श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है संपादक – डॉ. विजय चौरसिया जी द्वारा सम्पादित “पण्डुवानी” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २२० ☆
☆ “पण्डुवानी” – संपादक : डॉ. विजय चौरसिया ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक : पण्डुवानी
संपादक : डॉ. विजय चौरसिया
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव
☆ पण्डवानी : लोक स्मृतियों में जीवित महाभारत – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
महाभारत एक ऐसा महाकाव्य है जो, भारतीय समाज की सामूहिक स्मृति का विशद आख्यान है। विभिन्न भाषाओं और लोक परंपराओं में अपने विशिष्ट रूप इसकी कथाएं आकर्षक आकार ग्रहण करती रही है।
लोकजीवन में प्रवेश करके इसकी कथाएँ स्थानीय संस्कृति, विश्वासों और जीवनानुभवों से जुड़ जाती हैं।
डॉ. विजय चौरसिया द्वारा संपादित पुस्तक पण्डुवानी, गोंड परधान समुदाय की इसी समृद्ध मौखिक परंपरा से परिचित कराती है।
परधान समुदाय पारंपरिक रूप से गायक, कवि और पुरोहित की भूमिका निभाता रहा है। उसकी पण्डुवानी, गोंडवानी और रामायनी जैसी लोकगाथाएँ सामुदायिक स्मृतियों तथा सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रखने का माध्यम रही हैं। इन गाथाओं में महाभारत के परिचित पात्र लोक कल्पना और स्थानीय जीवनदृष्टि के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं।
पद्मश्री तीजन बाई ने पंडवानी गायन एवं प्रस्तुति की उनकी बोल्ड शैली से ही उनकी विशिष्ट पहचान बनाई थी।
पंडवानी, में वीरता के साथ श्रृंगार का भी वर्णन है और भीम का चरित्र विशेष रूप से उभरता है।
पुस्तक में तेरह प्रसंग संकलित हैं। इनमें कौरव पांडव के बचपन के खेल, भीम का विवाह, लाखा महल, जलसेन मगर से युद्ध, अर्जुन का विवाह, राजा कीचक का वध, बैराट राज्य और महाभारत युद्ध जैसे प्रसंग शामिल हैं। कैलासुगढ़, लोहारीगढ़, गोबरगढ़ और सूरजगढ़ से जुड़े आख्यान इस लोक साहित्य के विशिष्ट कथात्मक संसार का परिचय देते हैं।
कौरव पांडव के बचपन के खेल का प्रसंग लोक कल्पना की रोचक बानगी है। अर्जुन को खेल में शामिल करने के बहाने कौरव उसे परेशान करने की योजना बनाते हैं। खेल में डंडा चौबीस कोस दूर जा गिरता है और उसे लेने जाने में शाम हो जाती है। दूरी का यह अतिरंजित वर्णन लोकगाथा की विशिष्ट शैली को दर्शाता है।
इस तरह के रोचक प्रसंगों की रोचक प्रस्तुति से थके हारे लोकजन इस आत्मीयता से जुड़ जाते हैं कि पेट्रोमेक्स की रोशनी में भी रात रात भर भीड़ बनाकर दर्शक मंत्रमुग्ध पंडवानी देखते रहते हैं।
सबका जाना हुआ प्रसंग भी हर बार नया आनन्द देता है।
साधारण खेल भी कथा, संघर्ष और कल्पना का विराट रूप ले लेता है।
पुस्तक की भूमिका में परधान गायकों के पारंपरिक वाद्य बाना, जिसे किंकणी भी कहा गया है, का उल्लेख भी मिलता है। लकड़ी, बकरी की खाल और घोड़े के बाल से निर्मित इस वाद्य का विवरण बताता है कि लोकगाथा केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि गायन और वादन से जुड़ी जीवंत सांगीतिक कला भी है।
इस परंपरा के संकलन का ऐतिहासिक महत्व भी है। भूमिका के अनुसार, पद्मश्री स्वर्गीय शेख गुलाब जी ने लगभग छह दशक पूर्व गोंड प्रदेश में जाकर इन गाथाओं का संकलन किया था। वर्ष 1964 में आदिमजाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्था, छिंदवाड़ा द्वारा इसका प्रकाशन हुआ। डॉ. विजय चौरसिया का संपादकीय प्रयास इस सांस्कृतिक विरासत को नए पाठकों तक पहुँचाने की नई कड़ी है।
पण्डुवानी का महत्व इस बात में है कि यह महाभारत को लोक समाज की दृष्टि से देखने का अवसर देती है। इसके आख्यानों में वीरता, विवाह, युद्ध, धार्मिक आस्थाएँ और सामुदायिक स्मृतियाँ एक साथ अभिव्यक्त होती हैं। पुस्तक हमें याद दिलाती है कि भारतीय महाकाव्य परंपरा केवल लिखित ग्रंथों में नहीं, लोक गायकों की वाणी और समुदायों की सांस्कृतिक स्मृति में भी जीवित है। लोक साहित्य के अध्येताओं और आदिवासी संस्कृति में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह संकलन विशेष महत्व रखता है।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
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≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





