श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय  लघुकथा  ‘लिफाफा’).   

☆ लघुकथा # 107 ☆ लिफाफा ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

उस बेचारी ने कलेक्ट्रेट में ज्वाइन किया। 

कुछ दिन बाद नेता जी ने खबर भिजवाई कि हर महीने की पांच तारीख तक लिफाफा पहुंच जाना चाहिए।

वो भोली थी, पिता की लाडली थी उसी पिता की जो बार्डर पर कुछ साल पहले शहीद हो गए थे। उस बेचारी ने लिफाफे का मतलब नहीं समझा तो उसने चपरासी से लिफाफे के बारे में पूछा। चपरासी ने बताया कि नेताजी सब अधिकारियों से हर माह उगाही करते हैं, और लिफाफा लेते हैं। 

पिता के शहीद होने के बाद उस बेचारी ने बड़ा संघर्ष किया था, पैसे पैसे के लिए तरस गई थी, और पहली तनख्वाह में नेता जी को घूंस वाला लिफाफा देकर नौकरी बचाने की बात उसे जमी नहीं। उसने विरोध किया, बात चपरासी से होती हुई  ऊपर तक गई, और नेता जी तक पहुंच गई। 

दो महीने बाद उस बेचारी को एक लिफाफा मिला, खोलकर देखा तो प्रदेश के बार्डर के पिछड़े जिले के लिए उसका ट्रान्सफर आर्डर था।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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Shyam Khaparde

उत्कृष्ट व्यंग भाई