(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२८ ☆
व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ऊँट के मुँह में जीरा डालने से न ऊँट का पेट भरता है, न जीरे की ही प्रतिष्ठा बढ़ती है। पर हमारे देश में यह व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन चुका है। जहाँ देखिए, वहीं जीरे बाँटे जा रहे हैं और ऊँट मुस्कुराते हुए भूखे रहने का अभ्यास कर रहे हैं।
सरकार हर 6 माह में मंहगाई राहत की घोषणा करती है, । कर्मचारी पूछता है, कितना? जवाब आता है, इतना कि समाचार की हेडलाइन बन जाए, मगर जेब की सिलवट भी न बदले। यानी ऊँट के मुँह में जीरा।
लेखक को वर्षों की तपस्या , प्रकाशक की मिन्नत , जोड़ तोड़ के बाद पुरस्कार घोषित होता है। पुरस्कार राशि देखकर लेखक भावुक हो गया। इसलिए नहीं कि रकम अधिक थी, बल्कि इसलिए कि यात्रा भत्ता उससे महँगा था । सम्मान का शॉल इतना बड़ा कि उसमें पूरा लेखक लिपट जाए, लेकिन लिफाफा इतना हल्का कि हवा भी उसे उड़ा ले जाए। साहित्य ने फिर कहा, “सम्मान अमूल्य होता है।” लेखक मन ही मन बोला, “हाँ, इसलिए उसका मूल्य कोई नहीं देता।”
आजकल संस्थाएँ भी जीरा वितरण अभियान चला रही हैं। पाँच सौ रुपये का मानदेय देकर लिखती हैं, “आपका अमूल्य सहयोग मिला।” अमूल्य सहयोग का मूल्य पाँच सौ! लगता है शब्दकोश भी अब महँगाई से डर गया है।
ज्यादा साहित्य प्रेमी आयोजक अपनी इज्जत बचाने के लिए स्वयं ही मानदेय को पत्रम पुष्पम लिख देते हैं, या सुदामा के चावल कहकर उसे थोड़ा ललित टच दे कर अपनी झेंप पता नहीं किससे मिटा लेते हैं।
डिजिटल दुनिया ने तो जीरे को और आधुनिक बना दिया है। घंटों का वेबिनार, दर्जनों स्लाइड, अंत में धन्यवाद और एक ई-प्रमाणपत्र।
प्रमाणपत्र डाउनलोड करते-करते बिजली का बिल ज़्यादा आ जाए तो आयोजक की आत्मा प्रसन्न हो जाती है कि ज्ञान का प्रसार सफल रहा।
शिक्षा में भी यही हाल है। बच्चों से कहा जाता है, बड़े सपने देखो। फिर स्कूल की लाइब्रेरी में तीन किताबें और उन पर चार ताले। खेलो, आगे बढ़ो, मगर मैदान पार्किंग बन चुका है। सपनों का ऊँट दौड़ना चाहता है, व्यवस्था उसे जीरा चबाने का प्रशिक्षण दे रही है।
महँगाई सबसे बड़ी जीरा विशेषज्ञ है। वेतन बढ़ा दो प्रतिशत, खर्च बढ़ा बीस प्रतिशत। फिर अर्थशास्त्री बताते हैं कि आपकी आय में वृद्धि हुई है। सचमुच हुई है, कैलकुलेटर पर, जेब में तो वही पुराना ऊँट बैठा जुगाली कर रहा है।
सोशल मीडिया ने इस मुहावरे को लोकतांत्रिक बना दिया है। किसी ने एक पौधा लगाया, सौ सेल्फियाँ खिंच गईं। किसी ने दो किताबें दान कीं, पचास पोस्ट लिख दीं। काम जीरा, प्रचार ऊँट। एक दर्जन केले मरीजो में बांटकर पुण्यात्मा बन कर ऊंट की तरह अस्पताल से निकलते नेता जी की फोटो अखबार में देखी ही होंगी ।
हम सब भी कहीं न कहीं इस खेल के हिस्सेदार हैं। रिश्तों में समय नहीं, लेकिन इमोजी भरपूर। पड़ोसी की खबर नहीं, मगर “टेक केयर” का संदेश तुरंत पहुँच जाता है। संवेदनाएँ भी अब इंस्टेंट जीरे की पुड़िया बन गई हैं। व्हाट्सएप पर ज्ञान त्वरित फॉरवर्ड कर देते हैं, किंतु अमल में नहीं लाते ।
दरअसल समस्या जीरे की नहीं, ऊँट की भूख को समझने की है। भूख बड़ी हो और समाधान प्रतीकात्मक, तो व्यंग्य अपने आप जन्म लेता है। समाज को रोटी चाहिए, हम उसे रिबन काटकर आशाई भरोसा परोस देते हैं। लेखक को सम्मान के साथ श्रम का मूल्य चाहिए, हम उसे स्मृति-चिह्न थमा देते हैं। नागरिक को सुविधा चाहिए, हम उसे घोषणा दे देते हैं।
अंत में लगता है कि इस मुहावरे का संशोधित संस्करण लिख देना चाहिए, “ऊँट अब जीरा नहीं माँगता, उसे इतना अनुभव हो गया है कि वह पहले लिफाफे का वजन तौलता है।”
और हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जीरा बाँटने वाले स्वयं को अन्नदाता समझते हैं।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बातों के भूत…“।)
अभी अभी # १०८५ ⇒ आलेख – बातों के भूत श्री प्रदीप शर्मा
पहली बात तो भूत होते ही नहीं, और अगर होते भी हैं, तो उनसे डरने की कोई जरूरत नहीं, बस भृगु बनने की है। भूत बातों से नहीं मानते। घोड़ा हवा से बात करता है, और भूत से लातों से ही बात की जाती है। सुना है, भूत के पांव उल्टे होते हैं, जब कुछ लोग उल्टे पांव लौट आते हैं, तो शंका होती है, कहीं ये वो तो नहीं।
भूत के पाँव तो खैर इसलिए उल्टे होते हैं, कि जब उसे लात पड़े, तो भागने में सहूलियत हो। बेचारे भूत की इतनी फजीहत, कि पहले तो उससे लातों से बात करना, और जब वह उल्टे पांव भागने लगे तो उसकी लंगोटी पर भी नज़र रखना। भागते भूत की लंगोटी भली ! वाह रे इंसानियत।।
वैसे भूत अधिकतर किस्से कहानियों और फिल्मों में ही होते हैं, लेकिन क्या पता, कब, किस पर, किस बात का भूत सवार हो जाए। जब हम पर किसी बात का भूत सवार होता है तो फिर हमें भूत से डर नहीं लगता, लोग हमसे डरने लगते हैं। जब हम पर क्रिकेट का भूत सवार होता था तो मोहल्ले के मकानों की खिड़कियों के शीशे तड़ातड़ टूटने लगते थे। शीशे तो जुड़ गए, लेकिन क्रिकेट का भूत आज भी नहीं उतरा।
अंध विश्वास की भी हद होती है। लोगों को हवा में भूत नजर आता है। सुनसान हवेली की ओर जाने से मना किया था, लेकिन आज की पीढ़ी कभी किसी की सुनती है, अब आठ रोज से बुखार में पड़े हैं, कुछ भी बड़बड़ा रहे हैं, अजीबोगरीब हरकतें कर रहे हैं। ओझा को बुलाया है, अब तो वही भूत उतारेगा। भूत उतरे, ना उतरे, अच्छी लू उतरने वाली है, जब झाड़ुओं से पूजा होगी। भूत भागता नजर आएगा।।
मैं किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ़ हूं। इंसान हो या भूत ! पहले लातों से नहीं, बातों से ही मामला सुलझाना चाहिए। लेकिन इसमें एक समस्या और आ खड़ी होती है। किसी पर अगर बातों का ही भूत सवार हो, तो क्या करना चाहिए। आप समझ रहे हैं न बात को।
कुछ लोगों पर बातों का भूत सवार होता है। बातें ही बातें। जैसे बरसात में किसी छाते की दुकान में छाते ही छाते ! इतनी बातें, इतनी बातें, कि बस बातें ही बातें। पहले बातों के लिए मुलाकातें जरूरी होती थी। लोग किसी बातूनी इंसान को देखते ही, पतली गली से निकल लेते थे, अभी मिलेगा तो चाट जाएगा। इंसान भूत से नहीं, ऐसे बातूनी इंसान से अधिक डरता था।।
आज भी डर लगता है, क्या भरोसा कब, किस पर, बातों का भूत सवार हो जाए। मैने लोगों को आधे आधे घंटे वॉक एंड टॉक शो में मशगूल देखा है। अनलिमिटेड डाटा और अनलिमिटेड बांतां। बस कान में स्पीकर लगे हैं और अपना स्पीकर, यानी मुंह भी चालू है। ऐसे चलते फिरते बातूनी भूत मॉर्निंग वॉक और इवनिंग वॉक में बहुतायत से देखे जा सकते हैं।
कौन अधिक बात करता है और कौन कम, यह नहीं जानते हम, लेकिन हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय जरूर आता है, जब उस पर बातों का भूत सवार होता है। कहीं कहीं तो भोजन की तरह बातें भी हजम नहीं होती। बातें ही उनका हाजमोला होती हैं। पेट में गुड़गुड़ होने लगती है। ठीक से किसी से बात हो जाए, तो सब ठीक हो जाता है।।
जिस तरह लातों के भूत बातों से नहीं मानते, बातों के भूत का इलाज भी लातों से संभव है, यह हम नहीं मानते। यह छोटी सी बात नहीं, गंभीर बात है। कुछ लोग बड़ी प्यारी बातें करते हैं, लगता है, जैसे मुंह से फूल झर रहे हों। बच्चों की बातें कितनी प्यारी लगती हैं।
बातों का एक दर्दनाक पहलू भी है ! किसमें कितना दर्द भरा है, कौन जाने। दो घड़ी अगर बात करने से हल्कापन महसूस होता है तो क्या बुरा है। आधी मानसिक बीमारियां मन ही मन घुटते रहने से होती है;
मेरी बात रही मेरे मन में
कुछ कह ना सकी उलझन में;
से तो अच्छा है;
आपके पहलू में आकर रो दिए।
दास्ताने गम सुना कर रो दिए।।
बातों बातों में कभी कभी ऐसा भी हो जाता है;
जो हमने दास्तां अपनी सुनाई
आप क्यूं रोए !
किसी के दुख दर्द को कम करना, अथवा दूर करना ही तो वास्तव में भूत उतारना है ..!!
📖 दि. ४/९/२६ ते दि. ७/९/२६ — अंक बंद असल्याबद्दल महत्वाची सूचना!! 📖
कृपया सर्वांनी नोंद घ्यावी – –
काही अपरिहार्य कारणामुळेशुक्रवार दि. ४/९/२६ ते सोमवार दि. ७/९/२६ असे ४ दिवस दैनिक अंक प्रकाशित केला जाणार नाही.मंगळवार दि. ८/९/२६ पासून अंक नेहेमीप्रमाणे प्रकाशित केला जाईल.
सर्वांचे सहकार्य अपेक्षित आहे.
ई-अभिव्यक्ती, मराठी विभाग.– संपादक मंडळ
ई – अभिव्यक्ती, मराठी विभाग
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
आषाढाच्या धूसर पाऊलखुणा मागे टाकत श्रावण जेव्हा अंगणात येतो तेव्हा निसर्गाच्या चेहऱ्यावर एक वेगळीच प्रसन्नता खुलते..आकाशाच्या निळ्या ओठांवर काळ्या मेघांची हळवी कुजबुज सुरू होते आणि क्षितिजावर पावसाच्या रेशमी पडद्याआड हिरवाईचे स्वप्न आकार घेते. श्रावण म्हणजे केवळ निसर्गाने परिधान केलेला हिरवा शालू आहे.. मातीच्या कपाळावर उमटलेले पावसाचे कुंकू आहे आणि मनाच्या कोपऱ्यात अलगद जागवणारी आठवणींची सनई आहे म्हणूनच श्रावण आला की मन नकळत म्हणते
‘हा ऋतू आहे की आनंदाची एखादी अवखळ लहर? ’
श्रावणाच्या आगमनाची चाहूल लागताच वातावरणात जादू भरते. काळेकुट्ट ढग आकाशात जमू लागतात. क्षणभर सूर्य त्यांच्यामागे लपतो आणि पुढच्याच क्षणी पावसाच्या टपोऱ्या थेंबांची रिमझिम सुरू होते.. ते थेंब जणू आभाळाने पृथ्वीच्या कुशीत पाठवलेली मोत्यांची पत्रेच असतात… कोरड्या मातीवर पहिला पाऊस पडतो आणि मातीचा सुगंध चारही दिशांना दरवळतो.. त्या सुगंधात बालपण दडलेले असते, शेतकऱ्याचे स्वप्न असते आणि जगण्याची नवी उमेदही असते.
श्रावणाचा पाऊस कधी शांत, कधी खट्याळ तर कधी धुवांधार असतो.. कधी तो खिडकीच्या काचेवर बोटांनी टपटप वाजवत गुपित सांगतो तर कधी छपरावर ढोल वाजवत बेभान नाचतो… कधी रिमझिम सरींच्या रूपाने तो आकाशातून उतरतो तर कधी मुसळधार धारांनी पृथ्वीला चिंब भिजवून टाकतो.. त्याच्या या लहरी स्वभावामुळेच तो खरा ‘”अवखळ श्रावण’” वाटतो. एखाद्या लहान मुलासारखा तो क्षणात हसतो, क्षणात रडतो आणि पुन्हा क्षणात खळखळून हसवतो.
शेतांच्या बांधावर तर श्रावणाने हिरव्या रंगाची उधळणच केलेली असते… कालपर्यंत उन्हाने करपलेली जमीन आज हिरव्या गालिच्याने नटलेली दिसते… भाताची कोवळी रोपे वाऱ्याच्या तालावर डोलू लागतात.. ज्वारी-बाजरीची पिके पावसाशी कुजबुजतात.. रानफुलांचे रंगीत ठिपके हिरव्या चादरीवर विखुरलेल्या तारकांसारखे भासतात.. झाडांच्या फांद्यांवर नव्या पालवीचे दागिने चमकतात नी वेली झाडांना बिलगून जणू प्रेमाची मिठीच मारतात.. निसर्गाचा हा साज पाहताना डोळे तृप्त होतात आणि मनाला एक अनामिक शांतता लाभते..
श्रावण म्हणजे पक्ष्यांचाही उत्सव.. पावसाच्या सरींमध्ये भिजत कोकिळेचा मधुर स्वर दूरवर ऐकू येतो.. चिमण्या घरट्याच्या उंबरठ्यावर बसून पावसाकडे कुतूहलाने पाहतात. मोर तर श्रावणाचा जणू राजदूतच..! काळ्या ढगांचे दर्शन होताच तो पिसारा फुलवतो आणि निळ्या-हिरव्या रंगांची इंद्रधनुषी आरास करीत नाचू लागतो.. त्याच्या नृत्यात आनंदाचा उन्माद असतो. त्याला पाहून वाटते की जणू काही पृथ्वीनेच आकाशाच्या प्रेमात पडून नृत्य सुरू केले आहे.
श्रावणाच्या दिवसांना धार्मिक आणि सांस्कृतिक रंगही लाभलेला असतो.. मंदिरांच्या घंटानादाने वातावरण मंगलमय होते… सोमवारी शिवमंदिरांत भक्तांची गर्दी होते. हिरव्या बांगड्यांची खणखण, हातांवरील मेंदीचा सुगंध आणि झुल्यांवरील हास्य यामुळे गावोगावचे वातावरण उत्साहाने भरून जाते. नागपंचमी, मंगळागौर, नारळी पौर्णिमा, रक्षाबंधन अशा सणांनी श्रावण अधिकच रंगतदार होतो.. प्रत्येक सणामागे निसर्गाशी आणि मानवी जीवनाशी जोडलेले प्रेमाचे, कृतज्ञतेचे आणि नात्यांचे धागे असतात.
मंगळागौरीच्या रात्री तर गावातील अंगणे जागी होतात. पारंपरिक खेळ, फुगड्या, गाणी आणि हास्य यांच्या लयीने रात्र बहरते. कुठे झोका उंच जातो, कुठे बांगड्यांचा नाद घुमतो तर कुठे आजीच्या जुन्या श्रावणी आठवणी नव्या पिढीच्या कानात अलगद उतरतात.. त्या क्षणी काळ जणू थांबतो आणि भूतकाळ व वर्तमान एकाच झुल्यावर झुलू लागतात..
शहरातला श्रावणही तितकाच मोहक असतो फक्त त्याचे रूप वेगळे असते.. रस्त्यांवर छत्र्यांची रंगीबेरंगी गर्दी दिसते.. पावसाने धुतलेल्या इमारती नव्याने उजळून निघतात.. गरमागरम चहाचा कप हातात घेऊन खिडकीतून कोसळणाऱ्या सरींकडे पाहण्यात एक विलक्षण आनंद असतो. कांदा भजी, वाफाळता चहा आणि बाहेर बरसणारा पाऊस
या त्रिवेणी संगमाला कोण नकार देईल?
मात्र श्रावणाचा खरा अर्थ केवळ रोमँटिक पावसात नाही.. या ऋतूमागे शेतकऱ्याच्या आशेची धडधडही आहे. पाऊस वेळेवर पडला तर शेत हिरवेगार होते पाऊस दगा देतो, तर त्या हिरवाईवर काळजीची सावली पडते. त्यामुळे श्रावणातील प्रत्येक थेंब हा शेतकऱ्यासाठी अमृताचा थेंब असतो. त्याच्या डोळ्यांतल्या आशेचे प्रतिबिंब हिरव्या शिवारात दिसते.
श्रावण हा बाहेरच्या निसर्गाला जितका भिजवतो तितकाच तो मनालाही चिंब करून जातो…
श्रावण संपताना मनाला एक हुरहूर लागते. झाडांच्या पानांवरून ओघळणारे थेंब जणू निरोपाचे अश्रू वाटतात.. आकाश स्वच्छ होते, ढग दूर निघून जातात पण श्रावणाने मनात पेरलेली हिरवाई तशीच राहते.. पावसाचा सुगंध, मोराचा नाच, झुल्याची उंच भरारी, सणांची लगबग आणि ओल्या मातीचा गंध
या साऱ्या आठवणी मनाच्या कप्प्यात कायमच्या साठून राहतात…
असा हा अवखळ श्रावण..! कधी सरींच्या रूपाने हसणारा, कधी ढगांच्या रूपाने रुसणारा, कधी मोराच्या पिसाऱ्यात नाचणारा तर कधी मातीच्या सुगंधातून मनाला स्पर्शणारा. तो निसर्गाचा उत्सव आहे… भावनांचा झरा आहे आणि नवजीवनाची चाहूल आहे म्हणूनच श्रावण आला की मनाच्या आकाशातही काळे ढग दाटतात पण त्या ढगांतून बरसतो तो पाऊस नव्हे तर आनंद, आठवणी आणि जगण्याची नवी हिरवी उमेद.!
राघव – पन्नाशी उलटून गेली होती त्याची. मान खाली घालून आजवर नोकरी केली, बाकी कधी काही छानछौकी केली नाही, पण आयुष्यात एकदातरी कैलास–मानसरोवरला जायचंच अशी त्याची तीव्र इच्छा होती.
… आणि यावर्षी, अचानकपणे, ध्यानीमनी नसताना, ही त्याची इच्छा पूर्ण होण्याची संधी आली होती. पार्ल्याच्या जोशीकाकांच्या ग्रुपतर्फे त्याचा मित्र जाणार होता, पण वडिलांची प्रकृती अचानक बिघडल्याने त्याला जमणार नव्हतं, त्यानं राघवला विचारलं, आणि, राघव, अर्थात, एका पायावर तयार झाला. पासपोर्ट – व्हिसाचे सोपस्कार पूर्ण झाले आणि त्याने पत्नी मीराला सांगितलं, “मी यावर्षी मानसरोवरला जाणार आहे.”
मीरा काही क्षण शांत राहिली. “एकट्यानं? ”
“यात्रेचा ग्रुप आहे. काळजी करू नकोस.”
मीरा त्याच्याकडे पाहत हसली. “तुम्ही इतक्या दूर चाललात… आणि मी तुमची काळजी करायची नाही? ”
राघव हसला. “अगं, खुद्द महादेव आहेत ना सोबत.”
मीरा काही बोलली नाही. तिने कपाट उघडलं. तिने हळूच एक छोटासा फोटो काढला. त्यात राघव, मीरा, त्यांची मुलगी, जावई आणि छोटासा नातू होता. तिने तो फोटो राघवच्या बॅगेच्या पुढच्या कप्प्यात ठेवला.
राघवने ते पाहिलं.
“हा फोटो कशाला? ”
मीरा काहीच बोलली नाही, फक्त मंद हसली.
राघव हसला. “तुला माहिती आहे ना? मी परत येणार आहे.”
मीरा त्याच्याकडे काही क्षण पाहत राहिली. मग फक्त एवढंच म्हणाली, “कैलासाला जाऊन आल्यावर माणूस बदलतो.”
राघव निघाला. नेपाळमधून कैलासकडे जाणारा प्रवास सुंदर होता. डोंगर… धुकं… बर्फ… आणि त्या भव्य हिमालयाच्या कुशीतून जाणारा, वळणावळणाचा छोटासा रस्ता.
राघव अधूनमधून मोबाईलमध्ये फोटो काढत होता. एकदा त्याने मीराला व्हिडिओ कॉल करण्याचा प्रयत्न केला. नेटवर्क मिळालं नाही. त्याने मेसेज टाइप केला, “इथले पर्वत खूप सुंदर आहेत. तुला आवडले असते.”
मेसेज गेला नाही.
राघव हसला. “घरी गेल्यावर दाखवतो.”
तेव्हा त्याला ठाऊक नव्हतं की हा त्याचा साधा विचार त्याच्या आयुष्याचा सर्वात मोठा आधार बनणार होता.
२६ ऑगस्ट २०२६.
सकाळची वेळ. नाश्ता करून नुकताच बसचा प्रवास सुरू झाला होता त्यांचा.
… आकाश अचानक काळवंडलं.
पावसाचा जोर वाढला.
गाडीतील लोक अस्वस्थ झाले.
आणि अचानक…
दूरवरून एक भयानक आवाज आला.
गर्जना.
जणू संपूर्ण पर्वत तुटून खाली येत होता.
ड्रायव्हरने गाडी थांबवली.
“बाहेर पडा! जीव वाचवा! पळा! ”
लोकांना काहीच समजत नव्हतं.
पण पुढच्या क्षणी त्यांनी जे पाहिलं…
ते दृश्य ते आयुष्यभर विसरू शकणार नव्हते.
वरून पाण्याचा एक महाकाय लोंढा येत होता. बर्फ, दगड, झाडं, माती – त्या लोंढ्याच्या कचाट्यात जे सापडत होतं त्याला फरफटत नेत होता तो. रस्त्यावरची वाहनंही त्या पुरात खेळण्यांसारखी उलटत होती, इमारती कोसळत होत्या.
हे बघितलं, आणि सगळ्यांना परिस्थितीच्या भीषणतेची जाणीव झाली. लोक जीवाच्या आकांताने पळू लागले.
राघवही धावत होता.
पण एका क्षणी त्याचा पाय घसरला.
तो खाली पडला. पाठीवरची बॅग दूर फेकली गेली.
आणि त्याच क्षणी पाण्याचा जोरदार प्रवाह आला.
राघवने बॅग पकडण्याचा प्रयत्न केला.. पण ती त्याच्या हातातून निसटली.
आणि त्या बॅगेत होता… मीराने दिलेला तो फोटो.
राघव दूर जाणाऱ्या त्या बॅगकडे पाहत राहिला. “मीरा…”
लोकांनी त्याला ओढून उंच जागेवर नेलं.
रात्र झाली.
वाचलेले लोक एका छोट्या इमारतीत आश्रयाला होते.
.. बाहेर पाऊस.
.. आत भीती.
मोबाईल नेटवर्क नव्हतं, इलेक्ट्रिसिटी नव्हती. कुणाचा फोन लागत नव्हता. कुणाला आपल्या कुटुंबाची खबर नव्हती.
.. एक आई आपल्या मुलाला छातीशी धरून बसली होती.
.. एक वृद्ध माणूस सतत प्रार्थना करत होता.
आणि राघव…
एका कोपऱ्यात सुन्न बसला होता.
त्याच्या हातात मोबाईल होता.
त्याने पुन्हा नंबर लावला.
मीरा…
कॉल लागला नाही.
पुन्हा.
काहीच नाही.
त्याने मोबाईल बंद केला. डोळे मिटले.
आणि त्याला आठवलं – मीरा त्याला विमानतळावर निरोप देताना म्हणाली होती, “लवकर या.”
राघवच्या डोळ्यांत पाणी आलं.
त्याने दोन्ही हात जोडले.
“महादेवा…”
काही क्षण तो गप्प राहिला.
मग कुजबुजला,
“नको मला कैलासाचं दर्शन…”
त्याच्या आवाजात हुंदका होता.
“नको मानसरोवराचं…”
त्याने डोळे घट्ट मिटले.
“मला फक्त…”
आवाज तुटला.
“…माझ्या मीराकडे परत जायचं आहे, मला घरी जायचं आहे. इथले फोटो मीराला दाखवायचे आहेत.”
पुढचा दिवस आणखी भयानक होता.
हिमस्खलनाचा धोका होता.
आणखी एक मोठा पूर येण्याची भीती होती.
बचावकार्यात असंख्य अडथळे येत होते.
सगळे जण जणू मृत्यूची वाट पाहत बसून राहिले आहेत असं वाटत होतं.
राघव एका दगडावर बसला होता.
त्याच्या शेजारी एक तरुण नेपाळी मुलगा होता.
तो म्हणाला, “अंकल, घाबरू नका. हेलिकॉप्टर येईल.”
राघव हलकंसं हसला.
“तुला खात्री आहे? ”
मुलगा म्हणाला,
“हो.”
“कशी? ”
मुलगा काही क्षण शांत राहिला.
मग म्हणाला,
“कारण माझी आई म्हणते… देव माणसांना एकटं सोडत नाही.”
राघव त्या मुलाकडे पाहत राहिला.
… आणि त्याला अचानक मीरा आठवली.
ती सुद्धा असंच म्हणायची.
“देवावर विश्वास ठेव.”
काही तासांनी…
दूरवर हेलिकॉप्टरचा आवाज आला.
सगळे बाहेर धावले.
हेलिकॉप्टर वरून गेलं.
थांबलं नाही.
लोकांच्या चेहऱ्यावरची आशा पुन्हा मावळली.
राघव खाली बसला.
त्याने डोळे मिटले.
तेवढ्यात पुन्हा आवाज आला.
धड्… धड्… धड्…
… हेलिकॉप्टर परत येत होतं.
यावेळी ते खाली उतरलं.
बचाव पथक धावत आलं.
एकामागून एक लोकांना बाहेर काढलं जाऊ लागलं.
राघवही उठला.
तेवढ्यात त्यांच्या यात्रा कंपनीतल्या एका तरुण कर्मचाऱ्याने त्याला आवाज दिला.
“साहेब, ये आपका है क्या? “
राघव वळला.
त्या तरुणाच्या हातात एक वस्तू होती.
राघवचे डोळे मोठे झाले.
ती त्याची बॅग होती. पुराच्या पाण्यात वाहून गेलेली. मातीने माखलेली… त्याने थरथरत्या हाताने ती बॅग उघडली, मीराने दिलेला फोटो त्यात होता, मातीने माखलेला, कडांनी फाटलेला.
पण…
मीराचा चेहरा अजूनही त्यात स्पष्ट दिसत होता.
राघवने तो फोटो दोन्ही हातांनी धरला.
काही क्षण तो त्याच्याकडे फक्त पाहत राहिला.
मग फोटो छातीशी धरून तो ओक्साबोक्शी रडू लागला.
तो तरुण म्हणाला, “बॅग दगडांमध्ये अडकलेली होती.”
राघव काहीच बोलला नाही, त्यानं आकाशाकडे पाहिलं, हात जोडले.
हेलिकॉप्टर वर उडू लागलं.
खाली दिसणाऱ्या दरीकडे राघव पाहत राहिला.
रस्ते गायब झाले होते.
पूल वाहून गेले होते.
सगळीकडे नुसते चिखलाचे साम्राज्य पसरलं होतं.
नद्या आपला रौद्र चेहरा दाखवत होत्या.
आणि त्या सगळ्याच्या मध्ये…
हिमालय शांत उभा होता.
राघवच्या डोळ्यांत पुन्हा अश्रू आले.
तो फोटो हातात धरून म्हणाला,
“महादेवा… मी तुम्हाला भेटायला आलो होतो.”
त्याने फोटोतला मीराचा चेहरा पाहिला.
“पण तुम्ही मला परत पाठवलंत.”
मुंबईत विमानतळावर मीरा त्याची वाट पाहत होती.
राघव बाहेर आला.
दोघांची नजरानजर झाली.
मीरा काही क्षण तिथेच उभी राहिली, स्तब्ध, थबकलेली.
… मग ती धावत त्याच्याकडे गेली.
राघवने तिला घट्ट मिठी मारली.
इतकी घट्ट…
जणू पुन्हा कधीही सोडणार नव्हता.
.. मीरा रडत होती.
.. राघवही रडत होता.
काही मिनिटं दोघंही एक शब्दही बोलले नाहीत.
शेवटी मीरा कुजबुजली,
“कैलासाचं दर्शन झालं? ”
राघवने तिच्या डोक्यावर हात ठेवला.
“नाही.”
“मानसरोवर? ”
“नाही.”
मीरा त्याच्याकडे पाहत राहिली.
राघवने खिशातून तो फाटलेला, चिखलाने माखलेला फोटो काढला.
तो तिच्या हातात ठेवला.
“पण…”
त्याचा आवाज भरून आला.
“मला माझं मानसरोवर सापडलं.”
मीरा काही न समजल्यासारखी त्याच्याकडे पाहत राहिली.
राघव म्हणाला,
“मी देवाला भेटायला गेलो होतो.”
तो थांबला.
“पण मृत्यूच्या त्या क्षणी मला देव नको होता.”
.. त्याने तिचा हात घट्ट धरला.
“मला फक्त तू हवी होतीस, तुम्ही सगळे हवे होतात.”
मीराच्या डोळ्यांतून अश्रू ओघळले.
राघव हळूच म्हणाला,
“त्या दिवशी समजलं… देव कुठे असतो.”
“कुठे? ”
“आपल्या घरी, आपल्या माणसांत. जिथे कोणीतरी आपली वाट पाहत असतं.”
त्या रात्री राघवने तो फाटलेला फोटो देवघरात ठेवला.
मीराने त्याच्या शेजारी एक छोटासा दिवा लावला.
दोघे काही वेळ शांत बसून राहिले.
राघवने हात जोडले. त्याच्या डोळ्यांसमोर कैलास नव्हता… मानसरोवर नव्हतं.
होता…
एक छोटासा घराचा दरवाजा.
आणि त्या दारात उभी असलेली मीरा.
त्याने डोळे मिटले. आणि मनात म्हटलं—
“महादेवा, आयुष्यभर तुमच्यापर्यंत पोहोचण्याची इच्छा होती…
पण आता एकच प्रार्थना आहे—
माझ्या माणसांपासून मला कधीच दूर करू नका.”
कारण कधी कधी…
तीर्थयात्रा आपल्याला देवापर्यंत घेऊन जात नाही.
ती आपल्याला आपल्याच आयुष्याची किंमत समजावून सांगते.
कधी कधी…
हिमालय आपल्याला घाबरवतो, पूर आपल्याला वाहून नेतो, मृत्यू आपल्याला कवटाळतो…
आणि तरीही…
एखादा अनोळखी हात आपल्याला वाचवतो.
एखादा छोटासा फोटो पुरातून परत येतो.
आणि एखादी व्यक्ती विमानतळावर उभी राहून म्हणते—
“तुम्ही आलात… आता मला काही नको.”
तेव्हा जाणवतं…
कैलास कितीही उंच असो, मानसरोवर कितीही पवित्र असो…
आपल्या माणसाच्या मिठीत परत येण्यापेक्षा मोठी तीर्थयात्रा या जगात दुसरी नाही.
आणि कदाचित…
देवाकडे जाण्याचा सर्वात सुंदर मार्ग म्हणजे—
आपल्या माणसांकडे परत येणं.
(नेपाळ – चीनमध्ये अडकलेले सर्व श्रद्धाळू सुखरूप घरी पोहोचोत, ही प्रार्थना.)
एक मोठ्या मोठ्या उंच इमारतीचं नगर होतं. लोक खूप श्रीमंत होते. आधुनिक घरात रहात होते. आधुनिक तंत्रज्ञान वापरत होते. एका क्लिकवर सगळे पुढ्यात येत होते. भाजीपाला, समान सगळे क्षणात दरात येत होते.
हातात पैसाच पैसा होता. खाण्या पिण्याची चंगळ होती. आलिशान गाड्या होत्या. मुलं उत्तमोत्तम शाळेत जात होती. प्रत्येक हातात मोबाईल होता. टेबलवर संगणक होता. जग जवळ आलेले होते. नेटने जाळ्यात पकडलेले होते. सगळीकडे सुबत्ता होती. पण… कुठेतरी उणीव होती. आरोग्य मात्र बिघडलेले होते. डॉ.कडे मोठ्या रांगा होत्या. औषधांची दुकाने जोरात चालत होती. प्रत्येक माणशी काही ना काही आजार होता. मनस्वास्थ्य हरवले होते.
काय करावे कळेना. आरोग्य पैशाने विकत घेता येईना. सगळे होते चिंतेत.आपापल्या व्यथेत. तेवढ्यात एक माणूस आला. जणू देवदूतच भासला. खूप अनुभव त्याच्या गाठीला. एका मोठ्या कार्यक्रमात दाखल झाला. आनंदी राहण्याचा उपाय सांगतो म्हणाला. फक्त एक अट आहे म्हणाला. सगळे आवाज बंद करा. सर्वांनी जमिनीवर आसन धरा. लोकांनी तसेच केले. कारण सगळे होते शांतीचे आणि आनंदाचे भुकेले.
देवदूत म्हणाला खरेच मन:शांती व आनंद हवा असेल, तर माझे ऐकावे लागेल. एक व्रत करावे लागेल. सगळ्यांनी होकार भरला. प्रत्येक जण कान टवकारून ऐकू लागला. देवदूत बोलू लागला. चांगल्या गोष्टीची सुरुवात करायला श्रावण महिना आहे चांगला. फरक पडला तर कायम हे व्रत करा. आता फक्त सुरुवात करा.
या व्रतात काय करावे? सांगतो ऐका लक्ष द्यावे. आठवड्यात एक दिवस हे व्रत करावे. सकाळी लवकर उठावे. प्रथम मोबाईल, इंटरनेट बंद करावे. मोकळ्या हवेत फिरून यावे. फिरता फिरता स्वसंवाद करावे. उत्साहात घरी यावे. आई वडील यांच्या जवळ बसावे. छान छान बोलावे. सर्वांनी एकत्र चहा, नाश्ता घ्यावा. घरात मुलांशी खेळावे. गप्पा गोष्टी कराव्यात. थोडे स्वयंपाक घरात डोकवावे मदती साठी विचारावे. जमेल ते काम करावे. दुपारी निवांत वेळी जुने कपाट आवरायला घ्यावे. त्यातील जुने फोटोंचे अल्बम बघावे. आठवणींना जागवावे. कपाट आवरताना मनही आवरावे. वाटले तर दुपारी आळसावून झोपावे. नाहीतर आवडते संगीत ऐकावे. एक दिवस स्क्रीनचा उपास करावा. आरोग्याचा मार्ग धरावा. आनंदाचा रस्ता शोधावा. रात्री सर्वांनी हसत खेळत, गप्पा मारत सहभोजन करावे. सर्वांनी एक दिवस हॉल मध्ये गाद्या घालून झोपावे. असे व्रत करावे. फायदे अनुभवावे. चांगल्या आरोग्यदायी परिणाम मिळण्या साठी आठवड्यातून एकदा हे व्रत करावे. पुढच्या वेळी येईन तेव्हा अनुभव सांगावे. एवढे सांगून देवदूत निघून गेला. व्रत आचरणात आणण्याचा प्रत्येकाने निश्चय केला.
आपणही असे आचरण करावे. हे आपल्या चार्जिंगचे साधन समजावे. एक दिवस सुट्टी मिळाली म्हणून इकडे तिकडे जाऊन टेन्शन घेण्या पेक्षा हे उपाय करून बघावे. आपणच आपला आनंद शोधावा.
व्रत कसे वाटले सांगावे. आवडले न आवडले जरुर सांगावे.
आज सकाळीच गणेश सलून मध्ये कटिंग करण्यासाठी गेलो असता माझ्या आधीच एक गृहस्थ त्यांची कटिंग चालू होती,.. जुन्या ओळखीतून नमस्कार झाला,
स्व.अशोकराव अग्रवाल शेठ यांचे धाकटे चिरंजीव सन्माननीय विकास अग्रवाल यांची भेट झाली,
अनेक जुन्या आठवणीला वळसा घालताना फ्लॅश बॅक मध्ये गेलो,
त्यांच्या मोहक लाघवी गोड वाणीतून मनाला खूप बरे वाटले…
मला ते म्हणाले “माफ करा साहेब तुमचे नाव मला माहित नाही परंतु लॉर्ड्स मारुती व्हॅन वाले म्हणूनच आम्ही तुम्हाला ओळखतो…
इकडच्या तिकडच्या गप्पा चालू असताना मी त्यांना विचारले… “गोपाल प्रिंटिंग प्रेस” चे नाव तुम्हीं अजूनही व्यवसायातून जपून ठेवले आहे,
“ते म्हणाले आमच्या आजोबांची आणि वडिलांची ती कृपा आणि संस्कार आहेत…”
या यशस्वी व्यवसायाचे अती महत्वाचे राज त्यांनी बोलून दाखविले…
ते म्हणाले…”आमच्या वडिलांनी आम्हाला म्हणजे आमच्या तिघा भावांना दोन अतिशय महत्वाच्या गोष्टी शिकविल्या…”
“एक प्रत्येक ग्राहकांशी अगदी प्रेमाने अदबीने विनम्रपणे वागायचे कारण प्रत्येक ग्राहक आम्हाला काही न काही देऊनच जातो, “
“आणि दुसरे अतिशय महत्वाचे आपल्या कामगारांचे पगार दुनिया इकडची तिकडे होवो महिन्याच्या 1 तारखेला त्यांचा पगार झालाच पाहिजे, “
एवढे बोलल्यावर त्यांच्या आवाजात एक कंपन आले आणि गंभीर आणि भावनिक शब्दात ते सांगू लागले…
“वडील म्हणायचे महिन्याच्या 1 तारखेला कामगार नाही तर त्यांच्या कुटुंबातील प्रत्येक लहान थोर त्याच दिवसाची प्रकर्षाने वाट पहात असतो, “
घरातील किराणा असेल, लेकरांची कपडे लत्ते असतील, शालेय सामग्री असेल, चपला असतील, दूधवाला असेल, प्रत्येकाची देणेदारी, दवाखाना असेल…अशा अनेक गरजू गोष्टीची पूर्तता महिन्याच्या 1 तारखेला मोठी आशा धरून दरवाजाच्या उंबऱ्यावर उभी असते, “
“त्या एक तारखेला जेंव्हा आपला कामगार घरी जातो ना! “
“तेंव्हा त्यांच्या घरातील प्रत्येक जण मोठ्या आशेने दरवाज्याकडे टक नजर लावून बसलेले असतात, “
“आणि म्हणून त्यांच्या स्वप्नांचा आपण हिरमोड कधीच करायचा नाही”
थोडेसे भावनिक ते म्हणाले,
“या दोन वडिलांच्या तत्वावर आज आम्हीं “गोपाल प्रिंटिंग प्रेस” ला इथपर्यंत म्हणजे 82 वर्षानंतर ही व्यवस्थित चालू शकलो…”
पुढे जाऊन ते हेही म्हणाले…”आजही आम्ही तिघे भाऊ दीपक शेठ, संदीप शेठ आणि मी विकास एकत्र आहोत…”
“आमचे विचार आचार एक आहेत…”
“आमचे तिन्ही भावांचे कुटुंब एकत्र आहे…”
मी मनाशीच पुटपुटलो…
पवित्र ग्रंथ सांगतो…”तीन पदरी दोर सहसा तुटत नाही”
याचा प्रत्यय आज याची देही आला…
1943 साली अग्रवाल कुटुंबियांनी सुरू केलेले हे श्रीरामपूर शहरातील मेनरोड वरील दालन आजही “गोपाल प्रिंटिंग प्रेस” या नावाने दिमाखात यशस्वी रित्या चालू आहे…
छोट्याश्या भेटीतून दोन मूलमंत्र उराशी घेऊन आजचा दिवसाचे अत्यंत सार्थक झाल्याचे खूप मोठे समाधान आज मला झाले…