(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “प्यास” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १४१ ☆ प्यास ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “दुनिया सँवारने की शिकायत नहीं मुझे…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४६ ☆
दुनिया सँवारने की शिकायत नहीं मुझे… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
2 अप्रैल से एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी।
इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
There are journeys that are measured in miles, and there are those that unfold quietly within the chambers of the heart. The life of N. Padmanaban belongs to the latter—a gentle, unhurried unfolding across languages, landscapes, and lived experience.
Born in the southern soil of Tamil Nadu, with no early acquaintance with Hindi, he stepped into the wide and varied world of the State Bank of India as a young Probationary Officer. The years that followed—spent across the Bhopal circle, in the towns and cities of Madhya Pradesh and Chhattisgarh—were not merely years of service, but of silent absorption. Amid ledgers and responsibilities, another education was taking root: the slow, attentive learning of a language that was not his own, yet gradually became a trusted companion.
Hindi came to him not as an academic pursuit, but as a living presence—heard in conversations, shaped in classrooms during his tenure as Chief Instructor at the Staff Training Centre in Indore, and deepened through his travels as an Inspecting Official across the country. It was in these moments, woven between duty and movement, that language began to reveal its deeper music.
And then, as often happens in lives lived with quiet attentiveness, music itself entered more fully. Hindi film songs, with their rich emotional landscapes, and the steady cadence of All India Radio bulletins, became both teacher and muse. Over time, what began as a means to understand, turned into a means to feel.
In the stillness that followed retirement, translation emerged—not as an act of literal conversion, but as an offering. For he understood, with the sensitivity born of long reflection, that songs cannot be carried across languages word for word. Their rhyme, their rhythm, their cultural echoes often remain rooted in their native soil. Yet, their essence—the tender ache of love, the quiet resilience of hope, the searching questions of life, the gentle stirrings of faith, and the deep, unspoken current of patriotism—these can be felt, gathered, and re-expressed.
It is this essence that N. Padmanaban seeks to bring into English—carefully, respectfully, almost as one might carry a flame from one lamp to another, ensuring it neither flickers nor fades.
Now settled in Bengaluru, he lives a life marked by simplicity and inward richness. At eighty, his days are not a summation, but a continuation—of listening, of reflecting, of translating not just songs, but the many shades of a life thoughtfully lived.
In his work, one does not merely find translations. One finds a quiet bridge—between languages, between regions, and perhaps, between the outer world and the inner quest for meaning.
English rendition of the original Hindi song ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मक़ाम... from the Bollywood movie: Aap ki Kasam
☆ Turning Points in Life You Had Crossed Do Not Revisit You Again… ☆ English rendition by Shri N. Padmanaban ☆
Turning points in life you had crossed
Do not revisit you again.
Flowers bloom, people meet;
Flowers those wilted in winter,
Do not bloom afresh in spring.
People who had fallen apart in a jiffy
Do not meet again even after 1000 days.
Even after several calls life long
They do not respond.
Turning points in life you had crossed
Do not revisit you again.
Don’t blindly believe your eyes,
What you see is not what you get:
Suspicion is the foe of friendship, friends
Harbour it not in your bosom,
Lest you may feel sorry later.
Myriad best wishes may not
Fetch your dear friend.
Turning points in life you had crossed
Do not revisit you again.
Mornings dawn, nights follow
Time keeps ticking
In a blink, it goes ahead.
Mornings and evenings,
Days and nights
Once gone, gone for ever.
Turning points in life you had crossed
Do not revisit you again.
Credits:
Name of the film: Aap ki Kasam (1974) Lyricist: Anand Bakshi Singer: Kishore Kumar Music Director: Rahul Dev Burman
Lyrics of the original Hindi song in Devnagri script:
☆ ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मक़ाम ☆
ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मक़ाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते
ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मक़ाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते।
फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं
फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं
मगर पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं
वो बहारों के आने से खिलते नहीं
कुछ लोग इक रोज़ जो बिछड़ जाते हैं
वो हज़ारों के आने से मिलते नहीं
उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते।
आँख धोखा है, क्या भरोसा है
आँख धोखा है, क्या भरोसा है
सुनो दोस्तों, शक दोस्ती का दुश्मन है
अपने दिल में इसे घर बनाने ना दो
कल तड़पना पड़े याद में जिनकी
रोक लो, रूठ कर उनको जाने ना दो
बाद में प्यार के चाहे भेजो हज़ारों सलाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते।
सुबह आती है, रात जाती है
सुबह आती है, रात जाती है, यूँ ही
वक़्त चलता ही रहता है रुकता नहीं
एक पल में ये आगे निकल जाता है
आदमी ठीक से देख पाता नहीं
और पर्दे पे मंज़र बदल जाता है
एक बार चले जाते हैं, जो दिन-रात सुबह-ओ-शाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते
ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मक़ाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते।
फिल्म का नाम : आप की कसम (1974) गीत: आनंद बख्शी गीतकार : किशोर कुमार संगीत निर्देशक : राहुल देव बर्मन
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम रचना – हमें इल्म ही न था…।)
(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है एडवोकेट नीलम नांरग जी की पुस्तक के कहणापर श्री मनजीत सिंह की चर्चा।
☆ पुस्तक समीक्षा ☆ के कहणा (हरियाणवी काव्य संग्रह) – एडवोकेट नीलम नांरग☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆
किताब – के कहणा
कवयित्री – एडवोकेट नीलम नांरग (90344 22845)
पुस्तक समीक्षा – मनजीत सिंह (9671504409)
प्रकाशक – एस जैन पब्लिकेशन, रोहतक,
कीमत – 239 रूपये भारतीय
पृष्ठ -109
☆ ग्रामीण जीवन, स्त्री चेतना और सामाजिक यथार्थ का संवेदनशील चित्रण के कहणा काव्य – संग्रह ☆
नीलम नारंग की काव्य कृति “के कहणा” हरियाणवी भाषा में रचित एक अत्यंत संवेदनशील, सजीव और बहुआयामी कविता संग्रह है, जो अपने भीतर ग्रामीण जीवन की सुगंध, मानवीय संबंधों की ऊष्मा, स्त्री चेतना की दृढ़ता, सामाजिक सरोकारों की गंभीरता और प्रकृति के प्रति गहरे अनुराग को समेटे हुए है। यह कृति केवल कविताओं का संकलन भर नहीं है, बल्कि हरियाणा की मिट्टी, वहाँ के लोगों, उनकी सोच, उनके संघर्ष और उनके बदलते जीवन की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए ऐसा अनुभव होता है मानो पाठक किसी गाँव की पगडंडी पर चलते हुए वहाँ के जीवन को अपनी आँखों के सामने घटित होते देख रहा हो।
इस संग्रह की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी भाषा और अभिव्यक्ति है। हरियाणवी बोली की सहजता, उसकी खनक और उसकी आत्मीयता इस कृति को विशिष्ट बनाती है। कवयित्री ने भाषा को किसी साहित्यिक बंधन में नहीं बाँधा, बल्कि उसे उसी रूप में प्रस्तुत किया है जिस रूप में वह आम जन के जीवन में बोली और समझी जाती है। यही कारण है कि कविताएँ पढ़ते समय वे कृत्रिम नहीं लगतीं, बल्कि अपनेपन का गहरा अहसास कराती हैं। यह भाषा न केवल संप्रेषण का माध्यम बनती है, बल्कि भावों की सजीवता को और भी प्रखर करती है।
कविता संग्रह में स्त्री जीवन का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली और प्रेरणादायक है। “सयाणी छोरी”, “सुनो छोररयों”, “छोरियाँ” जैसी कविताओं में नारी के संघर्ष, उसकी मेहनत, उसकी आत्मनिर्भरता और उसके आत्मसम्मान को बहुत ही सशक्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहाँ स्त्री किसी दया या सहानुभूति की पात्र नहीं है, बल्कि वह अपने अस्तित्व को पहचानने वाली, अपने अधिकारों के लिए खड़ी होने वाली और समाज में अपनी पहचान बनाने वाली सशक्त इकाई के रूप में सामने आती है। कवयित्री ने यह स्पष्ट किया है कि बदलते समय के साथ ग्रामीण स्त्री भी अपनी सीमाओं को तोड़ रही है और हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है।
इन कविताओं में स्त्री के प्रति समाज की संकीर्ण मानसिकता पर भी करारा प्रहार किया गया है। “कमजोर मर्द”, “कैडी नजर” और “ईबे बाकी सै” जैसी रचनाएँ इस बात को उजागर करती हैं कि किस प्रकार आज भी समाज में स्त्री को कई तरह की बाधाओं और भेदभावों का सामना करना पड़ता है। कवयित्री इन विषयों को केवल सतही रूप में नहीं छूतीं, बल्कि उनके पीछे छिपी मानसिकता को भी उजागर करती हैं। यह दृष्टिकोण इस कृति को केवल भावनात्मक ही नहीं, बल्कि विचारोत्तेजक भी बनाता है।
ग्रामीण जीवन की सादगी, उसकी सुंदरता और उसके भीतर छिपी जटिलताओं का चित्रण इस संग्रह में अत्यंत मार्मिक ढंग से किया गया है। “मेरे गाम”, “गाम आए हां”, “ईसा समय” जैसी कविताएँ उस पुराने समय की याद दिलाती हैं जब गाँवों में रिश्तों में अपनापन था, जीवन में सरलता थी और लोगों के बीच एक अटूट जुड़ाव था। आज के समय में जब शहरीकरण और आधुनिकता के प्रभाव से यह सब धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है, तब ये कविताएँ उस खोती हुई संस्कृति की याद दिलाती हैं और एक प्रकार की भावनात्मक टीस उत्पन्न करती हैं।
कवयित्री ने केवल अतीत की स्मृतियों को ही नहीं संजोया, बल्कि वर्तमान की सच्चाइयों को भी पूरी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया है। आज का ग्रामीण जीवन भी चुनौतियों से भरा हुआ है—पलायन, बेरोजगारी, बदलते मूल्य और रिश्तों में आती दूरी जैसी समस्याएँ इस कृति में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती हैं। कवयित्री इन समस्याओं को न तो अतिरंजित करती हैं और न ही उनसे मुँह मोड़ती हैं, बल्कि उन्हें उसी रूप में प्रस्तुत करती हैं जिस रूप में वे समाज में मौजूद हैं।
प्रकृति के प्रति कवयित्री की संवेदनशीलता इस संग्रह का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। “जल है तो कल है”, “गमले से संवाद”, “यो आदमी” जैसी कविताओं में पर्यावरण संरक्षण का संदेश स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कवयित्री ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि किस प्रकार मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहा है और इसके परिणामस्वरूप पर्यावरण संकट उत्पन्न हो रहा है। इन कविताओं में केवल चेतावनी ही नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा भी निहित है।
प्रेम और मानवीय संबंधों का चित्रण इस कृति को और अधिक व्यापक बनाता है। “नू ही चाहूं”, “दुआ सा प्यार”, “पचास पार का प्यार” जैसी कविताएँ प्रेम के विभिन्न रूपों को उजागर करती हैं। यहाँ प्रेम केवल आकर्षण या भावुकता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर पड़ाव पर अपने अलग-अलग रूपों में प्रकट होता है। विशेष रूप से परिपक्व आयु में प्रेम के चित्रण ने इस संग्रह को एक नई दृष्टि प्रदान की है, जो सामान्यतः कम ही देखने को मिलती है।
पारिवारिक संबंधों की गहराई और उनकी भावनात्मक जटिलता को भी कवयित्री ने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। “मां”, “बाबू का साया”, “बापू की सोच” जैसी कविताएँ परिवार के भीतर के संबंधों को बड़ी ही सहजता और सच्चाई के साथ व्यक्त करती हैं। इन कविताओं में माता-पिता के त्याग, उनके सपनों और बच्चों के प्रति उनके निस्वार्थ प्रेम को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जो पाठक के मन को गहराई से प्रभावित करता है।
सामाजिक चेतना इस कृति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है। “कुण सा धर्म”, “हिंदुस्तान चाहिए”, “किसै खेल” जैसी कविताओं में समाज में व्याप्त विभाजन, धार्मिक भेदभाव और राजनीतिक स्वार्थों पर प्रश्न उठाए गए हैं। कवयित्री ने इन विषयों को बड़ी ही स्पष्टता और साहस के साथ प्रस्तुत किया है। इन कविताओं में एकता, भाईचारे और मानवीय मूल्यों को महत्व देने का संदेश दिया गया है, जो आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है।
इस संग्रह में जीवन के विभिन्न चरणों और अनुभवों को भी बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। “बचपन की बात”, “सुपने”, “जिंदगी” जैसी कविताएँ जीवन के अलग-अलग पड़ावों को दर्शाती हैं। बचपन की मासूमियत, युवावस्था के सपने और जीवन के संघर्ष—इन सभी को कवयित्री ने बहुत ही सजीवता के साथ चित्रित किया है। यह विविधता इस कृति को और अधिक समृद्ध बनाती है।
कवयित्री की शैली की एक विशेषता यह भी है कि वे जटिल विषयों को भी बहुत ही सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत करती हैं। उनकी कविताओं में किसी प्रकार का भारीपन या बोझिलता नहीं है, बल्कि वे सीधे दिल से निकलकर दिल तक पहुँचती हैं। यही कारण है कि यह कृति केवल साहित्य प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी समान रूप से आकर्षक है।
हालाँकि, इस कृति में कुछ सीमाएँ भी हैं। कुछ स्थानों पर भाषा की अत्यधिक स्थानीयता के कारण अन्य क्षेत्रों के पाठकों को समझने में कठिनाई हो सकती है। इसके अलावा, कुछ कविताओं में विचारों की पुनरावृत्ति भी देखने को मिलती है, जिससे कुछ हद तक नवीनता में कमी महसूस होती है। लेकिन ये छोटी-छोटी कमियाँ इस कृति के समग्र प्रभाव को अधिक प्रभावित नहीं करतीं।
दरअसल, यही स्थानीयता इस कृति की सबसे बड़ी ताकत भी है, क्योंकि यह हरियाणवी जीवन और संस्कृति को उसकी वास्तविकता के साथ प्रस्तुत करती है। यह कृति किसी सार्वभौमिक भाषा में लिखी गई होती तो शायद इतनी सजीव और प्रभावशाली न होती। इसलिए इसकी भाषा और शैली को उसकी मौलिकता के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
“के कहणा” केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज भी है, जो अपने समय और समाज की तस्वीर को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। यह कृति पाठकों को न केवल मनोरंजन प्रदान करती है, बल्कि उन्हें सोचने और अपने आसपास के समाज को समझने के लिए भी प्रेरित करती है।
कुल मिलाकर, नीलम नारंग की यह काव्य कृति हरियाणवी साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में देखी जा सकती है। यह कृति अपने विषय, भाषा, शैली और संवेदनशीलता के कारण पाठकों के मन में एक विशेष स्थान बनाने में सफल होती है। इसमें निहित भावनाएँ, विचार और संदेश पाठक को लंबे समय तक प्रभावित करते हैं।
अंत में मैं यही कहना चाहता हूं कि “के कहणा” एक ऐसी कृति है जो अपनी सादगी में ही अपनी सबसे बड़ी शक्ति को समेटे हुए है। यह कृति हमें हमारे मूल्यों, हमारी संस्कृति और हमारे संबंधों की महत्ता का एहसास कराती है और हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। नीलम नारंग ने इस कृति के माध्यम से न केवल अपने साहित्यिक कौशल का परिचय दिया है, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी बखूबी निभाया है। यह पुस्तक निश्चित रूप से पाठकों के लिए एक यादगार अनुभव साबित होती है।
*
समीक्षक : श्री मनजीत सिंह
सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र
manjeetbhawaria@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम कविता – “कवि… “।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डबल सवारी…“।)
अभी अभी # ९६६ ⇒ आलेख – डबल सवारी श्री प्रदीप शर्मा
यह तब की बात है, जब हर घर में एक साइकिल होती थी। साइकिल, जिसे बाइसिकल भी कहते हैं, एक ऐसा दुपहिया वाहन है, जिस पर मोटर व्हीकल एक्ट लागू नहीं होता, साइकिल का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं होता और इसका कोई थर्ड पार्टी इंश्योरेंस भी नहीं होता।
हमने बचपन में एक पहिये की गाड़ी भी चलाई है और तीन पहिये की लकड़ी की हाथ गाड़ी भी। एक पहिये की छड़ीनुमा गाड़ी में एक हैंडल होता था, जिसके पहिये से एक घंटी भी जुड़ी रहती थी। इस साइकिल में बैठने का नहीं, साइकिल चलाने का सुख नसीब होता था। लकड़ी की, तीन पहिए की हाथ गाड़ी से तो हमने चलना सीखा था, साइकिल चलाना नहीं।।
हमें याद है, तीन पहिये की साइकिल, जिसमें एक सीट आगे होती थी और एक सीट पीछे, जिस पर छोटा भाई अथवा बहन भी आसानी से बैठ सकते थे।
वह सिंगल चाइल्ड का जमाना नहीं था।
दो पहिये की साइकिल सीखने के लिए कोई लर्निंग स्कूल नहीं था।
स्कूल के मैदान में, अथवा मोहल्ले की सड़कों पर ही यह ट्रेनिंग गिरते पड़ते संपन्न हो जाती थी। कैंची से शुरू होकर सीट पर बैठकर साइकिल चला लेना आपको एक कुशल साइकिल सवार सिद्ध कर ही देता था।।
साइकिल लेडीज भी होती थी और जेंट्स भी। हालां कि इसमें एक ही सीट होती थी, लेकिन पीछे साइकिल कैरियर भी होता था, जिसका अधिकतर उपयोग डबल सवारी के लिए किया जाता था।
भले ही तब साइकिल एक राष्ट्रीय सवारी हो, यह कहां सबके नसीब में होती थी।
बच्चों के लिए अगर साइकिल चलाना शौक था, तो बड़ों के लिए जरूरत। इन सबकी सुविधा के लिए कुछ ऐसे साइकिल की दुकानें थीं, जहां साइकिल रिपेयर भी होती थीं और प्रति घंटे की दर से किराए से भी मिल जाती थी।।
क्या साइकिल का भी चालान बनता था ? जी हां, हम भुक्तभोगी हैं। बड़ी दर्दनाक दास्तान है। तब शहर में न तो कहीं वन वे था और न ही ट्रैफिक सिग्नल ! बस चौराहों पर कुछ सिपाही मुस्तैदी से यातायात नियंत्रित करते रहते थे। अचानक एक दिन हम और हमारा दोस्त कृष्णपुरा पुल के थाने के पास डबल सवारी धर लिए गए।
हमें थाने ले जाया गया। डबल सवारी का चालान कटा, साइकिल जप्त हुई। इधर जेब में फूटी कौड़ी नहीं। पता चला, चालान कोर्ट में पेश होगा। कोर्ट में हमारी पेशी होगी, जज साहब जुर्माना वसूलेंगे, तब ही हम छूट पाएंगे। नाम, पिता का नाम, पता, सब तो नोट कर लिया गया। अगर पिताजी को पता चला तो एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई।।
एकाएक नईदुनिया के एक
सिटी रिपोर्टर की हम पर नज़र पड़ी। वे पिताजी को जानते थे। लेकिन पुलिस बड़ी ईमानदार निकली। पत्रकार महोदय के कहने पर हमें साइकिल वापस मिल गई और हमें छोड़ भी दिया गया लेकिन अदालत का मुंह तो हमें फिर भी देखना ही था।
हमें समझा दिया गया था। जज साहब से ज्यादा बहस मत करना। चुपचाप अपना अपराध कबूल कर लेना। दो रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा। अगर सफाई पेश की तो जुर्माना डबल हो जाएगा।।
धर्मसंकट और आर्थिक संकट एक साथ। पिताजी तक बात भी नहीं जाए, और आर्थिक मदद भी कहीं से मिल जाए। ऐसे वक्त हमारे दाऊ यानी बड़े भाई साहब बहुत काम आते थे। उन्होंने सब संभाल लिया। कोर्ट में हमारी पेशी भी हो गई और आर्थिक दंड भरने के पश्चात हम लौटकर बुद्धू वापस घर भी आ गए।
आज वन वे में साइकिल क्या हाथी भी निकल जाए, तो कोई अपराध नहीं बनता। पूरी की पूरी बारात एकांगी मार्ग से गुजर जाती है, प्रशासन तमाशा देखता है, उधर डबल सवारी में हमारा तमाशा बन गया। आज हम कितने सुखी हैं
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – यादें पुरानी।)
महीने में एक दिन किटी पार्टी के लिए समय नहीं निकल सकती क्या इतनी देर से क्यों आई कमला जी ने कहा।
नेहा ने बड़ी विनम्रता से कहा- “क्या करूँ! घर में काम इतने हो जाते हैं कि समय का पता नहीं चलता।”
कमल जी ने कहा- “भाई हमें भी काम होता है फिर भी हम लोग महीने में एक दिन सब कुछ छोड़कर अपने लिए समय निकालते हैं।”
“ठीक है दीदी अब अगली बार किटी पार्टी में मैं सबसे पहले आ जाऊंगी आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगी।”
अच्छा यह तो बताइए कि “आप लोग इतनी जोर से हॅंस रहे थे और मुझे देखकर अचानक चुप हो गए?”
“कुछ नहीं हम सभी सहेलियाँ बात कर रही थीं ।” पुराने दिन कितने अच्छे थे जब हम लोग घर के बाहर बैठकर एक दूसरे से सुख-दुख की बातें करते थे। स्वेटर बुनते ,आचा,र बड़ी ,पापड़, चिप्स बनाते थे ।
आज वह सब दिन जाने कहाँ चले गए अब तो लोग बाजार से सब चीज खरीद लाते हैं मेरी बहू को तो यह सब काम फालतू और फिजूल खर्ची लगता है।
“कोई बात नहीं दीदी आप मेरे घर आइएगा मैं आपको यह सारी चीज अपने हाथों से बनी हुई खिलाऊंगी।”
“ठीक है तुम्हारे यहां आकर मैं यह सब चीज बनवाऊंगी।”
“अच्छा तुम सभी को दिखाने के लिए मैं एक पुराने जमाने की चीज लाई हूँ।”
“दीदी यह तो लालटेन है” जोर से चिल्लाते हुए नेहा बोली।
“हाँ यह मेरी अम्मा ने मुझे शादी में दिया था बहु को मेरे यह कबाड़ लगता है मेरे कमरे में मेरे साथ मेरी नातिन रहती है उसे भी यह अच्छा नहीं लगती ।”
“बहुत दिनों से इसे लपेटकर अलमारी में आदर पूर्वक रखी हूँ।”
” बिजली और नए युग के आने की खुशी तो बहुत है लेकिन क्या करूँ?”
“इसे देखकर मुझे ऐसा लगता है कि मेरी माँ मेरे पास है।”
नेहा बोली-” दीदी सच कह रही हो आजकल की पीढ़ी भी प्लास्टिक की दुनिया में खो गई है।”
“सारे सामान इस्तेमाल करके फेंक देती है उन्हें संभालना रखना यह अच्छा ही नहीं लगता।”
“बस बाहर जाना, नौकरी करना, घूमना, फास्ट फूड खाना हमारे पास बैठने तक का वक्त नहीं है?”
कमल जी ऑंखों से ऑंसू से बहने लगते हैं। उनके मन का सूनापन उनकी ऑंखों में उभर आता है।
कमल जी रोते हुए कहा -“एक दिन मैं भी ऐसे ही डिब्बे में पैक होकर भगवान के घर चली जाऊंगी।”
“क्या तुम लोग मुझे इस लालटेन की तरह याद करोगी।”
नेहा यह लालटेन निशानी समझ कर तुम संभाल कर अपने पास रख लो। देर से आने की यही तुम्हारी सजा है।
सभी सहेलियों मुस्कुराते हुए कहती हैं कमल दीदी अब हम सभी देर से आएंगे तो आप हमें इसी तरह उपहार देना।