मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ “ओडिसी” – मूळ लेखक : होमर – अनुवाद : श्री प्रणव सखदेव ☆ परिचय – श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

? पुस्तकावर बोलू काही ?

☆ “ओडिसी” – मूळ लेखक : होमर – अनुवाद : श्री प्रणव सखदेव ☆ परिचय –  श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

पुस्तक : ओडिसी 

लेखक : होमर

अनुवाद : प्रणव सखदेव

प्रकाशक : मधुश्री प्रकाशन, पुणे 

पृष्ठ :- १८४ 

मूल्य: २५०₹ 

प्रकार:- पुराणकथा, साहसकथा

होमरचं ‘ओडिसी’ हे एका वीराच्या घरी परतण्याची कथा आहे. ट्रॉयचं युद्ध संपल्यानंतर इथाका या आपल्या राज्यात परतण्यासाठी ओडिसियसला तब्बल दहा वर्षांचा संघर्ष करावा लागतो. युद्ध संपलं असलं तरी त्याच्यासाठी खरी लढाई तेव्हाच सुरू होते. समुद्र, राक्षस, जादूगारिणी, देवतांचा कोप, मोह, फसवणूक आणि स्वतःच्या निर्णयांची किंमत आणी प्रत्येक टप्प्यावर त्याची परीक्षा घेतली जाते. दुसरीकडे इथाकामध्ये त्याची पत्नी पेनेलोपी वीस वर्षांपासून त्याची वाट पाहत आहे. सर्वांना ओडिसियस मरण पावल्याचं वाटत असल्याने तिच्यावर दुसरं लग्न करण्यासाठी दबाव टाकला जातो. मुलगा टेलीमॅकस वडिलांचा शोध घेण्यासाठी निघतो. त्यामुळे ही केवळ साहसकथा राहत नाही; ती एका कुटुंबाची, निष्ठेची आणि घरी परतण्याच्या अटळ इच्छेची कथा बनते.

या महाकाव्यात देवतांचं स्थानही तितकंच महत्त्वाचं आहे. अथेना सतत ओडिसियसच्या पाठीशी उभी राहते, तर पोसायडन त्याच्या प्रत्येक पावलावर अडथळे निर्माण करतो. त्यामुळे संपूर्ण कथा ही एका माणसाच्या संघर्षाइतकीच दोन देवतांमधील अदृश्य संघर्षाचीदेखील कथा वाटते. ओडिसियस बुद्धिमान आहे, धाडसी आहे; पण हट्टीही आहे. अनेकदा त्याच्या स्वतःच्या निर्णयांमुळे संकटं ओढवतात. त्याच्या चुका, त्याचं चातुर्य आणि संकटांमधून मार्ग काढण्याची वृत्ती हेच त्याच्या व्यक्तिमत्त्वाचं खरं वैशिष्ट्य आहे. होमरचं लेखन आजही प्रभाव टाकतं, कारण ते केवळ साहस सांगत नाही; ते युद्धाची किंमत, माणसाची मानसिकता, घरापासून दूर राहण्याची वेदना, सत्तेचा मोह आणि आशा न सोडणाऱ्या मनुष्यस्वभावाबद्दलही बोलतं. म्हणूनच ओडिसी हजारो वर्षांनंतरही तितकीच जिवंत वाटत.

प्रणव सखदेव यांनी केलेला मराठी अनुवाद अत्यंत प्रवाही आहे. ग्रीक पुराणातील अनेक व्यक्तिरेखा, स्थळं आणि प्रसंग असूनही वाचन कुठेही क्लिष्ट वाटत नाही. उलट प्रत्येक प्रकरणासोबत पुढे काय घडणार याची उत्सुकता वाढत जाते. तुम्ही यावर आधारित चित्रपट पाहणार असाल तर आधी हे पुस्तक नक्की वाचा, कारण त्यामुळे कथानक, पात्रं आणि त्यामागची पार्श्वभूमी अधिक चांगल्या प्रकारे समजते. आणि जर पुस्तक आधीच वाचलं असेल, तर चित्रपटातील अनेक प्रसंग नव्या दृष्टीने अनुभवता येतात. जर तुम्हाला ग्रीक पुराणकथा, साहसकथा वाचण्याची आवड असेल, तर ‘ओडिसी’ नक्की वाचा. हजारो वर्षांपूर्वी लिहिलेली ही कथा आजही तितकीच ताजी, रंजक आणि विचार करायला लावणारी वाटते.

परिचय : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

पालघर 

मो. 9619800030

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५८ – बुन्देली कविता – ”वे पथरा खों दूद पिवा रय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – वे पथरा खों दूद पिवा रय।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५८ ☆

☆  बुन्देली कविता – वे पथरा खों दूद पिवा रय ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

बे पथरा खों दूद पिबा रय

देखौ कैंसो भ्रम फैला रय

आइ महामारी, व्यापारी

रोज कफन कौ, रेट बढ़ा रय

 *

पंडत जी छप्पन भोगों की

ओ गरीब खें कथा सुना रय

 *

दिवता सें कम नइँ बे सेवक

जो भूखों के पेट भरा रय

 *

ऐड़ी-चोटी कर चुनाव में

नेता अपने दाँव लगा रय

 *

बम्म पटकबे बारे भग गय

घायल रिश्ते, घाव दिखा रय

 *

भगवतसाम्हूँ प्यासो तड़पत

बे नदिया कौ पता बता रय

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “ये अजीब इत्तेफाक़ है” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – ये अजीब इत्तेफाक़ है… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

दिल के प्याले में

स्याही भरी होती है

यादों में आए उबाल से

छलक कर बाहर निकल आती है

गीले हरुफ़ लिखती हुई

किसी इबारत, किसी तहरीर को

शक्ल देती है

कभी ये हरुफ़ जल्दी सूखते हैं

कभी एक लंबे अरसे को गीले

रह जाते हैं

छूना नहीं इन गीले हरुफ़ों को

रोशनाई फैल कर,

सफ़े को धुंधला कर देगी

ये धुंधलापन सालता रहेगा

कचोटता रहेगा

लिहाज़ा, स्याही के सूखने का इंतज़ार

तो करना ही होगा…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – एकाक्षी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – एकाक्षी ? ?

एकाक्षी होना चाहता हूँ,

आवश्यक नहीं

एक आँख बंद कर लूँ,

वांछित है; दोनों में

समत्व विकसित कर लूँ!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१३ ☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित  “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवालापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१३ ☆

☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

☆ ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ : व्यंग्य की चटपटी प्लेट में समय का स्वाद – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

वरिष्ठ व्यंग्यकार अरविंद तिवारी की कृति पर विवेक रंजन श्रीवास्तव की पुस्तक चर्चा

व्यंग्य की अपनी तरह की यह गोलगप्पे वाली प्लेट हमें हास्य का स्वाद देने के बाद हमारे वैचारिक हाजमे को कितना दुरुस्त करती है? किताब बंद करने के बाद हमारे भीतर कितनी हँसी, कितनी खटास और कितनी डकारें बची रहती हैं? अरविंद तिवारी का व्यंग्य-संग्रह ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ पढ़ते हुए यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गड्ढे, सेमिनार, पुरस्कार, पुस्तक मेले, ए.आई., साहित्यकार, आलोचक और अंततः गोलगप्पेवाला—ये पात्र और प्रसंग पुस्तक बंद होने के बाद भी मन में घूमते रहते हैं।

यह अरविंद तिवारी का चौदहवाँ व्यंग्य-संग्रह है। साहित्य और राजनीति इसके प्रमुख सरोकार हैं, लेकिन लेखक की दृष्टि प्रशासन, सामाजिक व्यवहार, प्रकाशन, पुरस्कार, मीडिया, चुनाव और नई तकनीक तक जाती है। ‘गड्ढों का विद्रोह’, ‘जाना एक सेमिनार में’, ‘ए.आई. वाला लोचा’, ‘शोक सभा के विशेषज्ञ’, ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ जैसी रचनाएँ समकालीन विसंगतियों के अलग-अलग चेहरे सामने लाती हैं।

संग्रह की शुरुआत ‘गड्ढों का विद्रोह’ से होती है। सड़क के गड्ढे सामान्यतः नागरिकों की परेशानी हैं, लेकिन तिवारी उन्हें व्यवस्था के स्वाभाविक अंग में बदल देते हैं। उनका कथन—“गड्ढा बिना सड़क के भी हो सकता है”—सिर्फ हास्य पैदा नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर चोट करता है जिसमें पुरानी समस्या धीरे-धीरे समस्या न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।

‘जाना एक सेमिनार में’ साहित्यिक दुनिया के महानगरीय मोह और छोटे शहर के लेखक की विडंबना को पकड़ता है। कई बार साहित्यकार से अधिक उसका शहर महत्वपूर्ण हो जाता है। यह विसंगति इसलिए अधिक चुभती है क्योंकि साहित्य की दुनिया भी उससे मुक्त नहीं है।

तिवारी की खासियत यह है कि उनका व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं चलता। वे साहित्यिक संसार को भी उसी निर्ममता से कटघरे में खड़ा करते हैं। ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’ साहित्यिक प्रतिष्ठा, औपचारिक मित्रता, पुरस्कार-व्यवस्था और बाजारवाद की पोल खोलते हैं।

‘किताब हाथोंहाथ ली गई’ में मुहावरा ही व्यंग्य का हथियार बन जाता है। किताब का हाथोंहाथ घूमना साहित्यिक मित्रता और दिखावे की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसी तरह ‘पुरस्कार चुक गए हैं!’ में सब्जी मंडी की भाषा साहित्यिक पुरस्कारों की दुनिया में प्रवेश करती है। थोक, रिटेल, खरीददार और माल जैसे शब्द हँसाते तो हैं, लेकिन पुरस्कारों के बाजारीकरण का गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं।

‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ चुनावी संस्कृति के प्रदर्शन और राजनीतिक गणित को निशाना बनाता है। वहीं ‘ए.आई. वाला लोचा’ और ‘इस बार ए.आई. वाली दीवाली’ में नई तकनीक के बहाने आभासी छवि, प्रचार और असली-नकली की धुंधली होती सीमा पर टिप्पणी की गई है। इससे तिवारी की समकालीनता स्पष्ट होती है। वे पुराने मुहावरों के व्यंग्यकार हैं, लेकिन विषयों में पुराने नहीं हैं।

इस संग्रह की भाषा सहज, बातचीत के करीब और मुहावरेदार है। तिवारी असंगत चीजों को एक साथ रखकर नया व्यंग्यार्थ पैदा करते हैं—गड्ढा और व्यवस्था, सब्जी मंडी और पुरस्कार, आम और साहित्यकार, ए.आई. और दीवाली। यही उनका विशिष्ट व्यंग्य-कौशल है।

उनके व्यंग्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता आत्मव्यंग्य है। साहित्यिक संसार पर चोट करते हुए वे स्वयं को उससे बाहर खड़ा नहीं करते। यही ईमानदारी उनके व्यंग्य को उपदेश बनने से बचाती है। हाँ, कुछ रचनाओं में व्यंग्य की ऊर्जा इतनी अधिक है कि लेखक एक ही प्रसंग पर कुछ अधिक देर ठहर जाते हैं; किंतु यह उस लेखक की स्वाभाविक सीमा भी है जिसके पास कहने को बहुत कुछ है।

अरविंद तिवारी छोटी-सी विसंगति पकड़ते हैं और उसे इस तरह विस्तार देते हैं कि उसमें पूरा समय दिखाई देने लगता है। ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ की सार्थकता इसी में है कि यह दूसरों पर हँसने वाली किताब भर नहीं, बल्कि साहित्य और स्वयं साहित्यकार को भी हँसी के कटघरे में खड़ा करती है।

शायद हमारे समय की हर गंभीर चीज के भीतर सचमुच एक गोलगप्पा छिपा है। उसे फोड़ने के लिए व्यंग्यकार की उंगली चाहिए और उसमें चटपटा पानी भरने की कला भी। अरविंद तिवारी यह काम बखूबी करते हैं।

मेरी दृष्टि में यह संग्रह समकालीन हिंदी व्यंग्य की सशक्त धारा में अपनी जगह बनाता है। इसे पढ़कर मुस्कान आती है, लेकिन मुस्कान के पीछे एक असुविधाजनक सवाल भी रह जाता है—जिन विसंगतियों पर हम हँस रहे हैं, कहीं वे हमारी अपनी आदतें तो नहीं?

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

इन दिनों लंदन में

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३० – बरगद बनकर छाँव बनाई… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – बरगद बनकर छाँव बनाई...। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३० ☆

☆  बरगद बनकर छाँव बनाई…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

(समांत—- पदांत -आना, मात्रा भार-16, (चौपाई छंद))

सोते को है सरल जगाना।

पर जगते को कठिन उठाना।।

*

जीवन दाँव लगाया फिर भी।

मात-पिता का लुटा खजाना।।

*

बरगद बनकर छाँव बनाई।

चिड़िया उड़ती सुना बहाना।।

*

उँगली थामे बड़े हुए पर।

सबल पैर का नहीं ठिकाना।।

*

उमड़-घुमड़ कर आँसू सूखे।

पर मुखड़े को है हर्षाना ।।

*

प्रश्न चिन्ह तब लगा हुआ है।

कैसा आया नया जमाना।।

*

संस्कृति और सभ्यता रूठी।

जागो मानव क्यों पछताना।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७३ – स्वतंत्रता ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “स्वतंत्रता”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७३ ☆

🌻लघु कथा🌻 स्वतंत्रता 🌻

आज 15 अगस्त तिरंगे झंडे की टोकरी लिए बैठी सड़क पर स्वतंत्रता दिवस की भोर देख रही थी। अभी कुछ झंडे और छोटे – छोटे बैच बिकने को बाकी रह गया था। सोच रही थी अब तो लगभग सभी भीड़ खत्म होने चली है।

मेरी टोकरी में  यह बच गया नही बिक पाया। तभी एक नौजवान दौड़ता भागता आया, पूरा सामान उठा कई गुना ज्यादा राशि देकर चलता बना।

वह खुश होकर टोकरी उठा, मुखड़े पर मुस्कान और सरपट चल दी घर की ओर।

दरवाजे पर पहुची ही थी कि झपट्टा मार टोकरी को फेंकते उसका पतिदेव पैसे झींनते हुए

—मना आई स्वतंत्रता दिवस

अब देख गुलामी क्या है। इससे तू आजाद नही हो सकती।

धम्म से धरा पर बैठते सिसक पड़ी – – क्या स्वतंत्र होना इतना निर्मोही होता है। अश्रुं धारा बह चली तुझे तो उम्र भर की गुलामी मिली है जो सदैव जीवन्त रहेगी।

शायद शहीद होने के बाद ही स्वतंत्र हो सकूंगी. 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८७ – देश-परदेश – हर दिन ना होत एक समान ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८७ ☆ देश-परदेश – हर दिन ना होत एक समान ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त चित्र वर्षा ऋतु में होने वाली वर्षा से ठंडे खाद्य पदार्थों की बिक्री को प्रभावित करता हुआ बता रहा हैं।अब समय बदल चुका हैं।हम सब तो प्रकृति के विरुद्ध शंखनाद बजा चुके हैं। सर्दी के मौसम में रजाई में बैठ कर हीटर की गर्मी के पूरे मज़े लेने के लिए आइसक्रीम खाना आम बात हो चुकी है।

छाता खरीद कर अब लोग आइसक्रीम खाते हैं, इससे छाता विक्रेता भी खुश रहता है, और आइसक्रीम विक्रेता भी खुश। हम सब ने प्रकृति को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

कोल्ड ड्रिंक आदि ठंडे पेय का अब कभी भी ऑफ सीज़न नहीं होता है। ठंड में विवाह के समय मुफ्त के गर्म गुलाब जामुन के साथ वनिला आइसक्रीम की जुगलबंदी कुछ दशकों से लोक प्रिय हो चुकी हैं। गर्म खाद्य पदार्थ के बाद चिल्ड पानी पीना हो या ठंडी बियर के बाद  गरमा गर्म मुर्गा हलक से नीचे करने में हमारा स्वास्थ्य भी खराब नहीं होता है।

हमारा शरीर भी विचार करता होगा, हमें क्या जो करेगा वो ही ना भरेगा। रोग होने पर मौसम और हवा पर दोषारोपण कर हम  पाक साफ बन जाते हैं।

साठ के दशक यानि हमारे बचपन की बाते यदि आज के किसी जेन ज़ी से करो तो उल्टा जवाब मिलता है, “यू ओल्डीज़” हमेशा आदि मानव की तरह क्यों बिहेव करते हैं?

हमारी दादी तो गर्म भोजन करने के पश्चात तुरंत ठंडे जल से हाथ तक धोने के लिए मना करती थी। किसी भी मौसम में बाहर से घर प्रवेश के दस मिनट के बाद ही साधारण जल तक ग्रहण करने दिया जाता था। कारण पूछने पर परिवार के बड़े, बाहर और घर के टेम्प्रेचर के अंतर को शरीर को एडजेस्ट करने का कूलिंग पीरियड बता कर घर के छोटे बच्चों की जिज्ञासा को वैज्ञानिक तथ्य से शांत कर दिया करते थे। आज की युवा पीढ़ी तो गूगल की दलीलों से बुजर्गों की खिल्ली उड़ा देते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२४ – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल)  

☆  चुभते तीर # १२४ – व्यंग्य  – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

गुप्ता जी के दफ़्तर की मेज़ पर एक फाइल पिछले तीन महीनों से इस तरह सोई हुई थी, जैसे इतवार की सुबह कोई अलार्म बजने के बाद तकिया ओढ़कर सोता है। उस फाइल का नाम था ‘जनहित याचिका 402’। गुप्ता जी चाय के बड़े शौकीन थे। उनके लिए चाय सिर्फ़ एक पेय पदार्थ नहीं थी, बल्कि काम टालने का सबसे पवित्र औजार थी। जब भी कोई फाइल उनके सामने आती, वे चाय का कुल्हड़ उठाते, एक लंबी सांस खींचते और कहते, “मामला गंभीर है, थोड़ा पकाने की जरूरत है।”

दफ़्तर के सभी लोगों को लगता था कि गुप्ता जी बड़े ईमानदार और फुर्तीले अफ़सर हैं, जो हर कागज़ की बारीकी में उतरते हैं। लेकिन सच्चाई यह थी कि गुप्ता जी को उस फाइल का ताला खोलने की चाबी, यानी फाइल के अंदर छिपा मुख्य पन्ना कभी मिला ही नहीं था। वह पन्ना गायब था। अगर यह बात बाहर आ जाती, तो गुप्ता जी की नौकरी की मलाई में मक्खी गिर जाती। इसलिए वे हर रोज़ फाइल पर एक नया नोट लिखकर उसे अलमारी के सबसे गहरे कोने में सरका देते थे।

एक दिन अचानक बड़े साहब का बुलावा आया। बड़े साहब का गुस्सा ऐसा था जैसे बिना अदरक वाली उबली हुई चाय, जो गले से नीचे उतरते ही मूड खराब कर दे। साहब ने मेज़ पर मुक्का मारा और कहा, “गुप्ता, जनहित याचिका 402 का फैसला आज शाम चार बजे तक मेरी मेज़ पर होना चाहिए। मंत्री जी खुद इस पर नज़र बनाए हुए हैं।”

गुप्ता जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके माथे पर पसीने की बूंदें ऐसे चमकने लगीं जैसे बारिश के बाद पत्तों पर ओस। फाइल खोली गई, लेकिन गायब पन्ना अब भी गायब था। दोपहर के तीन बज चुके थे। दफ़्तर की घड़ी की सुइयां गुप्ता जी की धड़कनों से शर्त लगा रही थीं। उन्होंने तुरंत अपने चपरासी रामदीन को आवाज़ लगाई, “रामदीन, एक कड़क चाय बनाओ। आज ज़िंदगी और मौत का सवाल है।”

रामदीन चाय का कुल्हड़ लेकर आया। गुप्ता जी ने कांपते हाथों से कुल्हड़ उठाया। जैसे ही उन्होंने पहला घूंट लिया, उन्हें चाय के नीचे कागज़ का एक छोटा सा टुकड़ा चिपका हुआ दिखाई दिया। वह टुकड़ा वही गायब पन्ना था, जिसे रामदीन ने महीनों पहले चाय के कुल्हड़ को मेज़ पर टिकाने के लिए फाइल के बीच से निकालकर ‘कोस्टर’ की तरह इस्तेमाल कर लिया था।

गुप्ता जी ने राहत की सांस ली और फाइल पूरी करके साहब की मेज़ पर रख दी। साहब ने फाइल देखी, मुस्कुराए और बोले, “मान गए गुप्ता जी, आपकी पारखी नज़र से कोई सच छिप नहीं सकता।”

पूरा दफ़्तर ताली बजाने लगा। गुप्ता जी ने मुस्कुराकर चाय का आखिरी घूंट पिया और मन ही मन कहा कि इस देश में फाइलें काम से नहीं, सही समय पर मिली चाय की पत्ती से आगे बढ़ती हैं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६८ ⇒ अट्टहास ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अट्टहास ।)

?अभी अभी # १०६८ ⇒ आलेख – अट्टहास ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(HEE HAW )

हँसने के कई तरीके होते हैं। जब हँसी छूटती है, तब वह भीड़ की तरह दिशाहीन होती है। कहीं मंद मंद हँसी, तो कहीं हँसी के फव्वारे। कभी कभी तो भरे हुए बादलों की तरह हँसी फूट पड़ती है। आखिर हँसी में ऐसा क्या है, कि जब यह वेग में होती है, तो रोके नहीं रुकती।

हमारे अंदर गम और खुशी के गोदाम हैं, आप चाहें तो उन्हें गोडाउन भी कह सकते हैं। गोदाम अक्सर भरते रहते हैं, और खाली होते रहते हैं। आजकल इन्हें कोल्ड स्टोरेज भी कहा जाने लगा है। जब चीजों के दाम बढ़ते हैं, तब गोदाम भरे रहते हैं, और जब चीज़ों के दाम घटने लगते हैं, तो गोदाम खाली होते चले जाते हैं। गोदाम का भरना और खाली होना, वस्तुओं के दाम बढ़ने और घटने, से जुड़ा रहता है। दाम के अप और डाउन होने, अर्थात् घटने बढ़ने से गोडाउन की सेहत पर असर पड़ता है।।

हँसना सेहत के लिए अच्छा है। सेहत सुधारने के लिए आजकल लोग हेल्थ क्लब की तरह लाफ्टर क्लब भी जाने लग गए हैं। रोना तो इंसान जन्मजात लेकर आया है, लेकिन वह बड़ा होकर हँसना भूल गया है। हँसने की कोचिंग क्लास है लाफिंग क्लब, जहां हँसना सिखाया जाता है।

गम के गोदाम अक्सर भरे हुए ही रहते हैं और खुशी के खाली, क्योंकि गम के खरीददार कम होते हैं, और खुशी तो इंसान हर कीमत पर खरीदने को तैयार होता है। पहले खुशी खरीदने के लिए ढेर सारा पैसा लेकर बाजार जाना पड़ता था, आजकल खुशी भी ऑनलाइन पेमेंट पर अमेजान और फ्लिपकार्ट पर चढ़कर घर चली आती है। गम पर डिस्काउंट बढ़ता जा रहा है, पर कोई खरीद नहीं रहा। खुशी, लोग खुशी खुशी अपने घर ले जा रहे हैं।।

हँसना, खुशी जाहिर करने का पारंपरिक तरीका है। यूं तो हँसी के कई भेद हैं, लेकिन प्रमुख भेद पुरुष और स्त्री की हँसी का है। महिलाएँ, हँसती नहीं, खिलखिलाती हैं। लगता है, कहीं घंटियाँ बज रही हों।

चूड़ी की खनक और पायल की झंकार उनकी हँसी में शामिल होती है, क्योंकि ईश्वर ने उनके गले में सुर और स्वर दिया है।

पुरुष का स्वर खुरदुरा होता है क्योंकि रिश्ते में वे किसी के बाप लगते हैं। जितनी मोटी आवाज़, उतनी ही मर्दानी आवाज़ और ऊपर से हँसी के ठहाके। हा, हा, हि ही और हु हू की पूरी बारहखड़ी हं, ह:, ह : ह :। बिना कुछ कहे, कहकहे ही कहकहे के ऐसे फव्वारे छूटते हैं, कि लोग भीग जाने के अंदेशे से, चार कदम दूर ही खड़े रहते हैं।।

एक और धांसू हँसी होती है, जिसे अट्टहास कहते हैं। अट्टहास शब्द से ही ऐसा प्रतीत होता है, मानो अचानक कोई चट्टान की हँसी फूट पड़ी हो। हमारे धार्मिक सीरियल में अक्सर राक्षसों को हँसते हुए दिखाया जाता है। वह हँसी थमने का नाम ही नहीं लेती। हर एक दो डायलॉग के बाद फिर वही हँसी का टेप। आप इस हँसी को अट्टहास का परिहास भी कह सकते हैं, क्योंकि इस हँसी पर किसी को हँसी नहीं आती।

कभी कभी हँसते हँसते भी, आँखों में आँसू निकल आते हैं तो कभी रोते रोते भी हँसी निकल आती है। हँसना, रोना सहजता की निशानी है। किसी बात पर हँसना, किसी घटना पर हँसना अथवा परिस्थिति पर हँसना बुरा नहीं लेकिन किसी पर हँसना मना है। जो झरने की तरह फूटे, वह हँसी। फिर चाहे वह ठहाका हो, कहकहा हो, या फिर अट्टहास। लेकिन इस बात का जरूर रखें खयाल, कोई बीमार, दुखी, लाचार ना हो आसपास।।

खुशियों में शामिल हों, लोगों को अपनी खुशी में शामिल करें। गम के गोदाम खाली पड़े रहें, खुशियों को कैद ना करें, आज़ाद करें। सुना है खुशी बांटने से बढ़ती है और हँसी की फुहार भी तो रंगबिरंगी होली की फुहार ही होती है। जिस चेहरे पर हंसी ना,

वह काहे की हसीना। अब तो हँसी ना, हँसी ना …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares