हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 44 ☆ वो लड़की ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  एक भावप्रवण रचना “वो लड़की”।  यह कविता आपकी पुस्तक एक शमां हरदम जलती है  से उद्धृत है। )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 44 ☆

☆ वो लड़की ☆

 

फाइलों के ढेर के बीच

अचानक याद आ गयी मुझे वो लड़की

जो थी

कुछ शर्मीली सी,

कुछ डरी-डरी सी,

कुछ घबराई हुई;

जिसकी आँखों में

रंग भरे हज़ारों ख्वाब सजते थे

और जो सोचती थी

कि इतनी ऊंची होगी उसकी उड़ान एक दिन

कि वो भूल जायेगी डर और घबराहट…

 

जिसकी आँखों में रौशनी न हो

वो जिस तरह जिंदगी को टटोलता है,

कुछ उसी तरह वो भी

अपने ख़्वाबों को टटोलती-

कहाँ उसके पास कोई दौलत थी

इन ख़्वाबों के अलावा?

 

उड़ान तो बहुत ऊंची नहीं थी,

पर वो लड़की कतरा-कतरा इकठ्ठा करती हुई,

कुछ लड़ती हुई, कुछ जूझती हुई,

एक ऐसे मुकाम पर जरूर पहुँच गयी

जहां नहीं बसते अब

उसकी आँखों में डर और घबराहट!

 

अब जब भी मन हार मानने लगता है

और लगता है दर्द बसेरा बना लेगा मेरे आँगन में,

मैं फिर बन जाती हूँ वही छोटी लड़की

और फिर उड़ने लगती हूँ

ख़्वाबों के सहारे!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ विधाता* ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ विधाता

 

उस कलमकार ने

कलम उठाई,

खींच दी रेखा

मेरे होने और

न होने के बीच,

अब उसने

मुझे कलम थमाई,

मैंने टाँक दिए शब्द

उस रेखा पर,

लक्ष्मणरेखा,

शिरोरेखा बन कर

समा गई शब्दों में..,

वह कलमकार अब

आश्चर्य से देख रहा था

शब्दों में छिपा

विराट रूप

और अनुभव कर रहा था-

उसकी सृष्टि से परे

सृष्टि और भी हैं,

विधाता और भी हैं..!

 

©  संजय भारद्वाज

7.7.19  रात्रि 8.18 बजे,

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिव्यक्ति # 22 ☆ कविता – जीवन – एक रियलिटी शो ☆ हेमन्त बावनकर

हेमन्त बावनकर

(स्वांतःसुखाय लेखन को नियमित स्वरूप देने के प्रयास में इस स्तम्भ के माध्यम से आपसे संवाद भी कर सकूँगा और रचनाएँ भी साझा करने का प्रयास कर सकूँगा।  आज प्रस्तुत है  एक कविता  “जीवन – एक रियलिटी शो”।  यह कविता  रियलिटी शो अमूल स्टार वाइस ऑफ इण्डिया के विजेता स्व. इशमित सिंह की अकाल मृत्यु पर श्रद्धांजलि स्वरुप  2008 में लिखी थी जो आज भी प्रासंगिक लगती है। अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिये और पसंद आये तो मित्रों से शेयर भी कीजियेगा । अच्छा लगेगा ।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अभिव्यक्ति # 22

☆ जीवन – एक रियलिटी शो ☆

जीवन

एक रियलिटी शो ही तो है।

 

हम आते हैं

जीवन के मंच पर।

कोशिश करते हैं

जीतने की।

अक्सर,

कुछेक आशावादी

जीत भी जाते हैं

और

ज्यादातर हार जाते हैं।

 

फिर कुछ हो जाते हैं –

निराशावादी

कुछ कर लेते है समझौता

समय से

परिस्थितियों से।

 

विजयी जीत को मान लेता है

परिश्रम का फल

और

शेष मान लेते है

अपनी नियति

अथवा

कर्मों का फल।

 

सब में है प्रतिभा

कुछ प्रदर्शित कर पाते हैं

कुछ नहीं कर पाते।

 

हमारे अपने

सदैव भेजते हैं

प्रार्थना के रूप में एस एम एस

ईश्वर को।

कभी-कभी हमारे अच्छे कर्म

बन जाते है एस एम एस

हमारे लिये।

 

जब कभी देखता हूँ

मंच पर

मंच का रियलिटी शो

तो लगता है कि

कुछ भी तो अन्तर नहीं है

मंच और जीवन में।

 

वैसे ही

जीतने की खुशी

और

खुशी के आँसू।

 

हारने का गम

और

दुख के आँसू।

 

संवेदनशील मंच

गलाकाट प्रतियोगिता।

किन्तु,

ऐसा क्यों होता है?

क्यों होता है

जीवन का रियलिटी शो

इस बिखरी हुई कविता की तरह ?

 

दुख के क्षण

खुशी के क्षणों से

लम्बे क्यों होते है?

अंधकार से पूर्व

प्रकाश क्यो होता है?

और

दीप के बुझने के पूर्व

लौ तेज क्यों हो जाती है?

और

शेष रह जाती हैं

स्मृतियां

बुझे हुए दीप के धुयें की तरह

जो

धीरे-धीरे हो जायेंगी विलीन

समय की गोद में।

 

© हेमन्त बावनकर, पुणे 

28 जुलाई 2008

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 63 ☆ एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक विचारणीय आलेख  “एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें। इस अत्यंत सार्थक आलेख के लिए श्री विवेक जी का हार्दिक आभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 63 ☆

☆ एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें ☆

कोरोना के परिदृश्य में स्पष्ट हो चुका है कि केवल सबके बचाव में ही स्वयं का बचाव संभव है. एकता की शक्ति से वैश्विक उम्मीदें हैं. जो देश इस कठिनाई के समय में भी विस्तार की नीति अपना रहे हैं, वहां की सरकारें जनता से छल कर रही हैं. दुनियां के लिये यह समय सामंजस्य और एकता के विस्तार का है.

हमारी युवा शक्ति ही देश की  सबसे बड़ी ताकत है. बुद्धि और विद्वता के स्तर पर हमारे देश के युवाओ ने सारे विश्व में मुकाम स्थापित किया है. हमारे साफ्टवेयर इंजीनियर्स  के बगैर किसी अमेरिकन कंपनी का काम नही चलता. हमारी स्त्री शक्ति सशक्त हुई है. देश के युवाओ से यही कहना है कि  हम किसी से कम नही है और हमारे देश को विश्व में नम्बर वन बनाने की जबाबदारी हमारी पीढ़ी की ही है. हमें नीति शिक्षा की किताबो से चारित्रिक उत्थान के पाठ पढ़ने ही नही उसे अपने जीवन में उतारने की जरूरत है. मेरा विश्वास है कि भारतीय लोकतंत्र एक परिपक्व शासन प्रणाली प्रमाणित होगी, इस समय जो कमियां भ्रष्टाचार, जातिगत आरक्षण, क्षेत्रीयता, भाषावाद, वोटो की खरीद फरोक्त को लेकर देश में दिख रही हैं उन्हें दूर करके हम विश्व नेतृत्व और वसुधैव कुटुम्बकम् के प्राचीन भारतीय मंत्र को साकार कर दिखायेंगे. आज जब मानवीय मूल्य समाप्त होते जा रहे हैं, संभवतः रोबोट और मशीनी व्यवस्थायें ही देश से भ्रष्टाचार समाप्त कर सकती है, जैसा कंप्यूटरीकरण के विस्तार से रेल्वे या अन्य विभिन्न क्षेत्रो में हो भी रहा है.

सैक्स के बाद यदि दुनिया में कुछ सबसे अधिक लोकप्रिय विषय है तो संभवतः वह राजनीति ही है. लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली मानी जाती है और सारे विश्व में भारतीय लोकतंत्र न केवल सबसे बड़ा है वरन सबसे  तटस्थ चुनावी प्रणाली के चलते विश्वसनीय भी है. चुनावी उम्मीदवार अपने नामांकन पत्र में अपनी जो आय  घोषित कर चुके हैं  वह हमसे छिपी नही है,  एक सांसद को जो कुछ आर्थिक सुविधायें हमारा संविधान सुलभ करवाता है, वह इन उम्मीदवारो के लिये ऊँट के मुह में जीरा है. प्रश्न है कि  आखिर क्या है जो लोगो को राजनीति की ओर आकर्षित करता है. क्या सचमुच जनसेवा और देशभक्ति ? क्या सत्ता सुख, अधिकार संपन्नता इसका कारण है ? मेरे तो परिवार जन तक मेरे इतने ब्लाइंड फालोअर नही है, कि कड़ी धूप में वे मेरा घंटों इंतजार करते रहें, पर ऐसा क्या चुंबकीय व्यक्तित्व है,  राजनेताओ का कि हमने देखा लोग कड़ी गर्मी के बाद भी लाखो की तादाद में हेलीकाप्टर से उतरने वाले नेताओ के इंतजार में घंटो खड़े रहे, देश भर में.  जबकि उन्हें पता था कि नेता जी आकर क्या बोलने वाले हैं. इसका अर्थ  यही है कि अवश्य कुछ ऐसा है राजनीति में कि हारने वाले या जीतने वाले या केवल नाम के लिये चुनाव लड़ने वाले सभी किसी ऐसी ताकत के लिये राजनीति में आते हैं जिसे मेरे जैसे मूढ़ बुद्धि शायद समझ नही पा रहे. तमाम राजनैतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार देश के “रामभरोसे” मतदाता की तारीफ करते नही अघाते, देश ही नही दुनिया भर में हमारे रामभरोसे की प्रशंसा होती है, उसकी शक्ति के सम्मुख लोकतंत्र नतमस्तक है. रामभरोस वोटर के फैसले के पूर्वानुमान की रनिंग कमेंट्री कई कई चैनल कई कई तरह से करते रहे हैं. मैं भी अपनी मूढ़ मति से नई सरकार का हृदय से स्वागत करती हूं.पिछले अनुभवों में हर बार बेचारा रामभरोसे वोटर ठगा गया है, कभी गरीबी हटाने के नाम पर तो कभी धार्मिकता के नाम पर, कभी देश की सुरक्षा के नाम पर तो कभी रोजगार के सपनो की खातिर. एक बार और सही. हर बार परिवर्तन को वोट करता है रामभरोसे, कभी यह चुना जाता है कभी वह. पर रामभरोसे का सपना टूट जाता है, वह फिर से राम के भरोसे ही रह जाता है, नेता जी कुछ और मोटे हो जाते हैं. नेता जी के निर्णयो पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं, जाँच कमीशन व न्यायालय के फैसलो में वे प्रश्न चिन्ह गुम जाते हैं. रामभरोसे किसी नये को नई उम्मीद से चुन लेता है. चुने जाने वाला रामभरोसे पर राज करता है, वह उसके भाग्य के घोटाले भरे फैसले करता है. मेरी पीढ़ी ने तो कम से कम अब तक यही होते देखा है. प्याज के छिलको की परतो की तरह नेताजी की कई छबिया होती हैं. कभी वे  जनता के लिये श्रमदान करते नजर आते हैं, शासन के प्रकाशन में छपते हैं. कभी पांच सितारा होटल में रात की रंगीनियो में रामभरोसे के भरोसे तोड़ते हुये उन्हें कोई स्पाई कैमरा कैद   कर लेता है. कभी वे संसद में संसदीय मर्यादायें तोड़ डालते हैं, पर उन्हें सारा गुस्सा केवल रामभरोसे के हित चिंतन के कारण ही आता है. कभी कोई तहलका मचा देता है स्कूप स्टोरी करके कि  नेता जी का स्विस एकाउंट भी है. कभी नेता जी विदेश यात्रा पर निकल जाते हैं रामभरोसे के खर्चे पर, वे जन प्रतिनिधि जो ठहरे. संभवतः सर्वहारा को सर्व शक्तिमान बना सकने की ताकत रखने वाले लोकतंत्र की सफलता के लिये उसकी ये कमियां स्वीकार करनी जरूरी हैं. जो भी हो शायद यही लोकतंत्र है, तभी तो सारी दुनिया इसकी इतनी तारीफ करती है.

भारतीय लोकतात्रिक प्रणाली की वैधानिक व्यवस्थायें अमेरिकन व इंगलैण्ड सहित दुनिया के विभिन्न संविधानो के अध्ययन के उपरांत भीमराव अम्बेडकर जैसे विद्वानो ने निर्धारित की थीं. भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार तो विजयी उम्मीदवारों में से सबसे बड़े दल के सांसद, अपना नेता चुनते हैं, जो प्रधानमंत्री पद के लिये राष्ट्रपति के सम्मुख अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करता है, अर्थात जनता अपने वोट से सीधे रूप से प्रधानमंत्री का चुनाव नही करती यद्यपि सत्ता की मूल शक्ति प्रधानमंत्री में ही सन्नहित होती है . जबकि अमेरिकन प्रणाली में राष्ट्रपति सत्ता की शक्ति का केंद्र होता है, और उसका सीधा चुनाव जनता अपने मत से करती है.

अब जन आकांक्षा केवल घोषणायें और शिलान्यास नहीं कुछ सचमुच ठोस चाहती है. सरकार से हमें देश की सीमाओ की सुरक्षा, भय मुक्त नागरिक जीवन, भारतवासी होने का गर्व, और नैसर्गिक न्याय जैसी छोटी छोटी उम्मीदें  हैं . सरकार सबके हितो के लिये काम करे न कि पार्टी विशेष के, पर्दे के सामने या पीछे के नुमाइन्दो से सिफारिश पर, केवल उन लोगो के काम हो जिन के पास वह खास सिफारिश हो. जो उम्मीदें चुनावी भाषणो और रैलियो में जगाई गई हैं, वे बिना भ्रष्टाचार के मूर्त रूप लें .महिलाओ को सुरक्षा मिले, पुरुषो की बराबरी का अधिकार मिले. युवाओ को अच्छी शिक्षा तथा रोजगार मिले. आम आदमी को मंहगाई और भ्रष्टाचार से निजात मिले. अल्पसंख्यको को विश्वास मिले. देश का सर्वांगीण विकास हो सके. राष्ट्र कूटनीतिक रूप से, तकनीकी रूप से, सक्षम हो.  विकास के रथ पर सवार होकर हमारा देश दुनिया के सामने एक विकसित राष्ट्र के रूप में पहचान बनाये यह हर भारतीय की आकांक्षा है, और यही  सरकार की चुनौती है.

कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के चलते विकास के सारे मापदण्ड छिन्न भिन्न हैं  निश्चित ही सारी जबाबदारी केवल सरकार पर नही डाली जा सकती, हर नागरिक को भी इस महायज्ञ में अपनी भूमिका निभानी ही  होगी. सरकार विकास का वातावरण बना सकती है, सुविधायें जुटा सकती है, पर विकास तो तभी होगा जब प्रत्येक इकाई विकसित होगी, हर नागरिक सुशिक्षित बनेगा. जब देशप्रेम की भावना का अभ्युदय  हर बच्चे में होगा तो स्वहित के साथ साथ देशहित भी हर नागरिक के मन मस्तिष्क का मंथन करेगा. भ्रष्टाचार स्वयमेव नियंत्रित होता जायेगा और देश उत्तरोत्तर विकसित हो सकेगा. अतः नागरिको में सुसंस्कार विकसित करना भी नई सरकार के सम्मुख एक चुनौती है.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 57 ☆ नक्षत्रांचे देणे ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक समसामयिक एवं भावप्रवण कविता  “नक्षत्रांचे देणे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 57 ☆

☆ नक्षत्रांचे देणे ☆

 

ऋतू फळांचा होता, झाड लगडले होते

खडा मारला तरिही, झाड न चिडले होते

 

नवी पालवी फुटली, नटले झाड नव्याने

बघून हिरवा नखरा, खग फडफडले होते

 

नक्षत्रांचे देणे, लतिके तुझ्याच साठी

फुले न या वेलीला, हिरेच जडले होते

 

अमावास्या तरीही, चंद्र कसा हा दिसला

मला पाहुनी बहुधा, तंत्र बिघडले होते

 

युद्ध वादळी होते, सवाल अस्तित्वाचा

अवयव हे झाडाचे, मिळून भिडले होते

 

फळे पक्व ही होता सारी गळून गेली

देठासोबत येथे, मुळही रडले होते

 

पूर्वेच्या किरणांची, वाट मोकळी केली

स्वागतास मी त्यांच्या, दार उघडले होते

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ उत्सव कवितेचा # 12 – रात्र ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  हम श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी के हृदय से आभारी हैं कि उन्होने साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा के माध्यम से अपनी रचनाएँ साझा करने की सहमति प्रदान की है। आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता  रात्र 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा – # 12 ☆ 

☆ रात्र

 

रात्र

लडिवाळ

गोष्टीवेल्हाळ

आजीच्या मांडीवर

जोजावणारी

जादूच्या चटईवरून

साता समुद्रापार नेणारी

यक्ष … चेटकीणीचे

गारुड

दाखवता दाखवता

त्यातच विरघळून जाणारी

रात्र

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 57 – झूम -झूम जब सावन  आए …. ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  एक  अतिसुन्दर समसामयिक गीत   “झूम -झूम जब सावन  आए ….।  श्रवण मास हो और  सावन के गीत न हों यह संभव ही नहीं है। लॉक डाउन एवं मन के द्वार में अद्भुत सामंजस्य बन पड़ा है। ह्रदय से लेकर प्रकृति का अतिसुन्दर चित्रण। इस सर्वोत्कृष्ट  सावन के गीत के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 57 ☆

☆ झूम -झूम जब सावन  आए ….

 

झूम -झूम जब सावन  आए,

मन प्रसन्न हो गुन- गुन गाए।

झूमे उपवन की हर डाली,

जीव- जन्तु जन-मन मुस्काए।

 

नभ में प्यारी लाली छाई

भोर  घटा  फिर घिर -घिर आई।

धरती पर मनहर सुंदरता ,

अंबर ने  फिर यूँ बरसाई।

 

तरुवर को नव पात मिले हैं,

कली फूल बनकर मुस्काए।

 

कृषक खेत को हो मतवाले,

चले,स्वप्न अंतर् में पाले।

बैलों की घण्टी के स्वर भी,

लगते सबको बड़े निराले।

 

उछल; कूद करते सब बच्चे,

ज्यों खुशियों के नव पर पाए।

 

सनन -सनन चलती पुरवाई,

तन -मन  लेता है अँगड़ाई।

ले नदिया का नीर हिलोरे,

बढ़ती है जल की गहराई।

 

मुदित हुआ गोरी का आँचल,

संग संग पुरवा लहराए।

 

सावन की है बात निराली ,

मोह रही मन ऋतु मतवाली ।

पिया -मिलन  मधु सरगम छेड़े ,

चितवन हाला की ज्यों प्याली।

 

कर शृंगार सजी  है धरती,

रूप निरख मन अति हरषाये।।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ आज़ाद ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु के जैन महाविद्यालय में सह प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं एवं  साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, स्वर्ण मुक्तावली- कविता संग्रह, स्पर्श – कहानी संग्रह, कशिश-कहानी संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आज ससम्मान  प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं सार्थक कविता आज़ाद।  इस  कविता के लिए डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी की लेखनी को सादर नमन।)  

☆ कविता – आज़ाद  ☆ 

आज़ाद… आज़ाद…आज़ाद…

स्वतंत्र….हम स्वतंत्र…स्वतंत्र…

गूँज उठा एक स्वर भारत में,

मनाई होली, दिवाली………

 

फ़टे-चिथड़ों में लिपटी लड़की,

बहा रही आँसू कभी हँस रही,

कभी रुदन तो कभी ज़ोर से ठहाके,

पूछ रही स्वतंत्रता का अर्थ,

 

कह रही रोते-रोते नहीं हुए स्वतंत्र,

है आज भी हम परतंत्र,

कर रहे गुलामी आज भी,

भरा है दुःख उसके ह्रदय में,

 

आज़ाद मात्र हुआ भारत,

भारत कभी था गुलाम,

काले-गोरे का भेद किया,

कुचले गये पैरों तले,

 

हुए परेशां जाति-धर्म के नाम पर,

हुई गुस्ताखी सत्ता के ठेकेदारों से,

हुई लड़ाई भाई-भाई के बीच,

और कहते रह गये ’हम स्वतंत्र’,

 

अबला नहीं सबला है नारी,

कहते-कहते थक गई नारी,

दर असल आज भी है अबला,

आज भी चाहिए उसे सहारा,

 

पहले मात्र था दुश्मन अंग्रेज़,

आज बना दुश्मन संसार,

आज रच रहा महाभारत,

हर घर में, हर गली में,

 

भ्रष्टाचार, आतंकवाद से भरा देश,

बम फूटने का डर तो कभी………

कभी अत्याचार का खौफ़,

लोकतंत्र, प्रजातंत्र मात्र रह गये,

 

पद के लिए हुए अनेक दुश्मन,

दरारें खड़ी हुई भाई-भाई के बीच,

हुए खून के प्यासे हिन्दू-मुसलमान,

जान देते थे कभी एक-दूसरे के लिए,

 

इन्सान के लहू का रंग एक,

ईश्वर- अल्लाह नाम एक,

फिर भी क्यों बैर?

रंजिशें हो रहीं खुले आम,

 

हो रहा अत्याचार देश में,

देश को आज़ाद करने के लिए,

दिये बलिदान वीरों ने,

क्षणभंगुर किया कुछ ठेकेदारों ने,

 

अखण्ड भारत को किया खण्डित

जातिवाद, आरक्षण और धर्मवाद,

किए दुकड़े भारत के अनेक,

हुई बुद्धि भ्रमित इन्सान की,

 

घोर कलियुग आया है,

हम कहते आये है,

है हम स्वतंत्र, स्वतंत्र…..

क्या यही है परिभाषा,

 

बंद करो लड़ना आपस में,

मत बन खिलौना किसी का,

आज़ादी का समझ सही अर्थ,

इन्सान बन विचारों से स्वतंत्र,

 

मत कर शोषण दुर्बल का,

दूर कर बेरोजगारी दे सहारा,

बलात्कार, हत्या, मर्मान्त पीड़ा,

सारे बुरे कर्मो को दूर कर,

 

हिंसा छोड अहिंसा को अपनाओ,

बुद्ध और गांधीजी को ह्रदय से अपनाओ,

उन्नति की राह पर चलकर सहायक बनो,

विलासिता त्याग श्रम को अपनाओ,

 

स्वावलंबन को ही अपनी पूँजी बनाओ,

मत बदलो मात्र पहनावे को,

अपने विचारों से बदलो दुनिया को,

आत्मगौरव बने तुम्हारी जिंदगी,

 

आदर, सम्मान करना है औरत का,

नया इतिहास तुम्हें रचना है,

बढ़ना है आगे विकसित राष्ट्र में

समझो अर्थ आज़ादी का,

 

चिल्लाना नहीं बाज़ार में,

आज़ाद…स्वतंत्र…स्वतंत्र,

होकर सही अर्थों में स्वतंत्र,

समझाना लोगों को परिभाषा,

 

कर माँ का सम्मान,

दूध का कर्ज है चुकाना,

आज तुम्हें आगे बढ़ना,

अपनों का हाथ थामना।

 

©  डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

लेखिका, सहप्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, जैन कॉलेज-सीजीएस, वीवी पुरम्‌, वासवी मंदिर रास्ता, बेंगलूरु।

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (24) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण)

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।।24।।

 

सुख दुख को सम मानता, मिट्टी स्वर्ण समान

प्रिय अप्रिय में तुल्यता, निंदा स्तुति समान।।24।।

भावार्थ :  जो निरन्तर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है।।24।।

 

Alike in pleasure and pain, who dwells in the Self, to whom a clod of earth, stone and gold are alike, to whom the dear and the unfriendly are alike, firm, the same in censure and praise,।।24।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लेखनी सुमित्र की – प्रार्थना के स्वर ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम दोहे  प्रार्थना के स्वर। )

  ✍  लेखनी सुमित्र की – प्रार्थना के स्वर ✍

 

भाव संपदा हो घनी, हो चरणों की चाह।

शब्द ब्रह्म आराधना, घटे नहीं उत्साह।।

 

करुण, वीर ,वात्सल्य रस ,श्रंगारिक रसराज।

रस की हो परिपूर्णता, माने रसिक समाज।।

 

सत शिव -सुंदर काव्य ही,मौलिक रचे रचाव।

नयन प्रतीक्षा में निरत ,हार्दिक रहे प्रभाव।।

 

रस ही जीवन प्राण है, सृष्टि नहीं रसहीन ।

पृथ्वी का मतलब रसा, सृष्टि स्वयं रसलीन ।।

 

प्रथम वर्ण उपचार से, रचता रंग विधान।

प्रेम रंग में जो रंगी, उसको खोजे प्राण।।

 

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

9300121702

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