हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 56 – हम बारिश बन जाएं…. ☆ डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है एक विचारणीय भावप्रवण कविता  हम बारिश बन जाएं….। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 56 ☆

☆  हम बारिश बन जाएं…. ☆  

 

आओ!

हम बारिश बन जाएं

धरकर रूप बादलों का

फिर समूचे अंबर में छा जाएं।

 

सूरज से, आशीषें  लेकर

पवन देव से हाथ मिलाएं

मौसम से मनुहार,प्यार से

मैत्री भाव, आश्वस्ति पाएं,

 

जल के स्वामी वरुण देवता

से फिर अपनी  प्रीत बढ़ाएं।

आओ हम बारिश बन जाएं।।

 

बरसें, पहले  जहाँ  प्यास है

जल बिन जनजीवन उदास है

पक्षपात से पीड़ित अब तक

पहुंचें,  उनके आसपास है,

 

जहां पड़ा सूखा अकाल है

वहाँ हवा हमको पहुंचाए।

आओ हम बारिश बन जाएं।।

 

नहीं बाढ़ ना अतिवृष्टि हो

बंटवारे  में  सम दृष्टि हो

नहीं शिकायत रहे किसी को

आनंदित यह सकल सृष्टि हो,

 

वन उपवन फसलें सब सरसे

हरसे  धरा  तृप्त  हो  जाए।

आओ हम बारिश बन जाएं।।

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

07/06/2020

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 58 – गावाकडची कविता….. ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनके ही गांव पर आधारित एक अतिसुन्दर कविता कविता गावाकडची कविता…..। सुश्री प्रभा जी की यह रचना  उनके गांव का सजीव चित्रण है। काश हमारे सभी गांव इसी तरह हरित एवं श्वेत क्रांति के प्रतीक होते तो हमारा देश कितना सुन्दर देश होता ? सुश्री प्रभा जी द्वारा रचित  इस भावप्रवण रचना के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन।  

मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 58 ☆

☆ गावाकडची कविता….. ☆

(राहू हे आमचं गाव. दौंड तालुक्यातील….)

 

नदीकाठावर वसले आहे  आमचे राहू

मिडीयाला ही दिसले आहे  आमचे राहू

 

असे थोरांचे अन मोरांचे कोण कोणाचे

दलदली मध्ये फसले आहे  आमचे राहू

 

महादेवाचे,शिवशंभोचे ,गाव ऊसाचे

हरितक्रांतीने हसले आहे आमचे राहू

 

धवलक्रांती ही घडते,हे तर क्षेत्र दूधाचे

मनी लोकांच्या ठसले आहे आमचे राहू

 

इथे रानातच सळसळ चाले सर्प-नागांची

कुठे कोणाला डसले आहे आमचे राहू

 

‘प्रभा ‘त्याच्या ही स्वप्नी सजते पीक सोन्याचे

बळीराजाने कसले आहे  आमचे राहू

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ बहू-बेटी ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ बहू-बेटी

*पुनर्पाठ में आज एक लघु कथा-

“भाईसाहब प्रणाम! कैसे हैं?” उस दिन समाज के परिचय सम्मेलन में वे मिल गये थे।

“जरा अनुकंपा रखो छोटे भाई पर भी।”

“क्या बात है”, मैंने गंभीरता से पूछा।

“आपका भतीजा इंजीनियर होकर आई.टी. में दो साल से नौकरी पर है। बढ़िया पैकेज है। कोई अच्छी लड़की बताओ। विशेष मांग नहीं है अपनी पर हाँ शादी अपने स्टेटस की हो। खास बात यह कि लड़की, बेटे को सूट करने वाली ऊँची लिखी-पढ़ी हो लेकिन पूरी घरेलू हो। लड़की जात मेहनती तो होनी ही चाहिए। वैसे भी अपना बड़ा परिवार है। आकर सारा घर संभाल ले”, एक साँस में कह गये वे।

कुछ रोज़ बाद फिर टकरा गये एक शादी में।

“भाईसाहब प्रणाम!….आपके भतीजे का रिश्ता ले लिया है आपके आशीर्वाद से। वो आपने बताया था न, अपने साधुराम जी की पोती से ही तय हुआ है। तारीख निकलते ही हाजिर होता हूँ। पहला कार्ड तो आपको देना बनता ही है।

….जी भाईसाहब एक अनुकंपा और करो।”

“कहिये, आपके किस काम आ सकता हूँ?”

“अपनी टीकू भी ब्याह लायक हो गई है। कोई ढंग का लड़का बताओ। शादी जैसी बताएँगे, कर देंगे। हाँ बस देखना कि परिवार छोटा हो। हो सके तो लड़का अकेला ही रहता हो। सारे सुख हों। अपनी टीकू को पानी का गिलास भी उठाकर न पीना पड़े।”

नमस्ते कर मैं बाहर निकला। सामने सरकारी अस्पताल की दीवार पर स्लोगन लिखा था,  ‘दोनों घर की शान, बहू-बेटी एक समान।’

 

©  संजय भारद्वाज

2 नवंबर 2017, रात्रि 9:30 बजे।

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 37 – बापू के संस्मरण-11- निर्दोष प्राणी की बलि से देवी प्रसन्न नहीं होती…… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “बापू के संस्मरण –  निर्दोष प्राणी की बलि से देवी प्रसन्न नहीं होती…… ”)

☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष ☆

☆ गांधी चर्चा # 37 – बापू के संस्मरण – 11 – निर्दोष प्राणी की बलि से देवी प्रसन्न नहीं होती……

एक दिन बिहार के चम्पारन जिले के एक गांव से होकर लोगों का एक जुलूस देवी के स्थानक की ओर जा रहा था । संयोग से गांधीजी उस दिन उसी गांव में ठहरे हुए थे, जब वह जुलूस गांधीजी के निवास के पास से होकर गुजरा तो उसका शोर सुनकर उनका ध्यान उसकी ओर गया।  पास बैठे हुए एक कार्यकर्ता से उन्होंने पूछा ~यह कैसा जुलूस है? और ये इतना शोर क्यों मचा रहे हैं। ” कार्यकर्ता पता लगाने के लिए बाहर आया ही था कि उत्सुकतावश वह स्वयं भी बाहर आ गये और सीधे जुलूस के पास चले गये ।

उन्होंने देखा कि सबसे आगे एक हट्टा-कट्टा बकरा चला जा रहा है। उसके गले में फूलों की मालाएं पड़ी हुई हैं और माथे पर टीका लगा हुआ है। वह समझ गये कि यह बलि का बकरा है। क्षण-भर में अंधविश्वास में डूबे हुए इन भोले-भाले लोगों का सजीव चित्र उनके मस्तिष्क में उभर आया। हृदय करुणा से भीग गया। थोड़ी देर तक इसी विचार में डूबे वह जुलूस के साथ चलते रहे। लोग अपनी धुन में इतने मस्त थे कि वे यह जान ही नहीं सके कि गांधीजी उनके साथ-साथ चल रहे हैं। जुलूस अपने स्थान पर पहुंचा। बकरे का बलिदान करने के लिए विधिवत् तैयारी होने लगी।

तभी गांधीजी उन लोगों के सामने जा खड़े हुए। कुछ लोग उन्हें पहचानते थे। निलहे गोरों के अत्याचार के विरुद्ध वही तो उनकी सहायता करने आये थे। उन्हें अपने सामने देखकर वे चकित हो उठे । तभी गांधीजी ने उनसे पूछा, “इस बकरे को आप लोग यहां क्यों लाये है?” सहसा किसी को कुछ कहते न बना । क्षण भर बाद एक व्यक्ति ने साहस करके कहा, “देवी को प्रसन्न करने के लिए।” गांधीजी बोले “आप देवी को प्रसन्न करने के लिए बकरे की भेंट चढ़ाना चाहते हैं, लेकिन मनुष्य तो बकरे से भी श्रेष्ठ है।”

वे कुछ समझ न पाये बोल उठे,”जी हां, मनुष्य तो श्रेष्ठ है ही। ” गांधीजी ने कहा,”यदि हम मनुष्य का भोग चढ़ायें तो क्या देवी अधिक अधिक प्रसन्न नहीं होगी?” बड़ा विचित्र प्रश्न था। उन ग्रामीणों ने इस पर कभी विचार नहीं किया था। वे सहसा कोई उत्तर न दे सके। गांधीजी ने ही फिर कहा, “क्या यहां पर कोई ऐसा मनुष्य है, जो देवी को अपना भोग चढ़ाने को तैयार हो? अब भी उनमें से कोई नहीं बोला। थोड़ा रुककर गांधीजी ने कहा, “इसका मतलब है कि आप में से कोई तैयार नहीं है, तब मैं तैयार हूं ।” वे सब लोग अब तो और भी हक्के-बक्के हो उठे। पागल-से एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। उन्हें सूझ नहीं रहा था कि वे क्या कहें? विमूढ़ से खड़े ही रहे। गांधीजी ने अब अत्यंत व्यथित स्वर में कहा, “गूंगे और निर्दोष प्राणी के रक्त से देवी प्रसन्न नहीं होती । अगर यह बात किसी तरह सत्य भी हो तो मनुष्य का रक्त अधिक मूल्यवान है, वही देवी को अर्पण करना चाहिए, परन्तु आप ऐसा नहीं करते। मैं कहता हूं कि निर्दोष प्राणी की बलि चढ़ाना पुण्य नहीं है, पाप है, अधर्म है।”

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मीनाक्षी साहित्य – किचनेशा – ☆ सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। कई पुरस्कारों/अलंकारों से पुरस्कृत/अलंकृत सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी का जीवन परिचय उनके ही शब्दों में – “नियतकालिके, मासिके यामध्ये कथा, ललित, कविता, बालसाहित्य  प्रकाशित. आकाशवाणीमध्ये कथाकथन, नभोनाट्ये , बालनाट्ये सादर. मराठी प्रकाशित साहित्य – कथा संग्रह — ५, ललित — ७, कादंबरी – २. बालसाहित्य – कथा संग्रह – १६,  नाटिका – २, कादंबरी – ३, कविता संग्रह – २, अनुवाद- हिंदी चार पुस्तकांचे मराठी अनुवाद. पुरस्कार/सन्मान – राज्यपुरस्कारासह एकूण अकरा पुरस्कार.)

अब आप सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी के साप्ताहिक स्तम्भ – मीनाक्षी साहित्य को प्रत्येक बुधवार आत्मसात कर सकेंगे । आज प्रस्तुत है आपकी एक  मूल एवं विडंबन कविता  किचनेशा .

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मीनाक्षी साहित्य – किचनेशा – ☆

(ही कविता पूर्वींची आहे. तेव्हा कीचनमध्ये गँसची शेगडी नि लाल सिलेंडर म्हणजे महद्भाग्य वाटायचं. आधी गँस मिळवण्यासाठी नंबर नि नंतर तो महिन्याला मिळणे हेही कौतुकाचं.आता मा. पंतप्रधानानी गँस झोपड्यांमध्येही पोचवला, पण त्या काळात ? वाचुया कविता.” किचनेशा “)

विडंबन कविता —किचनेशा—

किती दिवसांनी तुला पाहिले गँसा

प्रिय माझ्या  रे  किचनेशा    ।।

तू गेल्याचा अजुनी आठवे दिवस

लावला हात कर्मास

पाहुणे  घरी  आले होते खास

मज आठवला  विघ्नेश

भोवती स्टोव्ह ते जमले

ते फरफरले, फुरफुरले

तोंडास लागले  काळे

मग रोजच रे असली अग्नि परिक्षा

प्रिय माझ्या      ।।

 

मूळ कविता—-

 

संदेश तुला कितीतरी पाठवले

नाही का ते तुज कळले?

की कोणि तुला मधुनच भुलवुन नेले?

मी येथे तिष्ठत बसले

भाकरी  नीट भाजेना

कुकरची  शिटी  होईना

झाली बघ दैना दैना

का विरहाची दिलीस असली शिक्षा

प्रिय माझ्या   ।।

 

आणि एके दिवशी  —

दूरात तुझा लाल झगा झकमकला

जिव सुपाएव्हढा झाला

मी लगबगले, काही सुचेना बाई

महिन्याने दर्शन  होई

ओटा धुतला, स्वच्छ शेगड्या केल्या

कौतुके तुला मी पुसला

ज्योत तुझी निळसर हसली ,

मुखकलिका माझी खुलली

महिन्याची शिक्षा सरली

मनमुक्त अता फिरेन मी दाहिदिशा

प्रिय माझ्या रे किचनेशा   ।।।।

 

© मीनाक्षी सरदेसाई

‘अनुबंध’, कृष्णा हास्पिटलजवळ, पत्रकार नगर, सांगली.४१६४१६.

मोबाईल  नंबर   9561582372, 8806955070

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हिन्दी साहित्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 36 ☆ सजल – बैर नहीं पाला जीवन भर…. ☆ श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी अतिसुन्दर सजल  बैर नहीं पाला जीवन भर….। 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 36 ☆

☆ सजल – बैर नहीं पाला जीवन भर…. ☆

हो  जाती वाणी  कठोर जब प्रेम न दिल में पलता है।

बैर नहीं पाला जीवन भर अपनी यही सफलता है।

 

नीम-करेला-सी कड़वाहट  बोली का संकेत यही

है मस्तिष्क रुग्ण चिंतन में पली हुई दुर्बलता है।

 

योगेश्वर भगवान सदा ही मेरी रक्षा  करते हैं।

इसका कारण मेरे मन की एक मात्र निश्छलता है।

 

आस लगाए रहतीं हूँ प्रभु चरणों में चातक जैसी

नहीं जानती पूजन-विधि पर भावों में  निर्मलता है।

 

करता है व्यवहार शत्रु-सा क्रूर पड़ोसी राष्ट्र सदा

और सहन करता है भारत यह कैसी दुर्बलता है।

 

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

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हिन्दी साहित्य ☆ कविता ☆ फुनवा यानी फोन ☆ डाॅ मंजुला शर्मा (नौटियाल)

डाॅ मंजुला शर्मा (नौटियाल)

( टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड में जन्मीं डॉ मंजुला शर्मा जी को  25 वर्षों के अध्यापन कार्य का अनुभव है एवं अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। हम भविष्य में आपके चुनिंदा रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करने की अपेक्षा करते हैं। आज प्रस्तुत है फोन पर एक तथ्यात्मक एवं विचारणीय सार्थक कविता  फुनवा यानी फोन)

☆ फुनवा यानी फोन ☆

(समाज में फोन प्रगति का आधार है मगर अति व मति का वैर रहता है , हर बुद्धिमान यही कहता है।यदि इसका प्रयोग काम के लिए ही अधिक होगा तभी सामाजिक जीवन में संतुलन रहेगा । )

 

ये फुनवा, ये फुनरा, ये फुनवा लेगा तेरी जान

तू इसका,तू इसका, तू इसका, खतरा ले पहचान

ये फुनवा,ये फुनवा, ये फुनवा लेगा तेरी जान।

 

शाम सवेरे जब भी देखूॅ, फोन पे तू बतियाए

बेढंगे सब काम करे और मन इसमें उलझाए

सारी दुनिया छोड के तूने इससे लिया है ज्ञान

ये फुनवा, ये फुनवा, ये फुनवा लेगा तेरी जान।

 

समय मिला न ज़रा तुझे, मम्मा से कर ले बात

हुई न जाने कबसे अपने पप्पा से मुलाकात

इसके आगे सबकुछ मिट्टी, फोन ही तेरे प्राण

ये फुनवा, ये फुनवा, ये फुनवा लेगा तेरी जान।

 

मेरे आगे- पीछे ऐसे लोगों की है फौज

चौबीस में से बाहर घंटे,फोन पे लें जो मौज

सोते जगते इसे ही देखें, फोन ही इनकी शान

ये फुनवा, ये फुनवा, ये फुनवा लेगा तेरी जान ।

 

कितने लोग हैं सैल्फी लेते, अपनी जान गंवाई

अजगर, शेर और ट्रेन के आगे सैल्फी लेनी चाही

जान से ज्यादा फोन का ही, रखा है जी ध्यान

ये फुनवा, ये फुनवा , ये फुनवा लेगा तेरी जान।

 

दोस्त यार और भाई-बंधु के, बदले है यह फुनवा

काम-धाम और रास-रंग के बदले है ये फुनवा

आज से इसको दूर रखेगा, मन में ले अब ठान

ये फुनवा,ये फुनवा , ये फुनवा लेगा।

 

© डाॅ मंजुला शर्मा (नौटियाल)

नई दिल्ली

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 7 – याद ☆ – श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी  अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता रिश्तों की हवेली

 

Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 7 – याद ☆

 

माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची अक्सर याद आते हैं,

मायूस ऑंखें मजबूर हो सबको दुनिया से विदा होते देखती रह गयी ||

 

याद कर सबको बरबस आँखों से हर कभी आंसू निकल आते हैं,

दिल में ख्याल आता है सेवा में हमसे बहुत कमी रह गयी थी||

 

थोड़ी सेवा और कर लेते, ना करने की भी कोई मजबूरी ना थी,

काश! इलाज और करा लेते, पैसे की भी कोई कमी ना थी ||

 

मगर ये सब बातें अब अक्सर रोज दिल को कचोटती है,

माफ़ करना ऐसा कुछ ना करने की कोई भावना हमारी नहीं थी ||

 

आप सबसे एक ही विनती, माफ़ी स्वीकार कर लीजिए हमारी,

चाहे जो सजा दे देना पर चरणों में अपने ही हमें जगह देना ||

 

हम अंश आपके बुद्धिहीन नादान, माफ़ी के हरगिज नहीं हकदार,

रह गयी बहुत सेवा में कमी, नादान समझ हमें माफ़ कर देना ||

 

ना जाने सांसरिक जीवन में क्यों ऐसी कमियां रह जाती,

हाथ जोड़ विनती करते,  हम भटकों को सही राह दिखा देना ||

 

©  प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (25) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण)

 

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।

सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते।।25।।

मानापमान औं मिच-रिपु जिसको सदा समान

कार्य करे निष्काम तो त्रिगुणातीत उसे जान।।25।।

 

भावार्थ :  जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है।।25।।

 

The same  in  honour  and  dishonour,  the  same  to  friend  and  foe,  abandoning  all undertakings-he is said to have crossed the qualities.।।25।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ विवाह – – मन तेरे संग उड़ान पर ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

(सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी” जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  की  एक सार्थक एवं  भावप्रवण कविता  विवाह – – मन तेरे संग उड़ान पर इस अतिसुन्दर रचना के लिए आदरणीया श्रीमती हेमलता जी की लेखनी को नमन। )

 ☆  विवाह – – मन तेरे संग उड़ान पर ☆ 

विवाह बंधन—जीवन का अलिखित आलेख

पवित्र संस्कार सात जन्मों का

निरंकुश संबंधों पर उजास प्रतिबद्धता का

एक दिशांकन रिश्तों की गरिमा का

 

पवित्र अग्नि – – संग संग सात फेरे

विश्वासों की पावन परिधि में मानस प्रतिज्ञा

सात वचनों की वचनबद्धता

दायित्व अधिकार और कर्तव्य की द्विपक्षीय

भावुक अपेक्षा की अभिनंदनीयता

 

विवाह मात्र मन की उड़ान नहीं

सतरंगी सपनों की अगवानी नहीं

सारा गगनांगन मंडप और जग बराती नहीं

विवाह

रिश्तों संबंधों का सबसे तुल्य मंचन

मर्यादाओं का संज्ञान

हर सांस में जीवित विश्वास की अनुगुंजन

 

बिंदिया चूड़ियाँ, नथ मटरमाला मंगलसूत्र

हाथ की रेखाओं में गहरे तक दमकते हैं।

 महावर बिछिया पायल पैरों से

देहरी पुजवाते—मन की उड़ान थामते

 

चलें – –  साथी धवल चंद्र रश्मियां ढूंढे

हिम चोटियों से मन की बात करें

शांत स्निग्ध सौम्य सागर छलकांएं

विवाह बंधन के अलिखित संविधान

की अनुगूंज सुनें–गुनें

 

उगते सूरज की सिंदूरी लाली से

डूबते मार्तण्ड का ईतिवृत्  सुनें

जीवन पथ का सफर साथ गुनगुनाते

प्रयाण बेला चुनें

चलो साथी—चलें उडान भरें

 

© हेमलता मिश्र “मानवी ” 

नागपुर, महाराष्ट्र

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