हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 10 ☆ वीर शहीद जसवंत सिंह का जीवंत शौर्य ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  की  1962 के भारत चीन युद्ध की एक वीरगाथा पर आधारित  कविता  वीर शहीद जसवंत सिंह का जीवंत शौर्य  एवं उनसे सम्बंधित आलेख।  हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।  ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 10☆

☆ वीर शहीद जसवंत सिंह का जीवंत शौर्य ☆

 हैं हिंद की सेना में कई वीर यों महान

सुन जिनका पराक्रम सभी रह जाते हैरान

 

मन में उमड़ता जोश आता खून में उबाल

बांहें फड़कती खींच लेने दुश्मनों की खाल

 

अरुणाचल में जसवंतगढ़ नूरा तांग के पास

ऐसे ही वीर जसवंत का जीवंत है इतिहास

 

उनकी ही याद में वहां उनका मंदिर बना हुआ

जिसमें सुरक्षित आज भी उनका सभी सामान

 

गहरा था उन्हें  देश प्रेम घने आस्था विश्वास

लड़ते रहे वे तीन दिनों तज भूख और प्यास

 

शैला और नूरा बहनों ने दे भोजन किया उपकार

जिससे बढा था हौसला दुश्मन को सके  मार

 

उनने अकेले तीन सौ चीनियों को मारा

पकड़ा उन्हें जब वे  थे थके अकेला बेसहारा

 

यह महावीर योद्धा थे जसवंत सिंह रावत

जो सच में सिंह से निडर थे जैसी है कहावत

 

गढ़वाल देवभूमि के थे वे मूल निवासी

कर्तव्य ऐसा प्यारा कि मरकर भी करें ड्यूटी

वीर वे अब भी हैं वहां अशरीर  निगहवान

भारत महान धन्य जिसे ऐसे वीरों का वरदान

 

देवभूमि उत्तराखंड ना केवल अपने देवी-देवताओं और उनके मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है बल्कि यह अपनी वीरता के लिए भी मशहूर है। देवभूमि का एक ऐसा ही महान वीर था जसवंत सिंह रावत। भारत और चीन के बीच 1962 की लड़ाई में वीर जसवंत सिंह रावत ने चीनी सेना को नाको चने चबवा दिया था। उन्होंने अकेले ही 72 घंटो तक चीनी सेना के 300 जवानों को मौत के घाट उतारा दिया। जानकार कहते हैं कि जसवंत सिंह एक की वीरता का लोहा चीनी सेना ने भी माना था। उनके अदम्य साहस और वीरता के लिए देश और पूरा उत्तराखंड हमेशा उन्हें याद रखेगा। आइए जानते हैं कि कैसे जसवंत सिंह ने तीन दिन तक चीनी सेना की नाक में दम करके रखा।

जसवसंत सिंह रावत हैं कौन

वीर जसवंत सिंह रावत का जन्म 19 अगस्त 1941 को उत्तराखंड के ग्राम-बाड्यूं ,पट्टी-खाटली,ब्लाक-बीरोखाल, जिला-पौड़ी गढ़वाल में हुआ था। आपको बता दें कि जिस समय जसवंत सिंह सेना में भर्ती होने गए थे उस समय उनकी उम्र महज 17 साल थी। जिस कारण उन्हें सेना में भर्ती होने से रोक दिया गया था। इसके बाद फिर उनकी उम्र होने पर ही उन्हें सेना में भर्ती किया गया। वह 1962 की लड़ाई में चीनी सेना के खिलाफ युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

नूरानांग युद्ध

चीन ने 17 नवंबर 1962 को अरुणाचल प्रदेश पर पर कब्जा करने के लिए चौथा व आखिरी हमला किया। जिस समय चीन ने अरुणाचल प्रदेश पर हमला किया उस समय अरुणाचल की सीमा पर भारतीय सेना की तैनाती नहीं थी। जिसका फायदा उठाकर चीन ने भारत पर हमला बोल दिया। चीन ने अरुणाचल पर हमला कर काफी तबाही मचाई और महात्मा बुद्ध की मूर्ति के हाथों को काटकर ले गए। चीनी सेना ने वहां औरतों की इज्जत भी लूटी।

गढ़वाल राइफल की तैनाती

चीनी सेना को रोकने के लिए वहां गढ़वाल रायफल की 4ह्लद्ध बटालियन को वहां भेजा गया। वीर जसवंत सिंह रावत इस बटालियन के एक सिपाही थ, लेकिन सेना के जवानों के पास चीनी सेना का भरपूर जवाब देने के लिए पर्याप्त हथियार और गोला बारूद उपलब्ध नहीं था। जिस कारण चीनी सेना अरुणाचल से सेना के जवानों को वापस बुलाने का फैसला किया गया। सरकार के आदेश के बाद पूरी गढ़वाल बटालियन वापस लौट आई। लेकिन गढ़वाल राइफल के तीन जवान रायफल मैन जसवंत सिंह रावत, लांस नाइक त्रिलोक सिंह नेगी, रायफल मैन गोपाल सिंह गुसाईं वापस नहीं लौटे। वीर जसवंत सिंह ने अपने दोनों साथियों लांस नाइक त्रिलोक सिंह नेगी और रायफल मैन गोपाल सिंह गुसाईं को वापस भेज दिया और खुद नूरानांग की पोस्ट पर तैनात होकर चीनी सेना को आगे बढऩे से रोकने का फैसला किया।

जसवसंत सिंह रावत ने 300 चीनी सैनिकों को उतारा मौत के घाट

वीर जसवंत सिंह ने अकेले ही 72 घंटो तक लड़ते हुए चीनी सेना के 300 जवानों को मौत के घाट उतार दिया और किसी को भी आगे नहीं बढऩे दिया गया। वीर जसवंत सिंह जितने बहादुर थे उतने ही वह चालाक भी थे। उन्होंने अपनी चतुराई और बहादुरी के बल पर चीनी सेना को 3 घंटों तक रोके रखा। इसके लिए उन्होंने पोस्ट की अलग अलग जगहों पर रायफल तैनात कर दी थी और कुछ इस तरह से फायरिंग कर रहे थे जिससे की चीन की सेना को लगा यहां एक अकेला जवान नहीं बल्कि पूरी की पूरी बटालियन मौजूद हैं।

शैला और नूरा ने क्या किया

इस बीच रावत के लिए खाने पीने का सामान और उनकी रसद आपूर्ति वहां की दो बहनों शैला और नूरा ने की जिनकी शहादत को भी कम नहीं आंका जा सकता। 72 घंटे तक चीन की सेना ये नहीं समझ पाई की उनके साथ लडऩे वाला एक अकेला सैनिक है। फिर 3 दिन के बाद जब नूरा को चीनी सैनिको ने पकड़ दिया तो उन्होंने इधर से रसद आपूर्ति करने वाली शैला पर ग्रेनेड से हमला किया और वीरांगना शैला शहीद हो गई। उसके बाद उन्होंने नूरा को भी मार दिया दिया और इनकी इतनी बड़ी शहादत को हमेशा के लिए जिंदा रखने के लिए आज भी नूरनाग में भारत की अंतिम सीमा पर दो पहाडिय़ा है जिनको नूरा और शैला के नाम से जाना जाता है।

चीनी सेना ने जसवंत सिंह की बहादुरी को किया सम्मानित

नूरा और शैला की शहादत के बाद वीर जसवंत सिंह को मिलने वाली रसद आपर्ति कमजोर पडऩे लगी। बावजूद इसके वह दुश्मनों से लड़ते रहे, लेकिन रसद आपूर्ति की कमी के चलते आखिरकार उन्होंने 17 नवम्बर 1962 को खुद को गोली मार ली। चीनी सैनिको को जब पता चला कि वह 3 दिन से एक ही सिपाही के साथ लड़ रहे थे तो वो भी हैरान रह गए। चीनी सेना जसवंत सिंह रावत का सर काटकर अपने देश ले गई। अंत में 20 नवम्बर 1962 को युद्ध विराम की घोषणा कर दी गई। जिसके बाद चीनी कमांडर ने जसवंत सिंह की इस साहसिक बहादुरी को देखते हुए न सिर्फ जसवंत सिंह का शीश वापस लौटाया बल्कि सम्मान स्वरुप एक कांस की बनी हुई उनकी मूर्ति भी भेंट की।

वीर जसवंत के नाम का स्मारक

जसवंत सिंह ने जिस जगह पर चीनी सेना के दांत खट्टे किए थे उस जगह पर उनके नाम का एक मंदिर बनाया गया है। जहां पर चीनी कमांडर द्वारा सौंपी गई जसवंत सिंह की मूर्ति को भी रखा गया है। भारतीय सेना का हर जवान उनको शीश झुकाने के बाद ड्यूटी करता है। वहां तैनात कई जवानों का कहना है कि जब भी कोई जवान ड्यूटी पर सोता है जसवंत सिंह रावत उनको थप्पड़ मारकर जगाते हैं। मानो वह उनके कानों में कहते हो की मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी करो क्योंकि देश की सुरक्षा तुम्हारे हाथो में है।

इनके नाम से नुरानांग में जसवंत गढ़ के नाम से एक जगह भी है। जहां इनका बहुत बड़ा स्मारक है। बता दें कि इस स्मारक में उनकी हर चीज को संभाल कर रखा गया है। आपको जानकर हैरानी होगी कि आज भी यहां इनके कपड़ो पर रोज प्रेस की जाती है। साथ ही रोज इनके बूटो पर पोलिश भी की जाती है। यही नहीं रोज सुबह दिन और रात की भोजन की पहली थाली जसवंत सिंह रावत जी को ही परोसी जाती ह। जसवंत सिंह रावत जी  भारतीय सेना के ऐसे पहले जवान है जिनको मरणोपरांत भी पदोन्नति दी जाती है। रायफल मैन जसवंत सिंह आज कैप्टेन की पोस्ट पर हैं और उनके परिवार वालो को उनकी पूरी सैलरी दी जाती है।

 

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सूचना /Information ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेषांक 2019-20 ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

☆ सूचना/Information ☆

 ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेषांक 2019-20 ☆

आदरणीय मित्रो,

गत वर्ष हमने महात्मा गांधी जी के 150वें जन्मोत्सव के अवसर पर अग्रज वरिष्ठ साहित्यकार श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी के अतिथि सम्पादन में दो भागों में गांधी जयंती विशेषांक का प्रकाशन किया था, जिसे आप सभी का भरपूर प्रतिसाद मिला।

पाठकों के विशेष अनुरोध पर हम उन दोनों विशेषांक में प्रकाशित रचनाओं के शॉर्ट लिंक्स प्रस्तुत कर रहे हैं। आप उन शॉर्ट लिंक्स पर क्लिक कर रचनाएँ पढ़ सकते हैं।

– हेमन्त बावनकर, ब्लॉग संपादक ई-अभिव्यक्ति

150वीं गांधी जयंती विशेष – 1

  1. हिन्दी साहित्य – ई-अभिव्यक्ति संवाद – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ अतिथि संपादक की कलम से ……. महात्मा गांधी प्रसंग ☆ – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

http://bit.ly/2oiSiae

  1. हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ दक्षिण अफ्रीका : मिस्टर बैरिस्टर एम. के. गांधी से गांधी बनाने की ओर ☆ श्री मनोज मीता

http://bit.ly/2nuCAsA

  1. हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -1☆ गांधी विचार की वर्तमान प्रासंगिकता ☆ श्री राकेश कुमार पालीवाल

http://bit.ly/2nER7le

  1. हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ गांधी जी के मुख्य सरोकार ☆ डॉ.  मुक्ता

http://bit.ly/2oq2sFK

  1. हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -1☆ सपने में बापू ☆ डॉ कुन्दन सिंह परिहार

http://bit.ly/2mRKpbq

  1. हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ घोडा, न कि …. ☆ डॉ सुरेश कान्त

http://bit.ly/2mKLKR6

  1. हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ तेरा गांधी, मेरा गांधी; इसका गांधी, किसका गांधी! ☆ श्री प्रेम जनमेजय

http://bit.ly/2mIfXjI

  1. हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ राजघाट का मूल्य ☆ श्री संजीव निगम

http://bit.ly/2ok5wDC

  1. हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ गांधी जिन्दा हैं और रहेंगे ☆ श्रीमती सुसंस्कृति परिहार

http://bit.ly/2mKFfOc

  1. हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ चंपारण सत्याग्रह: एक शिकायत की जाँच ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

http://bit.ly/2mO5eED

  1. हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ अहिंसा का दूत ☆ सुश्री निशा नंदिनी भारतीय

http://bit.ly/2paYPEi

  1. हिन्दी साहित्य – संस्मरण – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ पकुआ के घर गाँधी जी ! ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

http://bit.ly/2mI78q6

  1. मराठी साहित्य – कविता – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ बापू ☆ श्री सुजित कदम

http://bit.ly/2olLJn9

  1. हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष-1 ☆ क्योंकि मैं राष्ट्र मां नहीं ☆ श्रीमती समीक्षा तैलंग

http://bit.ly/2nDSYXD

 

150वीं गांधी जयंती विशेष -2  

 

  1. ई-अभिव्यक्ति: संवाद- 41 – ☆ ई-अभिव्यक्ति -गांधी स्मृति विशेषांक☆ – हेमन्त बावनकर

http://bit.ly/2n09wc7

  1. हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2 ☆ चौराहे पर गांधी! ☆ श्री प्रेम जनमेजय

http://bit.ly/2nQ2VBn

  1. हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2 ☆ महात्मा गांधी के सपनों का भारत ☆ डॉ भावना शुक्ल

http://bit.ly/2otaeiv

  1. हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2☆ बापू कभी इस जेब में कभी उस जेब में ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

http://bit.ly/2oz1Bmg

  1. हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2☆ हे राम ! ☆ डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

http://bit.ly/2nS9GCz

  1. हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2☆ कहाँ चल दिए बापू ☆ श्री विनोद कुमार ‘विक्की’

http://bit.ly/2piJ9ic

  1. हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -२ ☆ प्रश्नचिन्ह ☆ श्री रमेश सैनी

http://bit.ly/2nGgUtD

  1. हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2☆ मानव ☆ श्री सदानंद आंबेकर

http://bit.ly/2nPuieQ

  1. हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2☆ गांधी की खादी आज भी प्रासंगिक ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

http://bit.ly/2mQoSji

  1. मराठी साहित्य – कविता – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2 ☆ महात्मा गांधी……! ☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

http://bit.ly/2mSkCj8

  1. हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2 ☆ पूछ रहे बैकुंठ से बापू ☆ श्री मनोज जैन “मित्र”

http://bit.ly/2nG4L7Z

  1. हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2 ☆ दृष्टि ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

http://bit.ly/2pn1smx

  1. हिन्दी साहित्य – व्यंग्य लघुकथा – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2☆ महात्मा गाँधी की जय ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

http://bit.ly/2osqznA

  1. हिन्दी साहित्य – संस्मरण – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2 ☆ बा और बापू ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

http://bit.ly/2nST8KT

 

 

 

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ असमंजस ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ असमंजस

कविताएँ

लिखने-पढ़ने का

दौर आजकल

खत्म हो गया क्या…?

नहीं तो,

पर तुम्हें ऐसा क्यों लगा…?

फिर रोज़ाना

ये अनगिनत

विकृत,

वीभत्स,

नृशंस काण्ड

कैसे हो रहे हैं?

 

©  संजय भारद्वाज 

कामना करता हूँ कि 17 जून 2013 को लिखी यह रचना जाने सदा-सर्वदा के लिए अप्रासंगिक हो जाए।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature – Poetry (भावानुवाद) ☆ कितने ईश्वर रह जाओगे?/How much of a God will you remain…? – सुश्री निर्देश निधि ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. An alumnus of IIM Ahmedabad is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.)

We present an English Version of Ms. Nirdesh Nidhi’s  Classical Poem कितने ईश्वर रह जाओगे? with title  “How much of a God will you remain…?” .  We extend our heartiest thanks to the learned author  Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit,  English and Urdu languages) for this beautiful translation.)

आपसे अनुरोध है कि आप इस रचना को हिंदी और अंग्रेज़ी में  आत्मसात करें। इस कविता को अपने प्रबुद्ध मित्र पाठकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें और उनकी प्रतिक्रिया से  इस कविता की मूल लेखिका सुश्री निर्देश निधि जी एवं अनुवादक कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी को अवश्य अवगत कराएँ.

सुश्री निर्देश निधि

 ☆ कितने ईश्वर रह जाओगे? ☆ 

तुम मेरे पिता,

मेरे ईश्वर

पर मुझ धरा पुत्र को

वसीयत नहीं की ज़रा सी संवेदना

फिर भी तुम मेरे पिता

मेरे ईश्वर

 

गेहूं की खरे स्वर्ण सी पकी बालियों पर,

हर बरस गिराते हो बरसात का पारा

भोगते नहीं पीड़ा मेरी तुम ज़रा

फिर भी तो तुम मेरे पिता,

मेरे ईश्वर

 

फसल के कटते ही

उड़ेलने लगते हो आग आसमान से

ताकि बादलों की फूट पड़े नकसीर

और जड़ देते हो मेरे पैरों में गरीबी की अतिरिक्त नाल

फिर भी तुम मेरे पिता,

मेरे ईश्वर

 

धान की अनबुझ प्यासें जब मांगती हैं पानी

करता हूँ दिन की रात

रात को देता हूँ चकमा दिन का

रखता हूँ कैद, धैर्य मुट्ठियों में

पर तुम खुलवा देते हो जबरन

मेरी बंधी मुट्ठियां

अकाल की छड़ से

फिर भी तुम मेरे पिता

मेरे ईश्वर

 

फिर – फिर फेंट देते हो मेरी कड़ी मेहनतें

दलदल सी लिजलिजी कीच में

नहीं देते हो महादान किसी एक बूंद का

फिर भी तुम मेरे पिता

मेरे ईश्वर

 

अगर मैं मानना छोड़ दूँ तुम्हें,

और मुझे देख – देख सब भी

ज़रा सोचना कि तुम

कितने पिता

कितने ईश्वर रह जाओगे ?

 

© निर्देश निधि

संपर्क – निर्देश निधि , द्वारा – डॉ प्रमोद निधि , विद्या भवन , कचहरी रोड , बुलंदशहर , (उप्र) पिन – 203001

ईमेल – nirdesh.nidhi@gmail.com

 

☆ How much of a God will you remain…? ☆

You are the father

O’ God…!,

But you haven’t bequeathed any will to your son,

Still you’re my father…

O’ my beloved God…!

 

On pure golden earrings

of wheat,

Every year you shower the

mercury droplets

of rains

But you never endure

my sufferings,

Still you’re my father

O’ my  loving God…!

 

At the time of harvest

You keep pouring infernos

from the sky

So that cloudbursts

befall on us

But you tie fetters

to my feet

Worsening my

poverty stricken state

Still you  remain my father

O’ my  dear God…!

 

When the unquenchable

thirst of paddy longs for water

I toil day and night

with dogged perseverance

I keep my fists

clenched patiently

But you open them forcibly

with the iron rod of famine

Still you’re my father

My only God…!

 

Again, You render my hard work futile

Like in the quagmire of swamp

You never give

an alm of droplet

neverthless you remain my father

My  loving God…!

 

What if I stop believing in you,

If I disown you

And seeing me do this

Others start following me

Just think

How much of father

How much of  a God

will you  remain…!

 

© Captain (IN) Pravin Raghuanshi, NM (Retd),

Pune

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी जन्मोत्सव विशेष – गांधी विचारधारा और वैश्विक चेतना ☆ डॉ.राशि सिन्हा

डॉ.राशि सिन्हा

(गांधी जन्मोत्सव के अवसर पर प्रस्तुत है डॉ राशि सिन्हा जी का एक विचारणीय आलेख  गांधी विचारधारा और वैश्विक चेतना। )  

☆ गांधी जन्मोत्सव विशेष –गांधी विचारधारा और वैश्विक चेतना ☆ डॉ.राशि सिन्हा ☆ 

चैतन्य आत्मा एवं अक्षुण्ण अमर सत्ता को स्वीकार करने वाले देश में जन्म लेने वाले, नैतिक दर्शन के समर्थक, महात्मा गांधी के ‘व्यवस्थित विचारों’ के आधार में वैश्विक चेतना की नींव बड़ी गहरी दिखाई देती है। ऐसी नींव जो सामाजिक स्तरीकरण संबंधित अवधारणा को आत्मिक समरूपता के माध्यम से विश्वव्यापी चिंतन-दर्शन में व्यावहारिकता के नये आयाम जोड़ सके। इन नये आयामों को, वैश्विक मूल्यों की अवधारणा में शामिल करने के लिए महात्मा गांधी ने यथार्थवादी प्रश्नानुकुल  जिज्ञासा का मंथन करते हुए मानवतावादी चिंतन के विभिन्न आयामों का गहरे से विश्लेषण किया है।

वैश्विक चेतना में नई जान डालने वाले इस संत विचारक ने जिस व्यवस्थित विचार की पुरजोर वकालत की है, उसे सामान्य तौर पर’ गांधीवाद’ या ‘गांधी दर्शन’ के नाम से जाना जाता है, किंतु सत्य तो यह है कि गांधी जी ने किसी ‘वाद’ या ‘दर्शन’ को कभी सैद्धांतिक रुप से परोसने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि सत्याभास को व्यावहारिक जीवन में लागू करते रहे और उन्ही सत्यानुभूतियों को मानव समाज और जगत के भौतिक भाष्य के मध्य की बुनियादी कड़ी के रुप में प्रस्तुत कर मानवतावाद तथा मानवधर्म को रुपायित करने की चेष्टा करते रहे। शुद्ध, पुनीत और मानवीय तथ्यों को आधार मानकर संपूर्ण जगत के विकास की बात करने के तहत गांधीजी ने ईश्वर के मूल में निहित ‘ शिवमय’, ‘सत्यमय’ व ‘चिन्मय’की परिकल्पना में समाहित ईश्वर की सृष्टि रचना के प्रयोजन को सशक्त करने का प्रयास किया है।  इस क्रम में उन्होंने ‘ईशावास्यमिदं सर्व: यकिचं जगत्या’ की अवधारणा को वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा से जोड़ते हुएं ईश्वर की प्रयोजनवादी विचारधारा को व्यावहारिक रुप प्रदान करने की कोशिश की है ताकि प्रत्येक जन-मन आत्म परीक्षण, सादगी, सरलता, आत्मिक व सामाजिक समरुपता तथा त्यागमय जीवन शैली को अपनाकर पर पीड़ा को महसूस कर सके। चारित्रिक शुद्धता के द्वारा मानवीय संवेदनाओं को महसूस कर सके।

वैश्विक एकीकरण की भूमिका में सिर्फ एक धर्म विशेष यथा; ‘मानव धर्म’ पर बल देते हुए, गांधीजी ने  ‘सर्वोदय’ जैसे अर्थवान शब्दों को अत्यंत सक्रिय व श्रेष्ठतम बताया है। उदात्त चरित्र व मानवीय विचारों में निहित मानवता के दैवीय अंश के साथ कर्म की  प्रधानता को स्वीकार करता उनका यह ‘व्यावाहरिक रुप सेे व्यवस्थित विचार’ तर्कों की महीन बारीक उलझनों में लिपटा नहीं दिखता, परंतु संपूर्ण परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व के एकीकरण की बात करता दिखायी देता है।

अपनी इस परिकल्पना की पूर्णता के लिए गांधी जी प्रत्येक जन से सत्य, अहिंसा के आदर्शों पर चलते हुए शिक्षा को दैनिक जीवन में उतारने की बात करते हैं। उनका मानना है कि एक ‘शोषण विहीन समाज’ के लिए शिक्षा से बड़ा कोई मंत्र नहीं। ‘सा विद्या या विमुक्तये’ का अनुसरण करते हुए गांधीजी कहते हैं कि यह एक ऐसा आधार है जो मनुष्य को दुराग्रह की सभी व्याधियों से दूर कर व्यापक व उदार बना पाता है। और व्यक्ति स्व से ऊपर उठकर समस्त जीवन को अपनी आत्मा से स्वीकार कर पाता है।

इसके लिए उन्होंने महज साक्षर होने वाली शिक्षा नहीं वरन तात्कालिक और दुरगामी उद्देश्यों पर आधारित ऐसी शिक्षा की बात की है जिसके केंद्र में मानव को आर्थिक स्वावलंबन की शिक्षा के साथ साथ मानसिक, आत्मिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक विचारों को सशक्त करने की भी क्षमता वृद्धि की सीख हो ताकि आत्मविकास के माध्यम से सर्वोच्च अनुभूतियों को प्राप्त कर मानव सर्वोदय विकास की भावना में जी सके और उसी अनुसार समाज में सक्रिय हो व्यवहार कर सके, वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा को साकार करने में अपने दायित्वों को महसूस कर, अपनी भूमिकाओं का निर्वाह कर सके और विश्व के अंतिम अधिकार  की लड़ाई लड़ सके।

इन्ही विचारों को परिपूर्ण रुप प्रदान करने के लिए आगे चलकर गांधी जी ने स्वराज दर्शन या विचारों को स्पष्ट किया है। जिसमें  पुन: वह मानवता और मानव जाति के लिए समान रुप से संवेदनशील होने की बात को स्वीकार करते हुए उपदेशक की जगह ‘सत्यशोधक’ होने पर जोर देते हैं ताकि वैश्विक चेतना को खंडित होने से बचाया जा सके।

हालांकि मानवतावादी चिंतन की भूमि पर गांधीजी ने विश्व को जोड़ कर रखने के लिए मानवतावाद व मानव धर्म जैसे सशक्त विचारों को अत्यंत सुलझे व व्यवस्थित रुप से रखने की कोशिश की है। साथ ही, उनके विचारें की व्यावहारिकता के परिणामों ने भी वैश्विक सांस्कृतिक चेतना को अत्यंत प्रभावित किया है, किंतु बावजूद इसके , उनकी विचारधारा के परिप्रेक्ष्य में उठे विरोध के स्वर भी काफी ऊँचे उभर आये हैं। वर्तमान युग की चकाचौंध जीवन पद्धति में भौतिकता व स्वार्थों की क्षुद्रता, व्यक्ति गत लाभ की आतुरता ने विरोध के स्वरों को ऊंचे उभरने में मदद की है तो कहीं तथाकथित बुद्धि-प्राब्ल्यता तथा वैचारिक मतभेद ने इन स्वरों की धुन ऊंची कर रखी है, फिर भी  आज के हिंसात्मक व भौतिकवाद के अंधे युग में गांधी जी की विचारधारा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।यह एक शाश्वत सत्य है कि विरोध के विस्फोटक स्वरों के बीच भी गांधी जी की विचारधारा की प्रासंगिकता आज भी बनी है और सदा बनी रहेगी।

डॉ.राशि सिन्हा

नवादा, बिहार

(साभार श्री विजय कुमार, सह संपादक – शुभ तारिका, अम्बाला।)

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

दिनांक 2 अक्टूबर को गाँधी जन्मोत्सव के अवसर पर प्राप्त सभी सर्वोत्कृष्ट रचनाओं को स्थान नहीं दे पाए थे जिसका हमें खेद है। वे रचनाएँ हम प्रतिदिन आगामी अंकों में प्रकाशित कर रहे हैं।

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English Literature ☆ Stories ☆ Weekly Column – Samudramanthanam – 9 Apsaras ☆ Mr. Ashish Kumar

Mr Ashish Kumar

(It is difficult to comment about young author Mr Ashish Kumar and his mythological/spiritual writing.  He has well researched Hindu Philosophy, Science and quest of success beyond the material realms. I am really mesmerized.  I am sure you will be also amazed.  We are pleased to begin a series on excerpts from his well acclaimed book  “Samudramanthanam” .  According to Mr Ashish  “Samudramanthanam is less explained and explored till date. I have tried to give broad way of this one of the most important chapter of Hindu mythology. I have read many scriptures and take references from many temples and folk stories, to present the all possible aspects of portrait of Samudramanthanam.”  Now our distinguished readers will be able to read this series on every Saturday.)    

Amazon Link – Samudramanthanam 

 ☆ Weekly Column – Samudramanthanam – 9 – Apsaras ☆ 

 After deadly and poisonous spell of churning of ‘Kshirasāgara’ now Sura and Asura started churning with less interest. They are doing churning with less speed this time.

As they progress, liquid of ‘Kshirasāgara’ started turning to transparent and crystal clear. Soon environment there started to be pleasant and different kinds of smells started appearing from ocean. All sixteen types of sense engaging smells are flowing all around. All Suras and Asura started losing their sense. All of sudden they stop churning and liquid of ‘Kshirasāgara’ rise up in the sky and divided into sixteen direction and start turning into beautiful female sprits. Those all are ‘Apsaras’ means creature of ‘Ap’ or liquid of different types.

King of Sura were looking them without blinking. Those all sixteen apsaras are most beautiful possible females of all sixteen types of liquids. This is the auspicious day of autumn arriving. It is the day of festival ‘Teej’.

It ilooks like nature is dancing with those sixteen apsaras.

Those were Urvasi, Menaka, Rambha, Tilottama, Ghritachi, Manjukesi, Sukesi, Misrakesi, Sulochana, Saudamini, Devadatta, Devasena, Manorama, Sudati, Sundai, Vigagdha. These sixteen main apsaras appear from ‘Kshirasāgara’ and started dancing. Some other apsaras also appear with main apsaras who were secondary of main sixteen apsaras or means generated from the mixture of sixteen main essence in different ratios. These were Vividha,  Budha, Sumala, Santati, Sunanda, Sumukhi, Magadhi, Arjuni, Sarala, Kerala, Dhrti, Nanda, Supuskala, Supuspamala and Kalabha.

The main apsaras Urvasi is actually essence of Rose flower liquid.

Menaka is of Jasmine flower liquid.

Rambha is of Marigold.

Tilottama is of Lavender.

Ghritachi is of Sugarcane.

Manjukesi is of Coconut.

Sukesi is of Betel leaves pan.

Misrakesi is of Kasturi.

Sulochana is of Lemon.

Saudamini is of Basil.

 

© Ashish Kumar

New Delhi

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 56 – मला वाटले… ☆ सुजित शिवाजी कदम

सुजित शिवाजी कदम

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #56 ☆ 

☆ मला वाटले … ☆ 

 

मला वाटले ,भेटशील एकदा नंतर नंतर

कळले नाही,कसले तूझे हे जंतरमंतर…!

 

येते म्हणाली ,होतीस तेव्हा जाता जाता

किती वाढले,दोघांमधले अंतर अंतर…!

 

रोज वाचतो,तू दिलेली ती पत्रे बित्रे

भिजून जाते,पत्रांमधले अक्षर अक्षर…!

 

तूला शोधतो,अजून मी ही जिकडेतिकडे

मला वाटते,मिळेल एखादे उत्तर बित्तर…!

 

स्वप्नात माझ्या,येतेस एकटी रात्री रात्री

नको वाटते,पहाट कधी ही रात्री नंतर…!

 

उभा राहिलो,ज्या वाटेवर एकटा एकटा

त्या वाटेचाही,रस्ता झाला नंतर नंतर…!

 

विसरून जावे,म्हणतो आता सारे सारे

कुठून येते,तूझी आठवण नंतर नंतर…!

 

मला वाटले,भेटशील एकदा नंतर नंतर

कळले नाही,कसले तूझे हे जंतरमंतर…!

 

© सुजित शिवाजी कदम

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ कोंदण ☆ सुश्री पूजा दिवाण

 ☆ कवितेचा उत्सव ☆ कोंदण ☆ सुश्री पूजा दिवाण ☆ 

सळसळत्या पानांवर लिहिती

थेंब थेंब सृजनाची नक्षी

गर्द  राईच्या हिरवाई सह

शांत-निवांत  मनाचा पक्षी

 

तू न कुणाचा मी न कुणाची

स्नेह परी मग कसा जुळे हा

आयुष्याच्या वळणावरती

कसा घुमे हा मैत्र पारवा

 

किती पाहिली नवलाई अन्

किती साधले  गप्पांचे क्षण

खळाळत्या हास्याच्या संगे

आठवणींचे मखमाली क्षण

 

मैत्र जीवांचे असे जुळावे

सहवासाचे मोती व्हावे

दिल्या घेतल्या आनंदाचे

त्या मोत्याला कोंदण  व्हावे

 

© सुश्री पूजा दिवाण

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – जीवन रंग ☆ संदेश (भावानुवाद) ☆ सुश्री माया महाजन

श्रीमती माया सुरेश महाजन

☆ जीवनरंग ☆ संदेश ☆ श्रीमती माया सुरेश महाजन 

मूक-बधिर असलेल्या त्या आकर्षक तरुणीने स्वत:चे बुटिक उघडले होते. ज्यात रेडिमेड कपडे, सोफा कव्हर्स, चादरी, टॉवेल्स वगैरे बरोबरच महिलांच्या प्रसाधनाच्याही वस्तु ठेवल्या होत्या. तिची छोटी बहीण, जी मेडिकल प्रवेशाची तयारी करत होती, नेहमी आपल्या मैत्रिणीबरोबर रमा बरोबर, बुटिकमध्ये यायची तिची मैत्रीण आली की काही न काही वस्तु खरेदी करायचीच गप्पा मारता-मारता एकदा तिने सांगितले की तिला फॅशन डिझायनर बनायची इच्छा आहे, पण आई-वडिलांची इच्छा तिला डॉक्टर बनवायची आहे. परीक्षा झाल्यावर असे समजले की रमाचे पेपर्स काही चांगले नाही गेले. तिला अंदाज आला होता की तिला मेडिकलला प्रवेश मिळणे अशक्यच आहे. दोनच दिवसांनंतर तिने फॅनला लटकून आत्महत्या केली.

मूक-बधिर तरुणीला फारच धक्का बसला. तिने आपल्या डायरीत लिहिले, ‘निसर्गाने ज्यांना स्वस्थ, सुंदर आणि पूर्ण शरीर दिले आहे, अशी माणसेदेखील लहान-मोठ्या अपयशांना घाबरून इतके कुंठित, अवसान घातकी, तणावग्रस्त होऊन जातात की आपली जीवन यात्राच संपवून टाकतात. परिस्थितीला सामोरे जाण्याचे धैर्यच त्यांच्यात नसते. याउलट आमच्यासारखे विकलांग मात्र कोणत्याही परिस्थितीला तोंड द्यायला तयार असतात, कदाचित जीवन-संघर्षाचा धडा आपल्या अपंगत्वामुळे ते लहानपणापासून शिकत असतात. कोणाचाही जरासा स्नेह, सहयोग आणि प्रोत्साहन मिळताच आम्ही स्वत:ला खूप सुखी मानून घेतो तुम्ही कधी ऐकले आहे का कोण्या विकलांग व्यक्तिने जीवनात निराश होऊन, तणावग्रस्त किंवा मतिकुंठित होऊन आत्महत्या केली?’

तिने डायरीत ते पान फाडले आणि डिंकाने आपल्या बुटिकाच्या प्रवेशद्वारावर चिकटवून टाकले.

 

मूळ हिंदी कथा – लड़का-लड़की – सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा

मो.- ९३२५२६१०७९

अनुवाद – सुश्री माया सुरेश महाजन 

मो.-९८५०५६६४४२

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ अधिक महिमा + ☆ श्री अमोल अनंत केळकर

श्री अमोल अनंत केळकर

☆ विविधा ☆ अधिक महिमा + ☆ श्री अमोल अनंत केळकर ☆ 

मंडळी नमस्कार ??

सध्या कुठला महिना चालू आहे असे कुणी विचारले  तर आपण अगदी पटकन सांगू सप्टेंबर. मराठी महिना कोणता चालू आहे हे ही काहीजण सांगतील. ही जी कालगणना इंग्रजी, मराठी महिन्यांची जी अनेक कालखंडापासून अगदी सुयोग्य पद्धतीने चालू आहे,त्याला गुंफणारा एक दुवा जो साधारण तीन एक वर्षानी येतो तो म्हणजे ‘अधिक मास’/अधिक महिना/ जो आत्ता सध्या चालू आहे. अधिक अश्विन. यासंबंधी अनेक शास्त्रीय/धार्मिक माहिती आत्तापर्यंत तुम्ही वाचली असेल. तर या सदरात थोडं अधिक या अधिक  (+) शब्दाशी आपण कसे परिचित आहोत हे पहायचं?

लहानपणी गणित शिकताना अधिक  (+)  हा शब्द  पहिल्यादा आपण शिकतो. माझ्याबाबतीत बरीचशी बेरीज (अधिक+) असलेली गणिते माझी वजाबाकी असलेल्या गणितापेक्षा जास्त बरोबर आली आहेत किंवा वजाबाकीच्या गणितांपेक्षा बेरीज असलेली गणिते मला जास्त आवडायची . थोडे मोठे होत गेल्यावर परीक्षेत अगदी  इतर विषयाच्या पेपरात  ‘ अधिक + पुरवण्या ‘ लावण्या एवढी मजल मात्र मी मारू शकलो नाही .

अधिक/जास्त/अजून  या गोष्टीशी आपले नाते मानवी स्वभावानुसार  अगदी नैसर्गीक  आहे कारण जन्माला आल्यापासून आपले ‘शारीरिक वय’ हे  वाढतच असते (अधिक+), उणे कधीच होत नाही. ‘मार्केटींग स्कीम’ मध्ये या  ‘अधिक +’ गोष्टीचा अगदी पुरेपूर वापर केलेला दिसतो.  २ गोष्टीवर एक गोष्ट  फ्री (अधिक), अमुक एक गोष्ट अमुक कालावधीत घेतली तर तिसरी एखादी गोष्ट अधिक मिळेल, एखादी  पॉलिसी/ट्रॅव्हल प्लॅन/एखाद्या क्लबची मेंबरशीप घ्या आणि ही (अधिक+) बक्षसे मिळवा इ इ इ

दिवाळी/ होळी साठी  कोकणात सोडण्यात येणार-या जादा (अधिक) रेल्वे, पंढरपूर यात्रेसाठीचा अधिक बसेस, दिवाळीत काही नशीबवान कर्मचा-यांना  मिळणारा बोनस (अधिक)  एखाद्या उत्तम कलाकाराने सादर केलेली कलाकृती याला मिळालेला ‘वन्स मोर’ (अधिक+), शनिवार/रविवार काही  मालिकांचा सादर होणारा एक तासांचा  विशेष (अधिक +) भाग, कुठल्याही मॉल मध्ये सिनेमाच्या तिकिटाबरोबरच खादाडी करण्यासाठी घेतलेला (अधिक +) कॉम्बो पॅक, मराठीतील काही म्हणी जशा ‘ आधीच  उल्हास त्यात फाल्गुनमास ‘ किंवा दुष्काळात तेरावा महिना  यासगळ्या गोष्टीचा  कुठे ना कुठेतरी  ‘अधिक +’  शी संबध येतो असे वाटते. अगदी आजारीपडलो, अपघात  झाला  तर आयुष्यमान  वाढण्यासाठी जिथे आपण पोचतो त्या जागेचे चिन्ह ही ‘+’ हेच असते.  आणि शेवटी ते म्हणतात ना ‘नॉट बट लिस्ट’ का काय ते  राजकारण ?  होय राजकारण या प्रकारातही आपण अनेकदा ‘बेरजेचे राजकारण’ ऐकतो/पहातो की तर असा हा अधिक + महिमा. आपणास आवडला असेल.

तर सन २०२० हे लीप वर्ष असल्याने फेब्रुवारीही १ दिवस अधिक घेऊन आला होता. सर्व जावयांसाठी ‘ अधिक मास ‘ ही पर्वणीच असते असे म्हणतात कारण

अधिक मास, त्यात, कुठलीही तिथी

ताटलीयुक्त ताजे ताजे अनरसे किती?

दोन प्रहरी सासूरवाडीत सोहळा रंगला

तोची आनंदला ग सखे, जावई  भला

. पण कधी कधी वाटत  ही अजून अजून/अधिक अधिक ची हाव ही मर्यादित हवी. एकंदर मिळणा-या गोष्टीत समाधान आहे/ बास आता अजून अधिक नको. किती पळायचे त्या अधिक/अधिक च्या मागे? असे वाटणे ही महत्वाचे . लेखनाचा शेवट सगळ्यांसाठीच ‘धीर’ धरी  असा मोलाचा सल्ला देऊन

होसी का भयकंपित शरसी का शंका

गाजतसे वाजतसे तयाचाच  डंका

जय गोविद जय मुकूंद  जय सुखकारी

धीर धरी धीर धरी जागृत गिरिधारी

©  श्री अमोल अनंत केळकर

नवी मुंबई, मो ९८१९८३०७७९

मैफिल ग्रुप सदस्य

poetrymazi.blogspot.in, kelkaramol.blogspot.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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