हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ फेरा ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ फेरा ☆

अथाह अंधेरा

एकाएक प्रदीप्त उजाला

मानो हजारों

लट्टू चस गए हों,

नवजात का आना

रोना-मचलना

थपकियों से बहलना,

शनै:-शनै:

भाषा समझना,

तुतलाना

बातें मनवाना

हठी होते जाना,

उच्चारण में

आती प्रवीणता,

शब्द समझकर

उन्हें जीने की लीनता,

चरैवेति-चरैवेति…,

यात्रा का

चरम आना

आदमी का हठी

होते जाना,

येन-केन प्रकारेण

अपनी बातें मनवाना,

शब्दों पर पकड़

खोते जाना,

प्रवीण रहा जो कभी

अब उसका तुतलाना,

रोना-मचलना

किसी तरह

न बहलना,

वर्तमान भूलना

पर बचपन उगलना,

एकाएक वैसा ही

प्रदीप्त उजाला

मानो हजारों

लट्टू चस गए हों

फिर अथाह अंधेरा..,

जीवन को फेरा

यों ही नहीं

कहा गया मित्रो!

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

प्रात: 10:10 बजे, शनिवार, 26.5.18

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अगर अंधेरा हो….. ☆ डॉ सीमा सूरी

डॉ सीमा सूरी

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार , पत्रकार  एवं सामाजिक कार्यकर्ता  डॉ सीमा सूरी जी  का ई-अभिव्यक्ति  में हार्दिक स्वागत हैं। आपकी उपलब्धियां इस सीमित स्थान में उल्लेखित करना संभव नहीं है। आपने कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मंचों  पर भारत का प्रतिनिधित्व किया है एवं आयोजनों का सफल संचालन भी किया है।  आपकी कई रचनाएँ प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्र- पत्रिकाओं  में  प्रकाशित हुई हैं । आप कई राष्ट्रीय / अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों / अलंकारों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता अगर अंधेरा हो…..। )

☆ अगर अंधेरा हो….. ☆ 

 

चराग़ जम के जलाओ,अगर अंधेरा हो

कहीं न छोड़ कर जाओ,अगर अंधेरा हो

 

कोई सितारा न हो,तो न सही

खुद ही चांद बन जगमगाओ,अगर अंधेरा हो….

 

हक़ीक़तें जब परेशान करने लगें

किस्से फिर ख्वाबो के सुनाओ,अगर अंधेरा हो….

 

जिसके आने से रौशनी जवान होती है

उसे कहीं से भी लाओ,अगर अंधेरा हो….

 

किताबें बोझ सी लगने लगे पढ़ते पढ़ते

कोई ग़ज़ल फिर गुनगुनाओ,अगर अंधेरा हो…

 

गमों ने घेर लिया हो जब कभी कस कर

तो फिर खुल के मुस्कुराओ,अगर अंधेरा हो…

 

भूख जब ज़ोर से लगी हो कभी

तो फिर बाँट कर खाओ,अगर अंधेरा हो…

 

कभी जब धूप में करके काम जी जो घबराए

किसी को पानी पिलाओ,अगर अंधेरा हो…

 

तमाम रास्ते अपने आप मिलते जाएंगे

कदमों के निशां पे पैर रखते जाओ ,,अगर अंधेरा हो

 

अंधेरा कभी अंधेरे से हारता नही

दीप तुम मिल के जलाओ,अगर अंधेरा हो

 

©  डॉ सीमा सूरी

प्लाट नम्बर 70 ,प्रताप नगर जेल रोड ,नई दिल्ली 11 00 64

दूरभाष :84477 41053, 9958331143

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कलियुग ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु के जैन महाविद्यालय में सह प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं एवं  साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, स्वर्ण मुक्तावली- कविता संग्रह, स्पर्श – कहानी संग्रह, कशिश-कहानी संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आज ससम्मान  प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण  कविता कलियुग।  इस बेबाक कविता के लिए डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी की लेखनी को सादर नमन।)  

☆ कविता – कलियुग ☆ 

 

है घोर कलियुग

द्वापर युग, त्रेतायुग

अब तो प्रलय होगा

संभवतः

न बचेगा कोई भी

फिर भी बना है

आदमी-आदमी का शत्रु

भाई-भाई बहा रहा रक्त

अमीरी गरीबी का फासला

आदमी बना खूंखार जानवर

पी रहा लहू इंसान का

गरीब पी रहा खून के आंसू

इंसान बना मात्र असुर

अस्त-व्यस्त मानव

अशान्त समाज

उत्तुंग शिखिर पर

पक्षियों का कलरव

लहरों की ध्वनि

हरे-भरे खेत

निर्मल वातावरण

अद्‍भुत कुसुमकुंज

शीतल चांदनी का अहसास

सबसे दूर क्षितिज पर

खडा मानव तिमिर में

चांद की चांदनी ने

फैलाया एक विश्वास

सूरज की पहली किरण

तर्पण देता व्यक्ति

एक उम्मीद की किरण

जगाई है इंसान ने

आज भी एक रोशनी

कलियुग में जगा सकता

कलियुग नहीं भयंकर

कहता रुंध स्वर में इंसान।

 

©  डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

लेखिका, सहप्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, जैन कॉलेज-सीजीएस, वीवी पुरम्‌, वासवी मंदिर रास्ता, बेंगलूरु।

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 33 – बापू के संस्मरण-7 बा, बापू और सुभाष बाबू की चाय ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “बापू के संस्मरण – बा, बापू और सुभाष बाबू की चाय”)

☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष ☆

☆ गांधी चर्चा # 33 – बापू के संस्मरण – 7 – बा, बापू और सुभाष बाबू की चाय ☆ 

 

सुभाषचन्द्र  बोस महात्मा गांधी से मिलने सेवाग्राम आश्रम मे आए थे। वे चाय पीने के आदी थे। कस्तूरबा   उनके  लिए चाय  बना   रही  थी। उधर से गांधीजी गुजरे और बा को चाय  बनाते  बिफर गए। ‘क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि आश्रम मे चाय बनाना और पिलाना मना है । तुम ऐसा क्यो  कर रही हो ?  कस्तूरबा ने कोई उत्तर नहीं दिया और सुभाष बाबू की तरफ चाय का प्याला बढा  दिया।

गांधी जी को यह अच्छा नहीं लगा और वे कोई टिप्पणी करते उसके पहले कस्तूरबा ने उत्तर दिया – मुझे सब मालूम है लेकिन मेहमानो के लिए नियम लागू नहीं होते। गांधीजी निरुत्तर हो गए और वहाँ से चले गए। यह था कस्तूरबा का प्रभाव जिससे गांधीजी भी प्रभावित थे।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 3 – नफरत का बीज कहाँ पैदा होता है? ☆ – श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी  अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता  नफरत का बीज कहाँ पैदा होता है?

 

Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 3 – नफरत का बीज कहाँ पैदा होता है?  ☆

 

उड़ना चाहता हूँ आसमान की ओर,

देखना चाहता हूँ नफरत का बीज कहाँ पैदा होता है ||

उड़ना चाहता हूँ परिंदो की तरह,

देखना चाहता हूँ दुनिया में पाप कहाँ पैदा होता है ||

 

रहना चाहता हूँ दोस्तों में घुल मिलकर,

देखना चाहता हूँ अब सुदामा सा दोस्त कहाँ होता है ||

रहना चाहता हूँ रिश्तों की हवेली में,

देखना चाहता हूँ रिश्तों का धागा कैसे मजबूत होता है ||

 

जीना चाहता हूँ मैं सब के लिए,

देखना चाहता हूँ मेरे लिए दुनिया में कौन जीना चाहता है ||

माफ़ी चाहता हूँ सबसे अपनी हर गलती के लिए,

देखना चाहता हूँ खुद की गलतियां मान कौन मुझे गले लगाता है ||

 

© प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002

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हिन्दी साहित्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 32 ☆ हमको दर्द छिपाने होंगे ☆ श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है  एक भावप्रवण कविता हमको दर्द छिपाने होंगे। 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 32 ☆

☆ हमको दर्द छिपाने होंगे ☆

 

अपने दूर ठिकाने होंगे

हमको दर्द छिपाने होंगे.

 

हमें पता तुम नहीं मिलोगे

तुम पर कई बहाने होंगे.

 

इस जग की तो रीति पुरानी

हमको मन समझाने होंगे.

 

बसे तुम्हीं तन-मन में मेरे

सब इससे अनजाने होंगे.

 

टीस उठी है मन में कोई

रिसते घाव पुराने होंगे.

 

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (31) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय)

 

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ।।31।।

 

हैं अनादि निर्गुण अतः, अविनाशी जगदीश

व्याप्त किंतु निर्लिप्त है ,सबसे सबका ईश।।31।।

 

भावार्थ :  हे अर्जुन! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है।।31।।

 

Being without beginning and devoid of (any) qualities, the Supreme Self, imperishable, though dwelling in the body, O Arjuna, neither acts nor is tainted!।।31।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ डॉ सुमित्र के दोहे ☆डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। अपनी  कालजयी रचना याद के संदर्भ में दोहे  को ई- अभिव्यक्ति  के पाठकों के साथ साझा करने के लिए आपका  हृदय से आभार।)

 ✍  डॉ सुमित्र के दोहे ✍

 

फूल अधर पर खिल गये, लिया तुम्हारा नाम।

मन मीरा -सा हो गया, आंख हुई घनश्याम ।।

 

शब्दों के संबंध का, ज्ञात किसे इतिहास ।

तृष्णा कैसे  मृग बनी, कैसे  दृग आकाश।।

 

गिरकर उनकी नजर से, हमको आया चेत।

डूब गए मझदार में ,अपनी नाव समेत।।

 

ह्रदय विकल है तो रहे, इसमें किसका दोष।

भिखमंगो के वास्ते, क्या राजा क्या कोष ।।

 

देखा है जब जब तुम्हें, दिखा नया ही रूप ।

कभी धधकती चांदनी, कभी महकती धूप ।।

 

पैर रखा है द्वार पर, पल्ला थामे पीठ ।

कोलाहल का कोर्स है, मन का विद्यापीठ ।।

 

मानव मन यदि खुद सके, मिले बहुत अवशेष।

दरस परस छवि भंगिमा, रहती सदा अशेष।।

 

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

9300121702

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दस दोहे ☆ डॉ मनोहर अभय

डॉ मनोहर अभय

(ई- अभिव्यक्ति पर बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी ख्यातिलब्ध शब्द-साधक डॉ मनोहर अभय जी का हार्दिक स्वागत है।  आपका स्नेहाशीष ई-अभिव्यक्ति पर पाकर हम गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं ।

साहित्यिक यात्रा : जन्म 3 अक्टूबर 1937 को तत्कालीन अलीगढ़ जिले के नगला जायस नामक गाँव में हुआ। आपने वाणिज्य में पीएचडी के अतिरिक्त एलटी, साहित्यरत्न और आचार्य की उपाधि अर्जित की। ग्यारह वर्ष के अध्यापन के बाद हरियाणा के राज्यपाल के लोक संपर्क अधिकारी का कार्यभार सम्हाला। तत्पश्चात इक्कतीस वर्ष तक अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था आईपीपीएफ लन्दन के भारतीय प्रभाग (एफपीए इंडिया) में विभिन्न वरिष्ठ पदों पर कार्य करते हुए संस्था के सर्वोच्च पद (महासचिव) से 2004 में अवकाश ग्रहण किया। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सभा-सम्मेलनों, कार्यशालाओं, परिसंवादों में प्रतिनिधि वक्ता के रूप में आपने चीन, जापान, कम्बोडिया, इजिप्ट, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, थाईलैंड तथा भारत के प्रायः सभी महानगरों, ग्रामीण क्षेत्रों, आदिवासी अंचलों का सर्वेक्षण-अध्ययन-प्रशिक्षण-मूल्यांकन हेतु परिभ्रमण किया। डॉ.अभय की प्रथम कहानी 1953 में प्रकाशित हुई। वर्ष 1956 में हिंदी प्रचार सभा, सादर, मथुरा की स्थापना की।

आपने हस्तलिखित पत्रिका ‘नव किरण’ से लेकर संस्था के मुखपत्र हिमप्रस् के अतिरिक्त ग्राम्या, माध्यम, पेन जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के साथ बीस पुस्तकों का सम्पादन-प्रकाशन किया।  ‘एक चेहरा पच्चीस दरारें’, ‘दहशत के बीच’ (कविता संग्रह), ‘सौ बातों की बात’ (दोहा संग्रह), ‘आदमी उत्पाद की पैकिंग हुआ’ (समकालीन गीत संग्रह) के अतिरिक्त श्रीमद्भगवद्गीता की हिन्दी-अंग्रेजी में अर्थ सहित व्याख्या, रामचरित मानस के सुन्दर कांड पर शोध-प्रबंध (करि आये प्रभु काज), ‘अपनों में अपने’ (आत्म कथा) आपकी विशष्ट कृतियाँ में हैं। साहित्यिक सेवाओं के लिए महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी ने 2014 में डॉ. अभय को संत नामदेव पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त राष्ट्र भाषा गौरव, काव्याध्यात्म शिरोमणि, सत्कार मूर्ती आदि अनेक अलंकारों से अलंकृत डॉ. अभय नवी मुम्बई से प्रकाशित ‘अग्रिमान’ नामक साहित्यिक पत्रिका के प्रधान संपादक हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके “दस  दोहे”।)

☆ कविता  – दस दोहे ☆

चलो धूप तो तेज है राह उगलती ज्वाल

कहीं मेघ की छतरियाँ लेंगी हमें सम्हाल

 

परदे बदले रोशनी नाट्यमंच आकार ,

बदलेंगे संवाद औ ‘कथा कथ्य किरदार .

 

खाने को भोजन दिया रहने को आवास

साईँ आकर देखलो कितना किसके पास

 

कबिरा बैठा देखता जोड़- तोड़ की होड़ ,

किसे सुहाएँ साखियाँ ढाई आखर जोड़

 

इंजन  पलटा  रेल  का  ब्रेक हुए  बेकार

जाँच  हुई  पकडे  गए  क्लीनर  सेवादार

 

संत गुफाओं में छुपे  हंस  गए सुरधाम

बाकी  तो  मयुरा   बचे  मिट्ठू  तोताराम

 

लजवन्ती नदियाँ हुईं निर्वसना सी आज

हँसी उड़ाने में लगी धूप खडी निर्लाज

 

कुछ बौछारें दे गईं पावस का आभास

रहे नगाड़े पीटते मेघ चढ़े आकाश

 

हम भीगे भीगी धरा भीगे नदी कछार

छुपे पखेरू धूप के भीगे पंख सँवार

 

मेघ घिरे बूँदें झरीं नदिया उठी तरंग

जलतरंग सी बज रही हर तरंग के संग

 

© डॉ मनोहर अभय

संपर्क : आर.एच-111, गोल्डमाइन, 138-145, सेक्टर – 21, नेरुल, नवी मुम्बई- 400706, महाराष्ट्र,

चलभाष: +91 9167148096

ईमेल: manoharlal.sharma@hotmail.commanohar.abhay03@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ चुप्पियाँ-13 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ चुप्पियाँ-13 ☆

 

चुपचाप उतरता रहा

दुनिया का चुप

मेरे भीतर..,

मेरी कलम चुपचाप

चुप्पी लिखती रही।

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(प्रातः 9:26 बजे, 2.9.18)

( कवितासंग्रह *चुप्पियाँ* से।)

 ☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

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