हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 40 ☆ वो चीखें ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “ वो चीखें  ”।  यह कविता आपकी पुस्तक एक शमां हरदम जलती है  से उद्धृत है। )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 40 ☆

☆ वो चीखें  ☆

सुनो,

औरतों की यह गूँजती चीखें

मुझसे बर्दाश्त नहीं होतीं-

भेद जाती हैं मेरे कानों को,

टुकड़े कर देती हैं मेरे ज़हन के

और मुझे हिला जाती हैं!

 

मेरे देश में

जहां देवियाँ पूजी जाती हैं,

वहीँ आजन्म कन्याओं को

कोख में ही मार दिया जाता है;

जब दम तोड़ते हुए

वो लडकियां चीखती हैं ना-

मेरे दिल का एक कोना

सुन्न हो जाता है!

 

आज भी मेरे देश में

दहेज़ के नाम पर

एक बेचारा पिता

सब कुछ गिरवी रख देता है,

अपना घर, अपना खेत, अपनी इज्ज़त;

पर फिर भी जलाई जाती हैं

उनकी बेटियाँ…

जब कोई बेटी इस तरह

अपने प्राण त्यागते वक़्त चीखती है ना-

तड़प उठता है मेरा मन!

 

अभी कुछ दिन पहले

बड़ा हल्ला मचा था

जब दामिनी का बलात्कार कर

उसे निर्दयता से मार दिया गया था-

कहाँ बंद हुई है अभी भी

वो निष्ठुरता?

अब भी लडकियां और औरतें

हैवानियत का शिकार बनती ही रहती हैं

और जब वो चीखती हैं न-

एक खामोशी मेरे ज़हन को घेर लेती है!

 

सुनो,

इन औरतों से कह दो ना

वो चुप रहा करें-

न बोला करें कुछ भी,

सब कुछ सह लिया करें

और चीखा तो बिलकुल न करें…

मेरा दम घुटता है!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 56 ☆ व्यंग्य – नया भारत ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक अतिसुन्दर व्यंग्य   “ नया भारत ।  यह बिलकुल सच है कि मार्केटिंग ने न केवल फ़ास्ट मूविंग कंस्यूमर गुड्स  अपितु हमारे जीवन में भी अहम् भूमिका निभा रहे हैं। श्री विवेक जी की लेखनी को इस अतिसुन्दर  व्यंग्य के  लिए नमन । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 56 ☆ 

☆ व्यंग्य –  नया भारत ☆

मार्केटिंग का फंडा है जब किसी ब्रांड नेम की वैल्यू कुछ कम लगने लगे तो उसका नया अवतार प्रस्तुत करके लोकप्रियता बरकरार रखी जाती है. इसके लिये स्पार्कलिंग कलर्स में पैकेजिंग बदली जाती है, नये स्लोगन और टैग लाईन दी जाती है. हिन्दी में पढ़े उपसर्ग व प्रत्यय का भी समुचित उपयोग करके ब्रांड वैल्यू की रक्षा की जाती है.  नाम के आगे “नया ” उपसर्ग लगा देने से सब कुछ नया नया सा हो जाता है. लोग पुराने की कमियां भूल जाते हैं, और नये के स्वप्न में खो जाते हैं. इस तरह लकड़ी की हांडी बारम्बार चढ़ाई जा सकती  है. निजी क्षेत्र में तो एम बी ए पास युवा अपने इसी हुनर की मोटी तनख्वाहें पाते हैं. पूरे विश्वास से प्रोडक्ट बिना बदले ” भरोसा वही, पैकिंग नई ” का स्लोगन प्राईम टाईम पर विज्ञापन बाला बोलती है और सेल्स के आंकड़े बढ़ने लगते हैं, क्योकि जो दिखता है वही तो बिकता है. एक संस्थान का नाम उसके लोगो पर केपिटल लैटर्स में लिखा जाता था, फंड मैनेजर की  नीयत में कुछ खोट आ गई, घोटाले का क्या है,हो गया. जांच वगैरह बिठा दी गईं, पर संस्थान तो नहीं बिठाया जा सकता था, लोगो बदल दिया गया, कैपिटल लैटर्स की जगह स्माल लैटर्स में संस्था का नया नाम लिख दिया गया. फंड फिर चल निकला. आखिर हर साल इस देश में करोड़ो की आबादी बढ़  रही है, पुरानो को न सही नयो को तो नये से परिचित करवाया ही जा सकता है. फ़ास्ट मूविंग कंस्यूमर गुड्स  में एक नही अनेक प्रोडक्ट हैं,जो कभी गुणवत्ता में कम ज्यादा निकल आते हैं, कभी किसी मिलावट  के शिकार हो जाते हैं, कभी कोई कीटाणु निकल आता है पैक्ड बोटल में पर मजाल है कि सेल्स के फिगर गिर जायें, लोगो की स्मृति कमजोर होती है, विज्ञापन की ताकत और नाम के आगे “न्यू” का प्रिफिक्स बेड़ा पार करवा ही देता है. एक टुथपेस्ट के सेल्स फिगर गिरे तो उसने प्रोडक्ट में नमक, तुलसी, बबूल, जाने क्या क्या मिलाकर एक के अनेक उत्पाद ही परोस दिये. खरीदो जो पसंद आये पर खरीदो हमसे ही.

देश के मामले भी तकनीकी मनोविज्ञान के सहारे मैनेज किये जाते हैं. अभी तक गरीबी हटाओ के नारो को, अच्छे दिनों के सपनो को, सुनहरे कल के सफर के तिलिस्म को, बेहतरी के लिये बदलाव को अखबारो के फुल पेज विज्ञापनो के सहारे वोटो में तब्दील करने के ढ़ेरो प्रयोग कईयो ने कई कई बार किये हैं. पर अब कुछ बेहतर की जरूरत लग रही है. इसलिये नामुमकिन से ना हटा दिया गया है. वहां से न लेकर या में मिलाकर,  “नया” उपसर्ग जुड़ा ताकतवर  रत पूरे भरोसे और श्रद्धा  के साथ प्रस्तुत है. मेरी कामना है कि सचमुच ही मेरा भारत  दिखने में स्मार्ट, व्यवहार में गंभीर, ताकत में फौलादी  नया भारत हो जावे, तो फिर किसी को विज्ञापन में बोलना न पड़े काम खुद ही बोले आरोप लगाने से पहले आरोप लगाने वाला सौ दफा सोचे..

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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English Literature ☆ Weekly Column – Abhivyakti # 20 ☆ Some lines…. between the lines! ☆ Hemant Bawankar

Hemant Bawankar

(All of the literature written by me was for self satisfaction. Now I started sharing them with you all. Every person has two characters. One is visible and another is invisible. This poem shows us mirror.  Today, I present my contemporary poem ‘Some lines…. between the lines!’This poem has been cited from my book “The Variegated Life of Emotional Hearts”.))

My introduction is available on following links.

☆ Weekly Column – Abhivyakti # 20 

☆  Some lines…. between the lines! ☆

❃ ❃ ❃ ❃

We came in the world

to learn and try

Not for suicide

and not for die!

❃ ❃ ❃ ❃

I’m wandering

between

birthplace and graveyard.

I’m hanging

between

painful birth and dangerous death!

❃ ❃ ❃ ❃

You born alone

and

you will die alone.

But,

you can’t live alone.

❃ ❃ ❃ ❃

Death after birth

is definite

and

tracks from birth to death

is the definition of life!

❃ ❃ ❃ ❃

© Hemant Bawankar

Pune

9th August 1977

 

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गिरा जो कल वो ख़ून था…. ☆ श्री मनीष खरे “शायर अवधी”

श्री मनीष खरे “शायर अवधी”

(श्री मनीष खरे “शायर अवधी”जी का परिचय उनके ही शब्दों में – “मैंने 300 से अधिक शायरी, गजल, कविताएं लिखीं किन्तु, कभी इस तरह से प्रकाशित करने की कोशिश नहीं की। इस लॉकडाउन में मैंने महसूस किया कि मुझे अपनी इस सोच नुमा चौकोर कमरे से बाहर आना चाहिए और अपनी “अभिव्यक्ति” को अपनी डायरी से बाहर डिजिटल मीडिया में ले जाना चाहिए। मैं ऑटोमोबाइल क्षेत्र के एक प्रसिद्ध संस्थान में मानव संसाधन टीम का सदस्य हूँ। अपने समग्र कैरियर के दौरान  मैं ऐसे कई लोगों से मिला हूँ, जिन्होंने मेरे मस्तिष्क में विभिन्न  संवेदनाओं को जगाने का प्रयास किया है और उनके साथ उनकी भावनाओं को जिया है। मेरी सभी रचनाएँ उन सभी को समर्पित हैं जिन्होंने अब तक मेरे जीवन के विभिन्न पहलुओं को स्पर्श किया है।”  आज प्रस्तुत है आपकी द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने वाले परिवारों की संवेदनाओं की पृष्ठभूमि पर आधारित एक  भावप्रवण रचना  गिरा जो कल वो ख़ून था….।)

☆ कविता  – गिरा जो कल वो ख़ून था….

 

गिरा जो कल वो ख़ून था

मरा जो था वो जुनून था

कुछ ठहाके लग गए बस

पर मिला नहीं जो वो सुकून था

 

रात थी जो ढल गयी पर आंधियाँ थमी नहीं

सूखे थे सैलाब आँसुओं के पर गयी नमी नही

आह थी सुलग रही और बाजू थे उलझ रहे

जो था वो झुलस रहा वो शहर बस रंगून था

 

गिरा जो कल वो ख़ून था….

मरा जो था वो जुनून था….

 

कट गये हज़ारों ख़्वाहिशों की शान पे

लुट गयीं थीं मांगें बस बेसुरी सी तान पे

याद जो रह गयी और बात सब ये कह गयी

जो टूटे थे वो रिश्ते थे वो वक़्त का क़ानून था

अंगार थे बरक़रार थे और बस्तियां उजड़ रही

जो था वो झुलस रहा वो शहर बस रंगून था

 

गिरा जो कल वो खून था…

मरा जो था वो जुनून था….

 

© श्री मनीष खरे “शायर अवधी”

पुणे, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 50 – कविता – जन्म जन्म की प्रीत निभाने…….☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी  एक अप्रतिम कविता  “जन्म जन्म की प्रीत निभाने……..।  भारत में वैवाहिक बंधन की रस्में अविस्मरणीय तो होती ही हैं साथ ही एक एक पल  भी अविस्मरणीय होता है जिसके एक अंश को श्रीमती सिद्धेश्वरी जी  ने  इस शब्दचित्र के माध्यम से बखूबी लिपिबद्ध किया है।  इस सर्वोत्कृष्ट  रचना के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 49 ☆

☆ कविता  – जन्म जन्म की प्रीत निभाने ……..

 

पांव की सुंदरता देख

लग गई दिल पर हाजिरी

लाल लाल मेहंदी सजी

पहने राजस्थानी मोजरी

 

नूपुर की सुंदरता धामे

झूलन मोतियों की लगी

पांवों की सुंदरता सोच

मुख देखन की आस लगी

 

थम थम  जब चलेगी गोरी

खन खन खनकेगा कंगना

सुर ताल छेड़ती नूपुर भी

जाएगी पिया के अंगना

 

सिर सिंदूरी लाल लगाई

हाथों लाली लाली सजाई

घूंघट की ओर से दिखे

सुर्ख लाल होठों की लाली

 

देख लाल जोडे पर दुल्हन

साजन भी लजाए लाल

जनम जनम साथ निभाने

मांथे  तिलक लगाए लाल

 

प्रकृति की सुंदर रचना

मेंहदी ने दिखाया अपना रंग

जन्म जन्म की प्रीत निभाने

सात फेरे लिए दोनों संग संग

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ उत्सव कवितेचा # 8 – ऐन थंडीत ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  हम श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी के हृदय से आभारी हैं कि उन्होने साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा के माध्यम से अपनी रचनाएँ साझा करने की सहमति प्रदान की है। आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता  ‘ऐन थंडीत’ एवं इस मूल कविता का  श्री भगवान् वैद्य ‘प्रखर’ जी द्वारा  ऐन सर्दियों में  शीर्षक से हिंदी  भावानुवाद किया गया है जिसे आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

कविता का लिंक  >>>>   ☆ ऐन सर्दियों में ☆

साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा – # 8 ☆ 

☆ ऐन थंडीत 

या आश्वस्त वृक्षांनीच

विश्वासघात केला आमचा

ऐन थंडीत.

आसरा अव्हेरणं

त्यांना अशक्य झालं,

तेव्हा त्यांनी

विटा काढून घेतल्या

आपल्या घराच्या भिंतींच्या

आता उघडे पडलेले आम्ही

वाट बघतोय

पिसे झडण्याची

किंवा

कुणा शिका-याच्या

मर्मभेदी बाणाची.

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 53 ☆ पावसाचे थेंब ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक अत्यंत मार्मिक, ह्रदयस्पर्शी एवं भावप्रवण कविता  “पावसाचे थेंब।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 53 ☆

☆ पावसाचे थेंब☆

 

असंख्य पावसाचे थेंब

डोकं आपटून घेतात

रस्त्यावर, खडकावर,

ओघळ होऊन वाहतात,

खड्ड्यांची तळी निर्माण करतात,

डोंगरावरून कोसळतात,

नदीत धावतात,

धरणात साटतात,

मातीला सुखावतात,

अन्नाच्या निर्मितीत योगदान देतात,

सजीवांत जगवण्याची उमेद निर्माण करतात,

समुद्रात माशांना जगवतात,

भूतलावर प्राण्यांना वाढवतात,

कधी पानांच्या कुशीत

मोत्यांचं रूप घेऊन विसावतात,

कधी गोठून घेतात स्वतःचंच अस्तित्व

कधी आग झेलतात, बाष्प होतात,

बहुरुप्यासारखी रुपं बदलतात

पावसाचे थेंब

या साऱ्या उपकाराच्या बदल्यात

काय मागतात ते तुमच्याकडे

पाणी वाचवा पाणी जिरवा

इतकच ना ?

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (30) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय)

 

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।।30।।

 

हैं तो भूत अनेक पर ,सबका कर्ता एक

ऐसा जो भी देखता, उसे ब्रह्म है एक ।।30।।

भावार्थ :  जिस क्षण यह पुरुष भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।।30।।

 

When a man sees the whole variety of beings as resting in the One, and spreading forth from That alone, he then becomes Brahman.।।30।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 5 – सुखी रहें सब … ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज पस्तुत है उनका अभिनव गीत  “सुखी रहें सब …”

☆ साप्ताहिक स्तम्भ #5 – ।। अभिनव गीत ।।

☆ सुखी रहें सब …. ☆

 

मुँह बिचकाती लगी गाँव की

तिरस्कृता पछुआ

यहाँ गुजरते हुये शहर ने

जब जब उसे छुआ

 

सड़क उधर की बेशक

आकर सत्‍वर यहाँ मिली

शीलवती, संयमी दिखी है

ग्राम्या गली गली

 

चौपालों का दर्द अनसुना

कर चौराहे भी

जगमग करते रहे सम्हाले

सब अपना बटुआ

 

स्वीमिंग पूल नहाये तन को

जब छू गई नदी

लगा वर्ष के हिस्से आयी

पूरी एक सदी

 

यहाँ कीमियागर सपनों का

स्वयं खोजने को

मॉलों बाजारों से हटकर

सुन्दर लगा सुआ

 

कुंठा, घुटन, तनाव, प्रदूषण,

कचरा नहीं मिला

गाँव, प्राकृतिक कुशल प्रबंधन

का मजबूत किला

 

औद्योगिको तनिक तो मानवता

की खातिर तुम

”सुखी रहें सब” हाथ उठा कर

ऐसी करो दुआ

 

© राघवेन्द्र तिवारी

21-04-2020

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ ज्योतिर्गमय ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ ज्योतिर्गमय☆

 

अथाह, असीम

अथक अंधेरा,

द्वादशपक्षीय

रात का डेरा,

ध्रुवीय बिंदु

सच को जानते हैं

चाँद को रात का

पहरेदार मानते हैं,

बात को समझा करो

पहरेदार से डरा करो,

पर इस पहरेदार की

टकटकी ही तो

मेरे पास है,

चाँद है सो

सूरज के लौटने

की आस है,

अवधि थोड़ी हो

अवधि अधिक हो,

सूरज की राह देखते

बीत जाती है रात,

अंधेरे के गर्भ में

प्रकाश को पंख फूटते हैं,

तमस के पैरोकार,

सुनो, रात काटना

इसे ही तो कहते हैं..!

( ध्रुवीय बिंदु पर रात और दिन लगभग छह-छह माह के होते हैं।)

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(रात्रि 3:31 बजे, 6.6.2020)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

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