मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ आगळं वेगळं सुख ☆ सौ. सुनिता अनंत गाडगीळ

 ☆ मनमंजुषेतून ☆ आगळं वेगळं सुख ☆ सौ. सुनिता अनंत गाडगीळ ☆ 

आम्ही दोघेच शिळोप्याच्या गप्पा करत बसलो होतो. सोसाट्याचा वारा सुटला आणि त्यापाठोपाठ पाऊस कोसळला. इतका की आम्हाला एकमेकांचे आवाज ऐकू येईनात. मग आम्ही दोघेच आमच्या नव्या नवलाईच्या दिवसांच्या आठवणी मनातल्या मनात आळवत शांत बसून राहिलो.

तीस वर्षांपूर्वी नवीन लग्न झालं. आम्ही आनंदात चिंब भिजत होतो आणि गळणाऱ्या घरात राहत होतो. कौलारू घर गळतीन भरून जायचं .   ठेवायची पातेली आणि थांबला पाऊस की त्यातलं मळकट पाणी द्यायचं  ओतून. ओली जमीन कोरडी करायची आणि पुन्हा परस्परांच्या प्रेमात चिंब व्हायचं असे ते छान दिवस होते.

दोघांनी मिळून घराच स्वप्न पाहिलं खूप मेहनत घेतली. तेव्हापासूनआमचा आयुष्य घाईगडबडीत झालं. उठा, आवरा, पळा, कामावरून या, झोपा ,आवरा, लवकर पळा असं चुकीचं पण आवश्यक. कारण भविष्यात सुख मिळायला हवं. भविष्याबाबत ची अनिश्चितता आयुष्याच्या नाण्याची दुसरी बाजू असते. अशीच स्वस्त पणाने मी आताही घरात बसले होते. शिळोप्याच्या गप्पात कुठेच अनिश्‍चितता डोकावत नव्हती.  गप्पा सरणाऱ्या नव्हत्याच….. पावसाने थांबलेल्या होत्या. अचानक छतावरून एक पावसाचा  थेंब माझ्या डोक्यात पडला. भांबावून जात मी वरती पाहिले. ज्या घराला तीस वर्षे पुरी झाली होती. त्या वास्तुने आलेला पुराचा तडाखा सोसला होता.  आमच्या घराने गतवर्षी इतक्या पावसाने सुद्धा कुठे गळती झाली नव्हती म्हणून आम्ही दोघेही खूप आनंदात होतो.

मी छताकडे पाहिले .एका कोपऱ्यातून टप टप टप संततधार सुरू झाली होती. ती पाहताना माझे डोळे मिटले. जणू बाहेरचा पाऊस  या डोळ्यात आला होता. आमच्या नव्या संसाराच्या नवलाईच्या दिवसाच्या आठवणी जाग्या करत होता. पंखात बळ आल्यावर आमची पाखरे घरट्यातूनउडून गेली होती.

पुन्हा एकदा दोघेच होतो.

पुन्हा एकदा पाऊस होता.

पुन्हा एकदा छत गळत होतं.

तेच टपटपणारे थेंब नव्हते.   यंदा या अनिश्चित वातावरणात कोणी छताची दुरुस्ती करणार आहे नव्हतं.

नवा पाऊस पडणार होता.

मनाचा आभाळ स्वच्छ करणार होता. काऊच घरटं दुरुस्त होणारच होतं. तोवर आठवणींचे आगळेवेगळे थेंब टपटपत राहणार होते……. राहणार होते.

 

© सौ. सुनिता अनंत गाडगीळ

9420761837

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (6) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय 18  

(सन्यास   योग)

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा फलानि च ।

कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्‌ ।।6।।

किंतु ये भी सब कर्म हो, त्याग आश अनुराग

किये जायें निश्चित सदा, मेरे मत का राग ।।6।।

 

भावार्थ :  इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।।6।।

But even these actions should be performed leaving aside attachment and the desire for rewards, O Arjuna! This is My certain and best conviction.।।6।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – गांधीजी और एकादश व्रत ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया एवं आग्रह को पूर्ण किया. अपने लेख सहर्ष प्रकाशनार्थ में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है  महात्मा गाँधी जी की जयंती पर प्रस्तुत है आपका एक आलेख  “गांधीजी और  एकादश व्रत”) यह आलेख आपकी शीघ्र प्रकाशनार्थ पुस्तक ” गाँधी के राम ” से उद्धृत है । )

☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष ☆
☆ गांधीजी और  एकादश व्रत ☆ 

 गांधीजी और  एकादश व्रत

गांधीजी का आध्यात्म एकादश व्रतों पर आधारित है। इन व्रतों में हिन्दू व  जैन धर्म के पांच  सिद्धांत अहिंसा,सत्य,अस्तेय,अपरिग्रह तथा ब्रह्मचर्य को शामिल हैं और इसके अलावा गांधीजी ने इसमें शरीरश्रम, अस्वाद, अभय, सब धर्मों के प्रति समानता , स्वदेशी व अस्पृश्यता-निवारण को भी जोड़ दिया। इस प्रकार यह एकादश व्रत कहलाये और गांधीजी की नित्य प्रार्थना के अभिन्न अंग बन गए। संस्कृत में यह मंत्र आचार्य विनोबा भावे ने बनाया –

‘अहिंसा,सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, असंग्रह।

शरीरश्रम, अस्वाद, सर्वत्र भयवर्जन।।

सर्वधर्म-समानत्व, स्वदेशी, स्पर्शभावना।

विनम्र व्रत निष्ठा से ये एकादश सेव्य हैं।।’

उसका गुजराती अनुवाद जुगत भाई ने किया और हिन्दी रूपांतरण सियारामशरण गुप्त ने निम्नानुसार किया:

‘ अहिंसा,सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शरीरश्रम, अस्वाद, अभय, सब धर्मों के प्रति समानता, स्वदेशी और अस्पृश्यता-निवारण, इन ग्यारह व्रतों का सेवन नम्रता पूर्वक व्रत के निश्चय से करना चाहिए।’

गांधीजी ने सत्याग्रह का प्रयोग अपने जीवन में खूब किया। घर गृहस्थी के मसले हों, बा को व बच्चों को समझाना हो, आश्रम वासियों की आशंकाओं का निराकरण करना हो अथवा आज़ादी की लड़ाई में सविनय अवज्ञा भंग जैसे आन्दोलन हों उन्होंने सत्याग्रह का ही सहारा लिया। एकादश व्रत तो वस्तुतः सत्याग्रह के ही अंग हैं। सविनय अवज्ञा भंग तो सत्य, अहिंसा, अभय व नम्रता के समावेश का अचूक उदाहरण  है। गांधीजी में शुद्ध सत्याग्रह का भाव बचपन से ही रहा। उनके जीवन में ऐसे अनेक अवसर आये जब उन्हें सत्य के आग्रह को करने पर हिंसा का सामना करना पडा लेकिन उन्होंने कभी भी हिंसक साधनों का प्रयोग नहीं किया वरन सत्य को नम्रता के साथ उजागर किया और ऐसा करने में उन्हें कभी किसी भी नुकसान का भय नहीं हुआ। दक्षिण अफ्रीका में डरबन से प्रिटोरिया जाते वक्त प्रथम श्रेणी में यात्रा करने पर अंग्रेजों का दुर्व्यवहार  हो अथवा घोड़ागाड़ी में घटित अपमानजनक घटना या फिर न्यायालय में पगड़ी पहनने से इनकार हो गांधीजी ने अपमान का सदैव प्रतिकार नम्रता से ही किया।

गांधीजी ने 12 मार्च 1930 से प्रारम्भ विश्व विख्यात नमक सत्याग्रह को, जिसे दांडी मार्च भी कहा गया, सफलता पूर्वक संपन्न कराने के बाद 06 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचकर अपने जत्थे के साथ नमक-क़ानून भंग किया। साबरमती आश्रम से 78 स्वयंसेवकों के साथ शुरू हुआ यह कूच देखते ही देखते व्यापक जनांदोलन में बदल गया और इस सविनय अवज्ञा भंग आन्दोलन के व्यापक होने के कारण गांधीजी को  05 मई 1930 को कराडी में गिरफ्तार कर उन्हें यरवदा जेल भेज दिया गया।

यरवदा जेल को गांधीजी ने यरवदा मंदिर का नाम दिया और सदा की भांति अपने इस कैदी जीवन का उपयोग आश्रम के कार्यकर्ताओं को पत्र लिखने में भी किया। गांधीजी ने आश्रम की दैनिक प्रार्थना के समय पढ़े जाने हेतु प्रत्येक मंगलवार को एक पत्र लिखा जिसमें इन ग्यारह एकादश व्रतों के नैतिक महत्व को समझाते हुए उनका सम्बन्ध उस आध्यात्मिक उद्देश्य के साथ जोड़ा जिसकी प्राप्ति के लिए गांधीजी आजीवन प्रयासरत रहे।। गांधीजी ने नारणदास गांधी को 22 जुलाई 1930 में लिखे अपने पत्र में प्रार्थना सभा में पढ़े जाने वाले इन संदेशों की शुरुवात क्यों की गई इस पर लिखा कि ‘ विश्वनाथ के पत्र में सुझाव है कि मुझे हर सप्ताह थोड़ा सा प्रवचन प्रार्थना के समय पढ़ा जाने के लिए भेजना चाहिए। विचार करने पर मुझे उसकी यह मांग उचित लगी है। प्रार्थना के समय थोड़ी और चेतनता डाल देने में मेरा यह योगदान मानना। दूसरे छह दिनों के लिए भी पढने लायक कुछ भेजा जा सकता हो तो भेजने की योजना काका के साथ बना रहा हूँ। यह तो इस सप्ताह के लिए है।’ ऐसे आध्यात्मिक महत्व के सन्देश भेजने का सिलसिला 14 अक्टूबर 1930 तक सतत हर मंगलवार को चलता रहा, जिसे बाद में नवजीवन ट्रस्ट द्वारा संकलित कर ‘मंगल-प्रभात’ पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया। इन संदेशों के अलावा गांधीजी ने अपने कुछ अन्य विचार भी व्यक्त किये जैसे कपडे के लिफ़ाफ़े को कैसे बचाया जाय ताकि उसका बारबार उपयोग हो सके, या अच्छी रोटी पकाने के लिए खमीर युक्त आटा कैसे गूंथा जाना चाहिए, रुई की पोनी कैसे बनाई जाय, चप्पल सुधारने हेतु चमड़े के टुकड़े भेजने हेतु भी लिखा है। इस प्रकार जेल में भी गांधीजी पल पल का सदुपयोग करते थे।

–  मेरी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक “गांधी के राम “का अंश

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य ☆ आलेख ☆ गाँधी जयंती विशेष – गांधी और जीवन मूल्य ☆ डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ 

(डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन ।  वर्तमान में संरक्षक ‘दजेयोर्ग अंतर्राष्ट्रीय भाषा सं स्थान’, सूरत. अपने मस्तमौला  स्वभाव एवं बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध। आज प्रस्तुत है डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  का महात्मा गाँधी जयंती पर विशेष आलेख  “गांधी और जीवन मूल्य “। डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  के आज के सन्दर्भ में इस सार्थक एवं  विचारणीय विमर्श के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन।  ) 

 ☆ गाँधी जयंती विशेष – गांधी और जीवन मूल्य  

जीवन मूल्य सामाजिक अभिलाषाओं का वह रूप होते हैं जो एक मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाते हैं और ये ऐसे नैतिक सिद्धांत व विश्वास भी हैं जो व्यक्ति के साथ-साथ समाज को भी उत्प्रेरित करते हैं।  इतना ही नहीं किसी भी संस्कृति के आध्यात्मिक, भौतिक और सौंदर्य परक मूल्यों में ये मानवीय मूल्य भीतरी तह तक समाए हुए होते हैं और मनुष्य को मानवता की ओर ले जाते हैं। उसे सामान्य मानव से ऊपर उठाकर उच्च और उदात्त मनुष्य बनाते हैं।

दुनिया भर के सभी महापुरुषों के जीवन मूल्य कमोबेश एक जैसे होते हैं। प्राय:शाश्वत और समावेशी होते हैं। लेकिन जब हम बापू के संदर्भ में मानवीय मूल्यों की बात करते हैं तो उनमें सबसे पहले मानवीय संवेदना आती है जिसे वह सत्य,अहिंसा,सत्याग्रह,अपरिग्रह, त्याग, निर्लोभ, वात्सल्य, करुणा और निर्लिप्त प्रेम से पोषित करते हैं। बापू के ये मानवीय मूल्य शाश्वतता के साथ ही अपनी समसामयिक आवश्यकता और प्रासंगिकता से लैस हैं। उनके ये मूल्य आज़ादी के पूर्व से आज़ादी के काफ़ी बाद तक जन-जन में फैले हुए देखे जा सकते हैं।

वे मानवीय मूल्यों को समय और समाज के संदर्भ में देखते थे। उनके जीवन दर्शन से पता चलता है कि कभी बहुमूल्य रहे मानवीय मूल्यों को वह कभी सीधे-सीधे अपनाते नहीं हैं।  अपितु यथास्थिति वादियों से लोहा लते हुए समय और समाज के सापेक्ष रखकर तोलते हैं। यदि वे अनुकूल पाए जाते हैं तभी उन्हें अपनाते हैं फिर वे चाहे ब्राह्मण,उपनिषद या पौराणिक काल की मिथकीय धरोहर क्यों हों। ब्राह्मण कालीन कर्मकांड को उन्होंने अपने आचरण का हिस्सा नहीं बनाया। किसी भी धर्मग्रन्थ का जो हिस्सा उपयोगी था उसे लेकर शेष छोड़ दिया। प्राचीन काल से चली आ रही वर्णाश्रम व्यवस्था को भले ही वह नकारते नहीं लेकिन उसमें व्याप्त अस्पृश्यता को वे सिरे से खारिज़ करते हैं और हृदय परिवर्तन के साथ वह उस वर्ग को अपनाते हैं, गले लगाते हैं, जिसे समाज वर्षो से उपेक्षित किए हुए था।  दलित बनाए हुए था ।

उनके मानवीय मूल्य लोकतंत्र के पोषक मूल्य हैं। जनकल्याण के पक्षधर मूल्य हैं। लोक कल्याणकारी सरकार की संस्थापना हेतु उन्होंने तुलसी का रामराज्य लिया और स्वराज की कल्पना को साकार करने में प्राणपण से जुट गए।

उनमें पक्षपात नहीं है। बुद्ध की करुणा की तरह ही इनकी करुणा भी एकरस होकर बहती है ।  वह किसी- किसी के लिए और कभी- कभी नहीं बहती और न ही कभी अवरुद्ध होती है बल्कि सभी के लिए अनवरत और अनवरुद्ध बहती है। उनका प्रेम किसी वर्ग या वर्ण के लिए आरक्षित न होकर पशु पक्षी से लेकर समस्त मानव जगत तक व्याप्त है।

हर जीव के जीवन को बहुमूल्य मानना भी उनका जीवन मूल्य है। लेकिन उनके अनुसार मनुष्य जीवन तो अनमोल है। उनमें संस्कार बहुत ज़रूरी है। वे निश्छल और सरल मन बच्चे को ही नहीं अपितु बड़े से बड़े पापी को भी संस्कारित करने की बात करते हैं । इसलिए वह उनमें भी संस्कार डालकर हृदय परिवर्तन कर मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठापित करने में विश्वास करते हैं। वे जीवन को गढ़ना सामाजिक धर्म मानते हैं और मूल्य भी।  बचपन में देखा गया नाटक सत्यवादी हरिश्चंद्र उनके जीवन को परिवर्तित करने वाला नाटक इसलिए भी सिद्ध हो सका क्योंकि उनमें बालपन से ही ऐसे संस्कार थे,जो मानव मूल्यों से आपूरित थे।  सत्य की रक्षा के लिए अपने राजपाट से लेकर अपनी संतान तक का खोना हरिश्चंद्र के लिए ही नहीं बापू के लिए भी आदर्श रहा और उसे उन्होंने जीवन भर भी निभाया। उन्होंने अपने प्राण सत्य, अहिंसा और मानवीय मूल्यों के लिए ही अर्पित कर दिये।

अत्याचार और असत्य का दृढ़ता से प्रतिकार उनका बहुमूल्य और समसामयिक  जीवन मूल्य रहा है। इसीलिए वे सदियों से शोषित समाज के उत्थान के लिए सत्य की प्रयोगशाला में परीक्षित मानववादी जीवन मूल्यों के पुरस्कर्ता बां सके थे । चुनौतियों के सामने पहाड़ की श्वेत धवल,शीतल बरफ़ीली चोटी-से निर्भय खड़े-खड़े सामना करने का साहस   रखने वाले अपराजेय योद्धा के रूप में  उन्हें सामने पाकर आखिरकार ब्रिटिश अत्याचार का ज्वालामुखी भी एक दिन ठण्डा ही पड़ गया।

अंतत:उनके जैसे अहिंसा और  सत्य के नि:शस्त्र आग्रही के आगे असत्य का क्रूर दानव नतमस्तक हो गया। वह इसलिए कि वे वर्तमान के स्रष्टा और भविष्य के द्रष्टा थे।   वे पराई पीर को अन्तर्मन से समझने वाले वैष्णव थे।

असहमति का विवेक उनका ऐसा जीवन मूल्य था जो उनके जीवन में विवादों का कारण रहा। लेकिन वे इससे रंच भी विचलित नहीं हुए।   गांधी जी अपने सत्याग्रह की व्याख्या में यह कहना नहीं भूलते कि उनके सत्याग्रह में केवल उन्हीं का सत्य शामिल नहीं है बल्कि विपक्षी का सत्य भी शामिल है। इसी के साथ वे असहमति के विवेक को भी बराबर महत्त्व देते थे। इसी कारण से वे अपने ‘हरिजन’और आंबेडकर के दलित विमर्श की सहमति -असहमति से ऊपर उठकर ‘पूना पैक्ट’ में सफल हुए थे। आंबेडकर के जाति उच्छेद को वे सही नहीं मानते थे। जाति उन्मूलन की ज़गह वे अस्पृश्यता का उच्छेद सही मानते थे। इस संदर्भ में उनका यह स्पष्ट कहना था कि,’स्पृश्यता के विरुद्ध आन्दोलन हृदय परिवर्तन का आन्दोलन है। ‘जबकि बाबा साहेब आंबेडकर इनके ‘हरिजन’ शब्द से नफ़रत करते थे और मानते थे कि अगर जाति का नाश नहीं होगा तो स्पृश्यता का नाश सपना ही रह जाएगा।  किसी हद तक गाँधी के विचार आज अधिक प्रासंगिक लग रहे हैं कि अस्पृश्यता तो समाप्त हो गई पर जाति व्यवस्था अब भी है। स्वयं दलित ही आज अपनी जाति की पहचान को इसलिए नहीं छोड़ना चाहते क्योंकि इससे उनके आरक्षण के अधिकार को आघात लगने का भय दिखता है।

वे मानव मूल्यों को केवल मानते ही नहीं थे,उनके पोषक भी थे। इन्हीं कारणों से एक आदर्श और नैतिक पिता के रूप में हम बापू को पाते हैं। इसीलिये तो वे सर्व स्वीकार्य राष्ट्रपिता हैं।

माता-पिता के दैहिक रूप पर कोई नहीं   रीझता। इसी से हर बच्चे को उसकी माँ ही सबसे प्यारी होती है उसके बाद पिता।  माँ के पहचनवाने पर कि उसका पिता कौन है बच्चा भी रूप-कुरूप के भेद से परे भाव से उसे अपना लेता है। मेरी माँ ने भी मुझे किसी शिशु के हिसाब से  डरावनी मूंछों वाले मेरे पिता से कब और कैसे परिचय कराया होगा यह तो होश नहीं लेकिन राष्ट्रपिता से परिचय का होश है।  मेरी माँ के ‘बापू’अवतारी थे और अवतारी नहीं थे तो कम से कम सिद्ध पुरुष अवश्य थे जो लखनऊ में ज़मीन में प्रवेश करके सीतापुर में निकलकर उनके बाबा से मिले थे।

विद्यालय में बापू के जिस चित्र को देखते हुए हम बड़े हुए वह पसलियां दर्शाती दुर्बल काया थी। आगे के दांत टूटे।  हाथ में लाठी लिए तेज़-तेज़ चलता अर्धनग्न शरीर वाला फ़कीर।

भौतिक आँखें तो चमक देखती हैं फिर वह चाहे सोने की हों या पीतल की।  ऐसे में वे भला रीझें  भी तो किस पर। बाहरी आंखों को क्या पता  कि वे रूपवान नहीं चरित्रवान थे और चरित्र तो नंगी आंखों देखा नहीं जा सकता उसके लिए तो भीतरी आँखें  चाहिए।

गाँधी अपने वात्सल्य और चरित्र के कारण आज भारत ही नहीं सारी दुनिया में पूजे जा रहे  हैं। सारी दुनिया उन्हें पिता मान रही है। हमारे लिए यह गर्व की बात है कि  अपने मानव मूूल्यों के चलते ही हमारे राष्ट्र पिता आज विश्व पिता हो गए हैं।

इस दुनिया का बच्चा- बच्चा गाँधी से प्रभावित हुआ है तो हम  भला कैसे अछूते रह जाते।  हम भी प्रभावित हुए थे।   लेकिन गांधी के विचारों को मलिन करने वालों के कारण हमारा बालमन उस समय आहत हुआ था जब गाँँधी के कुटीर उद्दयोग  में इकलौते बचे उनके चरखे की अर्थी उठाकर हम भी दस-ग्यारह विद्यार्थी पहली बार गांव से बाहर  पांचवीं की परीक्षा देने गए थे। हाथ में रुई (कपास) लिए-लिए उकता गए थे।  चरखा एक, कातने वाले दस । अपनी बारी आने तक रुई हथेली के पसीने से भीग भी गई थी। इसके बाद उसे काता हमारे गुरु जी ने था। यह गाँधी दर्शन और उनके आर्थिक विचारों का उनकी ही संतानों द्वारा किया जा रहा अन्तिम सम्मान या संस्कार था, जिससे पूर्व किशोरवास्था में ही हमारा परिचय हो गया था। उस इम्तिहान से पहले हमने सिर्फ तकली,रुई और बापू को देखा था लेकिन चरखे को नहीं। यहाँ तक कि चित्र में भी नहीं। शायद इसीलिए बचपन में तो उतना नहीं रीझे जितनी मेरी माँ रीझी थी।   अपनी  माँ की तरह ही थोड़ा बड़े यानी समझने लायक होने पर मैं भी रीझा और पाया कि अपने ही घर में उपेक्षित होने के बावजूद बापू पर मैं ही क्या  सारी दुनिया रीझी हुई है और ऐसी रीझी हुई है कि जैसे चुंबक  पर लोहा रीझता है।  उनकी आत्मा के चुंबक के जो भी  करीब आया उसे  ऐसे चिपकाया जैसे जनम-जनम से वह उनका ही रहा हो या  होकर रह गया हो और अब तो पूरे यकीन से कह सकता हूँ कि  उनपर जो नहीं रीझा या रीझ रहा वह संवेदनशील मनुष्य तो क्या  हाँड़-माँस  का   विवेक शून्य पशु भी नहीं यहाँँ तक कि  जड़  भी  नहीं।

मूल्य भले अमूर्त होते हैं लेकिन आचरण में ढलकर मूर्त हो उठते हैं। गांंधी का चरित्र  बड़ा कीमती चरित्र इसलिए बन सका है कि मूल्य उनके आचरण की टकसाल में ढाले गए हैं।  वे जितना जज के लिए कीमती हैं उतना ही किसी  अपराधी के लिए भी। उनके विचार एक विशुद्ध दार्शनिक के ही विचार नहीं बल्कि सहृदय और विवेकशील पिता के  भी विचार हैं । ‘आँख के बदले आँख’ से तो सारी दुनिया ही अंधी हो जाएगी और ‘पाप से घृणा करो पापी से नहीं’ के माध्यम सेे वे जहाँ जज के लिए मार्गदर्शन करते हैं  वहीं चोर के लिए भी आत्म सुधार का रास्ता खोलते हैं। हृदय परिवर्तन से पापी में भी सच्चाई,ईमानदारी,कर्तव्यनिष्ठा,सहिष्णुता,करुणा,अहिंसा,प्रेम,सौहार्द,विश्वास,आस्था और आदर भाव जैसे मानवीय मूल्य स्थापित किए जा सकने में पूरा विश्वास रखते थे।

वे साध्य की शुद्धता से अधिक साधन की शुद्धता पर जोर देते हैं। क्योंकि उनकी दृष्टि में यही सबसे सुंदर और कारगर औजार था जिससे हम सुंदर समाज की संरचना कर सकते थे। इसीलिए गांधी   क्या उनके हर अनुयायी को  इन  दो बातों से चिढ़ थी। एक ओर  सब  कुुुछ  चुपचाप   सहे  जाना और दूसरी ओर  सारे शोषण को रातोंरात मिटा देने का उन्माद। अत:बापू के  हिसाब से  अत्याचार सहना स्पष्टत: कायरता थी। ऐसे निर्भय और  आत्मनिर्भर  समाज की सरंचना  करनेे वाले को आज दबे-छिपे और कहीं-कहीं तो खुलेआम  भी  गालियाँ  दी जा रही हैं ।  लेकिन वे इसके परिणाम पहले ही जानते थे पर इसकी परवाह उन्होंने कभी नहीं की । इसके लिए राज मोहन गांधी एक सटीक बात कहते हैं कि,” उन्हें विश्वास था कि उनके सत्याग्रह का लोग सम्मान करेंगे लेकिन एक दिन वही उन्हें नीचे धकेल देंगे। —अगर विभिन्न धर्मों  वाले  हमारे देश में आज बहुत से भारतीय खुले आम या गुप्त रूप से गांधी के समान अधिकारों ,परस्पर सम्मान,और आपसी दोस्ती के विचारों को नापसंद करते हैं तो भारत और दुनिया भर में ऐसे लोग भी कम नहीं जो केवल इसी कारण उनसे प्यार करते हैं।   ”

वे सौंदर्य परक मूल्यों को अच्छी तरह समझते थे। लेकिन वे उन्हें रोटी,कपड़ा और मकान के भौतिक मूल्यों से जोड़कर देखने के पक्षधर थे। गाँव -गाँव  और घर-घर स्वच्छता और खुशहाली चाहते थे। समता और बंधुता उनके मूल्य ही नहीं आत्मीय संकल्प थे। इसके वे औरों के सामने जीवंत आदर्श रख रहे थे । वह इसलिए भी कि इससे उनका दिल दुखता था।  अस्पृश्यता का निवारण वे शब्दों से नहीं आचरण से चाहते थे। इसीलिए वे अपने शौचालय स्वयं साफ़ करें। श्रम की कद्र करने के लिये वे अपने जूते-चप्पल स्वयं भी गांठते थे। उनके  अनुसार खादी और ग्रामोद्योग से बिना पूंजी और कौशल के भी  ग्रामीणों को रोजगार मिल सकता है। वे कहते थे,”बुद्धि, श्रम और कौशल   को अलग करने से गांवों की  अनदेखी का अपराध हुआ है और  इसी लिए हमें गांवों में  सौन्दर्य की जगह कूड़े के ढेर  नज़र आते हैं । ”

निर्भयता और अचौर्य भी उनके अपरिहार्य जीवन मूल्य थे। प्राय: हम लोग उनकी अहिंसा को कायरता समझते हैं लेकिन यह हमारी भारी भूल है। वह एक अहिंसक को निडर व्यक्ति बनाते हैं, कायर नहीं । उनका मानना है कि कायर कभी अहिंसक हो ही नहीं सकता। हम दुर्बल हैं।  हिंसक हैं। कायर हैं। इसलिए बापू को नहीं समझ पाते।  हम बापू को इसलिए भी नहीं समझ पाते क्योंकि हम भीतर से चोर और बाहर से कोतवाल हैं। बहुत से लोगों का आरोप है कि गाँधी जी ने शहीद भगत सिंह की पैरवी नहीं की। इसे मैं मारीशस के यशस्वी साहित्यकार अभिमन्यु अनत के ‘गांधी जी बोले थे’ उपन्यास के पात्र  देवराज का सहारा लेते हुए साफ़ करना चाहूँगा कि यही एक पड़ाव है जहाँ वे अपने सिद्धांत के विरुद्ध जाते हुए मिलते हैं, जिसे एक विदेशी साहित्यकार तो स्वीकारता है लेकिन हममें वैसा साहस नहीं।  क्योंकि हमें उनके व्यक्तित्त्व की विराटता सहन नहीं होती। इसलिए हर बड़ी लकीर की तरह इसे भी छोटी करने के उपक्रम करते रहते हैं। हिंसा के बदले हिंसा वाला चरित्र बताता है कि उपन्यासकार के मनो मस्तिष्क में स्वाधीनता के लिये हिंसा के पक्षधर क्रान्तिकारियों का पक्ष भी है और उनके प्रति अहिंसक गाँधी का सॉफ़्ट कार्नर भी। उसे वह गांधीवादी मदन के माध्यम से कहलवाता है कि,”देव !तुम निर्दोषों को फांसी चढ़ने से रोकने के लिए खुद अपनी गर्दन में फंदा डाल बैठे। ”    यह गांंधी का  ईमानदार   चारित्र  ही है जो  उन्हें  देश-काल से  बाहर ले जाता है ।

अचौर्य व अपरिग्रह का पाठ  उन्होंने जन-जन को पढ़ाया  कि किसी के खेत से कुछ मत छूना। जो लेना हो बस अपने खेत से लाओ।  अपने आचरण से हमें अपरिग्रह भी सिखाया और अहिंसा भी।

उनके आचरण की पाठशाला जीवन्त दूर शिक्षण शाला की तरह थी। इसी से बापू से ही सीख कर जो बड़े स्तर पर बापू ने सारी दुनिया के लिए  किया वही  मेेेरी माँ ने मेरे लिए किया।  बचपन मेें मुझे मेरी निरक्षर माँ  पढ़ाती थी और किसी के घर या खेत से कुछ लाने के लिए साफ़ मना करती थी।    वह जहाँ पढ़ी  थी वह पाठशाला बापू की जीवनी थी और  वहाँ उसका शिक्षक कोई और नहीं बस बापू का सुना-सुनाया आचरण था।  इस अर्थ मेें बापू सारी दुनिया  केे लिए   एक आदर्श पिता के साथ-साथ प्राथमिक अध्यापक भी कहे जा सकते हैं।

वे एक जागरूक पिता की तरह सेवा और सदाचार भाव के साथ भारतीय जनमानस को तैयार कर रहे थे,जिसमें धर्म सर्वोपरि था। लेकिन उनका धर्म ऐसा धर्म था जिसमें सच में सारी वसुधा और उसके जन समाए हुए थे फिर वे चाहे किसी भी भूभाग के या किसी भी पंथ को मानने वाले क्यों नहों। उनके इसी विराट वैश्विक व्यक्तित्त्व वाले सजग नेतृत्व में ही भारतीय जनमानस  पला -पुसा। भटके और डरे हुए भारत को वे धर्माध्यात्म,नीति,समाजनीति,संयम,सत्याचरण ,अहिंसा, राजनीति,आत्मबल वाली जीवनोपयोगी शिक्षा और दर्शन सब एक साथ सिखा-समझा रहे थे।  गाँधी  और उनके जीवन-दर्शन के विशेषज्ञ आचार्य नन्द किशोर कहते हैं,”महात्मा गांधी जब सत्य को ही ईश्वर कहते हैं तो स्पष्टत: धर्म से उनका आशय सत्य की साधना के उपाय से हो जाता है।  वे संपूर्ण सृष्टि को सत्य अर्थात् ईश्वर और उसकी सेवा को ही ईश्वर की सेवा मानते हैं। इस तरह  मानवता की सेवा ही गांधी जी के लिए धर्म है,क्योंकि उसके माध्यम से वे सत्य को पा सकते हैं। “गांधी जी ने साफ़  शब्दों में कहा है कि ,”जो लोग यह कहते हैं कि धर्म का राजनीति से कोई वास्ता नहीं है,वे धर्म का अर्थ नहीं जानते। ”

गाँधी सब धर्मों से प्रभावित हैं।  इसलिए उनके राजनीतिक मूल्य मानवीय मूल्यों के पोषक मूल्य हैं। वे उनके दुरुपयोग  से भी भिज्ञ थे। ऋषि  हृदय बापू को पूर्वाभास था कि एक न एक दिन मंदिर-मस्ज़िद,गिरिजाघर और गुरुद्वारे में राजनीति और राजनीतिक  दलों के कार्यालयों और सभा स्थलों पर किसान,मज़दूर और मज़बूर के दर्द के बजाय अपने-अपने स्वार्थ के अनुसार धर्म की तकरीरें होंगी। शायद इसीलिए वे कहते थे,”धर्मों के भीतर जो धर्म है वह हिंदुस्तान से लुप्त हो रहा है। ” इसके दुष्परिणाम बापू  भलीभाँति जानते थे ।

प्रयोगधर्मिता भी उनका मानवीय मूल्य था। इसीलिए दुनियावी दृष्टि में यदि कहीं विफल नज़र आएँ तो आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। विज्ञान में भी सारे प्रयोग सफल नहीं होते। जो प्रयोग सफल होता है उसी पर सिद्धांत बनते हैं। इसीलिए बापू की किसी विफलता के पहले उनका यह विचार जानना बहुत ज़रूरी है कि उनका आखिरी कथन,विचार या प्रयोग ही अमल में लाया जाए । इस परिप्रेक्ष्य में यह कथन बहुत उपयोगी है कि ‘उनका जीवन ही उनका संदेश है। ‘

जो गांधी की विफलता का ढोल पीटते हैं और उसे  रेखांकित करते हुए यह बार-बार बताते हैं कि उन्होंने देश का सत्यानाश कर दिया, उन्हें  बापू को तोपों वाली सेना के सामने निडर खड़े भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के संदर्भ में समझना होगा।  उनको उनके ही समय और समाज के परिप्रेक्ष्य में देखने पर पता चलेगा कि वे(बापू) कितने कीमती थे,जिनके व्यक्तित्त्व का असर देश की सीमाओं को लाँघ सात समुद्र पार तक पहुँच गया था ।

नैतिकता और पवित्रता भी बापू के जीवन मूल्य थे। इसी से वे पूँजी के प्रवाह में प्रगतिगामी नैतिकता को प्रमुख स्थान देते हैं और ट्रस्टीशिप जैसे मूल्य को जोड़ कर उसके प्रवाह को गंगा की तरह पवित्र बनाना चाहते हैं।  बापू   को  समझने  वाले जानते  हैं  कि  वे निर्धन समाज के लिए उसी तरह बराबर चिंतित रहे जिस तरह से कोई भी पिता अपनी संतानों में सबसे अधिक निकटता अपनी कमजोर  संतान के प्रति   रखता है। वे भी इनके प्रति ऐसे ही चिंतित रहे जैसे बापू की चिंता के केंद्र में दुनिया भर के दुखी -दरिद्र रहे।  मारीशस और दक्षिण अफ्रीका के गिरटिया मज़दूरों और  शोषित लोगों के साथ तो वे प्रत्यक्ष रूप से भी खड़े रहे। उनकेअर्थ दर्शन के पीछे  यथार्थ की आँच में तपे प्रौढ़  और अनुभवी मुखिया का अर्थिक चिंतन था।  बापूअर्थशास्त्र की बुनियादी चिंताओं की  ओर ध्यान देने वाले राजनीतिज्ञ थे। प्लेटो के बाद बापू ही दुनिया के सबसे आध्यात्मिक राजनीतिक विचारक हैं।

मेरी राय में वे किसी देश की अर्थ व्यस्था को भी घर की तरह चलाने में विश्वास करने वाले एक सच्चे राष्ट्र पिता थे।   संसाधनों का आवंटन, आजीविका की रचना, वस्तुओं व सेवाओं का  उत्पादन व वितरण,उत्पादकों के साधनों के स्वामित्व की  प्रकृति और उनके न्यायोचित वितरण के पक्षधर राष्ट्रीय चिंतक थे।  गरीबी, ढांचागत संरचना,हिंसा और अन्याय  को लेकर गहरी चिंता उनके आर्थिक चिंतन का मूल थी।  गांधी के ‘दरिद्र नारायण की छवि हम सबको  इस  विश्वास से भी मुक्त करती है कि भौतिक वस्तु ही इंसानी अहमियत का वास्तविक पैमाना होती है और इसलिए इन्हें हासिल करना ही सबसे उपयोगी पुरुषार्थ है। ‘  गांधी ने ईश्वर को इसी दरिद्र का या दरिद्र को ईश्वर का और आगे चलकर सत्य को ही ईश्वर का स्वरूप देकर दरअसल ईश्वर की अवधारणा को उसकी मूल रूपांतरकारी और मुक्त करने वाली क्षमता लौटा दी।  बापू की दरिद्र नारायण की धारणा बहुत सार्थक है लेकिन वह संपन्न लोगों को नहीं भाई । इसी तरह ट्रस्टीशिप का विचार भी सबके लिए है। यह विचार पूंजी के संचयन व संग्रहण के खिलाफ नहीं बल्कि नैतिक अनिवार्यता के तौर पर पुनर्विचार तथा  न्याय का ख्याल रखना है।

प्रताड़ना का प्रतिकार उनका प्रगतिशील मानव मूल्य है। “गरीब को शरीर की हिंसा से बचाने का एकमात्र तरीका मानक व्यवहार अपनाने का है चाहे वह ईश्वर में व्याप्त हो, दरिद्र नारायण में या ईश्वर के किसी संदर्भ के बिना ट्रस्टीशिप में। ” बापू का यही स्वरूप हमें इस रूप में भी लुभाता है कि  राजनेता या आध्यात्मिक संत के रूप में वे भले अपूर्ण लगते हों पर  पिता के रूप में संपूर्ण थे।    वे ऐसे पिता थे जो अपने बच्चों का भौतिक  विकास तो चाहता है पर पूर्ण   नैतिकता के साथ। वह अपनी संतति को संपन्न तो बनाना चाहते थे लेकिन अपरिग्रह की भावना के साथ।  वह हमारे राष्ट्रपिता ही नहीं जगतपिता थे।  इसलिए उनका नैतिक धर्म था कि वह राष्ट्र और दुनिया को चरित्रवान बनाएँ  । नैतिक और अपरिग्रही बनाएँ ताकि दुनियाभर के सभी भाई-बहन समृद्ध और सुखी जीवन जी सकें। वह अपनी संतानों को अमीर के बजाय सही अर्थों में सुखी बनाना चाहते थे। शारीरिक या मानसिक रोगी बनाने के बजाय संपूर्ण रूप से स्वस्थ बनाना चाहते थे। इसी लिए बापू खानपान पर भी जगह-जगह विचार करते हुए मिलते हैं। उन्होंने स्वयं सालों तक शाकाहारी बनने के लिए संघर्ष किया । गाय तक का दूध  छोड़ा।  वह साबुत और कच्चे अनाज व  मूंगफली के दूध पर विश्वास करते थे। उपवास पर भी उनका अपूर्व विश्वास था। देश और दुनिया की सेवा के लिए उनका स्वस्थ रहना भी ज़रूरी था। इसीलिए अंततः उन्होंने बकरी के दूध को एक उत्तम और अन्यतम विकल्प के रूप में स्वीकार कर ही लिया।

बापू से पहले अध्यात्म प्रेरित राजनीतिक चिंतक विगत पांच हज़ार सालों में भगवान श्री कृष्ण के अलावा दूसरा कोई न हुआ। बहुत संभव है कि  पिछले इन सालों के  शुरुआती हज़ार-दो हज़ार साल इसी ऊहापोह में बीत गए हों कि कहीं महाभारत के सूत्रधार कृष्ण ही तो नहीं हैं।   संभव यह भी है कि गांधारी के द्वारा दिए गए  शाप को समाज इसीलिए स्वीकार करता  हो कि वह भी उन्हें महाभारत के महाविनाश का दोषी मानता रहा हो ।  हो तो यह भी  सकता है कि  गान्धारी कोई और नहीं स्वयं जनमानस हो और जिसने गांधारी की ओट ली हो।  बापू को भी समझने में हज़ार साल  तो लगेगा ही। इस अर्थ में आइंस्टीन का यह कहना भी गलत न होगा  कि,’हज़ार साल  बाद  लोग यह विश्वास  ही नहीं करेंगे कि धरती पर हांड़- मास का ऐसा पुतला जन्मा था। ‘ यह भी  असंभव नहीं कि हज़ार दो हज़ार साल बाद बापू को भी उसी तरह अवतार भी मान लिया जाए जैसे बुद्ध को मान लिया गया और यह अवतार सारी दुनिया का सर्वमान्य अवतार हो।

ब्रह्मचर्य उनका एक ऐसा जीवन मूल्य रहा जो सर्वाधिक विवादास्पद हुआ। कुछ विरोधियों को तो जैसे एक धारदार हथियार बापू ने खुद पकड़ा दिया। लेकिन उसे समझने के उसी कोटि के चरित्र की आवश्यकता है जो आधुनिक काल में बापू और ओशो के सिवा किसी के पास नहीं है। आधुनिक काल के ये दो महान प्रयोग धर्मी महापुरुष (बापू और ओशो)बहुतों से समझे ही नहीं गए। जिन्होंने थोड़ा -बहुत इन्हें समझा भी तो दूसरों को सही से समझा नहीं पाए । बापू ने  राजनीति के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग किए तो  ओशो ने अध्यात्म के क्षेत्र में और  ऐसे- ऐसे प्रयोग किए जो सामान्य जन के लिये अबूझ पहेली और जादू की तरह समझ व पकड़ से परे रहे। हम इन्हें क्यों नहीं समझ पाए इसका उत्तर भी बहुत सीधा-सा है कि चाहे अध्यात्म का क्षेत्र हो या फिर राजनीति का दोनों क्षेत्रों में हम पूर्ण ईमानदार कभी नहीं रहे। हमने सत्य और अहिंसा का पथ इस तरह अपनाया कि बाहर से कोतवाल और भीतर से चोर बने रहे। उनकी देह को तो केवल एक ने ही गोली मारी पर उनके विचारों को अनेक ने मारा ।  मारा ही नहीं बल्कि निशाना  साध-साध कर छलनी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इतना ही नहीं उनके सत्य,अहिंसा और असहयोग जैसे उपयोगी औजारों को उन्हीं के साथ जला भी दिया गया। उनके चरखे को उनके फूलों वाली हंडिया के साथ पीपल पर लटका दिया गया। यही कारण है कि गांधी जहां दुनिया भर की समझ में आ गए हम उनके बारे में  असमंजस में ही पड़े रहे ।

बापू को ठीक से समझने के लिए पहले हमें भी अपने बारे में गांधी की ही तरह ईमानदार होकर पीपल पर लटकी उनके फूलों(अस्थियों)की हांड़ी को हिम्मत से उतारना होगा।  चरित्र से पवित्र होना होगा अन्यथा उनके पवित्र फूल अपवित्र हो जाएँगे।  हमें भीतर से पूर्ण अहिंसक और सत्य का पक्षधर बनना होगा तब जाकर हम उन्हें समझने लायक बन सकेंगे। इतना सब होने में ही सौ-दो सौ साल लग जाएँगे। जो उन्हें केवल मुसलमानों का पक्षधर  मानते हैं उन्हें बिल्कुल समझ नहीं पाए। हिंदू-मुसलमानों के बीच वैमनस्य के संबंध में उनका विचलित रूप ऐसा लगता है जैसे कि  कोई पिता बँटवारे के बावज़ूद अपनी संतानों में असहमति का विवेक पैदा करके उन्हें प्रेम से रहना सिखाना चाहने के मूड में हो और ऐसा होते न पाकर झुंझला रहा हो।

आज का तथाकथित गांधीवाद की जुगाली करने वाला वर्ग अपने स्वार्थ से गांधी  पर लिख और बोल रहा है। वह वैसे ही भ्रमित है जैसे एक वासनांध युवा प्रेम के मर्म को समझने के लिए  फुटपाथ पर कोक शास्त्र की किताब खोज रहा हो।  हम गाँधी की तस्वीर लगाकर गाँधी छाप बटोर रहे हैं।  पता  नहीं किस भ्रम में जी रहे हैं। हम सामने वाले से उसकी मज़बूरी या छोटे से स्वार्थ के बदले उसका सारा ईमान गिरवीं रख ले रहे हैं। ऊपर से यह मानने-मनवाने का मुगालता भी रखते हैं कि वह हमें अपना ट्रस्टी समझे। बापू की ट्रस्टीशिप वह नहीं है जो हम समझ और कर रहे हैं। उनकी ट्रस्टीशिप का ट्रस्टी एक संपूर्ण पिता है।  उसमें त्याग ही त्याग है लाभ-लोभ का लेश भी नहीं।

बापू का एकांगी आकलन करने वाले  हम अपने आचरण को देखें तो पता चलेगा कि हम भी कुछ  वैसा ही कर  रहे  हैं  जैसे कोई डॉक्टर  शरीर का पोस्टमार्टम करके   उससे हत्यारे की मंशा जांचने की कोशिश कर रहा  हो । लेकिन ऐसा करते समय यह भूल जाते हैं कि शरीर के घाव भला हत्यारे की मंशा को कैसे और कितना बता पाएंगे।

शुद्धाचरण उनका बेशकीमती जीवन मूल्य है। उनको जानने-समझने के लिये हमें भी शुद्धाचरण अपनाना होगा। इसके लिए पहली शर्त ही यह है कि तन के बजाय मन को धोना होगा। लेकिन हम मन के बजाय तन धो रहे हैं। जीवन रस से हीन मुर्दे तनों में  कलम   लगा   रहे हैं।  गाँधी को जीने और उनपर सोचने-विचारने के पहले  हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि मुर्दों  के भीतर नहीं अपितु जीवितों में विचारों को जीवित करना होगा,जैसा बापू ने किया था। उन्होंने ज़िन्दा तनों में कलमें लगाई थीं मुर्दे तानों में नहीं। क्योंकि कलमें भी ज़िन्दा पेड़ में ही लगती हैं।

कहीं  हम ‘बापू – बापू’ का नाटक तो नहीं  खेल रहे हैं।  आखिर उन पर नाटक खेलने के लिए भी तो उनकी लुंगी और लाठी  के बजाय उनके चारित्र को भी जीना होगा। उनके विचारों में उन्हें साक्षात्  जीवित देखते हुए उनकी भावनाओं को समझना होगा।  हमें यह भी समझना होगा कि वह अहिंसा के कितने पक्षधर थे और  हम कितने हैं।    इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि  जहाँ एक ओर बापू को पूजा जा रहा है वहीं दूसरी ओर उनकी अहिंसा को खुलेआम गालियाँ  दी जा रही हैं।  लेकिन वे इस परिणाम को भी पहले से ही जानते थे पर इसकी परवाह उन्होंने कभी नहीं की । इसके लिए राज मोहन गांधी ठीक ही कहते हैं कि,” उन्हें विश्वास था कि उनके सत्याग्रह का लोग सम्मान करेंगे लेकिन एक दिन वही उन्हें नीचे धकेल देंगे। —अगर विभिन्न धर्मों  वाले  हमारे देश में आज बहुत से भारतीय खुले आम या गुप्त रूप से गांधी के समान अधिकारों,परस्पर सम्मान, और आपसी दोस्ती के विचारों को नापसंद करते हैं तो भारत और दुनिया भर में ऐसे लोग भी कम नहीं जो केवल इसी कारण उनसे प्यार भी करते हैं। ”

बापू की अहिंसा के कारण उन्हें असफल और भोला राजनेता कहा गया।  गोली का जवाब गोली से देने वालों के लिए उन्होंने साफ़ संदेश दे ही दिया था कि आँख के बदले आँख से सारी दुनिया अंधी हो जाएगी।  इसके बावजूद लोग उनसे जबरन हिंसक आंदोलन में समर्थन चाहते रहे।  इनकी निश्छलता के कारण कुछ पाश्चात्य चिंतकों ने भी इन्हें भोला अहिंसक कहा है।  मार्टिन बूबर जैसे तत्कालीन चर्चित  विचारक  का  भी मानना था  कि यदि बापू  जर्मनी में होते तो सत्याग्रह के पहले कदम पर ही  नाज़ियों ने  उन्हें मिटा दिया होता। लेकिन मेरा विश्वास है की बूबर का विश्वास गलत है। सही यह है कि जर्मनी का यह दुर्भाग्य है कि बापू जर्मनी में पैदा नहीं हुए। जिस ब्रिटिश सत्ता को बापू ने घुटने टिकवा दिये उसके भय से कायर हिटलर को आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ा। क्रूरता,विवशता और कायरता का पर्याय हिटलर बापू के सामने टिक ही नहीं पाता।

बापू हर देश और काल के लिए प्रासंगिक राजनीतिज्ञ ही नहीं सच्चे मार्गदर्शक महात्मा और पिता हैं।  अपने बापू को अगर सही अर्थों में याद करना है तो    उनके जीवन    मूल्यों को समझना होगा।  उनके  राजनीतिक विचारों के साथ-साथ धर्म संबंधी विचारों को  भी समझना होगा।

सच्ची मानवता के  निश्छल पुजारी और परमहंसी भावधारा वाले संत बापू को कोई सिरफिरा कहे या  सफल पाखंडी या फिर उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोगों को भी उनकी सनक कहे तो  कहता रहे। हम तो उनके  सबकी कुशल-क्षेम के साधक विश्व के सबसे बड़े व बहुजातीय राष्ट्र वाले लोकतंत्र के उस संपूर्ण  और नियामक पिता रूप के पुजारी हैं जो हमारे लिए आधी रोटी खाकर उठ जाता रहा हो।  अधनंगे बदन पर शीत ,ताप और बारिश सहते हुए निष्काम योगी -सा गाँव- गाँव,देश-देश भरमा हो।  अपनी गंभीर रूप से बीमार संतानों के भले के लिए अस्पताल-अस्पताल भटका हो।  कलश,गुंबद या मीनार में भेद किए बिना दर-दर माथा टेका हो ।  अपने बूढ़े शरीर का होश रखे बिना पागल जवानी के खूनी उन्माद का उपचार करने के लिए नंगे पाँवों हाँफते हुए   बिना रुके और थके भूखे-प्यासे बदहवास भागता रहा हो ।

©  डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

सूरत, गुजरात

इस आलेख में व्यक्त विचार साहित्यकार के व्यक्तिगत विचार हैं।

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – गांधी-150 (गांधी वादी मित्रों का आत्म चिंतन) ☆ श्री राकेश कुमार पालीवाल

श्री राकेश कुमार पालीवाल

(सुप्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक श्री राकेश कुमार पालीवाल जी  वर्तमान में  प्रधान मुख्या आयकर आयुक्त ( प्रिंसिपल  चीफ कमिश्नर) मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पद पर पदासीन हैं। गांधीवादी चिंतन के अतिरिक्त कई सुदूरवर्ती आदिवासी ग्रामों को आदर्श गांधीग्राम बनाने में आपका महत्वपूर्ण योगदान है। आपने कई पुस्तकें लिखी हैं जिनमें  ‘कस्तूरबा और गाँधी की चार्जशीट’ तथा ‘गांधी : जीवन और विचार’ प्रमुख हैं।

हम आदरणीय श्री राकेश कुमार पालीवाल जी की  फेसबुक वाल से  गांधीजी के जन्मोत्सव पर एक सार्थक  एवं विचारणीय कविता प्रस्तुत कर रहे हैं – गांधी – 150 (गांधी वादी मित्रों का आत्म चिंतन))

☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष ☆ 

☆ गांधी – 150 (गांधी वादी मित्रों का आत्म चिंतन)  ☆

 

बीत गया गांधी – एक सौ पचास भी

अब दो अक्तूबर दो हजार बीस में

दी जा रही है उसे अंतिम श्रद्धांजलि

 

इसकी शुरुआत में

गांधी वादी संस्थाओं ने

की थी बड़ी बड़ी घोषणाएं

मसलन एक सौ पचास गांवों को

बनाएंगे आदर्श गांधी गांव गांधी के सपनों के

और, और भी न जाने बनाई थी

कितनी भारी भरकम महत्वाकांक्षी योजनाएं

ठीक उसी तरह जैसे बनाते हैं बड़े बड़े घोषणापत्र

राजनीतिक दलों के बडबोले नेतागण

 

पदों की भूल भुलैया में

गांधी की संस्थाओं में जमे लोग

भूल गए हैं सहज सरल गांधी मार्ग

जिसमें कथनी करनी में अंतर नहीं होता

और कहने से पहले किए जाते हैं काम निस्वार्थ

 

गांधीवादी संस्थाओं के पदाधिकारियों को

अब इंतजार रहेगा गांधी एक सौ पचहत्तर का

तब तक बर्फ सा जमे रहना है गांधीवादी संस्थाओं में

भले ही शरीर साथ नहीं दे उम्र के नवें दशक में पहुंचकर

पद से गोंद सा चिपके रहना है हर हालत में हर मौसम में

 

गांधी एक सौ पचहत्तर में बनेंगी

और बड़ी योजनाएं गांधीवादी संस्थाओं में

भले ही उनका अंतिम हस्र भी

वैसा ही होगा जैसा हुआ है

गांधी एक सौ पच्चीस और एक सौ पचास में !

 

© श्री राकेश कुमार पालीवाल

भोपाल

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – गांधी लौट आया है ☆ श्री संजय भारद्वाज 

श्री संजय भारद्वाज 

गांधीजी को हमारी पीढ़ी ने देखा नहीं। अलबत्ता गांधी-दर्शन और सत्याग्रह का प्रत्यक्ष दर्शन अप्रैल 2011 में अण्णा हजारे के लोकपाल आंदोलन के दौरान हुआ। बाद में आंदोलन के फलित के रूप में राजनीतिक दल बनाने के एक समूह के निर्णय पर सहमति या असहमति हो सकती है। तथापि देश में अभूतपूर्व चेतना और लोकमानस में अण्णा हजारे के रूप में नये गांधी के दर्शन उस समय का सत्य है। 7 अप्रैल 2011 को लिखी इस रचना का पुणे में जुलूस में पोस्टर और बैनर के रूप में भी उपयोग हुआ। यह रचना उस समय बेहद चर्चित रही।

गांधी जयंती पर आँखों देखे गांधी दर्शन को शब्दबद्ध करने का प्रयास है यह कविता। साथ ही महात्मा गांधी को विनम्र श्रद्धांजलि भी।

☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष ☆

 ☆  गांधी लौट आया है ☆ 

आज पहली बार-

मंत्रालय के आगे

चाय के ठेले पर काम करता अधनंगा

सरकारी गाड़ी देखकर भी अनदेखी कर गया,

अंगूठाछाप मंत्री की अध्यक्षता वाली

शिक्षा सुधार समिति में

शामिल होने से प्राइमरी का शिक्षक मुकर गया,

मृतक का शरीर देने के लिए

रिश्वत मांगता अस्पताल का कर्मचारी

ज़िंदा आदमी से डर गया,

काग़ज़ पर वज़न रखने के खिलाफ

सरकारी दफ्तर के वज़नी बाबू से

अदना-सा आदमी लड़ गया,

सब्जी बेचनेवाली ने भी

पुलिसिया रंगरूट को

मुफ्त सब्जी देने से कर दिया इंकार,

फुटपाथ पर सोनेवाले ने

निर्वाचित गुंडे का

हफ्ता अदा करने को दिया नकार,

न 26 जनवरी, न 15 अगस्त,

झण्डा बेचनेवाले बच्चे का हाथ

झण्डे के आगे सैल्युट की मुद्रा में

खुद-ब-खुद तन गया,

लोक का सिर गर्व से उठा

तंत्र का बेढब बदन डगमग गया,

व्यवस्था सहमी-सहमी, भ्रष्टाचार आशंकित

हवाओं में परिवर्तन के सुभाषित,

कौन है इस बयार का जनक

निडर-निर्भीक चेहरों का सर्जक,

पुनर्जन्म का मिथक

यथार्थ बना जिसके तेज से,

मुनादी करा दो देश में-

गांधी लौट आया है

अन्ना के भेष में।

 

©  संजय भारद्वाज 

7 अप्रैल 2011

☆ संस्थापक- अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – हे बापू ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  की  एक  समसामयिककविता कैसा होने लगा अब संसद में व्यवहार? हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।  ) 

☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष ☆ 

☆ हे बापू ☆

 

हे सत्य अहिंसा आराधक गंभीर विचारक व्याख्याता

हे कर्मवीर कृषकाय वृति क्या ग्रह के सत्याग्रह के उद्गगाता

हे सबल आत्मविश्वासी निर्भय युगदृष्टा युग निर्माता

कर याद तुम्हारी बार-बार आंखें रोती मन भर आता

तुमने दी जग को नई दृष्टि मानव को एक जीवन दर्शन

तुम बने रहे सारे जीवन नई राजनीति के आकर्षण

तुमने की मानव से ममता , पर दुराचार का तिरस्कार

संयमी तपस्वी किया सदा तुमने संशोधन परिष्कार

एक आंधी सी बन आये तुम सारे जग को झकझोर गए

बापू तुम तो भारत ही क्या दुनिया का  रुख मोड़ गए

तुम थे भारत के प्राण तुम्हारी वाणी भारत की वाणी

तुमको पा भारत धन्य हुआ हे संत तत्वदर्शी ज्ञानी

कुछ समझ ना पाए लोग कि तुम थे मानव या अवतारी

जो भी थे पर यह तो सच है तुम हो पूजा के अधिकारी

तुम नवल शक्ति लेकर आए आजादी देकर चले गए

सब रहे देखते ठगे हुए मानो जादू से हों छले गए

तुम तो दे गए वरदान मगर हमने कि तुमसे नादानी

है अभी सीखना बहुत हमें हम जो अज्ञानी अभिमानी

है ऋणी तुम्हारी यह दुनिया जिसको तुमने पथ दिखलाया

जिसको थी ममता सिखलाई बन्धुत्व प्रेम था सिखलाया

करती है बापू याद तुम्हें हर रोज तुम्हारी वह वाणी

जो आग बुझाकर चंदन लेप  लगा जाती थी कल्याणी

हम क्षमा प्रार्थी अभिलाषी तव कृपा करो हे सिद्धकाम

हैं विनत तुम्हारे चरणों में शत-शत वंदन शत-शत प्रणाम

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 63 ☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  महात्मा गाँधी जी के जन्मदिवस पर “गांधी जी के संदर्भ  – दोहे । ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 63– साहित्य निकुंज ☆

☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष  – दोहे ☆

 

बलिदानों के बाद ही, आया नवल विहान।

तिमिर पाश को चीरकर, निकला हिंदुस्तान।

*

संत महात्मा आदमी, राजा रंक फकीर।

गांधी जी के रूप में, पाई एक नजीर।।

*

 आने वाली पीढ़ियाँ, भले करें संदेह ।

किंतु कभी यह देश था, गांधीजी का गेह ।

*

बापू, गांधी, महात्मा, जन के मुक्ति मुकाम।

मुक्ति मंत्र तुमने दिया, तुमको विनत प्रणाम।

*

देश कहाँ पर जा रहा, जाएगा किस ओर।

आशाओं के धनुष की, खींची हुई है डोर।

*

संकल्पों की साधना, कब होती आसान।

बलिवेदी पर देश की, करो समर्पित प्राण।

*

जय भारत जय हिंद का, गूंज रहा जयघोष

जय बोलो जय मातरम, मन में भरकर जोश।

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – 2 अक्टूबर ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे 

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं । सेवारत साहित्यकारों के साथ अक्सर यही होता है, मन लिखने का होता है और कार्य का दबाव सर चढ़ कर बोलता है।  सेवानिवृत्ति के बाद ऐसा लगता हैऔर यह होना भी चाहिए । सेवा में रह कर जिन क्षणों का उपयोग  स्वयं एवं अपने परिवार के लिए नहीं कर पाए उन्हें जी भर कर सेवानिवृत्ति के बाद करना चाहिए। आज प्रस्तुत है आपकी महात्मा गाँधी जयंती के अवसर पर एक कविता  “2 अक्टूबर ”। इस रचना में व्यक्त विचार साहित्यकार के व्यक्तिगत विचार हैं। )

श्री श्याम खापर्डे जी ने  इस कविता के माध्यम से लॉकडाउन की वर्तमान एवं सामाजिक व्याख्या की है जो विचारणीय है।) 

☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – कविता – 2 अक्टूबर  ☆ 

पिछले वर्ष–

2 अक्टूबर के दिन

नेताओं को राजघाट पर

सत्य, अहिंसा और देशप्रेम के प्रति

कसमे खाते देखकर

हमारे एक मित्र ने

हमारे सामने  कसम खाई

नैतिक मूल्यों के प्रति

अपनी वचन बद्धता दोहराई

कि, आज से हम

शुध्द, सात्विक जीवन जियेंगे

इस कलमुंही शराब को

कभी नहीं पीयेंगे

 

इस वर्ष–

जब 2 अक्टूबर को

वह रास्ते मे मिला

उसे देख हमारा हृदय

अंदर तक हिला

वह हाथ में बोतल लिए

घूम रहा था

शराब के नशे में

झूम रहा था

हमे देख वह रुका

अभिवादन के लिए झुका

बोला–

मै वाकई तुम्हारा गुनहगार हूं

कसम तोड़ने को लाचार हूं

 

मैने उन सभी नेताऔं को

साल भर,

हर पल,

उन कसमों को तोड़ते देखा है

असत्य, हिंसा और पाखंड से

इस देश को जोड़ते देखा है

इनके अंदर की इंसानियत

मर गई है

इनके शरीर में शैतान की आत्मा

भर गई है

ये  किसी दिन

अपने स्वार्थ के लिए

बापू के आदर्शो को बेच डालेंगे

 

मित्र ,

आज प्रातःकाल मैने राजघाट पर

उन्हीं नेताऔं को फूल चढ़ाते देखा है

फिर वही कसमें खाते देखा है

तब से मै बड़ी बेचैनी मे जी रहा हूं

यार,

मजबूरी मे कसम तोड़कर

शराब पी रहा हूं .

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

मो  9425592588

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – कुली लोकेशन की होली ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। आज प्रस्तुत है महात्मा गाँधी जी की जयंती पर एक संस्मरण “कुली लोकेशन की होली

☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – संस्मरण – कुली लोकेशन की होली  ☆

हिंदुस्तान में बड़ी से बड़ी सेवा करने वाले को भंगी की उपमा दिया जाता था और उन्हें गाँव के बाहर रखा जाता था। जिन्हें “देढवाडा” भी कहते थे। उन्हें बहुत नफरत की दृष्टि से देखा जाता था।

बात उन दिनों की है जब दक्षिण अफ्रीका के शहर में हिंदुस्तानियों को ‘देढ’ कहते थे। बाद में यही शब्द जोहानेसबर्ग में कुली के नाम से मशहूर हो गया।

1914 से 1917 के बीच महात्मा गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में वकालत का काम शुरू किए और उनका आना जाना होता था। भारतीयों को शहर से बाहर तिरस्कार कर उनको मालिकाना हक नहीं दिया जाता था और उसी कुली लोकेशन पर जहाँ साफ-सफाई बिल्कुल नहीं थी वहीँ  पर रहने दिया जाता था।

उस समय हिंदुस्तान से बहुयाता की संख्या में धन और धंधे के लिए लोग बाहर जाने लगे। और कुली लोकेशन पर भीड़ एकत्रित होने की वजह से महामारी फैल गई। गांधी जी ने स्वयं सभी लोगों को मिलकर, वहां की साफ-सफाई और व्यवस्था अपने हाथों में लेकर, उस जगह को स्वच्छ किया। गरीब हिंदुस्तानी चांदी और तांबे के सिक्के जमीन पर गढ़ा कर रखे थे। उस जगह को वह छोड़ना नहीं चाहते थे। गांधीजी ने उन्हें समझाया कि यह जगह अब दूषित हो चुकी है। मुझ पर विश्वास करो और इस जगह को खाली कर मैं आपको सुरक्षित जगह पर ले चलता हूं।

इधर अंग्रेज बैंक के कर्मचारी गांधी जी से मिलकर कहने लगे कि वह सिर्फ आपके ही हाथ से पैसे बैंक में जमा करेंगे। आँख मूंदकर गांधी जी पर अटूट विश्वास लोगों का था। और सब चीजों को सुरक्षित निकालकर गांधी जी सभी को दूसरी जगह व्यवस्थित कर अपने एकता और शक्ति का परिचय दिखा दिया।

अंग्रेजों ने सोचा था कि इसको पूरी तरह नष्ट करने के लिए इनको ही जला दिया जाए। गांधीजी तक यह बात पहुंची और गांधीजी उस जगह पर पहुंच गए। वहां पर जाकर गांधीजी सभी कुली वर्ग के लिए वकील बने। अपने सूझबूझ से 70 केस जीतकर सिर्फ एक केस हारे। शेष बाकी सब जीतकर गांधीजी ने एकता और शक्ति की मिसाल कायम की। जबकि अंग्रेज इसे जड़ से मिटाना चाहते थे।

अपने सूझबूझ के कारण चाहे धन रहे या ना रहे। परिश्रम और सूझबूझ से मानवता की सेवा करते गांधीजी ने महामारी से अपने लोगों को सुरक्षित बचा लिया।

2 अक्टूबर गांधी जी को समर्पित एकता और शक्ति की मिसाल पर उनका संस्मरण  पुस्तक – मेरे अनुभव – मोहनदास करमचंद गाँधी से उद्धृत।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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