हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ त्रिलोक ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ त्रिलोक

सुर,

असुर,

भूसुर,

एक मूल शब्द,

दो उपसर्ग,

मिलकर

तीन लोक रचते हैं,

सुर दिखने की चाह

असुर होने की राह,

भूसुर में

तीन लोक बसते हैं।

 

# सजग रहें, सतर्क रहें, स्वस्थ रहें।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(प्रातः 6:24 बजे, 25.5.19)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 23 ☆ बहानेबाजी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “बहानेबाजी ।  वास्तव में श्रीमती छाया सक्सेना जी की प्रत्येक रचना कोई न कोई सीख अवश्य देती है। इस समसामयिक सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 23 ☆

☆ बहानेबाजी  

बहाना बनाने का गुण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बड़ी कुशलता के साथ हस्तांतरित होता चला आ रहा । झूठ व मक्कारी दोनों ही  इसके परममित्र हैं । पर कोरोना ने इस पर भी वार कर इसे चारो खाने चित्त कर दिया है । अब आप सोच रहे होंगे कि ये भी भला कोई चिंतन का मुद्दा है , सो जाग जाइये साहब आज की सबसे बड़ी समस्या यही है । जो भी लोग  या कार्य हमें पसन्द नहीं आता था वहाँ हम बड़े चातुर्य के साथ सफेद झूठ बोल देते थे । पर अब क्या करेंगे….?

कोरोना के चलते एक  बड़ा नुकसान हुआ है कि अब पुराने झूठ नहीं चल पा रहे हैं । पहले अक्सर ही लोग कह देते थे , घर पर नहीं  हैं , अब तो सभी को घर पर ही रहना है। साहब कहाँ गए हैं ,इसका उत्तर भी सोच समझकर ही दिया जा सकता है क्योंकि बहुत से कन्टेनमेंट एरिया हैं जहाँ जाना प्रतिबंधित है ।

बच्चों की भी ऑन लाइन पढ़ाई शुरू हो चुकी है सो उन्हें भी अब समय पर उठना होगा । पहले तो पेटदर्द का बहाना चल जाता था पर अब कोई सुनवाई नहीं । नींद पूरी हो या न हो , तबियत ठीक हो या न हो पढ़ना तो पड़ेगा , ऐसा आदेश माताश्री ने पास कर दिया है ।

बस अब कोई बचा सकता है तो वो है नेटवर्क न मिलने का बहाना, पढ़ाई वाला नया एप ठीक से कार्य नहीं कर रहा या क्लास अटेंड कर फिर गोल मार देना । ये सब बहाने जोर -शोर से चल रहे हैं । मोबाइल या लैपटॉप तो हाथ में है ही,  बस जो जी आये देखिए । न कोई चुगली करेगा , न टीचर कॉपी चेक करेगी । बस मम्मी का ही डर है ,जो धड़धड़ाते हुए किसी भी समय चेकिंग करने आ धमकती हैं ।

इस समय एक समस्या और जोर पकड़ रही है कि पहले अक्सर ही बीबी से कह देता था कि आज ऑफिस में ज्यादा काम है देर से आऊँगा पर अब तो समय से पहले ही घर आना पड़ता है क्योंकि नियत समय के बाद कर्फ़्यू लग जाता है । पहले  दोस्तों के साथ गुलछर्रे उड़ाते रहो कोई रोकने -टोकने वाला नहीं था पर अब तो कोरोना के डर से वे भी कोई न कोई बहानेबाजी कर देते हैं ।

सदैव की तरह सिर दर्द है , मूड ठीक नहीं है , डिप्रेशन है, काम में मन नहीं लग रहा, ये बहाने आज भी उपयोगी बने हुए हैं । खैर वो कहते हैं न कि एक रास्ता बंद हो तो हजारों रास्ते खुलते हैं । इसलिए चिंता की कोई बात नहीं मनुष्य बहुत चिंतनशील प्राणी है ; अवश्य ही कोई न कोई नए झूठों का अविष्कार कर लेगा । कहा भी गया है आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है ।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 53 – सजा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा  “सजा  । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 53 ☆

☆ लघुकथा –  सजा  ☆

 

“तुम ने जहर क्यों खाया था ? जानते हो आत्महत्या करने वाले को सजा होती है?”

“नहीं साहब ! मैं बीवी को अच्छी जिंदगी नहीं दे पा रहा था. बच्चे अच्छे खाने को तरस रहे थे. ऊपर से साहूकार का कर्ज , प्रकृति की मार. सब फसल चौपट हो गई थी . मैं घबरा गया था साहब. क्या करता?”

“तो मरने चले?”

“हाँ साहब ! मैं उन्हें तड़फता हुआ नही देख सकता था.”

“अच्छा. अब दोनों तड़फ़ना. एक बाहर और एक अन्दर.”

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

१५/०५/२०१५

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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English Literature – Article – ☆ Struggle for Happiness ☆– Shri Divyanshu Shekhar

Shri Divyanshu Shekhar 

 

(Young author Shri Divyanshu Shekhar writes poems, stories, plays and scripts in Hindi and English. His first collection of poems  “Zindagi – ek chalchitra” was published in May 2017 and first English Novel “Too Close – Too Far” in December 2018. Today we present his article “Struggle for Happiness.)  

☆ Struggle for Happiness ☆

It was a beautiful Sunday morning.

It was drizzling outside. A man was sitting in his balcony with his cup of hot coffee and enjoying the weather.

Suddenly, he saw few people are working in front of a temporary house to make a strong base of a new building and his romantic thoughts and expressions started changing.

But why? And which kinds of emotions, he felt later? Scare or Happiness? Empathy or Proud? or anything else?

He felt empathy with them. He is also a migrant like them, who change places to earn money for their responsibilities. He lives in a well-structured and furnished flat with all the luxurious things and they are living in a temporary house where few bricks are removed from the wall for ventilation, no electricity, and without any modern facilities.

He felt surprised because he is an engineer but he never went in a workshop without proper safety measure but they are cutting steel bars without any precautions and even without any hesitation.

He felt happy in his flat because he has a fear of snakes but they are living in such an area where there are high chances of getting those reptiles. He follows a healthy diet for his good health but they eat what they get. He does exercises daily but they have no time for practicing Yoga and lifting weights during workouts. They just do physical work for the whole day as part of their job irrespective of weather.

He felt jealous because even without such luxury and relaxation, their sleep is deeper and their smiles are wider with whom he always struggles. They have better physical strength and brave heart.

Someone said correctly that “It is the great privilege of poverty to be happy and yet unenvied, to be healthy with physic, secure without a guard, and to obtain from the bounty of nature what the great and wealthy are compelled to procure by the help of art”.

He felt scared by keeping himself in their positions. It’s a bitter truth that we all have grown literally afraid to be poor. Even we despise anyone who elects to be poor in order to simplify and save his inner life and maintain peace. If he does not join the general scramble and pant with the money-making street, we deem him spiritless and lacking in ambition.

He knows all the facts and at last, he stood up and went inside his room. He felt thankful to God and proud of his parents because he knows his current situation and comfort in this tough world is a precious gift and outcome of their parents’ struggle, and he has to maintain this tradition.

 

© Divyanshu Shekhar

Kolkata (West Bengal)

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ बज़्म में ज़िक्र…. ☆ सुश्री भारती शर्मा

सुश्री भारती शर्मा

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री भारती शर्मा जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आप हिंदी साहित्य की गीत, ग़ज़ल, लघुकथाएँ विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। संक्षिप्त साहित्यिक यात्रा – प्रबंध सम्पादक : ‘अभिनव प्रयास’ (त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका)।  विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में गीत, ग़ज़ल, लघुकथाएँ प्रकाशित। दैनिक जागरण द्वारा लघुकथा प्रतियोगिता के अंतर्गत (613 प्रतिभागियों में से) लघुकथा संग्रह के प्रकाशनार्थ अलीगढ़ से चयनित ।आगरा आकाशवाणी से समय समय पर गीत, ग़ज़ल का नियमित  प्रसारण। आज प्रस्तुत है आपकी रचना “बज़्म में ज़िक्र….। “
☆ बज़्म में ज़िक्र…. ☆
सुर्ख़ आँखों में जब नमी देखी

बुझती-बुझती-सी रोशनी देखी

 

अश्क ढलके जो दो किनारों से

मैंने ख़्वाबों की खुदकुशी देखी

 

बज़्म में ज़िक्र आपका आया

फिर से ज़ख़्मों पे ताज़गी देखी

 

जाने क्यू उसने फेर ली नज़रें

कशमकश उसकी बेबसी देखी

 

बिन तेरे और क्या बताऊँ मैं

आग बरसाती चाँदनी देखी

 

देके आवाज़ छुप गये हो कहाँ

ये शरारत नयी-नयी देखी

 

सारी दुनिया में तू मिला मुझको

मैंने ख़ुद में तेरी कमी देखी

 

© भारती शर्मा

आगरा उत्तर प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 32 ☆ डोरी लगती गोली ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक सकारात्मक एवं भावप्रवण कविता  “डोरी लगती गोली.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 32 ☆

☆  डोरी लगती गोली ☆ 

 

उड़ी पतंगें देख गगन में

चिड़िया रानी  बोली।

नहीं सुहाए इनका उड़ना

डोरी लगती गोली।।

 

अनगिन साथी घायल होकर

प्राण गँवा देते हैं।

बढ़े प्रदूषण भू पर

झूठा सुख मानव लेते हैं।

 

अरे पतंगी तुम दुश्मन हो

हम जीवों के सारे।

तुम्हें एक दिन दण्ड मिलेगा

हम हैं ईश सहारे।

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 50 –एकांताची करतो सोबत…. ☆ सुजित शिवाजी कदम

सुजित शिवाजी कदम

(सुजित शिवाजी कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजित जी की कलम का जादू ही तो है! आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण कविता  “एकांताची करतो सोबत….”। आप प्रत्येक गुरुवार को श्री सुजित कदम जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं। ) 

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #50 ☆ 

☆ एकांताची करतो सोबत…. ☆ 

 

एकटाच रे नदीकाठी या वावरतो मी

प्रवाहात त्या माझे मी पण घालवतो मी

 

सोबत नाही तू तरीही जगतो जीवनी

तुझी कमी त्या नदीकिनारी आठवतो मी

 

हात घेऊनी हातात तुझा येईन म्हणतो

रित्याच हाती पुन्हा जीवना जागवतो मी

 

घेऊन येते नदी कोठूनी निर्मळ पाणी

गाळ मनीचा साफ करोनी लकाकतो मी.

 

एकांताची करतो सोबत पुन्हा नव्याने

कसे जगावे शांत प्रवाही सावरतो मी .

 

© सुजित शिवाजी कदम

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

दिनांक  16/2/2019

 

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (32) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय)

 

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।

सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ।।32।।

 

जैसे सब में व्याप्त है, सूक्ष्म रूप आकाश

वैसे ही सब देह में , है आत्मा का वास।।32।।

 

भावार्थ :  जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता।।32।।

 

As the  all-pervading  ether  is  not  tainted  because  of  its  subtlety,  so  the  Self  seated everywhere in the body, is not tainted.।।32।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 52 – तुमको भी कुछ सूत्र सिखा दें….☆ डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है इस सदी की त्रासदी को बयां करती  भावप्रवण रचना तुमको भी कुछ सूत्र सिखा दें….। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 52 ☆

☆ तुमको भी कुछ सूत्र सिखा दें…. ☆  

 

अपना यशोगान करना

पहचान हमारी

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।

 

थोड़े से गंभीर

मुस्कुराहट महीन सी

संबोधन में भ्रातृभाव

ज्यों नीति चीन की,

हो शतरंजी चाल

स्वयं राजा, खुद प्यादे

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

 

हो निशंक, अद्वैत भाव

मैं – मैं, उच्चारें

दिनकर बनें स्वयं

सब, शेष पराश्रित तारे,

फूकें मंत्र, गुरुत्व

भेद, शिष्यत्व लिखा दें

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

 

बुद्ध, प्रबुद्ध, शुद्धता के

हम हैं पैमाने

नतमस्तक सम्मान

कई, बैठे पैतानें,

सिरहाना,सदियों का सब

भवितव्य बता दे

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

 

हों विचार वैविध्य,साधते

सभी विधाएं

अध्ययन, चिंतन, मनन

व्यर्थ की, ये चिंताएं,

जो मन आये लिखें और

मंचों पर बाँचें

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

सुरेश तन्मय

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

12/06/2020

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 54 – पंढरीची वारी ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  एक भावप्रवण कविता  “पंढरीची वारी”।  यह कैसी विडम्बना है कि आज भक्त अपने हृदय में भक्तिभाव के रहते हुए भी प्रभु के दर्शन नहीं कर पा रहे हैं और प्रभु भी अपने भक्तों को दर्शन नहीं दे पा रहे हैं। आज सब के पैर महामारी के प्रकोप से बंधे हुए हैं । बरसों  पुरानी परंपरा थम सी गई है मानों प्रभु कह रहे हों आज पंढरपुर बंद है, अपने घरों में ही मुझे स्मरण करो। मैं स्वयं तुम्हारे घर पर ही दर्शन दूंगा। एक अप्रतिम रचना । सुश्री प्रभा जी द्वारा रचित  भक्तिभावपूर्ण रचना के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन ।  

मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 54 ☆

☆ पंढरीची वारी ☆ 

पंढरीच्या राया

नाही आता वारी

तूच ये सत्वरी

घरी माझ्या!

केली ज्यांनी वारी

सदोदित पायी

घेई हृदयाशी

देवा त्यांना

 एकदाच गेले

वारी मध्ये तुझ्या

 केली मनोमन

नित्य  पूजा

थकले पाऊल

अवेळीच माझे

नाही आले पुन्हा

तुझ्या भेटी

 आली महामारी

जगतात सा-या

पंढरीच्या फे-या

बंद आता

तूच माझी भक्ती

तूच माझी शक्ती

देई बळ फक्त

जगण्याचे

 सांग आता भक्ता

येऊ नको दूर

रे पंढरपूर

बंद आता

 हे लाॅकडाऊन

सर्वांनी पाळावे

घरीच रहावे

सुरक्षित

 पांडुरंग ध्यानी

पांडुरंग मनी

झाले मी हो जनी

अंतर्बाह्य

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

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