मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ उत्पलमय ही फुलवंती… ☆ रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

रेणुका धनंजय मार्डीकर

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? उत्पलमय ही फुलवंती… ? रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

(वृत्त : बालानंद, मात्रा : ८+६=१४)

पुष्करणीची जलवंती

उत्पलमय ही फुलवंती

*

सरोवराला मोहविती

सरितेची जडली प्रीती

भ्रमरासाठी रसवंती

उत्पलमय ही फुलवंती

*

रक्तिम निरज सजलेले

सुवर्ण पंकज रुजलेले

अंबुजातली मधुवंती

उत्पलमय ही फुलवंती

*

श्वेत साजरी सरोजिनी

वागेश्वरी वरदायिनी

जलाशयातील भ्रमंती

उत्पलमय ही फुलवंती

*

कलिकांनी उमलू आले

पर्णांवर मोती झाले

हरितांगी जणू लजवंती

उत्पलमय ही फुलवंती

 *

मेघ जणू सरसी आले

पंकज नील रंगी न्हाले

काय देखणी निलवंती

उत्पलमय ही फुलवंती

*
पावस ऋतूत आलेला

वसंत रंगी न्हालेला

राष्ट्र फुलाची श्रीमंती

उत्पलमय ही फुलवंती

*

कधी कधी वाटते मला

कवनच द्यावे कमळदला

सरगममय अन् स्वरवंती

उत्पलमय ही फुलवंती

© रेणुका धनंजय मार्डीकर

औसा.

मोबा. नं.  ८८५५९१७९१८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ फुलला असा बहावा… ☆ प्राची अभय जोशी ☆

प्राची अभय जोशी

 

?️? चित्रकाव्य ?️?

? फुलला असा बहावा… ? प्राची अभय जोशी ☆

हिरव्यागार गवतपातीच्या,

तनुवरील थेंब पाण्याचे 

मनाला मोहून टाकती हे,

सोनेरी कवडसे उन्हाचे

*

चिंब पडलेला पाऊस,

भिजवी या आठवणींना

अलवार रेशमी जाणीवांनी,

हळवे करीतसे मनाला

*

अशा वळीव सरींनी 

बरसणाऱ्या नभाचा

जणू क्षण पुरे एक प्रेमाचा,

देतसे नजरेतला दिलासा

*

गुंफलेले क्षण नाजूक,

मनावर करतात राज्य

जणू ते ही एकमेकास,

मोहरुनी देतात हास्य

*

जाणते हे आपुले नाते,

उलगडावे असे हळूवार

प्रेमळ क्षणांनीच ते,

जपावे मनी अलवार

*

पिवळा सुन्दर सोनेरी 

फुलला असा बहावा 

पाहता मनात नाचला 

मनमोर आठवणींचा 

*

आपुले निरपेक्ष प्रेम असे,

जसे की बहरला हा बहावा

मनांमध्ये आपुल्या आपण,

हा अव्यक्त अर्थ जपावा…

©  प्राची अभय जोशी

मो 9822065666 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३१७ – कविता – ☆ आओ ! कविता-कविता खेले… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता आओ ! कविता-कविता खेले” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३१७ 

☆ आओ ! कविता-कविता खेले… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

आओ ! कविता-कविता खेले

मन से या, फिर बेमन से ही

एक, दूसरे को हम झेलें।

गीत गजल नवगीत हाइकु

दोहे, कुण्डलिया, चौपाई

जनक छन्द, ताँका-बाँका

माहिया, शेर मुक्तक, रुचाई,

लय, यति-गति, मात्रा प्रवाह सँग

वर्ण गणों के कई झमेले।

छंदबद्ध कुछ, छंदहीन सी

मुक्तछंद को कुछ कविताएँ

समकालीन कलम के तेवर

समझे कुछ, कुछ समझ न पाएँ

आभासी दुनियां में, सभी गुरु हैं

नहीं कोई है चेले।

वाह-वाह, करते-करते अब

दिल से आह निकल जाती है

इसकी उधर, उधर से इसकी

कॉपी पेस्ट चली आती है,

रोज समूहों से, मोबाइल

सम्मानों के खोले थैले।

उन्मादी कवितायें, प्रेमगीत

कुछ हम भी सीख लिए हैं

मंचों पर पढ़ने के मन्तर

मन मंदिर में, टीप लिए हैं,

साथी कई और भी है

इस मेले में हम नहीं अकेले।

आओ !

कविता कविता खेलें।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३८ ☆ दुर्गा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “दुर्गा” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३८ ☆ दुर्गा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

शक्ति का अवतार दुर्गा

आस्था  का द्वार  दुर्गा ।

*

धरा की हैं सजग प्रहरी

सृष्टि का श्रृंगार दुर्गा ।

*

चैत्र की उज्ज्वल पताका

शरद की मनुहार दुर्गा ।

*

सुर असुर जन पूजते हैं

भक्ति का आधार दुर्गा ।

*

जगत जननी पतित पावन

माँ का निश्छल प्यार दुर्गा ।

*

चिर पुरातन चिर नवीना

ब्रम्ह का सुविचार दुर्गा ।

*

कृष्ण काली राम तारा

शिवोहम साकार दुर्गा ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मौन का अनुवाद ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मौन का अनुवाद ? ?

यह अनपढ़

वह कथित लिखी-पढ़ी,

यह निरक्षर

वह अक्षरों की समझवाली,

यह नीचे ज़मीन पर

वह बैठी कुर्सी पर

यह एक स्त्री

वह एक स्त्री,

इसकी आँखों से

शराबी पति से मिली पिटाई

नदिया-सी प्रवाहित होती,

उसकी आँखों में

‘एटिकेटेड’ पति की

अपमानास्पद झिड़की

बूँद-बूँद एकत्रित होती,

दोनों ने एक-दूसरे को देखा

संवेदना को

एक ही धरातल पर

अनुभव किया

बीज-सा पनपा मौन का अनुवाद

और अब उनके बीच वटवृक्ष-सा

फैला पड़ा था मुखर संवाद!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ शराफ़त का दस्तूर… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम रचना “शराफ़त का दस्तूर…

? शराफ़त का दस्तूर ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

भला मोहब्बत की ये कोई कौन सी रवायत है

पहली ही मुलाक़ात में मेरा दिल लूट के ले गए

 *

कम से कम कुछ  अदब-ओ-लिहाज़  तो  निभाते

शराफ़त से एक  बार हमसे  इजाज़त  तो  ले लेते

 *

निगाहों में ना जाने कैसा कातिलाना कहर था

वार  करने से  पहले  कम से कम बता तो देते

 *

हमें तूफान में यूँही बेसहारा छोड़ कर चले गए

इंसानियत का  कोई  एक दस्तूर तो निभा देते

 *

क़यामत में डूबते वक़्त हाथ नहीं बढ़ाया तो भी

कम से कम मुस्कुरा के  एक दिलासा तो दे देते

 *

हर बात में अब तो उनका ही ज़िक्र रहने लगा है

अमानत-ए-दिल, तो  कम  से  कम तो लौटा देते

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४३ ☆ वो जीना है नहीं जीना… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “वो जीना है नहीं जीना“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४३ ☆

✍ वो जीना है नहीं जीना… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

कभी तोला कभी माशा यही सबको बनाता है

समय हर एक की क़ीमत घटाता और बढ़ाता है

 *

समझ लीजे छुपाने में लगा है अपने ग़म सबसे

बिना ही बात जब इंसान कोई मुस्कराता है

 *

रहा जो मुनहसर है दूसरों पर  कामयाबी को

कुल्हाड़ी पाँव पर अपने ही हाथों से चलाता है

 *

ज़लालत से भरी इस ज़िंदगी से मौत है बहतर

किसी की नज़रों में कोई अगर इंसां गिराता है

 *

वो जीना है नहीं जीना जो केवल छाँव में पलता

है अच्छा वो जो हर मौसम में खिलता लहलहाता है

 *

समुंदर और झरने की नहीं तमसील है जायज़

किसी के तिशना लब की प्यास झरना ही बुझाता है

 *

बुरा जब वक़्त आये वो नहीं तब हाथ फैलाता

कमाई में से कुछ हिस्सा अगर अपनी बचाता है

 *

ख़ुदा उसकी इबादत पर तवज़्ज़ो दे नहीं कोई

अगर मजबूर मुफ़लिस को सताता और रुलाता है

 *

चुनावों में नहीं अब हार औ है जीत का मतलब

तबंगर वोट जनता के किसी तरहा चुराता है

 *

वही वंदा ख़ुदा का है वही है दीन  का हामी

गिराया वक़्त जिस इंसान को उसको उठाता है

 *

सनक हसरत बनी है जब मिली है कामयाबी तब

अगर रस्मन रही काविश न कुछ भी हाथ आता है

तुम्हें ये आप बीती इसलिए लगती तुम्हारी सी

अरुण जो दर्द जीवन ने दिए गीतों में गाता है

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “युगांतर” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – युगांतर..  ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

कुछ इस तरह

मुद्दतों बाद उसका

अचानक मिलना

यूँ के माज़ी की किताब के सारे सफ़ों का

फरफरा कर उड़कर पलट जाना

यादों की जमीं, ज़िद्दी गर्द का

तीखे तेवर दिखाना

फिर उस किताब को वापस बंद कर

यथार्थ के संसार में वापस लौट आना

उनींदी आंखों से अधूरे टूटे सपने को वापस जोड़

फिर से देखने की,नाकाम कोशिश करना

बीते काल के उस टीले के, शिखर को

मायूस आंखों से देखने,को छुपाना

जहां से नीचे उतर आया था, कभी

उम्मीदों के सारे अवशेष,वहीं छोड़कर

जहां से, मालूम था कि

टूटे तार,

 फिर कभी नहीं जुड़ते …!!!!!

 

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४८ – राय अपनी अपनी… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – राय अपनी अपनी।)

✍ राय अपनी अपनी… ☆ श्री हेमंत तारे  

दिल को दिल,

दिमाग को दिमाग रहने दो,

कुछ फैसले

दिल

तो कुछ

दिमाग से होने दो |

 

बेतुका है सवाल,

बेमानी है बहस,

कि सही फैसला करता है कौन,

दिल या कि दिमाग ?

अरे भाई,

दिल, दिल है,

और

दिमाग, दिमाग

न मानो, तो मेरे ठेंगे से

और हाँ,

तुम अपनी राय पर बने रहो,

मुझे अपनी पर रहने दो |

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५७ ☆ लघुकथा – चुस्कियाँ… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “चुस्कियाँ“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५७ ☆

✍ लघुकथा – चुस्कियाँ… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

सतीश और भीम लंबे अरसे के बाद मिले। दोनों ठेकेदार थे। पानी की लाइन डालना, सड़क बनाना और भी सरकार के निर्माण कार्य दोनों ही करते थे। संबंध मधुर थे पर व्यवसाय में कड़ा मुकाबला और गोपनीयता थी। कई बार सुरेश के ऊंची दर वाले टेंडर को अनुभव या किसी अन्य तकनीकी कारणों से स्वीकार नहीं किया जाता और कम दर होने पर भीम का टेंडर स्वीकार हो जाता।

लेकिन दोनों में से किसी ने कभी यह जिक्र नहीं किया कि ऐसा कैसे हो जाता है।  सतीश को अखरता तो टेंडर पास होते समय भीम की आंखें झुक जाती थी। हृदय में जो कुछ हो उसे आंखों से कोई समझले तो समझले पर शब्दों में नहीं आ पाता।

अब दोनों ही वृद्ध हो गए हैं और ठेकेदारी भी छोड़ चुके हैं।  दोनों चाय की चुस्कियाँ ले रहे हैं। न सतीश के चेहरे पर अखराव के भाव हैं और न ही भीम की आंखें झुकी हुई हैं।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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