हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१५ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

पैंगोंग झील

04 जुलाई 2022 को आज विश्व प्रसिद्ध पैंगोंग झील पहुँचने के लिए सात बजे हुंदर से निकलना पड़ा। ड्राइवर का कहना था कि दोपहर में ग्लेशियर का पानी पिघल कर रास्ते में तेज़ी से बहकर व्यवधान उत्पन्न करता है, इसलिए कई स्थानों पर सड़क टूट जाती है। सीमा सड़क संगठन के कर्मचारी उसे ठीक करते चलते हैं। सुबह चाय बिस्कुट लिया और नाश्ता पेक करवा कर रख लिया।

पैंगोंग झील की जुड़वा त्सो मोरीरी झील का जायज़ा भी लेना ठीक रहेगा। मोरीरी झील को पैंगोंग झील की जुड़वा बहन कहा जाता है, जो लद्दाख के चांगथंग क्षेत्र में स्थित है। इस झील की समुद्र तल से ऊंचाई 4522 मीटर (14,836 फीट) है, जिसकी वजह से यहां पर भी ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है और यही कारण है कि यहां पर पर्यटकों की ज्यादा भीड़ नहीं होती। इस झील की लंबाई 135 किमी. है जो भारत और चीन दोनों देशों में विस्तारित है। इस झील में भारत का हिस्सा 1/3 (45 किमी.) और चीन का हिस्सा 2/3 (90 किमी.) है। यह झील अपने रंगों को बदलने में माहिर है। इस झील का रंग सूर्य किरणों और उनके बर्फीले पहाड़ों पर प्रतिबिम्ब से नीला, लाल और कभी-कभी हरा भी दिखलाई पड़ता है। झील के रंग से आसपास का आभामंडल भी उसी रंग का बनता है।

इस झील के किनारे कई फिल्मों की शूटिंग हुई है, लेकिन 2009 में 3-इडियटस् फिल्म का शूटिंग होने के कारण यह झील काफी चर्चा में आई और अब आकर्षण का केंद्र बन चुकी है। झील के पानी का कहीं पर भी निकास न होने की वजह से इसका पानी खारा है और खारा होने के बावजूद भी सर्दियों में यह झील जम जाती है, उस समय इसके ऊपर बाइक और कार वगैरह को आसानी से चलाया जा सकता है।

हुंदर, डिसकिट, खालसर और अगम के बीच एक तरफ़ गगनचुंबी पहाड़ दूसरी तरफ़ पाँच सौ फुट से एक हज़ार फुट गहरी खाई के किनारे से ख़तरनाक रास्ता पर चलते जान मुँह को आती रही। सब चुप थे। ज़ुबान को जैसे लकवा मार गया हो। घबराहट से जान छुड़ाने के लिए फ़िल्मी गीत तेज आवाज़ में बजाए जाने लगे। उसके बाद रेतीले पिघलते पहाड़ों की शृंखला आरम्भ हुईं। सीमा सड़क संगठन ने श्योक नदी के बीच से रास्ता निकाला है। जिसमें बीच-बीच में कई धाराएँ निकली हैं। रास्ता अक्सर बंद रहता है। अगम में एक नाश्ते की दुकान पर हुंदर से लाया नाश्ता निपटा रहे थे तभी खबर मिली कि आगे रास्ता बंद है। रास्ता खुला लेकिन थोड़ी दूर चलने पर फिर रुकना पड़ा। सीमा सड़क संगठन के श्रमिक बिल्कुल स्याह पड़ चुके हैं। वे बहुत मुश्किल वातावरण में सड़कों की मरम्मत और रखरखाव करते हैं। भोपाल से साथ लाए मिठाई उन्हें खिलाई और उनके हालचाल पूछे। श्योक नदी के अंदर से रास्ता है। जो ठंड के दिनों में बर्फ़ से भर जाता है। 

क्ति नामक गाँव से एक रास्ता लेह जाता है। हमने श्योक जाने वाला रास्ता पकड़ा। पूरा रास्ता श्योक नदी के बीच से होकर है। एक तरफ़ नदी का पाठ है और दूसरी तरफ़ से रास्ता। कभी भी कहीं से ग्लेशियर का पानी तेज़ी से आ सकता है। पेट्रोलिंग पुलिसकर्मी गाड़ियों को निकालने में सहायता करते हैं। अभी एक जगह बहुत देर से फँसे हैं। बाईकर्स निकलते जा रहे हैं। दुनिया के अत्यंत दुरूह रास्ता पर यात्रा करना रोमांचक है। पैंगांग पहुँचना है, कब पहुँचेंगे, कैसे पहुँचेंगे, कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता। साहस और धैर्य की परीक्षा का समय है। कुछ लोग उत्तेजित हैं तो कुछ बोरियत ढ़ो रहे हैं। साथ रखा पानी पेशाब बनकर ख़त्म होता जा रहा है। अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। हृदय गति बेचैनी का मापक यंत्र साथ है। हृदय गति बढ़ती जा रही है। मापी तो 72-75 रहने वाली हृदय गति 96-98 आ रही है। बैठे-बैठे घुटने पथराने लगे हैं। हालाँकि आक्सीजन का स्तर 97-98 है। जितने भी फ़िल्मी गीत थे सब तीन बार सुन चुके हैं। अभी पता चला है कि आगे बड़े ग्लेशियर से पानी एकदम आने लगा है। पता नहीं ग्लेशियर महोदय की कृपा कब होगी। कब पानी पिघलना रोकेंगे और रास्ता खुलेगा।

आजकल युवा जोड़े बाईक पर खूब आने लगे हैं। युवकों में साहसिक रोमांचक यात्रा का रुझान बढ़ा है। तीन-चार सौ गाड़ियों का जाम लग चुका है। बाईकर सबसे आगे पहुँच गए हैं। पानी रुकने पर वे पहले निकलेंगे बाद में गाड़ियाँ। हमारे साथी श्योक नदी के पानी को छूने चले गये, तभी रास्ता खुल गया। भागकर आये। साँसें फूल गयीं। दो साथी आगे निकल गये। उन्हें आगे से बिठाना था। एक पर्वत से पानी की मोटी धार रास्ते पर  बह रही थी। गाड़ियाँ एक-एक करके निकालना जोखिम भरा काम था। दो घंटे फँसे रहे। हरेक गाड़ी के निकालने पर लगता था कि यह तो फँस जाएगी या पानी के बहाव में बह जाएगी। एक जेसीबी बीच-बीच में पत्थरों को पानी में डालकर पूरते जाती थी। फिर तीन-चार गाड़ियों को निकालते थे। सौम्या बिटिया और कैलाश भाई गाड़ी से उतर कर नजारा देखने चले गये। वे उस स्थान पर पहुँचे जहां गाड़ियाँ फँस रही थीं। उनके पैर बर्फीले पानी में जमने लगे। उन्होंने पानी के बहाव में फँसती गाड़ियों को धक्का लगाना शुरू किया। कई लोग उनकी फ़ोटो लेकर फ़ेस्बुक और व्हॉटसएप पर डालने लगे। उन्होंने पंद्रह-बीस गाड़ियाँ निकालीं। जब हमारी गाड़ी पहुँची तो दूर खड़े होकर इंतज़ार कर रहे थे। हमारा ड्राइवर होशियार था। उसने रास्ते का निरीक्षण कर एक झटके में गाड़ी निकाल ली।

श्योक से दुर्बक का रास्ता भी बहुत दुस्साहसिक और जोखिम भरा था। एक तरफ़ एक हज़ार से फुट अधिक ऊँचे पहाड़ और दूसरी तरफ़ दो हज़ार फुट गहरी खाई में बहती श्योक नदी, बीच में पहाड़ों से झरनों के रूप में उतरता ग्लेशियर का बर्फीला पानी। ड्राइवर ख़तरनाक तरीक़े से तेज गाड़ी चला रहा था। उसे टोंकने पर बोला- आप चुप रहो, हमारा भरोसा करो। हमने कहा- आपका भरोसा तो है लेकिन मशीन का क्या भरोसा कब दगा दे जाये। संभल कर चलो। पत्थरों में से गाड़ी निकालने पर क्या मालूम नीचे से कोई बुश वग़ैरह कट गया हो। उसे बात समझ आई। थोड़ी देर ठीक चला और फिर अपनी पर आ गया। बंदर पलटी खाना कभी नहीं छोड़ता। दुर्बक में लंच लिया।     

पैंगोंग त्सो विवादित क्षेत्र है। उसके बिल्कुल नज़दीक से गुज़रे। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से लगभग 20 किमी पूर्व में झील का एक हिस्सा चीन द्वारा नियंत्रित है लेकिन भारत द्वारा उसका दावा किया जाता है। झील का पूर्वी छोर तिब्बत में है। 19वीं सदी के मध्य के बाद, पैंगोंग त्सो जॉनसन लाइन के दक्षिणी छोर पर था, जो अक्साई चिन क्षेत्र में भारत और चीन के बीच सीमांकन का एक प्रारंभिक प्रयास था। खुर्नक किला झील के उत्तरी किनारे पर पैंगोंग त्सो के लगभग आधे रास्ते पर स्थित है। तिब्बत अधिग्रहण के समय अर्थात् 1958 से खुर्नक किला क्षेत्र पर चीनियों का नियंत्रण है। दक्षिण में छोटी स्पंगगुर त्सो झील है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC)  झील से होकर गुजरती है। यह क्षेत्र एलएसी के साथ एक संवेदनशील सीमा बिंदु बना हुआ है। इस क्षेत्र में चीनी पक्ष से घुसपैठ आम बात है। 20 अक्टूबर 1962 को, पैंगोंग त्सो ने चीन-भारतीय युद्ध के दौरान सैन्य कार्रवाई देखी, जिसमें चीन ने भारतीय ज़मीन का एक बड़ा टुकड़ा दबा लिया था। चूसुल की प्रसिद्ध लड़ाई पर चेतन आनंद ने हक़ीक़त फ़िल्म बनाई थी। जिसके प्रसिद्ध गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी” सुनकर तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की आँखों में आँसू आ गए थे।

चीन का राष्ट्रीय राजमार्ग 219 पैंगोंग त्सो के पूर्वी छोर से गुजरता है। झील तक रुतोग से 12 किमी या शिकान्हे से 130 किमी की दूरी पर गाड़ी चलाकर पहुँचा जा सकता है। उसके बाद चीनी सीमा लग जाती है। पर्यटक झील पर एक नाव किराए पर ले सकते हैं, लेकिन पक्षियों के प्रजनन स्थल की रक्षा के लिए द्वीपों पर उतरने की अनुमति नहीं है। किनारे पर कई रेस्तरां हैं।

पैंगोंग झील का मज़ा यहाँ तक पहुँचने की रोमांचक यात्रा में है, तकलीफ़ में है, भूख-प्यास की तड़फ में है। यहाँ पहुँच कर विशाल झील में लहराता नीला पानी और उसके चारों तरफ़ सूखे पहाड़ों पर धूप और बादलों की आवारगी देख मन प्रफुल्लित हो गया है। 

झील के परे जो पहाड़ दिखते हैं वे चीन की सीमा में हैं। अगस्त 2017 में, पैंगोंग त्सो के पास भारतीय और चीनी सेना में हाथापाई हुई थी जिसमें लात मारना, मुक्का मारना, पत्थर फेंकना और लाठी और छड़ जैसे परम्परा गत हथियारों का उपयोग शामिल था। 11 सितंबर 2019 को, चीनी सैनिकों ने उत्तरी तट पर भारतीय सैनिकों का सामना किया। 5-6 मई 2020 को, झील के पास लगभग 250 भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना हुआ, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षों के सैनिक हताहत हुए।

भारत की ओर की झील की यात्रा के लिए एक इनर लाइन परमिट की आवश्यकता होती है क्योंकि यह चीन-भारतीय वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित है। सुरक्षा कारणों से भारत नौका विहार की अनुमति नहीं देता है। एक मान्यता प्राप्त गाइड के साथ समूहों की अनुमति है। टांगसे, लुकूँग होते हुए शाम को पाँच बजे आख़िर पैंगोंग झील पर पहुँच गये। झील के उस पार चीन की सीमा में बीच के पहाड़ों पर एक टुकड़ा धूप चमक रही थी। आजुबाजु के पहाड़ों पर स्याह बादलों की कालिमा छाई थी। पहले पी-3 टेंट हाऊस में सामान रखा। लेकिन उसके पहले एक झंझट से निपटना पड़ा। जब हमने मैनेजर को टेंट आवंटन का पत्र दिया तो वह बोला कि उसके पास हमारे आवंटन की कोई सूचना नहीं है। हमने भुगतान नहीं किया होगा। हमने तब तक सामान उतार लिया था। सामान सहित उस पर चढ़ाई कर दी। उसके मालिक से बात कराने को कहा। वे तीन चार लोग मिलकर सलाह करने लगे। हमने ज़ोर से डाँटा तो उन्होंने तुरंत दो टेंट दे दिए। यह खेल बाद में समझ आया कि वे हमें तनाव में रखकर किराया वसूलना चाह रहे थे। उनका मालिक हमारी बुकिंग का भुगतान सीधे टूर ऑपरेटर से प्राप्त कर चुका था। हमारा भुगतान उनकी ऊपरी कमाई होती। बढ़िया चाय पी। पहली फ़ुरसत में पैंगोंग झील किनारे पहुँचे। भारतीय समाज पर फ़िल्मों का इतना प्रभाव है। इसे यहाँ पहुँच कर समझा जा सकता है। 3-इडियटस् फ़िल्म ने इस स्थान को प्रसिद्धि दिलाई है। उसका यहाँ कारोबारी उपयोग होने लगा है। करीना कपूर टाइप पीले रंग की स्कूटर पर बैठकर फ़ोटो खिंचवाने का मूल्य एक सौ, तीन कुर्सियों का किराया तीन सौ रुपया लिया जाता है। 

कैम्प में पी-3 के मैनेजर को टेंट में तीसरा बिस्तर लगाने को बुलाया। उसका नाम अजित है। वह झारखंड से नौकरी करने जान जोखिम में डालकर इतनी दूर आया है। उसकी मासिक तनख़्वाह 15,000/-  माहवार है। यहाँ का पर्यटक मौसम मई से सितम्बर कुल 5 महीने रहता है। वह पूरी टीम के साथ मई में यहाँ आया है। खाना पीना यहीं से मिलता है। मासिक तनख़्वाह टेंट के मालिक उसके खाते में जमा कर देते हैं। उसके परिवार के लोग झारखंड में बैंक एटीएम से निकाल लेते हैं। इस प्रकार सीज़न में 75,000/- उसे मिल जाते हैं। उसने बताया ऊपरी कमाई से सीज़न में दो लाख अलग से ले जाते हैं। जिसमें गेस्ट की टिप्स और टेंट के मालिक की जानकारी के बग़ैर किराए से आमदनी शामिल है। मालिक लेह के राजनीतिक वर्चस्व वाले लोग हैं। इतनी दूर रोज़ आ नहीं सकते। वे बुकिंग के हिसाब से भुगतान सीधे प्राप्त करते हैं। भूले भटके पर्यटकों को टेंट उपलब्ध कराकर मैनेजर ऊपरी कमाई कर लेते हैं। सितम्बर में पेंगोंग झील पूरी तरह जमना शुरू होती है तो तापमान -40 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है।

पेंगोंग में साल के बारह महीने भारी मात्रा में सैनिक मौजूदगी रहती है। 1962 से 2020 तक भारतीय और चीनी सैनिकों में भिड़ंत होती रही है। चीन के साथ यह अत्यंत संवेदन शील इलाक़ा है। विषम परिस्थितियों में भी सैनिक मोर्चा नहीं छोड़ते हैं। राष्ट्राध्यक्ष को जब भी किसी स्थानीय कारण से जनता का ध्यान भटकाना होता है तब उनके एक इशारे पर सैनिक मुठभेड़ होती रहती हैं। 

बताया जाता है कि 1962 के युद्ध के दौरान यही वो जगह थी, जहां से चीन ने अपना मुख्य आक्रमण शुरू किया था। भारतीय सेना ने भी चुशूल घाटी के दक्षिण-पूर्वी छोर के पहाड़ी दर्रे रेजांग ला से वीरतापूर्वक युद्ध लड़ा था। पिछले कुछ सालों में चीन ने पैंगोंग झील के अपनी ओर के किनारों पर सड़कों का निर्माण भी किया है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह झील यक्ष राज कुबेर का मुख्य स्थान है। माना जाता है कि भगवान कुबेर की ‘दिव्य नगरी’ इसी झील के आसपास कहीं स्थित है। इसका उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, ये तो शायद ही कोई बता पाए। 

आधिकारिक तौर पर, मैकमोहन रेखा भारत और चीन के बीच की सीमा को परिभाषित करती है। यह ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा भारत और फिर तिब्बत के बीच एक समझौते के रूप में खिंची गई थी। चीन हमेशा सीमा समझौते पर आपत्ति जताता है क्योंकि उसका दावा है कि यह समझौता झूठा है क्योंकि चीन इसका हिस्सा नहीं था बल्कि तिब्बत था।

पेंगोंग से चूसुल 30 किलोमीटर और मिराक 45 किलोमीटर चीन सीमा पर अंतिम गाँव है। सुबह सेना के दो हेलिकोप्टर पेट्रोलिंग पर जाते दिखे। एक सेनानी ने बताया कि ऑफ़िसर कमांडिंग चूसुल पोईंट पर चाय-नाश्ता की मेज़ पर

तुरतुक

भारत-पाकिस्तान सीमा पर तुरतुक गाँव है। सरहदें अच्छी भी होती हैं और खराब भी। अच्छी इसलिए की सरहदें किसी मुल्क को उसके वजूद का अहसास दिलाती हैं। खराब इसलिए कि ये लोगों को एक दूसरे से जुदा कर देती हैं। सरहदें बनने का दर्द भारत से बेहतर और कौन जान सकता है। सरहद ने एक ही मुल्क के लोगों को एक दूसरे के लिए बेगाना बना दिया। जहां बंटवारे की लाइन खींची गई, वहां के आधे लोग एक तरफ और आधे लोग दूसरी तरफ के हो गए।

बंटवारे की इस लड़ाई में सरहद के पास ऐसे बहुत से इलाके थे जिन पर दोनों मुल्क अपना दावा ठोंक रहे थे। ऐसे ही इलाकों में से एक था जम्मू-कश्मीर के बाल्टिस्तान इलाके का तुरतुक गांव। बंटवारे के वक्त ये पाकिस्तान में था। चूंकि ये गांव दोनों मुल्कों की सरहदों के बीच स्थित था, लिहाजा यहां बाहरी लोगों के आने पर पाबंदी थी। यहां के लोग बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे हुए थे। 1971 की लड़ाई में जब पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी, तो तुरतुक भी उसके हाथ से निकल कर भारत में शामिल हो गया। तुरतुक गाँव गांव में हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध तीनों धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। यह गांव श्योक नदी के तट पर स्थित है, जहां जाने के बाद आपको काफी सुंदर और बेहतरीन नजारा देखने को मिलेगा।

 यह भारत द्वारा 1971 ई० में पाकिस्तान से छीना गया गांव है, जो वर्तमान समय में भारत का एक हिस्सा बन चुका है। यह गांव चारों ओर से पहाड़ों से घिरे होने के साथ-साथ श्योक नदी के तट पर बसा हुआ है, जहां जाने के बाद एक अलग ही दुनिया का एहसास होता है। वर्तमान समय में यह गांव लद्दाख का काफी बड़ा आकर्षण का केंद्र बन चुका है, जिसे देखने के लिए हर साल देश के अलग-अलग क्षेत्रों से सैलानी यहां आते हैं।

 05 जुलाई 2022 को सुबह पाँच बजे नींद खुली तो पेंगोंग झील देखने चले गए। ग़ज़ब का प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा हुआ था। सूर्य रश्मियों का हिमशिखरों पर रंगीन नृत्य और उनका झील पर सतरंगी प्रतिबिम्ब आभा देखते बनती थी। आठ बजे पेंगोंग से रवाना हुए। हमें अब पुनः श्योक नदी के और भी ख़तरनाक दर्रों से गुजरते हुए सिंधु की सहायक नदियों के काँठे में पहुँचना है।   

लद्दाखी हिमालय सिंधु की सहायक नदियों के साथ, भारत का पंजाब क्षेत्र बनाता है, जबकि नदी का निचला भाग पाकिस्तान के दक्षिणी सिंध प्रांत में एक बड़े डेल्टा में समाप्त होता है। सिंधु नदी ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र की कई संस्कृतियों का मिलन स्थल रही है। तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में सिंधु घाटी सभ्यता का उदय हुआ, जो कांस्य युग की एक प्रमुख शहरी सभ्यता थी। दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान पंजाब क्षेत्र का उल्लेख ऋग्वेद की ऋचाओं में सप्त सिंधु और अवेस्ता धार्मिक ग्रंथों में सप्त हिंदू (दोनों शब्दों का अर्थ “सात नदियों”) के रूप में किया गया है। सिंधु घाटी में उत्पन्न होने वाले प्रारंभिक ऐतिहासिक साम्राज्यों में गांधार और सौवीर के रोर वंश शामिल रहे हैं। सिंधु नदी पश्चिमी दुनिया के ज्ञान में शास्त्रीय काल की शुरुआत में आई, जब फारस के राजा डेरियस ने नदी का पता लगाने के लिए 515 ई.पू. में अपने ग्रीक दरबारी स्काइलैक्स ऑफ कैरींडा को भेजा।  

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख शहर, जैसे हड़प्पा और मोहनजो-दारो, लगभग 3300 ईसा पूर्व के हैं। प्राचीन दुनिया के कुछ सबसे बड़े मानव आवासों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता पूर्वोत्तर अफगानिस्तान से पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत तक फैली हुई थी। झेलम नदी के पूर्व से ऊपरी सतलुज पर रोपड़ तक ऊपर की ओर पहुंचती है। तटीय बस्तियाँ पाकिस्तान, ईरान सीमा पर सुतकागन डोर से लेकर भारत के आधुनिक गुजरात कच्छ तक फैली हुई हैं। उत्तरी अफगानिस्तान में शॉर्टुघई में अमु दरिया पर एक सिंधु स्थल है, और हिंडन नदी पर सिंधु स्थल आलमगीरपुर दिल्ली से केवल 28 किमी की दूरी पर स्थित है। आज तक, 1,052 से अधिक शहर और बस्तियां मुख्य रूप से घग्गर-हाकरा नदी और उसकी सहायक नदियों के सामान्य क्षेत्र में पाई गई हैं। बस्तियों में हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो के प्रमुख शहरी केंद्र, साथ ही लोथल, धोलावीरा, गनेरीवाला और राखीगढ़ी थे। सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर 40 सिंधु घाटी स्थलों की खोज की गई है। हालांकि, सिंधु लिपि की मुहरों और उत्कीर्ण वस्तुओं की खोज की गई वे अधिकांश सिंधु नदी के किनारे पर पाए गए थे।

“इंडिया” शब्द सिंधु (Indus) नदी से लिया गया है। प्राचीन काल में, “भारत” शुरू में सिंधु के पूर्वी तट के साथ उन क्षेत्रों को संदर्भित करता था, लेकिन 300 ईसा पूर्व तक, हेरोडोटस और मेगस्थनीज सहित ग्रीक लेखक पूरे उपमहाद्वीप में इस शब्द का उपयोग कर रहे थे जो पूर्व की ओर बहुत आगे तक फैला हुआ है। सिंधु का निचला बेसिन ईरानी पठार और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच एक प्राकृतिक सीमा बनाता है। यह क्षेत्र पाकिस्तानी प्रांतों बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब और सिंध और अफगानिस्तान और भारत के देशों को शामिल करता है। डेरियस द ग्रेट (दारा) के शासनकाल के दौरान सिंधु घाटी पर कब्जा करने वाला पहला पश्चिम यूरेशियन साम्राज्य फारसी साम्राज्य था। उनके शासनकाल के दौरान, कर्यंदा के यूनानी खोजकर्ता स्काइलैक्स को सिंधु के मार्ग का पता लगाने के लिए नियुक्त किया गया था। इसे सिकंदर की हमलावर सेनाओं ने पार कर लिया था, लेकिन उसके मैसेडोनिया के लोगों द्वारा पश्चिमी तट पर विजय प्राप्त करने के बाद – इसे हेलेनिक दुनिया में शामिल करने के बाद, सिकंदर ने एशियाई अभियान को समाप्त करते हुए नदी के दक्षिणी मार्ग के साथ पीछे हटने का चुनाव किया। सिकंदर के एडमिरल नियरचस सिंधु डेल्टा से फारस की खाड़ी का पता लगाने के लिए टाइग्रिस (दजला-फ़रात) नदी तक पहुंचने के लिए निकल पड़े। सिंधु घाटी पर बाद में मौर्य और कुषाण साम्राज्यों, इंडो-ग्रीक साम्राज्यों, इंडो-सीथियन और हेप्टालाइट्स का प्रभुत्व था। कई शताब्दियों में मुहम्मद बिन कासिम, गजनी के महमूद, मोहम्मद गोरी, तैमूरलंग और बाबर की मुस्लिम सेनाओं ने सिंध और पंजाब पर आक्रमण करने के लिए नदी पार की, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप का प्रवेश द्वार उपलब्ध हुआ।

आप सोचते होंगे कि यह सब जानकारी कहाँ से लाते हैं। राहुल सांस्कृत्यायन तीन बार तीन तरफ़ से तिब्बत यात्रा पर गए थे। उन्होंने “मेरी लद्दाख़ यात्रा” और “मेरी तिब्बत यात्रा” में इस क्षेत्र का विशद विवेचन किया है। प्रत्येक घुमंतू को उनकी “अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा” और “घुमक्कड़ शास्त्र” ज़रूर पढ़ना चाहिए। इसके अतिरिक्त हेनरिख हेरर की किताब “मेरे तिब्बत में सात साल” दलाई लामा के तिब्बत से पलायन के पहले के सात सालों का जीवंत वृतांत भी पठनीय है। 

बहुत ज्ञान बघार लिया। अब दर्रों पर आते हैं। श्योक नदी काराकोरम दर्रे के पास से निकलती है। श्योक और नुब्रा नदियों की घाटी वाले क्षेत्र को नुब्रा के नाम से जाना जाता है। नुब्रा-सियाचिन घाटी में बड़े पैमाने पर अप्सरास समूह, रिमो समूह, और तेराम कांगरी समूह शामिल हैं। इस प्रकार हमने इन सभी गगनचुंबी शिखरों से सटे दर्रों को श्योक से सिंधु काँठे में पहुँचने हेतु पार किया।

पूर्वी और मध्य हिमालय अर्थात् सिक्किम, भूटान, नेपाल उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश मानसूनी बादलों को रोक कर ख़ाली कर देते हैं। वृष्टिछाया के कारण भारतीय मानसून के नमी भरे बादलों का प्रवेश लद्दाख़ में नहीं होता है। यहाँ सितम्बर से जनवरी तक भारी हिमपात होता है। इस प्रकार लद्दाख एक उच्च ऊंचाई वाला वनस्पति विहीन बियाबान है। पानी का मुख्य स्रोत पहाड़ों पर शीतकालीन हिमपात है। हिमालय के उत्तरी किनारे के क्षेत्र- द्रास, सुरू घाटी और ज़ांस्कर- में भारी हिमपात होता है और वर्ष में कई महीनों तक देश के बाकी हिस्सों से लगभग कट जाता है। ग्रीष्मकाल छोटा होता है, हालांकि फसल उगाने के लिए काफी लंबा होता है। वनस्पति की कमी के कारण ऊंचाई पर कई स्थानों पर हवा में ऑक्सीजन का अनुपात कम है।

पेंगोंग से चलकर तंगस्ते से लेह सड़क पकड़ी। खारू होते हुए लेह 110  लिखा था। पेंगोंग जाते समय खारदुंग ला पार किया था। अब 17,600 फुट ऊँचाई वाला चांगला दर्रा पार करना था। पहला पड़ाव सोलतक था, दस बजे चांगला दर्रा पर पहुँचने वाले थे तभी ट्राफ़िक जाम का सामना हो गया। सेना की गाड़ियाँ भी साथ में थीं। तंगस्ते से लेह के रास्ते पर कई गाँव है। जिनके घोड़े, याक और अन्य पशु चरते दिख रहे थे। उनके गोबर के कंडे भी बनते दिखे।

चांगला पार करके हम फिरसे सिंधु घाटी में प्रवेश कर गए। यहाँ के ग्लेशियर पंजाब और सिंध को तर करते हैं। जिंग्राल, शक्ति आया। शक्ति के आगे सीमा सुरक्षा संगठन का सड़क निर्माण कार्य चल रहा था इसलिए ट्राफ़िक जाम फिर सामने आ खड़ा हुआ। वहाँ सीमा सड़क संगठन और इंडीयन आयल कोर्पोरेशन मिलकर प्रोजेक्ट हिमांक नाम से एक सड़क बना रहे हैं। खारू तक उम्दा सड़क बन चुकी है। हेमिस मठ खारू से आठ किलोमीटर है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

गुरुद्वारा पत्थर साहिब

श्री गुरु नानक देव जी भूटान, नेपाल, तिब्बत से होते हुए लद्दाख पहुंचे थे। लेह में लोगों से मिलते हुए वह कश्मीर के मट्टन पहुँचे थे। लेह और मट्टन में स्थित गुरुद्वारे श्री गुरु नानक देव जी की याद दिलाते हैं। अगर हम बात लेह की करें तो वहां पत्थर साहिब गुरुद्वारा है। यह गुरुद्वारा लेह से पहले 25 किमी दूर श्रीनगर-लेह रोड पर स्थित है। श्री गुरु नानक देव जी 1517 ई में सुमेर पर्वत पर अपना उपदेश देने के बाद लेह पहुंचे थे। गुरुद्वारे का इतिहास काफी अहम है किंवदंती है कि गुरु जी ने एक राक्षस को सही रास्ते पर लाकर लोगों के दिल से उसका भय दूर किया था। वहां एक पहाड़ पर रहने वाला एक राक्षस लोगों को बहुत तंग करता था। लोगों ने अपने दुख को गुरु जी के सामने बयां किया। गुरु नानक देव जी ने नदी किनारे अपना आसन लगा लिया।

एक दिन की बात है कि जब श्री गुरु नानक देव जी प्रभु की भक्ति में लीन थे, तब राक्षस ने गुरु जी को मारने के लिए पहाड़ से बड़ा पत्थर फेंका। गुरु जी से स्पर्श होते ही पत्थर मोम जैसा मुलायम हो गया। इससे गुरु जी के शरीर का पिछला हिस्सा मोम बने पत्थर में धंस गया। गुरुद्वारे में पत्थर में धंसा श्री गुरु नानक देव जी के शरीर का निशान आज भी पत्थर पर मौजूद हैं। तब राक्षस पहाड़ से नीचे उतरा और गुरु जी को ज़िंदा देखर हैरान रह गया। गुस्से में आकर राक्षस ने अपना दायां पैर पत्थर पर मारा, लेकिन उसका पैर मोम बने पत्थर में धंस गया। तब राक्षस को अहसास हुआ कि उससे गलती हुई है। राक्षस गुरु जी के चरणों में गिर पड़ा। राक्षस के पैर का निशान भी पत्थर पर देखा जा सकता है। गुरु जी ने राक्षस को उपदेश दिया कि बुरे काम मत करो, लोगों को तंग न करो, मानव के कल्याण के लिए काम करो। इस समय गुरुद्वारा पत्थर साहिब की संभाल का जिम्मा भारतीय सेना के पास है।

हमने वाहन से उतर कर देखा तो गुरुद्वारा के सामने से एक रास्ता बग़ल में गया था। लोग वहाँ गरम चाय का सेवन कर रहे थे। वहाँ पर एक नल में बर्फ़ का पानी ठंडा पानी आ रहा था। उसके पीछे देखा तो पाया कि एक बड़ा लम्बा पतला पाइप नल से जुड़ा था और वह पतला पाइप मोटे पाइप से जुड़ा था। जिनमे से होकर  बर्फ़ का पानी पिघल कर नल तक आ रहा था। शुद्ध कंचन पानी देख मुँह हाथ धोए और ठंडा पानी पीकर दिन भर से थकी देह से थकान और गर्मी को राहत देकर चाय सेवन के स्थान पर पहुँच चाय ग्रहण करने लगे। तेज हवा चल रही थी। चाय अधिक गरम होने से फूँक-फूँक कर सिप कर रहे थे। तभी हमारे पीछे किसी सज्जन ने चाय ठंडी करने के लिए चाय को दो गिलासों में ऊपर से एक दूसरे में उँडेल कर ठंडी करने की कोशिश की तो हवा के तेज झौंके से हमारी बायीं बाँह कंधे से लेकर कोहनी तक गरम चाय से तरबतर हो गई। हमने मुड़कर उन सज्जन को देखा तो वे मुँह फेरकर दूसरी तरफ़ देखने लगे। अब उनसे क्या बोलते, जिन्हें अपनी गलती का अहसास ही नहीं था। हमने अपनी चाय मेज़ पर रख कर नल से पानी ले बाँह से कंधे तक को धो लिया। ताकि दाग पक्के न हो जायें। ज़रूरी नहीं है कि आपको खुद की ग़लतियों से दाग लगें। कभी-कभी दूसरों की ग़लतियों से भी दाग लग सकते हैं। उन परिस्थितियों में किसी से उलझने की बजाय दाग साफ़ कर लेना ठीक रहता है अन्यथा कपड़ों पर लगे दाग मन मस्तिष्क में पक्के होने की सम्भावना रहती है।             

मेगनेटिक हिल 

लद्दाख क्षेत्र के लेह के नज़दीक एक ऐसी पहाड़ी है जिसे मैग्नेटिक हिल के नाम से जाना जाता है। सामान्यतौर पर पहाड़ी के ढलान पर वाहन को गियर में डाल और हैंडब्रेक लगा खड़ा किया जाता है। यदि ऐसा नहीं किया जाए तो वाहन नीचे की ओर लुढ़ककर खाई में गिर सकता है लेकिन इस मैग्नेटिक हिल पर वाहन को न्यूट्रल करने खड़ा कर दिया जाए तब भी वाहन ढलान की तरफ़ नहीं जाता। ऊपर की तरफ़ जाने लगता है। यह श्रीनगर-लद्दाख रोड पर लेह से 26.5 किमी पश्चिम में है। आश्चर्य तो तब होता है जबकि वाहन एंजिन बंद होने पर नीचे की ओर नहीं जाकर खुद ब खुद उपर की ओर जाने लगता है। यही तो इस पहाड़ी का चमत्कार है कि वाहन लगभग 20 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ऊपर की ओर चढ़ने लगता है। दूसरा चमत्कार यह कि न सिर्फ गाड़ियां बल्कि आसमान से उड़ने वाले जहाज भी इस पहाड़ी के गुरुत्वाकर्षण से बच नहीं सकते। कोई इसे गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहते हैं तो कुछ इसे सिर्फ एक भ्रम मानते हैं लेकिन अब तक इस पहाड़ी का रहस्य सुलझाया नहीं जा सका है।

वैज्ञानिक कहते हैं…मैग्नेट हिल या निमू-लेह मैग्नेट हिल भारत के लद्दाख में लेह के पास स्थित एक गुरुत्वाकर्षण पहाड़ी है। आसपास की भौगोलिक विशेषताओं के कारण, इसमें एक ऑप्टिकल भ्रम है जहां वाहन गुरुत्वाकर्षण की अवहेलना में ऊपर की ओर लुढ़कते हुए प्रतीत होते हैं, जबकि वे वास्तव में पृथ्वी के ढलान पर लुढ़क रहे होते हैं।

विमान चालकों के अनुसार गुरुद्वारा पत्थर साहिब के निकट स्थित इस हिल में गजब की चुंबकीय ताकत है। यही नहीं इसका मैग्नेटिक फील्ड भी काफी बड़े क्षेत्र तक प्रभावित करता है। यदि इस हिल की चुंबकीय ताकत का परीक्षण करना हो तो किसी वाहन के इंजन को बंद करके वहां खड़ा कर दें, वह बंद वाहन धीरे-धीरे पहाड़ी की चोटी की ओर स्वत: ही खिसकना शुरू कर देता है। इस मैग्नेटिक हिल से होकर विमान उड़ा चुके कई पायलटों का दावा है कि इस हिल के ऊपर से विमान के गुजरते वक्त उसमें हल्के झटके महसूस किए जा सकते हैं, इसीलिए जानकार पायलट इस क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले ही विमान की गति बढ़ा लेते हैं ताकि विमान को हिल के चुंबकीय प्रभाव से बचाया जा सके।

जब हम वहाँ पहुँचे तो वहाँ थोड़ा ऊपर पहाड़ी पर जाने के लिए मोटरबाईक किराए पर मिल रही थीं। जहाँ पहुँच कर पर्यटक मैग्नेटिक हिल का करिश्मा देख रहे थे। मुख्य सड़क पर हमने अपना वहाँ खड़ा करके देखा तो कोई वैसा चमत्कार नहीं हुआ जिसका दावा किया जाता है। हमारे पास इतना समय भी नहीं था कि एक हज़ार रुपए देकर चमत्कारी भ्रम का सत्यापन करने मोटरबाईक से ऊपर जाया जाये। पर्यटन उद्योग के नुमाइंदे कुछ पर्यटक पोईंट भ्रम फैलाकर बनाए रखते हैं। हम मैग्नेटिक हिल को दूर से सलाम करके आगे बढ़ गये।

स्पितुक गोंपा 

स्पितुक मठ, जिसे स्पितुक गोम्पा या पेथुप गोम्पा भी कहा जाता है, स्पितुक, लेह से 8 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर एक बौद्ध मठ है। इसकी स्थापना 11 वीं शताब्दी में मरियम में आने पर लामा चांगचब ओड के बड़े भाई ओड-डी ने की थी। जब लोत्सेवा रिनचेन ज़ंगपो (अनुवादक) उस स्थान पर आए तो उन्होंने कहा कि एक अनुकरणीय धार्मिक समुदाय वहां विकसित होगा, इसलिए मठ को स्पितुक (अनुकरणीय) कहा जाता था। धर्म राज ग्रगस्पा बम-आइड के समय मठ को लामा लवांग लोदोस द्वारा बहाल किया गया था और टोंसखापा का स्टेनलेस ऑर्डर पेश किया गया था और यह आज तक बरकरार है। रेड हैट संस्था के रूप में स्थापित, मठ को 15 वीं शताब्दी में पीली टोपी संप्रदाय द्वारा ले लिया गया था। वह एक छोटा मठ था। वहाँ थोड़ी देर रुककर अगले पड़ाव की तरफ़ चल दिये।

हाल ओफ़ फ़ेम

कारगिल युद्ध में भारतीय सूरमाओं की गाथा बताने वाला हाल आफ फेम पर्यटकों का सिर गर्व से ऊंचा करने में सक्षम है। टूरिस्ट सर्किट पर महत्वपूर्ण पड़ाव यह हॉल आफ फेम देशभक्ति को प्रदर्शित करता है। भारतीय सैनिकों की बहादुरी और उनकी साहसिक उपलब्धियों का बखान करता है। जैसे ही आप विजय गैलरी से गुजरेंगे तो वहां आपको कारगिल युद्ध में इस्तेमाल किए गए हथियार दिख जाएंगे। सियाचिन ग्लेशियर और अन्य स्थानों पर पहने जाने वाली युद्ध की ड्रेस देखते हैं तो आप उन मुश्किलों का अन्दाज़ लगा सकते हैं, जिनसे हमारे सैनिकों को गुजरना पड़ता है। सैनिकों द्वारा उनके परिवारों को लिखे गए पत्र इस क्षेत्र में लड़े गए युद्धों के दौरान ली गई तस्वीरें और कारगिल युद्ध पर 30 मिनट की डॉक्यूमेंट्री कुछ ऐसे आकर्षण हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर खींच ही लेते हैं।  इस भवन की दूसरी मंजिल पर भारतीय सेना द्वारा जप्त पाकिस्तानी बंदूकों और अन्य युद्धक शस्त्रों को प्रदर्शित किया गया है। हॉल को भारतीय सेना द्वारा उन सैनिकों के सम्मान में बनाया गया था जो इस क्षेत्र में लड़े गए विभिन्न युद्धों के दौरान शहीद हुए थे।

शांति स्तूप

शांति स्तूप लद्दाख के लेह जिले के चांसपा क्षेत्र में एक पहाड़ी की चोटी पर सफेद गुंबद वाला एक बौद्ध स्तूप (चोर्टेन) है। इसे 1991 में जापानी बौद्ध भिक्षु , ग्योमोयो नाकामुरा और पीस पैगोडा मिशन द्वारा बनाया गया था। स्तूप न केवल अपने धार्मिक महत्व के कारण बल्कि अपने अवस्थिति के कारण भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है जो आसपास के समूचे क्षेत्र का मनोरम दृश्य नज़रों की परिधि में समेटे है। शांति स्तूप से लेह शहर दिखाई देता है, दालान में खड़े होने पर नज़दीक में चांगस्पा गांव, दूर क्षितिज पर नामग्याल त्सेमो पैलेस और आसपास के पहाड़ों के मनोरम दृश्य प्रदान करता है। शांति स्तूप से सूर्योदय और सूर्यास्त को सबसे आकर्षक तरीक़े से देखा जा सकता है। स्तूप रात में रोशनी से जगमगाता है। जिसे लेह शहर से देखा जा सकता है और स्तूप से लेह शहर की रोशनी देखी जा सकती है।

शांति स्तूप का निर्माण अप्रैल 1983 में भिक्षु ग्योम्यो नाकामुरा और भारत सरकार के अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य, पूर्व राजनेता और भारत गणराज्य के पूर्व अंतरराष्ट्रीय राजनयिक लद्दाख के लामा कुशोक बकुला की देखरेख में हुआ था। यह परियोजना लद्दाखी बौद्धों और जापानी बौद्ध, जो भारत को बुद्ध का “पवित्र” जन्मस्थान मानते हैं, की मदद से पूरी की गई थी। भारत की तत्कालीन प्रधान मंत्री, इंदिरा गांधी ने 1984 में स्तूप के लिए एक सड़क के निर्माण को मंजूरी दी थी। राज्य सरकार ने शांति स्तूप के निर्माण के लिए कुछ वित्तीय सहायता भी प्रदान की। वर्तमान दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो ने अगस्त 1991 में शांति स्तूप का उद्घाटन किया।

शांति स्तूप में वर्तमान दलाई लामा की तस्वीर है जिसके आधार पर बुद्ध के अवशेष बताए जाते हैं। स्तूप दो-स्तरीय संरचना के रूप में बनाया गया है। पहले स्तर में प्रत्येक तरफ हिरण के साथ धर्मचक्र है। एक स्वर्ण बुद्ध की छवि “धर्म के टर्निंग व्हील” (धर्मचक्र) को दर्शाते हुए एक मंच पर बैठी है। दूसरे स्तर में बुद्ध के “जन्म”, बुद्ध की मृत्यु (महाननिर्वाण) और बुद्ध को  “शैतानों को हराने” को ध्यान में रखते हुए दर्शाया गया है।

शांति स्तूप का निर्माण विश्व शांति और समृद्धि को बढ़ावा देने और बौद्ध धर्म के 2500 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में किया गया था। इसे जापान और लद्दाख के लोगों के बीच संबंधों का प्रतीक माना जाता है। अपने उद्घाटन के बाद से, शांति स्तूप एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण बन गया है। द हिंदू के अनुसार यह लेह के आसपास “सबसे प्रसिद्ध पर्यटक आकर्षण” है। इसकी स्थापत्य शैली लद्दाखी शैली से अलग है।

खारदुंग ला की ओर

लद्दाख भारत के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में से एक है, जो हरियाली विहीन ऊंचे पहाड़ों, झीलों, नदियों, ग्लेशियरों, बौद्ध मठों और धार्मिक स्थलों से परिपूर्ण है। अगर देखा जाए तो लद्दाख में ऐसी एक भी जगह नहीं है, जहां जाने के बाद आपको लगेगा कि मुझे यहां नहीं आना चाहिए था, क्योंकि लद्दाख में स्थित हर एक जगह का अपना अलग ही महत्त्व है, जो पहाड़ों के बीच अपने अलग-अलग रंग-रूप, प्राकृतिक सौन्दर्य और अपने आस-पास के सुन्दर नजारों से भरे पड़े हैं, जिसे देखने के बाद आपको ऐसा लगेगा कि आप एक अलग ही दुनिया में आ गए हैं।  आप सिर्फ़ पहाड़ों पर हरियाली की तलाश करने की कोशिश न करें। लद्दाखी पहाड़ों की बारिश से दुश्मनी है। ला याने दर्रे और दाख शब्द दस का अपभ्रंश, याने दसों दर्रों की जगह लद्दाख़ हुआ। 

03 जुलाई 2022 को खारदुंग ला (दर्रा) पार करके नुब्रा घाटी पहुँचना है। खारदुंग ला लेह से लगभग 40 किमी. की दूरी पर स्थित है, जिसे विश्व में सबसे ऊंची जगह से गाड़ियों के गुजरने वाली सड़क का दर्जा मिला है। खारदुंग ला की ऊंचाई 5,359 मीटर (17,582 फीट) है। लेह में गरम कपड़े और आक्सीजन सिलेंडर बेचने वाले दर्जनों स्टोर गलत तरीके से इसकी ऊंचाई 5,602 मीटर (18,379 फीट) के आसपास होने का दावा करते हैं। ताकि समुद्र सतह से अधिक ऊँचाई पर होने वाली सम्भावित दिक्कतों के मद्देनज़र पर्यटकों को सामान बेचा जा सके। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस रास्ते से युद्ध के सामानों को भी चीन तक पहुँचाया गया था। अभी भी इस सड़क पर भारतीय सेना के वाहनों को जाते हुए देखा जा सकता है। यहां पर जाने के लिए आपको इनर लाइन परमिट की जरूरत पड़ती है, जिसे आप लेह के डीसी ऑफिस या वहां किसी भी ट्रैवल एजेंट के मार्फ़त बनवा सकते हैं।

खारदुंग ला लद्दाख के सबसे ऊंचे स्थानों की सूची में शामिल होने की वजह से वहां ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम रहती है, जिसकी वजह से वहां जाने पर एल्टीट्यूड सिकनेस होने की संभावना बढ़ जाती है। अगर आप खारदुंग ला जा रहे हैं, तो एल्टीट्यूड सिकनेस से बचने के लिए मेडिसिन वगैरह अपने साथ लेकर जरूर जाएं, वरना चिड़चिड़े  होकर आप एटीट्यूड सिकनेस का शिकार भी हो सकते हैं। एटीट्यूड सिकनेस से आप सिर्फ़ धैर्य पूर्वक निकल सकते हैं। लद्दाख़ के दर्रों की जानकारी इसे समझने में सहायक रहेगी।

पर्वतों के आर-पार विस्तृत सँकरे और प्राकृतिक मार्ग, जिससे होकर पर्वतों को पार किया जाता है, दर्रा कहलाते हैं| ‘ला’ शब्द तिब्बती भाषा में ‘दर्रे’ का अर्थ रखता है। परिवहन, व्यापार, युद्ध अभियानों और मानवीय आवागमन में इन दर्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिमालय पर काराकोरम दर्रा, रोहतांग दर्रा, खारदुंग दर्रा, बुर्जिला,  जोजिला, पीर पंजाल दर्रा, बनिहाल दर्रा, नाथूला दर्रा प्रमुख दर्रे हैं।

रोहतांग दर्रा (Rohtang Pass) भारत के हिमाचल प्रदेश में कुल्लू घाटी और लाहौल और स्पीति घाटियों के बीच 3,980 मीटर (13,058 फुट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह हिमालय की पीर पंजाल श्रेणी के पूर्वी भाग में मनाली से 51 किमी दूर है। यह पूरे वर्ष हिमग्रस्त रहता है। हिमाचल को लद्दाख़ से जोड़ने वाला मनाली लेह राजमार्ग इस दर्रे से गुज़रता है। अब वहाँ अटल सुरंग बन जाने से चार घंटो का सफ़र चौबीस मिनट में पूरा किया जा सकता है। एल्टीट्यूड सिकनेस से बच जाते हैं।

क़ाराक़ोरम दर्रा भारत और चीन द्वारा नियंत्रित शिंजियांग प्रदेश के बीच 4,693 मीटर (15,397 फ़ुट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह लद्दाख़ के लेह शहर और तारिम द्रोणी के यारकन्द क्षेत्र के बीच प्राचीन व्यापारिक मार्ग का सबसे ऊँचा स्थान है।

ज़ोजिला या ज़ोजि दर्रा भारतीय लद्दाख क्षेत्र के कारगिल जिले में स्थित कश्मीर घाटी को पश्चिम में द्रास और सुरू घाटियों से जोड़ता है और इसके सुदूर पूर्व में सिंधु घाटी को जोड़ता है। ज़ोजिला दर्रा को अक्सर कश्मीर से लद्दाख के प्रवेश द्वार के रूप में नामित किया जाता है। यहाँ भी सुरंग बनने का काम जोरशोर से जारी है।   

पीर पंजाल दर्रा भारत के जम्मू और कश्मीर की पीर पंजाल पर्वतमाला में  3,490 मी॰ (11,450 फीट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह कश्मीर घाटी को जम्मू क्षेत्र के राजौरी ज़िले और पुंछ ज़िले से जोड़ता है। इस दर्रे से मुगल काल में बनाई गई सड़क गुज़रती है। कल्हण के अनुसार इसका प्राचीन नाम “पञ्चालधारा” है। “दर्रा” को संस्कृत में “धारा” कहते हैं। इस दर्रे से उत्तर में श्रीनगर और दक्षिण में जम्मू स्थित है।

बनिहाल दर्रा हिमालय का एक प्रमुख दर्रा हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-1 ए इस दर्रे से होकर निकलता है। यही दर्रा कश्मीर घाटी को जवाहर सुरंग के माध्यम से जम्मू से जोड़ता है।

नाथूला दर्रा सिक्किम राज्य को दक्षिण तिब्बत में चुम्बी घाटी से जोड़ता है। यह 14,200 फुट की ऊंचाई पर है। भारत और चीन के बीच 1962  युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था। इसे 05 जुलाई 2006 को व्यापार के लिए खोल दिया गया है। बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत और चीन के होने वाले व्यापार का 80 प्रतिशत हिस्सा नाथू ला दर्रे के ज़रिए ही होता था। यह दर्रा प्राचीन रेशम मार्ग की एक शाखा का भी हिस्सा रहा है।

खारदुंग ला लेह के उत्तर में सिंधु नदी घाटी और श्योक नदी घाटी को जोड़ता है। उत्तर-पूर्व तरफ़ मुड़ जाओ तो यह नुब्रा घाटी का प्रवेश द्वार भी बनाता है, जिसके आगे सियाचिन ग्लेशियर है। दर्रे के ऊपर से 1976 में एक मोटर चलने योग्य सड़क सैनिक उपयोग हेतु बनाई गई थी, जो 1988 में सार्वजनिक मोटर वाहनों के लिए खोल दी गई। सीमा सड़क संगठन द्वारा रखरखाव वाला यह दर्रा भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका उपयोग सियाचिन ग्लेशियर में आपूर्ति करने के लिए भी किया जाता है। यह सड़क दुनिया की सबसे ऊंची मोटर चलने योग्य सड़कों में से एक है।

1950 के दशक की शुरुआत में, विलियम ओ. डगलस ने वर्णन किया है कि “सिंधु पार करने के बाद पगडंडी का एक रास्ता नदी के किनारे दक्षिण-पर्व की ओर स्पितोक, खलत्से और खारगिल तक जाता है, दूसरा उत्तर की ओर लेह, खरडोंग दर्रा (… ), और सिंकियांग के एक प्राचीन व्यापारिक केंद्र “यारकंद” की तरफ़ जाता है।  उन्होंने आगे कहा, “लेह एक ऐतिहासिक कारवां मार्ग पर है जो न केवल सिंकियांग में यारकंद की ओर जाता है बल्कि तिब्बत में ल्हासा तक जाता है। (…) ऊन, चांदी, चाय, कैंडी, खाल, मखमल, रेशम, सोना, कालीन, कस्तूरी, मूंगा, बोरेक्स, जेड कप, नमक उत्तर से नीचे लेह आता था। कपास के सामान, शॉल, ब्रोकेड, अफीम, नील, आलूबुखारा, जूते, मोती, अदरक, लौंग, काली मिर्च, शहद, तंबाकू, गन्ना, जौ चावल, गेहूं नीचे से ऊपर की तरफ़ रेशम मार्ग जाता था।” द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस मार्ग से चीन को युद्ध सामग्री पहुँचाने करने का प्रयास किया गया था।

हम अब लद्दाख़ में सबसे कठिन यात्रा की शुरुआत करने वाले हैं। दिमाग़ में कौतुहल मिश्रित भय है। थोड़ी असुरक्षा भी लग रही है। दो दिनों के लेह प्रवास में दर्रों पर साँस उखड़ने की कठिनाइयाँ सुनने-सुनाने को मिलती रही है। जो खारदुंग ला होकर आते हैं, वे बहादुरी के क़िस्से सुनाते हैं और जो जाने वाले हैं, वे सहमे-सहमे से सुनते रहते हैं।  

खारदुंग ला ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मध्य एशिया के लेह से काशगर तक जाने वाले प्रमुख कारवां मार्ग पर स्थित है। इतिहास में इसे सालाना लगभग 10,000 घोड़ों और ऊंटों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था। बैक्ट्रियन ऊंटों की एक छोटी आबादी अभी भी पास के उत्तर क्षेत्र हुंडर में देखी जा सकती है। खारदुंग ला लेह सड़क मार्ग से 39 किमी. की दूरी पर है। दक्षिण पुल्लू चेक प्वाइंट से उत्तर पुल्लू चेक प्वाइंट तक के लगभग 15 किमी की दूरी तक के भाग में मुख्य रूप से ढीली चट्टान, गंदगी और यदाकदा पिघली बर्फ के नाले हैं। नुब्रा घाटी की निकटवर्ती सड़क (कुछ स्थानों को छोड़कर जहां शिला स्खलन होता है) बहुत अच्छी तरह से बनी हुई है। दो और चार-पहिया वाहन, भारी ट्रक और मोटरसाइकिल विशेष अनुमति से नियमित रूप से नुब्रा घाटी में यात्रा के लिए जाते हैं।

हम सुबह दस बजे चल दिए। टैक्सी JK 10 9335 चालक तंडुप सहित चल पड़ी। लेह से एक आक्सीजन यूनिट 3,000/- रुपए में किराए पर ली, जिसका उपयोग ज़रूरत पड़ने पर करना था। यात्रा की शुरुआत 12,000 फुट से होना था और उच्चतम बिंदु 17,582 फुट पर था। उसके बाद फिर नीचे उतरना था। पहले साउथ पुल्लु गाँव आया वहाँ से खारदुंग ला 14 किलोमीटर बचा था। खड़ी चढ़ाइयों का सिलसिला शुरू हुआ। ऊपर से सर्पाकार सड़क की कई रेखाएँ नीचे देखने में डर लगता है। साँस में भारीपन महसूस होने लगा। टिस्सु पेपर में लपेट कर कपूर की दो टिकियाँ शर्ट के ऊपरी ज़ेब में रखी हैं। जिनको आक्सीजन की कमी दूर करने के लिए बीच-बीच में निकाल कर सूंघते रहते हैं। चढ़ाई पर आक्सीजन की कमी को पूरा करने के लिए पानी सहित तरल पदार्थ पीना होता है। ऊपर पहुँच कर लोग पेशाबघर ढूँढते रहे। एक जगह दो बाथरूम बने थे लेकिन उनमें ताले डले थे। एक-दो पर्यटक बाथरूम के बाहर ही निस्तार करने लगे तो आर्मी सेनानियों ने उन्हें डाँट पिलाई। डाँट खाने के बाद बाथरूम की अनिवार्यता और बढ़ गई। खारदुंग ला पर गाड़ियों की भारी भीड़ थी। लोग गाड़ियाँ उठाकर आगे बढ़ गए। जहां बर्फ़ जमी थी। पर्यटकों ने बर्फ़ पर खेलना, बर्फ़ उछालना और पेशाब करना आरम्भ कर दिया। अब हम लेह घाटी से निकल कर स्योक घाटी में प्रवेश कर रहे थे।

पर्वतों से पिघलते ग्लेशियर से श्योक नदी की धाराएँ मिलकर एक घाटी का निर्माण कर रही थीं। घाटी में सबसे पहले उत्तर पुल्लू नाम का गाँव आया। फिर खारदुंग नामक गाँव पहुँचे। वहाँ से एक सड़क सियाचीन ग्लेशियर और दूसरी सड़क स्कर्दु की ओर जाती है। आगे बढ़ने पर दाहिनी तरफ़ स्कर्दु घाटी आरम्भ हो गई।  खालसार और प्रतापपुर पार करने के बाद स्कर्दू पहुँचे। एक ठीकठाक से दिखते रेस्टौरेंट पर पेशाब की थैली ख़ाली करने का अनुपूरक कार्य निपटाया। कुछ अनुपूरक के साथ मूल निस्तार कार्य से भी निवृत्त होकर फ़्रेश हो प्रसन्नचित्त हुए। फिर नाश्ता और चाय निपटाई।

हिमाच्छादित हिमालय पर्वतमाला से घिरी नुब्रा घाटी तिब्बत और कश्मीर के बीच स्थित है। घाटी का दृश्य मनोरम और मनमोहक है। सर्दियों के दौरान, पूरी घाटी दिन रात चंद्रमा के परिदृश्य से भरी रहती है। दिन में उत्तरायण सूर्य की तेज किरण बर्फ़ पर पड़ने से सफ़ेदी लिए होती हैं और रात में चाँदनी का बर्फ़ के साथ अलहदा करिश्मा दिखटा है।

अलेक्जेंडर कनिंघम ने नुब्रा को लद्दाख के पांच प्राकृतिक और ऐतिहासिक डिवीजनों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया था। नुब्रा लद्दाख के उत्तरपूर्वी हिस्से पर है, उत्तर में बाल्टिस्तान और चीनी तुर्किस्तान की सीमा और पूर्व में अक्साई चिन पठार और तिब्बत पर चीन का कब्जा है। सियाचिन ग्लेशियर घाटी के उत्तर में स्थित है। सैसर दर्रा और प्रसिद्ध काराकोरम दर्रा घाटी के उत्तर-पश्चिम में स्थित है और नुब्रा को उइघुर (मंदारिन: झिंजियांग) से जोड़ता है। पहले पश्चिमी चीन के झिंजियांग और मध्य एशिया के साथ इस क्षेत्र से बहुत अधिक व्यापार होता था। बाल्टिस्तान के लोगों ने भी तिब्बत जाने के लिए नुब्रा घाटी का इस्तेमाल किया था।

तिब्बती पठार की तरह, नुब्रा नदी के किनारे को छोड़कर दुर्लभ वर्षा और दुर्लभ वनस्पति के साथ एक उच्च ऊंचाई वाला ठंडा रेगिस्तान है। गांव सिंचित और उपजाऊ हैं, गेहूं, जौ, मटर, सरसों और विभिन्न प्रकार के फल और मेवे पैदा करते हैं, जिनमें सेब, अखरोट, खुबानी और यहां तक ​​​​कि कुछ बादाम के पेड़ भी शामिल हैं। अधिकांश नुब्रा में नुब्रा बोली या नुब्रा स्काट वक्ताओं का निवास है। बहुसंख्यक बौद्ध हैं। नियंत्रण रेखा के पास नुब्रा के पश्चिमी या सबसे कम ऊंचाई वाले छोर पर यानी भारत-पाक सीमा पर श्योक नदी किनारे के गांव तुरतुक के निवासी गिलगित-बाल्टिस्तान के बाल्टी हैं, जो बलती बोलते हैं, और शिया और सूफिया नूरबख्शिया मुसलमान हैं।

नुब्रा घाटी एक तीन भुजाओं वाली घाटी है जो लद्दाख घाटी के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह श्योक और नुब्रा नदियों के संगम से बनी है। श्योक नदी उत्तर पश्चिम की ओर बहती है और नुब्रा नदी एक न्यूनकोण बनाते हुए इसमें उत्तर-उत्तर पश्चिम से आ कर मिलती है। श्योक नदी आगे जाकर सिन्धु नदी में मिलती है। नुब्रा की केन्द्रीय बस्ती दिस्कित की दूरी लेह से 150 कि॰मी॰ है।  दिस्कित अपने बागों, दर्शनीय स्थलों, बैक्ट्रियन ऊंटों और मठों के लिए जाना जाता है। नुब्रा घाटी जम्मू और कश्मीर का सबसे उत्तरी भाग है। नुब्रा घाटी को लद्दाख के बाग के रूप में जाना जाता है और इसे मूल रूप से लदुमरा कहा जाता है जिसका अर्थ है फूलों की घाटी।

नुब्रा घाटी दूर से देखने पर घाटी सूखी लगती है। हालांकि, घाटी में मुख्य रूप से प्रमुख कृषि भूमि शामिल है। तब कोई आश्चर्य नहीं कि घाटी ने लद्दाख का प्रतिष्ठित बाग का सम्मान अर्जित किया है। यह सिर्फ नुब्रा की प्राकृतिक सुंदरता ही नहीं है जो पर्यटकों को आकर्षित करती है। घाटी मुख्य रूप से बौद्ध है और बौद्ध शिक्षा के कई केंद्रों को बसाए है। एन्सा, समस्टेमलिंग, दिस्कित और हुंदर प्रसिद्ध बौद्ध मठ हैं। हम सुमूर, हुंदर और दिस्कित की तरफ़ बढ़ रहे हैं। सबसे पहले सुमूर पहुँचे। श्योक नदी के बहुत चौड़े पाठ के किनारे पर स्थित मठ पर चढ़े तो दोनों तरफ़ नदी का आठ-दस किलोमीटर भाग दिखने लगा। बर्फ़ पिघल कर आते पानी से नदी एक किनारा पकड़ कर बह रही है। नीचे से एक सड़क चीन के खसगर की तरफ़ जा रही है।

नुब्रा घाटी समुद्र तल से 10,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। पर्यटक वर्ष के किसी भी समय यात्राओं की योजना बना सकते हैं। जुलाई और सितंबर में, जब यहाँ पतझड़ का मौसम होता है, नुब्रा घाटी की यात्रा करने का सबसे अच्छा समय है। यहाँ पेड़ नहीं होते इसलिए पतझड़ में पत्ते नहीं झड़ते अपितु बर्फ़ पिघलती है। उसे बर्फ़झड़ कहा जा सकता है। नुब्रा घाटी की जलवायु साल भर अनुकूल रहती है। यहां तक कि गर्मी के मौसम के दौरान न्यूनतम और अधिकतम तापमान क्रमशः 4 डिग्री सेल्सियस और 30 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। हालाँकि मौसम साल भर शीतल और सुखद रहता है, सर्दियों के मौसम के दौरान तापमान न्यूनतम -40 डिग्री तक गिर सकता है। दिसंबर और जनवरी के महीने आम तौर पर सबसे ठंडे होते हैं, जब पूरी घाटियाँ और दर्रे बर्फ़ से ढँककर समतल हो जाते हैं।

हम सुमूर पहुँच रहे हैं। लद्दाखी में ‘सुम’ का अर्थ  तीन है और ‘यूर’ का अर्थ है धारा या चैनल। कहा जाता है कि इस गांव में तीन प्रमुख धाराएं बहती हैं और इसी से यह नाम सुमूर पड़ा है। कुछ लोग यह भी अनुमान लगाते हैं कि यह Sum_Yul है, जिसका अर्थ है तीन गाँव। Sum_Yul  ही सुमूर है। ऐतिहासिक रूप से यह गांव चीन के खसगर को लद्दाख से जोड़ने वाले प्राचीन व्यापार मार्ग पर है। मठ के ठीक ऊपर पहाड़ी की चोटी पर एक प्राचीन किला है। मठ नुब्रा घाटी में सबसे बड़ा है, जिसे लामा त्सुल्टिम नीमा ने 1830 के आसपास स्थापित किया था। 8-9वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व की विशाल चट्टान की लालसा है। पूरे साइचेन बेल्ट में जनसंख्या के मामले में सबसे बड़ा गांव है। लंबी सर्दियों के दौरान गांव के लोग विभिन्न पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं का पालन करते हैं।

सुमूर से श्योक नदी पार करके पर्वत को काट कर बनाए मार्ग पर चलने लगे हैं। रास्ता कभी नदी के बीच से होता है और कभी किनारे से पहाड़ पर चढ़ जाता है। नुब्रा घाटी में ठहरने के लिए दिस्कित के पास बजट रेंज में गेस्टहाउस हैं। कैंपिंग के लिए टेंट भी उपलब्ध कराते हैं। सुमुर में सभी बुनियादी सुविधाओं के साथ डीलक्स कैंप हैं। हंडर में अच्छे होटल भी हैं। नुब्रा घाटी में खाने के लिए सबसे अच्छी जगह होटल और गेस्ट हाउस भारतीय, चीनी, महाद्वीपीय और यूरोपीय भोजन परोसते हैं। हमारा एक रात का डेरा हुंदर के सैंडलवुड कैम्प में अर्थात् पर्यटक टेंट में था। पंद्रह टेंट के गोलाकार घेरा के बीच एक पार्क में चारों तरफ़ पहाड़ियों से घिरे बैठकर भोजन का आनंद लिया। फिर हुंदर पहुँचे।

हुंदर लद्दाख के लेह जिले का एक गाँव है जो रेत के टीलों, बैक्ट्रियन ऊंटों के लिए प्रसिद्ध है। यह नुब्रा तहसील में श्योक नदी के तट पर स्थित है। हुंदर कभी पूर्व नुब्रा साम्राज्य की राजधानी थी। कई बर्बाद इमारतें हैं, जिनमें राजा के महल के खंडहर, लंगचेन खार (“हाथी महल”) शामिल हैं। पहाड़ी की चोटी पर एक किला है, जिसे गुला कहा जाता है। हुंदर में दो बौद्ध मंदिर भी हैं: सफेद मंदिर (लखांग कार्पो) और लाल मंदिर (लखांग मारपो)। हुंदर और दिस्कित के बीच रेत के टीले हैं।

दिस्कित और हुंदर के बीच का ठंडा रेगिस्तान पर्यटकों के लिए एक आकर्षण है। पर्यटक रेत के टीलों को देखने और बैक्ट्रियन ऊंटों की सवारी करने के लिए ठंडे रेगिस्तान में आते हैं। राजस्थान और भारत के अन्य हिस्सों में पाए जाने वाले एकल-कूबड़ वाले ऊंटों के विपरीत, मध्य एशिया के स्टेपीज़ मूल के बैक्ट्रियन ऊंट के दो कूबड़ होते हैं। बैक्ट्रियन ऊंट, केवल हुंदर में पाए जाते थे। जब लद्दाख मध्य एशिया के साथ प्राचीन व्यापार मार्गों पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, तब बैक्ट्रियन ऊंट परिवहन का मुख्य साधन थे। प्राचीन रेशम मार्ग पर एक प्रमुख पड़ाव, नुब्रा अभी भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पश्मीना ऊनी वस्त्रों और बागवानी फसलों का एक प्रमुख व्यापार केंद्र है। स्थानीय लोग सेब, अखरोट, खुबानी, बादाम और मुख्य फसलों जैसे गेहूं, जौ आदि का उत्पादन करते हैं।

दिस्कित मठ

नुब्रा घाटी में दिस्कित मठ न केवल अपने अविश्वसनीय स्थान के लिए, बल्कि मठ के ठीक नीचे स्थित 106 फीट मैत्रेय बुद्ध प्रतिमा के लिए जाना जाता है। नुब्रा घाटी में दिस्कित मठ खालसर-पनाकिल मार्ग से 15 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में 10,308 फीट की ऊंचाई पर ठंडे रेगिस्तान के किनारे स्थित है। यह पार्थपुर और उन को जोड़ती सड़क के किनारे एक पहाड़ी के ऊपर खड़ा है।

दिस्कित मठ के अंदरूनी भाग इसके बाहरी हिस्से की तरह ही सुंदर हैं, क्योंकि वे जटिल थंक़ा भित्तिचित्रों से सजाए गए हैं। प्रार्थना कक्ष, जिसे दुखंग कहा जाता है, बौद्ध संरक्षक देवताओं के विशाल ड्रम और सुंदर छवियों का घर है। मठ का भंडार कई मंगोलियाई और तिब्बती धार्मिक ग्रंथों को संरक्षित करता है। मठ के ठीक ऊपर लाचुंग मंदिर है, जो बौद्ध धर्म के गेलुगपा संप्रदाय के संस्थापक सोंग खापा की बड़ी मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है। इसे नुब्रा घाटी के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। दिस्कित मठ का प्रांगण दिस्कित गांव और आसपास के परिदृश्य के सुंदर दृश्य प्रस्तुत करता है।

नुब्रा घाटी में एक प्रमुख आकर्षण मैत्रेय बुद्ध की 108 फीट की मूर्ति है, जो को आश्चर्यचकित करती है। सोने और लाल रंग की मूर्ति पाकिस्तान की ओर श्योक नदी का सामना करती एक पहाड़ी के ऊपर दिस्कित मठ के ठीक नीचे स्थित है। पाकिस्तानी अधिकृत कश्मीर के गाँव सामने की दिखती पहाड़ी के पार स्थित हैं। श्योक नदी उसी तरफ़ जा रही है। काराकोरम पहाड़ पर सिंधु से मिलेगी। माना जाता है कि मूर्ति के सौंदर्य और आध्यात्मिक महत्व के अलावा, तीन विचारों को शामिल किया गया है: दिस्कित गांव की सुरक्षा, विश्व शांति को बढ़ावा देना और पाकिस्तान के साथ युद्ध की रोकथाम करना।

दिस्कित मठ में मनाया जाने वाला मुख्य त्योहार दोस्मोचे, या देस्मोचे है, जिसका अर्थ है, “बलि का बकरा का त्योहार।” यह नुब्रा घाटी के गांवों के लोगों की बड़ी भीड़ को आकर्षित करता है। त्योहार का मुख्य आकर्षण छम नृत्य है, जो पर्यटकों के बीच मुखौटा नृत्य के रूप में अधिक प्रसिद्ध है। ये नृत्य मठ के लामाओं द्वारा किए जाते हैं। किसी भी आपदा की घटना को रोकने के लिए आटे से बने चित्र भी फेंके जाते हैं, और हर जगह शांति और समृद्धि का स्वागत करते हैं।

इस मठ का निर्माण त्सोंग खपा के एक शिष्य चंग्ज़ेम त्सेराब जंगपो ने 14 वीं शताब्दी में करवाया था, जिसके अंदर अलग-अलग तरीके से तिब्बती चित्रकारियाँ की हुई हैं, जो देखने में काफी खूबसूरत लगती है। इस मठ में प्रवेश करने के लिए ₹ 30 देना पड़ता है और अगर कोई व्यक्ति यहां ड्रोन उड़ाना चाहता है, तो उसे अलग से ₹.500 देना पड़ेगा। एक घंटा मठ का अवलोकन करके रुकने के स्थान हुंदर तरफ़ कूच किया। पूरा रास्ता श्योक नदी के बीच से होकर है। नदी एक  कोने से बह रही है। नदी की किनारे घने घुमावदार कूचों में एक घंटा भटकने के बाद तय स्थान मिला।

हमारे रुकने का इंतज़ाम टेंट हाऊस में था। चारों तरफ़ पहाड़ों से घिरे छोटे से मैदान में 14 टेंट हाऊस बने थे। बीच में एक बगीचा में बीस-पच्चीस कुर्सियाँ डली थीं। उन पर चाँदनी छनकर आ रही थी। रात को आठ बजे के लगभग तीस दक्षिण भारतीय पर्यटक और आ गए। उनकी धमाचौकड़ी देर रात तक चलती रही। रात बारह  बजे तक बर्फीले पहाड़ों से उतरती चाँदनी का आनंद लेकर शयन को चले गये।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१३ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १० ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

लेह के आसपास

02 जुलाई 2022  को नाश्ता करने के बाद लेह के आसपास भ्रमण को निकले। होटल में पता चला कि जयपुर से आये पर्यटकों को आक्सीजन की कमी के कारण साँस लेने में तकलीफ़ हो रही है। लेह समुद्र तल से तक़रीबन 12,000 फुट ऊँचाई पर है। अब हमें 13,000 फुट पर जाना था। हमने पेपर नैप्किन में कपूर की एक-एक गोली रखकर सभी साथियों को इस निर्देश के साथ पकड़ा दी कि वे इसे थोड़ी-थोड़ी देर में सूंघते रहें। इससे उन्हें घुमावदार चढ़ाई वाले रास्तों पर मितली की परेशानी नहीं होगी और आक्सीजन की कमी भी न होगी। जब भी किसी स्थान के विभिन्न पर्यटन केंद्रों पर घूमने जाना हो तो टैक्सी वाले एक तरीक़ा अपनाते हैं कि सबसे नज़दीक के स्थलों पर पर्यटकों का अधिक समय खर्च कराने की जुगत में रहते हैं। लंच तक उसी स्थान के आसपास तीन बज जाएँ और इतने थक जाएँ कि लम्बी दूरी के स्थान पर जाने लायक़ न रहें या जाने को अनिछुक हो जायें। हमने टैक्सी चालक को लेह से सत्तर किलोमीटर दूरी पर स्थित अलची गोम्पा स्थल पर सबसे पहले चलने को कहा। थोड़ी आनाकानी के बाद वह सहमत हो गया। उसने गाड़ी में डीज़ल भरवा लिया।

लिकिर गोंपा

वाहन तेज गति से लेह-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 01 पर चल पड़ा। सबसे पहले 52 किलोमीटर पर हमारा पड़ाव लिकिर गोंपा था। यह लेह के पश्चिम में 3700 मीटर की ऊंचाई पर एक छोटी सी पहाड़ी पर सुरम्य रूप से स्थित है। यह तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग्पा संप्रदाय द्वारा लद्दाख के पांचवें राजा, ल्हाचेन ग्यालपो (ल्हा-चेन-रग्याल-पो) की कमान के तहत 1065 में लामा दुवांग चोसजे ने स्थापित किया गया था। वर्तमान में लगभग 120 बौद्ध भिक्षु इस मठ में रहकर साधना करते और धर्म चक्र प्रवर्तित करते हैं। यहाँ लगभग तीस छात्रों वाला एक स्कूल है। जिसमें बौद्ध धर्म सम्बन्धी शिक्षा तीन भाषाओं, हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी में प्रदान की जाती है। इसे केंद्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान चलाता है।

मठ में दो सभा मंडप हैं, जिन्हें दुखांग के नाम से जाना जाता है। जीवन सतत दुख का अंग है। उससे मुक्त होने के लिए निर्वाण सुखांग है। दुखांग में बोधिसत्व (जिसने सत्य जान लिया है), अमिताभ (जिसकी अमिट आभा है)  शाक्यमुनि ( शाक्यों में जो मुनि है), मैत्रेय (भविष्य के बौद्ध) और पीली टोपी संप्रदाय के संस्थापक त्सोंग खापा की बड़ी मूर्तियाँ हैं। एक केंद्रीय प्रांगण के दाईं ओर ध्यान केंद्र स्थित है जिसमें सात-सात लामाओं के बैठने की छह पंक्तियाँ और लिकिर के प्रमुख लामा के लिए एक सिंहासन है।

मठ में एक संग्रहालय है जिसमें पुरानी पांडुलिपियों का भंडार है। उल्लेखनीय थंका पेंटिंग संग्रह और पुरानी वेशभूषा और मिट्टी के बर्तन हैं। छत पर बैठे मैत्रेय की 75 फीट ऊंची सुनहरे रंग की मूर्ति है। यह बुद्ध मूर्ति 1999 में बनकर तैयार हुई है। बाईं दीवार में 35 इकबालिया बुद्धों के चित्र हैं, जबकि दाहिनी दीवार में शाक्यमुनि की एक छवि है। एक सीढ़ी हॉल से बाहर निकलती है, जो प्रमुख लामा का कमरा ज़िनचुन की ओर जाती है। जिसमें मुख्य रूप से थंका और लामाओं की छवियां और अवलोकितेश्वर की पत्नी तारा की अभिव्यक्तियाँ हैं। 

हमारा समूह दो भागों में बँट गया। इस कारण से ज़रूरत से अधिक समय इस मठ में व्यतीत हुआ। हमें आज दस पर्यटन स्थलों का भ्रमण करना था इसलिए सभी को समूह में साथ रहने और प्रत्येक स्थल पर समय निर्धारण करने की हिदायत दी गई। 

अलची गोम्पा

अगला पड़ाव सिंधु नदी के दक्षिण तट पर 3,100 मीटर (10,200 फीट) की ऊंचाई पर लेह से 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अलची मठ है। सिंधु नदी की सहायक नदियों के किनारे बीस किलोमीटर चलकर अलची गोम्पा पहुँचे। गोम्पा या गोम्बा या गोन्पा तिब्बती शैली में बने एक प्रकार के बौद्ध-मठ के भवन या भवनों के समूह को कहते हैं। तिब्बत, भूटान, नेपाल और लद्दाख़, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम व अरुणाचल प्रदेश क्षेत्रों में कई स्थानों पर गोम्पा बने हैं।

अलची गोम्पा को लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश के लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के तहत संचालित लेह जिले के अलची गांव में मंदिरों के मठ परिसर (चोस-खोर) के रूप में जाना जाता है। इस परिसर में निचले लद्दाख क्षेत्र के अलची गांव में चार अलग-अलग बस्तियां हैं। जिनमें विभिन्न अवधियों के स्मारक हैं। इन चार बस्तियों में लिकिर मठ द्वारा प्रशासित अलची गोम्पा सबसे पुराना और सबसे प्रसिद्ध कहा जाता है।

अलची परिसर के निर्माण का श्रेय 10 वीं शताब्दी में प्रसिद्ध विद्वान-अनुवादक रिनचेन ज़ंगपो (958-1055) को दिया जाता है, साथ ही लामायुरु मठ, वानला, मांग-ग्यू और सुमदा का नाम भी उनके नाम के साथ जुड़ा है। दसवीं शताब्दी के दौरान, गुगे के तिब्बती लामा-राजा येशे- Ö ने ट्रांस हिमालय क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रसार करने के लिए 21 विद्वानों को क्षेत्र आवंटित करके मठ निर्माण की पहल की थी। हालांकि, कठोर जलवायु और विषम स्थलाकृतिक परिस्थितियों के कारण, केवल दो ही जीवित रहे, उनमें से एक सम्मानित विद्वान और अनुवादक रिनचेन जांगपो थे। जिन्होंने लद्दाख क्षेत्र और हिमाचल प्रदेश और सिक्किम सहित भारत के अन्य क्षेत्रों में बौद्ध मठों की स्थापना की थी। अपने प्रवास के दौरान, वे नेपाल, भूटान और तिब्बत के पड़ोसी देशों में भी गए। जांगपो को “लोहत्सावा” या “महान अनुवादक” के नाम से जाना जाने लगा। उन्हें बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में 108 मठों के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म को संस्थागत रूप दिया। इन मठों को तिब्बती बौद्ध धर्म के वज्रयान का मुख्य आधार माना जाता है। जांगपो ने पौराणिक 108 मठों में दीवार पेंटिंग और मूर्तियां बनाने के लिए कश्मीरी कलाकारों को लगाया। इनमें से केवल कुछ ही मठ बचे हैं, लद्दाख में अलची मठ परिसर को उनके द्वारा बनाए गए सभी मठों में प्रथम स्थान का गौरव प्राप्त है।

निचले लद्दाख क्षेत्र में अलची तीन गांवों में एक हिस्सा है जो ‘स्मारकों के अलची समूह’ का गठन करते हैं; अलची से सटे अन्य दो गाँव मंग्यू और सुमदा चुन हैं। इन तीन गांवों में स्मारकों को “अद्वितीय शैली और कारीगरी” कहा जाता है, लेकिन अलची मठ परिसर सबसे प्रसिद्ध है। यह एक मात्र मठ है जो पहाड़ी पर स्थित न होकर निचले धरातल पर है। मठ में उस समय के बौद्ध और हिंदू दोनों राजाओं के कलात्मक और आध्यात्मिक विवरण चित्रों में परिलक्षित होते हैं। ये लद्दाख की कुछ सबसे पुरानी पेंटिंग हैं। परिसर में बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ और विस्तृत लकड़ी की नक्काशी और बारोक शैली में कला-कार्य भी हैं।

मठ परिसर में तीन प्रमुख मंदिर हैं: दुखांग (असेंबली हॉल), सुमत्सेक और मंजुश्री का मंदिर , सभी 12 वीं और 13 वीं शताब्दी की शुरुआत के बीच के हैं। चौर्टेंस भी परिसर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके अलावा, अलची परिसर में दो अन्य महत्वपूर्ण मंदिर हैं, अनुवादक का मंदिर जिसे ‘लॉटसभा लखंग’ कहा जाता है और एक नया मंदिर जिसे ‘लखंग ​​सोमा’ कहा जाता है। दुखंग या असेंबली हॉल और एक तीन मंजिला मुख्य मंदिर (gTsug-lag-khang), है, जिसे सुमत्सेग (gSum-brtsegs) कहा जाता है। कश्मीरी शैली में बनाया गया एक चौर्टेंस भी परिसर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। तीसरे मंदिर को मंजुश्री मंदिर (‘जाम-दपाल ल्हा-खांग) कहा जाता है। यहाँ दो सौ रुपए प्रवेश शुल्क जमा कराया जाता है। प्रवेश टिकट लेकर तीनों मंदिरों के दर्शन किये।

निम्मू गाँव

लद्दाख़ की मुख्य नदी सिंधु की मुख्य धारा का उद्गम तिब्बत में मानसरोवर झील के पास है। ज़ांस्कर पर्वत श्रृंखला से इसकी एक सहायक ज़ांस्कर नदी निकलती है। यह लद्दाख के पूर्वोत्तर भाग से होकर बहती है। इस क्षेत्र में ठंड के कारण सर्दियों जम जाती हैं। ज़ांस्कर नदी निम्मू (निमो) गांव में सिंधु नदी में मिलती है। हम निम्मू गाँव पहुँचे। निम्मू चाय-समोसा और चोल-पूरी के लिए बहुत प्रसिद्ध है। निम्मू में रुककर दोपहर का खाना निपटाया और चाय पी।

निम्मू गांव के पास कई पर्यटन स्थल हैं, जिनमें बाजगो, लिकिर और अलची मठ शामिल हैं। यहां का तापमान गर्मियों में 40 डिग्री सेल्सियस से लेकर सर्दियों में -29 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। इतनी कठोर जलवायु और चरम मौसम की स्थिति के कारण बहुत कम वनस्पति आच्छादन है। यहाँ एक जलविद्युत ऊर्जा संयंत्र है जिसे निमु-बाजगो बांध के नाम से जाना जाता है। बाजगो मठ नदी किनारे देखते निकले।

सिंधु नदी भारतीय उपमहाद्वीप को जीवनदायिनी वरदान है। हिमालय महापर्वत उत्तर दिशा से ब्रह्मपुत्र महानद को तिब्बत से बंगलादेश तक पहुँचाता है। वहीं दक्षिण में तिब्बत और पामीर के पठार से अनेकों नदियों को मिलाकर सिंधु महानद को अरब सागर तक पहुँचाता है। मानो हिमालय भारतीय महाद्वीप को दोनों हाथों से सहेज रहा हो। 

सिंधु नदी का कुल जल ग्रहण क्षेत्र 11,65,000  वर्ग किमी से अधिक है। लद्दाख में इसकी बायीं ओर की सहायक नदी ज़ांस्कर है, और मैदानी इलाकों में इसकी बाएँ किनारे की सहायक नदी पंजनाद हैं, जो पंजाब की पाँच नदियों, अर्थात् ब्यास, सतलुज, झेलम, रावी, और चिनाब, के क्रमिक संगम से बनती है। सिंधु उत्तरी भाग में एक पहाड़ी झरने से शुरू होकर हिमालय, काराकोरम और हिंदू कुश पर्वतमाला में ग्लेशियरों और नदियों से पोषित होकर समशीतोष्ण जंगलों, मैदानों और शुष्क ग्रामीण इलाकों के पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करती है। इसकी दाहिने किनारे की सहायक नदियाँ श्योक, गिलगित, काबुल, कुर्रम और गोमल नदियाँ हैं। सिंधु नदी लद्दाख की रीढ़ है; सभी प्रमुख स्थान शे, लेह, बासगो और टिंगमोसगैंग नदी के करीब स्थित हैं।

यह ज़ांस्कर घाटी का क्षेत्र है। सुरू नदी ज़ांस्कर श्रेणी की पश्चिमी और उत्तरी सीमा बनाती है। सुरु कारगिल के उत्तर में थोड़ी दूरी पर द्रास और शिंगो नदियों के संयुक्त जल को प्राप्त करने के बाद बाल्टिस्तान के मरोल में सिंधु में शामिल हो जाता है, जो अब नियंत्रण रेखा के पाकिस्तान की ओर है। रंगदम मठ और जूलिडोक का परिचर गांव सुरु घाटी में अंतिम बसा हुआ क्षेत्र है; यह बकरवाल नामक खानाबदोश चरवाहों का भी गंतव्य है, जो हर गर्मियों में जम्मू क्षेत्र में ट्रेकिंग करते हैं। रंगदम, हालांकि पेन्सी-ला के उत्तरी किनारे पर, सुरू के बजाय सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से ज़ांस्कर का हिस्सा माना जाता है।

ज़ांस्कर घाटी रंगदम से  पेन्सी-ला में 4400 मीटर तक ऊँची हो जाती है। कारगिल सुरू घाटी का एकमात्र शहर, 1947 से पहले व्यापार कारवां के मार्गों पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जो श्रीनगर, लेह, स्कर्दु और पदुम से लगभग 230 किलोमीटर की दूरी पर कमोबेश समान दूरी पर था।

हिमालय के उत्तरी भाग में भारी हिमाच्छादित फ्लैंक के तल पर ज़ांस्कर और सुरु घाटियाँ एक बड़ा ट्रफ़ बनाती हैं। ज़रा देखें ज़ांस्कर नदी कैसे आकार लेती है। ज़ांस्कर घाटी में दो नदियाँ, स्टोड (डोडा) और लुंगनाक (ज़ाराप लिंगती) के कुंड हैं। लुंगनाक की मुख्य सहायक नदियों में से एक ज़ाराप है, जो उत्तरपूर्वी हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों और घाटियों को त्सो मोरीरी (झील) के उत्तर-पश्चिम में सिर्फ 20 किलोमीटर दूर से आती है। बारा-लाचा-ला के उत्तर में थोड़ा दूर यह लिंगटी और एक अन्य सहायक नदी से जुड़ती है; इसके बाद यह उत्तर-पश्चिम की ओर बहती है और अचानक एक दर्रे से होकर दक्षिण की ओर मुड़ जाती है और फुगताल गोम्पा से होते हुए शिंगो-ला से उतरती कारग्याक नदी में मिल जाती है, जो हिमाचल प्रदेश से आती है। स्टोड पेन्सी-ला के नीचे द्रांग-ड्रंग ग्लेशियर पिघला हुआ पानी ले जाता है, और लुंगनाक के पास एक विस्तृत खुली घाटी में बहता है। ज़ांस्कर में भारी हिमपात होता है, पेन्सी-ला केवल जून में खुलता है और अक्टूबर के मध्य में फिर से अवरुद्ध हो जाता है। पूरी घाटी वस्तुतः वृक्षविहीन है। ज़ांस्कर नदी के रूप में इन सबका संयुक्त जल ज़ांस्कर रेंज में एक दर्रे के माध्यम से उत्तर की ओर बहता है, मध्य लद्दाख में निम्मू के नज़दीक में सिंधु नदी में शामिल होता है। उसी संगम के सामने आधा घंटा गुज़ारा।

ग्रीष्मकाल के दौरान, ज़ांस्कर नदी और भी प्रफुल्लित होती है और सर्दियों के दौरान यह हरे रंग में बदल जाती है जबकि सिंधु नीला हो जाता है। सिंधु नदी में राफ्टिंग (जोखिम ग्रेड 1) और ज़ांस्कर नदी में राफ्टिंग (जोखिम ग्रेड 2) लोकप्रिय आउटडोर खेल हैं। ज़ांस्कर और सिंधु नदियों का संगम इसके करीब स्थित है। निम्मू सभी रिवर राफ्टिंग समूहों के लिए एक पड़ाव है और सिंधु नदी में सालाना अखिल भारतीय रिवर राफ्टिंग अभियान के लिए मुख्य प्रारंभिक बिंदु है।

हमने सिंधु नदी और ज़ांस्कर नदियों के संगम पर हिमाच्छादित शिखरों का अवलोकन किया। दो पहाड़ों के बीच बहती नीली-हरी सिंधु नदी का मटमैली ज़ांस्कर नदी के साथ संगम हम देख रहे हैं। रंगों के इस जादुई संगम के चारों ओर अनगढ़ सूखे पहाड़ों ने इसकी जीवंतता को और बढ़ा दिया है। सूर्य की आभा में जुड़ा नीले आसमान से उतरती पहाड़ियाँ – सचमुच भूमि की चुप्पी कितनी प्यारी है। फड़फड़ाते झंडे के साथ उभरते प्रार्थना के स्वरों ने सहूलियत बिंदु के साथ एक शांति जोड़ दी। पूरे वातावरण ने सम्मोहन से आगाह किया कि आप सब कुछ भूलकर मंत्रमुग्ध कर देने वाले परिदृश्य को हृदय में बसा लें।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१२ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – ९ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

दर्रों की लुकाछिपी 

01 जुलाई 2022 को सुबह सात बजे भोपाल से दिल्ली उड़ान पकड़ने राजा भोज विमान तल रवाना होना था। पर्यटन की शुरुआत करने के उत्साह में सुबह की ताजी हवा और भी सुहानी लग रही थी। लगे भी क्यों न, आख़िर हवा बदलने के लिए दुनिया के सबसे ऊँचे स्थान पर स्थित लेह हवाई अड्डे पर उतरने वाले थे। वहाँ की ज़मीन कुछ-कुछ चाँद सी वीरान दिखती है। शायरी में चौदहवीं का चाँद लाजवाब होता है। लेकिन अपोलो-११ के अंतरिक्ष यात्री नील आर्म स्ट्रोंग ने सचमुच के चाँद को बहुत खुरदुरा बताया है। वहाँ पीने को पानी नहीं है और साँस लेना दूभर है। घर के चाँद के सानिध्य में तो साँस कतिपय कारणों से अक्सर तेज हो जाती है। लद्दाख़ में आक्सीजन कम होने से साँस धीमी होने लगती है।

पिछले पंद्रह दिन से इस यात्रा की तैयारी कर रहे थे। चाहे कितनी भी तैयारी कर लो लेकिन अंतिम समय की अफ़रातफ़री से बचा नहीं जा सकता। महिलाओं की तैयारी का आलम बिल्कुल अलहदा होता है। कपड़े-ज़ेवर-जूते-चप्पल और खाने पीने की सामग्री सब गड्डमड्ड हो जाते हैं। लद्दाख़ में समुद्र तल से 14,000 से 18,000 फुट ऊपर अजीबोग़रीब मौसम होता है। वहाँ हरियाली रहित सूखे नंगे पहाड़ हैं जिनके शिखरों पर जमी बर्फ़ पर तेज धूप से दिन में 37-38 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान रहता है परंतु शाम घिर आते ही तापमान एकदम से गिर कर 4-8 डिग्री तक पहुँच जाता है।

आख़िर वह क्षण आ ही गया जब टैक्सी दरवाज़े पर आ खड़ी हुई, और गरम कपड़ों को रखने की अफ़रातफ़री ने माहौल बिगाड़ दिया। भारतीय घरों में अक्सर तनावग्रस्त वातावरण में पर्यटन यात्रा की शुरुआत होती है। आपको तनाव झेलने और उससे निजात पाने की आदत डालना ही होती है। फिर भी कुछ न कुछ सामान छूट ही जाता है। जैसे साबुन, दवाइयाँ, दंतमंजन ट्यूब और ब्रश वग़ैरह। इन चीजों का एक अतिरिक्त पैकेट पहले से ही बैग में रख लेना चाहिए। फिर भी महिलाओं के रबर बैंड, सुई-धागा, अतिरिक्त नाड़ा और सिंदूर डिबिया छूटते-छूटते बचीं। टैक्सी में बैठते ही विमान में अनुमत सामान और हैंडबेग हेतु नियत क्रमशः पंद्रह और दस किलो वजन निर्धारित होने लगा। थोड़ा-थोड़ा करते सामान अधिक हो ही जाता है। फिर कम करते-करते बहुत कम हो जाता है। ख़ैर गहरी साँस लेकर मन के विमान को संतुलित किया। इतने में हवाई अड्डा आ गया। सुरक्षाकर्मी को टिकिट और पहचान के साक्ष्य दिखाकर अंदर घुसे। बोर्डिंग पास के बाद सुरक्षा जाँच में सामान की बिदाई के समय महिलाएँ कुछ इस तरह द्रवित हो रही थीं, मानो बेटी की बिदाई हो रही हो।

सात बजे विमान में बैठने के लिए गेट नम्बर 4 की तरफ़ प्रस्थान किया। सौम्या ने वेब चेक-इन करके सभी की कुर्सियाँ खिड़की की तरफ़ ले ली थीं। तक़रीबन एक घंटा इंतज़ार करते बैठे रहे। विमान में चढ़ने कि घोषणा होने पर विमान में प्रवेश किया। चार उड़नपरियों का समूह विमान के प्रवेश द्वार पर नमस्कार की मुद्रा में कुछ बोलता सा नज़र आ रहा था लेकिन उनके शब्द सुनाई नहीं दे रहे थे। उनसे नज़र मिलाकर धन्यवाद कह आगे बढ़ गये। हमारी सीट 16-A खिड़की किनारे पर थी। नज़दीक जाकर खड़े हुए तो वहाँ एक जोड़ा बैठा था। उन्होंने हमें मूर्ख समझ 16-C की तरफ़ बैठने का इशारा किया लेकिन हम जन्म से ही मूर्ख नहीं हैं। हमने प्रत्युत्तर में आँखों से 16-A की तरफ़ इशारा किया। उन्होंने हमारी बुद्धिमानी से चकित हो खड़े होकर हमें अपनी कुर्सी तक जाने दिया। फिर वे तोता-मैना की तरह चौंच लड़ाने में और हम लद्दाख़ की घाटियों के विचार में खोए यात्रा वृतांत लिखने में व्यस्त हो गये।

विमान ने नियत समय 7:45 पर उड़ान भरी। विमान रनवे याने उड़ान भरने के लम्बे रास्ते पर पहुँचा। कैप्टन के कुछ बुदबुदाने के बाद विमान दौड़ाना शुरू किया। विमान ने पल भर में गति पकड़ ठीक तीस सेकंड में ज़मीन छोड़ दी। उड़ान भरते ही भोपाल का बड़ा तालाब और ताज़ुल मसाज़िद दिखने लगी। अब हम सही के आसमान में उड़ रहे थे। वो वाला नहीं, जिसे लोग कहते हैं “साला आसमान में उड़ रहा है।” ख़्याल आया, ज़मीन पर थे तो आसमान मुट्ठी में नहीं था, आसमान में पहुँचे तो ज़मीन छूट गई। निदा फ़ाज़ली ने क्या ख़ूब कहा है।

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,

कहीं जमीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता।

बग़ल वाला तोता-मैना जोड़ा ग़ैरज़रूरी बातें करके हाथों में हाथ डालकर सो गया। थोड़ी देर बाद हाथ से हाथ छूटे तो मैना का सिर तोता के कंधे पर था। किरदार तो नींद में थे परंतु उनकी बाहों और कलाइयों पर छपे टैटू आपस में जो बयाँ रहे थे। उसे देख हम निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल गुनगुनाने लगे-

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है,

ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबाँ नहीं मिलता।

थोड़ी देर में उनकी साँसों से बिना धुएँ के शोले उठने लगे।

बुझा सका है भला कौन वक़्त (इश्क़) के शोले,

ये ऐसी आग है जिसमे धुआँ नहीं मिलता।

उन्हें देखकर लगा कि इनकी ज़िंदगी का यह रूमानी  वक्त गुज़रने के बाद सब लोगों की तरह ये लोग गुनगुनाएँगे। 

 तेरे जहाँ में ऐसा नहीं कि प्यार न हो,

जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता।

आसमान में उमड़ते-घुमड़ते सफ़ेद बादलों से बातें करते सोचते रहे कि इस घूमती फ़ानी दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है- मुहब्बत भी। इतने में नाश्ता परोसने वाली परिचारिका आ गई। जब से मास्क चलन में आया है, उनकी नक़ली ख़ुशी बिखेरती मुस्कान दिखती नहीं है। वह काली घटाओं को गोल माथे पर से खींच पीछे कसकर जूड़ा बाँधे सिर्फ़ आँखों से बात कर रही थी। नाश्ता भुगतान पर उपलब्ध था। मतलब 295.00 रुपए की सैंडविच, जिसमें 29.00 रुपए से अधिक लागत नहीं लगी थी, GST सहित 307.00 रुपयों में मिल रही थी। सैंडविच की विमान सी ऊँची क़ीमत सुनकर हमें चक्कर आने लगा। ऐसा लगा क़ीमत सुनकर आक्सीजन कम हो रही है। इसीलिए शायद उड़ान के पहले ही विमान में आक्सीजन लेने की विधि से परिचय करा दिया जाता है। विमान हसीना से एक गिलास पानी लेकर गले में उँडेला और दिल्ली पहुँचने लग गए।

तोता-मैना जोड़ा गहन निद्रा में था। शायद कई दिनों से सोया नहीं था। बाहर निकलने के लिए आख़िर उनकी नींद में ख़लल डालना पड़ा। वे चौंक कर उठे। अस्तव्यस्त परिधानों को व्यवस्थित करने लगे। विमान रुका नहीं कि यात्री तुरंत खड़े हो गये। जबकि उतरने की सीढ़ी विमान के दरवाज़े पर लगाने में पंद्रह-बीस मिनट का समय तो लगता ही है। तब तक अपन आराम से बैठे रहे। जब स्थिति धक्कामुक्की से सामान्य हुई तब विमान से उतरना शुरू किया। विमान के दरवाज़े पर पहुँचे तब सीढ़ियाँ ख़ाली थीं। दरवाज़े पर थोड़ा रुककर किसी राष्ट्राध्यक्ष सी धीमी चाल से चारों तरफ़ देखते हुए उतरे। अरे भाई! फोकट में इतराना भी तो एक अदा है। जब कोई न देख रहा हो तो थोड़ा इतराने में क्या हर्ज है। ख़ैर आसमान में उड़कर ज़मीन पर आ गये। कितना भी ऊँचा उड़ लो आख़िर ज़मीन पर तो आना ही पड़ता है।  

ज़मीं की गोद में इतना सुकून है ’आतिश’
जो उतरा वो सफ़र की थकान भूल गया।

 हमें दिल्ली से लेह की उड़ान पकड़नी थी। दिल्ली विमानतल पर प्रस्थान से बाहर निकल पुनः आगमन द्वार से सुरक्षा जाँच उपरांत मालूम पड़ा कि लेह की उड़ान गेट नम्बर 32 से प्रस्थान करेगी। क्रेडिट कार्ड संस्कृति के कुछ फ़िज़ूल खर्ची नुक़सान हैं तो कुछ फ़ायदे भी मिलते हैं। ये किसी-किसी विमानतल पर इग्ज़ेक्युटिव लाउंज में मुफ़्तखोरी करवाते हैं। इत्तफ़ाक़न इग्ज़ेक्युटिव लाउंज गेट नम्बर 32 के बिल्कुल बग़ल में था। थोड़ी लम्बी क़तार थी। क्रेडिट कार्ड की दो रुपया पकड़ जुगाड़ से दस मिनट में लाउंज के अंदर थे। अमेरिकन नाश्ता और हिंदुस्तानी नाश्ता का विकल्प था। हिंदुस्तानी इडली साम्भर चटनी उपमा उदरस्त किया और साथ में काप्पीछिनों काफ़ी का कड़क ज़ायक़ा गले में उतारा। इतनी देर में बोर्डिंग की घोषणा हुई और विमान में चढ़कर खिड़की वाली 18-A कुर्सी पर आसान जमाया।

विमान कप्तान ने बताया लेह का तापमान 32 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक होने के कारण बर्फ़ पर सूर्य रश्मियाँ चकाचौंध पैदा करती हैं। जिससे विमान उतारने में दिक़्क़त हो सकती है। इसलिए 11:45 के तय समय से पूर्व ही 11:30 को उड़ान भरना पड़ेगी। विमान के उड़ान भरते ही गुड़गाँव का कांक्रीट जंगल दिखने लगा। दस मिनट के बाद हम बादलों से बातें कर रहे थे। उसके बाद शिवालिक पहाड़ियाँ, पीर पंचाल पर्वत शिखर दिखने लगे।

शिवालिक पहाड़ियाँ मुख्य हिमालय से उतार की बाह्य हिमालयी पर्वतमाला है, जो  भारतीय महाद्वीप के उत्तरी भाग में पश्चिम में सिंधु नदी  से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक लगभग 2,400 किलोमीटर तक पसरी है। यह लगभग 10–50 किमी चौड़ी है और इसके शिखरों की औसत ऊँचाई 1,500–2,000 मीटर (4,900–6,600 फुट) है। असम में  तीस्ता और रायडक नदी के बीच लगभग 90 किलोमीटर (56 मील) का गलियारा है, जहाँ शिखर कम ऊँचाई के हैं। वहीं से अरुणाचल का रास्ता है। यह हिमायल पर्वत प्रणाली के दक्षिणतम और भूगर्भ शास्त्रीय दृष्टि से, कनिष्ठतम पर्वतमाला कड़ी है। इसकी औसत ऊंचाई 850-1200 मीटर है और इसकी कई उपश्रेणियां भी हैं। यह 1600 कि॰मी॰ तक पूर्व में तीस्ता नदी सिक्किम से पश्चिमवर्त नेपाल और उत्तराखंड से कश्मीर  होते हुए उत्तरी पाकिस्तान तक जाते हैं। बीच में शाकंभरी देवी की पहाडियों से सहारनपुर,  देहरादून मसूरी  के पर्वतों में जाने हेतु मोहन दर्रा  प्रधान मार्ग है। “शिवालिक” का अर्थ “शिव की जटाएँ” है। शिवालिक से उत्तर में ऊँची हिमालय पर्वत माला  है, जो मध्य हिमालय भी कहलाती है। एक पौराणिक मिथक के अनुसार रघु कुल के भागीरथी प्रयासों से गंगा स्वर्ग से धरा पर आने की सहमत हुईं लेकिन उनके तीव्र वेग को पृथ्वी पर झेलना मुश्किल था। शिव अपनी जटाएँ फैलाकर कैलाश पर्वत पर विराजमान हुए, तब उनकी जटाएँ हिमालय की तराई तक फैल गईं, वे ही शिवालिक पहाड़ियाँ कहलाती हैं। 

लेह में चटक तेज धूप की अल्ट्रा वायोलेट किरण बर्फीले पहाड़ों पर पड़कर गर्मी बढ़ा देती है। सूर्य रश्मियों की तेज़ी नज़र को दृश्यों पर थमने नहीं दे रही थी। आसमान में मानसूनी बादलों का दूल्हा बिना बूँदों की बारात नृत्य कर रहा था। विमान को बादलों से ऊपर उठाने के प्रयास में विमान बुरी तरह हिलने लगा। कुछ लोग घबराहट में एक दूसरे को देखने लगे। वैसे भी विमान में सिवाय उड़नपरियों को देखने के अलावा और कुछ था भी नहीं। कुछेक को उल्टियाँ होने लगीं। थोड़ी देर में भोजन परोसने की घोषणा हुई। सवारियाँ चौकन्नी हो गईं। उनकी जीभें लपलपाने लगीं। यह जानकारी मिलते ही कि भोजन भुगतान पर उपलब्ध है, सुनते ही सबने अपनी जीभें समेट लीं। हमारी टिकट कारपोरेट बुकिंग में होने से मुफ़्त नाश्ते में सजीधजी सैंडविच एक गिलास पानी के साथ परोसी गई।

विमान आधा घंटे बाद 18000 फुट की ऊँचाई पर था। बादल नदारत और उनकी जगह धूप में झुलसते हिम शिखरों ने ले ली। हिमालय का अर्थ ही हिम का आलय याने बर्फ़ का भंडार होता है जैसे पुस्तकों का भंडार पुस्तकालय होता है। पायलट ने सूचना दी कि सब हम लेह पहुँचने वाले हैं। सभी यात्री कुर्सी सीधी करके बेल्ट कस लें। विमान सुविधाजनक तरीक़े से नीचे पहुँचने लगा। फ़ौज की छावनी दिख रही थी। उसके ठीक बाजू की हवाई पट्टी पर विमान उतरा। लेह की हवाई पट्टी फ़ौजी है। उसे नागरिक विमान उतरने की अनुमति है। सामान समेटकर बाहर निकले। एक टैक्सी चालक हमारे नाम की तख़्ती लिए खड़ा था। सवार होकर लेह शहर के बीच में स्थित मानसरोवर होटल पहुँच गये।

लेह की मानसरोवर होटल में पहले माले पर कमरा मिला। कमरे में पंखा या एसी होने को कोई प्रश्न नहीं है। दिन में यद्यपि 38 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान है परंतु रात ढलते ही सात डिग्री पर खिसक जाएगा। रूम हीटर चलाना पड़ता है। स्वागत पेय के रूप में बढ़िया गाढ़े लीकर की चाय पीकर मज़ा आ गया। स्थानीय नियमों के अनुसार शरीर के थर्मोस्टेट को सेट करने और कोविड नियमावली पालन हेतु एक दिन का आराम आवश्यक है। चार बजे पैदल घूमने निकले तो घरों में सेवफल से लदे पेड़ दिखे। बाक़ी दिन आराम किया। मुफ़्त के खाने का भी एक अलग मज़ा होता है। होटल की तरफ़ से सौजन्य रात्रिभोज करके जल्दी सोने चले गये।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-११ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – ८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-११ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

विपश्यना

विपश्यना एक प्राचीन और अद्भुत ध्यान पद्धति है। इसका शाब्दिक अर्थ है, देखकर लौटना। मतलब आओ, देखो, अनुभव करो और लौट जाओ, रुको मत।  यह “पशयन्ति” धातु से बना शब्द है। पशयन्ति याने देखना, विपशयन्ति याने विशेष देखना। विशेष के मायने चार आर्य सत्यों- दुख, दुख का कारण तृष्णा, दुख निरोध और आष्टांग मार्ग सहित सुख दुख की क्षणिक वेदना को तटस्थ भाव से देखना। विपश्यना आत्मनिरीक्षण की एक प्रभावकारी विधि है। यह प्राणायाम और साक्षीभाव का मिला-जुला रूप है। दरअसल, यह साक्षीभाव का ही हिस्सा है। साक्षी भाव मतलब जो कुछ घटित हो रहा है, आप उसके साक्षी हैं, न अतीत में हैं और न भविष्य में, सिर्फ़ उसी क्षण में हैं जिसमें hगुजर रहे हैं। चिरंतन काल से ऋषि-मुनि इस ध्यान विधि को करते आए हैं। भगवान बुद्ध ने इसको सरलतम बनाया। इस विधि के अनुसार अपनी श्वास को देखना और उसके प्रति सजग रहना होता है। देखने का अर्थ उसके आवागमन को महसूस करना। उन्होंने इसका अभ्यास लोगों से भी करवाया था।

विपश्यना बड़ा सीधा-सरल प्रयोग है। अपनी आती-जाती श्वास के प्रति साक्षीभाव। प्रारंभिक अभ्यास में उठते-बैठते, सोते-जागते, बात करते या मौन रहते किसी भी स्थिति में बस श्वास के आने-जाने को नाक के छिद्रों में महसूस करें। अब तक आप अपनी श्वासों पर ध्यान नहीं देते थे लेकिन अब स्वाभाविक रूप से उसके आवागमन को साक्षी भाव से देखें या महसूस करें कि ये श्‍वास छोड़ी और ये ली। श्‍वास लेने और छोड़ने के बीच जो अंतर है, उस पर भी सहजता से ध्यान दें। जबरन यह कार्य नहीं करना है। बस, जब भी ध्यान आ जाए तो सब कुछ बंद करके इसी पर ध्यान देना ही विपश्यना है।

आप दूसरे चरण में बीच-बीच में यह भी देखें कि एक विचार आया और गया, दूसरा आया और गया…… यह क्रोध आया और गया….. आशा आई और गई…… निराशा आई और गई। किसी भी चीज से किसी भी स्थिति पर जुड़ना नहीं होना है। बस चुपचाप तटस्थ भाव से देखना है कि आपके मन, मस्तिष्क और शरीर में किस तरह की क्रिया और प्रतिक्रियाएं होती रहती है। देह और अनुभूतियों से विलग हो उन्हें देखना भर है।  

विपश्यना को करने के लिए किसी भी प्रकार के तामझाम की या एकांत में रहने की जरूरत नहीं। इसका अभ्यास भीड़ और शोरगुल में रहकर भी किया जा सकता है। बाइक चलाते हुए, बस में बैठे, ट्रेन में सफर करते, कार में यात्रा करते, राह के किनारे, दुकान पर, ऑफिस में, बाजार में, घर में और बिस्तर पर लेटे हुए कहीं भी इस विधि को करते रहो और किसी को पता भी नहीं चलेगा कि आप ध्यान कर रहे हैं।

शरीर और जीव के बीच श्‍वास ही एक ऐसा सेतु है, जो हमारे विचार और भावों को ही संचालित नहीं करता है बल्कि हमारे शरीर को भी जिंदा बनाए रखता है। श्वास जीवन है। बुद्ध कहते हैं कि यदि तुम श्वास को ठीक से देखते रहो, तो अनिवार्य रूपेण, अपरिहार्य रूप से, तुम शरीर से भिन्न अपने को जानने लगोगे। जो श्वास को देखेगा, वह श्वास से भिन्न हो गया, और जो श्वास से भिन्न हो गया वह शरीर से तो भिन्न हो ही गया। शरीर से छूटो, श्वास से छूटो, तो शाश्वत अनुभूति का अहसास होता है। उस दर्शन में ही उड़ान है, ऊंचाई है, उसकी ही गहराई है। बाकी न तो कोई ऊंचाइयां हैं जगत में, न कोई गहराइयां हैं जगत में। बाकी तो व्यर्थ की आपाधापी है।

इससे तनाव हट जाता है। नकारात्मक और व्यर्थ के विचार नहीं आते। मन में हमेशा शां‍ति बनी रहती है। मन और मस्तिष्क के स्वस्थ रहने से इसका असर शरीर पर भी पड़ता है। शरीर के सारे संताप मिट जाते हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ यह कि यदि आप इसे निरंतर करते रहे तो स्वयं से साक्षात्कार होने लगता है और मोह कटने लगता है।

उपेक्षा-अपेक्षा

गौतम बुद्ध अधिक व्यावहारिक थे। घायल हंस की कथा आती है, जिसके संदर्भ में वे कहते हैं कि जरूरी यह नहीं है कि जिस तीर से हंस घायल हुआ, वह तीर कहां से आया, तीर चलाने वाला कौन था, उसने किस उद्देश्य से तीर चलाया? इन प्रश्नों के उत्तर ढूढऩे की अपेक्षा जरूरी है हंस को घाव से निजात दिलाने का प्रयत्न करना। ऐसे या वैसे लोग संसार में है या नहीं, संसार क्षणिक है या अनन्त, आत्मा और शरीर एक है या भिन्न-भिन्न, आत्मा है या नहीं, पुनर्जन्म है या नहीं। इन प्रश्नों को पाली साहित्य में अव्यक्तानि कहा गया है। इनके बारे में कुछ कहना ठीक नहीं, अत: ऐसे प्रश्नों पर भगवान बुद्ध मौन रह जाते थे। जिनका बोध यही था कि व्यक्ति ऐसे प्रश्नों में उलझकर विवाद को जन्म न दें। बल्कि अपना कर्तव्य आसानी से करता रहे। इन प्रश्नों की उपेक्षा करते हुए तटस्थ भाव से जीवन यापन करते किसी से कोई अपेक्षा न करे। अपेक्षा से ही तृष्णा जागती है।  

बोधि 

गौतम बुद्ध ने जिस ज्ञान की प्राप्ति की थी उसे ‘बोधि’ कहते हैं। माना जाता है कि बोधि पाने के बाद ही संसार से छुटकारा पाया जा सकता है। सारी पारमिताओं (पूर्णताओं) की निष्पत्ति, चार आर्य सत्यों की पूरी समझ और कर्म के निरोध से ही बोधि पाई जा सकती है। बोधि प्राप्ति से लोभ, दोष, मोह, अविद्या, तृष्णा और कथित आत्मा में विश्वास सब गायब हो जाते हैं।

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गोरखपुर

21 जून 2022 को गोरखपुर से भोपाल के लिए ट्रेन पकड़ने हेतु लुम्बिनी से गोरखपुर पहुँचना है। जिसके लिए पहले टैक्सी से 30 किलोमीटर सुनौली बॉर्डर जाना होगा। वहाँ से 95 किलोमीटर गोरखपुर है। गोरखपुर से शाम छै बजे भोपाल के लिए ट्रेन पकड़ना है।   

भैरहवा भारतीय सीमा पर नेपाल का आख़िरी बस्ती है। बॉर्डर पार करके भारत की सीमा में पहली बसावट सोनौली शहर है। बॉर्डर के नज़दीक पहुँचते ही गोरखपुर ले जाने वाले टैक्सी ड्राइवर पीछे पड़ने लगे।  हमारे मास्टर नेगोशीएटर जवाहर जी ने एक-दो को हड़का कर तीसरे ड्राइवर को कोने में ले जाकर गोरखपुर पहुँचाने हेतु दो हज़ार माँगने वले टैक्सी ड्राइवर से गोरखनाथ मंदिर दर्शन कराकर स्टेशन छोड़ने का सौदा सत्रह सौ में पटा लिया। टैक्सी में सामान रखकर बॉर्डर पर पहुँचे। भारतीय सिपाही ने पूछा कहाँ जा रहे हैं। हमारे भोपाल बताने पर उसने हमारे एक सदस्य को टेंट में बैठे एक पुलिसकर्मी के पास विवरण लिखने को भेजा। पाँच मिनट में काम निपट गया। 

दो दिन से खांसी परेशान कर रही थी। वहीं एक दवाई की दुकान दिख गयी। केमिस्ट को कहा- कॉफ़ सिरप दे दो। उसने पूछा कौन सा?, हमने कहा डॉक्टर जो सिरप मरीज़ों सबसे ज़्यादा लिख रहे हैं, वही दे दो। उसने मुस्कुरा कर सिप्ला कम्पनी की rexcof 116.00 मूल्य छपी शीशी 100.00 में पकड़ा दी। दो ढक्कन उँडेला तो अंदर से बाहर खुलने वाला खांसी ढक्कन बंद होने लगा। रास्ते में दशहरी आम की बहार आई थी। सड़क किनारे से डाल के पके साठ रुपए किलो के हिसाब से पाँच किलो आम ख़रीद कार की डिक्की को मालामाल कर दिया। अगला पड़ाव प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर था। साढ़े दस बजे हम गोरखनाथ मंदिर में थे।

गोरखपुर

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर में स्थित बाबा गोरखनाथ मंदिर के नाम पर इस जिले का नाम गोरखपुर पड़ा है। गोरखनाथ मन्दिर के वर्तमान महन्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी है। एक साधु से दिखते विद्वान व्यक्ति मिले। हमने नाथ सम्प्रदाय के बारे में पूछा। उन्होंने विस्तार पूर्वक पूरी कहानी सुना दी। हिन्दू धर्म, दर्शन, अध्यात्म और साधना के अंतर्गत विभिन्न संप्रदायों और मत-मतांतरों में ‘नाथ संप्रदाय’ का प्रमुख स्थान है। संपूर्ण देश में फैले नाथ संप्रदाय के विभिन्न मंदिरों तथा मठों की देख रेख यहीं गोरखपुर से होती है। नाथ सम्प्रदाय की मान्यता के अनुसार सच्चिदानंद शिव के साक्षात् स्वरूप ‘श्री गोरक्षनाथ जी’ सतयुग में पेशावर, त्रेतायुग में गोरखपुर, द्वापर युग में द्वारिका के पास हरमुज, तथा कलियुग में गोरखमधी, सौराष्ट्र में आविर्भूत हुए थे।  

उन्होंने चारों युगों में विद्यमान एक अयोनिज अमर महायोगी, सिद्ध महापुरुष के रूप में एशिया के विशाल भूखंड तिब्बत, मंगोलिया, कंधार, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, सिंघल तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपने योग से मानवता को कृतार्थ किया था।  

यहां यह भी स्मरणीय है कि महान बालसंत ज्ञानेश्वर महाराज, जिन्होंने भगवद्गीता  पर सुप्रसिद्ध ग्रंथ “ज्ञानेश्वरी” लिखा,भी नाथपंथ से दीक्षित थे,तथा उनके सद्गुरु भी उनके सगे सहोदर भ्राता निवृत्तिनाथजी भी नाथपंथ से शिक्षित-दीक्षित थे।निवृत्तिनाथजी की समाधि भी नासिक ज्योतिर्लिंग से मात्र लगभग आधा पौन किलोमीटर नासिक नगर में ही में मुख्य बाजार की मेनरोड़ पर ही है।

नाथपंथी या नाथवंशी यह मूल रूप से नाथ समाज में श्रेष्ठ जोगी समाज से होते हैं! या यूँ कह सकते हैं कि वे शिव के वंशज होते है जो शिव शैवनाथ ब्राह्मण के नाम से भी जाने जाते हैं। एशिया के देशों नेपाल में 20%, भारत में 13 .5%, भूटान में 3% नाथ लोग मिलते हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, तिब्बत, बांग्लादेश और रंगून में नाथवंशियो के अनुयायी को मानने वाले लोग होते हैं।  

गोरक्षनाथ मंदिर गोरखपुर में अनवरत योग साधना का क्रम प्राचीन काल से चलता रहा है। ज्वालादेवी के स्थान से परिभ्रमण करते हुए ‘गोरक्षनाथ जी’ ने भगवती राप्ती के तटवर्ती क्षेत्र में आकर तपस्या की थी और उसी स्थान पर अपनी दिव्य समाधि लगाई थी, जहाँ वर्तमान में ‘श्री गोरखनाथ मंदिर (श्री गोरक्षनाथ मंदिर)’ स्थित है। उज्जैन के भर्तृहरि का भी नाथ सम्प्रदाय से सम्बंध था। नाथ योगी सम्प्रदाय के महान प्रवर्तक ने अपनी अलौकिक आध्यात्मिक गरिमा से इस स्थान को पवित्र किया था, अतः योगेश्वर गोरखनाथ के पुण्य स्थल के कारण इस स्थान का नाम ‘गोरखपुर’ पड़ा। महायोगी गुरु गोरखनाथ की यह तपस्याभूमि प्रारंभ में एक तपोवन के रूप में रही होगी और जनशून्य शांत तपोवन में योगियों के निवास के लिए कुछ छोटे- छोटे मठ रहे, मंदिर का निर्माण बाद में हुआ। आज हम जिस विशाल और भव्य मंदिर का दर्शन कर हर्ष और शांति का अनुभव करते हैं, वह ब्रह्मलीन महंत श्री दिग्विजयनाथ जी महाराज जी की ही कृपा से अस्तित्वमान हुआ है। वर्तमान पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ जी महाराज के संरक्षण में श्री गोरखनाथ मंदिर विशाल आकार-प्रकार, प्रांगण की भव्यता तथा पवित्र रमणीयता को प्राप्त हो रहा है। पुराना मंदिर नव निर्माण की विशालता और व्यापकता में समाहित हो गया है। हमारे पहुँचने के दिन योग दिवस होने से सुबह ही योग दिवस कार्यक्रम हुआ था। पहले हमने मंदिर में योगियों की मूर्तियों के दर्शन किए। उसके बाद प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण करके चार बजे गोरखपुर रेल्वे स्टेशन पहुँच गये।

ट्रेन रवानगी का समय छै बजे का था। हमारी बहुत दिनों से गीता प्रेस जाने की उच्चतम इच्छा थी लेकिन अवसर नहीं बन पा रहा था। जवाहर जी ने गीता प्रेस का प्रस्ताव रखा। जवाहर जी के साथ विश्व प्रसिद्ध गीता प्रेस भ्रमण को गये। जवाहर जी ने गेट पर पहुँच कर इंटर्काम से मैनेजर साहिब से बात की तो उन्होंने सलाह दी कि हम लोग चित्र दीर्घा और पुस्तक भंडार देखकर उनके कार्यालय आ जायें।

हम गीता प्रेस के प्रबंधक लालमणि तिवारी से बात करके दंग रह गये। उन्होंने बताया अभी कुछ दिन पहले ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी का गीता प्रेस आना हुआ था। उन्होंने संस्था के प्रन्यासियों सहित उन्हें 24 जून 2022 राष्ट्रपति भवन आमंत्रित किया है कि विदेशों में दूतावासों के माध्यम से गीता प्रेस की किताबों को वहाँ के समाज में पहुँचाया जाये। उसी तारतम्य में तैयारी चल रही है। उन्होंने बताया कि रामचरितमानस और हनुमान चालीसा की माँग इतनी अधिक है कि कई कोशिशों के बावजूद पूरा नहीं किया जा सकता है। कोविड के बाद माँग में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। रामचरितमानस की एक साल में एक करोड़ प्रतियाँ बिक जाती हैं।

हमने पूछा गीता प्रेस की किताबें बाज़ार से कम मूल्य पर कैसे मिलती हैं। उनका कहना था कि किसी भी किताब पर लाभ नहीं कमाया जाता। क़ीमत में स्थायी लागत (fixed cost) को भी शामिल नहीं किया जाता। चल लागत ही विक्रय मूल्य होता है। ट्रस्टी एक भी पैसा नहीं लेते और न किसी सुविधा का लाभ उठाते हैं। यहाँ तक कि अभी राष्ट्रपति भवन जाना है तो ट्रस्टी खुद के ख़र्चों पर जाएँगे। किसी प्रकार का कोई सरकारी या ग़ैर-सरकारी दान भी नहीं लिया जाता है।  

गीता प्रेस भ्रमण से हमारी एक बहुत पुरानी इच्छा पूरी हुई। हमारी इच्छा गीता प्रेस से छै खंडों में प्रकाशित 2700/- मूल्य की टीका सहित मूल महाभारत ख़रीदने की थी। बेचवाल किताबों का सेट निकलवा कर बिल काटने ही वाले थे, तभी पुस्तकों का बड़ा वज़नी पैकेट आ गया। जिसे ले जाने में दिक़्क़त हो सकती थी। उसमें 450/- भिजवाने का खर्चा जुड़वा कर 3150/- भुगतान करके इच्छापूर्ति सम्भव हुई। अब हम अपने घर पर “महाभारत पाठक मंच” बनाकर अध्ययन करने की दिशा में एक कदम बढ़ा चुके हैं।

इति वृतांत

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-१० – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – ७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-१० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

बुद्ध दर्शन

जिस समय एकेश्वरवाद धर्मों के स्वयंभू पुजारी धर्म के “ध” की बारहखड़ी सीख कर रहे थे उस समय तक भारतीय दर्शन ईश्वर को चुनौती देकर मानव समाज के लिए आवश्यक “सहिष्णु-व्यक्तित्व” के गठन हेतु स्वयं को संयमित और व्यवस्थित करके दूसरों लोगों ही नहीं जीव जगत और प्रकृति के साथ अन्योन्याश्रित सम्बंधों के गणित का कठिन प्रश्न हल कर रहे थे। भारतीय चिंतकों ने मनुष्य के भाग्य को भगवान भरोसे छोड़ने की बजाय खुद ज़िम्मेदार होने की ज़िम्मेदारी लेना सिखाना शुरू कर दिया था।

गौतम बुद्ध जिन्हें बौद्ध दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है, उनके लिए संसार दुखों का घर है। संसार में आने वाला हर प्राणी दुखों का पुंज लेकर धरती पर आता है। संसार में कोई आए और दुखों से उसका सम्बन्ध न हो, यह असम्भव है। समस्त बौद्ध विचार “चत्वारि आर्य सत्यानि” में समाहित है। चार आर्य सत्यों की यात्रा निर्वाण की यात्रा है। जिसकी शुरुआत दुख से होती है। किसी को पिता के मरने का दुख, किसी को पत्नी के मरने का, किसी को विवाह न होने का दुख तो किसी को रोगी होने का और किसी को अभीप्सित की पूर्ति न होने का दुख। संसार में दुख ही दुख हैं और संसार दुखों का घर है। चार आर्यसत्य, पंचशील, अष्टांगिक मार्ग आदि के रूप में बुद्ध को प्राप्त ज्ञान और उनकी शिक्षाएँ समझी जा सकतीं हैं।

चार आर्य सत्य

तथागत बुद्ध का पहला धर्मोपदेश, जो उन्होने अपने साथ के कुछ साधुओं को दिया था, इन चार आर्य सत्यों के बारे में था। बुद्ध ने चार आर्य सत्य बताये हैं।

 1.दुख

  • इस दुनिया में दुःख है। जन्म में, बूढे होने में, बीमारी में, मौत में, प्रियतम से दूर होने में, नापसंद चीज़ों के साथ में, चाहत को न पाने में, सब में दुख है। गौतम बुद्ध दु:ख से संसार की यात्रा की शुरुआत मानते हैं किन्तु उनका लक्ष्य दुखों को स्थापित करना नहीं था। दु:ख की चर्चा दुख को जानने के लिए करते हैं, उसके कारणों को ढूंढऩे के लिए करते हैं।

2.दुख का कारण

  • दुख है तो उसका कारण भी है, जैसे डॉक्टर रोग के निदान के लिए रोग के कारणों को ढूंढते हैं तो रोग का सटीक निदान होता है, वैसे ही दुख है तो दुख का कारण है और जब कारण का पता चल जाता है तो उसका निवारण हो जाता है।
  • तृष्णा, या चाहत, दुख का कारण है और वह फ़िर से सशरीर धारण करके संसार को जारी रखती है। हर जन्म से तृष्णा और भी गहन होती जाती है।
  • भारतीय दर्शन के सन्दर्भ में तृष्णा का अर्थ ‘प्यास, इच्छा या आकांक्षा’ से है। तृष्णां, तृ मतलब तीन, इष्णा मतलब लालच। तीन लालच, पहला धन का लालच, दूसरा पुत्र (वंश) का लालच, तीसरा सम्मान का लालच।

3.दुख निरोध

  • तृष्णा के निराकरण से दुख निरोध सम्भव है। किसी वस्तु की तृष्णा से उसे ग्रहण करने की जो प्रवृत्ति होती है, उसे उपादान कहते हैं। उपादान से ही प्राणी के जीवन की सारी भागदोड़ होती है, जिसे भव कहते हैं। तृष्णा के न होने से उपादान भी नहीं होता और उपादान के निरोध से भव का निरोध हो जाता है। यही निर्वाण के लाभ की दिशा है। हम उपादान और प्रतीत्यसमुत्पादन की चर्चा आगे करेंगे।
  • प्रतीत्यसमुत्पादन की दूसरी कड़ी ‘तण्हापच्चया उपादानं’ – इसी का प्रतिपादन करती है।
  • दुःख-निरोध के आठ साधन बताये गये हैं जिन्हें ‘अष्टांगिक मार्ग’ कहा गया है। तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है। बुद्ध दु:खों के निदान के लिए ही दुख का उल्लेख करते हैं। इसे वे दुख निरोध कहते हैं।

4.दुख निरोध का मार्ग

  • तृष्णा से मुक्ति अष्टांगिक मार्ग के अनुसार जीने से पाई जा सकती है। दुख निरोध के लिए दु:ख निरोध मार्ग भी बताते हैं। अत: उनका लक्ष्य दुख निरोध मार्ग से दुख दूर कर निर्वाण को प्राप्त करना है।

जन्म दुख है, ज़रा दुख है, व्याधि दुख है, मरण दुख है, प्रिय से बिछुड़ना दुख है, अप्रिय से मिलना दुख है। जीवन के दो छोर जन्म और मृत्यु दुख से भरे हैं। सुख-दुख एक सिक्के के दो पहलू हैं। सुख लेना छोड़ दें तो दुख स्वमेव छूटना तय है।

अष्टांगिक मार्ग

बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथा आर्य सत्य अष्टांग मार्ग है दुःख निरोध पाने का रास्ता। गौतम बुद्ध कहते थे कि चार आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करके इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए :

प्रज्ञा

  • सम्यक् दृष्टि- वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप को जानना ही सम्यक् दृष्टि है। कामना प्रकट होती है नष्ट हो जाती है। सुख स्थायी नहीं है।
  • सम्यक् संकल्प- आसक्ति, द्वेष तथा हिंसा से मुक्त विचार रखना ही सम्यक् संकल्प है। कामना से अनासक्त होना संकल्प है।

शील

  • सम्यक् वाक्- सदा सत्य तथा मृदु वाणी का प्रयोग करना ही सम्यक् वाक् है। वही वाणी अनासक्त है।
  • सम्यक् कर्मान्त- इसका आशय अच्छे कर्मों में संलग्न होने तथा बुरे कर्मों के परित्याग से है।
  • सम्यक् आजीव- विशुद्ध रूप से सदाचरण से जीवन-यापन करना ही सम्यक् आजीव है।

समाधि

  • सम्यक् व्यायाम- अकुशल धर्मों (अति) का त्याग तथा कुशल धर्मों (मध्यम) का अनुसरण ही सम्यक् व्यायाम है।
  • सम्यक् स्मृति- इसका आशय वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप (उत्पत्ति-भव) के संबंध में सदैव जागरूक रहना है।
  • सम्यक् समाधि – चित्त की समुचित एकाग्रता ही सम्यक् समाधि है। अविचलित चित्त समाधि की पूर्व शर्त है।

सत्य और अहिंसा आंतरिक सफ़ाई तथा ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह बाहरी बुहारियाँ हैं। सम्पूर्ण सफ़ाई से ही निर्वाण सम्भव है। अष्टांगिक मार्ग अनुसरण पूर्व पंचशील समझना अनिवार्य बताया है।

पंचशील

भगवान बुद्ध ने अपने अनुयायिओं को पांच शीलों का पालन करने की शिक्षा दी है।

1.अहिंसा

  • पालि में – पाणातिपाता वेरमनी सीक्खापदम् सम्मादीयामी !
  • अर्थ – मैं प्राणि-हिंसा से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।

2.अस्तेय

  • पालि में – आदिन्नादाना वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
  • अर्थ – मैं चोरी से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।

3.अपरिग्रह

  • पालि में – कामेसूमीच्छाचारा वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
  • अर्थ – मैं संग्रह व व्यभिचार से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।

4.सत्य

  • पालि नें – मुसावादा वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
  • अर्थ – मैं झूठ बोलने से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।

5.सभी नशा से विरत

  • पालि में – सुरामेरय मज्जपमादठटाना वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी।
  • अर्थ – मैं पक्की शराब (सुरा) कच्ची शराब (मेरय), नशीली चीजों (मज्जपमादठटाना) के सेवन से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।

इन आचरण शील पर स्थिर होने के बाद आष्टांगिक मार्ग अनुसरण होता है।

निर्वाण है तो उसके प्राप्ति का मार्ग भी है। बौद्ध दर्शन में इसे अष्टांग मार्ग कहा गया है। सम्यक् दृष्टि अर्थात जैसी वस्तु है वैसा ज्ञान है। सम्यक् संकल्प अर्थात दृढ़ इच्छा शक्ति है। दृढ़ इच्छा को वाणी में उतरना सम्यक् वाक् है। केवल वाणी में ही उतरना नहीं अपितु व्यवहार में उतारना सम्यक् कर्म है। सम्यक् आजीव, व्यायाम, सम्यक् स्मृति के अभ्यास के लिए बुद्ध ने विस्तृत उपदेश दिया है।

कुछ लोग आर्य अष्टांग मार्ग को पथ की तरह समझते है, जिसमें आगे बढ़ने के लिए, पिछले के स्तर को पाना आवश्यक है। और कुछ लोगों को लगता है कि इस मार्ग पर सब साथ-साथ चलते जाते हैं। अष्टांग मार्ग को तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है : प्रज्ञा, शील और समाधि।

बौद्ध दर्शन में प्रज्ञा, शील और समाधि के अन्तर्गत अष्टांग मार्ग को समाहित किया गया है। प्रज्ञा के अन्तर्गत सम्यक् दृष्टि व सम्यक् संकल्प आते हैं। प्रज्ञा से व्यक्ति की दृष्टि और संकल्प सधते हैं। शील में सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीव एवं सम्यक् व्यायाम समाहित है। शील में वाणी, कर्म स्वत: आ जाते है। पेशा या व्यवसाय भी शील के ही अंग है। अच्छा करने और बुरा रोकने का अभ्यास शील है। प्रज्ञा और शील की सुखद यात्रा के बाद समाधि तक पहुंचा जाता है। समाधि के पूर्व स्मृति भी समाधि में स्वत: समाहित है। अष्टांगमार्ग को प्रज्ञा, शील और समाधि जैसे त्रिरत्न के अंतर्गत रखा गया है जो जैन त्रिरत्नज्ञान, दर्शन और चारित्र से पृथक है। पूर्ण प्रज्ञा, पूर्ण शील और पूर्ण समाधि से निर्वाण संभव है।

प्रतीत्य समुत्पाद

बौद्ध दर्शन में  “कर्म और फल का सिद्धांत” एक मौलिक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है। जिसे पाली भाषा में पटिच्चसमुप्पाद, संस्कृत में ‘प्रतीत्य समुत्पाद’ और इंग्लिश में dependent coercing कहा जाता है। हिंदी में इसे कार्य-कारण, कारण-परिणाम या फिर कर्म और विपाक (विपाक अर्थात कर्म का फल) का सिद्धांत भी कहा जाता है. प्रतीत्य समुत्पाद को ‘भवचक्र’ भी कहा जाता है क्यूंकि ये हमारे भव या becoming का विश्लेषण है। प्रतीत्य समुत्पाद को  ‘द्वादशनिदान’ भी कहा जाता है। इसमें बारह बिंदु हैं और इन बिन्दुओं में पूरे जीवन का निदान या diagnosis है। प्रतीत्य समुत्पाद तृष्णा तिरोहिति व्रत है।

प्रतीत्य समुत्पाद में प्रतीत्य शब्द का अर्थ है घटना घटित हो जाने पर या घटना के बीत जाने पर और समुत्प्पाद का अर्थ है नई घटना या कुछ नया उत्पन्न होना। सरल शब्दों में इसका अर्थ हुआ कि “एक घटना घटित हो जाने के परिणाम स्वरुप कोई और घटना घट जाती है और यह सिलसिला जारी रहता है।” यह क्रम सीधा और सरल ना होकर एक जटिल जाल की तरह है। जल, थल और नभ में हर क्षण कुछ न कुछ घटित होता रहता है और इन घटनाओं के मिलेजुले परिणाम होते रहते हैं। जो दूसरी घटनाओं को उत्पन्न करते रहते हैं। इन सब घटनाओं का एक प्रवाह चलता रहता है। अर्थात संसार परिवर्तनशील है। ये घटनाएं भौतिक हों या अभौतिक, चेतन हों या अचेतन, विचार हों या वस्तु किसी ना किसी कारण से होती हैं बिना कारण के नहीं। इसका कोई अपवाद नहीं है।

प्राणी समाज के लिए घटनाएं कर्म पर आधारित हैं और उनके परिणाम (विपाक) के अनुसार फिर कर्म का चक्र आगे चलता रहता है। क्योंकि संसार का चक्र परिवर्तनशील है इसलिए दुखदायी है। दूसरे शब्दों में कारण के होने पर ही कार्य होता है और कारण ना होने पर कार्य नहीं होता जिसका अर्थ है की हम दुःख को समझ लें, कारण ढूँढ लें तो दुःख को रोक पाएंगे।

गौतम बुद्ध ने प्रतीत्य समुत्पाद के माध्यम से जटिल जीवन चक्र को बड़ी सरलता से समझाया है। संयुक्त निकाय के बुद्ध वर्ग के विपस्सी सुत्त में गौतम बुद्ध कहते हैं कि-

“भिक्खुओ बौद्ध होने से पहले जब मैं विपश्यना (मैडिटेशन) कर रहा था तो मन में सवाल थे – यह लोक दुखों से घिरा हुआ है। मानव पैदा होता है, बूढ़ा होता है, मर जाता है, और फिर जन्म  लेता है। इस दुःख भरे चक्र से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है? मैं इस जरा-मरण के दुःख से छुटकारा जान पाया?” यह प्रतीत्य समुत्पाद चक्र है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति फँसा है।”

प्रतीत्य समुत्पाद चक्र के द्वादश बिंदुओं को सरल ढंग से भी समझा जा सकता है।

  1. जरा-मरण क्या है?

किसी भी जीव का ढल जाना, दांत गिरना, झुर्रियां पड़ना, बाल सफ़ेद हो जाना, इन्द्रियों का शिथिल पड़ जाना, बूढ़ा होना इत्यादि ‘जरा’ या जर्जर होना (ageing) कहलाता है। पांच स्कंधों (विवरण आगे दिया गया है) का छिन्न भिन्न हो जाना, चोला त्याग देना, सांस का न आना मरण कहलाता है। यही जरा-मरण है।

भिक्खुओ मन में चिंतन किया, किसके होने से जरा-मरण होता है? जरा-मरण का कारण क्या है? भली प्रकार चिंतन मनन से ज्ञात हुआ कि जन्म के होने से जरा-मरण होता है। जाति/जन्म ही जरा-मरण का हेतु है।

  1. जाति / जन्म क्या है?

जीव का प्रकट होना, पैदा हो जाना, पांच स्कंधों का मिलना, इन्द्रियों का जुड़ कर काम करने लग जाना यही जाति या जन्म (birth)  है।

चिंतन मनन का अगला सवाल था – किसके होने से जाति या जन्म होता है? जन्म का हेतु क्या है? विचारने पर ज्ञात हुआ कि भव के होने से जाति होती है। भव ही जन्म का हेतु है।

  1. भव क्या है?

भव तीन प्रकार के हैं- 1. काम लोक में बने रहने की इच्छा अर्थात काम-भव (sensual becoming) है, 2. रूप लोक में बने रहना की इच्छा रूप-भव (form becoming)  है,  और 3. अरूप लोक में बने रहना अरूप-भव (formless becoming)  है।

इस पर प्रश्न उठा कि किसके होने से भव होता है? भव का हेतु क्या है? विचार करने के बाद ज्ञात हुआ कि उपादान के होने से भव होता है. उपादान भव का हेतु है।

  1. उपादान क्या है?

उपादान या आसक्ति (craving)  चार तरह की हैं. 1. काम से आसक्ति (sensuality clinging), 2.  मिथ्या दृष्टि से आसक्ति (false view clinging), 3. शीलव्रत से आसक्ति (precept & practice clinging) और 4. आत्मवाद से आसक्ति (doctrine of self clinging)।

अब सवाल ये था कि किसके होने से उपादान होता है? उपादान का हेतु क्या है? गहन मनन के बाद प्रज्ञा जागी कि तृष्णा होने से उपादान होता है। तृष्णा ही उपादान का हेतु है।

  1. तृष्णा कितने प्रकार की है?

तृष्णा छः प्रकार की है. 1. रूप तृष्णा (craving for forms), 2. शब्द तृष्णा (craving for sounds), 3. गंध तृष्णा (craving for smells), 4. रस तृष्णा (craving for tastes), 5. स्पर्श तृष्णा (craving for touch) और 6. धर्म तृष्णा (craving for ideas)।

प्रश्न है कि किसके होने से तृष्णा होती है? तृष्णा का हेतु क्या है? उत्तर है कि वेदना होने से तृष्णा होती है. वेदना ही तृष्णा का हेतु है।

  1. वेदना कितने प्रकार की है?

वेदनाएं छः प्रकार की हैं. 1. चक्षु के माध्यम से होने वाली वेदना, 2. कान के माध्यम से से होने वाली वेदना, 3. नाक के माध्यम से होने वाली वेदना, 4. जीभ के माध्यम से होने वाली वेदना, 5. काया से होने वाला स्पर्श और 6. मन के संस्पर्श से होने वाली वेदना।

प्रश्न उठा कि किसके होने से वेदना होती है? वेदना का हेतु क्या है? चिंतन मनन करने से उत्तर मिला कि स्पर्श के होने से वेदना होती है। स्पर्श ही वेदना का हेतु है।

  1. स्पर्श कितने प्रकार के हैं?

छः तरह के स्पर्श हैं. 1. चक्षु स्पर्श, 2. कान स्पर्श, 3. नाक स्पर्श, 4. जीभ स्पर्श, 5. काया स्पर्श और 6. मन स्पर्श।

इस पर फिर प्रश्न किया कि किसके होने से स्पर्श होता है? स्पर्श का हेतु क्या है? विचार करने पर जाना कि षड़ायतन होने से स्पर्श होता है. षड़ायतन ही स्पर्श का हेतु है।

  1. षड़ायतन क्या है?

षड़ायतन या सलायतन (six senses) इस प्रकार हैं: 1. चक्षु आयतन, 2. कान आयतन, 3. नाक आयतन, 4.जीभ आयतन, 5. काया आयतन और 6.मन आयतन।

अब प्रश्न ये था कि किसके होने से षड़ायतन होता है? षड़ायतन का क्या हेतु है? विचार किया तो उत्तर मिला कि नाम-रूप होने से षड़ायतन होता है। नाम-रूप ही षड़ायतन का कारण है।

  1. नाम-रूप क्या है?

पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि जैसे महाभूतों के संयोग से रूप बना। वेदना, संज्ञा, चेतना, और स्पर्श से मन और सबको मिला कर बना नाम-रूप। अब सवाल ये उठा कि किसके होने से नाम-रूप होता है? नाम-रूप का हेतु क्या है? विचार करने पर प्रज्ञा जागी कि विज्ञान के होने से नाम-रूप होता है। विज्ञान ही नाम-रूप का हेतु है।

  1. विज्ञान कितने प्रकार के हैं?

विज्ञान छः प्रकार के हैं. 1. चक्षु विज्ञान 2. कान, 3. नाक, 4. जीभ, 5. काया और 6. मन विज्ञान।

प्रश्न ये आया कि किसके होने से विज्ञान होता है? विज्ञान का क्या हेतु है? मनन करने पर पाया की संस्कार के होने से विज्ञान होता है। संस्कार विज्ञान का हेतु है।

  1. संस्कार कितनी तरह के हैं?

संस्कार तीन प्रकार के  हैं। 1. काया संस्कार 2. वाक् संस्कार, 3. चित्त संस्कार।  

मन में प्रश्न आया कि किसके होने से संस्कार होते हैं? संस्कारों का हेतु क्या है? गहन चिंतन से पाया कि अविद्या के होने से संस्कार होते हैं. अविद्या ही संस्कारों का हेतु है।

  1. अविद्या क्या है?

दुःख को ना जानना, दुःख के उदय को ना जानना, दुःख-निरोध को ना समझना और दुःख त्यागने का मार्ग ना जानना अविद्या कहलाता है।

यह बारह बिन्दुओं की श्रंखला हमें दुःख और दुःख के कारण बताती है। साथ ही अगर कारण पता हैं तो उन्हें दूर करने का उपाय भी मिल सकता है. इसी श्रंखला के बारवें बिंदु से पहले बिंदु तक भी विचार कर सकते हैं जैसे कि…

* अविद्या हो तो संस्कार जागते हैं,

> संस्कारों की वजह से विज्ञान है,

> विज्ञान है तो नाम-रूप है,

> नाम-रूप है तो षड़ायतन हैं,

> षड़ायतन के कारण स्पर्श हो जाता है,

> स्पर्श के कारण वेदना होती है,

> वेदना से तृष्णा उपजती है,

> तृष्णा से उपादान या आसक्ति हो जाती है,

> आसक्ति से भव जागता है,

> भव से जाति या जन्म होता है और

> जन्म से जरा मरण होता है*

अब अगर अविद्या का विनाश कर दिया जाए तो संस्कारों का विनाश हो जाएगा, संस्कारों के विनाश से विज्ञान का खात्मा हो जाएगा, विज्ञान का विनाश होगा तो नाम-रूप का भी विनाश होगा, नाम-रूप का विनाश होगा तो षड़ायतन का, षड़ायतन का विनाश हो जाए तो स्पर्श का विनाश हो जाए, स्पर्श का विनाश हो तो वेदना का विनाश हो जाए, अगर वेदना गयी तो तृष्णा भी गई, तृष्णा के विनाश से आसक्ति समाप्त होगी, आसक्ति नहीं तो भव नहीं, भव न हो तो जन्म नहीं और अगर जन्म नहीं तो जरा-मरण दुःख, चिंताएं और परेशानी नहीं।

लुम्बिनी प्रवास में चिंतन जारी है। हम किसी भी तीर्थ स्थल पर केवल मंदिर, मूर्ति, इतिहास, पुरातत्व साक्ष्य देखने नहीं जाते, अपितु इन सबके पीछे क्या दर्शन है, उस पर भी चिंतन हो तो यात्रा सफल होती है। अन्यथा वैचारिक स्तर पर घर से जैसे चले थे वैसे ही घर पहुँचे तो यात्रा की उपलब्धि क्या रही। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

बुद्ध दुनिया में भारत के सर्वकालिक ब्रांड एम्बेसडर हैं। विश्व के कोने-कोने में समृद्ध घरों की बैठकों में उनकी बर्स्ट याने चेहरा मूर्ति मिल जायेगी। इसका कारण यह है कि जीवन के दुख से निजात पाने हेतु उन्होंने एक वैज्ञानिक सोच पर आधारित दर्शन दुनिया को दिया है। वह दर्शन सनातन सिद्धांतों का विस्तार ही था। अनात्मवाद का एक नया सिद्धांत बुद्ध दर्शन को सनातन से अलग करता है। बाद के सनातन ऋषियों ने बुद्ध को भी विष्णु का नौवाँ अवतार बताकर भारतीय दर्शन में मिला लिया। फिर भी बुद्ध की राह पृथक ही रही। भारतीय संस्कृति समन्वयवादी रही है। वह तो ईसा और मुहम्मद को भी समायोजित कर सकती थी परंतु वे श्रेष्ठता और एकेश्वरवाद की हठ छोड़ते तब वह सम्भव था। वे तो सनातन को आमूलचूल मिटाने पर आमादा था।   

प्रतीत्य समुत्पाद सिद्धांत से अविद्या, संस्कार, वेदना, तृष्णा इत्यादि कैसे दूर होंगी? इसके लिए गौतम बुद्ध द्वारा बताई गई विपश्यना मैडिटेशन सीखनी होगी। लेकिन उसके पूर्व उनका अनात्मवाद सिद्धांत समझना होगा। नहीं तो आत्मसुख के चक्कर में भटक सकते हैं।

अनात्मवाद सिद्धांत और चेतना

बुद्ध वैसी आत्मा का अस्तित्व नहीं मानते जैसी आत्मा अद्वैतवाद में अस्तित्वमान बताई जाती है। वे आत्मा को जीव या चेतना कहते हैं।
जो पाँच स्कंधों के समन्वय से अस्तित्वमान होता हैं अर्थात् रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान, इन पांचों का समुदाय ही चेतना कहलाता है। इस प्रकार बुद्ध केवल पामार्थिक नित्य आत्मा का निषेध करते है परंतु अनित्य व्यावहारिक चेतना को मान्य करते है। वे पाँच स्कंध इस तरह बताए गए हैं।

रूप स्कन्द 

पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये चार महाभूत तथा इनके मेल से उत्पन्न सभी रूप स्कन्ध कहलाते है। हड्डी, स्नायु, मांस और चर्म से घिरा आकार ही रूप कहलाता है।

वेदना स्कंध

सुख, दुःख और न सुख-दुःख इन तीनों प्रकार की अनुभूतियों को वेदना कहते है।

संज्ञा स्कन्ध

गुणों के आधार पर किसी वस्तु का नामकरण ही संज्ञा-स्कन्ध (ज्ञान) है। संज्ञा का कार्य पहचान कराना है। हमें नील, पीत, रक्त, श्वेत आदि रूप से वस्तु का भान होता है, यही संज्ञा है।

संस्कार स्कंध

कुशल-अकुशल चेतना की राग-द्वेष आदि मानसिक प्रवृत्तियां तीन संस्कार हैं।

काय संस्कार- कायिक धर्म, आश्वास-प्रश्वास

वाक् संस्कार- वितर्क-विचार वचन या

चित् संस्कार- संज्ञा और वेदना

विज्ञान स्कन्ध

बाह्य वस्तुओं का ज्ञान और आंतरिक अहं अर्थात् ‘मैं’ का ज्ञान ही विज्ञान कहलाता है। संज्ञा, वेदना और विज्ञान तीनों का आपस में सम्बंध है।

मधुर, तिक्त आदि स्वाद का अनुभव वेदना है, किसी वस्तु का परिचयात्मक ज्ञान संज्ञा है।

परिच्रय के पहले स्वरुप मात्र का ज्ञान विज्ञान हैं।

इस तरह पांच स्कंध या पांच ढेर या पांच समुच्चय , पांच मनो-भौतिक समुच्चय बौद्ध दर्शन के आधार हैं। पांच स्कंध सिद्धांत अनिवार्य रूप से यह समझने की एक विधि है कि हमारे जीवन का हर पहलू लगातार बदलते अनुभवों का संग्रह है। ऐसा कोई एक पहलू नहीं है जो वास्तव में ठोस, स्थायी या अद्वितीय हो। सब कुछ प्रवाह में है। सब कुछ कई कारणों और स्थितियों पर निर्भर है। उदाहरण के लिए, 

  • रूप-स्कंधहमारे भौतिक संसार-हमारे शरीर और हमारे भौतिक परिवेश में सब कुछ को संदर्भित करता है। ये सभी चीजें लगातार बदल रही हैं।
  • वेदना-स्कंधहमारी संवेदनाओं को संदर्भित करता है जो सकारात्मक, नकारात्मक या उदासीन हैं – हमारी सभी संवेदनाएं क्षणभंगुर हैं, क्षण-क्षण बदलती रहती हैं। 
  • संज्ञा-स्कंधका अर्थ है हमारी हर उस चीज़ की पहचान या लेबलिंग जो हम देखते हैं, सुनते हैं, सूंघते हैं, स्पर्श करते हैं या सोचते हैं; ये लेबल भी लगातार प्रवाह में हैं।
  • संस्कार-स्कंद(हमारी सभी मानसिक आदतें, विचार, विचार, मत, पूर्वाग्रह, मजबूरियां आदि) कई कारणों और स्थितियों पर निर्भर हैं और हमेशा बदलते रहते हैं।
  • हमारी चेतना स्वयं एक चीज नहीं है, बल्कि अनुभूतियों का संग्रह है (विज्ञान-स्कंध:) जो लगातार बदल रहे हैं।

बौद्ध मत में, स्कंधों की विशेषताओं पर विचार करके, हम आत्म-लोभ को दूर कर सकते हैं। आत्म-लोभी एक स्वयं की अवधारणा से लगाव है जो अद्वितीय, स्वतंत्र और स्थायी है। बौद्ध मत में, स्वयं के इस विकृत दृष्टिकोण के प्रति यही लगाव ही दुख का मूल कारण है। अतः इस आसक्ति को त्याग कर हम स्वयं को बुढ़ापा, बीमारी और आसन्न मृत्यु के कष्टों से मुक्त करने का प्रयास कर सकते हैं। यही निर्वाण की दिशा है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मी प्रवासी ☆ आमची चार धाम यात्रा – भाग – ७ ☆ श्री राजीव गजानन पुजारी ☆

श्री राजीव गजानन पुजारी

? मी प्रवासी ?

☆ आमची चार धाम यात्रा – भाग – ७ ☆ श्री राजीव गजानन पुजारी

(याबाबत ही एक कथा आहे. संन्यास स्वीकारण्यासाठी शंकराचार्यानी आपल्या आईची अनुमती मागितली. त्यावर आई त्यांना म्हणाली, तू संन्यास घेतल्यावर माझा अंत्यविधी तुला करता येणार नाही. त्यामुळे माझ्या आत्म्याला शांती मिळणार नाही. तुला संन्यास घ्यायचाच असेल तर माझ्या मृत्यूनंतर घे. यावर मी संन्यास घेतला तरी तुझा अंत्यसंस्कार जरूर करीन, असे वचन आईला देऊन संन्यासासाठी तिची अनुमती मिळवली.) – इथून पुढे – – – 

ज्यावेळी त्यांच्या मातेचा अंत झाला त्यावेळी संन्यासी बनलेले शंकराचार्य आईच्या अंत्यसंस्कारासाठी घरी आले. त्यावेळेस संन्याशाने अंत्यसंस्कार करणे धर्मशास्त्राच्या विरुद्ध आहे असे सांगून तत्कालीन सनातनी रूढीप्रिय धर्ममार्तंडानी प्रेत स्मशानात नेण्यात शंकराचार्यांना विरोध केला. शंकराचार्यांच्या जातभाईंनी प्रेत उचलण्यास नकार दिला. त्यावेळी त्यांनी आपल्या घराच्या अंगणातच चितारचून आईच्या मृत शरीराला अग्नी दिला. त्यावेळी चोली आणि मुकाणी जातीच्या दोन ब्राह्मणांनी त्यांना साथ दिली. या ब्राह्मणांना बद्रीनाथाच्या पूजनाच्या अधिकार देऊन शंकराचार्य त्यांच्या ऋणातून मुक्त झाले. आजही याच ब्राह्मणांच्या वंशात बद्रीनाथाच्या पूजनाचे अधिकार वंशपरंपरेने चालत आले आहेत.

बद्रीनाथ गढवाल नरेशांचे कुलदैवत होय. गढवालची राजगादी ही भगवान बद्रीनाथाची होय या भावनेने त्यांनी राज्यकारभार केला. बद्रीनाथ मंदिराच्या पुजाऱ्यास रावळ असा किताब त्यांनी बहाल केला. मंदिराची पूजाअर्चा व्यवस्थेत चलावी यासाठी १४० गावातील सरकारी जमीन देणगी दाखल मंदिरास बहाल केली. त्याद्वारे लाख दीड लाखाचे उत्पन्न मंदिरास मिळते. याशिवाय दानशूर भक्तांकडून देणग्या मिळतात. त्यातून मंदिराची पूजाअर्चा, प्रसाद, रावळ व इतर सर्व कर्मचाऱ्यांचा पगार भागविला जातो. पंधराव्या शतकात टेहरीच्या गढवाली राजाने मंदिराचा जीर्णोद्धार केला. पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होळकरांनी मंदिरावर सुवर्ण कलश चढविला. सध्या मंदिराचा कारभार टेहरी संस्थानाच्या वतीने पाहण्यात येतो.

बद्रीनाथ मंदिर मे मध्ये उघडते व दिवाळीनंतर बंद होते. मंदिर बंद करताना पूजा करून तुपाचा दिवा लावून ठेवतात. सहा महिने मंदिर बर्फात निद्रिस्त असते. बर्फ वितळल्यावर मे मध्ये ज्यावेळी मंदिर उघडले जाते त्यावेळी दिवा तसाच जळत असतो, पूजेतील फुले टवटवीत असतात. बंद काळात नारद गुप्त रूपाने पूजा करतात, लक्ष्मी दिवा लावते अशी भक्तांची श्रद्धा आहे. बंद काळात येथे कोणीही राहत नाही. मंदिर बंद करते वेळी एक किलो शुद्ध गाईचे तूप घेतात. त्यापैकी काही तूप मूर्तीवर चोळले जाते, त्यावर पातळ वस्त्र चिकटवले जाते. त्यानंतर राहिलेल्या तुपात एक किलो तांदूळ कालवून कापसाची वात बाहेर काढून एका डब्यात भरतात. वात पेटवून आरती करून मंदिर बंद करतात. सहा महिन्याने मंदिर उघडल्यावर दिवा जसाच्या तसा जळत असतो. हे दिव्य ज्योती दर्शन पाहण्यासाठी मंदिर उघडण्याच्या दिवशी यात्रेकरूंची मोठी गर्दी बद्रीधामात होते.

महाभारत व इतर अनेक पुराण ग्रंथात बद्रीनाथांसंबंधी अनेक उल्लेख आहेत. भगवान विष्णू द्वापार युगात श्रीकृष्ण व अर्जुनाच्या रूपाने प्रकट झाले. दक्षाच्या तेराव्या मुलीचा विवाह धर्माबरोबर झाला. तिच्यापोटी सत् युगात मानव कल्याणासाठी विष्णूने नर आणि नारायणाच्या रूपाने जन्म घेतला. अलकनंदेच्या किनाऱ्यावरील ज्या पर्वतावर त्यांनी तप केले त्यांना नर आणि नारायण पर्वत अशी नावे पडली. नर नारायणांनी ऋषीमुनी व मानव जातीला त्रस्त करणाऱ्या सहस्त्र कवचधारी राक्षसांचा वध केला. मानवी कल्याणासाठी महाभारत आणि अठरा पुराणे रचण्याची प्रेरणा नारायणांनीच व्यासांना दिली. स्कंद पुराणात बद्रिक्षेत्राची चार नावे आहेत. द्वापार युगात विशाला, त्रेता युगात योगसिध्दा, सत् युगात मुक्तीप्रदा व कलियुगात बद्रीनाथ अशा नावांचे उल्लेख स्कंद पुराणात सापडतात. कलियुगात मानवाला श्री विष्णूचे साक्षात दर्शन होणार नाही म्हणून ते मूर्ती रुपात या ठिकाणी प्रकटले. बद्री म्हणजे बोर. पूर्वी या परिसरात काटेरी बोरीची झाडे विपुल होती. या झाडांना येणारी बोरे ऋषीमुनी भक्षण करीत. या बोरांमुळे त्यांच्या शरीरात अनेक दिवस टिकणारी ऊर्जा निर्माण होत असे. त्या कारणाने ते अनेक दिवस अन्न पाण्याशिवाय राहू शकत. तप:साधनाप्रसंगी नरनारायणावर बोरीच्या झाडाने सावली धरली अशी अख्यायिका आहे. बोरीच्या वनातला नारायण म्हणून भगवान विष्णू बद्रीनारायण झाले. बद्रीवनाचा विस्तार १२ योजने (एक योजन म्हणजे चार मैल) लांब व तीन योजने रुंद होता. बदरीशपुरी ऐश्वर्य व सुख शांती देणारे तीर्थस्थान आहे. बद्रीनाथ यात्रा करणाऱ्यास पुनर्जन्म लाभत नाही. या पुण्यदायी यात्रेने सर्व पापांचा नाश होतो, विकार वासना संपून जातात. आत्मशुद्धी होते. ‘जो जाईल बदरी न येईल तो उदरी’ अशी मराठीत एक म्हण आहे.

बदरी विशाल या नावामागची वराह पुराणातील एक कथा आम्हास येथे ऐकायला मिळाली. सूर्यवंशी राजा विशाल शत्रूकडून पराजित झाला. त्याचे राज्य त्याच्या शत्रूंनी बळकावले. तो दुःखी झाला. त्या अवस्थेत तो हिमालयात आला. भक्तिभावाने त्याने बद्रीनाथाचे पूजन केले. बद्रीधामपूरीतील गंधमादन पर्वतावर जाऊन बद्रीनाथाच्या कृपेसाठी तपाचरण केले. त्याची भक्ती पाहून बद्रीनाथांनी त्यास दर्शन दिले. आपले राज्य पुन्हा मिळवून देण्याचे कृपा व्हावी अशी विनंती भगवान बद्रीनाथाजवळ राजाने केली. बद्रीनाथने राजाला सामर्थ्य व निर्भयता प्रदान केली. त्यामुळे राजाला राज्य पुन्हा मिळाले. तसेच तुझ्या अढळभक्तीमुळे माझ्या नावापुढे लोक तुझे नाव लावून जयजयकार करतील असाही वर दिला. तेव्हापासून जय बद्री विशालकी असा जयघोष सुरू झाला. हॉटेलवर आलो तर साबुदाण्याची गरम गरम खिचडी तयार होती. ती खाऊन आम्ही जवळच असलेल्या माणा गावी जायचे ठरविले. त्यासाठी आम्ही एक टॅक्सी बुक केली. माणा हे गाव बद्रीनाथ पासून तीन कि. मी. अंतरावर असून तिबेट सीमेपासून २६ किलोमीटर अंतरावर आहे. पूर्वी हे गांव भारतातील शेवटचे खेडे म्हणून ओळखले जायचे. पण पंतप्रधान मोदीजींनी त्याचे नामकरण भारताचे प्रथम खेडे असे केले. गावची लोकसंख्या फक्त १२०० असून हिवाळ्यात हे सर्व लोक सखल प्रदेशात स्थलांतरीत होतात; कारण हा भाग त्यावेळी पूर्णपणे बर्फाच्छादित असतो. हे गांव पौराणिक कथांचे संदर्भ, महाभारतातील घटनांचे संदर्भ तसेच अप्रतिम निसर्ग सौंदर्यासाठी प्रसिद्ध आहे. ९. ३० वाजता माणा गावच्या प्रवेशद्वाराजवळ आलो. प्रवेशद्वारावर ‘First Indian village Mana:भारत का प्रथम गांव माणा’ अशी इंग्रजी व हिंदीत पाटी लावली आहे. तिच्या पार्श्वभूमीवर आम्ही फोटो काढून घेतले. टॅक्सीवाल्याने आम्हाला पार्किंगमध्ये ड्रॉप केले. तेथून आम्ही पिट्टू केले व दर्शनीय ठिकाणे पाहण्यास निघालो.

‘First Indian village Mana’ 

प्रथम आम्ही पाहिली ती गणेश गुफा. येथेच महर्षी व्यासांनी श्री गणेशास महाभारताचे श्रुतलेखन सांगितले होते. त्याचे असे झाले: महर्षी व्यासांनी महाभारताची रचना करायचे ठरवले. ते अत्यंत वेगाने विचार करीत. एव्हढ्या जलद कोण बरे लिहून घेणार? असा ते विचार करू लागले. त्यांना श्री गणेशाचे नाव सुचले. त्यांनी गणेशास विनंती केली. त्याने ती मान्यही केली. पण त्याने एक अट घातली. ‘मी तुम्ही ज्या वेगाने सांगाल, त्या वेगाने लिहून घेईन, पण तुम्ही सांगताना अजिबात थांबायचे नाही. ज्या क्षणी तुम्ही थांबाल, त्या क्षणी मी लिहायचे सोडून निघून जाईन. ’ महर्षी व्यास विचार करू लागले. ‘श्री गणेशाएव्हढा जलद लिहिणारा लेखनिक आपणास शोधून सुद्धा सापडणार नाही. पण त्याच्या या अटीचे काय बरे करावे? ’ तेव्हाढ्यात त्यांना एक कल्पना सुचली. ते गणेशाला म्हणाले, ”तुमची अट मला मान्य आहे, पण माझीही एक अट आहे. मी जे सांगेन ते आपण फक्त लिहायचे नाही, तर त्याचा अर्थ समजून घेऊन घेऊन मगच ते लिहायचे. ’ गणेशाने ती अट मान्य केली. महर्षी व्यास महाभारत सांगू लागले. गणेशांना त्याचा अर्थ लागून ते लिहितात तो पर्यंत व्यास मुनींना पुढील मजकूर सुचत असे. अशा प्रकारे महाभारताचे लिखाण पूर्ण झाले. मंदिर प्राचीन असून मंदिरात श्री गणेशाची मूर्ती आहे. प्रदक्षिणा मार्ग भुयारी आहे. दर्शन घेऊन आम्ही सरस्वती नदीचचे उगमस्थान पहायला गेलो. येथे सरस्वती नदी उगम पावते, मोठा आवाज करीत दरीत कोसळते व तिथेच लुप्त होते. मान्यता अशी आहे की, ज्यावेळी गणेशजी महाभारताचे लिखाण करीत होते त्यावेळी त्याना सरस्वतीनदीच्या आवाजाचा त्रास होऊ लागला. त्यांना त्रास होऊ नये म्हणून ती लगेचच लुप्त झाली. सरस्वती नदीवरच एक भलीमोठी शिळा आहे, तिला भीम पूल असे संबोधिले जाते. अशी मान्यता आहे की, ज्यावेळी पांडव स्वर्गात निघाले होते, त्यावेळी सरस्वती नदी त्यांचे मार्गात येत होती. द्रौपदीला नदी ओलांडणे सुलभ व्हावे म्हणून भीमाने नदीवर एक शिळा टाकली. तिच्यावरून जाऊन द्रौपदीने नदी पार केली. भीम पूल ओलांडून आम्ही सरस्वती मंदिर बघायला गेलो. हे मंदिर भव्य व अतिशय सुंदर आहे. मंदिराची निर्मिती MIT विश्वशांती विश्वविद्यालय, पुणे यांनी केली आहे. मंदिरात सरस्वती देवीची अत्यंत देखणी मूर्ती आहे. सोबतच विठ्ठल रुक्मिणी व ज्ञानेश्वर माऊलींच्या मूर्ती देखील आहेत. या मंदिराच्या अनावरण प्रसंगी MIT विश्वशांतीचे संस्थापक प्रो. विश्वनाथ कराड, प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ विजय भटकर, महाराष्ट्राचे तत्कालीन राज्यपाल व उत्तराखंडचे तत्कालीन मुख्यमंत्री हजर होते. भीमपूल ओलांडल्यावर एक कमान लागते. त्यावर ‘स्वर्गारोहण मार्ग’ असे लिहिले आहे. हा तोच मार्ग आहे ज्यावरून पांडव व द्रौपदी स्वर्गप्रती जाते झाले. आम्ही त्या कमानीतून पलीकडे गेलो.

पलीकडे यूधिष्ठिराचे श्वान तसेच द्रौपदीसह पाच पांडवांच्या १२ फूट उंचीच्या सोनेरी रंगाच्या मूर्ती आहेत. मान्यता अशी आहे की, श्री कृष्णाच्या मृत्यूनंतर अभिमन्यूचा पुत्र परीक्षित याला राज्य सोपवून पाची पांडव व द्रौपदी नर नारायण पर्वतावरून आपली स्वर्गाकडे जाण्याची यात्रा सुरू केली. मार्ग दऱ्याखोऱ्याचा व घनदाट अरण्याचा होता. चालता चालता द्रौपदी तोल जाऊन दरीत पडली व मृत्यू पावली. कांही वेळानंतर सहदेवाचाही तोल गेला व तो मृत्युमुखी पडला. त्यापाठोपाठ नकुल, अर्जुन व भीमही मृत्यू पावले. शेवटी फक्त धर्मराज व त्याचा विश्वासू श्वान स्वर्गात पोहोचले जेथे इंद्रदेवाने त्यांचे स्वागत केले. स्वर्गारोहण मार्ग परिसरातच चहाच्या कांही टपऱ्या आहेत. त्यांवर ‘हिंदुस्तानकी आखरी चायकी दुकान’ असे पूर्वी लिहिले होते, त्यातील ‘आखरी’ शब्दावर काट मारून तिथे ‘प्रथम ’ शब्द लिहिलेला दिसला.

इथे लोकरीचे कपडे चांगले मिळतात. त्यामुळे स्त्रीवर्गाने इथेही शॉपिंग केले. पिट्टूत बसून आम्ही पार्किंग पर्यंत आलो. तेथून सकाळच्या टॅक्सीने साधारण अडीच वाजता आम्ही हॉटेलला पोहोचलो.

 त्या दिवशी विश्रांती घेऊन ६ जूनला सकाळी ६. ३० वाजता हरिद्वारला जायला निघालो. रात्री आठ वाजता हरिद्वारला पोहोचलो. दुसऱ्या दिवशी सकाळी बरीचशी मंडळी मनसादेवीच्या दर्शनाला गेली. पण सौ ची तब्येत जरा नरम असल्याने आम्ही गेलो नाही.

 ७ जूनला जेवण करून सकाळी अकरा वाजता आम्ही दिल्लीला जायला निघालो. संध्याकाळी सहा वाजता दिल्लीला पोहोचलो. ड्रायव्हरने आम्हाला साधारण स्टेशनजवळ सोडले. सर्व सहकाऱ्यांचा व पुसेगावकर दांपत्याचा निरोप घेऊन आम्ही पुण्याला जाणारे सातजण दोन रिक्षांनी स्टेशनला आलो. आमची पुणे समर स्पेशल ट्रेन रात्री १०. १० ला होती. आम्हाला रात्रीचे जेवण बांधून दिले होते. ते आम्ही गाडीत खाल्ले. गाडी आठ जूनला रात्री ११. ५५ ला पुण्याला पोचणार होती. पण समर स्पेशल असल्याने प्रत्येक स्टेशनवर हिला मागे ठेऊन रेग्युलर गाड्या पुढे सोडल्या जात होत्या. पूर्वीच्या प्लॅन प्रमाणे आम्ही एक दिवस चि. मुग्धाकडे थांबून नऊ तारखेला दुपारी किंवा दहा तारखेला सकाळी सांगलीला जाणार होतो. पण असे तसे जागरण होणारच आहे व अनायसे कनेक्टिंग ट्रेन आहेच, तर सांगलीला जाऊनच विश्रांती घेऊ असा आम्ही विचार केला व नऊ तारखेच्या महाराष्ट्र एक्सप्रेसचे बुकिंग आम्ही हरिद्वार सोडल्यावरच केले होते. आमची सांगलीला जाणारी कनेक्टिंग ट्रेन रात्री ३. ४० ला होती. ती मिळते की नाही अशी धाकधूक वाटू लागली. रडत खडत पुणे समर एक्सप्रेस नऊ तारखेच्या पहाटे ३. ३५ ला पुण्याला पोचली. नशिबानं आमच्या लगतच्या प्लेटफॉर्मवरच महाराष्ट्र एक्सप्रेस लागली होती. पळत पळत कशीबशी ती पकडली व नऊ तारखेला सकाळी नऊ वाजता सांगलीला पोचलो. आम्हाला घ्यायला जावई आले होते, त्यांच्या गाडीत बसून घरी पोचलो. अशा पद्धतीने आमची चारधाम यात्रा सफल संपूर्ण झाली.

– समाप्त –

© श्री राजीव  गजानन पुजारी 

विश्रामबाग, सांगली

ईमेल – rgpujari@gmail.com मो. 9527547629

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मी प्रवासी ☆ आमची चार धाम यात्रा – भाग – ६ ☆ श्री राजीव गजानन पुजारी ☆

श्री राजीव गजानन पुजारी

? मी प्रवासी ?

☆ आमची चार धाम यात्रा – भाग – ६ ☆ श्री राजीव गजानन पुजारी

दुसरी एक कथा पांडवांच्या संबंधात आहे. या कथेतून केदारनाथ मंदिराशी त्यांचा निकटचा संबंध जाणवतो. पांडवांकडून महाभारतातील महायुद्धात भाऊबंद, गुरुजन व ब्राह्मण पुत्रांची हत्या झाल्याचे पातक घडले. या पापातून मुक्त होण्यासाठी व्यास ऋषींचे सांगण्यावरून ते भगवान शंकराच्या दर्शनासाठी काशीला गेले. पांडवांची भक्ती पारखण्यासाठी काशीत त्यांना दर्शन न देता भगवान शंकर हिमालयात गुप्त काशीला येऊन गुप्त रूपाने राहू लागले. पांडव त्यांच्या शोधार्थ गुप्त काशीला येऊन पोहोचले. पांडवाना पाहून शंकर गुप्त रूपाने गौरीकुंडापाशी प्रकटले. अंतर्ज्ञानी पांडव त्वरित गौरीकुंडाकडे आले. तेथून शंकराने केदार शिखराकडे पोबारा केला. शंकर दर्शनाच्या उत्कट इच्छेने भारावलेले पांडव दगड धोंड्यातून वाट काढीत केदार भूमीवर पोहोचले. पांडव दिसताच रेड्याचे रूप घेऊन ते चरू लागले. परंतु चाणाक्ष भिमाने रेडा रूपातील भगवान शंकराला ओळखले. सर्व पांडव दर्शनासाठी पुढे धावले. त्या क्षणी प्रचंड शिलाखंडाचे रूप घेऊन भगवान शंकर भूमीत प्रवेश करू लागले. भीमाने धावत जाऊन भूमीत गडप होणाऱ्या शंकराला पकडण्याचा प्रयत्न केला. बहुतेक भाग भूमीत प्रवेशला होता फक्त पाठीचा भाग भीमाच्या हाती सापडला. सर्व ताकत एकवटून आपल्या बलवान बाहूंनी भीमाने हा भाग पकडून ठेवला. त्यामुळे हा भाग तसा जमिनीवर राहिला तेच त्रिभुजाकार केदारलिंग होय. भूमीत गेलेले बाकी भाग तुटून ते वेगवेगळ्या ठिकाणी प्रकट झाले. डोळे नेपाळमध्ये निघाले; त्याला पशुपतिनाथ म्हणतात. बाकी शरीराचा भाग केदारनाथ परिसरात प्रकट झाला. मुख रुद्रनाथमध्ये, हात तुंगनाथमध्ये, नाभि मद् महेश्वर मध्ये व जटा कल्पेश्वरामध्ये प्रकट झाल्या.

हिमालयातील केदारनाथसह या चार तीर्थक्षेत्रांना पंचकेदार म्हणतात. या पंचकेदारांची यात्रा केल्यावर केदार यात्रा पूर्ण होते असे मानले गेले आहे. पांडवांची अढळ आणि उत्कट भक्ती पाहून भगवान शंकरांनी त्यांना प्रसन्नतेने दर्शन दिले. त्यांना पाप मुक्त केले. भगवान शंकरदर्शन स्मृती प्रित्यर्थ पांडवांनी त्रिभुजाकार शिवलिंगावर मंदिर बांधले. आद्य शंकराचार्य यांनी आठव्या शतकात या मंदिराचा जीर्णोद्धार केला. अशी या पवित्र केदारनाथ मंदिराची जन्म कथा आहे. कतुरी शैलीच्या या दगडी मंदिराची उंची ६६ फूट आहे. तांबड्या रंगाचे दगड चुन्याशिवाय बेमालूम सांधण्यात आले आहेत. दर्शनी दरवाज्यावर सूर्य देवाची प्रतिमा कोरण्यात आली आहे. मंदिरावर सुवर्णकलश आहे. भोवतालच्या हिमपर्वतांच्या पार्श्वभूमीवर मंदिराचे सौंदर्य खुलून दिसते. आद्य शंकराचार्यांनी येथे तप:साधना करून हिंदू धर्माची पुनर्स्थापना व पुनर्रचना केली. त्यांचे जीवनकार्य संपल्यावर वयाच्या बत्तीसाव्या वर्षी याच पवित्र भूमीत त्यांनी देहत्याग केला. केदारनाथ मंदिरामागे शंकराचार्यांची समाधी आहे. एका शिलेवर शंकराचार्यांचा हात रेखांकित करण्यात आला आहे. याच ठिकाणी अतिप्राचीन इशानेश्वराचे अवशेष व शिलालेख सापडले आहेत. हिमालयातील पाच खंडांपैकी केदारखंड हा हिमालयाचा मध्यवर्ती भाग होय. या मध्यभागाच्या केंद्रबिंदूवर केदारनाथाचे मंदिर उभे आहे.

मंदिराच्या पूजाअर्चेसाठी टेहरीच्या राजाने काही गावातील जमीन देवस्थानला दान केली आहे. त्या अगोदरच्या काळात आद्य शंकराचार्यांनी केदारनाथाच्या पूजेची व्यवस्था केली होती. प्राचीन काळात हिमालयातील यक्ष-किन्नर केदारलिंगाची पूजा करीत. दक्षिणी जंगमाकडे केदारनाथाचे पौरोहित्य वंशपरंपरेने चालत आले आहे. शिवभक्त भुकुंड हा आपला मूळ पुरुष होय असे या मंदिराचे पुजारी म्हणतात. याबाबतचा इतिहास असा: पांडवकाळात स्वामी वीरभद्र नावाचा शिवगण होता. पांडवांच्या स्वर्गारोहण प्रसंगी त्याच्याकडून शिवाज्ञाचे उल्लंघन झाले. त्यावेळी तुला मानवजन्म घेऊन माझ्या अवज्ञेचे प्रायश्चित भोगावे लागेल, असा शाप भगवान शंकराने त्यास दिला. त्यावर वीरभद्राने आर्त स्वरात भगवान शंकरांची क्षमा मागितली. शंकरांचा क्रोधाग्नी क्षमला. ते प्रसन्नतेने वीरभद्रास म्हणाले, ”चौल देशातील वेदपाठी ब्राह्मणाच्या घरी तुझा जन्म होईल. पुढे तू भूकुंड नावाने प्रसिद्ध पावशील. त्यावेळी दृढभावाने माझी पूजाअर्चा करून माझ्या सहवासात येशील. ”त्यानुसार चौलमध्ये वेदपाठी ब्राह्मणाच्या घरात वीरभद्राचा जन्म झाला. ब्रह्मचर्य धारण करून तो वेदशास्त्र संपन्न झाला. भूकुंड मुनी या नावाने प्रख्यात झाला. काही दिवस वाराणशीत जाऊन अध्ययन करीत राहिला. तेथून तो गंगोत्रीला आला. तेथे त्याने तप:साधना केली. गंगोत्री वरून केदार नगरीत आला. येथे भगवान शंकराची मनोभावे भक्ती केली. अनेक शिवभक्तांनी भुकुंडांचे शिष्यत्व स्वीकारले. त्याने पंचकेदाराची यात्रा करून श्रद्धेने पूजन केले. केदारपुरीत त्याने कठोर तप केले. त्याच्या तपाने प्रभावित होऊन भगवान शंकरांनी त्यास दर्शन दिले. भूकुंडाने शंकराकडे एक वर मागितला, ”मला या मानवी देहातून मुक्त करून शिवगण म्हणून पुन्हा आपल्या सेवेत घ्यावे, तसेच केदारलिंगाच्या पूजनाची परंपरा माझ्या शिष्यांत सदैव चालत राहावी. ” भुकुंडाच्या विनंतीनुसार श्री शंकराने त्यास मानव देहातून मुक्त केले. केदारलिंगाच्या पूजाअर्चेची जबाबदारी भुकुंडाच्या शिष्यांकडे कायमची सोपवण्यात आली. तेव्हापासून हीच प्रथा चालू आहे. मंदिराच्या दक्षिण पुजाऱ्यांनी नंतर बद्रीनाथच्या पुजाऱ्यांप्रमाणे श्रीनगरच्या राजाकडून रावळ ही उपाधी घेतली. भुकुंडापासून आजतागायत झालेल्या केदारनाथच्या ३२० पुजारांची जाडजूड जुन्या वहीत केलेली नोंद पुरावा म्हणून उपलब्ध आहे. मुख्य रावळास विवाह करण्याचा अधिकार नाही, मात्र त्याच्या शिष्यांना तो आहे.

मे महिन्यात अक्षय तृतीयेला केदारनाथाचे मंदिर उघडते. दीपावली बलिप्रतिपदेच्या दुसऱ्या दिवशी मंदिराचा दरवाजा सहा महिन्यांसाठी बंद करण्यात येतो. त्यानंतर येथे चिटपाखरूही राहत नाही. गौरीकुंडा पर्यंतचा साराप्रदेश बर्फमय होतो. रस्ते बुजून जातात. केदारनाथ मंदिर बर्फात समाधीस्थ होते. तप:साधना व ईश्वरी साक्षात्कारासाठी काही साधू या बर्फमय प्रदेशात अट्टाहासाने राहतात. सारी सामग्री अगोदर जमवितात. केदारनाथची यात्रा म्हणजे पृथ्वी, आकाश आणि सूर्य या त्रिनेत्ररुपी ईश्वराची एक निसर्ग यात्रा होय. या निसर्गयात्रेत घनदाट वृक्षराजी आणि हिमशिखरांच्या दर्शनाने डोळे सुखावतात. महाकवी कालिदासाचे मेघदूत महाकाव्यच जगल्याची अनुभूती येते. या निसर्ग यात्रेतून निसर्गानंद आणि स्वर्गसुखाच्या प्राप्तीचे समाधान मिळते. ही आनंददायी निसर्गयात्रा प्रत्येकाने एकदातरी अनुभवावी.

बद्रीनाथ..

चार जूनला सकाळी आठ वाजता बद्रीनाथसाठी प्रयाण केले. अलकनंदेच्या काठाकाठाने बदरीधामाच्या दिशेने आमचा प्रवास सुरू झाला. सकाळचे प्रसन्न वातावरण, हवीहवीशी वाटणारी गुलाबी थंडी, धुक्याचा दुपट्टा लेऊन शेजारून वाहणारी अलकनंदा, मधूनच अवखळ वारा हा दुपट्टा ओढून वृक्षांच्या गळ्यात अडकवायचा, त्यावेळी दिसणारे अलकनंदेचे बदामी रंगाचे पाणी बघत बघत आमचा प्रवास सुरू होता. एक गोष्ट इथे आवर्जून सांगावीशी वाटते, ती म्हणजे चारी धामांकडे जाणारे रस्ते अप्रतिम आहेत, पण त्यांची रुंदी कमी आहे. कांही कांही ठिकाणी तर केवळ एकच चारचाकी जाईल एव्हाढाच रुंद!!  सव्वासहा वाजता विष्णुप्रयाग येथे चहापानासाठी थांबलो. हे क्षेत्र अलकनंदा व धौलीगंगा या नद्यांच्या संगमावर स्थित आहे. पंचप्रयागांपैकी हे प्रथम प्रयाग आहे. उरलेले चार प्रयाग म्हणजे नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग व देवप्रयाग होत. विष्णुप्रयाग हे क्षेत्र जोशीमठ-बद्रीनाथ रस्त्यावर चमोली जिल्ह्यात आहे. येथेच नारद मुनींनी घोर तपश्चर्या करून भगवान विष्णूंना प्रसन्न करून घेतले होते. म्हणून या स्थळाचे नाव विष्णुप्रयाग असे पडले. येथील सुंदर असे अष्टकोनी विष्णुमंदिर १८८९ साली इंदोरच्या महाराणींनी बांधवले होते.

चहा-बिस्किटे घेऊन आम्ही बद्रीनाथकडे आगेकूच केली व साधारण आठ वाजता अलकनंदा नदीच्या काठावर असणाऱ्या बद्रीनाथला पोचलो. नारायण पॅलेस या हॉटेलमध्ये आमची राहण्याची व्यवस्था होती. प्रचंड थंडी होती जेवण करून झोपी गेलो.

पाच तारखेला पहाटे उठून हॉटेलबाहेर आलो. समोर बर्फाच्छादित हिमशिखरांचे मनोहर दर्शन घडले. ती शिखरे म्हणजे नर-नारायण पर्वत रांग आहे. ज्यामध्ये निळकंठ हे एक प्रमुख शिखर आहे. धुके नसल्याने त्याचे मनोहर दर्शन आम्हाला घडले.

अंघोळी वगैरे उरकून सात वाजता बद्रीनाथाच्या दर्शनाला निघालो. हॉटेल ते मंदिर अंतर दोन किलोमीटर एव्हढेच असले तरी रस्ता चढाचा असल्याने आम्ही पिट्टू ठरविले. हे पिट्टूवाले नेपाळी होते. पिट्टूवाल्याने मंदिरापर्यंत नेऊन तुम्हाला दर्शनही घडवतो असे सांगितले. वाटेत बाजारपेठ आहे. तिथे पूजासाहित्य वगैरेंची दुकाने आहेत. अलकनंदेवरील पूल ओलांडून व दगडी पायऱ्या चढून पिट्टूवाल्याने आम्हाला मंदिराच्या प्रांगणात आणले. जय बद्रिविशाल असा जयघोष करत यात्रेकरू रांगेत उभे होते.

 चित्रांत नेहमी पाहत असलेल्या बद्रिनाथाच्या देखण्या मंदिरासमोर आपण प्रत्यक्ष उभे आहोत हे अजूनही खरे वाटत नव्हते. स्वतःला चिमटा घेऊन कळ आल्यावर हे खर आहे हे पटलं. मंदिर अतिशय भव्य असून पशुपक्षांच्या विविध शिल्पकृतींनी नटलेले, रंगीबेरंगी व अतिशय देखणे आहे. प्रवेशद्वारावर चौघड्यासाठी मंडप असून त्यावर तीन सुवर्ण कळस आहेत. आम्हाला पिट्टूवाल्याने पहिल्यांदा गेट नं २ ला नेले व तेथील सुरक्षा रक्षकांना आम्हाला आत सोडण्याविषयी सांगितले. बऱ्याच विनंत्या करूनही रक्षकाने आम्हाला सोडले नाही, पण गेट नं ३ ला जाण्यास सांगितले. गेट नं ३ समोर बराच वेळ उभे राहिलो. दिंडी दरवाज्यातून आतील डोअर कीपर्स आम्हाला दिसत होते. आमच्या पिट्टूवाल्यांनी हजारो विनंत्या करूनही ते आमच्याकडे किल्ली नाही, ज्यांच्याकडे किल्ली आहे ते लवकरच येतील असे बहाणे करत राहिले. आम्ही परत मंदिराच्या प्रांगणात आलो. तेथे आल्यावर असे समजले की दोन हजार रुपयांचे स्पेशल कूपन काढल्यावर आपल्याकडून अगदी बद्रीनाथांच्या मूर्तीसमोर बसून पूजा करून घेतली जाते. आम्ही तिकीट काढले व बाजूच्या दरवाज्याने सभामंडपात प्रवेश केला. सभामंडपात कुबेर, गरुड आदिंच्या अतिशय सौंदर्यशाली कलापूर्ण भव्य मूर्ती आहेत. आमचा नंबर आल्यावर आम्ही गाभाऱ्यासमोर जाऊन बसलो. शाळिग्राम शीलेची बद्रीनाथजींची मूर्ती तीन फूट नऊ इंच आहे. आम्हाला नशिबाने ओरिजिनल मूर्ती पहायला मिळाली. या मूर्तीत परीस बसवलेला आहे असे म्हणतात. केदारनाथ सारखे गर्भगृहात जाऊन मूर्तीचे स्पर्श दर्शन घेऊ दिले जात नाही. मूर्तीच्या दोन्ही बाजूंस नरनारायण, कुबेर व नारदाच्या मूर्ती आहेत. गुरुजींनी संकल्प सांगून आमचेकडून यथासांग पूजा करून घेतली. बरोबर आणलेले चांदीचे तुळशीपत्र आम्ही बद्रीनाथांना वाहिले. आम्हाला अगदी धन्य धन्य झाल्यासारखे वाटले. पूजा करून बाहेर आलो.

परिक्रमा मार्गावर घंटाकर्णाची विशाल मूर्ती आहे. हा बद्रीनाथांचा द्वारपाल होय. तसेच श्री लक्ष्मी, श्री गणेश, लक्ष्मण यांची सुंदर छोटी मंदिरे मंदिराच्या आवारात आहेत. मागे शंकराचार्यांची गादी आहे. तेथे एका चित्रकाराने काढलेले शंकराचार्यांचे अतिशय प्रसन्न चित्र आहे. प्रदक्षिणा घालून साडेआठ पर्यंत आम्ही रूमवर परतलो.

हरिद्वारला आम्हाला कल्पना देखील नसतांना आमच्या कडून गंगामय्येची आरती करून घेतली गेली, केदारनाथला गर्भ गृहात जाऊन आम्हाला स्पर्श दर्शन घेता आले, आज अगदी चार फूट अंतरावरून आम्हाला बद्रिनाथांची पूजा करता आली. कोणी विश्वास ठेवो वा ना ठेवो, माझे पक्के मत बनले आहे की, या सर्व गोष्टी नशिबातच आसाव्या लागतात. देवच आपणाकडून या सर्व गोष्टी करवून घेत असतो. नाहीतर बघा ना, आमच्या ग्रुप मधीलच एक नवराबायको केदारनाथचा चढ डोलीने चढले पण त्यांची बायको आजारी पडल्याने त्याना केदारनाथांचे दर्शन कांही घडले नाही. अशी बरीच उदाहरणे आपण नित्य बघत असतो.

बद्रीनाथाचे मंदिर कोणी व कधी बांधले याचा इतिहास उपलब्ध नाही. परंतु शंकराचार्यांनी लिहिलेला एक संस्कृत श्लोक मंदिरात सापडला आहे, त्यावरून बद्रीनाथाचे मंदिर अडीच हजार वर्षांपूर्वी बांधलेले आहे याचा उल्लेख सापडतो. पूर्वी देवगण, सिद्ध, गंधर्व व ऋषीमुनी बद्रीनाथाचे पूजन करीत. सदर मंदिर शंकराचार्यांनी बांधले असे काहीजण म्हणतात. परंतु शंकराचार्य आठव्या शतकात झाले. त्यावेळी भारतात बौद्ध धर्माचे प्राबल्य वाढून हिंदू धर्म मृतप्राय झाला होता. बौद्ध धर्मियांनी बद्री मंदिरातील बद्रीनाथाची मूर्ती तप्तकुंडात फेकून दिली होती. या मूर्तीबाबत शंकराचार्यांना दृष्टांत झाला. त्यांनी सदर मूर्ती तप्तकुंडातून काढून त्याची प्रतिष्ठापना केली. बद्रीनाथ मंदिराचा जीर्णोद्धार केला. या मंदिराचे पौरोहित्य दक्षिणेकडील नंबुद्रीपाद ब्राह्मणाकडे आहे. याबाबत ही एक कथा आहे. संन्यास स्वीकारण्यासाठी शंकराचार्यानी आपल्या आईची अनुमती मागितली. त्यावर आई त्यांना म्हणाली, तू संन्यास घेतल्यावर माझा अंत्यविधी तुला करता येणार नाही. त्यामुळे माझ्या आत्म्याला शांती मिळणार नाही. तुला संन्यास घ्यायचाच असेल तर माझ्या मृत्यूनंतर घे. यावर मी संन्यास घेतला तरी तुझा अंत्यसंस्कार जरूर करीन, असे वचन आईला देऊन संन्यासासाठी तिची अनुमती मिळवली.

– क्रमशः भाग सहावा 

© श्री राजीव  गजानन पुजारी 

विश्रामबाग, सांगली

ईमेल – rgpujari@gmail.com मो. 9527547629

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मी प्रवासी ☆ आमची चार धाम यात्रा – भाग – ५ ☆ श्री राजीव गजानन पुजारी ☆

श्री राजीव गजानन पुजारी

? मी प्रवासी ?

☆ आमची चार धाम यात्रा – भाग – ५ ☆ श्री राजीव गजानन पुजारी

आमची चार धाम यात्रा…

गंगेच्या सांगण्यानुसार भगीरथाने सुमेरू तथा सतोपंथ हेमशिखरावर भगवान शंकरासाठी तप सुरू केले. वर्षांमागून वर्षे लोटली. भगीरथाचे तप चालूच राहिले. भगीरथाच्या तप:प्रभावाने भगवान शंकराचे आसन डगमगू लागले. त्यांची समाधी भंग पावली. भगीरथाच्या समोर येऊन ते उभे राहिले. वरं ब्रूही म्हणाले. भगीरथाने सर्व निवेदन करून गंगेस धारण करण्याची विनंती भगवान शंकरांना केली. शंकरांनी ती मान्य करून ते डमरू वाजवू लागले. आनंदाने नाचू लागले. आपल्या जटा सोडून कमरेवर हात ठेवून पाय फाकून ते आकाशाकडे पाहू लागले. त्याचवेळी आकाशात विजेसारखा लख्ख प्रकाश पडला. गगनभेदी कडकडाट होऊन गंगा जलप्रवाहाच्या रूपाने खाली कोसळली. त्या वेळी भगवान शंकरांनी आपल्या जटेत गंगा झेलली. गंगा शंकरांच्या जटेत फिरू लागली. नेत्र कमळांच्या पुष्प मालिकेसारखी ती दिसू लागली. तिच्या जलधारेचा वेग कमी होऊन ती शंकरजटांत सामावली. त्रैलोक्यनिधी पवित्र गंगा धारण केल्याच्या आनंदात भगवान शंकर कैलासात निघून गेले. भगीरथाला गंगा द्यायची आहे याचे त्यांना विस्मरण झाले. पुन्हा गंगोत्री या ठिकाणी एका शिलेवर बसून भगीरथाने शंकरांची पुन्हा उग्र तप:साधना सुरू केली. भगवान शंकर भगीरथाला पुन्हा दुसऱ्यांदा प्रसन्न झाले. भगीरथाला एक दिव्य रथ देताना ते म्हणाले, ‘भक्ता तुझी साधना, पराक्रम आणि कुल धन्य होय. तू तुझ्या तप:सामर्थ्याने साऱ्या कुळाचा उद्धार केला केला आहेस. या रथावर बसून तू पुढे जा गंगेचा प्रवाह तुझ्या मागे मागे येईल. ’

सुमेरू पर्वत शिखरशृंखलेवर जाऊन भगवान शंकराने गंगेस आपल्या जटांतून मुक्त केले. ती आल्हादपणे धरतीवर अवतरली. गंगेचा प्रवाह दहा धारांनी विविध शिखरांवरून वाहू लागला. सतपथ सरोवरातून निघालेली अलकनंदा, केदारकंठावरून निघालेली मंदाकिनी या गंगेच्याच धारा होत. गंगेची मुख्य धार शिवलिंग शिखराच्या खालील भूगर्भातील बर्फखंडातून बाहेर पडते. हीच गंगेची मुख्य मोक्षधार भगीरथाच्या मागून जाऊ लागली. गंगोत्री या स्थळी भगीरथाचे विश्राम केला. तेथे त्याने गंगेची मनोभावे पूजा केली. म्हणून या ठिकाणी गंगोत्री हे पावन तीर्थ निर्माण झाले. भगीरथामागे जाऊन सगर पुत्रांच्या रक्षेला गंगेचा स्पर्श झाला. त्या क्षणी त्यांचा उद्धार झाला. भगीरथाच्या मागून निघालेल्या गंगेने कोट्यावधी भारतवासीयांचे जीवन सुखी केले.

भगीरथाने कठोर परिश्रम करून गंगा आणली. यावरून अशा परिश्रमाला ‘भगीरथ प्रयत्न’ असा वाक्प्रचार ही मराठीत रूढ झाला आहे. वैशाख महिन्यातील शुक्ल सप्तमीला गंगेने ब्रम्हलोकातून भगवान शंकराच्या जटांत प्रवेश केला. ज्येष्ठ महिन्यातील शुक्ल दशमीला भगवान शंकराकडून भगीरथाला गंगा प्राप्त झाली. या दोन तिथींना गंगा दसरा मोठ्या उत्साहात साजरा होतो. मुखवा या गावापासून या दसऱ्याची विशाल मिरवणूक निघते. गंगेची पालखी घेऊन ही मिरवणूक वाजत गाजत गंगोत्रीला येते. याप्रसंगी पारंपारिक पोशाख करून लोक आनंदाने नाचतात. गंगागीत गातात. अतिशय उत्साहात गंगाजन्मोत्सव साजरा करतात.

गंगा नावाचा द्रवरूप पदार्थ म्हणजे साक्षात परब्रह्म होय. महापातकांचाही उद्धार करण्यासाठी स्वयं कृपाळू परमेश्वराने पुण्यजलाच्या रूपात पृथ्वीवर अवतार धारण केला आहे. असा स्कंदपुराणात उल्लेख आहे.

केदारनाथ —

एक जूनला पहाटे पाच वाजता चहा घेऊन फाटा गावाकडे प्रस्थान केले. या फाटा गावात त्या दिवशी आमचा मुक्काम असणार होता. खिडकीतून बाहेर पाहतांना आजूबाजूचे भान विसरायला होत होते. खरोखर ‘अनंत हस्ते कमलावराने देता, घेशील किती तू दोही करी’ अशी आमची अवस्था झाली होती. आमच्याबरोबर किचन जीप होती. नाश्ता व जेवण रस्त्यातच घेतले. वाटेत सव्वाचार वाजता रुद्रप्रयागला गाडी थांबवली. खाली उतरून अलकनंदा व मंदाकिनी नद्यांचा संगम बघितला. रात्री आठ वाजता महाराष्ट्र निकेतन या हॉटेलला पोचलो. रात्री जेवण झाल्यावर दुसऱ्या दिवशीच्या कार्यक्रमाची रूपरेषा सांगण्यात आली.

त्याप्रमाणे दोन जूनला रात्री एक वाजता आम्ही बसमध्ये बसलो. बसने सीतापूर पार्किंग पर्यंत गेलो. तेथून साधारण दोन किलोमीटर्स चालल्यावर शेअर रिक्षास्टँड लागले. एक रिक्षात बाराजण घेतात. ज्याला जसे जमेल तसे रिक्षा पकडून सर्वजण साधारण पाच किलोमीटरवरील गौरीकुंड पर्यंत आलो. तेथे एकत्र जमलो. डोलीचे बुकिंग करण्यासाठी क्यू असतो. त्या लाईनमध्ये उभे राहिलो असतो तर आमचे दोन तास गेले असते. पण पुसेगावकरांनी एक लोकल माणूस बरोबर घेतला होता. त्याने पुढे जाऊन सर्वांचे बुकिंग केले, थोडे जास्त पैसे द्यावे लागले, पण महत्वाचा वेळ वाचला. डोलीवाल्यांचे रजिस्ट्रेशन केलेले असते. डोलीत बसतांना गोफ मध्ये अडकविलेले रजिस्ट्रेशनकार्ड ते आपल्याला देतात. एका डोलीत एक जण बसू शकतो व चार जणं ती डोली उचलतात. जातांना मध्ये मध्ये त्यांना नाश्ता व जेवण द्यायला लागते. ट्रॅक १६ किलोमीटर्सचा आहे पण वळणं वळणं असल्यामुळे प्रत्यक्षात २२ किलोमीटर्स वाटचाल करावी लागते. प्रत्येकजण वेगवेगळ्या वेळी पोहोचलो.

मी व पुसेगावकर साडेबारा वाजता पोहोचलो. मुख्य मंदिराकडे पोहोचण्यापूर्वी एक ऑफिस लागते. तेथे चारधाम यात्रा सुरू होण्यापूर्वी उत्तराखंड टुरिझम डेवलपमेंटकडे आपण जे रजिस्ट्रेशन केले होते ते दाखवून आपल्याला दर्शनासाठी एक टोकन देण्यात येते. डोलीवाले त्या ऑफिसच्या बरेच अलीकडे उतरवितात. तेथून त्या ऑफिस पर्यंतचे अंतर साधारण १-१।। कि. मी. आहे. टोकन घेऊन मंदीरासमोर एक मोठी घंटा आहे, तिथपर्यंत मी व पुसेगावकर आलो. काहीजण पूर्वीच पोहोचले होते. केदारनाथ मंदिराचे चित्र बऱ्याचदा बघितले होते. त्यासमोरच आपण उभे आहोत हे खरच वाटतं नव्हतं!! मी मनोमन देवळाच्या शिखराला नमस्कार केला. दर्शनासाठी भलीमोठी रांग होती. तीमध्ये उभे राहिलो असतो तर दर्शनाला सहा सात तास लागले असते. आम्ही थोडी विश्रांती घेऊन, स्पेशल दर्शनाची काही सोय होती का हे पहायचे ठरविले. केदारनाथ येथे विश्रांतीसाठी तंबू आहेत तसेच पक्क्या खोल्या देखील आहेत. आमच्यासाठी पुसेगावकरांनी कांही तंबू आरक्षित करून ठेवले होते. कांही तंबूत तिघांची तर कांहीत चौघांची राहण्याची व्यवस्था होती. आम्हाला चौघांची सोय असलेला तंबू देण्यात आला. तंबू जाड गाद्या, जाड पांघरुणे, उशा आदींनी सुसज्ज होता. लाईट व मोबाईल चार्जिंगची सोय होती. मंदिराच्या मागील बाजूस स्पेशल दर्शनासाठीचा काउंटर आहे व तो पाच वाजता उघडतो असे समजले. सौ सुनीता त्या शून्याच्या खाली चार अंश तपमान असणाऱ्या गोठविणाऱ्या थंडीत काउंटर समोर तीन वाजताच लाईनमध्ये उभी राहिली. पाच वाजता काऊंटर उघडला पण काउंटरवाल्याने सांगितले की स्पेशल दर्शनाचा कोटा संपला आहे. हताश मनाने लाईन मधील सर्वजण आपापल्या टेंटकडे परतले. सुनीता कांहीवेळ तिथेच उभी राहिली. तवंर एक व्यक्ती तिच्याजवळ आली आणि म्हणाली, ’मांजी, आपको स्पेशल दर्शन करना है क्या? ’ सुनीता होय म्हणाली. तो म्हणाला, आठ बजे मोबाईल टॉवर के नीचे एक दुकान है, वहा आ जाईये’ आम्ही रात्री आठ वाजता तिथे पोहोचलो. त्याने आम्ही किती माणसे आहोत ते विचारून, अमुक एव्हढे पैसे होतील असे सांगितले व रात्री अकरा वाजता स्पेशल दर्शनाची लाईन असते तिथे यायला सांगितले. त्याप्रमाणे थोडंस खाऊन आम्ही स्पेशल दर्शनाच्या लाईनमध्ये उभे राहिलो. स्पेशल दर्शन वाल्यांना बाजूच्या दरवाज्याने सोडतात. त्याप्रमाणे आम्ही आत गेलो. गाभाऱ्याच्या बाहेरील भागात पाच पांडव, द्रौपदी, कुंती यांच्या कलात्मक सुंदर मूर्ती आहेत. त्यांचे दर्शन घेत घेत आम्ही गाभाऱ्यात प्रवेश केला. तेथे केदारनाथांचे रेड्याच्या पाठीसारखे स्वयंभू पाषाण स्वरूप आहे. ते बघून मन भरून आले. त्याला तूप लावायची प्रथा आहे. तत्पूर्वी तेथील गुरुजींनी गंगेच्या पाण्याने भरलेला एक कलश आमच्या हाती देऊन आम्हाला त्या पाण्याने केदारनाथांचा अभिषेक करायला सांगितले. अभिषेकानंतर आम्ही केदारनाथांना बरोबर नेलेले तूप चोळले व चांदीचे बिल्वपत्र अर्पण केले. हे शिवलिंग नसल्याने त्याला पूर्ण प्रदक्षिणा घातली तर चालते. अर्धी प्रदक्षिणा झाल्यावर गुरुजींनी यमुना जलाने भरलेला एक कलश आमचे हाती देऊन त्या पाण्याने देखील अभिषेक करायला सांगितला. आम्ही केला. आम्ही किती नशीबवान की, आम्हाला गंगा व यमुना दोन्हींच्या जलाने केदारनाथांना अभिषेक करता आला!! दर्शन घेऊन बाहेर आलो. ज्यांनी आमच्या स्पेशल दर्शनाची सोय केली होती, ते गुरुजी भेटले. त्यांचे आभार मानून त्यांना ठरलेली दक्षिणा देऊन नमस्कार केला.

नंतर मंदिराच्या मागील बाजूस जाऊन भीम शिळेचे दर्शन घेतले. ही शिळा २० फूट लांब व १२ फूट व्यासाची आहे. २०१३ साली आलेल्या प्रचंड महापुरात पाण्याच्या प्रवाहाबरोबर ही शिळा घरंगळत आली व मंदिराच्या मागील बाजूस येऊन थांबली. त्यामुळे पाण्याचा प्रवाह दुभंगून मंदिराचे रक्षण झाले. ही खरोखर ईश्वराची लीलाच म्हणायला पाहिजे. भीम शिळेचे दर्शन घेऊन आम्ही टेंटवर येऊन थोडी विश्रांती घेतली व (तीन जूनला) सकाळी चहा बिस्किटे घेऊन परतीच्या प्रवासाला निघालो. हा प्रवास मी पिट्टूने केला. पिट्टू म्हणजे आपणाला नेणाऱ्या माणसाच्या पाठीवर एक बास्केट असते, त्यात बसवून आपणास तो नेतो. पार्श्वभूमीला बर्फाच्छादित हिमशिखरे असणाऱ्या केदारनाथ मंदिराचे दर्शन डोळे भरून घेतले. पिट्टूने मी व आमच्यापैकी कांही वयस्क मंडळी एक ते दिड किलोमीटर्स दूर असणाऱ्या एका हॉटेलजवळ गेलो. साधारण याच ठिकाणी डोलीवाल्याने काल आम्हाला सोडले होते. कांही मंडळी पायी तिथपर्यंत आली. नंतर पिट्टू, घोडा व डोली यांपैकी ज्याला जे सोयीचे वाटले त्याने ते निवडले व खऱ्या अर्थाने आमचा परतीचा प्रवास सुरू झाला. निसर्गसौंदर्याचा मनसोक्त आस्वाद घेत आम्ही निघालो. मध्ये मध्ये रिमझिम पाऊस पडत होता. पिट्टूवाल्याने पिट्टूवर व पर्यायाने माझ्यावर प्लास्टिकचे आवरण घातले. एक व्यक्तीस पाठुंगळीला घेऊन २२ किलोमीटर्सचा उतार उतरणे खायचे काम नाही. त्यामुळे दोन तीन ठिकाणी मी मुद्दाम थांबवून त्यास खाऊ पिऊ घातले. चारच्या सुमारास गौरीकुंडला पोहोचलो. तेथून शेअर जीपने सोनप्रयाग पर्यंत गेलो. तेथून बरेचसे चालल्यावर एक वाहनस्टँड लागते. तेथून गुप्तकाशीकडे जाणारी शेअर जीप मिळाली. तिने फाट्याच्या महाराष्ट्र निकेतनला साधारण पावणेसहा पर्यंत पोचलो. कांही मंडळी साडेतीन चारपर्यंत पोचली होती. जेवायला पुरणपोळीचा बेत होता. मंडळी पुरणपोळीवर ताव मारून आराम करत होती. आचारी मंडळीही निवांत होती. मी हातपाय धुवून कपडे बदलले व चहा वगैरे काहीतरी घ्यावे म्हणून मी व पत्नी वरच्या मजल्यावर गेलो. आचाऱ्याने निरोप दिला की, तुमच्यासाठी गरम गरम पोळ्या बनवल्या जात आहेत. मला त्यांचे खूप कौतुक वाटले. दूध व पुरणपोळीवर ताव मारून ताणून दिली ते दुसरे दिवशी (४ जूनला) पहाटे पाचलाच उठलो.

महाभारत, लिंगपुराण, वामनपुराण, शिवपुराण, ब्रह्मपुराण, वायुपुराण, कूर्मपुराण व गरुड पुराणात केदारनाथच्या अनेक कथा आणि अख्यायिका आहेत. भारत भूमीवर जी बारा ज्योतिर्लिंगे आहेत त्यापैकी हिमालयातील केदारनाथ हे एक होय. ज्यावेळी ईश्वराने मानवी सृष्टी निर्माण केली, त्याच्या रक्षणासाठी भगवंताने नरनारायण यांना पृथ्वीवर पाठवले. जगाच्या कल्याणासाठी गंधमादन पर्वतावर नरनारायणाने भगवान शंकरासाठी उग्र तप केले. भगवान शंकर प्रसन्न होऊन नरनारायणास त्यांनी वर मागण्यास सांगितले. त्यावेळी नरनारायण नम्रपणे त्यांना म्हणाले, ” विश्वकल्याणासाठी आम्ही आपले स्मरण केले. विश्वकल्याणासाठी आपण या पर्वतात सदैव प्रकट स्वरूपात कायम वास्तव्य करावे. आपल्या दर्शनातून संसारी मानवाला मुक्ती लाभेल. ” भगवान शंकरांनी नरनारायणाचे मनोगत स्वीकारले. केदार भूमित ते निवास करू लागले. त्यापासून हे पावन तीर्थ केदारनाथ या नावाने प्रसिद्ध झाले. या पवित्र निवासस्थानाबाबत पार्वतीशी बोलताना ते म्हणाले, ”मी ज्याप्रमाणे अनादी कालापासून या विश्वात वावरतोय, त्याप्रमाणे केदारभूमी ही प्राचीन आहे. ब्रह्मरूप धारण करून याच ठिकाणी सृष्टीनिर्मितीची रचना मी केली तेव्हापासून ही केदारभूमी अस्तित्वात आहे. ही देव दुर्लभ पवित्र भूमी होय. ” ही कथा वायुपुराणात वाचायला मिळते.

पुरातन यथा हं वै तथा स्थानामिदं किला।

यदा सृष्टीक्रिया यांच मयावै ब्रह्ममूर्तीना।।

स्थितमत्रैव सततं परब्रम्ह जिगीशया ।

तदादिकमिदं स्नानं देवानामपि दुर्लभम।।

असे या तीर्थक्षेत्राचे वर्णन केदारकल्प या ग्रंथात आहे.

– क्रमशः भाग पाचवा 

© श्री राजीव  गजानन पुजारी 

विश्रामबाग, सांगली

ईमेल – rgpujari@gmail.com मो. 9527547629

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मी प्रवासी ☆ आमची चार धाम यात्रा – भाग – ४ ☆ श्री राजीव गजानन पुजारी ☆

श्री राजीव गजानन पुजारी

? मी प्रवासी ?

☆ आमची चार धाम यात्रा – भाग – ४ ☆ श्री राजीव गजानन पुजारी

उत्तरकाशीकडे… 

३० मे रोजी ठरल्यानुसार ११ वाजता आम्ही उत्तरकाशीकडे प्रस्थान केले. वाटेतील निसर्गसौदर्याचा आस्वाद घेत घेत आम्ही संध्याकाळी साडेचार वाजता उत्तरकाशीला पोहोचलो. ११५८ मीटर्स उंचीवर भागीरथीच्या काठावरील एक तीर्थक्षेत्र म्हणून उत्तर काशीचा अनेक पुराणग्रंथात उल्लेख आहे. पुराणात उत्तरकाशीचा उल्लेख सौम्यकाशी म्हणून आहे. गढवालीत उत्तर काशीला बारहाट असे म्हणतात. अनादिकालापासून ही नगरी ऋषी मुनींची तपोभूमी होती. अशी मान्यता आहे की पांडवांची इथे ये जा असायची. तसेच जमदग्नी ऋषींचा आश्रम इथेच होता. येथेच जमदग्नी ऋषींचे कनिष्ठ पुत्र परशुरामाने आपल्या पित्याच्या आज्ञेनुसार आपली माता रेणुका हिचा शिरच्छेद केला होता. बालखिल्य, ऐरावत, इंद्रकिल व वारुणावत हे चार पर्वत उत्तरकाशीचे चार पहारेकरी आहेत. उत्तरकाशी वरुणावतच्या पायथ्याला वसली आहे. हे नगर पूर्वी भारत व तिबेट यांदरम्यानच्या व्यापाराचे महत्त्वाचे ठिकाण होते. तिबेटी व्यापारी पर्वत पार करून येत व मीठ व इतर पदार्थांच्या बदल्यात रत्नांची घेवाण करत. उत्तरकाशी वरुणा व अस्सी या दोन नद्यांच्या मध्ये स्थित आहे. या नगरीच्या एका टोकाला अस्सी व भागीरथी यांचा संगम आहे तर दुसऱ्या टोकाला वरुणा व भागीरथी यांचा संगम आहे. या दोन संगमांमधील ठिकाणास वाराणसी म्हणतात. पूर्ण जगात फक्त दोनच ठिकाणे अशी आहेत की जी दोन संगमांदरम्यान वसली आहेत. एक आहे काशी व दुसरे स्थान आहे उत्तर काशी. म्हणूनच प्राचीन काळी उत्तर काशीला सौम्य काशी म्हणून संबोधिले जात असे. या नगरीला उत्तर काशी म्हणण्याचे दुसरे कारण म्हणजे गंगामाई इथून जवळच असलेल्या तंबाखानी इथे धरण बांधण्यापूर्वी उत्तर दिशेकडे वहात होती. उत्तरकाशीचा उल्लेख स्कंद पुराणातील केदारखंडात सापडतो. दरवर्षी चैत्रातील कृष्ण त्रयोदशीला वरुणावताची पंचक्रोश प्रदक्षिणा निघते याला वारुणी यात्रा म्हणतात.

हॉटेलवर मुक्कामी जाण्याआगोदर आम्ही येथील प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिरात गेलो. उत्तर काशीमधील हे सर्वांत जुने मंदिर. या मंदिराची निर्मिती कचुरी शैलीत पाषाणांनी केली आहे व त्यासाठी हिमालय पद्धत अवलंबली आहे. मंदिरात रोज सकाळ संध्याकाळ गंगाजलाने विश्वनाथाला अभिषेक होतो. प्रांगणात श्री गणेश आणि शक्तिदेवतेचे मंदिर आहे. प्रांगणातच एकवीस फूट उंचीचा व अडीच फूट व्यास असलेला भव्य त्रिशूळ आहे. त्रिशूळाचा वरचा भाग लोखंडी तर खालचा भाग तांब्याचा आहे. देव दानवांच्या युद्धात देवानी याचा वापर केला होता. अशी केदारखंडातील अख्यायिका आहे. या त्रिशुळावर प्राचीन पाली लिपीत कांही ओळी कोरल्या आहेत. त्या ओळी इसवीसनाच्या ५०० वर्षांपूर्वी उत्तर काशीच्या राजाने आपल्या राज्यारोहण समारंभाच्या निमित्ताने नंतर कोरलेल्या असाव्यात असा इतिहास तज्ञांचा अभिप्राय आहे. हा त्रिशूळ उत्तराखंडच्या प्राचीन धार्मिक चिन्हांपैकी एक आहे. त्रिशुळावर नाग वंशाची वंशावळ देखील अंकित आहे. मंदिर परिसरात साक्षी गोपाल व मार्कंडेय ऋषींची मंदिरे देखील आहेत. मंदिरातील महादेवाची पिंड थोडी झुकलेली आहे. त्या संबंधी अशी आख्यायिका आहे की, ऋषी मार्कंडेय विधिलिखिताप्रमाणे अल्पायु होते. ते सदरच्या मंदिरात तपस्या करीत असत. त्यांचे आयुष्य संपल्यावर स्वतः यमराज त्याना नेण्यास आले, त्यावेळी मार्कंडेय पिंडीला घट्ट मिठी मारून बसले होते. यमराजानी त्यांना ओढण्याचा प्रयत्न केला, त्यामुळे पिंडी थोडी वाकडी झाली. मार्कंडेयांची भक्ती व तपश्चर्या पाहून शंकर भगवान प्रसन्न झाले व त्यांनी यमांना माघारी पाठविले. मार्कंडेय ऋषींना दीर्घायुष्य प्राप्त झाले. या प्राचीन विश्वनाथ मंदिराचा जीर्णोद्धार टेहरीचा पवॉरवंशीय राजा सुदर्शन शहाने १८५७ मध्ये केला. महाशिवरात्रीचा सोहळा येथे मोठ्या धुमधडाक्यात साजरा केला जातो. भगवान भोलेनाथांच्या प्रतिमा व गंगामैयाच्या सासन काठ्यांसह हजारो शिवभक्त ढोल ताशांच्या गजरात पूर्ण उत्तरकाशीची नगर प्रदक्षिणा करतात. विश्वेश्वर मंदिराजवळच मारुतीरायाचे सुंदर मंदिर आहे. तिथे जाऊन आम्ही मारूतिरायाचे दर्शन घेतले. त्यानंतर आम्ही कृष्णा पॅलेस या हॉटेलात मुक्कामासाठी गेलो. आमच्या हॉटेलमधून अप्रतीम निसर्गसौंदर्य दिसत होते. पण आमच्या समोरच्या हॉटेलमध्ये आमच्यापैकी कांही जणांची राहण्याची सोय केली होती, त्या हॉटेलच्या मागील बाजूस गंगामैया झुळूझुळू वहात होती व निसर्गाच्या माहोल कांही औरच होता.

गंगोत्रीकडे – – 

३१ मे ला सकाळी साडेसहा वाजता गंगोत्रीला जाण्यासाठी आम्ही निघालो. साडेनऊला गाडी गंगोत्रीजवळ पार्क केली. तेथून साधारण तीन किलोमीटर्स पायी चालावे लागणार होते. रस्त्यात पूजासाहित्याची अनेक दुकाने आहेत. त्यापैकी एका दुकानातून गंगाजल घरी नेण्यासाठी एक कॅन विकत घेतला. १०. ३० वाजता गंगोत्री मंदिराच्या प्रांगणात पोचलो. पुसेगावकरांनी एका पुजाऱ्यांकरवी खास दर्शनाची व्यवस्था केली होती त्यामुळे आम्हाला फारसे रांगेत उभे राहावे लागले नाही.

जी थोडी रांग होती त्या बरोबर आम्ही पुढे पुढे सरकू लागलो व गंगामैयाच्या मूर्तीसमोर आलो. गंगामैयाची मूर्ती पांढऱ्या संगमरवरामध्ये असून भान हरपेल एवढी देखणी आहे. मैय्याचे मनोभावे दर्शन करून बाहेर आलो. कांही पायऱ्या उतरून खाली आलो. मंदिरासमोरून गंगामैया तुफान वेगाने वाहते. यात्रेकरूंना नदीत पाय धुण्यासाठी जाड साखळ्या बांधल्या आहेत. त्यांना धरून आम्ही हातपाय प्रक्षालन केले व बरोबर आणलेल्या कॅन मध्ये गंगाजल भरून घेतले व वर येऊन तेथे असलेल्या पुजाऱ्यांकरवी कॅनमधील जलाचे पूजन करून घेतले. याला गंगापूजन म्हणतात. हे सर्व आवरून पावणेदोनला आम्ही बसमध्ये बसलो. गंगोत्री ते उत्तरकाशी सदोदित गंगामैया सतत आमच्या सोबत होती. कधी झुळूझुळू तर कधी जोरकसपणे. वाटेत येणाऱ्या दगडधोंडे व खडकांना अलगद ओलांडत तर कधी त्यांचेवरून अवखळपणे उड्या घेत तर कधी त्याना वळसे घालत. सोबतीला चीड आणि देवदार वृक्ष होतेच! असे सर्व निसर्गसौंदर्य प्राशन करीत आम्ही साडेचार पाच पर्यंत रूमवर पोचलो.

गंगा गंगोत्री वरून उगम पावते, असा काही लोकांचा समज आहे. परंतु गंगोत्री पासून १८ किलोमीटर दूरवर असलेल्या प्रचंड बर्फाच्या ग्लेशियरमधून ती बाहेर पडते. हजारो वर्षांपूर्वी गंगेचा उगम गंगोत्रीस असावा, परंतु प्रचंड वृक्षतोडीमुळे हिमकडे कोसळून तो १८ किलोमीटर मागे गेला असावा. या उगमाला गोमुख असे म्हणतात. कठोर तप करून राजा भगीरथाने स्वर्गातून तिला पृथ्वीवर आणले म्हणून तिला भागीरथी नावाने संबोधले जाते. देवप्रयाग पर्यंत ती भागीरथी नावाने वाहते. देवप्रयाग या ठिकाणी अलकनंदा आणि भागीरथीचा संगम होतो. देवप्रयाग पासून ७१ किलोमीटर प्रवास करून ऋषिकेशच्या मैदानात ती गंगा या नावाने अवतरते.

मात: शैलसुता सपत्नी वसुधा शृंगाराहारवली ।

स्वर्गारोहिण वैजयंती भवती प्रार्थये ।।

त्वत्तिरे वसतस्त्वदर्पित पिबत स्त्वव्दीचिशु ।

स्त्वन्नाम स्मरत स्त्वदर्पित दृश:स्योन्मे शरीरव्यय: ।।१।।

याप्रमाणे भागीरथीचे पुराणग्रंथात सुंदर वर्णन दिले आहे. त्याचप्रमाणे गंगेची जन्मकथाही पुराणात आहे. धरतीवर तिची अवतरण झाले याची ही कथा म्हणजे इतिहास होय. सत् युगातील ही कथा आहे.

प्राचीन काळात इश्वांकू वंशातील चक्रवर्ती राजा सगर राज्य करीत होता. महापराक्रमी आणि प्रजेवर पुत्रवत प्रेम करणारा राजा म्हणून त्याचा लौकिक होता. त्याने अश्वमेध यज्ञ करायचे ठरवले. त्यासाठी त्याने घोडा सोडला. सदर राजाचा अश्वमेध यज्ञ साकार झाला तर हा शक्तिशाली राजा आपला पराभव करून इंद्नगरीचा कब्जा घेईल अशी इंद्राला भीती वाटली. या अश्वमेध यज्ञात विघ्न निर्माण करण्यासाठी त्याने एक क्लुप्ती योजली. त्यानुसार त्याने घोड्याला पकडून समाधीस्थ कपिल मुलींच्या आश्रमात गुपचूपपणे बांधून टाकले. घोडा हरवल्याचे कळताच सगर राजा चिंताग्रस्त झाला. आपल्या पराक्रमाला आव्हान देणाऱ्या कोणत्या वीराने घोडा अडवला म्हणून राजाच्या सैन्याने त्याचा शोध घेतला, परंतु घोडा सापडायला तयार नव्हता. शेवटी त्याने आपल्या साठ हजार पुत्रांना घोड्याला शोधण्यासाठी पाठवले. त्यांनी स्वर्ग मृत्यू पाताळ पालथे घातले, परंतु घोडा मिळाला नाही. ते निराशमनाने माघारी परतले. फिरत फिरत ते कपिल मुनींच्या आश्रमाजवळ आले. तो आश्रमापाठीमागे घोडा बांधलेला त्यांना दिसला. मुनी समाधीस्थच होते. आपल्या आश्रमामागे चक्रवर्ती राजा सगराचा अश्वमेध यज्ञाचा घोडा बांधला आहे याची त्यांना काहीच कल्पना नव्हती. परंतु कपिलमुनींनीच घोडा पळवून आश्रमात बांधून ठेवला असा सगर पुत्रांचा समाज झाला. त्यांनी चिडून कपिलमुनींना त्रास द्यायला सुरुवात केली. त्यांच्या गळ्यात मृतसर्प लटकवला. मुनींना मोठमोठ्याने अर्वाच बोलू लागले. त्यामुळे मुनींची समाधी भंग पावली. सगर पुत्रांच्या मर्कटलिला पाहून त्यांचा क्रोधांनी जागृत झाला. डोळे उघडताच त्यांच्या मुखातून शापवाणी बाहेर पडली. त्यामुळे ६०, ००० सगरपुत्र भस्म होऊन त्यांचे राखेच्या ढिगार्‍यात रूपांतर झाले. राजा सगराला ही बातमी समजतात तो कपिल मुनींकडे आला. कपिल मुनींची त्याने क्षमा मागितली. पुत्रांना जीवदान देण्याची विनंती केली. आपल्या आश्रमात घोडा बांधण्याचे कपटकारस्थान इंद्राचे होते हे नंतर योगसाधने द्वारा मुनींना समजले. केवळ अज्ञानापायी सगर पुत्रांचा नाश झाला. त्यामुळे कपिलमुनींना खंत वाटली. ते राजाला म्हणाले, ’तुझ्या पुत्रांचा मृत्यू माझ्या शापामुळे होणार होता. तसे त्यांच्या नशिबात लिहिलेलं होतं. तो मृत्यू कोणत्याही कारणाने टाळता आला नसता. यात माझा आणि त्यांचा काहीच दोष नाही. त्यांचे जगण्याचे दिवस संपलेले आहेत. त्यामुळे ते पुन्हा जिवंत होऊ शकणार नाहीत. परंतु अधिक विचार न करता मी त्यांना भस्म केल आहे त्यामुळे त्यांच्या आत्ममुक्तीसाठी आणि उद्धारासाठी प्रयत्न करणं मी माझं कर्तव्य समजतो. त्यासाठी त्यांच्या मुक्तीचा मार्ग मी तुला सांगतो. प्रत्यक्ष ब्रह्मद्रव्य गंगा ब्रम्हलोकातून खाली आणली व तिचे जल या रक्षेवर शिंपडले तर तत्काळ तुझ्या पुत्रांना मुक्ती मिळेल. ’ यावर राजा सगर विवश होऊन म्हणाला, ’मुनीवर्य ब्रह्म लोकातून गंगा पृथ्वीवर आणणे ही अशक्य गोष्ट आहे. माझी शारीरिक, मानसिक व आत्मिक शक्ती तेवढी प्रबळ नाही. गंगा अवतरणासाठी मी असमर्थ आहे. ’ यावर मुनीवर्य म्हणाले, ’राजा या जगात मानवाला कोणतीच गोष्ट अशक्य नाही. त्याच्या अंतरंगात ईश्वरी शक्तींचे प्रचंड भांडार आहे. पण त्याचा त्याला पत्ता नसतो. त्यासाठी कठोर साधनेची गरज असते. त्यासाठी सत्यव्रती, प्रतिज्ञापालक, दृढनिश्चयी बनावं लागतं. तरच त्याच्यातील सुप्त शक्ती व पुरुषार्थ जागा होतो. मग त्याला जगातली कोणतीही गोष्ट साध्य करता येते. तुझ्या कुळात असा सामर्थ्यशाली पुरुष निर्माण होऊन तो ब्रह्मलोकांतून गंगा मृत्यूलोकात निश्चितपणे आणेल. या गंगेच्या स्पर्शाने तुझ्या पुत्रांना मुक्ती मिळेल. ’

मुनींचा आशीर्वाद घेऊन दुःखद अंतःकरणाने राजा राजधानीत आला. राजवाड्याच्या दर्शनी दरवाजावर त्याने एक शिलालेख कोरला- ‘माझ्या ६०, ००० पुत्रांची राख कपिलाश्रमासमोर पडलेली आहे. कपिल मुनींच्या शापामुळे दग्ध झालेल्या या पुत्रांच्या मुक्तीसाठी गंगाजलाची आवश्यकता आहे. माझ्यानंतर माझ्या वंशात होणाऱ्या ज्या राजांच्या ठिकाणी अलौकिक सामर्थ्य असेल त्याने ब्रह्मलोकांतून गंगा पृथ्वीवर आणावी. आपल्या कुळाचा उद्धार करावा. जोपर्यंत गंगा पृथ्वीवर वाहत राहील तोपर्यंत त्याचे नाव घेतले जाईल. ’

सगर राजाचा पुत्र दिलीप हा सिंहासनावर बसला. त्याने शिलालेख वाचला. परंतु त्याला ब्रह्मलोकातून गंगा आणणे शक्य झाले नाही. त्याला अतिशय तेजस्वी पुत्र झाला. त्याचे भगीरथ नाव ठेवण्यात आले. लहानपणापासून भगीरथ जिज्ञासू प्रवृत्तीचा होता. राजवाडाच्या दरवाजाकडे तो तासानतास बघत राहायचा दरवाजावरील शिलालेख त्याने आपल्या पिताजींकडून वाचून घेतला त्याचा अर्थ व इतिहास समजावून घेतला. आपल्या आजोबांची अतृप्त इच्छा पूर्ण करून आपल्या पूर्वजांचा उद्धार करण्याची इच्छा त्याच्या मनात जागृत झाली. युवावस्था प्राप्त झाल्यावर तो राजसिंहासनावर बसला. पण त्याचे मन राज्यकारभारात रमेना. ऐशआराम त्याला बोचू लागला. दरवाजावरील शिलालेख त्याला खुणावत होता. आव्हान करीत होता. मग त्याने एक दिवस घोर प्रतिज्ञा केली. :‘ब्रह्म लोकातून गंगा धरतीवर आणून पितरांचा उद्धार करीन त्याचवेळी मी सिंहासनावर बसेन. ’ प्रतिज्ञेनुसार राज सिंहासनाचा त्याग करून तो हिमालयात गेला. हिमशृंग पर्वतावरील श्रीकंठ शिखरावर तो पोहोचला. तेथे त्याने गंगा प्राप्तीसाठी घोर तपश्चर्या सुरू केली. हिमालयातील यक्ष, किन्नर व गंधर्वांनी विघ्ने आणून त्याचा तपोभंग करण्याचा प्रयत्न केला. त्यांच्यावर विजय मिळवून भागीरथाने आपली तप:साधना चालू ठेवली. भागीरथाची कठोर तपश्चर्या पाहून गंगा प्रसन्न झाली. भागीरथाने तिला आपल्या तपश्चर्येचे कारण सांगितले. त्यानुसार गंगा ब्रम्हलोकातून मृत्यूलोकात यायला तयार झाली. परंतु ती भगीरथाला म्हणाली, ’मी तुझ्या पुर्वजांच्या उद्धारासाठी पृथ्वीवर येईन, परंतु माझ्या जलप्रवाहाचा वेग पृथ्वीला सहन होणार नाही. त्याच्या वेगाने तिचे तुकडे तुकडे होतील. माझा वेग धारण करणारी एकच व्यक्ती आहे. श्री भगवान शंकर त्यांच्यातच माझ्या प्रबळ वेगाला धारण करण्याची शक्ती आहे त्यांना तू प्रसन्न करून घे. मी यायला तयार आहे.’

– क्रमशः भाग चौथा 

© श्री राजीव  गजानन पुजारी 

विश्रामबाग, सांगली

ईमेल – rgpujari@gmail.com मो. 9527547629

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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