श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१५ ☆ श्री सुरेश पटवा
पैंगोंग झील
04 जुलाई 2022 को आज विश्व प्रसिद्ध पैंगोंग झील पहुँचने के लिए सात बजे हुंदर से निकलना पड़ा। ड्राइवर का कहना था कि दोपहर में ग्लेशियर का पानी पिघल कर रास्ते में तेज़ी से बहकर व्यवधान उत्पन्न करता है, इसलिए कई स्थानों पर सड़क टूट जाती है। सीमा सड़क संगठन के कर्मचारी उसे ठीक करते चलते हैं। सुबह चाय बिस्कुट लिया और नाश्ता पेक करवा कर रख लिया।
पैंगोंग झील की जुड़वा त्सो मोरीरी झील का जायज़ा भी लेना ठीक रहेगा। मोरीरी झील को पैंगोंग झील की जुड़वा बहन कहा जाता है, जो लद्दाख के चांगथंग क्षेत्र में स्थित है। इस झील की समुद्र तल से ऊंचाई 4522 मीटर (14,836 फीट) है, जिसकी वजह से यहां पर भी ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है और यही कारण है कि यहां पर पर्यटकों की ज्यादा भीड़ नहीं होती। इस झील की लंबाई 135 किमी. है जो भारत और चीन दोनों देशों में विस्तारित है। इस झील में भारत का हिस्सा 1/3 (45 किमी.) और चीन का हिस्सा 2/3 (90 किमी.) है। यह झील अपने रंगों को बदलने में माहिर है। इस झील का रंग सूर्य किरणों और उनके बर्फीले पहाड़ों पर प्रतिबिम्ब से नीला, लाल और कभी-कभी हरा भी दिखलाई पड़ता है। झील के रंग से आसपास का आभामंडल भी उसी रंग का बनता है।
इस झील के किनारे कई फिल्मों की शूटिंग हुई है, लेकिन 2009 में 3-इडियटस् फिल्म का शूटिंग होने के कारण यह झील काफी चर्चा में आई और अब आकर्षण का केंद्र बन चुकी है। झील के पानी का कहीं पर भी निकास न होने की वजह से इसका पानी खारा है और खारा होने के बावजूद भी सर्दियों में यह झील जम जाती है, उस समय इसके ऊपर बाइक और कार वगैरह को आसानी से चलाया जा सकता है।
हुंदर, डिसकिट, खालसर और अगम के बीच एक तरफ़ गगनचुंबी पहाड़ दूसरी तरफ़ पाँच सौ फुट से एक हज़ार फुट गहरी खाई के किनारे से ख़तरनाक रास्ता पर चलते जान मुँह को आती रही। सब चुप थे। ज़ुबान को जैसे लकवा मार गया हो। घबराहट से जान छुड़ाने के लिए फ़िल्मी गीत तेज आवाज़ में बजाए जाने लगे। उसके बाद रेतीले पिघलते पहाड़ों की शृंखला आरम्भ हुईं। सीमा सड़क संगठन ने श्योक नदी के बीच से रास्ता निकाला है। जिसमें बीच-बीच में कई धाराएँ निकली हैं। रास्ता अक्सर बंद रहता है। अगम में एक नाश्ते की दुकान पर हुंदर से लाया नाश्ता निपटा रहे थे तभी खबर मिली कि आगे रास्ता बंद है। रास्ता खुला लेकिन थोड़ी दूर चलने पर फिर रुकना पड़ा। सीमा सड़क संगठन के श्रमिक बिल्कुल स्याह पड़ चुके हैं। वे बहुत मुश्किल वातावरण में सड़कों की मरम्मत और रखरखाव करते हैं। भोपाल से साथ लाए मिठाई उन्हें खिलाई और उनके हालचाल पूछे। श्योक नदी के अंदर से रास्ता है। जो ठंड के दिनों में बर्फ़ से भर जाता है।
क्ति नामक गाँव से एक रास्ता लेह जाता है। हमने श्योक जाने वाला रास्ता पकड़ा। पूरा रास्ता श्योक नदी के बीच से होकर है। एक तरफ़ नदी का पाठ है और दूसरी तरफ़ से रास्ता। कभी भी कहीं से ग्लेशियर का पानी तेज़ी से आ सकता है। पेट्रोलिंग पुलिसकर्मी गाड़ियों को निकालने में सहायता करते हैं। अभी एक जगह बहुत देर से फँसे हैं। बाईकर्स निकलते जा रहे हैं। दुनिया के अत्यंत दुरूह रास्ता पर यात्रा करना रोमांचक है। पैंगांग पहुँचना है, कब पहुँचेंगे, कैसे पहुँचेंगे, कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता। साहस और धैर्य की परीक्षा का समय है। कुछ लोग उत्तेजित हैं तो कुछ बोरियत ढ़ो रहे हैं। साथ रखा पानी पेशाब बनकर ख़त्म होता जा रहा है। अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। हृदय गति बेचैनी का मापक यंत्र साथ है। हृदय गति बढ़ती जा रही है। मापी तो 72-75 रहने वाली हृदय गति 96-98 आ रही है। बैठे-बैठे घुटने पथराने लगे हैं। हालाँकि आक्सीजन का स्तर 97-98 है। जितने भी फ़िल्मी गीत थे सब तीन बार सुन चुके हैं। अभी पता चला है कि आगे बड़े ग्लेशियर से पानी एकदम आने लगा है। पता नहीं ग्लेशियर महोदय की कृपा कब होगी। कब पानी पिघलना रोकेंगे और रास्ता खुलेगा।
आजकल युवा जोड़े बाईक पर खूब आने लगे हैं। युवकों में साहसिक रोमांचक यात्रा का रुझान बढ़ा है। तीन-चार सौ गाड़ियों का जाम लग चुका है। बाईकर सबसे आगे पहुँच गए हैं। पानी रुकने पर वे पहले निकलेंगे बाद में गाड़ियाँ। हमारे साथी श्योक नदी के पानी को छूने चले गये, तभी रास्ता खुल गया। भागकर आये। साँसें फूल गयीं। दो साथी आगे निकल गये। उन्हें आगे से बिठाना था। एक पर्वत से पानी की मोटी धार रास्ते पर बह रही थी। गाड़ियाँ एक-एक करके निकालना जोखिम भरा काम था। दो घंटे फँसे रहे। हरेक गाड़ी के निकालने पर लगता था कि यह तो फँस जाएगी या पानी के बहाव में बह जाएगी। एक जेसीबी बीच-बीच में पत्थरों को पानी में डालकर पूरते जाती थी। फिर तीन-चार गाड़ियों को निकालते थे। सौम्या बिटिया और कैलाश भाई गाड़ी से उतर कर नजारा देखने चले गये। वे उस स्थान पर पहुँचे जहां गाड़ियाँ फँस रही थीं। उनके पैर बर्फीले पानी में जमने लगे। उन्होंने पानी के बहाव में फँसती गाड़ियों को धक्का लगाना शुरू किया। कई लोग उनकी फ़ोटो लेकर फ़ेस्बुक और व्हॉटसएप पर डालने लगे। उन्होंने पंद्रह-बीस गाड़ियाँ निकालीं। जब हमारी गाड़ी पहुँची तो दूर खड़े होकर इंतज़ार कर रहे थे। हमारा ड्राइवर होशियार था। उसने रास्ते का निरीक्षण कर एक झटके में गाड़ी निकाल ली।
श्योक से दुर्बक का रास्ता भी बहुत दुस्साहसिक और जोखिम भरा था। एक तरफ़ एक हज़ार से फुट अधिक ऊँचे पहाड़ और दूसरी तरफ़ दो हज़ार फुट गहरी खाई में बहती श्योक नदी, बीच में पहाड़ों से झरनों के रूप में उतरता ग्लेशियर का बर्फीला पानी। ड्राइवर ख़तरनाक तरीक़े से तेज गाड़ी चला रहा था। उसे टोंकने पर बोला- आप चुप रहो, हमारा भरोसा करो। हमने कहा- आपका भरोसा तो है लेकिन मशीन का क्या भरोसा कब दगा दे जाये। संभल कर चलो। पत्थरों में से गाड़ी निकालने पर क्या मालूम नीचे से कोई बुश वग़ैरह कट गया हो। उसे बात समझ आई। थोड़ी देर ठीक चला और फिर अपनी पर आ गया। बंदर पलटी खाना कभी नहीं छोड़ता। दुर्बक में लंच लिया।
पैंगोंग त्सो विवादित क्षेत्र है। उसके बिल्कुल नज़दीक से गुज़रे। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से लगभग 20 किमी पूर्व में झील का एक हिस्सा चीन द्वारा नियंत्रित है लेकिन भारत द्वारा उसका दावा किया जाता है। झील का पूर्वी छोर तिब्बत में है। 19वीं सदी के मध्य के बाद, पैंगोंग त्सो जॉनसन लाइन के दक्षिणी छोर पर था, जो अक्साई चिन क्षेत्र में भारत और चीन के बीच सीमांकन का एक प्रारंभिक प्रयास था। खुर्नक किला झील के उत्तरी किनारे पर पैंगोंग त्सो के लगभग आधे रास्ते पर स्थित है। तिब्बत अधिग्रहण के समय अर्थात् 1958 से खुर्नक किला क्षेत्र पर चीनियों का नियंत्रण है। दक्षिण में छोटी स्पंगगुर त्सो झील है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) झील से होकर गुजरती है। यह क्षेत्र एलएसी के साथ एक संवेदनशील सीमा बिंदु बना हुआ है। इस क्षेत्र में चीनी पक्ष से घुसपैठ आम बात है। 20 अक्टूबर 1962 को, पैंगोंग त्सो ने चीन-भारतीय युद्ध के दौरान सैन्य कार्रवाई देखी, जिसमें चीन ने भारतीय ज़मीन का एक बड़ा टुकड़ा दबा लिया था। चूसुल की प्रसिद्ध लड़ाई पर चेतन आनंद ने हक़ीक़त फ़िल्म बनाई थी। जिसके प्रसिद्ध गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी” सुनकर तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की आँखों में आँसू आ गए थे।
चीन का राष्ट्रीय राजमार्ग 219 पैंगोंग त्सो के पूर्वी छोर से गुजरता है। झील तक रुतोग से 12 किमी या शिकान्हे से 130 किमी की दूरी पर गाड़ी चलाकर पहुँचा जा सकता है। उसके बाद चीनी सीमा लग जाती है। पर्यटक झील पर एक नाव किराए पर ले सकते हैं, लेकिन पक्षियों के प्रजनन स्थल की रक्षा के लिए द्वीपों पर उतरने की अनुमति नहीं है। किनारे पर कई रेस्तरां हैं।
पैंगोंग झील का मज़ा यहाँ तक पहुँचने की रोमांचक यात्रा में है, तकलीफ़ में है, भूख-प्यास की तड़फ में है। यहाँ पहुँच कर विशाल झील में लहराता नीला पानी और उसके चारों तरफ़ सूखे पहाड़ों पर धूप और बादलों की आवारगी देख मन प्रफुल्लित हो गया है।
झील के परे जो पहाड़ दिखते हैं वे चीन की सीमा में हैं। अगस्त 2017 में, पैंगोंग त्सो के पास भारतीय और चीनी सेना में हाथापाई हुई थी जिसमें लात मारना, मुक्का मारना, पत्थर फेंकना और लाठी और छड़ जैसे परम्परा गत हथियारों का उपयोग शामिल था। 11 सितंबर 2019 को, चीनी सैनिकों ने उत्तरी तट पर भारतीय सैनिकों का सामना किया। 5-6 मई 2020 को, झील के पास लगभग 250 भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना हुआ, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षों के सैनिक हताहत हुए।
भारत की ओर की झील की यात्रा के लिए एक इनर लाइन परमिट की आवश्यकता होती है क्योंकि यह चीन-भारतीय वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित है। सुरक्षा कारणों से भारत नौका विहार की अनुमति नहीं देता है। एक मान्यता प्राप्त गाइड के साथ समूहों की अनुमति है। टांगसे, लुकूँग होते हुए शाम को पाँच बजे आख़िर पैंगोंग झील पर पहुँच गये। झील के उस पार चीन की सीमा में बीच के पहाड़ों पर एक टुकड़ा धूप चमक रही थी। आजुबाजु के पहाड़ों पर स्याह बादलों की कालिमा छाई थी। पहले पी-3 टेंट हाऊस में सामान रखा। लेकिन उसके पहले एक झंझट से निपटना पड़ा। जब हमने मैनेजर को टेंट आवंटन का पत्र दिया तो वह बोला कि उसके पास हमारे आवंटन की कोई सूचना नहीं है। हमने भुगतान नहीं किया होगा। हमने तब तक सामान उतार लिया था। सामान सहित उस पर चढ़ाई कर दी। उसके मालिक से बात कराने को कहा। वे तीन चार लोग मिलकर सलाह करने लगे। हमने ज़ोर से डाँटा तो उन्होंने तुरंत दो टेंट दे दिए। यह खेल बाद में समझ आया कि वे हमें तनाव में रखकर किराया वसूलना चाह रहे थे। उनका मालिक हमारी बुकिंग का भुगतान सीधे टूर ऑपरेटर से प्राप्त कर चुका था। हमारा भुगतान उनकी ऊपरी कमाई होती। बढ़िया चाय पी। पहली फ़ुरसत में पैंगोंग झील किनारे पहुँचे। भारतीय समाज पर फ़िल्मों का इतना प्रभाव है। इसे यहाँ पहुँच कर समझा जा सकता है। 3-इडियटस् फ़िल्म ने इस स्थान को प्रसिद्धि दिलाई है। उसका यहाँ कारोबारी उपयोग होने लगा है। करीना कपूर टाइप पीले रंग की स्कूटर पर बैठकर फ़ोटो खिंचवाने का मूल्य एक सौ, तीन कुर्सियों का किराया तीन सौ रुपया लिया जाता है।
कैम्प में पी-3 के मैनेजर को टेंट में तीसरा बिस्तर लगाने को बुलाया। उसका नाम अजित है। वह झारखंड से नौकरी करने जान जोखिम में डालकर इतनी दूर आया है। उसकी मासिक तनख़्वाह 15,000/- माहवार है। यहाँ का पर्यटक मौसम मई से सितम्बर कुल 5 महीने रहता है। वह पूरी टीम के साथ मई में यहाँ आया है। खाना पीना यहीं से मिलता है। मासिक तनख़्वाह टेंट के मालिक उसके खाते में जमा कर देते हैं। उसके परिवार के लोग झारखंड में बैंक एटीएम से निकाल लेते हैं। इस प्रकार सीज़न में 75,000/- उसे मिल जाते हैं। उसने बताया ऊपरी कमाई से सीज़न में दो लाख अलग से ले जाते हैं। जिसमें गेस्ट की टिप्स और टेंट के मालिक की जानकारी के बग़ैर किराए से आमदनी शामिल है। मालिक लेह के राजनीतिक वर्चस्व वाले लोग हैं। इतनी दूर रोज़ आ नहीं सकते। वे बुकिंग के हिसाब से भुगतान सीधे प्राप्त करते हैं। भूले भटके पर्यटकों को टेंट उपलब्ध कराकर मैनेजर ऊपरी कमाई कर लेते हैं। सितम्बर में पेंगोंग झील पूरी तरह जमना शुरू होती है तो तापमान -40 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है।
पेंगोंग में साल के बारह महीने भारी मात्रा में सैनिक मौजूदगी रहती है। 1962 से 2020 तक भारतीय और चीनी सैनिकों में भिड़ंत होती रही है। चीन के साथ यह अत्यंत संवेदन शील इलाक़ा है। विषम परिस्थितियों में भी सैनिक मोर्चा नहीं छोड़ते हैं। राष्ट्राध्यक्ष को जब भी किसी स्थानीय कारण से जनता का ध्यान भटकाना होता है तब उनके एक इशारे पर सैनिक मुठभेड़ होती रहती हैं।
बताया जाता है कि 1962 के युद्ध के दौरान यही वो जगह थी, जहां से चीन ने अपना मुख्य आक्रमण शुरू किया था। भारतीय सेना ने भी चुशूल घाटी के दक्षिण-पूर्वी छोर के पहाड़ी दर्रे रेजांग ला से वीरतापूर्वक युद्ध लड़ा था। पिछले कुछ सालों में चीन ने पैंगोंग झील के अपनी ओर के किनारों पर सड़कों का निर्माण भी किया है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह झील यक्ष राज कुबेर का मुख्य स्थान है। माना जाता है कि भगवान कुबेर की ‘दिव्य नगरी’ इसी झील के आसपास कहीं स्थित है। इसका उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, ये तो शायद ही कोई बता पाए।
आधिकारिक तौर पर, मैकमोहन रेखा भारत और चीन के बीच की सीमा को परिभाषित करती है। यह ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा भारत और फिर तिब्बत के बीच एक समझौते के रूप में खिंची गई थी। चीन हमेशा सीमा समझौते पर आपत्ति जताता है क्योंकि उसका दावा है कि यह समझौता झूठा है क्योंकि चीन इसका हिस्सा नहीं था बल्कि तिब्बत था।
पेंगोंग से चूसुल 30 किलोमीटर और मिराक 45 किलोमीटर चीन सीमा पर अंतिम गाँव है। सुबह सेना के दो हेलिकोप्टर पेट्रोलिंग पर जाते दिखे। एक सेनानी ने बताया कि ऑफ़िसर कमांडिंग चूसुल पोईंट पर चाय-नाश्ता की मेज़ पर
तुरतुक
भारत-पाकिस्तान सीमा पर तुरतुक गाँव है। सरहदें अच्छी भी होती हैं और खराब भी। अच्छी इसलिए की सरहदें किसी मुल्क को उसके वजूद का अहसास दिलाती हैं। खराब इसलिए कि ये लोगों को एक दूसरे से जुदा कर देती हैं। सरहदें बनने का दर्द भारत से बेहतर और कौन जान सकता है। सरहद ने एक ही मुल्क के लोगों को एक दूसरे के लिए बेगाना बना दिया। जहां बंटवारे की लाइन खींची गई, वहां के आधे लोग एक तरफ और आधे लोग दूसरी तरफ के हो गए।
बंटवारे की इस लड़ाई में सरहद के पास ऐसे बहुत से इलाके थे जिन पर दोनों मुल्क अपना दावा ठोंक रहे थे। ऐसे ही इलाकों में से एक था जम्मू-कश्मीर के बाल्टिस्तान इलाके का तुरतुक गांव। बंटवारे के वक्त ये पाकिस्तान में था। चूंकि ये गांव दोनों मुल्कों की सरहदों के बीच स्थित था, लिहाजा यहां बाहरी लोगों के आने पर पाबंदी थी। यहां के लोग बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे हुए थे। 1971 की लड़ाई में जब पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी, तो तुरतुक भी उसके हाथ से निकल कर भारत में शामिल हो गया। तुरतुक गाँव गांव में हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध तीनों धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। यह गांव श्योक नदी के तट पर स्थित है, जहां जाने के बाद आपको काफी सुंदर और बेहतरीन नजारा देखने को मिलेगा।
यह भारत द्वारा 1971 ई० में पाकिस्तान से छीना गया गांव है, जो वर्तमान समय में भारत का एक हिस्सा बन चुका है। यह गांव चारों ओर से पहाड़ों से घिरे होने के साथ-साथ श्योक नदी के तट पर बसा हुआ है, जहां जाने के बाद एक अलग ही दुनिया का एहसास होता है। वर्तमान समय में यह गांव लद्दाख का काफी बड़ा आकर्षण का केंद्र बन चुका है, जिसे देखने के लिए हर साल देश के अलग-अलग क्षेत्रों से सैलानी यहां आते हैं।
05 जुलाई 2022 को सुबह पाँच बजे नींद खुली तो पेंगोंग झील देखने चले गए। ग़ज़ब का प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा हुआ था। सूर्य रश्मियों का हिमशिखरों पर रंगीन नृत्य और उनका झील पर सतरंगी प्रतिबिम्ब आभा देखते बनती थी। आठ बजे पेंगोंग से रवाना हुए। हमें अब पुनः श्योक नदी के और भी ख़तरनाक दर्रों से गुजरते हुए सिंधु की सहायक नदियों के काँठे में पहुँचना है।
लद्दाखी हिमालय सिंधु की सहायक नदियों के साथ, भारत का पंजाब क्षेत्र बनाता है, जबकि नदी का निचला भाग पाकिस्तान के दक्षिणी सिंध प्रांत में एक बड़े डेल्टा में समाप्त होता है। सिंधु नदी ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र की कई संस्कृतियों का मिलन स्थल रही है। तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में सिंधु घाटी सभ्यता का उदय हुआ, जो कांस्य युग की एक प्रमुख शहरी सभ्यता थी। दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान पंजाब क्षेत्र का उल्लेख ऋग्वेद की ऋचाओं में सप्त सिंधु और अवेस्ता धार्मिक ग्रंथों में सप्त हिंदू (दोनों शब्दों का अर्थ “सात नदियों”) के रूप में किया गया है। सिंधु घाटी में उत्पन्न होने वाले प्रारंभिक ऐतिहासिक साम्राज्यों में गांधार और सौवीर के रोर वंश शामिल रहे हैं। सिंधु नदी पश्चिमी दुनिया के ज्ञान में शास्त्रीय काल की शुरुआत में आई, जब फारस के राजा डेरियस ने नदी का पता लगाने के लिए 515 ई.पू. में अपने ग्रीक दरबारी स्काइलैक्स ऑफ कैरींडा को भेजा।
सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख शहर, जैसे हड़प्पा और मोहनजो-दारो, लगभग 3300 ईसा पूर्व के हैं। प्राचीन दुनिया के कुछ सबसे बड़े मानव आवासों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता पूर्वोत्तर अफगानिस्तान से पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत तक फैली हुई थी। झेलम नदी के पूर्व से ऊपरी सतलुज पर रोपड़ तक ऊपर की ओर पहुंचती है। तटीय बस्तियाँ पाकिस्तान, ईरान सीमा पर सुतकागन डोर से लेकर भारत के आधुनिक गुजरात कच्छ तक फैली हुई हैं। उत्तरी अफगानिस्तान में शॉर्टुघई में अमु दरिया पर एक सिंधु स्थल है, और हिंडन नदी पर सिंधु स्थल आलमगीरपुर दिल्ली से केवल 28 किमी की दूरी पर स्थित है। आज तक, 1,052 से अधिक शहर और बस्तियां मुख्य रूप से घग्गर-हाकरा नदी और उसकी सहायक नदियों के सामान्य क्षेत्र में पाई गई हैं। बस्तियों में हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो के प्रमुख शहरी केंद्र, साथ ही लोथल, धोलावीरा, गनेरीवाला और राखीगढ़ी थे। सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर 40 सिंधु घाटी स्थलों की खोज की गई है। हालांकि, सिंधु लिपि की मुहरों और उत्कीर्ण वस्तुओं की खोज की गई वे अधिकांश सिंधु नदी के किनारे पर पाए गए थे।
“इंडिया” शब्द सिंधु (Indus) नदी से लिया गया है। प्राचीन काल में, “भारत” शुरू में सिंधु के पूर्वी तट के साथ उन क्षेत्रों को संदर्भित करता था, लेकिन 300 ईसा पूर्व तक, हेरोडोटस और मेगस्थनीज सहित ग्रीक लेखक पूरे उपमहाद्वीप में इस शब्द का उपयोग कर रहे थे जो पूर्व की ओर बहुत आगे तक फैला हुआ है। सिंधु का निचला बेसिन ईरानी पठार और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच एक प्राकृतिक सीमा बनाता है। यह क्षेत्र पाकिस्तानी प्रांतों बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब और सिंध और अफगानिस्तान और भारत के देशों को शामिल करता है। डेरियस द ग्रेट (दारा) के शासनकाल के दौरान सिंधु घाटी पर कब्जा करने वाला पहला पश्चिम यूरेशियन साम्राज्य फारसी साम्राज्य था। उनके शासनकाल के दौरान, कर्यंदा के यूनानी खोजकर्ता स्काइलैक्स को सिंधु के मार्ग का पता लगाने के लिए नियुक्त किया गया था। इसे सिकंदर की हमलावर सेनाओं ने पार कर लिया था, लेकिन उसके मैसेडोनिया के लोगों द्वारा पश्चिमी तट पर विजय प्राप्त करने के बाद – इसे हेलेनिक दुनिया में शामिल करने के बाद, सिकंदर ने एशियाई अभियान को समाप्त करते हुए नदी के दक्षिणी मार्ग के साथ पीछे हटने का चुनाव किया। सिकंदर के एडमिरल नियरचस सिंधु डेल्टा से फारस की खाड़ी का पता लगाने के लिए टाइग्रिस (दजला-फ़रात) नदी तक पहुंचने के लिए निकल पड़े। सिंधु घाटी पर बाद में मौर्य और कुषाण साम्राज्यों, इंडो-ग्रीक साम्राज्यों, इंडो-सीथियन और हेप्टालाइट्स का प्रभुत्व था। कई शताब्दियों में मुहम्मद बिन कासिम, गजनी के महमूद, मोहम्मद गोरी, तैमूरलंग और बाबर की मुस्लिम सेनाओं ने सिंध और पंजाब पर आक्रमण करने के लिए नदी पार की, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप का प्रवेश द्वार उपलब्ध हुआ।
आप सोचते होंगे कि यह सब जानकारी कहाँ से लाते हैं। राहुल सांस्कृत्यायन तीन बार तीन तरफ़ से तिब्बत यात्रा पर गए थे। उन्होंने “मेरी लद्दाख़ यात्रा” और “मेरी तिब्बत यात्रा” में इस क्षेत्र का विशद विवेचन किया है। प्रत्येक घुमंतू को उनकी “अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा” और “घुमक्कड़ शास्त्र” ज़रूर पढ़ना चाहिए। इसके अतिरिक्त हेनरिख हेरर की किताब “मेरे तिब्बत में सात साल” दलाई लामा के तिब्बत से पलायन के पहले के सात सालों का जीवंत वृतांत भी पठनीय है।
बहुत ज्ञान बघार लिया। अब दर्रों पर आते हैं। श्योक नदी काराकोरम दर्रे के पास से निकलती है। श्योक और नुब्रा नदियों की घाटी वाले क्षेत्र को नुब्रा के नाम से जाना जाता है। नुब्रा-सियाचिन घाटी में बड़े पैमाने पर अप्सरास समूह, रिमो समूह, और तेराम कांगरी समूह शामिल हैं। इस प्रकार हमने इन सभी गगनचुंबी शिखरों से सटे दर्रों को श्योक से सिंधु काँठे में पहुँचने हेतु पार किया।
पूर्वी और मध्य हिमालय अर्थात् सिक्किम, भूटान, नेपाल उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश मानसूनी बादलों को रोक कर ख़ाली कर देते हैं। वृष्टिछाया के कारण भारतीय मानसून के नमी भरे बादलों का प्रवेश लद्दाख़ में नहीं होता है। यहाँ सितम्बर से जनवरी तक भारी हिमपात होता है। इस प्रकार लद्दाख एक उच्च ऊंचाई वाला वनस्पति विहीन बियाबान है। पानी का मुख्य स्रोत पहाड़ों पर शीतकालीन हिमपात है। हिमालय के उत्तरी किनारे के क्षेत्र- द्रास, सुरू घाटी और ज़ांस्कर- में भारी हिमपात होता है और वर्ष में कई महीनों तक देश के बाकी हिस्सों से लगभग कट जाता है। ग्रीष्मकाल छोटा होता है, हालांकि फसल उगाने के लिए काफी लंबा होता है। वनस्पति की कमी के कारण ऊंचाई पर कई स्थानों पर हवा में ऑक्सीजन का अनुपात कम है।
पेंगोंग से चलकर तंगस्ते से लेह सड़क पकड़ी। खारू होते हुए लेह 110 लिखा था। पेंगोंग जाते समय खारदुंग ला पार किया था। अब 17,600 फुट ऊँचाई वाला चांगला दर्रा पार करना था। पहला पड़ाव सोलतक था, दस बजे चांगला दर्रा पर पहुँचने वाले थे तभी ट्राफ़िक जाम का सामना हो गया। सेना की गाड़ियाँ भी साथ में थीं। तंगस्ते से लेह के रास्ते पर कई गाँव है। जिनके घोड़े, याक और अन्य पशु चरते दिख रहे थे। उनके गोबर के कंडे भी बनते दिखे।
चांगला पार करके हम फिरसे सिंधु घाटी में प्रवेश कर गए। यहाँ के ग्लेशियर पंजाब और सिंध को तर करते हैं। जिंग्राल, शक्ति आया। शक्ति के आगे सीमा सुरक्षा संगठन का सड़क निर्माण कार्य चल रहा था इसलिए ट्राफ़िक जाम फिर सामने आ खड़ा हुआ। वहाँ सीमा सड़क संगठन और इंडीयन आयल कोर्पोरेशन मिलकर प्रोजेक्ट हिमांक नाम से एक सड़क बना रहे हैं। खारू तक उम्दा सड़क बन चुकी है। हेमिस मठ खारू से आठ किलोमीटर है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈










