हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६४ ⇒ छाता और बरसात ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छाता और बरसात…“।)

?अभी अभी # १०६४ ⇒ आलेख – छाता और बरसात ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

उधर आसमान को पता ही नहीं कि सावन आ गया है, लोग बेसब्री से बारिश का इंतजार कर रहे हैं और इधर एक हम हैं जो पंखे के नीचे बैठकर छाते की बात कर रहे हैं। याद आते हैं वे बरसात के दिन, जब उधर आसमान से रहमत बरसती थी और इधर हम बंदूक की जगह छाता तानकर उसका सामना करते थे। आज हमने सीख लिया, जब रहमत बरसे, तो कभी छाता मत तानो, बस रहमत की बारिशों में भीग जाओ।

जब हमारा सीना भी छप्पन सेंटीमीटर था, तब हम भी बरसती बारिश में सीना तानकर सड़क पर निकल जाते थे, क्योंकि तब घर में कोई नहीं था, जो हमारे लिए बिनती करता, नदी नारे ना जाओ श्याम पैंया पड़ूं। तबीयत से भीगकर आते थे, मां अथवा बहन टॉवेल लेकर हमारा इंतजार करती थी, कपड़े बदलो, और गर्मागर्म दूध पी लो।।

तब कहां आज की तरह सड़कों पर इतनी कारें और दुपहिया वाहन थे। इंसान बड़ी दूरी के लिए साइकिल और कम दूरी के लिए ग्यारह नंबर की बस से ही काम चला लेता था। शायद ही कोई ऐसा घर हो, जिसमें तब छाता ना हो। खूंटी पर टोपी, कुर्ते के साथ आम तौर पर एक छाता भी नजर आता था, काले रंग का। जी हां हमने तो पहले पहल काले रंग का ही छाता देखा था।

एक छाते में दो आसानी से समा जाते थे, और साथ में आगे छोटा बच्चा भी। उधर बच्चा बड़ा हुआ, उसके लिए भी एक बेबी अंब्रेला, यानी छोटा छाता।

अपने छाते से बारिश का सामना करना, तब हमारे लिए बच्चों का ही तो खेल था।

छाता भी क्या चीज है, खुलते ही छा जाता है, हमारे और बरसात के बीच, और छाते से छतरी बन जाता है। एक थे गिरधारी, जिन्होंने अपनी उंगली पर इंद्रदेव को नचा दिया था, छाते की जगह पर्वत ही उठा लिया था।

कलयुग में गलियन में गिरधारी ना सही, छाताधारी ही सही।।

समय के साथ, साइकिल की तरह छाते भी लेडीज और जेंट्स होने लग गए।

रंगबिरंगे फैशनेबल छाते, जापानी गुड़िया और मैं हूं पेरिस की हसीना ब्रांड छाते। हमें अच्छी तरह याद है, छातों में ताड़ी होती थी, जिससे बटन दबाते ही छाता तन जाता था और काले मोट कपड़े पर शायद धन्टास्क लिखा रहता था।

छाता कभी आम आदमी का उपयोग साधन था। कामकाजी संभ्रांत पुरुष डकबैक की बरसाती, हेट और गमबूट पहना करते थे, जेम्स बॉन्ड टाइप। कामकाजी महिलाओं के लिए भी लेडीज रेनकोट उपलब्ध होते थे। हर स्कूल जाने वाले बच्चे के पास बारिश के दिनों में बरसाती भी होती थी।।

समाज में एक तबका ऐसा भी है, जो पन्नी(पॉलिथीन) ओढ़कर ही बारिश का सामना कर लेता है। हमने कई बूढ़ी औरतों को गेहूं की खाली बोरी ओढ़कर जाते देखा है।

आज भी छाते की उपयोगिता कम नहीं हुई है। जो पैदल चलते हैं, उनकी यह जरूरत है। जो कार में चलते हैं, उन्हें भी बरसते पानी में, कार में बैठते वक्त और उतरते वक्त छाते का सहारा लेना ही पड़ता है।।

क्या विडंबना है, नीली छतरी वाले और हमारे बीच भी एक छतरी। रहमत बरसा, लेकिन छप्पर तो मत फाड़। कुंए, नदी, तालाब, पोखर, लबालब भरे रहें, लेकिन हमारे सब्र के बांध की परीक्षा तो मत ले। अब तो हमें तेरी तारीफ के लिए बांधे पुलों पर भी भरोसा नहीं रहा, बहुत झूठी तारीफ की हमने तेरी अपने स्वार्थ और खुदगर्जी की खातिर। हमें माफ कर।।

छाते का एक मनोविज्ञान है, एक छाते में दो प्रेमी बड़ी आसानी से समा जाते हैं।

प्रेम भाई बहन का भी हो सकता है और पति पत्नी का भी। साथ में भीगना भी, और भीगने से बचना भी, तब ही तो प्रेम छाता है। किसी अनजान व्यक्ति को भीगते देख उसे अपनी छतरी में जगह भी वही देगा, जिसके दिल में जगह होगी। हर इंसान तो नेमप्लेट लगाकर नहीं घूम सकता न ;

तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह,

भीग तो पूरा गए, पर हौंसला बना रहा।

(अनूप शुक्ल से साभार)

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (३) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (३) ? ?

निर्वाण षटकम् का हर शब्द मनुष्य के अस्तित्व पर हुए सारे अनुसंधानों से आगे की यात्रा कराता है। इसका सार मनुष्य को स्थूल और सूक्ष्म की अवधारणा के परे ले जाकर ऐसे स्थान पर खड़ा कर देता है जहाँ ओर से छोर तक केवल शुद्ध चैतन्य है। वस्तुत: लौकिक अनुभूति की सीमाएँ जहाँ समाप्त होती हैं, वहाँ से निर्वाण षटकम् जन्म लेता है।

तृतीय श्लोक के रूप में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य का परिचय और विस्तृत होता है-

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।3।।

अर्थात न मुझे द्वेष है, न ही अनुराग। न मुझे लोभ है, न ही मोह। न मुझे अहंकार है, न ही मत्सर या ईर्ष्या की भावना। मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से परे हूँ। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ।

राग मनुष्य को बाँधता है जबकि द्वेष दूरियाँ उत्पन्न करता है। राग-द्वेष चुंबक के दो विपरीत ध्रुव हैं। चुंबक का अपना चुंबकीय क्षेत्र है। अनेक लोग, समान और विपरीत ध्रुवों के निकट आने से उपजने वाले क्रमश: विकर्षण और आकर्षण तक ही अपना जीवन सीमित कर लेते हैं। यह मनुष्य की क्षमताओं की शोकांतिका है।

इसी तरह मोह ऐसा खूँटा होता है जिससे मनुष्य पहले स्वयं को बाँधता है और फिर मोह मनुष्य को बाँध लेता है। लोभ मनुष्य को सीढ़ी दर सीढ़ी मनुष्यता से नीचे उतारता जाता है। इनसे मुक्त हो पाना लौकिक से अलौकिक होने, तमो गुण से वाया रजो गुण, वाया सतो गुण, गुणातीत होने की यात्रा है।

एक दृष्टांत स्मरण हो आ रहा है। संन्यासी गुरुजी का एक नया-नया शिष्य बना। गुरुजी दैनिक भ्रमण पर निकलते तो उसे भी साथ रखते। कोई न कोई शिक्षा भी देते। आज भी मार्ग में गुरुजी शिष्य को अपरिग्रह की शिक्षा देते चल रहे थे। संन्यास और संचय का विरोधाभास समझा रहे थे। तभी शिष्य ने देखा कि गुरुजी एक छोटे-से गड्ढे के पास रुक गये, मानो गड्ढे में कुछ देख लिया हो। अब गुरुजी ने हाथ से मिट्टी उठा-उठाकर उस गड्ढे को भरना शुरू कर दिया। शिष्य ने झाँककर देखा तो पाया कि गड्ढे में कुछ स्वर्णमुद्राएँ पड़ी हैं और गुरुजी उन्हें मिट्टी से दबा रहे हैं। शिष्य के मन में विचार उठा कि अपरिग्रह की शिक्षा देनेवाले गुरुजी के मन में स्वर्णमुद्राओं को सुरक्षित रखने का विचार क्यों उठा? शिष्य का प्रश्न गुरुजी पढ़ चुके थे। हँसकर बोले, “पीछे आनेवाले किसी पथिक का मन न डोल जाए, इसलिए मैं मिट्टी पर मिट्टी डाल रहा हूँ।”

मिट्टी पर मिट्टी डालने की लौकिक गतिविधि में निहितार्थ गुणातीत होने की अलौकिकता है।

गतिविधि के संदर्भ में देखें तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। इनमें से हर पुरुषार्थ की विवेचना अनेक खंडों के कम से कम एक ग्रंथ की मांग करती है। यदि इनके प्रचलित सामान्य अर्थ तक ही सीमित रहकर भी विचार करें तो धर्म, अर्थ, काम या मोक्ष की लालसा न करना याने इन सब से ऊपर उठकर भीतर विशुद्ध भाव जगना। ‘विशुद्ध’, शब्द लिखना क्षण भर का काम है, विशुद्ध होना जन्म-जन्मांतर की तपस्या का परिणाम है।

परिणाम कहता है कि तुम अनादि हो पर आदि होकर रह जाते हो। तुम अनंत हो पर अपने अंत का साधन स्वयं जुटाते हो। तुम असीम हो पर तन और मन की सीमाओं में बँधे रहना चाहते हो। तुम असंतोष और क्षोभ ओढ़ते हो जबकि तुम परम आनंद हो।

राग, द्वेष, लोभ, मोह, मद, मत्सर, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन सब से हटकर अपने अस्तित्व पर ध्यान केंद्रित करो। तुम अनुभव करोगे अपना अनादि रूप, अनुभूति होगी अंतर्निहित ईश्वरीय अंश की, अपने भीतर के चेतन तत्व की। तब शव होने की आशंका समाप्त होने लगेगी, बचेगी केवल संभावना, जो प्रति पल कहेगी ‘शिवोऽहम्।’

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ काशी की रामलीला ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप ‘कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।)

☆ आलेख ☆ काशी की रामलीला ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

(‘सबसे बुरा होता है हमारे सपनों का मर जाना !’- कथाकार संजीव (गिरेबान में झाँकने की जरूरत:ः बहुवचन: अक्टूबर-दिसंबर. 2016) 

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ईश्वरगंगी – हाँ, यही नाम है इस पोखरे का। वामन शिवराम आप्टे ने ‘ईश’ के अर्थ में लिखा है – राज्य करना, स्वामी होना, शासन करना आदि, और ‘ईश्वर’ का अर्थ है – 1.शक्तिसम्पन्न 2.दौलतमंद 3.पति ४. परमेश्वर  5.कामदेव और 6.शिव (संस्कृत हिन्दी कोश)। राणाप्रसाद शर्मा ने पौराणिक कोश में ईश्वर के ये अर्थ दिये हैं -महेश्वर या शिव। वैसे काशी तो शिव की नगरी है ही। और शिव ने ही स्वर्ग से धरा पर तेज रफ्तार से उतरती गंगा को अपनी जटा में सँभाल लिया था। यह कथा तो सभी को मालूम है। यहाँ बनारस में गंगा उत्तरवाहिनी हंै, यानी दक्षिण की ओर न जाकर उत्तर की ओर बहती हैं। तो लोकमन में यही आस्था रही होगी कि ईश्वरगंगी के पोखरे में स्नान करने से गंगा नहाने का पुण्य मिलता है, मगर अब तो…….। खैर….

आज शाम यहीं होगा राम केवट संवाद। सरोवर के चारों ओर पुराने मुहल्लों के मकान एक दूसरे के कंधे से कंधे भिड़ाकर खड़े हैं। उत्तर और  पश्चिम तट डाँगरों के कब्जे में। पोखरे के घाट कहीं पक्के हैं, तो कहीं सिर्फ मिट्टी से बने हैं। देखते देखते तालाब के इर्द गिर्द सँकरे रास्तों पर लोक लहरें आकर मचलने लगती हैं। कहीं गोलगप्पे के ठेले लगेे हैं, तो कहीं रास्ते के किनारे कपड़ों पर चिउड़ा और रेवड़ी की दुकाने सजी हैं। गुब्बारेवाले हाथ में फिरकी घुमाते हुए घूम रहे हैं। किसी बालक की आँखें उड़ते गुब्बारों के संग हवाबाजी करने लगती हैं, तो कोई आधुनिक बच्चा अपनी माता का हाथ खींचते हुए अपना माडर्न डिमांड पेश कर रहा है,‘ए मम्मी, हम्मे उ मोबाइल दिला दे !’ एकाध जगह शिव, काली, बंदर, हनुमान और राक्षसों के मुखौटे बिक रहे हैं। एक जमाने में तो कागज की लुगदी से बने मुखौटे ही बिकते थे। आज तो सत्यानाशी प्लास्टिक सर्वव्यापी है। किस तरह यहाँ की एक लोक कला और एक घरेलू उद्योग अपनी आखिरी साँस ले रहे हैं आप इसका भी एहसास कर सकते हैं।

घाट पर एक नाव आकर लगती है। नौका में रंग रोेगन हुआ है, उसे खूब सजाया गया है। हाथों में धनुष वाण लिये वनवासी के भेस में घाट पर खड़े हैं दो छोटे बालक – राम और लक्ष्मण। उनके सिर पर है जटा, माथे पर तिलक और गले में माला। उनकी बगल में उसी तरह खड़ी है नन्ही जानकी। कबहुँ नहिं यहि भाँति देख्यो, आज को सो रंग (-सूर)! अब तीनों को गंगापार जाना है। राम निशादराज गुह यानी केवट को बुलाते हैं।

ज्यों तीनों नाव पर बैठने जाते हैं, केवट ने हाथ जोड़ लिये,‘प्रभु, एक विनती है।’

राम पूछते हैं कि भाई क्या बात है ?

इतने में लीला का ‘व्यास’जी यानी कथावाचक रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड से लीला सम्बन्धित चैपाइयों को पढ़ने लगते हैं,‘ चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुश करनि मूरि कछु अहई।।’ प्रभु, सभी कहते हैं कि तुम्हारे चरणकमलों की धूल में कोई ऐसी जड़ी है जिससे कोई बेजान वस्तु भी इन्सान बन जाती है। क्योंकि …….

‘छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।। तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।।

’आपके चरणस्पर्श से तो एक पत्थर भी सुंदरी बन गया था। मेरी नाव तो बस काठ की है, वह तो पत्थर जितनी सख्त भी नहीं है। कहीं वो भी किसी मुनि की घरवाली बन कर फुर्र हो जाये तो मैं तो लुट जाऊँगा!’

यानी केवट पहले राम लक्ष्मण और सीता के चरण धोना चाहते हैं फिर उन्हें अपनी नाव पर बैठायेंगे।

इसी तरह से काशी के भिन्न भिन्न मुहल्लों में मानस के एक एक अंश की लीला ‘अभिनीत’ होती रहती है। किसी दिन दिन अगर ईश्वरगंगी में राम केवट संवाद की लीला चल रही होती है, तो उसी दिन हो सकता है रामनगर में सूर्पनखा की नाक काटने वाली घटना को दर्शाया जा रहा है और भोजूबीर में चित्रकूट में भरद्वाज मुनि के साथ उन तीनों की भेंट की लीला सम्पन्न हो रही हो।

काशी की लोक-कलाओं एवं लोक-संस्कृति में रामलीला का अपना अनूठा स्थान रहा है। पर इसे अभिनय मात्र न समझे। इस संदर्भ में काशी के विशिश्ट संस्कृति कर्मी डा0 भानुशंकर  मेहता का वक्तव्य भी काबिले गौर है,‘….‘लीला’ में नाटक मत ढूँढ़ो। यह तो ‘वृत्तांत दर्शन’ है, लोक वृत्तानुकरण है, धार्मिक अनुष्ठान है, जीवन का अनुदर्शक है और सर्वोपरि, ‘भावानुकीर्तन’ है। ….लीला में पात्र अभिनय नहीं करते – भूमिकाएं जीते हैं।’ ( आजकल:ःफरवरी 2006)

ध्यान देनेवाली बात यह भी है कि आज के इस राम केवट संवाद में स्वयम् ईश्वरगंगी पोखरे को भी एक रोल मिला हुआ है। वह गंगा के चरित्र में यहाँ उपस्थित है। गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।। समस्त आनन्द और मंगलों के मूल गंगा है। वे सबको सुखी करती हैं और हर पीड़ा हर लेती हैं।

रामलीला आरम्भ होने के बाद आज यह पंद्रहवी संध्या है। प्रतिवर्ष अनन्त चतुर्दशी से यह लीला शुरू हो जाती है। और हाँ, परंपरा के अनुसार बालकांड के 175 दोहे चैपाई जिनका लीलारूप में मंचन नहीं किया जाता, उन्हें अनन्त चतुर्दशी के पहले गायन कर रस्म पूरी की जाती है। इसके लिए रामायणियों के उत्साह में कभी कोई कमी नहीं रहती। भादो कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पर गणेश पूजन के बाद से वे रामनगर के चैक स्थित रामलीला पक्की पर बैठे उन दोहे चैपाइयों का गायन करते हैं।

काशी में गंगा के उस पार स्थित है रामनगर का दुर्ग। वहाँ रहते हैं काशी नरेश। वे हर साल रामलीला के समय गोधूली वेला में हाथी पर बैठ कर जनता के सामने आते हैं। इसके बाद षुरू होती है रामलीला – गंगा के इस पार एवं उस पार। 2013 में वहीं एक विशेष घटना घटी थी। राजा जिस हाथी पर सवार होकर आनेवाले थे, उसका कोई लाइसेन्स नहीं था। चूँकि इसतरह किसी बेजबान प्राणी को तकलीफ देना अनुचित है, इस आधार पर आदि विश्वेश्वर मंदिर का महन्त शिवशंकर  मिश्र ने वन विभाग में शिकायत की थी। नतीजा यह हुआ कि हाथी पर राजा की सवारी दो दिन के लिए टल गयी थी (प्रमोद यादव – दैनिक जागरण 20.9.13)।

कहते हैं काशी में रामलीला का शुभारंभ करनेवाले थे एक वैष्णव, नारायण दास ‘मेघाभगत’। वाल्मीकि रामायण पर आधारित यह लीला संभवतः सन् 1543 में शुरू हुई होगी। मानस की रचना तो उसके बाद यानी 1574 में हुई थी। रामनगर की रामलीला का शुभारंभ 1830 में हुआ था, और काशी की रामलीला 472 साल पुरानी है। चित्रकूट, असीघाट और रामनगर की लीलाओं को ही काशी में प्रमुख माना जाता है। 

पर एक प्रचलित कथा यह भी है कि गोस्वामीजी ने ही नारायण का नामकरण किया था – मेघा भगत। कवि के महाप्रयाण के समय वे इतना व्याकुल हो उठे थे कि आत्महत्या की बात सोचने लगे थे। तुलसीदास ने उनको समझाया और सान्त्वना दी। उनसे कहा कि अपनी जीवन नैया को भक्ति एवं निष्ठां के डाँड़ से खेने का प्रयास करो! संत के महाप्रयाण के बाद अन्न जल त्याग कर विलाप करते हुए वे जा पहुँचे अयोध्या। वहाँ स्वप्न में दो बालकों के रूप मंे उनको देव दर्शन हुआ, और वहाँ से लौटकर उन्होंने चित्रकूट की रामलीला का शुभारम्भ किया। (प्रो. राममोहन पाठक:ः आजकल. फरवरी 2006)

इन मेलों में कभी लाखों की भीड़ इकठ्ठी होती थी। इसीलिए इनको ‘लक्खी मेले’ नाम से अभिहित किया गया है। लोक जीवन में स्वाभाविक रूप से इन मेलों का अलग महत्व होता था। बड़े बूढ़ों से लेकर महिलायें एवं बच्चे – इनमें सभी की हिस्सेदारी होती थी। वे दर्शक तो थे ही, भक्त भी थे और कभी राम बारात का अंश या कभी जनक सभा में सभासद भी होते थे। इन्हीं मेलों में छोटे छोटे दुकानदार अपनी जिन्स लेकर पहुँचते थे। उनका भी कारोबार चलता था। लोग आपस में मिलते जुलते थे। वैसे अब बहुत कुछ बदल चुका है। फिर भी चेतगंज के नक्कटैया के मेले में घर आये मेहमानों की खातिरदारी के लिए घरवालों को पहले से बंदोबस्त करना पड़ता है। चूँकि मेला भले शाम तक षुरू हो जाए, पर लक्ष्मण के द्वारा सूर्पणखा की नाक कटते कटते आधी रात बीत ही जाती है, तो मेहमान उतनी रात अपने घर कैसे वापस जायेंगे? सो उनके खाने एवं ठहरने का प्रबन्ध तो अनिवार्य ही हो जाता है।

नक्कटैया के मेले के जलूस में तरह तरह से सजावट भी होती है। जैसे चित्रकूट की कुटिया के सामने राम, लक्ष्मण और सीता बैठे हैं – ऐसे दृष्यों का स्वांग या झाँकी बनाकर दूर दूर से लोेग आते हैं। फिर लाग और विमान। इनमंे पवनपुत्र द्वारा उड़कर मेघनाद के शक्तिवाण लगने से मूर्छित लक्ष्मण के लिए विषल्या या विषल्यकरणी यानी संजीवन बूटी लेने जाने का दृश्य या ऐसा ही कुछ रहता है। इसमें जो लड़का पवनपुत्र बना होता है, उसे तार के सहारे एक लोहे के स्टैंड से लटका कर रखा जाता है। उसी हालत में उसे घंटों लटके रहना पड़ता है। उधर कहीं अगर राम की वानर सेना की झाँकी प्रस्तुत की गयी है, तो अंगदादि के मुखौटे लगाकर पूरे मेकअप के साथ कई पात्र राम लक्ष्मण के पास खड़े रहते हैं।

अब जरा इस पर भी गौर फरमाइये। लोक संस्कृति की एक अनुपम ताकत होती है इसकी सम्प्रेषणीयता। कथ्य, भाश्य एवं वाचन की दृश्टि से यह जनता जनार्दन के बिलकुल नजदीक होती है। यद्यपि घटनाओं को दर्शाते समय इनमंे कोई अनपेक्षित क्राइसिस, कैथार्सिस या कथानक की सीढ़ी चढ़ने के उपरान्त कोई अनजाना क्लाइमैक्स नहीं होता, फिर भी दर्शक मंडली उसकी जानी पहचानी कहानी में ही भाव विभोर हो उठती है। उदाहरण के लिए जरा सोचिए – वन गमन के समय दर्शक यह जानता है कि आगे क्या होने वाला है, दशरथ का कौन सा हष्र होने जा रहा है, फिर भी वह हर साल जानकी की पीड़ा से, बेटे से बिछुड़ने के कारण राजा दशरथ के हाहाकार से द्रवित हो जाता है। आखिर क्यों ? यहीं पर जनता की बोली, उसकी भाशा, परंपरा, भावनायें, धार्मिक विश्वास, उसका समाज, उसकी परवरिश आदि हर एक का प्रभाव उस पर परिलक्षित होने लगता है।  

इसी बात को जरा और आगे बढ़ायें तो आप पाइयेगा कि भिन्न भिन्न समय में हमारी आजादी की लड़ाई में भी लोक संस्कृति या इन मेलों ने एक महत्वपूर्ण रोल अदा किया था। बंगाल के चारण कवि मुकुंद दास ऐसे मेलों में जाकर ही गाया करते थे,‘ हे बंगबालायें, अपनी कलाइयों से इन रेशमी चूड़ियों को फेंक दो! हे जननी, हे भगिनी, अब जागो!’ उसी तरह आदिवासी लड़ाकू नेता बिरसा मुंडा ने घोषणा की थी कि अब रावण का लंकाराज (यानी अंग्रेजी राज) खतम करने का वक्त आ गया है। मंदोदरी (इंग्लैंड की रानी) की मूर्ति को अब जला देना है! (बिरसा मुंडा:ः के.एस.सिंह. पृ.45)

और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद इन झाँकियों में ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी’ या फाँसी के तख्ते पर चढ़ते तात्या टोपे या अन्य विद्रोहियों की झाँकी भी शामिल की गयी। केवल सीधी व्यंजना नहीं, वरन व्यंग या वक्रोक्ति के जरिए भी अपनी बात कह दी जाती थी। जेम्स् प्रिन्सेप ने ‘बनारस इलस्ट्रेटेड’ में लिखा है सन् 1825 में जो रावण सेना बनायी गयी थी, उनमें बदन पर जैकेट पहने एवं सफेद मुखौटा लगाये ढेर सारे ‘राक्षस’ थे। तो इशारा किस तरफ था? हाँ, प्रिन्सेप्स साहब ने इस बारे में ‘कौनो काॅमेंट’ नहीं किया है। अक्लमंद के लिए इशारा काफी होता है। (फेस्टिवल आॅफ रामलीला)

फिर 1920 के लवण सत्याग्रह या विदेशी कपड़ों की होली को लेकर भी इन मेलों में झाँकी या स्वाॅग की रचना की गयी। आगे चलकर भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरू भी इनमें किरदार के रूप में उपस्थित हो गये। फिर दूसरी सामाजिक समस्यायों पर भी इसी तरह टिप्पणी की गयी। मंदिरों में हरिजनों का प्रवेश हो, दहेज के लिए बहुओं की प्रताड़णा, उन पर जुल्म बंद हो – इन विषयों पर भी लाग या झाँकी की रचना हुई। यानी धार्मिक तत्व के अलावा अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का भी इन मेलांे ने भरसक निर्वाह किया।  

‘‘लीला का अनूठा पक्ष है उसका उद्देष्य, उसका प्रयोजन!’ डा0 भानुशंकर  अपनी बात को इस तरह आगे बढ़ाते हैं, ‘श्रीमद्भागवत के अनुसार:- जीवस्य यः संसरतो विमोक्षणं/ न जानतोऽनर्थ वहच्छरीरतः/ लीलावतारैः स्वयश प्रदीपकं/ प्राज्वालयत्वा तमहं प्रपद्ये।

लीला का उद्देश्य है समाज-कल्याण, मानव मात्र का कल्याण, सबके लिए सुख-समृद्धि, सुख-शांति के लिए आयोजित अनुष्ठान। आधुनिक नाटक में अवसाद है, त्रासदी है, कैथार्सिस है, नहीं है तो सर्वमंगल, सर्वेभवन्तु सुखिनः की कामना।’ (आजकल – वही)

हाँ, तो साहबजान मेहरबान, रामलीला की झाँकी महिमा प्रस्तुत करते हुए मेरी कलम-लीला भी अब समापन की ओर अग्रसर है। मगर रात का ध्रुव तारा भी जब निष्प्रभ होने लगे तो लोक-संस्कृति एवं लोक-विरासत के बारे में कोशी मिथिला अंचल के रमेश कुमार का बयान भी जरा सुन लीजिए, ‘किसी भी लोक-कला, लोक-शिल्प, लोक-तकनीक के पतन की पहली शर्त है कि वह अपने लोगों के बीच में ही अपना कलात्मक महत्व को खो दे।’ (ककसाड़ – दिसंबर. 2016)

और हाँ, पर्दा गिरने से पहले यह भी तो सोचें कि आखिर एक ‘मेला’ मर क्यों जाता है? आप अगर बट-बाबा को ही काट डालिएगा, तो मेला होगा किस मैदान में ? आप अगर खनिज सम्पदा के खनन के नाम पर या तथा कथित विकास के लिए मेले वाली जमीन ही हथिया लीजिएगा, तो मेेला होगा कौने ठाँई? भले ही आप उन अभागे अशिक्षितों को उनकी जमीन की ‘कीमत’(?) अदा कर दें, मगर उनकी आगे की पीढ़ी कहाँ जायेगी? कहाँ बसेगी? क्या खायेगी? अपने बीवी बच्चों को क्या खिलायेगी? क्या आपको मालूम भी है कि इतनी बड़ी एवं निर्मम ‘नर्मदा-रामायण’ के बाद किसको कितना मुआवजा मिला? नर्मदा बचाओ आंदोलन के बारे मेें तो आपने सुना ही है। वहीं धोलेरा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से प्रभावित 22 गांवों के लोगों ने अहमदाबाद के लिए प्रस्तावित नहरों के लिए सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के डिनोटिफिकेशन का विरोध किया था। आखिर नर्मदा का वह पानी गुजरात के किसानों के खेतों की प्यास नहीं बुझा रहा है, वो तो किसी नयी नगरी के निर्माण में ‘कामगार’ बन गया है (प्रीती सम्पत: दि हिन्दू 1.2.2017.)। तो ? जन ही रह नहीं जायेगा तो जन-संस्कृति के दीये जलायेगा कौन ?

रवीन्द्रनाथ ने अपने आलेखों में कई जगह (कालान्तर मंे ‘छोटो ओ बड़ो’, ‘वातायनिकेर पत्र’, फिर राजा प्रजाः समूह में ‘विरोधमूलक आदर्श’ आदि) एक ऋशि वाक्य को दोहराया है:-

अधर्मेनैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति,/ ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति।

इसको अगर यूँ कहें:- अधर्म के जरिए कुछ लोग तो ‘बड़े आदमी’ बन जाते हैं, अधर्म में ही वे अपना कल्याण देखने लगते हैं, अधर्म से वे अपने शत्रुओं पर भी विजय प्राप्त कर लेते हैं, परंतु आखिर जड़ से ही उनका विनाश होता है।

लोक-चेतना, लोक-दृश्टि और लोक-संस्कृति के रक्षकों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘अपनी सीता’ को पाने के लिए स्वयम् राम को जंग-ए-लंका लड़नी पड़ी थी। ‘सिंहासन’ ने पांडवांे को बिना युद्ध के सूच्यग्र मेदिनी देने से भी इनकार कर दिया था। अपने ‘हक’ के लिए उनको लड़ना पड़ा कुरुक्षेत्र का समर।

♦♦♦♦

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी

पताः फ्लैट नं. 301, चौथी मंजिल, टावर नं 1, मंगलम आनन्दा ग्रैंड रामपुरा रोड, सांगानेर, जयपुर, 302029

मो. 9455168359, 9140214489. ईमेल: asrc.vns@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (२) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (२) ? ?

शिवोऽहम् के संदर्भ में आज  निर्वाण षटकम् के दूसरे श्लोक पर विचार करेंगे।

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः

न वा सप्तधातुः न वा पंचकोशः।

न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पंचप्राणों में से कोई हूँ। न मैं सप्त धातुओं में से कोई हूँ, न ही पंचकोशों में से कोई । न मैं वाणी, हाथ, अथवा पैर हूँ, न मैं जननेंद्रिय या मलद्वार हूँ।  मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ। 

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के इस अद्भुत आत्मपरिचय को यथासंभव समझने का प्रयास जारी रखेंगे।

वैदिक दर्शन में प्राण को ही प्रज्ञा भी कहा गया। शाखायन आरण्यक का उद्घोष है,

यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः

अर्थात जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।

प्राण, वायु के माध्यम से शरीर में संचरित होता है। संचरण करने वाली वायु पाँच स्थानों पर मुख्यत: स्थित होती है। इन्हें पंचवायु कहा गया है। पंचवायु में प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान समाविष्ट हैं।

स्थूल रूप से समझें तो प्राणवायु का स्थान नासिका का अग्रभाग माना गया है। यह सामने की ओर गति करने वाली है। प्राणवायु देह तथा प्राण की अधिष्ठात्री है। अपान का अर्थ है नीचे जाने वाली। अपान वायु गुदा भाग में होती है। मूत्र, मल, शुक्र आदि को शरीर के निचले भाग की ओर ले जाना इसका कार्य होता है। समान वायु संतुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका स्थान आमाशय बताया गया है। भोजन का समुचित पाचन इसका दायित्व है। व्यान वायु शरीर में सर्वत्र विचरण करती है। इसका स्थान हृदय माना गया है। रक्त के संचार में इसकी विशेष भूमिका होती है। उदान का अर्थ ऊपर ले जाने वाली वायु है। अपने उर्ध्वगामी स्वभाव के कारण यह कंठ, उर, और नाभि में स्थित होती है। वाकशक्ति मूलरूप से इस पर निर्भर है। 

इसी तरह त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि एवं मज्जा, शरीर की सप्तधातुएँ हैं। इनमें से किसी एक के अभाव में मानवशरीर की रचना  दुष्कर है। शरीर में इनका संतुलन बिगड़ने पर अनेक प्रकार के विकार जन्म लेते हैं।

अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय, शरीर के पंचकोश हैं। हर कोश का नामकरण ही उसे परिभाषित करने में सक्षम है। विभिन्न कोशों द्वारा चेतन, अवचेतन एवं अचेतन की अनुभूति होती है।

जगद्गुरु उपरोक्त श्लोक के माध्यम से अस्तित्व का विस्तार प्राण, पंचवायु, सप्तधातु, पंचकोश से आगे ले जाते हैं। तीसरी पंक्ति में वर्णित वाणी, हाथ, पैर, जननेंद्रिय अथवा गुदा तक, स्थूल या सूक्ष्म तक आत्मस्वरूप को सीमित रखना भी हाथी के जितने भाग को स्पर्श किया, उतना भर मानना है।

विवेचन करें तो मनुष्य को ज्ञात सारे आयामों से आगे हैं शिव। शिव का एक अर्थ कल्याण होता है। चिदानंदरूप शिव होना मनुष्यता की पराकाष्ठा है। इस पराकाष्ठा को प्राप्त करना, हर जीवात्मा का लक्ष्य होना चाहिए।

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६४ ⇒ पर्स ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पर्स…“।)

?अभी अभी # १०६४ ⇒ आलेख – पर्स ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पर्स का जन्म प्रिवीपर्स से हुआ है ! इसे आप प्रीवियस पर्स भी कह सकते हैं। यह तो हुई राजा महाराजाओं वाली बात। आम आदमी की कमीज़ में एक खीसा होता था, जिसमें पइसा रखा जाता था। मुद्रा के प्रचलन के इतिहास में शासकों के सिक्के ही चलते थे, जिन्हें थैलियों में रखा जाता था। मोहर, दीनार का ज़माना था वह।

चीन से हम मोबाइल ही नहीं, paytm भी लाए ! यह तो हुई आज की बात। पेपर करेंसी का जन्मदाता भी सुना है, चीन ही है। प्रोनोट और नोट, दोनों अंग्रेजों की देन है। हम लोग हुंडी वाले हैं। याद कीजिये, नरसिंह भगत की हुंडी और नानी बाई को मायरो। ।

पर्स नाम से ही लेडीज़ लगता है ! इसलिए पुराने समय में मर्द लोग बटुआ रखते थे। आज भी दुकानदार पर्स को लेडीज पर्स ही बोलता है। पुरुष वॉलेट जो रखने लग गए हैं। जब किसी का पर्स खोता है, तो वह कॉमन जेंडर हो जाता है। लेडीज पर्स छीना जाता है, जेंट्स पर्स या तो कोई हिप पॉकेट से निकाल लेता है, या कहीं गिर जाता है।

पर्स लेडीज हो या जेंट्स, एक ऐसी बहुउद्देशीय युक्ति है, जिसमें पैसे के अलावा बहुत कुछ रखा जाता है। कुछ पुरुषों का वॉलेट तो इतना भारी और मोटा हो जाता है, मानो वह उनके शरीर का ही एक अंग हो। बहुत सारे विज़िटिंग कार्ड, आधार, क्रेडिट, डेबिट कार्ड, घर के सामान की सूची के बाद अगर कुछ जगह बचे तो कुछ नकद रुपए।

महिलाओं के पर्स की तो पूछिये ही मत। पूरी गृहस्थी साथ लेकर चलनी पड़ती है। एक समय था, जब हर कामकाजी महिला के पर्स में एक ऊन का गट्टा और सलाइयाँ अवश्य होती थी। जहाँ भी समय मिला, ज़ुबाँ से तेज उंगलियाँ चलती थी। अनाधिकारिक तौर से इसे भी ऑफिस वर्क का ही हिस्सा माना जाता था। आखिर होता तो यह भी एक ज़रूरी काम ही था न। स्कूल और सरकारी दफ्तरों के कार्यालयीन समय में स्वेटर और गर्म कपडों का आँकड़ा अगर न भी उपलब्ध हो, तो भी यह राष्ट्रीय उत्पाद का एक बहुत बड़ा हिस्सा है, वह भी बिना हींग और फिटकरी के। ।

जब से मुआ मोबाइल और कंप्यूटर आया है, न तो पर्स में ऊन के लिए इतनी जगह बची है, और न ही दफ़्तर में इतना टाइम ! हर समय कंप्यूटर पर आँखें, और की बोर्ड पर उंगलियाँ चलानी पड़ती हैं।

जब से इंडिया डिजिटल हुआ है, और कैशलेस इकॉनमी हुई है, पर्स और बटुए का औचित्य खत्म ही हो गया है। लेकिन पर्स हल्के होने के बजाय अब और भारी होने लग गए हैं।

पर्स की ज़िम्मेदारी बढ़ने के साथ ही इनकी कीमतों में भी इज़ाफ़ा हुआ है। पर्स में जितनी जेब हों, उतना अच्छा। जितने घर की अलमारी में खाने होते हैं, उतनी जगह तो पर्स में होनी ही चाहिए। अलमारी में अगर ताला है, तो पर्स में चेन। इधर चेन खराब, तो उधर जीया बैचेन। आखिर एक चलती फिरती अलमारी ही तो है पर्स। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (१) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में आज से  पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्’ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (१) ? ?

।। चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

गुरु द्वारा परिचय पूछे जाने पर बाल्यावस्था में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा दिया गया उत्तर निर्वाण षटकम् कहलाया। वेद और वेदांतों का मानो सार है निर्वाण षटकम्। इसका पहला श्लोक कहता है,

मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तानि नाहं

न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।

न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

मैं न मन हूँ, न बुद्धि, न ही अहंकार। मैं न श्रवणेंद्रिय (कान) हूँ, न स्वादेंद्रिय (जीभ), न घ्राणेंद्रिय (नाक) न ही दृश्येंद्रिय (आँखें)। मैं न आकाश हूँ, न पृथ्वी, न अग्नि, न ही वायु। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ।

मनुष्य का अपेक्षित अस्तित्व शुद्ध आनंदमय चेतन ही है। आनंद से परमानंद की ओर जाने के लिए, चिदानंद से सच्चिदानंद की ओर जाने के लिए साधन है मनुष्य जीवन।

सर्वसामान्य मान्यता है कि यह यात्रा कठिन है। असामान्य यथार्थ यह  कि यही यात्रा सरल  है।

इस यात्रा को समझने के लिए वेदांतसार का सहारा लेते हैं जो कहता है कि अंत:करण और बहि:करण, इंद्रिय निग्रह के दो प्रकार हैं।  मन, बुद्धि और अहंकार अंत:करण में समाहित हैं। स्वाभाविक है कि अंत:करण की इंद्रियाँ देखी नहीं जा सकतीं, केवल अनुभव की जा सकती हैं। संकल्प- विकल्प की वृत्ति अर्थात मन, निश्चय-निर्णय की वृत्ति अर्थात बुद्धि एवं स्वार्थ-संकुचित भाव की वृत्ति अर्थात अंहकार। इच्छित का हठ करनेवाले मन, संशय निवारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली बुद्धि और अपने तक सीमित रहनेवाले अहंकार की परिधि में मनुष्य के अस्तित्व को समेटने का प्रयास हास्यास्पद है।

बहि:करण की दस इंद्रियाँ हैं। इनमें से चार इंद्रियों आँख, नाक, कान, जीभ तक मनुष्य जीवन को बांध देना और अधिक हास्यास्पद है।

सनातन दर्शन में जिसे अपरा चेतना कहा गया है, उसमें निर्वाण षटकम् के पहले श्लोक में निर्दिष्ट आकाश, भूमि, अग्नि, वायु, मन, बुद्धि, अहंकार जैसे स्थूल और सूक्ष्म दोनों तत्व सम्मिलित हैं। अपरा प्रकृति केवल जड़ पदार्थ या शव ही जन सकती है। परा चेतना या परम तत्व या चेतन तत्व या आत्मा का साथ ही उसे चैतन्य कर सकता है, चित्त में आनंद उपजा सकता है, चिदानंद कर सकता है।

आनंद प्राप्ति में दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। दृष्टिकोण में थोड़ा-सा परिवर्तन, जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन लाता है। मनुष्य का अहंकार जब उसे भास कराने लगता है कि उसमें सब हैं, तो यह भास, उसे घमंड से चूर कर देता है। दृष्टिकोण में परिवर्तन हो जाए तो वह धन, पद, कीर्ति पाता तो है पर उसके अहंकार से बचा रहता है। वह सबमें खुद को देखने लगता है। सबका दुख, उसका दुख होता है। सबका सुख, उसका सुख होता है। वह ‘मैं’ से ऊपर उठ जाता है।

यूँ विचार करें करें कि जब कोई कहता है ‘मैं’ तो किसे सम्बोधित कर रहा होता है? स्वाभाविक है कि यह यह ‘मैं’ स्थूल रूप से दिखती देह है। तथापि यदि आत्मा न हो, चेतन स्वरूप न हो तो देह तो शव है। शव तो स्वयं को सम्बोधित नहीं कर सकता। चिदानंद चैतन्य, शव को शिव करता है  और जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के शब्द सृष्टि में चेतनस्वरूप की उपस्थिति का सत्य, सनातन प्रमाण बन जाते हैं।

इसीलिए कहा गया है, ‘शिवोहम्’,..मैं शिव हूँ..’मैं’ से शव का नहीं शिव का बोध होना चाहिए। यह बोध मानसपटल पर उतर आए तो यात्रा बहुत सरल हो जाती है।

यात्रा सरल हो या जटिल, इसमें अभ्यास की बड़ी भूमिका है। अभ्यास के पहले चरण में निरंतर बोलते, सुनते, गुनते रहिए, ‘शिवोऽहम्।’

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© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

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मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ पावस ऋतु के विषैले जीव: पहचान, संरक्षण और सुरक्षा ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – पावस ऋतु के विषैले जीव: पहचान, संरक्षण और सुरक्षा।)

☆ आलेख – पावस ऋतु के विषैले जीव: पहचान, संरक्षण और सुरक्षा ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

भारतीय ऋतुचक्र में पावस केवल हरियाली, कृषि समृद्धि तथा वर्षा का ही नहीं, यह जैव विविधता की दृष्टि से भी अत्यन्त सक्रिय और रचनात्मक काल होता है। महीनों से सूखी मिट्टी में सोए हुए बीज अंकुरित हो जाते हैं, हिरण-लोमड़ी इसी मौसम में पैदा होते हैं, मेंढ़क-टोड प्रजनन शुरू कर देते हैं, तितलियाँ, मधुमक्खी, दीमक, जुगनू की संख्या कई गुना बढ़ जाती है, नदियाँ- तालाब पानी से भर जाते हैं और इसी समय अनेक विषैले जीव — साँप, बिच्छू, मकड़ियाँ और कनखजूरे अपने आवासों से निकलकर  बस्तियों में दिखाई देने लगते हैं। परिणामस्वरूप सर्प एवं बिच्छूदंश जैसी अनेक घटनाएँ घटित होने लगती हैं। इस ऋतु में तापमान, आर्द्रता और नमी बढ़ जाती है। वर्षा के कारण बिलों में पानी भर जाता है, प्रजनन काल आरम्भ होने व भोजन की उपलब्धता बढ़ने से ये विषैले जीव मानव-आवासों की ओर बढ़ जाते हैं।

भारत में तीन सौ से अधिक साँपों की प्रजातियाँ पाईं जाती हैं, जिनमें लगभग साठ प्रजातियाँ अधिक विषैली होती हैं। भारतीय कोबरा, सामान्य करैत, रसेल वाइपर, साॅस्केल्ड वाइपर सर्वाधिक घातक सर्प होते हैं। अधिकांश सर्पदंश की घटनाएँ इन्हीं से सम्बन्धित होती हैं। बिच्छू की भी यहाँ सौ से अधिक प्रजातियाँ पाईं जाती हैं। लाल और काले बिच्छुओं का डंक अत्यधिक घातक व पीड़ादायक होता है। यहाँ की अधिकांश मकड़ियाँ विषैली किन्तु हानिरहित होती हैं। कुछ प्रजातियों का विष त्वचा व स्नायुतंत्र को प्रभावित करता है। कनखजूरा का विष भी प्राणघातक तो नहीं होता किन्तु पीड़ा, सूजन तथा एलर्जी उत्पन्न करता है। ततैया, बर्र, मधुमक्खियाँ तथा इल्ली भी विषैला प्रभाव उत्पन्न करती हैं। सभी विषैले साँपों का विष एक जैसा नहीं होता। कुछ का विष मस्तिष्क और स्नायुतंत्र को प्रभावित करता है जिसमें पलकें झुक जाती हैं, बोलने में कठिनाई, साँस लेने में परेशानी व माँसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। नाग और करैत का विष इसी प्रकार होता है। कुछ का रक्त पर प्रभाव पड़ता है, रक्त के थक्के बनने की क्षमता को प्रभावित करता है। मसूड़ों से रक्तस्राव, मूत्र में रक्त, गुर्दों पर दुष्प्रभाव आदि इनके लक्षण होते हैं। रसेल वाइपर इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। कुछ सर्पों का विष ऊतकों को क्षति पहुँचाता है। यह विष काटे गए स्थान की कोशिकाओं को नष्ट करता है। तीव्र सूजन, फफोले, संक्रमण,ऊतकों का नष्ट होना इसके प्रमुख लक्षण होते हैं।

ये विषैले जीव जहाँ एक ओर हानिकारक हैं वहाँ दूसरी ओर पारिस्थितिकी में उपयोगी घटक भी हैं। साँप एक वर्ष में सैकड़ों चूहों को खा जाते हैं। यदि ये नहीं होंगे तो कृषि को नुकसान होगा, अनाज भंडारण कठिन होगा, चूहों से फैलने वाले रोगों में वृद्धि होगी। सर्प स्वयं खाद्य श्रृंखला का हिस्सा है। ये स्वयं गरुड, मोर, नेवला, उल्लू जैसे जीवों के भोजन बनते हैं। इनके विष से अनेक औषधियों के विकास पर अनुसंधान हो रहा है। भारत में अधिकांश साँप वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत संरक्षित हैं। इनका शिकार, अवैध व्यापार, अनावश्यक हत्या दण्डनीय अपराध माना गया है। यदि किसी घर या परिसर में ये दिखाई दें तो मारने के बजाय प्रशिक्षित वन विभाग अथवा अधिकृत सर्परक्षक को सूचना देना उचित बताया गया है।

पावस ऋतु में इन विषैले जीवों से स्वयं को बचाना अति आवश्यक है। दुर्घटनाओं से बचाव हेतु रात को टाॅर्च का उपयोग करें, ऊँचे जूते पहनकर खेतों में जाएँ, हाथ डालने से पूर्व लकड़ी,घास या पत्थरों को डण्डे से हटाएँ, झाड़ियाँ- कचरा आसपास न रखें, दरवाजों और खिड़कियों की दरारें बंद रखें। सर्पदंश से होने वाली अनेक मौतें समय पर उपचार न मिलने के कारण होती हैं। गाँवों में आज भी कई लोग झाड़- फूँक, ताबीज, मंत्र व घरेलू नुस्खों पर भरोसा करते हैं, जिससे बहुमूल्य समय नष्ट हो जाता है। घाव को चाकू से काटना, विष चूसने का प्रयास करना, बर्फ लगाना, बहुत कसकर पट्टी बाँधना, झाड़- फूँक, रोगी को शराब पिलाना इन उपायों से लाभ नहीं होता, स्थिति गंभीर हो जाती है। समय पर अस्पताल पहुँचने से रोगियों का सफल उपचार सम्भव है। अत: सर्पदंश केवल वन्यजीवों से जुड़ी समस्या ही नहीं, जनस्वास्थ्य, ग्रामीण चिकित्सा व्यवस्था, समय पर उपचार और जनजागरूकता से भी जुड़ा विषय है। जब समाज ज्ञान और जागरूकता को अपनाएगा तभी पावस ऋतु की हरियाली के साथ मानव और वन्यजीवों का संतुलित सहअस्तित्व सुरक्षित रह सकेगा।

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©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६३ ⇒ लाखों का सावन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लाखों का सावन…“।)

?अभी अभी # १०६३ ⇒ आलेख – लाखों का सावन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एक वह भी ज़माना था, (आप समझ गए) हाँ, वह कांग्रेस का ज़माना था, जब सावन लाखों का होता था, और नौकरी दो टके की, यानी 90 – ढाई की ! मास्टर गाँव में पड़ा रहता था, और नई नवेली बहू शहर में सास-ससुर की सेवा करते हुए आनंद बक्षी का यह गीत सुनकर पति-परमेश्वर को कोसा करती थी।

उसे भी अपने मायके के सावन के झूले याद आया करते थे।

अब वह न घर की थी, न नाथ की।

समय बदलते देर नहीं लगती।

जो नौकरी कभी टके की थी, वह लाखों की हो गई, और लाखों का सावन टके का हो गया। सावन लगने पर किसी को आज उतनी खुशी नहीं होती, जितनी तनख्वाह में इन्क्रीमेंट लगने पर होती है।

तब भी सावन लगने से ज़्यादा खुशी हमें गुरुवार को शहर के थिएटर में नई फिल्म लगने पर होती थी। आज भी अच्छी तरह से याद है कि आया सावन झूम के जब रिलीज़ हुई थी, तो झूमकर बारिश हुई थी। जिनके पास छाते नहीं थे, वे सावन का मज़ा झूमकर ही नहीं भीगकर भी ले रहे थे। ।

कितनी फुरसत थी, जब सावन आता था ! श्रावण सोमवार को गाँधी-हॉल का बगीचा खचाखच महिलाओं और बच्चों से भर जाता था। पेड़ों पर झूले बाँध दिये जाते थे, जिन पर युवतियां जोड़े से झूला करती थी। ऊपर जाना, नीचे आना, ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव को हँसते-हँसते झेलना, यही तो ज़िन्दगी का मेला होता था। बच्चों के लिए तो पुंगी और फुग्गे ही काफी थे। घास में लोटना और कोड़ा-बदाम छाई खेलना। घर की बनाई पूरी/पराँठे के साथ आलू/भिंडी की सब्जी, प्याज-अचार, और गाँधी-हॉल के गेट से दो रुपये का नमकीन मिक्सचर। बगीचे की घास पर मूँगफली के बचे हुए छिलके थे। बस, यही लाखों का सावन था।

समय ने करवट बदली ! सियासत ने अपना रंग बदला, ढंग बदला।

सावन की जगह बदले का मौसम आ गया। 60 साल से सोलह साल तक का पागल मन तलत का यह गीत गुनगुनाने लग गया !

बदली, बदली दुनिया है मेरी। वह बादल की बदली की नहीं, डिजिटल इंडिया की बात कर रहा है, वह सावन की बारिश में भीगकर बंद एटीएम तक नहीं जाना पसंद करता। paytm का आनंद लेता है, और रेडियो मिर्ची पर मन की बात सुना करता है।

आजकल की फिल्मों ने भी सावन का दामन छोड़ दिया है,

संगीत ने मधुरता खो दी है,  तो गानों ने अर्थ खो दिया है।

व्यर्थ की फिल्में करोड़ों कमा रही है तो पद्मिनी पद्मावत बनी जा रही है। सावन कहीं प्यासा है तो

कहीं अभी से ही सावन-भादो की झड़ी लगी जा रही है। संगीत की स्वर-लहरियां मेरे कानों में गूँज रही हैं। नेपथ्य में फ़िल्म आया सावन झूम के का गाना बज रहा है। मन भी आज यही कह रहा है, सावन आज भी लाखों का है, सावन को आने दो। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८६ – देश-परदेश – दाग अच्छे हैं ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८६ ☆

☆ देश-परदेश – दाग अच्छे हैं ☆ श्री राकेश कुमार ☆

कुछ वर्षों पूर्व हिंदुस्तान लीवर लिमिट, ने अपने सबसे अधिक बिकने वाले सर्फ डिटर्जेंट पाउडर के लिए “दाग़ अच्छे हैं” को अपनी टैग लाइन बना कर अपने उत्पाद की बिक्री को एक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया था।

आज के समाचार पत्र की उपरोक्त खबर पढ़ कर तो सर्फ कंपनी के निर्माताओं की तो नींद उड़ गई होगी। जब रेलवे ए.आई. के उपयोग से दाग ढूंढ लेगा, तो सर्फ जैसे पाउडर की क्या आवश्यकता आन पड़ी है। खबर पढ़ कर हमारे घर में भी ये निर्णय लिया गया अब तो ए.आई. का उपयोग कर कपड़े धोये जाएंगे।

रेलवे जैसे बड़े संस्थानों में वर्षों पूर्व में स्टेशन के पास स्थित किसी बड़े तालाब में कपड़े धो कर, खुले में सुखाये जाते थे। इस प्रकार के स्थानों को धोबी घाट कहते हैं। अब ये तरीका बदल चुका है। इसलिए इन घाटों को भी “पुराना धोबी घाट” कहा जाता है। हमने तो पुरानी फिल्मों में गुंडो द्वारा अगवा किए हीरो/ हीरोइन को ऐसे स्थानों पर छुपा कर रखते हुए देखा था।

गधे के ऊपर लदे हुए कपड़े या धोबी के साथ किसी कुत्ते को भी नहीं देखा हैं। पता नहीं फिर कहावत “धोबी का कुत्ता घर का ना घाट” कैसे बन गई ?

इस ख़बर को पढ़ कर बर्तन साफ करने वाले पाउडर निर्माताओं और उन पाउडरों के ब्रांड एम्बेसडर हमारी फिल्मी दुनिया के हीरो भी बहुत परेशान हैं। उनको डर है, कि अब गन्दी कढ़ाई ( बर्तन) के जिद्दी दाग भी ए. आई. से दूर हो जाएंगे, तो उसके विज्ञापन से होने वाली आय समाप्त हो जाएगी। इन पाउडर निर्माताओं के विज्ञापन में नींबू के रस का प्रयोग भी किया जाता है, ऐसा क्लैम किया जाता है, यदि ये वास्तकविकता है, तो बाज़ार में नींबू भी सस्ते हो जायेंगें, क्योंकि ए. आई. के उपयोग में किसी भी पदार्थ का उपयोग जो नहीं होता हैं।

हमारे फिल्मी हीरो बहुत दूरगामी होते हैं, इसलिए उन्होंने अब खाने में उपयोग होने वाले मसालों और पशु आहार जैसे नए आइटम के विज्ञापनों से अपनी आय में बढ़ोतरी कर ली है।

आपकी जानकारी के लिए पता देवें, कि आज का ये आलेख भी ए. आई. ने ही लिखा है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६२ ⇒ स्वर्ग नरक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “स्वर्ग नरक…“।)

?अभी अभी # १०६२ ⇒ आलेख – स्वर्ग नरक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कभी कभी ऐसा भी हो जाता है, जिसके बारे में हम सपने में भी नहीं सोचते, उसके सपने में दर्शन हो जाते हैं। मेरे साथ भी कल कुछ ऐसा ही हुआ। मेरे सपने में चार्वाक प्रकट हो गए। जीवन भर अपने पैसों से च्यवनप्राश खाया, लेकिन कभी च्यवन ऋषि ने स्वप्न में आने का कष्ट नहीं किया और जिनके दर्शन और सिद्धांत में मेरी रुचि नहीं, वे स्वप्न में दर्शन दे रहे हैं।

जिनका जीवन दर्शन ही –

यदा जीवेत, सुखं जीवेत्

ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत्

यानी जब तक जीयो, सुख से जीयो, कर्जा करो और घी पीयो, हो उनके लिए कैसा पाप और कैसा पुण्य और कैसा स्वर्ग और नरक। जरूर किंगफिशर माल्या चार्वाक के वंश के ही होंगे। न आसमां में कोई खुदा है और न ही किसी का पुनर्जन्म। जो भी है, बस यही मानस जनम। खाओ, पीयो, कर्जा करो, और मौज करो।।

जो ईश्वर को नहीं मानते, वे ईश्वर से नहीं डरते। उनका ईमान तक कहीं गिरवी रखा होता है। जब मरने के बाद सब मिट्टी में मिल जाना है, नेकी बदी सब, अगर स्वर्ग कहीं है, तो केवल इस धरती पर ही है। ऑनली डिफॉल्टर्स भोग्या वसुन्धरा। इस धरा का पूरी तरह दोहन वही पुरुष कर सकता है जो पाप और पुण्य में भेद नहीं करता हो। जो कथित ईश्वरीय शक्ति के कोप से भयभीत नहीं होता हो। शायद यही चार्वाक दर्शन हो।

जो नास्तिक होते हैं, वे ईश्वर और स्वर्ग नरक को नहीं मानते। लेकिन पाताल के बारे में सब मौन हैं। मरने के बाद कोई पाताल नहीं जाता। इंदौर से कुछ किलोमीटर दूर एक प्राकृतिक झरना है, जिसे पाताल पानी कहते हैं। कहते हैं, उसकी गहराई पाताल तक है। जो उसकी गहराई नापने गए, वे वापस ही नहीं आए। पाताल लोक को सर्प लोक भी कहते हैं।

हमारा नश्वर शरीर का भी धार्मिक मान्यता अनुसार ही अंतिम कर्म किया जाता है। कहीं उसे दाह कर्म के जरिए पंच तत्वों में विलीन किया जाता है तो कहीं उसे दफना दिया जाता है। जिसे ऊपर जाना है, उसे दो गज जमीन के नीचे कयामत तक इंतजार करना पड़ता है। खुदा करे कि कयामत हो और तू आए।।

जो प्रकृति को जाने बिना, केवल अपने स्वार्थवश प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग एवं शोषण करते हैं, वे आस्तिक हों या नास्तिक, मानवता के बहुत बड़े शत्रु होते हैं। लेन – देन, give and take, ही जीवन का नियम है। आप अगर समाज से कुछ ले रहे हैं, तो बदले में क्या लौटा रहे हैं। मानव सभ्यता barter system यानी वस्तु विनिमय प्रणाली से ही शुरू हुई थी। तब भी हम इतने खुदगर्ज नहीं थे, जितने आज हैं।

आज जितने भी दर्शन हैं, सब प्रदर्शन की वस्तु बन गए हैं। पोथी पढ़ना और ज्ञान बांटना ! जीवन में जो आत्मसात होता है, अमल में लाया जाता है, वही दर्शन होता है। बाहर से मंदिर प्रदर्शन और मन में चार्वाक दर्शन, अगर इसी तरह चलता रहा, तो स्वर्ग नरक तक कोई पहुंच ही नहीं पाएगा, और कोई नये किंगफिशर और सहाराश्री देश को रसातल की ओर ले जाएंगे। हमारी संस्कृति ने सभी मान्यताओं और दर्शन को सम्मान दिया है। सबकी अच्छाई बुराई सामने है। नीर क्षीर विवेक ही कर्ज़ वाले घी से बेहतर है। दत्तात्रेय समर्थ थे, फिर भी उन्होंने २४ गुरु किये। जिस प्राणी में भी अच्छाई दिखी, उसे अपना गुरु माना। आपका आत्म गुरु आपके अंदर ही है। हम विश्व गुरु की बात नहीं कर रहे। चार्वाक ने हमारी आंखें खोल दी हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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