हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #31 ☆ आस्था ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से इन्हें पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # 31 ☆

☆ आस्था ☆

हमारे कार्यालय में काम करनेवाली मेहरी अनेक बार कोनों में झाड़ू का तिनका डालकर कचरा निकालती है। यदि कभी जल्दी निपटाने के लिए कहा जाए तो उत्तर होता है, ‘‘मैं अपना काम खराब नहीं कर सकती, अपना नाम खराब नहीं कर सकती।”

सृष्टि का मूलाधार है आस्था।

हर युग का मनुष्य मानता है कि बीते समय की तुलना में वह आधुनिक समय में जी रहा है। आधुनिक होने की एक आधारहीन परिभाषा अनेक जन को नास्तिक होना लगती है। वस्तुतः जग में नास्तिक न कोई हुआ, न हो सकेगा।

नास्तिक भी आस्तिक शब्द में ‘न’ उपसर्ग लगाकर तैयार हुआ है। आस्तिक में मूल शब्द है- आस्था। जिस शब्द के मूल में आस्था हो, वह नकारार्थी कैसे हो सकता है?

कोई एक व्यक्ति बताइए जिसे किसी किसी भी कर्म, प्रक्रिया, सिद्धांत या व्यक्ति के प्रति आस्था न हो। परले दर्जे की कल्पना भी कर लें तो जिसमें किसीके प्रति नहीं होती, उसे भी अपने नास्तिक होने के प्रति तो आस्था होती है न!  अपने आप पर आस्था तो हर किसी को है। फिर भला वह नास्तिक कैसे हुआ?

श्रीलंकाई  प्रोफेसर कोवूर स्वयं के नास्तिक होने का ढिंढोरा पीटता था। उसका बेटा हर रविवार चर्च जाने लगा। कोवूर चिंतित हुआ। बेटे से पूछा तो उसने बताया कि चर्च में सुंदर लड़कियाँ आती हैं। कोवूर आश्वस्त हुआ। बेटे का अगला वाक्य चौंकानेवाला था। बोला,‘’सुंदर लड़कियाँ देखने से मेरा पूरा सप्ताह अच्छा बीतता है।”

विश्वास या अंधविश्वास की अंतररेखा आज चर्चा का विषय नहीं है पर सप्ताह अच्छा बीतने का यह भरोसा, आस्था का ही स्वरूप है।

मनुष्य प्रायः अगली सुबह के कामों की अग्रिम योजना बनाकर सोने जाता है। याने सुबह उठने के प्रति आस्था है। यह आस्था आस्तिकों और घोर नास्तिकों (!) दोनों में विद्यमान होती है।

सृष्टि का मूलाधार है आस्था।

भाँति-भाँति की थिएरी ऑफ ओरिजिन में अभिप्रेत स्रष्टा के अस्तित्व से सहमत होने या न होने पर तर्क हो सकता है पर खुली आँखों से दिखती सृष्टि के प्रति अनास्था संभव नहीं।

अतः कहता हूँ-‘सृष्टि में नास्तिक न कोई हुआ, न हो सकेगा।’

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 26 – ज्ञान और दुविधा ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “ज्ञान और दुविधा”।)

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 26 ☆

☆ ज्ञान और दुविधा ☆

कर्मिक कारण क्या था कि भीष्म को तीरों के बिस्तर पर पीड़ित होना पड़ा? इस प्रश्न के लिए कि उन्हें इस सजा से क्यों पीड़ित होना पड़ रहा है, भले ही उन्होंने पिछले 72 जन्मों के जीवन में कोई पाप नहीं किया था, भगवान कृष्ण ने उन्हें उत्तर दिया कि उन्होंने अपने पिछले 73 वें जन्म में एक मूर्खता की थी, जब उन्होंने एक कीड़े द्वारा काटे जाने के बाद उस कीड़े के शरीर में सुईया चुभा चुभा कर उसे तड़पा तड़पा कर मारा था। वो कांटे या सुईया अब आपके लिए तीरों के बिस्तर के रूप में वापस आये हैं। 72जन्मों तक आपके पापी कर्म निष्क्रिय रहे क्योंकि इन 72जीवनों में आप एक पवित्र व्यक्ति थे, लेकिन चूंकि अब आप दुर्योधन की ओर से अर्थात अधर्म की ओर से युद्ध का भाग बन गए हैं, तो आपके संचीत कर्म (जो तीन प्रकार के कर्मों में से एक है। यह किसी के पिछले सब जन्मों के कर्मों का जमा खाता होता है जिसमे से कुछ भाग उसे उसके वर्तमान जीवन में उसे भोगना पड़ता है जिन्हें प्रारब्ध कर्म कहते हैं), इस प्रकार 73 वें जीवन में पक गए और उनमे से उस 73 जन्म पहले किये गएपाप को भोगने के लिए जरूरी वातावरण उन्हें मिल गया।

क्या आपको पता है की भीष्म का जन्म भी एक अभिशाप के कारण ही था।

एक बार ‘द्यौ’ नामक वसु ने अन्य साथ सात वसुओं के साथ वशिष्ठ ऋषि की कामधेनु (अर्थ :सर्वश्रेष्ठ खुशी) का हरण कर लिया। इससे वशिष्ठ ऋषि ने द्यौ से कहा कि ऐसा कार्य तो मनुष्य करते हैं इसलिए तुम आठों वसु मनुष्य हो जाओ। यह सुनकर वसुओं ने घबराकर वशिष्ठजी की प्रार्थना की तो उन्होंने कहा कि अन्य वसु तो वर्ष का अंत होने पर मेरे शाप से छुटकारा पा जाएंगे, लेकिन इस ‘द्यौ’ को अपनी करनी का फल भोगने के लिए एक जन्म तक मनुष्य बनकर पीड़ा भोगना होगी।

यह सुनकर वसुओं ने गंगाजी के पास जाकर उन्हें वशिष्ठजी के शाप को विस्तार से बताया और यह प्रार्थना की कि ‘आप मृत्युलोक में अवतार लेकर हमें गर्भ में धारण करें और ज्यों ही हम जन्म लें, हमें पानी में डुबो दें। इस तरह हम सभी जल्दी से मुक्त हो जाएंगे’ गंगा माता ने स्वीकार कर लिया और वे युक्तिपूर्वक शाँतनु राजा की पत्नी बन गईं और शाँतनु से वचन भी ले लिया। शाँतनु से गंगा के गर्भ में पहले जो 7 पुत्र पैदा हुए थे उन्हें उत्पन्न होते ही गंगाजी ने पानी में डुबो दिया जिससे 7 वसु तो मुक्त हो गए लेकिन 8वें में शाँतनु ने गंगा को रोककर इसका कारण जानना चाहा।गंगाजी ने राजा की बात मानकर वसुओं को वशिष्ठ के शाप का सब हाल कह सुनाया। राजा ने उस 8वें पुत्र को डुबोने नहीं दिया और इस वचनभंगता के कारण गंगा 8वें पुत्र को शाँतनु कोसौंपकर अंतर्ध्यान हो गईं। यही बालक ‘द्यौ’ नामक वसु था।

आप लोग जानते हैं कि शरशय्या पर लेटने के बाद भी भीष्म प्राण क्यों नहीं त्यागते हैं, जबकि उनका पूरा शरीर तीर से छलनी हो जाता है फिर भी वे इच्छामृत्यु के कारण मृत्यु को प्राप्त नहीं होते हैं। भीष्म यह भलीभांति जानते थे कि सूर्य के उत्तरायण होने पर प्राण त्यागने पर आत्मा को सद्गति मिलती है और वे पुन: अपने लोक जाकर मुक्त हो जाएंगे इसीलिए वे सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते हैं । भीष्म ने बताया कि वे सूर्य के उत्तरायण होने पर ही शरीर छोड़ेंगे, क्योंकि उन्हें अपने पिता शाँतनु से इच्छा मृत्यु का वर प्राप्त था और वे तब तक शरीर नहीं छोड़ सकते जब तक कि वे चाहें, लेकिन 10वें दिन का सूर्य डूब चुका था। बाद में सूर्य के उत्तरायण होने पर युधिष्ठिर आदि सगे-संबंधी, पुरोहित और अन्यान्य लोग भीष्म के पास पहुँते हैं। उन सबसे पितामह ने कहा कि इस शरशय्या पर मुझे 58 दिन हो गए हैं। मेरे भाग्य से माघ महीने का शुक्ल पक्ष आ गया। अब मैं शरीर त्यागना चाहता हूँ । इसके पश्चात उन्होंने सब लोगों से प्रेमपूर्वक विदा माँगकर शरीर त्याग दिया।

 

© आशीष कुमार  

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 30 ☆ रिश्ते बनाम गलतफ़हमी ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का आलेख “हाउ से हू तक”.  डॉ मुक्ता जी का यह विचारोत्तेजक लेख  हमें  साधारण मानवीय  व्यवहार से रूबरू कराता है।  यह सच है कि धन दौलत और पद प्रतिष्ठा का चोली दामन का साथ है, किन्तु मानवीय व्यवहार तो आपके  नियंत्रण में है न ।डॉ मुक्त जी की कलम को सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें एवं अपने विचार कमेंट बॉक्स में अवश्य  दर्ज करें )    

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 30☆

☆ रिश्ते बनाम गलतफ़हमी ☆

शीशा और रिश्ता दोनों ही बड़े नाज़ुक होते हैं। दोनों में सिर्फ़ एक ही फर्क़ है…शीशा ग़लती से और रिश्ते गलतफ़हमी से टूट जाते हैं। उपरोक्त वाक्य में छिपा है… जीवन का सार्थक संदेश। दोनों की सुरक्षा अर्थात् हिफाज़त करना अत्यंत आवश्यक है। ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’… दोनों स्थितियों में लागू है यह सिद्धांत… दोनों ही नाज़ुक हैं और छोटी-सी ग़लती या गलतफ़हमी से टूट जाते हैं और टूटने पर भले ही जुड़ जायें, परंतु पूर्व-स्थिति में नहीं आ पाते। स्मरण होंगी—आपको रहीम जी की यह पंक्तियां ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय। टूटे पे फिर ना जुरै, जुरै गांठ परि जाय’ प्रेम रूपी  धागा चटकने के पश्चात् टूट जाता है और एक बार टूटने पर पुन: जुड़ नहीं पाता, उस में गांठ अवश्य पड़ जाती है अर्थात् दिलों में दरार पड़़ जाने के पश्चात् मानव कभी भी सामान्य नहीं हो सकता। सो! संबंधों को संभाल कर रखिये। कांच के टूटने पर उसके असंख्य टुकड़े हो जाते हैं और आपका पूरा अक्स उसमें नज़र नहीं आता। रिश्ते गलतफ़हमी से टूटते हैं… इसलिए कभी भी कानों सुनी बात पर विश्वास न करें। अक्सर लोग तो दूसरों के घर में आग लगा कर तमाशा देखते हैं।

दूसरी ओर ‘घर का भेदी लंका ढाए’ अर्थात् मन- मुटाव होने पर जब दूसरे पक्ष या आपके घर का कोई सदस्य भावावेश में आकर बाग़ी हो जाता है… किसी दूसरे की शरण में चला जाता है, तो सोने की लंका तक भी जल जाती है, सर्वस्व नष्ट हो जाता है। इसलिए कभी भी दूसरों की तो छोड़िए, अपनों से भी दुश्मनी मत कीजिए। यह कहावत तो आपने सुनी होगी कि ‘आप को आपका सबसे क़रीबी व्यक्ति ही सर्वाधिक हानि पहुंचाता है, क्योंकि वह आपकी सोच व कार्य-व्यवहार से बखूबी परिचित होता है। इसलिए कभी भूल कर भी, किसी पर विश्वास मत कीजिए और अपने मन की बात सांझा मत कीजिये, क्योंकि राज़दार ही दुश्मनी निभाते हैं…आपके पतन व विनाश का कारण बनते हैं।

हां! कई बार पारस्परिक वैमनस्य की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सो! सुनी-सुनाई बात पर विश्वास करके अपना आपा मत खोइए…उससे संवाद कीजिए तथा अपना पक्ष रखिए, क्योंकि यह स्थिति दिलों के फ़ासलों को इस क़दर बढ़ा देती है कि इंसान एक-दूसरे का चेहरा देखना भी पसंद नहीं करता। यदि किसी बात पर ग़लतफ़हमी हो जाती है,तो आपस में विचार-विनिमय कीजिए, ताकि मनोमालिन्य समाप्त हो जाए और स्थिति शीघ्रातिशीघ्र सामान्य हो जाए अन्यथा इसका अंजाम कुछ भी हो सकता है…अक्सर ऐसी दुश्मनी पीढ़ी- दर-पीढ़ी चलती रहती है। संवाद व इपसी विचार-विमर्श इस अप्रत्याशित स्थिति से मुक्ति पाने का सर्वोत्तम साधन है। जब भी आप इस तथ्य से अवगत हों… बातचीत का सिलसिला तुरंत आगे बढ़ायें। मन में व्यर्थ की शंकाओं को पनपने न दें, क्योंकि राई का पहाड़ बनने में समय नहीं लगता… अफ़वाहें तो वायु से भी तीव्र वेग से फैलती हैं।

रिश्तों में सदैव गर्माहट का अहसास होना चाहिए। एक-दूसरे के लिए मर-मिटने का भाव सदैव आमादा रहे, तभी ज़िंदगी की गाड़ी फर्राटे से आगे बढ़ सकती है। रिश्तों की दास्तान बड़ी अजब है। रिश्ते खुशी व ग़म के अहसास हैं, जज़्बात हैं, भाव हैं, संवेदनाएं हैं और रिश्ते आगे बढ़ते हैं…स्नेह-सौहार्द व समर्पण- त्याग से। जब तक आप इनका प्रेम से सिंचन करते रहेंगे, ज़िंदगी में कोई आपदा दस्तक नहीं देगी…वह तीव्र गति से सीधी-सपाट दौड़ती रहेगी। छोटे-छोटे ज्वालामुखी तो अक्सर संबंधों में फूटते रहते हैं, परंतु उनका अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। सो! हमें दूसरों की विषाक्त बातों से अपने मन को मलिन नहीं होने देना चाहिए, बल्कि वमन कर बाहर निकाल फेंकना अपेक्षित है। इसके द्वारा ही हमारी ज़िंदगी सुचारू ढंग से आगे बढ़ सकती है।

प्रशंसा को आप विनम्रता से स्वीकार करें और आलोचना पर गंभीरता से विचार करें। यदि आप दोनों स्थितियों में सम रहते हैं, तो आपके पथ में कोई अवरोधक उपस्थित नहीं हो सकता। यदि प्रशंसा में आप फूले नहीं समाते और अपने हृदय में अहंकार का प्रवेश वर्जित रखते हैं…आलोचना पर आप गहराई से चिंतन-मनन करते हैं , तो आप सम्पूर्ण सृष्टि पर साम्राज्य स्थापित कर सकते हैं। परंतु अहंनिष्ठ मानव जीती हुई बाज़ी भी हार जाता है और अर्श से सीधा फर्श पर आन पड़ता है। अहं क्रोध का जनक है। इसलिए अहं व क्रोध में कभी भी कोई निर्णय न लें। यह दोनों विवेक के शत्रु हैं…एक स्थान पर नहीं रह सकते।

जहां विवेक नहीं, वहां सत्य नहीं, सही सोच नहीं। इसके लिये आवश्यकता है… अच्छे-बुरे व गुण-दोषों के चिंतन-मनन करने की, क्योंकि सकारात्मक सोच ही हमें तनावमुक्त जीवन जीने की राह दिखलाती है। दूसरी ओर नकारात्मक सोच हमारी जीवन-नौका को अवसाद के भंवर में हिचकोले खाने को छोड़ देती है। इसलिए सदैव अच्छे कर्म कीजिए, क्योंकि जो आप करते हैं, वही लौट कर आपके पास आता है। गीता के निष्काम कर्म का संदेश ध्यातव्य है, अनुकरणीय है। मानव को अपने कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है।कबीर जी का यह दोहा विचारणीय है…’बोया पेड़ बबूल का, आम कहां ते खाय’ अर्थात् बुरे कर्म करके सुफल की अपेक्षा करना व्यर्थ है, निष्फल है…सबसे बड़ी मूर्खता है।

अच्छे कर्म व मधुर वाणी दो अनमोल रतन हैं। यदि आप सुकर्म करते हैं और आपका व्यवहार कटु है, तो आप सदैव निंदा के पात्र बने रहेंगे… लोग आपसे बात तक करना भी पसंद नहीं करेंगे। इसलिए मधुर वचन बोल कर, सबसे विनम्र व्यवहार करें, क्योंकि विनम्रता की जन्मदात्री है विद्या…इसलिए अध्ययन व चिंतन-मनन कीजिए और जब आवश्यकता हो तभी बोलिए…दूसरे शब्दों में जब आपके शब्द मौन से बेहतर व अधिक सार्थक हों, तभी बोलना उचित है। मौन में सभी समस्याओं का समाधान निहित है। इसलिए इसे नव-निधियों की खान कहा गया है। मौन से आपकी भीतरी शक्तियां जाग्रत होती हैं, जो आपको विश्व में श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिस्थापित करा सकती हैं। गलत संगति में रहने से अकेला रहना श्रेष्ठ है। उसी प्रकार बोलने से बेहतर है, चुप रहना। इसलिए कहा गया है पहले तोलिए, फिर बोलिए। यदि हम अनर्गल प्रलाप से बचेंगे, तो व्यर्थ की ग़लतफ़हमियां नहीं होंगी, स्नेह व सौहार्द के संबंध बने रहेंगे…जीवन में सामंजस्यता का भाव बना रहेगा और समरसता की स्थापना होगी… अलौकिक आनंद होगा। सो! न गलती की संभावना होगी, न ग़लतफ़हमी से रिश्ते टूटेंगे और न एकांत की त्रासदी को झेलना पड़ेगा। सो! रिश्तों को कांच व भुने हुए पापड़ की भांति स्वीकारिये, क्योकि वे पल भर में  टूट जाते हैं। मुझे याद आ रही हैं, नयी कविता की दो पंक्तियां,’मेरे सपने ऐसे टूटे, जैसे भुने हुए पापड़’ सपने भी बहुत नाज़ुक होते हैं, ज़रा सी चोट लगने पर दरक़ जाते हैं, जैसे रिश्ते तनिक-सी गलतफ़हमी व उपेक्षा से उस कग़ार पर आकर खड़े हो जाते हैं, जहां मनुष्य स्वयं को ठगा-सा महसूसता व किंकर्तव्यविमूढ़-सा पाता है। शायद! इसलिए शक़ को दोस्ती का दुश्मन कहा गया है।  इसके जीवन में दस्तक देते ही जीवन की तमाम खुशियां जाने कहां विलीन व नदारद हो जाती हैं और ज़िंदगी उस दोराहे पर आकर खड़ी हो जाती है, जहां से उसे कोई रास्ता नहीं सूझता। सो! रिश्तों की मासूम बच्चे की भांति परवरिश करना अपेक्षित है।

वास्तव में रिश्ते जब मज़बूत होते हैं, तभी महसूस  होते हैं तथा अंतर्मन में घर जाते हैं और शक़ की गुंजाइश नहीं रहती… जीवन द्रुत गति से दौड़ता हुआ कैसे गुज़र जाता है। आइए! एक-दूसरे के प्रति गहन विश्वास रखें, सच्चे मित्र की भांति, उसकी अनुपस्थिति में भी, उसके पक्ष में एक मज़बूत ढाल व सुख-दु:ख के सच्चे साथी बन कर खड़े रहें… कभी उसकी निंदा सुनकर बरगलाएं नहीं… तुरंत प्रतिक्रिया न दें…सोच-विचार कर प्रत्युत्तर दें। यह बात सदैव मन में रखनी अपेक्षित है कि लोगों का काम तो नदी व सरोवर के शांत जल में पत्थर फेंक कर, उसे उद्वेलित करना होता है… उसी प्रकार लोग निंदा रूपी पत्थर फेंक कर उसके जीवन में खलल उत्पन्न कर उल्लसित होते हैं, जिसका भयावह पक्ष सम्मुख आने पर आपके हाथ खाली होते हैं अर्थात् कई बार तो जन्मजात संबंध भी हाशिये पर चले जाते हैं और हम हाथ मलते रह जाते हैं।

सो! मन से नकारात्मकता के भाव निकाल कर सकारात्मक ऊर्जा से आप्लावित करें… यही जिंदगी की चाहना है, अपेक्षा है, रिश्तों की ऊर्जा है…इन्हें महसूसें तथा बचाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहें। वैसे समय को सबसे बड़ा हीलर कहा गया है, जो सब प्रकार के घावों को भर देता है। परंतु वाणी के घाव कभी नहीं भरते…इसलिए सदैव मधुर वाणी बोलनी अपेक्षित है। अटूट विश्वास व समर्पण भाव ही इन्हें बचाने की सर्वश्रेष्ठ साधना है। अंत में, मैं यह कहना चाहूंगी कि सभी सुंदर वस्तुएं दिल से आती हैं और बुरी वस्तुएं मस्तिष्क से। इसलिए संबंध व दोस्ती के लिए हृदय रूपी उर्वरा अपेक्षित है। मन में कभी मलाल न आने दें। सो! चिर वसंत रहेगा और रिश्तों में प्रगाढ़ता आएगी, जिसे मिटाने का साहस ज़माने भर के लोगों में नहीं होगा। इसलिए मस्तिष्क को कभी हृदय पर हावी न होने दें, क्योंकि मस्तिष्क चिंतन-मनन करता है, जबकि हृदय में स्वीकार्यता भाव प्रमुख होता है। स्वार्थ पर आधारित रिश्ते कभी स्थाई नहीं होते, ज़रा-सी गलतफ़हमी रूपी खरोंच लगते ही टूट  जाते हैं।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सूर्यदेव ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

(We present an English Version of this Hindi Poetry “सूर्यदेव”  as  ☆ Suryadev☆  We extend our heartiest thanks to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for this beautiful translation. )

☆ संजय दृष्टि  – सूर्यदेव ☆

सूर्यदेव अर्थात सृष्टि में अद्भुत, अनन्य का आँखों से दिखता प्रमाणित सत्य। सूर्यदेव का मकर राशि में प्रवेश अथवा मकर संक्रमण खगोलशास्त्र, भूगोल, अध्यात्म, दर्शन  सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

इस दिव्य प्रकाश पुंज का उत्तरी गोलार्ध के निकट आना उत्तरायण है। उत्तरायण अंधकार के आकुंचन और प्रकाश के प्रसरण का कालखंड है। स्वाभाविक है कि इस कालखंड में दिन बड़े और रातें छोटी होंगी।

दिन बड़े होने का अर्थ है प्रकाश के अधिक अवसर, अधिक चैतन्य, अधिक कर्मशीलता।

अधिक कर्मशीलता के संकल्प का प्रतिनिधि है तिल और गुड़ से बने पदार्थों का सेवन।

निहितार्थ है कि तिल की ऊर्जा और गुड़ की मिठास हमारे मनन, वचन और आचरण तीनों में देदीप्यमान रहे।

*तमसो मा ज्योतिर्गमय!*

*मकर संक्रांति/ उत्तरायण/ भोगाली बिहू / माघी/ पोंगल/ खिचड़ी की अनंत शुभकामनाएँ।*

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मकर संक्रांति विशेष ☆ मकर संक्रांति (मेरी पुस्तक पूर्ण विनाशक से) ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। हम  प्रत्येक शनिवार आपकी रचनाएँ उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”  के अंतर्गत  प्रकाशित करते हैं । आज प्रस्तुत है मकर संक्रांति पर विशेष उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय का अंश  “मकर  संक्रांति ”।)

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☆ मकर संक्रांति विशेष  ☆ आशीष साहित्य – # 25 ☆

☆ जीव विज्ञान ☆

मकर संक्रांति पर विशेष (मेरी पुस्तक पूर्ण विनाशक से):

अगले दिन, आकाश में सूर्य फिर उगा। दोनों सेनाएँ मैदान में फिर से युद्ध के लिए तैयार थी। उस दिन रावण की सेना की कमान ‘मकराक्ष’ के हाथों में थी, जिसका अर्थ है मकर राशि की धुरी, अंतरिक्ष का वह भाग जहाँ राशि चक्र की मकर राशि स्थित है ।मकराक्ष का एक अन्य अर्थ पहाड़ी बकरी की रीढ़ की हड्डी भी है । कुछ लोगों का कहना है कि उसका नाम ‘मग्रक्ष’ था, मगर का अर्थ मगरमच्छ और अक्ष का अर्थ धूरी है इसलिए मग्रक्ष का अर्थ मगरमच्छ के रीढ़ की हड्डी।मकराक्ष ‘खर’ का पुत्र था, जिसे पंचवटी में भगवान राम ने मारा था। वह महान योद्धा था। मकराक्ष ने शपथ ली थी कि वह अपने पिता के हत्यारे को मार डालेगा, और उसके बाद ही वह अपने पिता की मृत्यु की अंतिम क्रियाएँ करेगा। उसने सीधे भगवान राम को लड़ाई के लिए चुनौती दी।

भगवान राम तैयार थे। भगवान राम और मकराक्ष के बीच खतरनाक लड़ाई आरम्भ हो गयी। मकराक्ष – मकर राशि की धुरी, यह भूल गया था कि वह भगवान के साथ लड़ रहा था जिनसे पूरा राशि चक्र प्रकट हुआ था, न की केवल मकर राशि का अक्ष बल्कि ब्रह्मांड के सभी अक्ष। भगवान राम ने चेहरे पर मुस्कान के साथ एक तीर मकराक्ष की ओर चलाया। उस तीर में 13 शाखाएं थीं जो अंतरिक्ष में तेजी से मकराक्ष से की ओर बढ़ी, और मकराक्ष की रीढ़ की हड्डी को 13 टुकड़ों में काट दिया, और तुरंत ही वह मर गया।

भगवान राम, जो की सभी प्राणियों के प्रकाश, सूर्य और आत्मा है, और भगवान राम सूर्यवंशी कुल के वंशज थे। मकराक्ष ने अपनी पहचान खो दी और वो भगवान राम की कृपा या आध्यात्मिकता के अनंत प्रकाश में विलय हो गया। ऐसा कहा जाता है कि मकराक्ष के शरीर को पूर्णतय नष्ट होने में करीब तीन माह लग गए, और वह दिन मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाने लगा।

मकर संक्रांति हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है। मकर संक्रान्ति पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है, इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। एक दिन का अंतर लौंद वर्ष के 366 दिन का होने ही वजह से होता है ।मकर संक्रान्ति उत्तरायण से भिन्न है। मकर संक्रान्ति पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं, यह भ्रान्ति गलत है कि उत्तरायण भी इसी दिन होता है। उत्तरायण का प्रारंभ 21 या 22 दिसम्बर को होता है ।लगभग 1800 वर्ष पूर्व यह स्थिति उत्तरायण की स्थिति के साथ ही होती थी, संभव है की इसी वजह से इसको व उत्तरायण को कुछ स्थानों पर एक ही समझा जाता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। सम्पूर्ण भारत में मकर संक्रान्ति विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। विभिन्न प्रान्तों में इस त्योहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व में नहीं । हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व 13 जनवरी को ही मनाया जाता है। इस दिन अँधेरा होते ही अग्नि जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है। इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियाँ आपस में बाँटकर खुशियाँ मनाते हैं। बहुएँ घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारम्परिक मक्के की रोटी और सरसों के साग का आनन्द भी उठाया जाता है ।

उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से ‘दान का पर्व’ है। इलाहाबाद में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष एक माह तक मेला लगता है जिसे माघ मेले के नाम से जाना जाता है। 14 जनवरी से ही इलाहाबाद में हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है। 14 दिसम्बर से 14 जनवरी तक का समय खर मास के नाम से जाना जाता है। एक समय था जब उत्तर भारत में 14 दिसम्बर से 14 जनवरी तक पूरे एक महीने किसी भी अच्छे कार्य को अंजाम भी नहीं दिया जाता था। अर्थात शादी-ब्याह नहीं किये जाते थे परन्तु अब समय के साथ लोग बदल गये हैं। परन्तु फिर भी ऐसा विश्वास है कि 14 जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से पृथ्वी पर अच्छे दिनों की शुरुआत होती है। माघ मेले का पहला स्नान मकर संक्रान्ति से शुरू होकर शिवरात्रि के आख़िरी स्नान तक चलता है। संक्रान्ति के दिन स्नान के बाद दान देने की भी परम्परा है।इस दिन बागेश्वर में भी बड़ा मेला होता है। वैसे गंगा-स्नान रामेश्वर, चित्रशिला व अन्य स्थानों में भी मेले होते हैं। इस दिन गंगा स्नान करके तिल के मिष्ठान आदि को ब्राह्मणों व पूज्य व्यक्तियों को दान दिया जाता है। इस पर्व पर क्षेत्र में गंगा एवं रामगंगा घाटों पर बड़े-बड़े मेले लगते हैं। समूचे उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है तथा इस दिन खिचड़ी खाने एवं खिचड़ी दान देने का अत्यधिक महत्व होता है।

बिहार में भी मकर संक्रान्ति को खिचड़ी नाम से जाता हैं। इस दिन उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान करने का अपना महत्त्व है।

महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित स्त्रियाँ अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन स्त्रियों को दान करती हैं। तिल-गूल नामक हलवे के बाँटने की प्रथा भी है। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं –“लिळ गूळ ध्या आणि गोड़ गोड़ बोला” अर्थात “तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो”। इस दिन स्त्रियाँ आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बाँटती हैं।

बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है। यहाँ गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिये व्रत किया था। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं। वर्ष में केवल एक दिन मकर संक्रान्ति को यहाँ लोगों की अपार भीड़ होती है। इसीलिए कहा जाता है- “सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार”।

तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं। प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अन्तिम दिन कन्या-पोंगल। इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आँगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। इस दिन बेटी और जमाई राजा का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है।

असम में मकर संक्रान्ति को माघ-बिहू अथवा भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं।राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन स्त्रियाँ अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही स्त्रियाँ किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं। इस प्रकार मकर संक्रान्ति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखती है।

शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ठ होता है-

माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।

स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥

मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी। ऐसा जानकर सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है। सामान्यत: भारतीय पंचांग पद्धति की समस्त तिथियाँ चन्द्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं, किन्तु मकर संक्रान्ति को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है। इसी कारण यह पर्व प्रतिवर्ष 14 जनवरी को ही पड़ता है।ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रान्ति का ही चयन किया था। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं।

© आशीष कुमार  

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सकारात्मक सपने – #32 – घर बनायें स्वर्ग ☆ सुश्री अनुभा श्रीवास्तव

सुश्री अनुभा श्रीवास्तव 

(सुप्रसिद्ध युवा साहित्यसाहित्यकार, विधि विशेषज्ञ, समाज सेविका के अतिरिक्त बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी  सुश्री अनुभा श्रीवास्तव जी  के साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत हम उनकी कृति “सकारात्मक सपने” (इस कृति को  म. प्र लेखिका संघ का वर्ष २०१८ का पुरस्कार प्राप्त) को लेखमाला के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने के अंतर्गत आज अगली कड़ी में प्रस्तुत है  “घर बनायें स्वर्ग”।  इस लेखमाला की कड़ियाँ आप प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे।)  

 

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने  # 32 ☆

☆ घर बनायें स्वर्ग  ☆

हम सब के अवचेतन मन में, स्वर्ग की  कल्पना, एक सुखद, परम आनन्ददायी, कष्ट रहित, अलौकिक अनुभूति के रूप में रेखांकित है. अर्थात स्वर्ग वही है, जहाँ आपके परिवेश में आपकी आज्ञा का अक्षरशः परिपालन हो, आपको मन वाँछित महत्व मिले, आपकी आवश्यकतायें सहजता से पूरी हों, सकारात्मक वातावरण हो. कटुता, विषमता, वैमनस्य जैसी कुत्सित प्रवृत्तियों का परिवेश न हो. ऐसे ही लोक की चाहत में हम  स्वर्ग की कामना करते हैं. तपस्या, पूजा पाठ, धार्मिक अनुष्ठान करते हैं. इस सबके बाद, मृत्यु के उपरांत  भी ऐसा काल्पनिक स्वर्ग मिलता है या नहीं प्रमाणिक रूप से निश्चित नहीं  है. किन्तु  अपने कर्मों से, अपनी जीवन शैली में थोड़ा सा बदलाव करके, हम इसी जीवन में, यहीं धरती पर, स्वयं अपने घर पर ही स्वर्ग के समस्त गुणों से परिपूरित परिवेश बना सकते हैं.

यदि पति पत्नी परस्पर संपूर्ण सर्मपण के साथ,  मित्र भाव से,  निष्ठा पूर्वक, दाम्पत्य का निर्वाह कर रहे हैं, अर्थात पति एक पत्नीव्रती है, व पत्नी पतिव्रता है तो हम समझ सकते हैं कि यह सुख स्वर्ग की किसी भी अप्सरा के साथ के सुख से बेहतर, चिर स्थाई एवं ऐसा है जिसकी अपेक्षा देवता भी करते हैं.

यदि आपकी संतान आपकी आज्ञाकारणी है, तो हर पल के ऐसे अनुचर तो स्वर्ग में भी नहीं मिलते. कहा जाता है ” पूत सपूत तो क्या धन संचय ? “. यदि आपकी संतान को आपने सुसंस्कारी, सुसंतान बनाया है तो आपको संपत्ती के व्यर्थ संग्रहण की भी कोई आवश्यकता नहीँ है. “साँई इतना दीजीये जामें कुटुंब समाये, मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाये  ” गोस्वामी तुलसीदास ने भी  कहा है ” जहाँ सुमति तँह संपति नाना “. अतः अच्छा हो कि हम अपने परिवेश में सुमति का वातावरण बनाने के प्रयत्न करें. भौतिक संसाधनों के संग्रहण की अंत हीन स्पर्धा में पड़कर मन की शांति, दिन का चैन, रात का आराम खो देने में बुद्धिमानी नहीं है,जिन  भौतिक संसाधनो को पाने के लिये हम अपना स्वास्थ्य तक खो देते हैं वे तो स्वर्ग में  होते ही नहीं.

घर के प्रत्येक सदस्य के कार्यों का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव  घर वालों पर पड़ता है, कोई एक परिवार जन बीमार पड़ जाये तो सब चिंतित हो जाते हैं ! घर परिवार के सदस्य अपने आचरण, व्यवहार से घर में ही स्वर्ग सावातावरण बना सकते हैं, या फिर किसी एक के भी दुराचरण से परेशान होकर घर वाले स्वर्ग वासी बनने पर मजबूर होकर आत्महत्या तक कर लेते हैं. चुनना हमें ही है !

© अनुभा श्रीवास्तव्

 

घर बनायें स्वर्ग

 

 

हम सब के अवचेतन मन में, स्वर्ग की  कल्पना, एक सुखद, परम आनन्ददायी, कष्ट रहित, अलौकिक अनुभूति के रूप में रेखांकित है. अर्थात स्वर्ग वही है, जहाँ आपके परिवेश में आपकी आज्ञा का अक्षरशः परिपालन हो, आपको मन वाँछित महत्व मिले, आपकी आवश्यकतायें सहजता से पूरी हों, सकारात्मक वातावरण हो. कटुता, विषमता, वैमनस्य जैसी कुत्सित प्रवृत्तियों का परिवेश न हो. ऐसे ही लोक की चाहत में हम  स्वर्ग की कामना करते हैं. तपस्या, पूजा पाठ, धार्मिक अनुष्ठान करते हैं. इस सबके बाद, मृत्यु के उपरांत  भी ऐसा काल्पनिक स्वर्ग मिलता है या नहीं प्रमाणिक रूप से निश्चित नहीं  है. किन्तु  अपने कर्मों से, अपनी जीवन शैली में थोड़ा सा बदलाव करके, हम इसी जीवन में, यहीं धरती पर, स्वयं अपने घर पर ही स्वर्ग के समस्त गुणों से परिपूरित परिवेश बना सकते हैं.

यदि पति पत्नी परस्पर संपूर्ण सर्मपण के साथ,  मित्र भाव से,  निष्ठा पूर्वक, दाम्पत्य का निर्वाह कर रहे हैं, अर्थात पति एक पत्नीव्रती है, व पत्नी पतिव्रता है तो हम समझ सकते हैं कि यह सुख स्वर्ग की किसी भी

अप्सरा के साथ के सुख से बेहतर, चिर स्थाई एवं ऐसा है जिसकी अपेक्षा देवता भी करते हैं.

यदि आपकी संतान आपकी आज्ञाकारणी है, तो हर पल के ऐसे अनुचर तो स्वर्ग में भी नहीं मिलते. कहा जाता है ” पूत सपूत तो क्या धन संचय ? “. यदि आपकी संतान को आपने सुसंस्कारी, सुसंतान बनाया है तो आपको संपत्ती के व्यर्थ संग्रहण की भी कोई आवश्यकता नहीँ है. “साँई इतना दीजीये जामें कुटुंब समाये, मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाये  ” गोस्वामी तुलसीदास ने भी  कहा है ” जहाँ सुमति तँह संपति नाना “. अतः अच्छा हो कि हम अपने परिवेश में सुमति का वातावरण बनाने के प्रयत्न करें. भौतिक संसाधनों के संग्रहण की अंत हीन स्पर्धा में पड़कर मन की शांति, दिन का चैन, रात का आराम खो देने में बुद्धिमानी नहीं है,जिन  भौतिक संसाधनो

को पाने के लिये हम अपना स्वास्थ्य तक खो देते हैं वे तो स्वर्ग में  होते ही नहीं.

घर के प्रत्येक सदस्य के कार्यों का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव  घर वालों पर पड़ता है, कोई एक परिवार जन बीमार पड़ जाये तो सब चिंतित हो जाते हैं ! घर परिवार के सदस्य अपने आचरण, व्यवहार से घर में ही स्वर्ग सावातावरण बना सकते हैं, या फिर किसी एक के भी दुराचरण से परेशान होकर घर वाले स्वर्ग वासी बनने पर मजबूर होकर आत्महत्या तक कर लेते हैं. चुनना हमें ही है !

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #30 ☆ विश्वास☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से इन्हें पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # 30 ☆

☆ विश्वास ☆

 

भोर अंधेरे यात्रा पर निकलना है। निकलते समय घर की दीवार पर टँगे मंदिर में विराजे ठाकुर जी को माथा टेकने गया। दर्शन के लिए बिजली लगाई। बिजली लगाने भर की देर थी कि मानो ठाकुर जी हँस पड़े। मनुष्य को भी अपनी वैचारिक संकीर्णता पर स्वयं हँसी आ गई।

दिव्य प्रकाशपुंज को देखने के लिए 5-7 वॉट का बल्ब लगाना!! सूरज को दीपक दिखाने का मुहावरा संभवत: ऐसी नादानियों की ही उपज है।

नादानी का चरम है, भीतर की ठाकुरबाड़ी में बसे ठाकुर जी के दर्शन से आजीवन वंचित रहना। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मनुष्य आँखों को खुद ढककर अंधकार-अंधकार चिल्लाता है।

खुद को प्रकाश से वंचित रखनेवाले मनुष्य रूपी प्रकाश की कथा भी निराली है। अपनी लौ से अपरिचित ऐसा ही एक प्रकाश, संत के पास गया और प्रकाश प्राप्ति का मार्ग जानना चाहा। संत ने उसे पास के तालाब में रहनेवाली एक मछली के पास भेज दिया। मछली ने कहा, अभी सोकर उठी हूँ, प्यास लगी है। कहीं से थोड़ा जल लाकर पिला दो तो शांति से तुम्हारा मार्गदर्शन कर सकूँगी। प्रकाश हतप्रभ रह गया। बोला, “जल में रहकर भी जल की खोज?” मछली ने कहा, “यही तुम्हारी जिज्ञासा का समाधान है। खोज सके तो खोज।”

“खोजी होये तुरत मिल जाऊँ

एक पल की ही तलाश में ।

कहत कबीर सुनो भाई साधो,

मैं तो हूँ विश्वास में ।।

भीतर के ठाकुर जी के प्रकाश का साक्षात्कार कर लोगे तो बाहर की ठाकुरबाड़ी में स्वत: उजाला दिखने लगेगा।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

प्रात: 8.29, 7.1.2020

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 25 – जीव विज्ञान ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “जीव विज्ञान”।)

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 25 ☆

☆ जीव विज्ञान ☆

मुझे लगता है कि आप सभी जानते होंगे कि हमारा शरीर अरबों कोशिकाओं से बना है, और शरीर की कोशिकाएँ हर पल बदलती रहती है कोशिकाओं का बदलाव ही उम्र के बढ़ने का कारण है। यदि शरीर की कोशिकाएँ नहीं बदलती हैं, तो हम बूढ़े नहीं होंगे।जीवद्रव्य, पुरस या प्रोटोप्लाज्म कोशिका की जीवित सामग्री होता है जो प्लाज्मा झिल्ली से घिरा होता है। जीवद्रव्य आयनों, एमिनो अम्लों, मोनोसैक्राइड और पानी जैसे छोटे अणुओं और नाभिकीय अम्ल, प्रोटीन, लिपिड और पॉलीसैकराइड जैसे बड़े अणुओं (macromolecules) के मिश्रण से बना होता है। सुकेंद्रिक या युकेरियोट (eukaryote) एक ऐसे जीव को कहा जाता है जिसकी कोशिकाओं (सेल) में झिल्लियों में बंद जटिल ढाँचे हों। सुकेंद्रिक और अकेंद्रिक (प्रोकेरियोट) कोशिकाओं में सबसे बड़ा अंतर यह होता है कि सुकेंद्रिक कोशिकाओं में एक झिल्ली से घिरा हुआ केन्द्रक (न्यूक्लियस) होता है जिसके अन्दर आनुवंशिक (जेनेटिक) सामान होता है।

प्रोटोप्लाज्म दो रूपों में पाया जाता था, एक तरल जैसा ठोस रूप या दूसरा लप्सी/जेली जैसी चिपचिपा घोल” कोशिकाओं (Cell) सजीवों के शरीर की रचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है और प्राय: स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं। ‘कोशिका’ का अंग्रेजी शब्द सेल (Cell) लैटिन भाषा के ‘शेलुला’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ ‘एक छोटा कमरा’ है। कुछ सजीव जैसे जीवाणुओं के शरीर एक ही कोशिका से बने होते हैं, उन्हें एककोशकीय जीव कहते हैं जबकि कुछ सजीव जैसे मनुष्य का शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है उन्हें बहुकोशकीय सजीव कहते हैं। सजीवों की सभी जैविक क्रियाएँ कोशिकाओं के भीतर होती हैं। कोशिकाओं के भीतर ही आवश्यक आनुवांशिक सूचनाएँ होती हैं जिनसे कोशिका के कार्यों का नियंत्रण होता है तथा सूचनाएँ अगली पीढ़ी की कोशिकाओं में स्थानान्तरित होती हैं।

 

© आशीष कुमार  

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 29 ☆ हाउ से हू तक ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का आलेख “हाउ से हू तक”.  डॉ मुक्ता जी का यह विचारोत्तेजक लेख  हमें  साधारण मानवीय  व्यवहार से रूबरू कराता है।  यह सच है कि धन दौलत और पद प्रतिष्ठा का चोली दामन का साथ है, किन्तु मानवीय व्यवहार तो आपके  नियंत्रण में है न ।डॉ मुक्त जी की कलम को सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें एवं अपने विचार कमेंट बॉक्स में अवश्य  दर्ज करें )    

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 29☆

☆हाउ से हू तक☆

‘दौलत भी क्या चीज़ है, जब आती है तो इंसान खुद को भूल जाता है, जब जाती है तो ज़माना उसे भूल जाता है।’ धन-दौलत, पैसा व पद-प्रतिष्ठा का नशा अक्सर सिर चढ़कर बोलता है, क्योंकि इन्हें प्राप्त करने के पश्चात् इंसान अपनी सुध-बुध खो बैठता है … स्वयं को भूल जाता है। तात्पर्य यह है, कि धन-सम्पदा पाने के पश्चात् इंसान अहं के नशे में चूर जो रहता है, उसे अपने सिवाय कुछ भी दिखलायी नहीं पड़ता… उस स्थिति में वह स्व-पर से ऊपर उठ जाता है… उसे कोई भी अपना नज़र नहीं आता… सब पराए अथवा दुश्मन ही नज़र आते हैं। वह दौलत के नशे के साथ-साथ शराब व ड्रग्स का आदी हो जाता है…सो! उसे समय, स्थान व परिस्थिति का लेशमात्र भान अथवा ख्याल भी नहीं रहता। और वह संबंध व सरोकारों का उसके जीवन में महत्व नहीं रहता। इस स्थिति में वह अहंनिष्ठ मानव अपनों अर्थात् परिवार व बच्चों से दूर…बहुत…दूर चला जाता है और वह अपने सम्मुख  किसी के अस्तित्व को नहीं स्वीकारता। वह  मर्यादा की समस्त सीमाओं को लांघ जाता है और रास्ते में आने वाली बाधाओं के सिर पर पांव रख कर आगे बढ़ता चला जाता है  और उसकी यह दौड़ उसे कहीं भी थमने नहीं देती।

धन-दौलत का आकर्षण न धूमिल पड़ता है, न ही कभी समाप्त होता है। यह तो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ता चला जाता है। यह प्रसिद्ध कहावत है…’पैसा ही पैसे को खींचता है।’ दूसरे शब्दों में इंसान की पैसे  की हवस कभी समाप्त नहीं होती…सो! उसे उचित-अनुचित में भेद नज़र आने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। धन कमाने का नशा उस पर इस क़दर हावी होता है कि वह राह में आने वाले  आगंतुकों-विरोधियों को कीड़े-मकोड़ों की भांति रौंदता हुआ बढ़ता चला जाता है। इस मन:स्थिति में  वह पाप-पुण्य के भेद को नकार, अपनी सोच व निर्णय को उचित स्वीकारता है।

दुनिया के लोग भी धनवान अथवा दौलतमंद  इंसान को सलाम करते हैं, अर्थात् करने को बाध्य होते हैं…  और यह उनकी नियति होती है। परंतु दौलत के खो जाने के पश्चात् ज़माना उसे भूल जाता है क्योंकि  यह तो ज़माने का चलन है। परंतु इंसान माया के कारण सांसारिक आकर्षणों व दुनियावी चकाचौंध में इस क़दर खो जाता है कि उसे अपने आत्मज भी अपने नज़र नहीं आते, दुश्मन भासते हैं। एक लंबे अंतराल के पश्चात् जब वह उन अपनों के बीच लौट जाना चाहता है, तो वे भी उसे नकार देते हैं। अब उनके पास उस अहंनिष्ठ इंसान के  लिए समय का अभाव होता है। यह सृष्टि का नियम है कि जैसा आप इस संसार में करते हैं, वही लौट कर आपके पास आता है। यह तो हुई आत्मजों अर्थात् अपने बच्चों की बात, जिन्हें अच्छी परवरिश व सुख- सुविधाएं प्रदान करने के लिए वह दिन-रात परिश्रम करता रहा, गलत-ठीक काम करता रहा…परंतु उन्हें समय व स्नेह नहीं दे पाया, जिसकी उन्हें दरक़ार थी, जो उनकी प्राथमिक आवश्यकता थी।

फिर ग़ैरों से क्या शिक़वा कीजिए… दौलत के समाप्त होते ही ज़माना अर्थात् दुनिया भर के लोग भी उसे भुला देते हैं, क्योंकि वे संबंध स्वार्थ के थे, स्नेह सौहार्द के नहीं। मैं तो संबंधों को रिवाल्विंग चेयर की भांति मानती हूं। आपने मुंह दूसरी ओर घुमाया, अवसरवादी बाशिंदों के तेवर भी बदल गए, क्योंकि आजकल संबंध सत्ता व धन-संपदा से जुड़े होते हैं… सब कुर्सी को सलाम करते हैं। जब तक आप उस पर आसीन हैं, सब ठीक चलता है, आपको झूठा मान-सम्मान मिलता है, क्योंकि लोग आपसे हर उचित-अनुचित कार्य की अपेक्षा रखते हैं। वैसे भी समय पर तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है… सो! इंसान की तो बात ही अलग है।

लक्ष्मी का तो स्वभाव ही चंचल है… एक स्थान पर ठहरती कहां है। जब तक वह मानव के पास रहती है, सब उससे पूछते हैं ‘हाउ आर यू’ और लक्ष्मी के स्थान परिवर्तन करने के पश्चात् लोग कहते हैं ‘हू आर यू।’ इस प्रकार लोगों के तेवर पलभर में बदल जाते हैं। ‘हाउ’ में स्वीकार्यता है— अस्तित्वबोध की, आपकी सलामती का भाव है… जो दर्शाता है कि लोग आपकी चिंता करते हैं… चाहे विवशता-पूर्वक या मन की गहराइयों से… यह और बात है। परंतु ‘हाउ’ को ‘हू’ में बदलने में पल भर का समय भी नहीं लगता। ‘हू’ अस्वीकार्यता बोध…आपके अस्तित्व से बेखबर अर्थात् ‘कौन हैं आप?’ ‘कैसे से कौन’ प्रतीक है स्वार्थपरता का, आपके प्रति निरपेक्ष भाव का, अस्तित्वहीनता का… यह प्रतीक है, मानव के संकीर्ण भाव का… क्योंकि उगते सूर्य को सब सलाम करते हैं और डूबते सूर्य को निहारना अपशकुन मानते हैं। आजकल तो लोग बिना काम अर्थात् स्वार्थ के नमस्ते अथवा दुआ सलाम भी नहीं करते।

इस स्थिति में चिन्ता अथवा तनाव का होना अवश्यं- भावी है, जो मानव को अवसाद की स्थिति में धकेल देता है, जिससे मानव लाख चाहने पर भी उबर नहीं पाता। वह अतीत की स्मृतियों में अवगाहन करके संतोष का अनुभव करता है। उसके सम्मुख प्रायश्चित करने के अतिरिक्त दूसरा विकल्प होता ही नहीं। सुख व्यक्ति के अहं की परीक्षा लेता है, तो दु:ख उसके धैर्य की…दोनों स्थितियों-परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले व्यक्ति का जीवन सफल कहलाता है। यह भी अकाट्य सत्य है कि सुख में व्यक्ति फूला नहीं समाता, उस के कदम धरा पर नहीं पड़ते…वह अहंवादी हो जाता है और दु:ख के समय वह हैरान-परेशान हो जाता है तथा अपना धैर्य खो बैठता है। वह अपनी नाकामी अथवा असफलता का ठीकरा दूसरों के सिर फोड़ता है। इस उधेड़बुन में वह सोच नहीं पाता कि यह संसार दु:खालय है और सुख बिजली की कौंध की मानिंद जीवन में दस्तक देता है…परंतु बावरा मन उसे स्थायी समझ अपनी बपौती समझ बैठता है और उसके जाने के पश्चात् शोकाकुल हो जाता है।

सुख-दु:ख का चोली दामन का साथ है। एक के जाने के पश्चात् ही दूसरा आता है। जिस प्रकार एक  म्यान में दो तलवारों का रहना असंभव है, उसी प्रकार दोनों का एकछत्र छाया में रहना असंभव है। परंतु सुख-दु:ख में सम रहना आवश्यक है। दोनों अतिथि हैं, आए हैं, तो उनका लौटना भी निश्चित है। इसलिए न किसी के आने की खुशी, न किसी के जाने का शोक मनाना चाहिए। हर स्थिति में सम रहने का भाव सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम है। इसलिए सुख में अहं को शत्रु समझना आवश्यक है और दु:ख में अथवा दूसरे कार्य में धैर्य का दामन छोड़ना स्वयं को मुसीबत में डालने के समान है। जीवन में कभी भी किसी को छोटा समझ कर किसी की उपेक्षा मत कीजिए, क्योंकि समय पर हर व्यक्ति व वस्तु का अपना महत्व होता है। सूई का काम तलवार नहीं कर सकती। मिट्टी, जिसे आप पांव तले रौंदते हैं, उसका एक कण भी आंख में पड़ने पर, इंसान पर की जान पर बन आती है। सो! जीवन में किसी तुच्छ वस्तु व व्यक्ति की, कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए… उसे स्वयं से अर्थात् उसकी प्रतिभा को कम नहीं आंकना चाहिए।

पैसे से सुख-सुविधाएं तो खरीदी जा सकती हैं,  मानसिक शांति नहीं। इसलिए दौलत का अभिमान कभी मत कीजिए… पैसा तो हाथ का मैल है… एक स्थान पर नहीं ठहरता। परमात्मा की कृपा से पलक झपकते रंक राजा बन सकता है…पंगु पर्वत लांघ सकता है, अंधा देखने लग जाता है। इस जन्म में इंसान को जो कुछ भी मिलता है…पूर्वजन्मों के कर्मों का फल होता है…फिर अहं कैसा? गरीब व्यक्ति भी अपने कृतकर्मों का फल भोगता है…फिर उसकी उपेक्षा व अपमान क्यों? इसलिए मानव का हर स्थिति में सम रहना सर्वश्रेष्ठ व उत्तम है…सफलता का मूल है। समन्वय सामंजस्यता का जनक है, उपादान है, जो जीवन में समरसता लाता है। यह कैवल्य अर्थात् अलौकिक आनंद की स्थिति है, जिसमें ‘हाउ व हू’ का वैषम्य भाव समाप्त हो जाता है।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 11 – हिन्द स्वराज से (गांधी जी और मशीनें) ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

 

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह  गाँधी विचार, दर्शन एवं हिन्द स्वराज विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें.  आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला का अगला आलेख  “हिन्द स्वराज से (गांधी जी और मशीनें) ”.)

☆ गांधी चर्चा # 11 – हिन्द स्वराज से (गांधी जी और मशीनें) ☆

हमारे कुछ मित्रों ने कहा कि ‘जो लिखा जा रहा है वह भी तो मशीनों के उपयोग से है।‘यह प्रश्न तो गांधीजी ने स्वयं  से भी किया था और बापू ने इसका कोई सीधा उत्तर नहीं दिया। लेकिन हर जगह जहाँ कहीं वे यंत्र का समर्थन करते हैं तब एक ही बात उनके ध्यान में रहती है वह है समय और श्रम की बचत।  मैं सोचता हूँ कि आज अगर गांधीजी से पूंछा जाता  कि कम्प्यूटर व केलकुलेटर का उपयोग करना चाहिए कि नहीं तो वे कहते हाँ करना चाहिए क्योंकि इससे समय व श्रम की बचत होगी और मानव जाति का हित होगा। गांधीजी ऐसी मशीनों के पक्षधर हैं जो श्रम की बचत तो करें पर धन का लोभ का कारण  न बने। केलकुलेटर व  कम्प्यूटर का प्रयोग ऐसा ही है, हम इनका प्रयोग कोई धन के लोभ में नहीं करते वरण इनके प्रयोग से तो जोड़ने घटाने के काम आसानी से हो जाते हैं और समय बचता है, कम्प्यूटर का प्रयोग हमें और व्यवस्थित बनाता है हमारे कार्यों को सरल बनाता है। कम्प्यूटरीकरण से रोजगार के अवसर बढे हैं, इसने रोजगार के अवसर छीने नहीं हैं बल्कि नए अवसर पैदा किये हैं।

लेकिन वे मोबाइल को लेकर जरूर दुखी होते और शायद यही कहते कि इस यंत्र ने मानव जाति का सबसे ज्यादा नुकसान किया है। वे कहते इसने तो मानवीय संवेदनाओं को व्यक्त करने का तरीका ही बदल दिया है लोग आपस में बातचीत ही नहीं करते बस सन्देश भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। स्वास्थ पर हो रहे दुष्प्रभाव को लेकर भी वे हमें डांटते। लेकिन शायद जब अनेक लोग उनकी आलोचना करते, उनके मोबाइल विरोध को गलत बताते तो वे क्या कहते तब शायद वे कपड़ा मिलों के विषय में अपने विचारों जैसा कुछ बदलाव करते या फिर कहते कि जैसे रेलगाड़ी सब मुसीबतों की जड़ है वैसे ही मोबाइल भी है पर फिर भी मैं जब जरुरत होती है तब रेलगाडी और मोटर गाडी का उपयोग करता हूँ वैसे ही आप भी जरूरत पड़ने पर मोबाइल का उपयोग करो दिन भर उससे चिपके मत रहो।

उनकी यह बात भारतीय मनीषियों के सदियों पुराने चिंतन का परिणाम है जो काम क्रोध  मद लोभ को सभी बुराइयों की जड़ मानती आई है और इस चिंतन ने सदैव धन के लोभ से बचने की सलाह दी है। गांधीजी कहते हैं कि मेरा झगड़ा यंत्रों के खिलाफ नहीं, बल्कि आज यंत्रों का जो बुरा उपयोग हो रहा है उसके खिलाफ है। अब देखिये ट्राली बैग ने कुली ख़तम कर दिए हम ट्राली बैग क्यों लेते है क्योंकि कुछ पैसे बचाना है, यह जो कुछ धन बचाने का जो लोभ है उसने एक बड़े तबके का रोजगार छीन लिया है। आज रेलवे स्टेशनों से कुली लगभग गायब हो गए हैं।

अनेक मित्रों ने गांधीजी के मशीनों के विरोध को राष्ट्र की रक्षा से जोड़ा है। यंत्रों का विरोध और राष्ट्र की सुरक्षा दो अलग अलग बातें हैं। गांधीजी ने राष्ट्र की सुरक्षा के लिए आत्म बलिदान की बातें कहीं, जब कबाइली कश्मीर में घुस आये तो तत्कालीन सरकार ने फ़ौज भेजकर मुकाबला किया। इस निर्णय से गांधीजी की भी सहमति थी। हम हथियारों का निर्माण राष्ट्र की रक्षा के लिए करें और उसकी अंधी खरीद फरोख्त के चंगुल में न फंसे यही गांधीजी के विचार आज की स्थिति में होते। आंतकवादियों, नक्सलियों, राष्ट्र विरोधी ताकतों की गोली का मुकाबला गोली से ही होगा लेकिन बोली का रास्ता भी खुला रहना चाहिए ऐसा कहते हुए मैंने अनेक विद्वान् गांधीजनों को सुना है। हमे 1962 की लड़ाई से सीख मिली और सरकारों ने देश की रक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए अनेक कदम उठाये। इसके साथ ही बातचीत के रास्ते राजनीतिक व सैन्य स्तर पर भी उठाये गए हैं इससे शान्ति स्थापना में मदद मिली है और 1972 के बाद देश को कोई बड़े युद्ध का सामना नहीं करना पडा।यही गांधीजी  का रास्ता है, बातचीत करो, अपील करो, दुनिया का ध्यान समस्या की ओर खीचों समस्या का निदान भी ऐसे ही संभव है। हथियारों से हासिल सफलता स्थाई नहीं होती।

कुछ मित्रों ने जनसंख्या वृद्धि की ओर ध्यान दिलाया है। यह तो सही है की बढ़ती हुई जनसंख्या का पेट भरने में कृषि उत्पादन को बढ़ाना जरुरी है और इसमें यंत्रों/ रासायनिक खाद / कीटनाशकों  का प्रयोग न किया जाय तो फसल की पैदावार कैसे बढ़ेगी। लेकिन यह सब कुछ हद में बाँध दिया जाय तो फसल भी खूब होगी और कृषि के मजदूर बेरोजगार न होंगे। जैसे हार्वेस्टर के बढ़ते प्रयोग ने फसल कटाई में, खरपतवार नाशक दवाई ने निंदाई में मजदूरों के प्रयोग को खतम कर दिया है। हम इनके उपयोग को रोक सकते हैं।हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि औद्योगिक क्रांति ने ही जनसंख्या वृद्धि को संभव बनाया। शायद गांधीजी ने इस दुष्प्रभाव को भी 1909 में भलीभांति पहचान लिया था।

गांधीजी ने मशीनों का विरोध स्वदेशी को प्रोत्साहन देने के लिए नहीं वरन देश को गुलामी की जंजीरों का कारण मानते हुए किया था। वे तो स्वयं चाहते थे कि मेनचेस्टर से कपड़ा बुलाने के बजाय देश में ही मिलें लगाना सही कदम होगा। यंत्रीकरण और तकनीकी के बढ़ते प्रयोग ने रोज़गार के नए क्षेत्र खोले हैं। इससे पढ़े लिखे लोगों को रोजगार मिला है लेकिन उन लाखों लोगो का क्या जो किसी कारण पढ़ लिख न सके या उनका कौशल उन्नयन न हो सका। यंत्रीकरण का सोच समझ कर उपयोग करने से ऐसे अकुशल श्रमिकों की  आर्थिक हालत भी सुधरेगी। प्रजातंत्र में सबको जीने के लिए आवश्यक संसाधन और अवसर तो मिलने ही चाहिए।

यह सही है कि अब हम पुराने जमाने की ओर नहीं लौट सकते, बिजली और उससे चलने वाले उपकरणों ने हमें बहुत सुख दिया है अब दिया बाती के युग में वापिस जाना मूर्खता ही होगी। पर सोचिये इन सब संसाधनों के बढ़ते प्रयोग ने कैसा विनाश रचा है। वातानुकूलन यंत्रों के अति प्रयोग ने ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को बढ़ाया ही है।

कुछ ने कहा कि गांधीजी के रास्ते पर चलना जंगली जीवन जीने जैसा होगा। इस बात का क्या उत्तर होगा? जब आदि मानव थे तो उन्होंने ही सबसे ज्यादा आविष्कार किये, सदैव नई खोज करना मनुष्य का स्वाभाव है। गांधीजी तो पुरातनपंथी कतई न थे।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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