हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ कारगिल विजय दिवस विशेष… कुछ किस्से कारगिल के… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका कारगिल विजय दिवस पर एक संस्मरणीय आलेख कुछ किस्से कारगिल के।)

☆ आलेख – कुछ किस्से कारगिल के…  ☆ श्री अजीत सिंह ☆

कारगिल युद्ध की रिपोर्टिंग के लिए जब मैं कारगिल पहुंचा तो एक हद तक यह एक सुनसान शहर था । मैं श्रीनगर से सेना द्वारा आयोजित मीडिया पार्टी का हिस्सा था । प्रमुख मीडिया नेटवर्क के संवाददाताओं वाली पार्टी ने युद्ध क्षेत्र में जाने के लिए सेना की अनुमति प्राप्त करने के लिए श्रीनगर में तीन सप्ताह से अधिक समय तक इंतजार किया था ।

मैं फिल्म डिवीजन की टीम के साथ डीएवीपी की वैन में सफर कर रहा था । हमने युद्ध क्षेत्र में कुछ कहीं फंस जाने की संभावना से निपटने के लिए ब्रेड, मक्खन, बिस्कुट और चावल का पर्याप्त कोटा साथ लिया था ।

मेरे पास मेरे टेपरेकॉर्डर के इलावा एक सैटेलाइट फोन भी था ।

12000 फीट ऊंचे ज़ोजिला दर्रे को पार करते हुए, हमारा पहला हाल्ट एक बोफोर्स तोप बैटरी थी जो ऊंची पहाड़ी के पार पाकिस्तान सेना पर भारी गोलाबारी कर रही थी ताकि हमारे सैनिक आगे बढ़ सकें। यह दृश्य मीडिया के लिए काफी लुभावना था । हम बोफोर्स तोप की मारक क्षमता से बड़े प्रभावित हुए।

उन दिनों भी इस तोप की खरीदी में भ्रष्टाचार का मुद्दा चल रहा था। पिछले शासन के दौरान स्वीडन से इसकी खरीद की गई थी।

कुछ आगे चल कर एक स्थान पर सेना के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा उस क्षेत्र और भारतीय सेना की स्थिति के बारे में एक ब्रीफिंग दी गई । दरास कस्बे के नजदीक टोलोलिंग रिज को पाकिस्तानी घुसपैठियों से खाली करा लिया गया था।

दोपहर के भोजन के समय हमने कुछ जवान फौजी अफसरों से भी बात की। वे बड़े उत्साहित लग रहे थे। उस समय मुख्य लड़ाई टाइगर हिल पर चल रही थी। टाइगर हिल दरास कस्बे के पश्चिम में एक सीधी ऊंची चोटी है। गाइडेड मिसाइलों के साथ बमबारी की फ्लैश लाइट दिखाई दे रही थी। वहां से हमने कारगिल शहर की ओर रुख किया जो पूर्व दिशा में पड़ता है।

संकरी सड़क एक नदी के किनारे चलती है और इसका कुछ हिस्सा काकसर रेंज की ऊंची पहाड़ियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों की फायरिंग रेंज में है ।

बीएसएफ के एक जवान ने कुछ जरूरी सावधानियों के लिए चेकपोस्ट पर हमारे वाहनों को रोका।

“आप दुश्मन की फायरिंग रेंज में हैं । अपने वाहनों के बीच लगभग 100 मीटर की दूरी रखें । अंधेरे के दौरान भी कोई लाइट न जगाएं। तेजी से ड्राइव करें और अगर आप पर फायरिंग भी हो जाए तो भी रुकें नहीं” ।

आखिरी निर्देश काफी डरावना था । हमने कुछ वाहनों के मलबे को नदी में नीचे देखा तो हमारा डर और भी बढ़ गया ।

देर शाम तक हम कारगिल के एक होटल में पहुंच गए । शहर को नियंत्रण रेखा के पार से रोजाना तोपखाने की गोलाबारी का सामना करना पड़ रहा था ।

होटल एक तीन मंजिला बिल्डिंग थी लेकिन सभी मीडियाकर्मी पहली मंजिल के कमरे चाहते थे । अब तक उन्हें पता चल चुका था कि टॉप फ्लोर पर तोप का गोला सीधी मार कर सकता है और अगर गोला होटल के कंपाउंड में फट जाता है, तो उसके छर्रे ग्राउंड फ्लोर के कमरों में जा सकते हैं ।

डीसी कारगिल भी पास के एक होटल से कार्य कर रहे थे क्योंकि उनका कार्यालय फायरिंग रेंज में था ।

कारगिल शहर के अधिकांश लोगों को जांस्कर मार्ग पर कुछ दूरी पर सुरक्षित स्थान पर तंबुओं में शिफ्ट किया गया था । अगले दिन हम वहां गए। लोग बड़ी मुसीबत में थे। उन्होंने अपने जानवरों को खुला छोड़ दिया था क्योंकि घर में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था ।

उससे अगले दिन हमें उस सड़क पर ले जाया गया, जो सिंधु नदी के किनारे पांच गांवों में बसे आर्य लोगों की ओर जाती है । आर्यों में बहुसंख्यक लद्दाखी लोगों से काफी अलग विशेषताएं हैं । वे अपने सिर पर पगड़ी में फूलों को सजा कर रखते हैं, सिवाय उस समय के जब उनके परिवार में कुछ शोक होता है ।

वे आमतौर पर सेना के लिए मजदूर के रूप में काम करते हैं ।

यह एक आर्य चरवाहा ही था जिसने सबसे पहले सशस्त्र घुसपैठियों को देखा और सेना को सूचित किया । सेना ने पता लगाने के लिए अपनी एक खोजी टीम भेजी थी। पाकिस्तानी सैनिकों ने घात लगाकर उन्हे पकड़ लिया और बाद में सभी को बेरहमी से मार दिया गया। उनके क्षत-विक्षत शव भारतीय सेना को सौंप दिए गए । यह अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का स्पष्ट उल्लंघन था ।

हमने आर्य लोगों से बात की जिन्होंने पाकिस्तानी घुसपैठियों की जानकारी दी थी।

अगली शाम जब मैं सैटेलाइट फोन के जरिए अपनी खबर आकाशवाणी दिल्ली भेज रहा था तो होटल का मालिक मेरे कमरे में आया।

उन्होंने कहा कि लगभग एक साल पहले तक आकाशवाणी के समाचार बुलेटिनों में वह मेरा नाम सुनता रहा है। दिल्ली स्थानांतरित होने से पहले मैंने छह साल तक श्रीनगर में आकाशवाणी के वरिष्ठ संवाददाता के रूप में कार्य किया था ।

बातचीत में मैंने उसे एक दिलचस्प व्यक्ति पाया ।

“सर, यह भारतीय सेना को घुसपैठ की पाकिस्तानी योजनाओं के बारे में जानकारी तो पिछले साल अक्टूबर से थी पर इन्होंने ज़रूरी कदम नहीं उठाए। उनके पास पाकिस्तान में अपने जासूसी एजेंटों से पूरी जानकारी थी” ।

मैंने उसे यह कहते हुए टोका कि वह इतना सुनिश्चित कैसे हो सकता है ।

“सर, घुसपैठ के क्षेत्रों के सभी ब्यौरे का एक पत्र 1998 के अक्टूबर में प्राप्त हुआ था । यह उर्दू में था और मुझे इसे पढ़ने के लिए सेना के अधिकारी ने बुलाया था क्योंकि वे उर्दू नहीं पढ़ सकते थे”, उसने कुछ विस्तार से बताया । अब बात कुछ समझ में आ रही थी।

और फिर बात करते हुए वह सुबकने लगा । मैंने उसे सांत्वना देने की कोशिश की तो कहने लगा, “सर, पाकिस्तान हमारे लिए, कारगिल के लोगों के लिए कोई विकल्प नहीं है । हम शिया हैं और हम जानते हैं कि पाकिस्तान में शिया समाज पर क्या ज़ुल्म हो रहे हैं। हमें भारत में ही रहना है । हमारे लिए कोई दूसरा घर नहीं है । लेकिन भारतीय सेना हमारी रक्षा नहीं कर पाएगी” ।

आप ऐसा क्यों महसूस करते हैं? मैंने पूछा।

“शाम को जब मैं सेना के लिए उर्दू की चिट्ठी पढ़ने गया था तो मैंने वहां चौंकाने वाला नज़ारा देखा। सेना के अधिकारी एक-दूसरे की पत्नियों के साथ नाच रहे थे । पत्नियों की कमर पकड़े हुए वे नाच रहे थे और गा रहे थे एक ट्रेन बना कर स्कूली बच्चों की तरह खेल कर रहे थे। वे शराब पी रहे थे । उन्होंने मुझे ठंड के मौसम में मेस के बाहर एक घंटे से अधिक समय तक बैठा कर रखा। क्या आपको लगता है कि ऐसे लोग हमें बचा सकते हैं? जिस अधिकारी ने मुझे फोन कर बुलाया था वह भी नशे में था । हो सकता है कि उसने मेरी बात ठीक से सुनी ही न हो”।

वह थोड़ा उत्तेजित और कुछ हताश लग रहा था ।

मैंने सेना के एक अधिकारी को विश्वास में लेकर यह मामला बताया । उसने कहा, ” जासूसों के पत्र हर साल आते हैं। इन पर विधिवत ध्यान दिया जाता है लेकिन बात अक्सर बढ़ा चढ़ा कर लिखी गई या पूरी तरह से आधारहीन पाई जाती है । कुछ जासूस डबल एजेंट हैं । कभी कभी ये पत्र पाकिस्तान की एजेंसियों द्वारा भी लिखवा कर भिजवाए जाते हैं, हमें गुमराह करने के लिए। सर्दियों के दौरान ऊंची चोटियों पर सैनिक तैनात करना बेहद मुश्किल है ।

मैंने यह खबर नहीं भेजी। कच्ची खबर थी।

चौथे दिन, प्रेस पार्टी वापस श्रीनगर के लिए चल पड़ी। उसी दिन नई दिल्ली में सेना के प्रवक्ता कर्नल बिक्रम सिंह ने घोषणा की कि टाइगर हिल को मुक्त करा लिया गया है । कर्नल बिक्रम सिंह बाद में थल सेना अध्यक्ष भी बने। बीच में उनका एक ब्रिगेडियर के रूप में अनंतनाग में कार्यकाल रहा था ।

टाइगर हिल को फिर से जीतने की गाथा आने वाले हफ्तों और महीनों में सामने आने वाली थी । सिपाही संजय कुमार को 2020 के गणतंत्र दिवस पर परम वीर चक्र के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार से नवाजा जाना था ।

कारगिल युद्ध बहादुर भारतीय सैनिकों ने एक कुटिल दुश्मन की बुरी नीयत और उसके षडयंत्र को नाकाम करके जीता था। इसे इतिहास में याद किया जाता रहेगा। मेरी भी कुछ यादें इससे जुड़ी रहेंगी क्योंकि मैंने इसे अपनी आंखों से देखा था।

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स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह को वरिष्ठ नागरिकों की श्रद्धांजलि

हिसार। जुलाई २६। राजस्थान में चूरू के पास वायु सेना युद्धाभ्यास के दौरान 9 जुलाई को विमान दुर्घटना में मारे गए स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह को आज वरिष्ठ नागरिक क्लब हिसार में भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया गया कि विमान में खराबी आने पर उन्होंने बेल आउट नहीं किया और अपनी जान की परवाह न करते हुए अपने फाइटर जेट को आबादी से दूर गिराया।

 स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह अपने पीछे अपनी पत्नी सुरभि और एक महीने का पुत्र छोड़ गए हैं। सुरभि का परिवार हिसार में रहता है और वह गांव खरड़ अलीपुर का मूल निवासी रहा है।

 वरिष्ठ नागरिक क्लब की बैठक में उपस्थित सुरभि के पिता सुशील सहरावत ने बताया कि लोकेंद्र सिंह जैगुआर विमान के कुशल फाइटर पायलट थे और उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में भी भाग लिया था।

 वायु सेना मुख्यालय से प्राप्त पत्र का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह बैटल फील्ड स्ट्राइक एक्सरसाइज में हिस्सा ले रहे थे और लोलेवल की उड़ान पर थे जब उनके विमान में खराबी आने के कारण वह गिरने लगा। हौसले और सूझ बूझ का परिचय देते हुए

उन्होंने फाइटर जेट का रुख आबादी से परे कर दिया पर वे स्वयं इस घटना में शहीद हो गए।

 वायु सेना मुख्यालय ने हरियाणा के चीफ सेक्रेटरी को लिखे पत्र में स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह की कुर्बानी को बहादुरी की मिसाल करार देते हुए मांग की है कि सरकार उनकी पत्नी सुरभि की पीएचडी की योग्यता को देखते हुए उन्हें सिविल सर्विस या कोई अन्य क्लास वन जॉब दे जैसा कि राज्य के नियमों में प्रावधान है और जैसा कि मुख्य मंत्री नायब सैनी घोषणा भी कर चुके हैं।

 श्रद्धांजलि बैठक में पूर्व डिविजनल कमिश्नर युद्धवीर ख्यालिया भी उपस्थित थे। दो मिनट का मौन रख स्वर्गीय स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

 

फोटो कैप्शन:

  1. स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह

 

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 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

26.07.2025

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 299 – शिवोऽहम्…(2) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 299 शिवोऽहम्…(2)… ?

शिवोऽहम् के संदर्भ में आज निर्वाण षटकम् के दूसरे श्लोक पर विचार करेंगे।

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः
न वा सप्तधातुः न वा पंचकोशः।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पंचप्राणों में से कोई हूँ। न मैं सप्त धातुओं में से कोई हूँ, न ही पंचकोशों में से कोई । न मैं वाणी, हाथ, अथवा पैर हूँ, न मैं जननेंद्रिय या मलद्वार हूँ। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ।

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के इस अद्भुत आत्मपरिचय को यथासंभव समझने का प्रयास जारी रखेंगे।

वैदिक दर्शन में प्राण को ही प्रज्ञा भी कहा गया। शाखायन आरण्यक का उद्घोष है,

यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः

अर्थात जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।

प्राण, वायु के माध्यम से शरीर में संचरित होता है। संचरण करने वाली वायु पाँच स्थानों पर मुख्यत: स्थित होती है। इन्हें पंचवायु कहा गया है। पंचवायु में प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान समाविष्ट हैं।

स्थूल रूप से समझें तो प्राणवायु का स्थान नासिका का अग्रभाग माना गया है। यह सामने की ओर गति करने वाली है। प्राणवायु देह तथा प्राण की अधिष्ठात्री है। अपान का अर्थ है नीचे जाने वाली। अपान वायु गुदा भाग में होती है। मूत्र, मल, शुक्र आदि को शरीर के निचले भाग की ओर ले जाना इसका कार्य होता है। समान वायु संतुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका स्थान आमाशय बताया गया है। भोजन का समुचित पाचन इसका दायित्व है। व्यान वायु शरीर में सर्वत्र विचरण करती है। इसका स्थान हृदय माना गया है। रक्त के संचार में इसकी विशेष भूमिका होती है। उदान का अर्थ ऊपर ले जाने वाली वायु है। अपने उर्ध्वगामी स्वभाव के कारण यह कंठ, उर, और नाभि में स्थित होती है। वाकशक्ति मूलरूप से इस पर निर्भर है।

इसी तरह त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि एवं मज्जा, शरीर की सप्तधातुएँ हैं। इनमें से किसी एक के अभाव में मानवशरीर की रचना दुष्कर है। शरीर में इनका संतुलन बिगड़ने पर अनेक प्रकार के विकार जन्म लेते हैं।

अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय, शरीर के पंचकोश हैं। हर कोश का नामकरण ही उसे परिभाषित करने में सक्षम है। विभिन्न कोशों द्वारा चेतन, अवचेतन एवं अचेतन की अनुभूति होती है।

जगद्गुरु उपरोक्त श्लोक के माध्यम से अस्तित्व का विस्तार प्राण, पंचवायु, सप्तधातु, पंचकोश से आगे ले जाते हैं। तीसरी पंक्ति में वर्णित वाणी, हाथ, पैर, जननेंद्रिय अथवा गुदा तक, स्थूल या सूक्ष्म तक आत्मस्वरूप को सीमित रखना भी हाथी के जितने भाग को स्पर्श किया, उतना भर मानना है।

विवेचन करें तो मनुष्य को ज्ञात सारे आयामों से आगे हैं शिव। शिव का एक अर्थ कल्याण होता है। चिदानंदरूप शिव होना मनुष्यता की पराकाष्ठा है। इस पराकाष्ठा को प्राप्त करना, हर जीवात्मा का लक्ष्य होना चाहिए।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 740 ⇒ पैदा होने का सुख ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पैदा होने का सुख।)

?अभी अभी # 740 ⇒ आलेख – पैदा होने का सुख ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पैदा होने वाले से, पैदा करने वाला बड़ा होता है। पैदा होना, जीव की नियति है, इसमें सुख और दुःख का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। पैदा होना, किसी का जन्मसिद्ध अधिकार भी नहीं। जो हो गया, सो हो गया। जो नहीं हुआ, सो नहीं हुआ। कहीं सिंगल चाइल्ड, तो कहीं वर्ल्ड इलेवन।

वैसे यह शीर्षक बड़ा भ्रामक है। असली समस्या पैदा होने में नहीं, पैदा करने में है। सृजन सुख जिसे हम मातृत्व सुख भी कह सकते हैं, इसमें पैदा होने वाला तो एक तरह से अकर्ता ही हुआ। सुख दुःख और प्रारब्ध की गठरी अपने सर पर लिए उसे तो बस, इस संसार में प्रवेश करना है। वह एक तरफ पड़ा रोता रहेगा, लोग उसके जन्म की खुशियां मनाते रहेंगे।।

सृजन, सृष्टि का विधान है, नियम है, चक्र है, नियति है। आज अगर हम पैदा नहीं होते, तो कहां होते, जैसे बेतुके और बेबुनियाद प्रश्नों का कोई जवाब नहीं होता। जो हो गया, सो हो गया, जो नहीं हुआ, सो नहीं हुआ। कहीं कोई निःसंतान है तो कहीं संतानों की कतार खड़ी है। इसमें होने वाले का कोई दोष नहीं, जिसके कोई संतान नहीं, उसके लिए भी कोई सहानुभूति नहीं, जिसने पैदा किया, उस पर जरूर आज नहीं तो कल गाज गिरने वाली है, क्योंकि आदमी पर जनसंख्या भारी है।

जो अच्छे संपन्न घरानों में पैदा हुए, चंदन के पालने में झूले, वे अपने आपको सुखी और भाग्यशाली मान सकते हैं, लेकिन रोहिंग्या शरणार्थी, जो न घर का है, न घाट का, कहीं घुसपैठिया है, तो कहीं आतंकवादी, उसके पैदा होने अथवा जिंदा रहने का क्या औचित्य ?

कंट्रोल, कंट्रोल, पेस्ट कंट्रोल !

मेरे घर में आजकल कॉकरोच और छिपकली का सामूहिक सत्संग चल रहा है। पूरा घर कीट पतंग प्रसूति गृह बना हुआ है। जनसंख्या अधिनियम के भरोसे मैं नहीं बैठ सकता। पेस्ट कंट्रोल मेरा अधिकार है। कीड़े मकोड़ों को जीने का अधिकार किसने दिया। अगर कण कण में भगवान है, तो इन्हें भगवान के पास पहुंचाने में ही समझदारी है।

करे कौन भरे कौन ! किसी लेखक की अच्छी रचना को नाम मिल जाता है, प्रसिद्धि मिल जाती है, लेखक और रचना अमर हो जाते हैं तो कुछ रचनाएं ऐसी भी होती हैं, जो पढ़ने के बाद संपादक द्वारा रद्दी की टोकरी में फेंक दी जाती है। उनकी भ्रूण हत्या हो जाती है, उन्हें इस संसार में आने ही नहीं दिया जाता। वे क्या जानें, किसी लेखक की रचना होने का सुख क्या होता है।।

जो पैदा हो गया, सो हो गया, जो रह गया सो रह गया ! किसी जैविक हथियार अथवा पेस्ट कंट्रोल से जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। अभी तो हम अपने चुने हुए सांसद और विधायक को ही वापस नहीं बुला सकते, जिन्हें भगवान ने इस संसार में भेज दिया, उनका तो भगवान ही मालिक है लेकिन आइंदा अब पैदा होने का सुख इतना आसान भी नहीं होगा ! First come first serve! दो के बाद वैक्सीन ख़त्म।

कुछ कथित सेलिब्रिटीज लिव इन रिलेशन में रहकर दिखावे के लिए ही सही, अनाथ बच्चों को गोद ले रहे हैं। जो पैदा हो गए हैं, उन्हें बेहतर जिंदगी नसीब हो सके इसलिए जनसंख्या नियंत्रण का पालन करते हुए संपन्न लोग भी अगर कुछ have not बच्चों को पालने का संकल्प ले लें, तो शायद सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी। पैदा तो हो गए, पैदा होने का सुख भी अगर उन्हें नसीब हो, तो क्या बुरा है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 739 ⇒ । गुड़ गोबर। ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “। गुड़ गोबर।।)

?अभी अभी # 739 ⇒ आलेख – । गुड़ गोबर। ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गुड़ – गोबर में अगर गुड़ का गोबर होना है तो प्यार में परिश्रम के बावजूद शिकस्त ही हाथ लगना है। एक समय था, जब करे कराए पर पानी फिर जाता था, आजकल लोग सीधे फ्लश चला देते हैं। रायता फैलाने में तो हम आजकल बहुत आगे निकल गए हैं।

अगर अंगूर को सुखाकर किशमिश और सड़ाकर शराब बनाई जा सकती है, तो गुड़ बेचारे ने ऐसा क्या बिगाड़ा है कि उसकी नियति गोबर होना है।

गूंगे का गुड़ होगा बेचारा, क्या बोले। वैसे आयुर्वेद में पुराने गुड़ का बहुत महत्व बताया गया है, नीबू का अचार और असली घी जितना पुराना होता है, उतना फायदेमंद होता है, लेकिन स्वास्थ्य के मान से आजकल सभी खाद्य पदार्थों की एक्सपायरी डेट होने लग गई है। ऐसे में गुड़ को गोबर होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।।

अनुवाद की अपनी समस्या है। शब्दानुवाद के साथ साथ अगर भाषानुवाद ना हो, तो अर्थ का अनर्थ होने से कोई नहीं रोक सकता। भाषा भाव को पकड़ती है, शब्द अर्थ को। बिमल मित्र एक बंगाली लेखक हुए हैं, जिनके कई उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद हुआ है। इतनी रोचक भाषा, किस्सागोही और घटनाओं का तारतम्य पाठकों को इतना बाँध लेता है, मानो लेखक स्वयं सामने मौजूद हो। बेगम मेरी बिस्वास, इकाई दहाई सैकड़ा, खरीदी कौड़ियों के मोल, और हां, साहब बीवी और गुलाम। इन सभी उपन्यासों का अनुवाद दिनेश आचार्य ने किया है, लेकिन वे बीच में कहीं नहीं हैं। बिमल मित्र ही आपके रूबरू हैं।

हमारे व्याकरण के मास्टर जी को अनुवाद का बड़ा शौक था। वे स्वयं wren के ग्रामर और Roget के थिसारस थे। उनके हाथ में कभी पुस्तक नहीं होती थी। साक्षात सरस्वती उनके मुख में विराजमान थी। बस बोल दिया, कल गुड़ गोबर का अंग्रेजी में अर्थ और एक वाक्य बनाकर लाना। बेचारे बच्चे डिक्शनरी में से jaggery और dung शब्द निकालते और वाक्य बनाते।

दूसरे दिन उनकी क्लास ली जाती। लो कर दिया न गुड़ गोबर !

Love’s Labour Lost अंग्रेजी नाटककार विलियम शेक्सपियर का एक सुखांत नाटक है। अंग्रेजी में सुख को कॉमेडी और दुख को ट्रेजेडी कहते हैं। उनकी एक और कॉमेडी का नाम है,

All is well that ends well.

वे यहीं नहीं रुकते। अपने सुखांत नाटकों का अंत भी As you like it नामक play से करते हैं। हमारा नाटक उनके लिए खेल तमाशा ही तो है।।

शेक्सपियर की पूरी कॉमेडी का सीधा प्रसारण तो नहीं हो सकता, लेकिन पर्दे के पीछे उसका आनंद अवश्य लिया जा सकता है। इसके लिए शेक्सपियर को पढ़ना जरूरी नहीं, बस अपने टॉयलेट के कमोड को ही उनकी कॉमेडी मान लेना है। क्योंकि वहां तो वैसे भी सब गुड़ गोबर ही होना है।

रात को बड़े प्यार से छप्पन में विजय चाट का पेटिस और खमण, और बाद में मधुरम स्वीट्स की रसमलाई ! और तो और मोनिका गैलेक्सी की आइसक्रीम भी कोई काम नहीं आई। सुबह सब खाया पीया निकल गया। हुआ न Love’s Labour Lost. चलो इतने दिनों की कब्जियत से छुटकारा तो मिला। शेक्सपीयर ने गलत नहीं कहा, All is well that ends well. अच्छा ही हुआ, करे कराए पर फ्लश जो फिर गया। As you like it. अब आपको जैसा भी लगे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #285 ☆ दर्द की इंतहा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख दर्द की इंतहा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 285 ☆

☆ दर्द की इंतहा… ☆

‘दर्द को भी आधार कार्ड से जोड़ दो/ जिन्हें मिल गया है दोबारा ना मिले’ बहुत मार्मिक उद्गार,क्योंकि दर्द हमसफ़र है; सच्चा जीवन-साथी है; जिसका आदि-अंत नहीं। ‘दु:ख तो अपना साथी है’ गीत की ये पंक्तियां मानव में आस्था व विश्वास जगाती हैं; मन को ऊर्जस्वित व संचेतन करती है। वैसे तो रात्रि के पश्चात् भोर,अमावस्या के पश्चात् पूर्णिमा व दु:ख के पश्चात् सुख का आना निश्चित है; अवश्यंभावी है। सुख-दु:ख दोनों मेहमान हैं और एक के जाने के पश्चात् ही दूसरा दस्तक देता है।

समय निरंतर अबाध गति से चलता रहता है; कभी रुकता नहीं। सो! जो आया है अवश्य जाएगा। इसलिए ऐ मानव! तू किसी के आने की ख़ुशी व जाने का मलाल मत कर। ‘कर्म-गति अति न्यारी/ यह टारे नहीं टरी।’ इसके मर्म को आज तक कोई नहीं जान पाया। परंतु यह तो निश्चित् है कि ‘जैसा कर्म करता,वैसा ही फल पाता इंसान’ के माध्यम से मानव को सदैव सत्कर्म करने की सीख दी गयी है।

अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अनिश्चित् है। परंतु भविष्य सदैव वर्तमान के रूप में दस्तक देता है। वर्तमान ही शाश्वत् सत्य है,शिव है और सुंदर है। मानव को सदैव वर्तमान के महत्व को स्वीकारते हुए हर पल को ख़ुशी से जीना चाहिए। चारवॉक दर्शन में भी ‘खाओ-पीओ,मौज उड़ाओ’ का संदेश निहित है। आज की युवा पीढ़ी भी इसका अनुसरण कर रही है। शायद! इसलिए ‘वे यूज़ एंड थ्रो’ में विश्वास रखते हैं और ‘लिव इन’ व ‘मी टू’ की अवधारणा के पक्षधर हैं। वे पुरातन जीवन मूल्यों को नकार चुके हैं,क्योंकि उनका दृष्टिकोण उपयोगितावादी है। वे अहंनिष्ठ क्षणवादी सदैव हर पल को जीते हैं। संबंध-सरोकारों का उनके जीवन में कोई मूल्य नहीं तथा रिश्तों की अहमियत को भी वे नकारने लगे हैं,जिसका प्रतिफलन पति-पत्नी में बढ़ते अजनबीपन के एहसास के परिणाम-स्वरूप तलाक़ों की बेतहाशा बढ़ती संख्या को देखकर लगाया जा सकता है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हैं,जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा उनके आत्मज भुगत रहे हैं। वे मोबाइल व मीडिया में आकण्ठ डूबे रहते हैं और नशे की लत के शिकार हो रहे हैं जिसका विकराल रूप मूल्यों के विघटन व सामाजिक विसंगतियों के रूप में हमारे समक्ष है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं,रिश्तों की अहमियत रही नहीं और अपहरण,फ़िरौती,दुष्कर्म व हत्या के हादसों में निरंतर इज़ाफा हो रहा है। चहुंओर संशय व अविश्वास का वातावरण व्याप्त है,जिसके कारण इंसान पल भर के लिए भी सुक़ून की साँस नहीं ले पाता।

दूसरी ओर अमीर-गरीब की खाई सुरसा के मुख की भांति बढ़ती जा रही है और हमारा देश इंडिया व भारत दो रूपों में विभाजित परिलक्षित हो रहा है। एक ओर मज़दूर,किसान व मध्यमवर्गीय लोग,जो दिन-भर परिश्रम करने के पश्चात् दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते और आकाश की खुली छत के नीचे अपना जीवन बसर करने को विवश हैं। दूसरी ओर बाल श्रमिक शोषण व बाल यौन उत्पीड़न का घिनौना रूप हमारे समक्ष है। एक घंटे में पांच बच्चे दुष्कर्म का शिकार होते हैं; बहुत भयावह व चिंतनीय स्थिति है। दूसरी ओर धनी लोग और अधिक धनी होते जा रहे हैं,जिनके पास असंख्य सुख-सुविधाएं हैं और वे निष्ठुर,संवेदनहीन,आत्मकेंद्रित व निपट स्वार्थी हैं। शायद! इसी कारण गरीब लोग दर्द को आधार-कार्ड से जोड़ने की ग़ुहार लगाते हैं,ताकि छल-कपट से लोग पुन: वे सुविधाएं प्राप्त न कर सके। उनके ज़हन में यह भाव दस्तक देता है कि यदि ऐसा हो जायेगा तो उन्हें जीवन में पुन: अभाव व असहनीय दर्द सहन नहीं करना पड़ेगा,क्योंकि वे अपने हिस्से का दर्द झेल चुके हैं। परंतु इस संसार में यह नियम लागू नहीं होता। भाग्य का लिखा निश्चित् होता है,अटूट होता है,कभी बदलता नहीं। सो! उन्हें इस तथ्य को सहर्ष क़ुबूल कर लेना चाहिए कि कृत-कर्मों का फल जन्म-जन्मांतर तक मानव के साथ-साथ चलता है और उसे अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए सुंदर भविष्य की प्राप्ति हेतू सदैव अच्छे कर्म करें ताकि भविष्य उज्ज्वल व मंगलमय हो सके।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अब तक 2192!. ✍☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अब तक 2192 !.✍️ ? ?

(दैनिक लेखन का सातवाँ वर्ष)

(ई-अभिव्यक्ति की ओर से इस साहित्यिक यात्रा के सहयात्री श्री संजय भारद्वाज जी को २१९२ साहित्यिक रचनाओं के सहयोग के लिए हृदय से आभार. यह इस यात्रा के मील का एक पत्थर है. इस कीर्तिमान के लिए — अभिनन्दन 💐🙏) 

आज 25 जुलाई है। इस दिनांक के साथ मेरे लेखकीय जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी जुड़ा हुआ है।

प्रसंग यह है कि लेखन करते हुए लगभग चार दशक से अधिक बीत चुके। उसमें गत आठ-नौ वर्ष से लिखना नियमित-सा रहा। कविता, लघुकथा, आलेख, संस्मरण, व्यंग्य और ‘उवाच’ के रूप में अभिव्यक्ति जन्म लेती रही। 15 जून 2019 से ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने ‘संजय उवाच’ को साप्ताहिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया। 

फिर संपादक आदरणीय बावनकर जी का एक पत्र मिला। पत्र में उन्होंने लिखा था, “आपकी रचनाएँ इतनी हृदयस्पर्शी हैं कि मैं प्रतिदिन उदधृत करना चाहूँगा। जीवन के महाभारत में ‘संजय उवाच’ साप्ताहिक कैसे हो सकता है?” 

संजयकोश’ में यूँ भी लिखना और जीना पर्यायवाची हैं। फलत: इस पत्र की निष्पत्तिस्वरूप 25 जुलाई 2019 से सोमवार से शनिवार ‘संजय दृष्टि’ के अंतर्गत ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने इस अकिंचन के ललित साहित्य को दैनिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया। रविवार को ‘संजय उवाच’ प्रकाशित होता रहा।

इस दैनिक यात्रा ने आज सातवें वर्ष में चरण रखा है।

आज पीछे मुड़कर देखने पर पाता हूँ कि इन  वर्षों ने बहुत कुछ दिया। ‘नियमित-सा’ को नियमित होना पड़ा। अलबत्ता नियमित दैनिक लेखन की अपनी चुनौतियाँ और संभावनाएँ भी होती हैं। नियमित होना अविराम होता है। हर दिन शिल्प और विधा की नई संभावना बनती है तो पाठक को प्रतिदिन कुछ नया देने की चुनौती भी मुँह बाए खड़ी रहती है। अनेक बार पारिवारिक, दैहिक, भावनात्मक कठिनाइयाँ भी होती हैं जो शब्दों के उद्गम पर कुंडली मारकर बैठ जाती हैं। विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि यह कुंडली, भीतर की कुंडलिनी को कभी प्रभावित नहीं कर पाई। माँ शारदा की अनुकम्पा ऐसी रही कि लेखनी हाथ में आते ही पथ दिखने लगा और शब्द पथिक बन गए।

अनेक बार यात्रा के बीच पोस्ट लिखी और भेजी। कभी किसी आयोजन में मंच पर बैठे-बैठे रचना भीतर किल्लोल करने लगी, तभी लिखी और भेजी। ड्राइविंग में कुछ रचनाओं ने जन्म पाया तो कुछ ट्रैफिक के चलते प्रसूत ही नहीं हो पाईं।

तब भी जो कुछ जन्मा, पाठकों ने उसे अनन्य नेह और अगाध ममत्व प्रदान किया। कुछ टिप्पणियाँ तो ऐसी मिलीं कि लेखक नतमस्तक हो गया।

नतमस्तक भाव से ही कहना चाहूँगा कि लेखन का प्रभाव रचनाकार मित्रों पर भी देखने को मिला। अपनी रचना के अंत में दिनांक और समय लिखने का आरम्भ से स्वभाव रहा। आज प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े 90 प्रतिशत से अधिक रचनाकारों ने अपनी रचना का समय और दिनांक लिखना आरम्भ कर दिया है। अनेक मित्रों ने इसका श्रेय दिया तो अनेक कंजूसी भी बरत गए। इतना अवश्य है कि  रेकॉर्डकीपिंग की यह आदत भविष्य में मित्रों को अपनी रचनाधर्मिता के पड़ाव खंगालने में सहायक सिद्ध होगी।

विनम्रता से एक और आयाम की चर्चा करना चाहूँगा। लेखन की इस नियमितता से प्रेरणा लेकर अनेक मित्र नियमित रूप से लिखने लगे। किसी लेखक के लिए यह अनन्य और अद्भुत पारितोषिक है।

आदरणीय भाई हेमंत बावनकर जी इस नियमितता के प्रथम कारण और कारक बने। ‘दक्षिण भारत राष्ट्रमत’ के सम्पादक श्रीकांत पाराशर जी विगत पाँच चार वर्ष से साप्ताहिक उवाच को बैंगलुरू और चेन्नई दोनों संस्करणों में स्थान दे रहे हैं। भिवानी से दैनिक ‘चेतना’ के सम्पादक श्रीभगवान वसिष्ठ जी भी साढ़े चार वर्ष से ‘उवाच’ और ‘दृष्टि’ दोनों स्तम्भ नियमित रूप से प्रकाशित कर रहे हैं। आप तीनों महानुभावों को हृदय की गहराइयों से अनेकानेक धन्यवाद। नियमित रूप से मेरे लेखन को पढ़नेवाले और अपनी प्रतिक्रिया देनेवाले पाठकों के प्रति आभारी हूँ। ‘आप हैं सो मैं हूँ।’ मेरा अस्तित्व आपका ऋणी है।

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© संजय भारद्वाज  

 अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 738 ⇒ ||•• गं ध ••|| ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – ||•• गं ध ••||।)

?अभी अभी # 738 ⇒ आलेख – ||•• गं ध ••|| ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

~~ smell ~~

आप सुगंध कहें या खुशबू, किसे महकता वातावरण पसंद नहीं। बात चाहे वादियों और फिज़ाओं की हो, अथवा गंधमादन पर्वत की, सुंदरता और मादकता को न तो आप परिभाषित कर सकते हैं, और न ही उसे किसी तस्वीर में उतार सकते हैं। किसी बदन की खुशबू और किसी गुलाब की महक किसी नुमाइश की मोहताज नहीं। कब ‘आंख ‘ सूंघ ले, और कब ” नाक ‘ देख ले, कुछ कहा नहीं जा सकता। एक सस्ता सा शेर भी शायद यही बात दोहरा रहा है ;

सच्चाई छुप नहीं सकती

बनावट के उसूलों से।

कि खुशबू आ नहीं सकती

कभी काग़ज़ के फूलों से।।

सभी प्राणियों में सूंघने की शक्ति होती है, किसी में कम, किसी में ज्यादा। जिस तरह लोग स्वाद के शौकीन होते हैं, उसी तरह कई लोग खुशबू के भी शौकीन होते हैं। कजरा अगर सुंदरता का प्रतीक है तो गजरा खुशबू का। रसिकों का क्या है, वे तो सुनने के भी शौकीन होते हैं ;

पायल वाली देखना,

यहीं तो कहीं दिल है ;

पग तले आए ना।।

रस और गंध का गुण धर्म राजसी है। स्वर्ग में राजसी सुख है, वैभव है, नृत्य और संगीत है। हम मंदिर में अपने इष्ट को पुष्प और गंध दोनों अर्पित करते हैं। धूप बत्ती और कर्पूर आरती का भी प्रावधान है। गंध से आसुरी शक्तियां पास नहीं फटकती। सुगंधित पदार्थों और जड़ी बूटियों से ही यज्ञ और हवन संपन्न होते हैं।

पुष्प समर्पयामि। गंधं समर्पयामि ! चित्त का शांत होना ही शांति का प्रतीक है।

सूंघने का विभाग नाक का है। एक विभाग के भी दो भाग हैं, जिनमें वेंटिलेटर्स लगे हैं। हमारे फेफड़ों में प्राणवायु का प्रवेश और कार्बन डाइऑक्साइड की निकासी भी तो इसी नाक से होती है। नस नाड़ियों का जाल हमारे शरीर का नेटवर्क है। सूर्य चंद्र नाड़ी का अनुपात शरीर को गर्म ठंडा रखता है। संत कबीर तो इड़ा पिंगला की बात करते करते सीधे सुषुम्ना यानी सहज समाधि तक पहुंच जाते हैं।।

यह हमारा शरीर भले ही हाड़ मांस का पुतला हो, लेकिन अगर किसी के बदन में खुशबू है तो किसी के शरीर में बदबू भी हो सकती है, क्योंकि हमारी प्रवृत्ति भी सात्विक, राजसी और तामसिक होती है तामसी पदार्थों के सेवन से बदन में खुशबू नहीं, बदबू ही आती है। जैसा अन्न वैसा मन ;

फूल सब बगिया खिले हैं

मन मेरा खिलता नहीं क्यों।

फूल तो खुशबू बिखेरें

मैं रहा बदबूऍं क्यों।।

हमारे ही शरीर में आभा भी है और ओज भी, जिसे विज्ञान की भाषा में aura कहते हैं। किसी के आने पर सजना, धजना, संवरना भी प्रसन्नता का ही द्योतक होता है। बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है। खुशी से हमारा चेहरा खिलता क्यों है, जब उदास होते हैं, तो मुरझाता क्यों है।

चमन में बहार है तो खुशबू है। जिस घर में महक और खुशबू जैसी बहनें हों, वहां तो बहार ही बहार है। किसी के पड़ोसी अगर मिस्टर गंधे हैं तो किसी के समधी श्री सुगंधी हैं। एक सुगंधा मिश्रा है, जो आज तक यह तय नहीं कर पा रही, कि वह एक अच्छी गायिका है या मिमिक्री आर्टिस्ट।।

अक्सर, जब सर्दी जुकाम हो जाता है, तो हमारी सूंघने की शक्ति काम नहीं करती। हम समझते हैं, रसोई में अभी दाल ही नहीं गली, जब कि दाल जलकर खाक हो चुकी होती है। पेट में जब चूहे कूदने लगते हैं, तो दूर किसी झोपड़ी से चूल्हे की आग में सिक रही रोटी की महक, छप्पन भोग को मात कर देती है।

हमारी माटी की गंध का भी जवाब नहीं। तपती गर्मी के बाद, जब बारिश की कुछ बूंदें, धरती पर पड़ती है, तो वह सौंधी सौंधी खुशबू, बड़ी प्यारी लगती है। नेकी ही खुशबू का झोंका है और बदी, असह्य बदबू।

षडयंत्र की बू सभी को आ जाती है लेकिन अच्छाई कभी अपना प्रचार नहीं करती। फूल कभी नहीं कहता, मुझे सूंघो, उसकी खुशबू चलकर आपके पास आती है। हमारा स्वभाव ही हमारी असली पहचान है, डियोड्रेंट और आर्टिफिशियल फ्रेगरेंस ( कृत्रिम सुगंध ) नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 252 ☆ उम्मीद को जाग्रत करने का पर्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना उम्मीद को जाग्रत करने का पर्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 252 ☆ उम्मीद को जाग्रत करने का पर्व

सावन मास सुहावन लागे । हरियाली के साथ भगवा रंग को धारण किये हुए श्रद्धा व विश्वास की शक्ति को काँधे पर लिए भक्त गंगा जल या नगर ,ग्राम में जो भी नदियाँ हैं उनके जल को काँवर  में भरकर बांस की छड़ी  जिसके दोनों ओर जल से भरे घड़े लटके रहते हैं ।

आस्था ,संस्कार की पूर्णता,ब्रह्मचर्य नियम का पालन, पद यात्रा, बम- बम भोले का  जाप करते हुए शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं ।

*

कांवड़िया चलते हैं आगे

भाव भावना भगवन जागे

भोले की भक्ति को धारे

बम बम बम का नाम पुकारे ।

*

भगवा वस्त्र धार कर रहते

शिव शंकर को गुरुवर कहते

जलाभिषेक करें  पावनता

बिगड़े काम सकल जन बनता ।।

*

बारिश की बूंदों में भींगते हुए, बिना रुके, कदम से कदम मिलाते हुए पूरे जुलूस के साथ, झांझ, मंजीरा, भजन, जयकारे, मंत्र जाप की अनुगूँज । महिलाएँ गोद में बच्चों को लिए, उँगली पकड़े, व सखी सहेलियों के साथ, पूरे परिवार, समाज के संग भोलेनाथ को मनाने शिव मंदिर पहुँचती हैं । यही सब तो  अपनी संस्कृति से जुड़ने व समझने के लिए मार्ग तैयार करता है।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर विशेष… वो भी क्या दिन थे… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर एक संस्मरणीय आलेख वो भी क्या दिन थे।)

☆ आलेख – राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर विशेष… वो भी क्या दिन थे… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

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राष्ट्रीय प्रसारण दिवस का इतिहास:

भारत में पहला रेडियो प्रसारण बॉम्बे स्टेशन से 23 जुलाई 1927 को किया गया था। तब स्टेशन का स्वामित्व इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी नामक एक निजी कंपनी के पास था।

सरकार ने 1 अप्रैल 1930 को प्रसारण का कार्यभार संभाला और इसका नाम बदलकर भारतीय राज्य प्रसारण सेवा (आईएसबीएस) कर दिया ।

यह शुरू में प्रायोगिक आधार पर था।  बाद में यह स्थायी रूप से 1932 में सरकारी नियंत्रण में आ गया।

8 जून, 1936 को भारतीय राज्य प्रसारण सेवा ऑल इंडिया रेडियो बन गई । 1956 में इसका नाम आकाशवाणी रखा गया।

वर्तमान में, आकाशवाणी दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण संगठनों में से एक है।

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(प्रसारण दिवस की सभी साथियों को बधाई। मुझे अपने स्कूल समय की एक रोचक घटना याद आ रही है जो मैं आपसे साझा करना चाहता हूं। – श्री अजीत सिंह)

एक रेडियो उद्घोषक ने रेलवे स्टेशन मंज़ूर करवा लिया… 

राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर, मुझे उस समय की याद आती है जब एक रेडियो उद्घोषक अपने गांव के लिए एक रेलवे स्टेशन मंजूर करवा सकता था । यह साल 1956 या 57 के आसपास की बात है।जब मैं छठी या सातवीं क्लास का स्कूल छात्र था ।

उस समय हरियाणा पंजाब राज्य का हिस्सा था। जिला करनाल  में सरकारी हाई स्कूल कैमला में हमारे शिक्षक ने हमें एक दिन पास के गांव कोहंड तक पैदल मार्च करने के लिए कहा, जहां एक मंत्री को एक जनसभा को संबोधित करना था।  हम यात्रा का आनंद लेने के लिए बहुत खुश थे और लगभग तीन किलोमीटर की दूरी कोई बड़ी बात नहीं थी।

रेल राज्य मंत्री श्री शाहनवाज कुछ समय बाद पंडित हिरदे राम के साथ आए, जो कि कोहंड गांव के रहने वाले आकाशवाणी दिल्ली के देहाती कार्यक्रम के एक लोकप्रिय कंपीयर थे।

अपने स्वागत भाषण में हिरदे राम ने रेलवे स्टेशन की मांग की और बदले में मंत्री ने मांग स्वीकार कर ली।  हम सभी ने ताली बजाई।  ऐसा लग रहा था कि हिरदे राम पहले से ही दिल्ली में मंत्री के साथ डील कर चुके थे।

एक दो महीने के बाद, हम फिर से कोहंड के लिए मार्च कर रहे थे जब पहली ट्रेन वहां रुकी थी। यह एक उत्सव का समय था। इसमें ग्रामीण बैंड बाजे के साथ शामिल हुए।  सरपंच और उसके आदमियों ने मिठाई से भरी  टोकरियां हर डिब्बे में डाली।  बर्फी का एक डब्बा स्टेशन मास्टर के लिए और दूसरा इंजन ड्राइवर के लिए था। पतासों के साथ हमने भी अपनी जेबें भरी थीं।

ट्रेन उस दिन करीब दस मिनट के लिए रुकी। स्टेशन मास्टर ने घोषणा की कि आगे से रेलगाड़ी का ठहराव केवल एक मिनट के लिए होगा ।

असल में, स्टेशन को ट्रैफिक की मात्रा के आधार पर परीक्षण के तौर पर शुरू किया गया था।  ट्रैफिक ज्यादा नहीं था।  स्थानीय पंचायत ने एक रास्ता तैयार किया: पहला, कोई भी बिना टिकट यात्रा नहीं करेगा और दूसरा, पंचायत निर्धारित न्यूनतम कोटा पूरा करने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रतिदिन रेलवे टिकट खरीदेगी।

कोहंड रेलवे स्टेशन अभी भी एक छोटा स्टेशन है।  जाहिर है, अब टिकटों की आवश्यक बिक्री को पूरा करने के लिए पर्याप्त ट्रैफिक है।   मुश्किल से एक या दो ट्रेनें वहां रुकती हैं।  पानीपत और करनाल के लिए यात्री यहां से ट्रेनें लेते हैं।

हमारे गांव में एक सामुदायिक रेडियो सेट था और लोग हर्षोल्लास के साथ देहाती कार्यक्रम सुनते थे। कभी कभी  कोई कहता सुनाई पड़ता कि साहब  के रूप में बोल रहा आदमी वही व्यक्ति है जिसने अपने गांव कोहंड के लिए रेलवे स्टेशन  मंजूर करा लिया था।

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जब मैं अस्सी के दशक में आकाशवाणी जम्मू में संवाददाता के तौर पर काम कर रहा था तो  एक सहयोगी ने मुझे एक श्रोता से मिली चिट्ठी दिखाई जिस पर पता लिखा था, “स्टेशन मास्टर, रेडियो कश्मीर, जम्मू” । अक्सर पत्र डायरेक्टर के नाम से आते थे। मैंने कहा इसमें श्रोता की कोई खास गलती नहीं है। अगर रेलवे स्टेशन  का मुखिया स्टेशन मास्टर हो सकता है तो रेडियो स्टेशन का मुखिया भी स्टेशन मास्टर क्यों नहीं हो सकता ?

हा हा!

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 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

26.01.2025

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 737 ⇒ घोड़ा, घास और यारी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घोड़ा, घास और यारी।)

?अभी अभी # 737 ⇒ आलेख – घोड़ा, घास और यारी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

घोड़ा घास से यारी नहीं करता ! घोड़े पर अक्सर सवारी की जाती है। आप गाय और कुत्ते की तरह घोड़े को नहीं पाल सकते। घोड़ा बिना घुड़सवार के शोभा नहीं देता। गाय और कुत्ता तो कोई भी रहम दिल इंसान पाल सकता है, घोड़े को पालने के लिए शारीरक बल के अलावा एक अस्तबल की भी आवश्यकता होती है।

युद्ध की कलाओं में घोड़े का विशिष्ट स्थान है। अश्वारोही सेना के बिना कोई भी युद्ध अधूरा होता था। महाराणा प्रताप हों, छत्रपति शिवाजी हों या फिर रानी लक्ष्मीबाई, घोड़ा ही इनकी पहचान थी। अश्व – विश्व में चेतक का नाम अमर है।।

फ़ौज में आज भी कैवेलरी यूनिट, अश्ववाहिनी सेना होती है। कर्फ्यू के वक्त कुछ बीएसएफ के जवान सड़कों पर मार्च करते देखे जा सकते हैं। कभी इंदौर शहर भी ताँगों का शहर हुआ करता था। आज शहर से घोड़ा और घास दोनों गायब हैं।।

घुड़सवारी अगर एक शौक है, तो घुड़दौड़ एक जुनून। मुम्बई का महालक्ष्मी रेस कोर्स घुड़दौड़ के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ घोड़ों पर दाँव लगाया जाता है। यह एक तरह का जुआ है, जिसमें कई रईस अपनी दौलत लुटा बैठते हैं। पुरानी हिंदी फिल्मों में कई राय साहब बने चरित्र अभिनेता किसी नंबर के घोड़े पर दाँव लगाकर अपना सब कुछ हार जाते हैं, और दिल के दौरे में अपनी जान गँवा बैठते हैं। तब हीरो रायसाहब की लड़की और माँ को सहारा देता है। अंग्रेजों का यह एक प्रिय खेल था, इसलिए हर छोटे-बड़े शहर में रेस कोर्स रोड और पोलोग्राउंड आज भी देखे जा सकते हैं।

कभी घोड़े तांगा और बग्घी में जोते जाते थे। महाभारत काल में कृष्ण जिस अर्जुन के रथ के सारथी बने थे, उसमें भी घोड़े ही शोभायमान होते थे। जब घोड़े को घास मिलनी बंद हो गई, तो ताँगों का स्थान सायकल रिक्शा और ऑटो रिक्शा ने ले लिया। एक आम इंसान ने भले ही ज़िन्दगी में कभी कोई घोड़ा न खरीदा हो, सोते वक्त वह अक्सर घोड़े बेचकर ही सोता है।।

जो लोग धंधे-व्यवसाय को यारी से अधिक महत्व देते हैं, वे दोस्ती के लिहाज में एक पैसा नहीं छोड़ते। उनका यह तकिया कलाम होता है, भैया ! घोड़ा घास से यारी करेगा, तो खायेगा क्या ? उन्हें यारी से ज़्यादा घास प्यारी है। उसूल अपना अपना।

अब तो घोड़ा बस बारात में देखा जा सकता है। माफ़ कीजिये, वह भी शायद घोड़ी ही होती है। घोड़ी पे हो के सवार … गाना चला करता है। दूल्हे राजा घोड़े पर बैठे हैं। एक रस्म में घोड़े को आग्रहपूर्वक एक पात्र में भीगी हुई चने की दाल खिलाई जाती है। बस शायद यही एक मौका होता है, जब घोड़ा घास से नहीं, चने की दाल से भी यारी कर लेता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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