(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “हरी भरी धरती- नववर्ष का खास संदेश…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २७१ ☆हरी भरी धरती- नववर्ष का खास संदेश… ☆
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नव वर्ष आया द्वार पे
आशा की चादर ओढ़कर।
बीते दुखों छोड़कर
बंधन कटीले तोड़कर।।
*
हर दिन जगे विश्वास ऐसा,
भोर होवे प्रेममय ।
जीवन पथिक बनते हुए
होगी सदा जय की विजय ।।
*
उम्मीद की डोरी पकड़
हाथों में थामें फूल को।
पहला कदम रखते ही जागे
भूलिए मत मूल को ।।
*
तय किया जब लक्ष्य पाना
वर्ष नव उत्कर्ष हो ।
गूँजती मंगल ध्वनि तो
क्यों न सबको हर्ष हो।।
***
नया वर्ष केवल कैलेंडर न बदले हमारी आदतें भी हरी हो जाएँ। पौधे लगाना,पेड़ बचाना यही सच्चा संकल्प बन जाए।जब धरती मुस्कुराएगी,तभी मन को सुकून आएगा।प्रकृति की रक्षा करेंगे हम,तो भविष्य सुरक्षित होगा।आइए इस वर्षहर श्वास में हरियाली,हर कर्म में प्रकृति,और हर दिन ग्रीन मोटिवेशन अपनाएँ।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “किताबी कीड़ा…“।)
अभी अभी # ८७४ ⇒ आलेख – किताबी कीड़ा श्री प्रदीप शर्मा
जो कीड़ा क़िताब चाट जाए, उसे किताबी कीड़ा कहते हैं। इंसानों में यह काम अगर एक बुद्धिजीवी नामक प्राणी करता है तो कीड़ों मकोड़ों में यह दायित्व एक दीमक निभाती है। अगर हमें विरासत में मिले अथाह ज्ञान रूपी सागर को सुरक्षित रखना है तो हमें उसे इन दोनों से बचाकर सुरक्षित रखना होगा।
ज्ञान के हमारे तीन आगार
हैं, श्रुति, स्मृति और पुराण।
सृजन एक सतत प्रक्रिया है, जिसे जब सहेजा जाए तो यह ग्रंथ का आकार ले लेती है। हमारे यहां पुस्तकों में सरस्वती का वास होता है, इसलिए इन्हें विद्या भी कहते हैं। पुस्तकों की ही तरह विद्यालय भी ज्ञान के आगार होते हैं और जो हमें ज्ञान प्रदान करते हैं उन्हें हम शिक्षक, अध्यापक अथवा गुरु।।
करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। कुछ लोग बुद्धि का उपयोग ज्ञान प्राप्त करने में लगा देते हैं, बाकायदा किसी नालंदा अथवा तक्षशिला विश्वविद्यालय से विधिवत ज्ञानार्जन प्राप्त कर, संचित ज्ञान का सदुपयोग करते हैं, पठन, पाठन करते हैं तथा साहित्य सेवा करते हैं तो कुछ केवल बुद्धि के स्तर पर गोष्ठी, वाद विवाद और बहस में अपने ज्ञान की बौद्धिक उल्टी करा करते हैं। उनका साहित्य वादी प्रतिवादी हो जाता है। कहीं पूरब पश्चिम, तो कहीं वाम, दक्षिण हो जाता है।
ऐसे लोग पहले किताबों को चाटते हैं और बाद में कॉफी हाउस की बहस और गोष्ठियों में श्रोताओं का दिमाग चाटते हैं। इस प्रजाति में ऐसे कवि, लेखक और साहित्यकार प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो अपने आपको बुद्धिजीवी कहलाना पसंद करते हैं। एक समय था, जब इनका एक गणवेश भी होता था। आँखों पर मोटा चश्मा, खिचड़ीनुमा दाढ़ी, ढीला ढाला कुर्ता पायजामा, जो कालांतर में फटी जीन्स में परिवर्तित हो गया। जहां कभी एक झोला और डायरी पेन था, वहां आजकल एक अदद एंड्रॉयड हो गया। कल का बुद्धिजीवी भी आजकल डिजिटल हो गया।।
किताबों से दीमक का भी वही रिश्ता है, जो एक बुद्धिजीवी का ! वह भी जब किताबें चाटती हैं, तो कोई कसर नहीं छोड़ती, पूरी ही चाट जाती है। लेकिन किसी बुद्धिजीवी की तरह हमारा दिमाग नहीं चाटती। दीमक से किताबों को भले ही खतरा हो, किसी इंसान को नहीं।
हमारे यहां पुस्तकों और ग्रंथों की पूजा होती है। भागवत, पुराण, गीता, रामायण और गुरुग्रंथ साहब हमारे धार्मिक ग्रंथ हैं, जिन्हें हमने ईश्वर का ही दर्जा दिया हुआ है। व्यासपीठ और धार्मिक स्थलों पर इनका पारायण एक उत्सव का स्वरूप ले लेता है जिसे ज्ञान यज्ञ की संज्ञा दी गई और जहां सतत ज्ञान की गंगा प्रवाहित होती रहती है।।
हमारे सत्साहित्य को हमें दीमक और बुद्धिजीवी इन दोनों से बचाकर रखना है। दीमक अगर किताबों को खोखला करती है तो एक बुद्धिजीवी लोगों के दिमागों को खोखला करता है। हवा हो गए वो दिन, जब लोग बुद्धिजीवी को इज्जत की निगाह से देखते थे। क्या दिन थे वे भी, जब कॉफी की भाप और सिगरेट का धुआं एक साथ समां बांधता था। अब बेचारा इंसान फिक्र को धुएं में उड़ा भी नहीं सकता। कितनी कुंठा, कितना संत्रास, और बेचारे नित्शे, काफ्का और कामू ! आखिर गम तो गलत करना ही पड़ेगा। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ..!!
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नरसिंह भगत…“।)
अभी अभी # ८७३ ⇒ आलेख – नरसिंह भगत श्री प्रदीप शर्मा
नाथ मैं थारो ही थारो ! अवतारों और चमत्कारों के इस देश में शायद ही कभी ऐसा वक्त आया हो, जब ईश्वर ने अपना कोई ना कोई अवतार संकट की घड़ी में ना भेजा हो। दुष्टों के लिए तो स्पेशल अवतार होते ही हैं, यहां तो भक्त भी भगवान का रूप धारण कर अवतरित हो जाते हैं। फिर उनके भी भक्त पैदा हो जाते हैं और इस तरह आस्था और संस्कार की यह चैनल, टीवी पर २४ घंटे चला करती है।
याद कीजिए भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद को बचाने, और दुष्ट, अधर्मी राजा हिरणयकश्यप का वध करने के लिए खंभे में से प्रकट हो नरसिंह अवतार लिया था। भक्त कभी किसी का वध नहीं करता, प्रतिरोध नहीं करता। वह बस अपने आराध्य के प्रति शरणागति हो जाता है। नाथ मैं थारो ही थारो और खुद अकर्मा नरसिंह भगत होकर अपने ठाकुर जी को यहां से वहां भगाया करता है।।
उसने कहीं सुन रखा है, हरि है हजार हाथ वाला, इसलिए अपनी नानी बाई के मायरे के वक्त भी वह हाथ पांव नहीं मारता। बस सब कुछ सांवरिया सेठ के भरोसे छोड़ देता है। मरता क्या न करता। ठाकुर जी को भाई बनकर आना पड़ता है और अपने भक्त की लाज बचानी पड़ती है।
डाकोर जी के नरसिंह भगत हों अथवा बंगाल के चैतन्य महाप्रभु, आज से पांच सौ वर्ष पूर्व ना केवल गुजरात, अपितु महाराष्ट्र में भी इन संतों का बोलबाला था। संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव, जना बाई और स्वामी समर्थ तो ठीक, शिरडी के साई बाबा के यहां तो आज भी भक्तों का दरबार लगा रहता है। चमत्कार को नमस्कार ही आगे चलकर आस्था को अंध विश्वास में बदल देता है और संतत्व ढोंग और पाखंड में तब्दील हो जाता है।
आशाराम, निर्मल बाबा से होता हुआ यह साहित्य के चेतन भगत और राजनीति के बगुला भगत तक जगह बना लेता है।।
जहां भक्त है, वहां भगवान है।
या जहां भगवान है, वहां भक्त है। कलयुग में पैसा ही भगवान है। भक्ति की सारी शक्ति कलयुग में सत्ता में समा जाती है। हम भारतीय अपने भक्ति के संस्कार नहीं छोड़ते। हमने अपने अपने इष्ट और भगवान बना रखे हैं। अगर वे प्रसन्न, तो हम प्रसन्न। भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई। चेतन भगत हैं हम।
सच्चे संत और भक्त को संसार की चाह नहीं होती। संसार उसकी परीक्षा पर परीक्षा लिया करता है। मीरा को विष का प्याला भेजा जाता है, वह विष भी अमृत हो जाता है और एक आज के संत हैं जिन्हें फूड पॉइजनिंग हो जाता है। कोई राष्ट्र संत आत्म हत्या कर लेता है तो कोई आशाराम जेल चला जाता है। न नर, न सिंह, न भगत न भगवान, आज केवल एक इंसान ही मिल जाए किसी के अंदर, तो वहीं कृष्ण की राधा है, वहीं कृष्ण की मीरा है, वहीं चैतन्य महाप्रभु और वहीं नरसिंह भगत है।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ताइवान के अमरूद…“।)
अभी अभी # ८७२ ⇒ आलेख – ताइवान के अमरूद श्री प्रदीप शर्मा
अगर आपने बागपत के खरबूजों की तारीफ सुनी है,तो हमने भी बड़वानी के पपीते खाए हैं। आज अगर लोकल फॉर वोकल और स्वदेशी का जमाना है,तो हमारा जमाना तो पूरा देसी ही था। मांडव की खिरनी और फलबाग के जाम अगर देसी थे तो बड़वाह का चिवड़ा और राऊ की कचौरी भी अपनी ही तो थी।
सूरज की पहली किरण के साथ ही,दूध,अखबार,अटाला और सब्जी वाला मोहल्ले में एक साथ दस्तक देते थे। उनके सभी लोकल काम, वोकल ही तो होते थे। सूर्योदय से पहले ही सबसे पहला संगीत सड़क पर झाड़ू बुहारने का गूंजा करता था। और फिर शुरू होता था बिग बास्केट और ज़ोमेटो की जगह ठेलों पर ताजी सब्जियों, और फलों का तांता,अपने अपने सुर और राग में। एक ही सांस में सभी सब्जियों के नाम। तेरी आवाज ही पहचान है। फेरी वालों की पहचान आवाज से ही होती थी।
दोपहर होते होते तो एक बूढ़ी लेकिन कड़क आवाज हींग वाले की भी सुनाई दे जाती थी।।
तब तो टमाटर भी देसी ही आते थे और नींबू भी कागदी,बिल्कुल पीयर्स साबुन की तरह पारदर्शी। फिर शुरू हुआ संकर मक्का और हाइब्रीड का दौर ! टमाटर भी देसी और सलाद के आने लगे,बिना बीज के,बिना रस,स्वाद और खटाई के। बीज से लोगों को पथरी होने लगी।
रासायनिक खाद ने छिलकों में छोड़िए,पूरे फलों में ही जहर भर दिया।
पहले अंगूर खट्टे और बीज वाले होते थे। आज उन्नत अंगूर देखिए बिना बीज वाले,लंबे लंबे,नासिक वाले। आज आप कौन से संतरे खा रहे हैं,आप ही जानें। हम तो नागपुरी संतरों की बात कर रहे हैं।।
पपीते की जगह तो कब से ताइवान के पपीते ने ले रखी है, नासपाती और अमरूद ने मिलकर एक अलग ही खिचड़ी पका ली। केले समय पूर्व पकने के चक्कर में अपना स्वाद और खुशबू,सब खो चुके हैं। करते रहिए छींटाकशी,बाजार में छींटे वाले केले कहीं नजर नहीं आएंगे।
इस बार तो देसी भुट्टो के लिए भी तरस गए। यह कैसा स्वदेशी और लोकल फॉर वोकल, हर जगह अमरीकन भुट्टे का ही बोलबाला। जो किसान बोएगा,वही तो बाजार में उपलब्ध होगा।।
बदलते मौसम के साथ फलों की भी बहार आती है। एकाएक पूरे बाजार में ताजे ताजे,बड़े बड़े अमरूदों की बहार आ गई। अमरूद किसकी कमजोरी नहीं। एक अमरूद रोज,an apple a day, का ही काम करता है,क्योंकि इसके बीज आंतों की सफाई करते हैं और इसे शुगर वाले मरीज भी खा सकते हैं।
लेकिन हाय री किस्मत,इस बार हमें अमरूद भी ताइवान के ही हाथ लगे। हम अमरूदों की खुशबू पहचानते हैं। खुशबू तेरे बदन सी,किसी में नहीं नहीं ! लेकिन पहली बार उस ताइवानी अमरूद की शक्लो सूरत और बाहरी सुंदरता पर मर मिटे। अच्छा हरा भरा,मोटा ताजा,मुंह में पानी लाने वाला।।
हमें न जाने क्यों ऐसे वक्त पर बर्नार्ड शॉ याद आ जाते हैं। जो चाहते हो,वह पा लो,वर्ना जो पाया है,उसे ही चाहने लग जाओगे। अरहर और मूंग की दाल भी आजकल हमें आकार में छोटी नजर आने लगी है,बड़ी मांगो तो स्वाद और खुशबू गायब। अब तो बस,जो मिल गया,उसी को मुकद्दर समझ लिया। मैं स्वाद,खुशबू और गुणवत्ता के साथ समझौता करता चला गया।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५९ ☆ देश-परदेश – पशु बनाम परिवार प्रेम ☆ श्री राकेश कुमार ☆
पशु प्रेम और पालतू पशु प्रेम के मायने अलग है। समाज में कुछ लोग पशु प्रेमी होते हैं। दुसरी तरफ कुछ लोग पालतू पशु प्रेमी श्रेणी में आते हैं।
वर्तमान में जब मानव अपने परिवार, समाज और यहां तक की अपनी मातृ भूमि से भी अधिक प्यार अपने पालतू पशु को करने लग गया हैं।
पूर्व में लोग पालतू पशु शौकिया तौर से पाला करते थे। आज लोग पालतू पशु सोशल मीडिया के लिए भी पाल रहें हैं। परिवार और अपनों से दूरी बढ़ा कर पालतुओं से नजदीकियां बन रहीं हैं।
पालतू पालक बनना कोई गलत बात नहीं हैं, लेकिन परिवार और समाज की उपेक्षा करना भी किसी भी एंगल से अच्छा नहीं कहा जा सकता हैं। इससे बेहतर तो पशु प्रेमी लोग हैं।
मानव योनि में जन्म लेकर अपने ही समाज के उत्थान में योगदान ना कर, सिर्फ पालतू पशुओं का कल्याण करना, कभी भी उचित नहीं माना जाएगा।
आजकल लोग मां और बाप को बुढ़ापे में लावारिस छोड़ अपने पालतू पशुओं को अपना रहें हैं। कुछ युवा दंपती तो हद पार कर, अपना परिवार भी नहीं बना रहें हैं, जीवन का सब कुछ पालतू को समर्पित कर रहे हैं। इसी क्रम में कुछ युवा विवाह जैसी पवित्र संस्था के बंधन से मुक्त रह कर सृष्टि को ही समाप्त करने की मुहिम में योगदान कर रहें हैं।
समाज को भी सोचना होगा कि युवा पीढ़ी ऐसे कदम उठाने के लिए क्यों अग्रसर हो रही हैं।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३१७ ☆ संतुलन…
मुंबई में हूँ और सुबह का भ्रमण कर रहा हूँ। यह इलाका संभवत: ऊँचे पहाड़ को काटकर विकसित किया गया है। नीचे समतल से लेकर ऊपर तक अट्टालिकाओं का जाल। अच्छी बात यह है कि विशेषकर पुरानी सोसायटियों के चलते परिसर में हरियाली बची हुई है। जैसे-जैसे ऊँचाई की ओर चलते हैं, अधिकांश लोगों की गति धीमी हो जाती है, साँसें फूलने लगती हैं। लोगों के जोर से साँस भरने की आवाज़ें मेरे कानों तक आ रही हैं।
लम्बा चक्कर लगा चुका। उसी रास्ते से लौटता हूँ। चढ़ाव, ढलान में बदल चुका है। अब कदम ठहर नहीं रहे। लगभग दौड़ते हुए ढलान से उतरना पड़ता है।
दृश्य से उभरता है दर्शन, पार्थिव में दिखता है सनातन। मनुष्य द्वारा अपने उत्थान का प्रयास, स्वयं को निरंतर बेहतर करने का प्रवास लगभग ऐसा ही होता है। प्रयत्नपूर्वक, परिश्रमपूर्वक एक -एक कदम रखकर, व्यक्ति जीवन में ऊँचाई की ओर बढ़ता है। ऊँचाई की यात्रा श्रमसाध्य, समयसाध्य होती है, दम फुलाने वाली होती है। लुढ़कना या गिरना इसके ठीक विपरीत होता है। व्यक्ति जब लुढ़कता या गिरता है तो गिरने की गति, चढ़ने के मुकाबले अनेक गुना अधिक होती है। इतनी अधिक कि अधिकांश मामलों में ठहर नहीं पाता मनुष्य। मनुष्य जाति का अनुभव कहता है कि ऊँचाई की यात्रा से अधिक कठिन है ऊँचाई पर टिके रहना।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, विषयभोगों के पीछे भागने की अति, धन-संपदा एकत्रित करने की अति, नाम कमाने की अति। यद्यपि कहा गया है कि ‘अति सर्वत्र वर्ज्येत’, तथापि अति अनंत है। हर पार्थिव अति मनुष्य को ऊँचाई से नीचे की ओर धकेलती है और अपने आप को नियंत्रित करने में असमर्थ मनुज गिरता-गिरता पड़ता रसातल तक पहुँंच जाता है।
विशेष बात यह है कि ऊँचाई और ढलान एक ही विषय के दो रूप हैं। इसे संदर्भ के अनुसार समझा जा सकता है। आप कहाँ खड़े हैं, इस पर निर्भर करेगा कि आप ढलान देख रहे हैं या ऊँचाई। अपनी आँखों में संतुलन को बसा सकने वाला न तो ऊँचाई से हर्षित होता है, न ढलान से व्यथित। अलबत्ता ‘संतुलन’ लिखने में जितना सरल है, साधने में उतना ही कठिन। कई बार तो लख चौरासी भी इसके लिए कम पड़ जाते हैं।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रै दा स…“।)
अभी अभी # ८७१ ⇒ आलेख – रै दा स श्री प्रदीप शर्मा
दासत्व अथवा दास प्रथा अगर अभिशाप है,मानवता पर कलंक है तो दासबोध अथवा दास्य भाव भक्ति भाव की सर्वोच्च अवस्था है जहां केवल सूरदास,तुलसीदास और रैदास जैसे भक्त शिरोमणि ही पहुंच पाते हैं। आज के युग में भी मोहनदास जैसे व्यक्ति पैदा हुए हैं जिनके भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।
हम जिस रैदास की बात करने जा रहे हैं,वह एक सीधा सादा,विनम्र लेकिन मेहनती मोची था,जो सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे तक कोर्ट कंपाउंड के बाहर,महात्मा गांधी मार्ग पर,गुमटियों की आड़ में जूते चप्पलों की मरम्मत और पॉलिश से अपनी जीविका चलाता था।।
आज का महानगर इंदौर,कभी गुमटियों का शहर था। गुमटी एक चलित व्यावसायिक प्रतिष्ठान था,जिसमें पहले पहिए लगे रहते थे। ठेलों और गुमटियों से पहले अतिक्रमण किया जाता था, बाद में इन्हें हटाकर और कहीं बसाया जाता था। महात्मा गांधी मार्ग स्थित गुरुद्वारे के आगे एक समय में केवल लोअर कोर्ट और गांधी हॉल था जिसे पहले टॉउन हॉल कहा जाता था। आज का शास्त्री ब्रिज तब अस्तित्व में नहीं था।
कोर्ट कंपाउंड के बाहर तब नगर निगम ने स्थायी गुमटियों का निर्माण कर दुकानदारों को किराए पर देना शुरू किया जिनमें चश्मा पेन,गोली बिस्किट की दुकानें,टेलरिंग व्यवसायी, कागज के हार फूल और कपड़ों के व्यापारी शामिल थे। रैदास सुबह सवेरे आता,दुकानदारों के चप्पल जूते मांगकर ले जाता,और पॉलिश करने के बाद वापस कर जाता।
उसके चेहरे के दीन भाव को देख भक्त रैदास का स्मरण हो आता। उसके चेहरे से हमेशा विनम्रता टपकती रहती थी। वह बहुत कम बोलता था और संकोची स्वभाव का था। वह किसी दुकानदार से अपना मेहनताना नहीं मांगता था। अगर पूछो तो हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता था,मानो कह रहा हो, जो आपकी मर्जी !
उसके इसी व्यवहार के कारण कई ग्राहक और आगंतुक भी समय का सदुपयोग करते हुए रैदास से अपना बूट पॉलिश करवा लिया करते थे। दो पैसे और एक आने की पॉलिश के सहारे वह अपने परिवार का पेट पालता था। हां, जूते चप्पल की मरम्मत से कुछ उसकी किस्मत की मरम्मत भी ज़रूर हो जाती होगी लेकिन उसके चेहरे पर संतुष्टि का भाव उसका नूर था,जो उसे आम इंसान से अलग बनाए रखता था।
जन्म और कर्म से कोई पेशा अथवा इंसान बड़ा अथवा छोटा नहीं होता। हम जब छोटे होते हैं,तो इन छोटी छोटी घटनाओं पर गौर नहीं कर पाते और जब तक हम बड़े होते हैं,ये किरदार हमारी ज़िंदगी से बाहर हो जाते हैं। लोभ,लालच और स्वार्थ की इस दुनिया ने गरीब को लालची और बेईमान बना दिया है। शान शौकत और दिखावे की इस दुनिया में कल के रैदास के लिए कोई जगह नहीं है।।
कुछ दिन पहले मेरे पुराने जूते में कुछ समस्या हुई तो फुटपाथ पर बैठे आज के रैदास पर अचानक नजर पड़ी। वह मोटरसाइकिल से उतरा ही था जीन्स और कैप में मुझसे अच्छा सजा धजा, अप टू डेट। जब उसने अपना स्थान ग्रहण कर लिया तब ही विश्वास हो पाया कि ये सज्जन आज के रैदास अर्थात जूता सुधारक हैं।
उन्होंने बड़े अदब से बात की ! पहले हमें देखा,फिर हमारे जूते को। और आत्म विश्वास से कह दिया, जूता तो खैर गया हुआ है,लेकिन मैं इसे फिलहाल पहनने लायक बना देता हूं। केवल पचास रुपए के पारिश्रमिक में,पंद्रह मिनिट की मोहलत में,हमारी पादुका का कायाकल्प आखिर हो ही गया। बीच बीच में आज के रैदास के फोन की घंटियां भी बजती रहीं,ज़रूरी बातें भी होती रहीं। मैं सोचता रहा,कहां कल का भक्त रैदास, और कहां आज का एडिडास (Adidas)।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बड़े दिल वाला…“।)
अभी अभी # ८७० ⇒ आलेख – बड़े दिल वाला श्री प्रदीप शर्मा
अभी जाड़े का वर्ष का सबसे छोटा दिन गुज़र गया। बड़ा दिन भी करीब है। लेकिन मेरा दिल बहुत छोटा होता जा रहा है। न जाने क्यों हम छोटे दिनों को बड़ा दिन कहते हैं। छोटे दिल वाले होते हुए भी बड़े दिल वाला होने का नाटक करते हैं।
दिन का लंबा होना और छोटा होना तो समझा जा सकता है ! गर्मी में दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं और सर्दियों में दिन छोटे और रातें बड़ी हुआ करती हैं। लेकिन इंसान का दिल एक ही शक्ल का होता है, न बड़ा न छोटा। फिर भी किसी को बड़े दिल वाला और किसी को तंग दिल इंसान भी कहा जाता है। ।
दिल पर या तो शायरी होती है
या फिर डॉक्टर की रिसर्च ! दिन भर बहस हो सकती है,लेकिन दिन पर हम बातें कम ही करते हैं। दिल पर दिन भर बातें हो सकती हैं,लेकिन दिन पर हमने कभी दिल भर के बातें शायद ही कभी की हों।
दिल का दर्द रात को भी उठ सकता है। दिन के दर्द पर शायद ही किसी ने रात भर चर्चा की हो। सभी जानते हैं दिल की ही तरह,दिन भी सिर्फ बड़ा-छोटा ही नहीं, अच्छा-बुरा होता है। कहने वाले तो यहाँ तक कह गए, कि दिन बुरे होते हैं, हालात बुरे होते हैं, आदमी तो बुरा नहीं होता। ।
आप मानें या न मानें ! खुश हों, या न हों। बड़ा दिन तो आकर ही रहेगा। आपके दिन अच्छे चल रहे हों, या बुरे। दिल में आपके उत्साह,उमंग हो,या न हो। आप दिन को बड़ा मानते हों या न हों। 25 दिसंबर तो बड़ा दिन है, और बड़ा ही रहेगा। कल ही किसी ने मुझे marry Christmas कह दिया। अंग्रेज़ी में marry और merry बहुत कंफ्यूज करते हैं। मैंने फिर भी उन्हें धन्यवाद दे दिया।
एक हफ्ते बड़े दिनों की छुट्टी रहती है। महानगर की होटलें और मॉल्स दिन रात जगमगाएँगे। लोग हँसेंगे, नाचेंगे, खुशियाँ मनाएंगे। जो बड़े दिन को अपना दिन नहीं मानते,वे दिल मसोसकर रह जाएँगे। सबकी खुशी में जो खुश रहना सीख लेते हैं, जिनका दिल उदार है,बड़ा है,वे ही बड़ा दिन मनाएंगे। ।
मैं भी अपने दिल के दर्द को छुपाकर, बड़े दिल वाला बनकर, बड़े दिन का स्वागत करूँगा। Merry x-mas ! सबको बड़ा दिन, दिल से मुबारक…!!!
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०३ ☆
☆ पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव… ☆
‘संस्कृति/ जो सुसंस्कृत करती है हमें/ धरोहर हमारे देश की/ जिसके सम्मुख नतमस्तक विश्व/ ज्ञानोदय रूपी सूर्योदय हुआ/ सबसे पहले यहां/
ज्ञान रुपी रश्मियाँ/ फैली इसके प्रांगण में/ अपनाया दूसरे देशों ने/ हमारी संस्कृति को/ पहुंचे उन्नति के शिखर पर वे।’ 2007 में प्रकाशित काव्य-संग्रह अस्मिता की उपरोक्त पंक्तियां भारतीय संस्कृति के स्वरूप, महत्ता व उज्ज्वल रूप को दर्शाती हैं। संस्कृति हमेशा सुसंस्कारों से सिंचित करती है और ज्ञान रूपी सूर्योदय भी सबसे पहले भारत में होता है। ऋतु-परिवर्तन, तीज-त्योहार, अतिथि-सत्कार आदि हमारी संस्कृति की विशेषताएं हैं। ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा/ जहां पहुंच अनजान क्षितिज को/ मिलता एक सहारा।’ हमारा देश महान् है। यहां का आतिथ्य, पारस्परिक स्नेह, सौहार्द व त्याग क़ाबिले-तारीफ़ है। हम अजनबी लोगों को अपना बनाने में पारंगत है। अहिंसा परमोधर्म, मूक जीवों के प्रति करुणा भाव, हमारी संस्कृति के मुख्य आकर्षण हैं। हम सभी धर्मों में आस्था रखते हैं। जाति-पाति भेदभाव से हम बहुत ऊपर हैं। हम में प्रेम व समर्पण की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है।
रामचरितमानस में राम, लक्ष्मण, सीता, उर्मिला, भरत, शत्रुघ्न आदि सभी पात्रों का त्याग स्तुत्य है। दधीचि का अपनी हड्डियों का दान देना श्लाघनीय है। हम किसी प्राणी को आपदा में देखकर उसके रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग को सदैव तत्पर रहते हैं। क्षमा भाव हमारे अंतर्मन में कूट-कूट कर भरा है। जैन धर्म में क्षमापर्व इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिए दिया गया निष्काम कर्म का संदेश आज भी अनुकरणीय है। इसमें माया-मोह के बंधनों से ऊपर उठने का मार्ग दर्शाया गया है।
‘ब्रह्म सत्यम्, जगत मिथ्या’ का भाव सर्वोपरि है अर्थात् ब्रह्म के अतिरिक्त संसार में सब मिथ्या है। परंतु वह माया के कारण सत्य भासता है। ‘यह किराए का मकान है/ कौन कब तक ठहर पाएगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे! खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘यह दुनिया है/ दो दिन का मेला/ हर शख्स यहां है अकेला/ तन्हाई में जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ और ‘एकला चलो रे’ का संदेश जनमानस में समाया हुआ है।
भगवत् गीता को मैनेजमेंट गुरु के रूप में विभिन्न देशों में पढ़ाया जाना उसकी उपयोगिता व उपादेयता को सिद्ध करता है। इसलिए भारत विश्व गुरु कहलाता था। परंतु धीरे-धीरे हम अपनी संस्कृति से दूर होते चले गए, जिसके परिणाम-स्वरुप जीवन-मूल्यों का निरंतर पतन होता गया। रिश्तों में सेंध लग गई तथा अविश्वास के कारण गया रिश्तो में खटास उत्पन्न हो गई। दिलों में घृणा का भाव पसरने लगा। सब अपने-अपने द्वीप में कैद होकर रह गए। संबंध- सरोकार समाप्त हो गए। अपने, अपने बन अपनों पर घात लगाने लगे। दूसरे शब्दों में पीठ में छुरा घोंपने लगे और असहिष्णुता बढ़ती गई हम आत्मकेंद्रित होते गए तथा स्व-पर व राग- द्वेष ने दिलों में आशियाँ बना लिया। चारवॉक दर्शन के ‘खाओ-पीओ और मौज उड़ाओ’ का प्रभाव हम पर हावी हो गया। मर्यादा न जाने किस कोने में मुंह छुपा कर बैठ गई। हम सब सीमाओं को लाँघकर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगे। मैं, मैं और सिर्फ़ मैं का बोलबाला हो गया। पैसा प्रधान हुआ और अहंनिष्ठ इंसान स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगा। बड़े बुज़ुर्ग, माता-पिता व गुरुजन हाशिये पर चले गए। ‘जब अपने आँखें दिखाने लगे/ पल-पल वे बेवजह डराने लगें/ तो समझो कलयुग आ गया है।’
सो! शराब, सिगरेट व रेव पार्टियों का प्रचलन बढ़ गया। संबंध हैलो-हाय तक सिमट कर रह गए व महिलाएं महफ़िलों की शोभा बनने लगी। शराब व सिगरेट पीकर सड़कों पर हंगामा करना सामान्य बात हो गई। जींस कल्चर व शरीर पर घटते वस्त्रों का प्रचलन बढ़ गया। इतना ही नहीं, वे ‘तू नहीं और सही’ की ओर आकर्षित हुए, जिसके कारण अलगाव व तलाक़ आदि के हादसों में वृद्धि हो गई। आजकल हर तीसरी लड़की सिंगल रहती है, क्योंकि लिव-इन व मीटू का प्रचलन बेतहाशा बढ़ गया। लड़के-लड़कियां ‘को-लिव’ में एक छत के नीचे रहने लगे और ड्रग्स का सेवन कर होशो-हवास खोने के भयंकर परिणाम सबके समक्ष हैं। हिंदू लड़कियां इन हादसों का शिकार अधिक हो रही हैं। थोड़े दिन के पश्चात् पार्टनर द्वारा विवाह से इन्कार कर देने पर वे सकते में आ जाती हैं। फलत: वे उनके टुकड़े-टुकड़े कर इत-उत फेंक देते है, जिसे देखकर ह्रदय आक्रोश से भर जाता है और एक लंबे अंतराल तक हम स्वयं को इस दु:ख से मुक्त नहीं कर पाते।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिव-इन व मीटू को मान्यता देना हृदय को विचलित करता है। परंतु अब लिव-इन के लिए माता-पिता की अनुमति होने को आवश्यक स्वीकारा गया है। यदि हम वृद्धों की दशा पर दृषटिपात करें तो बुज़ुर्गों की सम्पत्ति हथियाने के पश्चात् उन्हें बेघर कर वृद्धाश्रम में छोड़ देना हृदय को कोंचता व कचोटता है, शर्मसार करता है। वहीं उनका अपने घर में तिल-तिल कर मर जाना समाज को आईना दिखाता है– यह सब देखकर कलेजा मुँह को आता है। पैसे के लिए सभी रिश्तों को नकार कर कत्ल कर देना सोचने को विवश करता है–’कैसे हैं यह रिश्ते।’ आजकल स्नेह, प्रेम सौहार्द जाने कहां लुप्त हो गए और संवेदनाएं मर गई हैं। पूरे समाज में अजनबीपन का एहसास परिलक्षित है और हम पाश्चात्य की जूठन का अमृत-सम सहर्ष आचमन कर रहे हैं।
दूसरी ओर विदेशों में लोग हमारी संस्कृति को अपना रहे हैं। वे योग, ध्यान की ओर आकर्षित हो रहे हैं। हमारे वेदों के महत्व को वे स्वीकारने लगे हैं। दया, करुणा, ममता व संबंधों की स्वीकार्यता का भाव पनप रहा है तथा हिन्दू धर्म में उनकी श्रद्धा व आस्था दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। परंतु दीये तले सदैव अंधेरा रहता है। हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और हमारा जो भी शोध विदेशों के माध्यम से हमारे देश में आता है, हम उसे सत्य स्वीकारते हैं; उसका गुणगान करते हैं।
महाकुंभ सिर्फ़ तीन नदियों का ही संगम नहीं है, त्रिदेव भी वहां उपस्थित हैं। विभिन्न अखाड़ों, नागा साधुओं के साथ विभिन्न धर्म, राज्यों व देश-विदेश के लोगों का वहां आस्था की डुबकी लगाना– हमें सोचने व स्वीकारने पर विवश कर देता है कि मेरा देश व संस्कृति महान् है, अनुकरणीय है, सर्वश्रेष्ठ है, सर्वोत्तम है। संस्कृति देश के धर्म, वेशभूषा, प्रभु में आस्था, तीज त्यौहार, रीति-रिवाज़ व मन के उल्लास-उमंग को दर्शाती है। विभिन्न देशों से लोगों का साइकिल पर विश्व भ्रमण करते हुए भारत में आकर हिंदुत्व को स्वीकारना और सदा के लिए यहाँ बस जाना– जहां हमारे देश व संस्कृति के महान् होने का परिचायक है, वहीं हमारे लिए गर्व, गौरव व उल्लास का विषय है।
संपूर्ण विश्व में भारत ही केवल हिंदू राष्ट्र है, जहां विभिन्न धर्म, जाति, मज़हबों के लोग प्रेम से रहते हैं। हमारे वेद, पुराण, शास्त्र आदि इसका साक्ष्य हैं। हम हज़ारों वर्ष तक गुलाम रहे और विशाल भारत से कटकर अनेक देशों का प्रादुर्भाव हुआ। इसका कारण हमारी हमारी स्वार्थपरता व मानसिक दासता रही है, जिसके कारण हम आत्मकेंद्रित होते गए और देशहित में हमने कभी नहीं सोचा। इसका अंजाम हमारे कश्मीरी भाई 1990 से आज तक भुगत रहे हैं। धारा 370 और 35 ए हटने के 35 वर्ष पश्चात् भी वे अपने राज्य में लौटने का साहस नहीं जुटा पाए और आज भी शरणार्थियों तक जीवन जी रहे हैं। उनकी वेदना, पीड़ा व संत्रास का आकलन वर्तमान सरकार ने किया। परंतु वे उन्हें उनके अधिकार अभी तक भी नहीं दिलवा पाए। धर्म परिवर्तन भी कोढ़ की भांति हमारे देश में खोखला कर रहा है, जिसके कारण भारत देश में अनेक देश पनप रहे हैं। राजनीतिज्ञ वोटों की राजनीति में विश्वास रखते हैं और सत्ता पाने के निमित्त अपने देश की स्वतंत्रता को दाँव पर लगाने में लेशमात्र तक भी संकोच नहीं करते, जो देश के लिए अत्यंत लज्जास्पद व हानिकारक है।
काश! हम अपनी संस्कृति के उदार दृष्टिकोण को स्वीकार पाते। भारत माता की रक्षा हेतू प्राणोत्सर्ग करने को सदैव तत्पर रहते तथा अपने अंतर्मन में त्याग करुणा, क्षमा आदि देवीय गुणों को विकसित करते। पाश्चात्य संस्कृति को हम अपने हलक़ से न उतरने देते तथा अपनी जड़ों से जुड़े रहते। माता-पिता, गुरुजन व बड़े-बुज़ुर्गों का मान-सम्मान करते और वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करते। अपने देश की बेटियों की अस्मिता पर कभी आंच न आने देते तथा अपना सर्वस्व लुटाने का जुनून मन में पनपने देते। देश के रणबांकुरों के परिवारों की हर संभव सहायता करते, क्योंकि उन शहीदों की शहादत के कारण ही हमारा देश आज सुरक्षित है और हम सुक़ून की साँस ले पा रहे हैं। उनके परिवार का एक व्यक्ति शहीद नहीं होता बल्कि पूरे परिवार पर घने काले आपदाओं के बादल मंडराने लगते हैं और वे आजीवन उस भयंकर त्रासदी से उबर नहीं पाते। यदि हमारा देश सुरक्षित होगा तभी हम अमनो-चैन से जी पाएंगे। हमारा विकास भी तभी संभव होगा, जब हम स्वदेशी को हृदय से अपनाएंगे तथा राष्ट्र-हित में अपने प्राणों की बलि देने को तत्पर रहेंगे। जीवन-मूल्यों को धारण करेंगे तथा उनका अवमूल्यन नहीं होने देंगे। भावी पीढ़ी में सुसंस्कारों का सिंचन करेंगे। उन्हें वेबसाइट, मीडिया व मोबाइल के चक्रव्यूह में नहीं फंसने देंगे ताकि संपूर्ण मानव के रूप में उनका सर्वांगीण विकास हो सके और हमारा देश सुरक्षित हाथों में रहे।
वैसे संसार में जहां भी जो भी अच्छा मिले, उसे मानव को अपना लेना चाहिए। जो ग्रहणीय नहीं है, उसका त्याग कर दीजिए और किसी को न बुरा कहिए, न ही कीजिए। कबीर जी के शब्दों में ‘बुरा जो देखन मैं चला, मोसे बुरा न कोय‘ द्वारा आत्मचिंतन व आत्मावलोकन करने का संदेश प्रेषित है। दैवीय गुणों को जीवन में धारण कीजिए, क्योंकि जो तुम्हारे भाग्य में है, वह तुम्हें अवश्य मिलेगा और जो आप देते हो, वह लौटकर नहीं अवश्य तुम्हारे पास आता है। इसलिए जो आपको मिला है, उसका संग्रह मत कीजिए; बांटने का सुख प्राप्त कीजिए, क्योंकि जो आप देते हैं, वह लौट कर आपके पास अवश्य आता है। क्योंकि ‘धन दौलत, पद-प्रतिष्ठा तेरे साथ कुछ भी नहीं जाएगा/ इस धरा का सब यही धरा पर रह जाएगा’– यही है हमारी भारतीय संस्कृति का अवदान जो हमें पाश्चात्य संस्कृति से श्रेष्ठ बनाती है। हमें दूसरों की अच्छी बातों को अहमियत देना है और बेवजह उनकी आलोचना करना कारग़र नहीं है। हमें नीर-क्षीर विवेकी होते हुए हंस की भांति मोतियों को चुनना है।
तुरंत प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं है। अक्सर यह हमें विचित्र व अशोभनीय स्थिति में डाल देता है, जिनके लिए हमें पछताना पड़ता है। सो! सोच-समझ कर निर्णय लेना चाहिए। आइए! हम सत्यम्, शिवम्, सुंदरम की राह पर चलते हुए शिव की भांति परहित में हलाहल का आचमन करने को सदैव तत्पर रहे। यही मानव जीवन की सार्थकता है, जो हमें विभिन्न देशों की संस्कृति से उत्तम व श्रेष्ठ सिद्ध करती है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सौ बार जनम लेंगे…“।)
अभी अभी # ८६९ ⇒ आलेख – सौ बार जनम लेंगे श्री प्रदीप शर्मा
(मोहम्मद रफ़ी जी के जन्म शती पर 24 दिसंबर 1924)
आज हम नहीं कहेंगे, बहारों फूल बरसाओ, क्योंकि दुनिया जानती है, आज से एक सौ एक साल पहले, आज ही के दिन, यानी 24 दिसंबर 1924 को आसमान से एक फरिश्ता हमें प्यार का सबक सिखलाने आया था। आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूं, वह खुद बहारों की बारात साथ लेकर साथ आया था। जैसी मुस्कुराहट उसके हंसते हुए नूरानी चेहरे पर जन्म के समय थी, वही मुस्कुराहट और ढेर सारी नेकी और प्यार वह अपने नगमों के जरिए हम सबमें लुटा गया ;
बा होशो हवास मैं दीवाना
ये आज वसीयत करता हूं।
ये दिल ये जाॅं मिले तुमको,
मैं तुमसे मोहब्बत करता हूं।।
आज रफी साहब का जन्म दिन ही नहीं, उनके जन्म शताब्दी महोत्सव का आज पहला दिन है। पूरे साल उनके नगमे आसमान में वैसे ही गूंजेंगे, जैसे उनकी आवाज हमेशा हमारे कानों में गूंजती आई है। साल में दो बार इस इंसान को याद किया जाता है, आज के दिन, यानी 24 दिसंबर और 31 जुलाई 1980, जिस दिन यह पंछी अपने बाग को छोड़ आसमान में उड़ गया था।
मुझे अच्छी तरह याद है, रफी साहब की 25 वीं पुण्यतिथि पर रेडियो सीलोन ने पूरा जुलाई माह इस गायक को श्रद्धापूर्वक समर्पित कर दिया था। 1जुलाई से 31 जुलाई तक रेडियो सीलोन पर केवल रफी साहब की ही आवाज गूंजी थी। वो जब याद आए, बहुत याद आए। क्या दिन, महीना और साल, क्योंकि ;
जनम जनम का साथ है, हमारा तुम्हारा।
अगर मिले ना इस जीवन में
लेंगे जनम दोबारा।।
क्योंकि उनका ही यह वादा था ;
सौ बार जनम लेंगे
सौ बार फना होंगे।
ऐ जाने वफा फिर भी
हम तुम ना ज़ुदा होंगे।।
जन्मदिन खुशी का मौका होता है, आज किसी के गम में आंसू नहीं बहाते, लेकिन खुशी में भी कहां बाज आते हैं ये आंसू। क्योंकि ये आंसू मेरे दिल की जुबान है।।
हमारा दिल भी तो एक मंदिर ही है। रफी साहब का तो इबादत का अंदाज भी निराला ही था ;
एक बुत बनाऊंगा और पूजा करूंगा।
अरे मर जाऊंगा यार अगर मैं दूजा करूंगा।
जिसकी अंखियां हरि दर्शन को प्यासी हों, जिसकी आंखों में हमने प्यार ही प्यार बेशुमार देखा हो, जो बस्ती बस्ती, परबत परबत, एक बंजारे की तरह, दिल का इकतारा लेकर गाता रहता हो, और प्यार के गीत सुनाता हो, अपने दिल का दर्द बयां करता हो, आज उसके जन्मदिन पर यही कह सकते हैं :
बार बार दिन ये आए
और हजारों सालों तक यह दुनिया आपके गीत गुनगुनाएं। आप जब भी याद आए, बहुत याद आए। बिछड़ने का तो सवाल ही नहीं, क्योंकि जन्म शताब्दी का तो आज फकत आगाज़ ही है ;