हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८५ ☆ माँ गंगा: आस्था, विज्ञान और सम्पूर्ण जीवन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना माँ गंगा: आस्था, विज्ञान और सम्पूर्ण जीवन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८५ ☆

माँ गंगा: आस्था, विज्ञान और सम्पूर्ण जीवन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

भारत की आत्मा यदि किसी एक धारा में बहती हुई महसूस की जाए, तो वह है माँ गंगा। यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि सनातनी लोगों की आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार है।

तीर्थ अनेकों आपके, भक्त तारतीं आप।

संगम की महिमा अमिट, हर लें सब संताप।।

सच में, गंगा केवल जल नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है। भारत के अनगिनत तीर्थ, घाट और नगर इसी पवित्र धारा के किनारे बसे हैं, जहाँ आज भी लोग अपने दुःखों का विसर्जन कर शांति का अनुभव करते हैं।

माँ गंगा का भौतिक उद्गम गौमुख (गंगोत्री ग्लेशियर) से माना जाता है। यहाँ से निकलने वाली धारा “भागीरथी” कहलाती है, जो आगे चलकर देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलती है और तभी “गंगा” नाम धारण करती है।

यहाँ एक अद्भुत समन्वय दिखता है—आध्यात्मिक कथा कहती है कि राजा भगीरथ की तपस्या से गंगा पृथ्वी पर आईं, जबकि विज्ञान बताता है कि यह हिमनदों के पिघलने से बनी एक विशाल नदी तंत्र है। जीवन को सींचती हुई यात्रा…

उद्गम गौमुख आपका, गंगोत्री हरिद्वार।

वाराणसी प्रयाग माँ, कल-कल जल रसधार।।

गंगा हरिद्वार से मैदानों में प्रवेश करती है, जहाँ इसका स्वरूप और भी विशाल और जीवनदायिनी हो जाता है।

फिर प्रयागराज में यमुना और अदृश्य सरस्वती के साथ त्रिवेणी संगम बनाती है—यह स्थान आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

आगे वाराणसी जैसे प्राचीन नगर में गंगा मोक्षदायिनी मानी जाती हैं, जहाँ जीवन और मृत्यु दोनों का गहरा संबंध इस नदी से जुड़ता है।

गंगा की धारा अनेक शहरों और संस्कृतियों को जोड़ती हुई आगे बढ़ती है…

कोलकता, कानपुर, गाजी, पटना धाम।

जीवनदायनि मातु हैं, सदा बहें अविराम।।

कानपुर, पटना और कोलकाता जैसे बड़े नगरों से गुजरते हुए अंततः गंगा, गंगा सागर में समुद्र से मिल जाती हैं।

यह मिलन केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक प्रतीक है—जीवन की यात्रा का अंतिम समर्पण।

क्यों विशेष है गंगा जल?

आधुनिक विज्ञान भी गंगा की विशेषताओं को स्वीकार करता है। शोध बताते हैं कि गंगा जल में स्वयं शुद्धिकरण (self-purification) की अद्भुत क्षमता होती है, जिसका कारण उसमें पाए जाने वाले विशेष जीवाणु और खनिज हैं।

यही कारण है कि गंगा जल लंबे समय तक खराब नहीं होता—यह बात आज के युवाओं को विज्ञान के माध्यम से जोड़ती है।आज की युवा पीढ़ी के लिए गंगा केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का आह्वान है।

गंगा हमें सिखाती है—

निरंतर बहते रहना

सबको जोड़ना

और स्वयं को समर्पित करना

यदि हम गंगा को स्वच्छ और अविरल बनाए रखें, तो यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार बनी रहेगी।

देवनदी मंदाकिनी, विष्णुपगी ध्रुवनन्द।

सुरसरिता माँ जाह्नवी, देतीं परमानन्द।।

माँ गंगा सच में “जाह्नवी”, “सुरसरिता” और “देवनदी” हैं—जो केवल शरीर ही नहीं, बल्कि आत्मा को भी पवित्र करती हैं।

माँ गंगा की यह यात्रा—गौमुख से गंगा सागर तक—हमें जीवन का गूढ़ संदेश देती है:

“बहते रहो, जोड़ते रहो, और अंततः समर्पण में ही पूर्णता है।”

यही गंगा है—आस्था भी, विज्ञान भी, और जीवन का सार भी।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४११ ☆ साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४११ ☆

?  आलेख – साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लेखकीय भावना के साथ न्याय या निर्देशक का व्यवसायिक रूपांतरण, एक बहुआयामी जटिल प्रश्न रहा है।

साहित्य और सिनेमा के बीच का रिश्ता हमेशा से एक ऐसे पुल की तरह रहा है जिसे पार तो बहुतों ने किया, पर उससे कम ही लोग दर्शकों के मन में वह छबि बना पाए, जो उस दर्शक ने एक पाठक के रूप में स्वयं अपने मन में उपन्यास पढ़कर बनाई थी। एक लेखक और साहित्य-अनुरागी होने के नाते, जब पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ जैसी कालजयी कहानी या महाकवि जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ के अंशों को फिल्मी पर्दे पर उतरते देखा, तो मन एक अनजानी सी रिक्तता और निराशा से भर जाता है। यह निराशा केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि उस पाठक की है जिसने उन शब्दों के ‘प्राण’ को अपनी कल्पना में जिया है।

सच तो यह है कि सिनेमा और साहित्य के लक्ष्य एक होकर भी अपनी प्रकृति में पूरी तरह भिन्न हैं। साहित्य जहाँ कल्पना की अनंत आकाशगंगा है, व्यावसायिकता से किंचित परे है, वहीं सिनेमा उसे कैमरे के लेंस और स्क्रीन के फ्रेम में कैद कर देने वाली एक विवश कला है, जो बॉक्स ऑफिस से जुड़ा हुआ है। किताब में लेखकीय भावों का डिस्टार्शन नहीं होता क्योंकि उसकी प्रस्तुति में सिनेमा की तरह अभिनय, निर्देशन, संपादन, लोकेशन, फिल्मांकन, पार्श्व, संगीत, गायन वगैरह  ढेर सारे लोग नहीं होते ।

जब प्रसाद जी लिखते हैं”तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन”तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मानवीय चेतना और श्रद्धा का एक गहन दर्शन है।  फिल्मी धुनों में  ऐसे गीत ‘शब्दनाद’ और गांभीर्य को खो देते है, जो मूल कृति की आत्मा थी।

फिल्मकार की कोशिश उसे ‘लोकप्रिय’ और ‘दृश्य-योग्य’ बनाने की होती है, जबकि रचना पाठक से एक विशेष मानसिक तैयारी और एकांत की मांग करती है। बाज़ार और बॉक्स ऑफिस की ज़रूरतों ने अक्सर महान कृतियों के मौलिक सौंदर्य की बलि चढ़ाई है।

दशकों से फणीश्वरनाथ रेणु की ‘तीसरी कसम’ से लेकर अमृता प्रीतम की ‘पिंजर’, आर.के. नारायण की ‘गाइड’ और दोस्तोएवस्की की रचनाओं पर आधारित ‘साँवरिया’ जैसी तमाम साहित्य आधारित फिल्में बनती रही हैं। इनमें से कुछ ने आत्मा को छुआ, तो कुछ केवल बाहरी कलेवर तक सीमित रहीं। ‘तीसरी कसम’ में जो ग्रामीण संवेदना और हीरामन की निश्छलता उतर पाई, वह शायद इसलिए संभव हुई क्योंकि फिल्म के पीछे शैलेंद्र जैसा कवि-हृदय और रेणु की मिट्टी की समझ थी। इसके विपरीत, जब हम ‘देवदास’ या ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसे रूपांतरणों को देखते हैं, तो द्वंद्व और गहरा हो जाता है। जहाँ सत्यजीत रे प्रेमचंद के व्यंग्य को दृश्यों में ढालने में सफल रहते हैं, वहीं आधुनिक सिनेमा अक्सर शरतचंद्र की उस आंतरिक दरिद्रता और आत्म-पीड़ा को मखमली लिबासों और भव्य झूमरों के नीचे दबा देता है।

फिल्मकार अक्सर कृति के कथानक (Plot) को तो पकड़ लेते हैं, पर उसके ‘उद्देश्य’ और उस सूक्ष्म सौंदर्य को चित्रित करने में चूक जाते हैं जिसे लेखक ने शब्दों के बीच की रिक्तियों में छिपाया होता है। दृश्य माध्यम की अपनी माँगें हैं। वहाँ संवादों की गति चाहिए, चकाचौंध चाहिए और एक निश्चित समय सीमा का अनुशासन भी। लेकिन साहित्य के पास वह विलासिता है कि वह पाठक को घंटों एक ही विचार या संवेदना में डूबा रहने दे। यही कारण है कि कुछ विरले उदाहरणों को छोड़ दें, तो अधिकांश फ़िल्मी रूपांतरण मूल कृति के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाते।

अंततः, साहित्य एक व्यक्तिगत यात्रा है और सिनेमा एक टीम प्रस्तुति का  सामूहिक अनुभव। किसी भी कालजयी रचना का जो ‘शब्दनाद’ हमारी अंतरात्मा में गूँजता है, उसे पर्दे के कोलाहल में तलाशना शायद एक कठिन अपेक्षा है। सिनेमा साहित्य का अनुवाद करने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन वह उसकी गरिमा और गांभीर्य का पूर्ण विकल्प कभी नहीं बन सकता। जब भी कोई फिल्मकार किसी महान कृति को हाथ लगाता है, तो वह केवल एक कहानी नहीं उठाता, बल्कि वह उन हज़ारों पाठकों की स्मृतियों और भावनाओं को चुनौती देता है जिन्होंने उस कहानी को अपने भीतर जिया है। अफ़सोस कि अक्सर इस चुनौती में फिल्मकार अपनी तकनीक से तो जीत जाता है, पर संवेदना के धरातल पर प्रायः हार जाता है।

जिस तरह अनुवादक को मूल लेखक की आत्मा में परकाया प्रवेश कर उसके भाव पकड़ने होते हैं, उससे भी अधिक दुष्कर कार्य साहित्य का फिल्मांकन है, क्योंकि यहां सारी टीम को रचना की आत्मा में परकाया प्रवेश करना वांछित होता है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७३ ⇒ चुगली पुलिया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चुगली पुलिया।)

?अभी अभी # ९७३ ⇒ आलेख – चुगली पुलिया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ताल तो भोपाल का, बाकी सब तलैया है। आजकल बड़े बड़े फ्लाई ओवर बन रहे हैं, जब संसाधनों की कमी थी, नदियों पर पुल बनाए जाते थे और छोटे छोटे नालों पर बरसात के मौसम में आने जाने के लिए छोटा पुल बनाया जाता था।

हमारे शहर में आज भी कृष्णपुरा पुल है जो कभी सबसे बड़ा पुल कहलाता था। रामबाग और कृष्णापुरे के बीच, आज भी एक पुल है, जिसे बीच वाला पुल कहते थे। घर से स्कूल हम इसी पुल से जाते थे। दिन में तो ठीक, रात में इस पुल से गुजरने में डर लगता था। जब यह पुल बना होगा, किसी ने पुल की फर्शी पर ॐ लिख रखा था। चलते वक्त हमें ध्यान रखना पड़ता था, कहीं इस पर पांव न पड़ जाए। पुल के खत्म होने के पहले, एक पिलर से सटा हुआ, कुछ कटा हुआ, एक शब्द लिखा था कग्। रोज पुल पार करते वक्त ध्यान इसी पर रहता था, ॐ आ गया, अब कग् आएगा।।

पुल को अंग्रेजी में ब्रिज कहते है। मेरे शहर में मेरे देखते देखते, कितने ब्रिज बन गए। मुझे अच्छी तरह याद है, आज तिलक पथ पर कहां लोखंडे ब्रिज है, वहां कभी एक छोटी सी पुलिया थी। इस पार से उस पार जाने के लिए खतरों के खिलाड़ी की तरह, संभल संभल उतरे पारा वाला मामला था। हम बच्चे लोगों का तो कई बार पांव भी फिसल जाता था। पानी ज़्यादा नहीं होता था। एक तो mud स्नान और बाद में घर पर पहले तबीयत से पूजा, तत्पश्चात ठंडे पानी से स्नान।।

सारे पुल ब्रिज हुए अब ! ब्रिज तो हावड़ा का, बाकी सब culvert यानी पुलिया है। आज हमारे शहर में नदी तो एक ही है, जिसका सौंदर्यीकरण चल रहा है, लेकिन पुलियाओं की कोई कमी नहीं। बरसाती पानी के निकास के लिए नालों पर पुलिया बनाई जाती थी। नाले तो बंद हो जाते थी, पुलिया मशहूर हो जाती थी।

आज शहर में जगह जगह कई पुलियाएं हैं। किसी को तीन पुलिया कहते हैं, तो किसी को गमला पुलिया। सुबह की सैर पर जाने वाले स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नागरिकों के लिए, ये पुलियाएं सुस्ताने के काम आती हैं। सुबह की सैर अकेले नहीं की जाती। चार पांच लोगों का ग्रुप हो, तो समय भी कट जाता है, और थकान भी महसूस नहीं होती। राजनीति, शेयर मार्केट, फिल्म और अफवाहों के अलावा और भी कई मसले होते हैं, जिन पर इन पुलियाओं पर विस्तृत चर्चा होती है।

कुछ पुलियाएं जो मंदिर के करीब स्थित हैं, शाम की आरती के बाद मोहल्ले की महिलाओं के लिए सुरक्षित होती हैं। वहां सड़क के दोनों ओर, आमने सामने एक एक पुलिया है जिसका नाम किसी ने निंदा पुलिया और चुगली पुलिया रख दिया है। निंदा और चुगली में भी अंतर होता है। निंदा तो किसी की भी की जा सकती है, लेकिन चुगली तो अपनों की ही हो सकती है।।

ऐसा माना जाता है कि निंदा खुले आम की जाती है लेकिन चुगली किसी से छुपाकर की जाती है। ‌मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायो, यह चुगली नहीं तो और क्या है।।

‌सास को बहू की निन्दा करने का जन्मसिद्ध अधिकार है, इसलिए वह खुले आम निंदा पुलिया पर किसी भी बहू की निन्दा कर सकती है। बचपन में हम निंदा नहीं समझते थे, केवल चुगली से ही काम चला लिया करते थे। किसी के कान भरना क्या चुगली करना नहीं।

‌अगर पुलिया न होती, तो हम अपने दिल की बात कहां करते। दीवारों के भी कान होते हैं, पुलिया के कान, मुंह, आंख कुछ नहीं होते। आज तक किसी पुलिया ने इधर की बात इधर नहीं की। न कुछ लिया, न कुछ दिया। बस जो उस पर बैठा, उसको थोड़ा आराम दिया। उसे अपने मन की बात कहने का मौका दिया। कितनों ने पुलिया पर बैठकर अपनी फिक्र धुएं में उड़ाई है, कितने थके हुए राहगीरों ने यहां बैठकर राहत की सांस पाई है। क्या आपको कभी किसी पुलिया की याद आई है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७२ ⇒ कलम के पहलवान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कलम के पहलवान।)

?अभी अभी # ९७२ ⇒ आलेख – कलम के पहलवान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कलम के धनी तो बहुत हुए हैं, कलम के सिपाहियों ने भी कई वैचारिक जंग जीती हैं, आज हम कलम के पहलवानों की चर्चा करेंगे। जैसा कि सर्वविदित है, मौसिकी हो या पहलवानी, उस्ताद से गंडा बंधवाने की प्रथा है। रियाज और वर्जिश की दरकार तो है ही।

बिन गुरु ज्ञान कहां से आए ! घिस घिस कर शालिग्राम की तरह, कलम घिस घिसकर ही कोई कलम का पहलवान बन सकता है। योग गुरु, संगीत के आचार्य और अखाड़े के उस्ताद की तरह एक कलम के पहलवान को भी अपने कलम गुरु की चिलम भरनी पड़ती है। कलम का गुरु द्रोणाचार्य की तरह नहीं होता। वह जिस शिष्य पर मेहरबान हो जाता है, उससे वह कलम पकड़ने वाली कोई उंगली गुरु दक्षिणा में नहीं मांगता, अपितु अपनी कलम ही उसे प्रसाद स्वरूप ईनाम में दे देता है।।

पूत के पांव पालने में, और कलम का सिर पहले दवात में होता था। दवात की स्याही में डुबो डुबोकर कलम कागज पर अक्षर बनाती थी। गुरुकुल का ज्ञान kores की स्याही की एक टिकिया से शुरू होता था। कागज़ के अखाड़े में कलम ने भी कोई कम घास नहीं छीली। कई बार कागज़ छलनी हुआ तो कई बार कलम क्षतिग्रस्त हुई। वह कलम का बाल्यकाल था। सरकंडे और पार्कर पेन का संधि काल था वह। होल्डर और स्याही की दवात की दास्तान है यह।

जिस तरह बंदर के हाथ में उस्तरा नहीं दिया जाता, किसी काला अक्षर भैंस बराबर वाले के हाथ में कलम नहीं पकड़ा दी जाती थी। मिट्टी से पैदा हुए हो, पहले मिट्टी का सम्मान करना सीखो। पट्टी तब कागद का काम करती थी और पेम, पट्टी पर ढाई आखर प्रेम का लिखना सीख जाती थी। आज भी जो विद्या, अध्यापन कक्ष के श्याम पट के दायरे में, खड़ू निर्मित चाक से प्राप्त होती है, वह किसी गुरुकुल के ज्ञान से कम नहीं। दुनिया के सभी गणित के सवाल इसी ब्लैक बोर्ड पर हल हुए हैं। हर बार एक नया सवाल हल किया जाता है और बाद में उसे पोंछ दिया जाता है।

ज्ञान की स्लेट कोरी की कोरी ही रह जाती है। गुत्थी इसी तरह सुलझती, उलझती जाती है।

मेरा जीवन कोरा कागज़, कोरा ही रह गया। जब कलम कागज़ पर चलती है, तो जगह कम पड़ जाती है। कागज़ भी मानो कलम से कहता प्रतीत होता है, रंग दे, रंग दे, रंग दे, मुझे तू रंग दे। कलम के पहलवान पीठ झुकाकर ज्ञानपीठ के लिए सृजन रत रहते हैं। कलम वही जो कलमकार को पुरस्कार ही नहीं, कार भी उपलब्ध करवाए। महा मंडलेश्वर की उपाधि ना सही विद्या वाचस्पति, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार और पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित होना तो बनता है।।

कलम का सदगुरु एक कलम के पहलवान को ज्ञानवान, बुद्धिमान और शक्तिमान बनाता है। जितने आचार्य, पंडित, और डॉक्टर साहित्य में पैदा हुए हैं, उतने अन्य किसी बौद्धिक क्षेत्र में नहीं हुए। आलोचक, समालोचक, समीक्षक यहां के शंकराचार्य हैं। साहित्य के सभी पीठ इनका सम्मान करते हैं। अगर आप एक सच्चे कलम के पहलवान हैं तो इन्हें कभी पीठ ना दिखाएं। इन्हें अपनी पीठ पर बिठाएं।

एक अप्रैल का ज्ञान भंग की तरंग में नहीं प्रस्फुटित होता। उसके लिए जन्मजात प्रतिभा संपन्न होना भी जरूरी होता है। अगर आपमें वह प्रतिभा नहीं है तो कलम के साथ पहलवानी ना करें, हवा आने दें। बेहतर है किसी साहित्य के उस्ताद अथवा विद्यालंकार से गंडा बंधवा ही लें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७१ ⇒ अपनापन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपनापन।)

?अभी अभी # ९७१ ⇒ आलेख – अपनापन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्रेम में अगर ढाई अक्षर होते हैं, तो अपनापन में पाँच ! यानी ढाई से दो गुना। प्रेम को तो परिभाषित किया गया है, लेकिन अपनेपन को परिभाषित करना इतना आसान नहीं।

फेसबुक पर अपने बारे में लिखने का मौका कम ही आता है ! परिचय को रिश्ते में बदलने में वक्त तो लगता है। केवल विचारों के आदान-प्रदान पर आधारित रिश्ते में अपनेपन का अहसास होना ही फेसबुक की खूबी है।।

कल 1 अप्रैल था ! कई लोग 1 अप्रैल को पैदा होते हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ ! जब छोटे थे, तो जन्मदिन सिर्फ माँ को याद रहता था। माँ हलवे से मुँह मीठा करती थी। पिताजी कुछ न कुछ लेकर ज़रूर घर आते थे। कभी कोई खिलौना, कभी नये कपड़े, तो कभी सायकल।

समय के साथ जन्मदिन का स्वरूप बदलता चला गया। जन्मदिन, स्कूल, दफ़्तर और परिचितों की सीमाएं पार करता हुआ फेसबुक तक पहुँच गया। कल फेसबुक पर बधाई देने वालों का ताँता लग गया।।

पहली बार अपनेपन का अहसास हुआ ! अपरिचय से परिचय का रिश्ता जब इतना मजबूत होने लगता है, तो सब अपने लगने लगते हैं। रोज सुबह ” अभी अभी ” से अपनों की पहचान हुई। अपनों को नापने का कोई मापदंड नहीं होता। आश्चर्य हुआ, खुशी भी हुई। इतनों में अपनेपन का अहसास हुआ।

शब्द भाव प्रकट करते हैं। भाव दो शब्दों में भी प्रकट किए जा सकते हैं, और 200 में भी ! मेरे लिए भाव अधिक महत्वपूर्ण है। कहीं कहीं तो मौन से भी अपनेपन की अभिव्यक्ति होती है। प्रकट रूप से व्यक्त हर शब्द का मैं सम्मान करता हूँ, उसके पीछे छुपे गहन अर्थ को समझना सबके बस की बात नहीं, अतः कभी कभी व्यक्ति के भाव को पूरा सम्मान भी नहीं मिल पाता।

जाने अनजाने हुई इस भूल के लिए मैं क्षमा-प्रार्थी हूँ।।

अभी अभी का यह सिलसिला आपके प्यार और आशीर्वाद का ही फल है। मेरे जीवन भर की उपलब्धि केवल यह अभी अभी ही है। जन्मदिन के अवसर पर आप सबने मुझे अपनेपन का अहसास कराया। कुछ का मैं धन्यवाद कर पाया, कुछ का नहीं। सभी के द्वारा व्यक्त भावों, उद्गार और जन्मदिन पर प्रेषित शुभकामनाओं हेतु मैं सबका पुनः आभार प्रकट करता हूँ।

आपके इस अपनेपन के कारण मुझे कभी अपनी उम्र का अहसास नहीं हुआ। ज़िन्दगी जीने का इससे बेहतर जरिया मुझे नज़र नहीं आया। मित्रों, हितैषियों और शुभचिन्तकों की इतनी बड़ी तादाद है कि मैं उनका व्यक्तितगत रूप से आभार नहीं प्रकट कर सकता।

अंत में जगजीतसिंह के शब्दों में केवल इतना ही कहूँगा –

तुमको देखा तो ये ख़याल आया

ज़िंदगी धूप, तुम घना साया।।

आभार, शुक्रिया, धन्यवाद। बारम्बार ….

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३१ – आदिम से आदिम तक ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३१ आदिम से आदिम तक… ?

मनुष्य जंगल में रहता था। शिकार के लिए संघर्ष होता था। स्वाभाविक है कि शस्त्र के रूप में पत्थर और लकड़ी का प्रयोग होता होगा।  मनुष्य ने विकास की राह पर कदम बढ़ाए। आदिम से आधुनिक होने की सतत यात्रा की।

इस यात्रा में मनुष्य ने बस्तियाँ बसाई। बस्तियों से गाँव, गाँव से नगर बने। नागरी सभ्यता का उदय हुआ। अकेला-दुकेला रहने वाला मनुष्य समूह में बसने लगा, समाज बना। तथापि संसाधनों के केंद्रीकरण के चलते संग्रह की वृत्ति जन्मी, लालच पनपा। इसने न केवल संघर्ष को बढ़ाया, अपितु द्वंद्व के नए आयाम भी खोले। मनुष्यजीवन के केंद्र में पैसा आता गया। धन संपदा, संसाधनों पर अधिकार जमाए रखने की वृत्ति बढ़ती गई, समर तीव्र होता गया।

संघर्ष की परिधि बढ़ी तो पत्थर, डंडे से आगे बढ़कर मनुष्य ने तलवारें विकसित की। फिर तो एक दूसरे को मारने- काटने के लिए विनाश का खून मुँह लग गया। गोली-गोले ढाले जाने लगे, मनुष्य द्वारा मनुष्य पर दागे जाने लगे। दो लोगों की सिर फुटव्वल में एक की अधिक हानि होती थी, अब हानि सामूहिक होने लगी। शत्रु का संहार, भीषण  नरसंहार में बदलने लगा।

विज्ञान का विकास और विस्तार हुआ। आदमी का आदिम और निखरा। अब ‘मास डिस्ट्रक्शन’ या बड़ी संख्या में मनुष्य को एक साथ मौत के घाट उतार देने के साधन तैयार हुए।

मनुष्य- मनुष्य में होने वाला संघर्ष, दो समूहों में होने वाले युद्ध से होते हुए विभिन्न राष्ट्रों के आपसी  संग्राम तक आ पहुँचा।

फिर उन्नीसवीं सदी आई । बड़ी संख्या में विश्व के राष्ट्र एक दूसरे से उलझे। यह प्रथम विश्वयुद्ध था। इस विश्वयुद्ध ने डेढ़ करोड़ से अधिक लोगों की बलि ली।

दो दशक बीतते-बीतते, विनाश के अजगर ने फिर अपना मुँह खोला। द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हुआ। येन केन प्रकारेण विजय प्राप्त करना ही इसका अंतिम ध्येय था। इस बार मनुष्य पर परमाणु बम का परीक्षण किया गया। इस विनाश के साक्ष्य के रूप में पूरे शहर में जलकर खाक हुए और कुछ अधजले पेड़ बचे रहे, बाकी पूरा शहर मर गया।

आदमी के भीतर का आदमी मरता रहा, आज भी मर रहा है। कहा गया कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा। संसार की महाशक्तियों को लगा कि पहले तेल पर तो आधिपत्य जमा लें, फिर पानी पर सोचा जाएगा।

अस्त्र-शस्त्र अब इतने संहारक हो चले कि एक रात में एक पूरी सभ्यता को नष्ट करने की चेतावनी दी जाने लगी। आदमी के विकराल आदिम को देखते हुए इस चेतावनी के सच सिद्ध होने की आशंका सदा बनी रहती है। आदमी की विडंबना और विसंगति देखिए कि किसी की आशंका, किसी के लिए संभावना भी होती है।

आदमी ने अपनी सूझबूझ से जंगल से महानगर तक यात्रा की। ज़मीन को अपने कब्जे में लिया, अंतरिक्ष को घातक हथियारों से पाट दिया समुद्र के गर्भ में विनाश बो दिया। बाहर से आधुनिक होने की यात्रा में भीतर का आदिम निखरता रहा।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि चौथा विश्वयुद्ध पत्थरों और लकड़ियों से लड़ा जाएगा। सभ्यता नष्ट करने का आसुरी उन्माद यह स्थिति ला भी सकता है कि हमारी कथित सभ्य प्रजाति ही नष्ट हो जाए।  जब हथियारों के उपयोग से प्रजाति नष्ट हो जाएगी तो नये हथियार ढालने वाले भी नष्ट हो जाएँगे। साधनहीन बचे- खुचे लोग जंगलों में रहने लगेंगे। इसके बाद आगे जब कभी संघर्ष होगा तो फिर वही पत्थर, वही लकड़ियाँ साधन बनेंगे।

आदिम से आदिम की इस यात्रा के असंख्य आयाम हैं। इन आयामों पर हर विचारवान को अपने-अपने ढंग से चिंतन करना चाहिए। इस चिंतन से कोई समाधान निकल कर आ सके तो मनुष्य जाति पर बड़ा उपकार होगा।

© संजय भारद्वाज 

प्रातः 7:31 बजे, 11 अप्रैल 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७० ⇒ च ख ना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “च ख ना ।)

?अभी अभी # ९७० ⇒ आलेख – च ख ना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मुख हमारे शरीर का प्रवेश द्वार है। आप इसे सिक्योरिटी चेक भी कह सकते हैं। बत्तीस दांतों के बीच एक जीभ है जो शरीर रूपी नगरी में प्रवेश के पूर्व मीठे शब्दों से आगत का स्वागत करती है। उसके स्टाफ के अन्य सदस्य भी हैं। पहले नाक उसे सूंघती है, फिर आंखें उसे घूरती है, और पश्चात जीभ उसे चखती है। मीठा मीठा गप, कड़वा कड़वा थू।

राम नाम अति मीठा है, कोई गा के देख ले। लीजिए, मीठा चखने के लिए जीभ तैयार है और कोई वहां मीठा गा रहा है। कानों में रस घोल रहा है। एक और प्रवेश द्वार ! कंठ गा रहा है, और स्वाद कानों को मिल रहा है। इतने में कानों में एक स्वर और गूंजता है, कोई पीयो रे पियाला(प्याला) राम रस का। अजीब खेल हैं भाई इस रसना और चखना के। अच्छा समागम है रस और इन्द्रियों का।।

यूं तो यह जबान बीस तालों के बीच बंद रहती है लेकिन जब खुलती है तो बड़ी मुश्किल से काबू में आती है। कुछ होते हैं मौन मोहन, जो इस पर तो लगाम कसते हैं, लेकिन उनकी डोर किसी और के ही हाथों में होती है। वैसे कैंची और छुरी से भी तेज होती है इसकी धार। जब यह जीभ अनशन पर चली जाती है, तो सत्ता रूपी स्वर्ग में भूचाल आ जाता है।

वैसे जीभ का मुख्य काम सिर्फ चखना है। जब यह ललचाती है, तो इसकी तो सिर्फ लार टपकती है, पूरे मुंह में तो पानी भी आ जाता है। पानी पूरी खाता तो मुंह है, लेकिन पूरा स्वाद जीभ ले लेती है। बड़ी चटोरी है यह जीभ। नमक, मिर्ची का स्वाद यह पहचानती है। खट्टे, मीठे और कड़वे की भी इसको खूब पहचान है।।

इसको मीठे के साथ नमकीन भी पसंद है और कड़वे के साथ चखना। मीठे के साथ नमकीन तो समझ में आ गया लेकिन सुना है कड़वा तो यह थूक देती है, फिर कड़वे के बाद भी एक और चखना ! क्या यह डबल सिक्योरिटी चेक है ? अजीब पहेली है यह अथवा कोई कड़वा सच।

बताओ सच सच।

अच्छा चलिए, राम नाम से

ही शुरू करते हैं। राम नाम अति मीठा है और हमने राम रस का प्याला भी पीकर देख लिया। गजब नशा है भाई साहब राम नाम में। लेकिन क्या है आजकल मीठा ज्यादा हजम नहीं होता इसलिए हमने राम की मात्रा थोड़ी कम करके रम का सहारा ले लिया है। रम कड़वी है, लेकिन नशा इसमें भी है। आपने सुना नहीं, जब दिल को सताए गम, तू छेड़ सखी सरगम। बस यह रम ही हमारी वह सरगम है। अगर मीठे के साथ नमकीन तो कड़वे के साथ चखना।।

चखना बुरा नहीं। चखने में मज़ा है, लेकिन जब भी पीना हो तो बस राम रस का ही प्याला पीएं और सबको पिलाएं। दुश्मनी और गम की अंधेरी रातों को भूल जाएं, सुबह का इंतजार करें, राम नाम का मज़ा चखें, सबको चखाएं। रम को हमेशा के लिए राम राम जी और आप सबको सुबह की राम राम जी।

कोई पीयो रे पियाला राम रस का ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६९ ⇒ रिश्ते और फरिश्ते ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रिश्ते और फरिश्ते ।)

?अभी अभी # ९६९ ⇒ आलेख – रिश्ते और फरिश्ते ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

रिश्ता क्या है तेरा मेरा !

मैं हूं शब, तू है सवेरा।।

कुछ रिश्ते हमें बांधते हैं और कुछ मुक्त करते हैं।

जो स्वयं मुक्त होते हैं, जब हम उनसे जुड़ते हैं, तो हमें भी मुक्ति का अहसास होता है लेकिन जिसे संसार ने जकड़ लिया है, और अगर हमने उसे पकड़ लिया है, तो वह हमारा भी बंधन का ही कारण सिद्ध होता है।

रिश्तों को बंधन का कारण माना गया है। बंधन में सुख है, थोड़ा प्रेम भी है, थोड़ी आसक्ति भी। कुछ बंधन इतने अटूट होते हैं जो टूटे नहीं टूटते, और कुछ बंधन इतने शिथिल और कमजोर होते हैं, कि संभाले नहीं संभलते। कहीं रिश्तों में गांठ आ जाती है तो कहीं तनाव

और कहीं सिर्फ एक प्रेम का धागा ही रिश्तों की बुनियाद बन जाता है।।

रिश्ता दर्द भी है और दवा भी। रिश्ते में कहीं फूल सी खुशबू है तो कहीं कांटों सी चुभन भी है। किसी की फुलवारी महक रही है तो कहीं घरों के बीच दीवार खड़ी हो रही है ;

रिश्तों में दरार आई

बेटा न रहा बेटा,

भाई न रहा भाई …

ऐसी मनोदशा में जब रिश्ते साथ नहीं देते, कहीं से एक फरिश्ता चला आता है। कहते हैं, फरिश्ते का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता। वह तो बस फरिश्ता होता है। यह फरिश्ता हमारे आसपास ही होता है, लेकिन हमें कभी नजर नहीं आता।

आप सड़क के बीच, कुछ अनमने से, कुछ खाए खोए से चले जा रहे हैं, पीछे से एक वाहन हॉर्न दे रहा है, कहीं से अचानक एक अनजान व्यक्ति फुर्ती से आता है और आपको पकड़कर सड़क के किनारे ले जाता है। आप कुछ समझ नहीं पाते। वह आपकी जान बचाकर वहां से चला जाता है। कोई जान ना पहचान। आप सोचते हैं, जरूर कोई फरिश्ता ही आया होगा आपकी जान बचाने।

जीवन में ऐसे काई अवसर आते हैं, जब संकट की घड़ी में कहीं से अनायास ही ऐसा कुछ घटित हो जाता है, जिससे हम राहत की सांस लेने लगते हैं।।

रिश्ता अच्छा बुरा हो सकता है, फरिश्ता कभी बुरा नहीं होता। कभी कभी हमें रिश्तों में भी फरिश्ते नजर आते हैं तो कुछ रिश्ते असहनीय दर्द और मानसिक पीड़ा के कारण रिसते नजर आते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी कोई फरिश्ता हमारा रहबर बनकर कहीं से प्रकट होता है और हमें उस पीड़ा से उबार लेता है।

फरिश्ते का भी क्या कभी नाम होता है, कोई पहचान होती है ! जी हां, कभी कभी हो भी सकती है।

हर नन्हा बच्चा एक नन्हा फरिश्ता होता है। कभी हमें अपनी मां ही फरिश्ता नजर आती है तो कभी बहन अथवा भाई। कृष्ण सुदामा तो दोनों ही फरिश्ते होंगे। राम लक्ष्मण जैसे भाई जहां हों, वहां तो फरिश्ते भी शरमा जाएं।।

हमें जहां भी भलाई और अच्छाई नजर आ रही है, वह सब उन फरिश्तों की बदौलत ही है। वे फरिश्ते हम आप भी हो सकते हैं। अच्छे रिश्तों को ही हमने फरिश्तों का नाम दिया हुआ है। किसी गिरते को थाम लेना, किसी मुसीबतजदा इंसान की मदद करना, यही तो एक फरिश्ते का काम होता है।

फरिश्ता स्वयं ईश्वर नहीं होता, लेकिन वह ईश्वर का दूत अवश्य होता है। फरिश्ते की ना तो आरती होती है और ना ही फरिश्ते का कोई मंदिर होता है। न आरती न अगरबत्ती, फिर भी कहीं से संकटमोचक की तरह प्रकट हो जाए, आपकी बिगड़ी बना दे, और गायब हो जाए।।

कितने फरिश्ते हमारे आसपास हैं, हमें मालूम ही नहीं। अच्छाई को महसूस करना ही फरिश्ते को पहचानना है।

जब रिश्तों में स्वार्थ और खुदगर्जी का स्थान प्रेम और त्याग ले लेगा। बुराई अच्छाई की चकाचौंध में कहीं नज़र नहीं आएगी, दूसरों का दुख हमें अपना लगने लगेगा, हर प्यासे तक कोई फरिश्ता कुआं बनकर आएगा, तब हम सब मिलकर यह तराना गाएंगे ;

फरिश्तों की नगरी में

आ गया हूं मैं,

आ गया हूं मैं …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

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मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१७ ☆ गुण और ग़ुनाह… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख गुण और ग़ुनाह। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१७ ☆

गुण और ग़ुनाह… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘आदमी के गुण और ग़ुनाह दोनों की कीमत होती है। अंतर सिर्फ़ इतना है कि गुण की कीमत मिलती है और ग़ुनाह की उसे चुकानी पड़ती है।’ हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। गुणों की एवज़ में हमें उनकी कीमत मिलती है; भले वह पग़ार के रूप में हो या मान-सम्मान व पद-प्रतिष्ठा के रूप में हो। इतना ही नहीं,आप श्रद्धेय व वंदनीय भी बन सकते हैं। श्रद्धा मानव के दिव्य गुणों को देखकर उसके प्रति उत्पन्न होती है। यदि हमारे हृदय में उसके प्रति श्रद्धा के साथ प्रेम भाव भी जाग्रत होता है तो वह भक्ति का रूप धारण कर लेती है। शुक्ल जी भी श्रद्धा व प्रेम के योग को भक्ति स्वीकारते हैं। सो! आदमी को गुणों की कीमत प्राप्त होती है और जहां तक ग़ुनाह का संबंध है,हमें ग़ुनाहों की कीमत चुकानी पड़ती है; जो शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना रूप में हो सकती है। इतना ही नहीं,उस स्थिति में मानव की सामाजिक प्रतिष्ठा भी दाँव पर लग सकती है और वह सबकी नज़रों में गिर जाता है। परिवार व समाज की दृष्टि में वह त्याज्य स्वीकारा जाता है। वह न घर का रहता है; न घाट का। उसे सब ओर से प्रताड़ना सहनी पड़ती है और उसका जीवन नरक बन कर रह जाता है।

मानव ग़लतियों का पुतला है। ग़लती हर इंसान से होती है और यदि वह उसके परिणाम को देख स्वयं की स्थिति में परिवर्तन ले आता है तो उसके ग़ुनाह क्षम्य हो जाते हैं। इसलिए मानव को प्रतिशोध नहीं; प्रायश्चित करने की सीख दी जाती है। परंतु प्रायश्चित मन से होना चाहिए और व्यक्ति को उस कार्य को दोबारा नहीं करना चाहिए। बाल्मीकि जी डाकू थे और प्रायश्चित के पश्चात् उन्होंने रामायण जैसे महान् ग्रंथ की रचना की। तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली के प्रति बहुत आसक्त थे और उसकी दो पंक्तियों ने उसे महान् लोकनायक कवि बना दिया और वे प्रभु भक्ति में लीन हो गए। उन्होंने रामचरित मानस जैसे महाकाव्य की रचना की, जो हमारी संस्कृति की धरोहर है। कालिदास महान् मूर्ख थे, क्योंकि वे जिस डाल पर बैठे थे; उसी को काट रहे थे। उनकी पत्नी विद्योतमा की लताड़ ने उन्हें महान् साहित्यकार बना दिया। सो! ग़ुनाह करना बुरा नहीं है,परंतु उसे बार-बार दोहराना और उसके चंगुल में फंसकर रह जाना अति- निंदनीय है। उसे इस स्थिति से उबारने में जहां गुरुजन, माता-पिता व प्रियजन सहायक सिद्ध होते हैं; वहीं मानव की प्रबल इच्छा-शक्ति,आत्मविश्वास व दृढ़-निश्चय उसके जीवन की दिशा को बदलने में नींव की ईंट का काम करते हैं।

इस संदर्भ में, मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहूंगी कि यदि ग़ुनाह किसी सद्भावना से किया जाता है तो वह निंदनीय नहीं है। इसलिए धर्मवीर भारती ने ग़ुनाहों का देवता उपन्यास का सृजन किया,क्योंकि उसके पीछे मानव का प्रयोजन द्रष्टव्य है। यदि मानव में दैवीय गुण निहित हैं;  उसकी सोच सकारात्मक है तो वह ग़लत काम कर ही नहीं सकता और उसके कदम ग़लत दिशा की ओर अग्रसर नहीं हो सकते। हाँ! उसके हृदय में प्रेम,स्नेह,सौहार्द,करुणा, सहनशीलता,सहानुभूति,त्याग आदि भाव संचित होने चाहिए। ऐसा व्यक्ति सबकी नज़रों में श्रद्धेय,उपास्य,प्रमण्य  व वंदनीय होता है। ‘जाकी रही भावना जैसी,प्रभु तिन मूरत देखी तैसी’ अर्थात् मानव की जैसी सोच,भावना व दृष्टिकोण होता है; उसे वही सब दिखाई देता है और वह उसमें वही तलाशता है। इसलिए सकारात्मक सोच व सत्संगति पर बल दिया जाता है। जैसे चंदन को हाथ में लेने से उसकी महक लंबे समय तक हाथों में बनी रहती है और उसके बदले में मानव को कोई भी मूल्य नहीं चुकाना पड़ता। इसके विपरीत यदि आप कोयला हाथ में लेते हो तो आपके हाथ काले अवश्य हो जाते हैं और आप पर कुसंगति का दोष अवश्य लगता है। कबीरदास जी का यह दोहा तो आपने सुना होगा, ‘कोयला होय न ऊजरा,सौ मन साबुन लाय’ अर्थात् व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन लाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। परंतु बार-बार अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान बन सकता है। इसलिए मानव को निराश नहीं होना चाहिए और अपने सत् प्रयास अवश्य जारी रखने चाहिए। यह कथन कोटिश: सत्य है कि यदि व्यक्ति ग़लत संगति में पड़ जाता है तो उसको लिवा लाना अत्यंत कठिन होता है,क्योंकि ग़लत वस्तुएं अपनी चकाचौंध से उसे आकर्षित करती हैं–जैसे माया रूपी महाठगिनी अपनी हाट सजाए  सबका ध्यान आकर्षित करने में प्रयासरत रहती है।

शेक्सपीयर भी यही कहते हैं कि जो दिखाई देता है; वह सदैव सत्य नहीं होता और हमें छलता है। सो! सुंदर चेहरे पर विश्वास करना स्वयं को छलना व धोखा देना है। इक्कीसवीं सदी में सब धोखा है, छलना है,क्योंकि मानव की कथनी- करनी में बहुत अंतर होता है। लोग अक्सर मुखौटा धारण कर जीते हैं। इसलिए रिश्ते भी विश्वास के क़ाबिल नहीं रहे। रिश्ते खून के हों या अन्य भौतिक संबंध–भरोसा करने योग्य नहीं हैं। संसार में हर इंसान एक-दूसरे को छल रहा है। इसलिए रिश्तों की अहमियत रही नहीं; जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा मासूम बच्चियों को भुगतना पड़ रहा है। अक्सर आसपास के लोग व निकट के संबंधी उनकी अस्मत से खिलवाड़ करते पाए जाते हैं। उनकी स्थिति बगल में छुरी ओर मुंह में राम-राम जैसी होती है। वे एक भी अवसर नहीं चूकते और दुष्कर्म कर डालते हैं,क्योंकि उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई जाती। वास्तव में उनकी आत्मा मर चुकी होती है,परंतु सत्य भले ही देरी से उजागर हो; होता अवश्य है। वैसे भी भगवान के यहां सबका बही-खाता है और उनकी दृष्टि से कोई भी नहीं बच सकता। यह अकाट्य सत्य है कि जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का फल मानव को किसी भी जन्म में भोगना अवश्य पड़ता है।

आइए! आज की युवा पीढ़ी की मानसिकता पर दृष्टिपात करें, जो ‘खाओ पीयो,मौज उड़ाओ’ में विश्वास कर ग़ुनाह पर ग़ुनाह करती चली जाती है निश्चिंत होकर और भूल जाती है ‘यह किराये का मकाँ है/ कौन कब तक ठहर पायेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’ यही संसार का नियम है कि इंसान कुछ भी अपने साथ नहीं ले जा सकता। परंतु वह आजीवन अधिकाधिक धन-संपत्ति व सुख- सुविधाएं जुटाने में लगा रहता है। काश! मानव इस सत्य को समझ पाता और देने में विश्वास रखता तथा परहितार्थ कार्य करता तो उसके ग़ुनाहों की फेहरिस्त इतनी लंबी नहीं होती। अंतकाल में केवल कर्मों की गठरी ही उसके साथ जाती है और कृत-कर्मों के परिणामों से बचना सर्वथा असंभव है।

मानव के सबसे बड़े शत्रु है अहं और मिथ्याभिमान; जो उसे डुबा डालते हैं। अहंनिष्ठ व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को हेय मानता है। इसलिए वह कभी दयावान् नहीं हो सकता। वह दूसरों पर ज़ुल्म ढाने में विश्वास कर सुक़ून पाता है और जब तक व्यक्ति स्वयं को उस तराजू में रखकर नहीं तोलता; वह प्रतिपक्ष के साथ न्याय नहीं कर पाता। सो! कर भला, हो भला अर्थात् अच्छे का परिणाम अच्छा व बुरे का परिणाम सदैव बुरा होता है। शायद! इसीलिए शुभ कर्मण से कबहुं न टरौं’ का संदेश प्रेषित है। गुणों की कीमत हमें आजीवन मिलती है और ग़ुनाहों का परिणाम भी अवश्य भुगतना पड़ता है; उससे बच पाना असंभव है। यह संसार क्षणभंगुर है,देह नश्वर है और मानव शरीर पृथ्वी,जल,वायु, अग्नि व आकाश तत्वों से बना है। अंत में इस नश्वर देह को पंचतत्वों में विलीन हो जाना है; यही जीवन का कटु सत्य है। इसलिए मानव को ग़ुनाह करने से पूर्व उसके परिणामों पर चिन्तन-मनन अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने के पश्चात् ही आप ग़ुनाह न करके दूसरों के हृदय में स्थान पाने का साहस जुटा पाएंगे।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ फॅमिली डे ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  फॅमिली डे।)

 

? आलेख – फॅमिली डे ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

वर्तमान समय में समाज जिस गति से आगे बढ़ रहा है, बदल रहा है, सभी जब भी आपस में मिलते हैं एक ही बात करते हैं कि पहले तो ऐसा नहीं होता थाl अब आपको नहीं लगता बहुत कुछ बहुत जल्दी बदल गया है? आखिर क्या बदला? पानी का रंग, फूलों की सुगंध, पक्षियों की आवाज, भवरों का गुनगुन या पत्तों का रंग? चलिए इन सब को छोड़ते हैंl कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारा देखने का नजरिया ही बदल गया हो? कहते हैं ना जैसी जाकि दृष्टि वैसी दिखे सृष्टिl जैसी नजर वैसा दिखे नजाराl हम इंसान एक दूसरे में बुराइयाँ ही खोज रहे हैंl यही हमारी दृष्टि का दोष हैl

किसी कवि ने क्या खूब लिखा है कि खिड़की की सलाखों से बाहर झाँक कर देखा तो नीचे कीचड़ और ऊपर चाँद पायाl

ये हमारा नजरिया ही तो है कि हम क्या ढूंढ़ रहे हैं हमें ज्ञात ही नहींl हम यहीं बातें अपने ड्राइंग रूम से लेकर ऑफिस के गलियारे तक, प्लेटफॉर्म से लेकर शादी के शामियाने तक सिर्फ और सिर्फ बुराइयाँ ही ढूंढ़ रहे हैं, बुराइयाँ ही देख रहे हैं और उन्हें ही बढ़ाचढ़ा कर एक दूसरे को बयां करते आ रहे हैंl हम समाज का एक ऐसा आइना बच्चों के सामने पेश कर रहे हैं जो उनकी परवरिश के दौरान सही नहींl इस तरह हम हमारे स्वयं के परिवार में भी पॉजिटिव एनवायरनमेंट क्रिएट नहीं कर पा रहे हैंl जब भी हम अपने परिवार के साथ बैठते हैं तो आस पडोस की, सगे संबंधियों की बुराइयाँ ही तो करते रहते हैंl

परिवार में बच्चों के साथ अच्छी बातें, अच्छी आदतें एवं अच्छे अनुभवों को साझा करेंl और एक पॉजिटिव एनवायरनमेंट क्रिएट करेंl

कुछ दिनों पहले हम फॅमिली डे मना रहे थेl सारा व्हाट्सप्प का इनबॉक्स भर गया थाl और बिना पढ़े ही डिलीट कर दिया गयाl

मैं सोच रही थी कि हम आज के दिन भी अपने परिवार में महज एक दिखावे की जिंदगी जी रहे हैंl हम कुछ बेशकीमती उपहारों के जरिये रिश्ते खरीद रहे हैंl क्या हम इतना भूल गये कि रिश्ते बिकाऊ नहीं होते?

इस खरीद फरोख्त कि दुनिया से बाहर आएंl अपने बच्चों को जीवन के अर्थ की सही पहचान कराएंl हमने तो नर्सरी के बच्चे को भी इस वैश्विक दौड़ का हिस्सा बना दियाl बच्चों की विशेषताओं एवं खूबियों को किनारे कर दियाl उनकी भावनाओं को कुचल कर रख दिया और बड़ी ही सहजता से ख दिया कि हमने यह तो नहीं कहा थाl

हम क्यों ऊँचे पद और प्रतिष्ठा के लालच में अपने बच्चों से उनका बचपना और साथ में उनकी मासूमियत जाने अंजाने में छीन रहे हैं ? अंत में मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि – प्यार, विश्वास और उम्मीद की जिंदगी अपने बच्चों को दीजिएl साथ ही उन्हें पहचानिए और महसूस कीजिएl

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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