हाड़ कँपा देने वाली, कयामत की ठंड फिर भी निकिता को मुँह पर रजाई ओढ़कर सोना अच्छा नहीं लगता। दम घुटने जैसा एहसास होता है। ये क्या—जैसे ही भगवान का नाम लेकर निकिता ने आँखें बंद कीं सोने का प्रयास किया ,एक मच्छर होठों के ऊपर, ठीक नाक के नीचे काट गया।वह खुद ही भुनभुनाने लगी–इन मच्छरों को जरा भी तमीज नहीं। काटने का सलीका तो सीख लेते। ठीक है कि”खून पीना तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है।”
खून ही पीना है तो चुपचाप पियो ना। तबला पेटी लेकर क्यों चले आते हो। उस पर भूँssssभूँ ssssगीत गाने की जरूरत क्या है।
पर नहीं, हम डंके की चोट पर पिएंगे—ढोल नगाड़े बजाकर पिएंगे। बिना ढोल नगाड़े बजाए, ताकत का लोहा कौन मानता है।डरता है कौन !
है कोई माई का लाल- जो हमारा कुछ बिगाड़ सके। बाल भी बाँका कर सके। पता चला कि उस मच्छर की सियासी हल्के में भारी दखल है। और वह “किम जोंग” प्रजाति का मच्छर है। जिनपिंग कबीले के मच्छरों से गाढ़ी दोस्ती है उसकी। तभी तो मगरा रहा है ।
ऐसे में नींद आने से रही। निकिता के भीतर का खोजी पत्रकार जाग्रत हो उठा। उसने गूगल सर्च किया तो पता चला कि वे फीमेल को इम्प्रेस करने के लिये गाते हैं। तो भाई मच्छर -जाओ ना ! जाकर अपनी मच्छरानी को रिझाओ ना गाकर। हमारी नींद में खलल क्यों डालते हो।
एक तो अपनी लंबूतरी नोंक से खून चूसते हो—-ऊपर से गीत संगीत का सहारा लेते हो।
असित बोले डार्लिंग–अपनी सहनशीलता बढ़ाओ। वैसे भी तुम कछुआ छाप क्वाइल, अगरबत्ती,लिक्विड सभी कुछ आजमा चुकी हो। कुछ बिगड़ा मच्छरों का। सब कुछ पचा गये। इनका इम्यून सिस्टम बड़ा तगड़ा है। ठीक वैसे ही जैसे जनता की सारी शिकायतों का नेता पर कोई असर नहीं होता। अब तुम रैकेट ले आओ, थोड़ी थोड़ी देर में घुमाती रहो। पहले भूँ भूँ सुनते थे अब तिड़ तिड़- तिड़ तिड़ सुनो। आत्मरक्षार्थ कोई न कोई उपाय तो करना पड़ेगा ना।
रही आवाज़ की बात तो तुम चाहो न चाहो सुनना तो पड़ेगा कितनी ही भौंडी, बेसुरी,खरखरी, कर्णकर्कश क्यों न हो। हमारे पास चुनाव की सुविधा कहाँ, जो मनपसंद आवाज़ का चयन कर सकें।
निकिता बोली असित तुम बात को कहां से कहां तक ले गये। टी वी चैनल ज्यादा न देखा करो। भक्तिभाव में लीन लोगों की संगत न किया करो।
तुम्हें पता है मुझे डेंगू से बड़ा डर लगता है। जानते हो कार्पोरेशन वालों ने क्या कहा–घर के बाहर रखे जलपात्रों में “गप्पी मछली”डालने का सुझाव दिया है। अब गप्पी मछली लाये कहां से ?
उन्हें पता है जब केवल शब्दों के जमाखर्च से काम चल जाता है तो खाली पीली मशक्कत कौन करे! घर घर गप्पी पहुँचाए कौन ? सुनते हैं अब लेडी मच्छर भी प्रतिशोध की मुद्रा में हैं। उनको अंडरएस्टीमेट करना भी ठीक नहीं।
अब बस भी करो निकिता- मच्छर पुराण खत्म करो। सो भी जाओ। जानती हो ना मच्छर हो या मच्छरानी, सियासी रंग में रंगकर एक रंग हो जाते हैं। ढंग एक हो जाते हैं।उनपर चढ़ने से रहा और दूसरा रंग।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘दो प्रेम-पत्र। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१६ ☆
☆ व्यंग्य ☆ दो प्रेम-पत्र ☆
प्राणप्यारे,
कल तुम्हें छोड़कर चली तो आयी लेकिन मुझे लगता है जैसे मेरा सब कुछ वहीं छूट गया। रास्ते में मेरी आंखें भर भर आती थीं, कुछ सूझता नहीं था। गुस्सा भी लगता था कि कहां से यह निगोड़ा पुन्नी का ब्याह आ पड़ा। यहां आकर जो मेरी दशा है सो मैं जानूं कि मेरा राम जाने। खाने पीने की इच्छा नहीं होती, किसी काम में मन नहीं लगता। दिल में टीस सी उठती है, सारा बदन जलता रहता है। प्यारे, लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में। दिन को आंखें मूंदे लेटी रहती हूं, रात को तारे गिना करती हूं। फिकर लगी रहती है तुम कैसे रहते हो, क्या खाते पीते हो, परेशान तो नहीं हो? बस प्यारे, मेरी यही प्रार्थना है कि तुम सब को छोड़कर आ जाओ।
तुम्हारी ही दुखिया
चुन्नी
जवाब
प्यारी चुन्नी,
अत्र कुशलं तत्रास्तु। तुम्हारी चिट्ठी कल मिली, पढ़ कर खुशी हुई। समाचार मालूम हुए। तुमने जो बातें लिखीं उनको पढ़कर चिन्ता होती है। तुमने जो लिखा है सो वह तुम्हारी भूल है। यहां तुम्हारा कोई भी जरूरी सामान नहीं छूटा। दोनों अटैची मैंने तुम्हारी सीट के नीचे रख दी थीं। कहीं रास्ते में किसी ने चुरा ली हों तो तुरंत लिखो जिससे मैं खोज करा सकूं। रास्ते में तुम्हारी आंख में कोयले की धूल चली गयी होगी, उसी की वजह से आंख में पानी आता रहा होगा। तुमसे कहा था कि खिड़की के पास मत बैठना लेकिन शायद तुम मानी नहीं। पुन्नी के ब्याह का जहां तक सवाल है तो उसमें गुस्सा करने का कोई मतलब नहीं। ब्याह जून में ही बनता था। पंडितों ने कहा था कि आगे साल भर तक कोई मुहूर्त नहीं निकलता। तुमने जो अपनी हालत लिखी सो बात ठीक नहीं। तुम फौरन किसी डाक्टर को दिखाओ। पैसे की फिकर मत करना, जो लग जाए सो लगा देना। यहां तो तुम बिल्कुल ठीक थीं, वहां क्या हो गया? लगता है ब्याह के घर में वनस्पति वगैरह ज्यादा खा गयीं। अम्मां से कहके तुम अपने खाने का इंतजाम अलग करवा लेना। ये उजड़े दयार में तुम कहां घूमती हो? घर के सामने तो कहीं उजाड़ है नहीं। लगता है तुम पीछे बगीचे में घूमती हो। उजड़े बगीचे में कहां मन लगेगा? घर में सबके साथ हंसा बोला करो तो मन लगे। तुम्हारे तारे गिनने की बात पढ़ कर हंसी आती है। पगली, तारे तो इतने सारे हैं, भला तुम उन्हें कहां गिन पाओगी? मेरा खाना पीना सब नट्टू के होटल में चलता है। पट्ठा बढ़िया कोरमा बनता है, तबियत खुश हो जाती है। मुझे कोई परेशानी नहीं है। तुमने जो मेरे आने की बात लिखी सो बहुत मुश्किल है। अभी बहुत सी जरूरी फाइलें निपटाने को हैं, भला उन्हें छोड़ कर कैसे आ जाऊं? खत का जवाब जल्दी देना। अम्मांजी बाबूजी को चरन छूना। टुल्लू ,मुंडू को प्यार।
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “वेस्ट नहीं, इन्वेस्टमेंट समझे जाने की जरूरत…” ।)
☆ शेष कुशल # ५८ ☆
☆ व्यंग्य – “वेस्ट नहीं, इन्वेस्टमेंट समझे जाने की जरूरत…”– शांतिलाल जैन ☆
9 नवंबर, 2025. जैन परिवार पूर्व और वर्तमान के सभी सरकारी कर्मचारियों,अधिकारियों का आभार व्यक्त करता है. काम के प्रति आपकी उदासीनता और बेरुखी के कारण हमारा परिवार देश के विकास के लिए, सरकारी खजाने में अत्यंत मामूली ही सही, योगदान दे तो पाया है. इसका पता भी हमें आज ही अख़बारों से चला जब सरकार ने संसद में बताया कि सरकारी दफ्तरों में चले सफ़ाई अभियान में रद्दी बेचकर सरकार को चार हज़ार पिच्चासी करोड़ रुपए मिले हैं. निश्चित ही इसमें वो फाईल भी रही होगी जिसमें दादाजी ने राशनकार्ड के लिए एप्लाय किया था और ताउम्र चक्कर काटने के बाद भी बन नहीं पाया था. उस मोटी सी पेंडिंग फाईल का डब्बा-बाटली वाले ने कम से कम एक रूपया तो दिया ही होगा. राष्ट्र के विकास में हमारे साधारण से मुफ़लिस परिवार से एक रूपए का योगदान भी कम नहीं होता श्रीमान्.
आप ही सोचिए, जो हमारे दादाजी ने उस समय राशन कार्ड बनवाने में टाईम वेस्ट नहीं किया होता तो आज ‘वेस्ट से वेल्थ’ कैसे बना पाती सरकार? फाईलों के पहाड़ों को वेस्ट नहीं इन्वेस्टमेंट के नज़रिए से देखे जाने की जरूरत है. देशभर में लाखों बाबूओं ने जो अपनी काहिली, कामचोरी और भ्रष्टाचार से आम आदमी को यह इन्वेस्टमेंट करने के लिए विवश नहीं किया होता क्या आज सरकार चार हज़ार करोड़ कमा पाती!! जो कागज़ कभी आम नागरिकों को उनके अधिकार नहीं दिला पाए अब सरकार का रेवेन्यू मॉडल बन चुके हैं.
फिर बात सिर्फ आर्थिक योगदान की नहीं है, मंत्रीजी ने यह भी बताया कि ‘ज़्यादातर पेंडिंग फाइलें और दूसरे पेपरवर्क के रूप में अटाला हटाने से 923 लाख वर्गफुट ऑफिस स्पेस खाली हुआ, इतनी जगह में एक बड़ा मॉल या वैसी ही बड़ी बिल्डिंग बन सकती है. जैन परिवार के राशन कार्ड की फाईल ने एक वर्गफुट जगह भी खाली करने में मदद की हो तो इसे मामूली योगदान न समझा जाए श्रीमान्. हम दादाजी के लिए कोई पद्म पुरस्कार नहीं मांग रहे, उनके योगदान की पावती भर मिल जाए, बस. लेमिनेट करा कर उनकी तस्वीर के बाजू में लगाकर हम उन्हें सच्ची श्रृद्धांजलि देना चाहते हैं. इससे हमारा अपराध बोध कम होगा. अब तक हम उन्हें झक्की इंसान समझते रहे. हमें लगता था उनकी कुंडली राग दरबारी के लंग्गड़ की कुंडली से मैच करती है. अगर उस ज़माने की प्रचलित दरों के अनुसार उन्होंने पाँच रूपए की रिश्वत दे दी होती तो महज़ एक पेज की दरख्वास्त में उसी समय काम हो गया होता. आज लगा कि वे झक्की नहीं दूरदर्शी थे. पहले एप्लीकेशन, फिर एफिडेविट, फिर मूलनिवासी का प्रमाणपत्र, फिर रिमाइंडर, रि-एप्लाय, रि-रिमाइंडर के कागज़ सबमिट कर-कर के थ्रू एक जाड़ी फाईल के देश के खजाने में तभी अपना योगदान करके चले गए. वे बो गए थे, सरकार काट रही है.
बहरहाल, आज से जैन परिवार सरकार का मुरीद हो गया है. उसने अब जाकर यह रियलाइज़ किया है कि बेचने के मामले में सरकार की नज़र में सब समान है. वह सरकारी दफ्तरों से निकले जूने-पुराने अटाले को भी उसी शिद्दत से बेच लेती है जिस शिद्दत से एयरलाईंस, पोर्ट, एयरपोर्ट, सार्वजनिक उपक्रमों, उद्यमों को बेच लेती है. जब बेचने ही निकले हैं श्रीमान् तो क्या लकड़ी के जंगल और क्या लकड़ी की टूटी कुर्सी!! सरकार वेस्ट बेचकर वेल्थ बनाने के मिशन पर काम कर रही है. इस बेचने को सरकार बेचना कहती भी नहीं, असेट मोनेटाईजेशन कहती है.
नेशन के लिए असेट मोनेटाईजेशन में अपने अल्प किन्तु महत्वपूर्ण योगदान से जैन परिवार गौरवांवित अनुभव करता है और उन सभी बाबूओं का आभार व्यक्त करता है जिनकी काहिली, लापरवाही, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के कारण जैन परिवार को यह सुअवसर प्राप्त हुआ है. आभार.
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ…” ।)
☆ शेष कुशल # ५७ ☆
☆ व्यंग्य – “ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ…”– शांतिलाल जैन ☆
‘मैं इमरजेंसी वर्क मीटिंग में हूँ। बाद में कॉल करता हूँ।’
‘झूठ लिखना पाप है’ – ऐसा तो न कहीं पढ़ा, न कहीं सुना। अलबत्ता ‘झूठ बोलना पाप है’ – बचपन से सुनते आ रहे हैं।
सो बोल नहीं रहे, लिख रहे हैं, धड़ल्ले से लिख रहे हैं। लिख कर रख ले रहे हैं, उसी को बार बार फॉरवर्ड कर दे रहे हैं। लिखना एक बार, फॉरवर्ड अनेक बार। इस कला में प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती श्रीमान्, एक गिफ्ट सी है जो मोबाईल खरीदने के साथ गॉड से मिल जाया करती है। नेटफ्लिक्स पर आप वेब सिरीज़ देख रहे हैं और कॉल रिसीव हुआ। लिखिए कि – ‘बॉस के साथ एक अर्जेंट मैटर पर डिस्कशन में हूँ। केबिन से बाहर आकर फोन करता हूँ’। फिर क्या तो आपका केबिन से बाहर निकलना और क्या ही आपका कॉल करना। यकीन मानिए लिखा हुआ झूठ पाप की केटेगरी में नहीं आता। आता तो लाखों व्हाट्सअप अंकल पाप की गठरी सिर पर लादे नरक में प्रवेश की कतार में खड़े होते। उनकी कहानी फिर कभी, फिलवक्त आज के विषय ‘ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ’ पर ही रहते हैं।
वाईफ का मूड सुबह से ख़राब है। मूड अगर सुबह आठ बजे के आसपास ख़राब हुआ है तो नौ साढ़े नौ तक तो माईग्रेन का माइल्ड से सीवियर केटेगरी में कन्वर्जन पक्का है। शॉपिंग ही इलाज़ है। शाम तक क्रेडिट कार्ड की शरण में जाना ही जाना है। तनाव पसरा है घर में कि घंटी बज उठती है। एक दोस्त का कॉल है। उठाऊँगा तो कहेगा – घर पर मिलने आना चाहता हूँ। ‘जी बहुत चाहता है सच बोलें, क्या करें हौंसला नहीं होता’। कुछ देर की ऊहापोह के बाद हौंसला जुटाकर लिखा – ‘सॉरी डियर, मैं आपसे मिल नहीं पाउँगा! आउट ऑफ़ स्टेशन हूँ, परसों लौटने का है। लौटने पर मैं ASAP जवाब दूँगा। कुछ अर्जेंट हो तो मैसेज करना। बाय।’ शहर में, दस मिनिट बाद ही, जो वो सामने पड़ जाता तो…। तो भी कुछ नहीं होता। आजकल झूठ बोलकर लोग शर्मिंदा नहीं होते। सारे ही बंदरों की पूँछ कटी हुई है इन दिनों। ऐसा कुछ हुआ भी नहीं, बस जवाब में उसने वसीम बरेलवी साहब का एक शेर लिख भेजा – ‘वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से, मैं ए’तिबार न करता तो क्या करता’।
अगर अब भी आपको लगता है झूठ लिखने से पाप लग सकता है तो आप ये जिम्मेदारी मोबाइल पर डालकर अपराध-बोध मुक्त हो सकते हैं। ऑटो रिप्लाई का सिस्टम अवेलेवल जो है। मैनेजर साहब ने अपने वाट्सअप अकाउंट में सेट कर रखा है। मैसेज मिला – ‘पिताजी नहीं रहे। शवयात्रा 11 बजे निज निवास से निकलेगी।’ रिप्लाईड इंस्टेंटली – ‘थैंक-यू, आपका संदेश पाकर हमें बहुत ख़ुशी हुई। हमारे प्रतिनिधि आपके पिताजी से शीघ्र संपर्क करेंगे। उनका लोकेशन शेयर कर सकेंगे तो हमें आसानी होगी। आपका दिन शुभ हो।’ बैकुंठ धाम की लोकेशन खोजने में कितने ऋषियों, संतों ने हिमालय में अपने आप को गला दिया श्रीमान् मैनेजर साहब !! क्या शेयर करें आपको ?
ऑटो रिप्लाई तो दादू ने भी सेट किया हुआ है। उसे लगता है हर बार मैं उसे लेख छप जाने का अलर्ट ही भेजता हूँ। मगर उस दिन तो हमारे घर में चोरी हो गई थी। दादू को मैसेज किया। ‘बधाई शांतिबाबू’ – दादू रिप्लाईड।
वफ़ा के शहर में अब सब झूठ लिखते हैं। जो झूठ सब लिखते हों वो झूठ नहीं रह जाता, न्यू नार्मल हो जाता है।
तो लिखिए, धड़ल्ले से लिखिए, झूठ लिखिए, फिलवक्त तो पाप नहीं ही पड़ेगा। पड़ने की संभावना हो तो भी ऑटो रिप्लाई करनेवाला मोबाइल हैण्डसेट नरक में जाएगा, आप और हम तब भी बचे रहेंगे।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘असली नास्तिक की पहचान‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१४ ☆
☆ व्यंग्य ☆ असली नास्तिक की पहचान ☆
स्वर्ग-नरक के विशाल स्वागत-कक्ष में भारी भीड़ जुटी थी। तिल धरने को जगह नहीं थी। मृत्युलोक से पहुंची आत्माओं के रिकॉर्ड खंगालने में चित्रगुप्त जी के आठ दस असिस्टेंट लगे थे। रिकॉर्ड के आधार पर स्वर्ग और नरक के अलॉटमेंट की लिस्टें निकाली जा रही थीं। आत्माएं दम साधे अपने कर्मों का फैसला सुनने के लिए खड़ी थीं। कई पाप-कर्म वाले भी इस उम्मीद में थे कि शायद एकाध पुण्य-कर्म के बदौलत स्वर्ग की लिस्ट में नाम आ जाए।
लिस्टें लगीं तो हल्ला-गुल्ला बढ़ गया। स्वर्ग की लिस्ट में जगह पाने वाले खुशी से ‘चित्रगुप्त जी जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे तो नरक की लिस्ट में ढकेले गये विलाप करके उसे अन्याय और भेदभाव बता रहे थे।
हल्ला-गुल्ला सुनकर यमराज वहां घूमते हुए आ गये। चित्रगुप्त जी से हाल-चाल पूछा । चित्रगुप्त जी ने जवाब दिया, ‘सब काम ठीक चल रहा है, प्रभु, लेकिन ये दो-तीन आत्माएं बड़ी देर से बहस कर रही हैं। बार-बार पूछती हैं कि उनका नाम नरक की लिस्ट में कैसे रखा गया।’
यमराज ने पूछा, ‘इनके रिकॉर्ड में क्या है?’
चित्रगुप्त जी बोले, ‘ये घोर नास्तिक हैं। भगवान के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठाते हैं। कभी मंदिर नहीं गये, कभी भगवान की पूजा नहीं की। कहते हैं भगवान के अस्तित्व का किसी ने कभी प्रमाण ही नहीं दिया। ‘मान लो’ ‘विश्वास करो’ कहने से काम नहीं चलता। इनका सवाल है कि बिना प्रमाण-सबूत के कैसे मान लें? अब बताइए इनको नरक में न भेजें तो क्या करें? एकदम ओपिन एंड शट केस है।
‘इनका यह भी कहना है कि वे नास्तिक नहीं, तर्कवादी हैं। असली नास्तिक वे हैं जो ऊपर से भगवान को मानने का ढोंग करते हैं, लेकिन भीतर से उन पर बिल्कुल विश्वास नहीं करते। जो भगवान का नाम जपते हैं, लेकिन धर्मस्थलों के दान-पात्रों से सारा चढ़ावा, बिना भगवान से डरे, गायब कर देते हैं। इनकी नज़र में नास्तिक वे नेता भी हैं जो जनता को दिखाने के लिए मंदिर में पूजा करते हैं, मंदिर बनवाते हैं, लेकिन जनता को मूर्ख बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जो दिन भर झूठ बोलते हैं, झूठे आश्वासन देते हैं। नास्तिक वे धर्मगुरु हैं जो धर्म को धंधा समझते हैं, जो भगवान पर भरोसा करने का उपदेश देते हैं लेकिन अपने साथ सशस्त्र सुरक्षाकर्मी लेकर चलते हैं। ये सब भगवान की मूर्ति को मिट्टी के पुतले से ज़्यादा कुछ नहीं समझते। इनकी नज़र में असली नास्तिक वे हैं जो भगवान का नाम लेकर हत्या और अपराध करते हैं।’
सयाने यमराज बोले, ‘ये लोग गलत नहीं कहते। शंका करने मात्र से कोई नास्तिक नहीं हो जाता। अगर कोई उनकी शंका का समाधान नहीं कर पाता तो उसमें उनका क्या दोष है? असली नास्तिक वही है जो ऊपर से ईश्वर को मानने का दिखावा करता है, लेकिन भीतर से नहीं मानता। यदि इन शंकालु लोगों ने कोई अन्य पाप नहीं किया, किसी को लूटा सताया नहीं, समाज का अहित नहीं किया, तो इन्हें नरक में भेजना उचित नहीं। इन्हें ऐसी जगह स्थान दिया जाए जहां इन्हें हमारी व्यवस्था को समझने का अवसर मिले और इनकी शंकाओं का समाधान हो। आगे से यह भी ध्यान रखें कि मुंह में राम और बगल में छुरी रखने वाले ढोंगी स्वर्ग में जगह न पा जाएं।’
चित्रगुप्त जी को ऐसी हिदायत देकर यमराज आगे बढ़ गये।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय व्यंग्य “बाढ़ में बन्दर-बाँट…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # १३
बाढ़ में बन्दर-बाँट… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
एक बाढ़ आई… दर्जनों पुल ढहे… सैकड़ों घर डूबे… हजारों बहे…लाखों मरे… करोड़ों का नुक़सान हुआ…अरबों की मदद चाहिए… l… नतीज़ा ?.. अरबों की मदद सेंक्शन हुई… करोड़ों जमा हुए… लाखों बाँटे गये… हजारों बँटे… सैकड़ों हिस्से में आये… दर्ज़ेनों में बन्दर-बाँट हुआ… एक… सिर्फ़ एक पल्ले पड़ा है… उसी एक रूपये की रेवेन्यु टिकट लेकर आम आदमी लाइन में खड़ा है… l
आपदा प्रबंधन, बाढ़ राहत कोष, हवाई सर्वेक्षण और बाढ़ आकलन पुनर्वास… इन चार स्कन्धों पर बाढ़-ग्रस्त अभिशप्त जनों की लाशें ढोई जाने की रस्में बख़ूबी अदायगी होती हैं l पूर्व चेतावनी प्रणाली, नियंत्रित संरचना ये सब इस शव-यात्रा में अनिवार्यतः शामिल होते हैं.. l…
“ज़नाज़े में बहुत हैं तमाशाई देखो
चूना लगाके अहा!रोशनाई देखो”
नज़ारा देखो… कितने स्कूलों की छत भरभराकर नौनिहालों की इहलीला समाप्त कर गई… सरकारी निर्माण को परखने, एन.ओ.सी. देने हेतु विशेषज्ञ अभियंता हैं… तो बीच में विश्वसनीय मापक बन काहे टाँग अड़ाती हैं ये अतिवृष्टि एवं बाढ़..?
“पुलिया टूटी, सड़क बही,
हर ओर तबाही का मंज़र
सीधी – सादी आबादी,
आँसू पीने की आदी है”
चमचासान की मुद्रा में बैठे, मौक़ा-परस्त चमचे नियमों को परास्त कर, लोकतंत्र के गाल पर तमाचा जड़ने में ज़रा भी नहीं हिचकते… आपको तो विदित है ही कि, “चमचा जिस बर्तन में रहता है, उसे खाली कर देता है… l “क्या कुछ ग़ायब नहीं हो जाता…?…
गोदाम से ग़ायब हुआ, अनाज देखिये,
‘राजेश’ इस वतन का उफ़ रिवाज देखिये…!
“चले केन्द्र से पूरे एक सौ
आते-आते पचपन ग़ायब
सावन ग़ायब, बचपन ग़ायब
मेल-जोल अपनापन ग़ायब”
किसी को रूखा-सूखा नसीब हुआ है, इसका तात्पर्य ही यही है कि कोई कथरी ओढ़कर घी चुपड़ी हथिया चुका है—
“जिनके हिस्से बारिश आई, सर से पाँव तर-बतर हुए
आम आदमी के हिस्से में केवल बूँदा-बाँदी है”
बाढ़ आकर तबाही मचाकर अलविदा हो जाती है… परन्तु ऐसे बहुतायत हैं, जिनकी आँखों में निश-दिन बाढ़ है, जिनका जीवन ही बारामासी आषाढ़ है…!
बाढ़ आई-गई, अपनी बला से!…तथाकथितों के सर कड़ाही में और पाँचों उँगलियाँ घी में सराबोर रहे! तभी तो इस व्यंग्यकार ने उवाचा है —
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – ईमानदारों का सम्मेलन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७४ – व्यंग्य – ईमानदारों का सम्मेलन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
पहली बार जिला मुख्यालय में “ईमानदारों का राष्ट्रीय सम्मेलन” आयोजित हुआ। स्वागत द्वार पर बड़े अक्षरों में लिखा था—“सच्चाई ही हमारी पहचान है।” नीचे छोटा अक्षर में लिखा था—“प्रायोजक: यूनिवर्सल कंस्ट्रक्शन कंपनी (जिस पर सीबीआई की जांच जारी है)।” मुख्य अतिथि, माननीय मंत्री जी, जिन्होंने हाल ही में अपनी तीसरी पत्नी के नाम पर पाँच एकड़ ज़मीन रजिस्टर कराई थी, मंच पर पहुँचे तो तालियाँ गूँज उठीं। भीड़ में से किसी ने कहा— “यही सच्चे ईमानदार हैं, सब कुछ खुलेआम करते हैं!” मंत्री जी मुस्कुराए। उन्होंने भाषण में कहा— “देश को अब ईमानदारी की कमी नहीं, बस पहचानने की ताकत चाहिए।” भाषण समाप्त होते ही मंच संचालक ने घोषणा की— “अब ईमानदारी सम्मान समारोह होगा।” पुरस्कार स्वरूप मंत्री जी ने हर प्रतिनिधि को घड़ी भेंट की, जिस पर उनका चुनाव चिन्ह खुदा था। पत्रकारों ने पूछा— “घड़ी असली है या नकली?” आयोजक बोला— “घड़ी असली है, बस समय नकली बताती है।”
दूसरा सत्र ‘नैतिकता के नए मानदंड’ पर था। एक वक्ता, सरकारी बाबू, बोले—“पहले रिश्वत को अपराध माना जाता था, अब यह सहयोग शुल्क कहलाने लगी है। समाज विकासशील है, शब्दावली भी होनी चाहिए।” दूसरे वक्ता, प्राइवेट स्कूल के संचालक, बोले—“हम बच्चों में नैतिकता लाने के लिए जीना कठिन बना देते हैं। फिर जब बच्चा नियम तोड़ने लगे, तो वही असली नागरिक कहलाता है।” सभागार तालियों से गूंज उठा। तभी मंच के पीछे से आवाज़ आई—“कृपया चोरी गई कुर्सियाँ वापस करें।” प्रतिनिधि मुस्कुराए—“ईमानदारी का सम्मेलन है, कुर्सियाँ कहाँ जाएँगी?” कुछ देर बाद पाया गया कि दर्जनभर कुर्सियाँ पार्किंग में बिक्रय हेतु रखी थीं। आयोजक ने घोषणा की— “यह व्यवस्था शुल्क है।” बाबू जी बोले— “वाह, देश आगे बढ़ रहा है!”
तीसरे सत्र में “डिजिटल ईमानदारी” पर चर्चा हुई। एक युवा अफ़सर ने कहा—“अब सब ऑनलाइन है। भ्रष्टाचार भी पारदर्शी हो गया है। ट्रांजैक्शन सीधे खाते में आती है, दलालों की ज़रूरत नहीं रही। यह डिजिटल इंडिया की सफलता है।” एक और विद्वान बोले—“ईमानदारी अब ऐप में मिलती है, वेरिफाई करके डाउनलोड करनी पड़ती है।” तभी मंच के सामने एक गरीब व्यक्ति अपनी फ़ाइल लेकर आया—“बाबू जी, दो महीने से आवेदन लंबित है।” बाबू ने मुस्कुरा कर कहा—“भाई, यह ईमानदारी का सम्मेलन है, सुविधा केंद्र नहीं। यहाँ सिर्फ भाषणों की अनुमति है, काम की नहीं।” वह आदमी चुप हो गया, लेकिन पौधे के पास खड़ा एक बच्चा बोला—“अगर यह ईमानदार हैं, तो हमारे गाँव में झूठे कौन रहते हैं?” सभा मौन हो गई। पंखे की आवाज़ में ईमानदारी की झिल्ली सी फड़फड़ाने लगी।
सम्मेलन के अंत में अध्यक्षीय वक्तव्य हुआ। अध्यक्ष महोदय बोले— “हम सब अपने-अपने क्षेत्र के ईमानदार लोग हैं। मैं डॉक्टर के नाम पर दवा बेचता हूँ, शिक्षक नकली प्रमाणपत्र देता है, अफ़सर काम न करके फ़ाइल दबाता है, नेता जनता को भरोसा देता है—और यही राष्ट्रीय एकता का आधार है।” सभागार ठहाकों से भर गया। उन्होंने कहा— “अगले वर्ष हम ‘सच्चाई दिवस’ मनाएँगे, बशर्ते प्रायोजक मिल जाए।” बाहर निकलते हुए किसी ने पूछा— “क्या सम्मेलन सफल रहा?” आयोजक हँसा— “पूरा बजट खर्च हो गया, अब तो ईमानदारी साबित है!” रात को शहर लौटने वाले प्रतिनिधियों की बसें चलीं। सड़क किनारे एक ठेला वाला बैठा था, धीरे से बुदबुदाया— “साहब लोग ईमानदार हैं, इसलिए गरीब अब भी ज़िंदा है।” सड़क की बत्तियाँ झिलमिलाईं—शायद वे भी इस नई ईमानदारी पर मुस्कुरा रही थीं।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “फेरी वाले और पड़ोसन”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २० ☆
☆ व्यंग्य ☆ “फेरी वाले और पड़ोसन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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बचपन में जब भी मां मुझे बाजार भेजा करतीं, मोल – भाव कर दाम निश्चित करके समान खरीदने की हिदायत देना न भूलतीं। कभी – कभी तो वे मंगाई जाने वाली वस्तुओं का व्यापारी द्वारा निर्धारित अनुमानित मूल्य बताकर, मेरे द्वारा तय की जाने वाली राशि की पहली परिधि भी निश्चित कर देतीं, जैसे आलू का भाव 20 रूपये किलो बताया जाए तो तुम 15 रूपये किलो मांगना।
मां के कहने से मैं खरीद फरोख्त के समय थोड़ा प्रयास भी करता कि व्यापारी द्वारा मांगी कीमत से कम दामों में मुझे वस्तु मिल जाए, परंतु मुझे खेद है कि मैं भाव ठहराने अथवा तय करने की कला में निपुणता प्राप्त नहीं कर पाया और हमेशा ही अपनी मां एवं मित्रों की तथा अब पत्नी की नजरों में भी एक कुशल खरीददार न कहला सका। अपने द्वारा खरीदी गई किसी भी वस्तु का मूल्य बताकर में लोगों पर रौब न जमा सका, उन्हें आश्चर्य में न डाल सका। जब मेरे मित्र और मेरी पत्नी मेरे द्वारा लाई गई वस्तु का मूल्य सुनकर मुझे ठगा हुआ साबित कर देते हैं तो मुझे ऐसा लगता है कि शायद वह दिन मेरे जीवन में कभी नहीं आएगा जब मेरे द्वारा खरीदी वस्तु की तथा उसके मूल्य की तारीफ करते हुए लोग दांतों तले अंगुली दबा कर मुझसे उस दुकान का पता पूछेंगे। कभी – कभी मुझे दुख होता है कि मैंने दाम ठहराने अथवा मोल भाव करने जैसी अत्यावश्यक कला मन लगा कर क्यों न सीखी।
मोल भाव करने की आवश्यकता कहां नहीं पड़ती, रिक्शा करने, सब्जी खरीदने से लेकर शादी करने – कराने और पुराने कपड़ों से बर्तन खरीदने तक कदम – कदम पर मोलभाव कर मूल्य ठहराने या दाम निश्चित करने की आवश्यकता पड़ती है।
मेरी पत्नी पर हमारी पड़ोसन का प्रभाव है जहां दिन के बारह घंटे में से छह घंटे तो फेरी वालों का आना – जाना लगा ही रहता है। अच्छे – अच्छे पठान फेरी वाले जो दरी – गलीचे जैसी महंगी वस्तुएँ किश्तों में बेचते हैं हमारे पड़ोस में आकर ठग लिए जाते हैं। न जाने कौन सी कला हमारी पड़ोसन के पास है, सारे मोहल्ले की महिलाओं पर खरीद फरोख्त के मामले में उनका प्रभाव है।
जानकार फेरी वाले तो स्वयं आवाज लगते हुए उनके घर के दरवाजे पर बैठ जाते हैं। अनजान या नए फेरी वालों को पकड़ – पकड़ कर लाने का कार्य उनके चुन्नू – मुन्नू किया करते हैं। वैसे हमारा और हमारी पड़ोसन का मकान गली की नुक्कड़ पर ही है, अतः यह कहा जा सकता है कि चाहे वह कोई भी फेरी वाला क्यों न हो बिना मेरे पड़ोस में रुके आगे जा ही नहीं सकता।
फेरी वालों को कुशलता पूर्वक ठग कर उनसे उचित मूल्य पर समान खरीदने में हमारी पड़ोसन को सिद्धि प्राप्त है। मुझे तो ऐसा लगता है कि जैसे गीदड़ मौत आने पर शहर की ओर भागता है वैसे ही फेरी वाले दुर्भाग्य आने पर हमारे पड़ोस में सामान बेचने पहुंच जाते हैं। पड़ोसन की ख्याति धीरे – धीरे आसपास के सभी घरों की घर मालकिनों तक एवं उनके माध्यम से घर मालिकों तक पहुंच चुकी है। मोहल्ले की अनेक महिलाएं जो वस्तु क्रय करने में हमारी पड़ोसन का नेतृत्व स्वीकार कर चुकी हैं, फेरी वाले के आने पर चुन्नू – मुन्नू की सूचनाओं के द्वारा उनके घर पहुंच जाती हैं, पड़ोसन की अगुवाई में वस्तु को उचित मूल्य पर खरीदने।
ठंड का मौसम चल रहा है आजकल फेरीवालों को फंसा कर सस्ते मूल्य पर ऊन खरीदने का अभियान मोहल्ले की महिलाओं ने उन्हीं के नेतृत्व में चलाया है। घर घर में ऊनी बनियान बनाई जा रहीं हैं। फुर्सत के क्षणों में मेरे घर में भी मेरी पत्नी की बातों का विषय ऊन ही रहता है। हमारे किस पड़ोसी की पत्नी ने कौन से रंग का कितना ऊन, किस मूल्य पर लिया है इसकी जानकारी तो मुझे है ही यदि मैं गंभीरता पूर्वक पत्नी की बात सुनूं तो यह भी मालुम कर सकता हूं कि किस पड़ोसन ने किसके लिए कितने फंदे डाले।
एक दिन जब मेरी पत्नी पड़ोसन के यहां उनके आमंत्रण पर किसी फेरी वाले से कुछ खरीदने गई थी, मैंने सोचा क्यों न अपने गर्म कपड़े निकाल कर उनकी झाड़ – पोंछ करके उन्हें धूप दिखा दूं। मैंने घर की तमाम पेटियां, अलमारियां इत्यादि छान डालीं परंतु जब मुझे अपना इकलौता ससुराल से मिला गर्म सूट न मिला तो मैं आश्यर्च में पड़ गया। वही तो एक सूट था जिसे कभी – कभी विशेष पार्टियों आदि में पहिन कर मैं लोगों पर अपनी सम्पन्नता की धाक जमा दिया करता था। पत्नी के वापस आने पर रहस्योद्घाटन हुआ – मेरा सूट और अपनी एक पुरानी बनारसी साड़ी फेरी वाले को देकर उन्होंने कुछ बर्तन पड़ोसन के नेतृत्व में ले लिए थे। मैंने अपना माथा ठोक लिया और पड़ोसन को कोसता हुआ पश्चाताप करने लगा। मुझे दुखी और परेशान देख कर पत्नी अपने हाथों का ऊन दिखा कर प्रसन्नता पूर्वक बोली – चिंता न करो अभी, मैंने कुछ पुराने बर्तनों के तुम्हारी स्वेटर के लिए ही ऊन लिया है, दो – चार दिन में ही स्वेटर तैयार हो जाएगी। मैं बर्तनों के बदले ऊन की बात सुनकर चौंक गया, परंतु पत्नी विजय से गर्वित मुस्कान लिए सलाई में फंदे डालते हुए बनियान का डिजाइन पूछने पुनः पड़ोसन के यहां जा चुकी थी। मैंने चुपचाप कपड़े पहने और इस पड़ोसन से दूर नए मकान की तलाश में निकल पड़ा।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – भक्त और ऑनलाइन समीक्षाएँ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७३ – व्यंग्य – भक्त और ऑनलाइन समीक्षाएँ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
पवित्रता और श्रद्धा का वह युग, जब भक्त मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अपनी धूल-धूसरित चप्पलों के साथ अहंकार को भी बाहर छोड़ आते थे, अब समाप्त हो चुका है। अब तो भक्त नहीं, बल्कि ‘ग्राहक-उपभोक्ता’ आते हैं, जिनके हाथों में धूप-दीप की जगह चमचमाता स्मार्टफोन होता है और मस्तिष्क में एक स्पष्ट प्रश्न गूँजता है: “मैंने समय दिया, पैसा चढ़ाया, अब रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) क्या है?” यह युग ‘त्वरित मोक्ष’ (Instant Salvation) का है, जहाँ आस्था भी एक ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म बन गई है। मंदिर, जो कभी आत्मा की शांति का आश्रय थे, आज गूगल मैप्स पर तीन-सितारा रेटिंग वाले एक पर्यटन स्थल से ज़्यादा कुछ नहीं। सबसे हृदयविदारक दृश्य तब उत्पन्न होता है जब कोई भक्त बाहर आकर अपनी निराशा को व्यक्त करता है: ‘भगवान को चार बार आवाज़ दी, कोई जवाब नहीं आया, प्रसादी भी ठंडी थी, इसलिए एक स्टार!’ यह समीक्षा केवल एक ऐप पर दर्ज की गई टिप्पणी नहीं है; यह उस उपभोक्तावादी संस्कृति का महाकाव्य है, जिसने ईश्वर को भी एक विफल सर्विस प्रोवाइडर बना दिया है, और यह मन को झकझोरने वाला सत्य है कि हम अपनी समस्याओं के तत्काल समाधान की चाह में, धैर्य और विश्वास की अपनी सदियों पुरानी पूंजी को नष्ट कर चुके हैं।
यह ‘वन स्टार’ की विडंबना ही हमारे समय का सार है। भक्त की अपेक्षाएँ किसी प्रीमियम मेंबरशिप वाले ग्राहक से कम नहीं होतीं। उन्होंने लाइन में खड़े होकर ‘वीआईपी दर्शन’ के लिए अतिरिक्त शुल्क दिया है, उन्होंने अपनी अर्जी (चिट्ठी) बाकायदा ड्रॉप-बॉक्स में डाली है, तो अब उनके ‘ईष्ट देव’ को तत्काल प्रकट होकर, कम से कम, उनकी नौकरी की तरक्की या बेटी के विवाह की गारंटी तो देनी ही चाहिए थी। भक्त यह भूल गया है कि यह मंदिर किसी ’24×7 कॉल सेंटर’ का ब्रांच ऑफिस नहीं है, जहाँ शिकायत दर्ज होते ही ‘अगले तीन मिनट’ में समस्या का निवारण हो जाएगा। वे भूल गए हैं कि आध्यात्मिक यात्रा एक ‘स्लो बफरिंग’ वाली लंबी फ़िल्म है, जिसे देखने के लिए धैर्य का डेटा पैक चाहिए, न कि ‘फास्ट-फॉरवर्ड’ बटन। यह त्रासदी केवल भगवान की अनुपस्थिति की नहीं है, बल्कि भक्त के भीतर से उस ‘अदृश्य विश्वास’ की अनुपस्थिति की है, जो बिना किसी सबूत या गारंटी के भी, अपनी यात्रा को जारी रखता था। हम प्रमाणिकता और दृश्यता के इतने आदी हो चुके हैं कि जो चीज़ आँखों से ओझल है, उसे हम स्वचालित रूप से ‘फ़र्जी’ मान लेते हैं।
आस्था का यह बाजारीकरण दरअसल हमारी आत्मिक दरिद्रता का प्रमाण है। जब जीवन की जटिल समस्याएँ (जैसे कि ईएमआई का बोझ, या बॉस का अत्याचार) हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, तो हम त्वरित समाधान के लिए दौड़ते हैं, और मंदिर हमें एक ‘मैजिक पिल’ बेचने वाली दुकान लगने लगती है। भक्त यह उम्मीद करता है कि अगर वह एक ‘मेगा डोनेशन’ देता है, तो उसकी फाइल भगवान के इनबॉक्स में सबसे ऊपर चली जाएगी, क्योंकि वह ‘प्रीमियम ग्राहक’ है। वह नहीं समझता कि ब्रह्मांड की व्यवस्था किसी ‘फ़र्स्ट कम, फ़र्स्ट सर्व’ की नीति पर नहीं चलती, और वहाँ कोई ‘सुपर एडमिन’ विशेष लाभ नहीं देता। इस हृदयविदारक नाटक में, भक्त की आँख में एक आँसू भी है—वह आँसू जो उसकी गहरी असुरक्षा और खालीपन को दर्शाता है। वह सचमुच डरा हुआ है और उसे किसी सहारे की ज़रूरत है, लेकिन सहारा ढूँढने के लिए उसने जिस आधुनिक ‘समीक्षा-आधारित’ प्रणाली को चुना है, वह उसकी आस्था को और खोखला कर रही है, क्योंकि जब वह ‘एक स्टार’ देता है, तो वह वास्तव में भगवान को नहीं, बल्कि अपने ही टूटे हुए विश्वास को रेटिंग दे रहा होता है।
इस ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ की बीमारी ने भगवान के अस्तित्व के पूरे सिद्धांत को ही विकृत कर दिया है। ज़रा सोचिए, अगर यह रेटिंग प्रणाली व्यापक हो जाए तो क्या होगा: किसी गरीब ने मन्नत माँगी और लॉटरी नहीं लगी, वह तुरंत आकर लिखेगा: ‘गॉड ऑफ़ लक, फ़ेल! 0/100, विल नॉट रेकमेंड।’ किसी धनी व्यापारी को थोड़ी सी हानि हुई, वह लिखेगा: ‘पोर्टफोलियो मैनेजमेंट बहुत ख़राब है, एआई (AI) आधारित आशीर्वाद की ज़रूरत है।’ मंदिरों को शायद अब एक ‘फ़ॉलोअप टीम’ रखनी पड़ेगी जो भक्तों को फ़ोन करके पूछे: ‘सर, क्या आपको हमारी कृपा प्राप्त हुई? क्या आप हमारे ‘दिव्य समाधान’ से संतुष्ट हैं?’ यह सब इतना मन को झकझोर देने वाला है, इतना तर्कहीन है कि दिमाग चकरा जाता है। हमने ‘कर्म’ को ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ में बदल दिया है और ‘मोक्ष’ को ‘इंस्टॉलेशन प्रोसेस’ मान लिया है। हमारी समस्या यह नहीं है कि हमें भगवान नहीं मिले, हमारी समस्या यह है कि हमने भगवान को ढूँढने का सही पता ही भुला दिया है।
इस पूरे तंत्र में सबसे दयनीय प्राणी है पुजारी। वह बेचारा अब ‘कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजर’ बन गया है। उसकी धोती भले ही पवित्र हो, लेकिन उसकी ज़िम्मेदारियाँ कॉर्पोरेट हैं। वह सुबह उठकर भगवान का अभिषेक करता है या भक्तों की शिकायतों का निवारण? भक्त आकर उस पर चिल्लाता है: ‘महाराज, मेरे बेटे को विदेश की वीज़ा फाइल को पास क्यों नहीं कराया? पिछली बार मैंने आपको अच्छा दक्षिणा दिया था!’ पुजारी, जो कभी आत्मज्ञान का वाहक था, अब ‘फ़्रंटलाइन एग्जीक्यूटिव’ है, जिसे ‘फ़ॉल्टी ग्रेस’ या ‘अन-डिलीवर्ड मिरेकल’ की शिकायतें संभालनी हैं। मंदिर प्रबंधन (जो शायद एक ट्रस्ट का ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ है) उस पर ‘ग्रोथ’ और ‘ईश्वर के विज़िबिलिटी स्कोर’ बढ़ाने का दबाव डाल रहा है। पुजारी अपनी माला जपता है और मन ही मन सोचता है: ‘हे प्रभु, या तो इन्हें असली ज्ञान दो, या मुझे इस रिव्यू सिस्टम से मुक्ति दो।’ यह तनावपूर्ण स्थिति इतनी हृदयविदारक है कि हम इसमें छिपे हुए सच्चे आध्यात्मिक सेवक के दुख को अनदेखा कर देते हैं।
यह व्यवहार, दरअसल, एक ‘आस्था का फ़ास्ट फ़ैशन’ है, जिसमें सब कुछ क्षणिक और खर्च करने योग्य है। आज का भक्त ‘ईश्वर के साथ संबंध’ नहीं चाहता, वह ‘ईश्वर से सौदा’ चाहता है। वह अपने जीवन को एक ‘टू-डू लिस्ट’ के रूप में देखता है, जहाँ भगवान की ज़िम्मेदारी है कि वह सबसे मुश्किल ‘टास्क’ को पूरा करें। वे भूल गए हैं कि ‘आस्था’ एक लंबी अवधि का निवेश है, जिसके लाभ तुरंत नहीं दिखते, बल्कि जीवन के अंतिम खाते में जुड़ते हैं। यह ‘मन को झकझोरने वाला’ तथ्य है कि हम, जो अपनी मर्ज़ी से मंदिर आते हैं, जब अपनी इच्छा पूरी नहीं होती, तो सार्वजनिक रूप से ‘ईश्वर की गुणवत्ता’ पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। क्या किसी भक्त ने कभी अपनी ‘बुरी आदतों’ को ‘वन स्टार’ दिया है? क्या किसी ने अपने ‘क्रोध’ या ‘लालच’ के लिए ‘रिफंड’ माँगा है? नहीं। हम अपनी विफलताओं का दोष एक अदृश्य शक्ति पर मढ़ने में अत्यधिक कुशल हो चुके हैं, क्योंकि ऐसा करना हमारी ज़िम्मेदारी को आसान बना देता है।
विडंबना यहीं खत्म नहीं होती। कुछ भक्त ‘अच्छी’ समीक्षाएँ भी लिखते हैं, लेकिन उनका आधार भी उतना ही खोखला होता है। ‘मैंने 100 रुपए चढ़ाए थे, और रास्ते में 1000 रुपए का नोट मिल गया। 5 स्टार! बेहतरीन सेवा!’ इस तरह की समीक्षाएँ साबित करती हैं कि ईश्वर को भी अब ‘चमत्कार-वितरण’ (Miracle-Delivery) के आधार पर मापा जा रहा है। वे यह नहीं समझते कि शायद उस दिन उन्हें 1000 रुपए का नोट इसलिए मिला होगा ताकि वे यह जानें कि लालच और कृतज्ञता में क्या अंतर है। लेकिन नहीं, उनके लिए तो भगवान एक उच्च-रिटर्न वाली ‘म्यूचुअल फंड स्कीम’ हैं। यह ‘मन को झकझोरने वाला’ है कि हमने अपनी आध्यात्मिकता को पूरी तरह से भौतिक लाभ और लेन-देन तक सीमित कर दिया है, और इस प्रक्रिया में हमने उस ‘निःस्वार्थ प्रेम’ को खो दिया है जो बिना किसी अपेक्षा के भक्ति की नींव रखता था। यह प्रेम, यह निःस्वार्थता ही वह चीज़ है जिसे हमने सबसे सस्ता समझा और जिसे सबसे पहले ऑनलाइन बाज़ार में बेच डाला।
अंत में, यह कथा भगवान की विफलता की नहीं, बल्कि हमारी मानव जाति की आधुनिक विफलता की है। हमने एक ऐसी दुनिया बना ली है जहाँ हर अनुभव को रेटिंग दी जाती है, जहाँ हर भावना को इमोजी में समेटा जाता है, और जहाँ ‘विश्वास’ का अर्थ ‘गारंटी’ बन गया है। जब भक्त बाहर आकर ‘वन स्टार’ देता है, तो वह वास्तव में चिल्लाकर कह रहा होता है: “मेरी इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं, इसलिए तुम्हारा अस्तित्व व्यर्थ है!” यह हमारी ‘उपभोक्ता-केंद्रित’ मानसिकता का अंतिम चरण है, जहाँ हम भगवान को भी अपनी नौकरशाही और उपभोक्ता अधिकारों के अधीन देखना चाहते हैं। हरिशंकर परसाई जी शायद आज यह देखकर आहें भरते कि जिस समाज की उन्होंने आलोचना की थी, वह समाज अब अपनी आलोचना को भी ‘वन स्टार’ देकर आगे बढ़ जाएगा। हमें याद रखना चाहिए: ईश्वर ने हमें आज़ादी दी है, लेकिन हम उस आज़ादी का प्रयोग उन्हें ‘रेटिंग’ देने में कर रहे हैं। काश, हम अपनी आत्मा की गहराई में झाँककर, अपने जीवन को ‘पांच स्टार’ देने लायक बना पाते, न कि अपने मनचाहे परिणाम न मिलने पर उस अदृश्य शक्ति को दोष देते।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “मूंछें, पुलिस और रौब”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १९ ☆
☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “मूंछें, पुलिस और रौब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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यदि कोई पुलिस वाला किसी गुंडे, बदमाश अथवा शरीफ आदमी के साथ गाली – गलौच या मारपीट करके उसकी इज्जत रूपी नाक काट लेता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि यह तो रोजमर्रा की बात है, किंतु यदि कोई व्यक्ति किसी हवलदार को चेलेंज करके उसकी मूंछें काट कर उसे मुछमुंडा बना दे तो यह न केवल मूंछों की हानि उठाने वाले उस पुलिसिया के लिए वरन पूरे विभाग के लिये शर्म से डूब मरने वाली घोर आश्चर्य की बात होगी।
एक बार ऐसी ही एक घटना किसी थाने के प्रधान आरक्षक के साथ घटी। बताया गया कि आरक्षक को वहीं के एक व्यक्ति ने चेलेंज किया कि वह आरक्षक की मूंछें काट लेगा और आखिर रात के दो बजे उस व्यक्ति ने हवलदार साहब को “क्लीनशेव” कर दिया। यह पता नहीं चला कि इतना सब होने के बाद भी पुलिस ने उस दुस्साहसी का क्या किया ?
पुलिस विभाग का गहराई से निरीक्षण करने पर ऐसा समझ में आता है कि इस विभाग के लोगों को मूंछों से बड़ा लगाव है। 95 प्रतिशत पुलिसिया मूंछधारी होते हैं। जितने आकार प्रकार की मूंछें दुनिया में हो सकती हैं सभी इस विभाग के लोगों में पाई जाती हैं। तलवार से भाला कट तक और मक्खी से तितली के आकार तक की मूंछों को आप विभिन्न पुलिसियों के चेहरों पर शान से जमे देख सकते हैं।
लोगों का ऐसा सोचना है कि मूंछों से चेहरे पर कठोरता आती है, रौब मैं वृद्धि होती है, चेहरा मर्दाना मालूम होने लगता है। पुलिस को इन सभी की आवश्यकता होती है जो वे मूंछ उगाकर ग्रहण करते हैं। बड़ी – बड़ी मूंछें रख कर बहुत से कमजोर, डरपोक और पिद्दी टाइप के पुलिसिया भी लोगों पर रौब जमाने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। उनकी मूंछें देखकर ही लोग समझ जाते हैं कि यह पुलिस वाला है इससे दूर ही रहो। अब आप ही अंदाज लगाएं कि पुलिस की नौकरी और मूंछों का कैसा सम्बंध है। मूंछें पुलिस वालों की पहचान बन गई हैं, जिस पुलिस वाले की जितनी बड़ी मूंछें वह उतना ही दबंग, जांबाज माना जाता है। चावल में कंकड़ों की भांति पुलिस विभाग में भी कुछ मुछमुंडे पाए जाते हैं, किंतु उनके चेहरों में वो बात नहीं होती जो मूंछ वालों के चेहरों पर होती है।
पुलिस विभाग में मूंछों की लोकप्रियता और महत्व देखते हुए मेरे हिसाब से तो इसे पुलिस वालों के लिए आवश्यक करार दे दिया जाना चाहिए। बल्कि मैं तो यहां तक कहूंगा कि जिस तरह इस विभाग में प्रवेश के लिए लम्बाई, सीना और वजन की न्यूनतम माप निर्धारित है उसी तरह मूंछों की भी न्यूनतम लम्बाई – चौड़ाई निर्धारित कर दी जाना चाहिए। मुझे विश्वास है कि इस कदम से अवश्य ही अपराधों की संख्या में कमी आएगी। जब मूंछें पुलिस का खौफ बढ़ाएंगी तो अपराधियों के हौसलों का पस्त होना स्वाभाविक ही है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले तो पुलिस विभाग में मूंछ मेंटेनेंस भत्ता भी मिला करता था।
हां, एक परेशानी उस समय अवश्य पैदा हो सकती है जब मूंछ धारी पुलिस वालों के रौब से बचने अथवा उन पर अपना रौब कायम करने के लिए गुंडा तत्व भी उसी टक्कर की अथवा उनसे बड़ी मूंछें रखने लगें, फिर मूंछों में “कॉम्पटीशन” पैदा हो जाएगा। अस्तु, इस स्थिति में ऐसा कोई नियम भी बनाया जाना आवश्यक हो जाएगा जिससे आम आदमी की मूंछें पुलिस वालों की मूंछों से टक्कर न ले सकें। कहने का अर्थ यह कि आम जनता की मूंछों का आकर प्रकार भी निर्धारित करना होगा।
खैर यह तो एक ऐसी बात है कि जिस पर तरह – तरह से विचार किया जा सकता है। अब बात उठ गई है तो लोग इस पर सोचेंगे भी, सुधार भी करेंगे। समस्या उन बेचारे पुलिस वालों की होगी जिनकी मूंछें ऊगती ही न हों अथवा बिरली हों। ऐसी दशा में एक मात्र सहारा नकली मूंछें लगाने का ही बचेगा, किन्तु नकली मूंछें लगाना भी आज की स्थिति में कहां तक उचित होगा विचारणीय है। जब एक पुलिस वाला एक साधारण से आदमी से अपनी असली मूंछें कटवा चुका हो तब नकली मूंछों से बनी इज्जत का कहां तक भरोसा किया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि अब पुलिस विभाग में पर्याप्त संख्या में महिलाएं भी आ गई हैं और आती जा रही हैं। महिलाओं के मूंछें नहीं होतीं और न ही उगाई जा सकती हैं अतः महिला पुलिस कर्मियों को लेकर मूंछों के प्रसंग पर बात करना व्यर्थ है। हां, बात खतम करते – करते इतना अवश्य कह दूं कि बिन मूंछों की महिलाओं के सामने बड़ी – बड़ी मूंछों वाले भी झुकते देखे गए हैं। चाहे वे गुंडे – बदमाश हों या मंत्री – संतरी। अतः विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि महिलाएं पुलिस विभाग में मूंछें न होने के बाद भी उतनी ही सफल होंगी जितना सफल कोई मर्द बड़ी – बड़ी मूंछों के सहारे भी नहीं हो सकता।