डॉ. मीना श्रीवास्तव
☆ कथा-कहानी ☆
☆ समवेदना – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆
सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
सई और सचिन, दोनों की ही पिछले चार-पाँच महीनों से भागदौड़ जारी थी। पूरा एक महीना तो बस योजना बनाने में ही निकल गया। दूल्हा-दुल्हन को लाभान्वित करने वाले विवाह का शुभ मुहूर्त तय होने के पश्चात् जब उन्हें ज्ञात हुआ कि, उस दिन उनका पसंदीदा सभागृह उपलब्ध है, तो उन्होंने उसका तत्काल आरक्षण कर लिया। अब उनकी असली भागमभाग की शुरुआत हुई।
बहुत पहले से ही उन दोनों ने अपनी लाड़ली इकलौती बिटिया का विवाह बड़ी धूमधाम से मनाने का फैसला कर लिया था – लेन -देन, बारातियों का आदर सम्मान जैसे अहम प्रश्नों के उत्तर समधी जी ने बड़े सलीक़े से दे दिए थे, सो उन दोनों के तनावग्रस्त मन को काफी राहत मिली थी। परन्तु अन्य साज सामान की खरीदारी, गहने, घरेलू सामान, पूजा की तैयारी, घर की सजावट एवं कई अन्य चीजें बाकी थी। उस पर निमंत्रण सूची पर काफी विचार-विमर्श चल रहा था, तब कहीं जाकर अंतिम फेहरिस्त तैयार होने वाली थी। ऐसे में निमंत्रण पत्रिका का चयन भी एक समय लेने वाली प्रक्रिया होती है। आने वाले समय में तो बस काम का अटल पहाड़ सामने उनके इंतजार में था। उन दोनों की अक्सर कई मुद्दों पर गहन चर्चा होती, कभी कभी थोड़ी गर्मजोशी से बहस होती, परन्तु इस जुगाली के अंत में जैसे उनमें मतैक्य हो जाता, वैसे इस बार भी वे कई मुद्दों पर सहमति बना चुके थे। विचारों के धागे उलट पलट कर उलझे तो थे लेकिन धीरे धीरे उनको सुलझाने के निरंतर प्रयास के कारण यह उलझन अंततः समाप्त हो गई, और प्रत्येक कार्य योजना के अनुसार मुकाम हासिल करता रहा।
जल्द ही निमंत्रण देने का सिलसिला भी ख़त्म हो गया। चाय- नाश्ते का पूरा ऑर्डर ही दिया गया था। अपने सगे सम्बन्धियों को भेंट करने के लिए उपहार पैक करके तैयार कर लिए गए। खाना बनाने एवं ऐन वक्त पर उभरने वाले तमाम आकस्मिक काम काज करने के लिए दो अतिरिक्त कामकाजी महिलाऐं भी गत आठ दिन से जुट गईं थीं। घर की सजावट शुरू हो चुकी थी। जहाँ विवाह संपन्न होने वाला था उस हॉल में ले जाने वाले सामान से भरे बैग पैक होकर तैयार थे—यानी सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं—दोनों में उत्साह की लहरें उमड़ रहीं थीं। उनकी उमंगों का ज्वार मानों उफान पर था। देखते देखते कल आने वाला गणेश और मातृका पूजन का दिन देहलीज पर खड़ा दस्तक दे रहा था।
तेजी से भागने वाले इतने दिनों तक अपनी बेटी के बिछोह के विचार से विचलित होने तक का समय भी नहीं मिल पाया था – परन्तु आज – आज इस घड़ी में, सिर्फ एक ही अनुभूति उसके मन को कचोट रही थी। – एक नन्हीसी कली जैसी उसकी मासूम बिटिया की हर बात, बढती उम्र के साथ बदलती हुई उसकी खिलखिलाती बाललीलाएँ, उम्र की एक एक दहलीज को पार करता उसका कली से फूल में रूपांतरण! फूल में परिवर्तित होते होते उसके बदलते हठ और मांगें! दूसरी तरफ जाने-अनजाने में वृद्धिंगत होती समझदारी, सब कुछ उसकी स्मृति में शीशे की तरह साफ़ दिखाई देने लगा सई को। नन्ही मासूम सलोनी याद आयी, पर याद करना हो तो भूलना पड़ता है। हालत यह थी कि, सलोनी के नन्हे-नन्हे प्यारे बचपन का एक भी पल वह बिसरी ही कहाँ थी, जो उसे याद करना पड़ता? उन यादगार लम्हों को भूलना वैसे भी असंभव ही था। नन्ही सलोनी की वजह से दोनों की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी—जो ज़िंदगी अब तक निरर्थक और उदास लगती थी, उसे एक नया अर्थ प्राप्त हुआ था। उनके जीवन को मानों एक नई दिशा मिल गई थी।
‘सलोनी’… कितना प्यारा और सुन्दर नाम सोचा था उन्होंने उसके लिए। वह नन्हीसी बच्ची थी ही वैसी! मनमोहक गुड़िया जैसी लुभावनी, मुस्कुराती- गेहुँआ रंग, बाएं गुलाबी गाल पर खिली एक छोटीसी डिंपल। बेहद खूबसूरत, पानीदार, भावभीनी मतवाली आँखें – पहली ही नज़र में उसने इन दोनों का मन मोह लिया था। उसे देखते बराबर ही दोनों ने तुरंत फैसला किया, कि वे अब अन्य बालकों का मुआयना नहीं करेंगे। उन्होंने आश्रम प्रबंधक को अपने फैसले की सूचना दी। कानूनी औपचारिकताएँ पूरी की गईं और वे दोनों उसे लाने के लिए कोजागिरी पूर्णिमा के दिन चले गए। मन पर सम्मिश्र भावनाओं का घना कोहरा छा गया था। भय – दबाव- उत्सुकता- बेचैनी – विषाद और मन ही मन उस मासूम बच्ची की असली माँ के लिए एक गहरी सहानुभूति- वह अभागी माँ कभी भी यह नहीं जान पाएगी कि उसके ही पेट से जन्मी उसकी लाड़ली बिटिया हमेशा के लिए कौनसे पराये लोगों के हाथों में पहुँच जाएगी। सई को इस वास्तविकता पर बहुत रंज हो रहा था- परन्तु इसका कोई इलाज नहीं था। आश्रम की यहीं शर्त थी।
—– आश्रम में पहुँचते बराबर सई ने उस नन्ही कली को गोद में उठा लिया और अनायास ही अपनी ह्रदय से लगा लिया, और बस उसी अंतरंग पल में, मानों उसे विचलित करने वाले विचारों का मन पर हावी हुआ बोझ सदा के लिए उतर गया। वह बच्ची भी सई से लिपट गई। सई का हृदय भर आया। वह बच्ची को बारम्बार चूमती रही। जैसे ही उसने उसके लिए लाए नए झबला-टोपी अपने हाथों से उसे पहनाए, उसका मन एक अनामिक आनंद और अनकही संतुष्टि से प्रफुल्लित हो उठा। यहाँ आते समय वे दोनों आये थे, अब विधि के विधान के अनुसार वे हमेशा हमेशा के लिए ‘तीन’ हो गए थे। वे एक अलग ही उल्लास और उमंग के साथ बाहर आए। मुख्य द्वार पर पहुँचते ही सई सलोनी को लेकर वहीं रुक गई, जबकि सचिन कार लेने चला गया।
उस अबोध बालिका के साथ सई लगातार बातें करती जा रही थी। —– “देखो ये पमपम– पसंद आई? और वहां देखो- उसे पेड़ कहते हैं– कितना बड़ा है न? और पूरा हरा हरा –‘ — जिसे दुनिया की कोई जानकारी तक नहीं थी, उस नवजात बालिका को पेड़ दिखाते दिखते उसकी नजर अनायास ही उस पेड़ के पीछे से झांकती दो व्याकुल आँखों की और आकर्षित हुई–.. ..
वे आँखें उस नन्ही बच्ची को हसरत भरी निगाहों से ताक रही थीं। उन सजल नेत्रों से निरन्तर बहती आंसुओं की धार सई दूर से ही महसूस कर पा रही थी। जैसे ही वह पेड़ की ओर बढ़ीं, एक औरत पेड़ की ओट से धीरे से झाँकी…मटमैली फटी साड़ी पर लगे कई पैबंद के बावजूद वह मुश्किल से ही अपने शरीर को ढक पा रही थी। उसके रूखे बाल बिखरे हुए थे और उसका कमजोर शरीर एकदम निस्तेज लग रहा था। उसने अपने हाथ से सई को इशारा किया — “आगे मत आओ।” —- वहीं से उसने अपनी उंगलियों को अपने कानों पर मोड़ बड़े प्रेमभाव से उस नन्ही बालिका की बलैया ली, अपना हाथ उठाकर उठाकर, ‘अच्छा है-अच्छा है’ का संकेत कर बच्ची को खूब आशीर्वाद दिए। सई की ओर अप्रत्याशित कृतज्ञता भरी नज़र से देखते हुए, उसने अपने हाथ जोड़ लिए – और पीछे मुड़कर देखते हुए बड़ी ही तेज़ी इस कदर भाग गई कि देखते देखते सई की आँखों से ओझल हो गई…
.. .. .. .. सई का मन भावनाओं की उथलपुथल से मचलने तो लगा था, परन्तु इसी बीच कई और अपरिचित भावनाओं का कोहरा उसके मन पर छाने लगा —— “क्या वह इस नन्ही की माँ हो सकती है? इतनी दूर से भी, मैं निश्चित रूप से उन कई एक भावनाओं के अम्बार को महसूस कर सकती थी, जो एक के बाद तेजी से उसके पारदर्शी चेहरे पर महीन बदलियों की भांति छाते और छंट जाते। उसे अपने पेट से जने गोले को ऐसे को इस तरह दुनिया जहाँ के थपेड़े झेलने के लिए छोड़ देने के अपराधबोध से वह शर्म के मारे मानों धरती में धंसे जा रही थी। परन्तु उसकी आँखों ने कई अनकही बातें व्यक्त कर दीं थीं —- भले ही काफी दूर से ही क्यों न हो, अपनी बेटी को देखने की खुशी— अब फिर से उसे कभी न देख पाने का अपार अकथनीय दुःख – और एक अनामिक संतुष्टि। और – और अपने ही हाथों से अपने “मातृत्व” की छाप हमेशा के लिए मिटा देने की असीम मानसिक वेदना –जो किसीको भी लब्जों में बयान नहीं की जा सकती। हृदय को अंदर से बाहर तक तोड़ मरोड़ कर रख देने वाली भयानक पीड़ा के ज्वलंत सत्य का एहसास अनायास सई के चेहरे पर भी उभरकर व्यक्त हो गया था। — “उस पल सई को लगा कि परकोटि की विवशता का मूर्तिमंत रूप उसके सामने खड़ा है। परन्तु सचमुच ही वह अबला स्त्री एवं सई, दोनों ही उस क्षण बेबस थे। आश्रम का एक सख्त नियम था कि एक बार आप अपने बच्चे को आश्रम के दरवाज़े पर छोड़ आए, तो ज़िंदगी में फिर कभी भी उसके समक्ष नहीं आ सकते। और यह जानते हुए भी, जैसे ही उसे भनक लगी कि कोई उसकी बेटी को गोद ले रहा है, तो आज उस असहाय माता ने इतना साहसी निर्णय इसलिए लिया था ताकि, वह अपनी बिटिया को अंतिम बार देख सके, भले ही दूर से ही क्यों न हो!
—–सई का दिल और आँखें दोनों ही आँसुओं से भर आईं। उससे दूर भागती हुई उस स्त्री को उसने मन ही मन सच्चे दिल से वादा किया कि वह उसकी बेटी की माँ बनेगी, और उसी क्षण वह उस नन्ही बिटिया की असली माँ बन गई——-
—— हॉर्न बजते ही सई की चेतना जागी। धीरे से आँखें पोंछते हुए वह सलोनी को धीरे से अपनी बाँहों में भरकर कार में बैठ गई। शांति से सो रही उनकी नन्हीसी परी को वे दोनों कुछ समय तक अपलक देखते रहे, और फिर वे सलोनी के नए घर की ओर निकल पड़े—- यह जानकर कि वे खुद कभी किसी के भी असली माता-पिता नहीं बन पाएंगे, इस सदमे से थोड़ा उबरने के बाद, उन्होंने बहुत सोच-विचार के बाद यह निर्णय लिया। ससुराल और मायके के सभी सदस्यों ने उसे तहे दिल से स्वीकार कर लिया था। इसलिए, सलोनी का घर पर बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया गया —-
—- और फिर, जैसे कोई कोमल कली हौले हौले खिलती है, वैसे ही वक्त के साथ सलोनी भी धीरे-धीरे सजीला स्त्रीत्व प्राप्त करती गई — और वे दोनों तुष्टि से उसे देखते रहते। बढ़ती उम्र के साथ, उसकी पसंद, विचार, रहन-सहन-बातचीत, व्यवहार, राय, अभिव्यक्ति—सब कुछ बदल रहा था,— सलोनी में हो रहे इतने सारे बदलावों को वे दोनों अभिभावक के रूप में सचेतन रूप से महसूस कर रहे थे। वह बुद्धिमान तो थी ही, और उसके व्यक्तित्व में वृद्धिंगत होती प्रगल्भता अक्सर उन दोनों को कृतार्थ होने का एहसास दिलाती थी। उन्हें बार बार अनुभूति होते रहती कि, सलोनी के उनके घर-आंगन में प्रवेश करने मात्र से ही उनका जीवन परिपूर्ण और सार्थक हो गया है। “गोद लेने की अवधारणा” तो उनके भाव विश्व से कब की लुप्त हो चुकी थी। घर में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। वह पूरी तरह से लाड़प्यार से पल रही थी। उसे अपनी पसंद की शिक्षा लेने की स्वतंत्रता थी। और अब उसने अपनी इंजीनियरिंग की शिक्षा भी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर ली थी — देखते देखते वह ब्याह करने योग्य हो गई थी। सब कुछ सुचारु रूप से मन के माफिक चल रहा था — सलोनी के और उन दोनों के भी। परन्तु फिर भी, उससे पहले कई सालों से, उनके मन पर लगातार एक दबाव बना हुआ था— सलोनी को एक दिन खुद के बारे में सत्य पता चल ही जाएगा —- तब क्या होगा? उसका और हम दोनों का भी ——-
जब वह अठारह वर्ष की हुई, तब मनोचिकित्सकों की सलाह और सहायता से सलोनी को सई और सचिन ने बतलाया था कि, वे उसके असली माता-पिता नहीं हैं। अधिकांश बच्चे मनोवैज्ञानिक रूप से टूट जाते हैं जब उन्हें अप्रत्याशित रूप से यह कड़वी सच्चाई पता चलती है कि जिन्हें वे अपने माता-पिता कहते हैं, वे उनके वास्तविक जैविक माता-पिता नहीं हैं, तथा कोई भी नहीं जानता कि उनके वास्तविक माता-पिता कौन हैं। यह सत्य निगलना उनके लिए बहुत कष्टप्रद होता है, इसलिए अधिकतर बच्चे मानसिक रूप से अत्यंत विचलित होकर विचित्र और असंगत व्यवहार करने लगते हैं। डॉक्टर ने उन्हें अच्छी तरह आगाह किया था —- “यह अनुमान लगाने का कोई तरीका नहीं है कि, ऐसे बच्चे इस आकस्मिक आघात को ठीक से झेल पाएंगे या नहीं” —- और दोनों ही इस बात को लेकर बेहद तनाव में थे। दोनों के मन में डर था कि सलोनी उनसे दूर हो जाएगी। लेकिन उसे किसी न किसी मोड़ पर यह बात मालूम होना जरुरी था। इस पर सुकून इस बात का था कि, आजतक किसी और ने बेबाकी से उसे यह बात नहीं बताई थी।
सलोनी को सच्चाई पता चलते ही उसने भी अपेक्षा के अनुसार व्यवहार करना शुरू कर दिया। उसने सात-आठ दिनों से उन दोनों से बात तक नहीं की थी – न ही ढंग से खाना खाया था – वह घंटों खुद को कमरे में बंद किए रहती थी… इधर-उधर धक्का मुक्की करते हुए छटपटाती रहती थी — बिना किसी वजह के उसका चीखना चिल्लाना जारी था, मानों हवा से लड़ाई झगड़ा कर रही हो — दोनों ही बहुत हतप्रभ और भयाकुल थे। परन्तु मनोचिकित्सक के उपबोधन (काउंसेलिंग) का प्रभाव धीरे धीरे असरदार हो रहा था।
…… और एक दिन, जैसे ही वह उठी, सई के गले में अपनी बाँहें डाल जोर जोर से निरंतर रोती रही। उसकी सिसकियाँ धीरे धीरे शांत हुईं। उसे लगा जैसे उसके मन पर छाए चिंता के घने बादल छंट गए हो। —- “माँ, मैं समझ गई —चाहे मुझे किसी ने भी जन्म दिया हो, आप ही मेरे सच्चे माता-पिता हैं और हमेशा रहेंगे। मैं जानती हूँ कि आप मन की गहराई से मुझे बहुत प्यार करते हैं। और मैं भी आप दोनों से उतना ही प्यार करती हूँ। आपको छोड़ कोई और मेरे माता-पिता नहीं हो सकते।” — और सलोनी के इन प्रेमभरे बोलों के साथ ही सभी के मन का बाँध टूट गया। उसी अनमोल क्षण को साक्षी मान उन तीनों के बीच एक नया, समृद्ध और दृढ़ रिश्ता अंकुरित हुआ। दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था। आश्रम से उस गुड़िया को घर लाते वक्त उन्हें जो प्रसन्नता हुई थी, वह अधिक थी, या इस क्षण में अनुभव की हुई प्रसन्नता की भावना, यह प्रश्न निरर्थक ही साबित होता था। —–
और देखते ही देखते सलोनी विवाह के उम्र तक बड़ी हो गई। उसने अपना जीवनसाथी खुद ही चुना था — बड़ी समझ बूझ के साथ. रिश्ता बहुत ही अच्छा था। लड़का अमेरिका में नौकरी कर रहा था। उसका संपूर्ण परिवार सर्वार्थ रूप से समृद्ध था। रिश्ते को नकारने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। सबसे अहम बात यह थी कि उस लड़के और उसके परिवार वालों ने यह सत्य भी सहजता से स्वीकार लिया था कि सलोनी उनकी गोद ली हुई लड़की है। उन्होंने दिल की गहराई से इस विवाह के लिए हामी भरी थी — और विवाह की घडी बस चार दिन दूर थी। यह तो मानी हुई बात थी कि शादी के बाद सलोनी अमेरिका जाने वाली थी — यह सोचकर कि अब सलोनी इसके बाद किसी और की होगी, उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे ——-
— और आज, इतने सालों बाद, उसे अचानक उस स्त्री की याद आ गई — जो पेड़ की ओट से ही सही, अपनी बेटी को अंतिम बार देखने की आस लिए हुए थी—उसे उतनी दूर से आशीर्वाद दे रही थी वह — अपने दिल पर हमेशा के लिए पत्थर रख कर अपनी बेटी से जीवन भर के दूर जा चुकी थी वह —–
.. .. .. सई को गहरा एहसास हुआ —- “उस औरत को समाज ने निष्कासित कर दिया था, और मैं यहाँ बहुत ही सम्मानजनक रूप से जी रही हूँ, सलोनी को नौ महीने अपनी कोख में पाले बिना ही उसकी माँ होने का सुख अनुभव कर रही हूँ — अपने आँचल में कन्यादान का पुण्य बटोर रही हूँ, हम इतिकर्तव्यता का श्रेय लेते हुए आनंदोत्सव मना रहे हैं। लेकिन वह असली जनिता? हम कैसे कह सकते हैं कि सामाजिक रूप से दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है? भले ही किसी को यह ज्ञात न हो कि वह इस लड़की, सलोनी, की जननी है, पर मैं तो यह सत्य कैसे नकार सकती हूँ? बेचारी वह अनामिका माता! उसे तो अपनी बेटी का नाम तक मालूम नहीं है! परन्तु उसकी बेटी कैसी दिखती है – क्या करती है – कहाँ रहती है, सुरक्षित और खुश है या नहीं – ऐसे सब विचार उसके मन में ज़रूर मंडराते होंगे, है ना? — यानि हम दोनों के अंतर्मन की ‘माँ’ बिल्कुल एक जैसी ही तो है —- दोनों की भावनाएं एक जैसी – प्यार की कसक वैसी ही – और बेटी से बिछड़ने की व्यथा का एहसास भी एक जैसा है। क्या इसी को ‘समवेदना’ कहते हैं?
परन्तु … परन्तु शायद — शायद नहीं– बिल्कुल निश्चित ही — तब की उसकी ये सारी भावनाएँ – जब वह हतोत्साहित होकर मज़बूरी में अपनी बेटी को अपने ही हाथों से खुद से दूर धकेल रही थी – मेरी अब की भावनाओं से कहीं अधिक तीव्र और दर्दनाक थीं, भले ही उसने उन्हें न दर्शाया न ही बतलाया! बावजूद इसके मैंने तब भी उन्हें महसूस किया था – और अब तो मैं उसे लगातार और भी अधिक प्रकर्ष के साथ अनुभव कर रही हूँ – क्योंकि न केवल उसे इस स्पष्ट सत्य की जानकारी थी कि, वह अपनी बेटी को भविष्य में जीवन में फिर कभी भी, यहाँ तक कि, दूर से भी देख तक नहीं पाएगी, बल्कि उसके पास इस हलाहल को पचाने के अलावा कोई विकल्प तक नहीं था। यह सब झेलते हुए उसने कितनी प्रचंड मात्रा में क्लेश सहे होंगे—
— परन्तु मेरे साथ ऐसा नहीं है। — ऐसा तो तो होगा नहीं कि, सलोनी का विवाह होने के बाद मैं कभी उसे
देख नहीं पाऊँगी। आज मैं ‘बिछोह’ इस शब्द का दर्दनाक अर्थ सही मायने में समझ पा रही हूँ।”
— सई ने अत्यंत दृढ़ता से यह महसूस किया, और मन ही मन उस माँ के सामने हाथ जोड़े – एक बार फिर उस अनजान जनिता माता को उसकी अपनी बच्ची के बारे में आश्वस्त किया, जो उसके लिए हमेशा के लिए अजनबी हो गई थी। उस स्त्री ने सई के आँचल में न केवल अपनी बेटी सौंपी थी, बल्कि एक सम्पूर्ण “मातृत्व” भी प्रदान किया था – आज पहली बार, सई के हृदय में उसके प्रति इतनी गहराई से समाई हुई वास्तविक और असीम कृतज्ञता उसकी आँखों से ऑंसुओं की बरसात का रूप लेकर बह रही थी। और इतने सालों से मन की गहराई में छाया घना कोहरा अप्रत्याशित तेजी से छंट चुका था।
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मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
सांगली, महाराष्ट्र मो ९८२२८४६७६२
हिंदी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव
संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈















