हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 362 ☆ आलेख – “व्यंग्य लेखन के वर्तमान मानक” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 362 ☆

?  आलेख – व्यंग्य लेखन के वर्तमान मानक ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य लेखन साहित्य की वह विधा है जो समाज के अंतर्विरोधों, विसंगतियों और विद्रूपताओं को उजागर करती है। यह महज़ हँसाने का माध्यम नहीं, बल्कि एक सशक्त सामाजिक टिप्पणी है, जो समाज को आईना दिखाने का साहस रखती है। वर्तमान समय में जब सूचना की गति तेज़ है, और सामाजिक ढाँचे में निरंतर परिवर्तन हो रहे हैं, तब व्यंग्य लेखन के मानकों में भी परिवर्तन और परिष्कार हुआ है।

आज के व्यंग्य लेखन में स्पष्ट दृष्टिकोण का होना अनिवार्य है। लेखक को यह पता होना चाहिए कि वह किस सामाजिक या राजनीतिक प्रवृत्ति पर प्रहार कर रहा है। व्यंग्य किसी घटना, व्यक्ति या प्रवृत्ति की आलोचना तो करता है, परंतु वह आलोचना बौद्धिक और कलात्मक होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत या अमर्यादित। आधुनिक व्यंग्य एक विचार का पक्ष लेकर उसकी विरोधी सोच को अतिशयोक्तिपूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे हास्य उत्पन्न होता है और साथ ही मूल सन्देश भी स्पष्ट हो जाता है।

आज के व्यंग्य लेखन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विषयवस्तु में अत्यधिक विशिष्टता है। सामान्य कथाओं या घटनाओं से हटकर, यदि किसी अजीब, अतिरेक और अप्रत्याशित उदाहरण के माध्यम से व्यंग्य रचा जाए, तो वह अधिक प्रभावशाली होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई लेखक सरकारी तंत्र की आलस्यपूर्ण कार्यशैली पर व्यंग्य लिखता है, तो वह ‘एक कछुए को नौकरी लगने और विभागीय फाइलों में अटक जाने’ जैसी कल्पना का सहारा ले सकता है, जिससे हास्य भी उत्पन्न हो और पाठक ठिठककर सोचने को भी मजबूर हो।

व्यंग्य का उद्देश्य केवल उपहास करना नहीं है। यह सामाजिक जागरूकता फैलाने, सोच बदलने और व्यवस्थागत सुधार के लिए जनमत तैयार करने का माध्यम है। आज के दौर में, जब संचार के नये माध्यम जैसे मोबाइल ऐप, सोशल मीडिया और इंटरनेट समाचार पोर्टल सक्रिय हैं, व्यंग्य लेखन की पहुँच पहले से कहीं अधिक हो गई है। एक व्यंग्य रचना मिनटों में हज़ारों तक पहुँच सकती है, जिससे लेखक की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।

आज व्यंग्य लेखन में नैतिक सीमाओं का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि भाषा या विचार का। लेखक को यह सावधानी रखनी होती है कि वह किसी समूह, जाति, धर्म, लिंग या विकलांगता को लक्षित कर हास्य न बनाए। यह अंतर बहुत महीन होता है, पर समझना आवश्यक है कि व्यंग्य कहीं कटाक्ष न होकर मानहानि या असंवेदनशील मज़ाक में न बदल जाए। एक ज़िम्मेदार व्यंग्यकार वही है जो समाज को चुभने वाले प्रश्न पूछे, पर मर्यादा का पालन भी करे।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में वर्तमान व्यंग्य लेखन ने नए रूप धारण किए हैं। जहाँ पहले व्यंग्य मुख्यतः साहित्यिक पत्रिकाओं और अख़बारों तक सीमित था, अब यह मंचीय प्रस्तुतियों, सोशल मीडिया, यूट्यूब चैनलों और ऑनलाइन पत्रिकाओं तक पहुँच चुका है। मंचीय प्रस्तुतियों में “ऐसी तैसी डेमोक्रेसी” जैसे तीक्ष्ण प्रयोगों ने व्यंग्य को आधुनिक युवाओं के बीच पहुँचाया है। इन मंचों पर राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर गीतों, संवादों और कविता के माध्यम से तीखा व्यंग्य प्रस्तुत किया जाता है। इसी प्रकार विज्ञापन की दुनिया में ‘अमूल’ के पोस्टर निरंतर हल्के फुल्के परंतु प्रभावशाली व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं।

हिंदी के समकालीन व्यंग्यकारों में पंकज प्रसून का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो विज्ञान आधारित व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा हरि जोशी, सुशील सिद्धार्थ, विवेक रंजन श्रीवास्तव जैसे लेखक आज भी क्लासिक व्यंग्य की परंपरा को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए आगे बढ़ा रहे हैं। इनकी रचनाओं में भाषा की चपलता, प्रतीकों की नवीनता और सामाजिक अंतर्दृष्टि देखने योग्य है।

व्यंग्य लेखन की प्रक्रिया में रचनात्मक संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। एक प्रभावी व्यंग्य में विषय वस्तु स्पष्ट, भाषा शैली सहज और कथानक सुसंगठित होता है। लेखक को यह निर्णय लेना होता है कि वह किसी एक विचार के पक्ष में रहेगा या उसके विरोध में, और उसके बाद रचना को उसी धारा में बहाना होता है। हास्य उत्पन्न करने के लिए अतिशयोक्ति, विरोधाभास, विडंबना, नकल, रूपांतरण और द्विअर्थता जैसे उपकरणों का उपयोग करना पड़ता है। यह सभी उपकरण भाषा, संदर्भ और समय के अनुसार भिन्न रूपों में प्रयुक्त होते हैं।

भाषा की दृष्टि से आज का व्यंग्य बहुस्तरीय हो गया है। एक ओर वह ग्रामीण परिवेश की बोलियों से लेकर शहरी शब्दावली तक को आत्मसात करता है, वहीं दूसरी ओर आज की पीढ़ी से जुड़ने के लिए वह विज्ञापन, फिल्मी संवाद, मोबाइल ऐप्स, मीम और इंस्टाग्राम की भाषा का भी प्रयोग करता है। यह बदलाव व्यंग्य को समसामयिक बनाता है, पर इसके साथ-साथ लेखक को इस बात का ध्यान भी रखना होता है कि उसकी भाषा कहीं अर्थ का अनर्थ न कर दे।

व्यंग्य लेखन आज केवल लेखकों तक सीमित नहीं रहा। पाठक, श्रोता और दर्शक भी इसके सहयात्री बन गए हैं। प्रतिक्रिया और समीक्षा की संस्कृति ने व्यंग्य को पारस्परिक संवाद का माध्यम बना दिया है। यही कारण है कि एक अच्छा व्यंग्यकार अपने पाठकों की प्रतिक्रिया को गंभीरता से लेता है और समयानुसार अपनी शैली में परिवर्तन करता है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में व्यंग्य लेखन केवल एक साहित्यिक अभ्यास नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद, आलोचना और चेतना का सशक्त माध्यम बन चुका है। इसके मानक अब भाषा की शुद्धता से अधिक विचार की स्पष्टता, दृष्टिकोण की गहराई, नैतिक जिम्मेदारी और समसामयिकता की माँग करते हैं। व्यंग्य अब महज़ ‘हँसाने’ के लिए नहीं, बल्कि ‘सोचने’ और ‘बदलने’ के लिए लिखा जा रहा है—और यही उसकी सबसे बड़ी सफलता है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 254 ☆ संस्कृति और परम्परा का अनूठा मेल – कजरी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना संस्कृति और परम्परा का अनूठा मेल – कजरी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 254 ☆ संस्कृति और परम्परा का अनूठा मेल – कजरी

वर्षा ऋतु आगमन से, सावन -भादों मास प्रकृति के रंगों में सराबोर हो धरती का स्वागत करने को आतुर हो उठता है। कजरी के राग सुन झूमते लोगों का दिखना बहुत अच्छा लगता है। रक्षाबंधन का पर्व मनाने के लिए बहनें मायके आतीं हैं। वहाँ सखियों से मिलना, कजरी तीज के अवसर पर व्रत रखकर शिव पार्वती के मिलन का पर्व मनाना। ऐसा माना जाता है कि इस दिन ही पार्वती जी को शिव जी मिले थे। हरे- भरे खेत देख किसान उमंगित हो जाते हैं। भादों मास के आने वाले त्योहारों की छटा अपनी फसल में देखते हैं। धान की रोपाई, मनभावनी छवि हृदय को छू जाती है।

*

हरी भरी धरती मन मोहे

हर डाली में पत्ते सोहे

रिमझिम बारिश होती ऐसे

नवयौवन छाया हो जैसे।

*

भींगी चूनर ओढ़े आतीं।

कजरी राग सुहावन गातीं। ।

सखियाँ मिलजुल झूला झूलें।

राग- द्वेष जीवन के भूलें। ।

*

आइए हम सभी मिलकर इन सांस्कृतिक धरोहरों का पालन -पोषण करें। इन्हें जीवन में शामिल कर अपनी परम्पराओं के जीवंत स्वरूप से लाभान्वित हों।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 750 ⇒ सिया तो से नैना लागे रे ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सिया तो से नैना लागे रे।)

?अभी अभी # 750 ⇒ आलेख – सिया तो से नैना लागे रे ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्यार करने की, और ईश्वर स्मरण की कोई उम्र नहीं होती। प्यार तो हमने खूब किया होगा, नाम जपन क्यूं भूल गया। हम तो खैर अब प्यार करना भी भूल गए होते, अगर हमारे जीवन के ७५ वें वसंत में सिया के बाल स्वरूप का प्रवेश नहीं होता।

किसी भी भाव में और किसी भी स्थिति में अगर सियाराम से नेह लग जाए, तो समझो आपका बेड़ा पार। लोग कहते हैं, राधे राधे बोलो, चले आयेंगे बिहारी, तो हम अगर सिया सिया कहेंगे तो क्या सिया के साथ प्रभु श्रीराम नहीं चले आएंगे। हमारा तो मानना है, राम जी तो आएंगे ही, साथ ही साथ हनुमान जी भी चले आएंगे। हमने कहीं पढ़ा है ;

एकै साधे सब सधे।

सब साधे, सब जाय।।

ईश्वर का बाल स्वरूप भी होता है, और हर बाल शिशु ईश्वर स्वरूप ही होता है।

बच्चों की बाल लीला और ईश्वर की लीला में कोई भेद नहीं होता। सूरदास ने अगर प्रज्ञाचक्षु होते हुए श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का सजीव चित्रण किया तो रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने भी मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की बाल लीलाओं का अलौकिक वर्णन किया ;

ठुमक चलत

ठुमक चलत रामचंद्र

ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनियां ….।।

सीताजी की बाल लीलाओं के बारे में हमने बहुत कम पढ़ा अथवा जाना है। हां लेकिन लोकगीतों में सीताजी की भी बाल लीलाओं का वर्णन भक्तों और कवियों ने अवश्य किया होगा।।

हम ना तो मैथिलीशरण हैं और ना ही सियारामशरण, लेकिन फिर भी आज से दो वर्ष पूर्व हमारे जीवन में एक तीन माह की बालिका का प्रवेश हुआ, जिसके पालकों ने उस बच्ची का नाम सिया रख दिया। कहते रहें शेक्सपीयर, नाम में क्या रखा है, लेकिन अगर इस बच्ची का नाम सिया नहीं होता, हो शायद यह अभी अभी भी यहां नहीं होता।

हम तो नाम की महिमा से भलीभांति परिचित हैं, और इसी सिया को हमारा आज का यह अभी अभी समर्पित है।

पास के ही तो फ्लैट में सिया का जन्म हुआ था। गोद में थी, तब से उसके दादा दादी के साथ हमारे घर आती थी। वैसे सिया से नैन तो हमारे तब से ही मिल गए थे, लेकिन आज हम आपस में बहुत घुल मिल गए हैं।।

व्यावहारिक जगत में हमारे संगी साथी भी होते हैं और इष्ट मित्र भी। क्या आपका इष्ट भी आपका मित्र हो सकता है ? श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी भी थे और सखा भी। जब कि श्रीकृष्ण सुदामा के मित्र भी थे और इष्ट भी। इसी तरह सिया हमारी इष्ट भी है और मित्र भी। जहां मित्रवत व्यवहार होता है, वहां उम्र बीच में नहीं आती।

सिया को देखकर हमें बिहारी का यह दोहा याद आ गया ;

कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात।

भरे भोन में करत है

नैननु हि सब बात।।

शब्द वही हैं लेकिन यहां हमारी सिया की, कृष्ण की तरह यह बाल लीला है। चितवन शब्द हमने सिर्फ सुना ही था, लेकिन सिया हमें साक्षात् हमें उस चित्त के वन में ले गई, जिसे आप चाहें तो भुवन भी कह सकते हैं। हमारी सिया नजरें मिलाते ही नज़र फेर लेती है, क्योंकि उसकी निगाहें तो पूरी सृष्टि पर ही टिकी हुई है। बाल स्वरूप में सिया पूरे ब्रह्माण्ड को निहार रही है, और उसी बीच उसकी हम पर भी कृपा हो गई।।

आसक्ति और भक्ति का अगर मिला जुला विराट स्वरूप देखना हो तो बस किसी बाल गोपाल अथवा कन्या से एक बार आँखें चार कर लो। प्रज्ञाचक्षु सूरदास जी ने जो बंद आंखों से पाया, क्या हम आंख रहते नहीं महसूस कर सकते।

बच्चे ईश्वर का ही रूप होते हैं, यह जानते हुए भी हम यह सुअवसर खो देते हैं।

हम इतने नादान नहीं, हमारे पास अखिल ब्रह्माण्ड आज बाल रूप में, सिया बनकर उपस्थित है। यह स्वर्ण अवसर हम हाथ से कैसे जाने दे सकते हैं।

हनुमान जी के लिए सीता जी माता थी, हमारे लिए सीताजी का यह बाल रूप सिया बनकर प्रकट हुआ है। हमारे तो भाग जाग गए तो फिर हम क्यों ना कहें,

सिया तो से नैना लागे रे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 749 ⇒ जीरावन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जीरावन।)

?अभी अभी # 749 ⇒ आलेख – जीरावन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जीवन है मधुवन ! मैं कभी मधुवन गया नहीं। बचपन में मेरी अधिकतर जानकारी सोच पर ही आधारित होती थी। बालमन सोचता था, जहां अधिक मधु होगा, उसे मधुवन कहते होंगे। जहां आग होती है, वहां धुआं होता है, जहां मधु होता है, वहां मधुमक्खी भी होती ही होगी।

जब मैं मधुवन में राधिका नाचे रे, वाला गीत सुनता था, तब मुझे चिंता हो जाती थी कि कहीं राधिका के नाचने से अथवा गिरधर की मुरलिया के बजने से कोई मधुमक्खी मगन होने के बजाय विचलित ना हो जाए। समय के साथ मेरा ढाई आखर का ज्ञान विकसित होता चला गया और मैं मधुवन का सही अर्थ भी जान गया। फूल, पराग और खुशबू वाला भी मधुवन ही होता है। अब यह गीत मैं आराम से रस लेकर सुनता हूं। मेरे पास मधुमक्खी तो क्या, कोई मक्खी भी नहीं फटकती।।

बचपन से हम नमक और मिर्ची का नाम तो सुनते आ रहे थे, बोर, जाम, जामुन में नमक मिर्ची लगाते भी आ रहे थे। मां की मसालदानी में जीरा भी होता था, जो बघार में भी डाला जाता था, लेकिन जीरे की उत्पत्ति के बारे में इतना ज्ञान नहीं था। चने के खेत जैसा कोई गीत जीरे के बारे में हमने नहीं सुना।

जब मधुवन की तरह ही जब हमने जीरावन शब्द सुना तो हमें यही लगा, जीरे के वन की ही शायद जीरावन कहते हों। आप चाहें तो कह सकते हैं, बंदर क्या जाने जीरावन का स्वाद। लेकिन जब एक बार जीरावन का स्वाद मुंह को क्या लगा, हमें इस शब्द का वास्तविक अर्थ भी पता चल गया। जीरा क्या जी, सभी स्वादिष्ट चटपटे मसालों का वन है जीरावन।।

घर में अचार नहीं हो, नींबू नहीं हो, सब्जी नहीं हो, कोई चिंता नहीं। बस अगर घर में जीरावन हो तो काम बन जाता है। वैसे पसंद अपनी अपनी। हमें ना तो कोई गरम मसाला रास आता, और ना ही कोई चाट मसाला। जीरावन में गुण भी बहुत है, और स्वाद भी।

भले ही हींग और फिटकरी में कोई सांठगांठ हो, लेकिन रसोई में तो हींग जीरे का ही राज होता है। जीरे की खेती मुख्य रूप से गुजरात के ऊंझा क्षेत्र में और राजस्थान में ही अधिक होती है। और जहां तक जीरावन का सवाल है, आपको आश्चर्य होगा, राजस्थान का प्रतापगढ़ जीरावन का गढ़ है।।

जीरावन में वैसे कोई हीरे मोती तो जड़े नहीं होते। बस जीरा, सूखा धनिया, काला नमक, लाल मिर्ची, हींग और अमचूर ही तो होता है। आप चाहें तो घर में भी बना लें। वैसे जैनियों की दादावाड़ी में कहीं कहीं आपको केसर के साथ जीरावन भी नज़र आ जाएगा।

सात्विक आहार के भी अपने ठाठ हैं। उसे भी राजसी और तामसी बनाने के तरीके हमें आते हैं।

वैसे भी प्याज लहसुन नहीं होने के बावजूद यह स्वादिष्ट है। हमारा तो घर में ही, जीवन है मधुवन, क्योंकि हमारे पास है, नंबर वन जीरावन।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 141 – देश-परदेश – जंग, मोहब्बत और तिजारत में सब जायज़ है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 141 ☆ देश-परदेश – जंग, मोहब्बत और तिजारत में सब जायज़ है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

पुरानी कहावत हुआ करती थी, कि प्यार और युद्ध में सब चलता हैं। इसमें कुछ समय से व्यापार भी जुड़ गया हैं। वो समय और था, जब व्यापार में नैतिकता पर ज़ोर रहता था।

बचपन में एक कहानी सुनी थी, कि एक व्यक्ति दस रुपए में तोता बेच रहा था, जबकि अन्य लोग बीस रुपए में तोता बेच रहे थे। दस रुपए में तोता बेचने वाला पक्षी का पिंजरा बहुत महंगा बेच रहा था। बिना पिंजरे के तोता तो खरीदा नहीं जा सकता हैं। कुल मिला कर सस्ते तोता बेचने वाला अधिक लाभ कमा रहा हैं।

सत्तर के दशक में सरकारी राशन की दुकान पर सस्ती चीनी की बिक्री होती थी। राशन विक्रेता चीनी की बिक्री के साथ गेहूं भी जबरदस्ती बेचता था।

आज भी हमारे मोहल्ले में सरकारी डेयरी का दूध विक्रेता इस बात से नाराज़ रहता है, कि ब्रेड, मक्खन आदि दूसरी दुकान से क्यों खरीदते हो? जबकि  दूध कियोस्क से अन्य सामान बेचना अनधिकृत हैं।

उपभोक्ता हमेशा किसी ना किसी रूप में दबाया जाता रहा हैं। कस्टमर हमेशा कष्ट से ही मरता हैं। देश में उपभोक्ता सरंक्षण के लिए बहुत सारी संस्थाएं कार्य कर रही हैं। इसके बावजूद भी ग्राहक कहीं ना कहीं मात खाता हैं।

विश्व व्यापार में भी बहुत सारी संस्थाएं हैं। मुक्त व्यापार से लेकर भुगतान के लिए अनेक देशों ने नए नए समूह भी बनाएं गए हैं। MRTP नियम भी बनाया गया हैं।इन सब के होते हुए आज भी  तीसरी दुनिया देशों के हित सुरक्षित नहीं हैं।

बड़े देश बस हथियार, और विमान बनाकर अपना साम्राज्य चलाते हैं। छोटे देशों से कपड़े, घरेलू सामान आदि खरीदते हैं। विश्व व्यापार में  कुछ देश स्वयंभू नेतागिरी भी करते है, अपने निजी हितों को साधते हुए अन्य देशों को अपने प्रभाव से तंग करने में लगें रहते हैं।

टीप : इस आलेख का वर्तमान में “पूंजीपति देशों के सिरमौर” द्वारा नए टैरिफ नियम लागू करने से कोई दूर दूर तक सम्बन्ध नहीं हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 748 ⇒ कान, नाक, और गला ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कान, नाक, और गला।)

?अभी अभी # 748 ⇒ आलेख – कान, नाक, और गला ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(EAR, NOSE & THROAT)

हमारे शरीर के जितने भाग हैं, चिकित्सा की दुनिया में उसके उतने ही विभाग हैं। हर परिवार का एक चेहरा होता है, हमारे चेहरे का भी एक परिवार है, जहां निगरानी के लिए अगर आँखें हैं, तो सुनने, साँस लेने और गले मिलने के लिए कान, नाक और एक गला है। आँख के लिए अगर अलग से आई स्पेशलिस्ट है तो नाक, कान और गले, तीनों का भार, बेचारे अकेले ENT विशेषज्ञ पर है। अजीब सरकार है हमारी एनाटॉमी और फिजियोलॉजी की ! शरीर में ही पूरा मेडिकल कॉलेज खोल रखा है। नाक के नीचे मुंह है, जिसमें बत्तीस दांत हैं, अगर दांत में दर्द है तो यह मामला दंत विभाग का है, E N T का नहीं ! दंत विशेषज्ञ की सेवाएं लीजिए। सॉरी आंटी।

पर्दा आँख में भी होता है, और कान में भी। आँख के पर्दे को रेटीना और कान के पर्दे को ear drum कहते हैं। वैसे पर्दे घरों में, खिड़की दरवाजों में भी होते हैं। कोई पर्दे के पीछे से देखता है, तो कोई पर्दे के पीछे से सुनता है। दीवारों के भी जब कान हो सकते हैं, तो क्या कान के पर्दे नहीं हो सकते। जितना महत्व आंख के परदे का है, उतना ही महत्व कान के परदे का है। अधिक आवाज से कान के पर्दे फटने का अंदेशा रहता है।।

कान सुनने के लिए बने हैं और नाक सूंघने और साँस लेने के लिए। गला हमें धड़ से जोड़ता है। E N T यानी कान, नाक और गले को आप शरीर का 3BHK अपार्टमेंट भी कह सकते हैं, क्योंकि अंदर से ये तीनों अंग आपस में मिले हुए हैं। सर्दी जुकाम हुआ, तो गला भी खराब होना ही है। कान का दर्द भी किसी सरदर्द से कम नहीं। सरदर्द की तो कई गोलियाँ हैं, झंडू बाम है, कान के दर्द का इलाज या तो दादी मां के पास है या फिर किसी E N T के पास।

इस बार हमने कोरोना को मुंह नहीं लगाया। बार बार हाथ धोए, सैनिटाइज किया, गले का विशेष खयाल रखा। हल्दी, नमक और गिलोय हमारी संजीवनी बूटी रहे। मुंह पर मास्क रहा, हम जब भी घर से बाहर रहे। सोचिए, अगर हमारी नाक और कान नहीं होते तो कितनी परेशानी होती। नाक पर मक्खी ही नहीं, मास्क भी टिकता है और चश्मा भी। चश्मा चढ़ता तो आँख पर है, लेकिन उसको सहारा नाक और कान ही देते हैं। कुछ लोग आज भी कान पर जनेऊ चढ़ाते हैं।

श्रृंगार के क्षेत्र में भी महिलाओं का प्रिय विभाग कान, नाक और गला ही है।

दांत के दर्द में अगर लौंग रामबाण नुस्खा है, तो महिलाओं की नाक पर भी लौंग विराजमान होती है। कहीं कहीं इसे नथ भी कहा जाता है। कान नहीं होते तो कर्ण श्रृंगार कैसे होता। झुमका बरैली वाला हो या कान के टॉप्स अथवा इयररिंग, कान, सुनसान अच्छा नहीं लगता। श्रृंगार में क्या कभी गला पीछे रहा है।

हीरे मोतियों की माला हो, मंगलसूत्र हो अथवा नौलखा हार, नारियों की पसंद का उपहार, हार ही तो होता है। प्रेयसी हो या पत्नी, दिल जीतने के लिए गले के हार से बेहतर कोई विकल्प नहीं।

हम कभी कान के कच्चे ना हों, कभी हमारी नाक नीची ना हो, गला सुरीला हो, नाक, कान और गले की बीमारियों से अपना बचाव करते हुए, अच्छा संगीत सुनें, अपने आसपास के वातावरण को शुद्ध और सुगंधित बनाए रखें। गला काट स्पर्धा से दूर रहें। सबका हो भला, हमेशा निरोग रहे, कान, नाक गला।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ सुसज्जित फूल ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ सुसज्जित फूल ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

स्त्रियों की वजूद बिलकुल गेदें के फूल के हिसाब जैसा है, वक़्त पड़े तो औषधि बन जाती हैं तो कभी साज्ज सज्जा में लिप्त नज़र आती है।  बड़ा  मोहक है यह गेंदें का फूल!

‘तोरण बन दरवाजे पर लटक के लक्ष्मी आगमन की सुगंध बन बिखर जाती हैं तो कभी शिव के थाली में सुज्जित होकर मंदिरों में चढ़ जाती हैं। 

अक्सर आसानी से खिल जाता यह गेंदें का फूल।  मिट्टी ही तो चाहिए इसे पनपने के लिए और थोडी सी देखभाल फिर आंगन में खडी़ खुद ही सबकों मोहित कर देता  है यह गेंदें का फूल।

भींगी भींगी खुशबु से परिपूर्ण पीले रंग की अत्यंत मनभावन किंतु भावनाओं से परिपूर्ण होती है । 

कहते हैं, गेंदें का फूल जहाँ खिलाता हैं वहां खुशियाँ इक़ट्ठा करती तभी तो तस्वीर या दरवाजे पे बैठीं पुरनिया स्त्री नज़र कवच सा बन लिपटी मोह माया के धागों से पिरोने के बाद  अथाह अपनत्व के पीड़ा में डूबीं केवल  संवेदना को छुपाई मौन नज़र आती है लेकिन कमब्खत उफ्फ्फ तक नहीं करतीं ।

गेंदें के इस फूल को आंगन में लाने के बाद  पुरुषों ने मन के हिसाब से उपयोग किया क्योंकि गुलाब की तरह उसनें मुहब्बत की मांग जो नहीं रखीं बस ताउम्र मौन उपलब्धि दर्ज करातीं अपने भाग्य के भरोसे बैठीं थोड़ी सी मिट्टीसे परिपूर्णता दर्शाती रही।

~ अभिव्यक्ति की स्याही ~

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 747 ⇒ घराना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घराना।)

?अभी अभी # 747 ⇒ आलेख – ∆ घराना ∆ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मेरा नाम राजू, घराना अनाम,

बहती है गंगा, जहां मेरा धाम …

लेकिन सभी जानते हैं, कपूर खानदान के इस चिराग का भी एक सेमी क्लासिकल फिल्म संगीत का घराना था, जिसमें शंकर जयकिशन, शैलेंद्र हसरत और मुकेश ने मिलकर जो गीतों की बरसात शुरू की थी, उसने मेरा नाम जोकर तक थकने का नाम नहीं लिया था। और जहां तक नाम का सवाल है, तो पृथ्वी थिएटर से शुरू इस कपूर परिवार के अभिनय का करिश्मा आज भी कायम है।

घराना गर्व और गौरव का विषय है, अच्छे घराने की बहू के लिए ही गृह लक्ष्मी जैसे विशेषणों का प्रयोग किया जाता था। राजघरानों में आज हम भले ही केवल होलकर और सिंधिया राजघरानों तक ही सिमटकर रह गए हों, लेकिन शास्त्रीय संगीत के घरानों की बात तो कुछ और ही है।।

नृत्य और संगीत हमें स्वर्ग की नहीं, गंधर्व लोक की देन हैं, सवाई गंधर्व और कुमार गंधर्व इनके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आप मानें या ना मानें, संगीत के घरानों और राजघरानों का आपसी संबंध बहुत पुराना है। आइए कुछ संगीत घरानों की चर्चा करें।

भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य की वह परंपरा है जो एक ही श्रेणी की कला को कुछ विशेषताओं के कारण दो या अनेक उप श्रेणियों में बाँटती है।।

घराना (परिवार, कुटुंब), हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट शैली है, क्योंकि हिंदुस्तानी संगीत बहुत विशाल भौगोलिक क्षेत्र में विस्तृत है, कालांतर में इसमें अनेक भाषाई तथा शैलीगत बदलाव आए हैं। घराना शब्द हिंदी शब्द ‘घर’ से आया है जिसका अर्थ है ‘घर’। यह आमतौर पर उस स्थान को संदर्भित करता है जहां संगीत विचारधारा की उत्पत्ति हुई; उदाहरण के लिए, ख्याल गायन के लिए प्रसिद्ध कुछ घराने हैं: दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, इंदौर, अतरौली-जयपुर, किराना और पटियाला।

इसके अलावा शास्त्रीय संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा में प्रत्येक गुरु व उस्ताद अपने हाव-भाव अपने शिष्यों की जमात को देता जाता है। घराना किसी क्षेत्र विशेष का प्रतीक होने के अलावा, व्यक्तिगत आदतों की पहचान बन गया है, यह परंपरा ज़्यादातर संगीत शिक्षा के पारंपरिक तरीके तथा संचार सुविधाओं के अभाव के कारण फली-फूली, क्योंकि इन परिस्थितियों में शिष्यों की पहुँच संगीत की अन्य शैलियों तक बन नहीं पाती थी।

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गायन के लिये प्रसिद्ध घरानों में से निम्न घराने शामिल होते हैं: आगरा, ग्वालियर, इंदौर, जयपुर, किराना, और पटियाला।

सबसे पुराना ग्वालियर घराना है। तानसेन भी ग्वालियर से ही आए थे। हस्सू हद्दू खाँ के दादा नत्थन पीरबख्श को इस घराने का जन्मदाता कहा जाता है। दिल्ली के राजा ने इनको अपने पास बुला लिया था।।

जरा इन गायकों और उनके घरानों पर भी गौर कर लिया जाए ;

१. मेवाती घराना पंडित जसराज

२.पटियाला घराना; उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, बेगम अख्तर, निर्मला देवी और परवीन सुल्ताना

३. जयपुर अंतरौली घराना ; मल्लिकार्जुन मंसूर, किशोरी अमोनकर और अश्विनी भिड़े।

४. भीमसेन जोशी किराना घराना,

५. आगरा घराना जितेंद्र अभिषेकी

इन घरानों की शुद्धता, मर्यादा और अनुशासन का पालन शिष्यों को भी करना पड़ता है। गुरु शिष्य परम्परा यूं ही फलीभूत नहीं होती। ना मिलावट ना खोट यही शास्त्रीय संगीत की पहचान है। एक भी सुर गलत नहीं।

धारवाड़, कर्नाटक से आए, घराने की बंदिश से अपने को मुक्त रखते हुए, लोक संगीत को शास्त्रीय संगीत की ऊंचाईयों तक पहुंचाने वाले कुमार गंधर्व स्वयं अपने आपमें एक घराना हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 300 – शिवोऽहम्…(3) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 300 ☆ शिवोऽहम्…(3) ?

निर्वाण षटकम् का हर शब्द मनुष्य के अस्तित्व पर हुए सारे अनुसंधानों से आगे की यात्रा कराता है। इसका सार मनुष्य को स्थूल और सूक्ष्म की अवधारणा के परे ले जाकर ऐसे स्थान पर खड़ा कर देता है जहाँ ओर से छोर तक केवल शुद्ध चैतन्य है। वस्तुत: लौकिक अनुभूति की सीमाएँ जहाँ समाप्त होती हैं, वहाँ से निर्वाण षटकम् जन्म लेता है।

तृतीय श्लोक के रूप में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य का परिचय और विस्तृत होता है-

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ

मदो नैव मे नैव मात्सर्यभाव:

न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष:

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।3।।

अर्थात न मुझे द्वेष है, न ही अनुराग। न मुझे लोभ है, न ही मोह। न मुझे अहंकार है, न ही मत्सर या ईर्ष्या की भावना। मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से परे हूँ। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ।

राग मनुष्य को बाँधता है जबकि द्वेष दूरियाँ उत्पन्न करता है। राग-द्वेष चुंबक के दो विपरीत ध्रुव हैं। चुंबक का अपना चुंबकीय क्षेत्र है। अनेक लोग, समान और विपरीत ध्रुवों के निकट आने से उपजने वाले क्रमश: विकर्षण और आकर्षण तक ही अपना जीवन सीमित कर लेते हैं। यह मनुष्य की क्षमताओं की शोकांतिका है।

इसी तरह मोह ऐसा खूँटा होता है जिससे मनुष्य पहले स्वयं को बाँधता है और फिर मोह मनुष्य को बाँध लेता है। लोभ मनुष्य को सीढ़ी दर सीढ़ी मनुष्यता से नीचे उतारता जाता है। इनसे मुक्त हो पाना लौकिक से अलौकिक होने, तमो गुण से वाया रजो गुण, वाया सतो गुण, गुणातीत होने की यात्रा है।

एक दृष्टांत स्मरण हो आ रहा है। संन्यासी गुरुजी का एक नया-नया शिष्य बना। गुरुजी दैनिक भ्रमण पर निकलते तो उसे भी साथ रखते। कोई न कोई शिक्षा भी देते। आज भी मार्ग में गुरुजी शिष्य को अपरिग्रह की शिक्षा देते चल रहे थे। संन्यास और संचय का विरोधाभास समझा रहे थे। तभी शिष्य ने देखा कि गुरुजी एक छोटे-से गड्ढे के पास रुक गये, मानो गड्ढे में कुछ देख लिया हो। अब गुरुजी ने हाथ से मिट्टी उठा-उठाकर उस गड्ढे को भरना शुरू कर दिया। शिष्य ने झाँककर देखा तो पाया कि गड्ढे में कुछ स्वर्णमुद्राएँ पड़ी हैं और गुरुजी उन्हें मिट्टी से दबा रहे हैं। शिष्य के मन में विचार उठा कि अपरिग्रह की शिक्षा देनेवाले गुरुजी के मन में स्वर्णमुद्राओं को सुरक्षित रखने का विचार क्यों उठा? शिष्य का प्रश्न गुरुजी पढ़ चुके थे। हँसकर बोले, “पीछे आनेवाले किसी पथिक का मन न डोल जाए, इसलिए मैं मिट्टी पर मिट्टी डाल रहा हूँ।” 

मिट्टी पर मिट्टी डालने की लौकिक गतिविधि में निहितार्थ गुणातीत होने की अलौकिकता है।

गतिविधि के संदर्भ में देखें तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। इनमें से हर पुरुषार्थ की विवेचना अनेक खंडों के कम से कम एक ग्रंथ की मांग करती है। यदि इनके प्रचलित सामान्य अर्थ तक ही सीमित रहकर भी विचार करें तो धर्म, अर्थ,  काम या मोक्ष की लालसा न करना याने इन सब से ऊपर उठकर भीतर विशुद्ध भाव जगना। ‘विशुद्ध’, शब्द  लिखना क्षण भर का काम है, विशुद्ध होना जन्म-जन्मांतर की तपस्या का परिणाम है।

परिणाम कहता है कि तुम अनादि हो पर आदि होकर रह जाते हो। तुम अनंत हो पर अपने अंत का साधन स्वयं जुटाते हो। तुम असीम हो पर तन और मन की सीमाओं में बँधे रहना चाहते हो। तुम असंतोष और क्षोभ ओढ़ते हो जबकि तुम परम आनंद हो।

राग, द्वेष, लोभ, मोह, मद, मत्सर, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन सब से हटकर अपने अस्तित्व पर ध्यान केंद्रित करो। तुम अनुभव करोगे अपना अनादि रूप, अनुभूति होगी अंतर्निहित ईश्वरीय अंश की, अपने भीतर के चेतन तत्व की। तब शव होने की आशंका समाप्त होने लगेगी, बचेगी केवल संभावना, जो प्रति पल कहेगी ‘शिवोऽहम्।’

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 746 ⇒ नि गु रा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नि गु रा।)

?अभी अभी # 746 ⇒ आलेख – नि गु रा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गुरु बिन कौन करे भव पारा !

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ..

हमारे देश में आदमी अनपढ़, अशिक्षित रह सकता है, लेकिन बिना गुरु के नहीं रह सकता। इतने जगतगुरु, साधु संत, महात्मा, शिक्षक, प्रोफेसर,

विद्वान, आचार्य, ज्योतिष, योग, आर्युवेद, महंत, और महामंडलेश्वर के रहते, भला कोई निगुरा कैसे रह सकता है। जिस देश में लोगों का तकिया कलाम ही गुरु हो, कोई महागुरु और कोई गुरु घंटाल हो, वहां गुरुओं की क्या कमी। गुरु, इसी बात पर ठोको ताली।

गुरु से बचना इतना आसान भी नहीं ! पहले गुरु तो माता पिता ही होते हैं। अब आप अजन्मे तो नहीं रह सकते। आप पालने में पड़े हो और किसी ज्योतिष गुरु ने आपका नामकरण भी कर दिया। घर में भवानीप्रसाद, और ज्वालाप्रसाद तो पहले से ही मौजूद थे, आप हो गए गुरुप्रसाद। लाड़ प्यार में नाम बनता बिगड़ता रहता है, किसी के लिए गुड्डू, तो किसी के लिए गुल्लू। गुरु कृपा से अच्छे पढ़ लिख लिए, तो बड़े होकर कॉलेज में आप प्रोफेसर जी.पी.दुबे कहलाने लगे। यथा नाम तथा गुण।।

गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊँ ! द्रोणाचार्य और शुक्राचार्य। मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ, या फिर निगुरा ही रह जाऊँ। जो आपको जीवन के गुर सिखलाए, वह गुरु। वैसे भी गुरु को तो गुड़ ही रहना है, शक्कर तो चेले ही बनते हैं। जीवन में मिठास जरूरी है। या तो गुड़ बन जाएं, या फिर शक्कर। वैसे आप गुरु करें ना करें, आपकी मर्जी। लेकिन किसी ज्योतिष गुरु के कहने पर गुरुवार करने में क्या हर्ज है। जिन लोगों का गुरु कमज़ोर होता है, वे किसी उस्ताद की शरण में जाते हैं। गुरुवार तो वैसे भी हर हफ्ते आता ही रहेगा।

एक समय था, जब शहर में हर गुरुवार को सिनेमा घरों में नई पिक्चर लगती थी। व्यापारी अपनी दुकानें बंद रखते थे। गुरुवार अब भी आता है, लेकिन क्या करें, सिनेमागृहों की गृह दशा ही खराब चल रही है। व्यापारी भी गुरुवार की जगह संडे मनाने लग गए।।

संत कबीर बड़े ज्ञानी थे, गुरु ग्रंथ साहब तक में उनका जिक्र है, फिर भी वे निगुरे नहीं रह सके। उन्हें भी गुरु रामानंद की शरण में जाना ही पड़ा। दत्तात्रय तो भगवान थे, लेकिन उनके भी एक दो नहीं चौबीस गुरु थे। उन्हें सृष्टि के जिस जीव में गुण नजर आते, वे उसे गुरु रूप में स्वीकार कर लेते। जो हमें सीख दे, वही गुरु, वही शिक्षक और वही सदगुरु। अगर हम अपना सबक ठीक से याद नहीं करें, तो इसमें गुरु का क्या दोष।

आखिर गुरु को बाहर क्यूं ढूंढा जाए जब हमारे अंदर ही ब्रह्मांड समाया हुआ है। और लोग अंतर्गुरु तलाशने पहले ओशो, कृष्णमूर्ति और महर्षि रमण की शरण में गए लेकिन जब बात नहीं बनी तो जग्गी वासुदेव का दामन थाम लिया। श्री श्रीरविशंकर और योगगुरु बाबा रामदेव अपने अपने सुदर्शन चक्र चला ही रहे हैं, बचकर कहां जाओगे।।

एक तरफ कुआं, एक तरफ खाई ! इन निगुरों के बीच यह वामपंथी कहां से आ टपका भाई ? ब्रिटिश चैनल से बड़ी हमारे देश में आस्था और संस्कार की चैनल है। यहां 24 x 7 संत महात्माओं, साधुओं और परम हंसों का जमघट लगा रहता है। चित्रकूट के घाट से कम नहीं यह सत्संग और स्वाध्याय की चौपाटी। रामकथा, भागवत और शिव पुराण। कभी मोरारी बापू तो कभी रमेश भाई ओझा। दान पुण्य और गऊ सेवा का पुण्य अलग।

जो भी भक्त है, उसका अपना भगवान है। शिष्य का अपना गुरु है। बाकी सब स्वयं ही गुरु हैं। अहं ब्रह्मास्मि ! बस इस देश में वामपंथी ही निगुरे हैं। निगुरे नहीं, विश्व गुरु हैं हम।। 

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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