हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५७ – देश-परदेश – वकील दिवस: 3 दिसंबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५७ ☆ देश-परदेश – वकील दिवस: 3 दिसंबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆

देश के प्रथम राष्ट्रपति स्वर्गीय श्री राजेंद्र प्रसाद जी के जन्मदिवस को अधिवक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है। साधारण भाषा में अधिवक्ता को वकील कह कर संबोधित किया जाता हैं। कानून के हाथ लंबे होते हैं, कानून अंधा होता है, जैसी अनेक किवदंतियां वकीलों से जुड़ी हुई हैं।

वकीलों से बच कर रहना चाहिए कहने वाले तो यहां तक ज्ञान देते हैं, कि वादी और परिवादी वकील के द्वारा कोर्ट में इतने पैसे खर्चवा देते है, उससे अच्छा तो दोनों पक्ष अपनी अपनी पूंजी लेकर जलती हुई आग के समक्ष बैठ कर करेंसी नोट जलाते जाएं, जिसके पैसे पहले समाप्त हो जाए, वो पक्ष हारा हुआ कहलाएगा।

लोग वकील के घर के पास घर भी नहीं लेना चाहते है, डरते हैं, कोई ना कोई झगड़ने का मुद्दा बन जाएगा इसलिए वकीलों के घर के पास प्रॉपर्टी अपेक्षाकृत सस्ती उपलब्ध रहती हैं।

कानून की डिग्री वाले वकीलों के अलावा भी अनेक प्रकार के वकीलों का सामना जीवन में हुआ हैं। मोहल्ले या परिवार के झगड़े सलटाने वाले भी हमारे समाज में पाए जाते हैं।

कार्यालय में कुछ लोग बात बात पर नियम की बात करते हैं, तो लोग उनको भी वकील की संज्ञा से नवाज़ देते हैं। इस प्रकार के लोगों से लोग दूरी बनाना उचित समझते हैं।

दो बिल्लियों की रोटी के एक टुकड़े को लेकर लड़ाई को बंदर वकील सलटा देता है, वाली पुरानी कहानी हम सब ने बचपन में खूब सुनी थीं।

वर्तमान में तो वकील पुलिस तक को डराते हैं। किसी वकील के साथ दुर्घटना हो या किसी वकील ने आपकी गाड़ी को टक्कर भी मारी हो, वकील संगठित होकर सड़कों पर उतर आते हैं।

वकील का पेशा कभी बहुत सम्मानित पेशा होता था, वर्तमान में लोग उनका सम्मान भय के कारण ही करते हैं। न्याय प्रणाली और हमारे न्यायधीश भी इस सब के लिए उतने ही जिम्मेवार है जितने हमारे वकील लोग हैं।

देश के कुछ वकीलों ने समाज के लिए बहुत अच्छा कार्य भी किया है। राष्ट्रीय मुद्दे और गरीबों के लिए भी समय समय पर वकीलों ने पूर्व में बहुत सारे कार्य भी किए गए हैं, जिनको भुलाया नहीं जा सकता हैं।

अब लेखनी को विराम देता हूं, वर्ना आप लोग कहेंगे वकीलों की बहुत वकालत कर रहा हूं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५८ ⇒ भस्मासुर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें…“।)

?अभी अभी # ८५८ ⇒ आलेख – अंतिम साँसें ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वह असुर जो उसे ही भस्म कर दे, जो उसे भस्म करने का वरदान दे, भस्मासुर कहलाता है। ये असुर भी बड़े जीवट हीते हैं !मनचाहा वरदान पाने के लिए कठिन तप, साधना और इष्ट की भक्ति किया करते हैं। और इनके आराध्य देव इतने भोले होते हैं कि इन पर प्रसन्न हो ही जाते हैं।

समय के साथ असुरों ने समझौता कर लिया। अवतारों का जन्म केवल असुरों का नाश करने के लिए होता है। अब कलयुग में केवल एक कल्कि अवतार बचा है। अवतारों का स्टॉक अब खत्म। अब आप ही अवतार पैदा करो। अब एंड्राइड फ़ोन की तरह हाड़ माँस के इंसान में ही भगवान ने असुर, दैत्य, राक्षस, डाकू, और शैतान का app डाल दिया है।

सब इंसान ऊपर से एक जैसे हैं, किसी में साधु विराजमान है, तो किसी में शैतान। ।

इंसान हो या शैतान, भगवान के बिना किसी का काम नहीं चलता। किसी के गुरु द्रोणाचार्य होते हैं, तो किसी के शुक्राचार्य ! ईश्वर की भक्ति के बिना शक्ति, दिव्यास्त्र और वरदान प्राप्त नहीं होते। दैत्य उनका दुरुपयोग करते हैं, और देवता, सदुपयोग।

कहते हैं, कलयुग सोने के साथ पृथ्वी पर आया। सोने का मुकुट प्रिवीपर्स चबा गया, एक ले-देकर कुर्सी बची, जो आज भी लोकतंत्र की लाज रख रही है। एक लोकसेवक को कुर्सी पर पाँच वर्ष बैठने का अधिकार है, और अफसर को उससे कई गुना अधिक। एक लोक-सेवक को कुर्सी पर 18-18 घंटे जागते रहना पड़ता है। कहीं कुर्सी छिन न जाए। ससुरी कुर्सी नहीं, चौकीदारी हो गई। ।

भरत की यह भूमि भारतवर्ष कभी असुरों से मुक्त नहीं रही !

यह देश जो कभी सोने की चिड़िया रहा, जहाँ घी-दूध की नदियां बहीं, वहीं महाभारत भी हुआ, खून की नदियाँ भी वहीं।

पहले मुगल, फिर अंग्रेज़ भी आए, और बाद में आज़ादी के बाद सफेदपोश लुटेरे भी आए।

लोकतंत्र में जनता भगवान हो गई और नेता कस्मों-वादों से उसे लुभाने लगे। जनता जिस पर प्रसन्न हुई, उसे सिंहासन सौंप दिया। अब कोई कंस और रावण निकल जाए, तो जनता क्या करे। जनता का चुना हुआ, जनता को ही खा जाए, तो क्या वह भस्मासुर नहीं हुआ। ।

लग रहा था कि कांग्रेस रूपी भस्मासुर का अंत निकट है, लेकिन किसी ने चिराग घिस दिया, और राहुल गाँधी अलादीन का चिराग लेकर फिर उपस्थित हो गए। अब बोलिये, क्या हुक्म है आका ?

जनता शिवजी की ओर देख रही है ! कौन भस्मासुर और कौन अलादीन, अब फैसला शंकर का तीसरा नेत्र ही करेगा। अगला वर्ष मंगलमय हो। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१५ ☆ आलेख – विश्वग्राम के नागरिक (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय आलेख – ‘विश्वग्राम के नागरिक (वैचारिकी) ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१५ ☆

☆ आलेख ☆ विश्वग्राम के नागरिक (वैचारिकी) ☆

आज के अखबार में पढ़ने को मिला कि भारत की पवित्र भूमि को त्याग कर लगभग 2 लाख नागरिक हर वर्ष विदेश में बस रहे हैं। पिछले 5 सालों में 9 लाख नागरिकों ने भारत की नागरिकता छोड़ी। पढ़कर आश्चर्य हुआ। जहां हम ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ गाते थकते नहीं हैं, वहां इस देश की तरफ बेरुखी से मुंह फेर लेने वाले कौन हैं?

देश छोड़ने की वजहें ढूंढ़ें तो अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान जैसे देशों में रहन-सहन का बेहतर स्तर, बेहतर कमाई की बात समझ में आती है। कुछ देशों को लोग टैक्स से बचने के लिए जाते हैं। ऐसे कम टैक्स वाले देशों को ‘टैक्स हेविन’ कहा जाता है। अभी प्रदूषण के कारण दिल्ली के 80% लोग दिल्ली छोड़ने की सोच रहे हैं। इनमें से कितने विदेश उड़ जाएंगे और कितने भारत में ही कोई अन्य शहर ढूंढ़ेंगे कह पाना मुश्किल है।

कुछ चतुर लोग देश के बैंकों से भारी भरकम कर्ज़ लेकर विदेश पलायन कर गये और वहां सुखी जीवन जी रहे हैं। सामान्य आदमी यही समझने में लगा है कि उनके कर्ज की रकम के 9 हजार करोड़ या 12 हजार करोड़ होते कितने हैं और इसके लिए 9 या 12 में कितने ज़ीरो लगते हैं। यह समझना भी मुश्किल है कि इतना रुपया देश से निकलने पर संबंधित बैंकों की स्थिति पर क्या फर्क पड़ा है।

जो भी हो, देश छोड़कर जाने की कूवत उन्हीं में होती है जिन पर लक्ष्मी की पर्याप्त कृपा होती है। पक्षियों की तरह इनके लिए भी कोई बॉर्डर नहीं होता। ये विश्व नागरिक होते हैं। इनके लिए कोई गंदगी, कोई प्रदूषण नहीं होता। ये जहां भी जाते हैं वहां बैठकर खिड़की से बाहर प्रकृति की सुषमा निहार कर ‘सुजलां, सुफलां, मलयज शीतलां’ का आनंद लेते हैं।

इसके विपरीत देश का सामान्य आदमी मिलावट वाली चीज़ों का उपयोग करने और बाढ़, प्रदूषण झेल कर ‘जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां’ की स्थिति को झेलता है। ऐसे में यदि आदमी कमाई के लिए अनैतिक तरीकों का उपयोग करे तो उसे कैसे रोका जाए?

यह भी पढ़ा कि दुनिया के धनी लोग धीरे-धीरे सभी संस्थाओं पर हावी होते जाते हैं। सारे नियम कायदे उनकी सुविधा के हिसाब से बदल जाते हैं। उन पर कोई कानून काम नहीं करता। इस संबंध में तुलसीदास जी की चौपाई ‘समरथ को नहिं दोस गुसाईं’ इन पर खूब फिट बैठती है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१५ – पहाड़ के पार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१५ ☆ पहाड़ के पार… ?

‘पहाड़ के पार एक एक राक्षस रहता है। उसकी सीमा में प्रवेश करने वालों को वह खा जाता है।’ बचपन में सुनी कहानियों में प्रायः इस राक्षस का उल्लेख मिलता है। बालमन यों भी कच्चा होता है। जो उकेरा गया, वह अंकित हो गया। यह अंकित डर जीवनभर पहाड़ लांघने नहीं देता।

मज़े की बात यह है कि पहाड़ के उस पार रहने वालों के बीच, इस पार के राक्षस के किस्से हैं। इस पार हो या उस पार, पार उतरने वाले नगण्य ही होते हैं।

पहाड़ भौगोलिक संरचना भर है। जलवायु को अधिनियमित करने और प्रकृति के संतुलन के लिए पहाड़ होना चाहिए, सो है। पहाड़ को पार किया जा सकता है। थोड़ा अपभ्रंश का सहारा लिया जाए तो पहाड़, पहार, पार…! जिन्हें पार किया जा सकता है, वे ही पहाड़ हैं। ये बात अलग है कि पृथ्वी पर के पहाड़ों की सफल चढ़ाई करनेवालों में भी बिरले ही हैं जो मन का पहाड़ पार कर पाए हों।

मन के पहाड़ कई प्रकार के होते हैं। वर्जना से ग्रस्त, लांछना से भयभीत। वर्जना और लांछना, वांछना से दूर करते हैं। परिणामस्वरूप खंडित व्यक्तित्व जन्म लेने लगता है।

किसी कार्य के संदर्भ में एक उपासिका से मिलने गया। वे प्रवचन कर रही थीं। प्रवचन उपरांत चर्चा हुई। कुछ पृष्ठ मैंने उन्हें दिये। पृष्ठ देते समय उनकी अंगुली से स्पर्श हो गया होगा। मुझे तो पता भी नहीं चला पर वे असहज हो उठीं। सहज होने में कुछ समय लगा। पता चला कि पंथ के नियमानुसार उपासिका के लिए पुरुष का स्पर्श वर्जित है।

सत्य तो यह है कि स्त्री या पुरुष का क्रमशः पुरुष या स्त्री से स्पर्श एक विशिष्ट भाव जगाता है, यह वर्जना उनके अभ्यास में कूट-कूट कर भर दी गई थी। धर्म के पथ पर जिस ईश्वर की आराधना की जा रही है, अधिकांश पंथों में वह पुरुष देहाकार ही है। पुरुष होना दैहिक रचना है, पिता, भाई, मामा, चाचा, ताऊ, दादा, नाना, पुत्र या पति होना आत्मिक भाव है। स्पर्श के पार का राक्षस उपासिका के मन में बसा दिया गया था। फलतः उनके चेहरे पर कुछ देर असहजता छलकी था।

मनुष्य का सामर्थ्य अपार है, बस वह पार जाने का मन बना ले। साथ चाहिए तो एक समर्थ मित्र, गुरु या मार्गदर्शक चुने। मार्गदर्शक भी ऐसा जो आगे नहीं, साथ चले। जिसके सानिध्य में एक निश्चित दूरी के बाद पथिक को भी मार्ग का दर्शन होने लगे। मार्गदर्शन होने लगे तो पहाड़ के पार जाना कौनसा पहाड़-सा काम है!

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५७ ⇒ मैं तो तर गयो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मैं तो तर गयो…“।)

?अभी अभी # ८५७ ⇒ आलेख – मैं तो तर गयो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

देशभक्ति क्या होती है, हम इंदौरी नहीं जानते। कोई उधौ हमें ज्ञान न सिखाए। हमारे लिए इंदौर ही देश है, आप चाहो तो हमें कूप मंडूक कह लो, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि हमारा कुआं अब इतना विशाल हो गया है कि अब आप इसे स्मार्ट कुआं भी कह सकते हैं।

मध्यप्रदेश के भी मध्य में, दो ज्योतिर्लिंगों के बीच स्थित यह इंदौर मेरी जान है, जान है, शान है। आज भी कई जूनी इंदौरी, इंदौर छोड़कर विदेश तो क्या, स्वर्ग में जाना भी पसंद नहीं करते। उनके लिए तो इंदौर ही हमी अस्तो, हमी अस्तो है।।

स्वच्छता की हैट्रिक तो खैर अपनी जगह है, हमें तो स्वच्छता के छक्के जड़ना भी आता है। शुरू से ही, अपने शहर पर हमें नाज़ है। जैसा भी है, मेरा इंदौर, मेरा इंदौर है। इसे हम मेरा नहीं, अपना इंदौर कहते हैं, जैसे आप अपने बच्चे के बारे में शान से कहते हो, यह अपना बच्चा है।

शहर की छोटी मोटी उपलब्धि पर खुश होना, हमारी आदत में शुमार है। लता मंगेशकर से लेकर राहत इंदौरी तक के नाम हमें बहुत राहत देते हैं, क्योंकि ये इंदौर से जुड़े हैं। देवी अहिल्या तो हमारी माता है। तुकोजीराव और यशवंतराव के नाम पर इंदौर में क्या क्या नहीं है। एम् वाय अस्पताल और एम टी क्लॉथ मार्केट का नाम सुना है। कभी यशवंत क्लब गए हो।

सारे क्रिकेट मैचेस कहां होते हैं। कर्नल सी के नायडू, और कैप्टन मुश्ताक अली को जानते हो।।

आखिर आज इंदौर का इतना गुणगान क्यों ? अरे कोई कारण होगा। जी हां, ज़रूर है। बात ही कुछ ऐसी है। मेरे एक पुराने परिचित हैं, इंदौर प्रेमी हैं। वैसे एक बात बता दूं, सभी इंदौरी प्रेमी होते हैं। जो बाहर से आता है, इंदौर का होकर रह जाता है। और अगर इंदौर का कहीं जाता है, तो इंदौर के गुण ज़रूर गाता है।

इन इंदौर प्रेमी को आप इंदौरी लाल भी कह सकते हो। कल बहुत दिनों बाद इनके दर्शन हुए ! मुझे देखते ही उछल पड़े। कहां हो आजकल, दिखाई नहीं पड़ते। पता है, इंदौर में क्या हो रहा है ? मुझे बोलना पड़ता है, नहीं पता। तब उनकी गाड़ी चल निकलती है। दोनों हाथ सर तक ले जाकर बोले, साहब मैं तो तर गया। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे जीते जी इंदौर में मेट्रो जैसी चीज आ जाएगी। जब बीच सड़क में आई बस चलती थी, तो मेरा सीना गर्व से फूल जाता था, और अब मेट्रो। साहब मैं तो तर गया, मेरा जीवन सफल हो गया।।

जब उसकी गाड़ी चल निकलती है, तो उसको रोकना आसान नहीं होता। वह भावुक हो गया ! कोई व्यक्ति बनारस जाए, और भला गंगा स्नान करके न आए, कोई वी आई पी, इंदौर आए और सराफा की चाट न खाए, ऐसा कभी हुआ है। भले ही क्रिकेट के खिलाड़ी सायाजी और होटल रेडिसन में रुकें, जब छप्पन दुकान पर विजय चाट का पेटिस खाते हैं, तो हर इंदौरी का सीना छप्पन इंच का हो जाता है साहब। जो इंदौर से करे प्यार, वो देशप्रेम से कैसे करे इंकार। इंदौर के पोहे जलेबी वर्ल्ड फेम हैं, आप जानते हो।

हमारे दामू अण्णा की दुकान और जेलरोड की प्रशांत होटल पर ऐसी ही बातें होती हैं। हम इंदौरी ऐसे ही हैं। मेट्रो के इंदौर आने की खबर से ही हर इंदौरी तर गया है। वह उस दिन का इंतज़ार कर रहा है, जब वह मेरे साथ मेट्रो में बैठकर सराफा में नागौरी की शिकंजी पीने चलेगा। आप भी आमंत्रित हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – डिफॉल्टर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – डिफॉल्टर ? ?

 समय छाती पर

साहूकार-सा आ बैठा है,

अब तक निरर्थक बिताए

घटी-पल का ब्याज के साथ

सारा हिसाब मांग रहा है और

मैं निरुत्तर-सा खड़ा हूँ..,

सच बताना,

केवल मैं ही डिफॉल्टर हुआ हूँ

या तुम्हारा भी यही हश्र हुआ है…!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३५ – आलेख – संकल्प ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३५ ☆

☆ आलेख ☆ ~ “संकल्प” (एक शब्द विशेष) ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

जानने का प्रयास करते हैं। इस सम्बन्ध में मैं एक शब्द विशेष आप सभी के सम्मुख रखने का प्रयास कर रहा हूँ।

वह शब्द विशेष जिसके विषय में मैंने न सिर्फ मनन – चिंतन किया है, बल्कि अध्ययन भी किया है।

शब्द जो स्वयं में सामर्थ्य रखता हो और ऐसा सामर्थ्य जो किसी व्यक्ति को या व्यक्तियों के समूह को निर्धारित लक्ष्य के पार ले जाता हो। आज मैं एक ऐसे शब्द की बात करने जा रहा हूँ-

वह शब्द विशेष है –

☆ “संकल्प” ☆

यदि किसी एकल शब्द को साहित्यिक, आध्यात्मिक एवं भौतिक भाव से देखे तो –

इस अति महत्वपूर्ण शब्द “संकल्प” का कोई विकल्प है ही नहीं। संकल्प का आश्रय लेकर और संकल्प के साथ कार्य को प्रतिपादित करने वाले महामना जन का मानना है, कि संकल्प शब्द, शब्द के प्रभाव की ऐसी पराकाष्ठा है, जो विश्वास को आधार बनाकर स्व्यं को उस पर स्थापित कर, किसी विशेष उद्देश्य को प्राप्त कराने सहायक होती है।

संकल्प के साथ कार्य करने में दुश्वारी यह है कि लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निद्रा का त्याग करना होगा, स्वयं को अहं दूर रखना होगा, विश्वास को साथ लेकर चलना होगा।

संकल्प को सिद्धि तक ले जाने हेतु सत्य का आश्रय लेना आवश्यक एवं श्रेयस्कर होता है।दुनिया की कोई भी बड़ी से बड़ी समस्या ही क्यों न हो। संकल्प उसे पूर्ण समाधान की ओर ले जाता है। यदि इस शब्द को विभिन्न संदर्भों में ले तो इसका प्रभाव क्या होगा, इसके एक दो उदाहरण आपके सामने रखता हूं।

प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठानो में संकल्प का बड़ा ही महत्व है।

निश्चित संकल्प के साथ मन्त्रोंचार के माध्यम से किया गया अनुष्ठान सिद्धि को प्राप्त करता है।

क्षय मुक्ति आंदोलन पर आधारित मेरा ऐतिहासिक उपन्यास ‘तुमसे क्या छुपाना’ के आवरण पृष्ठ पर लिखा मेरा मूल वाक्य –

“क्षय मुक्त भारत की संकल्पना पर आधारित उपन्यास”

का परिणाम यह कि इस उपन्यास में परम ऊंचाई को प्राप्त किया।

क्षय मुक्ति पर लिखी हुई मेरी पहली कविता जो एन. टी. आई. बेंगलुरु में पढ़ी गई थी, वह यह थी कि –

संकल्प सिद्धि का ले मन में आगे हर कदम बढाना है।

एक सफल उद्घोषक के रूप में पहचान दिलाने में सहायक हुई।

यदि हम संकल्प के आध्यात्मिक पक्ष को देखें तो मां सती ने जब भेष बदलकर भगवान श्री राम के होने की परीक्षा ली तो उन्हें शिव के क्रोध का भाजन बनना पड़ा-

गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि-

शिव संकल्प कीन्ह मन माही

एहि तन सती भेंट अब नाहीं

यह संकल्प को शिव संकल्प नाम दिया गया। 

वहीं यदि मैं अपने जनपद बलिया की बात करूं,तो मेरे जनपद में कला एवं संस्कृति से जुडी हुई एक संस्था है जो साहित्य संस्कृति और कला को प्रोत्साहित करती है और जिसके संस्थापक अध्यक्ष वरिष्ठ रंगकर्मी श्री आशीष त्रिवेदी हैं – उस संस्था का नाम है – “संकल्प”

मैं इस संस्था के अनवरत प्रदर्शन को देखकर कह सकता हूँ कि यह संस्था अपने नाम के अनुरूप प्रभाव के साथ स्वयं के संकल्प पर खरी ही नहीं उतरी बल्कि ने संस्था ने अपने निरंतर प्रयास एवं अभ्यास से शिखर को स्पर्श किया है। आज यह संस्था अपना बीसवा अपना स्थापना वर्ष मना रही है।

इस प्रकार कह सकते हैं कि “संकल्प” एक विशेष प्रभावपूर्ण शब्द है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५६ ⇒ चाह और राह ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चाह और राह…“।)

?अभी अभी # ८५६ ⇒ आलेख – चाह और राह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यह विल और वे का मामला है! क्या चाह को हम इच्छा-शक्ति कह सकते हैं। आखिर कुछ तो अंतर होगा डिजायर और विल में! प्रबल इच्छा-शक्ति हमारा मार्ग प्रशस्त कर सकती है,लेकिन सांसारिक चाह तो हमें किसी भी रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर सकती है।

क्या वासना और चाहत में कोई अंतर है ? क्या कोई भी गलत राह सही रास्ते पर पहुँचा सकती है, ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जो हमेशा अनुत्तरित रहते चले आए हैं।।

नीति और राजनीति में बहुत अंतर होता है। राजनीति विज्ञान के किताबी दायरे से, जब राजनीति खुले मैदान में आती है,तो खुला खेल फरूखाबादी शुरू हो जाता है। हमने राजनीति के शयनकक्ष में अंतरात्मा और अवसरवाद को हमबिस्तर होते देखा है। सिद्धांत पर आस्था को हावी होते भी देखा है और धर्म और अधर्म को हाथ में हाथ डालकर खुले बाजार में टहलते देखा है।

चाह को हम चाहत अथवा विश भी कह सकते हैं। निरंतर प्रयास, पुरुषार्थ और उचित अवसर मिलने पर कदम मंज़िल की ओर बढ़ ही जाते हैं, और जो चाहा है, वह हासिल हो ही जाता है।।

बर्नार्ड शॉ का तो कहना है कि जो चाहते हो, वह पा लो! वर्ना जो पाया है, उसे ही चाहने लगोगे। एक चाह जीवन का एक नया अध्याय खोल भी सकती है तो एक गलत राह जीवन को बर्बाद भी कर सकती है। शायद इसीलिए किसी अच्छे उद्देश्य की प्राप्ति लिए रास्ते का चुनाव भी सही होना चाहिए।

कर्म की कुशलता न केवल वांछित फल देती है, एक सात्विक संतुष्टि का भाव भी पैदा करती है,जिसके मूल में आस्था और विश्वास होता है। चाह और राह का सामन्जस्य जीवन के सोपान को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में सक्षम होता है। आदर्श और शुचिता ही वह मूल-मंत्र है,जो जहाँ चाह , वहाँ राह के सिद्धांत को व्यवहार रूप में परिणत करता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६८ ☆ एक पौधा… उम्मीद भरा…… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “एक पौधा… उम्मीद भरा……”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २६८ ☆ एक पौधा… उम्मीद भरा… ☆

गाँव के बीचों-बीच एक छोटी-सी पगडंडी थी। उस पगडंडी से रोज कई लोग गुजरते थे—कुछ जल्दी में, कुछ थके हुए, और कुछ अपने ही विचारों में खोए हुए। लेकिन वहाँ एक बुजुर्ग महिला रहती थी, जिसका नाम था श्यामली अम्मा।

अम्मा रोज सुबह सूरज निकलते ही एक छोटा-सा पौधा लेकर पगडंडी के किनारे लगा देतीं। फिर उसे थोड़ा पानी डालतीं, थोड़ी माटी थपथपातीं और मुस्कुराकर कहतीं—

“बेटा, बढ़ते रहो… किसी की छाँव बनना।”

एक दिन गाँव के बच्चों ने अम्मा से पूछा,

“अम्मा, आप रोज एक पौधा क्यों लगाती हैं? इससे होगा क्या?”

 

अम्मा ने हँसकर कहा,

“बच्चों, जब मैं नहीं रहूँगी, ये पौधे मेरे शब्द बनकर बोलेंगे…

किसी को छाँव देंगे, किसी को फल देंगे, किसी को ऑक्सीजन देंगे।

एक पौधा सिर्फ पौधा नहीं होता—ये जीवन को बढ़ाने का प्रण होता है।”

 

उनकी बात बच्चों के दिल में उतर गई। अगले दिन बच्चे भी अपने-अपने हाथों में पौधे लेकर आ गए। फिर क्या था—

धीरे-धीरे हर घर से एक व्यक्ति निकलता…

हर हाथ में एक पौधा होता…

और हर मन में एक संकल्प।

 

कुछ महीनों में वही पगडंडी, जो कभी सूनी थी,

अब हरियाली से भर गई।

तितलियाँ उड़ने लगीं, परिंदे चहकने लगे,

और हवा में एक मीठी ठंडक फैल गई।

 

गाँव वालों ने महसूस किया कि

“एक पौधा लगाना छोटा काम नहीं,

ये आने वाली पीढ़ी के लिए दिया गया एक उपहार है।”

 

और आज वह गाँव पूरे इलाके में जाना जाता है—

“एक व्यक्ति, एक पौधा” गाँव।

 

क्योंकि वहाँ हर इंसान जान गया था कि

अगर हर व्यक्ति सिर्फ एक पौधा भी लगा दे…

तो धरती फिर से मुस्कुरा सकती है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८८ ☆ ~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ “फेसबुक की कहानी” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८८ ☆

?  आलेख ?~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ फेसबुक की कहानी ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

फेसबुक एक ऐसे विचार से शुरू हुआ था  जिसमें कुछ युवा अपने विश्वविद्यालय परिसर में आपस में जुड़ने का सरल तरीका खोज रहे थे। समय के साथ वही विचार इतना विशाल रूप ले चुका है कि दुनिया के लगभग हर कोने में लोग दिन की शुरुआत और बिस्तर पर दिन का अंत इसी मंच की खिड़की पर झांककर करते हैं। इसकी शुरुआत दो हजार चार में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से हुई थी और धीरे धीरे इंटरनेट से आज फेसबुक सीमित दायरे वाले कॉलेज नेटवर्क से निकलकर वैश्विक मंच बन गया है। इस यात्रा में इसके संस्थापक मार्क ज़ुकरबर्ग सबसे प्रमुख चेहरे के रूप में बने रहे और आज भी कंपनी का नियंत्रण मुख्य रूप से उनके हाथ में ही है। बाद में कंपनी ने अपना नाम बदलकर मेटा प्लेटफार्म्स कर लिया, जबकि फेसबुक उसी नाम से अपनी सेवाएं देता रहा।

फेसबुक की सबसे बड़ी सफलता उसका फैलाव है। यह केवल परिचितों से संपर्क बनाए रखने का साधन नहीं रहा, बल्कि विचार, अनुभव, समाचार, कला, व्यापार, जनमत और मनोरंजन का ऐसा सम्मिलित मंच बन चुका है जिसकी तुलना किसी अन्य माध्यम से करना कठिन है। इसके उपयोगकर्ता दुनिया भर में करोड़ों की संख्या में हैं और हर दिन अरबों पोस्ट, फोटो, वीडियो और संदेश यहां पर साझा होते हैं। लोग अपने विचार व्यक्त करते हैं, समूह बनाते हैं, समुदायों से जुड़ते हैं, खरीद फरोख्त करते हैं, विज्ञापन चलाते हैं और अपनी पहचान को मजबूत करते हैं। यही व्यापकता इसे आज के दौर में सबसे प्रभावी डिजिटल मंचों में शामिल करती है।

फेसबुक के आर्थिक ढांचे की रीढ़ विज्ञापन है। इसका लगभग पूरा राजस्व इसी पर आधारित है। फेसबुक उपयोगकर्ताओं के व्यवहार और रुचियों को समझकर विज्ञापनदाताओं को ऐसा मंच देता है जहां वे लक्षित दर्शकों तक सीधे पहुंच सकते हैं। इस सटीकता ने छोटे और बड़े सभी व्यवसायों के लिए इसे अत्यंत उपयोगी बना दिया  है। धीरे धीरे कंपनी ने कंटेंट निर्माताओं के लिए भी अवसर खोले हैं। पेशेवर मोड, वीडियो मोनेटाइजेशन, पेड सदस्यता जैसे कई साधन उपयोगकर्ताओं को सीधे कमाई का अवसर दे रहे  हैं। इस तरह फेसबुक एक साधारण सोशल नेटवर्क से विकसित होकर एक व्यापक डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार बन गया है।

फेसबुक का उपयोग समझदारी और सावधानी से किया जाए तो यह उपयोगकर्ता को अत्यंत लाभ पहुंचा सकता है। गोपनीयता सेटिंग्स की समय समय पर जांच, निजी जानकारी साझा करने में संयम, उपयोगी समूहों और पृष्ठों से जुड़ाव, संतुलित समय प्रबंधन और स्वस्थ संवाद की आदत इसे सकारात्मक अनुभव बना सकती है। जो लोग रचनात्मक हैं और नियमित रूप से लेख, फोटो या वीडियो साझा करते हैं, उनके लिए यह अपनी पहचान बनाने और  लोगों तक पहुंच बढ़ाने का एक प्रभावी मोबाइल एप है। इसे कंप्यूटर पर भी उसी सरलता से चलाया जा सकता है, किसी तरह के व्यक्तिगत डेटा स्टोरेज की अलग से आवश्यकता नहीं होती। निजी व्यवसाय चलाने वाले लोगों के लिए तो अब फेसबुक आधुनिक ऑनलाइन बाजार का अनिवार्य उपकरण बन चुका है।

भविष्य की दिशा में फेसबुक और उसकी मूल कंपनी मेटा नई संभावनाओं की ओर कदम बढ़ा रही है। आभासी और संवर्धित वास्तविकता के माध्यम से वे एक ऐसे डिजिटल जगत की कल्पना कर रहे हैं जिसमें लोग एक दूसरे से केवल संवाद ही नहीं करेंगे बल्कि एक साझा आभासी संसार में चल फिर सकेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नए प्रयोग भी इस अनुभव को और उन्नत बनाने की ओर अग्रसर हैं। यह सब सफल हुआ तो सोशल कनेक्शन, मनोरंजन, शिक्षा और व्यापार के बिल्कुल नए स्वरूप सामने आ सकते हैं।

फिर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। गलत सूचना, गोपनीयता का जोखिम, अत्यधिक स्क्रीन समय से आँखें खराब होना ,सामाजिक ध्रुवीकरण और डिजिटल निर्भरता जैसे पहलू चिंता का विषय बने रहते हैं। इस कारण फेसबुक की उपयोगिता तभी अर्थपूर्ण है जब इसे समझदारी और जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जाए। एक ओर यह अवसरों की दुनिया खोलता है, दूसरी ओर यह अपने साथ अपेक्षित सतर्कता भी मांगता है।

समग्र रूप से फेसबुक आधुनिक समाज का ऐसा दर्पण बन गया है जिसमें पूरी दुनिया एक साथ दिखाई देती है। यह लोगों को जोड़ता है, विचारों को दिशा देता है, रचनात्मकता को बढ़ावा देता है और आर्थिक अवसरों के नए मार्ग खोलता है। साथ ही यह याद दिलाता है कि हर तकनीक उतनी ही उपयोगी है जितनी समझदारी से हम उसका उपयोग करें।

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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

इन दिनों न्यूयार्क से

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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