श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता तुम आ रही हो…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७१ ☆

☆ # “तुम आ रही हो…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

यह मेंघों का गरजना

धरती का तरसना

पानी का बरसना

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

 

यह ठंडी ठंडी हवाएं

भीगी हुई फिजाएं

मौसम मदहोश बनाए

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

 

यह खिलती हुई कलियां

वर्ष में डूबी हुई गलियां

बूंदों में छुपा हुआ छलिया

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

 

अमराई में कोयल की कूक

जवां दिलों में उठती हुई हूक

याद दिलाती प्रियतम की चूक

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

 

वर्षा की रिमझिम फुहारें

जुल्फों में चमकते हुए तारे

भीगे हुए वस्त्र सारे

देखकर

ऐसा लगता है

कि तुम आ रही हो

 

यह वर्षा की लंबी झड़ी

बूंदों की रंगीन लड़ी

बीतती हुई मदहोश घड़ी

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

 

अब तो तुम आ भी जाओ

प्यासे दिल को और ना सताओ

रूत बेईमान है देर ना लगाओ

चिड़ियों की चहचहाहट

देखकर

ऐसा लगता है

जैसे कि तुम आ रही हो

अपना किया हुआ वादा

निभा रही हो /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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