(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘बहती गंगा में हाथ धोने वाले‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१२ ☆
☆ व्यंग्य ☆ बहती गंगा में हाथ धोने वाले ☆
देशभक्त कई किसिम के होते हैं। पहली किस्म के देशभक्त वे होते हैं जिनके दिल में देशभक्ति स्वाभाविक रूप से पैवस्त रहती है। उन्हें उसे याद नहीं करना पड़ता, न ही उसे बार-बार जगाना पड़ता है। वे अंग्रेज़ी कहावत के अनुसार अपनी देशभक्ति अपनी आस्तीन पर टांग कर प्रदर्शित नहीं करते।
दूसरी तरह के लोग वे होते हैं जिनकी देशभक्ति तभी जागती है जब देशभक्ति दिखाने से कुछ प्राप्ति की संभावना होती है। सूखी देशभक्ति से क्या फायदा? ऐसे ही लोग देशभक्ति के प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरते हैं, देशभक्ति के नाम पर बवाल काटने को तैयार रहते हैं। ऐसे देशभक्त असली देशभक्तों का जीना मुहाल किये रहते हैं।
एक किस्म की देशभक्ति राजनीतिज्ञों की होती है। ये देश की सेवा के नाम पर बार-बार दल बदलते हैं। याद रखना मुश्किल होता है कि वे कौन-कौन से घाट का पानी पीकर आये हैं। कइयों को खुद भी याद नहीं होगा कि उन्होंने कितनी पार्टियां बदली हैं। सब कुछ देश की सेवा की दुहाई देकर होता है। देश की सेवा के लिए ये बेचारे अपने उसूल तृणवत त्याग देते हैं, ज़बान बदल देते हैं, अंतरात्मा का गला घोंट देते हैं।
बहुत से लोगों की देशभक्ति मौसम के हिसाब से बदलती है। सत्ता बदलने के साथ सत्ता की नीतियां बदलती हैं। बहुत से होशियार लोग इन्हें पढ़ते और गुनते हैं, और फिर उनको दुहने के लिए देशभक्ति का झंडा लेकर मैदान में उतर आते हैं। बहुत से लेखक और फिल्मकार यही करते हैं। इनकी देशभक्ति लाभ की संभावना के हिसाब से बढ़ती घटती है। ये मौके पर चौका लगाने वाले चतुर लोग होते हैं। जब अटल जी प्रधानमंत्री थे तब उनकी कविताओं के बहुत से गायक और प्रशंसक पैदा हो गये थे। उनके पद से हटते ही ये गायक भी ग़ायब हो गये थे। लालू यादव के एक प्रशंसक ने उन पर ‘लालू चालीसा’ लिखी थी। पुरस्कार- स्वरूप कवि जी राज्यसभा में सीट पा गये थे।
अभी चतुर लेखक सत्ता के ताकतवर लोगों पर पुस्तकें लिख रहे हैं और पर्याप्त प्रचार के साथ उनका विमोचन करा रहे हैं ताकि संदेश सही जगह पहुंच जाए और कृपा के द्वार खुल जाएं। राजाओं के ज़माने में यह काम भाट और चारण करते थे। कुछ फिल्मकार हैं जिन्हें सोते-सोते अचानक याद आता है कि देश में बहुत ज़ुल्म हुए हैं और उन पर किसी ज़िम्मेदार फिल्मकार ने फिल्म नहीं बनायी। सत्तर अस्सी साल पीछे तक दौड़ लगती है, पुराने कागज़-पत्र खंगाले जाते हैं, और साबित किया जाता है कि एक समुदाय ने दूसरे पर कितनी क्रूरता की है। नमक-मिर्च का भरपूर उपयोग होता है। भावनाओं की नदियां बहती हैं। कोशिश होती है कि उत्पीड़ित बताया गया समुदाय भीड़ों की शक्ल में सिनेमाघरों पर टूटे और सिनेमा- खिड़की पर चांदी बरसे। ऐसी फिल्मों को सत्ता का आशीर्वाद मिलता है, उन्हें मनोरंजन-कर से मुक्त किया जाता है। इसलिए खोज-खोज कर ऐसी घटनाओं पर फिल्में बनायी जा रही हैं।
यह मायने नहीं रखता कि इससे कितना आपसी सौहार्द्र बिगड़ता है, कितनी उत्तेजना फैलती है, कितना वैमनस्य होता है, आम आदमी की कितनी फजीहत होती है। फिल्मकार के लिए ये बातें निरर्थक होती हैं। वह ‘मिशन मोड’ में होता है। सच्चाई पर से पर्दा उठाना है, चाहे जो परिणाम हो। इस क्रम में गुज़रे वक्त के नेताओं को कठघरे में खड़ा किया जाता है, उनका मान-मर्दन होता है। नेताओं के लिए ये फिल्में लाभदायक होती हैं क्योंकि इनसे समुदायों में असुरक्षा की भावना बढ़ती है और वे गोलबंद होते हैं।
इन फिल्मकारों से पूछा जाता है कि वे दूसरे समुदाय के द्वारा किये गए ज़ुल्म और अन्याय पर फिल्म क्यों नहीं बनाते। जवाब मिलता है कि हर घटना पर फिल्म बनाने का ठेका हमीं ने नहीं ले रखा है। अन्य घटनाओं पर फिल्म अन्य फिल्मकारों को बनाना चाहिए। संदेश साफ है कि समझदार लोग वहीं हाथ डालेंगे जहां कुछ शहद मिलने की संभावना हो।
गनीमत यही है कि इस देश का आम आदमी शांतिप्रिय और धर्मनिरपेक्ष है और इसीलिए वह प्रोपेगंडा फिल्मों से प्रभावित नहीं होता। इन फिल्मों की कमाई के आंकड़ों से यह सिद्ध होता है। आम जनता को अच्छे कथानक और अच्छे अभिनय वाली फिल्में ही लुभाती हैं।
सत्ता के मिजाज़ के अनुसार रंग बदलने वाले और ‘जैसी बहै बयार, पीठ तब तैसी दीजे’ के सिद्धांत पर चलने वाले होशियार लोग हर युग में रहे हैं और हमेशा फलते-फूलते रहते हैं। डार्विन के सिद्धांत के अनुसार इनका ‘सर्वाइवल’ निश्चित है क्योंकि ये हर युग में ‘फ़िटेस्ट’ साबित होते हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “सटायर और रिटायर…“।)
अभी अभी # ८३८ ⇒ व्यंग्य – सटायर और रिटायर श्री प्रदीप शर्मा
सटायर कभी रिटायर नहीं होती। रिटायर होना, जिंदगी की सबसे बड़ी सटायर है। रिटायर होना पहले टायर होना है और उसके बाद सटायर होना है। टायर जीवन का पहिया है, जो हमेशा बाबू बनकर दफ्तर की जिंदगी की गाड़ी में जुता रहता है। जब थक जाता है, सटायर हो जाता है, दफ्तर से रिटायर हो जाता है।
जब बड़े बाबू रिटायर होते हैं, उनकी कलम थक जाती है। जीवन भर, जब तक उनकी कलम चली नहीं, फाइल अपनी जगह से हिली नहीं। कलम ही उनका जीवन का पहिया था, जो टायर का काम करता था। उनकी टीप से ही फाइल यहां से वहां जाया करती थी। अपना वक्त जाया किया करती थी। बड़े बाबू कभी थके नहीं, फाईल कभी नहीं थकी। अचानक जीवन सटायर हो गया, बड़ा बाबू रिटायर हो गया।।
जीवन में संगति है तो गति है। गीत है, संगीत है। आशा, उम्मीद, उत्साह, उमंग, जोश जीवन के पहिये हैं, जिन पर चलकर ही इंसान आगे बढ़ता है। चलना जिंदगी की निशानी, रुकना टायर के रिटायर होने की निशानी। कबीर की एक और ताजी उलटबासी! जो कभी थके नहीं, हमेशा चलता रहे, फिर भी नाम टायर यानी थकेला। व्हाट अ सटायर!
बेचारा थका है, टायर है, फिर भी चल रहा है। हम सब थके हुए टायर हैं, फिर भी चल रहे हैं। टायर नहीं, रिटायर हूं मैं। यानी करेला और नीम चढ़ा। नीम की उम्र बड़ी होती है, करेले की कम होती है। यह सटायर कभी कड़वी नीम है तो कभी मीठी। करेले की तरह नहीं, नीम की तरह रिटायर हों। दीवाली के फरसाण की मीठी नीम हैं हम, अभंग स्नान की नीम, चंदन, केसर, तुलसी हैं हम।
हमारी विसंगति में भी गति है। रिटायर हैं हम, सटायर हैं हम। आज नहीं नीम की कड़वाहट, आज नहीं टायर की थकावट, कल के जुगनू नहीं, आज प्रकाश के पुंज हैं हम। उम्मीद के आकाश के चमकते तारे हैं हम। आज नहीं बयानबाजी, बस खुशियों की आतिशबाजी, तम की कड़वाहट दूर भगाई जाए, आज कुछ मीठा हो जाए।।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “लल्लू की शादी में कल्लू का बैंड”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १८ ☆
☆ हास्य-व्यंग्य ☆ “लल्लू की शादी में कल्लू का बैंड” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
लल्लू की शादी थी। लल्लू के दोस्तों की जिद थी कि बारात में कल्लू का बैंड बजेगा, तभी झल्लू, लल्लू और सिल्लू नाचेंगे।
बारात में नृत्य होना अब कितना जरूरी “आइटम” हो गया है यह सभी जानते हैं। वह बारात भी कोई बारात है जिसमें घोड़ी चढ़े दूल्हे के आगे – आगे बैंड वादकों के बीच उसके दस – बीस साथी नाच – नाच कर आसमान सर पर न उठा लें। नर्तकों के दल के बिना आज बारात की कल्पना भी नहीं की जा सकती। नृत्यों के प्रदर्शन के बिना बारात वैसी ही बेमजा, अनाकर्षक लगती है जैसे नमक के बिना दाल, बूट के बिना सूट और ठुमकों के बिना खूबसूरत कमसिन हसीना की चाल।
यदि व्हेनसांग या फाहयान जैसा कोई चीनी यात्री इस समय भारत यात्रा का वर्णन लिख रहा होगा तो उसने यहां के विवाहों और बारातों पर अवश्य ही लिखा होगा कि भारत में विवाह अब पंडितों के मुहूर्त पर नहीं बैंड वादकों के दिए समयानुसार निर्धारित होकर संपन्न होते हैं। वर पक्ष नगर में उपलब्ध श्रेष्ठतम बैंड पार्टी को अपनी बारात हेतु तय करके पूरा पैसा कन्या पक्ष के सर मढ़ने की कोशिश करता है।
वर – पक्ष की हैसियत अब बारात के साथ चल रही बैंड पार्टी के स्टैण्डर्ड से आंकी जाने लगी है। बारात में बैंड वादकों के आगे आगे चमचमाते रथों अथवा सुसज्जित ठेलों पर ध्वनि विस्तारक यंत्र (लाउड स्पीकर) चलते हैं जो बैंड वादकों की संगीत कला और वर पक्ष की प्रतिष्ठा को दूर – दूर तक फैलाने का काम करते हैं। बैंड वादकों के दोनों ओर कतार से गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले बच्चे अथवा महिलाएं सर पर डिस्को लाइट व्यवस्था से जुड़े विद्युत बोर्ड रख कर चलते हैं जिनकी विद्युत छटा वाद्य यंत्रों से निकली तरंगों की भांति कंपित होकर नृत्य का वातावरण निर्मित करती है।
यों तो पथ पर जगह – जगह बारात रुकवाकर उपस्थित नर्तक दल अपने नृत्य का प्रदर्शन करता है, किंतु तिराहों – चौराहों पर नाच के विशेष और लम्बे प्रदर्शन हुआ करते हैं। आमतौर पर नशे के कारण बारात में उपस्थित युवा नर्तकों का समय बोध समाप्त हो जाता है। वे नाचना शुरू करते हैं तो उस समय तक नाचते ही रहते हैं जब तक कि बारात के साथ युवकों का संकोच पालते चुपचाप होश में चल रहे बड़े – बूढ़े बार – बार उनसे आगे बढ़ने का अनुरोध नहीं करते।
नर्तकों में कुछ तो घोषित नर्तक होते हैं जिन्हें केवल बारात के आगे – आगे नृत्य करने के उद्देश्य से ही दूल्हे अथवा उनके छोटे बड़े भाईयों द्वारा आमंत्रित किया जाता है। ऐसे युवा नर्तक नृत्य के प्रभाव को उभारने वाली भड़कीली, नए फैशन की पोशाकें धारण किए रहते हैं। सामान्यतः इनके बाल या तो बड़े – बड़े होते हैं अथवा सिर के चारों ओर के बाल साफ, केवल सिर के ऊपर बालों का गुच्छा होता है जैसे छिला हुआ नारियल। बैंड वादकों को इनके निर्देशानुसार नृत्य प्रधान फिल्मी गीतों की धुनें बजाना पड़ती हैं। युवकों की दृष्टि में इन कुशल तथा बड़े – बूढों की दृष्टि में इन भौंडी हरकतें करने वाले युवा नर्तकों का नृत्य अथवा उछलकूद जब पूरे जोश में होता है तब दर्शनीय वातावरण निर्मित होता है। ऐसा लगता जैसे अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, ऋषि कपूर, सलमान खान और ऋतिक रौशन के भूत एक साथ इन पर सवार हो गए हों। अब तो बड़ी संख्या में महिलाएं भी बारातों में सड़क पर होने वाले नृत्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगी हैं। सच भी है जमाना बराबरी का है।
बारात के समक्ष नृत्य प्रदर्शन में बीच – बीच में निपुण नर्तकों द्वारा नृत्य से अंजान अथवा नृत्य करने में शर्माने, झिझकने वालों को भी नृत्य में सम्मिलित होने के लिए पकड़ – पकड़ कर खींचा जाता है। चूंकि बारात में नाचना दूल्हे से निकटता का परिचायक है, अतः नाच न जानने वाले अथवा नाच की इच्छा न रखने वालों को भी नृत्य आमंत्रण के बलात्कार का शिकार होना पड़ता है। जब इस तरह के लोग सामूहिक नृत्य करते हैं तो केवल तीन काम किए जा सकते हैं। पहला जी खोल कर हंसने का, किंतु हंसना अभद्रता का प्रतीक हो जाता है इसीलिए बारात में उपस्थित दर्शक हंसी आने पर भी हंस नहीं पाते, हां कुछ चेहरों पर मुस्कुराहट अवश्य आ जाती है। नृत्य से बिल्कुल ही अपरिचित किंतु नृत्य करने को मजबूर कुछ बेचारों का नृत्य देखकर जो दूसरा काम किया जा सकता है वह है सिर पटकने का। इसी तरह तीसरा काम, अपने बाल नोंचने का भी यदि दर्शक चाहें तो कर सकते हैं।
अस्तु, अंत में कन्या के घर तक पहुंचते – पहुंचते नर्तक दलों और बैंड वादकों में तू – तू, मैं – मैं होने लगती है। बैंड वादक भिन्न – भिन्न नर्तक दलों के पसंद की धुनें बजा – बजाकर परेशान हो जाते हैं। कोई कहता है ” खई के पान बनारस वाला” बजाओ, कोई “घोड़ी पे होके सवार, चला है दूल्हा यार” की फरमाइश करता है। तो कोई कहता है कि “तंबू में बम्बू” बजाओ। सबकी अलग फरमाइश होती है।
लड़की के घर के समक्ष नृत्य का विशाल, अनोखा और अंतिम प्रदर्शन किया जाता है जिसमें सारे कुशल, अकुशल नर्तक एक साथ भाग लेकर हंगामा खड़ा कर देते हैं। पंडित लड़की के माता – पिता से मुहूर्त निकला जा रहा है की गुहार लगाते हैं। आखिर समझने – बुझाने पर किसी तरह नृत्य निशा समाप्त होती है। मिलने को आतुर समधी गले मिलते हैं। नचईया कम हो रहे नशे की पूर्ति को निकल जाते हैं।
यह दृश्य केवल लल्लू की शादी और कल्लू की बैंड पार्टी का नहीं, आज की अधिकांश बारातों का है। हर शादी में झल्लू, मल्लू और सिल्लू जैसे नर्तक होते हैं। भले ही इनके नाम कुछ और हों। शादियों का समय चल रहा है, वैसे तो मुझे भरोसा है कि सभी के पास बारात के लिए नाचइयों का इंतजाम होगा फिर भी यदि किसी को नाचने वाले न मिल रहे हों तो उसे चाहिए कि वह पहले से दौड़ धूप कर ले, आजकल किराए पर सब उपलब्ध है।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘‘रूट्स’ की खोज-खबर‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३११ ☆
☆ व्यंग्य ☆ ‘रूट्स’ की खोज-खबर ☆
संतोष भाई आठ दस साल से ‘स्टेट्स’ में बस गये हैं। बच्चे भी अब आठ दस साल के हो गये हैं। बड़ी बेटी है और छोटा बेटा। संतोष भाई के गांव में अभी मां-बाप और अन्य रिश्तेदार हैं। तीन चार साल पहले वे अकेले गांव गये थे। अमेरिका के घर में मां-बाप, चाचाओं-चाचियों और गांव के घर की फोटो टंगी है। कई बार उन्हें हसरत से देख लेते हैं, लेकिन इंडिया वापस लौटने की नहीं सोचते।
लेकिन कुछ दिनों से संतोष भाई के मन में यह बात बार-बार आ रही है कि बच्चे बड़े हो गये, उन्हें अपनी ‘रूट्स’ से परिचित कराना चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि उनके ‘एंसेस्टर्स’ कहां से आये थे, वे कैसे रहते थे, इंडिया का गांव कैसा होता है, वगैर:-वगैर:। बेटी सयानी हो रही है, कहीं कल के दिन डेटिंग वेटिंग के चक्कर में न पड़ जाए, इसलिए इंडियन कल्चर की जानकारी देना ज़रूरी है। जब से संतोष भाई के दिमाग में ये बातें आयी हैं तब से वे ‘टु द रूट्स’, ‘टु द रूट्स’ बुदबुदाते रहते हैं।
संतोष भाई करीब एक महीने का प्लान बनाकर पांच छः दिन के लिए अपने गांव आ गये। दोनों बच्चे और पत्नी, रेखा, साथ हैं। गांव से ससुराल जाएंगे, फिर घूमने के लिए शिमला मसूरी।
मां बाप पोते-पोती को देखकर खुश हुए। गांव से और रिश्तेदार-परिचित जुटने लगे। गांव की दीदियां, चाचियां, बुआएं आने लगीं। घर में भीड़ होने लगी। महिलाएं बच्चों को लिपटाने चिपटाने की कोशिश करतीं तो रेखा की नाक सिकुड़ती। ‘इनफेक्शन’ का डर लगता। यहां कोई ढंग का डॉक्टर भी नहीं मिलेगा।
गांव में बहुत तब्दीली हो गयी। संतोष भाई के बचपन में रोशनी के नाम पर लालटेनें और लैम्प थे, पानी कुएं से आता था, रसोई के लिए चूल्हा था, खेती के लिए हल और परिवहन के लिए बैलगाड़ी थी, लोग कम पढ़े-लिखे और सीधे-सादे थे और सब तरफ सादगी और मजबूरी का आलम था। कारों के दर्शन कभी-कभी रसूखदारों की कृपा से होते थे। अब सब घरों में बिजली और नल थे, रसोई के लिए गैस थी, खेती- परिवहन के लिए ट्रैक्टर आ गये थे, लोग शिक्षित और चतुर हो गये थे और जीवन में चमक आ गयी थी। पहले लड़कियां संकोच में सिकुड़ीं घर में रहती थीं, अब वे पूरे आत्मविश्वास से मोबाइल और लैपटॉप पर काम करती दिखायी पड़ती थीं। कई घरों के दुआरे पर कारें देखी जा सकती थीं। कभी गांव में सिर्फ वैद्य का एक घर था जिसकी सेवा बड़े लोगों को ही मयस्सर होती थी, बाकी जनता रामभरोसे थी। अब सरकारी डॉक्टर के अलावा प्राइवेट डॉक्टर भी थे। सरकारी स्कूलों के अलावा प्राइवेट स्कूल भी पहुंच गये थे। गांव में ज़रूरी सुविधाएं पैदा हो गयी थीं।
लेकिन संतोष भाई को बच्चों को उनकी ‘रूट्स’ से रूबरू कराना है। वे घर के टांड़ में पुरानी चीज़ों को खंगालने में लगे हैं। पुरानी चीज़ों का ढेर लग रहा है। मिट्टी मंगवा कर चूल्हा बन रहा है। जलाने के लिए सूखी टहनियां मंगा ली गयी हैं। टांड़ पर एक टूटी चिमनी वाली लालटेन मिल गयी है। संतोष भाई उसे पोंछ-पांछ कर जलाते हैं। बच्चे देखकर कौतूहल से ताली बजाते हैं। दादी चूल्हा जलाती है, बच्चे धुएं की मार से बचने के लिए दूर खड़े होते हैं। रेखा हाथ नहीं लगाती, जलने का डर है।
टांड़ में हाथ से झलने वाला पंखा भी मिल जाता है। संतोष भाई बताते हैं कि पुराने ज़माने का ‘फ़ैन’ यही है। इसी के सहारे गर्मी कटती थी। बच्चे ताज्जुब से उस अजूबे को देखते हैं। संतोष भाई घुमा घुमा कर उसका प्रदर्शन करते हैं। बताते हैं कि उसे ‘बिजना’ कहा जाता था।
सवेरे दही बिलोने के लिए मथानी चलती है। दादी बच्चों को दिखाने के लिए रस्सी से खींचकर मथानी चलाती हैं। मक्खन या ‘नैनूं’ निकाला जाता है। बच्चे भी एक दो बार खींचा- खांची करते हैं। मज़ा आता है। फिर मां बरजती है। रस्सी से हाथ कटने का डर है।
संतोष भाई बच्चों को घर के सामने मीठे पानी के कुएं पर ले जाते हैं। गांव में मीठे पानी के दो-तीन कुएं ही हैं। कुएं पर मोटी रस्सी और उसमें बंधी बाल्टी पड़ी है। संतोष भाई वीरता दिखाने के लिए बाल्टी को कुएं में लटका देते हैं। कुआं गहरा है। संतोष भाई भरी बाल्टी खींचते हैं। आधी दूर तक खींचते खींचते उनकी हालत खराब हो जाती है। हांफी चढ़ जाती है। मुश्किल से बाल्टी को जगत तक पहुंचाते हैं, फिर कमर पर हाथ रखकर लंबी सांसें लेने लगते हैं। रेखा नाराज़ होकर बुदबुदाती है—‘सिली।’
अगले सवेरे एक बैलगाड़ी दरवाज़े आ लगी। ‘द चिल्ड्रेन विल गो फॉर अ राइड। इट विल बी अ नेसेसरी एक्सपीरिएंस।’ बच्चे बैलों को देखकर ‘काउ काउ’ चिल्लाने लगे। उन्हें बताया गया कि वे ‘काउ’ नहीं, ‘ऑक्स’ थे। गाड़ी में मोटा कालीन बिछाया गया ताकि झटके कम से कम लगें। गाड़ी चली तो हर गढ्ढे पर उछलने पर बच्चे ‘ओह’ ‘आह’ करते। पहले तो उन्हें मज़ा आया, फिर उनका मुंह बिगड़ने लगा। रेखा परेशान होने लगी। ज़्यादा उछलने पर छोटी-मोटी चोट लगने का ख़तरा था। लाचार संतोष भाई ने आधे घंटे में ही गाड़ी वापस मुड़वा ली।
तीन दिन में संतोष भाई ने अपनी ‘रूट्स’ को काफी खंगाल लिया है। अब वे संतोष के साथ ‘स्टेट्स’ लौट सकते हैं। ‘वी हैव नॉट फॉरगॉटेन अवर रूट्स। अपनी रूट्स को भूलना नहीं है। वी आर प्राउड ऑफ़ देम। सैल्यूट टु अवर मदरलैंड। सैल्यूट टु इंडिया।’
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय व्यंग्य – “सत्य का डॉक्टर्ड वीडियो” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८४ ☆
व्यंग्य – सत्य का डॉक्टर्ड वीडियो श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
सत्य संशय में है,गांधी जी के तीनो जापानी बंदर अब ए आई के जमाने में अपडेट हो चुके हैं। एक ने मुंह पर मोबाइल के पैक डिब्बे से निकला टेप चिपका लिया है , दूसरा कानों में इयरबड लगाकर कह रहा है मैं एआई फेक नहीं सुनता , यह मेरी समझ से बाहर है, तीसरा कैमरे के सामने हाथ हिलाकर कह रहा है अब मुझे मत शूट करो भाई, मुझे वीडियो साक्ष्य पर अब भरोसा नहीं रहा ।
कभी लोग कहते थे जो आंखों देखा वही सच। पर आज वही वीडियो सत्य , झूठ साबित हो रहा है। आंखों देखी अब भरोसे के काबिल नहीं रही। आंखें तो अब मोबाइल स्क्रीन पर टिकी रहती हैं और स्क्रीन पर जो कुछ दिखता है वो जेमिनी और उसके भाई बंधुओं का बनाया हुआ मायाजाल होता है। अब कोई भी वीडियो सच नहीं होता बस ए आई एडिटिंग की उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन होता है। पल भर में आप शेर की सवारी करते नजर आ सकते हैं, और अगले ही क्षण एक क्लिक से गोआ के बीच पर रंगरेलिया मनाते दिखाए जा सकते हैं। वीडियो सत्य भी डॉक्टर्ड है जो फॉरेंसिक जांच के प्रमाण पत्र के बिना झूठ समझा जा सकता है।
पहले कोई रिश्वत लेते पकड़ा जाता था तो कहा जाता था कि वीडियो साक्ष्य पक्का सबूत है। अब वही अफसर मुस्कराकर कहता है साहब ये तो जेमिनी का बनाया हुआ वीडियो है । विभाग जांच बैठा देता है कि यह रिश्वत असली है या आर्टिफिशियल। रिश्वतखोर कहता है कि नोटों के बंडल तो मेरी जेब में खुद एआई ने डाले थे मैं तो फाइल में गांधी जी के आदर्श ढूंढ रहा था, यह सब मेरे विरुद्ध एक टेक्निकल साजिश है।
अब न्यायालय भी परेशान है। वकील साहब कहते हैं कि माय लॉर्ड यह वीडियो पूरी तरह से कंप्यूटर जनित भ्रम है। जज साहब सोच में पड़ जाते हैं कि फैसला सुनाएं या अपडेट डाउनलोड करें। अदालत में गवाह कहता है मैंने अपनी आंखों से देखा और सामने वाला वकील पूछता है क्या आपकी आंखें जेमिनी से वेरीफाइड थीं।
प्रेम की दुनिया भी इस तकनीक की शिकार हो गई है। अब लड़की पूछती है क्या तुम सच में मुझसे प्यार करते हो और लड़का कहता है जितना प्यार जेमिनी मुझसे करता है। अब रोमांस नहीं होता रेंडरिंग होती है। लोग कहते हैं वीडियो कॉल पर कितने प्यारे लगते हो और सामने मिलते ही पूछ बैठते हैं , आप कौन हैं। प्यार बस एचडी क्वालिटी में दिखने वाला झूठ बन गया है।
शर्मा जी का हाल तो और भी खराब हुआ। ऑफिस में एक वीडियो फैला जिसमें वे अपनी टीम मेंबर के साथ पार्किंग में कुछ ज्यादा ही टीमवर्क करते दिखे। बीवी ने मोबाइल दिखाकर कहा ये कौन है। शर्मा जी बोले ये सब डीपफेक है , मैं तो बोर्ड मीटिंग में था। बीवी बोली बोर्ड मीटिंग में तुमने थाईलैंड जाने की बात कब से शुरू कर दी। शर्मा जी ने पसीना पोंछते हुए कहा अब जेमिनी आवाज तक कॉपी कर लेता है। बीवी बोली तो क्या अब मैं जेमिनी से पूछूं कि मेरा असली पति कौन है।
भ्रष्टाचार अब कला का रूप ले चुका है। पहले चोरी करते लोग डरते थे अब चोरी का वीडियो खुद बनाते हैं और लिखते हैं यह समाजशास्त्र का प्रयोग है। अब चोर भागता नहीं इंटरव्यू देता है। कहता है मैंने चोरी नहीं की, जेमिनी ने सिखाया था, मैं तो अनुसंधान कर रहा था। पुलिस भी अब सर्वर से पूछताछ करती है अपराधी नहीं पकड़ा जाता उसका डेटा पकड़ा जाता है।
जनता की हालत और भी दयनीय है। सुबह सोशल मीडिया खोलते ही हर आदमी किसी न किसी स्कैंडल का हिस्सा होता है। कोई नेता रिश्वत लेता है । कोई संत भगवत कथा सुनते हुए लड़कियों के संग गुप्त तपस्या में लीन पकड़ा जाता है । और हर कोई कहता है ये सब फेक वीडियो है। साजिश है ।अब भ्रम है , कौन असली है कौन आर्टिफिशियल। अब जो झूठ बोलता है वो मासूम कहलाता है और जो सच बोल देता है वो एआई विरोधी माना जाता है।
थाईलैंड अब एक पर्यटन स्थल नहीं वैवाहिक विवाद का प्रतीक बन गया है। कोई भी पुरुष वहां न भी जाए तो भी उसका डिजिटल वर्जन घूम आता है। बीवी वीडियो दिखाती है , देखो ये तुम बीच पर हो और पति कहता है ये फेस स्वैप है। बीवी कहती है तो पासपोर्ट की फोटो में वही मुस्कान क्यों है। अब सच्चाई भी सर्वर की मरजी से चलती है।
सच अब वैसा है जैसे सरकारी टेंडर हमेशा अटैचमेंट में छुपा रहता है। या शेयर इनवेस्टमेंट की बारीक अक्षरों वाली शर्तों में। लोग कहते हैं सच देखना हो तो वीडियो भेजो और वीडियो भेजते ही सबूत मिट जाता है। जो सच था वो फाइल बन गया और जो झूठ था वो ट्रेंडिंग वायरल टॉपिक।
भविष्य का बच्चा स्कूल में निबंध लिखेगा मेरा असली पिता कौन है। परीक्षा में पूछा जाएगा सत्य और डीपफेक का तुलनात्मक अध्ययन। और विज्ञान मेले में बच्चे प्रोजेक्ट लगाएंगे सच्चाई को फर्जी बनाने की मशीन।
अब हर सत्य संशय में है। कोई कहता है मैंने देखा तो लोग कहते हैं स्क्रीन रिकॉर्डिंग दिखाओ। कोई कहता है मैं निर्दोष हूं तो जवाब मिलता है प्रमाण दो कि तुम इंसान हो न कि किसी सॉफ्टवेयर का एक्सपेरिमेंट।
सच बोलना अब अपराध है क्योंकि झूठ जेमिनी की मेहरबानी से और खूबसूरत हो गया है।
वीडियो साक्ष्य का सचमुच अंत हो चुका है। अब सच्चाई क्लाउड में अपलोड है और झूठ हर मोबाइल के व्हाट्सअप पर डाउनलोड हो रहा है। जो दिख रहा है वो झूठ है और जो नहीं दिख रहा वह सच हो इसमें सदा संशय है।
कहते हैं सत्य परेशान हो सकता है पर पराजित नहीं। पर जेमिनी के जमाने में सत्य न सिर्फ परेशान है बल्कि एडिट भी हो चुका है।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – अपेक्षा, जीवन का लाइसेंस।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७१ – व्यंग्य – अपेक्षा, जीवन का लाइसेंस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
अरे भैया, आप भी क्या खूब बात कर दिए! अपेक्षाएँ यानी आशाएँ! हा हा हा। यह तो ऐसा हो गया जैसे कहो कि पेट्रोल यानी गंगाजल। भई, गंगाजल से प्यास बुझती है, आस्था जगती है, पर पेट्रोल तो आग लगाता है! हमारी आपकी इस फालतू-सी जिंदगी में ये जो ‘अपेक्षा’ नाम का लाइलाज कोढ़ है न, यह केवल आशा का नाम नहीं है, यह तो जीवन का लाइसेंस है, और मृत्यु का वारंट भी! लाइसेंस इस बात का कि हाँ, तुम अभी जिंदा हो, क्योंकि तुम्हें किसी पड़ोसी की नई कार से, किसी रिश्तेदार की झूठी तारीफ से, या खुद अपनी निकम्मी औलाद से कोई गंभीर-सी अपेक्षा बाकी है। जिस दिन ‘जीने की वजह’ खत्म हो जाएगी, उसी दिन यह निरुद्देश्य जीवन जो तुम कोस रहे हो, वह अपने चरम पर पहुँच जाएगा। लेकिन ‘निरुद्देश्य जीवन’ भी कोई जीवन है? बिलकुल नहीं, वह तो सरकारी अस्पताल की फाइल है, जिसका कोई अता-पता नहीं, बस मोटी होती जाती है।
हमारे ‘मामाजी’ की अपेक्षाएँ तो इतनी ऊँची थीं कि छत से लगकर वापस आती थीं। उन्हें अपेक्षा थी कि उनकी मृत्यु पर कम से कम बीस हज़ार लोग रोएँ, जिसमें दस हज़ार तो ‘शो ऑफ’ करने वाले ही हों। और जब मरे, तो कुल पंद्रह आदमी पहुँचे, जिनमें से ग्यारह केवल खाना खाने के लिए आए थे। और आप कहते हैं कि अपेक्षाएँ रखनी चाहिए? ज़रूर रखिए! लेकिन यह ध्यान रखिए कि अपेक्षा जिससे रख रहे हैं, वह इंसान है—यानी फिसड्डी, कामचोर और मतलबी। आप अपेक्षा रखिए कि आपकी पत्नी चाय बनाएगी, और वह आपको ज़हर भी दे सकती है! और हाँ, यह बात तो बिलकुल ही सही है कि ‘पूरी न हो पाने पर निराश नहीं होना चाहिए’। यह उपदेश नहीं है, यह तो राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है! हर भारतीय यही उपदेश देता है, क्योंकि हममें से किसी की कोई अपेक्षा पूरी नहीं होती, इसलिए हम निराश नहीं होते, हम बस सन्न रह जाते हैं। यह निराशा नहीं, यह जन्मजात उदासीनता है। अपेक्षा रखो, और जब पूरी न हो, तो बस हँसो, एक ऐसी हँसी जो भीतर ही भीतर आपकी आँतों को निचोड़कर रख दे। यही जीवन का सबसे बड़ा व्यंग्य है, मेरे भाई।
वाह! क्या बात कही है! “जिंदगी चलने का नाम है”! बिलकुल, जिंदगी ऐसे ही चलती है, जैसे सरकारी बाबू की फाइल। धीरे-धीरे, रेंगते हुए, बिना किसी उद्देश्य के, और अंततः एक रद्दी के ढेर में सिमटकर। और ये जो इच्छाएँ अनन्त हैं न, यह तो ऐसा जुमला है, जिसे सुनकर तो आँखों में आँसू आ जाने चाहिए! एक इच्छा पूरी हुई नहीं कि दूसरी ने बेलन लेकर सिर पर दस्तक दे दी। अरे भाई, ये इच्छाएँ नहीं हैं, ये तो ब्याज हैं, जो हम अपनी आत्मा से ले रहे हैं! पहली इच्छा (एक साइकिल) पूरी होती है तो दूसरी (एक स्कूटर) तुरंत माँग पत्र भेज देती है। स्कूटर मिलता है तो तीसरी (एक सरकारी नौकरी) एफिडेविट लेकर खड़ी हो जाती है! यह अनन्तता नहीं है, यह तो नरक का इन्फिनिटी लूप है। एक इच्छा-पूर्ति का सुख सिर्फ दो मिनट का होता है, और अगली इच्छा का दुख दो जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ता।
जिस दिन सब पूरी हो जाएँ, यानी मन निर्मोही हो जाए! हा हा हा! यह तो भारतीय आध्यात्म का सबसे क्रूरतम व्यंग्य है। मन निर्मोही हो जाए? यानी मन काम करना बंद कर दे, यानी मन की मशीन में जंग लग जाए। तब मोक्ष मिलेगा? मोक्ष नहीं मिलेगा मेरे दोस्त, अधूरे सपनों का भूत मिलेगा, जो रात भर कान में फुसफुसाएगा, “क्यों नहीं किया? क्यों छोड़ दिया?” और आप कहते हैं कि तब व्यक्ति मरे हुए के समान हो गया? बिलकुल! मरे हुए के समान नहीं, बल्कि सच्चा भारतीय नागरिक हो गया! क्योंकि यहाँ आदमी जिंदा कम, मरा हुआ ज़्यादा नज़र आता है। सुबह-शाम काम करता है, बच्चों को पालता है, समाज को गालियाँ देता है, लेकिन भीतर से वह कोरा कागज़ है, जिस पर कोई इच्छा, कोई अपेक्षा अब कोई रंग नहीं भर पाती। यह जीती-जागती लाश बनना ही तो ‘मोक्ष’ है—उस मोक्ष का, जो इस समाज ने हमें उपहार में दिया है! अपेक्षा ही तो वह काला धागा है, जो हमें खुद से और दूसरों से बाँधे रखता है। यह धागा टूट जाए तो आदमी निर्गुण ब्रह्म हो जाए, यानी बेकार!
अपेक्षा ही वह जीवन-पथ है, जो निरंतर जीवन्तता की ओर अग्रसर होती है! आह! क्या सहानुभूतिपूर्ण झूठ है! अपेक्षा जीवन्तता की ओर नहीं ले जाती, वह तो हमें अस्पताल के बेड की ओर खींचती है, जहाँ हम अपेक्षा करते हैं कि डॉक्टर अब भी ईमानदार होगा और इंजेक्शन सही नस में लगाएगा! यह अपेक्षा ही तो है जो जीवन में रस घोलती है? बिलकुल घोलती है! यह माधुर्य नहीं घोलती, यह तो ज़हर का कड़वा घोल घोलती है! यह रस तो ऐसा है, जो हमारी नसों से खून निचोड़कर बाहर कर देता है, और हम कहते हैं, वाह! क्या माधुर्य है! एक कर्मचारी अपने बॉस से अपेक्षा करता है कि उसकी मेहनत का फल उसे मिलेगा। फल मिलता है? नहीं, उसे ज्यादा काम मिलता है! एक पत्नी अपेक्षा करती है कि पति उसे समझेगा। पति समझता है? नहीं, वह उसे रसोई का सामान समझता है! यही तो हमारे ‘जीवन का रस’ है—अधूरापन और उपेक्षा।
और ये लोगों के विचारों में जो उनकी अपेक्षाओं का दम होता है न, यह तो पेटेंट कराने लायक है! मरने के बाद के लिए भी अपेक्षाएँ पाल लेना—इससे बड़ा मानवीय विदूषक और कोई हो ही नहीं सकता। हमारे ‘चाचाजी’ (फिर से नाम बदल दिया, पर आत्मा वही है) ने अपनी वसीयत में लिखा था कि उनके मरने के बाद उनके सारे झूठ और कमजोरियाँ जला दी जाएँ। उन्हें अपेक्षा थी कि दुनिया उन्हें एक देवता की तरह याद करेगी। और हुआ क्या? उनके मरने के अगले ही दिन उनकी अवैध ज़मीन पर कब्ज़ा हो गया, और उनके बेटा-बेटी आपस में चप्पलें चला रहे थे कि पिता का काला चश्मा किसे मिलेगा!
और यह जो आपने कहा, ‘मरने के बाद कोई लौट कर यह देखने नहीं आता’! यह बात तो रोने पर मजबूर कर देती है! कोई आता ही नहीं, क्योंकि जिसे आना था (यानी आत्मा), वह तो मोक्ष के चक्कर में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही होगी! लेकिन फिर भी, अपेक्षाएँ तो रहेंगी! हाँ! जीवन के बाद के लिए भी अपेक्षाएँ रहेंगी—कि अगली बार इंसान न बनें, कम से कम कीड़ा ही बन जाएँ, जिसकी कोई अपेक्षा न हो! कम से कम कीड़े को मोक्ष की चिंता तो नहीं करनी पड़ती!
अंतिम बात, जो आपने कही, वह तो आत्म-उत्पीड़न का चरम है! जैसे अपेक्षाओं का अंत नहीं होता, वैसे ही ज़रूरी नहीं हर अपेक्षा पूर्णता को प्राप्त हो। यह सच्चाई नहीं है, यह तो ज़िंदगी का क्रूर मज़ाक है! अपेक्षा पूरी न हो, तब भी हम सीधी पीठ करके खड़े रहें। क्यों? क्योंकि हमें अपने आप को ऐसा बनाना चाहिए कि किसी बात से कभी निराश नहीं होना चाहिए! यह असंभव है! यह तो ऐसा है जैसे किसी भूखे आदमी से कहो कि तुमको खाना नहीं मिलेगा, पर तुम खुश रहो, क्योंकि खुशी में ही सुखी जीवन की कुंजी है!
अरे भैया, निराशा का दामन न थामना वीरता नहीं है, यह तो आत्म-वंचना है! जो आदमी निराशा का दामन नहीं थामता, वह असल में कुछ भी नहीं थामता! वह बस बहता जाता है, जैसे सेप्टिक टैंक का पानी। उसे लगता है कि वह सुखी जीवन जीने की कुंजी हासिल कर लेगा? हा हा हा! उसे मिलती है अमरता का फंदा! वह हमेशा खुश रहने की एक्टिंग करता है, और इसी एक्टिंग में वह इतना थक जाता है कि अंततः वह मनुष्य नहीं रह जाता, वह एक खाली, खोखला ढोल बन जाता है।
सुखी जीवन की कुंजी यह नहीं है कि आपकी अपेक्षाएँ पूरी हों। सुखी जीवन की कुंजी यह भी नहीं है कि आप निराशा से दूर रहें। सुखी जीवन की कुंजी तो यह है कि जब आपकी अपेक्षाएँ धूल में मिल जाएँ, जब आपके अपने आप को धोखा दें, जब दुनिया आपको ठुकरा दे, तब आप ज़ोर-ज़ोर से रोएँ! आप चिल्लाएँ! आप अपनी अंदर की पीड़ा को बाहर आने दें! लेकिन नहीं, हमारा समाज हमें यही सिखाता है—मुस्कुराओ, क्योंकि रोने वाला आदमी कमज़ोर होता है। इस झूठी मुस्कान के पीछे जो अश्रु-सागर छिपा है न, वही इस व्यंग्य की सबसे मार्मिक और पीड़ादायक सच्चाई है।
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “सोनम (गुप्ता नहीं): बावफ़ा से बेवफ़ा तक…” ।)
☆ शेष कुशल # ५६ ☆
☆ व्यंग्य – “सोनम (गुप्ता नहीं): बावफ़ा से बेवफ़ा तक…”– शांतिलाल जैन ☆
वफ़ा का तो ऐसा है जनाब कि एक अनचाहा कदम उठा और आप बावफ़ा से बेवफ़ा हुए. 2016 की नोटबंदी में दस रूपए के नोट से मशहूर हुई सोनम गुप्ता के बेवफ़ा होने की कहानी की असलियत का तो अभी तक पता नहीं चला मगर सोनम के बेवफ़ा होने की चर्चा फिर से एकबार आम हो चली है. लेह के अवाम ने मनचाहा कदम उठाना चाहा तो मुल्क के निज़ाम ने अनचाहा फील किया और ‘सोनम(टू) बावफ़ा से बेवफ़ा’ हो गई. दस का नोट बच गया. लिखकर मुनादी कराने की जरूरत भी ना पड़ी.
अह्द आसान है पर उसकी वफ़ा मुश्किल है. सूबे को आईन की छठी अनुसूची में जोड़ेंगे. वादा किया था निज़ाम ने. निभाया तो नहीं और बेवफ़ाई का इल्ज़ाम अलबत्ता सोनम के नाम जड़ दिया. कसूर बस इतना ही कि वे दो-तीन बरस से मुक़ाबिल थे निज़ाम के, दाग़ देहलवी का शेर दोहरा रहे थे – ‘वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे, तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था.’
स्टीरियो टाईप जवाब निज़ाम का – ‘क्यूँ पशेमाँ हो अगर वअ’दा वफ़ा हो न सका, कहीं वादे भी निभाने के लिए होते हैं.’
अब अवाम के इस भोलेपन पर क्या ही कहें – आदतन तुमने कर लिए वादे और आदतन हमने ए’तिबार कर लिया. वादा तो पूर्ण राज्य का दर्ज़ा देने का भी था. ’सादगी तो हमारी ज़रा देखिए ए’तिबार आपके वादे पर कर लिया.’ इंतिज़ार लंबा खिंचा तो इधर सूबे का अवाम सड़कों पर उतर आया, उधर निज़ाम की आँखों में खून उतर आया. यूँ तो निज़ाम की बेवफ़ाई के दर्ज़नों किस्से हवा में तैरते रहते हैं मगर आँखों में इतनी तेज़ी से खून उतर आए ऐसा कम ही हुआ होगा. खून जो निज़ाम की आँखों में उतरता है वो अवाम की छाती चीर कर बहने लगता है. चार निर्दोष जवान सीने चाक् कर दिए गए. वफ़ादार नायक कल तक निज़ाम की आँख का तारा हुआ करे था, फलक से टूटा तो सीधे जेल में लेंड कर गया. पुलिस भी तेरी, अदालत भी तेरी, गवाह भी तू ही रहा. वफ़ा खुद से नहीं होती ख़फ़ा अवाम पर होते हो!!
निज़ाम के पास सतह से लेकर समंदर और आसमां को तक को चीरने के लिए सेना मौजूद थी. मगर उसकी सबसे मज़बूत सेना वर्चुअल दुनियाँ में थी – ट्रोल आर्मी. पुलिसिया कार्रवाई के सामानांतर चलते ट्रोल, कीचड़ फैंकने, कालिख पोतने में प्राम्प्ट भी और प्रवीण भी. बेवफ़ा का ख़िताब नवाजने तक सीमित नहीं रही ट्रोल आर्मी. ‘थ्री ईडियट्स’ का प्रेरणा-नायक, शिक्षाविद, दुनिया के सौ सबसे प्रभावशाली टाइम क्लाईमेट लीडर्स में शामिल एक खरा-खरा पर्यावरण संरक्षक, देशभक्त को गद्दार, पाकिस्तानी एजेंट जैसे कारतूस चला-चला कर लहू-लुहान कर दिया उसने. गंगोत्रियाँ झूठ की भी तो होती हैं जनाब. सोनम को बेवफ़ा का ख़िताब नवाजने की मैली-धारा आईटी सेल की गंगोत्री से निकली और मीडिया में बह चली. ‘बेवफ़ा’ से ‘बदनाम हुई’ तक सोनम(टू) सलाखों के पीछे है, उसका सवाल है –
’मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा,
मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा.’
मुनासिब जवाब किसी के पास नहीं, अपन के पास तो बिलकुल नहीं.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय व्यंग्य – “व्यंग्य – काँपटेबिलिटी सॉफ्टवेयर अपडेट करो भगवान” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८३ ☆
व्यंग्य – काँपटेबिलिटी सॉफ्टवेयर अपडेट करो भगवान श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कहा जाता है जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन लगता है भगवान को अपनी “मैचमेकिंग सिस्टम” की फाइलें फिर से स्कैन करनी होंगी। शायद उनके कंप्यूटर में “ विवाह सॉफ्टवेयर 1.0” अब बग से भर गया है। वरना धरती पर इतने असंगत युगल हर दिन “कम्पैटिबिलिटी एरर” क्यों दिखा रहे हैं।
शर्मा जी और उनकी पत्नी संगीता जी को ही ले लीजिए। शर्मा जी सुबह छह बजे उठकर योग और प्राणायाम करते हैं, और संगीता जी सुबह आठ बजे उठकर योगा नहीं बल्कि “जोगाड़” शुरू कर देती हैं कि आज खाना बाजार से किस तरह बुलवाया जाए । शर्मा जी नमक की मात्रा नाप-नापकर कम से कम खाते हैं और संगीता जी का सिद्धांत है कि “स्वाद, मूड से ज्यादा, भरपूर नमक से आता है।”
गुप्ता दंपति का हाल देखिए , गुप्ता जी को टीवी पर न्यूज़ देखना सबसे प्रिय लगता है, वो भी वो न्यूज़ जहां एंकर चीख-चीख कर बहस कर रहे हों। वहीं उनकी पत्नी सीमा जी को लगता है कि टीवी का उपयोग केवल “सास बहू सीरियल” के लिए है। नतीजा यह कि हर शाम गुप्ता जी और सीमा जी के बीच रिमोट वैसा ही मुद्दा बन जाता है जैसा संसद में बजट बिल। एक तरफ चीखता एंकर, दूसरी ओर रोती सास , घर में दोनों ही कार्यक्रम बराबर चलते हैं।
राजेश और कविता की जोड़ी में तो और भी दिलचस्प मेल है। राजेश को सुबह की सैर इतनी प्रिय है कि वो बिना घूमे दिन शुरू ही नहीं कर सकते। कविता के लिए सुबह की सैर का मतलब है,नींद में करवट बदल लेना। राजेश पार्क से लौटकर कहते हैं “तुम्हें भी चलना चाहिए था,” तो कविता तकिया पलटकर कहती हैं “तुम घूम आए न, कितने चैन से सोई मै पिछले एक घंटे।”
वर्मा जी को लगता है कि छुट्टी का दिन घर की डीप क्लीनिंग के लिए होता है, पंखा खोलो, बल्ब बदलो, स्क्रू कसो। और उनकी पत्नी मंजू जी मानती हैं कि छुट्टी का मतलब है “शॉपिंग डे”। नया कुकर, नई साड़ी, नई डील। सुबह से दोनों अपनी-अपनी दिशा में निकल पड़ते हैं, एक औजारों के साथ, दूसरी ऑफरों के साथ। शाम को थके हुए होते हैं, पर भगवान की राम मिलाई अपनी जोड़ी पर हंसते हैं।
कपड़ों पर भी मतभेद किसी राष्ट्रीय मुद्दे से कम नहीं। राठौर साहब की पत्नी को चटख रंग इतने पसंद है कि लगता है जैसे हर त्योहार होली ही हो। वहीं राठौर साहब को सफेद इतना प्रिय है कि लोग उन्हें देखकर पूछते हैं “क्या आप किसी फॉर्मल सम्मेलन से आ रहे हैं?” दोनों एक साथ बाजार जाते हैं, पत्नी कहती हैं “यह लाल साड़ी कितनी प्यारी है,” और पति सोचते हैं “अब घर में ट्रैफिक सिग्नल लगेगा क्या?”
भोजन पर बात छिड़े तो हर जोड़ा किसी कुकिंग शो का प्रतियोगी लगता है। मिस्टर तिवारी नॉनवेज के शौकीन हैं और मैडम तिवारी प्याज तक नहीं खाती। पति के हाथों में चिकन टिक्का और पत्नी के हाथों में तुलसीपत्र, किचन और पूजा घर के बीच दो विचारधाराएं टकराती हैं। पर प्रेम देखिए, दोनों साथ बैठकर खाते हैं, शायद एक स्वाद से, दूसरा सहनशीलता से।
घूमने का मामला तो और भी मजेदार है। मिश्रा जी कहते हैं “कश्मीर चलो, ठंड में मज़ा है।” और उनकी पत्नी कहती हैं “गोवा चलो, धूप में मज़ा है।” नतीजा यह कि दोनों समझौते में शिमला के रास्ते निकलते हैं और मनाली पहुंचकर भी एक दूसरे के शारीरिक थर्मोस्टेट को दोष देते हैं।
फिटनेस का भी अपना संघर्ष है। श्रीमती अग्रवाल जीरो फिगर के लिए डाइट पर हैं सलाद, सूप, स्मूदी। और अग्रवाल जी कहते हैं “भई जीवन में स्वाद न रहे तो सेहत का क्या फायदा।” जब वो परांठे खाते हैं तो श्रीमती जी उसे देख कर कहती हैं “तुम्हें अपने दिल की चिंता नहीं?” अग्रवाल जी हंसते हुए कहते हैं “दिल की ही सुनता हूं, दिल को खुशी चाहिए।”
एक और वर्ग है, सेल्फी बनाम सन्नाटा। पत्नी को हर मौके पर फोटो चाहिए। खाना खाया, फोटो। मंदिर गए, फोटो। झगड़ा हुआ, तब भी फोटो, ताकि बाद में दिखा सकें। बल्कि झगड़ा ही इस बात पर शुरू होता है। श्रीमान जी को कैमरा देखकर ही तनाव हो जाता है, लगता है हर क्लिक के साथ उनके निजी जीवन की पिक्सल घटती जा रही है।
तो क्या अब समय आ चुका है कि भगवान जोड़ियां बनाने वाला अपना सॉफ्टवेयर अपडेट कर ले।
शायद ये सारे पति-पत्नी एक जैसे सोचने लगें तो क्या बच जाएगा? न बहस, न नोक झोंक वाली मुस्कान, “तुम हमेशा ऐसे ही क्यों करते हो ? वाला ताना, फब्ती।” विवाह तब वैसा हो जाएगा जैसे बिना नमक की खिचड़ी या बिना विज्ञापन का टीवी ।
इसलिए कहा जा सकता है कि भगवान ने जो जोड़ियां बनाईं, वे असंगति नहीं, रोचकता से भरी हैं। भगवान ने प्रेम के कोड में जानबूझकर थोड़ा “कन्फ्यूजन” डाला है, ताकि रिश्ते नीरस न हों। वरना शर्मा जी और संगीता जी अगर दोनों योगी बन जाएं, तो कौन ठहाके लगाएगा? गुप्ता जी अगर सीरियल देखने लगें, तो न्यूज चैनल बंद ना हो जाएंगे।
भगवान को सॉफ्टवेयर बदलने की जरूरत नहीं, बस उसमें एक नया अपडेट डालना चाहिए “विवाह वर्जन 2.0 बस इतना कि श्रीमती श्रीवास्तव के 20 डिग्री ऐ सी के चलते मिस्टर श्रीवास्तव को रात में दूसरे बेड रूम में शिफ्ट न होना पड़े।”
जहां हंसी है, वहीं रिश्ता स्वस्थ है, और जहां रिमोट की छीना-झपटी चल रही है, वहां प्रेम जिंदा है। आखिर मीठा विरोध ही तो विवाह की ऑक्सीजन है। थोड़ी ठंड, थोड़ी गर्मी, पर दोनों साथ में, हमेशा “स्वर्गिक संगति” में।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “नेता याने अगुआ”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १७ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “नेता याने अगुआ” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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प्रायमरी शाला में पढ़ाया गया था “नेता याने अगुआ”। पहले अगुआ कम ही हुआ करते थे, पिछलग्गू अधिक होते थे। अगुआ ने जो कहा पिछलग्गुओं ने उसे मान कर उसका अनुसरण करना शुरू कर दिया, किंतु अब नई पीढ़ी में देखा जा रहा है कि पिछलग्गू बनने कोई तैयार नहीं। सब अगुआ याने नेता बनना चाहते हैं।
पुराने अगुआ नए अगुओं से परेशान हैं। वे चाहते हैं, अच्छे ठोस किस्म के पिछलग्गू, लेकिन आज का पिछलग्गू केवल पिछलग्गू ही नहीं बना रहना चाहता, बड़े अगुओं के साथ चलना तो चाहता है, किंतु छोटा अगुआ बनकर। इसी तरह की चेन ऊपर से नीचे तक बन गई है।
इसे यों भी कहा जा सकता है कि हमारे देश में – “सारे एक समान” के मूल संदेश को कितने अच्छे ढंग से आत्मसात किया गया है कि अब यहां न तो कोई अकेला अगुआ है और न तो कोई मात्र पिछलग्गू। जो अगुआ है वह किसी न किसी का पिछलग्गू अवश्य है और जो पिछलग्गू है वह कहीं न कहीं किसी न किसी का अगुआ भी है।
हमारे शहर के लिए यह गौरव की बात है कि हमने इस क्षेत्र में भी देश के किसी अन्य शहर, कस्बे अथवा गांव से हेटी नहीं खाई। जबलपुर की साहित्यिक चेतना पर कुछ लोग व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि यदि कोई यहां पत्थर उठा कर फेंके तो वह कवि के घर गिरता है। यह सच है – भले ही लोग इस बात पर हमारा मजाक उड़ाएं, लेकिन इस सच पर हमें नाज है। उसी तरह अब हम सीना ठोक कर कह सकते हैं कि हमारे शहर में नेताओं की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है बल्कि इससे कहीं ज्यादा सुदृढ़। आने वाले समय में हमें कम से कम यह नहीं कहना पड़ेगा कि नेतृत्व के अभाव में हमारे शहर का विकास नहीं हुआ है। हां, नेतृत्व की अधिकता में विकास अवरुद्ध हुआ यह कहना पड़ जाए तो बात अलग है।
अभी तक लोग कहा करते थे कि नेताओं के मामले में उत्तर प्रदेश धनी है। अब हम मध्यप्रदेश की वर्तमान स्थिति को देख कर कह सकते हैं कि आने वाले समय में नेताओं के मामले में हमारा प्रदेश और विशेष रूप से हमारा नगर जबलपुर किसी से कम नहीं रहेगा, बल्कि कई प्रदेशों के रिकॉर्ड तोड़ेगा। यहां के अधिकांश नवयुवकों में नेतागिरी के प्रति असीम उत्साह और लगन को देखते हुए कहा जा सकता है कि शीघ्र ही यहां से देश को नए नेताओं की बड़ी खेप मिलेगी।
अनेक युवक और छात्र इन दिनों पूर्णकालिक नेतागिरी के कार्य में रत हैं। सुबह से शाम तक एक ही कोशिश में लगे रहते हैं, कैसे अगुआ बनें, कहां नेतागिरी पकाएं। कौन सी समस्या पर चका जाम, धरना, प्रदर्शन किया जाए, किसे काले झंडे दिखाए जाएं ? कौनसा आंदोलन शुरू किया जाए अथवा किसे खत्म कराया जाए। अखबारों में विज्ञप्तियां भेजने के लिए विषयों की खोज करना भी कोई इन नए नेताओं से सीखे।
कोई बड़े नेता आ रहे हैं, फटाफट सैकड़ों की संख्या में स्वागत अथवा विरोध संबंधी विज्ञप्तियां भेज देंगे। कोई दुर्घटना हुई नहीं कि विज्ञप्तियां जारी। सहयोगी की उपलब्धि पर विज्ञप्ति, सड़क, पानी, बिजली पर विज्ञप्ति। रेलों, बसों, हवाई जहाजों पर विज्ञप्ति। स्कूलों – कॉलेजों, विश्वविद्यालयों पर विज्ञप्तियां। कचरे के ढेरों, आवारा जानवरों पर विज्ञप्ति, पेशाब घरों पर विज्ञप्ति। पुलिस की ज्यादती पर विज्ञप्ति, पुलिस की कमजोरी पर विज्ञप्ति।
कहने का अर्थ आप समझ ही गए होंगे। नेता बनना है तो अखबार में नाम छपना जरूरी है, और नाम छपवाना है तो कोई न कोई बहाना तो होना ही चाहिए। अगुआ याने नेता, नेतृत्व करता है। ध्यान आकर्षित करता – कराता है। कार्य करना कर्मचारियों का अथवा उनका काम है जो नेता अथवा पिछलग्गू नहीं हैं। सब महसूस कर रहे हैं कि इन दिनों काम नहीं हो रहे अथवा मंद गति से हो रहे हैं। इसके पीछे क्या कारण हैं आप समझ गए होंगे। सब अगुआ अथवा पिछलग्गू बनकर ध्यान आकर्षित करा रहे हैं, विज्ञप्तियां दे रहे हैं, काम कौन करे ? कुछ यही हाल सरकारी दफ्तरों के भी हैं यहां का अगुआ अधिकारी अथवा बॉस कहलाता है फिर उससे छोटे अधिकारी होते हैं जो बॉस के पिछलग्गू लेकिन बाबुओं के लिए तो बॉस ही होते हैं। बड़ा अधिकारी याने बॉस याने ऑफिस का अगुआ आदेश निकलता है। छोटे बॉस उसे पूर्ण करने कर्मचारियों को प्रसारित करते हैं और कितना काम होता है यह सभी जानते हैं।
नेताओं की नई खेप में ज्यादातर वर्तमान नेताओं के भाई, भतीजे, पुत्र हैं तो कुछ अन्य संपन्न परिवारों के महत्वाकांक्षी युवा भी हैं जो नेतागिरी को व्यवसाय के रूप में अपना कर यश कीर्ति और धन अर्जित करना चाहते हैं पर जिनसे न तो दो शब्द बोलते बनते हैं, न लिखते – विज्ञप्ति किस विषय पर बनाई जाए यह सोचते भी नहीं बनता, लेकिन अगुआ बनने की आकांक्षा है। नेतागिरी के गुर और बोलना बताना सिखाने के लिए भी अब कोचिंग स्कूलों की जरूरत महसूस की जा रही है। ठीक है व्यक्ति को महत्वाकांक्षी व असंतुष्ट होना चाहिए, तभी तरक्की संभव है। अरस्तू ने कहा है कि संतुष्ट मनुष्य से अच्छा असंतुष्ट सुअर होता है।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘समाज में बाहुबलियों की अहमियत’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१० ☆
☆ व्यंग्य ☆ समाज में बाहुबलियों की अहमियत ☆
हाल ही में एक घटना ऐसी हुई जिसने बहुत भावुक कर दिया। बरेली में एक अभिनेत्री की बहन के घर पर एक बाहुबली के आदेश पर गोलियां चल गयीं। बाहुबली की नाराज़ी का कारण यह था कि अभिनेत्री की बहन ने एक कथावाचक के द्वारा स्त्रियों के विरुद्ध दिये गये बयान पर अपना रोष व्यक्त किया था। बाहुबली ने अभिनेत्री की बहन की टिप्पणी को सनातन का अपमान बताया था और उन्हें दंडित करने का निश्चय जताया था ।बाहुबली ने यह भी चेतावनी दी कि सनातन का अपमान करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
खबर सुनकर भावुकता से मेरा दिल भर आया। दो दिन तक कंठावरोध रहा। जहां सनातन के इतने बलशाली रक्षक हों वहां सनातन को हानि पहुंचाने की जुरअत भला कौन कर सकता है? अब सनातन पूर्णतया सुरक्षित है। हमारा संत समाज अब निश्चिन्त हो सकता है। अब सनातन को हल्के में लेने की मूर्खता भला कौन करेगा? ‘जब जब होय धरम की हानी, बाढ़ैं असुर अधम अभिमानी; तब तब धरि प्रभु विविध शरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।’ प्रभु कौन सा रूप धरकर धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हो जाएंगे, कौन कह सकता है? कथावाचकों का पक्ष लेते हुए बाहुबली ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘इनहिं कुदृष्टि बिलोकै जोई, ताहि वधे कछु पाप न होई।’ अब कथावाचक निश्चिंत होकर बीस फीट दूर से प्रेतग्रस्त आदमी को थप्पड़ लगा सकते हैं या छात्रों को बिना पढ़े पास होने के नुस्खे बता सकते हैं।
बाहुबली की धमकी के बाद कथावाचकों पर जब तब फब्तियां कसने वालों को सांप सूंघ गया है। उन पर गुस्सा दिखाने वाले कलमधारी अब चुपचाप अपनी कलम चबा रहे हैं। उनके शब्द डर के मारे कागज पर उतरने से इनकार कर रहे हैं।
सनातन के रक्षक एक वकील साहब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी से ऐसे नाराज़ हुए कि उन्होंने उसे सनातन का अपमान माना और मुख्य न्यायाधीश की तरफ जूता उछाल दिया। इस पराक्रम के साथ उन्होंने नारा दिया—‘सनातन का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान ।’ दुष्यंत कुमार ने लिखा था ‘एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।’ वकील साहब को कोर्ट के चेंबर में कोई पत्थर नज़र नहीं आया तो जूता उछाल दिया। बहादुरी के इस काम से वकील साहब ने बता दिया कि कि वे देश की न्याय व्यवस्था को जूते की नोक पर रखते हैं। वकील साहब ने यह नहीं बताया कि उन्हें पूरे हिंदुस्तान का वकील बनने के लिए किसने वकालतनामा सौंपा था।
बाहुबली की धमकी से जो सन्नाटा खिंचा उससे धर्म की रक्षा के मामले में एक नया आयाम उद्घाटित हुआ। हमारे देश में धर्मस्थलों की सुरक्षा पर सरकार का बहुत धन व्यय होता है। नये राम मंदिर की सुरक्षा के इंतज़ाम पर नज़र डालें तो दिमाग चक्कर खा जाता है। तीन प्रकार के बल वहां सुरक्षा में लगाये गये हैं, कैमरों और ड्रोन की तैनाती है, मंदिर को घेरती चार किलोमीटर की दीवार है। कई दूसरे धर्मस्थलों पर भी सुरक्षा बल तैनात हैं। गरज़ यह कि जो संसार की रक्षा करते हैं उनकी रक्षा आदमी कर रहा है। कई धर्मगुरुओं को भी सरकार के खर्चे पर सुरक्षा दी गयी है, जो सवाल पैदा करती है कि अपने को भगवान का कृपापात्र मानने वालों और मृत्यु का दिन पूर्व निर्धारित मानने वालों को आदमी की दी हुई सुरक्षा की ज़रूरत क्यों पड़ती है?
तो दिमाग में यह विचार आता है कि अगर पीपीपी अर्थात पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के अंतर्गत सरकार धर्म की रक्षा हेतु बाहुबलियों का सहयोग लेने लगे तो मामला ‘कम कीमत बालानशीं’ वाला हो जाएगा। बाहुबली की एक चेतावनी आएगी और धर्म के कार्यों में गड़बड़ी करने वाले सभी उपद्रवियों के औसान ढीले हो जाएंगे। फिर धर्मगुरुओं को भी सुरक्षा की ज़रूरत नहीं रहेगी।
देश के कई क्षेत्रों में बाहुबलियों की तूती बोलती है, उनकी अदालतें लगती हैं, लेकिन अफसोस है कि सरकार ने उनकी ताकत और क्षमताओं का समुचित उपयोग नहीं किया। जो काम सरकार द्वारा लाखों रुपया खर्च करने पर भी नहीं होता वह बाहुबली के एक निर्देश पर हो सकता है।
राहत की बात है कि कुछ राज्यों ने अपने बाहुबलियों की संभावनाओं को पहचाना है और उनका सहयोग लेने में रुचि दिखायी है। बिहार के आसन्न चुनाव के लिए एक दल ने तीन बाहुबलियों को मैदान में उतारा है, जब कि दूसरे दल ने एक पूर्व बाहुबली के संभावना-संपन्न पुत्र और एक ऐसे बाहुबली की पुत्री को टिकट दिया है जो फिलहाल संगीन अपराध में जेल में बन्द हैं और जनता की सेवा करने की स्थिति में नहीं हैं। पुत्री ने साफ घोषणा की है कि वे अपने यशस्वी पिता को जेल से बाहर लाने के लिए ही चुनाव लड़ना चाहती हैं। एक और बाहुबली की पत्नी को भी टिकट से नवाज़ा गया है। कुछ दिन पूर्व सुशासन बाबू ने कानून में परिवर्तन करके एक बाहुबली को उनकी उपयोगिता को देखते हुए जेल से मुक्त कराया था। अब उनके पुत्र को टिकट दिया गया है ताकि पिताजी पुत्र के पीछे बैठकर ‘बैक सीट ड्राइविंग’ कर सकें। इस तरह जब बाहुबली कानून के शिकंजे में आ जाते हैं तो उनकी पत्नी या पुत्र को टिकट दे दिया जाता है ताकि समाज की सेवा में अवरोध न हो।
यह संतोष की बात है कि अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की हमेशा धर्म में रुचि रही है। देश के दस्यु अक्सर मंदिरों में घंटे चढ़ाते रहे हैं। जो पिंडारी कहलाते थे वे काली के उपासक होते थे। वाल्मीकि की डाकू से महर्षि बनने की कथा सर्वविदित है।
मेरे ख़याल से बाहुबलियों की उपयोगिता और उनकी क्षमता के मद्देनज़र सरकार को चाहिए कि संकोच त्याग कर समाज के कल्याण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करे। ‘साफ छिपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं’ वाली नीति की अब कोई ज़रूरत नहीं है।
ताज़ा समाचार यह है कि बिहार के चुनाव में करीब दो दर्ज़न बाहुबली मैदान में उतर रहे हैं। अब मेरी चिन्ता यह है कि कहीं ऐसा न हो कि धीरे-धीरे विधानसभा की सारी सीटों पर बाहुबली विराज जाएं और बिहार प्रगति के मार्ग पर ऐसा सरपट दौड़े कि पूरा देश देखता रह जाए।