हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर # ११६ – नामालूम कारागाह… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– नामालूम कारागाह…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # ११६ — नामालूम कारागाह — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर : मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

(150 शब्द – सीमा’ के आधार पर ‘गद्य भँवर’ का लेखन मेरा एक श्रमसाध्य प्रयोग है। अभी जो रचना मैं लिख रहा हूँ यह उसी की अगली कड़ी है। हो सकता है इसे उलझा सा मान कर सन्देहास्पद कहा जाना शुरु हो जाए। पर मैं तो यह मानने में तटस्थ रहूँगा लिखा तो मैंने अर्थ के लिए ही है।)

विद्वान सिल्वानो को सूर्योदय के वक्त अनुभूति हुई संसार का सब से बड़ा ज्ञान कहीं कारागाह में बंद है। अपनी इस अनुभूति ने तो उसे बहुत उद्वेलित किया। न हुआ तो भी हुआ सा हुआ, उसे लोगों को चिट्ठियाँ लिख कर पूछना पड़ा क्या किसी को उस कारागाह का पता मालूम है? उसी दिन सूर्यास्त के वक्त सिल्वानो की अनुभूति हुई उसके पास दुनिया भर से चिट्ठियाँ आई हैं जिनमें लिखा हुआ है संसार का सब से बड़ा ज्ञान कहीं कारागाह में बंद है। क्या तुम्हें वह कारागाह मालूम है?

 © श्री रामदेव धुरंधर

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – कसक ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – कसक ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

वह घर आया और रूठ कर दादी के पास पहुच गया। उसकी बाजू पकड कर बोला- दादी , फोन पर मेरी पापा से बात करवा दे।

– क्यों ?

– दादी , कहां रहता है , मेरा पापा ?

– वो तो काम के लिए दूर रहता है ।

– बुला उसे अभी ।

– क्यों ?

– मैं अभी जाॅय के साथ खेल रहा था । उसका पापा आया और हम दोनों को कार में घुमाने ले गया ।

– फिर क्या हुआ ?

– जब मेरे पापा के पास गाड़ी है, तो मैं जाॅय के पापा की गाडी में सैर क्यों करूं ?

– बेटे , तेरे पापा नहीं आ सकते ।

– कह दे फिर मैं उनसे बात नहीं करूंगा ।

-नहीं बेटे, ऐसे नहीं कहते ।

– बस फिर, करवा दे मेरी बात। वह अपनी जिद्द पूरी करके ही माना । उसके बाद सपनों में खो गया और पापा की गाड़ी में सैर करने निकल गया ।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क : 1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ औरत – भाग – २ – गुजराती लेखिका – सुश्री गिरिमा घारेखान ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆

श्री राजेन्द्र निगम

(ई-अभिव्यक्ति में श्री राजेंद्र निगम जी का स्वागत। आपने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में प्रबंधक के रूप में सेवाएँ देकर अगस्त 2002 में  स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। उसके बाद लेखन के अतिरिक्त गुजराती से हिंदी व अँग्रेजी से हिन्दी के अनुवाद कार्य में प्रवृत्त हैं। विभिन्न लेखकों व विषयों का आपके द्वारा अनूदित 14  पुस्तकें प्रकाशित हैं। गुजराती से हिंदी में आपके द्वारा कई कहानियाँ देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आपके लेखों का गुजराती व उड़िया में अनुवाद हुआ है। आज प्रस्तुत है आपके द्वारा सुश्री गिरिमा घारेखान जी की कथा का हिन्दी भावानुवाद “औरत”।)

☆  कथा-कहानी – औरत – भाग – १ – गुजराती लेखिका – सुश्री गिरिमा घारेखान ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆

गहरे रंग के दुपट्टे से बालों को ढंक कर अपने लोगों पर हुक्म चलानेवाली समीरा के गाल पर जब उसके सुनहरी बाल आ जाते, तब वह उन्हें एकटक देखता रहता | इस सुरमई आँखोंवाली मालकिन उसे उसके गाँव में बैठी एक प्रियजन की याद दिला देती | – अब इसकेआगे —- 

सुश्री गिरिमा घारेखान

एक गुरुवार राशिद नहीं आया | सुबह से राह देख रही समीरा दोपहर तक बैचैन हो गई | उसने राशिद का फोन मिलाया |

‘आपकी राह देख रही हूँ |’

‘अरे जानेमन, कुछ काम है यहाँ |’

राशिद के इस ‘जानेमन’ संबोधन में समीरा को आज जान नहीं लगी | परंतु बहुत अधिक पूछताछ किए बगैर उसने इतना ही पूछा,

‘अगले गुरुवार को तो आ रहे हो न ?’

‘इंशाअल्लाह’ कह कर राशिद ने फोन रख दिया |

उसके बाद प्रत्येक गुरुवार को सुबह समीरा खिड़की के पास खड़ी हो जाती और राशिद का इंतजार करती रहती और नजर हमेशा बाहर के खालीपन से टकरा कर वापिस लौट आती | एक दिन उसने माली को बाहर एक बड़े वृक्ष को उखाड़ते हुए देखा | उसने कारण पूछा तो जवाब मिला, ‘मालकिन, यहाँ तो ऐसे तैयार बड़े पेड़ लगाए जाते हैं | कुछ लग जाते हैं और कुछ नहीं लगते हैं | यह सूख गया है, इसलिए उखाड़ रहा हूँ |’

उसके बाद समीरा जब भी दर्पण में देखती, तब उसे एक सूखने वाला वृक्ष दिखाई देता | उसकी बेचैनी दिनोदिन बढ़ती जा रही थी | राशिद की रुकी हुई मुलाकातें, आवाज में बेरुखी और रख दिए जाते टेलीफोन उसे क्या संकेत दे रहे थे ? अब उसे मखमली कारपेट, फव्वारे का पानी और बगीचे के फूल आनंद नहीं देते थे | अब अन्धकार से खुश्बू और दिन से उजाला उड़ गया था |

महीने से भी अधिक समय हो गया था | समीरा को राशिद के व्यवहार में आए इस अचानक बदलाव का कारण समझ में नहीं आया था | राशिद को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी? उसे मात्र काम करने के लिए यहाँ लाया गया था ? ‘हिंदुस्तानी होशियार लड़की’ थी, इस लिए ? अकेलापन उसे खाए जा रहा था | पीली खजूर भी पक कर अब सुर्ख लाल हो गई थी | कुछ दिनों में यह काम भी बंद हो जाएगा | फिर तो बात करने के लिए सईद का साथ भी नहीं मिलेगा |

समीरा का मन बारबार उड़ कर उसके गाँव पहुँच जाता | वहाँ उस छोटे से घर में कितना सुकून था ! घर व बाहर पूरे दिन किसी चिड़िया की तरह चाँव-चाँव कर उड़ती रहनेवाली वह यहाँ क्या बन गई थी- एक मसाला भरी मोरनी जो कमरे की शोभा बढ़ाती थी ? वह सोचती कि उसकी अम्मी ने उसे इस सुख के कुँए में क्यों धकेल दिया ? अम्मी ने उसकी चमकती दीवारों को देखा. लेकिन उसे यह मालूम नहीं हुआ कि उन दीवारों पर भावनाओं की आर्द्रता बिल्कुल नहीं है | इन चिकनी दीवारोंवाले कुएँ में सिर ऊँचा रख कर बैठी समीरा प्रत्येक गुरुवार की सुबह राशिद के आने की राह देखती और दोपहर के बाद अगले गुरुवार की राह देखती |

अंत में उसके दुःख के बादलों को चीरता हुआ एक गुरुवार आया | राशिद जल्दी सवेरे ही आ गया | उसके चेहरे पर समुद्र की लहरों की तरह आनंद उछल रहा था | उसके ड्रायवर ने गाड़ी में से मिठाई के पैकेट निकाले और बगीचे में काम करनेवाले लोगों को बाँटना शुरू किया | सभी लोग मालिक को ‘मबरुक, मबरुक’ कह रहे थे | राशीद तो मानो दौड़ता हुआ समीरा के पास आया और उसे उठा लिया | समीरा के मन के रेगिस्तान में बरसात हुई | बहुत दिन के बाद मिले इस खाविंद से लिपटकर वह बोली, ‘इतनी ख़ुशी ! क्या धंधे में बहुत तरक्की हुई ?’ राशिद ने समीरा के मुँह को अपने दोनों हाथों के बीच लिया. ‘अरे, जिंदगी में तरक्की मिल गई | मैं अब्बा बन गया | बेटा हुआ है, बेटा |’

समीरा के कान से मानो बहता हुआ तेज़ाब उसके पूरे शरीर में फ़ैल गया | उसने राशिद को धक्का दे कर अपने से दूर किया | अब भी उसे अपने  कानो पर उसे विश्वास नहीं हो रहा था, ‘आ…प आप अब्बा ? अर्थात् क्या आपकी दूसरी पत्नी…?’

अब राशिद कुछ बेशर्मी के साथ हँसा, ‘अभी ऐसे सवाल से मेरा मूड खराब मत करो | बगैर बीबी के मैं मस्कत में रहूँगा कैसे ? मैं मर्द हूँ मर्द, अरब मर्द, समझीं ? मर्द को तो औरत चाहिए ही चाहिए, हर जगह|’

समीरा का कलेजा फट गया | बोलने को कुछ रहा नहीं | अरब देश में शादी कर रोबभरी साहबी के साथ बख्शीश की तरह मिलनेवाली इस कटु वास्तविकता को वह अच्छी तरह समझ गई थी | परंतु अब क्या हो सकता है ? धागा ही टाँके को तोड़ दे, तो फिर सिलाई कैसे हो?

राशिद ने दोपहर में खजूर का सब हिसाब-किताब देखा और शाम को ही लौट गया | खिड़की के पास खड़ी होकर समीरा इस उत्फुल्ल अरब मर्द को जाते हुए देखती रही | सूरज के ढलने से अब बाहर अँधेरा छा गया था | समीरा ने खिड़की से इस अन्धकार पर थूका, कमरे में आई और सात बल्बवाले झूमर की लाईट चालू की | कमरा जगमगाने लगा |

समीरा ने मोबाईल हाथ में लिया और सईद को फोन किया | कुछ ही देर में आसमान से निकलनेवाले आफताब की तरह सईद आ गया | उसे देखकर समीरा को लगा, मानो उसे कोई आत्मीय मिल गया हो और तब केरल की बरसात की तरह उसकी आँखे बहने लगी | उसने रोते-रोते कहा. ‘सईद, तुमने भी मुझे नहीं बताया, तुमने भी ?’

सईद सब स्थिति समझ गया और नजरे झुका कर बोला, ‘आप बहुत मासूम हैं | यह अरब देश है, यहाँ तो मर्द जहाँ भी रहे, वहाँ उसे एक बीबी तो चाहिए ही |’

समीरा चुपचाप सुनती रही | सईद की बातों से उसकी मासूमियत क्षीण होती रही – ‘अब मालिक की पहली ओमानी बीबी तो बच्चे में व्यस्त हो जाएगी | सुना है, अब मालिक पाकिस्तान जाएँगे | शादी कर आएँगे और उस लड़की को मस्कत में रखेंगे…|’

पत्थर बनी समीरा कण-कण में बिखर गई | उन कणों को एकत्रित करने में उसे कुछ वक्त लगा | फिर सईद की आँखों में अपनी सजल आँखें डालकर वह बोली, ‘तुम्हारे मालिक ने पैसों के जोर पर मेरी जिंदगी बर्बाद की है | सईद, क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकती हूँ ? मुझे यहाँ के कायदे-क़ानून समझाओगे ?’

 सईद को समीरा की आँखों में दिखीं चौवीस घंटे उसका पीछा करती केरल के उसके घर में बैठी बहन की दो आँखें | उसने स्वीकृति में सिर हिला दिया | उसे लगा कि खुदा ने उस पर मेहरबान होकर किसी का कर्ज चुकाने का मौका दिया है |

लगभग डेढ़ महीने के बाद राशिद आया | नए कपड़े और अलंकारों से सजी किसी दुल्हन की तरह समीरा उससे लिपट गई- कोई शिकायत नहीं और कोई गुस्सा नहीं | राशिद मन ही मन हँसा, ‘औरत को कपड़े-गहने मिल जाए, उसे फिर कोई फर्क नहीं पड़ता है |’

शब्दों में अपने समग्र स्त्रीत्व को पिघालकर समीरा ने राशिद से कहा: ‘दिलबर, आप बहुत लंबे समय से नहीं आते हैं, इसलिए बहुत परेशानी रहती है |”

‘क्या बेगम ? आप बोलिए, आपकी सभी समस्याएँ दूर कर देंगे |’

 राशिद को लगा कि वह किसी नए गहने की माँग करेगी |

‘आपके न आने से हमारे घर व खजूर के धंधे के लोगों की तनख्वाह समय पर नहीं होती है अतः वे काम ठीक से नहीं करते हैं | देखिए, खजूर उतारने के पहले ही कितनी पक गई ?’

‘बात तो सही है |’

‘अगर आप मंजूरी दें तो मुझे इस कामकाज को कुछ बढ़ाना है | पकी हुई खजूर में से गुठली निकालकर उसमें बादाम भर कर हम उसे परदेश भेज सकते हैं |’

राशिद को इस हिंदुस्तानी लड़की के दिमाग पर गर्व हुआ |

‘मेरे सरताज, आप मुझे यहाँ की पावर ऑफ अटार्नी दे दें, फिर आप कितने भी लंबे वक्त तक यदि न भी आएँ, तो कुछ दिक्कत नहीं |’ राशिद के होंठों पर अपनी उंगलियाँ घुमाते हुए समीरा बोली, ‘इस जानु के बगैर मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है. लेकिन उसकी औरत हूँ| मुझे मेरे खाविंद की खुशी भी देखना है न ?’

हाथों में पहनी चूड़ियों को खनकाते-खनकाते समीरा ने एक बादाम भरी खजूर राशिद के मुँह में रखी और उस नर्म खजूर के साथ उसकी बात भी राशिद के गले उतर गई | इतनी अवधि तक इस औरत ने इस कारोबार को बहुत सुंदर ढंग से संभाला था, इसलिये उसकी कुशलता या नियत पर भरोसा न करें, उसका कोई कारण ही नहीं था | यदि वह इसको पावर ऑफ अटार्नी दे दे, तो वह पाकिस्तान कि जिस खिली हुई कली को लानेवाला है, उसके साथ वह मस्कत में आराम से रह सकता है |

हमेशा की तरह राशिद शनिवार को चला गया और मंगलवार शाम को उसका ड्रायवर आया और सरियात की अदालत के दस्तावेज दे गया | अब राशिद की सोहार की सभी संपत्ति की पावर ऑफ अटार्नी समीरा के पास थी | दस्तावेज को हाथ में ले कर मुस्कराती हुई समीरा मन में बोली : ‘इस मर्द को पहली बार कोई औरत मिली है |’

सूर्यास्त हुआ और आकाश में चन्द्रमा उभरा | समीरा ने मोबाईल हाथ में लिया और सईद को फोन किया, ‘काम हो गया है | सेवइयाँ बना रही हूँ, आनंद से यह ख़ुशी मनाएँगे न ?’

दूर किसी मस्जिद में मगरीब की नमाज की अजान हुई | समीरा ने दुपट्टा सिर पर ओढ़ा और खुदा का शुक्रिया कहने के लिए उसने नमाज पढ़ना शुरू किया |

♦ ♦ ♦ ♦

मूल गुजराती कहानीकार – सुश्री गिरिमा घारेखान

संपर्क – 10, ईशान बंगलोज, सुरधारा- सत्ताधार मार्ग, थलतेज, अहमदाबाद- 380054 मो. 8980205909.

हिंदी भावानुवाद  – श्री राजेन्द्र निगम,

संपर्क – 10-11 श्री नारायण पैलेस, शेल पेट्रोल पंप के पास, झायडस हास्पिटल रोड, थलतेज, अहमदाबाद -380059 मो. 9374978556

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ औरत – भाग – १ – गुजराती लेखिका – सुश्री गिरिमा घारेखान ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆

श्री राजेन्द्र निगम

(ई-अभिव्यक्ति में श्री राजेंद्र निगम जी का स्वागत। आपने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में प्रबंधक के रूप में सेवाएँ देकर अगस्त 2002 में  स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। उसके बाद लेखन के अतिरिक्त गुजराती से हिंदी व अँग्रेजी से हिन्दी के अनुवाद कार्य में प्रवृत्त हैं। विभिन्न लेखकों व विषयों का आपके द्वारा अनूदित 14  पुस्तकें प्रकाशित हैं। गुजराती से हिंदी में आपके द्वारा कई कहानियाँ देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आपके लेखों का गुजराती व उड़िया में अनुवाद हुआ है। आज प्रस्तुत है आपके द्वारा गिरिमा घारेखान जी की कथा का हिन्दी भावानुवाद “औरत”।)

☆  कथा-कहानी – औरत – भाग – १ – गुजराती लेखिका – सुश्री गिरिमा घारेखान ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆

कुछ घरघराहट. मंद हो रही रोशनी… और विमान उड़ने लगा | समीरा धीमे-धीमे छोटे  होते जा रहे घरों को वह खिड़की से देखती रही | इनमें मेरा भी घर दिखाई देता होगा ? एक दूसरे से सटे अनगिनत घरों में उसका भी था एक घर | कहाँ से दिखाई देगा ? उसे याद आ गया… उसका बचपन… जब उड़ते विमान की हल्की-सी आवाज सुनते ही मोहल्ले के सभी बालक दौड़ कर बाहर आ जाते और वे तब तक देखते रहते, जब तक कि कि वह विमान छोटा होते-होते अदृश्य नहीं हो जाता | आज ठीक उल्टा है | वह विमान में बैठी है और घरों को छोटे होते हुए देख रही है |

सुश्री गिरिमा घारेखान

कुछ देर में विमान बादलों में आ गया और समीरा पानी में पड़ने वाले प्रतिबिंब की तरह कुछ दिन पहले के उस नज़ारे को तादृश्य होते हुए देखती रही |

‘नहीं मम्मी, मुझे शादी कर इतनी दूर नहीं जाना है |’

‘अरे पगली, मस्कत कहाँ इतनी दूर है ? विमान से तो सिर्फ दो-तीन घंटे में वहाँ पहुँच जाते हैं | इससे अधिक वक्त तो ट्रेन से कोचीन पहुँचने में लगता है |’

परवीन ने बेटी को समजाते हुए कहा l

समीरा को तो परदेश के नाम से ही पेट में चकरी जैसी घूमने लगती थी |

‘लेकिन अम्मी, बिल्कुल अनजान देश और अनजान लोग | मैं वहाँ कैसे रहूँगी ?’

परवीन ने समीरा को अपनी खाला की लड़की की बात बताकर समजाने की कोशिश की l   | वह कई वर्षों से दुबई में थी | महल जैसे घर में रहती थी | अधिक आना तो उसका संभव नहीं होता था. परंतु ईद-त्यौहार पर सबके लिए ढेरों कपड़े, इत्र, खजूर, सूखा मेवा और चाकलेट भेजती रहती थी | लेकिन फिर भी समीरा का मन नहीं मान रहा था | बरसात के दिनों में उसके घर की छत से गिरते पानी की तरह अम्मी की आँखों से भी पानी का बहना शुरू हो गया था |

समीरा उसके घर की हालत जानती थी | उसे मालूम था कि उसके अब्बा पूरे दिन साँस फुलाते हैं, तब कहीं घर के छह व्यक्तियों के शरीर को उनकी ऑक्सीजन मिलती थी | पगार के बाद के दस दिन ईद की तरह लगते थे और फिर धीरे- धीरे रोजों की शुरुआत हो जाती थी | दूर के एक रिश्तेदार की मार्फ़त, बीस वर्ष की समीरा के लिए, मस्कत में रह रहे एक अरब के लिए माँग आई | इस रिश्तेदार ने पहले भी कई लड़कियों की शादी खाड़ी के देशों में कराई थी, इसलिए अविश्वास की तो कोई बात नहीं थी | अतः यदि बगैर दहेज़ दिए लड़की को उसका ठिकाना मिल रहा हो, तो समीरा की अम्मी को अविश्वास करने का विचार भी नहीं आ रहा था |

इसलिए उस दिन जब तक समीरा मान नहीं गई, तब तक परवीन उसे समझाती रही | माँ-बेटी की आँसुओं की धार एक जैसी ही थी, सिर्फ कारण अलग थे | समीरा सोच रही थी कि एक बिल्कुल अनजाने देश में, एक अजनबी के साथ उसकी जिंदगी कैसे गुजरेगी ? फिर अरब देशों के लिए तो उसने कैसी-कैसी बातें सुनी थीं- वहाँ बुर्के में रहो, घर के बाहर बहुत अधिक नहीं निकलो और ऐसी ही बहुत-सी बातें | यहाँ चाहे पैसों की कमी हो, लेकिन वह आजादी से घूम सकती थी ! सरकार द्वारा लड़कियों को दी जानेवाली सहुलियत के कारण उसने बारहवीं तक पढ़ाई की थी | लड़कों के साथ एक ही कक्षा में बैठ कर व मॉनिटर बन कर रोब जमाया था| स्कूल में हेड-गर्ल बन कर भाषण दिए थे और सहेलियों की एक्टिवा पर बैठ कर बाजारों में घूमी थी | उसके अब्बा-अम्मी ने यह सब करने के लिए कभी इंकार नहीं किया था |  मस्कत में बुर्के के अलावा और कितनी बंधन होते होंगे ? क्या वह साँस ले सकेगी ?

फिर भी समीरा अम्मी के मजबूरी के शब्दों और लाचारी के आँसुओं के सामने झुक   गई | उसने जब अम्मी की ओर देखतें हुए स्वीकार में सिर हिलाया, तब अम्मी इतनी खुश हो गई, मानो झुकी हुई गर्दन में उसे ईद का चाँद दिखाई दिया हो |  समीरा का कपाल चूमते हुए उसने कहा था, ‘मेरी सयानी बेटी, चल, अपनी चाँद जैसी सूरत को सँवार ले | करीम चाचा उस अरब को ले कर आनेवाले हैं | राशिद – राशिद नाम है उनका |’

और आज वह राशिद की बीबी बन कर उसके साथ मस्कत जा रही थी | पहली मुलाकात में तो समीरा की पलकों पर पहाड़ छा गया था, लेकिन दूसरी मुलाक़ात में उसे लगा कि राशिद में आपत्तिजनक कुछ भी नहीं था | ऊँचा, गेहूँवर्ण और चुस्त शरीर | दूसरी मुलाक़ात में उसने समीरा को कहा था, ‘उस दिन तो आपकी पलकें उठ ही नहीं रही थीं और मेरी आँखें थीं कि आपकी सूरत से हट ही नहीं रही थीं | मैं तो हिंदुस्तान आया था, लड़की से निकाह करने और मुझे तो नूरजहाँ मिल गईं | मेरी तो बिना रोजे के ही इफ्तारी हो गई | हमदुल्ला |’

तब समीरा के हृदय में एक कोपल फूट गई थी | निकाह के बाद राशिद, किसी नवाब का हो वैसा साटिन का,  दूध जैसा सफ़ेद, जिसे वे ‘कंदोरा’ कहते थे, उस कुर्ते पर दिल को महकानेवाला परफ्यूम जब छांटता, तब समीरा उसकी उम्र के अंतर को भूल जाती | उसकी कमर के ऊपर लटकनेवाले चाँदी के खंजर और उसके साथ बंधे चाँदी के पट्टे ने तो मानो समीरा के मन को पूर्ण रूप से बाँध लिया था | हिंदुस्तान के सँस्कारों वाला और अब तक कुँवारा रहा समीरा का मन कब उस परदेशी के साथ ओतप्रोत हो गया, उसे महसूस ही न हुआ | वह अजनबी शख्स “शौहर” का इल्काब प्राप्त करने के साथ ही उसका सर्वस्व बन गया था |

एयर होस्टेस ठंडा पेय लेकर आई और राशिद ने समीरा को बादलों में से बाहर खींचा|

‘कैसा लगता है, यूँ बादलों में पहली बार उड़ना ?’

‘आपके साथ बैठ कर लगता है, मानो विमान सातवें आसमान में उड़ रहा है |’ समीरा ने राशिद की ओर कुछ नजदीक खिसकते हुए कहा |

निकाह के बाद तुरंत उसे साथ ले जाने की कार्यवाही में व्यस्त हुए राशिद से समीरा का बहुत कुछ पूछना बाक़ी रह गया था | उसने वह पूछना अब शुरू किया |

‘मस्कत कैसा शहर है? आपका घर कैसा है ? घर में कौन- कौन हैं ?’

राशिद ने हँसते हुए कहा, ‘मस्कत तो बहुत ही सुंदर शहर है | लेकिन हमें तो सोहार में रहना है |’

‘सोहार !’`

‘हाँ, वह मस्कत से कुछ छोटा शहर है और वहाँ मेरा घर है, फार्म हाउस- गार्डनवाला घर है | फार्म में घर में, बहुत नौकर- नौकरानी हैं | वहाँ तुम्हें बिल्कुल अकेला नहीं लगेगा |’

‘फ़ार्म !’ समीरा को लगा कि खुदा ने सच में उस पर मेहरबानी की है |

‘’बहुत बड़ा फ़ार्म है; खजूर के पेड़ हैं | उन्हें अब तुम्हें ही तो सँभालना है | हिंदुस्तान की लड़कियाँ बहुत होशियार होती हैं |’ समीरा के गाल पर हल्की-सी चपत लगाते हुए राशिद ने कहा|

समीरा आश्चर्य से सब कुछ सुनती रही | उसके चौकन्ने दिमाग में तुरंत एक प्रश्न उठा, ‘राशिद ऐसा क्यों कह रहा था कि तुम्हें अकेला नहीं लगेगा ? अकेले उसे क्या संभालना था और क्यों ?’ उसके दिमाग में यह सब एक साथ समा नहीं रहा था |  बहुत कम समाया में उसकी जिंदगी विमान की तरह उड़ती-उड़ती उसकी विचार-शक्ति से भी आगे बढ़ गई थी | इस समय तो मानो एक विकसित पौधे को उसकी जड़ों के साथ उखाड़कर किसी अन्य जगह पर रोपने के लिए ले जाया जा रहा था |

फिल्मों में देखे किसी हवाई-अड्डे से अधिक भव्य मस्कत हवाई-अड्डे को देख कर न केवल समीरा की आँखें, बल्कि मस्तिष्क भी चौंधिया गया | एयरपोर्ट के बाहर राशिद का ड्रायवर एक बड़ी गाड़ी के साथ खड़ा था | कोमल, चमकीले गाड़ी के पहिए किसी अफ्रीकन सुंदरी के गाल जैसे रास्ते को चूमकर आगे दौड़ रहे थे | लगभग एक सौ पच्चीस किलोमीटर के रास्ते पर समीरा मार्ग के दोनों ओर लटक रही खजूरी और किसी रंगोली की तरह बिखरे फूलों को अपनी नजर से निहारती रही | सोहांर में उसने जब अपने विशाल बँगले में प्रवेश किया, तब उसे लगा कि उससे पहले जन्नत यहाँ रहने के लिए आ चुकी है |

राशिद के प्रेम में डूबी समीरा अपने कुटुंब, देश, समय व दिनों की गणना भूल गई | वह बँगला उनके हनीमून की रोमांचक घड़ी को देखता हुआ रंगबिरंगा प्रकाश फैलाता रहा | बाहर खड़े खजूर के वृक्ष उनकी पीली खजूर में अधिक मिठास भरते रहे | एक दिन सवेरे राशिद की परफ्यूम की तीव्र गंध से समीरा की नींद खुल गई |

‘इतनी सुबह किस ओर ?’

‘मस्कत जा रहा हूँ | अब काम तो करना पड़ेगा न ?’

‘मतलब ?’ आघात से समीरा के मुँह से शब्द फूटे | वह चौड़ी आँखों से राशिद को ताकती रही | उसकी नींद अब पूरी तरह काफूर हो चुकी थी |

अपने कंदोरे पर चाँदी के पट्टे को पहनते-पहनते राशिद बोला. ‘जानेमन, मेरा मुख्य बिजनेस तो मस्कत में है | सप्ताह में पाँच दिन वहाँ रहूँगा | जुम्मे से पहले अपनी मलिका के पास उसका शहनशाह हाजिर |’

‘लेकिन…’

‘अरे पाँच दिन तो ऐसे ही बीत जाएँगे |’ हाथ से चुटकी बजाते हुए राशिद बोला. ‘तुम यह महल ठीक से देखोगी और तब तक बंदा वापिस |

आलिंगनबद्ध समीरा को नजाकत से दूर कर, वह उस आघात से बाहर आए, उसके पहले राशिद चला गया | यह बात राशिद ने उसे पहले क्यों नहीं बताई, इस प्रश्न का जवाब जानने की उसने बहुत कोशिश की, लेकिन नहीं जान सकी | परंतु जैसे जंगल में निकल पड़ी किसी बालिका का समय पहले डालियों पर झूलने में, नीचे गिरे फलों को उठाने में, पक्षियों के पीछे दौड़ने में और फूलों के साथ बात करने में बीतता है, वैसा ही कुछ समीरा के साथ हुआ | वह घर में बिछे मखमली गलीचों पर तितली की तरह बैठती, बाथरूम में सुगंधित पानी से भरे टब में झाग के साथ एकरस हो जाती,  बगीचे में नाच रहे फव्वारे के जल के छिड़काव से वह इन्द्रधनुष हो जाती… कई बार नक्काशीदार बड़े दर्पण के सामने बैठ कर आभूषणों को बदलती और सोचती रहती कि राशिद जब आएगा, तब वह क्या पहनेगी | वह किसी चातक की तरह गुरुवार की प्रतीक्षा करती | राशिद गुरुवार की सुबह हाजिर हो जाता और समीरा अपने इस फ़रिश्ते के साथ जन्नत के अंदर की जन्नत का आनंद लेती रहती |

राशिद धीरे-धीरे खजूर के कारोबार के बारे में समीरा को बताता गया और चतुर समीरा कुछ ही समय में सब काम सीख गई | पीली हो गई खजूर को पेड़ों से नीचे लाना, वजन कराने के बाद पैक कराना, लेबल लगाना और बड़े-बड़े खोखों में मस्कत भेजना | यह सब काम वह अपने लोगों से बहुत अच्छे ढंग से कराती | वहाँ इन सब का मैनेजर केरल से आया सईद था, जो अब उसका सीधा हाथ जैसा हो गया था | अपने ही मुल्क की इस मालकिन का उस पर जो विश्वास था, उससे सईद मगरूर था | गहरे रंग के दुपट्टे से बालों को ढंक कर अपने लोगों पर हुक्म चलानेवाली समीरा के गाल पर जब उसके सुनहरी बाल आ जाते, तब वह उन्हें एकटक देखता रहता | इस सुरमई आँखोंवाली मालकिन उसे उसके गाँव में बैठी एक प्रियजन की याद दिला देती |

♦ ♦ ♦ ♦

मूल गुजराती कहानीकार – गिरिमा घारेखान

संपर्क – 10, ईशान बंगलोज, सुरधारा- सत्ताधार मार्ग, थलतेज, अहमदाबाद- 380054 मो. 8980205909.

हिंदी भावानुवाद  – श्री राजेन्द्र निगम,

संपर्क – 10-11 श्री नारायण पैलेस, शेल पेट्रोल पंप के पास, झायडस हास्पिटल रोड, थलतेज, अहमदाबाद -380059 मो. 9374978556

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६३ ☆ बोधकथा – लकीर ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय बोधकथा ‘लकीर। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६३ ☆

☆ बोधकथा – लकीर ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

स्वाभिमान और अहंकार की गाड़ी ट्रैफिक में अटक गई। अहंकार ड्राइविंग सीट पर बैठा था। एफ.एम. पर गाने चल रहे थे – ‘दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई- –‘ गाने को सुनकर बातों ने नया मोड़ ले लिया। स्वाभिमान बोला– “तरह-तरह के लोग होते हैं दुनिया में। तू अपने को ही देख, कितना बढ़-चढ़कर बोलता है।” 

अहंकार बोला – “अरे! दुनिया गाल बजानेवालों की है, मुँह सिले बैठे रहो, कौन पूछेगा तुम्हें?” 

“मैं तेरी तरह डींगे नहीं हाँकता। तेरी बातों से दूसरों का दिल दुखता है। मैं जो करता हूँ, अपने मान- सम्मान की रक्षा के लिए” — स्वाभिमान जरा तनकर बोला।

“मैं भी यही करता हूँ। किसी का दिल दुखे, बुरा लगे तो इसमें मेरा क्या दोष? मैं कुएँ के मेंढ़क की तरह नहीं रह सकता।” 

पास खड़ा स्कूटर सवार अभिमान इनकी बातचीत सुन बोला-  “ड्राइविंग सीट पर बैठा अहंकार तो सबको दिखता है पर पिछली सीट पर बैठा स्वाभिमान कब अहंकार में बदल जाता है, इसका भान उसे भी नहीं होता—-!!” 

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – श्री गणेश ☆ श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ ☆

श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत। शिक्षा – स्नातकोत्तर (समाज शास्त्र ए हिंदी साहित्य), सम्मान – अनेक साहित्यिक सम्मान से अलंकृत। प्रकाशन – साझा संकलन एवं पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित,आकाशवाणी में काव्यपाठ। सम्प्रति – गृहणी, श्रोता एवं रचनाकार।  अभिरुचि साहित्य, संगीत, प्रकृति, देशाटन। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – श्री गणेश।)

☆ लघुकथा ☆ श्री गणेश ✍ श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ 

शाम ढलते ही गणेश पंडाल गेंदे के फूलों और झिलमिलाती लाइटों से सज गया था। ढोल-मंजीरों की गूँज के साथ संध्या आरती हुई। सभी ने श्रद्धा से आरती की और प्रसाद लेकर अपने घरों की ओर मुड़े ही थे कि बाहर गाड़ियों का शोर गूँजा।

“अरे हटो, नेता जी आ रहे हैं!”

कार्यकर्ताओं के लावलश्कर के साथ स्थानीय नेता जी समर्थकों समेत पंडाल में दाखिल हुए। मुख्य कार्यकर्ताओं ने उन्हें तुरंत गणेश प्रतिमा के सामने ला खड़ा किया।

एक कार्यकर्ता ने पुजारी के हाथ से थाली लेकर नेता जी को थमा दी और जोर से बोला, “मुख्य अतिथि आ गए हैं, आरती दोबारा होगी!”

पुजारी ने असमंजस में भगवान की मूर्ति और फिर नेता जी की ओर देखा। इसके बाद भारी मन से घंटी उठाई और बोले, “ॐ जय गणेश देवा…”

नेता जी ने कैमरों की तरफ देखकर आरती शुरू की। जो लोग घर जा चुके थे, वे भी रुककर इस तमाशे को देखने लगे। बप्पा के दरबार में भक्ति पीछे छूट गई थी और प्रोटोकॉल का बोलबाला हो चुका था।

© श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ ‘✍️

निवास – जबलपुर मध्यप्रदेश मो – 9329931303

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – घुँघरू की तरह बजती ही रही हूँ मैं… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ घुँघरू की तरह बजती ही रही हूँ मैं… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा

कार में धीमी आवाज़ में गीत बज रहा था – “घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं…”

“मम्मी, आप रो रही हो?” बेटी ने पूछा।

उसने जल्दी से शीशे की तरफ़ देखा – “नहीं बेटा, आँख में कुछ चला गया।”

“आप हमेशा यही कहती हो।”

वह चुप हो गई।

गीत की पंक्तियाँ जैसे वर्षों पुराना हिसाब खोल रही थीं।

कभी पति की पसंद, कभी परिवार की उम्मीदें, कभी बच्चों की जरूरतें – वह सबकी ताल पर चलती रही।

कभी टूट गई, कभी तोड़ी गई। कभी बिखरी, फिर रात के अँधेरे में खुद ही अपने टुकड़े समेटती रही।

किसी ने कभी यह नहीं पूछा कि उन टुकड़ों को जोड़ते-जोड़ते उसके हाथ कितनी बार लहूलुहान हुए थे। शायद इसलिए कि खून दिखाई नहीं देता था।

बेटी ने धीरे से पूछा – “मम्मी, आपको क्या पसंद है?”

वह जवाब नहीं दे पाई।

इतने वर्षों में शायद वह अपनी पसंद ही भूल चुकी थी।

गीत खत्म हो गया।

लेकिन कार में खामोशी बनी रही।

बेटी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उसने शीशे में खुद को देखा, फिर बेटी को।

होंठ कुछ कहने के लिए खुले… मगर आवाज़ नहीं निकली।

रेडियो पर अगला गाना शुरू हो चुका था।

और वह फिर चुपचाप सुनने लगी।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२५ – आईना… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आईना।)

☆ लघुकथा # १२५ – आईना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“नेहा! तुम हमेशा मेरे दुश्मनों से ही क्यों बात करती हो? मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं। आज ही मेरा मकान खाली कर दो।”

मकान मालकिन शांता देवी का स्वर गुस्से से काँप रहा था।

नेहा बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई। पीछे से शांता देवी की बड़बड़ाहट सुनाई देती रही—”किराए के घर में रहती है और तेवर महारानी जैसे!”

शाम को संदीप घर पहुँचा तो शांता देवी ने फिर वही बात दोहरा दी। कमरे में आकर उसने पूछा, “आख़िर बात क्या हुई?”

नेहा ने शांत स्वर में कहा, “कोने वाले घर में हमारे गाँव की पूजा रहती है। वह मुझसे दो बातें कर लेती है। आंटी उसे अपना दुश्मन मानती हैं। उनकी दुश्मनी में मेरा क्या दोष?”

संदीप ने कहा, “ठीक है, दोस्त का मकान खाली है। वहीं चलेंगे।”

दोनों सामान समेटने लगे। अलमारी बंद करते हुए नेहा की नज़र अपने पुराने पारिवारिक फोटो पर पड़ी। उसने उसे देर तक देखा, फिर धीमे से बोली, “एक बार सास-ससुर से दूर होकर सोचा था कि शांति मिल जाएगी। अब यहाँ भी वही कड़वाहट… क्या हर बार घर ही बदलना समाधान है?”

संदीप उसकी ओर देखने लगा।

कुछ क्षण बाद नेहा ने दृढ़ स्वर में कहा, “नहीं… गाड़ी विश्वकर्मा नगर नहीं जाएगी।”

“तो कहाँ?” संदीप ने पूछा।

नेहा की आँखें नम थीं।

“रामपुर… माँ-पिताजी के पास। अब किराए के मकान नहीं, अपने व्यवहार को बदलने की कोशिश करूँगी। शायद रिश्ते घर बदलने से नहीं, रवैया बदलने से सँवरते हैं। आज मैंने स्वयं को आईने में देख लिया है।”

गाड़ी रामपुर की ओर मुड़ चुकी थी और नेहा के जीवन की दिशा भी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७३ – स्वतंत्रता ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “स्वतंत्रता”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७३ ☆

🌻लघु कथा🌻 स्वतंत्रता 🌻

आज 15 अगस्त तिरंगे झंडे की टोकरी लिए बैठी सड़क पर स्वतंत्रता दिवस की भोर देख रही थी। अभी कुछ झंडे और छोटे – छोटे बैच बिकने को बाकी रह गया था। सोच रही थी अब तो लगभग सभी भीड़ खत्म होने चली है।

मेरी टोकरी में  यह बच गया नही बिक पाया। तभी एक नौजवान दौड़ता भागता आया, पूरा सामान उठा कई गुना ज्यादा राशि देकर चलता बना।

वह खुश होकर टोकरी उठा, मुखड़े पर मुस्कान और सरपट चल दी घर की ओर।

दरवाजे पर पहुची ही थी कि झपट्टा मार टोकरी को फेंकते उसका पतिदेव पैसे झींनते हुए

—मना आई स्वतंत्रता दिवस

अब देख गुलामी क्या है। इससे तू आजाद नही हो सकती।

धम्म से धरा पर बैठते सिसक पड़ी – – क्या स्वतंत्र होना इतना निर्मोही होता है। अश्रुं धारा बह चली तुझे तो उम्र भर की गुलामी मिली है जो सदैव जीवन्त रहेगी।

शायद शहीद होने के बाद ही स्वतंत्र हो सकूंगी. 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ रुग्ण मानसिकता…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा  – रुग्ण मानसिकता…!

☆ लघुकथा ☆ रुग्ण मानसिकता…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

(आज के समय में दम तोड़ती हुई संवेदना से उपजी लघुकथा…!)

 

रमिया जिन साहब के घर झाड़ू-पोंछे और बर्तन साफ़ करने का काम करती है। उनकी उम्र यही कोई अस्सी और मेम साहब की लगभग पचहत्तर की होगी। पति-पत्नी दोनों पढ़े-लिखे और सेवानिवृत्त हैं। बेटा और बेटी लक्ष्मी जी की कृपा से साधन-सम्पन्न हैं।

पिछले दिनों रमिया के साहब की आधी रात के लगभग अचानक साँस हलक में अटकने से पलक झपकते निधन हो गया। मेम साहब ने रमिया को मोबाइल लगाकर दुखद समाचार दिया कि साहब नहीं रहे हैं। वह भागी-भागी साहब के घर पहुँची और रात भर मेम साहब के आँसू पोंछती रही।

मेम साहब आँसू बहाते हुए बोली- ‘हाय राम! देख, तो री! रमिया… मेरे दाँए पड़ोसी को कैंसर और बाँए पड़ोसी को हार्ट की बीमारी है, बावजूद उनको कुछ नहीं हुआ और मेरे अच्छा-ख़ासा, खाता-पीता, चलता-फिरता आदमी मेरी आँखों के सामने चल बसा।

यह सुनकर कम पढ़ी-लिखी, पर समझदार रमिया ने अपना सर दीवार से ठोक लिया और सोचने लगी… क्या कथित शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले लोग ऐसी रुग्ण मानसिकता के होते हैं जो अपनों की मौत पर बीमार पड़ोसियों के मरने की कामना करते हैं…!

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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