(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
☆ संजय दृष्टि ☆ हिंदी का लेखक ☆
हिंदी का लेखक संकट में है। मेज पर सरकारी विभाग का एक पत्र रखा है। हिंदी दिवस पर प्रकाशित की जानेवाली स्मारिका के लिए उसका लेख मांगा है। पत्र में यह भी लिखा है कि आपको यह बताते हुए हर्ष होता है कि इसके लिए आपको रु. पाँच सौ मानदेय दिया जायेगा..। इसी पत्र के बगल में बिजली का बिल भी रखा है। छह सौ सत्तर रुपये की रकम का भुगतान अभी बाकी है।
हिंदी का लेखक गहरे संकट में है। उसके घर आनेवाली पानी की पाइपलाइन चोक हो गई है। प्लम्बर ने पंद्रह सौ रुपये मांगे हैं।…यह तो बहुत ज़्यादा है भैया..।…ज़्यादा कैसे.., नौ सौ मेरे और छह सौ मेरे दिहाड़ी मज़दूर के।….इसमें दिहाड़ी मज़दूर क्या करेगा भला..?….सीढ़ी पकड़कर खड़ा रहेगा। सामान पकड़ायेगा। पाइप काटने के बाद दोबारा जब जोड़ूँगा तो कनेक्टर के अंदर सोलुशन भी लगायेगा। बहुत काम होते हैं बाऊजी। दो-तीन घंटा मेहनत करेगा, तब कहीं छह सौ बना पायेगा बेचारा।…आप सोचकर बता दीजियेगा। अभी हाथ में दूसरा काम है..।
हिंदी के लेखक का संकट और गहरा गया है। दो-तीन घंटा काम करने के लिए मिलेगा छह सौ रुपया।… दो-तीन दिन लगेंगे उसे लेख तैयार करने में.., मिलेगा पाँच सौ रुपया।…सरकारी मुहर लगा पत्र उसका मुँह चिढ़ा रहा है। अंततः हिम्मत जुटाकर उसने प्लम्बर को फोन कर ही दिया।…काम तो करवाना है। ..ऐसा करना तुम अकेले ही आ जाना।..नहीं, नहीं फिकर मत करो। दिहाड़ी मज़दूर है हमारे पास। छह सौ कमा लेगा तो उस गरीब का भी घर चल जायेगा।…तुम टाइम पर आ जाना भैया..।
फोन रखते समय हिंदी के लेखक ने जाने क्यों एक गहरी साँस भरी!
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
☆ संजय दृष्टि ☆ तिलिस्म ☆
….तुम्हारे शब्द एक अलग दुनिया में ले जाते हैं। ये दुनिया खींचती है, आकर्षित करती है, मोहित करती है। लगता है जैसे तुम्हारे शब्दों में ही उतर जाऊँ। तुम्हारे शब्दों से मेरे इर्द-गिर्द सितारे रोशन हो उठते हैं। बरसों से जिन सवालों में जीवन उलझा था, वे सुलझने लगे हैं। जीने का मज़ा आ रहा है। मन का मोर नाचने लगा है। लगता है जैसे आसमान मुट्ठी में आ गया है। आनंद से सराबोर हो गया है जीवन।
…सुनो, तुम आओ न एक बार। जिसके शब्दों में तिलिस्म है, उससे जी भरके बतियाना है।जिसके पास हमारी दुनिया के सवालों के जवाब हैं, उसके साथ उसकी दुनिया की सैर करनी है।…..कब आओगे?
लेखक जानता था कि पाठक की पुतलियाँ बुन लेती हैं तिलिस्म और दृष्टिपटल उसे निरंतर निहारता रहता है। तिलिस्म का अपना अबूझ आकर्षण है लेकिन तब तक ही जब तक वह तिलिस्म है। तिलिस्म में प्रवेश करते ही मायावी दुनिया चटकने लगती है।
लेखक यह भी जानता था कि पाठक की आँख में घर कर चुके तिलिस्म की राह उसके शब्दों से होकर गई है। उसे पता था अर्थ ‘डूबते को तिनके का सहारा’ का। उसे भान था सूखे कंठ में पड़ी एक बूँद की अमृतधारा से उपजी तृप्ति का। लेखक परिचित था अनुभूति के गहन आनंद से। वह समझता था महत्व उन सबके जीवन में आनंद की अनुभूति का। लेखक समझता था महत्व तिलिस्म का।
लेखक ने तिलिस्म को तिलिस्म बने रहने दिया और वह कभी नहीं गया, उन सबके पास।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )। इनके अतिरिक्त हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6, लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
आज प्रस्तुत है सर्वप्रथम सुश्री वसुधा गाडगिल जी की मूल हिंदी लघुकथा ‘स्नेहरस ’ एवं तत्पश्चात श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी द्वारा मराठी भावानुवाद ‘स्नेहरस’।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – जीवन रंग #5 ☆
सुश्री वसुधा गाडगिल
(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री वसुधा गाडगिल जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है । पूर्व प्राध्यापक (हिन्दी साहित्य), महर्षि वेद विज्ञान कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, जबलपुर, मध्य प्रदेश. कविता, कहानी, लघुकथा, आलेख, यात्रा – वृत्तांत, संस्मरण, जीवनी, हिन्दी- मराठी भाषानुवाद । सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक, भाषा तथा पर्यावरण पर रचना कर्म। विदेशों में हिन्दी भाषा के प्रचार – प्रसार के लिये एकल स्तर पर प्रयत्नशील। अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलनों में सहभागिता, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ,आकाशवाणी , दैनिक समाचार पत्रों में रचनाएं प्रकाशित। हिन्दी एकल लघुकथा संग्रह ” साझामन ” प्रकाशित। पंचतत्वों में जलतत्व पर “धारा”, साझा संग्रह प्रकाशित। प्रमुख साझा संकलन “कृति-आकृति” तथा “शिखर पर बैठकर” में लघुकथाएं प्रकाशित , “भाषा सखी”.उपक्रम में हिन्दी से मराठी अनुवाद में सहभागिता। मनुमुक्त मानव मेमोरियल ट्रस्ट, नारनौल (हरियाणा ) द्वारा “डॉ. मनुमुक्त मानव लघुकथा गौरव सम्मान”, लघुकथा शोध केन्द्र , भोपाल द्वारा दिल्ली अधिवेशन में “लघुकथा श्री” सम्मान । वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। )
☆ स्नेहरस☆
कॉलोनी की दूसरी गली में बड़े से प्लॉट पर बहुमंज़िला इमारत बन रही थी। प्लॉट के एक ओर ईंटों की चारदीवारी बनाकर चौकीदार ने पत्नी के साथ छोटी – सी गृहस्थी बसाई थी। चारदीवारी में कुल जमा चार बर्तनों की रसोई भी थी। वहीं बगल से मिश्रा चाची शाम की सैर से लौट रही थीं। उनकी वक्र दृष्टि दीवार पर ठहर गई ! ईंटों के बीच स्वमेव बने छेदों से धुंआँ निकल रहा था। धुंआँ देख मिश्रा चाची टाट के फटे पर्दे को खींचकर तनतनायीं
“कैसा खाना बनाती है ! पार्किंग में धुँआँ फैल जाता है तड़के की गंध फैलती है सो अलग ! हें…”
पति की थाली में कटोरी में दाल परोसती चौकीदार की पत्नी के हाथ एक पल के लिये रूक गये फिर कटोरी में दाल परोसकर थाली लेकर मिश्रा चाची के करीब आकर वह प्रेमभाव से बोली
“आओ ना मैडमजी, चख कर तो देखो !”
गुस्से से लाल – पीली हुई मिश्रा चाची ने चौकीदारीन को तरेरकर देखा । दड़बेनुमा कमरे में फैली महक से अचानक मिश्राचाची की नासिका फूलने लगी और रसना ललचा उठी !उन्होंने थाली में रखी कटोरी मुँह को लगा ली। दाल चखते हुए बोलीं
“सुन , मेरे घर खाना बनाएगी ?”
चौकीदारीन के मन का स्नेह आँखों और हाथों के रास्ते मिश्रा चाची के दिल तक पहुँच चुका था!
संपर्क – डॉ. वसुधा गाडगिल , वैभव अपार्टमेंट जी – १ , उत्कर्ष बगीचे के पास , ६९ , लोकमान्य नगर , इंदौर – ४५२००९. मध्य प्रदेश.
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☆ स्नेहरस☆
(मूल कथा – स्नेहरस मूल लेखिका – डॉ. वसुधा गाडगीळ अनुवाद – उज्ज्वला केळकर)
कॉलनीच्या दुसर्या गल्लीत मोठ्या प्लॉटवर एक बहुमजली इमारत होत होती. प्लॉटच्या एका बाजूला विटांच्या चार भिंती बनवून चौकीदाराने आपल्या पत्नीसमवेत छोटासा संसार मांडला होता. चार भिंतीत एकूण चार भांडी असलेलं स्वैपाकघरही होतं. मिश्रा आंटी आपलं संध्याकाळचं फिरणं संपवून त्याच्या शेजारून चालली होती. विटांच्यामध्ये आपोआप पडलेल्या भेगातून धूर बाहेर येत होता. मिश्रा आंटी आपलं संध्याकाळचं फिरणं संपवून त्याच्या शेजारून चालली होती. धूर बघून मिश्रा आंटीनं तरटाचा फाटका पडदा खेचला आणि तणतणत म्हणाली,
‘कसा स्वैपाक करतेयस ग! पार्किंगमध्ये सगळा धूरच धूर झालाय. फोडणीचा वास पसरलाय, ते वेगळच. पतीच्या थाळीतील वाटीत डाळ वाढता वाढता तिचा हात एकदम थबकला. मग वाटीत डाळ घालून ती थाळीत ठेवत ती मिश्रा काकीच्या जवळ आली आणि प्रेमाने म्हणाली, ‘या ना मॅडम, जरा चाखून तर बघा.
रागाने लाल – पिवळी झालेली मिश्रा काकी तिच्याकडे टवकारून बघू लागली. त्या डबकेवजा खोलीत पसरलेल्या डाळीच्या सुगंधाने अचानक मिश्रा काकीच्या नाकपुड्या फुलू लागल्या. जिभेला पाणी सुटलं. तिने थाळीतली वाटी तोंडाला लावली. डाळीचा स्वाद घेत ती म्हणाली,
‘काय ग, उद्यापासून माझ्या घरी स्वैपाकाला येशील?
चौकीदारणीच्या मनाचा स्नेह, डोळे आणि हातांच्या रस्त्याने मिश्रा काकीच्या हृदयापर्यंत पोचला होता.
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी स्त्री पर विमर्श करती लघुकथा माँ दूसरी तो बाप तीसरा। यह अक्सर देखा गया है कि प्रथम पत्नी के बाद बच्चों के देखभाल के नाम से दूसरी पत्नी ब्याह लाता है। इस कटु सत्य को बेहद संजीदगी से डॉ ऋचा जी ने शब्दों में उतार दिया है। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को जीवन के कटु सत्य को दर्शाती लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 39 ☆
☆ लघुकथा – माँ दूसरी तो बाप तीसरा ☆
कभी कुछ बातें खौलती हैं भीतर ही भीतर, इतना तर्क – वितर्क दिल दिमाग में कि आग विचारों का तूफान- सा ला देती है। ऐसे ही एक पल में पति के यह कहने पर कि करती क्या हो तुम दिन भर घर में ? वह कह गई – हाँ ठीक कह रहे हो तुम, औरतें कुछ नहीं करतीं घर में, बिना उनके किए ही होते हैं पति और बच्चों के सब काम घर में। लेकिन जब असमय मर जाती हैं तब तुरंत ही लाई जाती है एक नई नवेली दुल्हन फिर से, घर में कुछ ना करने को ?
एक बार नहीं बहुत बार यह वाक्य उसके कानों में गर्म तेल के छींटों – सा पड़ा था, जब दिन भर घर के कामों में खटती माँ या दादी को घर के पुरुषों से कहते सुना था – करती क्या हो घर में सारा दिन ? वे नहीं दे पातीं थीं हिसाब घर के उन छोटे – मोटे हजार कामों का जिनमें दिन कब निकल जाता है, पता ही नहीं चलता। नहीं कह पाती थीं वे बेचारी कि हम ही घर की पूरी व्यवस्था संभाले हैं खाने से लेकर कपडों तक और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की। जिसका कोई मोल नहीं, कहीं गिनती नहीं। हाँ,शरीर लेखा जोखा रखता उनके दिन भर के कामों का, पिंडलियों में दर्द बना ही रहता और कमर दोहरी हो जाती थी काम करते करते उनकी।
सोचते – सोचते कड़वाहट- सी घुल गई मन में, आँखें पनीली हो आई। उभरी कई तस्वीरें, गड्ड – मड्ड होते थके, कुम्हलाए चेहरे माँ, दादी और – सच ही तो है, एक विधवा स्त्री अपने बच्चों के पालन पोषण के लिए माता- पिता बन संघर्ष करती पूरा जीवन बिता देती है। लेकिन पुरुष घर और बच्चों की देखभाल के नाम पर कभी – कभी साल भर के अंदर ही दूसरी पत्नी ले आता है। पहली पत्नी इतने वर्ष घर को संभालने में खटती रही, वह सब दूसरी शादी के मंडप तले होम हो जाता है। बच्चों की देखभाल के लिए की गई दूसरी शादी के बारे में दादी से सुना था कि माँ दूसरी तो बाप तीसरा हो जाता है ?
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ” के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा “गुरुदक्षिणा”। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 58 ☆
☆ लघुकथा – गुरुदक्षिणा ☆
” आज समझ लो कि उपथानेदार साहब तो गए काम से ,” एक सिपाही ने कहा तो दूसरा बोला,” ये रामसिंह है ही ऐसा आदमी. हर किसी को लताड़ देता है. इसे तो सस्पैंड होना ही चाहिए.”
” देख लो इस नए एसपी को, कितनी कमियां बता रहा है,” पहले सिपाही ने कहा तो दूसरा बोला,” इस एसपी को पता है कि कहां क्या क्या कमियां है,” दूसरे ने विजयभाव से हंस कर कहा.
तभी दलबल के साथ एसपी साहब थानेदार के कमरे में गए. रामसिंह ने अपनी स्थिति में तैयार हुए. झट से अपने अधिकारी के साथ एसपी साहब को सैल्यूट जड़ दिया.
जवाब में सैल्यूट देते हुए एसपी साहब उपथानेदार के चरण स्पर्श करने को झूके. तब उन्हों ने झट से कहा, ” अरे साहब ! यह क्या करते हैं ? मैं तो आप का मातहत हूं.” उन के मुंह से भय और आश्चर्य से शब्द निकल नहीं पा रहे थे .
” जी गुरूजी !” एसपी साहब ने कहा, ” मैं सिपाही था तब यदि आप ने इतना भयंकर तरीके से मुझे न लताड़ा होता तो उस वक्त मेरे तनमन में आग नहीं लगतीऔर मैं आज एसपी नहीं होता. इस मायने में आप मेरे गुरू हुए,” कहने के साथ एसपी साहब तेजी से अपने दलबल के साथ चल दिए, ” सभी सुन लों. मैं ने जो जो कमियां बताई हैं उसे पंद्रह दिन में ठीक कर लीजिएगा अन्यथा….”
तेजी से आती हुई इस आवाज़ को उपथानेदार साहब अन्य सिपाहियों के साथ जड़वत खड़े सब सुनते रहे. उन्हें समझ में नहीं आया कि यह सब क्या हो रहा है ?
( श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू, हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक अत्यंत भावुक लघुकथा ईश्वर मनुष्य बन्दर। संयोगवश मैंने भी इस तरह की घटना देखी है जिसमें बिजली के करंट से मृत बन्दर के बच्चे को उसकी माँ सीने से लगाकर इधर उधर दौड़ती रही और अंत में एक बूढा बन्दर सब को दूर कहीं दौड़ा कर ले गया। अकस्मात् हुई वह घटना कभी विस्मृत ही नहीं होती । श्रीमती कृष्णा जी की लेखनी को को ऐसी संवेदनशील लघुकथा के लिए नमन । )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 37 ☆
☆ लघुकथा – ईश्वर मनुष्य बन्दर ☆
स्कूल के सामने बिजली के लम्बे-लम्बे तार खिंचे थे उस पर बन्दरों की आवा-जाही अनवरत चलती रहती। अचानक एक बन्दर को बिजली का करंट लगने से वह छोटा सा बन्दर नीचे छटपटा कर गिरा, कुछ ही क्षणों मे जाने कहाँ से पचासों बन्दर वहाँ इकट्ठा हो गये कोई उसका हाथ पकड़ कर हिलाता, कोई उसकी आंख, कोई नाक इस तरह टटोलकर वे उसे किसी तरह उठाना चाह रहे थे। पर वह उठ ही नहीं रहा था।
हम सभी यह दुर्घटना देख उन बन्दरों की कोशिश देख रहे थे। स्कूल के बच्चे यदि उनके जरा भी करीब जाते तो सारे बन्दर खी- खी कर डरा कर उन्हे भगा देते। इतने मे ही नगर निगम की गाड़ी वहां आई, शायद किसी ने फोन कर उसे बुला लिया था, पर सभी बन्दर उस छोटे से बन्दर को एक पल को भी आँखों से ओझल नहीं होने दे रहे थे। वे कभी नगर -निगम की गाड़ी को तो कभी कर्मचारियों को देख रहे थे, किसी तरह उन्हें वहां से हटाया गया तो उनमें अफरा -तफरी सी मच गयी। बड़ी मुश्किल से छोटे मृत बन्दर को गाड़ी मे डाला गया। वे सभी अपनी भाषा मे बोलते, चीखते रहे और जब कभी ऊपर को देखते भले ही वे पेड़ को देख रहे थे पर हम सबको लग रहा था वे ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि हमारे बच्चे को जीवन दे दो।
और गाड़ी मृत बन्दर को लेकर चली गयी। बाकि जितने भी बन्दर थे वे भी गाड़ी जाते ही अपने अपने निवास को चले गये।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
☆ संजय दृष्टि ☆ लघुकथा – बेखुदी ☆
न दिन का भान, न रात का ठिकाना। न खाने की सुध न पहनने का शऊर।…किस चीज़ में डूबे हो ? ऐसा क्या कर रहे हो कि खुद को खुद का भी पता नहीं।
# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत हैं एक सार्थक लघुकथा “सीख की गाँठ”। वास्तव में सीख की गाँठ तो सौ टके की है ही, यह लघुकथा भी उतनी ही सौ टके की है। नवीन पीढ़ी को ऐसी ही कई गांठों की आवश्यकता है जो उचित समय पर बांधना ही सार्थक है। संभवतः सभी पीढ़ियां इस दौर से एक बार तो जरूर गुजरती हैं। इस सार्थक लघुकथा के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 58 ☆
☆ लघुकथा – सीख की गाँठ ☆
एक भव्य शादी समारोह लगभग सभी पढ़े लिखे शिक्षित परिवार से लग रहे थे।
बिटिया जिसकी शादी हो रही थी ” सुरीली” । बाहर पढ़ने गई हुई थी। लालन पालन भी आज की आधुनिकता भरे वातावरण में हुआ था।
घर पर सभी मेहमान आए हुए थे और बिटिया के बाहर रहने के कारण सभी सुरीली को कुछ ना कुछ समझा रहे थे।
शायद इसलिए कि वह इन रीति-रिवाजों को नहीं जान रही है और घर से दूर अकेली स्वतंत्र हॉस्टल की जिंदगी में पली बढ़ी है। हॉस्टल की जिंदगी अलग होती है।
समय निकलता जा रहा था सभी रस्में एक के बाद एक होते जा रहे थे। सुरीली नाक चढ़ा मजबूरी है कहकर निपटाना समझ रही थी।
दादी जो कि सत्तर साल की थी। सब बातों को बड़े ध्यान से एक किनारे बैठ कर भापं रही थी क्योंकि कोई उन्हें पूछं भी नहीं रहा था और उनकी अपनी पांव की तकलीफ के कारण वह खड़ी भी नहीं हो पा रही थी।
कभी-कभी बीच-बीच में बेटा और पोता, बहू आ कर पूछ जाते कुछ चाहिए तो नहीं??? परंतु दादी लगातार नहीं कह… कर खुश हो जाती और कहती… तुम सब अपना काम करो। बस मुझे विदाई के समय सुरीली की ओढ़नी पर गांठ बांधनी है।
सभी को लगा कि विदाई में शायद दादी कुछ भारी-भरकम चीज देंगी। परंतु ऐसा कुछ भी नहीं था।
विवाह संपन्न हुआ और धीरे-धीरे विदाई का समय आया। पिताजी ने सुरीली से कहा… कि दादी का आशीर्वाद ले लो सुरीली ने थोड़ा मुंह बना लिया जिसे दादी देख रही थी। सुरीली निपटाना है कहकर… आगे बढ़ी और दादी के पास गई।
दादी ने बड़े प्यार से सुरीली और दामाद के सिर पर हाथ रखा और ओढ़नी के पल्लू पर एक गांठ बांधते हुए बोली… मैं जान रही हूं तुम्हें संयुक्त परिवार की आदत नहीं है और जहां शादी होकर जा रही हो संयुक्त परिवार में जा रही हो।
यह गांठ मैं तुम्हें बांध रही हूं घर से निकलते समय बड़ों से पूछ कर जाना और उनके पूछने से पहले घर के अंदर आ जाना बस इतना सा ही कहना है। सुरीली की आंखें नम हो गई। दादी को कसकर गले लगा लिया और हां में सिर हिला दिया।
दादी की ‘सीख गांठ’ के लिए सभी ने तालियों से स्वागत किया। और अपनी पुरानी काया के साथ अनुभव को अपनी नातिन को बांटते हुए दादी फूली नहीं समा रही थी। सभी की आंखें चमक उठी। सभी ने कहा दादी ने सौ टके की बात कही। दादी की गांठ का सभी ने लोहा माना।
(सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी” जी विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी एवं दूरदर्शन में सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती हेमलता मिश्रा जी की आत्मीय लघुकथाएं – दो रंग:करुणा के। समाज के अनगढ़ त्याज्य अंग पर इन आत्मीय एवं मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत रचनाओं के लिए आदरणीया श्रीमती हेमलता जी की लेखनी को नमन।)
☆ आत्मीय लघुकथाएं – दो रंग:करुणा के☆
(कोरोना की विडम्बना के चलते कुछ अनगढ़ त्याज्य जगहों पर सहायता पहुंचाने हेतु पाले पडे़—सामाजिक साहित्यिक अंतर्राष्ट्रीय अग्नि शिखा मंच संस्था,नागपुरइकाई अध्यक्ष होने के नाते मुझे भी— स्वाभाविक करुणा ने छू लिया और लेखनी ने रच दीं कुछ करुण कथा पटल पर जिन पर आपकी सच्ची आस्था की प्रतिक्रियाएं अपेक्षित हैं ।)
☆ एक – मूर्तिमान आस्था ☆
लाॅक डाउन के चलते उस बदनाम “लाल गली” का सूनापन भयानक लगता–आमने-सामने मिलाकर कुल बीस छोटे-छोटे घरों की वह गली – – हर दरवाजे पर अधमैले से पर्दे के भीतर टिमटिमाते बल्ब की रोशनी उस गली की बेबसी की कहानी बयां करती रहती।
गली के मुहाने पर ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल 59 वर्षीय माँगीलालजी बडे़ भावुक और दुःखी हो जाते वहां रहने वालों की स्थिति पर। सबसे ज्यादा बुरा लगता वहां गली में खेलते सात-आठ बच्चों को देखकर। अधनंगे से पेट पीठ से चिपके कुपोषित चार-पांच लड़के और तीन चार लड़कियाँ।
हर पंद्रह बीस मिनट में एक ना एक कोठरी से पुकार आती जिसमें लडकों के नाम के साथ ही एक बड़ी ही वर्जित गाली भी होती। मैल गंदगी से भरा वह चेहरा आतंकित हो जाता और उस वर्जित शब्द से शर्मिंदा भी।
माँगीलालजी उन बच्चों से दूर – दूर से बतियाते रहते। उनकी भोली-भाली बातों, तमन्नाओं और पढ़ने-लिखने की इच्छा से वे तहेदिल से आप्लावित हो जाते—।
– – – और एक दिन— पुनर्वास कार्यालय में एक आवेदन ने सबकी आँखे नम कर दीं जब उस बदनाम गली के बच्चों को गोद लेने की इच्छा के साथ उन सबको अपना नाम देने की इच्छा और अपने दस बारह कमरों के पैतृक घर को बच्चों के लिए आश्रम बनाने की मंशा जाहिर की थी निःसंतान माँगीलालजी दंपत्ति ने। समाज के ठेकेदारों की भौंहे तनें इससे पहले ही अनेक समाज सेवी संस्थाओं ने भी सहमति की मुहर लगा दी और मूर्तिमान आस्था का प्रतीक बन गया गांव और शहर सीमा पर बसा वह “नीड़ “!!
☆ दो – अनचीन्हे रिश्ते ☆
आओ ना–आओ ना ओ बाबूजी देखो तो अभी बहुत जलवे बाकी हैं मेरे पास। डांस करूंगी गाना गाऊंगी-। आओ ना बाबू।
बीस पच्चीस छोटी छोटी कोठरियों के दरवाजे, छज्जे या खिड़कियों से उठती आवाजें मुनीश को विचलित कर देतीं। वह चिल्ला-चिल्ला कर कह देना चाहता कि मैं कोई बाबू नहीं हूँ। तुम जैसा ही एक मजदूर हूँ। तुम अपना हुनर बेचती हो और मैं दिमाग बेचकर पेट भरने का एक जरिया तलाश करता हूँ।
उस गली के शाॅर्टकट से स्टेशन रोड पर निकलते हुए रोज मुनीश सौ सौ लानते भेजता खुद पर मगर पाँच मिनट के रास्ते के लिए पच्चीस मिनट गँवाना उसे गवारा नहीं था।अतः वह वहीं से उसी गली से निकल जाया करता।
छः महीने पहले ही वह अपने गाँव से काफी दूर इस मँझोले से शहर में आया था। यहां स्टेशन के पास एक कंप्यूटर सेंटर में बैठकर लोगों की टिकिट निकालना, शहर में घूमने आने वालों को टैक्सी वाहन गाईड दिलवाना , होटल रूम दिलवाना आदि कार्य करता रहता।
अलबत्ता आधी रात के बाद वह बरबस उस मोगरा गली से ही होकर घर जाता। भीनी भीनी महक से महकती वह सुनसान गली उसे किसी मंदिर का सा आभास देती। साथ ही एक कोठरी के सामने रोज खिड़की पर बैठी वह तीन वर्षीय छोटी सी गुड़िया मानों उसकी ही राह देखती बैठी मिलती। उसकी प्यारी मुस्कान और चमकीली आँखें उसे मानों पूरे समय पुकारती रहतीं।
एक बार लगातार तीन चार दिन वह बच्ची नहीं दिखाई दी तो मुनीश की चिंता और बेचैनी बहुत बढ़ गई। पूरा साहस बटोर कर उसने द्वार खटका दिया। द्वार सहज ही खुल गया। भीतर के टिमटिमाते बल्ब में देखा कि एक अत्यंत क्षीण काया मटमैले बिस्तर पर बेहोश सी पड़ी है और उसके सिरहाने वही बच्ची रो रही है। एक अनजानी करुणा से मुनीश का दिल सिहर गया। बच्ची के प्यार से बँधे उसके फर्ज ने उसे साहस दिया। पुलिस को फोन लगाकर उसने पूरी स्थिति बतायी।पुलिस ने वहां पहुंच कर उस बच्ची की माँ को अस्पताल पहुंचाया और बच्ची को अनाथाश्रम भेजने की कार्रवाई करने लगे। लेकिन मुनीश की करुणा – – – बीच में आ गई और बच्ची को अपनी भानजी बताकर उसने बच्ची को अपने पास रखने की प्रार्थना की। न जाने क्या सोचकर बच्ची की माँ ने भी इस रिश्ते की हामी भर दी। पुलिस वालों ने भी मानवता की पुकार पर परिस्थितियों की गंभीरता को समझते हुए बच्ची को उसकी तथाकथित नानी और मामा को सौंप दिया कुछ डाक्यूमेंट्स पर हस्ताक्षर करवाके।
– – – और करुणा का मूर्तिमंत रूप बने वे अनचीन्हे रिश्ते खुद पर ही गौरवान्वित हो उठे।
(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )। इनके अतिरिक्त हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6, लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। )
आज प्रस्तुत है सर्वप्रथम डॉ लता अग्रवाल जी की मूल हिंदी लघुकथा ‘अर्धांगिनी’ एवं तत्पश्चात श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी द्वारा मराठी भावानुवाद ‘अर्धांगिनी ’।
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डॉ लता अग्रवाल
(सुप्रसिद्ध हिंदी वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविदडॉ लता अग्रवाल जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है । आप महाविद्यालय में प्राचार्य पद पर सेवारत हैं । प्रकाशन शिक्षा पर – 16 पुस्तकें, कविता संग्रह –4, बाल साहित्य – 5, कहानी संग्रह – 2, लघुकथा संग्रह – 5, साक्षात्कार संग्रह –1, उपन्यास – 1, समीक्षा – 3, लघुरूपक – 18 । पिछले 10 वर्षों से आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर संचालन, कहानी तथा कविताओं का प्रसारण, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में रचनाएँ प्रकाशित | )
☆ अर्धांगिनी☆
“अच्छा ! माँ –बाबा ! मैं चलता हूँ।”
“कितनी बार कहा है चलता हूँ नहीं आता हूँ कहते हैं बेटा।” मां ने गंभीर चेहरे पर बनावटी शिकायत का भाव लाते हुए कहा।
“ओह हां ! आता हूं माँ –बाबा।” अभी 8 ही दिन हुए हैं अवधेश के विवाह को, पूरे 1 माह की छुट्टी लेकर आया था, विवाह के पश्चात पत्नी को कहीं मनोरम स्थान पर घुमाने ले जायेगा …दोनों एक दूसरे के मन के भाव जानेंगे, मगर अटारी बॉर्डर पर हुए सैनिक हमले में कई सैनिक मारे गए अतः हेड ऑफिस से कॉल आया,
‘लेफ्टिनेंट अवधेश ! इमीजियेट ज्वाइन योर ड्यूटी।’ आदेश पाते हैं अवधेश ने जब अपनी नवविवाहित पत्नी से सकुचाते हुए कहा,
“सीमा ! हेड क्वार्टर से बुलावा आया है मुझे अर्जेंट ही जाना होगा।”
“क्या कल ही चले जायेंगे ?”
“हां ! अलसुबह निकलना होगा।”
“कुछ दिन और नहीं रुक सकते।” सीमा ने आत्मीय भाव से पूछा।
“नहीं सीमा उधर बॉर्डर पर मेरी आवश्यकता है …मेरा इंतजार हो रहा होगा। पता नहीं मेरे कौन-कौन साथी …।” अपने अनजाने खोये साथियों के शोक की कल्पना में अवधेश के स्वर डूब गये।
“फिर कब लौटना होगा ?”
“कह नहीं सकता …जब तक सीमा पर शांति बहाल ना हो या …शायद ……।”
“बस आगे कुछ मत कहिए, अच्छा सोचिये सब शुभ होगा।” सीमा ने पति के होठों पर प्यार से उंगली रखते हुए कहा।
“मैं जानता हूँ सीमा यह सप्ताह तुम्हारा रीति रिवाजों की औपचारिकता और मेहमान नवाजी के बीच बीत गया और अब हमें अपना हनीमून भी कैंसिल करना होगा मैं तुम्हें कुछ नहीं दे पाया उल्टे अब घर की मां -बाबा की देखभाल भी तुम्हें सौंपे जा रहा हूं। ” अवधेश ने सीमा को सीने से लगाते हुए कहा।
“आप चिंता मत कीजिए जी, हम सैनिकों की पत्नियों को ईश्वर अतिरिक्त साहस और धैर्य देकर भेजता है। आप निश्चिंत रहें आपके लौटने तक मैं मां -बाबा का पूरा ख्याल रखूंगी और आपका इंतजार करूंगी।” पत्नी ने अवधेश के मन का बोझ उतार दिया। अत: आज जाते हुए अवधेश स्वयं को हल्का महसूस कर रहा था अपना प्रतिनिधि मां -बाबा की सेवा के लिए जो छोड़े जा रहा था। जाते हुए घर के बाहर गांव के कई लोग जमा थे बुजुर्ग कह रहे थे,
‘गांव के अपने इस लाड़ले पर हमें नाज है।’ युवा, बच्चे सभी अवधेश को सैल्यूट देते हुए,
‘जय हिन्द अवधेश भैय्या’ कह रहे थे। दूर दहलीज पर पर्दे की ओट में खड़ी सीमा की ओर देखते हुए आंखों में कृतज्ञता का भाव लिए अवधेश ने एक जोरदार सैल्यूट दिया,
‘थैंक्स अर्धांगिनी, सही मायने में सैनिक तो तुम हो जो अपने जीवन के अमूल्य पल हंसते- हंसते हम पर कुर्बान कर देती हो।’ भाव सीमा तक पहुंच गये थे, उसके मुट्ठी के कसाव ने पर्दे को जोर से भींच लिया ।
‘किती वेळा सांगितलं, जातो, नाही येतो, म्हणावं रे!’ आई गंभीर चेहर्याने खोट्या तक्रारीच्या सुरात म्हणाली.
‘ओह! येतो!’
अवधेशाच्या विवाहाला अद्याप आठ दिवससुद्धा झाले नव्हते. चांगली एक महिन्याची सुट्टी घेऊन आला होता तो. विवाहानंतर पत्नीला एखाद्या निसर्गरम्य ठिकाणी तो घेऊन जाणार होता. दोघांना एकमेकांच्या मनातले भाव नीटपणे जाणून घेता येतील. पण अटारी बॉर्डरवर सैनिकांवर आक्रमण झाले. अनेक सैनिक मारले गेले. हेड ऑफिसमधून त्याला कॉल आला, ’लेफ्टनंट अवधेश, ताबडतोब तुमच्या ड्यूटीवर हजार व्हा.’ आदेश मिळताच अवधेश आपल्या नवपरिणीत पत्नीला संकोचत म्हणाला, ‘सीमा, हेडक्वार्टरवरून आदेश आलाय, मला लगेचच निघायला हवं!’
‘उद्याच निघणार?’
‘हो! उद्या पहाटेच निघायला हवं’
‘आणखी काही दिवस नाही थांबू शकणार?’ सीमानं आत्मीयतेने विचारलं .
‘नाही सीमा, तिकडे बॉर्डरवर माझी वाट बघत असतील. कुणास ठाऊक माझे कोण कोण साथी…’ आपल्या अज्ञात हरवलेल्या साथिदारांच्या शोकाच्या कल्पनेने अवधेशचा स्वर भिजून गेला.
‘परत कधी येणं होईल?’
‘काही सांगता येत नाही. जोपर्यंत सीमेवर शांतीचा वातावरण… किंवा मग…’
‘बस… बस .. पुढे काही बोलू नका. चांगला विचार करा. सगळं शुभ होईल. सीमा पतीच्या ओठांवर बोट ठेवत म्हणाली.’
‘सीमा, हा आठवडा रीती-रिवाजांची औपचारिकता आणि पाहुण्यांचे आदरसत्कार करण्यात निघून गेला॰ आता तर आपल्याला आपला हनीमूनही कॅन्सल करावा लागतोय. मी तुला काहीच देऊ शकलो नाही. उलट आई-बाबांना सांभाळण्याची जबाबदारी तुझ्यावर सोपवून चाललोय.’ सीमाला छातीशी कवटाळत अवधेश म्हणाला.
‘आपण काळजी करू नका. आम्हा सैनिकांच्या पत्नींना ईश्वर अतिरिक्त साहस आणि धैर्य देऊन पाठवत असतो. आपण निश्चिंत रहा. आपण येईपर्यंत आई-बाबांची मी नीट काळजी घेईन आणि आपली वाट पाहीन.’ सीमाने अवधेशच्या मनावर असलेला भार हलका केला. त्यामुळे आज घरातून बाहेर पडताना अवधेशला अगदी हलकं हलकं वाटत होतं॰ आपल्या आई-बाबांची सेवा करण्यासाठी तो आपला प्रतिनिधी मागे ठेवून जात होता. तो घराबाहेर पडला, तेव्हा बाहेर किती तरी लोक त्याला निरोप देण्यासाठी जमा झाले होते. ज्येष्ठ मंडळी म्हणत होती, ‘गावाच्या या लाडक्या मुलाचा आम्हाला अभिमान आहे.’ तरुण , मुले सगळे अवधेशला सॅल्यूट देत म्हणत होते, ‘जय हिंद अवधेशभैय्या!’ दूर उंबरठ्यावर पडद्याआड उभ्या असलेल्या सीमाकडे बघताना त्याच्या डोळ्यात कृतज्ञता होती. अवधेशने तिला एक जोरदार सॅल्यूट देत, तो डोळ्यांनीच म्हणाला , ‘थॅंक्स अर्धांगिनी खर्या अर्थाने तूच सैनिक आहेस. आपल्या जीवनातले अमूल्य क्षण तू हसत हसत आमच्यावरून ओवाळून टाकतेस.’
त्याच्या मनातले भाव सीमापर्यंत पोचले. तिच्या मुठीने पडद्याची कड घट्ट धरून ठेवली.