(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक बाल कहानी – “बर्फ की आत्मकथा” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३५ ☆
☆ बाल कहानी – बर्फ की आत्मकथा☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
मैं पानी का ठोस रूप हूं. द्रव्य रूप में पानी बन कर रहता हूं. जब वातावरण का ताप शून्य तक पहुंच जाता है तो मैं जम जाता हूं. मेरे इसी रूप को बर्फ कहते हैं. मेरा रासायनिक सूत्र एचटूओ है. यही पानी का सूत्र भी है. यानी मेरे अंदर हाइरड्रोजन के दो अणु और आक्सीजन के एक अणु मिले होते हैं.
जब पेड़पौधे वातावरण से कार्बन गैस से कार्बन लेते हैं तब मेरे पानी से हाइड्रोजन ले कर शर्करा बनाते हैं. इसे ही पौधों की भोजन बनाने की प्रक्रिया कहते हैं. इसे हिंदी में प्रकाश संश्लेषण कहते हैं. इस क्रिया में मेरे अंदर की आक्सीजन वातावरण में मुक्त हो जाती है.
बर्फ अपनी आत्मकथा सुना रहा था. सामने बैठा हुआ बेक्टो ध्यान से सुन रहा था.
बर्फ ने कहना जारी रखा. ध्रुवों पर तापमान शून्य के करीब रहता है. इस कारण वहां का पानी जम रहता है. इस जमे हुए पानी के पहाड़ को हिमनद कहते हैं. ये बर्फ के रूप में जमा होता है. यह सुन कर बेक्टो की आंखें फैल गई.
तुम सोच रहे हो कि सूर्य के प्रकाश से मेरा पानी पिघलता नहीं होगा ? बिलकुल नहीं. सूर्य का प्रकाश मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाता है. इस कारण जानते हो ? नहीं ना. तो सुनो. सूर्य का जितना प्रकाश मेरे ऊपर पड़ता है उतना ही मैं वापस वातावरण में लौट देता है. मैं सूर्य के प्रकाश को अपने पास नहीं रखता हूं. इसे वैसा ही वातावरण में लौटा देता हूं जैस यह मेरे पास आता है.
यही वजह है कि बर्फिली जगह लोगों को काला चश्मा लगाना पड़ता है. यहां पर प्रकाश बहुत तीव्र होता है. इस की चमक से आंखे खराब हो सकती है. इसलिए वे आंखों पर चश्मा लगाते हैं.
ओह ! बेक्टो की आंखे चमक गई. उस ने पूछा कि सूर्य का प्रकाश उसे पिघलाता नहीं है.
तब बर्फ ने कहा कि सूर्य का प्रकाश मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाता है. इस का कारण यह है कि मैं बर्फ की कोई ऊष्मा अपने अंदर ग्रहण नहीं करता हूं. मेरी मोटीमोटी पर्त भी पारदर्शी होती है. वे प्रकाश को आरपार पहूंचा देती है. या वातावरण में लौटा देती है. इसलिए मैं पिघलता नहीं है.
यदि मैं पिघल जाऊ तो जानते हो क्या होगा ? बर्फ के पूछने पर बेक्टो ने नहीं में गरदन हिला दी. तब बर्फ बोला कि यदि मेरी सभी बर्फ पिघल जाए तो इस से समुद्र के सतह पर 60 मीटर ऊंची दीवार बन जाएगी. इस पानी की दीवार में धरती की आधी आबादी डूब कर मर जाए.
यह सुन कर बेक्टो चकित रह गया.
बर्फ ने बोलना जारी रखा. मैं पिघलता नहीं हूं इसलिए हिमनद के रूप में जमा रहता हूं. यदि कभी मैं पिघलता हूं तो इस का कारण आसपास के वातावरण के तापमान बढ़ने से पिघलता हूं. वैसे जैसा रहता हूं वैसा जमा रहता हूं. यही मेरी कहानी है.
बेक्टो को बर्फ की कहानी अच्छी लगी. उस ने कहा कि आप तो सूर्य से भी नहीं डरते हैं.
इस पर बर्फ बोला कि सूर्य मेरा कुछ नहीं बिगाड़ता है. कारण यह है कि मैं ताप को ग्रहण नहीं करता हूं. इसलिए वातावरण से प्राप्त सूर्य के ताप को उसी के पास रहने देता हूँ. यदि तुम भी किसी की बुराई ग्रहण न करें तो तुम्हारी अंदर बुराई नहीं आ सकती है. तुम मेरी तरह अच्छाई ग्रहण करते रहो तो तुम भी मेरी तरह सरल और स्वच्छ बन सकते हो. यह कहते ही बर्फ चुप हो गया.
बेक्टो सोया हुआ था. उस की आंखे खुल गई. उस ने एक अच्छा सपना देखा था. इस सपने में वह बर्फ से आत्मकथा सुन रहा था. यह आत्मकथा बड़ी मज़ेदार थी इसलिए वह मुस्करा दिया.
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – ऊहापोह
हिरण मोहित था पानी में अपनी छवि निहारने में। ‘मैं’ का मोह इतना बढ़ा कि आसपास का भान ही नहीं रहा। सुधबुध खो बैठा हिरण।
अकस्मात दबे पाँव एक लम्बी छलांग और हिरण की गरदन, शेर के जबड़ों में थी। पानी से परछाई अदृश्य हो गई।
जाने क्या हुआ है मुझे कि हिरण की जगह मनुष्य और शेर की जगह काल के जबड़े दिखते हैं।
ऊहापोह में हूँ, मुझे दृष्टिभ्रम हुआ है या सत्य दिखने लगा है?
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।
इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम:
ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – विद्या।)
“तुम्हारा नाम क्या है?” गायत्री जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“दीदी हमें हमारा नाम नहीं पता, कोई काली कह देता है, कोई गुड़िया कह देता है, कोई मुनिया कह देता है, कोई कहता अरे ओ सुन, लेकिन दीदी ज्यादातर लोग कामवाली बाई कहते हैं।”
“ठीक है, ठीक है, ज्यादा बातें मत कर, सीधे काम पर लग जाओ, जल्दी से मुझे रोटी सब्जी बना दो। रसोई में राजमा भीगा पड़ा है, दोपहर में चावल बना लेना। राजमा रोटी मुझे दे दो, बच्चे स्कूल से आएंगे उन्हें खाना खिला देना। रोज के काम की लिस्ट मैं सामने टेबल पर रख चली जाऊंगी पढ़ी-लिखी हो ना।”
“जी दीदी वैसे पांचवी क्लास तक पढ़ी हूं। थोड़ा-थोड़ा जोड़ के अक्षरों को पढ़ लेती हूं आप चिंता मत करो मैं खाना अच्छा बनाती हूं। आपके यहां जो पहले काम करती थी झुमरी वह मेरी मौसी है उसी से मैंने सारा घर का काम खाना बनाना सीखा है, आप किसी बात की चिंता मत करो।”
“मेरे घर से जाते ही तुम अकेली घर में रहोगी ध्यान रखना कोई भी आए दरवाजा मत खोलना। बगल में शर्मा जी का नौकर बहुत तेज है वह जरूर आएगा। ज्यादा किसी से बात मत करना दोपहर में बच्चे आएंगे उन्हें खाना खिला देना शाम को मैं आऊंगी तब तुम्हें घर जाने की छुट्टी मिलेगी। अभी शुरू में तुम्हें ₹5000 दूंगी। काम देखूंगी, फिर पैसे बढ़ाऊंगी।”
“दीदी, स्कूल के बहार तो बहुत भीड़ लगी थी। सब लोग वोट डालने गए हैं क्या आप वोट नहीं डालते?”
“मैं ऑफिस से आते हुए वोट डालते हुए आऊंगी। चलो कोई बात नहीं मैं भी तुम्हारा वोटर आईडी बनवा दूंगी और धीरे-धीरे सारी चीज सिखा दूंगी।”
“दीदी एक बात तो सुनो हमारे मोहल्ले में कुछ लोग आते हैं। वह हमें बड़ी सी गाड़ी में भरकर ले जाते हैं एक पर्चा देते हैं उसमें बहुत सारे चित्र बने रहते हैं, हमें एक चित्र की ओर इशारा कर देते हैं, हम उस पर ठप्पा लगा देते हैं और हमें पैसे भी मिलते हैं, दीदी साड़ी और रुपया मिलता है। खाना भी बन रहा है मैंने अपने आदमी से कहा कि शाम को घर लेते आना खाने को।”
“कोई बात नहीं अब तुम हमारे यहां काम करने लग गई हो धीरे-धीरे तुझे मैं पढ़ना लिखना और बातें सिखा दूंगी अभी मुझे ऑफिस जाने दें।”
“मैं रविवार को एक बस्ती में गरीब महिला और बच्चों को पढ़ाने जाती हूं। तुझे भी साथ लिए चलूंगी। तब तो किसी भी कागज में क्या लिखा है खुद पढ़कर समझ सको। अब से तुम्हारा नाम विद्या और अपने विद्या नाम को सफल कर सकोगी। शाम को बढ़िया खाना बना कर रखना।”
मुस्कुराते हुए गायत्री जी अपने कर को स्टार्ट करके ऑफिस चली जाती हैं।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– साल और भी…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ८९ — साल और भी… —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
गरीब ने ऊँचे पर्वत के शिखर से कूद कर आत्म हत्या कर ली। हज़ार साल पहले यहाँ प्रकृति के वक्ष पर लिखा हुआ था विश्व सम्राट ने यहाँ से आत्म हत्या की थी। तब से यह विश्व सम्राट की मौत की जागीर हुई। अब जा कर एक गरीब से उसकी यह जागीर टूटी। अब प्रश्न शेष रहता विश्व सम्राट हज़ार साल पहले अपने राजशाही परिवार में अधिनियंता की जो जागीर छोड़ गया था उसके टूटने में और कितने साल लगते?
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “बलि”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
पता नहीं क्यों सब गड्ढमड्ढ सा हुआ जा रहा है। वह एक राजनीतिक समारोह की कवरेज करने आया हुआ है। रोज़ का काम जो ठहरा पत्रकार का ! रोज़ कुआं खोदो, रोज़ पानी पियो ! रोज़ नयी खबर की तलाश ।
फिर भी आज सब गड्ढमड्ढ क्यों हुआ जा रहा है? क्या पहली बार किसी को दलबदल करते देख रहा है? यह तो अब आम बात हो चुकी ! इसमें क्या और किस बात की हैरानी? फिर भी दिल है कि मानता नहीं । मंच पर जिस नेता को दलबदल करवा शामिल किया जा रहा है, उसके तिलक लगाया जा रहा है और मैं हूं कि बचपन में देखे एक दृश्य को याद कर रहा हूँ। किसी बहुत बड़े मंदिर में पुराने जमाने के चलन के अनुसार एक बकरे को बांधकर लाया गया है और उसके माथे पर तिलक लगाया जा रहा है और वह डर से थरथर कांप रहा है और यहां भी दलबदल करने वाले के चेहरे पर कोई खुशी दिखाई नहीं दे रही । बस, एक औपचारिकता पूरी की जा रही है और गले में पार्टी का पटका लटका दिया गया है । चारों ओर तालियों की गूंज है और मंदिर में बकरा बहुत डरा सहमा हुआ है । दोनों एक साथ क्यों याद आ रहे हैं ? यह मुझे क्या हुआ है? किसने धकेला पार्टी बदलने के लिए? सवाल मन ही मन उठता रह जाता है लेकिन बकरे की बेबसी सब बयान कर रही है….
☆ समाधान… मूळ गुजराती लेखिका : डॉ. रुश्वी टेलर ☆ हिन्दी अनुवाद : श्री राजेंद्र निगम ☆
गीत बजने की आवाज सुनकर वे चौंककर जाग गए। नींद से हल्के से जागकर पलंग के पास रखे मोबाइल को ढूँढा। नहीं, अलार्म तो नहीं बजा और अभी तो एक ही बजा था। बिस्तर पर बैठने के बाद उन्हें समझ में आया कि बाहर के कमरे से टीवी की आवाज आ रहा थी। “विराज रात में इतनी देर तक क्यों टीवी चालू कर के बैठा है ?”
वे खड़े होकर बैठक के कमरे में आए। प्रियांशी उन्हें देखकर सोफे पर से एकदम खड़ी हो गई। “सॉरी पापा, मैं चैनल बदलने के लिए गई, लेकिन मेरी भूल से से आवाज बढ़ गई।”
वे लुछ देर प्रियांशी के सामने और कुछ देर टीवी के सामने देखते रहे। प्रियांशी आगे कुछ कहने जा रही थी की तब ही वे बोले,
“क्यों बेटा, अब तक जाग रही हो ? क्या हुआ ? सेहत तो ठीक है न ?”
“अरे नहीं, नहीं। पापा कुछ नहीं हुआ। बस वैसे ही नींद नहीं आ रही थी तो लगा कुछ देर टीवी देख लूँ। सॉरी पापा, मेरे कारण आपकी नींद बिगड़ गई। आप सो जाएँ, मैं भी सोने के लिए जा रही हूँ।” कहते-कहते उसने टीवी बंद किया और तुरंत अपने कमरे में चली गई। बैठक खंड के अँधेरे में वे कुछ देर असमंजस जैसी स्थिति में खड़े रहे। उन्हें कुछ असामान्य जैसा लग रहा था या फिर वह केवल उनका वहम था !
उन्होंने कमरे में आकर अंदर वैसे ही दो-चार चक्कर लगाए। पलंग पर तकिया रखा और उसके सहारे बैठे। “प्रिया किसी बेचैनी में थी या कुछ और था ? ऑफिस में कुछ हुआ होगा ? विराज के साथ कुछ अनबन हो गई होगी ? नहीं… ऑफिस से आई, तब तो बहुत अच्छे मूड में थी। थकी हुई थी, लेकिन फिर भी उसने मेरी प्रिय दाल-ढोकली बनाई। और मुझे आग्रह कर खिलाया। लेकिन हाँ, वे दोनों जब भोजन के लिए बैठे, तब वह कुछ ढीली लग रही थी। तुरंत भोजन किया और बगैर कुछ बोले और बगैर रसोई का काम निपटाए सोने के कमरे में चली गई| लेकिन विराज भी तो सामान्य था। मेरे साथ फुटबॉल मैच देखते वक्त सहज लग रहा था। उसके किसी परिचित का फोन आया, तब वह हँस-हँसकर बात भी कर रहा था। तो फिर क्या हुआ होगा ? प्रियांशी की तबियत खराब हो गई होगी या फिर काम के बोझ के कारण थक जाती होगी ? उनका दिमाग घूमने लगा। जोरजोर से बोलनेवाली और वैसे ही हँसनेवाली प्रियांशी आज शाम के बाद गुमसुम हो गई थी। “अभी टीवी देख रही थी और जैसे ही मैं चला गया. तो कैसी शर्मसार हो गई थी ! मानो कोई गुनाह करते हुए पकड़ ली गई हो ! और मुझे उसकी परेशानी बताते हुए उसे शर्म आ रही हो ? क्या करूँ…अलका को फोन करूँ ? नहीं, नहीं. इतनी गंभीर बात भी नहीं है। और यह भी कहाँ निश्चित है कि प्रिया को कुछ हुआ ही है या वह सिर्फ मेरे मन का वहम है ? अलका की गैर-मौजूदगी के कारण क्या मैं कुछ अधिक चिंतित हो गया हूँ ? कल सवेरे विराज के साथ बात कर लेंगे।”
कोई ऊँची आवाज में बोल रहा था, वे तुरंत जाग गए। ओह, यह तो विराज की आवाज है। वे उठकर लगभग दौड़ते हुए बाहर आए। विराज टाई पहनते हुए गुस्से में बोल रहा था।
“मैं मेरा काम करूँ या तुम्हारे दर्जी के यहाँ धक्के खाऊँ ? इतना ही जरूरी था तो खुद जाकर के ले आती।”
वे घबरा गए। “वीरू बेटा, क्या हुआ है ? क्यों इतने गुस्से में हो ? प्रिया कहाँ है ?”
प्रियांशी रसोई से दोनों की टिफिन बैग लेकर बाहर आई। उसकी आँखें सुर्ख लाल हो रही थीं। चेहरा बिल्कुल उतर गया था। वे स्थिति को समझने की कोशिश करते रहे। विराज उनकी मौजूदगी को नजरअंदाज कर जूते-मौजे पहनने लगा। प्रियांशी टिफिन बैग को डाइनिंग टेबल पर रखकर रसोई में चली गई। वे रसोई के दरवाजे पर खड़े रहकर दोनों के सामने देखते रहे।
“प्रिया बेटा, क्या हुआ ? क्यों झगड़े तुम दोनों ? और ओ भाई, यह सवेरे-सवेरे क्यों चीख रहे हो ? ऐसा अच्छा नहीं लगता है। कारण बताओ, तो मालूम पड़े। प्रिया तुम्हें रोना नहीं चाहिए, बेटा| यहाँ बाहर आकर बैठो। वीरू, तुम भी बैठो।”
“पापा मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है। और मेरे पास इन सब नाटकों के लिए वक्त नहीं है ! मैं निकल रहा हूँ।”
“विराज, मैं शांति से बात कर रहा हूँ, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि तुम मेरे साथ चाहे जिस भाषा में बात कर सकते हो। चुपचाप जूते निकालकर यहाँ आ कर बैठो। नहीं जाना ऑफिस। प्रिया, तुम भी काम छोड़कर बाहर आओ।”
प्रियांशी बाहर आकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई। जो हुआ है, उसका संकोच उसके चेहरे पर देखा जा सकता था। “अब शांति से बोलो, वीरू, क्या हुआ ? क्यों इतना गुस्सा कर रहे हो प्रिया पर ?”
विराज लंबी साँस खींचकर गुस्से में प्रिया की ओर देखते हुए टाई को ढीला करने लगा। प्रियांशी की आँखें फिर बहने लगी।
“बेटा प्रिया, इसके सामने मत देखो। बोलो, क्या हुआ ? तुम कुछ बोलोगी तो मुझे मालूम होगा न ! मम्मी को फोन करूँ ?”
“नहीं पापा, मम्मी को परेशान मत करो। कोई बड़ी बात नहीं है, यह तो इनकी आदत है छोटी-छोटी बात को बड़ा रूप देने की।”
“वाह, मैं उसको बड़ा रूप दे देता हूँ ? मैं ? कल रात से तुम मुँह फुलाए घूम रही हो, मानो मैंने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो, इसलिए मेरी ओर देखती भी नहीं। पापा, सच तो यह है कि मम्मी ने बहू को बहुत सिर पर चढ़ा रखा है। और इसीलिए मुझ पर हुक्म चलाती है। देखो प्रिया, एक बात सुन लो, मेरे सामने फिजूल मगजमारी मत करो। तुम कमाती हो तो इसका रोब मुझ पर मत झाड़ो।” विराज का गुस्सा फिर बरसने लगा।
वे कुछ देर विराज के सामने देखते। यह घटना उनके स्वयं के घर में घट रही थी और इस परिवेश में वे स्वयं एक अनजान व्यक्ति की तरह मौजूद थे। इस घर में ऐसी भी घटनाएँ होती हैं ? पहले भी हुई होंगी ?
उन्हें घबराहट होने लगी। विराज को कुछ कहने के लिए गए, उसके पहले ही प्रियांशी बोल पड़ी, “सॉरी, विराज, तुम्हें अपना समझ कर मैंने अपना काम बताया था। तुम्हें यदि इसमें मेरा रोब दिखाई देता है, तो अब नहीं कहूँगी और कभी भी तुमसे मदद नहीं माँगूंगी।”
वह सिसकियाँ भरने लगी, “पापा, आज शाम को मेरे ऑफिस में ब्रांड सक्सेस का एक कार्यक्रम रखा है। मैं उस प्रोजेक्ट की लीडर हूँ और इसलिए आज मुझे वह अवार्ड मिलना है। फंक्शन में पहनने के लिए मैं नई साड़ी लाई थी और उसका ब्लाउज उस दरजी को सीने के लिए दिया था. जिसकी दूकान विराज की ऑफिस के पास के ही कांप्लेक्स में है। कल रात वह दर्जी शहर छोड़कर कहीं बाहर जाने वाला था, इसलिए मैंने विराज को विशेष रूप से याद करके मेरा ब्लाउज लाने के लिए कहा था और वे भूल गए। मुझे दुख हुआ, इसलिए मैंने कुछ नाराजगी बताई और उसमें ये उबल पड़े।”
“अरे यार, मैं कहाँ फुर्सत में हूँ। सत्तर प्रकार के तनाव हैं। काम में भूल गया, क्या करूँ, फाँसी पर लटक जाऊँ ?”
“हाँ, बस आपको ऐसा उल्टा बोलना आता है। मेरी वस्तु लाना भूल गए, उसका कोई अफसोस नहीं।” दोनों के एक दूसरे के आमने-सामने आक्षेप लगाते हुए देखकर उन्हें हँसी आ गई, ये दोनों कैसी तुच्छ बात पर झगड़ रहे हैं ?
वे प्रियांशी को समझाने लगे कि बेटा दूसरी साड़ी पहन लेना। तब ही विराज बोल पड़े, “कपड़ों के इतने ढेर इकट्ठे कर लिए हैं, उसमें से कुछ भी पहन लो न यार, उस नई साड़ी पर क्या कुछ छाप लगाई है ?”
“बस, देखा न, पापा ? सलाह दे दी कि अन्य कुछ पहन लो। मुझे आपकी सलाह की कोई जरूरत नहीं है, विराज। मैं निपट लूँगी।”
“मुझे मालूम है कि तुम्हें मेरी सलाह की कोई जरूरत नहीं है। मेरा दिन बिगड़ दिया, यार ! तुम्हें तो आदत हो गई है, बात-बात पर कलह करने की।” विराज गुस्से में पुनः बूट पहनकर उनकी ओर नजर डाले बगैर निकल गया।
प्रियांशी आँसू पोंछते-पोंछते उसके कमरे में चली गई। बैठक-खंड शांत हो गया। मानो कुछ हुआ ही नहीं ! ऐसी ही शांति तो रहती है इस घर में, हमेशा। “वीरू-प्रिया क्या पहली बार ऐसे झगड़े होंगे ? दोनों की बात से लगता है कि पहले भी झगड़े होंगे, तो मुझे यह क्यों मालूम नहीं है ? अलका ने भी मुझे नहीं कहा ?”
वे अभी सोच ही रहे थे कि तब ही प्रियांशी तैयार होकर बाहर आई। “पापा, भोजन तैयार है। आप भोजन करने के बाद ही ऑफिस जाने के लिए निकलना। मैं आज शाम पाँच बजे आ जाऊँगी। आपकी और विराज की रसोई बनाकर, करीब सात बजे मैं निकल जाऊँगी। मैं तो अपना भोजन वहीं ले लूँगी।”
प्रियांशी उसका पर्स लेकर बाहर निकली। सेंडल पहन कर वापिस आई और दरवाजे के पास खड़ी रही। “पापा, आप चिंता नहीं करें। छोटी बात है। मैं रात में विराज के साथ बात कर लूँगी। और प्लीज, मम्मी से कुछ नहीं कहना, वे अनावश्यक चिंता करेंगी। चिंता में उनका बीपी बढ़ जाता है।”
“प्रिया बेटा, तुम दोनों ऊँचे ओहदे पर नौकरी करते हो, इतने परिपक्व हो। फिर भी इस प्रकार छोटे बच्चों की तरह झगड़ते हो, क्या यह अच्छा लगता है ? अलका ने तो मुझे कभी कहा नहीं कि तुम दोनों ऐसी छोटी-छोटी बातों पर झगड़ने लगते हो। विराज इतना गुस्सा करता है, यह भी मुझे पहली बार मालूम हुआ।”
“आपको परेशानी न हो, शायद इसलिए मम्मी ने नहीं कहा होगा। लेकिन विराज का तो यह हमेशा का है। वह अपने काम को ही अहमियत देता है और दूसरे लोगों को तो वह गिनता ही नहीं। बात मात्र मेरे ब्लाउज भूलने की नहीं थी, पापा। उन्हें सौंपा गया घर का कोई भी काम वे नहीं करते हैं। भूल गया, कह कर हाथ झटक देते हैं। मम्मी की बात को भी इसी प्रकार उड़ा देते हैं। क्या घर की इस प्रकार उनकी कोई जवाबदारी नहीं है ?”
एक ही साँस में बोलकर प्रियांशी कुछ रुकी। “इस समय जो हुआ, उसके लिए सॉरी। मम्मी की गैर-मौजूदगी में आपको यह तनाव झेलना पड़ा।” धीमे से दरवाजा अटका कर वह चली गई।
“मम्मी की गैर मौजूदगी में आपको यह तनाव झेलना पड़ा।” यह वाक्य उन्हें काँटे की तरह चुभ गया।
“इस घर से संबंधित मामलों की सभी चिंताएँ मात्र अलका ही दूर कर सकती है ? वह अकेली ही इसे मैनेज करती है ? विराज इसी प्रकार का ख़राब व्यवहार करता है, उसके संबंध में मुझे कभी कहा ही नहीं ? उसका बीपी बढ़ जाता है ? डॉक्टर को बताती होगी ? दवा लेती होगी? प्रिया ने कहा की विराज सिर्फ अपने काम को ही प्राथमिकता देता है, वह मात्र विराज के लिए ही था या मेरे लिए भी था ? वह दर्जी के वहाँ जाना भूल गया, इसलिए वह झगड़ा करे, इतनी नादान तो प्रिया नहीं है। विराज द्वारा वह मुझे कुछ बताना चाहती होगी ? या अन्य कोई बड़ी बात होगी ?”
उन्हें कहीं चैन नहीं पड़ रहा था। अलका को फोन करने की तीव्र इच्छा हुई। लेकिन फोन में कहना क्या ? “उसकी बहन की सेहत के बारे में कुछ जानकारी ले लूँ और कुछ इधर-उधर की बातें कर, प्रिया-वीरू के झगड़े के बारे में कहूँ ? नहीं, नहीं वे दोनों तो शाम तक इसका समाधान कर लेंगे और वह फिर अनावश्यक चिंता में अपना बीपी बढ़ा लेगी। वह दवाई ले गई होगी ? वह क्यों मुझे कुछ कहती नहीं है ?” भोजन करने की इच्छा ही नहीं रही। वे तुरंत कपड़े बदलकर ऑफिस जाने के लिए तैयार हुए। दरवाजा लॉक करने के पहले घर में एक नजर घुमाई। यह घर अलका के कितने समाधान और कितनी पीड़ाओं को संग्रहित किए हुए है ?
कार चलाते समय इन्हें विचारों में दिमाग घूमता रहा। वे याद करने लगे, अंत में अलका ने कब उनसे मदद माँगी थी ? या कोई जरूरी काम उन्हें सौंपा था ? अरे ऑफिस से लौटते समय घर का कोई सामान ले आने के लिए कहा हो, ऐसा भी कभी नहीं हुआ। घर या बच्चों से संबंधित कोई जवाबदारी अलका ने मुझे सौंपी ही नहीं ? या मैंने कभी ली ही नहीं ? उसे जब मेरी जरुर पड़ी होगी, तब उसने क्या किया होगा ? अन्य किसी की मदद माँगी होगी या उस काम को ही छोड़ दिया होगा ? विराज-विराली की स्कूल, कॉलेज, दोनों की शादियाँ, ओह! कितने कार्यक्रम और घटनाएँ हैं, जिनमें अलका को मेरी जरूरत पड़ी होगी ! लेकिन मैं तो कहीं था ही नहीं ! लेकिन उसने कभी कोई शिकायत भी नहीं की ?” उनकी छाती सिकुड़ रही थी| अलका वापस आए, तब यह सब कहना था, कई प्रश्न पूछने थे।
दिमाग पर जब बहुत जोर दिया कि कभी तो ऐसा हुआ होगा कि जब अलका ने उनसे मदद माँगी होगी। याद ही नहीं आ रहा था। मानस-पटल पर वर्षों पहले की एक रात उभर आई, जब अलका ने आँख में आँसुओं के साथ, पस्त आवाज में कहा था,
“सुनो, वीरू-विली की सँभाल, घर के काम, इनमें मैं बहुत थक जाती हूँ। अम्माजी बिल्कुल मदद नहीं करती हैं और मदद नहीं भी करें, तब भी मुझे कुछ आपत्ति नहीं, लेकिन काम करते समय यदि जरा भी देर हो जाए, तो वह पूरा घर सिर पर उठा लेती हैं जोर-जोर से चाहे जो बोलने लगती हैं। उनके गुस्से से तो बच्चे भी डर जाते हैं। आप अम्माजी को कुछ समझाएँगे ?”
वे गुस्से से लाल हो गए थे, “अरे यार, मैं धंधे में ध्यान दूँ या घर में बैठकर औरतों की कलह को निपटाता रहूँ ? ऐसे छोटे-छोटे मामलों में मुझे हैरान मत करो। तुम अनपढ़ तो हो नहीं कि ऐसी मामूली-सी बातों में तुम्हें मेरी जरूरत पड़े। कुछ समझदार बनो, अपनी स्वयं की समस्याओं के लिए खुद समाधान ढूँढना सीखो। मेरे पास क्या कोई कम समस्याएँ हैं, जो तुम्हारे आगे-पीछे फिरता रहूँ ?” तब उन्हें अलका ने जो जवाब दिया था, उसने इस समय हथौड़ी की तरह दिमाग पर वार किया,
“मेरी भूल हो गई, जो मैंने आपसे मदद माँगी। अब मैं कभी आपको परेशान नहीं करूँगी| मेरी परेशानियों का समाधान मैं स्वयं ही ढूँढ लूँगी।”
उन्होंने विराज को फोन लगाया, “प्रिया की पार्टी शाम सात बजे है। पाँच बजे के पहले उसके मनपसंद रंग के रेडिमेड ब्लाउज के साथ डिजाइनर साड़ी ले कर घर पहुँच जाना।”
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मूळ गुजराती कथा – समाधान
मूळ लेखिका : डॉ. रुश्वी टेलर
संपर्क – झाड़ेश्वर, भरूच (गुजरात)
मो. 9979880080
हिंदी अनुवाद : श्री राजेन्द्र निगम
संपर्क – 10-11, श्री नारायण पैलेस सोसायटी, झायडस हॉस्पिटल रोड, थलतेज, अहमदाबाद- 380059.
मो. 9374978556
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी रचना बालकहानी – लिपि की कहानी।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३४ ☆
☆ बालकहानी – लिपि की कहानी ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
मुनिया की सुबह तबीयत खराब हो गई। उसने एक प्रार्थनापत्र लिखा। अपनी सहेली के साथ स्कूल भेज दिया। प्रार्थनापत्र में उसने जो लिखा था, उसकी अध्यापिका ने उस प्रार्थनापत्र को उसी रूप में समझ लिया। और मुनिया को स्कूल से छुट्टी मिल गई।
क्या आप बता सकते है कि मुनिया ने प्रार्थनापत्र किस लिपि में लिख कर पहुंचाया था। नहीं जानते हो ? उसने प्रार्थनापत्र देवनागरी लिपि में लिख कर भेजा था।
देवनागरी लिपि उसे कहते हैं, जिसे आप इस वक्त यहाँ पढ़ रहे है। इसी तरह अंग्रेजी अक्षरों के संकेतों के समूहों से मिल कर बने शब्दों को रोमन लिपि कहते हैं।
इस पर राजू ने जानना चाहा, “क्या शुरु से ही इस तरह की लिपियां प्रचलित थीं?”
तब उस की मम्मी ने बताया कि शुरु शुरु में ज्ञान की बातें एक दूसरे को सुना कर बताई जाती थीं। गुरुकुल में गुरु शिष्य को ज्ञान की बातें कंठस्थ करा दिया करते थे। इस तरह अनुभव और ज्ञान की बातें पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाती थीं।
मनुष्य निरंतर, विकास करता गया। इसी के साथ उस का अनुभव बढ़ता गया। तब ढेरों ज्ञान की बातें और अनुभव को सुरक्षित रखने की आवश्यकता महसूस हुई।
इसी आवश्यकता ने मनुष्य को प्रत्येक वस्तु के संकेत बनाने के लिए प्रेरित किया। तब प्रत्येक वस्तु को इंगित करने के लिए उस के संकेताक्षर या चिन्ह बनाए गए। इस तरह चित्रसंकेतों की लिपि का आविष्कार हुआ। इस लिपि को चित्रलिपि कहा गया।
आज भी विश्व में इस लिपि पर आधारित अनेक भाषाएं प्रचलित हैं। जापान और चीन की लिपि इसका प्रमुख उदाहरण है। शब्दाचित्रों पर आधारित ये लिपियों इसका श्रेष्ठ नमूना भी है।
चित्रलिपि का आशय यह है कि अपने विचारों को चित्र बना कर अभिव्यक्त किया जाए। मगर यह लिपि अपना कार्य सरल ढंग में नहीं कर पायी। क्यों कि एक तो यह लिपि सीखना कठिन था। दूसरा, इसे लिखने में बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। तीसरा, लिखने वाला जो बात कहना चाहता था, वह चित्रलिपि द्वारा वैसी की वैसी व्यक्त नहीं हो पाती थी। चौथा, प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आकर्षण का केंद्र नहीं थी। और यह दुरुह थी।
तब कुछ समय बाद प्रत्येक ध्वनियों के लिए एक एक शब्द संकेत बनाए गए। जिन्हें हम वर्णमाला में पढ़ते हैं। मसलन- क, ख, ग आदि। इन्हीं अक्षरों और मात्राओं के मेल से संकेत-चिन्ह बनने लगे। जो आज तक परिष्कृत हो रहे हैं।
हरेक वस्तु के लिए एक संकेत चिन्ह बनाए गए। विशेष संकेत चिन्ह विशेष चीजों के नाम बताते हैं। इस तरह प्रत्येक वस्तु के लिए एक शब्द संकेत तय किया गया। तब लिपि का आविष्कार हुआ।
इस तरह सब से पहले जो लिपि बनी, उसे ब्राह्मी लिपि के नाम से जाना जाता है। बाद में अन्य लिपियां इसी लिपि से विकसित होती गई।
ऐसे ही धीरे धीरे विकसित होते हुए आधुनिक लिपि बनी। जिसमें अनेक विशेषताएं हैं। प्रमुख विशेषता यह है कि इसे जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा भी जाता है। अर्थात् यह हमारे विचारों को वैसा ही व्यक्त करती है।
इनमें से बहुत सी लिपियों से हम परिचित हैं । ब्रिटेन में अंग्रेजी भाषा बोली जाती है। इस भाषा को रोमन लिपि में लिखते हैं। पंजाबी भाषा, गुरुमुखी लिपि में लिखी जाती है। इसी तरह तमिल, तेलगु, कन्नड़ तथा मलयालम आदि ब्राह्मी लिपि में लिखी जाती हैं।
अब यह भी जान लें कि विश्व की सबसे प्राचीन लिपियां निम्न हैं- ब्राह्मी, शारदा आदि।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – श्वेतपत्र
वर्ष बीता, गणना की हुई निर्धारित तारीखें बीतीं। पुराना कैलेंडर अवसान के मुहाने पर खड़े दीये की लौ-सा फड़फड़ाने लगा, उसकी जगह लेने नया कैलेंडर इठलाने लगा।
वर्ष के अंतिम दिन उन संकल्पों को याद करो जो वर्ष के पहले दिन लिए थे। याद आते हैं..? यदि हाँ तो उन संकल्पों की पूर्ति की दिशा में कितनी यात्रा हुई? यदि नहीं तो कैलेंडर तो बदलोगे पर बदल कर हासिल क्या कर लोगे?
मनुष्य का अधिकांश जीवन संकल्प लेने और उसे विस्मृत कर देने का श्वेतपत्र है।
वस्तुतः जीवन के लक्ष्यों को छोटे-छोटे उप-लक्ष्यों में बाँटना चाहिए। प्रतिदिन सुबह बिस्तर छोड़ने से पहले उस दिन का उप-लक्ष्य याद करो, पूर्ति की प्रक्रिया निर्धारित करो। रात को बिस्तर पर जाने से पहले उप-लक्ष्य पूर्ति का उत्सव मना सको तो दिन सफल है।
पर्वतारोही इसी तरह चरणबद्ध यात्रा कर बेसकैम्प से एवरेस्ट तक पहुँचते हैं।
शायर लिखता है- ‘शाम तक सुबह की नज़रों से उतर जाते हैं, इतने समझौतों पर जीते हैं कि मर जाते हैं।’
मरने से पहले वास्तविक जीना शुरू करना चाहिए। जब ऐसा होता है तो तारीखें, महीने, साल, कुल मिलाकर कैलेंडर ही बौना लगने लगता है और व्यक्ति का व्यक्तित्व सार्वकालिक होकर कालगणना से बड़ा हो जाता है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – श्रद्धा।)
पल्लवी क्यों ना हम लोग किटी पार्टी में हर महीने 50-50 रुपए सभी लोग इकट्ठा करें हमारे उसमें 12 मेंबर हैं और हर साल दिसंबर में उन पैसों से हम कम्बल खरीदें और किसी आश्रम या मंदिर में गरीबों को दान कर दें?
रोमा दीदी आप ठीक कह रहे हो पर क्या इसके लिए हमारे सारे सदस्य मानेंगे?
क्यों नहीं मानेंगे पल्लवी नेक काम करने में बुराई क्या है?
ठीक है दीदी आप जल्दी आ गई है, मैं थोड़ा सा नाश्ता तैयार कर लेती हूं तब तक सब महिलाएं आती है आप बात करके देख लो?
हिबा ने सभी महिलाओं से कहा कि हम सभी को जरूरतमंद की मदद करनी चाहिए?
ठीक है तो तुम करो ना मदद, हमसे क्यों मांग रही हो हर माह में हम 50-50 रुपए तुम्हारे पास क्यों जमा करें सभी महिलाओं ने एक सुर में कहा।
रीमा ने कहा – तुम लोग हमेशा मकर संक्रांति में तो एक दूसरे को उपहार देती हो सावन में हम भी एक दूसरे को उपहार देते हैं, तो क्यों ना ऐसा कुछ नेक काम भी करें।
बहन रीमा तुम्हें बहुत शौक है तो नेक काम तुम करो जीवन में हमारी बहुत उलझने हैं और हम सब अपने अनुसार दान करते हैं।
तुम्हें हमारा नेता बनकर राय देने की कोई जरूरत नहीं है?
आखिर हम सब लोग इधर-उधर घूमते फिरते हैं होटल में किटी पार्टी करते हैं कुछ लोग घर में भी कर लेते हैं इसलिए क्यों ना कुछ गरीबों को दान दें ।
तभी पल्लवी ने नाश्ता रखते हुए कहा कि रीमा दीदी आप अपने मन से दान करो ना हम सबको क्यों अपनी बात थोप रही हो।
नहीं नहीं पल्लवी हमारी छोटी सी बचत से किसी की जरूरतमंद का की मदद हो जाएगी।
दीदी आप आज की पार्टी का मजा क्यों खराब कर रही हो?
दीदी तुम बहुत अमीर है। जीजा जी शहर के मशहूर बिजनेसमैन है। घर में नौकर चाकर है होटल में पार्टी देती हो तुम्हारे लिए पैसों का कोई मोल नहीं है पर हम लोगों की स्थिति के बारे में तो सोचो।
सभी दान पूर्ण अपनी हैसियत के हिसाब से करते हैं।
भगवान ने सबको सोचने समझने की शक्ति का दिमाग दिया है सबको अपनी श्रद्धा से कार्य करने दो ना।
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – असली मालिक…!
☆ लघुकथा ☆ असली मालिक…!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
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माननीय महोदय सत्ता की कुरसी पर क्या विराजे कि अपने आपको मालिक मान बैठे, पर पुलिस और माननीय के बीच बड़ी देर तक चली लुका-छुपी के बाद आख़िरकार माननीय गिरफ्तार कर ही लिए गए।
अगली सुबह पुलिस माननीय को लेकर अदालत पहुँची और ‘माय लार्ड’ से अर्ज किया कि माननीय पर आरोप है कि इन्होंने सरकारी ख़ज़ाने का अपने हित में बेजा इस्तेमाल किया है। अतः कृपाकर माननीय पूछताछ के लिए हिरासत में रखने की अनुमति प्रदान की जाए। ‘माय लार्ड’ को मामला संगीन लगा और उन्होंने तत्काल कस्टडी प्रदान कर दी।
पुलिस पहले से ही माननीय पर ग़ुस्साए बैठी थी…! चूँकि उसको अपने विश्वसनीय और गुप्त स्रोतों से पता चल चुका था कि माननीय द्वारा डकैती की पूरी रकम डकारी जा चुकी है। अतः पुलिस के लिए माननीय के भेजे का ऑपरेशन कर उनके दिल में दफ़्न सारे राज उगलवाना ज़रूरी था।
माननीय पद और परिवार के मद में बुरी तरह अँधे हो चुके थे। वह इस सच्चाई को भूल बैठे थे कि समय सदा-सर्वदा किसी के लिए एक सा नहीं रहता है। वहीं वैसे भी, मौजूदा दौर टेक्नोलॉजी है। चोरी हो या फिर डकैती ज़्यादा समय के लिए राज़ को परदे में छुपाकर रखा जाना मुमकिन नहीं है।
चूँकि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। जिसमें सत्ता किसी के बाप की जागीर होती है, न इसमें कोई राजा-महाराजा होता है बल्कि जनता ही देश की असली मालिक होती है। उसको जब भी मौका मिलता है वह बड़े से बड़े पदाधिकारी को उसकी औक़ात दिखा देती है। जिसे वह सर-माथे पर बिठाती है, उसे समय आने पर कचरे की डस्टबीन के हवाले कर देती है।