हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “दुखवा में कासे कहूं ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “दुखवा में कासे कहूं?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

घर के निरीह बूढ़े प्राणी की अंतिम सांसें चल रही थीं पर उसके प्राण कुछ कहने के लिए तड़प रहे थे। आंखों की पुतलियां बेचैनी में बार बार धरती को, आसमान को ताके जा रही थीं। होंठ थे कि कुछ कहने के लिए खुलते पर फिर कसमसा कर बंद हो जाते थे।

परिवार के सभी छोटे बड़े सदस्य उनकी चारपाई के इर्द गिर्द घेरा डाले हुए खड़े थे। आखिर उनके प्यारे पोते से उनकी हालत देखी न गयी, आंसुओं से बाबा के पांव को नम करने के बाद, माथा टिकाते कहा- कहिए न बाबा। आप जो कहना चाहते हैं ताकि आपकी आत्मा को मुक्ति मिले।

बाबा ने कोशिश करके मुंदी आंखें खोलीं, फिर परिवारजनों को निहारा और धीमे सुर में कहना शुरू किया -मेरे बच्चो। मेरा जन्म उस पंजाब में हुआ, जिसमें अमृतसर और लाहौर एक दूसरे की ओर पीठ करके नहीं बैठते थे बल्कि एक दूसरे के गले मिलते थे,,, हाय,,, फिर इनका बिछुड़ना भी इन आंखों ने देखा। कैसे कहूं?

-कहिए न बाबा,,,

-मेरे बच्चो। मेरी जवानी उस पंजाब के खेतों को हरा भरा करने में निकल गयी जिसे इंसानी लहू से सोंचा क्या था। आह,,, कैसे कहूं,,, ? कैसा भयानक दौर आया। बंटवारे की धुंधली तस्वीर फिर सामने आ खड़ी हुई। और तुम मुझे पंजाब की अनजान धरती पर ले आए। अब,,,

-दुख कहो न बाबा,,,

-अब उस धरती पर अपने प्राण त्याग रहा हूं जहां मैंने न जन्म लिया, बचपन बिताया, न जवानी भोगी,,, तुम लोगों ने मेरा बुढ़ापा खराब कर दिया। हे भगवान्,,,, । कुछ और मंज़र दिखाने से पहले इस धरती से मुझे उठा ले,,, उठा ले,,,

इतना कहते कहते बाबा की गर्दन एक तरफ लुढ़क गयी,,, एक प्रश्नचिन्ह बनाती हुई,,,

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – पर्यावरण की हितेषी – जुगनू…  ☆ डॉ. सीमा शाहजी ☆

डॉ. सीमा शाहजी

(डॉ. सीमा शाहजी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत.  आप महारानी लक्ष्मीबाई कन्या महाविद्यालय इंदौर  में सहायक प्राध्यापक  अतिथि विद्वान हिंदी के पद पर कार्यरत हैं। रचना यात्रा – करीब डेढ़ दशक से विभिन्न विधाओं में लेखन एवम प्रकाशन।आकाशवाणी से प्रसारण ।कई संस्थाओं से सम्मानित। उल्लेखनीय-  आदिवासी संस्कृति व इस संस्कृति में महिलाओं की स्थिति पर आपने व्यापक अध्ययन। भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय द्वारा  सीनियर फ़ैलोशिप (2016-17) हेतु चयनित. “21 वीं सदी और आदिवासी महिलाओं के विकास की ओर बढ़ते कदम- सन्दर्भ- झाबुआ जिला मप्र”)

? लघुकथा – पर्यावरण की हितेषी – जुगनू…  ☆ डॉ. सीमा शाहजी  ? ?

?

मेरी प्रिय सहेली जुगनू. दूध सा गौरवर्ण. तराशे हुए नैन नक्श. अंडाकार मुख भंगिमा. सुराहीदार गर्दन. आकर्षण उड़ेलते नीले नीले नैन. सचमुच ही वो लावण्य से भरी पूरी थी. उसका विवाह स्थानीय था. मैं जब भी मायके जाती उससे मिलने जरुर जाती. मैंने जैसे ही उसके ड्राइंग रूम में कदम रखा. भव्यता सजावट बहुमूल्य थी. लेकिन मेरा ध्यान सोफे के नजदीक कोने में अटक गया. बैठक के कोने में एक बड़ा सा गोल पिंजरा रखा था. मैं पहले भी आई थी, तब मैंने ये पिंजरा नही देखा था.

जुगनू मेरे लिए स्पेशल चाय बनाने चली गयी. और मैं उस पिंजरे का मुआयना करने लगी. मैंने देखा चारों और जाली लगा पंछियों का नकली घर और उसमें देशी विदेशी तोतों का जमघट. कुल मिलाकर बीस तोते तो होंगे ही. जगह जगह छोटे छोटे पानी के सकोरे, मोटी मोटी लोहे की पट्टियां लगी थी. उन पर तोते अपनी भाषा में राम राम कर रहे थे. कुछ उड़ने का प्रयास कर जाली से टकराकर टकराकर थके जा रहे थे. कभी कोई छोटा तोता टूटे सकोरे पर बैठ कर लालमिर्च के टुकड़े कर आधा खाता आधा पिंजरें में गिरा देता. तो कोई तोता कुतर  कुतर कर टाइम पास कर रहा था जैसे, अवश होकर फड़फड़ाना मेरी वेदना के विचलन को बढ़ा गया. चाय आ गयी थी. बेमन से मैंने चाय पी. मेरा ध्यान उन हरे हरे तोतों, उनकी लाल लाल चोंच और उनकी आजादी के बारे में ही केन्द्रित था.

आखिर मुझसे रहा नही गया. और मैंने पूछ ही लिया, “जुगनू तुम तो बड़ी सामजिक कार्यकर्ता हो. पर्यावरण, मानव, पशु पक्षी सभी की आजादी की हामीदार. शहर में कितने ही सकोरों में पानी भरकर पेड़ों पर पंछियों के लिए लगवाती हो गर्मी में. मेरे इतना कहने पर वो गर्व से बोली, ”देखों ! पेड़ पोधों, पशु पक्षी और दु:खी मानव की रक्षा सहायता करना तो मेरे जीवन का उद्देश्य है. मैंने कहा, फिर तुमने इन तोतों को क्यों कैद कर रखा है? अरे छोड़ों प्रभा, यह मुझे मेरे पति अनीश ने मेरे विवाह की वर्षगांठ  पर दिया है. उन्हें ऐसे बंधन में बंधे फडफडाते हरे हरे तोते बहुत पसंद है. अब अगली वर्षगाँठ पर चिड़ियों का पिंजरा उपहार में देंगे. तू है ना, नाहक परेशान हो रही है. एक नौकर मैंने इन्ही के लिए रखा है. जो इन्हें नहलाता धुलाता, खाना खिलाता है. मैंने कहा, “ किसी की आजादी छिनना क्रूर कर्म है. अपराध के दायरे में आता है.

मेरी बात सुनकर वो चुप हो गई, मेरे विचार से तोतें के पिंजरे बनाम जुगनू के आलिशान घर के बंद दायरे समानांतर थे. जहाँ पिंजरें में पंछी कैद थे. वहीं जुगनू भी आजादी के दायरे में पति की बंधक ही तो थी. मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया था. पर्यावरण की हितेषी जुगनू के प्रति मोह भंग हो गया था.

थके कदमों से उसकी दहलीज पार की. मुझे लगा की दिखावटी पर्यावरण प्रेम की. . . . . कुंदक गुंजलक. . . . से मैं सुकून की आजाद जमीन पर खड़ी हूँ. जहाँ से मेरे घर का रास्ता सीधा है, सरल है. जहाँ पेड़ पोधों पर पंछी फुदकते है. आजादी के सरमाये में खुली साँस लेते है. चिड़ियों की ची. . ची. . तोतों की राम राम, भंवरों की गुनगुन और कबूतरों से की गुंटर गुं. . कितनी मिठास घोलकर हमें सुकून जिन्दादिली और आजादी से जीने का सबक देते रहते है. उन  आजाद पंछियों की आजादी के लिए मैं जुगनू को यह कहने का साहस जरुर करूंगी. कि किसी पंछी को गुलाम बनाकर उसकी आह से वाह लुटने का ढोंग ना करें.

© डॉ. सीमा शाहजी

सम्पर्क – 325 महा गांधी मार्ग थांदला (जिला झाबुआ, मप्र) पिन 457777. मो 7987678511, ईमेल seemashahji07@gmail. Com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सीसीटीवी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सीसीटीवी ? ?

शहर में लगे सीसीटीवी कैमरों से उसका धंधा लगभग चौपट हो चला था। मॉल, दुकानें, बंगले, सोसायटी कोई जगह नहीं छूटी थी जहाँ सीसीटीवी नहीं था। अनेक स्थानों पर तो उसी की तरह चोर कैमरा लगे थे। सब कुछ रेकॉर्ड हो जाता।

आज सीसीटीवी और चौकीदारों को मात देकर वह उच्चवर्ग वाली उस सोसायटी के एक फ्लैट में घुस ही गया। तिजोरी तलाशते वह एक कमरे में पहुँचा और सन्न रह गया। बिस्तर पर जर्जर काया लिए एक बुढ़िया पड़ी थी जो उसे ही टकटकी लगाये देख रही थी। बुढ़िया की देह ऐंठी जा रही थी, मुँह से बोल नहीं निकल रहे थे। शायद यह जीवन को विदा कहने का समय था।

क्षण भर के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ। फिर निश्चिंत होकर अपने काम में जुट गया। बहुत जल्दी नकदी और कुछ जेवर उसके हाथ में थे। एहतियातन उसने दो-तीन बार बुढ़िया को देखा भी। मानो कुछ कहना चाह रही हो या पानी मांग रही हो या परिजनों को जगाने की गुहार लगा रही हो। लौटते समय उसने अंतिम बार बुढ़िया की ओर देखा। देह ऐंठी हुई स्थिति में ज्यों की त्यों रुक गई थी, आँखें चौड़ी होकर शून्य ताक रही थीं।

वापस आते हुए भी उसे सीसीटीवी कैमरों से अपना बचाव करना पड़ा। खुश था कि बहुत माल मिला पर अजीब बेचैनी निरंतर महसूस होती रही। बुढ़िया की आँखें लगातार उसे अपनी देह से चिपकी महसूस होती रहीं। पहले टकटकी लगाए आँखें, फिर आतंक में डूबी आँखें, फिर कुछ अनुनय करती आँखें और अंत में मानो ब्रह्मांड निहारती आँखें।

अमूमन धंधे से लौटने के बाद वह गहरा सो जाता था। आज नींद कोसों दूर थी। बेचैनी से लगातार करवटें बदलता रहा वह। उतरती रही उसकी आँखों में सीसीटीवी कैमरों से बचने की उसकी जद्दोज़हद और बुढ़िया की आँखें। आँखें खोले तो वही दृश्य, बंद करे तो वही दृश्य। प्ले, रिप्ले…, रिप्ले, रिप्ले, रिप्ले। वह हाँफने लगा।

आज उसने जाना कि एक सीसीटीवी आदमी के भीतर भी होता है। कितना ही बच ले वह बाहरी कैमरों से, भीतर के कैमरा से खींची तस्वीर अमिट होती है। इसे डिलीट करने का विकल्प नहीं होता।

उसका हाँफना लगातार बढ़ रहा था और अब उसकी आँखें टकटकी बांधे शून्य को घूर रही थीं।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी (बुधवार 27 अगस्त) को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी (शनिवार 6 सितम्बर) तक चलेगी 🕉️

💥 साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः। इस मंत्र की कम से कम एक माला का संकल्प लेना होगा, साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८२ – स्वच्छता… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आपदा।)

☆ लघुकथा # ८२ – स्वच्छता श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

हमारे पड़ोस में तनु भाभी साफ-सफाई की बहुत करती हैं।

आज सुबह वह मुझसे कह रही थी कि – “प्रीति कोई साफ-सफाई ही नहीं करता ?”

“तुम मीरा को देखो उसके घर के सामने कितना कचरा पड़ा है, ये लोग कभी सफाई नहीं करते।”

“भाभी सब लोग आप जैसे नहीं होते हैं।”

कुछ देर बाद भाभी की सफाई खत्म होने के बाद मेरे घर के सामने पानी और साथ ही गेंदे के फूल और गुड़हल के फूल जो उन्होंने भगवान को चढ़ाए थे वह सब घर के सामने जमीन पर ही फेंक दिया।

मैंने सारा सामान एक डिब्बे में डाला औरउसका  एक पैकेट बनाया और उसे लेकर उनके घर गई और मैंने कहा- “भाभी, आपका कुछ सामान बाहर छूट गया था मैं उसे देने आई हूं।”

भाभी ने पैकेट खोला और मुझे देखती ही रही…।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २३९ – बप्पा जी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बप्पा जी ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २३९ ☆

🌻लघु कथा 🌻बप्पा जी 🌻

कालिंदी को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। चारों तरफ गणेश उत्सव की धूम मची थी। कालिंदी शहर के भीड़ भरी इलाके से पैदल चली जा रही थी। 12 दिन का समय दिया गया था उसे सभी प्रकार के कागजात समिट करने के लिए। पर कालिंदी कहाँ से लाएं??

अपने जन्म का सर्टिफिकेट और अपना सारा बायोडाटा माँ को तो पता ही नहीं था कि कालिंदी कब बड़ी हो गई।

समय और सहारा एक मात्र पास के शिव गणेश मंदिर का था। जहाँ से उसे पूर्ण संतुष्टि की भावना मिलती थी।

आज वह इस मंदिर पर टकटकी लगाये बैठी अपने भविष्य की भोर को घनी घटा से ढकते देखने लगी।

तेज आंधी तूफान के साथ बारिश। अचानक सर पर हाथ फेरते महसूस करते कालिंदी ने देखा– वहाँ माँ चुपचाप खड़ी है। सारे सवालों का जवाब देती कहने लगी – – – बाकी मैं नहीं जानती यह जगत के बप्पा पिताजी हैं। यही तुझे पाया है कालिंदी को समझते देर ना लगी। वह एक अनाथ है। जिसे बप्पा के मंदिर से उठाया गया था।

बाकी कुछ पूछने से पहले माँ ने आँचल से आंसू पोछते कहने लगी– कुछ वर्षों पहले मै भी इसी सवाल को लेकर आई थी।

आज माँ और बप्पा का आश्रय उसे स्वर्ग का महसूस हो रहा था। माँ तो बिन ब्याहे ही माँ का फर्ज उठा रही थी क्योंकि वह स्वयं भी बप्पा के आश्रय में पायी गई  थी।

काली घटा छटते ही मन में सोचने लगी समाज ने गणेश को बप्पा क्यों? कहा!!!

वह स्वयं भी अपनी माँ का नेतृत्व करेगी। कालिंदी को गणेश बप्पा के मातृत्व आदेश याद हो आया और चल पड़ी, अपनी मंजिल को पाने के लिए।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#७५ – हिस्से… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– हिस्से…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७५ — हिस्से — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

छोटा सा खरगोश आकाश में उड़ना चाहता था। बाज आकाश से यह देखने पर नीचे उतरा। उसकी हिंसक वृत्ति से अनजान खरगोश ने कहा — उसी से उसे आकाश में उड़ने की प्रेरणा मिली। बाज़ बोला — तुम धरती से हो, मैं आकाश से हूँ। जो जहाँ है उसकी धरती वहीं है, उसका आसमान वहीं है। बाद में समझ जाओगे मैंने क्या कहा था। बाज ने उसे समझ की उम्र तक पहुँचने के लिए जिंदा छोड़ा और पंख फैलाये आकाश में उड़ गया।

 © श्री रामदेव धुरंधर

30 / 08 / 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “स्वाभिमान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

लघुकथा – “स्वाभिमान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

सुबह सवेरे अखबार बांटने जब एक छोटा सा लड़का आने लगा तब मन में उत्सुकता जगी कि पूछ लूं कि पढ़ते लिखते क्यों नहीं? या पापा पढ़ाते क्यों नहीं? इस कंपकंपाती सर्दी में जब बच्चे रजाई से बाहर नहीं निकलते तब वह अखबार बांटने क्यों और किन मजबूरियों में आता है?

एक दिन जैसे ही वह अखबार फेंक कर जाने लगा तब मैंने रोक कर पूछा -रुकना, ऐ लड़के।

-कहिए।

-क्या स्कूल पढ़ने नहीं जाते?

-जाता हूं और नौवीं में पढ़ता हूं।

-फिर तुम्हारे पापा तुम्हें इस काम के लिए क्यों भेजते हैं?

-पापा बीमार हैं और मैं उनकी मदद करना चाहता हूं।

-कल सुबह मैं तुम्हें कुछ नोट बुक्स देना चाहता हूं।

-क्यों? मैं खुद कापियां किताबें ले सकता हूं , सर। जो नहीं ले सकते उन्हें दीजिए न।

इतना कह कर उसने साइकिल के पैडल पर पांव जमाया और अखबार बांटने चल दिया।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २१ – लघुकथा – मजबूरी की नींद ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २१ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ मज़बूरी की नींद ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

प्रीतम ने टिफिन को साहब के मेज पर रखा लेकिन स्वयं को खड़ा नहीं रख पाया। मेज को सहारा देते हुए आखिरकार वह उकुडू होकर जमीन पर बैठ गया ।

यह क्या प्रीतम! तुम्हारी तबीयत ठीक तो है न बेटा?

तुम्हें तो आज आराम करना चाहिए था… रजनीश जी ने  कहा।

प्रीतम कुछ भी जवाब नहीं दे पाया, उसने रजनीश जी की बात से अपनी सहमति जताते हुए  सिर हिला दिया, मानो वह कह रहा था कि..सर! सच में मेरी तबीयत आज बहुत खराब है।

वैसे इस समय बहुत तेज वायरल फैला हुआ है,.. तुम्हें आज नहीं आना चाहिए था।

अच्छा तुम अपना बारकोड दिखाओ। मैं कल के टिफिन का ऑनलाइन पेमेंट किये देता हूँ.. रजनीश ने कहा।

प्रीतम ने किसी तरह से जींस के जेब से मोबाइल निकाला और बारकोड खोलकर रजनीश जी के आगे कर दिया। उसके मोबाइल में कल वाले टिफिन का पेमेंट आ गया था ।

प्रीतम ने थम्भ का सिम्बल बनाते हुए कहा.. सर पेमेंट आ गया। तेज ज्वर के बीच हल्की सी सुकून भरी मुस्कान के साथ वह आफिस से बाहर निकल गया।

प्रीतम ने जिस दिन दस हजार रूपये प्रति माह – फिक्स वेतन वाली आउट सोर्स की नौकरी छोड़कर, टिफिन सप्लाई का छोटा सा बिजनेस खोला था, उस दिन उसके चेहरे की खुशी देखने लायक थी। उसका उत्साह परवान चढ़ रहा था। पैसे की तंगी के चलते वह स्वयं ही खाना बनाता था, साथ ही साथ स्वयं ही करीब 20-25 लोगों को विभिन्न ऑफिसेज में टिफिन सप्लाई करता था। उसका पूरा दिन खाना बनाने में और टिफिन सप्लाई करने में बीत जाता था।

ऑफिस बंद होने का वक्त हो गया था लेकिन अभी तक प्रीतम न तो पैसा लेने आया न ही खाली टिफिन उठाने आया था।

शायद आज उसके छोटे से व्यापार, थोड़ी सी खुशियाँ एवं तनिक से उत्साह तीनों के अवकाश का दिन था। वह बुखार से बुरी तरह तप रहा था और पेरासिटामोल की 650 एमजी की गोली खाकर मज़बूरी और चिंता की नींद सो रहा था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चातक ? ?

माना कि अच्छा लिखते हो। पर कुछ ज़माने को भी समझो। कोई हमेशा गंगाजल नहीं पी सकता। दुनियादारी सीखो।  कुछ मिर्च- मसालेवाला लिखा करो। नदी, नाला, पोखर, गढ्ढा जो मिले, उसमें उतर जाओ, अपनी प्यास बुझाओ। सूखा कंठ लिये कबतक जी सकोगे?

चातक कुल का हूँ मैं। पिऊँगा तो स्वाति नक्षत्र का पानी अन्यथा मेरी तृष्णा, मेरी नियति बनी रहेगी।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी (बुधवार 27 अगस्त) को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी (शनिवार 6 सितम्बर) तक चलेगी 🕉️

💥 साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः। इस मंत्र की कम से कम एक माला का संकल्प लेना होगा, साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बेटा तो है ना ! ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ बेटा तो है ना ! ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

शलभ– यार मृतका मिसेज माला का बेटा तो है ना !

प्रतीक– हां है तो —

शलभ–फिर उन्हें सबसे छोटी बेटी ने ही मुखाग्नि दी और कपाल क्रिया भी उसी ने की !

प्रतीक–शायद तुम कुछ भी नहीं जानते ।

शलभ– बरसों पहले ये लोग हमारे पड़ोसी हुआ करते थे। काफी अच्छे रिश्ते थे परिवार से। फिर बरसों बीत गये। मेरा ट्रान्सफर होता रहा — अब लौटकर इसी शहर में आ गया हूं। मुझे स्टाफ के एक सदस्य ने बताया जो उनका रिश्तेदार है। मालाजी के निधन का ऐसे पता चला।

प्रतीक– अब मुझसे सुनो— मालाजी तीसरे एक्सीडेंट के बाद जिन्दा लाश में तब्दील हो चुकी थीं। बेटे बहू ने  पाँच वर्ष तक खूब सेवा की। बेटा मलय पांच वर्ष तक बोलता था। फिर किसी बीमारी के बाद उसकी आवाज़ और सुनने की क्षमता भी चली गयी। उसने स्वयं गूँगा होने के कारण गूँगी लड़की से  ही शादी की।

शलभ—फिर

प्रतीक— फिर क्या! बहू भी पोस्ट ऑफिस में सर्विस करती थी। देखा नहीं  मालाजी की अंतिम यात्रा की तैयारी के समय बहू की मूक बधिर सहेलियां ही लगभग सारा काम संभाल रही थीं।

शलभ–सचमुच अत्यन्त करुण कथा है।

प्रतीक– आगे भी है शलभ। बेटे बहू ने  क्रिश्चियन धर्म स्वीकार कर लिया इस तकलीफ के साथ कि बरसों तक पूजा पाठ पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ करने के बाद भी  इस भगवान ने हमें क्या दिया–केवल जानलेवा दर्द।

शलभ की आँखों में अब किसी सवाल के लिए कोई जगह नहीं बची थी।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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