हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ८० – मंत्री द्वारे — द्वारे… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– मंत्री द्वारे — द्वारे…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ८० — मंत्री द्वारे — द्वारे — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

दादी को पता चला शिक्षा मंत्री शिवचरण गाँव में आया है। उसने नाती सुरेश से पूछा, “चुनाव आया है क्या नाती?” चुनाव आया तो था। मंत्री शिवचरण द्वार — द्वार जाने की प्रक्रिया में इस द्वार भी आता। दादी के इस तरह आश्चर्यकित होने का रहस्य वहाँ से था पाँच साल पहले शिवचरण जब यहाँ आया था दादी के पाँवों पर तो बस माथा पटकता था। उसने दादी से वचन लिया था, “मुझे ही वोट देना दादी।”

© श्री रामदेव धुरंधर

25 – 10 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “बासी धूप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “बासी धूप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

हम सभी साथी धूप में बैठे हुए थे। और दिनों की तरह लंच की छुट्टी में। हम हर रोज़ धूप में बैठते हैं। गप्पें हांकते हैं। मन बहलाते हैं। फिर सर्दियों की धूप भला किसे अच्छी नहीं लगती? मीठी धूप , प्यारी धूप , गर्माती हुई धूप , अपनी धूप और बराबर बंटती हुई धूप। आज भी एक गोल दायरे में कुर्सियां डाले हुए हम धूप सेंक रहे थे।

एकाएक चपरासी आया और बड़े साहब का संदेश सुना गया। यों यह संदेश न होकर हुक्म ही था -काला हुक्म। मानों बात न कह कर वह कोई बम फेंक गया हो। हम सभी के मध्य या उठाकर बीच सड़क में फेंक गया हो। निर्ममतापूर्वक किसी ट्रक तले। कुचलने के लिए।

बड़े साहब धूप सेंकना चाहते हैं। उन्होंने संदेश दिया है कि अपनी कुर्सियां यहां से हटा लें। कहीं और बैठ जायें। बड़े साहब धूप सेंकना चाहते हैं ,,,इसलिए हम कहीं और चले जायें। सभी दांतों में चबा चबा कर इसे दुहराते हुए कुर्सियां उठाने लगे थे। पर…धूप बराबर कहां बंट रही थी?

क्या मीठी धूप पर भी बड़े साहबों का ही हक है?

हम लोग बड़े साहबों द्वारा सेंकी जाने के बाद बची बासी धूप के ही हकदार हैं?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २८ – लघुकथा ☆ ~ लेखक की बेशकीमती संपत्ति ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २८ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ लेखक की बेशकीमती संपत्ति ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

लेखक की संपन्नता देखकर कुछ लोग उससे ईर्ष्या किया करते थे। वे लेखक की संपत्ति का आकलन कर पाने में स्वयं को अक्षम पाते थे।

लेखक के परिजन इस बात से बेखबर और मन ही मन निराश रहते थे कि लोग उसके पिता के किस संपत्ति की बात करते हैं। पिता नें मरने के काफी दिनों बाद तक लेखक के पुत्रों में यह चर्चा होती थी कि आखिर उसके पिता नें वह बहुमूल्य संपत्ति कहां छुपा रखी है जिसकी बात अक्सर आम लोगो में होती रहती है।

कुछ रहस्यमयी एवं गूढ चीजों की तलाश में विदेशी विद्वानो एवं राजनायिको का प्रतिनिधि मंडल लेखक के शहर में आया था।

लेखक के घर के चारों तरफ की सुरक्षा कड़ी कर दी गई। आला अधिकारियों आना-जाना शुरू हो गया। घर को पूरी तरह से सरकारी कब्जे में ले लिया गया। घर के सभी लोगों की सिक्योरिटी चेकिंग की जा चुकी थी। लेखक के परिजन अभी इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। इसी बीच उन्होंने किसी अधिकारी को यह कहते हुए सुना कि इस घर के लोगों के पिता के पास एक ऐसी बेशकीमती चीज है, जो शायद विश्व के किसे लेखक के घर या किसी लाइब्रेरी में नहीं है।

कुछ ही घंटे बाद गाड़ियों का काफिला लेखक के घर के सामने आकर रुका। मुश्किल से तीन या चार लोग लेखक के अध्ययनशाला में प्रवेश किये। जिसमें स्थानीय अधिकारी एवं कुछ विदेशी विद्वान थे। लेखक की अलमारी में रखी हुई एक पुस्तक से कुछ पंक्तियों के तस्वीर उतारते हुए, लेखक के घर पधारे प्रतिनिधियों नें लेखक के पुत्र -पुत्रियों से बड़े ही अदब के साथ भेंट की। साथ ही साथ कुछ बेशकीमती चीजे एवं उपहार भेंट करते हुए उनके साथ फोटो भी खिंचवाई।

अगले दिन यह खबर देश-विदेश के अखबार के पन्नों में थी कि अमुख बेशकीमती साहित्यिक दस्तावेज स्वर्गीय फलां (लेखक का नाम) के घर से प्राप्त किए गए। यह वैश्विक साहित्य जगत की बड़ी उपलब्धि है।

लेखक के परिजनों को अब अपनें स्वर्गीय लेखक पिता की वास्तविक संपन्नता का भान हो चुका था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – (१) देट साइड ऑफ़ स्क्रीन (२) दिया, बाती और तेल ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ (१) देट साइड ऑफ़ स्क्रीन (२) दिया, बाती और तेल ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

मराठी अनुवाद : सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे 👉 ☆ दोन अनुवादित कथा – (१) ‘स्क्रीनच्या अलीकडे.. पलिकडे‘ (२) ‘दिवे, वाती आणि तेल’

 

देट साइड ऑफ़ स्क्रीन ☆

अक्सर होता तो यही था कि जब भी कोई विशेष अवसर या त्यौहार होता तो सेवकराम जी और उनकी धर्मपत्नी अनुराधा जी अपने बच्चों के साथ विडियो कांफ्रेंस कॉल कर उस अवसर या त्यौहार का आनंद ले लेते थे. जन्मदिवस किसी का भी हो मोबाईल के सभी स्क्रीन्स पर एक-एक केक होता. एक साथ सभी केक काटे जाते और जन्मदिवस मनाया जाता.

इस बार दीपावली पर्व पर उनके बेटे का विदेश से विडियो कॉल आया. स्क्रीन के दूसरी ओर उनके बेटे बहू के साथ ही उनका आठ साल का बड़ा पोता और दूसरा पोता जो कुछ ही महीनों में दो साल का होने जा रहा था बड़ी उत्सुकता से दीपावली की पूजा देखने लगे. बड़ा पोता कुछ समझदार था और यह सब पहले भी देख चुका था, किन्तु, छोटे पोते को यह सब बड़ा विचित्र लग रहा था. सेवकराम जी ने उन सभी को घर के आसपास के रंगबिरंगी रोशनी से जगमगाते हुए परिदृश्य को दिखाया. छोटा पोता देव बड़े कौतुहल से यह सब देख रहा था. जैसे ही उन्होंने उसे फुलझड़ियाँ जलाते बच्चे और पड़ोस के लोगों को आतिशबाजी करते हुए दिखाया तो देव की आँखों में कौतुहलवश अद्भुत चमक दिखाई दी. वे अकस्मात ही देव से बोले – “Next year we all will celebrate Diwali in India.”

देव थोड़ी देर चुप रहा. फिर अत्यंत कौतुकता से दिवाली की रंगबिरंगी जगमगाती रोशनी और आतिशबाजी देखते हुए उनसे बोला – “No Grandpa.. I would like to come to that side of screen just now..”

वह स्क्रीन के इस ओर आने की जिद के साथ रोने लगा. सेवकराम-अनुराधा और बेटा-बहू असहाय एक दूसरे की ओर देखते रह गए और थोड़ी ही देर में विडियो कॉल कट गया.  

☆ दिया, बाती और तेल ☆

पुन्य सलिला नदी के तट, जिन्हें आज कल रिवर-फ्रंट कहते हैं, देखते ही बनते हैं. सेवकराम जी अक्सर प्रातःकाल पास के बगीचे में और कभी कभी शाम के समय उसी रिवर फ्रंट पर अपने समवयस्क वरिष्ठ नागरिक मित्रों के साथ टहलने चले जाया करते हैं.

नदी के तट अब पहले जैसे प्राकृतिक नहीं रह गए. सुन्दर हरे भरे तटों का स्थान अब सपाट पार्क / मैदान और कंक्रीट की चौड़ी सडकों ने ले लिया है. पुण्य सलिला नदी के तट के प्राचीन मंदिर से मुख्य सड़क तक तीर्थ यात्रियों/पर्यटकों के लिए वाणिज्यिक कॉरिडोर बन गया था. मंदिर के सामने नदी के तट की सीढ़ियों पर अब संध्या की विशाल आरती होने लगी थी.

समय के साथ हो रहे परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए ऐसा सभी का मानना है.

प्रतिदिन प्रातः और संध्या वेला में दिया बाती लगभग सभी घरों में एक अध्यात्मिक एवं सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है. नदी के दोनों ओर बसे घर-मंदिरों के दीपक और कृत्रिम तथा आधुनिक विद्युत् प्रकाश से जगमगाने लगते हैं. नदी के तट पर बैठ कर नदी की लहरों पर इस झिलमिलाते हुए प्रकाश को देखने का अपना ही आनंद है.

सोशल मीडिया और स्थानीय समाचार पत्रों के माध्यम से पता चला कि इस बार रिवर-फ्रंट पर लाखों की संख्या में दीप जलाकर विश्व रिकॉर्ड बनाने की तैयारियां चल रही है. हरिलाल भाई काफी जिद कर रहे थे कि हमें इस वेला का साक्षी बनने का अवसर हाथ से नहीं छोड़ना चाहिए. रात्रि दस से ग्यारह बजे के मध्य इस कार्यक्रम को संपन्न होना था और तब तक लोग घर की पूजा भी संपन्न कर ही लेते हैं.

तय समय पर हरिलाल भाई और सेवकराम जी नदी तट पर पहुँच गये. सुरक्षा व्यवस्था काफी चाक-चौबंद थी. काफी भीड़ थी. कई लोग स्वेच्छा से अपनी सेवायें दे रहे थे. छोटे छोटे समूह में आयोजकों ने दीपकों को सजाकर रखा था. तय समय पर दीप प्रज्वलित किये गए. साथ ही आकाश में ड्रोन कैमरे प्रकट हो गए. उन्होंने उन लाखों दीपकों के विभिन्न कोणों से विडियो और चित्र लिए और थोड़ी ही देर में विश्व रिकॉर्ड बनने की घोषणा की गई. इसी के साथ ही जयघोष प्रारंभ हो गया और कार्यक्रम के संपन्न होने की घोषणा भी हो गई.

हरिलाल भाई और सेवकराम जी ने भी आपस में एक दूसरे को इस क्षण के साक्षी होने के लिए बधाई दी. वे वापिस जाने के लिए दीपकों के समूह के बीच से जाने को तत्पर हुए तो वहां का दृश्य देख कर सन्न रह गए.

समय के साथ ही दीपक बुझने लग गए थे और तट की सुरक्षा व्यवस्था के हटते ही कुछ नर नारियों और बच्चो का हुजूम दीपकों पर टूट पड़ा. वे अपने साथ लाए गए पोलिथीन की थैलियों में दीयों का तेल उड़ेल रहे थे.

सेवकराम जी और हरिलाल भाई एक दूसरे को हतप्रभ देखने लगे.

विश्व रिकॉर्ड बन चुका था. पॉलिथीन की थैलियों में दीयों का तेल भरने वाले नर नारियों बच्चों को विश्व रिकॉर्ड से कोई लेना देना नहीं था. शायद इस तेल से उनके घरों में कुछ दिनों का खाना बन जायेगा. आसपास का उमंग भरा वातावरण शोरगुल में खो चुका था और ड्रोन विडियो और चित्र लेकर अपने कैमरामेन की ओर वापिस जा रहे थे.

©  हेमन्त बावनकर  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ नई सुबह ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

जगत सिंह बिष्ट

(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)

☆ कथा कहानी ☆ नई सुबह ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

भोर की पहली किरण धरती पर उतर रही थी। हवा में ठंडक थी और खेतों पर ओस की बूँदें चमक रही थीं। टोपी और छड़ी लिए गांव के बुजुर्ग धनीराम अपनी रोज़ की सैर पर निकले थे। रास्ते के किनारे अचानक उन्होंने देखा—एक युवक मिट्टी पर औंधा पड़ा है। उसके पास एक भूरा, दुबला कुत्ता चौकन्ना बैठा था, जैसे उसकी रखवाली कर रहा हो।

 

सूरज की किरण जब युवक के चेहरे पर पड़ी, तो कुत्ते ने उसकी नाक के पास सूंघकर एक गरम बौछार छोड़ दी। युवक कराहा, होंठ खुले, कुछ बूंदें भीतर चली गईं। उसने बड़बड़ाया—“और डालो रे, एक और पैग!”

 

धनीराम ठिठक गए। पास जाकर देखा—यह तो पारगांव का पंकज है! अच्छे किसान परिवार का लड़का, पर हाल के दिनों में बुरी संगत में पड़ गया था। उन्होंने छड़ी से कुत्ते को हलका इशारा किया और बोले—

“उठ भुला, घर जा। तेरी ईजा तेरे लिए रातभर जाग रही होगी।”

पंकज ने आंखें मलते हुए चारों ओर देखा। सिर भारी था, मुंह कसैला। कल रात के नशे और दोस्तों की हंसी-मजाक की धुंधली यादें दिमाग में तैर गईं। वह धीरे-धीरे उठा, लड़खड़ाते कदमों से घर की ओर बढ़ा। कुत्ता उसके पीछे-पीछे चला।

 

घर पहुंचा तो मां मवेशियों को चारा डाल रही थी। आंगन में चिड़ियां चहचहा रही थीं। पंकज चुपचाप दहलीज पर बैठ गया। सिर झुका हुआ, चेहरा अपराधबोध से भरा। कुत्ता उसके पैरों के पास बैठा पूंछ हिलाने लगा।

मां ने देखा, पर कुछ नहीं कहा। न ताना, न डांट। बस थाली में दो रोटियां रख दीं। वही मौन, वही करुणा—जिसकी आवाज़ शब्दों से कहीं अधिक गहरी होती है।

पंकज ने एक रोटी का टुकड़ा तोड़कर कुत्ते के आगे डाल दिया, फिर बोला—

“चल साथी, खेत चलते हैं।”

 

दिनभर खेत में वही रहा। धान की बालियां हवा में झूम रही थीं, जैसे प्रभात की प्रार्थना कर रही हों। पसीना बहता गया, और हर बूंद के साथ भीतर की गंदगी भी धुलती गई।

दोपहर में दाल-चावल खाया, और उसी कटोरे में कुत्ते को दूध में चावल मिलाकर दिया। दोनों ने साथ भोजन किया।

शाम को जब घर लौटा, तो मां शांत थी। दीपक की लौ स्थिर थी।

पंकज ने उस मौन में वह पुकार सुनी, जो किसी प्रवचन में नहीं मिलती—मां की मूक क्षमा की पुकार।

 

रात हुई। पंकज के भीतर फिर बेचैनी उठी। दरवाजे की ओर बढ़ा ही था कि कुत्ता उछलकर उसकी पैंट पकड़ लेता है—बिना भौंके, बिना गुर्राए, बस रोकता है।

उसकी आंखों में जैसे लिखा था—“अब नहीं, बस अब लौट चल।”

 

पंकज ठिठक गया। मां का चेहरा आंखों के आगे घूम गया।

वह लौट आया, चुपचाप थाली में बैठा, खाना खाया और कुछ कौर कुत्ते को दिए।

रात गहरी थी, पर मन में एक अजीब-सी शांति थी।

 

सुबह पक्षियों की मधुर बोली ने उसे जगाया। सूरज की किरणें कमरे में उतर आई थीं। उसने शुद्ध जल से मुंह धोया, कुल्ला किया, आंखों में बूंदें डालीं।

तभी मां की आवाज़ आई—

“बेटा, बछिया को घास डाल दे, दूध दुहने का समय हो गया।”

 

पंकज मुस्कुराया—वह मुस्कान जो भीतर से आती है।

उसने कुत्ते के सिर पर हाथ फेरा और बोला—

“चल साथी, आज सच में नई सुबह है।”

 

दोनों खेत की ओर चले—एक प्राणी, जिसने अपने मालिक को जगाया; और एक मनुष्य, जिसने खुद को पाया।

गांव की गलियों में रोशनी फैल चुकी थी।

 

©  जगत सिंह बिष्ट

इंदौर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८७ – जीवन जीने की दिशा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन जीने की दिशा।)

☆ लघुकथा # ८७ – जीवन जीने की दिशा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“क्या अम्मा हमेशा सब्जी बेचने टोकनी उठा कर आ जाती हो? कभी आराम नहीं करती? कोई तिथि त्यौहार नहीं मानती हो क्या?? रागिनी ने कहा।

बूढी अम्मा कमला ने मुस्कुराते हुए कहा – “बेटा यदि त्यौहार मनाने लगे तो हम खाएंगे क्या? हमारे लिए तो क्या त्यौहार और क्या सब दिन एक बराबर ही है बेटा, आप जैसे लोग कुछ खरीद लेते हो तो हमारा त्यौहार मान जाता है, मेरा छोड़ो बेटा यह बताओ तुमने इस त्यौहार में क्या मनाया? थोड़ा पानी पिला दो एक तुम ही हो जो थोड़ा चाय और पानी पिला देती हो।”

“अम्मा तुम्हारे बहाने मेरा भी कुछ समय तो कट जाता है वरना बच्चे और पति दिनभर बाहर निकल जाते हैं सब शाम को आते हैं तुम्हारे साथ थोड़ी देर बैठकर मैं भी अपने घर के कामों से आराम कर लेती हूं।”

“पितृ पक्ष आ रहे हैं श्राद्ध में क्या तुमने दाल की पूरी बनाई है?”

“अम्मा बना तो लूं पूरी और सारा पकवान पर कोई स्वाद से खाता नहीं है यह सब चीज मुझे तो बहुत पसंद है पर किसी को पसंद नहीं आती इसलिए बनाने का मन नहीं करता।”

चाय पीते हुए बुढ़िया मां कमला कुछ गहरी चिंता में खो गई।

“अम्मा क्या हुआ?” रागिनी ने कहा।

“कुछ नहीं बेटा जब मेरे पति जिंदा थे वह एक फैक्ट्री में नौकरी करते थे, बहुत खुश थी बच्चों को पढ़ाया लिखाया लेकिन अब वही बच्चे नौकरी करने लग गए और मुझे पराया कर दिया। पति की थोड़ी पेंशन मिलती है जिससे घर का किराया भर देती हूं और सब्जी बेचने से मेरा समय कट जाता है।”

“आपकी तरह पढ़ी-लिखी नहीं हूं बेटा बचपन में ही मेरी शादी हो गई थी बस घर गृहस्थी ही सीखा है लेकिन अब यह टोकरी उठाकर कहीं जाया नहीं जाता यदि एक दो घर में खाना बनाने का काम मिल जाए तो तुम मुझे बता देना।”

“ठीक है अम्मा मेरी पड़ोस में जो भाभी रहती है वह नौकरी करती है वह कई एक खाना बनाने वाली को ढूंढ रही थी।”

“आप रुको दाल पुरी की तैयारी करती हूं और साथ ही बच्चों की पसंद का नाश्ता भी बना दूंगी क्या आप मेरी मदद करोगी?”

“क्यों नहीं बेटा?”

“बच्चों और पति के लिए बड़ी प्रेम पूर्वक में खाना बनाती थी सब कहते हैं  मेरे हाथों में बहुत स्वाद है। जा बेटा तू आराम कर और यह अपना कोई और काम कर ले आज का खाना तेरी रसोई में ही बना कर रख देती हूं” और कमला मां उसे बड़े प्यार से खाना परोसने लग गई।

“मां के बाद आज पहली बार आपने गरम-गरम खाना बना कर खिलाया। मां को गए तो बरसों हो गए मायके में भी कभी यह सुख नहीं मिला।”

“कोई बात नहीं बेटा।”

“पर अम्मा आपने इतना काम किया मैंने आपसे सब्जी भी नहीं खरीदी कुछ सब्जियां तो ले लेती हूं।”

“नहीं नहीं बेटा आज मुझे एक बेटी मिल गई है इसी तरह मैं दोपहर में आया करूंगी और तुम मुझे कोई काम बता दिया करना।” 

दोनों के चेहरे पर एक विजय मुस्कान सी थी जैसे लग रहा था कि दोनों को जीवन जीने की एक दिशा मिल गई है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ – महालक्ष्मी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा महालक्ष्मी”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ ☆

🌻लघु कथा🌻 🛕महालक्ष्मी 🛕

पेशे से इंजीनियर राहुल, पर सारा गुणांक उसकी पत्नी करती थी। आज माँ फिर से दिपावली पर पूरे घर की साफ सफाई कर घर की लक्ष्मी (बहु) आने का इंतजार कर रही थी।

छोटा बेटा अपनी माँ का पूरा ध्यान रखता, पर हाय रे विदेश में रहने वाले बेटा बहु!!

पेंशन में जितना मिलता घर का खर्च चलता। माँ ने खुश होकर साड़ी सुहाग का समान बहु के आने पर उपहार स्वरूप देने लगी।

अरे मम्मी जी – – माना कि आपके पास नही है। पर दे ही रही तो चाँदी के सिक्के देती तो कुछ काम आता।

ये मेरे किस काम के – – सामने खड़ी घर में काम करती बाई को देते फोन पर काल करने लगी।

छोटा बेटा दिये लगा रहा था। मुझे तो महालक्ष्मी ही सर्वोपरि है। बेटे के सिर पर हाथ फेरती माँ बोल उठी मुझे भी दीपक का उजाला आज दिखाई दिया है।

दोनों एक दूसरे की बात समझ। पूजन की तैयारी करने लगे।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ७९ – प्रकृति… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– प्रकृति…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७९ — प्रकृति — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

संसार के एक किनारे में एक विशाल रेगिस्तान पानी में डूब रहा था। प्रश्न पैदा हुआ जो रेगिस्तान पानी के लिए हमेशा तरसा कैसे हुआ कि उसके डूबने के लिए इतना पानी निकल आया? इस प्रश्न का उत्तर तत्काल न मिल कर बहुत बाद में मिला। इस तरह के प्रश्नों के उत्तर बाद में ही मिलते हैं। संसार के दूसरे किनारे में बहुत विशाल पानी था। वैसे विशाल पानी को चीर कर उससे भी बड़ा एक रेगिस्तान उभर रहा था।

© श्री रामदेव धुरंधर

16 – 10 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “पहचान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “पहचान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

कंडक्टर टिकट काट कर सुख की सांस लेता अपनी सीट तक लौटा तो हैरान रह गया। वहां एक आदमी पूरी शान से जमा हुआ था। कोई विनती का भाव नहीं। कोई कृतज्ञता नहीं। आंखों में उसकी खिल्ली उड़ाने जैसा भाव था।

कंडक्टर ने शुरू से आखिर तक मुआयना किया। कोई सीट खाली नहीं थी। बस ठसाठस भरी थी। वह टिकट काटते अब तक दम लेने के मूड में आ चुका था।

-जरा सरकिए..

उसने शान से जमे आदमी से कहा।

-क्यों?

-मुझे बैठना है।

-किसी और के साथ बैठो। मैं क्यों सिकुड़ सिमट कर तंग होता फिरुं?

-कृपया आप सरकने की बजाय खड़े हो जाइए सीट से। कंडक्टर ने सख्ती से कहा।

जमा हुआ आदमी थोड़ा सकपकाया, फिर संभलते हुए क्यों उछाल दिया।

-क्योंकि यह सीट मेरी है।

-कहां लिखा है?

जमे हुए आदमी ने गुस्से में भर कर कहा।

-हुजूर, आपकी पीठ पीछे लिखा है। पढ़ लें।

सचमुच जमे हुए आदमी ने देखा, वहां साफ साफ लिखा था। अब उसने जमे रहने का दूसरा तरीका अपनाया। बजाय उठ कर खड़े होने के डांटते हुए बोला-मुझे पहचानते हो मैं कौन हूं? लाओ कम्पलेंट बुक। तुम्हारे अभद्र व्यवहार की शिकायत करुं।

-वाह। तू होगा कोई सडा अफसर और क्या? तभी न रौब गालिब कर रहा है कि मुझे पहचानो कौन हूं मैं। बता आज तक कोई मजदूर किसान भी इस मुल्क में इतने रौब से अपनी पहचान पूछता बताता है? चल, उठ खड़ा हो जा और कंडक्टर की सीट खाली कर। बड़ा आया पहचान बताने वाला। कम्पलेंट बुक मांगने वाला। कम्पलेंट बुक का पता है, कंडक्टर सीट का पता नहीं तेरे को?

उसने बांह पकड़ कर उसे खड़ा कर दिया। अफसर अपनी पहचान बताये बगैर खिड़की से लटक कर रह गया!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६७ – लघुकथा – चुप्पी का काला साया ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा – चुप्पी का काला साया।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६७ – लघुकथा  – चुप्पी का काला साया ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कल्पना कीजिए एक ऐसे शहर को जहां हवाएं भी फुसफुसाती हैं, वहां रहता था विशाल नामक एक साधारण क्लर्क, जो दफ्तर की फाइलों में छिपे भ्रष्टाचार की परतें उघाड़ता था, हर रिपोर्ट में वह लिखता ‘यह लूट है, जनता की कमर टूट रही है’, लेकिन एक शाम, जब सूरज डूब रहा था, अचानक काले कोट वाले लोग आए और उसे घसीट ले गए, आरोप था ‘गोपनीय दस्तावेजों का दुरुपयोग कर सिस्टम को बदनाम करना’, अब विशाल उस ठंडी कोठरी में है जहां दीवारें कान लगाकर सुनती हैं, बाहर उसके सहकर्मी चुपचाप काम कर रहे हैं, डर से कि कहीं उनकी बारी न आ जाए, जबकि ऊपर वाले अधिकारी पार्टियां मना रहे हैं, व्यंग्य की धार यह कि जो ईमानदारी की मशाल जलाता है वही अंधेरे में फेंक दिया जाता है, जैसे कोई पुराना कागज कूड़ेदान में, विशाल की यादें अब उसके मन में घूमती हैं, बचपन की वे गलियां जहां वह सपने बुनता था एक बेहतर दुनिया के, लेकिन अब वे सपने सलाखों से टकराकर टूट रहे हैं, उसकी बूढ़ी मां घर के कोने में बैठी रोती है, हर दरवाजे पर दस्तक देती है न्याय की गुहार लगाते, लेकिन मिलते हैं सिर्फ खाली वादे और ठंडे जवाब, सिस्टम की यह ठंडी क्रूरता ऐसी है कि इंसान को धीरे-धीरे खोखला कर देती है, जैसे कोई जहर जो नसों में घुलता जाता है, विशाल की डायरी में आखिरी पन्ना खाली है, शायद वह लिखना चाहता था ‘मैं हार नहीं मानूंगा’, लेकिन हाथ कांपते हैं, आंखें धुंधली, और एक रात जब चांद छिप जाता है, विशाल की सांसें थम जाती हैं, वह अंतिम पल जहां वह फुसफुसाता है ‘क्यों?’, वह करुण फुसफुसाहट पूरे शहर की चुप्पी बन जाती है, एक ऐसी पीड़ा जो सीने को चीरती हुई निकलती है। विशाल की मौत के बाद उसके सहकर्मी चुप रहते हैं, मां की आंखें सूख जाती हैं आंसुओं से, और सिस्टम चलता रहता है अपनी रफ्तार से, लेकिन वह खालीपन, वह साया कभी नहीं मिटता, बस फैलता जाता है दिलों में, एक दर्द जो चीखता नहीं बल्कि सिसकता है।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares