हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – आत्म-बोध ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा आत्म-बोध

☆ लघुकथा – आत्म-बोध ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त और ऐश्वर्यवान प्रसन्ना के जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि एक दिन अचानक उसके जीवन से शांति ग़ायब हो गई। उसकी अच्छी-ख़ासी ज़िंदगी में उथल-पुथल मच गई। वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर शांति उसे बिना बताए कहाँ छोड़कर चली गई है। आज के माहौल को देखते हुए बार-बार उसके मन में यह संदेह पैदा हो रहा था कि कहीं किसी दुष्ट-दुर्जन ने उसका अपहरण तो नहीं कर लिया है।

प्रसन्ना ने थाने में जाकर शांति के ग़ायब हो जाने की रपट लिखवाई। पर जैसाकि आमतौर पर होता है पुलिस ने  उसको ढाढ़स बँधाते हुए आश्वस्त किया कि हम अपनी ओर से शांति को खोजने का भरसक प्रयास करेंगे और जैसे ही कहीं से कोई सूचना मिलेगी श्रीमान को सूचित कर दिया जाएगा। दूसरी ओर प्रसन्ना ने अपनी ओर से जान-पहचान वालों और नाते रिश्तेदारों को फ़ोन कर शांति के बारे में पूछताछ की, अख़बारों में शांति के ग़ायब हो जाने के इश्तहार छपवाए, पर शांति का कहीं कोई सुराग नहीं मिला। उधर साल भर बीत जाने के बाद भी पुलिस की ओर से कोई सूचना नहीं मिली।

आखिर एक दिन थक-हारकर प्रसन्ना ने ईश्वर के समक्ष अपनी ओर से शांति की खोज के तमाम हथियार डाल दिए। उसी रात प्रसन्ना के सपने में शांति प्रकट हुई और उससे बोली- ‘मेरे प्रिय प्रसन्ना ! मेरा ना तो किसी ने अपहरण किया था और न ही मैं तुम्हें कहीं छोड़कर गई थी। पर जब मैंने देखा कि तुम मुझे और अपने बच्चों को छोड़कर अपने नाम, व्यवसाय, प्रसिद्धि और धन-दौलत को प्यार करने लगे, बात-बात पर मुझे अपमानित और उपेक्षित करने लगे, तो दरअसल तुम्हारे भीतर आत्मबोध जाग्रत हो इसलिए कुछ समय के लिए तुमको अकेला छोड़कर अंतर्ध्यान हो गई थी ताकि तुम्हें इस बात का अहसास हो सके कि जीवन में धन-दौलत अहम है अथवा अपने आत्मीय और सुख-शांति…!

प्रसन्ना मैं चाहती हूँ कि तुम सदैव प्रसन्न रहो। तुम कल भी मेरे आत्मीय थे, आज भी हो और आगे भी रहोगे। मैं अनादि काल से तुम्हारे ह्रदय में मौजूद हूँ। वो तो एक तुम ही थे, जो मुझे विस्मृत कर बैठे थे।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “बचपन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “बचपन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मेरे छोटे भाई के बेटे का जन्मदिन था । इसलिए ऑफिस से जल्दी छुट्टी लेकर आया । घर के अंदर खूब रौनक और,खुशी के माहौल । बाहर क्या देखता हूं हमारी कामवाली का छोटा सा बेटा बर्तन मांज रहा है और रोते रोते मां से कह रहा है -मुझे भी केक दिलवाओ । मुझे भी जन्मदिन मनाने है । मां बेबस । झांक रही अपने अंदर । मैं सोच रहा हूं कि जन्मदिन किसका मनाऊं ?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 153 ☆ लघुकथा – थाप ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा थाप। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 154 ☆

☆ लघुकथा – थाप ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

दिन-भर मशीन की मानिंद वह एक के बाद एक, घर के काम निबटाती जा रही थी। उसका चेहरा भावहीन दिख रहा था। बातचीत भले ही कर रही थी लेकिन स्वभाव में कुछ उदासी थी। मन ही मन वह झुँझला भी रही थी। छोटे भाई की शादी थी। घर में हँसी मजाक का माहौल था। किन्तु उसमें वह शामिल नहीं हो रही थी। वह शायद वहाँ पर रहना भी नहीं चाह रही थी।

“कुमुद ऐसी तो नहीं थी, क्या हो गया इसे?” उसकी उम्र ढ़ली अविवाहित बड़ी बहन से मैंने पूछा।

“अरे कोई बात नहीं, थोड़ी मूडी है।” कहकर उसने भी बात टाल दी।

मुझे खटक रहा था कि शादी लायक दो बड़ी बहनों के रहते, छोटे भाई की शादी की जा रही है? लड़कियाँ खुद ही शादी करना ना चाहें, सो अलग बात है लेकिन जानते-बूझते उनकी उपेक्षा करना सही नहीं है।

“खैर छोड़ो, दूसरे के फटे में पैर क्यों अड़ाना !”

शादी के घर में रिश्तेदारों का जमावड़ा था। महिला संगीत चल रहा था। साथ में स्त्रियों की शोख अदाएँ और फुसफुसाहट भी जारी थी। किसी एक ने कहा–“बिनब्याही जवान दो बहनें घर बैठी हैं और कई साल छोटे भाई की शादी की जा रही है?” दूसरी बोली–“बड़ी तो अधेड़ दिखने लगी है। कुमुद के लिए भी नहीं सोचा जा रहा।” ढ़ोलक की थाप पर नाच-गाना तो चल ही रहा था, निंदारस भी खुलकर बरस रहा था।

“अरे कुमुद ! अबकी तू उठ, बहुत दिनों से तेरा नाच नहीं देखा। ससुराल जाने के लिए थोड़ी प्रैक्टिस कर ले।” बुआ ने हँसी में व्यंग्य बाण छोड़ दिया–“अब कुमुद के लिए भी लड़का देख लो, नहीं तो यह भी कोमल की तरह बुढ़ा जाएगी। फिर कोई दूल्हा इसे नहीं मिलेगा।” ढ़ोलक की थाप थम गई। बात हिय में चटाख से लगी।

नाचने के लिए उठे कुमुद के कदम, वहीं थम गए। लेकिन चेहरा खिल गया–“किसी ने तो दिल की बात कही। फिर वह उठी और दिल खोलकर नाचने लगी।

कुमुद की माँ ननद रानी से उलझ गई–“बहन जी ! आपको रायता फैलाने की क्या जरूरत है। सबके सामने ये बातें छेड़कर। इत्ता दान-दहेज कहाँ से लाएँ? दो-दो लड़कियों के हाथ पीले करना, कोई आसान है? ऐरे-गैरों के घर जाकर किसी दूसरे की जी-हुजूरी करने से तो अच्छा है, अपने छोटे भाई का परिवार ही पालें। छोटे को सहारा भी रहेगा? उसकी नौकरी भी पक्की नहीं है। कोमल तो समझ गई लेकिन कुमुद के दिमाग से शादी का फितूर उतर नहीं रहा। खैर…जाने दो !”

ढ़ोलक की थाप, सुर में गाती औरतों की आवाजें और तालियों के बीच, इन बातों से अनजान कुमुद मगन-मन नाच रही थी।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सर्व धर्म प्रार्थना ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सर्व धर्म प्रार्थना ? ?

सर्व धर्म प्रार्थना का एक अनूठा आयोजन एक दुर्गम ग्लेशियर के निकट रखा गया था। विभिन्न‌ धर्मों के देश-विदेश में बसे  चुनिंदा अनुयायियों को इसमें सम्मिलित किया गया था। इन यात्रियों का दल दुर्गम हिमनद की ओर बढ़ रहा था। एकाएक हिम की सतह दरक गई और खाईनुमा गहरा गढ्ढा बन गया। दल गढ्ढे में गिर पड़ा।

हाहाकार मच गया। फिर कुछ समय के लिए यात्रियों के गढ्ढे में गिरने पर चर्चा चली। तत्पश्चात पर्वतारोहियों में हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख, पारसी, यहूदी, बौद्ध, जैन, ताओ, शिंटो, कन्फ्यूशियिस्ट गिने जाने  लगे।

फिर भी मन ना भरा तो विभिन्न धर्मों के यात्रियों के संप्रदाय, जातिगत वर्ग गिने जाने लगे। कुछ ने सवर्ण, दलित, अगड़ा, पिछड़ा, आदिवासी की माइक्रो काउंटिंग शुरू की तो कुछ ने मूल निवासी, आक्रमणकारी, आर्य-अनार्य की गणना भी कर डाली।

अपनी-अपनी जगह बैठे लोग मनुष्य और मनुष्य के बीच की खाई को चौड़ा करते रहे। उधर खाई में पड़े पर्वतारोहियों ने मानव शृंखला बनाई, एक दूसरे का हाथ पकड़ा और बाहर निकल आए।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  गोविन्द साधना शुक्रवार 15 अगस्त से गुरुवार 21 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना मेंॐ गोविंदाय नमः का मालाजप होगा साथ ही वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित मधुराष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८०– उपहार… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – उपहार।)

☆ लघुकथा # ८० – उपहार श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“आज पार्टी में जाना है। मैं तो तैयार हूं, तुम भी तैयार हो जाओ। बाहर से लाने को कहा था क्या कुछ लाये हो?”

“हाँ रागिनी में लेकर आया हूं यह पांच सुंदर फूलों के पौधे हैं, इनमें से जो चाहे तुम घर में रख लो और एक दो पौधे उपहार में दे देते हैं।”

“सुंदर पौधे लाये हो ना ..?  या जैसे सब्जी वाले से दया खाकर सब्जियां ले लेते हो, या कुछ भी?” गुस्सा होते हुए जोर से रागिनी ने कहा।

“उपहार में तो फूलों का गुलदस्ता  ही अच्छा लगता है।”

“कोई बात नहीं मेरे पास एक सुंदर सा पर्स रखा है उसको पैक करके और  गुलाब, मोगरा, गेंदा गुड़हल और रजनीगंधा फूलों के पौधे  दे  देती हूँ, इन्हें कौन रखेगा फालतू की झंझट अपनी अलग डालो?”

“क्यों .. ऐसे क्यों कह रही हो ?”

“पूजा के लिए फूल तो तुम्हें मिलेंगे साथ ही साथ बाल में भी लगा सकती हो” अरुण ने मुस्कुराते हुए कहा।

“गुलदस्ते तो सूख जाते हैं तो हम इधर-उधर फेंक देते हैं फूल तो हमारे सच्चे साथी हैं। फूलों की खुशबू के साथ बालकनी में बैठकर चाय पियेंगे और  भीनी- भीनी महक पूरे घर में रहेगी।”

“अरे लेकिन तुम्हारी बहन तो मुझे चार बातें सबके सामने सुना कर बेज्जती करेगी।”

“ठीक है मैं तैयार होने जाता हूँ तुम्हारी जो समझ में आए वह करो।”

“जब दोनों उपहार लेकर गए तो फूल देखकर उनकी बहन बहुत खुश हुई। बोली – “बहुत ही सुंदर उपहार लाई हो भाभी।”

सारे लोग देखकर खुश हो गए और जोर से ताली भी बजाने लगे।  आपस में सभी ने यही प्रण किया, कि हम एक दूसरे को माला और गुलदस्ते के बजाय एक पौधा गिफ्ट किया करेंगे।

रागिनी ने कहा- “हां मैंने इसीलिए तुम्हारे भैया से  मंगवाई यह उपहार हम आपके लिए लाये हैं।”

अरुण मुस्कुराते हुए अपनी बहन को देखा और बोला चलो केक काटते हैं।

पौधों का उपहार देना हमारे जीवन के लिए बहुत अच्छा है मन भी खुश रहता है और घर की भी सौंदर्यता बढ़ती है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २३७ – बड़बोली ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित लघुकथा बड़बोली”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २३७ ☆

🌻लघुकथा 🌻बड़बोली🌻

 सभी जगह फोटो खिंचवाना, इंस्टाग्राम, फेसबुक पर अपलोड करना ही उसका काम था। जहाँ मुफ्त की मिले वहाँ आँख नचाते पहुंच जाना।

मै तो ऐसे ही हूँ – – उसकी गंदी सोच को जानते हुए भी कई लोग उसकी संस्था में जुड़े ।

कुछ हो चाहे न हो, कुछ करें या न करें, मौके का फायदा उठाना, किसी के सरल सहज व्यक्तित्व को तीखी बातें चुभाते उसकी मानवीय सोच बनते जा रही थीं।

बड़बोली बनते आज वह अपने ही जाल में फँसते चली। बात किसी से नहीं छुपी। दुनिया गोल है, छोटी सी जिन्दगी और जरा सा समय, हवा में फैलते देर न लगी इसने तो मानवता को शर्मसार किया है। जिसका खाया उसी पर छेद किया।

आपस में बाकी सभी बात करते दिखे।बड़बोली कहते रही मै तो ऐसी ही हूँ।

बड़बोली को कौन मुँह लगे। सभी ने आजकल जैसा रिवाज है अपना अपना फोन नं रिमूव करते उसे ब्लाक किया।

बाल झटकती, आँख मटकाते बड़बोली किसी दूसरे शिकार पर निकल चली।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#७३ – कल्पना का सत्य… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कल्पना का सत्य…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७३ — कल्पना का सत्य — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मैं यह वृत्तांत कल्पना से लिख रहा हूँ, लेकिन मुझे वास्तविक लग रहा है। पिंजड़े में बंद कबूतरी के मर जाने से कबूतर बड़ा उदास रहता था। घर के मालिक ने एक दिन भूल से पिंजड़ा खुला छोड़ दिया और कबूतर उड़ गया। चार दिन बाद वह लौटा। बात ऐसी थी कबूतर ने खुली प्रकृति में अदम्य शक्ति वरण कर ली थी। वह पिंजड़ा उड़ा ले जाने आया था। अब से जोड़ा कबूतर यहाँ बंद न हो।

 © श्री रामदेव धुरंधर
13 — 08 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ ग्रीन कार्ड – गुजराती लेखिका – गिरिमा घारेखान ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆

श्री राजेन्द्र निगम

(ई-अभिव्यक्ति में श्री राजेंद्र निगम जी का स्वागत। आपने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में प्रबंधक के रूप में सेवाएँ देकर अगस्त 2002 में  स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। उसके बाद लेखन के अतिरिक्त गुजराती से हिंदी व अँग्रेजी से हिन्दी के अनुवाद कार्य में प्रवृत्त हैं। विभिन्न लेखकों व विषयों का आपके द्वारा अनूदित 14  पुस्तकें प्रकाशित हैं। गुजराती से हिंदी में आपके द्वारा कई कहानियाँ देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आपके लेखों का गुजराती व उड़िया में अनुवाद हुआ है। आज प्रस्तुत है आपके द्वारा गिरिमा घारेखान जी की कथा का हिन्दी भावानुवाद ग्रीन कार्ड।)

☆  कथा-कहानी – ग्रीन कार्ड – गुजराती लेखिका – गिरिमा घारेखान ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆

मनीष ने सामने थाली में रखी खिचड़ी की ओर देखा। साथ में कटोरी में छाछ भी थी। थाली को दूर खिसकाकर वह गुस्से-भरी नजरों से सामने बैठी नयना को देखता रहा, जो उस वक्त उसकी गोदी में सोए मंदार का सिर दबा रही थी। नयना ने रसोई की आलमारी में रखा उसका निजी बचत का छोटा-सा डिब्बा खोलकर मनीष के सामने रख दिया। तब मानो राह देखकर बैठी हों, उस तरह पलकों के किनारे से आँसू की एक बूँद आँख से गिरी और आँख के नीचे ही बन गए काले गड्डे में रुक गई। कुछ बोलने के लिए खुले मनीष के होंठ, पुनः बंद हो गए। नयना के आँसुओं की दो बूँदों ने उसके सभी प्रश्नों का जवाब दे दिया था – चार दिनों से थाली में सब्जी क्यों नहीं परोसी जा रही है, नुपुर की शाला से फीस भरने के लिए फोन क्यों आ रहे थे, किरानेवाला उधार देने के लिए क्यों मना करने लगा और मंदार का बुखार क्यों नहीं उतर रहा था। उसने थाली को नजदीक खींचा, ठंडी हो गई लुसलुस-सी खिचड़ी को खा लिया और हाथ धोकर खूँटी पर लटके शर्ट को पहना और घर के बाहर निकल गया।

बाहर निकलने के बाद उसने दो-तीन गहरी श्वास लीं। वह क्यों बाहर निकल गया था ? घर में वह नयना की नज़रों का सामना नहीं कर सकता था, इसलिए ?अपना धंधा करने के लिए उसने गुजराती शाला की नौकरी छोड़ दी, तब एक बार उसने इंकार किया था, –‘मैं जितना आता है, उसमें घर चला सकती हूँ। मुझे अधिक नहीं चाहिए। ’ लेकिन वह स्वयं ही नहीं माना था और अब उसके फलस्वरूप—

विमान की घरघनाहट सुनकर मनीष ने ऊपर देखा और विमान नजर से जब तक अदृश्य नहीं हो गया, तब तक उसकी नजर उन चमकती लाइट का पीछा करती रही। फिर बहुत दिन से मन में घूम रहे विचारों को उसने कार्यान्वित किया। सामने खंभे पर लटके हुए बोर्ड जिस पर लिखा था, ‘विदेश जाना है?’ उसके नजदीक जाकर उसे ध्यान से पढ़ने लगा।

‘क्यों मनीष, तुम भी जाने के बारे में सोच रहे हो, क्या ?’

हितेन की आवाज सुनकर मनीष ने पीछे देखा। हितेन ने पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखा।

‘तुमने जवाब नहीं दिया, लो। अपना पूरा गाँव अमेरिका में इकट्ठा हो गया है। तुम्हें नहीं जाना?

‘अरे यार, पूरे गाँव में लगे हुए ऐसे बोर्ड देखता हूँ तो मुझे भी होता है कि मैं भी पहुँच जाऊँ, उस सोने के देश में। अन्यथा यहाँ तो दिनों -दिन बढ़ती जा रही महँगाई में सब कुछ बिगड़ता ही जा रहा है। एक साल के बाद तो मंदार को भी शाला भेजना पड़ेगा। कैसे भरूँगा, दो बच्चों की फीस ?’

‘हाँ यार, वहाँ कुछ तो है। अपने हरिया कोई ही देख लो न !वहाँ से कितना पैसा भेजता है ! उसके पिता ने तीन मंजिल का मकान बनवा लिया। बेटी के शादी में भी पानी की तरह पैसा बहाया। पूरा कुटुंब मौज कर रहा है। ’

‘हाँ यार, मेरा भी एक हास मित्र है नरेंद्र, तुम्हें याद है न ? कुछ दिनों पहले उसने वीडियोकॉल किया था। अरे पूरा बदल गया है ! जब उसकी शादी हुई थी, तब काली, छड़ी जैसी थी, वह मीना अब तो बड़ी मेडम हो गई है !’

मनीष की आँखों के सामने अभी, जिसे रुलाकर आया था, वह नयना आ गई। बेचारी हँसती-खेलती अब सूखकर काँटा हो गई थी। पिचका हुआ चेहरा, बैठे हुए गाल, फटी हुई साड़ी। पट्टी में सेफ्टीपिन लगाकर स्लीपर पहनती थी।

‘क्या सोच रहे हो ? तुम्हारेमित्र सेऐसी दोस्ती है, तो उससे ही पूछो न कि वह कैसे गया था?’

 घर जाने के बाद बहुत देर तक मनीष को नींद नहीं आई। हितेन के शब्दों ने आग में घी ही डाला था। उसकी नजर के सामने नरेंद्र ने वीडियो में बताया उसका बड़ा घर, घर के पीछे का बगीचा, सामने रखी दो बड़ी गाड़ियाँ, पट-पट अँग्रेजी बोलते उसके दो लड़के,आकर्षित करते थे। गाँव से जितने अमेरिका गए थे, सब सुखी हो गए थे। एक बार जाने के बाद कोई वापस नहीं लौटता था। रमणीककाका तो जब वह छोटा था, तब अमेरिका गए और अब उनकी बेटी के विवाह करने के वक्त आए। उनकी मोटी और बुच्ची लड़की को कितना अच्छा वर मिला। अमेरिका का प्रताप ! वे तो दामाद को भी वहाँ ले गए। मैं अमेरिका में रहूँ, तो फिर मेरी नूपुर को भी अच्छा लड़का मिल जाएगा न ! वह चाहे अभी बारह वर्ष की हो, लेकिन लड़की को बड़ा होने में कहाँ वक्त लगता है ? मंदार तो वहीं पढ़ाई करेगा, इसलिए पहले से ही बड़ा साहब हो जाएगा। और क्या चाहिए ?

कुछ दिन बाद, बच्चे सो गए फिर उसने नयना से बात की।

‘मैंने नरेंद्र को फोन किया था, उसने उसके एजेंट का नाम और नंबर दिया है। ’

नयना बिस्तर पर बैठ गई। ‘आप किसकी बात कर रहे हो ?

‘अमेरिका जाने की। ’

नयना उसकी चौड़ी हो गई आँखों से सुनती रही। ‘एजेंट ने कहा है कि अभी किसी को इसके बारे में मालूम नहीं पड़ना चाहिए। पैसा लेंगे, लेकिन काम हो जाएगा, इसका विश्वास दिया है। पहले कनाडा ले जाएँगे और फिर वहाँ से अमेरिका। कई को इसने पहुँचाया है। वहाँ जाकर पहले किसी छोटे गाँव में रहना होगा। अपनी जाति वालों की मोटलों में नौकरी मिल जाती है। वहाँ यहाँ जैसा नहीं होता है। सब नए आनेवालों की मदद करते हैं। नौकरी पर रख लेते हैं। फिर वहाँ तो घंटे के हिसाब से पैसा मिलता है। जितने अधिक घंटे काम करो, उतनी अधिक रकम। पगार तो हर सप्ताह ले लो और वह भी डॉलर में। तुम काम करना।

इंद्रधनुषी सपनों के पंख फैलते जा रहे थे।

‘नहीं जी, मुझे अंग्रेजी नहीं आती। ’

‘अरे मोटल में तो मशीन में कपड़े धोना है और चादर बिछाना हैं। ऐसा ही सब काम होता है। दो लोग काम करें तो देखते-देखते लखपति हो जाएँ। एक डालर का भाव मालूम है ? कम से कम ₹80 तो मिलते ही हैं और घंटे के छह डॉलर मिलते हैं

बोलते समय मनीष की दृष्टि कमरे की छत पर डॉलर की खेती कर रही थी। हम दो यदि रोज 15-16 घंटे काम करें, तो रोज के 15 गुणा 6 अर्थात 90 डॉलर हो जाएँगे और फिर उसका 80 से गुणा, तो रोज के इतने रुपए हो गए। फिर महीने के और फिर वर्ष के…

‘हाँ, लेकिन हमारे जाने के कितने पैसे लगेंगे ?’

‘डॉलर की गड्डी, हाथ में आए, उसके पहले मनीष को रुपियों के नोटउड़ते हुए दिखाई दिए। लेकिन वह आँकड़ा बताकर नयना को घबराना नहीं चाहता था। ‘वह तो खासे लगेंगे, लेकिन उसके लिए तो हम अपना खेत बेच देंगे न ?’

‘हाय हाय ! खेत बेच देना पड़ेगा ?’

‘जब हमें लौटकर आना ही नहीं है, तो फिर इसे रखकर क्या करेंगे ? और उसमें भी एक वर्ष अकाल और दुसरे वर्ष ऐसी बरसात, कि सब फसल बह जाए। कभी कीटाणु लग जाए। भाग्य कुछ बताता नहीं। एक बार कनाडा जाने का वीजा मिल जाए, बस। ’

‘लेकिन हमरमणीककाका के जमाई की तरह सीधे अमेरिका क्यों नहीं जाते ? पहले कनाडा क्यों जाएँ ?’

‘थोड़ा घूम कर जाएँगे। ’ मनीष ने नयना की कमर में पीछे से हाथ रखा और उसे कुछ नजदीक खींच लिया। तुम बहुत पूछ-पूछ करती रहती हो,लेकिन वहाँ जाकर पूछने में समय मत बर्बाद करना। अपने मोहल्ले में जैसे यह पेड़ है न, वैसा वहाँ डॉलर का पेड़ लगने वाला है, देखना। ’

मनीष खिड़की में से दिखाई दे रहे वृक्ष पर ऊपर से खिर रहे पत्तों की मीठी लग रही खरखराहट सुनता रहा। नयना खिड़की के कोने में मकड़ी के द्वारा बनाए जाले की तरफ देखती रही। आज उसजाले के रेशे स्वर्णिम और चमकते हुए लग रहे थे।

वे ग्यारह लोग मुंबई हवाई अड्डे पर इकट्ठे हुएथे। उनका एजेंट वहाँ आया था और उसने सब समझा दिया — ‘उनका आदमी टोरंटो एयरपोर्ट के बाहर मौजूद होगा। उसके पास उनके फोटो पहुँच गए हैं, इसलिए वही उनको ढूँढ लेगा। अन्य किसी से कुछ पूछना नहीं है। वह एजेंट अमेरिका की सीमा तक बस में ले जाएगा और आगे के बारे में सब समझा देगा। उसने उनके साथ के अनिलभाई को सब समझा दिया है। वे जैसा कहेंगे, वैसे ही सबको करना है। किसी को कुछ पूछना है ?’

किसी के कुछ होंठ खुले, उसके पहले तो वह जैसा प्रकट हुआ था, वैसा ही अंतर्ध्यान हो गया।

टोरंटो पहुँचने तक कुछ डर और आशंका मिश्रित उत्साह की जंजीरों ने सबको एक दूसरे के साथ बाँध दिया था। पहली बार प्लेन में यात्रा कर रहे वे सब, प्लेन के बाहर दिखाई दे रहे बादलों के साथ उड़े और इंद्रधनुष के सहारे लटके। मानो एक जन्म पूरा हुआ, इस तरह सोए और सपने में दूसरे जन्म में अमेरिका पहुँच गए।

टोरंटो उतरने की घोषणा हुई और तब अनिलभाई ने जिस प्रकार की सूचना दी, उसके अनुसार सब ने हैंडबैग में जो उनके कपड़े रखे हुए थे, वे सब निकालकर पहन लिए। लेकिन ‘बहुत ठंड’ की उनकी व्याख्या नीचे उतरने के साथ ही बदल गई। शरीर काँप रहा था। दाढ़ी फडफडा रही थी और बोलते समय मुँह से शब्द से अधिक धुँआ निकल रहा था। कुछ ही देर में वहाँ के एक गोरे एजेंट ने उन्हें ढूँढ लिया और उसके बाद एक ऊष्मादायक छोटी बस में बैठने के बाद उन्होंने श्वास में श्वास ली।

अनिलभाई बस के ड्राइवर के साथ आगे बैठे। उसका बोला हुआ जितना समझ में आता, वह उसे जोर से बोलकर पीछे पहुँचाते देते।

‘सब सुनो, यह हमें अमेरिका की सीमा से जितने नजदीक हो सकेगा, वहाँ तक पहुँचा देगा। फिर हमें कुछ बर्फ में चलना पड़ेगा। वह पूछ रहा है कि यह सबको अनुकूल होगा न ?’

‘तुम उन्हें कह दो कि इतना तो हम खेतों में रोज चलते थे। कुछ अधिक चलना होगा तो परेशानी नहीं। सिर फट जाए, ऐसी गर्मी में भी काम करते तब, जब कुछ न हो तो बर्फ में क्या हो जाएगा ? ठंड सहन कर लेंगे, लेकिन साली भूख तो धूप में नहीं सूख सकती है न ? उसे कहो कि एक बार अमरीका पहुँचा दो, फिर हम सब देख लेंगे। ठीक है न मनीषभाई ?’

मनीष ने उसके लम्बे हुए हाथ पर ताली दी। हालाँकि उसके बाद नयना के बोलने में कुछ हताशा टपकती हुई दिखाई दी।

‘यह नन्हा अब परेशान हो गया है, अनिलभाई, उससे पूछो कि बस में कितनी दूर और जाना है?’

 ड्राइवर के स्थान पर उनकी नई बनी सखी ने जवाब दिया, नयनाबेन तुम नन्हे को सँभालना। इसके खिलौने की और कपड़े की बैग को हम बारी-बारी से कंधे पर ले लेंगे। जय श्रीकृष्णा बोलते- बोलते सब चल देंगे। ’

फिर छह दिन की यात्रा के बाद, वे लोग जब उतरे तब किसी को भी जय श्रीकृष्ण बोलने का भान नहीं था। उतरने के पहले अनिलभाई के शब्द भी कुछ काँपते हुए और कुछ थकान के साथ निकल रहे थे।

‘देखो, यहाँ बर्फ में चलना है। हवा भी बहुत ठंडी होगी। ग्यारह लोग साथ ही रहना। आज उसने विशेष रूप से कहा है कि अलग मत होना, नहीं तो गुम हो जाओगे। सामने उनका एजेंट, हमें लेने के लिए खड़ा होगा। ’

***

जल्दी सुबह पुलिसकार लेकर राउंड पर निकले जॉर्ज को रास्ते के एक और खड़ी हुई वांन को देखकर आश्चर्य हुआ। इस समय, इतनी ठंड में, इस जगह, किसने इस वान को खड़ा रखा होगा ? कोई समस्या उत्पन्न हुई होगी ? ड्राइवर को मदद की यदि जरूरत हो तो पूछने के लिए उन्होंने अपनी कार को वांन के पास लिया। अफ्रीकन अमेरिकन ड्राइवर के साथ, पीछे आधी लाश जैसे दो एशियाई बैठे थे। उसने उनसे पासपोर्ट और दस्तावेज माँगे। कुछ ही मिनट में चित्र स्पष्ट हो गया। वहाँ तो दूसरे पाँच लोग सामने से आते हुए दिखाई दिए। उनके सामान की जाँच करने पर, एक के बैकपैक में से छोटे बच्चों के कपड़े, खिलौने आदि निकले। उसने दूर नजर घुमाई। नहीं, कोई पीछे नहीं आ रहा था। अनिलभाई ने बताने में देरी नहीं की कि ये लोग कुल ग्यारह व्यक्ति थे। चार व्यक्तियों का एक कुटुंब अलग रह गया है। डाकोटा पुलिस इस प्रकार की खोज करने की अभ्यस्त थी। कुछ ही देर में हेलीकॉप्टर के पंखघुर्र की आवाज के साथ, पवन के साथ स्पर्धा करते हुए आकाश में उड़ने लगे। पायलट के मुँह से बार-बार निकल रहा था. ‘गाड नोज व्हाट कंडीशंस दे वुड बी। ’

***

मनीष की नजर जहाँ दूर तक देख सकती थी,वहाँ तक नजर घुमाने की कोशिश की। चारों ओर बर्फ के सिवा अन्य कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। नरेंद्र ने उसे चेतावनी दी थी, इस समय आ रहे हो तो हड्डियों को कंपा दे, वैसी हवा तुम्हें बहुत परेशान करेगी। ठंड- 35 डिग्री होती है। बहुत ध्यान रखना। ’ सावधानी तो रखी थी। गादियों जैसे वजनदार कपड़े पहने थे। आँखों के अलावा सब ढँक दिया था। लेकिन बर्फ के कणों से भरी, धुआं जैसी हवा,आँखों में घुसकर ऐसी जलन करती थी कि आँख खुल ही न सके। और ऐसे में वे सात लोग कैसे अलग हो गए, मालूम ही नहीं पड़ा। अच्छा है कि वे चार तो साथ थे ! इस बर्फ के महासागर में दिशा कैसे मालूम हो ? उसने कहा था कि सीधे-सीधे चलना। लेकिन सीधे किस दिशा में है, यह तो मालूम होना चाहिए न ? कुछ देर तक तो नयना का ‘वहाँ क्या गलत था?’ बेकार वहाँ से निकले। नन्हे को कुछ हो जाएगा तो – नहीं बड़बड़ाहट के जवाब में ‘अभी पहुँच जाएँगे’, ऐसा कहता रहा। लेकिन फिर तो किसी से कुछ बोलने में ही नहीं आ रहा था। उँगली पकड़कर चलती हुई नूपुर ने तो खनकना ही बंद कर दिया। ‘पहुँच जाएँगे, या बाद में’, ऐसे अपने मन में उठाते हुए प्रश्न उसे नयना की हाँफ में भी सुनाई दे रहे थे। लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था। बस अब तो चलते ही रहना था।

अचानक उसके हाथ के ऊपर वजन कम हो गया है, ऐसा लगा। अकड़ गई गर्दन को पीछे घुमा कर मनीष ने देखा कि नूपुर गिर गई थी। पैर पर एक-एक टन का वजन बँधा हो, ऐसे पैरों के साथ मनीष उसके पास गया। वह उसे खड़ी करना चाहता था, लेकिन हाथ मानो बर्फ की जंजीर से बंध गए हों, ऐसा वे उसका कहा मानते ही नहीं थे। उसने आसपास कोई हो तो आवाज देने के लिए मुँह खोलने की कोशिश की। लेकिन ऐसा करते समय होंठ के कोने के चिर जाने से वहाँ से कुछ प्रवाही की बूँद निकली और वहीं जम गई। लगता था कि शरीर के अंदर रक्त है ही नहीं,हड्डी तक सब जमकर बर्फ हो गया था। ठंड की धीमे-धीमे बढ़ती हुई प्यास उसके शरीर में से ऊष्मा के एक-एक कण को चूस-चूस कर पी रही थी। शरीर के एक-एक बारीक छिद्र से अंदर घुस रही हवा शरीर में जाकर बर्फ की नोकदार कटार जैसा बनकर उसे चुभारही थी। पहले थपेड़े मारता पवन अब बंदूक की गोलियों की तरह चुभ रहा था। ऊपर से लगातार बरस रही बर्फ की क्रूर छुरियाँ अंग-अंग को चीर रही थी और शरीर के अंदर बैठकर नसों के टुकड़े कर देती। अमेरिका जैसे स्वर्ग में जाने से पहले नर्क से गुजरना शायद अनिवार्य होता होगा।

अब तो मनीष को वह यहाँ क्यों आया था, यह भी याद नहीं आ रहा था। रोते हुए हृदय के आँसू आँखों से बाहर निकले, उसके पहले अंदर ही जमकर नजर को अधिक धुँधला बना रहे थे। आँख की पुतलियों में मानो दरारें हो गई थी। उन दरारों के बीच से वह हरा-हरा क्या दिखाई दे रहा था ? मेरे नए घर के पीछे उगी हुई हरी घास थी या ग्रीनकार्ड का ढेर ? उसके ऊपर चलकर सामने से क्या कोई आ रहा था ? ‘पापा’यह कौन बोला ? यह तो मेरी नुपुर, सोने के गहनों से लदी हुई वह लाल सुहाग के जोड़े में कितनी सुंदर लग रही थी ! उसके पीछे मंदार है ! हाँ, कितना ऊँचा हो गया है ! सूट-बूट में तो वाह ! नयना को कहेंगे कि चाहे बड़ा हो जाए, लेकिन कान के पीछे काला बिंदु जरूर लगाना, नहीं तो हमारी नजर ही लग जाएगी।

फटे हुए होंठ को कुछ अधिक चीरकर आई मुस्कुराहट के साथ मनीष ने नूपुर और मंदार से लिपटने के लिए हाथ लंबा करने की कोशिश की।

तब ही एक मानव आकार की बर्फ की शिला, नीचे बिछी हुई बर्फ की जाजम की तरफ झुकी।

अनंत अवकाश में कुछ शोध के लिए मथ रही मनीष की आँखें खुल नहीं सकती थी। चारों ओर बिखरी निशब्दता से प्रकट हो रही हो, ऐसी हेलीकॉप्टर की घरघराहट उसे सुनाई देती रही।

♦ ♦ ♦ ♦

मूल गुजराती कहानीकार – गिरिमा घारेखान

संपर्क – 10, ईशान बंगलोज, सुरधारा- सत्ताधार मार्ग, थलतेज, अहमदाबाद- 380054 मो. 8980205909.

हिंदी भावानुवाद  – श्री राजेन्द्र निगम,

संपर्क – 10-11 श्री नारायण पैलेस, शेल पेट्रोल पंप के पास, झायडस हास्पिटल रोड, थलतेज, अहमदाबाद -380059 मो. 9374978556

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – स्मृतियाँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – स्मृतियाँ ? ?

“मेरा दावा है कि स्मृतियाँ केवल मेरी धरोहर हैं”, उसने कहा।

“मैं सहमत हूँ”, उसने माना।

“कितनी आसानी से मान लिया! कभी मेरी कोई स्मृति आकर तुम्हें बेचैन नहीं करती? भीतर जमी बर्फ़ को पिघलाती नहीं? ठहरे पानी में हलचल नहीं मचाती?” इस बार उसके स्वर में आक्रोश था।

“अतीत की कोख से स्मृतियाँ जन्म लेती हैं। जिसने जीवन उसी समय के साथ जिया हो, उसी समय में जिया हो, अतीत को जड़ जमाने ही न दी हो, स्मृतियाँ भला उसकी धरोहर कैसे हो सकती हैं?”..एक उसाँस के साथ उसने उत्तर दिया।

अब दूसरी ओर से भी उसाँस भरी जा रही थी।

 ?

© संजय भारद्वाज  

अपराह्न 13:57 बजे, 24 जुलाई 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना संपन्न हुई। अगली साधना की सूचना शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️

💥 💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # २९ ☆ लघुकथा – अनुत्तरदायित्व… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा  – “अनुत्तरदायित्व“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # २९ ☆

✍ लघुकथा – अनुत्तरदायित्व… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

दीक्षित जी बाहर निकल ही रहे थे कि उनकी पत्नी शीला की आवाज आई, “सुनो, आज स्कूल वैन नहीं आई है जरा उर्वशी को स्कूल छोड़ आओ।” दीक्षित जी थोड़ा ठिठके, उनका अपने मित्रों के साथ बैठने का समय हो रहा था।  उन्हें खड़े देखकर शीला बोली, “क्यों क्या हो गया। कभी कभी तो घर की जिम्मेदारी उठा लिया करो।” बहू बेटे काम पर चले जाते हैं। दिन भर मैं घर संभालती हूँ। बाई है तो क्या। रिटायर होने का मतलब घर से, काम से और पेट से रिटायर होना तो नहीं होता न।” दीक्षित जी मोबाइल निकाल कर कोई नंबर ढूढने लगे।

तभी शीला चिल्लाई, “अरे बच्ची तैयार खड़ी है और तुम हिल ही नहीं रहे। स्कूल में वह लेट हो जाएगी। एक दिन तुम गप्पा गुट में लेट हो जाओगे तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा।” …..”और हां, लौटते समय कुछ सब्जी लेते आना, घर में कुछ नहीं है।” दीक्षित जी ने उर्वशी का स्कूल बैग उठाया और उसे साथ लेकर नीचे उतरने लगे। नीचे आकर स्कूटर उठाया और स्कूल के लिए चल दिए। लेकिन रास्ते में एक बैंच पर बैठे अपने ज्येष्ठ मित्रों से इशारा करते गए कि मैं अभी आता हूँ।

अपनी पोती को स्कूल छोड़ कर दीक्षित जी आए और सीधे अपने मित्रों के पास चले गए। ऐसा लग रहा था जैसे उनसे बहुत कुछ छूट गया हो। परंतु यह भूल गए कि शीला ने यह कहा था कि लौटते समय कुछ सब्जी लेते आना।  रिटायर होने के बाद वे समझते थे कि घर से व घर की जिम्मेदारियों से भी रिटायर हो गए हैं।  कुछ तनाव व खीज के साथ वे मित्र-अड्डे पर पहुंचे। मित्र लोग ठहाका मार रहे थे। एक ने पूछा,” दीक्षित जी क्या आज स्कूल वैन नहीं आई?” ” हाँ यार, ये वैन वाले पैसे तो पूरे लेते हैं पर कभी भी बिना बताए आते नहीं।”  दूसरे मित्र ने कहा, “ऐसा नहीं है उसने तुम्हारे बेटे को बोल दिया होगा।” ” हो सकता है” कहकर दीक्षित जी मुंह लटका कर बैठे रहे। कोई किस्सा कहानी नहीं, कोई अतीत की बात नहीं।  उसी उदासी में उठकर घर की ओर चल दिए।

फ्लैट में घुसते ही शीला बोली, “स्कूल छोड़ कर अब आ रहे हो। और सब्जी?” सब्जी शब्द सुनकर दीक्षित जी अवाक् रह गए। उन्हें अफसोस होने लगा कि वे अपने घर परिवार के प्रति कितने अनुत्तरदायी होते जा रहे हैं। बेटे बहू काम पर निकल जाते हैं पर उन्हें पता नहीं चलता , क्योंकि बिस्तर पर पड़े रहते हैं, नाती पोते स्कूल जाते हैं तो भी उन्हें पता नहीं चलता, क्योंकि तब स्नान, पूजा पाठ में लगे रहते हैं।  नाश्ता करने के बाद मित्रों के साथ जा बैठते हैं और दोपहर में आकर खाना खाकर आराम करते हुए सो जाते हैं। शाम को उठते हैं तो चाय पीकर फिर मित्रों के साथ निकल जाते हैं और रात में लौटकर आते हैं तो खाना खा कर सो जाते हैं। यह अलग बात है कि खाना खाते समय बहू बेटे और बच्चों से बात हो जाती है।

उन्हें लगा कि  बाहर जाकर मित्रों के साथ बात करते समय  जो कहा जाता रहता है  कि आजकल बेटे बहू के पास वृद्धों के लिए समय नहीं है, सच नहीं है। सच तो यह है हम वृद्धों ने अपने आपको रिटायरमेंट शब्द की आड़ में ढंक लिया है और काम करने से कतराने लगे हैं। उन्हें बहू बेटे का संघर्ष तो दिखता ही नहीं।‌ उनका उत्तरदायित्व दिखता है पर अपना नहीं। दीक्षित जी उठकर घर की ओर चल दिए। चलते समय हृदय में एक संकल्प सा गूँज रहा था कि वे अब घर के प्रति अनुत्तरदायी नहीं रहेंगे।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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