हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०९ – यादें पुरानी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – यादें पुरानी।)

☆ लघुकथा # १०९ – यादें पुरानी श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

तुम्हें कुछ याद नहीं रहता ।

महीने में एक दिन किटी पार्टी के लिए  समय नहीं निकल सकती क्या इतनी देर से क्यों आई कमला जी ने कहा।

नेहा ने बड़ी विनम्रता से कहा- “क्या करूँ! घर में काम इतने हो जाते हैं कि समय का पता नहीं चलता।”

कमल जी ने कहा- “भाई हमें भी काम होता है फिर भी हम लोग महीने में एक दिन सब कुछ छोड़कर अपने लिए समय निकालते हैं।”

“ठीक है दीदी अब अगली बार किटी पार्टी में मैं सबसे पहले आ जाऊंगी आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगी।”

अच्छा यह तो बताइए कि “आप लोग  इतनी जोर से हॅंस रहे थे और मुझे देखकर अचानक चुप हो गए?”

“कुछ नहीं हम सभी सहेलियाँ बात कर रही थीं ।” पुराने दिन कितने अच्छे थे जब हम लोग घर के बाहर बैठकर एक दूसरे से सुख-दुख की बातें करते थे। स्वेटर बुनते ,आचा,र बड़ी ,पापड़, चिप्स बनाते थे ।

आज वह सब दिन जाने कहाँ चले गए अब तो लोग बाजार से सब चीज खरीद लाते हैं मेरी बहू को तो यह सब काम फालतू और फिजूल खर्ची लगता है।

“कोई बात नहीं दीदी आप मेरे घर आइएगा मैं आपको यह सारी चीज अपने हाथों से बनी हुई खिलाऊंगी।”

“ठीक है तुम्हारे यहां आकर मैं यह सब चीज बनवाऊंगी।”

“अच्छा तुम सभी को दिखाने के लिए मैं एक पुराने जमाने की चीज लाई हूँ।”

“दीदी यह तो लालटेन है” जोर से चिल्लाते हुए नेहा बोली।

“हाँ यह मेरी अम्मा ने मुझे शादी में दिया था बहु को मेरे यह कबाड़ लगता है मेरे कमरे में मेरे साथ मेरी नातिन रहती है उसे भी यह अच्छा नहीं लगती ।”

“बहुत दिनों से इसे लपेटकर अलमारी में आदर पूर्वक रखी हूँ।”

” बिजली और नए युग के आने की खुशी तो बहुत है लेकिन क्या करूँ?”

“इसे देखकर मुझे ऐसा लगता है कि मेरी माँ मेरे पास है।”

नेहा बोली-” दीदी सच कह रही हो आजकल की पीढ़ी भी प्लास्टिक की दुनिया में खो गई है।”

“सारे सामान इस्तेमाल करके फेंक देती है उन्हें संभालना रखना यह अच्छा ही नहीं लगता।”

“बस बाहर जाना, नौकरी करना, घूमना, फास्ट फूड खाना हमारे पास बैठने तक का वक्त नहीं है?”

कमल जी ऑंखों से ऑंसू से बहने लगते हैं।  उनके मन का सूनापन उनकी ऑंखों में उभर आता है।

कमल जी रोते हुए कहा -“एक दिन मैं भी ऐसे ही डिब्बे में पैक होकर भगवान के घर चली जाऊंगी।”

  “क्या तुम लोग मुझे इस लालटेन की तरह याद करोगी।”

 नेहा यह लालटेन  निशानी समझ कर तुम संभाल कर अपने पास रख लो। देर से आने की  यही तुम्हारी सजा है।

सभी सहेलियों मुस्कुराते हुए कहती हैं कमल दीदी अब हम सभी देर से आएंगे तो आप हमें इसी तरह उपहार देना।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ – आशीर्वाद के अक्षत ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा आशीर्वाद के अक्षत”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ ☆

🌻लघु कथा🌻 💐आशीर्वाद के अक्षत 💐

आजकल पैसों से गरीब कोई नहीं होता। जो गरीब दिखते हैं वास्तव में वह कुछ करना ही नहीं चाहते या फिर एकदम बेसहारा लाचार प्राकृतिक आपदा दिव्यांगता।

इन चीजों को परे हट कर  देखा जाए तो आज वास्तव में पैसा संस्कार, श्रद्धा, अपनापन, रीतरिवाज, मर्यादा, सम्मान सब भूला देता है। भीषण युद्ध का समाचार पढ़ते- पढ़ते अचानक पेपर पर निगाह दौड़ रही थी।

एक पूंजीपति इंसान की दर्दनाक मौत। वजह अकेलापन, अपनों की याद, जकड़े हुए रिश्ते और बोझिल होती साँसे।

आसमान साफ परंतु हल्की सी बूंदाबांदी मानो कह रही हो राहत तो अपनों से ही मिलती है। पर अपने है कहाँ??

तभी दरवाजे पर दस्तक। चश्मे से निहारते नयन दरवाजे पर जाकर अटकी। सामने महीने बंदी सामान लेकर आने वाला किराना व्यापारी खड़ा था। मालती— सुनिए भैया इस बार का राशन का सामान आप इस पते पर पहुंचा दीजिएगा।

व्यापारी बोला – – क्या बात है मैडम कहीं जा रही है और यह किसको देना है।

मालती ने बड़े भोलेपन और खुशी जाहिर करते हुए बोली– वह हम अपने बेटे के यहाँ जा रहे हैं। यहाँ घर पर जो बनेगा वह सब वहाँ बन जाएगा।

व्यापारी – मैडम बेटे के यहाँ सामान लेकर जा रही है? मैं कुछ समझा नहीं। अपना ही बेटा है न?

हमारा ही बेटा है। खूब बड़ी कंपनी में नौकरी करता है। कल उसने फोन पर कहा है–अपना दो-चार दिन रहने का इंतजाम करके आना।

मुझे समय नहीं मिल रहा हैअब कुछ खाना है। तो ले जाना पड़ेगा और उसे उपहार में कुछ देना पड़ेगा। उपहार ही समझो। पर चिंता न करो हम कुछ दिन उसके घर पर ही रहेंगे।

जलती तवे पर पानी की बूँदे जैसे चटपटाती है, ठीक उसी तरह उसके हृदय के बोल निकल रहे थे। बाबूजी की आवाज – – अब छोड़ो भी बच्चों के पास जा रहे हैं क्या यह काम है।

जन्मदिन पर बुलाया है आशीर्वाद के अक्षत तो लेकर जाना ही है। व्यापारी को आशीर्वाद के अक्षत और उपहार का सामान समझते देर न लगी। वह बोला– ठीक है जल्दी आ जाईयेगा और अपना ध्यान रखिएगा

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३० ☆ कथा कहानी – सूखी पत्ती ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘सूखी पत्ती‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३० ☆

☆ कथा-कहानी ☆ सूखी पत्ती

दफ्तर की इमारत वैसी ही है जैसी सरकारी इमारतें अमूमन होती हैं— बदरंग और बेरौनक। कई सालों से उसमें रंगाई-पुताई नहीं हुई। भीतर दीवारों पर बरसाती पानी के बड़े-बड़े धब्बे बारह महीने उपस्थित रहते हैं। बाहर की दीवारें काली हो रही हैं। टॉयलेट में थोड़ी देर खड़े रहने पर छत से पानी की बूँद चाँद पर टपककर मन को पवित्र कर देती है।
गेट और दफ्तर की इमारत के बीच जो खाली ज़मीन है उसमें कई तरह के पौधे बेतरतीब उग आये हैं। उनकी कटाई-छँटाई का कोई इन्तज़ाम नहीं है। इन्हीं के बीच से दफ्तर तक का घुमावदार रास्ता गुज़रता है।

इसी दफ्तर में पाँच छः बाबू बैठते हैं। बगल में छोटा सा कमरा बड़े बाबू का है, और उसके पार साहब का कमरा। साहब के आने-जाने का कोई निश्चित वक्त नहीं है। इससे बाबुओं को कोई दिक्कत भी नहीं होती। साहब के न रहने पर आज़ादी और मौज का वातावरण रहता है। बड़े बाबू को पटा कर कोई सुविधा ली जा सकती है।

दफ्तर में बैठने वाले बाबुओं में निरंजन बाबू, बेनी बाबू, गोस्वामी बाबू और सिंह बाबू हैं। इनके अलावा एक रजक बाबू भी हैं। रजक बाबू सीधे-सादे आदमी हैं। कोई उनका मज़ाक उड़ाये  तो बुरा नहीं मानते। हल्के से हँसकर उसे झेल लेते हैं। प्रतिवाद नहीं करते। रजक बाबू का रहन-सहन बहुत सादा है, जैसा साधारण परिवारों का होता है। अपने इन्हीं गुणों के कारण वे अक्सर अपने सहकर्मियों के निशाने पर रहते हैं। उनकी सिधाई और कपड़ों-लत्तों को लेकर मज़ाक चलता रहता है, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

बड़े बाबू बड़े नफासत-पसन्द व्यक्ति हैं। अच्छे सिले, साफ-सुथरे कपड़े पहनते हैं और माथे पर लाल तिलक लगाते हैं। पान की डिबिया हमेशा बगल में रखते हैं और एक पान मुख में। दफ्तर पहुँचते हैं तो चपरासी पूरनलाल दौड़कर उनका स्कूटर थाम कर पार्किंग के लिए ले जाता है।

रजक बाबू अब भी दीक्षितपुरा के अपने पैतृक घर में रहते हैं। घर काफी पुराना है और मुहल्ला भी पुराना, टेढ़ी-मेढ़ी गलियों वाला है। दिन में कई बार ट्रैफिक-जाम होता रहता है, लेकिन रजक बाबू का मन वहीं रमता है। मित्र और सहकर्मी उन्हें कई बार बिन-माँगी नसीहत दे चुके हैं कि अब वे एक इज़्ज़तदार नौकरी में आ गये हैं, अब उन्हें अपना बसेरा किसी ऊँची कॉलोनी में बना लेना चाहिए। लेकिन रजक जी ‘मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे’ वाले हैं। वह घर और वह मुहल्ला छोड़ने की बात उनके गले उतरती नहीं।

रजक बाबू के परिवार में पीढ़ियों से कपड़े धोने और प्रेस करने का काम होता रहा है। माता-पिता ने इसी काम से कमाई की और बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। मुहल्ले में उन्हें सब जानते हैं। रजक बाबू भी खाली समय में पिता-माता का हाथ बँटाते रहे। अब दफ्तर में नियुक्त होने पर भी उन्हें अपने घर के धंधे में कोई खोट नज़र नहीं आता।

पिता ज़िन्दगी भर खड़े-खड़े प्रेस करते रहे, इसलिए अब साठ पैंसठ की उम्र में उनकी टाँगें जवाब देने लगी हैं। माँ स्थूल हो गयी हैं, उनसे ज़्यादा काम नहीं होता, इसलिए रजक बाबू सुबह- शाम उनकी मदद करते रहते हैं। माँ कपड़ों की गठरी लेकर मुहल्ले में प्रेस के कपड़े दे आती है। मुहल्ले के बाहर के भी कुछ ग्राहक हैं, उनके कपड़े पहुँचाने के लिए साइकिल पर गठरी रखकर खुद रजक बाबू निकल जाते हैं क्योंकि पिता को अब साइकिल चलाने में घुटनों में तकलीफ होती है। रजक बाबू का छोटा भाई भी है, लेकिन वह कॉलेज में पढ़ता है और उसे कपड़े लेकर लोगों के घर जाने में अपनी बेइज़्ज़ती लगती है। साथ पढ़ने वाले लड़कों-लड़कियों से टकरा जाने का भय भी होता है।

दफ्तर में रजक बाबू के इस काम को लेकर तानाकशी और फिकरेबाज़ी होती रहती है। उनके सहकर्मियों का खयाल है कि रजक बाबू के कपड़ों की गठरी लेकर घूमने से दफ्तर की इज़्ज़त गिरती है। उनके खयाल से यह काम ‘बिलो स्टैंडर्ड’ है। जिस दिन कोई सहकर्मी उन्हें गठरी के साथ देख लेता है उस दिन आक्षेप तेज़ हो जाते हैं— ‘दे आये कपड़े?’  ‘ग्राहक खुश हैं? कोई नाराज तो नहीं हुआ?’ ‘बैठने के लिए कुर्सी मिली या पूरे टाइम खड़े ही रहे?’ ‘बड़े आज्ञाकारी हो भैया।’ ‘ऊँचा पद पाने से कुछ नहीं होता, उसे मेंटेन भी करना पड़ता है।’ बेनी बाबू इस फिकरेबाज़ी में शामिल नहीं होते क्योंकि हर महीने बीस तारीख के बाद उनकी तनख्वाह चुक जाती है और ऐसे में उन्हें रजक बाबू से हजार पाँच सौ की मदद मिल जाती है। अन्य सहकर्मी इस मामले में ज़्यादा उदार नहीं हैं।

रजक बाबू कई बार अपने साथियों को बता चुके हैं कि वे यह यह काम सिर्फ अपने माँ-बाप की मदद के लिए करते हैं, कमाई के लिए नहीं। उन्हें इस काम में कुछ गलत या कोई बेइज़्ज़ती की बात नज़र नहीं आती। उनके हिसाब से कोई काम बड़ा या छोटा नहीं होता। किसी काम से आदमी की इज़्ज़त नहीं घटती। वे महात्मा गाँधी का उदाहरण देते हैं जो अपने सारे काम खुद ही करते थे।

यह सुगबुगाहट बड़े बाबू के कानों तक भी पहुँच चुकी है और वे एक दिन रजक बाबू को बुलाकर उन्हें लेक्चर भी पिला चुके हैं। आवाज़ में मिश्री घोल कर उन्होंने रजत बाबू को समझाया था, ‘देखो भैया, हमें तो बहुत अच्छा लगता है कि आप अपनी इज्जत की कीमत पर अपने माँ-बाप की सेवा करते हो, लेकिन कुछ बातें हैं जो आप को समझना चाहिए। मेहनत मजदूरी के काम करने वालों को हम ‘ब्लू कॉलर वर्कर’ कहते हैं और दफ्तर का बाबू ‘व्हाइट कॉलर वर्कर’ होता है। ‘ब्लू कॉलर वर्कर’ की कैटेगरी से उठकर ‘व्हाइट कॉलर’ की कैटेगरी में आना बड़े भाग्य की बात है। आप इस मामले में भाग्यशाली हैं। तो आपको लौटकर ‘ब्लू कॉलर वर्कर’ नहीं बनना चाहिए। इससे हमारे एस्टेब्लिशमेंट की प्रतिष्ठा घटती है।’

थोड़ा रुक कर वे बोले, ‘आप समझिए कि हमारे समाज में मेहनत-मजदूरी करने वाले की इज्जत नहीं है। किसी मजदूर को किसी घर में कुर्सी पर बैठे देखा है क्या? उसे बैठने के लिए जमीन ही मिलती है। आप आज इस लायक हो गये कि समाज में इज्जत पा सकें, इसलिए आपको निचली कैटेगरी के काम से बचना चाहिए, वर्ना बड़ी मुश्किल से कमायी इज्जत कभी भी हाथ से खिसक सकती है। मैं आपको वह काम करने से मना नहीं कर रहा हूँ, लेकिन आपको खुद इस मामले में सोच समझ कर काम करना चाहिए। आप खुद सोचिए कि जो लोग आपसे दफ्तर में मिलते हैं वे आपको बाहर कपड़ों की गठरी लेकर घूमते देखकर क्या सोचते होंगे? अपनी इज्जत का खयाल हम खुद नहीं रखेंगे जो दूसरे क्यों रखेंगे?’

लेकिन इस प्रबोधन के कुछ दिन बाद मामला फिर गर्मा गया। मामला तब उठा जब रजक बाबू ने निरंजन बाबू को अपने बच्चों के लिए दफ्तर की स्टेशनरी देने से मना कर दिया। रजक बाबू दफ्तर की स्टेशनरी के इंचार्ज हैं। निरंजन बाबू तब से बिफरे हैं और उन्होंने बड़े बाबू से कह दिया है कि रजक बाबू जो कपड़े पहुँचाने का काम करते हैं उससे पूरे दफ्तर की नाक कटती है और उस पर तुरन्त कार्यवाही होनी चाहिए, अन्यथा उन्हें अपनी बात साहब तक पहुँचानी पड़ेगी।

बड़े बाबू ने रजक बाबू को तलब किया। मुलायमियत से बोले, ‘आपके अपने घर का काम करने की शिकायत बार-बार आती है। इस समस्या पर मैं सोचता रहा हूँ। मेरी समझ में आपकी समस्या की सारी जड़ यह है कि आप उस पुराने मुहल्ले में फँसे हुए हैं। वहाँ तंग गलियों में रहने से आदमी की सोच भी वैसी ही हो जाती है। मेरी मानिए तो लोन लेकर एक दो बेडरूम वाला फ्लैट ले लीजिए। अभी सब तरफ अपार्टमेंट बन रहे हैं, आसानी से मिल जाएगा। कम आउट ऑफ दैट मुहल्ला। दूसरी जगह दूसरी तरह के लोगों के साथ रहेंगे तो आपकी सोच भी बदलेगी। थिंक ओवर इट।’

रजक बाबू सहमति में सिर हिलाते हैं, फिर अपनी सीट पर बैठकर सोचते हैं। लोन लेकर फ्लैट खरीदने का मतलब है अपना चैन हराम करना। ऊपरी मंज़िल पर बिना लिफ्ट का फ्लैट मिला तो माँ-बाप से अलग होना होगा। बुढ़ापे में उनकी देखभाल और मदद कैसे होगी? उन्हें भाई के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। नयी जगह में पुराने मुहल्ले जैसा सुकून, इत्मीनान और अपनापन मिलेगा?

बड़े बाबू की नसीहत याद करके रजक बाबू के मुख पर व्यंग्यपूर्ण मुस्कान आ जाती है। देखते हैं कि एक सूखी पत्ती उड़कर उनके कंधे से चिपक गयी है। उसे तर्जनी और अँगूठे से झाड़ कर वे सामने रखी फाइल में व्यस्त हो जाते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०१ – धरती एक ही… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– धरती एक ही…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०१ — धरती एक ही — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

अकूत धनवान सोचता था एक दिन इतना कुछ छोड़ कर जाना है। इस सोच से उसे रोना आ जाता था। इसी तरह की सोच एक फटेहाल आदमी के जेहन में कौंधती थी। कितने कष्ट से अपनी छोटी सी झोंपड़ी बनायी थी। एक दिन छोड़ कर जाना है। इस सोच से उसे भी रोना आ जाता था। शायद दुनिया के लिए यह नई बात न हो गरीब अपने जन्म की धरती के सीने पर लिखता हो मूल्यवान तो मैं भी होता हूँ।

 © श्री रामदेव धुरंधर
02 – 04 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “लाल बत्ती” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “लाल बत्ती” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मैं आज अपनी कार में बेटी को यूनिवर्सिटी छोड़ने जा रहा था। आमतौर पर अपनी सरकारी लाल बत्ती वाली चमचमाती गाड़ी में छोड़ने जाता हूँ। ‌लाल बत्ती देखते ही सिक्युरिटी पर तैनात सिपाही सैल्यूट ठोकना नहीं भूलते। पर आज ड्राइवर छुट्टी पर था। मैंने सोचा कि मैं ही अपनी कार में बेटी को छोड़ आता हूँ।

जैसे ही मेन गेट पर कार पहुंची, सिक्युरिटी वालों ने हाथ देकर रुकने का इशारा किया। मैं हैरान! जो मुझे देखे बिना सैल्यूट ठोकते थे, आज चैकिंग के लिए पूछ रहे थे क्योंकि आज लाल बत्ती वाली गाड़ी जो नहीं थी !

मैंने बताने की कोशिश की कि मैं वही हूँ, जिसे आप बिना देखे सलाम करते हो लेकिन वे मानने को तैयार न थे! तो क्या लाल बत्ती ही मेरी पहचान है, मैं नहीं? और मैं आईकार्ड ढूंढने लगा!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मनोरोग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मनोरोग ? ?

वह मिला था,

वह मिली थी..,

वह आया था,

वह आई थी..,

वह हँसा था,

वह हँसी थी..,

वह सोया था,

वह सोई थी..,

कर्ता का लिंग बदलने से

नहीं बदलता क्रिया का अर्थ,

व्याकरण तटस्थ होता है..,

कर्ता का लिंग बदलते ही

कर देता है सारे अर्थ वीभत्स,

आदमी मनोरोग से ग्रस्त होता है..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४७ – लघुकथा – पिता की बात, पत्थर पर खींची हुई लकीर? ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४७ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ पिता की बात, पत्थर पर खींची हुई लकीर ? ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

पत्थर पर खींची गयी लकीर, और पिता की कही गयी बात कभी मिथ नही हो सकती l ऐसा कह कर वह बुजुर्ग सो गया l इस बात को जिस विश्वास के साथ उसने कहा था, बुजुर्ग को अपने इस विश्वास के अस्तित्व पर खतरा महसूस हो रहा था l बुजुर्ग सोया, मगर इस सोच और मंथन के साथ सोया कि इस पंक्ति में मजबूती कितनी है, यह तो आगे देखने वाली चीज होंगी l

नींद में भी लम्बे अनुभव और युवा के अतिआत्मविश्वास मे द्वन्द बढ़ता गया था l युवा पुत्र को बुजुर्ग बाप से यह कहना बड़ा आसान था कि आप कुछ नही जानते है l आपको कुछ सही समझ मे आता ही कहां है l आप तो गलतियाँ करते ही करते है l अब ऐसी गलती बर्दास्त भी नही होंगी ।

बुजुर्ग बाप की लम्बी उम्र, पके बाल, और मंद होती आँखे स्वप्न में भी इसी सोच मे पड़ी रहीं कि क्या उसका पुत्र सही कह रहा था और उसकी बात गलत है ।

बुजुर्ग आँखे अपनी बत्ती बुझने से पहले पहले अपने इस प्रश्न का सटीक उत्तर ढूढ़ रही थी l अचानक मानव जीवन के यथार्थ का बोध कराने वाली पुस्तक श्रीरामचरितमानस उसके आगे खुली थी l वह लगातार पन्ने पलटते जा रहा था कि..अचानक ये पंक्तियाँ उसके मानस पटल से टकराई l

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें।

चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें॥

राहत की बात यह थी कि नींद खुलने से पहले उसके प्रश्न का उत्तर मिल गया था l

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६० ☆ लघुकथा – आस ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘आस। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६० ☆

☆ लघुकथा – आस ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

“सर! अनाथालय से एक बच्ची का प्रार्थना पत्र आया है।”

“अच्छा, क्या लिखा है उसने ?”

“पत्र में लिखा है कि वह पढ़ना चाहती है, उसे स्कूल आना है.”

“क्या नाम है उसका?”

“रेणु।”

“रेणु ? पर अभी तक तो वह पढ़ने के लिए तैयार ही नहीं थी – वह अचंभित थे । कितना समझाया था हम लोगों ने उसे लेकिन वह स्कूल आई ही नहीं।”

स्कूल की शिक्षिका ने एक पत्र उनके हाथ में देते हुए कहा – “सर! आप रेणु का यह प्रार्थनापत्र पढ़िए — ”

“टीचर जी! मुझे बताया गया है कि विदेश से कोई मुझे गोद लेना चाहते हैं| वो मेरे मम्मी- पापा होंगे न! अंग्रेजी नहीं आएगी तो मैं अपने मम्मी -पापा से बात कैसे करूंगी ? मुझे उनसे बहुत सारी बातें करनी है। मुझे नहीं मालूम था कि मम्मी-पापा से बात करने के लिए स्कूल जाना जरूरी होता है, मुझे पढ़ना है टीचर! — रेणु “

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५९ ☆ लघुकथा – अपने पराये… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “अपने पराये“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५९ ☆

✍ लघुकथा – अपने पराये… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

सुभाष और मनोज बचपन से दोस्त हैं।  हालांकि सुभाष मनोज से तीन चार साल बड़े हैं पर दोस्ती में कोई फ़र्क नहीं । पढाई में भी दो साल का अंतर रह। यह अंतर आखिर तक बना ही रहा क्योंकि पढाई में दोनों एक जैसे थे। पोस्ट ग्रेजुएट होने के बाद सुभाष की पोस्ट ऑफिस में नौकरी लग गई और पोस्टिंग आगरा में हुई। 

सुभाष का विवाह हो गया।  मनोज सुभाष की पत्नी को बड़े आदर के साथ भाभीजी कहा करता।

मनोज ने एम.ए. करते ही  मुंबई में एक कंपनी में मैनेजर के पद पर नौकरी लग गई। दोनों दोस्तों का संपर्क ऑनलाइन बना रहा लेकिन दोनों गृहस्थी के चक्कर में फँसते गए। दोनों के बच्चे भी हुए, उनकी शादी भी हो गई। और उनकी बातचीत में अंतराल बढ़ गया, मिलने जुलने का तो सवाल ही नहीं।

एक दिन मनोज दादर में सब्जी खरीद रहे थे कि उन्हें सुभाष दिखाई दिए।  लेकिन बाल पक गए थे तो विश्वास नहीं हो रहा था। इसलिए वह उनके पास गए और पहचान कर पुकारा, “सुभाष भाई”। सुभाष ने मुड़कर देखा तो मनोज को तुरंत पहचान गए। मनोज ने कहा,”आप मुंबई में, कब और कैसे?” सुभाष ने कहा कि मुझे एक्साइज में डेपुटेशन मिल गया तो मुंबई आ गया। दो साल हो गए। आओ, तुम्हें तुम्हारी भाभी से मिलाता हूँ, वह यहीं एक दूकान में कुछ खरीद रही है।” मनोज ने भाभी पुकारते हुए प्रणाम किया तो उन्होंने चौंक कर देखा, बोली,”मनोज, अरे तुम यहाँ?” सुभाष और मनोज बड़े अरसे के बाद मिलकर बहुत खुश हुए। भाभी ने अपना पता लिखवाते हुए कहा, “दीपावली आ रही है, घर  जरूर आना। और हाँ भोजन हमारे साथ ही करना। मनोज खुशी के मारे “जी हाँ ” ही कह पाए।

दीपावली की जगमगाहट में मनोज अपने परिवार के साथ सुभाष के घर खुशी खुशी पहुंचे। दरवाजा एक युवती ने खोला। मनोज सकपकाये कि कहीं गलत घर में न आ गए हों। वह युवती बोली, “आप मनोज अंकल, मम्मी पापा ने बताया था, मैं उनकी बहू सुप्रिया, आइए अंदर आइए।”  आवाजें सुन कर सुभाष और उनकी पत्नी ड्राइंग रूम में आए। दोनों गले मिले। बहू सुप्रिया बोली, “आप लोग बात कीजिए, मैं पानी पूरी लेकर आती हूँ। आज हमारे यहाँ पानी पूरी का कार्यक्रम है।” सुभाष और उनकी पत्नी तथा मनोज और उनकी पत्नी एक दूसरे का मुंह देखने लगे। भाभी जी ने मनोज को सपरिवार दीपावली के उपलक्ष्य में खाने पर बुलाया था। सुप्रिया की बात सुनकर एकदम गंभीर हो गई। मुंह से बोल नहीं फूटा। भोजन प्रश्न चिह्न बना रहा और अपने पराए दोनों दोनों अवाक् ।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०८ – दिखावा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – दिखावा।)

☆ लघुकथा # १०८ – दिखावा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

डी जे की धुन पर कुछ लोग नाच गा रहे थे और कुछ लोग कुछ लजीज व्यंजनों का आनंद ले रहे थे।

नवरात्रि का पहला दिन था, पास में माता का पंडाल भी लगा हुआ था। अचानक बहुत सारे लोग उसे पंडाल में आ गए और डांस फ्लोर पर डांस करने वालों की संख्या इतनी बढ़ गई कि ज्यादातर लोग नीचे ही थिरकने लगे। एक तरफ पटाखे चलने लगे।

वहाँ काम करने वाले दो किशोरवय लड़के आपस में बात करने लगे।

एक ने कहा “नए साल के आने पर इतनी खुशी की क्या बात है? मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित की है। नया साल हो या नवरात्रि, हमें तो रोज यही साफ सफाई का काम करना है। अच्छा है, हमें काम मिल जाता है।”

दूसरे लड़के  ने जवाब दिया- “बड़ी पार्टी है, इनका शहर में बहुत बड़ा शोरूम है, देर तक काम करेंगे, तो मालिक से कुछ पैसे ज्यादा मांग लेंगे, हमारे लिए तो यही खुशी की बात हो जाएगी।”

तभी अचानक पटाखे की आवाज से पास खड़ी एक बुजुर्ग महिला के हाथ से एक कांच का ग्लास टूट जाता है। डांस करते हुए सभी लोग एक दूसरे के ऊपर गिर जाते हैं कुछ को कांच लग जाते हैं, भाग दौड़ मच जाती है, लोग इधर-उधर भागने लगते हैं।

वे दोनों लड़के कहते हैं चलो मित्र तुम सब्जी उठा लो और मैं पूड़ी यह दोनों बड़े पतीले उठा कर घर चलते हैं पैसे तो नहीं मिलेंगे।

 हम दोनों के परिवार के लोग मिलकर नव वर्ष मनाएंगे।

 घर चलकर आरती करके माँ दुर्गा की आराधना करेंगे।

बड़े लोग ऐसे ही नव वर्ष मनाते हैं इसीलिए यह हुआ है?

दूसरे ने कहा दोस्त ठीक बोल रहे हो सच्चे दिल से मन की प्रार्थना करनी चाहिए दिखावे में यही हाल होता है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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