(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– लेन – देन …” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ११५ — लेन – देन —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)
एक ध्यातव्य ग्रामीण प्रसंग है। पड़ोसी देता था और लेने वाला पड़ोसी तो लौटाता ही नहीं था। देनदार पड़ोसी कशमकश अनुभव करता था किस चितवन से वापस मांगने का साहस कर पाए। उसकी पत्नी बड़ी गंभीरता से यह सब आँकती थी। इस मामले में अपने पति की अपेक्षा वह होशियार ही थी। उसने अपने पति से बात निकाल ली अपने घर से कुछ जाने का उसे दुख तो बहुत होता है। दुख की बात हुई तो उसने पति को सुख का नुस्खा सुझाया। तुम मांगने वाला फकीर बन जाओ। बाबा दो, लेकिन वापस पाने की आशा मत करना। पत्नी से सलाह पाने पर मांगने जैसे भाव से वह चेतन हो गया। पहली बार ही मांगे जाने पर उससे कहा गया, “मिंतर, तुमसे ली हुई कुल्हाड़ी मैं वापस कर दूँगा।” वह अंदर ही अंदर खुश हुआ। उसे तो याद ही न था अपनी कुल्हाड़ी कभी वहाँ गई थी।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “खोया हुआ कुछ…”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
-सुनो।
-कौन?
-मैं।
-मैं कौन?
– अच्छा। अब मेरी आवाज भी नहीं पहचानते?
– तुम ही तो थे जो काॅलेज तक एक सिक्युरिटी गार्ड की तरह चुपचाप मुझे छोड़ जाते थे। बहाने से मेरे काॅलेज के आसपास मंडराया करते थे। सहेलियां मुझे छेड़ती थीं। मैं कहती कि नहीं जानती।
– मैं? ऐसा करता था?
– और कौन? बहाने से मेरे छोटे भाई से दोस्ती भी गांठ ली थी और घर तक भी पहुंच गये। मेरी एक झलक पाने के लिए बड़ी देर बातचीत करते रहते थे। फिर चाय की चुस्कियों के बीच मेरी हंसी तुम्हारे कानों में गूंजती थी।
– अरे ऐसे?
– हां। बिल्कुल। याद नहीं कुछ तुम्हें?
– फिर तुम्हारे लिए लड़की की तलाश शुरू हुई और तुम गुमसुम रहने लगे पर उससे पहले मेरी ही शादी हो गयी।
-एक कहानी कहीं चुपचाप खो गयी।
– कितने वर्ष बीत गये। कहां से बोल रही हो?
– तुम्हारी आत्मा से। जब जब तुम बहुत उदास और अकेले महसूस करते हो तब तब मैं तुम्हारे पास होती हूं। बाॅय। खुश रहा करो। जो बीत गयी सो गयी।
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆ वही गलती, दो फैसले ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
☆
“तुम्हें मेरी बात की कभी परवाह ही नहीं रही…” साक्षी की आँखें भर आईं।
अभिषेक ने थके स्वर में कहा, “ऑफिस की परेशानियाँ थीं… इसलिए चुप था।”
कुछ दिनों बाद साक्षी पूरे दिन खामोश रही।
अभिषेक झल्लाया, “हर बात पर चुप्पी क्यों? रिश्ते ऐसे नहीं चलते!”
साक्षी ने उसकी ओर देखा और धीमे से बोली—
“जब तुम चुप रहते हो, उसे तनाव कहते हो…जब मैं चुप रहती हूँ, उसे अहंकार क्यों कहते हो?”
अभिषेक के पास कोई उत्तर नहीं था।
साक्षी की आवाज़ काँप गई-
“तुम्हारी बेचैनी में तुम्हारी झुंझलाहट और तुम्हारा दर्द मैं पढ़ लेती हूँ। मेरी आँखें भीग जाएँ, तो तुम मेरा व्यवहार पढ़ते हो… मेरा दर्द नहीं।”
कमरे में सन्नाटा था।
अभिषेक ने उसका हाथ थाम लिया।
“मुझे माफ़ कर दो,” उसने कहा, “मैं तुम्हारी गलतियाँ देखता रहा, तुम्हारी थकान नहीं।”
साक्षी मुस्कराई, “पति-पत्नी तब एक नहीं होते जब दोनों सही हों… बल्कि तब होते हैं, जब दोनों एक-दूसरे की गलतियों को भी एक ही दिल और एक ही तराजू से तौलें।”
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – देशभक्ति का आईना।)
हिंदी दिवस के अवसर पर विद्यालय में देशभक्ति पर भाषण प्रतियोगिता होने वाली थी। शिक्षिका ने बच्चों से पूछा, “बच्चो, बताओ, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में तुम क्या जानते हो?”
एक बच्चा सहजता से बोला, “मैडम, आप चिंता मत कीजिए। हम गूगल से भाषण खोजकर याद कर लेंगे। इस बार प्रतियोगिता हम ही जीतेंगे।”
शिक्षिका ने गंभीर होकर पूछा, “बेटा, बात केवल प्रतियोगिता जीतने की नहीं है। क्या तुम जानते हो कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रानी लक्ष्मीबाई ने देश के लिए क्या किया था?”
बच्चा बोला, “मैडम, इंटरनेट पर सब मिल जाएगा।”
शिक्षिका ने कहा, “इंटरनेट जानकारी दे सकता है, उनके त्याग का एहसास नहीं। राष्ट्रभक्ति केवल भाषण देने का नाम नहीं, उसे जीवन में उतारना भी जरूरी है।”
बच्चा कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “मैडम, जब आज भी शिक्षा व्यवस्था में इतनी समस्याएँ हैं, परीक्षाओं में धांधली होती है और पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरी नहीं मिलती, तब हम राष्ट्रभक्ति की बातें क्यों करें?”
शिक्षिका ने कहा, “इसीलिए तो पढ़ो बेटा! राष्ट्रभक्ति केवल ‘भारत माता की जय’ बोलना नहीं है। ईमानदारी से पढ़ना, नकल न करना, गलत के विरुद्ध आवाज उठाना और अपने कर्तव्य को निष्ठा से निभाना भी राष्ट्रभक्ति है।”
बच्चा मुस्कुराया, “तो मैडम, इस बार मैं गूगल से भाषण याद नहीं करूँगा। पहले अपने देश को समझूँगा, फिर देश के लिए कुछ करने की कोशिश करूँगा।”
शिक्षिका की आँखों में संतोष उतर आया।
तभी बच्चा फिर बोला, “लेकिन मैडम, एक बात पूछूँ? अगर मैं सच बोलूँगा, नकल नहीं करूँगा और गलत के खिलाफ आवाज उठाऊँगा… तो क्या अगली बार भी मुझे भाषण प्रतियोगिता में प्रथम आने के लिए गूगल से ही कोई ‘सफलता का मंत्र’ ढूँढ़ना पड़ेगा?”
शिक्षिका निरुत्तर थीं।
कक्षा में सन्नाटा छा गया।
बाहर विद्यालय की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ अच्छा लिखा था।
बच्चे ने उस वाक्य को देखा और धीमे से मुस्कुराया।
शायद उस दिन पहली बार उसने ‘सत्यमेव जयते’ पढ़ा नहीं, बल्कि उसके सामने खड़े होकर देशभक्ति का असली आईना देख लिया था।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “श्याम पट”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७२ ☆
🌻लघुकथा🌻 श्याम पट 🌻
गिरधारी लाल आज कमरे की दिवाल पर काले रंग का श्याम पट बनवा रहें हैं। दौड़ता हुआ पारस—- पास आकर
दादा जी ये क्या बना रहे?
(ब्लैक ब्लैक)
आज के बच्चे रंगों को रेड ब्लू, ग्रीन, यलो—से ही पहचानते हैं
धूमिल हो गई सिंदूरी रंग, भोर की लालिमा, गोधूली की बेला—
दादा जी ने बाल सुलभ चंचलता को आंकते कहा–यहाँ तुम लिखाई करोगे और एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनोगे। पारस गले में झूल गया मुझे तो आपके जैसा बनना है पापा तो दिनभर मोबाइल चलाते है क्या आपने उन्हें ये बोर्ड नही बनवाया था।
दादा ने कनकी लगा देखते फुसफुसा कर कहने लगे – – मोबाइल रिश्तों को काला करने लगा श्याम पट में आज भी वो ताकत है, जो परिवार जोड़ रखेगा।
देखते है श्याम पट पर पारस की छूअन कंचन बन कर कैसे निखरेगी। दादा श्याम पट को ध्यान से देखने लगे।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – लघुकथा – ईडन
…..उस रास्ते मत जाना, आदम को निर्देश मिला। आदम उस रास्ते गया। एक नया रास्ता खुला।
….पानी में खुद को कभी मत निहारना। हव्वा ने निहारा। खुद के होने का अहसास जगा।
….खूँख़ार जानवरों का इलाका है। वहाँ कभी मत घुसना।….आदम इलाके में घुसा, जानवरों से उलझा। उसे अपना बाहुबल समझ में आया।
…..आग से हमेशा दूर रहना, हव्वा को बताया गया। हव्वा ने आग को छूकर देखा। तपिश का अहसास हाथ और मन पर उभर आया।
….उस पेड़ का फल मत खाना। आदम और हव्वा ने फल खाया। ईडन धरती पर उतर आया।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास – बीच का आदमी… को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)
☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # ६ ☆ श्री मदन शर्मा
(चित्र साभार – श्री जगत सिंह बिष्ट, इंदौर)
≡ छः ≡
आशी को, पहले तो कोई साड़ी पसंद नहीं आ रही थी और अब एक घंटे से, ड्रेसिंग-टेबल के सामने डटी बैठी है!
पूछता हंू, ”आखि़र यह सब करने की ज़रूरत क्या है?”
वह केवल मुस्करा देती है।
“स्त्रियां अपने को कभी नहीं बदल सकतीं!” मैं खीज कर कहता हूं।
”और स्त्रियों के हर मामले में, पुरूषों की दख़ल देने की आदत कभी नहीं जा सकती!”
कहने के बाद, वह फिर मुस्करा पड़ती है।
“अर्चना कहां है?” पूछता हूं।
”लेटी है।”
“क्यों? वह नहीं चलेगी हमारे साथ?”
”कहती है, रेस्ट करना चाहती हूं।”
“कमाल है! कल रात उसने क्या कहा था, याद है?”
”कल रात, हम दो बजे तक जागती रहीं। बातें ही ख़त्म नहीं हो रही थीं और अब उसे नींद आ रही है।”
“जाओ, तुम भी सो जाओ जाकर!” चिड़ कर कहता हूं।
”ना… मुझे तो साथ ही चलना है… आप के साथ साथ क़दम से क़दम मिलाकर… ज़रा देखूं तो वहां जाकर, वह क्या चीज़ है, जिसकी बार बार सराहना करते, दोनों भाई बहन नहीं अघाते!”
“अब तो सुना है, वह पहचानी भी नहीं जाती।”
”तब भी, मिसमार खंडरात को देख कर भी, इमारत की बुलंदी और शानोशौक़त का अन्दाज़ा हो ही जाता है!”
“तुम्हें मज़ाक सूझ रहा है! उस बेचारी से ज़रा भी सहानुभूती नहीं?”
”मुझे तो आप से भी काफ़ी सहानुभूति है!”
औरत हमेशा औरत ही रहेगी! लाख पढ़-लिख जाये। समझदार और योग्य भी कहलाने लगे, किंतु अपनी इन शंकाओं और ईष्र्या से वह कभी मुक्त नहीं हो सकती! इसे साथ ही न ले जाऊं, तो?
मगर साथ जाये बिना, क्या वह टल जायेगी?
ठीक है, चली चलने दो साथ। ज़रा इसे भी तो पता चले, सौंदर्य क्या होता है। अपने को बहुत समझती है न! बड़ा ही नाज़ है इसे अपनी खूबसूरती पर! यह चार बार साड़ी बदल ले। दिन भर डेªसिंग टेबल के सामने बैठ कर बनती संवरती रहे, मगर मीता के सामने टिक पाने में कहां समर्थ होगी?
मीता पर लाख मुसीबतें टूटें, तब भी उसका सौंदर्य नष्ट नहीं हो सकता। आशाी को उसके सामने ग़रदन झुकानी ही पड़ेगी।
अर्चना वाक़ई हमारे साथ नहीं चल रही है।”उसे हरारत सी लग रही है। थोड़ा चिंतित हो जाता हूं।”
”चलो, पहले तुम्हें डाक्टर को दिखा दें।” मैं कहता हूं, तो वह मुस्कराने लगती है।
“दवा ले लेनी चाहिये।” आशी भी अपनी राय ज़ाहिर करती है।
उसके ‘चाहिये’ का वही उच्चारण है, लेडी टीचरों वाला!
अर्चना निश्ंिचत सी कहती है, ”ऐसा कुछ भी तो नहीं। आप तो यों ही चिंतित हो रहे हैं। मामूली थकान है, एक-आध दिन में वैसे ही ठीक हो जायेगी।”
“तो फिर उधर?”
”आप दोनों वहां हो आइये। मैं फिर किसी दिन जाकर मिल लूंगी मीता से।”
मीता अब तक काफी बदल गई होगी। कैसी नज़र आती होगी अब?। मिलने पर बात क्या करूंगा उससे? क्या पूछूंगा?… मुझे देखते ही वह हड़बड़ा सी जायेगी। टकटकी लगा कर देखती रहेगी… आंखों में जल भर आयेगा… फिर अचानक मुस्कराने या हँसने का प्रयास करेगी।
कहेगी, ”सो यु हैव कम।”
”यह क्या हालत बना रखी है?” पूछूंगा।
वह फिर उदास हो जायेगी… मगर मेरे साथ आशाी भी तो होगी। इसे साथ देख, वह पहले तो चैंक जायेगी। फिर अनुमान लगाकर, उसे एक बार तो झटका सा लगेगा। वह ज़रा सम्भलेगी और पुनः मुस्कराने की चेष्ठा करेगी और पूछेगी, शादी कब हुई?”
”तीन साल हो गये।”
“मुझे क्यों नहीं इन्वाइट किया शादी पर?”
मैं चुप हो जाऊंगा। उसकी ओर टकटकी लगाये देखता रहूंगा।
मगर आशी, वह इतनी देर कैसे चुप रह सकेगी? वह ज़रूर पूछेगी, ”हमारे साथ चलोगी?”
उसकी आंखों में एकाएक चमक आ जायेगी। किंतु वह चमक, देखते ही देखते अदृश्य हो जायेगी। मैं प्रश्न करूंगा, ”तुम्हारे अंकल कैसे हैं?”
“ठीक ही हैं!”
चाहूंगा, आशाी थोड़ी देर के लिये इधर उधर हो जाये, ताकि एक बार पूछ सकंू, ”मीता एक बार इतना तो बता दो कि …“
अर्चना द्धारा बताये पते के अनुसार, थ्री व्हीलर से यहां तक आने में अनुमान से भी अधिक देर लग गई है। शहर के बिल्कुल आखिरी छोर पर बसी, यह नई काॅलोनी है।
आशी के चेहरे से लगता है, उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई है।
“क्या बात है, कुछ परेशान-सी लगती हो?” पूछता हूं।
”आप के वहम का इलाज, लुकमान हक़ीम भले न कर सके, मैं ज़रूर कर सकती हूं।”
“बेशक कर सकती हो!”
काफी बड़ी काॅलोनी है। पूछतेे पूछते, यहां तक आ ही पहंुचे हैं। मकानों की संख्या पढ़ते पढ़ते, एक डबल स्टोरी मकान के आगे हम रूक जाते हैं। बड़ा उम्दा डिज़ाइन है मकान का! बहर लकड़ी के गेट पर जैसे नया पेंट हुआ है।
गेट के पार काफी खुला प्रांगन है, जिस का फर्श बहुत चिकना मालूम दे रहा है। मेरी नज़र शायद किसी गमले में खिले फूल या रात की रानी के पौधे को खोज रही है।
काॅलबेल का बटन दबाने के एक मिनट बाद दरवाज़ा खुलता है।
एक महिला दरवाज़े में खड़ी हैं।
”कहिये?”
“श्री एन0 मोहन यहीं रहते हैं?”
”वे लोग पिछले पोर्शन में रहते हैं। उस ओर से जाकर पीछे… मगर वे लोग तो आप को इस समय नहीं मिल सकेंगे।”
“कहीं बाहर गये हुए हैं?”
”कल दिन में वे काफी सीरियस हो गये थे। डाक्टर को घर बुला कर दिखाया। उसने इंजेक्शन दे दिया। साथ ही यह कहा, इन्हें फ़ौरन दिल्ली ले जाइये। बस कल ही रात की ट्रेन से, उनकी लड़की, उन्हें दिल्ली ले गई।”
मैं पूछता हूं, ”कुछ पता चला होगा, वहां कौन से अस्पताल में उन्हें ले जाने को डाक्टर ने कहा था?”
”यह तो हमें नहीं मालूम। वे लोग कभी किसी से बातचीत तो करते नहीं। कल दिन में डाक्टर आया, तो उनकी लड़की से बात हुई। शायद मीता नाम है उसका?”
“जी।”
अजीब स्थिति है!
आशी, जैसे उकता कर कहती है, ”चलिये अब, यहां कब तक खड़े रहेंगे!”
तभी महिला चैंक कर और लज्जित सी होकर कहती है, ”अरे अरे, मैं भी बस क्या हूं! आप तो काफी दूर से आये लगते हैं। भीतर आइये न।”
”बस, चलें।”
“ऐसी भी क्या बात है! पानी वानी पीकर जाइये।”
”थैंक यू।” कह कर आशी बाहर की ओर मुड़ती है।
मैं भी सिर झुकाये, पीछे हो लेता हूं।
आशी रूक जाती है। हम दोनों पीछे घूम कर देखते हैं।
महिला, अभी तक खुले दरवाज़े में मौजूद है।
“मीता जब लौटे, तो हमारे बारे में बता देंगी न?”
”आप?”
आशाी मेरा नाम बता देती है।
आशी चुपचाप मेरे साथ चल रही है। मैं भी चुप हूं। वह अचानक ही बोल उठती है, ”आप का यह शहर तो बहुत खूबसूरत मालूम पड़ता है। यहां से, इतने साल रहने के बाद जब गये होंगे, तो वाक़ई अफ़सोस हुआ होगा।”
मैं कुछ नहीं कहता। वही बोलती है, ”कल सुबह तो हम लोग, यहां से लौट जायेंगे। आप आज दिन दिन में ही शहर घुमा दीजिये। लोग तो न जाने कहां कहां से इधर पर्यटन के लिये आते हैं।”
उन्हीं रास्तों से एक बार फिर गुज़र रहा हूं। आज अकेला नहीं हूं, आशी साथ है। आशी के साथ साथ, जैसे एक परछाई सी भी हमारे साथ चल रही है…
यह परछाई, मेरी या आशी की नहीं, यह परछाई, उदासी की है।
आशी को शहर की ख़ास-ख़ास जगह दिखा दी है। उसे यहां बहुत ही अच्छा लगा है। वह प्रसन्न और आनन्दित सी लग रही है।
शाम घिर आई है। लोकल बस पकड़ कर, हम वापिस फैक्टरी एस्टेट पहुंच गये हैं।
स्ट्रीट लाइट, न जाने क्यों ग़ायब है। किंतु क्वार्टरों के भीतर, बत्तियां जल रही हैं। ऐसा लग रहा है, जैसे क्वार्टर न होकर, ये किसी रेलगाड़ी के डिब्बे हों। दोनों ओर रेलगाड़ियां, जैसे रात के वक़्त, किसी स्टेशन पर रूकी खड़ी हों!
आसपास से गुज़रते चंद स्त्री-पुरूष, जैसे हमें पहचानने की कोशिश करते हैं।
“बाहर के लगते हैं।” एक कहता है।
बाहर के! मैं सोचने लगता हूं। ज़हन में ‘साहिर’ का एक शेर उभरने लगता हैः-
हम इन्हीं फ़िज़ाओं के पाले हुए तो हैं
गर यां नही ंतो यां से निकाले हुए तो हैं
शेर के साथ साथ उस्ताद सोहन लाल की याद भी आ जाती है। वे दिन भी, क्या दिन थे!
विचार भंग होता है। आशी कुछ कह रही है। उसकी ओर ध्यान देता हूं।
”बेचारी मीता!” वह जैसे अफ़सोस ज़ाहिर कर रही हो!
मैं उसकी ओर ग़ौर से देखने की कोशिश करता हूं। वह कह रही है, ”दिल्ली जैसे बड़े शहर में, न जाने वह उसे लेकर, कहां मारी मारी फिर रही होगी! वह अकेलीे कैसे इस तरह के मरीज़ का इलाज करा पायेगी और जब वह इतना सीरियस है, तब बचेगा, तो क्या ही! कहीं कुछ उल्टा सीधा हो गया, तो क्या करेगी? कैसे सम्भालेगी उसे?… और वह सब हो जाने के बाद, वह खुद कहां जायेगी? करेगी क्या वह?
मैं चुप हूं।
“आप क्यों इतना उदास हो रहे हैं? यह तो संसार है, इस जीवन में, न जाने सुबह शाम, क्या कुछ घटता बढ़ता रहता है। मगर… काश! मैं उसे एक बार देख पाती!”
मैं अब भी ख़ामोश हूं।
”इतना मत सोचिये। आप को मैं एक बात बताऊं?”
मेरे ‘बताओ’ कहे बिना ही, वह अपनी बात कहने लगती है… कल रात अर्चना से मेरी खूब बातें हुई, दो बज गये थे बातें करते हुए… आपने पूछा नहीं, कि तब क्या क्या बातें हुईं?”
मैंने तब भी कुछ नहीं पूछा।
”चलो, ठीक है, मैं बिना पूछे ही बता देती हूं।”
वह ज़रा सा रूकने के बाद फिर शुरू हो गई है…
“मैंने अर्चना से पूछा, ”तुमने अरूणा को पढ़ा लिखा दिया उसकी शादी भी कर दी। अब अपने बारे में क्या सोचा है? बस, चुप! जैसे अकसर आप चुप रहा करते हैं, बिल्कुल वैसे ही! उसकी चुप्पी देख तो ऐसा ही लगता है, जैसे वह सचमुच ही आप की सगी बहन हो!… मैंने तो उस से कह दिया, तुम यह काम वाम छोड़ कर किसी आश्रम में जा बैठो। सुबह शाम कीर्तिन किया करना और खड़तालें बजाना। वहां पर, कम से कम, पांच-सात साथ देने वाले तो होंगे। आने जाने वालों से, दो बातें करोगी, तो थोड़ा दिल भी बहलेगा। यहां क्वार्टर में अकेली पड़ी, घुट घुट कर मर जाओगी। कोई पूछने वाला भी न होगा!… मगर वह अर्चना तो… उसी तरह गुम सुम। मैं हैरान परेशान, आखि़र इस लड़की के मन में क्या है? मैं स्कूल में पढ़ाती हूं। इतने-सारे लड़के-लड़कियों और उनके मात-पिता से वास्ता पड़ता है। सभी की बातें, मेरी समझ में आ जाती हैं। मगर यह लड़की तो, बस क्या कहूं! जब वह किसी भी तरह खुल कर बात करने के लिये तैयार ही नहीं हुई, तो मैंने एक अन्य बात भी पूछ ही ली। कहा, अर्चना, एक बात तो बताओ, आखि़र तुम किस के लिये इस तरह घुट घुट कर मर रही हो? तब जानते हैं उसने क्या कहा?”
मैं फिर उसकी ओर, अंधेरे में ही तकने लगा हूं। वह धीरे धीरे चलती और तेज़ तेज़ बोलती जा रही है…
कुछ लोग, क्वार्टरों से निकल कर सड़क पर आ गये हैं। उन्हांेने बग़ल में चादर या कम्बल दबा रखे हैं। लगता है, फैक्टरी में नाइट शिफ़्ट फिर से शुरू हो गई है।
आशी की वार्ता, बदस्तूर जारी है। मैं पुनः उसकी ओर ध्यान देने का प्रयास करता हूं। वह थोड़ा इधर उधर देख कहती है, ”कहीं हम, अर्चना का क्वार्टर पीछे तो नहीं छोड़ आये? स्ट्रीट लाइट के बिना तो कुछ भी पता नहीं चल रहा!”
किंतु शीघ्र ही वह आश्वस्त होकर कहती है, ”नहीं, हम ठीक ही चल रहे हैं। वह रही प्राइमरी स्कूल की इमारत और वह डिस्पैंसरी। उसके बाद जो ब्लाॅक शुरू होता है, उसी में तो है अर्चना वाला क्वार्टर… मैं कुछ कह रही थी। क्या कह रही थी?”
मैं कुछ नहीं कहता। वही बोलती है,
”हां, याद आया… वह बात तो बीच में ही रह गई! मैंने अर्चना से कहा, आज हम लोग तुम्हारे पास बैठे हैं। कल चले जायेंगे। फिर क्या जाने, कब आना हो! तब किस से कह पाओगी अपने मन की बात? अब तो अरूणा भी पास नहीं होगी, जो पूछ ले, क्यों उदास हो, या क्यांे रो रही हो। कोई नहीं होगा पास चुप कराने को…!
”मेरी यह बात सुन उसने चुप्पी तोड़ ही डाली। बोली, अरूणा की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर थी। मां को मैंने वचन दिया था। न भी दिया होता, तब भी मुझे यह ज़िम्मेदारी निभानी ही थी। सो, जितना कर सकती थी, मैंने जैसे-तैसे कर ही दिया। अब मेरी अपनी ज़िम्मेदारी, तो आप दोनों पर है… सुन कर मैं फूले नहीं समाई। सच मानो, बड़ा ही प्यार आया उस पर! बस, अब वहां पहुंच कर, कोई अच्छा सा लड़का तलाश कर लेंगे। हम जो भी करेंगे, उसे स्वीकार होगा। वह मुझे वचन दे चुकी है… अरे, आप तो कुछ बोल ही नहीं रहे!”
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– वरदानी कलंक…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य भँवर # ११४ — वरदानी कलंक —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)
इतिहास साक्षी है राजा एवं ऋषि भगवान की तपस्या करने पर अमरता का वरदान प्राप्त करते थे। पर वरदानी राजा अथवा ऋषि तो नीच अधम निकलते थे। वे भगवान को भस्म करते और स्वयं भगवान हो जाते। इतिहास और भी साक्षी है वैसे तपस्वियों को अमरता का वरदान मिलने पर भी वे मृत्यु की न टूटने वाली नींद में समाये। तभी तो युग बीते, लेकिन आज तक वरदानी अमरता का कोई प्राणी दृष्टिगत होता नहीं है। एक ऋषि हुआ उसने तपस्या से भगवानी वरदान पाया और उलटे भगवान पर टूट पड़ा। पर वह विस्मयकारी ऋषि हुआ। वह भगवान को भस्म नहीं करता। वह भगवान को अपनी परिभाषा से ललकारता। उसने शेर के जबड़ों में हाथ डाल कर भगवान से कहा मेरी अमरता दागदार न हो। पर उसकी अमरता दागदार हुई। शेर ने उसे निगल लिया। भगवान को अच्छा लगा, इस वरदानी झट्टू को भी मरना तो था ही।
(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास – बीच का आदमी… को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)
☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # ५ ☆ श्री मदन शर्मा
(चित्र साभार – श्री जगत सिंह बिष्ट, इंदौर)
≡ पांच ≡
आशी अभी अभी उठ कर किचिन में गई है। चाय की तलब लगी होगी। एक कप चाय, उसके पेट में पहुंचेगी, तभी वह कुछ कहने या सुनने के योग्य हो पायेगी। चाय के बिना वह रह ही नहीं सकती और खूबी यह, कि कप पर कप चढ़ाती जायेगी और पूरी चाय, मेरे नाम लिखती जायेगी!
कल, जब लोग एक एक करके, अर्चना को शगुन के लिफ़ाफे और गिफ़्ट-पैकेट पकड़ाते जा रहे थे, मैंने दो तीन बार आशी की ओर देखा। मगर वह बिल्कुल निश्ंिचंत और तटस्थ सी बैठी थी। मैने उसे अलग बुला कर पूछा, ”हमें भी तो कुछ देना चाहिये था।”
वह निश्ंिचंत-सी बोली, ”आप को ऐसी क्या जल्दी हो रही है!”
“जल्दी? शादी तो आज ही है न!”
वह मुस्कराई और उठ कर अपने एक ओर रखे सामान के पास चली गई। अटैची खोल, एक डिबिया निकाली। फिर चेक बुक निकाल कर एक चेक भरा।
आशी ने टोपस की जोड़ी मुझे दिखा दी। मगर चेक मुझे नहीं दिखाया। दोनों चीज़ें, उसने अर्चना को थमा दीं। अर्चना ने चेक देखा, तो चैंक कर बोली, ”भाभी यह क्या! न न… मैं इतने नहीं लूंगी।”
“बोलने की ज़रूरत नहीं, चुपचाप रख लो।”
”मगर…“ अर्चना ने मेरी ओर देखा। मैंने हंस कर कहा, ”एक तो तुम्हारी भाभी, रिश्ते में बड़ी और फिर टीचर भी! तुम्हारा कोई तर्क नहीं चल पायेगा।”
बाद में मैंने आशी से पूछा, ”चेक में कितना लिखा था?”
वह हंस कर बोली, ”चेक में, आज की तारीख डाल दी, अर्चना का नाम लिख दिया और अपने हस्ताक्षर भी कर दिये। एकाऊंट नम्बर पहले ही लिखा हुआ था।
“मतलब, रूपये कितने लिखे, यह नहीं बताओगी?”
”आप को क्या लेना इन बातों से! यह मेरा काम था, मैंने कर दिया।”
“अर्चना इतने क्यों कह रही थी?”
”रिश्ते निभाने में, स्त्री और पुरूष का नज़रिया अलग अलग होता है, हम स्त्रियों को, बातें बनाने के अतिरिक्त भी बहुत कुछ देखना पड़ता है। आप की समझ में ये बातें नहीं आने की!”
वह दो गिलासों में चाय लिये आ पहुंची है। एक गिलास मेरे हाथ में थमा, वह स्वयं कुर्सी पर बैठ कर सिप करने लगती है,
“अर्चना को भी जगा देना था?” मैं कहता हूं।
”मैं उसे चाय देकर आई हूं।”
तीन-चार घंटे की गहरी नींद लेकर, अर्चना सामान्य नज़र आने लगी है और खूब बातें कर रही है। फैक्टरी में इस दौरान क्या क्या परिवर्तन हुए हैं। कितनी प्रमोशनें हुई हैं। कौन कौन-सी नई इमारतों का निर्माण हुआ है। कितनी भीड़ होती है अब सुबह शाम फैक्टरी के गेट पर… बहुत से पुराने लोग, रिटायर हो चुके हैं। कितने ही नये भरती हो गये हैं। अनुशासन अब पहले जैसा नहीं रहा। काफी बिगड़ गया है। कोई किसी की सुनता ही नहीं…”
”यूनियन-बाज़ी कैसी चल रही है?”
“आडम्बरबाज़ी कहिये। जो नेता, दिन में, ऊंची आवाज़ में नारे लगाते हैं, अफ़सरों को गालियां देते हैं, वही शाम को बेंगलो एरिया में जाकर अफ़सरों को मस्का लगाने का काम करते हैं। नेताओं की, आपस में ही होड़ लगी रहती है। वे हर वक़्त एक दूसरे की टांग खींचने मंें ही लगे रहते हैं।”
”अफ़सरों का व्यवहार कैसा है अब?”
“पहले जैसा तो नहीं। मगर आजकल के अफ़सर बहरूपियों जैसे नज़र आते हैं।”
”वह कैसे?”
“एक मिनट में कुछ और दूसरे मिनट कुछ और।”
”यह बात तो पहले भी थी।” मैं कहता हूं।
“पहले कुछ दूसरे ढंग से होता था। अब एक ओर तो वे यह ज़ाहिर करते हैं, कि वे समाजवादी हैं, सभी को बराबर मानते और समझते हैं और भीतर ही भीतर, अपने को कुशल प्रशासक समझ कर, पुराने हथकंडे प्रयोग में लाते रहते हैं।”
”अब तो फैैक्टरी में और भी लड़कियां काम करने लगी होंगी?”
“भीड़ लग गई ह ैअब तो लड़कियांे की! दिनभर धमाचैकड़ी मचाये रखती हैं। काम कम और बातें अधिक!”
”लड़के, छेड़ख़ानी तो नहीं करते उनसे?”
“छेड़ख़ानी? कुछ दिन पहले की बात है, एक क्लर्क ने रिपोर्ट कर दी, कि जब वह नल पर पानी पीने जाता है, उसे लड़कियां छेड़ती है।”
मैं हंसने लगा। फिर जैसे अचानक ही कुछ याद आ गया हो।
पूछा, ”मीता कहां है आजकल?”
“यहीं है।”
”उसे निमंत्रण नहीं दिया था?”
“बिल्कुल दिया था।”
”फिर आई क्यों नहीं? कहीं बीमार न हो?”
“उसे बीमार ही समझिये!”
”मतलब?”
“वह आजकल, कहीं इधर उधर नहीं जाती।”
”क्यांे? कोठी में ही बंद रहती है?”
“कोठी में कहां! वे लोग आजकल शहर में रहते हैं। दरअसल, मीता के अंकल को लकवा हो गया था। बहुत इलाज कराया, मगर कुछ भी लाभ न हुआ। सर्विस पूरी होने से दो साल पहले ही रिटायरमेंट लेना पड़ गया। आजकल शहर में, वे किराये के मकान में रहते हैं। मीता और उसके अंकल।”
मीता अभी तक उसके साथ है, मैं इसी बात के बारे में सोच कर आश्चर्य किये जा रहा हूं। मीता और ‘वह’ उसका अंकल एन0 मोहन। वही मैनेजर, जिसके बारे में अर्चना ने बताया, कि उसका शरीर बेकार हो चुका है।
मीता की अंाटी, जिन के ट्रंक अलमारियां, रंग बिरंगे रेशमी और क़ीमती वस्त्रों से भरे रहते थे और वे स्वयं, सफे़द साड़ी ब्लाउज़ में, पति के होते हुए भी, सूनी मांग लिये, घंटों चुपचाप, छोटे से कमरे में अलग थलग बैठीं, छत और दीवारों को ताकती रहती थीं।
उस दिन भी, वे सफ़ेद परिधान में, फ़र्श पर लेटी, छत को ही जैसे ताके जा रही थी। नहीं मालूम, क्या सोचते हुए, उनकी चेतना सदा के लिये लुप्त हुई होगी!
सभी कुछ समाप्त हो गया था। किंतु वे आंखें, जो उनके द्धारा पहने गये वस्त्रों की तरह ही सफ़ेद हो चली थीं, ऊपर छत से, जैसे किसी प्रश्न का उत्तर मांग रही थीं।
एन0 मोहन स्वयं ‘केबल’ द्धारा, दोनों बेटों को सूचित करने कहीं गया था। उसका अपना फ़ोन न जाने कब ख़राब हो गया था।
यह भी पता चला, कि वह डाक्टर को साथ लेकर, पुलिस स्टेशन गया था। वहां से लौट कर वह बैंक पहुंचा और एक भारी रकम निकलवा कर, किसी बड़े पुलिस अफ़सर की कोेठी पर भी गया था।
बड़े बेटे से, उस की बात ही नहीं हो पाई। छोटा, बड़ी ही बेरूख़ी से पेश आया। कहने लगा, ”मां चली गई, हमारे लिये सभी कुछ समाप्त हो गया। अब हमारे आने या जाने का मक़सद ही क्या रह जाता है!”
एन0 मोहन ने कुछ और कहना चाहा, तो उत्तर और भी कड़वा मिला, ”आप के लिये तो यह अच्छा ही हो गया। अब आप के सभी रास्ते साफ़ हैं, जो जी में आये, करते जायें। कोई भी रोकने-टोकने वाला नहीं।”
किंतु एन0 मोहन, इतना जल्द हारने वाला व्यक्ति नहीं था। अपने पद, धन और चातुर्य के बल पर, उसने सभी कुछ ठीक ठाक कर लिया था और वह कुछ ही दिन बाद, उसी तरह अकड़ के साथ और तन कर फैक्टरी की सड़कों पर और सेक्शनों में गश्त लगा रह था, जैसे इस बीच कुछ भी न हुआ हो!
तब भी, उसके पूरे अभिनय के बावजूद, देखने वाले को यह पता चल ही जाता था, कि वह भीतर से लगातार टूटता चला जा रहा है। यह दूसरी बात है, कि वह अपनी हार स्वीकार करने को, किसी भी हालत में तैयार न था।
मैं मीता से अब भी मिलता रहता था। हमारे मिलने पर एन0 मोहन ने किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाया था। मगर कभी कभी महसूस होता, कि उसे हमारा मिलना जुलना विशेष अच्छा नहीं लगता।
स्थिति विकट थी। चाहते हुए भी, मैं वहंा जाना नहीं छोड़ पाया। एक बार कारणवश मैं दो तीन दिन तक उधर नहीं जा सका, तो एन0 मोहन ने मुझे स्वयं बुला भेजा।
वह बड़ी गम्भीरता से बातें कर रहा था। मालूम पड़ा, वह मीता के बारे में बेहद चिंतित है। कहने लगा, ”यह लड़की कहीं पागल न हो जाये। समझाने पर भी कुछ नहीं समझती। ठीक से खा-पी नहीं रही। रात को उठकर बैठ जाती है और न जाने, क्या बड़बड़ाती रहती है।”
“उसके कम्पीटीशन का क्या रहा?” मैंने पूछा तो वह व्यंग्यात्मक हंसी हंस कर बोला, ”कौन से कम्पीटीशन! मेर घर में तो बेवकूफ़ियों के कम्पीटीशन चल रहे हैं! और उसमें… वह सबसे आगे निकल गई!”
मैं केवल सुन रहा था।
वह मिन्नत सी करते बोला, ”तुम ही इसे समझाओ न।”
मैं मीता को सामान्य स्थिति में लाने के लिये लगातार प्रयास किये जा रहा था, वह किसी तरह खुल जाये, मन हल्का हो और यहां से वह कहीं और चली जाये, जहां उसका कोई अपना हो।
किंतु उसका अपना, कौन हो सकता था?
कितने ही दिन के लगातार प्रयास के बाद, वह कुछ खुल पाई थी… डैडी का इतना बड़ा बिज़नेस, एक ही झटके में तबाह हो जायेगा, कौन जानता था। कुछ ही दिन में ज़मीन और कोठी के साथ साथ, घर के जेवरात तक चले गये… डैडी बहुत ही सेेंटीमेंटल थे। पहले हार्ट अटैक में ही हमें छोड़, चलते बने… बड़ा ब्रदर, एक नम्बर का शराबी और गेम्बलर। हर वक्त नशे में धुत ही दिखाई पड़ता था। बस, वही एक था कहने के लिये अपना। मां तो उससे भी पहले चल बसी थी।
उन्हीं दिनों, उसका अंकल, अर्थात मीता का फूफ़ा, अपने साले का शोक व्यक्त करने, वहां पहुंचा हुआ था। उसने मीता को, अपने साथ ले जाने के लिये सहमत कर लिया। अन्य सभी रिश्तेदारों ने भी इस योजना की सराहना की। अच्छे माहौल में रहकर, लड़की योग्य बन जायेगी और अपने फूफा की कोशिश से, किसी अच्छे से घर की शोभा भी बन जायेगी।
वह उसे कार में बिठा कर अपने साथ ले आया। कुछ ही दिनों में, उसने अपने हंसी-मज़ाक और चुटकलेबाज़ी से, उसका सभी दुख-दर्द भुला दिया। वह उसे उत्साह बढ़ाते हुए कहता, ”तुम ग्रेज्युएट हो। समझदार भी काफी हो। कुछ दिन की मेहनत करके, आई. ए0 एस0 बन सकती हो। अरे, फिर तो तुम अपने इस अंकल से भी बड़ी अफ़सर बन जाओगी!”
बहुत प्रयास करने के बाद, वह थोड़ा सा और खुल पाने में समर्थ हुई… अंकल को आंटी, पहले बहुत ही चाहती थीं। शादी से पहले, अंकल के कई लड़कियों के साथ रिलेशनस रहे थे। आंटी ने कभी इस बात को तूल नहीं दी थी। मैरेज हो जाने के बाद भी अंकल ने कई जगह इधर उधर हाथ मारने की कोशिश की थी, जिन की भनक, आंटी के कानों में पड़ती रहती थी। मगर आंटी ने तब भी, अंकल को कुछ नहीं कहा। मगर कोई सहन करे, तो कहां तक?… आंटी शुरू शुरू में, मीता से सभी तरह की बात कर लिया करती थीं। एक दिन कहने लगी-दो शादीशुदा लड़कों का पिता, इधर उधर आंख मिचैनी खेलता फिरे, तो कितनी शरम की बात है! इतनी बड़ी पोस्ट का आदमी, सरकारी जिम्मेदार अफ़सर, रात को उठ कर, बंगले में मौजूद साफ़ सुथरे बिस्तर और पत्नी को छोड़कर सर्वेंट क्वार्टर की गन्दगी संूघता फिरे, यह मर जाने की बात नहीं?… एक दिन, आंटी रोकर बोलीं, मैं ऐसे आदमी के साथ और नहीं रह सकती, जो ज़रा सी बात के लिये, किसी मासूम लड़के को गुंडों से इस तरह पिटवा दे, कि उसके प्राण ही निकल जायें… मुझे इस आदमी से घिन आने लगी है। अब मैं इसे और अधिक सहन नहीं कर सकती…
मीता ने यह सब एक ही बार में नहीं बताया था। केवल टुकड़ों में ही, मैं इन बातों को जान पाया था। मैंने उसे सांत्वना देने के विचार से कहा, ”कितने ही पुरूष हैं, जो यह सब करते हैं। सभी की स्त्रियां तो इस तरह आत्महत्या नहीं कर लेतीं।”
”आंटी तो अंकल की हर एक्टीविटी वाच करने लगी थीं। एक दिन…“
“रूक क्यों गईं?”
मीता चुप थी।
”न बताना चाहो, तो रहने दो।” मैंने उसे चुप देखकर कहा।
“नहीं, अब कुछ भी नहीं छिपाऊंगी… एक दिन, नहीं एक रात, अंकल मुझे नाइट शो दिखाने शहर ले गये। किसी इंगलिश फ़िल्म का लास्ट शो था। पौने एक का वक़्त होगा, जब हम घर लौटे। डिनर हमने बाहर ही ले लिया था… मैंने ड्रेस बदला। बिस्तर में लेटते ही आंखें मुंद गईं। कह नहीें सकती, तब कितने बजे थे, जब किसी को अपने ऊपर झुके पाकर, मैं चीखने ही वाली थी, कि एक भारी हाथ ने मेरा मुंह बंद कर दिया। मैंने ज़ोर लगा कर उठने की कोशिश की, तो वह पीछे मेज़ से टकरा गया और मेज़ पर पड़ा पानी का जग, फ़र्श पर गिर कर चिकनाचूर हो गया… उधर आंटी चीखीं… कौन है, कौन है?… वह फुर्ती से निकल भागा था। अंधेरे में मैं उसकी शक्ल नहीं देख सकी थी। मगर आंटी का यही कहना था, कि वह और कोई नहीं, तुम्हारे अंकल हीे होंगे… उसके बाद, घर में कई दिन तक झगड़े का माहौल बना रहा। अंकल अपने ऊपर ऐसा लगा लांछन, स्वीकार करने को तैयार न थे और आंटी भी अपनी ज़िद पर अड़ी थीं।
“तुम्हें बिल्कुल शक नहीं हुआ, कौन था?”
”शक कैसे किया जाये? किस पर किया जाये, जब मैंने उसकी शक्ल देखी ही नहीं। मगर आंटी मानी ही नहीं। वे अपनी बात पर अड़ी ही रहीं और…“
मीता अब थोड़ा सामान्य हो चली थी। एक दिन उसने बहुत पहले अपनी कही बात पुनः दोहराई। कहने लगी,
“मेरी मानें, तो आप अर्चना से शादी कर ही लें। इतनी अच्छी लड़की आप को और कहीं नहीं मिलेगी। सो लवली एंड सो सिम्पल! व्हाट एल्स यु वांट?”
”देखो मीता…”
“फिर वही देखो मीता! आखि़र क्या कमी है उस लड़की में?”
”मेरी बात तो सुन लो।”
“ठीक है, सुनाइये?”
”मैं अर्चना को, छोटी बहन की तरह मानता हूं।”
“वाह! वहीं घिसी पिटी बातें! दुनिया कहां से कहां पहुंच गई और आप… क्या कहने!”
”उसका भाई नहीं रहा। वह भी इसी लिये मेरा आदर करती है।”
“उससे भी कभी आपने पूछा? क्या वह भी आप को एक बहन की तरह ही चाहती है?”
”ये बातें भी क्या पूछने या बताने की होती है!”
“तो आप… बिल्कुल शादी नहीं करना चाहते?”
”बिल्कुल का क्या मतलब?”
“मतलब, उससे नहीं, या किसी से भी नहीं?”
”किसी से?”
“मेरे साथ भी मैरेज नहीं कर सकते?”
”क्या…?”
इतनी महत्वपूर्ण बात, अकस्मात और सीधे सीधे सुनकर मैं हड़बड़ा गया था।
“क्या ऐसा हो सकता है?” मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था।
”क्यों नहीं हो सकता!” वह निर्भय थी।
“तुम्हारे अंकल?” मैं अभी तक आशंकित था।
”मैं अब, हर हालत में, अंकल से छुटकारा पा लेना चाहती हूं।”
मैं सोच में पड़ गया।
“सिर्फ़ सोचेंगे? मेरी बात का जवाब नहीं देंगे?”
”जवाब भी दूंगा।”
“कब?”
”अभी, इसी वक़्त… मैं शादी के लिये तैयार हूं!”
“थैंक्स!”
”अंकल के साथ तुम साफ़ तौर पर बात कर सकोगी?”
“हां, बात तो मुझे ही करनी होगी!”
दो दिन बाद ही, मीता मिली। खूब सजधज कर आई थी वह। आते ही चहक कर बोली, ”अंकल मान गये!”
“सच?” मुझे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था।
”बिल्कुल सच। उन्होंने तो ज़रा भी आब्जेक्शन नहीं किया। बल्कि सुन कर, बहुत खुश हुए और मेरी पीठ भी थपथपाई।”
तीन चार दिन ही गुज़रे थे, मुझे जेनरल मैनेजर के कार्यालय में उपस्थित होने का निदेश प्राप्त हुआ। मैं बड़े उत्साह में था। मैंने इस दौरान, अपने सेक्शन में कार्य बड़े ही परिश्रम से किया था और दूसरों से भी खूब काम लिया था। हो सकता है, उसी उपलक्ष में मेरा प्रमोशन कर दिया गया हो, या नक़द पुरस्कार, मेरे लिये स्वीकृत हो जाने की सूचना देने के लिये, बड़े साहब ने मुझे बुलाया हो।
“प्लीज़, टेक मोर सीट।”
मैं थैंक्स कह कर बैठ गया।
”आप आजकल इंस्पेक्शन में हैं?”
“जी।”
”कब से हैं?”
मैंने अवधि बता दी।
वे मेरी ओर ग़ौर से देखने लगे। फिर एक काग़ज मेरी ओर बढ़ा कर बोले, ”इसे देखिये, यह साइन आप के हैं?”
”जी।”
“यह काम, आपने खुद चेक किया था?”
”सर, बात यह है…“
किंतु उन्होंने मुझे बीच में ही टोक कर कहा,
“नो नो, बात वात कुछ नहीं। सिर्फ़ उस बात का जवाब दीजिये, जो पूछी गई है।”
”जी।”
“चेक किया था?”
”नहीं।”
“मतलब, आप ने बिना चेक किये ही, सामान को पास कर दियाः कितना पैसा खाया?”
”सर!”
“देखो, जो भी हुआ है, मुझे साफ़ साफ़ बता दो। यू नो वेरी वेल, आई डोंट टाॅलरेट एनी कोरप्शन इन माई डिपार्टमेंट!”
मैं चुप था। बोलता भी क्या! यह आक्रमण तो अचानक ही मेरे ऊपर कर दिया गया था।
”मिस्टर, नौकरी तो इस केस में जायेगी ही… पुलिस को भी हैंड ओवर करना पड़ सकता है।”
“सर, कुछ मेरी भी सुनेंगे?”
”ज़रूर सुनेंगे… मगर मिस्टर, यह सब करने के बाद भी, एक बार आप अगर यहां आकर मुझे बता देते, तो मैं इस केस को, किसी तरह सम्भाल ही लेता। मगर यह केस तो काफी ऊपर तक जा पहुंचा है। किसी ने सीधे ऊपर रिपोर्ट कर दी है… आप की वजह से, मुझे भी नीचा देखना पड़ गया… हाऊ सैड!”
“सर…”
”हां हां, कहिये?”
“मुझे सहगल सर ने कहा था, कि इस काम की बहुत ही जल्दी है। कोई गड़बड़ होगी तो वह देख लेगा।”
”उसके साइन हैं किसी काग़ज़ पर? कोई चिट या नोटिंग? चिट या नोटिंग? मुझे कमरे की दीवारें ही नहीं, सभी कुछ घूमता नज़र आने लगा।”
“दो दिन का टाइम देता हूं, अपना कोई बचाव करना हो, तो कर लो।”
कुछ समझ में नहीं आ रहा था, यह सब कैसे हो गया। कोई अन्य चारा न देख, मैं उसी मैनेजर एन0 मोहन की शरण में जा उपस्थित हुआ।
उसने मेरी पूरी बात सुनी। सुनकर उसने गम्भीरता प्रदर्शित की,
”इतनी लापरवाही नहीं करनी चाहिये थी!”
“सर, मुझे एसिस्टेंट मैनेजर सहगल ने धोखा दिया।”
”वह तो साला शुरू से ही बदमाश है! मैं उसे अच्छी तरह जानता हूं। मगर मिस्टर, एक बात कहूं, वो… कोई किसी को धोखा नहीं देता। धोखा, आदमी अपने से ही खाता है।”
मैं चुप रहा।
“तो, क्या चाहते हो?”
”सर, मैं इस समय सख़्त मुसीबत में हूं। कुछ सूझ नहीं रहा, क्या करूं! आप मुझे किसी तरह बचा लें सर!”
“किसी तरह?… सुनो।”
”जी।” मुझे आशा की किरण नज़र आई।
“तुम एक अच्छे लड़के हो एंड आई लाइक यु वेरी मच… बट…”
”सर?”
“जेल जाने से तो मैं तुम्हें बचा ही लूंगा। मगर… तुम एक काम करो।”
”जी?”
“अपना रिज़ाइन लिख कर मुझे दे दो। बाकी मैं सब कुछ ठीक करा दूंगा।”
”सर!”
“नौकरियों की कमी नहीें, बहुत मिल जाती हैं।”
”कहां मिलती है नौकरी इन दिनों सर!”
“अरे, कोशिश करने पर सभी कुछ मिल जाता है। मगर दिल छोटा करने से कुछ भी नहीं मिलता।”
”सर, और कोई रास्ता नहीं?”
“घबराने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। नौकरी मिल जायेगी। बल्कि इससे भी बढ़िया मिल सकती है। चाहो, तो रिज़ाइन करने से पहले, एप्वायेंटमेंट लेटर लेकर, जेब में रख लो। मगर एक शर्त होगी।”
मैं अब तक, नज़र झुका कर और गिड़गिड़ा कर बात कर रहा था। उसकी यह बात सुनते ही, मैं बुरी तरह चैंक गया।
ग़ौर किया, उसका लम्बा चैड़ा शरीर, उसी तरह तवाना है। चेहरे पर वही पहले जैसी सुर्खी मौजूद है और बड़ी-बड़ी आंखों में चिर प्रतिचित शरारत तैर रही है!
मगर एक शर्त होगी!
एक क्षण के लिये, मैं उसकी ओर देखता रहा। फिर कहा,
”मैं शर्त समझ गया!”
“देट्स व्हाई, आई लाइक यु सो मच!”
”मगर एक बात ज़रूर जानना चाहंूगा।”
“बोलो।”
”यह शर्त क्यों?”
“यह नहीं बताया जा सकता!”
”नुक़सान क्या है बताने में?”
“फ़ायदा भी क्या होगा जानकर? सोच लो। अच्छी तरह से सोच लो। फ़िल्मी हीरो की तरह, यहां से निकल कर जेल जाना चाहते हो, तो शौक़ से जाओ। कोई रोकने या टोकने वाला नहीं और अच्छे ढंग से कमा कर और इज़्जत के साथ दो वक़्त की रोटी खाना चाहते हो, तो उसके लिये भी रास्ता खुला है। अच्छी तरह सोच लो और फ़ैसला कर लो, कि तुम्हारे लिये क्या बेहतर है। दिल माने, तो मुझ से फिर मिल लेना। वरना…”
मैं फ़िल्मी हीरो नहीं था, जो हँसते, गाते या नारे लगाता हुआ, जेलयात्रा के लिये वहां से रवाना हो जाता। मैं सिर्फ़ एक मामूली आदमी था। इसलिये वही किया, जो एक मामूली आदमी से अपेक्षित था।
मैंने, दूसरे शहर जाकर नई नौकरी तलाश कर ली और धीरे-धीरे, नई जिं़दगी में रमने की कोशिश करने लगा और फिर एक दिन, आशी का साथ भी मिल गया।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
आज प्रस्तुत है लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा दर्शाती सुप्रसिद्ध लघुकथाओं में से एक सर्वश्रेठ लघुकथा – स्टिकर। हम आपके साथ भविष्य में भी श्री कमलेश भारतीय जी की सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ आपसे साझा करते रहेंगे। कृपया आत्मसात करें।
☆ लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा : स्टिकर ☆
एक पार्टी के लोग मुझसे चंदा मांगने आए । उनके भले चेहरों को देखकर मैं इंकार न कर सका । चलते चलते वे अपनी पार्टी का स्टिकर भी ड्राइंगरूम में लगा गये । मैं विचारों से सहमत न होते हुए भी लोकलज्जावश चुप रह गया ।
अब जो भी आता, पहले मुझको, फिर स्टिकर को घूरने लगता । घुमा फिरा कर पूछ ही लेता कि क्या मैं फलां पार्टी का सदस्य हूं । मैं इंकार में सिर हिला देता । अगला सवाल फिर होता, यदि सदस्य नहीं तो क्या इस पार्टी के हमदर्द हो ? मैं मासूम सा इंकार फिर कर देता । फिर तो जैसे तोप का मुंह मेरी ओर हो जाता ।
मोटी सी बात कही जाती- जब सदस्य नहीं, हमदर्द नहीं, तो फिर चंदा किसलिए ?
अब मेरा माथा ठनका । यह मामूली सा स्टिकर मेरी जान का जंजाल बन गया । बात ठीक भी लगने लगी । यदि किसी पार्टी का स्टिकर मेरे ड्राइंगरूम में लगेगा तो मेरे ही विचारों का प्रतिरूप माना जायेगा । मैं मामूली से स्टिकर को अपना मुखौटा क्यों बनने दूं ? किसी की विचारधारा को मैं क्यों ढोता फिरूं ?
एक फैसले के तहत मैने चाकू लेकर स्टिकर को काट दिया और मुक्ति की सांस ली