हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५७ – “बुंदेली के विद्वान स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।

ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व बुंदेली के विद्वान स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तवके संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)

स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव

☆ कहाँ गए वे लोग # ५७ ☆

☆ बुंदेली के विद्वान स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ईसुरी बुंदेलखंड के सुप्रसिद्ध लोक कवि हैं, उनकी रचनाओं में ग्राम्य संस्कृति एवं सौंदर्य का चित्रण है। बुंदेली बुन्देलखण्ड में बोली जाती है। यह कहना कठिन है कि बुंदेली कितनी पुरानी बोली हैं। भरतमुनि के नाट्य शास्‍त्र में भी बुंदेली बोली का उल्लेख मिलता है। भवभूति उत्तर रामचरित के ग्रामीणों की भाषा विंध्‍येली प्राचीन बुंदेली ही थी। आशय मात्र यह है कि बुंदेली एक प्राचीन, संपन्न, बोली ही नहीं अपितु परिपूर्ण लोकभाषा है। क्षेत्रीय आकाशवाणी केन्द्रों ने इसकी मिठास संजोई हुई है। ऐसी लोकभाषा के उत्थान, संरक्षण व नव प्रवर्तन का कार्य तभी हो सकता है जब क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों, संस्थाओं, पढ़े लिखे विद्वानों के द्वारा बुंदेली में नया रचा जावे। बुंदेली में कार्यक्रम हों। जनमानस में बुंदेली के प्रति किसी तरह की हीन भावना न पनपने दी जावे, वरन उन्हें अपनी भाषा के प्रति गर्व की अनुभूति हो। प्रसन्नता है कि बुंदेली भाषा परिषद, गुंजन कला सदन, वर्तिका, अखिल भारतीय बुन्देलखण्ड साहित्य संस्कृति परिषद, पाथेय, जैसी संस्थाओं ने यह जिम्मेदारी व्यापक स्तर पर उठाई हुई है। प्रति वर्ष 1 सितम्बर को स्व. डा. पूरनचंद श्रीवास्तव जी के जन्म दिवस के सुअवसर पर बुंदेली पर केंद्रित अनेक आयोजन होते हैं।

आवश्यक है कि बुंदेली के विद्वान लेखक, कवि, शिक्षाविद स्व. पूरनचंद श्रीवास्तव जी के व्यक्तित्व, विशाल कृतित्व से नई पीढ़ी को परिचित करते रहें। जमाना इंटरनेट का है, किंतु बुंदेली के विषय में, उसके लेखकों, कवियों, साहित्य आदि के संदर्भ में इंटरनेट पर जानकारी नगण्य है।

स्व. पूरनचंद श्रीवास्तव जी का जन्म 1 सितम्बर 1916 को ग्राम पिपरटहा, तत्कालीन जिला जबलपुर अब कटनी में हुआ था। कायस्थ परिवारों में शिक्षा को हमेशा से महत्व दिया जाता रहा है, उन्होंने अनवरत अपनी शिक्षा जारी रखी और पी एच डी की उपाधि अर्जित की। वे हितकारिणी महाविद्यालय जबलपुर से जुड़े रहे और विभिन्न पदोन्तियां प्राप्त करते हुये प्राचार्य पद से 1976 में सेवानिवृत हुये। यह उनका छोटा सा आजीविका पक्ष था पर इस सबसे अधिक वे बहुत बड़े साहित्यकार थे। बुंदेली लोक भाषा उनकी अभिरुचि का विषय था। उन्होंने बुंदेली में और बुंदेली के विषय में खूब लिखा। रानी दुर्गावती बुंदेलखण्ड का गौरव हैं। वे संभवतः विश्व की पहली महिला योद्धा हैं जिनने रण भूमि में स्वयं के प्राण न्यौछावर किये। “वीरांगना रानी दुर्गावती” पर श्रीवास्तव जी का खण्ड काव्य बहुचर्चित, महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है। “भौंरहा पीपर” उनका एक और बुंदेली काव्य संग्रह है। भूगोल उनका अति प्रिय विषय था और उन्होंने भूगोल की आधा दर्जन पुस्तकें लिखीं, जो शालाओं में पढ़ाई जाती रही हैं। इसके सिवाय अपनी लम्बी रचना यात्रा में पर्यावरण, शिक्षा पर भी उनकी किताबें हैं, विभिन्न साहित्यिक विषयों पर स्फुट शोध लेख, साक्षात्कार आदि अनेक प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में, आकाशवाणी में प्रकाशित – प्रसारित होते रहे हैं। संगोष्ठियों में सक्रिय भागीदारी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा रहा है। मिलन, गुंजन कला सदन, बुंदेली साहित्य परिषद, आंचलिक साहित्य परिषद जैसी अनेकानेक संस्थायें उन्हें सम्मानित कर स्वयं गौरवांवित होती रही हैं। वे उस युग के यात्री रहे हैं जब आत्म प्रशंसा और स्वप्रचार श्रेयस्कर नहीं माना जाता था, एक शिक्षक के रूप में उनके संपर्क में जाने कितने लोग आते गये और वे पारस की तरह सबको संस्कार देते हुये मौन साधक बने रहे।

उनके कुछ चर्चित बुंदेली गीत उधृत कर रहा हूं . . .

कारी बदरिया उन आई. . .  ️

कारी बदरिया उनआई, हां काजर की झलकार।

 

सोंधी सोंधी धरती हो गई, हरियारी मन भाई,

खितहारे के रोम रोम में, हरख-हिलोर समाई।

 

ऊम झूम सर सर-सर बरसै, झिम्मर झिमक झिमकियाँ।

लपक-झपक बीजुरिया मारै, चिहुकन भरी मिलकियां।

रेला-मेला निरख छबीली- टटिया टार दुवारे,

कारी बदरिया उनआई, हां काजर की झलकार।

 

औंटा बैठ बजावै बनसी, लहरी सुरमत छोरा।

अटक-मटक गौनहरी झूलैं, अमुवा परो हिंडोरा।

 

खुटलैया बारिन पै लहकी, त्योरैया गन्नाई।

खोल किवरियाँ ओ महाराजा सावन की झर आई

ऊँचे सुर गा अरी बुझाले, प्रानन लगी दमार,

कारी बदरिया उन आई, हां काजर की झलकार।

 

मेंहदी रुचनियाँ केसरिया, देवैं गोरी हाँतन।

हाल-फूल बिछुआ ठमकावैं भादों कारी रातन।

माती फुहार झिंझरी सें झमकै लूमै लेय बलैयाँ –

घुंचुअंन दबक दंदा कें चिहुंकें, प्यारी लाल मुनैयाँ।

हुलक-मलक नैनूँ होले री, चटको परत कुँवार,

कारी बदरिया उनआई, हाँ काजर की झलकार।

 

इस बुंदेली गीत के माध्यम से उनका पर्यावरण प्रेम स्पष्ट परिलक्षित होता है।

इसी तरह उनकी एक बुन्देली कविता में जो दृश्य उन्होंने प्रस्तुत किया है वह सजीव दिखता है।

 

बिसराम घरी भर कर लो जू. . .

बिसराम घरी भर कर लो जू, झपरे महुआ की छैंयां,

ढील ढाल हर धरौ धरी पर, पोंछौ माथ पसीना।

तपी दुफरिया देह झांवरी, कर्रो क्वांर महीना।

भैंसें परीं डबरियन लोरें, नदी तीर गई गैयाँ।

बिसराम घरी भर कर लो जू, झपरे महुआ की छैंयां।

 

सतगजरा की सोंधी रोटी, मिरच हरीरी मेवा।

खटुवा के पातन की चटनी, रुच को बनों कलेवा।

करहा नारे को नीर डाभको, औगुन पेट पचैयाँ।

बिसराम घरी भर कर लो जू, झपरे महुआ की छैंयां।

 

लखिया-बिंदिया के पांउन उरझें, एजू डीम-डिगलियां।

हफरा चलत प्यास के मारें, बात बड़ी अलभलियां।

दया करो निज पै बैलों पै, मोरे राम गुसैंयां।

बिसराम घरी भर कर लो जू, झपरे महुआ की छैंयां।

 

वे बुन्देली लोकसाहित्य एवं भाषा विज्ञान के विद्वान थे। सीता हरण के बाद श्रीराम की मनः स्थिति को दर्शाता उनका एक बुन्देली गीत यह स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त है कि राम चरित मानस के वे कितने गहरे अध्येता थे।

अकल-विकल हैं प्रान राम के–

अकल-विकल हैं प्रान राम के बिन संगिनि बिन गुँइयाँ।

फिरैं नाँय से माँय बिसूरत,करें झाँवरी मुइयाँ।

 

पूछत फिरैं सिंसुपा साल्हें, बरसज साज बहेरा।

धवा सिहारू महुआ-कहुआ, पाकर बाँस लमेरा।

वन तुलसी वनहास माबरी, देखी री कहुँ सीता।

दूब छिछलनूं बरियारी ओ, हिन्नी-मिरगी भीता।

खाई खंदक टुंघ टौरियाँ, नादिया नारे बोलौ।

घिरनपरेई पंडुक गलगल, कंठ – पिटक तौ खोलौ।

ओ बिरछन की छापक छंइयाँ, कित है जनक-मुनइयाँ ?

अकल-विकल हैं प्रान राम के बिन संगिनि बिन गुँइयाँ।

 

उपटा खांय टिहुनिया जावें, चलत कमर कर धारें।

थके-बिदाने बैठ सिला पै, अपलक नजर पसारें।

मनी उतारें लखनलाल जू, डूबे घुन्न-घुनीता।

रचिये कौन उपाय पाइये, कैसें म्यारुल सीता।

आसमान फट परो थीगरा, कैसे कौन लगावै।

संभु त्रिलोचन बसी भवानी, का विध कौन जगावै।

कौन काप-पसगैयत हेरें, हे धरनी महि भुंइयाँ।

अकल-विकल हैं प्रान राम के बिन संगिनि बिन गुँइयाँ।

 

बुंदेली भाषा का भविष्य नई पीढ़ी के हाथों में है, अब वैश्विक विस्तार के सूचना संसाधन कम्प्यूटर व मोबाईल में निहित हैं, समय की मांग है कि स्व. डा. पूरनचंद श्रीवास्तव जैसे बुंदेली के विद्वानों को उनका समुचित श्रेय व स्थान, प्रतिष्ठा मिले व बुंदेली भाषा की व्यापक समृद्धि हेतु और काम किया जावे।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023 मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

संकलन – श्री प्रतुल श्रीवास्तव

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

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आप गत अंकों में प्रकाशित विभूतियों की जानकारियों के बारे में निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं –

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १ ☆ कहाँ गए वे लोग – “पंडित भवानी प्रसाद तिवारी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २ ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३ ☆ यादों में सुमित्र जी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४ ☆ गुरुभक्त: कालीबाई ☆ सुश्री बसन्ती पवांर ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५ ☆ व्यंग्यकार श्रीबाल पाण्डेय ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ७ ☆ “स्व गणेश प्रसाद नायक” – लेखक – श्री मनोहर नायक ☆ प्रस्तुति  – श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ११ – “स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव उर्फ़ ऊँट बिलहरीवी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १४ ☆ “गुंजन” के संस्थापक ओंकार श्रीवास्तव “संत” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १५ ☆ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कविवर – पंडित गोविंद प्रसाद तिवारी ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # १७ – “डॉ. श्री राम ठाकुर दादा- समाज सुधारक” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २५ – “कलम के सिपाही – मुंशी प्रेमचंद” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २६ – “यादों में रहते हैं सुपरिचित कवि स्व चंद्रकांत देवताले” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २७– “स्व. फ़िराक़ गोरखपुरी” ☆ श्री अनूप कुमार शुक्ल ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २८ – “पद्मश्री शरद जोशी” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # २९ – “सहकारिता के पक्षधर विद्वान, चिंतक – डॉ. नंद किशोर पाण्डेय” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३० – “रंगकर्मी स्व. वसंत काशीकर” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३१ – “हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, फारसी के विद्वान — कवि- शायर पन्नालाल श्रीवास्तव “नूर”” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३२ – “साइकिल पर चलने वाले महापौर – शिक्षाविद्, कवि पं. रामेश्वर प्रसाद गुरु” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३३ – “भारतीय स्वातंत्र्य समर में क्रांति की देवी : वीरांगना दुर्गा भाभी” ☆ डॉ. आनंद सिंह राणा ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३४ –  “जिनके बिना कोर्ट रूम भी सूना है : महाधिवक्ता स्व. श्री राजेंद्र तिवारी” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३५ – “सच्चे मानव – महेश भाई” – डॉ महेश दत्त मिश्रा” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३६ – “महिलाओं और बच्चों के लिए समर्पित रहीं – विदुषी समाज सेविका श्रीमती चंद्रप्रभा पटेरिया” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३७ – “प्यारी स्नेहमयी झाँसी वाली मामी – स्व. कुमुद रामकृष्ण देसाई” ☆ श्री सुधीरओखदे   ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३८ – “जिम्मेदार शिक्षक – स्व. कवि पं. दीनानाथ शुक्ल” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ३९ – “सहृदय भावुक कवि स्व. अंशलाल पंद्रे” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४० – “मानवीय मूल्यों को समर्पित- पूर्व महाधिवक्ता स्व.यशवंत शंकर धर्माधिकारी” ☆ डॉ.वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४१ – “प्रखर पत्रकार, प्रसिद्ध कवि स्व. हीरालाल गुप्ता” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४२ – “जिनकी रगों में देशभक्ति का लहू दौड़ता था – स्व. सवाईमल जैन” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४३ – “संवेदनशील कवि – स्व. राजेंद्र तिवारी “ऋषि”” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४४ – “कर्णदेव की दान परम्परा वाले, कटनी के पान विक्रेता स्व. खुइया मामा” ☆ श्री राजेंद्र सिंह ठाकुर ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४५ –  “सिद्धांतवादी पत्रकार – स्व. महेश महदेल” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४६ – “मधुर गीतकार-  स्व. कृष्णकुमार श्रीवास्तव ‘श्याम’” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४७ – “साहित्य के प्रति समर्पित : आदरणीय राजकुमार सुमित्र जी” ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४८ – “गीतों के राजकुमार मणि “मुकुल”- स्व. मणिराम सिंह ठाकुर “मणि मुकुल”  ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ४९ – “शिक्षाविद और सहकारिता मनीषी – स्व. डा. सोहनलाल गुप्ता” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५० – “मंडला, जबलपुर के गौरव रत्न – श्रद्धेय स्व. श्री रामकृष्ण पांडेय” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५१ – “चर्चित कथाकार एवं मेरे श्रद्धेय अग्रज –  स्व. श्री हर्षवर्धन जी पाठक” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५२ – “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५३ – “प्रखर पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी – स्व. पं. कुंजबिहारी जी पाठक” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५४ – “माडल हाई स्कूल के पूज्य शिक्षक स्मृति शेष रमेश कुमार पांडेय जी” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५४ – “माडल हाई स्कूल के पूज्य शिक्षक स्मृति शेष रमेश कुमार पांडेय जी” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कहाँ गए वे लोग # ५५ – “बहुमुखी प्रतिभा के धनी – स्व. प्रोफेसर एन. बी.गोस्वामी” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ कहाँ गए वे लोग # ५६ – सरस्वती पुत्र स्व प्रोफ़ेसर चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # ३५ – मौलाना साहब ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ “मौलाना साहब”।) 

☆  दस्तावेज़ # ३४ – मौलाना साहब☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆ 

शहर के व्यस्ततम, एम जी रोड पर हमारी दुकान के पास ही मौलाना साहब की फूलों की दुकान थी। असली फूलों की नहीं, गुरुदत्त वाले नकली कागज़ के फूलों की। मौलाना साहब ने अपनी दुकान सजाने के लिए किसी के गुलशन को नहीं उजाड़ा, बस कुछ रंग बिरंगे काग़ज़ के टुकड़ों को मिलाकर फूलों का गुलदस्ता तैयार कर लिया। उनके गुलाब में अगर खुशबू नहीं होती थी, तो कांटे भी नहीं होते थे।

मौलाना साहब उनका असली नाम नहीं था ! उन्हें मौलाना क्यों कहते थे, वे कितनी जमात पढ़े थे, हमें इसका इल्म नहीं था। बस पिताजी इन्हें मौलाना साहब कहते थे, इसलिए हम भी कहते थे। एक शांत, सौम्य, दाढ़ी वाला चेहरा, जो सदा मुस्कुराता रहता था। पड़ोसी दुकानदार होने के नाते, पहली चाय मौलाना साहब और हमारे पिताजी साथ साथ ही पीते थे। तब दुकान खुली छोड़कर चाय पीने जाने का रिवाज नहीं था। चाय दुकान पर ही पी जाती थी .क्योंकि दुकान, दुकान नहीं पेढ़ी थी। रोजी रोटी का साधन थी।।  

आज भी अगर कोई दुकानदार अपनी दुकान खोलेगा तो पहले पेढ़ी को प्रणाम करेगा, साफ सफाई करेगा, अपने आराध्य के चित्र पर श्रद्धा से अगरबत्ती लगाएगा, इसके बाद ही कारोबार शुरू करेगा। श्रृद्धा का ईमान से कितना लेना देना है, यह एक अलग विषय है। श्रृद्धा, श्रृद्धा है, ईमान ईमान।

हमारी दुकान के आसपास लगता था, पूरा भारत बसा हुआ हो। कोई दर्जी, कोई गोली बिस्किट वाला तो कोई पेन, घड़ी और चश्मे वाला। एक संगीत के वाद्यों की दुकान भी थी, जिसका नाम ही वीणा था। एक रैदास था, जो सुबह पिताजी के जूते पॉलिश करने के लिए ले जाता था, और थोड़ी देर बाद वापस रख जाता था। एक शू मेकर भी थे, जिनके पास चार पांच कारीगर थे।।  

हमारी और मौलाना साहब की दुकान एक साथ ही खुलती थी। हमारी दुकान के दूसरी ओर बिना तले समोसे और बिस्किट की प्रसिद्ध एवरफ्रेश की दुकान थी, जहां शहर के खास लोग, शाम को घूमने और टाइम पास करने आते थे। सड़कों पर आवागमन तो रहता था, लेकिन उसे आप चहल पहल ही कह सकते हैं, भीड़भाड़ नहीं। ईद पर हमारा पूरा परिवार मौलाना साहब के घर सिवइयां खाने जाता था।

हमें इस रहस्य का पता बहुत दिनों बाद चला, जब मौलाना साहब और हमारे पिताजी दोनों इस दुनिया में नहीं रहे। राखी के दिन मौलाना साहब की बेगम हमारे पिताजी का इंतजार करती थी। उनकी कलाई पर एक राखी बेगम के हाथों से भी बंधी होती थी। स्नेह के बंधन कभी काग़ज़ी नहीं होते। उनमें भी प्यार की खुशबू होती है।।  

सुबह का समय सभ दुकानदारों का मिलने जुलने का रहता था। जैसे जैसे दिन चढ़ता, ग्राहकी बढ़ने लगती, लोग अपने काम में लग जाते। दोपहर का वक्त भोजन का होता था। अक्सर सभी के डब्बे घर से आ जाया करते थे। तब टिफिन और लंच जैसे शब्द प्रचलन में नहीं थे। गुरुवार को बाज़ार बंद रहता था, और हर गुरुवार को सिनेमाघरों में नई फिल्म रिलीज होती थी। कालांतर में, दूरदर्शन पर रविवार को रामानंद सागर के रामायण सीरियल के कारण यह अवकाश गुरुवार की जगह रविवार कर दिया गया। अब कहां रामायण सीरियल और शहर के सिनेमाघर ! हर दुकानदार के पास अपने हाथ में ही, अपना अपना चलता फिरता सिनेमाघर, अर्थात् 4 जी मोबाइल जो उपलब्ध है।।  

वार त्योहारों पर मौलाना साहब के यहां लोग अपने दुपहिया वाहनों का श्रृंगार काग़ज़ के हार फूल और रंग बिरंगी पत्तियों से करते थे। दशहरे पर नई खरीदी साइकिल को दुल्हन की तरह सजाया जाता था। शादियों में जिस तरह दूल्हा दुल्हन को ले जाने वाली कार की आजकल जिस तरह सजावट, बनाव श्रृंगार होता है, वैसा ही साइकिल का होता था। विशेष रूप से दूध वाले अपनी नई साइकिलों का श्रृंगार मनोयोग से करते थे, क्योंकि वही उनका दूध वाहन भी था।

आज मौलाना साहब इस दुनिया में नहीं हैं, उनकी काग़ज़ के फूलों की दुकान फल फूल रही है। कल की एक दुकान का विस्तार हो चला है, वह छोटी से बहुत बड़ी हो चुकी है। परिवार की तीसरी पीढ़ी उसी परंपरा का निर्वाह कर रही है। आज के कृत्रिम संसार में कभी न मुरझाने वाले हार फूलों का ही महत्व है। आज की रंग बिरंगी दुनिया वैसे भी किसी काग़ज़ के फूल से कम नहीं।।  

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ ☆प्रथम पुण्य तिथि पर सादर स्मरण  “स्मृतिशेष श्रीमती भारती श्रीवास्तव…” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

संस्मरण ☆ 

 

☆ प्रथम पुण्य तिथि पर सादर स्मरण  “स्मृतिशेष श्रीमती भारती श्रीवास्तवश्री यशोवर्धन पाठक

 नारी तुम केवल श्रद्धा हो,

 विश्वास रजत नग पग तल में।

 पीयूष स्त्रोत सी सहित बहा करो,

 जीवन के सुन्दर समतल में।।

सुप्रसिद्ध कवि स्व. श्री जयशंकर प्रसाद की‌ उपरोक्त काव्य पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध करने वाली एक आदर्श शिक्षिका श्रीमती भारती श्रीवास्तव की 13 अगस्त को प्रथम पुण्य तिथि है। अपनी कर्म निष्ठा से एक कर्तव्य परायण शिक्षिका के रुप में राष्ट्र निर्माता के दायित्वों का का निर्वाह करने वाली मातृ शक्ति श्रीमती भारती श्रीवास्तव इसी दिन हम सभी को छोड़ कर अनंत में विलीन हो गयीं।

समाज में ऐसी महिलाओं का व्यक्तित्व अत्यंत प्रेरक‌और‌ प्रणम्य होता है जो कि परिवार, समाज और अपने कार्यालयीन‌ क्षेत्रों में समान रूप से अपने दायित्वों का सफलता पूर्वक निर्वाह करते हुए सभी के ‌बीच लोकप्रियता अर्जित करती हैं। श्रीमती भारती श्रीवास्तव जी भी‌ एक ऐसी ही स्नेहमयी महिला थीं जिन्होंने यशस्वी, मनस्वी और तपस्वी नारी के रूप में पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को तो सक्रियता पूर्वक निभाया ही लेकिन इसके साथ ही शैक्षणिक क्षेत्र में भी अपने शिष्यों के साथ गुरु के अतिरिक्त संरक्षक और अभिभावक की भूमिका भी‌ बड़ी तन्मयता से अदा की। भारती जी मेरे घर के पास ही रहने वाले मेरे स्कूली साथी, बचपन के मेरे आत्मीय मित्र श्री नवीन श्रीवास्तव जी की जीवन संगिनी थी जिन्हें ‌मै भाभी जी के रूप में संबोधित और सम्मानित करता था लेकिन आत्मीय रुप से मैं उन्हें अपनी बहन के रुप में भी देखा करता। दरअसल बात यह थी कि मुझे मेरी मां ने बताया था कि सबसे शुरू में मेरी एक बहन हुई थी जिसका नाम 15 अगस्त को जन्म होने के कारण भारती रखा गया था और बाद में बचपन में ही उसका देहांत भी हो गया था। बस इन्हीं भावनाओं के तहत मैं भारती भाभी को मन ही मन बहन भी मानता था।

भारती श्रीवास्तव जी गौर नदी के पास केन्द्रीय विद्यालय से सेवा निवृत्त हुईं थीं। वे अपने शिक्षकीय कार्यकाल में जिस भी स्कूल में रहीं, अपने छात्रों के बीच लोकप्रिय और प्रतिष्ठित शिक्षिका के रुप में चर्चित रहीं। उनके छात्रों के साथ उनके संबंध स्थायी और स्मरणीय रहते थे। उनके छात्र शालेय जीवन के बाद भी उनसे अक्सर बात करते और अपनी उस पूज्यनीय शिक्षिका का मार्गदर्शन लेते जिनसे उन्हें पारिवारिक आत्मीयता प्राप्त हुई थी। शाला का स्टाफ भी उनकी योग्यता और बौद्धिकता से काफी प्रभावित रहता। शैक्षणिक क्षेत्र में भारती जी एक ऐसी विदुषी शिक्षिका के रुप में विख्यात थीं जिन्हें अनेक भाषाओं का ज्ञान था। जो भी व्यक्ति जिस भाषा में उनसे बातचीत करता, भारती जी उसी भाषा में उससे बातचीत करने ‌लगती।

भारती जी का मायका उड़ीसा‌ राज्य में पुरी के आंचलिक क्षेत्र में था। हमारे देश में जगन्नाथ पुरी आध्यात्मिक रूप में काफी महत्व रखता है। भारती जी पुरी से जो पावन और धार्मिक संस्कार लेकर‌ नवीन भाई के साथ मंगल परिणय के सूत्र में आबद्ध हुईं,उन संस्कारों के साथ उन्होंने न केवल अपने पति का जीवन के प्रत्येक सुख – दुख में साथ दिया बल्कि अपने दोनों बच्चों को भी‌ उच्च शिक्षा के साथ ऐसे संस्कार दिए जिनके कारण उन्होंने समाज में एक गरिमामयी पहचान बनाई।। एक सबके लिए और सब एक के लिए की सहकारी भावना के साथ भारती जी पारिवारिक और सामाजिक क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही थीं। उन्होंने सभी के बीच अपने प्रभावी व्यक्तित्व से एक विशिष्ट पहचान बनाई थी। कहने का मतलब यह कि सब कुछ अच्छा चल रहा था लेकिन विधाता को तो कुछ और मंजूर था। भारती जी को कठिन बीमारी केंसर ने जकड़ लिया। इलाज चला और फिर उम्मीद भी जगी। भारती जी के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा लेकिन फिर उनकी तबियत खराब होने लगी। डाक्टर बिटिया निमिषा, दामाद डाक्टर अनुज निगम की सारी कोशिशें बेकार हो गयीं और भारती जी बिटिया, दामाद, बेटे नयन, जीवन साथी नवीन, और जेठ जिठानी सभी को अपने सपने सौंप कर चिर निद्रा में लीन हो गयीं।

भारती जी ने अपनी विद्वत्ता और बौद्धिक समझ के साथ परिवार में, समाज में और स्कूल में जो अपनापन बांटा वह सभी के मानस पटल पर यादों की धरोहर के रूप में सदा अमिट रहेगा —

 यादों में जब खो जाता है मन

 दुनिया की सुधि बिसराता है मन

 🌹🌹

 © श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ ☆ “श्री ओंकार तिवारी और ‌नर्मदा के स्वर…” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

संस्मरण ☆ 

☆ “श्री ओंकार तिवारी और ‌नर्मदा के स्वरश्री यशोवर्धन पाठक

जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार, अधिवक्ता और सुप्रसिद्ध कवि श्री ओंकार तिवारी ने जब नर्मदा के स्वर अखबार का प्रकाशन किया, उस समय दैनिक, पाक्षिक और साप्ताहिक अखबार आज‌ की तुलना में कम प्रकाशित होते थे इसलिए उस समय पाक्षिक और साप्ताहिक अखबारों की चर्चा भी काफी होती थी। चूंकि उस समय ऐसे अखबारों का प्रकाशन प्रायः वरिष्ठ पत्रकारों के द्वारा होता था। इसलिए विज्ञापनों की तुलना में इन अखबारों में पठनीय विषय सामग्रीका विशेष ‌ध्यान रखा जाता था। उस समय अखबारों में समाचारऔर ज्ञानवर्धक लेख विज्ञापनों की तुलना में बहुतायत में प्रकाशित हुआ करते थे।

 श्री ओंकार तिवारी जी का अखबार नर्मदा के स्वर एक ऐसा ही समाचार पत्र था जो कमर्चारियों और कृषकों की समस्यायों और गतिविधियों के लिए सक्रिय था। यह अखबार उस समय अपने बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक, साहित्यिक और आध्यात्मिक विषय सामग्री के प्रमुख प्रकाशन के लिए चर्चित समाचार पत्रों में से एक था। यह उल्लेखनीय है कि श्री ओंकार तिवारी जी ने इस समाचार पत्र का प्रकाशन अनेक कठिनाइयों के बीच किया लेकिन अपनी सिद्धांतवादी नीतियों और आदर्शों से समझौता नहीं किया इसका कारण भी शायद यह था कि श्री ओंकार तिवारी जी पूंजीवादी सभ्यता से हटकर बौद्धिकता और मानवीय संवेदना से ओतप्रोत एक ऐसे कृषक, कवि‌और पत्रकार थे जिनकी सम्पूर्ण सोच सर्वहारा वर्ग के लिए ही समर्पित थी। कहने का मतलब यह कि नर्मदा के स्वर का प्रकाशन जितने समय तक संचालित किया गया उसने पाठकों के बीच अपनी ‌लोकप्रिय पहचान बनाई।

 स्मरणीय है कि श्रद्धेय श्री ओंकार तिवारी जी ने कृषक और पत्रकार के रुप में जितनी गौरवशाली पहचान बनाई उतनी ही प्रतिष्ठा उन्होंने कवि के‌ रुप में भी अर्जित की थी। कवि सम्मेलनों में श्रोता उनकी कविताओं को अत्यंत सम्मान और उत्साह से सुना करते थे। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में उनकी कविताओं का संग्रह धरती नाचे भी अपने समय में काफी पठनीय और लोकप्रिय सिद्ध हुआ।

 मेरे अति प्रिय श्री मनीष तिवारी जी ने तुलसी जयंती के पावन अवसर पर नर्मदा के स्वर के तुलसी जयंती विशेषांक की प्रति सभी के अवलोकनार्थ जब प्रस्तुत की तो इस अखबार की‌ अपने समय की गौरवशाली यादें ताजी हो गईं।

 नर्मदा के स्वर और उसके संपादक श्रद्धेय भैया श्री ओंकार तिवारी जी का सादर स्मरण और शत शत प्रणाम।

🌹

 © श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # ३३ – हरिशंकर परसाई: आम आदमी का लेखक और प्रतिनिधि – डॉ० कमला प्रसाद – ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

☆  दस्तावेज़ # ३३ – हरिशंकर परसाई: आम आदमी का लेखक और प्रतिनिधि – डॉ० कमला प्रसाद ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक स्मृतियाँ सहेजने का प्रयास है। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है डॉ कमला प्रसाद जी (तत्कालीन अध्यक्ष हिंदी विभाग, रीवा विश्वविद्यालय) से श्री जगत सिंह बिष्ट जी की ३५ वर्ष पूर्व ली गई लंबी बातचीत जो सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के व्यक्तित्व और कृतित्व के अंतरंग पहलुओं को स्पर्श करती है. यह मूल्यवान दस्तावेज़ डॉ. मधुसूदन पाटिल द्वारा संपादित, व्यंग्य की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘व्यंग्य विविधा’ में  प्रकाशित हुआ था. इस ऐतिहासिक दस्तावेज को हम अपने प्रबुद्ध पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं.)

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

10 अगस्त 1995 को हरिशंकर परसाई का निधन हुआ। तब मैं रीवा में पदस्थ था। डॉ. कमला प्रसाद रीवा विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे। उनसे मेरी परसाई जी के बारे में लंबी बातचीत हुई। अब, पैंतीस वर्षों के उपरांत, न परसाई जी और न डॉ. कमला प्रसाद हमारे बीच हैं लेकिन सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के व्यक्तित्व और कृतित्व के अंतरंग पहलुओं को स्पर्श करता यह मूल्यवान दस्तावेज़ हमारे पास संरक्षित है। यह तब, डॉ. मधुसूदन पाटिल द्वारा संपादित, व्यंग्य की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘व्यंग्य विविधा’ में  प्रकाशित हुआ था। अब आपके समक्ष प्रस्तुत है। परसाई जी को उनकी पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि!

– श्री जगत सिंह बिष्ट

डॉ० कमला प्रसाद 

(डॉ० कमला प्रसाद प्रख्यात समालोचक; ‘वसुधा’ के सम्पादक; परसाई रचनावली के सम्पादक मण्डल के सदस्य; ‘आँखन देखी’ के सम्पादक; केशव शोध संस्थान, और अन्तर्भारती’ के निदेशक हैं। रीवा विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हैं। वे परसाई के अन्तरंग मित्र रहे हैं। उन्हें परसाई पर ‘अथॉरिटी’ माना जाता है। अतः जगतसिंह बिष्ट का डॉ० कमला प्रसाद से परसाई विषयक साक्षात्कार एक सार्थक संवाद है और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज। सं०)

हरिशंकर परसाई का हिन्दी-गद्य स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। सुप्रसिद्ध कथाशिल्पी भीष्म साहनी ने उनके बारे में कहा है, “परसाई की लंबी यात्रा आसान नहीं रही है, इसमें उन्होंने अपना सब कुछ होम कर दिया है, ऊपर से हल्के-फुल्के लगने वाले व्यंग्य, एक ऐसे व्यक्ति द्वारा रचे गए हैं, जिसने अपनी अपनी आस्थाओं और निष्ठा के लिए बड़ी यातनाएं झेली हैं। उनकी आस्था उनकी लेखकीय देन को चार-चाँद लगाती है। उनका प्रखर, निष्ठावान व्यक्तित्व भी प्रेरणा का उतना ही बड़ा स्रोत है, जितना उनका लेखन ।”

लब्ध-प्रतिष्ठ आलोचक कमला प्रसाद उनसे आजीवन अनुजवत जुड़े रहे। “पहल” के संपादन से लम्बे समय तक जुड़े रहने वाले कमला प्रसाद ने हरिशंकर परसाई द्वारा संस्थापित पत्रिका “वसुधा” का संपादन उनके जीवन-काल में ही संभाल लिया था और उनकी आँखों के सामने ही इसे साहित्य जगत् की अनिवार्य पुस्तक बना दिया । कमला प्रसाद ने हरिशंकर परसाई पर केंद्रित “आँखन देखी” का संपादन कर पहला गंभीर प्रयास किया था उन्हें जानने का। परसाई रचनावली के संपादक कमला प्रसाद से जब मैं हरिशंकर परसाई पर बात-चीत करने गया तो उस समय तक वे परसाई के न रहने के दुख से उबर नहीं पाए थे। उनसे हुई बात-चीत पाठकों के सामने अविकल प्रस्तुत है :

जगत सिंह बिष्ट:

हरिशंकर परसाई के व्यक्तित्व और कृतित्व का आपने गहन अध्ययन किया है। उन्हें बहुत नजदीक से जाना है। परसाई जी पर आप “अथॉरिटि” माने जाते हैं। वर्ग संघर्ष उनके व्यंग्य का मूल स्वर रहा है और किसी भी तरह के अतिरेक पर उन्होंने प्रखर प्रहार किया है। कृपाकर उनके व्यंग्य के मूल स्वर और तेवर पर विस्तारपूर्वक कहें।

कमला प्रसाद:

बिष्ट जी, आपने बहुत सी बातें एक साथ पूछ लीं। हरिशंकर परसाई ने पूरे जीवन अपने आपको मनुष्य बनाने की कोशिश की । उनका सारा लेखन खुद के खिलाफ उतना ही संघर्ष है जितना समाज की विकृति के और विसंगतियों के खिलाफ। वे एक ऐसे लेखक हैं जो अपने संस्कारों, इर्द-गिर्द के प्रभावों, और उन रूढ़ परंपराओं के खिलाफ संघर्ष करते रहे जो किसी आदमी में स्वतः संस्कारों-प्रभावों से आकर संचित हो जाती है और जिनके कारण आदमी स्वाभाविक रूप से नहीं रह पाता । मनुष्य के बारे में वे कहते थे कि उसकी प्राकृतिक जिदगी के विरोध में उसमें बहुत सा अप्राकृतिक आकर जमा जो जाता है। मनुष्य का काम यह है, और लेखक का काम खास तौर से, कि उसमें जो अप्राकृतिक है उसे छाँट दे और यह तभी किया जा सकता है जब स्वयं की अप्राकृतिकता को वह निर्मूल करे। परसाई जी ने यह किया ।

उनके व्यक्तित्व की बहुत सी बातें मैं क्या बताऊँ आपको । मेरा जब पहले उनसे साक्षात्कार हुआ, उत्सव का मौका था । छतरपुर आए थे, अपने जबलपुर के दोस्तों के साथ और घर ठहर गए लोग। भवानी प्रसाद तिवारी थे, हरिशंकर परसाई थे और नर्मदा प्रसाद खरे, मायाराम सुरजन, हनुमान वर्मा थे। छतरपुर में हिन्दी साहित्य का सम्मेलन होने वाला था। सब लोग आए, घर के अंदर गए और नहाने-धोने लगे। परसाई जी घर के भीतर घुसे नहीं । उन्होंने कहा कि इन्हें सजने दो। आओ, तुम्हारे साथ छतरपुर घूमते हैं।

करीब २-३ किलोमीटर पैदल और उसके बाद फिर रिक्शे से पूरा शहर घूम आए, पूरी बस्ती देख आए, और जब लौटकर आए तो छतरपुर के बारे में पूछने लगे । इस तरह से उन्होंने कई काम एक साथ किए । एक तो जिस कस्बे में आए, वहां के लोगों की जीवन-प्रणाली, जीवन-स्तर का अनुभव हुआ, दूसरे वे मेरे भीतर घुस गए और टटोलने लग गए कि इसके भीतर कौन-सा तत्त्व है। न जाने कैसे उन्होंने मेरे भीतर, मध्यवर्गीय जीवन होते हुए भी, आम आदमी की ओर का झुकाव देख लिया। किसी तरह की उनकी मेरे साथ दोस्ती हो सकती है, दोस्ती क्या, स्नेह-भाव हो सकता है उनका मेरे ऊपर, ऐसा उनको लग गया ।

फिर, पत्राचार शुरू हुआ। उसकी एक लंबी कहानी है। आप यह देखें कि एक ऐसा लेखक जिसकी दिलचस्पी, उस शहर के बड़े अभिजात वर्ग के लोगों से मिलने में होने की बजाए, शहर के चरित्र को, उसकी जिदगी को जानना जिसका मक्सद हो, जो कहता है कि मैं ट्रेन में हमेशा तीसरे दर्जे से सफर करता रहा हूँ ताकि मैं उनकी बातें, उनका जीवन, उनकी मुद्राएं, उनकी शिकायतें, जमाने का उनके भीतर रचा-बसा चरित्र मालूम कर सकें। यह सब पढ़ना, जानना उनके जीवन का मक्सद है। गोर्की जैसे कहते थे कि ये पूरी जिंदगी ही मेरी यूनिवर्सिटी रही है, उसी तरह मैं मानता हूँ कि परसाई हिन्दी का वह लेखक है, प्रेमचन्द के बाद, जो सारी दुनिया को, सारे समाज को, अपने अंचल को, अपने स्थान को और वातावरण को ही अपनी सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी मानते रहे जीवन भर, वही उनके व्यक्तित्व के विकास का आधार है। इसी में उनकी रचना की सामग्री पैदा होती है। इसी में से वे रचना का सारा स्वरूप तैयार करते हैं, रचना की प्रकृति तैयार करते हैं। आप देखेंगे कि स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज का सच्चा इतिहास अगर कहीं मिल सकता है तो इतिहास की पुस्तकों में नहीं, परसाई की रचनाओं में मिलता है।

जगत सिंह बिष्ट:

वर्ग संघर्ष की बात और किसी भी तरह के अतिरेक पर उनके प्रहार । इनका कुछ और खुलासा करेंगे आप ?

कमला प्रसाद:

एक कहावत आपने सुनी होगी कि किसी पौधे में अगर पीपल का पेड़ उग जाता है तो उसे लोग छाती का पीपल कहते हैं। उस पौधे का सारा रस पीपल चूस लेता है और बिना नीचे तक गए, लहराता रहता है। समाज में यही वर्ग की स्थितियां हैं। जो श्रम करता है, जो उत्पादन करता है, वो नीचे खड़ा है। उसकी छाती पर मध्यवर्ग और उच्च वर्ग, अमीर वर्ग लहरा रहा है। यह बात इतिहास सिद्ध है। वर्गों का विकास तभी हुआ जबसे उत्पादन और वितरण के अधिकार अलग-अलग हुए। यह समाज, आदिम रूप को छोड़ दें तो, बाद में लगातार वर्ग में बंटता गया – एक अमीर वर्ग और एक गरीब वर्ग। इन दोनों के बीच में खाई बढ़ती चली गई और दोनों की संस्कृति अलग हुई। अमीरों की संस्कृति अलग। आपने निराला की कविता “वह तोड़ती पत्थर” पढ़ी होगी जिसमें मजदूरनी हथौड़ा चलाती है और सामने उसके अट्टालिका है, जहां तथाकथित सुखी लोग सो रहे हैं। निराला केवल उस चित्र को आपके सामने अंकित कर देते हैं :

सामने अट्टालिका

तरुमालिका प्राचीर

वह तोड़ती पत्थर ।

ये जो चित्र हैं, इसमें निराला कुछ कह नहीं रहे, अपनी तरफ से । केवल एक चित्र अंकित कर देते हैं। ये चित्र देखते ही, अगर आप संवेदनशील हैं, तो एक-बारगी आपको समाज की विसंगति नजर आ जाएगी। फोटोग्राफी भी साहित्य में बड़ी महत्वपूर्ण होती है। दिक्कत यह है कि जो घटित हो रहा है, उसी को लोग नहीं देख रहे। परसाई जी ने जो घटित हो रहा है, जो विसंगतियाँ जिस तरह हैं समाज में, उनको सबको, अपनी खुली आंखों से देखा। परसाई का पूरा लेखन, समाज की विसंगतियों को देखना और उनकी चित्रावली, उनकी छवियाँ लोगों के सामने, समाज के सामने रखता है। ऐसी छवियों रखने में निर्मम होने की जरूरत है, बहुत सर्तक होने की जरूरत है। कभी-कभी ठेठ और बहुत आक्रामक भाषा की जरूरत है क्योंकि बहुत सारा ऐसा रहस्य बना दिया गया है जिसको भाषा में व्यक्त करना, असभ्यता और असंस्कृति कहा गया है। वर्जित इलाका इतना हो गया है, प्रतिबंधित इलाका हो गया है कि वहां आंखें उठाकर देखने की हिम्मत नहीं होती किसी की। आप देखें कि मुक्तिबोध लिखते हैं:

एक कमरा,

उसके अंदर एक कमरा,

उसके अंदर एक कमरा,

उसके अंदर एक कमरा

और एक रहस्यमय लोक !

ये जो हमारी व्यवस्था है जहाँ राजाओं, अमीरों, सामंतों, पूंजीपतियों की किल्लोलभूमि है, वहां तक पहुंचना किसी के लिए दूभर है। इस पूरे को देखना, सर्तक निगाहों से देखना और अंदर रहस्य की जो पूरी दुनिया है, उसको भेद देना । आप परसाई की रचना “भोलाराम का जीव” को ही देखें । एक आदमी की आत्मा तड़प रही है कि उसकी पेंशन तो मिल जाए और वह मर जाता है। अब उसको “फैंटसी” बनाकर, क्योंकि समाज की सारी विसंगतियों को बिना फंतासी के व्यक्त करना मुश्किल है, क्योंकि इतना बड़ा यह साजिश का लोक है कि उसके ब्यौरे में आप जाएंगे, अभिधा में अगर आप जाएंगे तो “रिपोर्टिंग” हो जाने का खतरा है। उसमें समग्रता नहीं आ पाएगी। इसीलिए परसाई जी ने उसको फंतासी में व्यक्त किया है।

(यादों के झरोखे से – बाएं से दायें : डॉ. द्विवेदी, श्री जगत सिंह बिष्ट, प्रो  ज्ञानरंजन, डॉ. कमला प्रसाद, श्रीमती राधिका बिष्ट, डॉ. दिनेश कुशवाह)

जगत सिंह बिष्ट:

मुक्तिबोध और परसाई दोनों बड़े मित्र हैं। दोनों फंतासी में लिखते हैं…

कमला प्रसाद:

एक फंतासी में कविता लिखता है और दूसरा फंतासी में गद्य लिखता है, फंतासी में दूसरा कहानियां लिखता है, निबंध लिखता है। इसलिए कि दोनों की सोच की दुनिया मिलती है। एक अंधेरे में कविता लिखता है और उसमें एक ऐसा नायक है, जो रात के घनघोर अंधेरे में, इस मायाजाल के भीतर जो कुचक्र है जिसमें डाकू और पुलिस, न्यायाधीश और बदमाश, एक साथ एक जुलूस में चलते हैं, उसमें घुसकर वह आदमी जुलूस को देख लेता है और वही उसका अपराध है। उसने देख लिया यानि वह जासूस है। परसाई का जो लेखक है वह भी एक जासूस है। उससे कुछ नहीं छिपा होता । मुक्तिबोध की कविता में भी एक जासूस है जो सारे मायाजाल को चीर देता है, देख लेता है। यही अपराध है कि वह देख लेता है। परसाई के यहाँ भी यही अपराध है कि परसाई के यहां कुछ छिपा नहीं होता ।

अब आप देखें कि ये जो दोनों की दोस्ती का और दोनों की समझ का धरातल है, वह कैसे एक जगह मिल जाता है। जो वर्ग संघर्ष की बात आपने की, वर्गों का जाल बड़ा भ्रामक है। जैसे, आप भाषा के क्षेत्र में देखें, बड़ी मधुर भाषा होती है सामंतों की, लेकिन वो जहर होती है। सीधे-सीधे वो सामंत और खुराफाती दिख जाएं तो बड़ा आसान हो जाए उनको समझ लेना, पकड़ लेना। चालाकी से भरे माधुर्य को वे संस्कृति कहते हैं, मधुर वाणी कहते हैं। मधुर वाणी उनकी संस्कृति है और जो ठेठ बोलता है गांव का गंवार, वह असंस्कृत है। जब आप वर्ग को ठीक से समझने लगते हैं तो तथाकथित इस गंवार को उसकी ठेठ भाषा में उसे पेश करना पड़ेगा और इनकी जो मधुर भाषा है, उनके भीतर की जो असंस्कृति है, उसको चीरना पड़ेगा। ये जो आप करते हैं, सहानुभूति के आलंबन को बदल देना है। परम्परागत महाकाव्यों में जो नायक हैं, जो राजकुंवर है, सहानुभूति उसकी तरफ जाती है।

परसाई के गद्य को पढ़ते हुए, सहानुभूति उस नायक के बजाए, उस ठेठ गंवार आम नायक की तरफ चली जाती है। यह ट्रांसफर है। सहानुभूति का ट्रांसफर । नायक जिसे आप कहते हैं वो खलनायक हो जाता है और खलनायक नायक हो जाता है। ट्रांसफर, करुणा का ट्रांसफर, करुणा इधर नहीं है, उधर है। करुणा औरत की तरफ है, सबसे त्रासद स्थितियों में जो जीती है, दूसरे नंबर की नागरिक मानो जाती है जो समाज की । करुणा को औरत की तरफ ले जाना है, करुणा को गरीब की तरफ ले जाना है। ये जो पिछड़ा वर्ग है, जो गरीब तबका है, जो शोषित-पीड़ित है, उसको “स्टैंड” देना । उसको साहस देना, उसको आत्मविश्वास देना । उसकी जिजीविषा और पौरुष को ललकारना। तू छोटा नहीं है, तू बड़ा है, तू नियंता है, तू उत्पादक है, तू सर्जक है।

उत्पादक और सर्जक –  शब्दावली में सम्बन्ध है। जिसे आप सर्जक कहते है, दरअसल वह उत्पादक है। खेती का सर्जक और दूसरी तरफ कलम का सर्जक । सर्जक बड़ा होता है, वितरक बड़ा नहीं होता। दो अलग-अलग सत्ताएं हो गई। सर्जक की अलग, वितरक की अलग। वितरक हिंसक हो जाता है। इस पूरे “सोशियोलॉजिकल पैटर्न” को बदल देना वर्ग संघर्ष का काम है। इसमें कला कौशल भी है, कला की ऊँचाई है और दूसरी तरफ सामाजिक, समाज-शास्त्रीय विदग्धता, पैनापन भी है, खरा-खरा भी है। तो ये परसाई का मूल आधार है चिंतन का ।

जगर्तासंह बिष्ट:

व्यंग्य की परंपरा में जो उनके पूर्ववर्ती लेखक हैं, परसाई उनसे इसी मामले में सबसे पहले अलग दिखाई पड़ते हैं ।

कमला प्रसाद:

परसाई कहते हैं कि व्यंग्य औजार है, मेरा व्यंग्य मेरा रोजगार है । व्यंग्य मेरा औजार है, मैंने इसे सारे कामों के विकल्प में चुना है। इससे मैं सारे काम करता हूँ, मैं इससे खेती भी करता हूं मैं इससे लड़ाई भी लड़ता हूँ, मैं इससे अपनी रोटी भी कमाता हूं, मैं इससे लेखक भी बनता हूं, मैं इससे क्या नहीं बनता ? जैसे किसी का पैर टूट जाए तो हाथ उसका भी विकल्प होता है। हाथ का मतलब होता है पैर का भी विकल्प होना । उसी तरह से, अगर समाज में कोई कलमकार है तो कलम को उसे सारी चीजों का विकल्प बनाना पड़ेगा। अपनी शक्ति के सारे “डाइमेंशन” को कलम पर लाकर केंद्रित करना पड़ेगा। कलम कलम होती है। कलम औजार होती है। कलम आपको ऊंचाई भी देती है। कोई भी लेखक तब तक बड़ा लेखक नहीं बनता जब तक उसकी पूरी आत्मिक, वैचारिक, बौद्धिक, शारीरिक, सारी शक्तियों का विकल्प न बने कलम । तब तक कलम कलम नहीं होती ।

जगत सिंह बिष्ट:

कुछ लोगों का मानना है कि वैचारिक प्रतिबद्धता से कभी-कभी व्यंग्य की मारकता में बाधा आती है। परसाई वामपंथी विचारधारा को लेकर चले थे, प्रतिबद्ध थे। क्या आपको लगता है कि इससे परसाई के व्यंग्य में कहीं कोई अवरोध आया है?

कमला प्रसाद:

बीसवीं शताब्दी में, मैं जानना चाहूँगा, दुनिया का वो महान लेखक, जो महान भी हो और प्रतिबद्ध न हो। हिन्दी में पिछले पचास वर्षों में, मैं जानना चाहूँगा, उस बड़े कवि का नाम जो बड़ा भी हो और प्रतिबद्ध न हो और जो पचास वर्ष तक जीवित रहे इतिहास में। मैं जानना चाहूँगा उस गद्यकार का नाम, बड़ा लेखक हो जो, काल के भीतर भी हो और कालजयी भी हो, जिसने अपनी प्रतिबद्धता तय न की हो । प्रतिबद्धता दरअसल बंधन नहीं है। प्रतिबद्धता अपने बारे में और अपने समाज के बारे में एक दिशा है । मुक्तिबोध कहते थे, पार्टनर पहले अपनी “पॉलिटिक्स” तो तय करो। तुम गरीब की तरफ हो कि अमीर की तरफ हो। प्रतिबद्धता का मतलब है सर्जक की तरफ होना, कम की तरफ होना। तुलसीदास क्या नहीं प्रतिवद्ध थे ? तुलसीदास, बहुत बड़ा लोकमंगल का कवि है। अपने को तिरोहित कर दिया जिसने, अपने को मिटा दिया जिसने और इतना बड़ा कवि हुआ ।

परसाई की जो प्रतिबद्धता है, दरअसल अराजकता के खिलाफ संगठित, अनुशासित मानवीयता का पर्याय है। ये जो “मीडियोकर” हैं, ये अपने को, अपनी हीनताग्रन्थि को छिपाने के लिए आरोपों में जीते हैं। ऐसे आरोपों से वे बड़े लेखकों का कद छोटा करने की कोशिश करते हैं लेकिन इतिहास बड़ा निर्मम होता है। आप अनुभव करेंगे बड़ी-बड़ी बौद्धिक जुगालियाँ धरी रह जाती हैं, काल उनको अस्वीकार कर देता है, “रिजेक्ट” कर देता है काल । तो, प्रतिबद्धता का गलत व्याख्यान करने वाले लोग ऐसा कहते हैं।

सार्त्र को पूंजीवादी समाज ने बहुत पसंद किया । नोबल पुरस्कार दिया। जब पुरस्कार मिला तो उसने कहा कि ये हत्यारों का पुरस्कार मुझे नहीं चाहिए। लोग गलतफहमी में न हों, मैं “मार्क्सिस्ट” हूँ । यानि, उसने अपने सारे चिंतन का प्रेरणा स्रोत मार्क्सवाद को कहा, अर्थात्  मार्क्सवाद का विस्तार किया । पूंजीवादी उस विस्तार को न जान पाए कि इसका स्रोत क्या है? इसको अपनी दुनिया का लेखक मानने लगे। सार्त्र ने कहा कि ये जो बीसवीं शताब्दी है इसमें कोई “इंटेलेक्चुअल” होगा, वह “वाम” होगा, वह “लैफ्ट” होगा। मैं समझता हूँ कि काल से उत्तर ले लिया जाए इसका । पिछले सौ वर्षों की रचनाशीलता से इसका उत्तर ले लिया जाए । कमला प्रसाद क्यों उत्तर दें इसका ?

जगत सिंह बिष्ट:

इसमें एक बिंदु आता है शाश्वत व्यंग्य लेखन बनाम क्षणभंगुर या सामयिक व्यंग्य लेखन । परसाई ने कहीं लिखा भी है कि मैं अपने व्यंग्य को रोज मरते हुए देखता हूँ। क्या व्यंग्य में कालजयी जैसी कोई बात या कृति हो सकती है?

कमला प्रसाद:

बिष्ट जी, कालजयी अगर कुछ होता है तो जीवन होता है और काल जिसे डस लेता है, काल जिसे निगल लेता है, वह भी जीवन होता है। आदमी मर जाता है, आदमियत कालजयी होती है। रचना के भीतर का जो मानवीय पहलू होता है, वह कालजयी होता है। मनुष्य की आत्मा को, मनुष्य की परंपरा को, मनुष्य की जिजीविषा को, ऊर्जा को, जो रचना भर ले अपने में वह कालजयी होती है। जैसे घड़ा नहीं होता कालजयी, घड़े के भीतर का जल होता है कालजयी । जल तत्व कभी नष्ट नहीं होता। इसी तरह, शरीर मर जाता है लेकिन शरीर के भीतर जो आत्मा है – इसमें आत्मा को इस अर्थ में मत समझिए, भाववादी अर्थ में, आत्मा का मतलब होता है, आदमी के भीतर की ऊर्जा, जिजीविषा, ताकत – वो कालजयी होती है। आप देखिए न, प्रेमचन्द मर गए पर प्रेमचन्द का साहित्य कालजयी है। तुलसीदास मर गए, तुलसीदास का साहित्य कालजयी है। साहित्य के जीवित होने की शर्तें पूछी जानी चाहिए। साहित्य को कौन जीवित करता है ? मनुष्य ! तो मनुष्य का भला, बुरा, अच्छा, उसकी संवेदना जहां मिलेगी, उसके पास बार-बार वह जाएगा। वही कालजयी हो जाएगा । जो घड़ा, जो झील कभी नहीं सूखती गर्मी के दिनों में भी, आदमी वहीं जाता है। इसी तरह से जिस रचना में कभी रस नहीं सूखता, उसी के पास आदमी जाता है। क्या बात है कि रामचरित मानस के पास लोग बार-बार जाते हैं ? नया से नया आदमी भी जाता है, पुराने से पुराना आदमी भी जाता है। निराला की कविता के पास आदमी जाता है।

दरअसल कालजयी होने की चिंता करके जो लेखक रचना करता है, वो तत्काल मर जाता है। जो लेखक काल के भीतर काल की बारीकियों को, काल में रह रहे आदमी को और अपनी स्थानीयता को, अपनी जिंदगी की विसंगतियों को, उनकी चिंता करके, उनको संजोने की कोशिश करता है, अपनी अनुभूति में, तो वो अनचाहे कालजयी हो जाता है।

जगत सिंह बिष्ट:

प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध और तुलसी – ये नाम तो अपने आप आ गए चर्चा के दौरान । हिन्दी के अन्य ऐसे कौन से कवि और लेखक रहे हैं जिनके लेखन को, या जिनकी दृष्टि को, आप परसाई की दृष्टि के नजदीक पाते हैं ? जैसे, तुलसी की अभी बात चली । तुलसी और कबीर दोनों नामों से वे कॉलम लिखते थे । मुझे लगता है, कबीर के रूप में उन्होंने जो लिखा है वो ज्यादा प्रभावशाली और प्रखर है। तुलसी के दर्शन से परसाई की “स्पिरिट” या उनके पूरे साहित्य का “अंडरकरेंट” मेल नहीं खाता। आपका सोचना शायद भिन्न हो ।

कमला प्रसाद:

परसाई जी की प्रेरणा भूमि है मध्ययुग के संत। संतों का जीवन – फक्कड़, यायावरी, मस्तमौला, बेपरवाह। परसाई जी ने एक इंटरव्यू में कहा है, कि मैंने हमेशा लापरवाही से अपनी जिदगी की जिम्मेदारियां पूरी की हैं। परवाह करते हुए मैं अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी कभी पूरी नहीं कर सका । संतों में, आप देखते हैं कि कबीर का भी बेटा था, तुलसीदास की पत्नी थी, संतों में ऐसे भी मिलेंगे जो गृहस्थ थे पर पति भी संत और उनकी सहचरी भी संत । निकल पड़े । तो, संत स्वभाव क्या है, निस्पृह होना, संचयवृत्ति के विपरीत होना, यह उनका स्वभाव था। ये भी आश्चर्यजनक नहीं है कि संतों के बाद, अर्थात् मध्ययुग के बाद, जो भी बड़ा लेखक हुआ है, उसने बीच के सारे साहित्य को छोड़ दिया और उछलकर इतिहास में संतों के पास चला गया। हजारी प्रसाद द्विवेदी को देखिए, संतों के पास चले गये । रामचंद्र शुक्ल, संतों के पास चले गये। निराला ने संतों के पास जा जाकर प्रेरणा ली। हरिशंकर परसाई की भी जो प्रेरणा भूमि है वह मध्ययुग के संत हैं।

दूसरी बात ये है कि परसाई के जो प्रिय लेखक थे, वो निराला थे । निराला पर बहुत बात करते थे। वो चेखव को बहुत प्यार करते थे, गोर्की की चिंता अक्सर करते थे और अपने स्तंभ के लिए तुलसीदास का जो उन्होंने शीर्षक चुना “तुलसीदास चंदन घिसै”, यहां तुलसीदास संत हैं। इसमें बड़ी व्यंजना है- “तुलसीदास चंदन घिसै” या कबीर की उक्ति “माटी कहे कुम्हार से”। तुलसीदास या कबीर वाचक परंपरा के कवि हैं, ये सीधे अपनी वाणी से संबोधित करते हैं जनता को । इनके सामने कागज नहीं है और इस युग में तो कागज ही कागज है। परसाई जी कागज में लिखते हैं लेकिन संबोधित जनता को करते हैं। “सुनो भाई साधो” उनका एक कॉलम है। यह अकेले कॉलम नहीं है, निगाहें उनकी जनता की तरफ हैं। कलम का दायित्व है कि वह जनता की तरफ हो, जो वे कहना चाहते हैं, उसे वह लिखे, अंकित करे। लिखित समाज के भीतर रहते हुए भी, अलिखित समाज को संबोधित करते रहना हमेशा, यह परसाई का तार है जो कबीर से और तुलसी से अपने को जोड़ता है, वाचक परंपरा से जुड़ी जो विशाल जनता है, उससे जोड़ता है। बीच में बहुत सारे रचनाकार हैं, भारतेन्दु युग के जो निबंधकार हैं बालमुकुंद गुप्त, बालकृष्ण भट्ट और भारतेन्दु हरिश्चंद्र स्वयं।

एक बार उन्होंने कहा कि मैं बनारस गया तो मेरी सबसे बड़ी इच्छा थी कि मैं भारतेंदु हरिश्चंद्र का मकान देखूं और अक्सर वे “अंधेर नगरी” का जो प्रसंग है, “टके सेर भाजी, टके सेर खाजा” इसको दोहराते थे। मैं जब सतना में था, तो वो इलाहाबाद से लौटकर, सतना उतर गए और खबर भेजी कि मैं पवन होटल में हूं। मैं दौड़ा-दौड़ा गया। दो बजे का समय था । किवाड़ा खुला हुआ था, वे कमरे में चक्कर लगा रहे थे, “हम न मरिहैं, मरिहैं संसारा, हम न मरिहैं, मरिहैं संसारा”, ये पंक्ति बार-बार दोहरा रहे थे। मैं सीधे खड़ा हो गया । बड़ा लिहाज करते थे हम उनका उस समय । बाद में उन्होंने धीरे-धीरे हमारे लिहाज को कम किया और मैत्रीभाव की तरफ हमको ज्यादा लाए । खड़ा रहा मैं दो मिनट कि कैसे उनको आवाज दूं और मेरी तरफ उन्होंने देखा नहीं। दो-तीन मिनट बाद निगाह पड़ी उनकी, तो बोले, “आ गए? बैठो।” बैठ गए वे भी, सारा चेहरा सुर्ख था, लाल, लगा कि बड़े तनाव में हैं। कारण मेरी समझ में आया कि आज सीधे घर नहीं आए वे, होटल में जाकर रुक गए क्योंकि वे बच्चों के सामने, छोटे-छोटे बच्चों के सामने, तनावग्रस्त होकर परिवार में नहीं आना चाहते थे।

मैंने कुछ छेड़ा उनको, बातचीत की, लेकिन वे सहज नहीं हुए। बोले, मैं खाना खाके सोता हूँ । तुम अब शाम को आना। शाम को हम दो-चार लोग गए तो काफी ठीक थे। धीरे-धीरे पता चला कि इलाहाबाद में कुछ लोगों से उनका विवाद हुआ था, किसी गोष्ठी में, जो अपने को प्रतिबद्ध और मार्क्सवादी कहते हैं, उन लोगों से, और वे लोग खड़े हो गए दूसरे पाले में। कुछ मुक्तिबोध को लेकर भी उलझन थी। वैचारिक और साहित्यिक बहस में, अपने वर्ग की चिंता में रहकर जो स्नायविक तनाव होता है, यह कितने लोगों में होता है ? लोग अपनी विचारधारा को अपनी शारीरिक चिंता का अंग नहीं बना पाते, केवल गोष्ठियों की बहस में ही वह चिंता होती है। जीवन के संघर्ष की तरह वह चीज लोगों में शामिल नहीं होती। मोटे तौर पर कहें कि अगर किसी रिक्शे वाले की कोई पिटाई कर रहा है, बहुत धनवान आदमी और वहां से आप गुजर रहे हैं, तो उसके लिए लड़ जाना उसकी तरफ़दारी है। मैं कह रहा था कि तब काफी तनाव भरा था उनमें । उसी को लेकर वे बहस करने लग गए तो हम लोगों की समझ में आ गया। हमने पूछा कि क्या बात थी ? उन्होंने कहा  कमला प्रसाद: कि जो हमारे साथ हैं, वे हमारे साथ रहें और जो हमारे साथ नहीं हैं, वो रहें जहाँ रहें। यही हो जाए तो बहुत है।

बहुत सारे प्रतिबद्ध लोगों के दोगलेपन को परसाई जी सह नहीं पाते थे और इस घाव को वे अकेले में भी झेलते थे। जिस शहर में रहते थे, आप जानते हैं, उस शहर में ऐसे बहुत सारे प्रतिबद्ध लोगों के दोगलेपन के घाव को वे अपने घर में रहकर झेलते थे और इसका उन्हें तनाव होता था । वैचारिक रूप से सार्थक जीवन जीने के लिए उनको सतत् संघर्ष करना पड़ा जीवन में। इस तरह के बहुत सारे उद्धरण हैं, बिष्ट जी, उनके जीवन के । हम संपर्क में आए और हमको लगा कि परसाई को हम लोग “रिसीव” जितना कर सकते हों, करें, किया भी, लेकिन उनके जैसा जीवन हम लोग नहीं जी पाएंगे, नहीं जी पा रहे हैं।

जगत सिंह बिष्ट:

दो रचनाकारों की तुलना करना कहां तक उचित है, यह मैं नहीं जानता, लेकिन परसाई जी के समकालीन रहे शरद जोशी। एक प्रतिबद्ध, दूसरा उन्मुक्त । क्या दोनों के पीछे व्यंग्य के दो स्कूल आज भी चल रहे है ? परसाई और शरद जोशी के बारे में क्या कहना चाहेंगे ?

परसाई और शरद जोशी बड़े मित्र थे । भोपाल जब परसाई जी जाते थे तो शरद जोशी के घर ठहरते थे। शरद जोशी ने अपना गुरू कहा भी आरंभ में। दोनों में बहुत अच्छा पत्राचार था। बाद में दोनों अलग हुए। कहीं-कहीं, एकाध बार, शरद जोशी ने परसाई जी पर कटाक्ष भी किया। शरद जोशी बाद में मीडिया की तरफ भी झुक गए और लिखा। एक तो परसाई ने बहुत लिखा है और उनके लेखन के बहुत आयाम हैं । परसाई को जितना इतिहास का और दुनिया के साहित्य का ज्ञान था, वह आप उनके तमाम लेखन से जान सकते हैं।

“पूछिये परसाई से” एक कॉलम “देशबन्धु” में था। लोगों की आश्चर्य हुआ कि इतना इतिहास-बोध है उनका, सौंदर्य-बोध है। उनके ज्ञान का और भाव-बोध का क्षेत्र बहुत व्यापक था । बड़ी पारदर्शी और पैनी निगाह थी । छुपता नहीं था कुछ उनसे । मेरी राय ये है कि शरद जोशी का क्षेत्र तुलनात्मक रूप से सीमित है। इसका उत्तर पाने के लिए आप किसी बच्चे को तीन रचनाएं शरद जोशी की पढ़ने को दे दीजिए और तीन रचनाएं परसाई की। फिर चार साल बाद आप उस बच्चे से पूछिये कि तुम्हें क्या याद है दोनों में से और तुम पर क्या असर है दोनों का? उत्तर आपको मिल जाएगा ।

जगत सिंह बिष्ट:

जहाँ तक शिल्प या शब्दों की जादूगरी की बात है, वहां पर तुलना की जाए तो जो प्रयोग शरद जोशी ने किए हैं…

कमला प्रसाद:

शरद जोशी ने प्रयोग बहुत किए लेकिन एक सीमा के बाद क्या “मैनरिज्म” नहीं लगने लगता उसमें? भाषा – एक फव्वारे का उछाल होती है, एक झरने का उछाल होती है । दोनों में कुछ फर्क होता है ? भाषा का मैनरिज्म नए रीतिवाद को जन्म देता है।

जगत सिंह बिष्ट:

आप परसाई जी के बहुत ही अंतरंग रहे हैं । उनको अपना बौद्धिक गुरु भी मानते हैं…..

कमला प्रसाद:

हाँ, बिल्कुल!

जगत सिंह बिष्ट:

हम लोग सभी मानते हैं। अंतिम दिनों में उनसे आपकी मुलाकात हुई थी । लगता है, उस विषय में आपके पास काफी कुछ कहने को है। जो अनुभव है, अनुभूतियां हुईं, उनमें से कुछ पाठकों से “शेयर” करने के लिए…

कमला प्रसाद:

बिष्ट जी, १० अगस्त को वे नहीं रहे ! एक संयोग है, ६ और ७ अगस्त को मैं उनके साथ था। ट्रेन लेट हुई तो मैं एक बजे पहुंचा। बारह बजे उनके सोने का टाइम होता था। सीता दीदी ने बताया कि उन्हें सूचना मिल गई थी कि मैं आऊंगा तो एक दिन पहले रात में उन्होंने हाजमे का चूर्ण नहीं लिया। दीदी ने कहा, ले लो, तो बोले- कल कमला प्रसाद आएगा, कहीं गड़बड़ न हो जाए, दस्त न लग जाए। फिर बारह बजे सोए तो पिक्की से बोले कि जब कमला प्रसाद आए, तभी जगा देना । कितना बड़ा लेखक, मेरे जैसे छोटे आदमी की ये चिंता!

इन दोनों ने मुझे ये बातें बताई जब मैं १० अगस्त को उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर गया और रात को श्मशान घाट से लौटकर उनके घर आया। मैं और सेवाराम (त्रिपाठी) थे । दोनों ने ये बातें बताई, उस दिन नहीं बताई थी । दीदी ने ये चूर्ण वाली बात बताई जब, तो बिष्ट जी, मैं संभाल नहीं सका अपने आपको । सारा वृत्तांत इतना “इमोशनल” है कि बहुत-सी बातें हैं, बहुत बातें थीं और मुझे लगता है दीदी ने कहा बहुत से प्रसंग हैं.. पिछले करीब दो महीने से उनका स्वास्थ्य बहुत खराब था, बहुत बेचैन रहते थे और शक्ति इतनी क्षीण हो गई थी कि कुल तीन-चार वाक्य ही बोलते थे वो ।

छः तारीख को बहुत बोले । एक बार दीदी ने अंदर बुलाया और कहा कि भैया बहुत बोल रहे हैं तो मैंने सोचा कि उनसे कहूँ। मैंने कहा, परसाई जी मैं घूम आता हूं, मित्रों से मिल आता हूँ, आप थोड़ा आराम कर लीजिए। वे बोले, बैठो। मैंने कहा, आप थक रहे हैं। कहने लगे, मैं थोड़ी आंख मूंद लूंगा, ठीक हो जाएगा। तुम बैठो। तो, बार-बार दो-तीन मिनट के लिए आंख मूंद लें, फिर बोलने लगें और पूछने लगें ।

परसाई जी साहित्य की चर्चा नहीं शुरू करते थे। बिटिया कैसी है ? वो बेटा, छोटा वाला, कैसा है? उसको “जॉन्डिस” हो गया था, अब कैसा है। राजीव की चिट्ठी आई थी, अच्छा दामाद है तुम्हारा। तो, ये जिदगी से हमेशा अपने को संलग्न करना । मुझे लगता है कि कहानी की चर्चा तो हम घर बैठे भी कर सकते हैं, उसके लिए हमको जबलपुर जाने की आवश्यकता नहीं है। जिदगी की चर्चा के लिए हम लोगों को मिलना चाहिए । साहित्य की चर्चा तो, आज इतनी सामग्री, इतना लेखन उपलब्ध है, कि घर में कर सकते हैं। जिंदगी की चर्चा करनी चाहिए।

एक बात बताऊं, परसाई जी इधर लोगों के बारे में व्यक्तिगत प्रतिक्रिया व्यक्त करने से अपने को रोकते थे । किसी लेखक पर व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं करते थे। उस दिन उन्होंने कुछ कीं। मैं उन बातों को अभी, व्यक्तिगत बातों को अभी न कहूंगा, “कन्ट्रोवर्सी” होगी लेकिन मैं ये कहूंगा कि मेरे जीवन का यह चरम, एक तरह से सुख मिश्रित दुख का क्षण है कि मैं ये कहूं कि परसाई जी से मैं ६-७ अगस्त को मिला और चलते हुए दीदी ने कहा था, मैंने “वसुधा” के संपादकीय में लिखा भी है, हाँ भैया, बहुत अच्छा हुआ आ गए, बहुत हल्का हुआ जी उनका। तो इस तरह की और बहुत-सी बातें हुई। बहुत-सी बातें हैं दिमाग में लेकिन अभी ऐसा लगता है कि उनसे, परसाई जी से अपने आपको मुक्त करके ही उन बातों को कहा जा सकता है ।

जगत सिंह बिष्ट:

अंत में, एक और बात स्पष्ट हो जाए। परसाई जी की मृत्यु के पश्चात् , प्रभाष जोशी ने “कागद कारे” में, विवादास्पद कहें, या “पुअर टेस्ट” में बातें लिखी थीं जो कि श्रद्धांजलि लेख में साधारणतः लिखते नहीं हैं । उनमें जो बिंदु उठाए थे उन्होंने, वो आप जानते हैं, उनके बारे में कुछ स्पष्ट करना चाहेंगे आप?

कमला प्रसाद:

प्रभाष जोशी ने अपने आपको बहुत छोटा कर दिया उस लेख से। आप देखेंगे कि परसाई पर वह लेख कम है, प्रभाष जोशी का खुद के बारे में ज्यादा है। मसलन, जबलपुर हवाई जहाज नहीं जाता था, नहीं तो मैं जाता। इंदौर और मालवा से आने वाले लोगों ने मुझे बताया कि वो ऐसा करते हैं। एक ओर इंदौर और मालवा से आने वाले लोग और दूसरी तरफ परसाई । अगर आपके मन में परसाई से मिलने की तमन्ना थी तो आपने उस तमन्ना को इसीलिए रोका कि जबलपुर हवाई जहाज नहीं जाता ? अगर उस लेखक से मिलने की आपको इच्छा थी और उससे कुछ बात करने की इच्छा थी तो पैदल जाना था। “जनसत्ता” के संपादक का जो दंभ है वह पंक्ति पंक्ति से बोलता है। ऐसा व्यक्ति क्या मूल्यांकन करेगा परसाई का? कबीर कहता था न कि लकुटी और कमरिया रख के आओ, तब आओ!

यह जो लेखन की दुनिया है और लेखन में आम आदमी का लेखक और प्रतिनिधि होना, संसद में सांसद का प्रतिनिधित्व नहीं है यह। खुली जनता की अदालत है, उसमें जनता का प्रतिनिधि होना लेखन है। वहाँ आप हवाई जहाज से आएंगे? तब आप उनसे संवाद करेंगे ? बहुत छोटा कर दिया प्रभाष जोशी ने अपने आपको । परसाई का “एक्सपोज़र” नहीं बल्कि प्रभाष जोशी का “एक्सपोज़र” है और इस पर तमाम व्यापक प्रतिक्रिया हुई है हिन्दी जगत में। जिस दिन यह छपा था, मैं संयोग से दिल्ली में था, हम लोगों ने दिल्ली में उसी दिन प्रतिक्रिया व्यक्त की। प्रतिक्रियाएं तमाम हुईं। मैं कहूँगा कि यह बहुत पूर्वाग्रही दिमाग से उपजा लेखन है ।

♥♥♥♥

चित्र साभार – कमला प्रसाद – भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर

© जगत सिंह बिष्ट

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 300 ☆ परसाई जी, कुछ यादें ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक ऐतिहासिक संस्मरण  – ‘परसाई जी, कुछ यादें‘। इस ऐतिहासिक रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 300 ☆

☆ संस्मरण ☆ परसाई जी, कुछ  यादें

मुझे करीब बीस साल तक परसाई जी के आवास के बहुत नज़दीक रहने का मौका मिला। कभी भी पैदल चलकर उनके पास पहुंच जाता था। परसाई जी पैर खराब होने के कारण बाहर के कमरे में पलंग पर लेटे रहते थे। वही उनका स्थायी स्थान था। कहीं आने-जाने का सवाल नहीं। दरवाज़े पर एक पर्दा रहता था। दरवाज़ा कुछ खास समय पर ही बन्द होता था, अन्यथा परसाई जी के पास कभी भी पहुंचा जा सकता था। सिर्फ पर्दा उठाकर ‘आ सकता हूं?’ कहने की ज़रूरत होती थी। परसाई जी कभी किसी को मिलने के लिए मना नहीं करते थे। जो भी आता उसका स्वागत करते थे और सहज भाव से उससे बात करते थे। उन्होंने वश भर कभी किसी को दुखी या निराश नहीं किया। बहुत से लोग जबलपुर के मार्बल रॉक्स सहित अन्य दर्शनीय स्थलों को देखने के लिए आते थे और लगे हाथ परसाई जी के ‘दर्शन’ के लिए भी आ जाते थे। कोई परिचय न होने के बावजूद भी परसाई जी उनसे प्रेम से मिलते थे। उन्हें दिक्कत सिर्फ उन्हीं लोगों से होती थी जो उनके विचारों के विरोधी थे।

पैर खराब होने से पूर्व परसाई जी रोज़ ही सवेरे मित्रों से मिलने के लिए निकल जाते थे। जब वे निकलते तो उनका व्यक्तित्व देखते ही बनता था। लंबा कद, गौर  वर्ण, प्रशस्त ललाटऔर शरीर पर काली शेरवानी। जब वे सड़क पर चलते तो लोगों की गर्दनें मुड़ती थीं। किसी कार्यक्रम में परसाई जी के प्रवेश पर लोगों की नज़रें सहज ही उनकी तरफ उठती थीं।

कहना ज़रूरी है कि परसाई जी ने जैसा लिखा वैसा ही वे जिये। अपने मूल्यों से समझौता न कर पाने के कारण उन्होंने दो बार शिक्षक की नौकरी छोड़ी और फिर अन्त में पूरी तरह मसिजीवी हो गये। उनके ऊपर बहन के परिवार की ज़िम्मेदारी थी। कल्पना करें ऐसे व्यक्ति की जो चलने फिरने से लाचार हो, जो अपनी कलम के बल पर अपने संपूर्ण परिवार का जीवन-यापन करता हो और फिर भी अपने आत्मसम्मान से समझौता न करता हो। ‘गर्दिश के दिन’ में उन्होंने लिखा है कि उन्होंने शुरू से ही अपनी छाती को कड़ा कर लिया था और इसे उन्होंने अन्त तक निभाया। पूरी ज़िन्दगी गर्दिश में रहने के बावजूद उन्होंने अपने को किसी की दया का पात्र नहीं बनने दिया।

यह कहना भी ज़रूरी समझता हूं कि मैंने महसूस किया कि परसाई जी के संपर्क में आने से व्यक्ति का जीवन प्रभावित और परिवर्तित होता था। उनके जीवन को देखने और उनके साथ उठने- बैठने से व्यक्ति अनेक क्षुद्रताओं से मुक्त हो जाता था। उसके लिए उन मार्गों को अपनाना भी कठिन हो जाता था जो आज ऊपर पहुंचने की आसान सीढ़ी माने जाते हैं। मेरे जीवन पर परसाई जी की जो छाप पड़ी वह शायद अन्त तक कायम रहेगी। लेखन के प्रारंभ में मेरी एक कहानी तब की प्रसिद्ध पत्रिका ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुई थी जिसे लोगों ने बहुत पसन्द किया था। बड़ी भावुकतापूर्ण कहानी थी जिसमें एक सामन्त की उदारता का चित्रण था, जो अपने बुरे दिनों में भी एक परिचित को उसकी बेटी के विवाह के लिए दिये गये गलीचे को वापस लेने से इनकार कर देता है क्योंकि वह बेटी की शादी के लिए दिया गया था। परसाई जी ने इस कहानी को पढ़ा था और जब मैं उनसे मिलने गया तो उन्होंने बहुत संक्षेप में अपनी राय मुझे बतायी। वे कहानी में सामन्त के महिमामंडन से खुश नहीं थे। उनका मत था कि सामन्त के पास जो भी वैभव होता है वह सब जनता का होता है। बात मेरी समझ में आयी और इसका नतीजा यह हुआ कि मेरे आज तक सात कहानी-संग्रह निकलने के बाद भी वह कहानी किसी संग्रह में देने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

एक बार महाराष्ट्र के एक व्यंग्यकार परसाई जी से मिलने आये थे। वे परसाई जी की स्थिति को देखकर भावुक हो गये थे और उन्होंने लौटकर एक प्रसिद्ध पत्रिका में एक पत्र छपवाया था जिसमें लिखा कि परसाई जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है और उन्हें सरकारी मदद मिलना चाहिए। परसाई जी ने उसे पढ़कर तुरन्त पत्रिका को अपना प्रतिवाद भेजा कि वे अपनी देखभाल करने में समर्थ थे और उन्हें किसी मदद की ज़रूरत नहीं थी। शारीरिक असमर्थता के बावजूद दयनीय  बनना परसाई जी के स्वभाव के विपरीत था।

एक समय परसाई जी अवसाद में घिर गये थे और उन्होंने लोगों से बातचीत करना बन्द कर दिया था। उसी बीच मैं उनसे मिला और अपने पहले व्यंग्य-संग्रह का फ्लैप-मैटर लिखने का उनसे अनुरोध किया। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और मैं स्थिति को समझ कर लौट आया। उसके बाद उनके दुख-सुख के साथी, ‘देशबंधु’ पत्र के प्रधान संपादक स्व. मायाराम सुरजन उन्हें अपने साथ रायपुर ले गये और स्वस्थ होने तक उन्हें वहीं रखा। उनके लौटने पर जब मैं उनसे मिला तो उन्होंने स्वयं ही मुझसे कहा कि वे मेरी पुस्तक का फ्लैप-मैटर लिखेंगे और उन्होंने उसे लिखा भी। वे ऐसे ही संवेदनशील थे।

परसाई जी दूसरों की निन्दा में रुचि नहीं लेते थे। मुझे याद है मैंने एक बार एक ऐसे व्यक्ति के बारे में, जो उनके भी निकट थे, उनसे कहा था कि वे प्रतिभा-संपन्न होते हुए भी अपनी प्रतिभा का सही उपयोग नहीं कर रहे थे और एक तरह से अपना जीवन नष्ट कर रहे थे। परसाई जी ने छूटते ही पूछा कि मैं कैसे कह सकता था कि वे अपना जीवन नष्ट कर रहे थे। मैं उनकी बात समझ कर चुप हो गया। जीवन की सार्थकता की कोई एक परिभाषा और एक पैमाना नहीं हो सकता। अपने द्वारा गढ़े हुए पैमाने को ही उचित मानना नासमझी है।

परसाई जी वामपंथी थे। वे लंबे समय तक प्रगतिशील लेखक संघ के प्रांतीय अध्यक्ष रहे। समाजवाद की स्थापना उनका स्वप्न और उनकी प्रेरक-शक्ति थी, लेकिन अन्त में वे निराश होने लगे थे। एक दिन मेरे सामने ही उन्होंने एक मित्र से कहा था कि उन्हें लगता था कि उनके जीवन-काल में समाजवाद नहीं आएगा।

पैर की खराबी को परसाई जी ने झेल लिया था, लेकिन जीवन के अन्तिम दिनों में मोतियाबिंद के असफल ऑपरेशन ने उन्हें तोड़ दिया था। उनकी एक आंख खराब हो गयी थी। मिलने वालों के सामने वे  उस आंख को ढकने की कोशिश करते थे। एक मसिजीवी के लिए यह बड़ा आघात था। इसी मायूसी की स्थिति में वे एक रात नींद में ही दुनिया से विदा हो गये। ज़ाहिर है कि अपनी छाती कड़ी रखने की उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।

परसाई जी के संबंध में यह कहना ज़रूरी है कि उनके लिए लेखन मात्र लेखन नहीं रहा। वह उनके लिए एक मिशन और एक आंदोलन रहा। ‘गर्दिश के दिन’ में उन्होंने लिखा कि उन्होंने लेखन को दुनिया से लड़ने के लिए एक हथियार के रूप में अपनाया होगा। अपनी रचना ‘साहित्य और सरकार’ में वे लिखते हैं, ‘जो कैरियर की धुन में है उसे तो एकदम साहित्य रचना बन्द कर देना चाहिए। साहित्य रचना तपस्या तो है ही। इसमें मिटना तो पड़ता ही है।’ अपने लेख ‘साहित्यकार का साहस’ में वे लिखते हैं, ‘साहित्य हमारे यहां व्यापार कभी नहीं रहा, वह धर्म रहा है। अभी भी वह धर्म है, एक मिशन है। इसमें मिटना पड़ता है। जो इसमें बनना चाहते हैं वे बेहतर है आढ़त की दुकान खोलें। इसमें तो कबीर की तरह घर फूंक कर बाहर निकलना पड़ता है। यह ‘खाला का घर’ नहीं है।’

दुनिया के कई बड़े लेखक कालांतर में सोशल एक्टिविस्ट हुए। लेखक को कभी यह लगने लगता है कि लेखन से उसके कर्तव्य की पूर्ति नहीं होती। समाज में प्रत्यक्ष भागीदारी ज़रूरी है। पैर खराब होने से पूर्व परसाई  जी अनेक अवसरों पर सामाजिक आंदोलनों में भाग लेने लगे थे। समझा जा सकता है कि यदि वे स्वस्थ रहते तो निश्चय ही उनकी इस भूमिका में और वृद्धि होती।

कुछ आलोचक परसाई जी के लेखन में ‘सिनिसिज़्म’ या एक नकारात्मक दृष्टिकोण पाते हैं, किंतु यह नज़रिया सही नहीं है। परसाई जी द्वारा व्यंग्यकार जयप्रकाश पांडेय को दिये गये साक्षात्कार में इस आक्षेप का उत्तर मिलता है। वे कहते हैं— ‘यद्यपि मैं व्यंग्य विनोद लिखता हूं, पर वास्तव में मैं बहुत दुखी आदमी हूं। दुखी होकर लिखता हूं। मैं इसीलिए दुखी हूं कि देखो मेरे समाज का क्या हाल हो रहा है, मेरे लोगों का क्या हाल है, मनुष्य का क्या हाल होता जा रहा है। ये सब दुख मेरे भीतर है। करुणा मेरे भीतर है। इस कारण से करुणा की अंतर्धारा मेरे व्यंग्य के भीतर रहती ही है। इस प्रकार यह बात है कि जैसे मैं विकट से विकट ट्रेजेडी को व्यंग्य और विनोद के द्वारा उड़ा देता हूं उसी प्रकार उस करुणा के कारणों को भी मैं व्यंग्य की चोट से मारता हूं या उन पर विनोद करता हूं।’

इसी संदर्भ में अपने लेख ‘तब की बात और थी’ में परसाई जी अपने लेखन के बारे में लिखते हैं— ‘यह भी कहा गया है कि मेरा व्यंग्य बड़ा कटु होता है। होता तो है। पर चट्टान सी बुराई पर अगर कोई सुनार की छोटी हथौड़ी से प्रहार करे तो यह उसकी नासमझी ही कही जाएगी। चट्टान पर तो लुहार के घन का भरपूर हाथ ही पड़ना चाहिए। सामाजिक  बुराइयों के प्रति मैं बहुत कटु हूं। शेर को ‘टॉय गन से’ जिस दिन मारना संभव हो जाएगा उसे दिन फिर सोचूंगा कि क्या करूं।’

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि परसाई जी का साहित्य सोद्देश्य, समाज के हित में, समाज में परिवर्तन की आकांक्षा से रचा गया। उनके मित्र स्व. मायाराम सुरजन ने उनके विषय में लिखा, ‘परसाई जैसे  व्यक्ति के बारे में जिसकी निजी ज़िंदगी केवल दूसरों की समस्याओं की कहानी हो, अपनी कहने को कुछ नहीं।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ स्मृति दिवस विशेष – ‘यादों की धरोहर’ में स्व. हरिशंकर परसाईं ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय 

जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता

☆ संस्मरण ☆ स्मृति दिवस विशेष – ‘यादों की धरोहर’  में  स्व. हरिशंकर परसाईं ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆ 

 (‘यादों की धरोहर’ पुस्तक में से  स्व हरिशंकर परसाई जी के साक्षात्कार के अंश)

[1] साहित्यिक हास्य : परसाई का स्नेह चार्ज

हरिशंकर परसाई ने अपनी पहली पुस्तक – हंसते हैं,  रोते हैंं,  न केवल स्वयं प्रकाशित की बल्कि बेची भी । उनका समर्पण भी उतना ही दिलचस्प था – ऐसे आदमी को जिसे किताब खरीदने की आदत हो और जिसकी जेब में डेढ़ रुपया हो ।

एक मित्र ने कहा – यह क्या सूखी किताब दे रहे हो ? अरे,  कुछ सस्नेह,  सप्रेम लिखकर तो दो ।

परसाईं ने किताब ली और लिखा – भाई मायाराम सुरजन को सस्नेह दो रुपये में ।

मित्र ने कहा – किताब तो डेढ़ रुपये की है । दो रुपये क्यों ?

परसाई का जवाब – आधा रुपया स्नेह चार्ज ।

[2] हरिशंकर परसाई कहिन

मेरी कभी कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही । जब पूरी तरह लेखन करने लगा तब भी कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही । मेहनत से लिखता था । बस , यही चाहता था कि लेखन सार्थक हो । पाठक कहें कि सही है ।

मुझे मान सम्मान बहुत मिले । साहित्य अकादमी,  शिखर , मानद डाक्टरेट , प्रशस्ति पत्र  ,,,, ये सब कुछ अलमारी में बंद । कमरे में सिर्फ गजानंद माधव  मुक्तिबोध का एक चित्र । बस । सम्मान का कोई प्रदर्शन नहीं ।

[3] बुरा ही बुरा क्यों दिखता है 

एक आरोप मुझ पर लगाया जाता है कि मुझे बुरा ही बुरा क्यों दिखता है ? मेरी दृष्टि नकारात्मक है ।

यह कहना उसी तरह हुआ जैसे डाँक्टर के बारे में कहा जाए कि उसे आदमी में रोग ही रोग दिखता है ।

हरिशंकर परसाईं का कहना था कि मैं उन लेखकों में से नहीं जो कला के नाम पर बीमार समाज पर रंग पोतकर उसे खूबसूरत बना कर पेश कर दें । वे लेखक गैर जिम्मेदार हैं । जिम्मेदार लेखक  बुराई बताएगा ही । क्योंकि वह उसे दूर करके बेहतर जीवन चाहता है । वे मुक्तिबोध की पंक्तियां गुनगुनाने लगे

जैसा जीवन है उससे बेहतर जीवन चाहिए

सारा कचरा साफ करने को मेहतर चाहिए

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ ☆ “मित्रता दिवस विशेष – बचपन की यादों में स्मृति शेष अशोक…” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

संस्मरण ☆ 

☆ “मित्रता दिवस विशेष – बचपन की यादों में स्मृति शेष अशोक…श्री यशोवर्धन पाठक

यादों में जब खो जाता है मन ,

दुनिया की सुधि बिसराता है मन

           🌹

माईं अशोक घर पर  है कि स्कूल गया या फिर बुआ रंजन घर पर है कि स्कूल गया , ऐसी ही बातों से हम दोनों के दिन की शुरुआत होती थी । सुबह 7. 30 बजे  स्कूल जाने के लिए जब हम दोनों तैयार हो जाते तो फिर हमलोग एक दूसरे के घर पर जाकर ऐसी ही आवाज लगाते और फिर  एक दूसरे का हाथ पकड़ कर शैतानियां करते हुए स्कूल पहुंच जाते ।अशोक के पूज्य पिता हमारी अम्मा जी के ऐसे मुंह बोले भाई थे जिनको अम्मा जी ने लगभग 45 साल राखी बांधी।जबलपुर के गलगला क्षेत्र में हमारे पड़ोस में वर्मा जी के घर से बिल्कुल लगा हुआ हमारा घर याने हम दोनों  दिन भर एक दूसरे के घर में धमाल चौकड़ी मचाते रहते थे ।  स्कूल से 12 बजे जब हम घर आते दोनों में किसी के ही घर हम लोग खाना खा लेते और फिर स्कूल का होम वर्क करने के बाद या तो हम‌ लोग खेलते रहते या फिर आसपास  घूमने निकल जाते । हम लोग घर के सदस्यों के साथ या तो कैरम खेलते या फिर अट्टू याने कन्ना दूडी खेलते रहते । अट्टू खेलने के लिए कौड़ी के लिए स्कूल के बाद जब घूमने जाते तो इमली के झूठे बीज ढूंढ कर लाते फिर उन्हें धो कर बीच से फोड़ कर अट्टू खेला करते ।बचपन बहुत प्यारा होता है । पढ़ाई और लिखाई के अलावा  हमारी न तो कोई जिम्मेदारी होती है और न ही कोई तनाव । हमारी दोस्ती और हमारी मस्ती यही। हमारी रोजाना की जिंदगी होती है और बड़े होने पर यही हमारी जिंदगी के यादगार पल बन जाते हैं ।बस यही हम दोनों के साथ भी ऐसी ही बचपन की मस्ती थी जिसमें हम पूरे समय खोये रहते थे ।

बचपन का ऐसा ही  ही एक मनमोहक प्रसंग   हम दोनों के बीच  चाहे जब  बातचीत का विषय बनता था जब ज्हम दोनों एक बार स्कूल से आने के बाद बातें करते हुए घूमते निकल गये ।उस समय हम दोनों प्रायमरी स्कूल की दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ते थे । रास्ता तो हम दोनों को घर के आसपास का ही याद था लेकिन घूमते हुए हम लोग दूर निकल गये और घर तक आने का‌ रास्ता भूल गए, फिर काफी देर भटकते रहे और यहां हम दोनों की खोजबीन शुरू हो गई यहां तक कि पुलिस में भी खबर करने का सोचा जाने लगा। हम लोगों को भटकते हुए उस समय एक टेलर की पत्नी ने देख लिया । इस टेलर की पत्नी हम लोगों को पहचान गई।  वह हमारे परिवार से परिचित थी । हम दोनों को वो तुरंत अपने घर ले गयी और बढ़िया नाश्ता कराया और ठंडा शरबत भी पिलाया । उसके बाद उसने हम दोनों को हमारे घर पहुंचाया । घर पहुंचने पर हम लोगों को डांट तो पड़ी ही साथ में अपने अपने घर पर पिटाई भी हुई ।

अशोक के साथ ऐसी न जाने कितनी यादें हैं कि सुनाते सुनाते भी मन न भरे । हम दोनों जब भी मिलते तो बचपन की इन्हीं यादों के आसपास घूमते रहते ।

अशोक मेरे बचपन के पहले मित्र थे। याने इस दुनिया में आने के बाद जब हमें  ‌सोचने समझने और बोलने चालने की अक्ल आई तो मित्र के रूप में हमने अशोक को सामने पाया और हमें दोस्ती का भी अर्थ समझ में आया । दिन बीतते रहे और हम भी अपने अपने परिवार के साथ अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए  लेकिन हमारा मिलना बराबर जारी रहा और जब भी मिलते तो बचपन की  तमाम बेवकूफियों को को भी  याद करते और  उस समय हम अपने  वर्तमान   को भूलकर अपने  बचपन की दुनिया  में खो जाते ।

अशोक के जन्म दिवस पर हम नियमित रूप से प्रतिवर्ष पहुंचते और 22 अप्रैल का मुझे बड़ी बेसब्री से इंतजार भी रहता  लेकिन ये इंतजार कब तक । कभी तो इस इंतजार की  घड़ियां  खत्म होना थी और  एक दिन वह भी खत्म हो गई ।

आज अशोक हमारे साथ नहीं है लेकिन  उसकी  कभी खत्म न होने वाली ढेर सारी यादें हैं और वो भी बचपन की । बस यही मेरे लिए बहुत है ।

🌹

 © श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ दस्तावेज़ # ३१ – मारिशस से ~ मेरा एक विशेष संस्मरण – डाक्टर सतीश दुबे ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के चुनिन्दा साहित्य को हम अपने प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करते रहते हैं। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं।

(ई-अभिव्यक्ति में “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से अमूल्य और ऐतिहासिक तथ्यों को सहेजने का प्रयास है। दस्तावेज़ में ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेजों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है मारिशस से आदरणीय श्री रामदेव धुरंधर जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ “मेरा एक विशेष संस्मरण – डाक्टर सतीश दुबे।) 

☆ दस्तावेज़ # ३१  – मारिशस से ~ मेरा एक विशेष संस्मरण – डाक्टर सतीश दुबे ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆ 

विद्वान मनीषियों से भेंट मुलाकात होने पर उनसे मैं प्रभावित हुआ तो उनके बारे में लिखना मेरे लिए अवश्य जरूरी हुआ। लिखने का थोड़ा गुण आने से मैं मानता हूँ यह मेरा सौभाग्य ही है जिस किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति की मुझ पर छाप पड़ी मुझे तो उसे ध्यान में रखते हुए बस लिखना ही सूझा।

हिन्दी साहित्य के मेरे संस्मरण के बहुत से पड़ाव हैं। महादेवी वर्मा [प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 नागपुर। मुझे उस सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत और मॉरिशस द्वय सरकारों की ओर से हवाई टिकट मिला था] डा, हजारीप्रसाद द्विवेदी, विष्णु प्रभाकर, डा. शिवमंगलसिंह सुमन, उपेन्द्रनाथ अश्क, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, गिरिगाज किशोर, डा. नामवरसिंह, डा. विनय, राजेन्द्र यादव, दिनमान के सह संपादक सर्वेश्वरदयाल सक्सेना [बकरी नाटक के रचनाकार] दिमान के संपादक रघुवीर सहाय …… और भी अनेकानेक।

डा. रामधारीसिंह दिनकर [मॉरिशस में –1967]

यशपाल [ मॉरिशस में 1973 ]

इन सब से जुड़े मैंने विषद संस्मरण लिखे हैं। कुछेक प्रकाशित हो चुके हैं और पूर्णरूपेण ‘कुछ पूरे, कुछ अधूरे’ शीर्षक से मेरे संस्मरण — संग्रह में शीघ्र ही प्रकाशित होने वाले हैं।

मैं जो संस्मरण यहाँ लिखना चाहता हूँ उस पर आता हूँ। मैं दिल्ली में मित्र डाक्टर राजेन्द्र मिश्र के गाजियाबाद आवास के ऊपरी कक्ष के एक कमरे में अतिथि स्वरूप एक महीने तक ठहरा था। पहले भी मैं भारत गया और बाद में भी तो डाक्टर जी ने मुझे यह सम्मान दिया है। पैसे की बात उनसे बिल्कुल न करूँ। यह हिन्दी लेखक के रूप में सौगात है जो मेरे लिए सदा अनभूला रह जाने वाला है। धन्यवाद मेरे परम मित्र डाक्टर राजेन्द्र मिश्र जी।

मैं गाजियाबाद में ही था कि मित्र श्रीधर बर्वे जी ने मुझे उनके आवास इन्दौर आने के लिए कहा था। मैं इन्दौर गया तो उन्होंने मुझे बताया लघुकथा के एक प्रबल लेखक यहाँ रहते हैं। उनका नाम सतीश दुबे है। उन्होंने प्रेमचंद साहित्य पर एम. ए. के लिए शोध पूरा किया था अतः वे डाक्टर सतीश दुबे हैं। मैं लघुकथा लिखता था इसलिए भी श्रीधर बर्वे जी को लगा था डाक्टर सतीश दुबे जी से मेरी मुलाकात सामयिक होगी। मैं सतीश दुबे जी के बारे में पहले से जानता था। वे लघुकथा आन्दोलन के प्रथम हस्ताक्षरों में से एक थे।

इस वक्त मुझे साल याद नहीं है। पर निश्चित ही यह कोरोनो से बहुत पहले की बात है और तब डा. सतीश दुबे जी अपने जीवन से थे।

श्रीधर बर्वे जी ने मुझे बताया था सतीश दुबे जी बीमार प्राणी हैं। वे लकवा पीड़ित थे। मैंने वहाँ पहुँचने पर उन्हें देखा और बात को सच ही पाया वे जीवन में निरुपाय हो कर रह गए थे। उनके मकान के प्रवेश द्वार में लिखा हुआ था — साहित्यकार

यह डा. सतीश दुबे जी के आवास का नाम था। दूसरे शब्दों में यह उनकी आकाँक्षा का शब्द था जो मैं बस महसूस कर पाता। उनकी श्रीमती उनकी सेवा में लगी रहती थी। मैंने साहित्य की आत्मा रखने वाले सतीश दुबे जी ने कहा था धर्मयुग के माध्यम से वे मुझे जानते हैं। मैंने उनके इन शब्दों को अपने लिए आशीर्वचन माना था। इंदौर में मेरा कार्यक्रम रखा गया था। सतीश दुबे जी को वहाँ मोटर में लाया गया था। उन्हें वहीं से दो शब्द कहने के लिए माइक थमाया गया था। उन्होंने कहा था हमारे अतिथि रामदेव धुरंधर हिन्दी साहित्य में यशस्वी होने के रास्ते पर हैं। बल्कि उन्होंने बहुत कमा लिया है। कमाने का यह सारस्वत यज्ञ जारी रहे।

डाक्टर सतीश दुबे जी की कलम ठहर जाने की जो दुरावस्था उन पर हावी थी वह ध्यान में रखते हुए भगवान से कह लूँ, “तुम धर्मात्मा होते हो इसके लिए तुम्हें वंदन तो कर लूँ। पर साथ ही तुम्हारे प्रति मेरी एक शिकायत भी, “कष्ट देने में बहुत नामधारी हुआ करते हो भगवन।”

***

© श्री रामदेव धुरंधर

दिनांक  – 27 – 07 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी विशेष – अविस्मरणीय संस्मरण / अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ☆ साभार – स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी के स्वजन-मित्रगण ☆

☆ स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी विशेष – अविस्मरणीय संस्मरण / अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ☆

☆ साभार – स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी के स्वजन-मित्रगण ☆

वरिष्ठ साहित्यकार, भगवतगीता, रघुवंश, मेघदूत के हिंदी काव्य अनुवादक, 40 से ज्यादा कृतियों के कवि, लेखक, आध्यात्मिक, राष्ट्र प्रेम की भावधारा के साहित्यिक रचनाकार पिताजी प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध का दुखद अवसान 99 वर्ष की आयु में आज 25 जुलाई को शाम 4 बजकर 50 मिनट पर हो गया है।

उन्होने शांति से अंतिम सांसे ली, और दिव्य स्थान को प्रस्थान कर गए हैं।

उन्होंने बच्चों के बच्चों के बच्चों के संग भी जीवन का भरपूर आनंद लिया। उनकी तीन पुत्रियां श्रीमती वंदना श्रीवास्तव, श्रीमती विभूति खरे, श्रीमती विभा निगम एवं एक पुत्र विवेक रंजन श्रीवास्तव हैं।

देशाटन और दुनियाँ में अनेक देशों का पर्यटन किया।

उन्हें भारतीय अनुवाद परिषद के शीर्ष सम्मान, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी से तथा कई संस्थाओं से सम्मानित किया गया। वे केंद्रीय विद्यालय क्रमांक 1जबलपुर के संस्थापक प्राचार्य थे। उन्होंने गीता को जिया।

– विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

♥♥♥♥♥

ई-अभिव्यक्ति के नियमित वरिष्ठ रचनाकार गुरुवर प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी के रूप में मैंने अपनी माध्यमिक शिक्षा के समय के अपने प्रथम प्राचार्य (केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक १ जबलपुर) को खो दिया।  

विगत  ९९ वर्ष के जीवन काल के उनके स्वजन – मित्रगण भाई श्री विवेक रंजन जी के परिवार के साथ इस दुखद घडी के सहभागी हैं।   

जैसे ही भाई श्री विवेक रंजन जी द्वारा उनके अवसान की सूचना फेसबुक सहित सोशल मीडिया पर डाली गई तो 300 से अधिक लोगों ने प्रतिक्रिया में संवेदनाये व्यक्त की। अनेक लोगों ने व्हाट्सअप पर सीधे प्रतिक्रिया की। सोशल मीडिया से प्राप्त कुछ प्रतिक्रियाएं हम आपसे साझा करने का प्रयास कर रहे हैं।

हेमन्त बावनकर, पुणे 

आपसे एक माह पूर्व आशीर्वाद प्राप्त किया था, प्रो0 साहब आपको विनम्र श्रद्धांजलि एवं सादर नमन।

– इंजी ब्रिजेंद्र शंखवार

वेमिशाल जीवनचर्या पूर्ण कर देवलोक गमन हेतु सादर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं आपके साहित्य में छिपे संदेशों से बहुत कुछ सीखने को मिला है। आपकी स्मृति सदा जीवंत रहेगी।

प्रभा विश्वकर्मा शील

अत्यंत दुःखद समाचार.

ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि दिवंगत आत्मा को मोक्ष प्रदान करें व श्री चरणों में स्थान दें तथा परिजनों को इस महान दुख को सहने की शक्ति प्रदान करें. ॐ शांति ॐ शांति 🙏

इंजी रवींद्र गर्ग

अत्यंत दुखद सूचना है।

दादा जी

एक ऐसे व्यक्तित्व रहे,  जिनका मन निर्मल और जीवन पारदर्शी रहा। सादर विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

राजेश पाठक प्रवीण

अत्यंत दुःखद समाचार है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। दुख की इस गहन घड़ी में परिजनों को संबल प्रदान करें। विनम्र श्रद्धांजलि. ओम शांति शांति शांति। 🙏

लक्ष्मी सिंग

यह दुखद समाचार जानकर मन व्यथित हो गया। मैंने भी बाबूजी को बहुत करीब से देखा है। बहुत अच्छे साहित्यकार थे। लेकिन ईश्वर के विधान के सामने हम कुछ नहीं कर सकते। प्रभु से प्रार्थना है कि आप लोगों को सब्र और हौसला दे और दिवंगत आत्मा को शांति

सलमा खान

बहुत दुखद समाचार 🙏 मेरी ओर से सादर नमन 🙏 हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें और परिवार को यह गहन दुःख की घड़ी में संबल प्रदान करें 🙏 ओम शांति शांति शांति 🙏

संजय वर्मा

ओह्ह! 😢 विनम्र श्रद्धांजलि 💐

नईदुनिया जबलपुर में रहते उनका साक्षात्कार करने का अवसर मिला था। वो स्मृतियां हमेशा जीवित रहेंगी। ईश्वर पुण्यात्मा को श्रीचरणों में स्थान दें। 🙏🌺

राम कृष्ण गौतम

ओह अत्यंत दुखद समाचार। अंकल को विनम्र श्रद्धांजलि। ॐ शांति 🙏

समीक्षा तैलंग

दुखद समाचार है, पर शरीर की अपनी यात्रा होती है, लेकिन उस यात्रा में जो महान कार्य किया है उन्होंने वो सदा याद किया जाता रहेगा,

एक साहित्यकार ही नहीं थे बल्कि एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व के भी धनी थे वो, एक वटवृक्ष की भांति उन्होंने दोनों को संरक्षण दिया था, ऐसे महान व्यक्तित्व को भाव भरी श्रद्धांजलि, भगवान उन्हें अपनी शरण में लेकर उच्च आसन प्रदान करें, तथा शोकाकुल परिवार को उनके विछोह के दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें,  विनम्र श्रद्धांजलि, ॐ शान्ति

अशोक श्रीवास्तव

जो अंत्येष्टि में शामिल होगा,

वही पुण्य कमाऐगा!*

सतत् साधना में रत कविवर

की गंगा में नहाऐगा!!

मेरी उपस्थिति स्वीकारिऐगा

विदग्ध जी ॐ शाँति ॐ

ध्रुव कुमार गुप्ता

एक शानदार मिलनसार व्यक्तित्व का अवसान बहुत दुखद है..विनम्र श्रद्धांजलि

युनुस अदीब

अत्यंत दुःखद। पूज्य बाबूजी को विनम्र श्रद्धांजलि। ओम शांति 😔

हम अत्यंत सौभाग्यशाली हैं कि उनके द्वारा रचित नर्मदाजी की स्तुति को रिकॉर्ड करने का अवसर मिला। उनका आशीर्वाद सदैव अनुभव करते हैं, करते रहेंगे। 🙏🏼

प्रशांत सेठ

भावपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि। बाबू जी का जीवन सादगी एवं विद्वत्ता की मिसाल था। शिक्षक पिता एवं कवि लेखक के रूप में उनकी यादें सदैव हृदय पटेल पर अंकित रहेगी। ईश्वर उनकी आत्मा को परम गति प्रदान करे। एक युग का अंत हुआ।

पीयूष खरे

अत्यंत दुःखद समाचार!

हम परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह श्रद्धेय सर की दिवंगत आत्मा को जन्म मृत्यु के बन्धन से मुक्ति दे और अपनी शरण में लें तथा परिवार के सभी सदस्यों को इस असीम दु:ख को सहन करने की सामर्थ्य प्रदान करे।

ॐशांति ॐशांति ॐशांति

निखिलेश निगम

बेहद दुखद संस्कारधानी जबलपुर भी उनकी साहित्यिक कर्म भूमि रही है ऐसे ऊर्जावान साहित्य मनीषी का देवलोकगमन सभी के लिए व्यथित करने वाला समाचार है प्रभु से कामना है कि विवेकरजंन जी और परिजनों को इस गहन दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। श्रीजानकीरमण परिवार की ओर से सादर श्रद्धा-सुमन। ऊं शान्ति शान्ति शान्ति

डॉ अभिजात कृष्ण त्रिपाठी

दुखद समाचार। आपके परिवार के विशिष्ट व्यक्तित्व का जाना आप सबके लिए बहुत कष्ट दायक है। ऐसे विद्वान का अवसान समाज के लिए भी बड़ी क्षति है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और पूरे परिवार को इस दुख को सहन करने की शक्ति दे।  ओम शांति शांति 🙏

शक्ति तिवारी

हम खुशकिस्मत हैं आदरणीय बाबूजी का सानिध्य मिला। सदैव ऊर्जा, सकारात्मक विचारों और रचनात्मकता से ओत-प्रोत रहे। भावपूर्ण श्रद्धांजलि, ईश्वर पूज्यनीय बाबूजी की दिवंगत दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोक-संतप्त् परिजनों को यह गहन दुःख सहन करने की शक्ति दे। 🙏🏼🌹 ॐ शांति 🌹🙏🏼

दीपक मालवीय

अत्यंत दुखद खबर! भोपाल में होता तो आपके निवास पर पैदल चला आता! उन्हें सादर श्रद्धांजलि! उन्होंने पूरी जिंदगी स्वस्थ और सक्रिय रहकर जी, सादर नमन!

हरी जोशी

अत्यंत शोक का विषय है, बाबूजी का सानिध्य मुझे भी मिला है. जब विवेक सर एम पी ई बी रामपुर मे बॉलीबाल ग्राउंड के सामने रहते थे, मैं सुबह टाइम कल्याण भवन के सामने से ऑफिस जाता था औऱ रास्ते मे उनके दर्शन हो जाते थे तो मैं स्कूटर रोककर उनके चरण छू लेता था. मैं घर भी जाता था. दुःखद समाचार है. ईश्वर उनकी आत्मा को अपने चरणों मे स्थान देवें. ॐ शांति… शांति… शांति…

मोहन श्रीवास

अत्यंत ही दुखद समाचार है।

ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी आत्मा को अपने श्री चरणों में उचित स्थान प्रदान करने की कृपा करें और विवेक श्रीवास्तव के पूरे परिवार को इस गहन आघात सहन करने की शक्ति दें।

विनम्र श्रद्धांजलि। ओम् शांति ओम् शांति ओम् शांति।

अनिल गर्ग

अत्यंत दुःखद।

ईश्वर उनकी पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान प्रदान करें और परिवार जनों को इस भीषण आघात सहन करने की शक्ति दें।

विनम्र श्रद्धांजलि। ॥ॐशांतिः॥

अनिल कुमार लखेरा

कष्टदायक जीवन से बहुत श्रेष्ठ है भवसागर पार कर शांतिपूर्ण देहावसान कर परमेश्वर की प्राप्ति। जब सी बी साहब लगभग चालीस वर्ष के रहे होंगे तब से उनसे परिचय हुआ था नितांत शांत व्यक्तित्व सदा रचनात्मक कार्य में लगे रहना। जबलपुर के प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय से जब वे शनिवार रविवार अपने आवास पर मंडला आते तो सौभाग्य वश हम सामने ही रहते तो उन्हें प्रति बागवानी में व्यस्त देखते। अपने बच्चों के साथ मेरी बेटियों से भी अत्यंत मधुर और शिक्षाप्रद व्यवहार रहता था। सच मुच एक एक पल भीष्म पितामह का जीवन जीकर सार्थक किया उन्होंने। परिवार भी उनका उनके ही सम था। उनकी माताजी उनकी पत्नी स्व.दयावती जी हमारी शाला की प्राचार्य पुत्रियां उनकी बहू कल्पनाजी सभी परिचित अपने मधुर व्यवहार से ह्रदय जीतने वाले। पुत्र श्री विवेक रंजनजी को तो समस्त साहित्य जगत बहुत अच्छे से जानता ही है मैं क्या कहूं। एक सुपुत्र जिसकी जगत आकांक्षा करपताहै वे हैं। आदरणीय भाई को हार्दिक भावांजली। पूरे परिवार को सहानुभूतिपूर्वक सहनशक्ति की कामना। ॐ 🙏शांति। 🙏

नीलम भटनागर

श्री विदग्ध जी का जन्म सन छब्बीस है निश्चय ही उन्नीस सौ। क्योंकि क्रूर काल ने दो हजार का छब्बीस तो आने नहीं दिया। तो उनकी माताजी बताती थीं कि उस साल मंडला जो कि उनका जन्मस्थान है में नर्मदा मैया में भयानक बाढ आई थी। आमजन जीवन अत्यंत त्रस्त था। रहने और भोजन का बहुत अभाव ऐसे में कुछ दयालु जन ने अपने निवास पर लोगों को आश्रय दिया। उनमें से विदग्ध जी के पिता और दादा ने भी यह उपकारी कार्य किया। बादमें उन सभी घरों को तत्कालीन कलेक्टर साहब ने महलात नाम दिया जो इनके घर पर पट्टिका के रूप में लगा था। एक महलात औरतो मैं जानती हूं वह वल्लभजी ओझा का घर था जो मंडला के बडे दानदाता और विधायक रहे। बाद में उनकी सुयोग्य बहू श्रीमती नारायणी देवी झा शायद तीन चार टर्म की विधायिका रहीं। वे भी अत्यंत लोकप्रिय थीं। मंडला आदिवासी बहुत पुरातन जिला क्षेत्र फल के हिसाब से बहुत विस्तृत जिला था। अमर कंटक से आती मांनर्मदा ने इसे तीन ओर से घेरा हुआ है। अतिप्रसिद्ध तीर्थ स्थल है।

जो आज कायस्थ जन को चित्रांश नाम से नया नाम कहते हैं वे समझ लें कि इनका नाम तब श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव रखा गया जिसे उनने सार्थक किया अगाध साहित्य के रचयिता और अनुवादक रहे सी बी साहब की एक सहज सरल भूषण पर लिखी कविता यहां उनको भावाजलि के रूप में प्रस्तुत कर रही हूं जो उनके राष्ट्र प्रेम को व्यक्त करती है। –

यही हमारी .भारत माता।

जिसका. प्यार हमें हर्षाता।।

बडे सुहाने सांझ सकारे।

सूरजचांद चमकते तारे।।

कषक श्रमिकसैनिक व्यापारी।

कलाकार रक्षक व्यापारी।।

सब धार्मिक निश्छलसद्ज्ञानी।

ज्यों निर्मल गंगा का पानी।

युग युगे है इनका नारा।

प्रेम आपसी भाई चारा। ।

नील गगन धरती कल्याणी।

सुफल उर्वरा अनुपम दानी।।

जनता अधिक गांव में बसती।

उत्सव प्रिय संस्कृति जिनकी।।

शहरों मेंपर रोज़गार है।

दिल्लीदिल है कण्ठ हार है।।

विश्व गगन का उज्वलतारा।

ऐसा अनुपम देह हमारा।।

यह कविता उनके स्वच्छ पावन हृदय का दर्पण है। शायद अपने विद्यार्थी जीवन में लिखी थी जो मंडला के जनजीवन में बहुत लोकप्रिय थी। उन के संगी साथी जो अब बहुत कम ही होंगे उनके विषय में बहुत कुछ लिखेंगे पर मेरी जानकारी एक और  महत्वपूर्ण घटना है वह है अंग्रेजों द्वारा स्वाधीनता सैनानियों पर बीच चौक पर गोली चालन है जिसमें प्रसिद्ध श्री उदयचंद जी की मृत्यु हुई उस समूह में जो छात्र गण थे उसमें भी श्री सी. बी. भाई साहब थे। मेरा तात्पर्य महज यह याद दिलाना है कि उदयचंदजी भी शायद तब न मारे जाते तो अभी भी अपने परिवार में होते। अभी इत्यलम। पुनः भाई साहब को हार्दिक श्रद्धांजली। ईश्वर उन्हें अपने चरणों में स्थान। दें। । 🙏🙏

मीना जौहरी

भावपूर्ण श्रद्धांजलि आज उनके लिए जो लिखा है उसे पढ़कर बहुत सी यादें ताजा हो गई वे एक बार स्काउट गाइड का और एक बार फनीचर का आडिट करने आये थे तो देखते हुए बोले अरे तुम्हारा क्या देखे ठीक होगा लाओ साइन कर देते हैं सब याद आ रहा है विवेक का फोन नंबर देना बहुत पहले था अब कब से सम्पर्क नहीं हुआ है

रंजना मिश्रा

प्रिय साथियों

आज आ. विवेक रंजन जी के पिताजी के असामयिक निधन पर मंच पर अवकाश रखा गया था।

इस दुखद घड़ी में हम सब विवेक रंजन जी के साथ हैं।

ईश्वर पिताजी की आत्मा को शांति प्रदान करें। 🙏 ऊँ शांति ॐ 🙏

मधूलिका श्रीवास्तव, गद्य प्रवाह मंच

दुखद समाचार है। श्री विदग्ध जी की एक पुस्तक ईश आराधना जो मंडला में उन्होंने मुझे सप्रेम भेंट की थी, आज भी मेरी बुक शेल्फ में सुरक्षित रखी हैं। ईश्वर ऐसी महान विभूति को अपने श्रीचरणों में स्थान दें। सभी परिजनों को इस अपार दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें। 🌹विनम्र श्रद्धांजलि 🌹

कमल चंद्रा

प्रणाम

आज आपका जन्मदिन है हमें पूर्ण विश्वास है कि पूजनीय पापा जी बैकुंठ धाम से आपको देखकर गर्वित महसूस कर रहे होंगे कि उन्हें इस कलयुग में भी आपके जैसा श्रवण कुमार प्राप्त हुआ। आप और सुषमा दीदी परिवार के उच्च संस्कारों के उत्तम उदाहरण है।

इस कठिन समय में आपको जन्मदिन की शुभकामनाएं।

ईश्वर आपको हिम्मत और शक्ति प्रदान करें। सादर

श्वेता और तरुण

विवेक भाई, आदरणीय अंकलजी के देहावसान का दुखद समाचार आज ही देखा। आपके परिवार की इस घड़ी में मुझे अपने साथ ही समझो। मैं जानता हूं कि पिताजी का आशीर्वाद आपके लिए एक आदर्श संबल रहा है। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने चरणों में स्थान दें एवं आप सभी परिजनों को यह आघात सहन करने की शक्ति प्रदान करें। ओम् शांति।

हर्ष वर्धन व्यास

विवेक जी !

आप सचमुच भाग्यशाली हैं। इतने वर्षों तक पिता की छत्र छाया जिसे नसीब हो उस पर साक्षात् प्रभु की अनुकम्पा ही बरसती है।

अपनों का बिछोह कष्टदायी होता है। मनुष्य बड़ा ही स्वार्थी जीव है। बिछुड़ना नहीं चाहता किन्तु यही शाश्वत सत्य है।

ईश्वर हमेशा आपके साथ रहे आप भी पिता श्री के सिखाए आदर्शों पर चल कर शिखर तक पहुँचें, यही ईश्वर से प्रार्थना है।

शतायु से कुछ समय पूर्व निधन शतायु होने का ही संकेत है। विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

दुर्गा सिन्हा

आप के पूरे परिवार पर ईश्वर की असीम अनुकंपा रही है, आप सभी भाई बहनों को ऐसे विद्वान विदूषी, कर्मठ और ईमानदार माता पिता प्राप्त हुए। पिता का निधन अपूरणीय क्षति है। शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उन्हें सदा याद किया जाएगा।

मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। प्रभु आप सभी को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।🙏🙇‍♂️

राजीव कर्महे

प्रिय भाई विवेक, आपके पिताजी के अवसान की जानकारी से बहुत दुःख हुआ। इश्वर् उन्हें अपने लोक में स्थान दे। परिवार में सब को यह दुःख सहन करने की शक्ति दे.

परमानंद सिंहा

श्री विवेक रंजन जी,

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव जी हमारे प्रथम प्रधान अध्यापक थे। उनके निधन से मैंने एक गुरू, पथ प्रर्दशक और एक अभिभावक को खो दिया। मैं उनके श्री चरणों में अपना प्रणाम अर्पित करता हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वे उनकी आत्मा को चिर शांति प्रदान करे। साथ ही आप सभी को इस दुःख के समय संबल प्रदान करें। ॐ शान्ति शान्ति शान्ति।

अनूप बोस

1969 पास आउट केंद्रीय विद्यालय क्रमांक एक जबलपुर

Dear Mr Vivek Ranjan Shrivastava ji…Very Sad to know about the demise of Respected Guru Ji Professor C B Shrivastava Ji.

Our deep heartfelt Condolences to you & all the family members with the prayers to almighty God to give eternal peace to the departed Soul. God may give enough strength to all the family members to bear this loss. 🕉 SHANTI 🕉

Avinash Goel & Family, Bangalore

अत्यंत दुःखद साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति।

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः

अशोक सिंहासने, बालाघाट

..Babbaji lived 99 years with dignity, curiosity, a sharp and beautiful mind. But the quality of his life, the peace he had in his final days and the love he left with all of that was because of you. Your devotion, your patience and the way you put his needs above your own every single day is something I will carry with me forever.

Both of you have dedicated your lives to honouring him. He was truly a fortunate man.

In the quiet, often unseen moments adjusting his body, preparing his food, anticipating even the smallest needs you gave him a kind of care that few people in this world ever receive. And even at the very end, he wasn’t alone. He left in peace, held by the love of the two people who never left his side.

We will carry the lessons he gave us within us and pass them on to the generations that follow. He was endlessly curious, always eager to learn more about the world. He had clarity of thought, emotional control, and a deep hunger for knowledge. These are truly rare traits that I aspire to take forward from him.

Thank you for giving him such a beautiful life. And thank you for showing me what it truly selfless service means. I can’t imagine another soul as lucky as him or other children as self-sacrificing and noble as you both.

I love you both so much.

Anubha, London

ब्रम्हलीन आदरणीय प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव का देवलोक गमन शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र की अपूरणीय क्षति है। गरिमामय और सम्माननीय जीवन यात्रा पूरी कर अत्यंत सक्रिय और क्रियाशील स्थिति में स्वर्गारोहण भाग्यशाली व्यक्तियों को ही मिलता है। आदरणीय श्रीवास्तव साहब ऐसे ही परम भाग्यशाली थे।

अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में प्रख्यात साहित्यकार अपने पुत्र श्री विवेक रंजन जी श्रीवास्तव को अपना उत्तराधिकार सौंप गए है। ऐसे महामना को ईश्वर मोक्ष प्रदान कर अपने चरणों में स्थान दे और श्रीवास्तव परिवार को इस दारुण दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।

डॉ प्रो जे सी श्रीवास्तव

२५ जुलाई २०२५

प्रिय विवेक रंजन,
स्नेह

आप भाग्यशाली बेटे हैं कि आपको आपके पिताश्री पूजनीय चित्र भूषण जी अपनी उम्र के ९९ वर्ष तक रोज आशीर्वाद देते रहे. उनके मार्गदर्शन के umbrella में आपने उत्कृष्ट उपलब्धियां प्राप्त की. उनके निधन से अब एक बड़ा vaccume create हो गया है. मुझे लगता है – आप आज से बड़े हो गए हैं. पिता के रहते हम बड़े होते नहीं हैं. उनके दुलार प्रेम अनुशासन में बच्चे ही बने रहते हैं.

आदरणीय भाई साहब श्री चित्र भूषण जी से मेरा परिचय आधी सदी का है, मैंने उन्हें विभिन्न पदों पर निष्ठा, ईमानदारी, कर्मठता, एवं पारदर्शी कार्य प्रणाली से कार्य करते देखा है, मैं DPI Office में रहा. वे भोपाल आने पर पहले मुझसे मिलने मेरे घर आते रहे हैं. मुझे उनका स्नेह मिलता रहा. हम साहित्यिक विषयों पर भी चर्चा करते थे. विलक्षण प्रतिभा से उन्होंने हिंदी साहित्य जगत में प्राय सभी विधाओं पर लेखन कर प्रतिष्ठा प्राप्त की. मैं उनकी स्मृति को प्रणाम करता हूँ.

महेश सक्सेना

ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से स्मृति शेष स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी को विनम्र श्रद्धांजलि 

☆ ☆ ☆ ☆

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर / सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’   ≈

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