हिंदी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ अनन्त की गोद में: देवभूमि की एक यात्रा ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌿 यात्रा संस्मरण –  अनन्त की गोद में: देवभूमि की एक यात्रा 🌿

कुछ यात्राएँ हमें स्थानों तक ले जाती हैं… और कुछ ऐसी होती हैं जो हमें भीतर की ओर ले चलती हैं। उत्तराखण्ड की पावन धरती—देवभूमि—की मेरी यह यात्रा निस्सन्देह मुझे अध्यात्म की गहराई में लेकर गई।

लगभग डेढ़ महीने तक, जीवन ने पहाड़ों, हिमनदों और नदियों की लय पकड़ ली। घुमावदार पहाड़ी रास्ते कभी-कभी धैर्य की परीक्षा लेते, पर हर मोड़ पर प्रकृति अपना नया रूप दिखाती—बर्फ से ढकी चोटियाँ मौन वैभव में खड़ी, और साथ बहती पवित्र नदी जैसे सदा साथ निभाने वाली सहचरी।

मन बार-बार पूछता रहा—इस भूमि में इतने मंदिर, कथाएँ और आस्थाएँ कैसे समायी हैं? शायद इसका उत्तर ग्रन्थों में नहीं, इस भूमि की हवा में है—जहाँ हर श्वास स्वयं एक प्रार्थना बन जाती है।

🌊 ऋषिकेश: जहाँ मौन बोलता है

हिमालय की तराई में बसा ऋषिकेश, पावन गंगा के तट पर, हमें अपने शांत आलिंगन में ले लेता है।

मेरी पत्नी राधिका, परमार्थ निकेतन आश्रम में, एक गहन योग-प्रशिक्षण में प्रतिभागी थीं—उनका दिन भोर से आरम्भ होकर देर रात्रि में समाप्त होता। और मुझे मिला एक दुर्लभ वरदान—कुछ न करने का मधुर सुख।

सुबह मैं गंगा के किनारे बैठता, जल की लहरों को प्रथम किरणों में झिलमिलाते देखता। वहाँ, उस निःशब्दता में, विचार धीरे-धीरे शांत हो जाते और समय जैसे थम सा जाता। ध्यान स्वयं ही घटित होने लगा।

रविवार की एक सहज पदयात्रा हमें भूतनाथ मंदिर तक ले गई, जहाँ से गंगा और ऋषिकेश का दृश्य किसी स्वप्न सा प्रतीत हुआ—मानो नदी धरती और आकाश को एक सूत्र में पिरो रही हो।

🕉️ हिमालय का आह्वान

योग-प्रशिक्षण पूर्ण होते ही, मन हमें और भीतर—हिमालय की गोद में बसे उन पवित्र स्थलों की ओर खींच ले गया, जिन्हें देखने की चाह वर्षों से थी। पंच प्रयाग, जहाँ नदियाँ मिलकर एक हो जाती हैं, हमें बुला रहे थे।

🔱 गुप्तकाशी और उखीमठ: प्रार्थनाएँ सबके लिए

गुप्तकाशी में प्राचीन विश्वनाथ मंदिर, काशी की स्मृति जगाता है, और अर्धनारीश्वर मंदिर शिव और शक्ति के दिव्य संतुलन का प्रतीक है।

यहाँ हमने प्रार्थनाएँ कीं—अपने लिए, अपने परिवार और मित्रों के लिए, और उन पूर्वजों के लिए जो अब हमारे बीच नहीं हैं। ऐसा लगा मानो समय की सीमाएँ मिट गई हों और अतीत व वर्तमान एक ही क्षण में समा गए हों।

उखीमठ में ओंकारेश्वर मंदिर की संध्या आरती अत्यन्त भावपूर्ण थी। दीपों की ज्योति जब संध्या आकाश से मिलती, तो ऐसा लगता मानो दिव्यता साक्षात् उपस्थित हो।

💍 त्रियुगीनारायण: जहाँ प्रेम शाश्वत हुआ

त्रियुगीनारायण, वह पावन स्थल जहाँ मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था।

वहाँ आज भी होते विवाहों को देखना अद्भुत था—मानो समय ठहर गया हो और हर युगल उस दिव्य मिलन का आशीर्वाद पा रहा हो।

🏔️ चोपता से जोशीमठ: शिखरों और सरलता के बीच

आगे बढ़ते हुए चोपता के हरे-भरे मैदान, दूर चमकते हिमनदों के साथ, किसी स्वप्न से कम नहीं लगे।

जोशीमठ में नृसिंह मंदिर का वातावरण अत्यन्त शांत था। परन्तु सबसे मनमोहक दृश्य था—मंदिर प्रांगण में छोटे बच्चों का उत्साहपूर्वक क्रिकेट खेलना। कोई रोकटोक नहीं। बच्चों को निर्भीक होकर खेलने का अवसर मिलना ही चाहिए।

उस क्षण, पवित्रता और सहजता का सुंदर संगम देखने को मिला।

🌳 ज्योतिर्मठ: समय से संवाद

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिर्मठ, मानो समय की सीमाओं से परे है।

वहाँ स्थित प्राचीन कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान करना एक अद्भुत अनुभव था। समीप की गुफा ने हमें भीतर की यात्रा पर आमंत्रित किया।

कुछ स्थान ऐसे होते हैं जहाँ मौन रिक्त नहीं होता—वह पूर्ण होता है। यह उन्हीं में से एक था।

🌊 पवित्र संगम: जहाँ नदियाँ एक हो जाती हैं

हर प्रयाग एक पावन कथा सा प्रतीत हुआ—

विष्णुप्रयाग में धौली गंगा और अलकनंदा का आलिंगन,

नन्दप्रयाग में नन्द बाबा और कृष्ण की स्मृतियाँ,

कर्णप्रयाग में महाभारत के कर्ण की तपस्या की छाया,

रुद्रप्रयाग में जल को स्पर्श कर आरती करने का अप्रत्याशित सौभाग्य।

हमारे कक्ष से नीचे दिखता संगम, एक जीवंत चित्र सा प्रतीत होता था।

धारी देवी मंदिर में भोर का पहला दर्शन और आरती—अत्यन्त दिव्य और आत्मीय अनुभव।

🌺 देवप्रयाग: अलकनंदा और भागीरथी का संगम

देवप्रयाग में, जहाँ भागीरथी और अलकनंदा मिलकर गंगा का स्वरूप लेती हैं—वहाँ पहुँचकर मन स्वतः ही मौन हो गया।

दो नदियों का यह मिलन, जीवन का एक गहरा रूपक प्रतीत हुआ—दो यात्राएँ, जो मिलकर एक ऐसी धारा बनती हैं जो असंख्य जीवनों का आधार बनती है।

नेत्र अनायास ही नम हो उठे—यह भाव केवल अनुभव किया जा सकता है।

🌺 सुरकण्डा देवी और लाखामण्डल: आस्था की अनुगूँज

सुरकण्डा देवी मंदिर की चढ़ाई और मार्ग में दिखते हिमालय के दृश्य मन को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। राधिका की यह वर्षों पुरानी इच्छा थी, और वहाँ पहुँचकर जो दिव्य अनुभूति हुई, वह शब्दों से परे है।

लाखामण्डल मंदिर में संध्या आरती के समय गाँव के बच्चों की उल्लासपूर्ण सहभागिता ने मन मोह लिया। पास ही बहती यमुना के किनारे उनका क्रीड़ांगन और खेल के प्रति जोश, एक सजीव उत्सव सा प्रतीत हुआ।

🌄 यात्रा जो अभी शेष है

लौटते समय हमारे पास कोई भौतिक स्मृति नहीं थी—केवल एक गहन तृप्ति थी। यह अनुभव कि जीवन स्वयं एक तीर्थयात्रा है।

अब भी एक पुकार शेष है—भागीरथी के साथ चलने की, पंच केदार और पंच बद्री की यात्रा करने की।

ईश्वर हमें सामर्थ्य दे कि हम इन आकांक्षाओं को पूर्ण कर सकें।

तब तक, हिमालय हमारे भीतर ही बसा रहेगा।✨

#देवभूमि #उत्तराखण्ड #आध्यात्मिकयात्रा #हिमालय #गंगा #प्रकृतिप्रेम #आत्मअनुभूति #योगऔरध्यान #भारत_की_आत्मा

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – सतपुड़ा वन भ्रमण – भाग – ३१ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – सतपुड़ा वन भ्रमण – भाग- ३१ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

6.सतपुड़ा वन भ्रमण

पाँच जनवरी को सुबह उठे तो मादीखो गेस्ट हाउस से ही तवा मालिनी केसला संगम एक बड़े तालाब सा दिख रहा था। उसका आनंद ले रहे थे तभी चौकीदार ने बताया कि एक आदमी इसी जगह रहेगा और दो आदमी नाव से उस तरफ़ जाकर वहाँ की गणना में शामिल होंगे। एक साथी श्रीकृष्ण मादीखो ट्रेल पर सुबह छः बजे निकल गए। बाक़ी दो लोगों को एक नाव में बैठकर संगम पार जाना पड़ा। वे जब तक मोटर बोट से दूसरी तरफ़ पहुँचते तब तक वहाँ के चौकीदार और वन सेवक गणना पर निकल चुके थे। जंगल में अकेले जाने की मनाही है। वहाँ एक बहुत अच्छा साकोट रेस्ट हाउस है। साकोट नामक गाँव विस्थापित होकर पहचान खो चुका है। उसके कोई भी चिन्ह नहीं दिखते। विद्वान कहते हैं नाम में क्या रखा है, यहाँ तो सिर्फ़ नाम ही बचा है, अस्तित्व लोप हो गया। जो भी कुछ है नाम में ही बचा है। इसलिए अच्छे कर्म करो, हो सकता है तुम्हारे लोप होने के बाद कुछ दिन नाम रह जाये। हमने उसी साकोट रेस्ट हाउस में डेरा जमाया। संगम आर-पार जाने हेतु एक मोटर बोट उपलब्ध है। मदन यादव उसके परिचालक हैं। उन्होंने बिना दूध की लेमन चाय पिलाई। उनसे आज का भोजन बनाने की बात करके साथ लाया सामान की एक बोरी उनके सुपुर्द कर दी।

गेस्ट हाउस बहुत ही मनमोहक लुभावनी पहाड़ी पर बना है। सामने खुला मैदान है। मैदान समाप्त होते ही तवा नदी का भराव लहरें मार कर तटों को छेड़ता रहता है। चारों तरफ़ से खुला है। सामने की तरफ़ ऊँची बालकनी जैसी जगह है जहाँ से एक सौ अस्सी डिग्री गर्दन घुमाकर नज़रों से झिलमिल जलराशि पर खेलती सूर्य किरणों को देख कर मन प्रसन्न हो जाता है।  

पहाड़ अभी कुछ-कुछ उदास से दिख रहे हैं। जीव जंतुओं की स्थिति भी उनके जैसी ही लग रही है। रात भर ठंड में ठिठुरे जीव-जंतु सूरज निकलने का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि धूप में तपकर बदन में रात की ठंड से निपटने के लिए गर्मी संजो कर रख सकें। पहाड़, पेड़-पौधे, जीव-जंतु और पक्षी-पखेरू बारिश के मौसम में खिले रहते हैं। उनका उत्साह वसंत से आरम्भ होता है जो कि शरद ऋतु तक शबाब पर रहता है। सूर्य की किरणें अब समुंदर से भरे तवा जलभराव पर पसरने लगी हैं। हिंसक पशु भी रात के शिकार के बाद गहराइयाँ तलाश रहे हैं। तभी शाकाहारी जीव-जंतु खुली हवा और धूप का आनंद उठाने निकल आए हैं। लंगूरों का एक दल बेचैनी से उछलकूद कर रहा है। उसे कुछ अजीब सी गंध या चीज़ नज़र आ रही है। उनकी हरकत पर पक्षी भी सचेत होकर आवाज़ें निकाल रहे हैं।

वन सेवक ने एक शेर के पैरों के निशान देखे हैं जो अभी-अभी वहाँ से गुजरा है। एप खोलकर उनके फ़ोटो लिए और दर्ज कर लिए। सभी जानकारियों को एप में दर्ज करना है। गणना ऑनलाइन हो रही है। पहले एप में राज्य चुने, फिर अभयारण्य, फिर क्षेत्र के साथ बीट का चयन करें। उसके बाद वन सेवक और वालेंटियर्स के फ़ोटो उतार कर दर्ज करें। उसके बाद गणना के सबूत दर्ज करते जाएँ। 

जीव पैदाइशी रूप से मांसाहारी या शाकाहारी हैं। हाँ कुछ आदमियों की तरह दोनों तरह के होते हैं। जंगल में सबके लिए सब कुछ है। भूख के अलावा किसी अन्य चीज़ के लिए लड़ाई नहीं होती। इसलिए थाने-पुलिस, अदालत-वकालत, जिरह-निर्णय वग़ैरह कुछ नहीं होता। जब भूख लगी तब जंगल से निकाल कर खा लिया। समेटने या सहेजने की ज़रूरत नहीं होती है। सब कुछ साझा है। स्वामित्व का बोध ही नहीं है। इसलिए संग्रह नहीं तो बैंक नहीं, विनियोग नहीं, प्रॉपर्टी नहीं और उनके लिए गुणा-भाग नहीं। जंगली जीवों का दिमाग़ भूख, सृजन और सुरक्षा तक ही चलता है इसलिए अध्यात्म और ईश्वर भी उनके लिए उपयोगी विचार नहीं होता। वे साथियों को मरते देख कर अन्दाज़ लगाते हैं कि उन्हें भी मरना होगा। वे मोक्ष के बारे में भी नहीं सोचते। पाप-पुण्य निर्वाण-मोक्ष उनके दिमाग़ में ही नहीं आते। उनमें धर्म नहीं है तो धार्मिक भेद भी नहीं है, इसलिए जानवरों के सोचने में नहीं आता कि किसकी कितनी जनसंख्या बढ़ या घट रही है। वे एक दूसरे को धर्म  बदलने को मजबूर भी नहीं करते। शेर कभी हिरण से नहीं कहता कि वह शेर बन जाये। सब अपने चोले में मस्त रहते हैं। शेर कभी नहीं कहता कि बंदर उसे आरक्षण की दारू के बदले वोट दे। हिरणों के लिए चारा भी राशन से नहीं मिलता। जंगल धूप छाँव पानी सभी पर साम्यवादी साझा हक़ है। कहते हैं आदमी भी पहले ऐसे ही पशु थे। उन्होंने सामाजिक पशु के रूप में विकास करके बहुत सी झंझटें मोल ले लीं हैं।

साकोट रेस्ट हाउस तीन तरफ़ तवा बाँध से थमे डूब क्षेत्र से घिरा है। नहा धो कर ध्यान में बैठे तो ऊँचाई पर निर्मित रेस्ट हाउस से ऐसा लगा जैसे बीच समुद्र में धुनी रमाए बैठे हैं। ग्यारह बजे के क़रीब दो टिक्क याने मोटी रोटी, कनकी और तुअर दाल का भोजन करके आराम किया। पता चला कि साकोट से चूरना गेस्ट हाउस की दूरी मात्र 14 किलोमीटर है जबकि भौंरा से अस्सी किलोमीटर दूरी पर चूरना स्थित है। लेकिन वन विभाग की अनुमति के बग़ैर कोई भी इस रास्ते से तवा डूब क्षेत्र को पार करके चूरना नहीं जा सकता। उस हिसाब से यदि बाघ गणना प्रोजेक्ट में शामिल न होते तो कभी भी इस अविस्मरणीय  अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य के दर्शन नहीं कर सकते थे। शाम को रेस्ट हाउस की छत पर सुहावने मौसम का मज़ा लेने गए तो लहरों से पता चला कि हवा का रुख़ उत्तर से दक्षिण की तरफ़ है। जबकि गर्मियों और बारिश में हवा दक्षिण से बादलों को लेकर उत्तर की तरफ़ चलती है।

छः जनवरी सुबह पाँच बजे नियमत: जाग गये। आज जंगल के उस इलाक़े में जाना था जहाँ शेरों की सर्वाधिक आबादी है। एक अनुमान के अनुसार चालीस शेर इस जंगल में होंगे। सेवक चौकीदार मदन यादव ने बताया कि एक महीना पहले एक शेर रेंजर साहिब की जिप्सी पर लपका और उनका पीछा किया था। सब घबरा गए थे। हमको थोड़ी घबराहट हुई और जिम कार्बेट की “जंगल की कहानी” (Jungle Lore) पुस्तक की सावधानियाँ याद आने लगीं।

  • पहली-बात तो घबराना नहीं है। उसके लिए साँस पर ध्यान केंद्रित करके गिनती गिनना शुरू कर दो।
  • दूसरा- एक तो शेर आपके सामने नहीं आता। उसकी स्मृति में भी शिकारी नुमा आदमियों का डर रहता है।
  • तीसरा-यदि शेर दिख जाए तो आप पेड़ की आड़ में हो जायें। उसे निकल जाने दें।
  • चौथा-यदि शेर से अचानक सामना हो जाए तो एक बाजु हटकर उसे निकल जाने दें।
  • पाँचवाँ- भागें नहीं, हल्ला न मचाएँ, लेट जायें।

आज सबसे ख़तरनाक इलाक़े में शेरों की गिनती का कार्यक्रम था। इसलिए तीन वन कर्मी ईश्वर दास यादव वल्द रामनाथ यादव, साकिन नया खखरापुरा इटारसी स्थायी कर्मी (9399004517), संग्राम सिंह ठाकुर (कोरकु) वल्द मुंशी लाल साकिन टेकापार मढ़ई, सुरक्षा श्रमिक (6265940126) और कमल सिंह ककोड़िया (गोंड) वल्द बालचंद साकिन नया साकोट सेमरी हरचंद, मोटरबोट चालक (9165085944) सुबह छः बजे मुस्तैद मिले। हम भी बख्तर बंद होकर मुहिम पर उनके साथ निकल पड़े।

कमल सिंह ने हमें एक अपने क़द से ऊँची लाठी पकड़ा दी। उन्होंने बताया कि कोई भी जंगली जानवर अपनी ऊँचाई से ऊँची चीज़ से डरता है। इसीलिए लाठी ऊँची हो तो वह पास नहीं आता। दूसरा लाठी थोड़ी बन्दूक़ सी दिखती है। जानवर बन्दूक़ से डरता है। उसके दिमाग़ में पीढ़ी दर पीढ़ी बन्दूक़ की छवि है। जानवरों में भी सुरक्षात्मक श्रुति-स्मृति शास्त्र संग्रहित हैं।

ईश्वर यादव हमारे साथ चल रहे थे। अचानक एक शेर के पंजे का निशान मिला। उन्होंने बारिकियाँ बताईं कि यह बूढ़े शेर के पंजे का निशान है। इसे कैमरे में क़ैद कर लो। संग्राम सिंह के पास एप मोबाईल था। उन्होंने फ़ोटो खींच कर संरक्षित कर लिया। हमने पूछा अब अगला निशान भी उसी शेर का हो सकता है। आप कैसे पहचानोगे कि वह अलग शेर है। उन्होंने पहले नर और मादा के पंजों के निशान में भेद बताया। नर शेर के पंजे की उँगलियाँ गद्दी से जुड़ी रहती हैं जबकि मादा शेरनी की उँगलियाँ औरतों की लम्बी बातों की तरह लम्बी होती हैं। उम्र के अनुसार जानवर का पंजा छोटा-बड़ा या पसरता जाता है। बूढ़े शेर का पंजा फैल जाता है। बच्चे का पंजा छोटा और उँगलियाँ सटी होती हैं। आगे चीता और भालू के पंजों के निशान मिले। तीन किलोमीटर चलने के बाद दाहिनी तरफ़ मुड़े तो सामने तवा नदी दिखी। अब उसी के किनारे-किनारे वापस गेस्ट हाउस पहुँचना था। बहुत ही ऊबड़-खाबड़ पथरीली ज़मीन पर ट्रैकिंग करना पड़ा।

हमारे साथ जो तीन लोग चल रहे थे। वे सभी सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व को स्थापित करने में विस्थापित परिवारों से हैं।  विस्थापन दो तरह का वरदान लेकर आया है। एक तो कोर क्षेत्र से गाँवों का विस्थापन इटारसी और होशंगाबाद शहरों के आसपास हुआ है इसलिए उनके बच्चों को शिक्षा और स्वास्थ्य की उत्तम सुविधाएँ मिली हैं। उनको टाइगर रिज़र्व में रोज़गार मिले हैं। दूसरी ओर सतपुड़ा में जंगली जानवरों की संख्याओं में बढ़ोतरी होने से वन स्वयं शासित हुए। अब वहाँ शिकार और लकड़ी चोरी की वारदातें नहीं के बराबर होती हैं। लेकिन रेत और मत्स्य आखेट की मिलीभगत या अन्यथा चोरी में कोई कमी न होकर बढ़ोतरी ही हुई है।

जंगल में प्रत्येक जीव-जंतु आपको आदिम जीवन के मूलभूत सिद्धांत “भूख-भोजन, थकान-आराम, निद्रा और सृजन धर्म” का पालन करते दिखेगा। जंगल के वातावरण को भूख नियोजित करती है। एक ही नियम दृष्टिगोचर होता है कि ताकतवर कमजोर को खा जाता है। वहाँ इस सिद्धांत के अलावा न कोई नियम है, न विधान,  न साहित्य, न संस्कृति, न रसिक के मन को मथते रस-छंद-अलंकार, न मिलते पुरस्कार और न अन्य किसी प्रकार की चिंता, न कोई तनाव। आप सतपुड़ा के मनमोहक जंगल में एक खूबसूरत सफारी शुरू कर रहे हैं। वन्यजीव उत्साही लोगों के साथ एक दुर्लभ यात्रा आपके पास रहस्यों से भरे एक सम्पूर्ण वन्य जीव पार्क में दिन बिताने का शानदार अवसर है।

यह इलाक़ा पहले बाघों के लिए नहीं जाना जाता था, हालांकि अब जंगल के इस विस्तृत विस्तार में एक पूरा बाघ निवास है। टाईगर रिजर्व के अन्य हिस्सों में आप सामान्य रूप से जो देखते हैं, यह उससे बिल्कुल अलग प्रकार का जंगल है। यहां जो कुछ भी रेंगता, उड़ता, घूमता या लुढ़कता है वह सब यहीं फलता-फूलता है और यही ख़त्म होकर भी कभी ख़त्म नहीं होता। यही प्रथम कृति याने प्रकृति है। यह स्थान जीवन से भरपूर है। पूरे जंगल में सैकड़ों जलधाराएँ बहती हैं। जो जंगल के पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों को पोषित करती हैं। यह जंगल हमेशा अलौकिक सौंदर्य का ख़ज़ाना है, वन्य पशुओं के विचरण के मनोहारी दृश्य, झरनों का कल-कल निनाद, पक्षियों का कलरव और बहुत सारी कभी न भूलने वाली स्मृतियों के अलावा यहाँ से आप कुछ निकाल कर ले जा नहीं सकते। ये संरक्षित जंगल हैं। शेर से लेकर ख़रगोश तक सब सुरक्षित हैं, बस भूख भर न लगी हो या उनके जीवन पर संकट न हो, नहीं तो आप सुरक्षित नहीं हैं। जंगली कुत्ते बहुत ख़तरनाक हैं, वे झुंड में रहते हैं और जंगल का राजा शेर भी उनकी एकता से ख़ौफ़ खाता है। इनकी नज़रों का बहाशियाना अन्दाज़ आपकी रीढ़ की हड्डी में झुरझुरी पैदा कर सकता है। फन फैलाए कोबरा और डंक पर डेरा उठाए बिच्छू कभी भी कहीं से रेंगते दिख सकते हैं।

यह अनुभव अपने आप में विस्मयकारी है। हरे-भरे जंगल में घास के मैदानों का विशाल विस्तार बाघों के देश में इस यात्रा को एक रोमांचक अनुभव बनाता है। सतपुड़ा के घने जंगल में शानदार बाघ, चालाक तेंदुआ, सुस्त भालू, भारी भरकम गौर और विशालकाय गिलहरी इस रमणीय दुनिया में सभी खुलेआम घूमते हैं। यह जंगल हमेशा शानदार जीवों की बपौती नहीं है। सतपुड़ा सैकड़ों तितलियों का भी घर है और एक सुंदर रेतीले पानी की धारा पर तितली को देखा जा सकता है। वही जल धारा पक्षियों और विशाल गिलहरियों की एक अद्भुत आबादी को जीवन देती है, इसलिए पेड़ की छतरियों को भी देखते चलें। लंगूर आपको कौतूहल से निहार रहे हैं कि ये हमारे बिगड़े स्वरुप कहाँ से आ गये। 

जंगल का आनंद लेने के लिए आपको जंगली होने की कोई ज़रूरत नहीं है, उल्टा आपको रहमदिल होना चाहिए। घने जंगल में वन विभाग के स्थायी और अस्थायी कर्मचारी बिना परिवार के मोटी टिक्क रोटियों और पतली दाल के साथ एक उदास ज़िंदगी बिताते हैं। स्थायी वन पाल कर्मचारियों की तनख़्वाह तो फिर भी 25,000-30,000 रुपयों के बीच होती है परंतु कच्चे कर्मचारियों को कमीशन कटपिटकर महीने के 8,000 के आसपास मिलते हैं। हाँ पक्के होने के इंतज़ार में बेगारी और बेचारी उनके जीवन से जुड़ी नज़र आती हैं।

पहले तो वे बिचारे कुछ और भी कामधाम करके अलग से कमाई का जुगाड़ कर लेते थे परंतु आजकल जीपीएस से ट्रैकिंग के कारण उन्हें तैनाती स्थल पर ही रहना होता है। आज से 160 साल पहले इन जंगलों पर देवगढ़ (छिन्दवाड़ा) गोंड रियासत में एक कोरकु मालगुज़ार भभूत सिंह का एकक्षत्र राज्य था। वह राजा नहीं था परंतु किवदंतियाँ में वह आज भी राजा माना जाता है। किसी की अहमियत इस बात से नहीं आंकी जाती कि वह किस पद पर है। बल्कि इस बात से आंकी जाती है कि लोगों के दिल में उसका क्या जज़्बा है। जैसे अकबर इतिहास का महान बादशाह माना जाता है जबकि भारतियों के दिलों में जो सम्मान राणा प्रताप को प्राप्त  है, आज अकबर उसका पासंग भी नहीं ठहरता। जन भावना पद को नहीं सिरजती, स्वाभिमानी को दिल में सजाती-बसाती है। हम तीन दिवसीय वन भ्रमण उपरांत थके शरीर परंतु प्रफुल्लित मन से भोपाल लौट आए।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – सतपुड़ा वन भ्रमण – भाग – ३० ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – सतपुड़ा वन भ्रमण – भाग- ३० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

6.सतपुड़ा वन भ्रमण

तवा नर्मदा की सबसे लंबी सहायक नदी है, जिसकी लंबाई 117 किमी है। यह उद्गम से उत्तर और पश्चिम में बहते हुए होशंगाबाद जिले के बांद्रा भान गांव में नर्मदा में मिल जाती है। सारणी के पहाड़ों, जहां से तवा नदी निकली है, से बांद्राभान की दूरी अंदाज़न 100 किलोमीटर है लेकिन तवा नदी का बहाव 117 किलोमीटर कैसे हो सकता है? क्यों नहीं हो सकता? नदी रसिक आदमियों की तर्ज़ पर सीधी नहीं बल्कि टेढ़ी-मेढ़ी चाल से चलती है। आख़िर नदी भी झरनों से रस समेटते और जीवों को रसारस करते उद्गम से गंतव्य तक की यात्रा तय करती है। इस कारण उसकी वास्तविक लम्बाई सतही लम्बाई से अधिक होती है, जैसे मूर्ख व्यक्ति की ज्ञान पूर्ण बातें घुमावदार शब्दों से खिंचकर बहुत लम्बी होती जाती है।

श्री गोपाल ने दार्शनिक अन्दाज़ में बोलना प्रारम्भ किया- देनवा अपने पिता के घर सतपुड़ा से अपने आँचल में अमृत कलश भर-भर कर लाती है। अनादि काल से उसके उद्गम से लेकर तवा में समाहित होने तक उसके दामन में और आसपास जल-जंगल-ज़मीन पर जीवन-मृत्यु के अद्भुत खेल चलते आए हैं। मृत्यु के आश्चर्यजनक खेल को जितने नज़दीक से उसने देखा है और कोई नहीं देख पाता। मृत्यु-जीव का खेल शिकार-शिकारी सा होता है। मौत रूपी शिकारी के पंजे में जब जीव रूपी शिकार आता है याने शेर जब शिकार को दबोचकर उसकी इहलीला समाप्त करने लगता है तब जीव को जीवन का मोह और तेज़ी से जकड़ता है। मौत की तरह शेर एक सबसे कुशल और मज़बूत शिकारी और हिरण की तरह जीव सबसे आसान शिकार है। हिरण की नज़र एक बार शिकारी से मिली तो वह सम्मोहन में थगा सा रह जाता है। जीवन का मोह त्याग देता है। शेर मृत्यु की तरह दबे पाँव आ कर मोह रहित हिरण के गला को जबड़े से दबा उसकी गर्दन को झटके से तोड़ कर उसकी इहलीला क्षण मात्र में समाप्त कर देता है। देह के भीतर और बाहर समस्त ब्रह्मांड में शिकार का एकांकी अनवरत घटित हो रहा है।

शेर जब किसी सघन मोहग्रस्त बड़े जानवर जैसे भैंसा या हाथी का शिकार करने की कोशिश करता है तो संघर्ष लम्बा खिंचता है। नाटक में कई पटाक्षेप होते हैं। शिकार ताक़तवर होने के कारण जीवन का मोह आसानी से नहीं त्यागता है। शेर उसके पिछली टाँग की रान पजों के नाखूनों से खरोंच कर नस को काटने की कोशिश करता है ताकि शिकार का ख़ून बहने से वह कमज़ोर हो जाए, फिर काटी गई जगह को दाँतों से काट बड़े घाव में बदलता है। जीवन-मृत्यु का संघर्ष लम्बा खिंचता जाता है। जानवर दुलत्ती मारकर मृत्यु को भगाने की कोशिश भी करता रहता है। शेर बाजु में आकर शिकार के कंधे पर चढ़कर गर्दन पकड़ने की कोशिश करता है तो भैंसा उसे धनवान रोगी की तरह धन रूपी सींगों से उछालकर दूर फेंकना चाहता है। अस्पताल का बिल बढ़ता जाता है। शिकार जीवन से मोह में समर्पण नहीं करता तो तकलीफ़देह संघर्ष की अवधि और लहू-लूहान स्थिति लम्बी खिंचती जाती है। न यम हार मानता है और न जीव मोह त्यागता है। अंत में हारना जीव को ही है, उसे अंततः देह त्यागना ही होता है। बच नहीं सकता। इस संघर्ष को अस्पताल जितना लम्बा खींच सकें, खींचते चले जाते हैं। उस हिसाब से बिल भी लम्बा खिंचता जाता है।

हमने कहा- हाँ, देह त्याग में सबसे बड़ी बाधा मोह है। अनवरत जीवन का मोह, इंद्रियसुख का मोह, संतान का मोह, धन का मोह। ये सब मिलकर जीवन के मोह को सघन बनाते हैं। आदमी मृत्यु से भागता है। मृत्यु उतनी ही तेज़ी से उसे जकड़ती है। अधिकांश लोगों को अंत समय में अक्सर धन का मोह सर्वाधिक होने लगता है। धन मृत्यु को कुछ समय के लिए टाल सकता सा प्रतीत होने के कारण एक सुरक्षा बोध देता है। दुनिया में सबसे तकलीफ़देय मौत यमदूत शेर की होती है। कभी बूढ़े शेर को चिड़ियाघर में देखिए। वह कितना निरीह, बेबस और उदास जीवन से हारा नज़र आता है। जब वह खुले जंगल में शिकार करने योग्य नहीं रह जाता तो कई दिन तक तड़फ-तड़फ कर भूखा मरता है। पानी भी नहीं पी पाता है। उसकी माँस पेशियाँ लटक जातीं हैं। वह अपना बोझ भी नहीं उठा पाता। निशक्त एक जगह पड़ा रहता है। बड़ी दर्दनाक मौत मरता है। ऐसा लगता है कि प्रकृति उससे सारी निर्ममता और निर्दयता का हिसाब बराबर कर रही है।

श्री कृष्ण ने भी दार्शनिक हवन में हव्य अर्पित किया- देनवा के दामन में मौत का  खेल शिकार भी एक कारोबार रहा है। शेर जंगल का सबसे सुंदर और ताक़तवर जानवर होता है। उसकी दहाड़ सामने वाले के होश को हिलाकर रख देती है। वह जब तक भूखा न हो शिकार नहीं करता। आदमी पर वह दो दशाओं में हमला करता है। बूढ़ा या घायल हो जाने से शिकार करने लायक हालत में न रहने पर या उसे लगे कि कोई उस पर हमला करने वाला है। शेर यदि आदमखोर हो जाए तो वह फिर आदम माँस की जुगाड़ में रहता है। उसे मानव माँस का नमकीन स्वाद भाता है। इसलिए आदमखोर जानवर को मारना ही पड़ता है। लोग शिकार अपने शौक़ या लालच के कारण भी करते थे। पहले सतपुड़ा से नर्मदा तक शेरों की अच्छी ख़ासी आबादी थी। दसवीं और ग्यारहवीं सदी में राजस्थान और गंगा के मैदान से क़ाफ़िले के क़ाफ़िले आकर जंगलों को साफ़ करके खेती करने लगे। जानवरों को मजबूरी वश पहाड़ी तलहटी में खिसकना पड़ा। जंगल का नियम है कि हर ताक़तवर कमज़ोर को हज़म कर जाता है, यह जंगल में पूरी सच्चाई से लागू होता है परंतु  आदमियों के निष्ठुर समाज में सच्चाई-बेइमानी का कुछ पता ही नहीं चलता है। कौन कब सच्चा है और कब  झूठा। जानवर यदि शिकार कर रहा है तो पूरी जानकारी और चेतावनी के साथ। आदमी शिकार करता है परंतु न तो चेतावनी देता न सँभलने का मौक़ा और न ही कभी अहसास होने देता कि वह शिकार करने वाला है।

देनवा किनारे कई शिकारी आकर तंबू में कई रात बिताते थे। उनमें कई बहादुर होते थे और कई बहादुरी ओढ़ते थे। यह सिलसिला हुशंगशाह के एक उप-कोतवाल मुहम्मद शाह के समय से शुरू होता है। वह अफ़ग़ान शिकार का शौक़ीन था। अपनी बेगमों के साथ जंगल में डेरा डालता था। उसके सैनिक उसकी सुरक्षा और खाने-पीने का सारा इंतज़ाम करके आते थे। उसने जंगल में रहने वाले गौंड़ लोगों को शिकार में साथ देने के हिसाब से तीर चलाने, हाँका लगाने और जाल बिछाकर ख़ूँख़ार जंगली जानवरों को फंदा डालकर फाँसने की कला में प्रशिक्षित कर रखा था। वह नंगी तलवार और तीर कमान लेकर ऊँचे मचान पर बैठ जाता। चारों तरफ़ से घने ऊँचे पेड़ों से घिरे छोटे मैदान में नौ-दस गज़ गड्ढा करके जाल बिछा दिया जाता। उसके बाद बीस-पच्चीस लोग हथियार बंद होकर शेर को हाँका लगाकर उस मचान के नीचे गड्ढे की ओर हाँकते या गड्ढे के बीच में एक खम्भे पर पटिया रखकर एक बकरा शेर को ललचाने वास्ते बाँध दिया जाता था। शेर के जाल में गिरते ही चारों तरफ़ के पेड़ों पर बैठे तीरंदाज़ उसके शरीर को तीरों से भेद देते थे। जिसमें मुहम्मद शाह के तीर भी होते थे। मुहम्मद शाह के दरबारी शेर के मर्मस्थल पर लगे तीर को शाह का तीर बताकर ईनाम पाते। शाह का सीना गर्व से फूल जाता। वह नज़रों ही नज़रों में बेगम से शाबाशी पाकर पेड़ से नीचे उतर कर मृत शेर का मुआयना करके मर्मस्थल पर लगे तीर को बेगम को दिखाते हुए शिकार की कुछ बारीकियाँ बताता जो बेगम को बिलकुल भी समझ ना आतीं परंतु वह खाविंद की बलैयाँ लेने से न चूकती।

शिकारी शेर की दहाड़ को छोड़कर उसके शरीर के हर हिस्से का उपयोग करते थे। उसकी खाल को तुरंत ही उतारना ज़रूरी होता था। आठ-दस घंटे की देरी होने से खाल उतारने में कठिनाई होती और खाल ख़राब हो जाती थी। खाल उस ज़माने में 700-800 कलदारों में बिकती थी जबकि कोतवाल का वेतन मात्र 125 कलदार होता था। उसके नाख़ून, बाल, दाँत और आँख भी अच्छी क़ीमत में बिकते थे। सूबे और दिल्ली के दरबारी इन चीज़ों को ख़रीदते थे। इन चीज़ों को उपयोग धीमा ज़हर बनाने में होता था या कमोत्ताजक दवाइयों में काम आती थीं। माँस को मसाला लगाकर और सुखाकर लिवर किडनी की बीमारी ठीक करने में और हड्डियों का चूरा बनाकर कमर घुटनो और हड्डियों की कमज़ोरी दुरुस्त करने में उपयोग किया जाता था। उसकी हड्डियों को शराब में कई दिन तक डुबो कर शराब को ज़्यादा उत्तेजक और पाचक बनाया जाता था। शायद तभी से दो पैग गले के नीचे उतरने के साथ ही शराबी शेर सा दहाड़ने लगता है।

मुग़लों के साथ बारूद आ गई थी तो भरमार शिकार के काम में लाई जाने लगीं थीं। अंग्रेज़ों के आने के बाद सतपुड़ा शिकारगाह का स्वर्ग हो गया था। शेर की खाल, बाल, दाँत, आँख और नाख़ून की यूरोप के बाज़ारों में अच्छी क़ीमत मिलती थी। लोग समझते हैं शिकार बहादुरी दिखाने के लिए किया जाता था। शिकार की जड़ में लालच थी। इन जंगलों में अनगिनत शेर थे। जिनका बेरहमी से शिकार करके धन कमाया गया था। अब शेरों को बचाने के लिए पैसा बहाया जाता है। मेरे चारों तरफ़ बियाबांन जंगल में अनगिनत शेर थे। शेरों और अन्य जानवरों के शिकार का यह आलम था कि सोहागपुर में पुराने “बी” केबिन के सामने एक हड्डा साईडिंग रेल लाइन अंग्रेज़ रेल्वे ऑफ़िसर द्वारा बनाया गया था। जहाँ मालगाड़ी के डिब्बों में लादने हेतु जंगली और पालतू पशुओं की हड्डियों के ढेर लगाए जाते थे। सागौंन की लकड़ी जानवरों की हड्डियाँ और शेर के विभिन्न अंग सोहागपुर से बॉम्बे होकर पानी के जहाज़ से इंग्लैंड भेजे जाने लगे थे। अंग्रेज़ लॉटसाहब स्मिथ ने पारसी ठेकेदार पेस्टोंन ने साथ मिलकर इस धंधे से ख़ूब कमाई की थी। बहुत बाद में मौलवी साहिब और वॉन साहिब भी अपने दोस्तों के साथ शिकार खेलने जाते थे।

हमने बताया- जब कैप्टन जैम्स फॉरसोथ 1861 में पचमढ़ी की मुहिम पर था तब उसने मिट्टी की खुदाई करने हिंदुस्तानी लोगों को काम पर लगाया। जिन्हें कुली कहा जाता था। वे मिट्टी खोदकर सड़क बनाते थे। तब कुलियों की एक बस्ती पिपरिया-पचमढ़ी के बीच एक छोटे से पठार पर बस गई, वही बस्ती मटकुली (मिट्टी खोदने वाले कुली) नाम से अब तक आबाद है।

कैप्टन जैम्स फॉरसोथ पिपरिया से पचमढ़ी तक सड़क बनाता चल रहा था। पिपरिया से मटकुली तक सड़क बनने के बाद आगे काम जारी रहा। मटकुली से पचमढ़ी के बीच एक जगह पर कुलियों को पगार देने के लिए बुलाया जाता था, वह जगह पगारा नाम से आबाद हो गई। आगे आम के पेड़ों से आबाद एक जगह थी। जहां लोग थकान से राहत पाने सुस्ताते थे। वहाँ एक गाँव बस गया। वह बारीआम हुआ। इस तरह पचमढ़ी की खोज में मटकुली, पगारा और बारीआम आबाद हुए थे।

जनश्रुति के अनुसार भभूत सिंह पचमढ़ी के पास पगारा के निवासी थे, सही जान नहीं पड़ता। वे क्षेत्र में अंग्रेजों के दखल के खिलाफ थे। उन्होंने पगारा तक मार करके जीत लिया होगा इसलिए पगारा उनके नाम के साथ जुड़कर किंवदंती में चल पड़ा। वे हर्राकोट के निवासी हो सकते हैं। उन्होंने 1857 की पहली क्रांति के दौरान तात्या टोपे को छुपने में मदद की। अंग्रेजों ने भभूतसिंह को अपने झांसे में लेने की बहुत कोशिश की। कोरकू जाति के मवासी आदिवासी भभूतसिंह का कहना मानते थे। इस कारण अंग्रेज यहां के प्राकृतिक सौंदर्य पर कब्जा नहीं जमा पा रहे थे। अंग्रेज पचमढ़ी को हथियाना चाहते थे। उनको रास्ते से हटाने का षडयंत्र रचा गया। उस समय भभूत सिंह के साथ हुल्ली भोई का भी एकछत्र राज्य था। अंग्रेजों ने फतहपुर के नबाव आदिल मोहम्मद खान को लालच देकर पगारा भेजा। जब वह कोशिश में नाकाम रहा तो दोनों को घेर कर मरवा देने का निर्णय किया गया।  

पिपरिया के समाजवादी चिंतक गोपाल राठी ने फ़ोन पर बताया कि “फतहपुर बनखेड़ी के पास एक गौंड रियासत थी जो तीन भागों में विभाजित थीl नदी पूरा, बीच पूरा और फतेहपुर। इन तीनो के जागीरदार अलग-अलग थेl भभूत सिंह मालगुज़ार थे। पचमढ़ी के लिए बनखेड़ी से फतहपुर होते हुए मटकुली और मटकुली से पचमढ़ी जाने का मार्ग बनाने की तैयारी थी, लेकिन फतहपुर के गौंड राजा ने यह मंज़ूर नहीं किया इसलिए यह मार्ग पिपरिया से मटकुली और मटकुली से पचमढ़ी तक बना। भभूत सिंह को अंग्रेजों ने धोखे से उस समय पकड़ा था जब वे फतहपुर में सो रहे थे।

बाघों की गिनती करने साथ आए श्री गोपाल गांगुड़ा बता रहे हैं – भैया, नागद्वारी यात्रा के दौरान अंडमान-निकोबार और केरल-कन्यकुमारी से आए काले बादल गोंड़-कोरकु की तरह महादेव पहाड़ पर चढ़ने के लिए आपस में खूब लड़ते-झगड़ते हैं, गरजते और चमकते हैं, गुत्थम-गुत्था होते हैं, कोई नहीं जीतता तो दोनों छोटे बच्चों जैसे झारझार रोने लगते हैं। तब ये सब पर्वत उनके आँसुओं से तरबतर होकर असंख्य झरनों को बहाने लगते हैं। लोगों के नौतपा से तपे चेहरे खिल जाते हैं। उनकी आँखों में ख़ुशी से आँसू झरझर बहने लगते हैं। बादलों के आँसुओं से बहकर कविता लोगों के आँसुओं के झूले में आनंद की पीगें भरकर हिलोरें ले सावनी गीत गाने  लगती है।

कुछ बादल महादेव पर्वत पर बरसते हैं तो कुछ धूपगढ़ और ऊँचा चौंड़ा पर्वत पर धूनी रमा कर बैठ जाते हैं। ऐसा लगता है कि धरती पर इंद्रसभा की तैयारी हो रही है। ग़रज़, कलकल, चहचहाहट, पत्तों पर बूँदों की सरगम इंद्रसभा के नृत्य की तैयारी में झूमने लगते हैं। वक्ष पर कंचुकी कसी उत्तरीय ओढ़े मेनका का ठुमक पदचाप करते प्रवेश का इंतज़ार है। इंद्र देव मदिरा का एक घूँट लेकर इशारा करेंगे और ता—थई—ता-ता- थई- के साथ जल देव और भी रिसाकर बरसेंगे, पवन देव जल देव को किनारे कर नृत्य भंगिमा को उड़ा ले जाने का प्रयत्न करेंगे। लेकिन अभी इंद्र देव की अनुमति नहीं है।

सतपुड़ा के ऊँचे पहाड़, गहरी घाटियाँ और घने जंगल ऐसे रहस्यों को समेटे हुए हैं जिन्हें कोई भी इसके घने इलाके में जाकर ही इसे खोज सकता है। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद, बैतूल और छिंदवाड़ा जिलों में स्थित सतपुड़ा टाइगर रिजर्व, पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व का एक हिस्सा है, जो हर साल पर्यटकों की एक बड़ी भीड़ को आकर्षित करता है। रिजर्व को हाल ही में प्रतिष्ठित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के लिए संभावित सूची में शामिल किया गया था।

हमने उन्हें बताया कि पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व मध्य भारत में मध्य प्रदेश राज्य के सतपुड़ा रेंज में एक गैर-दख़लंदाज़ी  संरक्षण क्षेत्र और बायोस्फीयर रिजर्व है। इसे 1999 में भारत सरकार द्वारा संरक्षण क्षेत्र बनाया गया था। इसमें हिमालय की चोटियों और निचले पश्चिमी घाटों के जानवर भी लाए गए हैं। यूनेस्को ने 2009 में इसे बायोस्फीयर रिजर्व नामित किया था। पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व भारत में मध्य प्रदेश राज्य के होशंगाबाद, बैतूल और छिंदवाड़ा जिलों के क्षेत्रों में स्थित है। बायोस्फीयर रिजर्व का कुल क्षेत्रफल 4,926.28 वर्ग किलोमीटर (1,217,310 एकड़) है। इसमें तीन वन्यजीव संरक्षण इकाइयां शामिल हैं:-

बोरी अभयारण्य (518.00 किमी)

पचमढ़ी अभयारण्य (461.37 किमी)।

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान (524.37 किमी)

सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित रिजर्व की स्थलाकृति अद्वितीय है, इसकी पश्चिमी सीमा तवा नदी के बैकवाटर द्वारा और उत्तर में देनवा नदी के बैकवाटर द्वारा बनती है। इन विशाल जलाशयों में घूमते समय आपको समुद्र में खो जाने का एहसास होता है। सतपुड़ा पर्वत श्रंखला की ऊँची चोटियाँ दूर से ही दिखाई देती हैं। ये पहाड़ लाखों साल पुराने हैं और टाइगर रिजर्व का हिस्सा हैं। मध्य प्रदेश की सबसे ऊंची चोटी (1351 मी) धूपगढ़ इस रिजर्व के अंदर स्थित है। मानसून के मौसम में कई गहरी घाटियां शानदार झरने बनाती हैं। रिजर्व के अंदर कई जगहों पर प्राचीन शैल चित्रों को देखा जा सकता है, जो उस समय के आदिम कृतियों को दर्शाते हैं।

यह पेड़ों की लगभग 92 प्रजातियों, स्तनधारियों की 52 प्रजातियों, पक्षियों की 300 प्रजातियों, तितलियों की 130 प्रजातियों और सरीसृपों की 30 से अधिक प्रजातियों का घर है। जिनमें चित्तीदार हिरणों के बड़े झुंड भी शामिल हैं।

यह रिजर्व बड़े पैमाने पर प्रमुखत: साल और सागौन के मिश्रित जंगलों से भरा है। इन मिश्रित वनों में जामुन, बहेड़ा, पलाश, महुआ, साजा, बीजा, तेंदू, अर्जुन, सेमल, सलाई, कुसुम, आचार, आंवला, धामन, लेंदिया, हर्रा और कई अन्य पेड़ प्रजातियां शामिल हैं। मध्य भारत में पाए जाने वाले पेड़ों की सूची प्रदीप कृष्ण की उत्कृष्ट पुस्तक “जंगल ट्री ऑफ सेंट्रल इंडिया” में पाई जा सकती है। रिजर्व के पहाड़ी इलाकों में पाई जाने वाली प्रमुख प्रजाति बांस है। घास के मैदानों में भी इलाके का अपना हिस्सा होता है। समय के साथ खाली किए गए गांव समृद्ध घास के मैदानों में बदल गए हैं और विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों के ख़ज़ाने हैं। नर्मदा नदी मध्य प्रदेश की जीवन रेखा है। नर्मदा को जल देने वाले ये वन इसके पारिस्थितिकी तंत्र की तुलना में कहीं अधिक मूल्य रखते हैं। ये मानसूनी वर्षा के लीवर हैं।

आज, मध्य प्रदेश को भारत के बाघ राज्य के रूप में जाना जाता है, जहां देश में सबसे अधिक बाघ रहते हैं। 2018 की गणना के अनुसार मध्य प्रदेश में 526 बाघ दर्ज किए गए। यहां सतपुड़ा में इन शानदार बिल्लियों की उपस्थिति देखने से महसूस की जा सकती है। रिजर्व के माध्यम से यात्रा करते समय बड़ी बिल्ली की उपस्थिति के बहुत सारे सबूत देखे जा सकते हैं, लेकिन इसे देखने के लिए थोड़ी किस्मत की जरूरत होती है क्योंकि वे अभी तक आने वाले वाहनों और पर्यटकों के साथ समायोजित नहीं हुए हैं। हालांकि पगमार्क और अन्य जानवरों के स्कैट और अलार्म कॉल सफारी के दौरान पूरी तरह से व्यस्त रख सकते हैं।

चित्तीदार हिरण, सांभर, भौंकने वाले हिरण, चौसिंघा, भारतीय गौर, ब्लू बुल, जंगल बिल्ली, जंगली सूअर, भारतीय सियार, बंगाल फॉक्स, धारीदार लकड़बग्घा और रीसस मकाक इस रिजर्व में पाए जाने वाले अन्य स्तनधारी हैं।

बारिश के बाद अक्टूबर में एक बार रिजर्व खुलने के बाद, भारतीय गौर के बड़े झुंडों के दर्शन के साथ पहाड़ियाँ देदीप्यमान हो जाती हैं। गौर के झुंड भोजन की तलाश में पहाड़ियों की ओर चले जाते हैं क्योंकि तराई पानी में डूब जाती है और बांस के बड़े इलाकों में यह प्रजाति बहुतायत में पाई जाती है। जैसे-जैसे गर्मी का मौसम आता है, वे पीछे हटने वाले बैकवाटर्स द्वारा बनाई गई हरी चरागाहों में लौट आते हैं। स्लॉथ बियर को देखने के लिए पहाड़ियाँ भी एकदम सही हैं।

रिजर्व में जंगली कुत्तों याने ढोल की भी अच्छी संख्या है। लेकिन जंगली कुत्तों की एक स्वस्थ आबादी का मतलब उन इलाकों में शाकाहारी आबादी को काफी नुकसान होना है। ढोल क्रूर शिकारी होते हैं, और एक बार जब वे एक लक्ष्य पर ध्यान लगा लेते हैं, तो वे लगभग हमेशा अपना शिकार पाते हैं। हाल के वर्षों में, चूरना द्वार के पास मुख्य क्षेत्र में चित्तीदार हिरणों की संख्या हजारों से घटकर कुछ सौ रह गई है। जंगली कुत्तों का एक झुंड एक चित्तीदार हिरण का शिकार करता है और कुछ ही मिनटों में उसकी हड्डियों को साफ कर देता है।

मध्य प्रदेश के राज्य पशु बारासिंघा या हार्ड-ग्राउंड दलदल हिरण के वितरण और आबादी को बढ़ाने के लिए, 2015 में कान्हा टाइगर रिजर्व से एक झुंड को यहां स्थानांतरित किया गया था। तब से सतपुड़ा में बारासिंघा की आबादी फली-फूली है।

भारतीय विशालकाय गिलहरी रिजर्व के कई हिस्सों में देखी जाती है। यदि भाग्यशाली रहे, तो दुर्लभ भारतीय विशालकाय उड़न गिलहरी को भी देखा जा सकता है। यूरेशियन ओटर, जिसे भारत में पाए जाने वाले सबसे दुर्लभ स्तनधारियों में से एक माना जाता है, को भी सतपुड़ा में देखा गया है। यहां पाई जाने वाली सरीसृप प्रजातियों में मगरमच्छ, मॉनिटर छिपकली और सांप जैसे इंडियन रॉक पायथन शामिल हैं। स्थानिक सतपुड़ा तेंदुआ गेको भी यहाँ देखा जाता है। सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के नाम पर, गेको केवल मध्य भारतीय राज्यों मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में पाया जाता है। उभयचरों की कई प्रजातियाँ भी यहाँ देखी जाती हैं।

श्री कृष्ण बोले- सतपुड़ा टाइगर रिजर्व बर्डवॉचर्स के लिए एक खजाना है। एवियन विविधता अधिक है, जिसमें 300 से अधिक पक्षी प्रजातियां दर्ज हैं। लुप्तप्राय ब्लैक-बेलिड टर्न यहां प्रजनन के लिए जाना जाता है। भारतीय स्किमर, एक और लुप्तप्राय प्रजाति, यहाँ देखी जाती है, हालाँकि कम संख्या में। गंभीर रूप से लुप्तप्राय भारतीय लंबे-चोंच वाले गिद्ध उच्च सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं की चट्टानों में सुरक्षित शरण पाते हैं। वे पार्क के अंदर अच्छी संख्या में नजर आ रहे हैं। ग्रे और रेड जंगलफॉवल दोनों को देखा गया है। सतपुड़ा ग्रे-हेडेड फिश-ईगल जैसे शिकार के खतरे वाले पक्षियों का भी घर है।

कई जगहों पर सुंदर रैकेट-टेल्ड ड्रोंगो मिश्रित शिकार दलों के भीतर घूमते हुए दिखाई देते हैं। मालाबार पाइड हॉर्नबिल प्रचुर मात्रा में मिश्रित जंगलों के भीतर बड़े पेड़ों की छतरियों में ऊपर की ओर देखा जाता है। यदि आप भाग्यशाली हैं तो आप फलों के पेड़ों पर उनके बड़े झुंड देख सकते हैं। भारतीय चित्तीदार लता यहाँ पाई जाती है। सर्दियों के मौसम में, पीले पैरों वाले हरे-कबूतरों के बड़े झुंड को सुबह के समय नंगे पेड़ों पर चहकते देखा जा सकता है। ब्लैक-कैप्ड किंगफिशर, ब्लैक-क्रेस्टेड बुलबुल और ब्लू-बर्डेड बी-ईटर अन्य स्टार आकर्षण हैं जो हर बर्डवॉचर्स की सूची में उच्च स्थान पर हैं। बड़ी संख्या में प्रवासी बार-हेडेड गीज़, जो दुनिया की सबसे ऊंची उड़ान भरने वाली पक्षी प्रजाति है, को इसके बैकवाटर में देखा जा सकता है। उनके साथ प्रवासी बत्तखों की अन्य प्रजातियां जैसे यूरेशियन विजोन, नॉर्दर्न पिंटेल और नॉर्दर्न शॉवेलर भी हैं।

टाइगर रिजर्व के आसपास के स्थानीय लोग गोंड, भारिया और कोरकू जनजाति के हैं। रिजर्व के प्रबंधन ने इन स्वदेशी समुदायों की आजीविका के लिए ध्यान रखा है। उनमें से कई वन गाइड और गार्ड के रूप में कार्यरत हैं, और रिजर्व के पास अन्य प्रतिष्ठान इन गांवों के युवाओं को रोजगार प्रदान करते हैं।

हमने कहा- रिजर्व के पांच द्वार हैं: मडई, सहेरा/जमानीदेव, धसाई/चूरना, परसापानी और नीमधान। कोर और बफर दोनों क्षेत्र वनस्पतियों और जीवों में समृद्ध हैं। इन क्षेत्रों को विवेकपूर्ण ढंग से प्रबंधित किया गया है और पर्यटकों को उत्कृष्ट स्तनपायी दृश्य प्रदान करते हैं। परसापानी, बिनाका और जमनीदेव जैसे बफर जोन वन्यजीवों को देखने के लिए एकदम सही हैं, क्योंकि मुख्य क्षेत्रों में ज्यादातर समय भीड़भाड़ रहती है। रिजर्व के बफर जोन में नाइट सफारी के रोमांच का भी आनंद लिया जा सकता है। दुनिया की सबसे छोटी जंगली बिल्ली निशाचर और शर्मीली रस्टी-स्पॉटेड कैट पर्यटकों के बीच पसंदीदा है। रात की सफारी के दौरान उल्लू, नाईटजार, सिवेट और अन्य निशाचर वन्यजीव भी देखे जाते हैं। जीप सफारी के अलावा, जंगल में सैर और नाव की सवारी जैसी गतिविधियों की अनुमति है। हमें पता चला कि चूरना की माँदीखो चौकी आवंटित हुई थी। जहां पहुँचने का रास्ता सुखतवा से जाता है। हम भौंरा में बैठे चर्चा कर रहे थे।

तभी चूरना रेंज के अनुविभागीय अधिकारी ने बताया कि हमें मांदीखो चौकी आवंटित की गई है। भौंरा रेंज के रेंज आफ़िसर ने बताया कि बाघों की गणना हेतु हम तीन में से दो की तैनाती चूरना रेंज की मादीखो चौकी पर की गई है और एक को बहुत दूर कोड़ार चौकी पर जाना होगा। यह सुनते ही हम तीनों के दिमाग़ ख़राब हो गए। हम लोग सोच रहे थे कि तीनों की तैनाती नज़दीकी चौकियों पर होगी तो शाम को हमप्याला हमनिवाला की महफ़िल छः दिनों तक जमती रहेगी।

हमने भौंरा के रेंज अधिकारी से कहा कि हम चूरना रेंज अधिकारी से बात करना चाहते हैं ताकि तीनों नज़दीकी चौंकियों पर तैनात रहें। उन्होंने बताया कि  चूरना रेंज अधिकारी श्री विनोद वर्मा आपको केसला के बोरी रेंज अधिकारी के कार्यालय में मिलेंगे। हमने वर्मा जी से बात की तो उन्होंने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि आप लोगों में से एक गोपाल गांगुड़ा को कोड़ार चौकी पर जाना होगा जो कि मादीखो चौकी से लगभग सौ किलोमीटर दूरी पर थी। रोज़ शाम को मिलना सम्भव नहीं था। हम लोगों ने निर्णय किया कि हम केसला पहुँच कर वर्मा जी से मिलकर अपनी तैनातियाँ नज़दीक चौकियों पर करवा लेंगे।

हमने वर्मा जी से फ़ोन पर सम्पर्क साध कर अपनी गुहार उनके सामने रखी। वे टस से मस नहीं हो रहे थे। बोले कि आप दो लोग केसला पहुँच जाएँ, आपको मादीखो पहुँचा दिया जाएगा। एक आदमी कोड़ार निकल जाए जो कि भौंरा से चालीस किलोमीटर घने जंगल में था। वे इसी बात पर अड़ गए। आख़िर में हमने कहा कि साहब हम आपसे मिलकर चौकियों पर जाना चाहते हैं इसलिए अपनी कार से केसला पहुँच रहे हैं। उन्होंने कहा कि वो तीन बजे तक केसला पहुँचेंगे, आप बोरी रेंज के केसला स्थित कार्यालय पहुँचें। हम तीनों तीन बजे केसला में चाय पीकर केसला के सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व पहुँच गए। उनको फ़ोन से सम्पर्क साधने की कोशिश की तो पहले कवरेज से बाहर मिला परंतु लगातार प्रयास से उनसे बात हुई तो उन्होंने बड़े रूखे अन्दाज़ में कहा कि वे देरी से पहुँचेंगे। बोरी रेंज स्टाफ़ से बातचीत होती रही। वर्तमान में जंगल विभाग तीन तरह की कमान में बँटा है- सामान्य, उत्पादन और आरक्षित-वन देखभाल। फ़ील्ड में इनकी कमांड अनुविभागीय अधिकारी के हाथ में होती है। उनके नीचे रेंज आफ़िसर और रेंज आफ़िसर के नीचे पूरा अमला होता है। सबसे नीचे वन रक्षक फिर वन पाल इत्यादि पद होते हैं।

शाम के छः बजने लगे परंतु वर्मा जी का कोई पता नहीं चल रहा था। आख़िर सवा छः बजे उनका अवतरण हुआ। नमस्कार जुआर के बाद हमने अपनी बात रखी कि तीनों को या तो मादीखो और आसपास कर दें या फिर कोड़ार के आसपास रख दें। उन्होंने कहा कि उन्हें वहाँ भेजा जा रहा है जहां का स्टाफ़ शेरों की गणना का विवरण एप में दर्ज नहीं कर पाएगा, इसलिए आपको उनकी सहायता करना होगी। हम लोगों ने कहा कि हमको भी एप चलाना नहीं आता है। तब उन्होंने कहा कि यदि उनका बस चलता तो वे हम जैसों का चयन ही नहीं करते। हम चुप रहकर अपनी एक जगह रहने की माँग पर डटें रहे। आख़िर में उन्होंने तंग होकर कहा कि आप तीनों यहाँ से मादीखो चले जाएँ। इस राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 69 पर इटारसी तरफ़ जाने पर दो किलोमीटर पर दाहिनी तरफ़ एक रास्ता कटेगा। उस पर छः किलोमीटर के बाद मोरपानी गाँव की तरफ़ एक रास्ता दाहिनी ओर कटेगा उसे छोड़कर आप हल्का सा बाईं तरफ़ को जाने वाला रास्ता पकड़ना जो आपको एक स्थान पर पहुँचाएगा। वहाँ सामने कच्चा जंगली रास्ता मिलेगा वहीं हमारे दो आदमी आपको खड़े मिलेंगे। वो आपको तवा नदी किनारे स्थित मादीखो रेस्ट हाउस पहुँचा देंगे।

हम चलते गए, मोरपानी गाँव से हमारी दाहिनी तरफ़ सुखतवा नदी चलने लगी और बाईं तरफ़ घने जंगलों से भरी पहाड़ियाँ, बीच में ऊबड़-खाबड़ पथरीला रास्ता। नियत स्थान पहुँचने पर दो लड़के मोटर साइकिल सहित मिले। बहुत ही ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर डोलते-डालते सात बजे शाम नियत स्थान पर पहुँचे। वहाँ वन रक्षक प्रजापति मिले। साथ में आठ-दस लोग आग तापते बैठे थे। पूछने पर पता चला कि चोरी से मछली पकड़ने के लिए आए थे। जाल सहित पकड़ाए हैं। साहिब के आने तक यहीं रहेंगे। साहिब कब आएँगे किसी को पता नहीं था। हम गेस्ट हाउस में कपड़े उतार कर सुस्ता रहे थे। तभी वे मछुआरे हमें साहिब समझ हमारे पास आकर सफ़ाई देने लगे। हमने उन्हें वास्तविकता बताई तो वे मायूस होकर फिर आग तापने लगे। सुबह पता चला कि उनके जाल वग़ैरह जप्त करके उन्हें जाने दिया। वन अधिकारियों पर उन्हें छोड़ने हेतु राजनीतिक दबाव बनना शुरू हो चुका था। उनके जाने के बाद हम लोगों ने कमर सीधी की और सिग्नेचर चरणामृत सेवन से दिमाग़ और देह में भरी दिन भर की थकान उतारी। हम पाँच-छः दिन के हिसाब से खाना पीना बनाने का सामान तीन बोरियों में साथ लेकर चले थे। एक बोरी वन सेवक प्रजापति के हवाले कर दी। प्रजापति ने आलू की सब्ज़ी और मोटे टिक्क रोटी लाकर दिए जिन्हें गप्प लड़ाते हुए खाकर दस बजे सो गए।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – नैनीताल – भाग-२९ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – नैनीताल – भाग- २९ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

6.सतपुड़ा वन भ्रमण- जल जंगल ज़मीन का स्वर्ग

जब हमने घर वालों को जनवरी के ठंडे महीने में वन विभाग द्वारा बाघों की गिनती करने वाली मुहिम से जुड़ने की बात बताई तो घर में हंगामा बरपा हो गया। सब बोले सत्तर साल की उम्र में घने जंगलों में बाघों के बीच जाने की क्या ज़रूरत है। सामने बाघ आ गया तो क्या करोगे?

हमने कहा- हमें क्या करना है, जो करना है वह बाघ ही करेगा।

घर वाले बोले- आपको कुछ हो गया तो? 

हमने कहा, पहले तो कुछ होगा नहीं और यदि हो भी गया तो ठीक है। आज से कुछ सालों बाद तुम लोग हमारे मुँह में एक-एक बूँद गंगाजल  डाल कर मौत को एक-एक इंच हमारे नज़दीक आता देखोगे। उससे तो यह ठीक ही है कि एक बाघ से लड़ते हुए उसकी भूख मिटाएँ। हालाँकि ऐसा कुछ होने वाला नहीं है।

आज वर्ष 2022 के जनवरी महीने की चार तारीख़ है। हम मित्र श्रीकृष्ण श्रीवास्तव के साथ सतपुड़ा बाघ अभयारण्य के कोर-ज़ोन चूरना के वन्य भ्रमण पर जाने को सुबह सात बजे रानी कमलापति रेल स्टेशन से कामायनी एक्सप्रेस में सवार होकर इटारसी के लिए रवाना हुए। रेल में आड़िट विभाग के एक तिवारी जी मिले, जिनसे सरकारी आड़िट और वन भ्रमण के दो बिल्कुल अलग विषयों पर बात करते-करते पता ही नहीं चला कि कब होशंगाबाद आ गया। उन्होंने आड़िट विभाग की अंदरूनी बातें बताईं और हमने जंगल की जंगली रिवायत से उन्हें परिचित कराया। वे उतर कर चले गये। हमने घर से लाई लौंकी की सब्ज़ी और रोटियों का नाश्ता किया। इतने में इटारसी  स्टेशन आ गया। हम श्रीकृष्ण के साथ बचपन से जानी पहचानी नीलम होटल में चाय पीने घुसे। वहाँ एक घंटा इटारसी में लड़ी कुश्तियों और खेले गए हाँकी मेचों के साथ बनखेड़ी, पिपरिया, इटारसी और सिवनी मालवा में कुश्ती दंगल परम्परा पर बातें होती रहीं।

बातचीत के दौरान हरदा के एक खालिक पहलवान का ज़िक्र निकल आया। हम जब 1972 सागर विश्वविद्यालय की कुश्ती प्रतियोगिता में कुश्ती लड़ने गए थे, तब खालिक भी हरदा कालेज से आया था। वह ऊँचा सुंदर कसरती देह का मालिक और मज़बूत इरादों वाला पहलवान था। श्री कृष्ण ने बताया कि वह बम्बई चला गया था। वहाँ से दाऊद की गैंग में भर्ती होकर बम्बई बम कांड के बाद दुबई-शारजाह चला गया। वहीं बस गया।

पिपरिया से गोपाल गांगुड़ा का फ़ोन आया कि वे पिपरिया से अपनी कार में निकल गए हैं। आधा घंटे में इटारसी पहुँच जाएँगे और हिदायत दी कि तब तक सिग्नेचर की तीन बोतल ख़रीद लें। दुकान थोड़ी ही दूर थी। दुकानदार ने एक बोतल की क़ीमत 1500.00 रुपए बताई। भाव-ताव के बाद 1000.00 की दर से तीन हज़ार की तीन बोतलें ख़रीद लीं। गोपाल गांगुड़ा के पहुँचते ही हम वन विभाग के भौंरा कार्यालय के लिए निकले। जिनकी चार पहिया गाड़ी से हम वन विभाग भौंरा पहुँचे। वहाँ हमारा प्रशिक्षण होना था।

आशंका के अनुकूल सरकारी महकमा सुस्त चाल से चलता रहा। तवा और चूरना के वालंटियर्स बीच में उठकर इधर-उधर चल दिए। उन्हें जंगली महकमा के दस्तूर के अनुसार हाँका लगाकर समेटा गया। फिर एप को संचालित करने की विधि बताई गई। ख़ुशक़िस्मती से आई-फ़ोन के लिए एप नहीं बना था इसलिए हम बेकार की बेगारी से बच गए। औपचारिक परिचय के बाद प्रशिक्षण में कोर और बफ़र एरिया का अंतर बताया। फिर यह चेतावनी दी गई कि किसी भी हालत में जंगल में अकेले न जाएँ। हमेशा जूते पहन कर ही निकलें। यहाँ कोबरा साँप निकलते हैं। बहुत सावधानी से नीचे देखकर बाहर निकलें। बाघों की गणना का एक एप डाउनलोड करके बाघों की गणना की प्रक्रिया समझाई गई। सभी लोग एप समझने की प्रक्रिया में उलझ गए और हम यात्रा के संस्मरण लिखने में व्यस्त हो गये। “सुरम्य-सतपुड़ा” पुस्तक लिखने हेतु रिज़र्व फ़ॉरेस्ट के बारे में जानकारी जुटाने में एक कर्मचारी को पटा कर अंदरूनी जानकारियाँ निकलवाने में समय का सदुपयोग किया। आख़िर में बताया गया कि हमें, श्रीकृष्ण और गोपाल को मनचाहा चूरना रेंज आबँटन हुआ। लंच के समय तक कुछ सुगमुगाहट होने लगी। वन विभाग के एक अदना कर्मचारी से पता चला कि वन विभाग की तरफ़ से लंच का इंतज़ाम किया गया है। थोड़ी देर में एक पत्तल में पूड़ी-आलू मटर की सब्ज़ी, दाल, चावल का भोजन किया। चूरना के जंगल कहाँ है। पहले इसकी जानकारी लेना आवश्यक है।

भारत का प्रथम संरक्षित वनक्षेत्र क्रांतिकारी भभूत सिंह की मालगुजारी के अंतर्गत आने वाले बोरी के जंगलों को जब्त कर बनाया गया था। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व का ज्यादातर हिस्सा भभूत सिंह की मालगुजारी में आता था। राष्ट्रीय पुर्नजागरण की बेला में अपनी जड़ों को पहचानने का समय है। भभूत सिंह के स्वतंत्रता संग्राम में बलिदान से लोग अनभिज्ञ हैं। आइए, थोड़ा इतिहास की गलियों में तफ़री कर आयें।

पचमढ़ी का पठारी-पहाड़ी क्षेत्र, जो होशंगाबाद, पिपरिया, छिन्दवाड़ा और बैतूल शहरों के बीच स्थित है, गोंडों-कोरकुओं का रहवास हुआ करता था। भूमि के इस टुकड़े का भूवैज्ञानिक इतिहास मेसोलिथिक युग (9,000-4,000 ईसा पूर्व) तक पीछे जाता है। इतिहासकारों द्वारा इसका नाम गोंडवाना रखा गया। इस घने वन क्षेत्र में रहने वालों को आदिवासियों के रूप में नामित किया गया था। 12वीं-18वीं सदी के बीच इस क्षेत्र पर गोंडों का शासन था। उन्होंने इस क्षेत्र में कई महलों, तालाबों और किलों का निर्माण भी किया। देवगढ़ के शाह ने 1702 में नागपुर शहर बसाया, लेकिन 1710 के दशक के मध्य तक मराठों ने गोंड राज्य पर अधिकार कर लिया, और फिर 1818 में, अंग्रेजों ने मराठों को हरा कर इस क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया।

गोंड धीरे-धीरे जंगलों और पहाड़ियों में चले गए। एक जनजातीय के रूप में गुरिल्ला युद्ध में सिद्धहस्थ गोंड और कोरकू पहाड़ों पर विरल आबादी वाले साधारण लोग थे। 1819 में पचमढ़ी ने अंग्रेजों का ध्यान आकर्षित किया जब नर्मदा घाटी में मराठा प्रमुख अप्पा साहिब भोंसले को अंग्रेजों ने उनके क्षेत्र विस्तार की होड़ में बर्डी के युद्ध में हराया था। अप्पा साहिब शरण लेने के लिए महादेव हिल्स भाग गए। अपने आधुनिक हथियारों से लैस अंग्रेज इस क्षेत्र के सभी छोटे नेताओं, लुटेरों और छोटे मालगुज़ारों को बाहर निकालने में सक्षम थे। अप्पा साहिब नागपुर ले जाए गए। अंग्रेजों के अधीन नाम मात्र के शासक रहे। उनकी मृत्यु पर विधिक उत्तराधिकारी न होने के कारण अंग्रेजों ने उनके राज्य कर क़ब्ज़ा कर लिया।

कैप्टन जेम्स फोर्सिथ के आगमन से 25 साल पहले, होशंगाबाद में सहायक एजेंट कैप्टन ओसेली ने 1832 में पहली बार पचमढ़ी का दौरा किया। उन्होंने इस क्षेत्र से भूवैज्ञानिक और वनस्पति के नमूने एकत्र किए। पचमढ़ी में किसी विदेशी की यह पहली यात्रा थी। बाद में 1852 में, डॉ जेर्डन नामक एक सर्जन ने स्वदेशी जड़ी-बूटियों पर शोध करने के लिए पठार का दौरा किया। 1857 में अंग्रेजों ने पचमढ़ी पर अधिकारिक रूप से कब्जा कर लिया। 1857 के विद्रोह के दौरान तांत्या टोपे कोरकू प्रमुख भभूत सिंह से मदद लेने के लिए पचमढ़ी भाग गए। हालांकि विद्रोह जल्दी दबा दिया गया और तांत्या टोपे को शिवपुरी के नज़दीक पकड़ कर 18 अप्रेल 1959 को शिवपुरी कलेक्टर चौराहे पर फाँसी चढ़ा दिया गया। भभूत सिंह के लोग नीचे के मैदानों में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह और छापे करते रहे। इसी कारण विद्रोहियों को खदेड़ने के नाम पर अंग्रेजों को जंगलों पर आक्रमण करने का अवसर दिया। अंग्रेजों ने एक वर्ष में उनके विद्रोह को दबाकर भभूत सिंह के क्षेत्र को जब्त कर लिया। 1860-61 से इस क्षेत्र को फ़ौजी छावनी बनाने का काम शुरू हुआ। यह क्षेत्र एक तरफ तो सैनिक अड्डे हेतु सुरक्षित था और दूसरा यहाँ से बुंदेलखंड, मालवा, महाकौशल, निमाण, खानदेश और ब्रार के इलाक़ों को फ़ौजी मदद जल्दी भेजी जा सकती थी।

कुछ ही महीनों में कैप्टन जेम्स फोर्सिथ को पचमढ़ी भेजा गया, जहाँ उस समय 30 विषम कोरकू झोपड़ियाँ थीं। 1862 में वनवासियों को वैज्ञानिक संरक्षण के नाम पर हटा कर बोरी के पास के एक तिहाई क्षेत्र को जैव विविधता अभयारण्य के रूप में स्थापित कर दिया गया था। 1864 में, अंग्रेजों ने पचमढ़ी की जमीन स्थानीय सरदार ठाकुर घरब सिंह से 1.70 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से खरीदी। 14,580 एकड़ जमीन के लिए 23,916 रुपये का पूरा मुआवजा दिया गया। अंग्रेजों के पास अब एक रणनीतिक ऊंचाई पर भूमि का एक बड़ा टुकड़ा था जिसका उपयोग छावनी बनाने के लिए किया। आज भी पचमढ़ी का नागरिक प्रशासन छावनी बोर्ड के अधीन है। पचमढ़ी का शाब्दिक अर्थ पांच गुफाएँ है। एक लोकोक्ति के अनुसार पांडवों ने वन में अपने वनवास के वर्षों के दौरान इन गुफाओं में आश्रय लिया था। हालांकि, पुरातत्वविद इस सिद्धांत को खारिज करते हैं। उनके अनुसार गुफाओं का निर्माण बौद्ध भिक्षुओं ने गुप्त काल के दौरान किया था। इतिहास के बाद थोड़ी जानकारी भूगोल की भी लेते चलें।

बायोस्फीयर रिजर्व के कुल क्षेत्रफल 4,926.28 वर्ग किलोमीटर में हज़ारों झरनों से दो बड़ी नदियाँ आकार लेती हैं- देनवा और तवा। उनके बहाव का वर्णन यात्रा संस्मरण का जायज़ा बढ़ाएगा। श्री गोपाल और श्री कृष्ण ने इन सभी इलाक़ों का पैदल भ्रमण किया है।

श्री गोपाल बोले- भौगोलिक रूप से होशंगाबाद जिला दो भागों में बंटा है। एक देनवा घाटी की जंगल पट्टी, और दूसरा मिश्रित आबादी वाला मैदानी भाग सतपुड़ा पर्वत के ऊँचे-नीचे पहाड़ों की तलहटी से नर्मदा कछार तक बीस किलोमीटर फैला है। यहां तवा नहर से सिंचित खेती गुलज़ार है। पहाड़ी जंगल पट्टी में आदिवासी गावों में गोंड-कोरकू आदिवासी निवास करते हैं। खेती-बाड़ी अधिकांशतः मानसूनी बारिश पर निर्भर है। सतपुडा की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ़ (पचमढ़ी) से देनवा उद्गमित हुई है। वहीं से एक बड़ी नदी सोनभद्रा का उद्गम स्थल भी है।

देनवा नदी पचमढ़ी के चौरागढ़ क्षेत्र से शुरू होकर झिरपा, मटकुली, मढ़ई के रास्ते तवा में जाकर मिल जाती है। तवा बाँध से निकली नहरों के पानी से सिंचाई के कारण होशंगाबाद और हरदा ज़िलों के खेतों में गेहूँ, चना, धान, तुअर, की भरपूर फसल होती है। यह देनवा नदी का ही जल है जो तवा बाँध को समृद्ध करता है। स्थानीय गोंडों के एक देवता का नाम देवा है। देवा से ही इस नदी का नाम देनवा पड़ा है। देनवा याने देने वाली। देनवा नदी सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र से होकर गुजरती है। यह पेयजल का बड़ा स्रोत है। काफी गर्मी के बाद भी देनवा नदी सूखती नहीं और हर हाल में वन्य प्राणियों के लिए पानी उपलब्ध कराती है। हालांकि जंगल में और भी नदी नाले हैं जो जानवरों को पानी देते हैं, लेकिन देनवा की उपयोगिता बिलकुल अलग है। 

वन विभाग के एक अन्य अधिकारी बताते हैं, कि देनवा पचमढ़ी के चौरागढ़ पहाड़ के पीछे से निकलकर दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर अठखेलियां करते हुए झिरपा, मटकुली के पास जवान हो मढ़ई होते हुए तवा बाँध में समा जाती है। यह जितनी खूबसूरत है उतनी ही खतरनाक भी है। देनवा जब शांत रहती है तब इसकी गोद में आकर बच्चे भी खेलते हैं पर पहाड़ों पर बारिश होते ही इसका मिजाज बदल जाता है। इन दिनों देनवा से जरा सा भी खिलवाड़ जानलेवा साबित हो सकता है। वह हहराती, उफनती और भंवर बनाती रौद्र रूप में रहती है। इसकी खूबसूरती बेमिसाल है। ऊंची पहाड़ी चट्टानों के बीच बनी गहरी खाई में यह तेजी से बहती है। इसे किसी भी जगह से देखिए, हमेशा खूबसूरत नजर आती है।

प्रकृति प्रेमी पिपरिया के श्री गोपाल गांगुड़ा ने आगे बताया- मैं अक्सर इन जंगलों में जाता हूँ और जब भी जाता हूं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि देनवा को ना देखा हो। इसे गर्मी, सर्दी और बारिश किसी भी मौसम में देखा जाए, इसकी ख़ूबसूरती कभी भी कम नहीं होती।

हमने जानना चाहा- तीन लोग अलग-अलग बातें बताते हैं कि देनवा नदी धूपगढ़, चौरागढ़ और महादेव पर्वत से निकलती है। तीनों पर्वतों से एकसाथ कैसे निकल सकती है। तीनों पहाड़ तीन दिशाओं में ऊँचे खड़े हैं।

श्री गोपाल ने खुलासा किया- लेकिन वास्तविकता यही है। इन तीन गगनचुंबी पर्वत शिखरों की शिराओं से बारिश का जल असंख्य पहाड़ी झरनो से बह एकसार हो मटकुली के पहले सहस्त्रधार पर एक बड़ी नदी बन जाता है। देनवा नदी चाँवरपाठा से पूर्वी दिशा पकड़ कर सहस्त्रधार पहुँचती है वहाँ से दक्षिण मुड़ जाती है। सहस्त्रधार से मटकुली और परसापानी होती हुई मढ़ई से गुजर कर तवा बांध में समा जाती है।

श्रीकृष्ण- सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला की प्रसिद्ध धूपगढ़, चौरागढ़ और महादेव की पहाड़ियों से उद्गमित देनवा से कई बार साक्षात्कार होता है। कभी मटकुली के पुल पर, कभी देनवा दर्शन में, कभी थोड़ा नीचे जंगल के रास्तों पर और कभी मढ़ई में उसकी छाती पर सरपट दौड़ती मोटर बोटों की शक्ल में। लेकिन सतधारा में देनवा का सौंदर्य देखते ही बनता है। एक छोर से दूसरे छोर तक हल्के काले रंग की चट्टानों पर अलग-अलग सात धाराओं में उछलती-कूदती गेंद की तरह टप्पा खाती और नाचती-गाती देनवा को घंटों निहारते रहो, तब भी मन नहीं भरता। यहां देनवा के किनारे दोंनों ओर हरा-भरा जंगल है। सरसराती हवा और चिड़ियों के सुंदर गान से आनंद दायक वातावरण रहता है। सतधारा में जब हम पहुंचे तब हमें ज्यादा अंदाजा नहीं था कि यहां देनवा दर्शन और प्राकृतिक सानिध्य पाने के लिए इतने लोग आते हैं। कुछ ही घंटों में दर्जन भर गाड़ियां आ गईं और उसमें बैठे लोग ऊंचाई से उतर कर नदी में स्नान करने चले गए। कुछ लोग अपने साथ भोजन वगैरह लाए थे, वे भोजन करने लगे। बच्चे नदी की रेत में खेलने-कूदने लगे। इन सबसे बेख़बर पशु-पक्षी कीट-पतंगे, पेड़-पौधे निर्विकार रमण कर रहे थे।

हमने कहा- नर्मदा की तरह देनवा का भी धार्मिक महत्व है जो हमें भी देखने को मिला। जिस दिन हम वहां पर गए थे, कुछ ग्रामीण स्त्री पुरूष देनवा की पूजा करने आए थे। भूरा-भगत पर तो मेला भी लगता है। पचमढ़ी आते-जाते समय मटकुली पुल पर रुककर लोग इसकी पूजा करते हैं। पचमढ़ी के रास्ते में देनवा दर्शन एक पर्यटन स्थल बन गया है। जहां खड़े होकर लोग देनवा का अनोखा रूप आँख से देखते और कान से सुनते रहते हैं।

नदियों से जीवन है यह किताबी परिभाषा नहीं, हकीकत है। देनवा के किनारे फैली रेत में बरौआ समुदाय के लोग तरबूज-खरबूज की खेती करते है। गर्मियों में यहां की ककड़ी और खरबूजों की मांग बढ़ जाती है। स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिलता है। गर्मियों के मौसम में मटकुली में यहां की ककड़ी बिकती हैं। महिलाएँ छोटी टोकनियों में ककड़ियां बेचती हैं। लेकिन कई बार बारिश तरबूज-खरबूज बहाकर ले जाती है। यदि बरौआ बिना खेती के रह गए, मगर रोहू, कतला, बाम, सामन मछलियों की फसल उनसे कौन छीन सकता है। मछुआरे जाल लेकर देनवा में डेरा डाले रहते हैं क्योंकि जैसे ही देनवा में थोड़ा ज्यादा पानी हुआ, तवा बांध की मछलियां हवाई जहाज की तरह ऊपर चढ़ आती हैं। लेकिन पिछले सालों से मछलियां कम मिलती हैं, नदी में मगर मच्छ खूब हो गए हैं। देनवा का पानी स्वच्छ, निर्मल और जड़ी-बूटी व खनिजों से युक्त यानी सही मायने में मिनरल वॉटर है। जो पानी बोतलों में मिनरल के नाम से बिकता है, उनमें मिलावट के किस्से आते रहे हैं। लेकिन देनवा का पानी निर्मल मीठा और पीने योग्य है। जब गर्मियों में मटकुली जैसे कस्बों में पानी की कमी होती है, तब इससे ही पूर्ति होती है।

श्री गोपाल बोले- देनवा पहाड़ी नदी होने के कारण खतरनाक  मिजाज रखती है, थोड़ी देर की बारिश से इसमें उफान आ जाता है। और जल्दी ही नीचे भी उतर जाती है। मटकुली निवासी भूरा पाल ने बताया पहले नदी का जो पुराना पुल था उस पर बारिश में नदी के आ जाने से रास्ता बंद हो जाता था। एक बार 6 लोग उफनती नदी को पार करने में डूब कर मर गए थे। वे सभी टूरिस्ट थे। इनके अलावा और भी कई दुर्घटनाएं हुई हैं जिनकी याद दिल को दहला देती है। मटकुली निवासी पप्पू खान ने बताया देनवा की पहाड़ी खाईयां प्रकृति प्रमियों को ही नहीं अपराधियों को भी आकर्षित करती हैं। लगभग 10 साल पहले एक दौर चला था जब देनवा दर्शन प्वाइंट के आसपास शव बरामद होना शुरू हुए थे। खान ने बताया इन शवों का पता कभी नहीं चलता अगर हत्यारे खुद ना बताते कि उन्होंने शव देनवा की घाटी में फेंक दिए हैं। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की कई आपराधिक घटनाओं में देनवा का जिक्र आता है।

कुल मिलाकर, देनवा जैसी छोटी नदियों का बहुत महत्व है। सतपुड़ा से निकलने वाली ज्यादातर नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। दुधी, पलकमती, मछवासा, शक्कर आदि कई नदियां जो पहले सदानीरा थीं, अब बरसाती नाला बन कर रह गई हैं। देनवा में अभी पानी है, अपूर्व सौंदर्य भी है, जंगल भी है। लेकिन यह कब तक बचा रहेगा, यह कहा नहीं जा सकता। इसका पानी भी धीरे-धीरे कम होने लगा है। ऐसी छोटी नदियों को बचाने की जरूरत है। जंगल बचाने की जरूरत है। छोटे स्टापडेम बनाकर बारिश की बूंद-बूंद सहेजने की जरूरत है।

बारिश में मटकुली के पुल पर बाढ़ आ जाती है और जब तक बाढ़ नहीं उतर जाती पिपरिया-पचमढ़ी का रास्ता बंद हो जाता है। इस पुल को बनाने की मांग लंबे अरसे से की जा रही है। जब यातायात बंद रहता है, पचमढ़ी जाने वाले सैलानियों को बहुत परेशानी होती है। मटकुली में ही भभूतसिंह कुंड है, जो आदिवासियों की अंग्रेजों से लड़ाई की याद दिलाता है। यह नदी उस लड़ाई की गवाह है जो हर्राकोट के कोरकू भभूतसिंह ने अपने अधिकार व इज्जत के लिए अंग्रेजों से लड़ी थी। इसी देनवा नदी के किनारे पानी पी पीकर उन्होंने एक दूसरे को पानी पिलाया था, जबरदस्त लड़ाई हुई थी। इस क्षेत्र की दूसरी बड़ी नदी तवा नदी है।

हमने कहा- तवा नदी का बड़ा प्रताप है। यह सारणी के ऊपर पहाड़ों से निकल बांध के रूप में बंधी तवा सी पसरी है। नादिया नामक स्थान पर तवा नदी का पाठ सात किलोमीटर चौड़ा है। धूपगढ़ के नीचे से निकली सुपला और मालिनी नदी, केसला नदी और कई झरनों का पानी लेकर कई पहाड़ों के बीच पाँच से आठ किलोमीटर का चौड़ा पाठ बनाती हुई तवा बांध में स्थिर हो जाती है, जैसे कोई तपस्वी ध्यानमग्न धूनी रमाए हो। पूर्व से सुपला में मालिनी, पश्चिम से तवा में सुखतवा और दक्षिण से केसला नदियाँ आकर साकोट में मिलती हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – नैनीताल – भाग-२८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – नैनीताल – भाग- २८ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

नैनीताल

कालाढूँगी से नैनीताल की तरफ़ मुड़ने लगे तो वहाँ पुलिस ने बेरीकेड़ लगा कर मुस्तैद चौकसी कर रखी थी। वे कोरोना चेकिंग कर रहे थे। उन्हें टेस्ट रिपोर्ट बताई। फिर भी संतुष्ट नहीं हो रहे थे। परिचय पत्र के रूप में स्टेट बैंक के पहचान पत्र दिखाते ही अफ़सर ने कहा जाइए। यात्रा शुरू होते ही पहाड़ियों का घुमावदार रास्ता आरम्भ हो गया। जिम कार्बेट कभी इन्ही रास्तों से पैदल नैनीताल ज़ाया करते थे। इन्ही पहाड़ियों में उन्होंने आदमखोरों का पीछा किया था और कई बार तो आदमखोरों ने उनका पीछा किया था। शुरू में पहाड़ियाँ थोड़ी सपाट सी थीं लेकिन दस किलोमीटर चलने के बाद तीखी चढ़ाई आते ही चारों तरफ़ खूबसूरत नज़ारे दिखने लगे। शाम के धुँधलके में नैनीताल पहुँच गये।

स्टेट बैंक का गेस्ट हाऊस बहुत ऊँची पहाड़ी पर बहुत देर तक ढूँढने के बाद मिल तो गया। परंतु वहाँ का केयरटेकर बोला कि आपकी बुकिंग नहीं है। काफ़ी बहस मुबाहिसों के बाद कमरा हासिल कर लिया। बाहर निकल कर देखा तो नैनीताल को घेरकर अतीव प्राकृतिक सौदर्य बिखरा था। पूरा शहर नज़र आ रहा था। झील को घेरकर बनी सड़क पर आवागमन चिटियों की चलत रेखा सादृश्य दिख रहा था।

नैनीताल कुमायूँ इलाक़े का प्रमुख शहर और भारत का एक लोकप्रिय पर्वतीय पर्यटन स्थल है। राज्य का उच्च न्यायालय स्थित होने से यह उत्तराखंड की न्यायिक राजधानी है। कुमाऊं मंडल का मुख्यालय होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण ज़िला भी है। उत्तराखंड के राज्यपाल यहाँ राजभवन में रहते हैं। जबकि राजनीतिक राजधानी देहरादून है। नैनीताल संयुक्त प्रांत की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। नैनीताल बाहरी हिमालय की कुमाऊं तलहटी में राज्य की राजधानी देहरादून से 285 किमी की दूरी और नई दिल्ली से 345 किमी की दूरी पर स्थित है। यह शहर समुद्र तल से 6,358 फुट की ऊंचाई पर एक घाटी में स्थित है। जिसमें एक आंख के आकार की झील लगभग दो मील की परिधि में  पहाड़ों से घिरी हुई है, जिनमें से सबसे ऊंची नैना चोटी 8,579 फीट, उत्तर में देवपथ 7,999 फुट और पश्चिम में अयारपथ 7,474 फुट ऊंची चोटियों के शीर्ष से दक्षिण की ओर विशाल मैदान और उत्तर में बर्फीली श्रृंखला के साये में उलझी हुई लकीरों से पहाड़ी खेत के शानदार दृश्य हिमालय की केंद्रीय धुरी का निर्माण करती हैं। नैनीताल शहर का कुल क्षेत्रफल को 11.73 किमी है। झील की तलहटी झील के सबसे गहरे बिंदु, पाषाणदेवी के पास 85 मीटर की गहराई पर है। झील को विवर्तनिक रूप से बनाया गया माना जाता है। बलिया नाला, जो झील को भरने वाली मुख्य धारा है, और बाद की धाराएँ प्रमुख जोड़ों सहित 26 प्रमुख नाले झील  में मिलते हैं, जिसमें 3 बारहमासी नाले शामिल हैं।

पुराणों के अनुसार सती के शव के विभिन्न अंगों से बावन शक्तिपीठों का निर्माण हुआ था। इसके पीछे यह अंतर्कथा है कि दक्ष प्रजापति ने कनखल (हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व’ नामक यज्ञ रचाया। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता भगवान शंकर को नहीं बुलाया। शंकरजी की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती पिता द्वारा न बुलाए जाने पर और शंकरजी के रोकने पर भी यज्ञ में भाग लेने गईं। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर को अपशब्द कहे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती ने यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। भगवान शंकर के आदेश पर उनके गणों के उग्र कोप से भयभीत सारे देवता ऋषिगण यज्ञस्थल से भाग गये। भगवान शंकर ने यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए इधर-उधर घूमने लगे। तदनंतर सम्पूर्ण विश्व को प्रलय से बचाने के लिए जगत के पालनकर्त्ता भगवान विष्णु ने चक्र से सती के शरीर को काट दिया। तदनंतर वे टुकड़े 52 जगहों पर गिरे। वे 52 स्थान शक्तिपीठ कहलाए। सती ने दूसरे जन्म में हिमालयपुत्री पार्वती के रूप में शंकर जी से विवाह किया। पौराणिक मान्यता है की सती के नैन यहाँ गिरने से नैना देवी का शक्ति पीठ स्थापित हुआ।

नैनीताल ऐतिहासिक रूप से कुमाऊं क्षेत्र का हिस्सा रहा है। 10वीं शताब्दी में कत्यूरी राजवंश के पतन के बाद, कुमाऊं कई छोटी रियासतों में विभाजित हो गया था, और नैनीताल के आसपास का क्षेत्र एक खासिया परिवार की विभिन्न शाखाओं के अधीन था। कत्यूरियों के बाद कुमाऊं पर समेकित प्रभुत्व हासिल करने वाला पहला राजवंश चंद था, लेकिन इसमें कई शताब्दियां लगीं और नैनीताल और इसके आसपास के क्षेत्र अवशोषित होने वाले अंतिम क्षेत्रों में से एक थे।

त्रिलोक चंद ने तेरहवीं शताब्दी में भीमताल में एक किला बनवाया था, लेकिन उस समय नैनीताल स्वयं चंद शासन के अधीन नहीं था, और राज्य की पश्चिमी सीमा के पास स्थित था। उद्यान चंद के शासनकाल के दौरान, चंद राज्य की पश्चिमी सीमा कोशी और सुयाल नदियों तक फैली हुई थी, लेकिन रामगढ़ और कोटा अभी भी पूर्व खासिया शासन के अधीन थे। 1488 से 1503 तक शासन करने वाले कीरत चंद अंततः नैनीताल और आसपास के क्षेत्र पर अधिकार स्थापित करने में सक्षम हुए थे। खासिया प्रमुखों ने 1560 में अपनी स्वतंत्रता हासिल करने का प्रयास किया, जब उन्होंने रामगढ़ के एक खासिया के नेतृत्व में सफलता के एक संक्षिप्त क्षण का आनंद लिया, लेकिन बाद में बालो कल्याण चंद द्वारा निर्ममता से वश में कर लिया गया। अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में आपसी दुर्भावनाओं व राग-द्वेष के कारण चंद राजाओं की शक्ति बिखर गई थी। फलतः गोरखों ने अवसर का लाभ उठाकर हवालबाग के पास एक साधारण मुठभेड़ के बाद सन्‌ 1790 में अल्मोड़ा पर अपना अधिकार कर लिया।

कुमाऊं पर गोरखा शासन 24 वर्षों तक चला। इस अवधि के दौरान काली नदी को अल्मोड़ा के रास्ते श्रीनगर से जोड़ने वाली एक सड़क थी। गोरखा काल के दौरान अल्मोड़ा कुमाऊं का सबसे बड़ा शहर था, और अनुमान है कि इसमें लगभग 1000 घर थे।

कुमाऊँ की पहाड़ियाँ एंग्लो-नेपाली युद्ध (1814-16) के बाद ब्रिटिश शासन के अधीन आ गईं। नैनी ताल के हिल स्टेशन शहर की स्थापना  1841 में हुई थी, जिसमें शाहजहांपुर के एक चीनी व्यापारी पी. बैरोन द्वारा पहले यूरोपीय घर (पिलग्रिम लॉज) का निर्माण किया गया था। अपने संस्मरण में, उन्होंने लिखा: “यह अब तक का सबसे अच्छा स्थल है जिसे मैंने हिमालय में 2,400 किमी की यात्रा के दौरान देखा है।”

1846 में, जब बंगाल आर्टिलरी के एक कैप्टन मैडेन ने नैनी ताल का दौरा किया, तो उन्होंने दर्ज किया कि “बस्ती के अधिकांश हिस्सों में घर तेजी से उभर रहे थे: कुछ सैन्य रेंज के शिखर की ओर समुद्र तल से लगभग 7,500 फीट ऊपर थे। स्थानीय लोगों द्वारा इसका नामकरण ऊबड़-खाबड़ और जंगली आन्यारपट्टा आशीष (अन्यार-पट्ट – कुमाऊँनी में – पूर्ण अंधकार) किया था क्योंकि घने जंगलों के कारण यहाँ कम से कम सूर्य की किरणें पड़ती थीं। सेंट जॉन (1846) चर्च जंगल में सबसे शुरुआती इमारतों में से एक था। उसके बाद बेल्वेडियर, अल्मा लॉज, एशडेल कॉटेज (1860 ) बनीं। जल्द ही, यह शहर ब्रिटिश सैनिकों और औपनिवेशिक अधिकारियों और उनके परिवारों द्वारा मैदानी इलाकों की गर्मी से बचने की कोशिश करने वाला एक रिसॉर्ट बन गया। बाद में, यह शहर संयुक्त प्रांत के गवर्नर का ग्रीष्मकालीन निवास बन गया।

30 जुलाई 2021 को हमने एक पूरा दिन नैनीताल के दर्शनीय स्थलों के लिए रखा था। नैनीताल को भारत के लेक सिटी के रूप में भी जाना जाता है। कहा जाता है कि एक समय में नैनीताल जिले में 60 से अधिक झीलें थीं। चारों ओर सुंदरता बिखरी पड़ी है। सैर-सपाटे के लिए दर्जनों जगहें हैं, जहां पर्यटक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। बर्फ से ढके पहाड़ों से घिरा यह स्थान झीलों से भरा हुआ है। नैनीताल हिमालय की कुमाऊँ पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है।

नैनी झील नैनीताल का सबसे प्रमुख आकर्षण है, जो हरी घाटियों से घिरा है। यात्री नौकायन (रोइंग), रोइंग, पैडलिंग (नौकायन) जैसी गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं। यह झील काफी लंबी है और इसके उत्तरी भाग को ‘मल्ली ताल’ कहा जाता है, जबकि दक्षिणी भाग को ‘तल्ली ताल’ कहा जाता है। यह एकमात्र झील है जिस पर एक पुल और एक डाकघर है।

मॉल रोड नैनीताल की एक प्रसिद्ध सड़क का नाम है, और हाल ही में इसे बदलकर ‘गोविंद बल्लभ पंत मार्ग’ कर दिया गया है। दुकानों और बाजारों के अलावा, कई बैंक और ट्रैवल एजेंसियां मॉल रोड पर उपलब्ध हैं। यह सड़क मल्लीताल को महाल्ली से जोड़ती है। एक अन्य पर्यटक आकर्षण ‘ठंडी सड़क’ है, जो नैनी झील के दूसरी ओर स्थित है। हम लोग एक नौका पर सवार होकर दो घंटे नैनीताल में नौकायन का आनंद लेते रहे। चारों तरफ़ पहाड़ों पर बादलों की अठखेलियाँ मस्त वातावरण रच रही थीं। मंद-मंद रिमझिम फुहारों ने वातावरण को और भी रोमांटिक बना दिया। झील की सैर के बाद चिड़िया घर की सैर को निकल गए।

नैनीताल में चिड़ियाघर 1984 में स्थापित किया गया था। यह नैनीताल बस स्टॉप से केवल एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह चिड़ियाघर विभिन्न जानवरों का घर है, जिनमें बंदर, साइबेरियाई बाघ, तेंदुए, भेड़िये, ताड़ के सिवेट बिल्लियाँ, रोज़ रिंग पैराकेट्स, सिल्वर तीतर, पहाड़ी लोमड़ी, सांभर, प्यारे और बार्क हिरण और हिमालयन काला भालू  भी शामिल है। चिड़ियाघर सोमवार और सभी राष्ट्रीय छुट्टियों पर बंद है।

नैनीताल की सात चोटियों में 2611 मीटर ऊंची नैनी चोटी (चाइना पीक) सबसे ऊंची चोटी है। चाइना पीक की दूरी नैनीताल से लगभग 6 किलोमीटर है। इस चोटी से हिमालय की ऊँची चोटियाँ दिखाई देती हैं। नैनीताल झील और शहर के भव्य दृश्य भी हैं। फिर नीचे आकर टिफ़िन टॉप पर चढ़े। टिफिन टॉप एक सुंदर पिकनिक स्थल है, जिसे ‘डोरोथी की सीट’ के रूप में भी जाना जाता है। अयारपट्टा चोटी पर स्थित यह स्थान समुद्र तल से 7520 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यात्री यहाँ से ग्रामीण परिदृश्य के साथ शक्तिशाली हिमालय पर्वतमाला के प्रभावशाली दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। इस स्थान का विकास डोरोथी शैले (एक अंग्रेजी कलाकार) के पति द्वारा विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु के बाद किया गया था। नैनीताल टाउन से 4 किमी दूर स्थित, यह टिफिन टॉप प्रकृति की फोटोग्राफी के लिए एक आदर्श स्थान है।

अगली सुबह सेंट जॉन चर्च इन वाइल्डरनेस गए जो मल्लीताल (नैनीताल के उत्तरी भाग) में स्थित  एक शांत जगह है। यह चर्च वर्ष 1844 में स्थापित किया गया था। अभिलेखों के अनुसार, कोलकाता के बिशप, डैनियल विल्सन, इस चर्च की आधारशिला स्थापित करने के लिए यहां आए थे, अपनी यात्रा के दौरान, वे बीमार हो गए और उन्हें पास के जंगल में एक अधूरे घर में रहना पड़ा।  इसलिए, चर्च को जंगल में सेंट जॉन के रूप में जाना जाने लगा। यह चर्च 1880 में भूस्खलन का शिकार हुए लोगों के एक स्मारक के रूप में भी काम करता है, जहाँ कांस्य पट्टिका में मारे गए लोगों के नाम लिखे हैं।

उसके बाद गुफा गार्डन गए। गुफा गार्डन को इको गुफा गार्डन के नाम से भी जाना जाता है। यह नैनीताल का एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण है। यह उद्यान अपने आगंतुकों को पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली की एक झलक प्रदान करता है। छह भूमिगत पिंजरे हैं जो पेट्रोमैक्स लैंप द्वारा प्रकाशित किए जाते हैं और एक संगीत वाद्ययंत्र की ताल पर चलने वाला एक फव्वारा भी है जो पहली बार नैनीताल में स्थापित किया गया था। इन गुफाओं को टाइगर गुफा, पैंथर गुफा, चमगादड़ गुफा, गिलहरी गुफा, फ्लाइंग फॉक्स, एव और एप गुफा के रूप में जाना जाता है। इन गुफाओं को जोड़ने का मार्ग काफी संकीर्ण है, कभी-कभी यात्रियों को रेंगने की आवश्यकता होती है। ये सभी गुफाएँ प्राकृतिक हैं और स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रबंधित हैं।

नैनीताल के पास एक खुर्पाताल भी है। कॉटेज, फिशिंग फिटर (झोपड़ी) लोगों के लिए स्वर्ग है। यह नैनीताल से 10 किमी दूर स्थित है। यह खूबसूरत छोटा उपग्राम (खेरा) समुद्र तल से 1635 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता किसी को भी मंत्रमुग्ध कर देती है। खूबसूरत झील और आसपास के घर और होटल कई बार इस सुंदरता को बढ़ाते हैं। 19 वीं शताब्दी तक खुर्पाट लोहे के औजारों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन अब यह हरी सब्जियों के लिए प्रसिद्ध है।

तीसरे दिन सबसे पहले नैनीताल झील के किनारे पर स्थित नयना देवी के मंदिर पर देवी दर्शन किया। उसके ठीक बाजू में सिक्ख गुरुद्वारा में मत्था टेका। फिर नैनीताल झील में नाव की सवारी पर एक घंटा बिताता। इस झील में कई फ़िल्मों की शूटिंग हुई है। जिनमे कटी पतंग फ़िल्म का गाना “जिस गली में तेरा घर न हो बालमा” बहुत प्रसिद्ध है। झील से चारों तरफ़ के गगनचुंबी पर्वत शिखर अत्यंत मनोरम दृश्यावली बनाते हैं। उसके बाद रोपवे से नैनीताल शहर की ऊँची चोटी पर पहुँच कर पूरे शहर को देखा और फ़ोटो खींचे। फिर मॉल रोड पर दो घंटे मटरगश्ती करते रहे। इस प्रकार हमारा अंतिम पड़ाव पूरा हुआ।  

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ज़िम कार्बेट-नैनीताल – भाग-२७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

ज़िम कार्बेट-नैनीताल

जिम ने कुछ समय छोटी हल्द्वानी में भी बिताया, जिसे उन्होंने गोद लिया था और जिसे कॉर्बेट्स विलेज के नाम से जाना जाने लगा। जंगली जानवरों को परिसर से बाहर रखने के लिए कॉर्बेट और ग्रामीणों ने 1925 में गांव के चारों ओर एक दीवार का निर्माण किया। 2018 तक दीवार अभी भी खड़ी है, और ग्रामीणों के अनुसार इसे बनाने के बाद से दीवार ने ग्रामीणों पर जंगली जानवरों के हमलों को रोका जा सका था। उनकी यादों को मोती हाउस के रूप में बरकरार रखा गया था, जिसे कॉर्बेट ने अपने दोस्त मोती सिंह के लिए बनवाया था, और कॉर्बेट वॉल, एक लंबी दीवार (लगभग 7.2 किमी) गाँव के चारों ओर फसलों की जंगली जानवर से रक्षा के लिए बनाई गई थी। उन्होंने जंगली बिल्लियों और अन्य वन्यजीवों की घटती संख्या के बारे में लिखना और चेतावनी देना जारी रखा।

1947 के बाद, कॉर्बेट और उनकी बहन मैगी न्येरी, केन्या चले गए थे, जहां वे होटल आउटस्पैन के मैदान में ‘पक्सटू’ कॉटेज में रहते थे, जो मूल रूप से उनके दोस्त लॉर्ड बैडेन-पॉवेल के लिए बनाया गया था। जिम कॉर्बेट अपनी बहन मैगी कॉर्बेट के साथ गुर्नी हाउस में रहते थे। नवंबर 1947 में केन्या जाने से पहले उन्होंने श्रीमती कलावती वर्मा को घर बेच दिया। घर को एक संग्रहालय में बदल दिया गया है और इसे जिम कॉर्बेट संग्रहालय के रूप में जाना जाता है। आज हम कालाढुंगी के उसी संग्रहालय के प्रांगण में उन्हें याद करके आदरांजलि अर्पित कर रहे हैं।

केन्या भी कभी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहा था। रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय केन्या गई थीं। तब उनके लिए ट्रीटॉप हट बनाई है थी जिसमें कॉर्बेट 5-6 फरवरी 1952 को राजकुमारी एलिजाबेथ के अंगरक्षक के रूप में ट्रीटॉप्स पर (एक विशाल फ़िकस के पेड़ की शाखाओं पर बनी एक झोपड़ी) साथ रहे। उस रात राजकुमारी के पिता, किंग जॉर्ज VI की मृत्यु हो गई, और एलिजाबेथ रानी बन गई। दुनिया के इतिहास में पहली बार एक युवा राजकुमारी के रूप में पेड़ पर चढ़ी और अपने सबसे रोमांचक अनुभव के रूप में वर्णित करने के बाद वह अगले दिन पेड़ से इंग्लैंड की रानी बनकर नीचे उतरी। अपनी छठी पुस्तक, ट्री टॉप्स को समाप्त करने के कुछ दिनों बाद दिल का दौरा पड़ने से कार्बेट की मृत्यु हो गई, और उन्हें न्येरी में सेंट पीटर्स एंग्लिकन चर्च में दफनाया गया।  कॉर्बेट और उनकी बहन की लंबे समय से उपेक्षित कब्रों की मरम्मत और जीर्णोद्धार जिम कॉर्बेट फाउंडेशन के संस्थापक और निदेशक जैरी ए. जलील द्वारा 1994 और 2002 में किया गया।

जिम कॉर्बेट की कुल सात किताबें भारत में प्रकाशित हुई हैं। जिनके हिंदी संस्करण भी  आ चुके हैं। वन्य जीवन में रूचि रखने वालों के लिए उनका साहित्य अद्भुत ख़ज़ाना से कम नहीं है। 

1.जंगल की कहानियां। 1935 में निजी तौर पर प्रकाशित (केवल 100 प्रतियां)

सामग्री: गांव में वन्य जीवन: एक अपील, पीपल पानी टाइगर, मेरे सपनों की मछली, एक खोया स्वर्ग, आतंक जो रात में चलता है, पूर्णा लड़की और इसकी रहस्यमय रोशनी, चौगढ़ टाइगर्स।

2.कुमाऊं के आदमखोर। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, बॉम्बे 1944

सामग्री: लेखक का नोट (आदमखोर होने के कारण), चंपावत मानेटर, रॉबिन, चौगढ़ टाइगर्स, द बैचलर ऑफ पोवलगढ़, द मोहन मानेटर, फिश ऑफ माय ड्रीम्स, द कांडा मैनेटर, द पीपल पानी टाइगर, द ठक मैन-ईटर, जस्ट टाइगर्स।

3.रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1947

सामग्री: द पिलग्रिम रोड, द मैन-ईटर, आतंक, आगमन, जांच, पहली हत्या, तेंदुए का पता लगाना, दूसरा किल, तैयारी, जादू, ए नियर एस्केप, द जिन ट्रैप, द हंटर्स हंटेड, रिट्रीट, फिशिंग इंटरल्यूड, एक बकरी की मौत, साइनाइड जहर स्पर्श, सावधानी में एक सबक, एक जंगली सूअर का शिकार, एक देवदार के पेड़ पर सतर्कता, आतंक की मेरी रात, तेंदुए से लड़ता है तेंदुए, अंधेरे में एक शॉट, उपसंहार।

4.मेरा भारत। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1952

सामग्री: समर्पण और परिचय, गांव की रानी, ​​कुंवर सिंह, मोती, पूर्व लाल टेप दिन, जंगल का कानून, ब्रदर्स, सुल्ताना: भारत का रॉबिन हुड, वफादारी, बुद्धू, लालाजी, चमारी, मोकामा घाट पर जीवन।

5.जंगल विद्या। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1953

सामग्री: मार्टिन बूथ, डैनसे, लर्निंग टू शूट, मागोग, लुकिंग बैक, जंगल एनकाउंटर, कैटेगरी, जंगल विद्या, जंगल की पुकार, स्कूल के दिन / कैडेट, जंगल की आग और बीट्स, गेम ट्रैक्स, जंगल संवेदनशीलता परिचय।

6.कुमाऊं का टेंपल टाइगर और अन्य आदमखोर। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1954

सामग्री: द टेंपल टाइगर, द मुक्तेसर मैन-ईटर, द पनार मैन-ईटर, द चुका मैन-ईटर, द तल्ला देस मैन-ईटर, उपसंहार।

7.माई कुमाऊं: अनकलेक्टेड राइटिंग्स। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012

सामग्री: प्रकाशक का नोट; समयरेखा; प्रस्तावना: ‘मैं कैसे लिखने आया’; ए लाइफ वेल लिव्ड: एन इंट्रोडक्शन टू जिम कॉर्बेट बाय लॉर्ड हैली; खंड एक: अप्रकाशित कॉर्बेट—रात जार का अंडा; ‘हम में से एक’; माई जंगल कैंप से; रुद्रप्रयाग पत्र; रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए पर कॉर्बेट; द मेकिंग ऑफ कॉर्बेट्स माई इंडिया: कॉरेस्पोंडेंस विद हिज एडिटर्स; ‘शूटिंग’ टाइगर्स: कॉर्बेट एंड द कैमरा; गांव में वन्यजीव: एक पर्यावरण अपील; भारत में एक अंग्रेज; केन्या में जीवन; खंड दो: कॉर्बेट एंड हिज़ ऑडियंस-‘द आर्टलेसनेस ऑफ़ हिज़ आर्ट’; द मैन रिवील्ड: कॉर्बेट इन हिज़ राइटिंग्स; जिम कॉर्बेट की सार्वभौमिक अपील: पत्र और समीक्षाएं; रुद्रप्रयाग के लिए उद्धार: कॉर्बेट द्वारा आदमखोर तेंदुए की हत्या पर प्रतिक्रिया; कॉर्बेट का प्रभाव: कुमाऊं के आदमखोर और छिंदवाड़ा कोर्ट केस; सूक्ति

उनकी किताब  मैन-ईटर ऑफ कुमाऊं (कुमाऊं के आदमखोर) भारत, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका में एक बड़ी सफलता थी, अमेरिकन बुक-ऑफ-द-मंथ क्लब का पहला संस्करण 250,000 प्रतियां था। बाद में इसका 27 भाषाओं में अनुवाद किया गया। कॉर्बेट की चौथी पुस्तक, जंगल लोर, उनकी आत्मकथा है। 1948 में, कुमाऊं की सफलता के आदमखोरों के मद्देनजर, एक हॉलीवुड फिल्म, मैन-ईटर ऑफ कुमाऊं, बायरन हास्किन द्वारा निर्देशित और साबू, वेंडेल कोरी और जो पेज अभिनीत, बनाई गई थी। फिल्म ने कॉर्बेट की किसी भी कहानी का अनुसरण नहीं किया; एक नई कहानी का आविष्कार किया गया था। फिल्म फ्लॉप रही, हालांकि बाघ के कुछ दिलचस्प फुटेज फिल्माए गए। कॉर्बेट ने कहा है कि “सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बाघ था” ‘कॉर्बेट लिगेसी’ का निर्माण उत्तराखंड वन विभाग द्वारा किया गया था और बेदी ब्रदर्स द्वारा निर्देशित किया गया था, जिसमें कॉर्बेट द्वारा शूट की गई मूल फुटेज थी। 1986 में, बीबीसी ने जिम कॉर्बेट की भूमिका में फ्रेडरिक ट्रेव्स के साथ मैन-ईटर्स ऑफ़ इंडिया नामक एक डॉक्यूड्रामा का निर्माण किया।

कॉर्बेट की किताबों पर आधारित एक आईमैक्स फिल्म इंडिया: किंगडम ऑफ द टाइगर, 2002 में क्रिस्टोफर हेअरडाहल द्वारा कॉर्बेट के रूप में अभिनीत थी। 2005 में जेसन फ्लेमिंग अभिनीत रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए पर आधारित एक टीवी फिल्म बनाई गई थी। पूरी शाम प्रिय शिकारी और वाइल्ड लाइफ़ पर रोचक व रोमांचक किताबें देने वाले बेहतरीन इंसान की यादों में गुज़ारी। उनकी सभी किताबें और उनके हिंदी अनुवाद सब आसानी से आमेजोन पर उपलब्ध हैं। जिम कार्बेट के संग्रहालय में गुज़ारी। उनके द्वारा उपयोग की है सामग्रियों को निहारा। उनके फ़ोटोग्राफ़ कुर्सियाँ मेज़ कटलरी सब कुछ देखा। रात आठ बजे के आसपास नैनीताल पहुँचे।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग-२६ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ज़िम कार्बेट-नैनीताल – भाग- २६ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

29 जुलाई को पूर्वाह्न दस बजे हरिद्वार से नैनीताल की यात्रा आरम्भ की। अब हमारी दाहिनी तरफ़ गंगा का तेज बहाव और बाईं तरफ़ हिमालय तराई से जुड़ी पहाड़ियाँ और उनसे निकलती पहाड़ी नदियाँ और इन पर बने पुलों से गुज़रते मनमोहक दृश्य की क़तार साथ लिए बढ़ चले।

आधा घंटा चलने के बाद उत्तर प्रदेश का बिजनौर जनपद लग गया। एक बड़ी बस्ती निज़ामाबाद आई। जिसकी बसावट इतिहास की एक बड़ी घटना से जुड़ी है। पानीपत का तीसरा युद्ध अहमद शाह अब्दाली और मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ के बीच 14 जनवरी 1761 को वर्तमान पानीपत के मैदान मे हुआ जो वर्तमान समय में हरियाणा में है, इस युद्ध में तोपची इब्राहीम ख़ाँ गार्दी ने मराठों का साथ दिया था। दोआब के अफगान रोहिला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया। अवध के तराई इलाक़े पर एक अफ़ग़ान सरदार नजीबुल्लाह का क़ब्ज़ा था। उसने अहमद शाह अब्दाली को भारत पर आक्रमण कर दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने बुलाया था। उसने ही नजीबाबाद बसाया था।

नवाब नजीब-उद-दौला, जिसे नजीब खान के नाम से भी जाना जाता है, एक प्रसिद्ध रोहिल्ला मुस्लिम योद्धा और मुगल साम्राज्य और दुर्रानी साम्राज्य दोनों का रणनीतिकार योद्धा था। नजीब-उद-दौला 18 वीं शताब्दी के रोहिलखंड में एक प्रसिद्ध रोहिल्ला आदिवासी प्रमुख था, जिन्होंने 1740 के दशक में बिजनौर जिले में नजीबाबाद बसाया और “नवाब नजीब-उद-दौला” की उपाधि धारण की। 1757 से 1770 तक वह देहरादून पर शासन करते हुए सहारनपुर का गवर्नर था। वह मुगल सम्राट आलमगीर द्वितीय के एक समर्पित सैनिक था; बाद में अपने करियर में उन्हें नवाब नजीब-उद-दौला के नाम से जाना जाने लगा। उस अवधि के कई स्थापत्य अवशेष नजीबाबाद में हैं, जिन्हें उन्होंने मुगल मंत्री के रूप में अपने करियर की ऊंचाई पर बनवाए थे। उन्होंने सफदरजंग को वजीर के रूप में उत्तराधिकारी बनाया।

नजीब-उ-दौला की मृत्यु के बाद, उनका पुत्र जबीता खान  उनका उत्तराधिकारी बना। उनका कब्रिस्तान आज भी नजीबाबाद में है। नजीबाबाद में सुल्ताना डाकू या “द सुल्तान बैंडिट” का अड्डा था। जिसके खंडहर अभी भी नजीबाबाद में स्थित है। नजीबाबाद शहर को “हिमालय का प्रवेश द्वार” और “शहरों का शहर” के रूप में भी जाना जाता है।

उत्तर प्रदेश का पिछड़ापन उजागर होने लगा। दो घंटे चलने के बाद उत्तराखंड के ऊधमपुर ज़िले का इलाक़ा लगते ही साफ़ सफ़ाई और विकास के दर्शन हुए। एक ढ़ाबे पर खाना खाकर रामनगर की तरफ़ यात्रा शुरू की। अब मुरादाबाद जनपद लग गया।

मुरादाबाद उत्तर प्रदेश में एक ज़िला, आयुक्त और नगर निगम है। मुरादाबाद राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से 167 किमी की दूरी पर और राज्य की राजधानी लखनऊ से 344 किमी उत्तर-पश्चिम में रामगंगा नदी के तट पर स्थित है। मुगल बादशाह शाहजहां के तहत कटेहर के सिपाहसालार रुस्तम खान ने बादशाह के सबसे छोटे बेटे राजकुमार मुराद बख्श के नाम पर बस्ती का मुरादाबाद नाम रखा था। इसकी स्थापना के तुरंत बाद, बादशाह ने संभल को भी कटेहरा के अधीन कर दिया। मुरादाबाद को बाद में 1740 में अली मोहम्मद खान द्वारा रोहिलखंड राज्य में मिला दिया गया था। पहले रोहिल्ला युद्ध में रोहिलों के पतन के बाद 1774 में अवध राज्य के नियंत्रण में आ गया था और फिर 1801 में नवाब द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया था। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, रोहिलखंड क्षेत्र को रामपुर की रियासत और दो जिलों – बरेली और मुरादाबाद में विभाजित किया गया। उत्तर प्रदेश के उसी मुरादाबाद ज़िला की एक बड़ी बस्ती काशीपुर से उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले में प्रवेश किया।

अंग्रेज वन्य जन्तुओं की रक्षा करने के शौकीन थे। सन् 1935 में रामगंगा के इस अंचल को वन्य पशुओं के रक्षार्थ सुरक्षित किया गया। उस समय के गवर्नर मालकम हेली के नाम पर इस पार्क का नाम ‘हेली नेशनल पार्क’ रखा गया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इस पार्क का नाम ‘रामगंगा नेशनल पार्क’ रख दिया गया। विश्व में जिम कार्बेट नाम एक प्रसिद्ध शिकारी के रूप में प्रसिद्ध हो गया था। जिम कार्बेट जहाँ अचूक निशानेबाज थे वहीं वन्य पशुओं के प्रिय साथी भी थे।

आज यह पार्क इतना समृद्ध है कि इसके अतिथि-गृह में 200 अतिथियों को एक साथ ठहराने की व्यवस्था है। यहाँ आज सुन्दर अतिथि गृह, केबिन और टेन्ट उपलब्ध है। खाने का उत्तम प्रबन्ध भी है। ढिकाला में हर प्रकार की सुविधा है तो मुख्य गेट के अतिथि-गृह में भी पर्याप्त व्यवस्था है।

रामनगर रेलवे स्टेशन से 12 कि॰मी॰ की दूरी पर ‘कार्बेट नेशनल पार्क’ का गेट है। रामनगर रेलवे स्टेशन से छोटी गाड़ियों, टैक्सियों और बसों से पार्क तक पहुँचा जा सकता है। बस सेवाएँ भी उपलब्ध हैं। दिल्ली से ढिकाला तक बस आ-जा सकती है। यहाँ पहुँचने के लिए रामनगर कालागढ़ मार्गों का भी प्रयोग किया जा सकता है। दिल्ली से ढिकाला 297 कि॰मी॰ है। दिल्ली से गाजियाबाद- हापुड़- मुरदाबाद- काशीपुर- रामनगर होते हुए ढिकाला तक का मार्ग है। मोटर की सड़क अत्यन्त सुन्दर है।

पहाड़ी हिमालय का तराई क्षेत्र फिर शुरू हो गया। रामनगर पहुँच कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान के गेट पर पहुँचे। जिप्सी की बुकिंग कर हल्की बूंदाबाँदी के बीच तीन घंटे पार्क भ्रमण किया। दोपहर के समय खुले क्षेत्र में हिरण, नीलगाय, मोर दिखे लेकिन राजा साहिब किसी गुफा में आरामतलबगीर थे।

फिर कॉर्बेट संग्रहालय देखा। उनके साहसिक जीवन और लेखन की यादों के साथ कुछ समय वहाँ गुज़ारा। अब हम एक बहुत ही शानदार इंसान जिम कार्बेट के इलाक़े में हैं। उनकी कहानी न सिर्फ़ रोचक बल्कि रोमांचक भी है।

एडवर्ड ज़िम कॉर्बेट (25 जुलाई 1875 – 19 अप्रैल 1955) एक ब्रिटिश शिकारी, वन्यप्रेमी, प्रकृतिवादी और लेखक थे, जिन्होंने भारत में कई आदमखोर बाघों और तेंदुओं का शिकार करके भोलेभाले ग्रामीणों को भययुक्त किया था। उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना में कर्नल का पद धारण किया और उनको तात्कालिक आगरा और अवध के संयुक्त प्रांतों की सरकार द्वारा आदमखोर बाघों और तेंदुओं को मारने के लिए बुलाया जाता था।

जिम कॉर्बेट का जन्म कुमाऊं के नैनीताल शहर में ब्रिटिश परिवार में 25 जुलाई 1875 को हुआ था। वह क्रिस्टोफर विलियम कॉर्बेट और उनकी दूसरी पत्नी मैरी जेन की आठवीं संतान थे। मैरी जेन के पहले पति आगरा के डॉ चार्ल्स जेम्स डॉयल थे, जिनकी मृत्यु 1857  के संग्राम में इटावा में हो गई थी। मैरी जेन अपने तीन बच्चों के साथ नैनीताल भाग कर जान बचाने में कामयाब रहीं। क्रिस्टोफर कॉर्बेट सैन्य सेवा से निवृत्त होने के बाद नैनीताल शहर के पोस्टमास्टर नियुक्त होकर 1862 में नैनीताल चले गए थे। उनकी पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। नैनीताल में उनकी मुलाक़ात मैरी जेन  से हुई। दोनों ने शादी कर ली। उन दोनों के नौ बच्चे हुए, क्रिस्टोफर कॉर्बेट के रिश्तेदार के 1857 संग्राम में मारे गए, रिश्तेदारों के तीन बच्चे और मैरी जेन के तीन बच्चे इस प्रकार पंद्रह बच्चों के भीड़ भरे परिवार में ज़िम का उम्रदराज़ नम्बर ऊपर से चौदहवाँ था। परिवार नैनीताल में रहता था परंतु सर्दियों में तलहटी में चला जाता था, जहाँ उनके पास गाँव में “अरुंडेल” नामक एक झोपड़ी थी, जो अब कालाढुंगी के नाम से एक बड़ी बस्ती हो गई  है।

1891 तक कुमांऊँ कमिश्नरी में कुमांऊँ, गढ़वाल और तराई के तीन जिले शामिल थे। उसके बाद कुमांऊँ को अल्मोड़ा व नैनीताल दो जिलों में बाँटा गया। ट्रैल, लैशिगंटन, बैटन, सर हेनरी रामसे आदि विभिन्न कमिश्नरों ने कुमांऊँ में समय-समय पर विभिन्न सुधार तथा रचनात्मक कार्य किए। जमीन का बंदोबस्त, लगान निर्धारण, न्याय व्यवस्था, शिक्षा का प्रसार, परिवहन के साधनों की उपलब्धता के कारण अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान कुमांऊँ की खूब उन्नति हुई। हेनरी रामसे के विषय में बद्रीदत्त पांडे लिखते हैं- ‘उनको कुमांऊँ का बच्चा-बच्चा जानता है। वे यहाँ के लोगों से हिल-मिल गए थे। घर-घर की बातें जानते थे। पहाड़ी बोली भी बोलते थे। किसानों के घर की मंडुवे की रोटी भी खा लेते थे।’ अंग्रेजों ने शासन व्यवस्था में पर्याप्त सुधार किए, वहीं अपने शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए कठोरतम न्याय व्यवस्था स्थापित की, जो अब नैनीताल के उच्च न्यायालय के रूप में साकार है।

मैरी जेन यूरोपीय लोगों के बीच नैनीताल के सामाजिक जीवन में बहुत प्रभावशाली महिला थीं और वह एक तरह की रियल एस्टेट एजेंट बन गईं। क्रिस्टोफर विलियम 1878 में पोस्टमास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए। 21 अप्रैल 1881 को दिल का दौरा पड़ने के कुछ सप्ताह बाद उनकी मृत्यु हो गई। जिम तब छह वर्ष के थे और उनके सबसे बड़े भाई टॉम ने नैनीताल के पोस्टमास्टर के रूप में पदभार संभाला। बहुत कम उम्र से, जिम कालाढुंगी में अपने घर के आसपास के जंगलों और वन्य जीवन पर मोहित हो गया था। लगातार भ्रमण से उन्होंने अधिकांश जानवरों और पक्षियों को उनकी आवाज़ से पहचानना सीखा। समय के साथ वह एक अच्छा ट्रैकर और शिकारी बन गया। उन्होंने ओक ओपनिंग स्कूल में अध्ययन किया, जो नैनीताल में फिलेंडर स्मिथ कॉलेज, जिसे बाद में हैलेट वॉर स्कूल के रूप में जाना जाता है, और अब बिड़ला विद्या मंदिर, नैनीताल में विलय हो गया। उन्नीस साल की उम्र से पहले उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और बंगाल और उत्तर पश्चिम रेलवे में नौकरी कर ली। शुरू में एक ईंधन निरीक्षक के रूप में काम किया, और बाद में बिहार के मोकामा घाट पर गंगा के पार माल के ट्रांस-शिपमेंट के लिए एक ठेकेदार के रूप में काम किया। जिम कॉर्बेट ने मोकामा घाट पर रेलवे कर्मचारियों के लिए एक स्कूल शुरू किया।

अपने जीवन के दौरान जिम कॉर्बेट ने कई आदमखोर तेंदुओं और बाघों का पता लगाया और उन्हें गोली मार कर इलाक़े के बाशिंदों को डर से निजात दिलाई। लगभग एक दर्जन अच्छी तरह से प्रलेखित आदमखोर थे। कॉर्बेट ने अपनी पुस्तकों में मानव हताहतों का ब्योरा प्रदान किया है, जिसमें रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ, चंपावत टाइगर और द टेंपल टाइगर और कुमाऊं के आदमखोर शामिल हैं। ब्रिटिश और भारतीय सरकारों के रिकॉर्ड के अनुसार इन आदमखोर ने 1,200 से अधिक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मार डाला था। इसलिए आदमखोरों को जीने का अधिकार नहीं था।

पहला नामित आदमखोर बाघ, चंपावत टाइगर अनुमानित 436 प्रलेखित मौतों के लिए जिम्मेदार था। 1910 में पनार तेंदुआ था, जिसने कथित तौर पर 400 लोगों को मार डाला था। 1926 में रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ था, जिसने आठ साल से अधिक समय तक बद्रीनाथ की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों को आतंकित किया, और 126 से अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार बताया गया। उसके द्वारा मारे गए अन्य उल्लेखनीय आदमखोरों में तल्ला-देस आदमखोर, मोहन आदमखोर, ठक आदमखोर, मुक्तेसर आदमखोर और चौगढ़ बाघिन थे।

खतरनाक शिकारी खेल का पीछा करते हुए कॉर्बेट अकेले और पैदल शिकार करना पसंद करते थे। वह अक्सर एक छोटा कुत्ता रॉबिन के साथ शिकार करते थे, जिसके बारे में उन्होंने कुमाऊं के आदमखोरों किताब में लिखा था।

कॉर्बेट ने 1920 के दशक के अंत में अपना पहला कैमरा खरीदा और अपने दोस्त फ्रेडरिक वाल्टर चैंपियन से प्रेरित होकर सिने फिल्म पर बाघों को रिकॉर्ड करना शुरू किया। हालाँकि उन्हें जंगल का घनिष्ठ ज्ञान था, लेकिन अच्छी तस्वीरें प्राप्त करना एक कठिन काम था, क्योंकि जानवर बेहद शर्मीले थे।

उन्होंने कुमाऊं हिल्स में भारत के पहले राष्ट्रीय उद्यान, हैली नेशनल पार्क की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका नाम शुरुआत में लॉर्ड मैल्कम हैली के नाम पर रखा गया था। 323.75 किमी 2 (125.00 वर्ग मील) को कवर करने वाले हैली नेशनल पार्क के रूप में जाना जाने वाला एक आरक्षित क्षेत्र 1936 में बनाया गया था, जब सर मैल्कम हैली संयुक्त प्रांत के गवर्नर थे; और एशिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान अस्तित्व में आया। 1954-55 में रिजर्व का नाम बदलकर रामगंगा नेशनल पार्क कर दिया गया और 1955-56 में इसका नाम बदलकर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क कर दिया गया। इंडोचाइनीज टाइगर का नाम जिम कॉर्बेट के नाम पर 1968 में व्रातिस्लाव माज़क द्वारा रखा गया था, जो दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाले बाघ की नई उप-प्रजातियों का वर्णन करने वाले पहले व्यक्ति थे। 1968 में, बाघों की पांच शेष उप-प्रजातियों में से एक का नाम उनके नाम पर रखा गया था: पैंथेरा टाइग्रिस कॉर्बेटी, इंडोचाइनीज़ टाइगर, जिसे कॉर्बेट का बाघ भी कहा जाता है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग-२५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

हरिद्वार

हरिद्वार शहर गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में स्थित है। हरिद्वार कई प्रमुख तीर्थ स्थलों का प्रवेश द्वार है। धार्मिक आयोजनों में सबसे महत्वपूर्ण कुंभ मेला है, जो हर 12 साल में हरिद्वार में भरता है। हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान लाखों तीर्थयात्री हरिद्वार में गंगा नदी में स्नान कर मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा से आते हैं।

समुद्र मंथन की पौराणिक मान्यता के अनुसार उज्जैन, नासिक और प्रयागराज (इलाहाबाद) के साथ हरिद्वार में अमृत की बूंदें घड़े से झलक गिरी थीं। जहां अमृत गिरा वह स्थान ब्रह्म कुंड हर की पौड़ी (भगवान के कदम) पर स्थित है और इसे हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है। यह कांवड़ तीर्थयात्रा का प्रमुख स्थान भी है, जहाँ से लाखों श्रद्धालु गंगा का पवित्र जल लेकर शिव मंदिरों में चढ़ाने के लिए सैकड़ों मील दूर पैदल जाते हैं।

हरिद्वार भारतीय संस्कृति और विकास का बहुरूपदर्शक प्रस्तुत करता है। पवित्र ग्रंथों में, इसे कपिलस्थान, गंगाद्वार और मायापुरी के रूप में अलग तरह से निर्दिष्ट किया गया है। यह छोटा चार धाम (उत्तराखंड में चार प्रमुख तीर्थ स्थलों, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) के लिए एक मुख्य पड़ाव  है।

शहर के आधुनिक नाम में दो वर्तनी हैं: हरिद्वार और हरद्वार। इन नामों में से प्रत्येक का अपना अर्थ है। संस्कृत में, हिंदू धर्म की प्रचलित भाषा, हरि का अर्थ है “भगवान विष्णु”, जबकि द्वार का अर्थ है “प्रवेश द्वार”। तो, हरिद्वार का अनुवाद “भगवान विष्णु का प्रवेश द्वार” है। क्योंकि यह आमतौर पर वह स्थान है जहां तीर्थयात्री भगवान विष्णु के एक प्रमुख मंदिर बद्रीनाथ के दर्शन करने के लिए अपनी यात्रा शुरू करते हैं। इसी तरह, हर का अर्थ “भगवान शिव” है। इसलिए, हरद्वार “भगवान शिव के प्रवेश द्वार” कैलाश पर्वत, केदारनाथ, सबसे उत्तरी ज्योतिर्लिंग और छोटे चार धाम तीर्थयात्रा सर्किट के स्थलों तक पहुंचने के लिए एक विशिष्ट स्थान है। पौराणिक कथा के अनुसार, हरिद्वार में देवी गंगा अवतरित हुईं जब भगवान शिव ने अपने बालों की जटाओं में गंगा नदी को धारण मृत्यलोक में अवतरित किया था। गंगा नदी, गंगोत्री ग्लेशियर के किनारे पर गौमुख स्रोत से 253 किलोमीटर (157 मील) बहने के बाद, हरिद्वार में पहली बार मैदान में प्रवेश करती है, जिसने शहर को इसका प्राचीन नाम गंगाद्वार दिया।

महाभारत के वनपर्व में ऋषि धौम्य ने युधिष्ठिर को भारत के तीर्थों के बारे में बताया, तब गंगाद्वार, यानी हरिद्वार और कनखल का उल्लेख किया गया है, यह भी उल्लेख है कि अगस्त्य ऋषि ने अपनी पत्नी लोपामुद्रा के साथ यहां तपस्या की थी। कहा जाता है कि ऋषि कपिला का यहां एक आश्रम है, जिसका प्राचीन नाम कपिला या कपिलस्थान है। पौराणिक राजा, भगीरथ, सूर्यवंशी राजा सागर (राम के पूर्वज) के परपोते के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 60,000 पुरखों की मुक्ति के लिए, सतयुग में वर्षों की तपस्या से गंगा नदी को स्वर्ग से नीचे लाए थे। भगवान विष्णु ने हर की पौड़ी की ऊपरी दीवार में स्थापित पत्थर पर अपने पदचिह्न छोड़े थे, जहां हर समय पवित्र गंगा इसे छूती है।

पुरातत्व संबंधी निष्कर्षों से सिद्ध होता है कि इस क्षेत्र में 1700  ईसा पूर्व और 1200 ईसा पूर्व के बीच टेराकोट्टा संस्कृति मौजूद थी। हरिद्वार का प्रथम आधुनिक युग का लिखित प्रमाण एक चीनी यात्री ह्वेनसांग के वृत्तांतों में मिलता है, जो 629 ईस्वी में भारत आया था। राजा हर्षवर्धन (590-647) के शासनकाल के दौरान हरिद्वार को ‘मो-यू-लो’ के रूप में दर्ज किया गया, जिसके अवशेष अभी भी मायापुर में मौजूद हैं, जो आधुनिक शहर के दक्षिण में है। खंडहरों में एक किला और तीन मंदिर हैं, जिन्हें टूटी हुई पत्थर की मूर्तियों से सजाया गया है, उन्होंने मो-यू-लो के उत्तर में एक मंदिर की उपस्थिति का भी उल्लेख किया है, जिसे ‘गंगाद्वारा’ कहा जाता है। 13 जनवरी 1399 को यह शहर तैमूर लैंग (1336-1405) के अधीन आया।

गुरु नानक (1469-1539) ने हरिद्वार की अपनी यात्रा के दौरान, ‘कुशावर्त घाट’ पर स्नान किया, जिसमें प्रसिद्ध, ‘फसलों को पानी देना’ प्रकरण हुआ। गुरुद्वारा (गुरुद्वारा नानकवाड़ा) की दो सिख जन्मसखियों के अनुसार, यह यात्रा 1504 ईस्वी में बैसाखी के दिन हुई थी। बाद में उन्होंने गढ़वाल में कोटद्वार के रास्ते में कनखल का भी दौरा किया। 

आइन-ए-अकबरी, मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान 16 वीं शताब्दी में अबुल फजल द्वारा लिखी गई, इसे माया (मायापुर) के रूप में संदर्भित करती है, जिसे गंगा पर हरद्वार के रूप में जाना जाता है, हिंदुओं के सात पवित्र शहरों के रूप में। इसमें आगे इसका उल्लेख है। अठारह कोस (प्रत्येक लगभग 2 किमी) लंबा है, और चैत्र की 10 तारीख को बड़ी संख्या में तीर्थयात्री इकट्ठा होते हैं। अपनी यात्रा के दौरान और घर पर रहते हुए, मुगल सम्राट, अकबर ने गंगा का पानी पिया जिसे उन्होंने ‘अमरता का पानी’ कहा। सोरुन और बाद में हरिद्वार में सीलबंद जार में भेजने के लिए विशेष लोग तैनात किए गए थे।

मुगल काल के दौरान, हरिद्वार में अकबर के तांबे के सिक्के के लिए टकसाल थी। ऐसा कहा जाता है कि अंबर के राजा मान सिंह ने वर्तमान शहर हरिद्वार की नींव रखी और हर की पौड़ी में घाटों का जीर्णोद्धार भी किया। कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी अस्थियों को भी ब्रह्म कुंड में विसर्जित कर दिया गया था। सम्राट जहांगीर (1596-1627) के शासनकाल में इस शहर का दौरा करने वाले एक अंग्रेज यात्री थॉमस कोर्याट ने इसे शिव की राजधानी ‘हरिद्वार’ के रूप में वर्णित किया है।

सबसे पुराने जीवित शहरों में से एक होने के नाते, हरिद्वार का उल्लेख प्राचीन हिंदू शास्त्रों में मिलता है क्योंकि यह बुद्ध की अवधि से लेकर हाल के ब्रिटिश आगमन तक के जीवन और समय के माध्यम से बसा माना जाता है। हरिद्वार की एक समृद्ध और प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत है। इसमें अभी भी कई पुरानी हवेलियां हैं जिनमें उत्तम भित्ति चित्र और जटिल पत्थर का काम है।

गंगा नदी पर दो प्रमुख बांधों में से एक, भीमगोड़ा, यहाँ स्थित है। 1840 के दशक में निर्मित, यह गंगा के पानी को ऊपरी गंगा नहर की ओर मोड़ता है, जिससे आसपास की भूमि की सिंचाई होती है। हालांकि इससे गंगा के जल प्रवाह में गंभीर गिरावट आई, और अंतर्देशीय जलमार्ग के रूप में गंगा के क्षय का एक प्रमुख कारण है, जो 18 वीं शताब्दी तक ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाजों द्वारा भारी उपयोग किया जाता था। गंगा नहर प्रणाली का मुख्यालय हरिद्वार में स्थित है। अप्रैल 1842 में काम शुरू होने के बाद 1854 में ऊपरी गंगा नहर खोली गई, नहर की अनूठी विशेषता रुड़की में सोलानी नदी के ऊपर आधा किलोमीटर लंबी एक्वाडक्ट है, जो मूल नदी से 25 मीटर (82 फीट) ऊपर नहर को उठाती है।

हरिद्वार संघ नगर पालिका’ का गठन 1868 में किया गया था, जिसमें मायापुर और कनखल के तत्कालीन गाँव शामिल थे। हरिद्वार पहली बार लक्सर के माध्यम से 1886 में रेलवे से जुड़ा था। जब अवध और रोहिलखंड रेलवे लाइन को रुड़की से सहारनपुर तक बढ़ाया गया था, इसे बाद में 1900 में देहरादून तक बढ़ा दिया गया था। 1901 में, इसकी जनसंख्या 26,597 थी और यह संयुक्त प्रांत के सहारनपुर जिले में रुड़की तहसील का एक हिस्सा था, और 1947 में उत्तर प्रदेश के निर्माण तक ऐसा ही रहा।

हरिद्वार तन, मन और आत्मा के थके हुए लोगों का धाम रहा है। यह विभिन्न कला, विज्ञान और संस्कृति के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा है। आयुर्वेदिक दवाओं और हर्बल उपचार के एक महान स्रोत के रूप में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय सहित अद्वितीय गुरुकुल (पारंपरिक शिक्षा का स्कूल) का घर है, जिसमें एक विशाल परिसर है, और पारंपरिक शिक्षा प्रदान कर रहा है। हरिद्वार के विकास ने 1960 के दशक में आधुनिक मंदिर की स्थापना के साथ, 1975 में एक ‘महारत्न पीएसयू’, की स्थापना के साथ एक गति पकड़ी, जो न केवल बीएचईएल की अपनी एक बस्ती को साथ लेकर आई, tबल्कि इस क्षेत्र में सहायक इकाइयों का एक समूह भी है। रुड़की विश्वविद्यालयहै। विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सीखने के सबसे पुराने और सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग-२४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

ऋषिकेश-हरिद्वार

सामान्यत: ऋषिकेश जाने के लिए लोग हरिद्वार से होकर जाते हैं। देहरादून से एक सीधा रास्ता भी हरिद्वार जाता है। मसूरी से भी ऋषिकेश जाना चाहें तो पहाड़ों से गुज़रते आप ऋषिकेश पहुँच सकते हैं। मसूरी से आप सीधे यमनोत्री भी जा सकते हैं। वापसी लौटते समय पौंथी से रास्ता बदल कर टेहरी गढ़वाल से गंगोत्री भी जा सकते हैं। वहाँ से वापस ऋषिकेश आकर रुद्रप्रयाग पहुँचिए। रुद्रप्रयाग से केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा की जा सकती है। इस तरह ऋषिकेश छोटे चार धाम का प्रवेश द्वार है। ऋषिकेश (संस्कृत : हृषीकेश) उत्तराखण्ड के देहरादून जिले का एक हिन्दू तीर्थस्थल है। यह गढ़वाल हिमालय का प्रवेश्द्वार है। ऋषिकेश, हरिद्वार से 25 किमी उत्तर में तथा देहरादून से 43 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित है।

 ऋषिकेश

28 जुलाई 2021 को हम ग्यारह बजे के लगभग देहरादून से निकले। दाहिनी तरफ़ मैदान और बाईं तरफ़ हिमालय के पहाड़ बहुत सुंदर चित्रमय झांकी प्रस्तुत कर रहे थे। देहरादून से ऋषिकेश के रास्ते में एक स्थान थानो और भोगपुर गाँव के बीच एक पहाड़ी बड़ा झरना बरसाती पानी से बह रहा था। सामने से एक कार आती दिखी वह इस पार निकल आई। उसे निकलती देख हमारी टेक्सी के ड्रायवर मुबारक खान ने हमारी गाड़ी भी झरना पार करने को आगे बढ़ा दी। लेकिन हमारी तरफ़ पानी का बहाव तेज था। गाड़ी के आगे पानी का सैलाब बढ़ता गया और गाड़ी निकलने के पहले गाड़ी के चकों ने ज़मीन छोड़ दी और चके रेत में फ़्री घूमने लगे। गाड़ी में पानी भरने लगा। ड्राईवर को गाड़ी का एंजिन चालू रखने बोलकर तुरंत कार का दरवाज़ा खोलकर नीचे उतरना मुनासिब समझा क्योंकि कार के भीतर तेज़ी से पानी भरने लगा था। यदि आटोमेटिक लॉक बंद हो जाए और गाड़ी में पानी भरता रहे तो जान के लाले पड़ सकते थे। इसलिए कार का गेट खोलकर जैसे ही बाहर निकले कार के अंदर तेज़ी से पानी भर गया। सभी को बाहर निकालना पड़ा। सबने मिलकर खूब धक्के लगा कर गाड़ी निकालने की कोशिश की। राहगीरों की भीड़ लगने लगी। दो लड़के मोटर साईकिल से भोगपुर की तरफ़ जा रहे थे। उन्होंने आकर गाड़ी को धक्का देकर निकालने में मदद की। लेकिन गाड़ी हिली तक नहीं।

गाड़ी को धक्का लगाने के प्रयास में हमारा एक मोबाईल पानी में गिर गया। बहुत ढूँढा पर नहीं मिला। सब घबरा गए। बहुत कोशिश की गाड़ी नहीं निकली। दूसरे मोबाईल से उत्तराखंड राज्य के रेस्कू टीम को 112 पर खबर दी। इसके पहले उनकी टीम आए। आठ दस लोग आ गए। उनमें एक बड़ी बोलेरो लोडिंग गाड़ी भी थी। पास में ही जुगाड़ का तार मिल गया। कार को तार से बांध कर गाड़ी खींच कर बाहर निकाली। जान में जान आयी।

धक्का लगाने वालों में एक लड़के का नाम न्यूटन आस्टिन था। वह ईसाई प्रचारक था। उसे पानी में गिरे मोबाईल मिलने पर सूचना देने हेतु अपना नम्बर देकर हम ऋषिकेश की तरफ़ बढ़ गए। ऋषिकेश पहुँचने पर उसका संदेश आया कि हमारा मोबाईल मिल गया है। उसे लेने बीस किलोमीटर दूर उनके घर पहुँचना होगा। हम ऋषिकेश भ्रमण करके उनके घर पहुँचे। उन्होंने चाय नाश्ता कराया और हमारा मोबाईल हमें दिया। हमने उन्हें मिठाई के लिए पाँच सौ रुपए देकर उनसे बिदा ली। गाड़ी में पानी भरने से लग़ेज में रखे हमारे सारे कपड़े गीले हो गए। एक भी कपड़ा सूखा नहीं बचा। 

ऋषिकेश हिमालय का प्रवेश द्वार है। जहाँ गंगा पर्वतमालाओं को पीछे छोड़ समतल धरातल की तरफ तेज़ी से आगे बढ़ती जाती है। ऋषिकेश का शान्त वातावरण कई विख्यात आश्रमों का घर है। उत्तराखण्ड में समुद्र तल से 1360 फीट की ऊँचाई पर स्थित ऋषिकेश भारत के पवित्र तीर्थस्थलों में एक है। हिमालय की निचली पहाड़ियों और प्राकृतिक सुन्दरता से घिरे इस धार्मिक स्थान से प्रवाहित गंगा नदी इसे अतुल्य बनाती है। ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेशद्वार माना जाता है। हर साल यहाँ के आश्रमों में बड़ी संख्या में तीर्थयात्री ध्यान लगाने और मन की शान्ति के लिए आते हैं। विदेशी पर्यटक भी यहाँ आध्यात्मिक सुख की चाह में नियमित रूप से आते रहते हैं।

ऋषिकेश से सम्बन्धित अनेक धार्मिक कथाएँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि समुद्र मन्थन के दौरान निकला विष शिव ने इसी स्थान पर पिया था। विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें नीलकण्ठ के नाम से जाना गया। शिव ने केदार में गंगा को जटा में इसी स्थान पर ऋषि स्वरुप धारण कर केश से गंगा को हरिद्वार में अवतरित किया था। जहाँ गंगा ने विष्णु की चरण वंदना कर मैदान में प्रवेश किया था। एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार भगवान राम ने वनवास के दौरान यहाँ के जंगलों में कुछ समय व्यतीत किया था। रस्सी से बना लक्ष्मण झूला इसका प्रमाण माना जाता है। विक्रमसंवत 1996 में लक्ष्मण झूले का पुनर्निर्माण किया गया। यह भी कहा जाता है कि ऋषि रैभ्य ने यहाँ ईश्वर के दर्शन के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान हृषीकेश के रूप में प्रकट हुए। तब से इस स्थान को ऋषिकेश नाम से जाना जाता है।

गंगा नदी के एक किनारे को दूसरे किनारे से जोड़ता लक्ष्मण झूला नगर की विशिष्ट पहचान है। इसे विक्रम सम्वत् 1996 में वर्तमान रूप दिया गया था। कहा जाता है कि गंगा नदी को पार करने के लिए लक्ष्मण ने इस स्थान पर जूट का झूला बनवाया था। झूले के बीच में पहुँचने पर वह हिलता हुआ प्रतीत होता है। 450 फीट लम्बे इस झूले के समीप ही लक्ष्मण और रघुनाथ मन्दिर हैं। झूले पर खड़े होकर आसपास के खूबसूरत नजारों का आनन्द लिया जा सकता है। लक्ष्मण झूला के समान राम झूला भी नजदीक ही स्थित है। यह झूला शिवानन्द और स्वर्ग आश्रम के बीच बना है। इसलिए इसे शिवानन्द झूला के नाम से भी जाना जाता है। ऋषिकेश मैं गंगाजी के किनारे की रेत बड़ी ही नर्म और मुलायम है, इस पर बैठने से यह माँ की गोद जैसी स्नेहमयी और ममतापूर्ण लगती है, यहाँ बैठकर दर्शन करने मात्र से असीम शान्ति और रामत्व का उदय होने लगता है। ऋषिकेश में स्नान करने का प्रमुख घाट है जहाँ प्रात: काल में अनेक श्रद्धालु पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं। इसी स्थान से गंगा नदी दायीं ओर मुड़ जाती है। गोधूलि वेला में यहाँ की नियमित पवित्र आरती का दृश्य अत्यन्त आकर्षक होता है।

स्वामी विशुद्धानन्द द्वारा स्थापित आश्रम ऋषिकेश का सबसे प्राचीन आश्रम है। स्वामी जी को ‘काली कमली वाले’ नाम से भी जाना जाता था। इस स्थान पर बहुत से सुन्दर मन्दिर बने हुए हैं। यहाँ खाने पीने के अनेक होटल हैं जहाँ केवल शाकाहारी भोजन ही परोसा जाता है। आश्रम के आसपास हस्तशिल्प के सामान की बहुत सी दुकानें हैं।

लगभग 5,500 फीट की ऊँचाई पर स्वर्ग आश्रम की पहाड़ी की चोटी पर नीलकण्ठ महादेव मन्दिर स्थित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मन्थन से निकला विष ग्रहण किया था। विषपान के बाद विष के प्रभाव  से उनका गला नीला पड़ गया था और उन्हें नीलकण्ठ नाम से जाना गया था। मन्दिर परिसर में पानी का एक झरना है जहाँ भक्तगण दर्शन करने से पहले स्नान करते हैं।

भरत मंदिर ऋषिकेश का सबसे प्राचीन मन्दिर है जिसे आदि गुरू शंकराचार्य ने बनवाया था। भगवान राम के छोटे भाई भरत को समर्पित यह मन्दिर त्रिवेणी घाट के निकट ओल्ड टाउन में स्थित है। मन्दिर का मूल रूप 1398 में तैमूर आक्रमण के दौरान क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। हालाँकि मन्दिर की बहुत सी महत्वपूर्ण चीजों को उस हमले के बाद आज तक संरक्षित रखा गया है। मन्दिर के अन्दरूनी गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा एकल शालीग्राम पत्थर पर उकेरी गई है। आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रखा गया श्रीयन्त्र भी यहाँ देखा जा सकता है।

लक्ष्मण झूले को पार करते ही कैलाश निकेतन मन्दिर है। 12 खण्डों में बना यह विशाल मंदिर ऋषिकेश के अन्य मन्दिरों से भिन्न है। इस मंदिर में सभी देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं।

ऋषिकेश से 22 किलोमीटर की दूरी पर 3,000 साल पुरानी वशिष्ठ गुफा बद्रीनाथ-केदारनाथ मार्ग पर स्थित है। इस स्थान पर बहुत से साधुओं विश्राम और ध्यान लगाए देखे जा सकते हैं। कहा जाता है यह स्थान भगवान राम और बहुत से राजाओं के पुरोहित वशिष्ठ का निवास स्थल था। वशिष्ठ गुफा में साधुओं को ध्यानमग्न मुद्रा में देखा जा सकता है। गुफा के भीतर एक शिवलिंग भी स्थापित है। यह जगह पर्यटन के लिये बहुत मशहूर है।

राम झूला पार करते ही गीता भवन है जिसे 2007 में श्री जयदयाल गोयन्दकाजी ने बनवाया था। यहां रामायण और महाभारत के चित्रों से सजी दीवारें इस स्थान को आकर्षण बनाती हैं। यहां एक आयुर्वेदिक डिस्पेन्सरी और गीताप्रेस गोरखपुर की एक शाखा भी है। प्रवचन और कीर्तन मन्दिर की नियमित क्रियाएँ हैं। शाम को यहां भक्ति संगीत का आनन्द लिया जा सकता है। तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए यहाँ सैकड़ों कमरे हैं।

ऋषिकेश से नीलकण्ठ मार्ग के बीच मोहनचट्टी स्थान आता है जिसका नाम है फूलचट्टी, यह स्थान बहुत ही शान्त वातावरण का है यहाँ चारो और सुन्दर वादियाँ है। नीलकण्ठ मार्ग पर मोहनचट्टी आकर्षण का केंद्र बनता है |

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का अस्पताल परिसर 400 मीटर के दायरे में फैला है देखने योग्य भव्य ईमारत है, इसके कई भाग हैं-ट्रॉमा सेण्टर, Emergency आदि।

ऋषिकेश घूमकर आठ बजे रात को हरिद्वार लेवल होटल में रुके। होटल के चारों तरफ़ खाने-पीने की दुकानों का अम्बार लगा था लेकिन बाहर निकलने को कपड़े ही नहीं थे इसलिए होटल के ज़रूरत से ज़्यादा महँगे मीनू कार्ड से भिंडी मसाला और चपाती का सेवन कमरे में किया।

जब सामान खोल कर देखा तो सभी कपड़े और अन्य सामान पानी से तरबितर मिले। यह तय किया कि सभी कपड़ों की गीज़र के गर्म पानी में निथार कर सुखाए जाएँ। दस-बारह हैंगर मंगा कर उनमें कपड़े फँसाकर पंखे की हवा में सूखने डाले। कपड़ों से टपकता पानी देख श्रीमती जी ने एक लम्बी रस्सी ढूँढ निकाली उसे कमरे में आरपार बांधने की कोशिश दो घंटे होती रही लेकिन कपड़ों के वज़न से रस्सी टूट जाती थी। हारकर कपड़ों को यहाँ वहाँ फैलाया। सौम्या ने एक प्रेस करने वाली स्त्री मंगा ली। दूसरे दिन पहनने के लिए एक जींस और दो टॉप प्रेस से सुखा लिए। दो बजे रात तक यही सब चलता रहा।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग-२३ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग- २३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

सहस्त्रधारा देहरादून

सुबह दस बजे गेस्ट हाऊस से रवाना हुए। देहरादून से राजपुर सड़क से दाहिनी तरफ़ के रास्ते पर 16 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है रामपुर। इस गांव में बहने वाला गंधक झरना अपनी औषधीय गुणों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है की त्वचा से जुड़ी बीमारियों के लिये इस झरने से बहने वाला पानी बहुत उपयोगी होता है। विश्वास है कि इस झरने के पानी से नहाने पर कई तरह के त्वचा रोगों को खत्म किया जा सकता है।

पहाड़ियों के बीच से रिमझिम बारिश के साथ चलते हुए सहस्त्रधारा पहुँच गए। इस जगह का नाम सहस्त्रधारा रखे जाने का कारण बहुत रोचक है, इस जगह के पास स्थित पहाड़ो में बहुत छोटी-छोटी गुफाएं बनी है। इन सभी छोटी-छोटी गुफाओं के अंदर से बूंदों के रूप मे लगातार पानी टपकता रहता है। यह पानी एकत्र होकर बहुत सारी छोटी-छोटी धारा के रूप में आगे बढ़ता है। यहाँ बहने वाली पानी की छोटी-छोटी धाराएँ तलहटी में पहुंच कर एक बड़ी धारा का रूप ले लेती है इस वजह से इस जगह को सहस्त्रधारा कहा जाता है। पहाड़ो की तलहटी में बसे होने की वजह से प्राकृतिक रूप से भी बहुत ज्यादा सुंदर और मनमोहक जगह है। वर्तमान में सहस्त्रधारा एक पारिवारिक पिकनिक स्पॉट के रूप में बहुत ज्यादा प्रसिद्ध है।

मालसी डियर पार्क देहरादून

सहस्त्रधारा से देहरादून वापस लौटते समय राजपुर सड़क पर स्थित मालसी डियर पार्क पहुँचे। 22 एकड़ में फैला हुआ यह डियर पार्क परिवार और बच्चों के लिए सबसे शानदार जगहों में से एक है। इस पार्क के अंदर डियर के अलावा अन्य वन्यजीवों में मोर और नीलगाय, जैसे जानवर और पक्षी दिखाई देते है। बच्चों के मनोरंजन के लिए पार्क कुछ झूले भी लगाए हुए है। सप्ताहांत में स्थानीय निवासी मालसी डियर पार्क में आना बेहद पसंद करते है।

रोबर्स केव (गुचुपानी) देहरादून

रोबर्स केव देहरादून से 8 किलोमीटर दूर अनारवाला गांव में स्थित देहरादून का सबसे ज्यादा रोमांचक पर्यटक स्थल है। स्थानीय निवासी रोबर्स केव को गुचुपानी के नाम से पुकारते है। रोबर्स केव एक प्राकृतिक गुफा है जिसकी लंबाई लगभग 600 मीटर है।

इस गुफा की सबसे रोमांचक बात यह है की इस गुफा में पूरे साल घुटनों तक पानी बहता रहता है, इसलिए जब आप इस गुफा में प्रवेश करते है तो आपको एक अलग ही रोमांच महसूस होता है। आप जैसे-जैसे रोबर्स केव में अंदर जाते है तो कई जगह गुफा सँकरी हो जाती है। इस गुफा में वैसे तो पानी के मुख्य स्त्रोत अभी तक पता नहीं चला है लेकिन गुफा के अंदर लगभग 10 मीटर ऊंचाई से एक झरना गिरता है।

स्थानीय निवासियों का ऐसा मानना है की बहुत पहले इस जगह का उपयोग चोर और डाकू छुपने के लिए किया करते थे इस वजह से इस गुफा को रोबर्स केव के नाम से जाना जाने लगा। रोबर्स केव के आसपास स्थानीय निवासियों ने खाने पीने की दुकाने लगा रखी है। गुफा में आप के जूते या सैंडल खराब ना हो इसलिए अंदर पानी में चलने के लिए रोबर्स केव के पास आपको चप्पल भी किराए पर मिल जाएगी।

टपकेश्वर मंदिर देहरादून –

देहरादून से 5.5 किलोमीटर दूर गढ़ी केंट में एक प्राचीन शिव मंदिर है। यह प्राचीन शिव मंदिर गढ़ी केंट में बहने वाली एक छोटी नदी के किनारे पर बना हुआ है। इस प्राचीन मंदिर को टपकेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। टपकेश्वर मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा का जन्म इसी स्थान पर हुआ था।

आज भी इस प्राचीन शिवलिंग पर चट्टान से लगातार पानी की बूंदे टपकती रहती है इसलिये इस मंदिर को टपकेश्वर महादेव के नाम से पुकारा जाता है। टपकेश्वर महादेव मंदिर के पास एक छोटी नदी भी बहती है जिसमें यहाँ आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु नहाने का आनदं भी ले सकते है।

इस मंदिर और इस स्थान को लेकर गुरु द्रोण और उनके पुत्र अश्वथामा को लेकर एक रोचक कथा प्रचलित है। एक बार की बात है गुरु द्रोण के पुत्र अश्वथामा को एक बार बहुत जोर से भूख लगती है तो वह अपने माता पिता से पीने के लिए दूध मांगते है। गुरु द्रोण अपने पुत्र के दूध की मांग को पूरा करने में असमर्थता दिखाते है। गुरु द्रोण की इस बात से दुखी होकर अश्वथामा उसी समय भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये तपस्या करने लग जाते है। कुछ समय के बाद अश्वथामा की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान शिव तपस्या स्थल पर पर दूध की धारा बहा देते है और इस प्रकार अश्वथामा की भूख शान्त होती है। कहते हैं उस समय के बाद से ही यहाँ स्थित गुफा की चट्टान से शिवलिंग पर दूध की बूंदे टपक रही है। हमें दूध की बूँदें नहीं दिखीं। वहाँ एक पंडित जी ने बताया कि पापियों को दूध की बूँदें नहीं दिखतीं।

फारेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट देहरादून

देहरादून में स्थित वन अनुसंधान संस्थान भारत का सबसे बड़ी प्राकृतिक अनुसंधान संस्थान है। देहरादून के घण्टाघर से वन अनुसंधान संस्थान की दूरी लगभग 6 किलोमीटर है। भारत में इसका निर्माण 1906 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान किया गया था। इस संस्थान की इमारत अपने ग्रीक-रोमन वास्तुशैली में बने हुए होने के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्घ है। वन अनुसंधान संस्थान की इमारत का आकार भी इसकी प्रसिद्ध का बहुत बड़ा कारण है, यह इमारत लगभग 450 हेक्टेयर क्षेत्र में बनी हुई है।

वन अनुसंधान संस्थान में वानिकी से जुड़े छह संग्रहालय बने हुए है। इन छह संग्रहालय में जंगल-विज्ञान, कीट-विज्ञान, सामाजिक वानिकी, गैर-लकड़ी से बने वन उत्पाद, प्रकृति विज्ञान और लकड़ी की अलग-अलग किस्म का प्रदर्शन किया गया है। इस संस्थान में संग्रहालय के अलावा यहाँ बना हुआ उद्यान भी पर्यटकों के आकर्षण का विशेष केंद्र रहता है। फ़िल्म इंडस्ट्री की कुछ बड़ी फिल्मों का फिल्माकंन भी इसी वन अनुसंधान संस्थान में किया गया है। वनस्पति विज्ञान और जंगल विज्ञान से जुड़े हुए लोगों के लिए यह संस्थान किसी खजाने से कम नहीं है। वन अनुसंधान संस्थान के अंदर फोटोग्राफी पूरी तरह से प्रतिबंधित है। 

झंडा जी दरबार साहिब

देहरादून में झंडा दरबार साहिब सिख समुदाय की धार्मिक आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है, और देहरादून के नामकरण का इतिहास भी झंडा गुरु दरबार साहिब से जुड़ा हुआ है। बाबा राम राय (1745-1687) सातवें सिख गुरु हर राय के सबसे बड़े पुत्र और आठवें गुरु हर कृष्ण दास के भाई थे। औरंगज़ेब ने आठवें गुरु हर कृष्ण दास और राम राय में फूट डालने के उद्देश्य से राम राय को दिल्ली में सिक्ख पंथ की जड़ें मज़बूत करने हेतु कई सहूलियतें दीं और जिस जगह आज देहरादून आबाद है वहाँ गुरुद्वारा स्थापना हेतु मदद दी।

मंदिर का केंद्रीय परिसर गुरु राम राय की मृत्यु के बारह साल बाद 1699 में पूरा हुआ था, और पूरा संरचनात्मक कार्य 1703 और 1706 के बीच समाप्त हो गया था; माना जाता है कि संरचना के पूरा होने के बाद भी अलंकरण और पेंटिंग का काम लंबे समय तक चलता रहा। गुरु राम राय की पत्नी माता पंजाब कौर ने निर्माण कार्य की देखरेख की और 1741/42 में अपनी मृत्यु तक दरबार के मामलों का प्रबंधन किया।

राम राय सिख धर्म में एक अपरंपरागत संप्रदाय, रामरायस के संस्थापक थे। उन्होंने गुरु राम राय दरबार साहिब की स्थापना की, जो देहरादून में एक गुरुद्वारा है जिसे इंडो-इस्लामिक वास्तुकला शैली में बनाया गया था। उन्होंने गढ़वाल के समकालीन महाराजा फतेह शाह से राम राय को हर संभव मदद देने के लिए कहा। प्रारंभ में, धमावाला में एक गुरुद्वारा (मंदिर) बनाया गया था। वर्तमान भवन, गुरु राम राय दरबार साहिब का निर्माण 1707 में पूरा हुआ था। दीवारों पर देवी-देवताओं, संतों, संतों और धार्मिक कहानियों के चित्र हैं। फूलों और पत्तियों, जानवरों और पक्षियों, पेड़ों, नुकीली नाकों वाले समान चेहरे और मेहराबों पर बड़ी-बड़ी आँखों के चित्र हैं जो कांगड़ा-गुलेर कला और मुगल कला की रंग योजना के प्रतीक हैं। ऊंची मीनारें और गोल शिखर मुस्लिम वास्तुकला के नमूने हैं। सामने 230 गुणा 80 फीट का विशाल तालाब वर्षों से पानी की कमी के कारण सूख गया था। लोग कूड़ा फेंक रहे थे; इसे पुनर्निर्मित और पुनर्जीवित किया गया है। मुगल शैली से बनी हुई एक इमारत है।

झंडा गुरु दरबार साहिब में प्रत्येक वर्ष झंडा पर्व मनाया जाता है। देहरादून में होने वाला यह झंडा पर्व होली के दिन से पांच दिन बाद मनाया जाता है जो आठ दिन तक चलता है। यहाँ होने वाले झंडा पर्व में लाखों की संख्या में गुरु राम राय के अनुयायी और सिख धर्म से जुड़े हुए श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते है।

बुद्ध मोनेस्ट्री

देहरादून से 11 किलोमीटर दूर स्थित बुद्ध मोनेस्ट्री जिसे Mindrolling Monastery के नाम से भी जाना जाता है। बौद्ध धर्म को बढ़ावा देने के लिये इस बौद्ध मंदिर का निर्माण कुछ बौद्ध भिक्षुओं द्वारा गया। जापानी वास्तुशैली में निर्मित इस बौद्ध मंदिर का निर्माण कार्य 1965 में पूरा हुआ।  

बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले और बहुत सारे देशी और विदेशी पर्यटक आते है। इस बौद्ध मंदिर के प्रमुख आकर्षण केन्द्र यहाँ स्थित 103 फ़ीट ऊंची भगवान बुद्ध की प्रतिमा और मंदिर के अंदर बनाई गई सुंदर पेंटिंग्स है। इन पेंटिग्स में भगवान बुद्ध के पूरे जीवन को बहुत ही सुंदर तरीके से उकेरा गया है।

इसके अलावा इस मंदिर की पांच मंजिला इमारत भी अपने वास्तुकला की वजह से पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती है। इस मंदिर की इमारत की ऊंचाई कुल 220 फ़ीट है और मंदिर की चौथी मंजिल से बहुत ही मन मोहक प्राकृतिक दृश्य दिखाई देते है। यहाँ आने वाले पर्यटकों की सुविधा के लिये मंदिर के परिसर में ही खाने पीने की दुकानें बनी हुई है और अगर आप की बौद्ध धर्म में रुचि है तो आप यहाँ से बौद्ध धर्म से जुड़ी पुस्तकें भी खरीद सकते है।

देहरादून के आस पास घूमने के लिए कुछ प्रसिद्ध पर्यटन स्थल  – धनोल्टी, नई टिहरी, टिहरी झील, ऋषिकेश, नरेंद्र नगर, नाग टिब्बा, राजाजी राष्ट्रीय उद्यान, मालसी डियर पार्क, मसूरी, हरिद्वार, चम्बा, दशावतार मंदिर, जोरांडा फाल्स, बरेहिपानी और न्यू टेहरी टाउनशिप, माताटीला डैम और देओगढ़ किला है। पर्यटक यहाँ पर कई एडवेंचर स्पोर्ट जैसे रिवर राफ्टिंग, बंजी जम्पिंग, रॉक क्लाइम्बिंग, हाईकिंग और ट्रैकिंग का आनंद भी ले सकते हैं। पेशेवर कैंप पर्यटकों को रुकने के साथ साथ अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध करते है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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