(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६२ ☆ देश-परदेश – विंबलडन की विंडम्बना ☆ श्री राकेश कुमार ☆
लॉन टेनिस खेल की सबसे पुरानी प्रतियोगिता प्रतिवर्ष लंदन शहर में बरसो से आयोजित होती आ रही है। प्रतिवर्ष जून के अंतिम सप्ताह से आरंभ होकर जुलाई के मध्य तक चलने वाली प्रतियोगिता जब लंदन में आयोजित होती है, तो वहां का मौसम भी खुशनुमा रहता है।
हमारे देश में इस समय गर्मी चरम पर रहती है। देश के अधिकतर अमीरजादे, क्रिकेटर और बॉलीवुड के बिगड़ैल गर्मी से निजात पाने के लिए विंबलडन खेल देखने के बहाने लंदन शहर चले जाते हैं। इनके पास दौलत इतनी अधिक है, कि खर्च नहीं हो पाती है।
बॉलीवुड के एक प्रसिद्ध लेखक/ गीतकार जो शरीर के दर्द दूर करने की दवा का टीवी पर विज्ञापन भी करते है, विंबलडन देखने गए हुए हैं। उनकी वर्तमान पत्नी और पूर्व पत्नी का पुत्र भी अपनी वर्तमान पत्नी के साथ लंदन गया हुआ है। मीडिया में छाए रहने के लिए हवाई यात्रा कंपनी की तारीफ में भी कशीदे पढ़ दिए, कि इनके वायुयान में बैठने के लिए बहुत खुला स्थान उपलब्ध है, ये नहीं बताया कि वो “बिजनेस क्लास” से यात्रा कर रहें हैं।
इस खेल को देखने अधिकतर वो व्यक्ति जाते हैं, जो घर में एक ग्लास पानी का स्वयं उठाकर नहीं पीते हैं। रईसों की दुनिया में विंबलडन प्रतियोगिता देखना अब एक “स्टेटस” की श्रेणी में आता है। एक लड़के के विवाह बायो डाटा में भी लिखा हुआ था, कि लड़का तीन बार विंबलडन देखने जा चुका है। ऐसे लड़के जीवन में घर के कभी फ्यूज बल्ब तक नहीं बदले होंगे।
विंबलडन प्रतियोगिता में बॉल उठाने के लिए युवा लड़के और लड़कियां सेवा में रहती हैं, ताकि खिलाड़ी खेल पर अधिक ध्यान दे सकें। खिलाड़ियों के जैसे ये युवा भी बहुत फुर्तीले और फिट रहते हैं।
गोल्फ, लॉन टेनिस, क्रिकेट जैसे अंग्रेजों के खेल में सहायक की आवश्यकता होती है। अंग्रेजों ने तो पूरी दुनिया पर लंबे समय तक राज़ कर गुलामों से ऐसे कार्य करवाते थे। अब तो अंग्रेज़ अपने देश तक ही सीमित हो चुके हैं, लेकिन गुलामों/नौकर रखने की आदतें अभी भी हैं। सही कहा गया है” bad habits die hard”.
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३२० ☆ सोना और सोना…
‘समय बलवान, समय का करो सम्मान’, बचपन में इस तरह की अनेक कहावतें सुनते थे। बाल मन कच्ची मिट्टी होता है, जल्दी ग्रहण करता है। जो ग्रहण करता है, वही अंकुरित होता है। जीवनमूल्यों के बीज, जीवनमूल्यों के वृक्ष खड़े करते हैं।
अब अनेक बार किशोरों और युवाओं को मोबाइल पर बात करते सुनते हैं,- क्या चल रहा है?… कुछ खास नहीं, बस टीपी।.. टीपी अर्थात टाइमपास। आश्चर्य तो तब होता है जब अनेक पत्र-पत्रिकाओं के नाम भी टाइमपास, फुल टाइमपास, ऑनली टाइमपास, हँड्रेड परसेंट टाइमपास देखते-सुनते हैं। वैचारिक दिशा और दशा के संदर्भ में ये शीर्षक बहुत कुछ कह देते हैं।
वस्तुतः व्यक्ति अपनी दिशा और दशा का निर्धारक स्वयं ही होता है। गोस्वामी जी ने लिखा है- “बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।” मनुष्य तन पाना सौभाग्य की बात है। देवताओं के लिए भी यह मनुष्य योनि पाना दुर्लभ है। वस्तुत: ईश्वर से साक्षात्कार की सारी संभावनाएँ इसी योनि में हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि यह योनि नश्वर है।
योनि नश्वर है, अर्थात कुछ समय के लिए ही मिली है। यह समय भी अनिश्चित है। किसका समय कब पूरा होगा, यह केवल समय ही जानता है। ऐसे में क्षण-क्षण का अपितु क्षणांश का भी जीवन में बहुत महत्व है। जिसने समय का मान किया, उसने जीवन का सदुपयोग किया। जिसने समय का भान नहीं रखा, उसे जीवन ने कहीं का नहीं रखा। अपनी कविता ‘क्षण-क्षण’ का स्मरण हो आता है। कविता कहती है, “मेरे इर्द-गिर्द / बिखरे पड़े हज़ारों क्षण / हर क्षण खिलते/ हर क्षण बुढ़ाते क्षण/ मैं उठा/ हर क्षण को तह कर / करीने से समेटने लगा / कई जोड़ी आँखों में / प्रश्न भी उतरने लगा / क्षण समेटने का / दुस्साहस कर रहा हूँ /मैं यह क्या कर रहा हूँ?..अजेय भाव से मुस्कराता / मैं निशब्द / कुछ कह न सका/ समय साक्षी है / परास्त वही हुआ जो/ अपने समय को सहेज न सका।”
एक प्रसंग के माध्यम से इसे बेहतर समझने का प्रयास करते हैं। साधु महाराज के गुरुकुल में एक अत्यंत आलसी विद्यार्थी था। हमेशा टीपी में लगा रहता। गुरुजी ने उसका आलस्य दूर करने के अनेक प्रयास किए पर सब व्यर्थ। एक दिन गुरुजी ने एक पत्थर उसके हाथ में देकर कहा,” वत्स मैं तुझ से बहुत प्रसन्न हूँ। यह पारस पत्थर है। इसके द्वारा लोहे से सोना बनाया जा सकता है। मैं दो दिन के लिए आश्रम से बाहर जा रहा हूँ। दो दिन में चाहे उतना सोना बना लेना। कल सूर्यास्त के समय लौट कर पारस वापस ले लूँगा।” गुरु जी चले गए। आलसी चेले ने सोचा, दो दिन का समय है। गुरु जी नहीं हैं, सो आज का दिन तो सो लेते हैं, कल बाजार से लोहा ले आएँगे और उसके बाद चाहिए उतना सोना बना कर लेंगे। पहले दिन तो सोने पर उसका उसका सोना भारी पड़ा। अगले दिन सुबह नाश्ते, दोपहर का भोजन, बाजार जाने का लक्ष्य इस सबके नाम पर टीपी करते सूर्यास्त हो गया। हाथ में आया सोना, सोने के चलते खोना पड़ा।
स्मरण रहे, यह पारस कुछ समय के लिए हरेक को मिलता है। उस समय सोना और सोना में से अपना विकल्प भी हरेक को चुनना पड़ता है। इति।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी
इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम:
मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें
सरस्वती वंदना
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सेवा …“।)
अभी अभी # ८९१ ⇒ आलेख – सेवा श्री प्रदीप शर्मा
Service •
प्रेम में अगर ढाई अक्षर हैं, तो सेवा में तो सिर्फ दो ही अक्षर हैं। प्रेम का पाठ पढ़कर अगर कोई पंडित हो सकता है तो सेवा करने से उसे मेवा भी मिल सकता है। पोथी पढ़ पढ़कर अगर कोई पंडितजी बन जाए और ढाई आखर की डिग्री ले आए, तो वह शासकीय सेवा में लग जाए और प्रेम से मेवा खाए। A, B, C, D, E, F, G, क्लास में बैठे पंडित जी।
आओ प्यार करें, तो बहुत सुना है, आओ सेवा करें, कोई नहीं कहता। इसका तो यही मतलब हुआ कि जितना आसान प्यार है, उतनी ही कठिन सेवा है। अगर भक्तों ने प्यार ही पूजा है, का उदघोष किया, तो किसी ने काम ही पूजा है (work is worship) का नारा भी दे दिया। हमारे योगेश्वर कृष्ण ने अगर अपनी बाल लीलाओं में प्रेम का सन्देश दिया तो कुरुक्षेत्र में निष्काम कर्म का ज्ञान भी दिया।।
अगर कर्म को ईश्वर की सेवा समझकर किया जाए, तो वह निष्काम हो जाता है। सेवा के भाव में, नि:स्वार्थ भाव निहित है।
अगर आप प्रेम से कहीं शासकीय सेवा कर रहे हो, तो आप दोनों काम कर रहे हैं, प्रेम का प्रेम और सेवा की सेवा और ऊपर से तन की सेवा के लिए वेतन रूपी मेवा भी।
सेवा शब्द बड़ा व्यापक है। सेवा को अंग्रेजी में सर्विस भी कहते हैं। नौकरी चाकरी अगर मजबूरी का शब्द है तो सेवक एक सम्मानसूचक उद्बोधन है। अंग्रेजी में जो सेवा करते हैं, उन्हें सर्वेंट कहते हैं। जो अधिकारपूर्वक सेवा करते हैं, वे सिविल सर्वेंट कहलाते हैं। हमने उन्हें राजपत्रित अधिकारी के पद पर सुशोभित कर दिया।।
जो ईश्वर की सेवा करते हैं, वे दास भी कहलाते हैं। कल ही एक ईश्वर के सेवक, सुर के सेवक, येशुदास का जन्मदिन था। अगर एक दास हो तो ठीक, भक्ति काल में तो सूरदास, तुलसीदास, रैदास, हरिदास, कुंभनदास के अलावा कई अष्ट छाप के कवि अपने इष्ट के दास थे। आज भी आपको घर घर असंख्य मात्रा में रामदास, कृष्णदास, रामस्वरूप और भगवानदास जैसे दास नजर आ जाएंगे।
अजी साहब, दास की तो बस पूछिए ही मत। हमारा दासबोध तो देखिए, हमने दासप्रथा ही अपना ली थी। सब मालिकों, जमींदारों, जागीरदारों के अपने अपने दास थे। राजा महाराजा हों और उनकी दास दासियां ना हो, असंभव। हमारे मंदिरों का भी जवाब नहीं।
दासी तो ठीक, देवदासी तक हमारे मंदिरों की शोभा बढ़ाती थी।।
आज अगर आप कहीं सर्विस करते हैं तो ईमानदारी से काम करते हैं, पसीना बहाते हैं, सुबह से शाम तक मेहनत करते हैं, लेकिन अपना स्वाभिमान गिरवी नहीं रखते। आप नौकरी ही करते हैं किसी की चाकरी नहीं। आजकल मुफ्त की तनख्वाह वैसे भी कौन देता है। हम कोई विधायक, सांसद, नेता, अथवा मंत्री जैसे सेवक तो हैं नहीं।
ये भक्त भी बड़े अजीब होते हैं। कोई रामभक्त हनुमान राम काज को आतुर, तो कोई मीरा अरज लगाती है, श्याम मोहे चाकर राखो जी। कोई भक्त है, कोई दास है, कोई सेवक तो कोई चाकर है। अगर आप ढूंढेंगे तो शायद किंकर भी मिल जाए। लेकिन मुफ्त में कौन आजकल without any cause कामकाज करता है, और किसी की चाकरी, तो कतई नहीं। वैसे भी किसी नेता की चाकरी भी, नसीब वाले को ही मिलती है।।
आजकल मुफ्त सेवाओं पर प्रतिबंध है। सभी सेवाएं सशुल्क हैं। जो कभी सेवा शुल्क था, आज वही जीएसटी कहलाता है। आज के युग में हर सेवा एक सुविधा है। अगर कहीं किसी सेवा सुविधा में त्रुटि है तो कंज्यूमर फोरम, यानी उपभोक्ता समिति भी है।
हर सुविधा भोगी एक उपभोक्ता है। आजकल तो 4 जी और 5 जी सुविधा भी उपलब्ध है। आप बस, सेवा का अवसर दें।
सेवा से पैसा ही नहीं, पुण्य भी कमाया जा सकता है।
सोचो साथ क्या जाएगा, अगर आपके पास पैसा है तो दीन दुखी, दिव्यांगो की सेवा ही कर दें, दान, चंदा, ही नहीं आप स्वयं भी सेवा कार्य में अपने आपको समर्पित कर सकते हैं।
शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो, जिसमें निःस्वार्थ सेवकों की कमी हो।।
छोटा मुंह बड़ी बात, समाज सेवा से बड़ी कोई निःस्वार्थ सेवा नहीं। सेवक बनें, देशसेवक बनें, स्वयंसेवक बनें। हमारी अगर बोली कभी फल जाए तो हम तो यह भी कह गुजरें, आप देश के प्रधान सेवक बन जाएं, कांटों का ताज आपके सर पर हो, लेकिन फिर भी आप तन, मन और धन से देशवासियों की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दें।
शुरुआत आज से ही करें।
बस बिना किसी लोभ लालच के सेवा में जुट जाएं। विकास की चकाचौंध में आज भी कई ऐसे घर हैं, जहां अंधेरा है, कहीं अशिक्षा का, तो कहीं गरीबी और मुफलिसी का।।
☆ आलेख ☆ ~ रिश्ते की भावभीनी खुशबू से सराबोर होते थे हमारे तीज, त्यौहार एवं संस्कृतियाँ ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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फेसबुक पर वायरल हो रहे इस वीडियो को देखकर मुझे अतीत की याद आ रही है। एक पिता का अपने पुत्री के के लिए सर पर चूड़ा एवं हाथ में दही का कमंडल लेकर जा रहा है। व वास्तव में यह भाउक कर देने वाली और अतीत को याद करने वाली आज के जमाने में विरले ही देखी जाने वाली तस्वीर है। यूट्यूब से जुड़े लोग इस तस्वीर के अलग मायने निकालते हुए, इसमें संभवत: कहीं कुछ देखते हैं, लेकिन मैं तो समझता हूं कि उन्होंने इस भावुक करने वाली तस्वीर को खींच कर, युवकों के लिए एक नई चीज और हम सबके लिए एक पुरानी याद जरूर ताज की है। एक पिता का पुत्री के प्रति कितना प्रेम हो सकता है और किस स्तर का हो सकता है यह इसमें स्पष्ट रूप से झलकता है। पुत्री के प्रति उसका स्नेह और श्रम साफ साफ देखा जा सकता है। मैं यह नहीं कह रहा कि आज के युग में यह प्रेम कही से भी कमतर है। लेकिन इस चित्र दिख रहा प्रेम, प्रेम की पराकाष्ठा है।
जैसा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अँचल में बेटी के यहां यहाँ तीज और खिचड़ी, भेजने की प्रथा है लेकिन दही और चूड़ा जो कि पूर्वांचल और बिहार में खिचड़ी का खास व्यंजन है इसे पहुचाने का सीधा-साधा अर्थ यह है कि हर पिता का या परिवार का उद्देश्य होता है कि यदि हमारे घर में दूध दही की प्रचुर मात्रा में है और कोई तीज त्यौहार है तो यह घर पर बनाए जाने वाला व्यंजन, अपने प्रियजन के पास तो जरूर पहुंचे।
यहां तक कि इसके अंदर जो प्रेम भाव होता है उसका मूल्य नहीं लगाया जा सकता। उस व्यंजन को ले जाने का खर्च बाजार से खरीद कर देने से कहीं ज्यादा हो जाएगा, लेकिन जो आनंद उसको लेकर पहुंचने में और उसे देने में है वह शायद रुपए पैसा या खरीद कर देने में तो बिल्कुल ही नहीं है।
पूर्व के काल में पिता अपने पुत्री के घर कुछ लेकर ही जाता था, वह कभी खाली हाथ जाता ही नहीं था। उसकी मंशा यह होती थी कि मैं वहां सिर्फ दूंगा ही दूंगा। मैं बेटी के यहाँ से कुछ भी नहीं लाऊंगा। यहां तक कि वह अपने बेटी के घर में भोजन भी नहीं करता था और अक्सर देखा जाता था कि यदि पिता बेटी के घर में एक रात ठहर गया तो बेटी या उसके ससुराल वाले किसी दूसरे के घर से भोजन – पानी मंगा कर भोजन कराते थी
हमारे तीज त्योहारों की मौलिकता कैसी है, जिसमें की एक पिता खाने पीने की चीज लेकर बिना शर्म किये सिर पर बोरी और हाथ में दही का कमंडल लेकर निकल जाता ही जाता है। यह प्राचीन परंपरा यद्यपि समाप्त की ओर बढ़ चली है, या यूँ कहें कि लगभग समाप्त ही हो चुकी है। पिता का बेटी के घर आना जाना बेटी का पिता के घर आना जाना किसी समय या किसी त्योहार पर आधारित नहीं है।
अब मैं आगे का जो दृष्टांत बताने जा रहा हूं इसे ध्यान से पढियेगा ओर समझिएगा। विगत दिनों में अपने गांव बलिया गया था और जब लौटने लगा तो मेरे ससुराल के लोगों ने घर का चुरा तिलवा लिया अच्छा आदि पैक करके हमारे साथ रखवा दिया। यानी मेरे घर इसी खिचड़ी परंपरा के अनुसार कुछ खाने पीने की चीज आ गयीं थी, जोकि पूर्ण रूप से घर की बनी थी, और इसमें गांव की खुशबू साफ-साफ देखी जा रही थी। पिछले 15 जनवरी को मकर संक्रांति यानी खिचड़ी का त्यौहार था। मेरे कार्यालय में भी अवकाश था। मेरी दो बेटियां हैं और दोनों बेटी दामाद लखनऊ में ही रहते हैं।
यद्यपि वायरल हो रहे इस चित्र को मकर संक्रांति के दिन तो मैंने फेसबुक पर नहीं देखा था, लेकिन न जाने क्या हुआ मेरे मन में इस बार आया, कि चलूँ, आज मकर संक्रांति के दिन है, थोड़ा चूड़ा, तिलवा ओर गुड़ दोनों बेटियों के लिए, लिए चलते हैं। इन्हीं विचारों के साथ दो छोटे-छोटे झोलों में यह सामग्रियां रखवाया और कार्य पर रखकर चल दिया। मैंने अपने पहुंचने की सूचना अपने बेटियों को नहीं दी थी। मैं उन्हें सरप्राइज रूप से यह गांव का बना हुआ उपहार देना चाहता था। यह वही प्रेम था जो प्रेम इस वायरस चित्र में उस वृद्ध व्यक्ति के अंदर अपने पुत्री के प्रति प्रदर्शित हो रहा है।
अब आपको सच बताऊँ, जिस समय मैं इस झोले को लेकर जा रहा था। उस झोले में रखें रसद का मूल्य तो कुछ नहीं था, लेकिन मेरा स्नेह अपरंपार था जिसे मैं अपनी कर से लेकर बेटी के घर जा रहा था। लखनऊ के इस पॉस एरिया में रह रही मेरी बेटी जहां ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं के बीच जहां रह रही थी, जहां आधुनिकता के पैमाने पार हो रहे थे। वहां जब मैं पहुंचा तो मेरी बेटी मुझे गले लगा कर, अपना स्नेह लूट रही थी, या मैं उसको स्नेह दे रहा था, मेरे सामने वही दृश्य उपस्थित हो रहा है, जो आज एक आप अपनी बेटी के लिए पैदल चूड़ा दही लेकर जा रहा है। जब मैंने अपनी बेटी को ये थोड़ा स्नेह देकर गले लगाया, तो मैंने महसूस किया कि आखिरकार बाप बेटी के बीच का स्नेह क्या होता है।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अपेक्षा व उपेक्षा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०५ ☆
☆ अपेक्षा व उपेक्षा… ☆
‘अत्यधिक अपेक्षा मानव के जीवन को वास्तविक लक्ष्य से भ्रमित कर मानसिक रूप से दरिद्र बना देती है।’ महात्मा बुद्ध मन में पलने वाली अत्यधिक अपेक्षा की कामना को इच्छा की परिभाषा देते हैं। विलियम शेक्सपीयर के मतानुसार ‘अधिकतर लोगों के दु:ख एवं मानसिक अवसाद का कारण दूसरों से अत्यधिक अपेक्षा करना है। यह पारस्परिक रिश्तों में दरार पैदा कर देती है।’ वास्तव में हमारे दु:ख व मानसिक तनाव हमारी ग़लत अपेक्षाओं के परिणाम होते हैं। सो! दूसरों से अपेक्षा करना हमारे दु:खों का मूल कारण होता है, जब हम दूसरों की सोच को अपने अनुसार बदलना चाहते हैं। यदि वे उससे सहमत नहीं होते, तो हम तनाव में आ जाते हैं और हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है; जो हमारे विघटन का मूल कारण बनता है। इससे पारिवारिक संबंधों में खटास आ जाती है और हमारे जीवन से शांति व आनंद सदा के लिए नदारद हो जाते हैं। सो! मानव को अपेक्षा दूसरों से नहीं; ख़ुद से रखनी चाहिए।
अपेक्षा व उपेक्षा एक सिक्के के दो पहलू हैं। यह दोनों हमें अवसाद के गहरे सागर में भटकने को छोड़ देते हैं और मानव उसमें डूबता-उतराता व हिचकोले खाता रहता है। उपेक्षा अर्थात् प्रतिपक्ष की भावनाओं की अवहेलना करना; उसकी ओर तवज्जो व अपेक्षित ध्यान न देना दिलों में दरार पैदा करने के लिए काफी है। यह सभी दु:खों का कारण है। अहंनिष्ठ मानव को अपने सम्मुख सब हेय नज़र आते हैं और इसीलिए पूरा समाज विखंडित हो जाता है।
मनुष्य इच्छाओं, अपेक्षाओं व कामनाओं का दास है तथा इनके इर्द-गिर्द चक्कर लगाता रहता है। अक्सर हम दूसरों से अधिक अपेक्षा व उम्मीद रखकर अपने मन की शांति व सुक़ून उनके आधीन कर देते हैं। अपेक्षा भिक्षाटन का दूसरा रूप है। हम उसके लिए कुछ करने के बदले में प्रतिदान की अपेक्षा रखते हैं और बदले में अपेक्षित उपहार न मिलने पर उसके चक्रव्यूह में फंस कर रह जाते हैं। वास्तव में यह एक सौदा है, जो हम भगवान से करने में भी संकोच नहीं करते। यदि मेरा अमुक कार्य सम्पन्न हो गया, तो मैं प्रसाद चढ़ाऊंगा या तीर्थ-यात्रा कर उनके दर्शन करने जाऊंगा। उस स्थिति में हम भूल जाते हैं कि वह सृष्टि-नियंता सबका पालनहार है; उसे हमसे किसी वस्तु की दरक़ार नहीं। हम पारिवारिक संबंधों से अपेक्षा कर उनकी बलि चढ़ा देते हैं, जिसका प्रमाण हम अलगाव अथवा तलाक़ों की बढ़ती संख्या को देखकर लगा सकते हैं। पति-पत्नी की एक-दूसरे से अपेक्षाओं की पूर्ति ना होने के कारण उनमें अजनबीपन का एहसास इस क़दर हावी हो जाता है कि वे एक-दूसरे का चेहरा तक देखना पसंद नहीं करते और तलाक़ ले लेते हैं। परिणामत: बच्चों को एकांत की त्रासदी को झेलना पड़ता है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद रहते हुए अपने-अपने हिस्से का दर्द महसूसते हैं, जो धीरे-धीरे लाइलाज हो जाता है। इसका मूल कारण अपेक्षा के साथ-साथ हमारा अहं है, जो हमें झुकने नहीं देता। एक अंतराल के पश्चात् हमारी मानसिक शांति समाप्त हो जाती है और हम अवसाद के शिकार हो जाते हैं।
मानव को अपेक्षा अथवा उम्मीद ख़ुद से करनी चाहिए, दूसरों से नहीं। यदि हम उम्मीद ख़ुद से रखते हैं, तो हम निरंतर प्रयासरत रहते हैं और स्वयं को लक्ष्य की पूर्ति हेतू झोंक देते हैं। हम असफलता प्राप्त होने पर भी निराश नहीं होते, बल्कि उसे सफलता की सीढ़ी स्वीकारते हैं। विवेकशील पुरुष अपेक्षा की उपेक्षा करके अपना जीवन जीता है। अपेक्षाओं का गुलाम होकर दूसरों से उम्मीद ना रखकर आत्मविश्वास से अपने लक्ष्य की प्राप्ति करना चाहता है। वास्तव में आत्मविश्वास आत्मनिर्भरता का सोपान है।
क्षमा से बढ़ कर और किसी बात में पाप को पुण्य बनाने की शक्ति नहीं है। ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात्’ अर्थात् क्षमा सबसे बड़ा धन है, जो पाप को पुण्य में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। क्षमा अपेक्षा और उपेक्षा दोनों से बहुत ऊपर होती है। यह जीने का सर्वोत्तम अंदाज़ है। हमारे संतजन व सद्ग्रंथ इच्छाओं पर अंकुश लगाने की बात कहते हैं। जब हम अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण कर लेंगे, तो हमें किसी से अपेक्षा भी नहीं रहेगी और ना ही नकारात्मकता का हमारे जीवन में कोई स्थान होगा। नकारात्मकता का भाव हमारे मन में निराशा व दु:ख का सबब जगाता है और सकारात्मक दृष्टिकोण हमारे जीवन को सुख-शांति व आनंद से आप्लावित करता है। सो! हमें इन दोनों मन:स्थितियों से ऊपर उठना होगा, क्योंकि हम अपना सारा जीवन लगा कर भी आशाओं का पेट नहीं भर सकते। इसलिए हमें अपने दृष्टिकोण व नज़रिए को बदलना होगा; चिंतन-मनन ही नहीं, मंथन करना होगा। वर्तमान स्थिति पर विभिन्न आयामों से दृष्टिपात करना होगा, ताकि हम अपनी संकीर्ण मनोवृत्तियों से ऊपर उठ सकें तथा अपेक्षा उपेक्षा के जंजाल से मुक्ति प्राप्त कर सकें। हर परिस्थिति में प्रसन्न रहें तथा निराशा को अपने हृदय मंदिर में प्रवेश ने पाने दें तथा प्रभु कृपा की प्रतीक्षा नहीं, समीक्षा करें, क्योंकि परमात्मा हमें वह देता है, जो हमारे लिए हितकर होता है। सो! हमें उसकी रज़ा में अपनी रज़ा मिला देनी चाहिए और सदा उसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए। हमें हर घटना को एक नई सीख के रूप में लेना चाहिए, तभी हम मुक्तावस्था में रहते हुए जीते जी मुक्ति प्राप्त कर सकेंगे। इस स्थिति में हम केवल अपने ही नहीं, दूसरों के जीवन को भी सुख-शांति व अलौकिक आनंद से भर सकेंगे। ‘संत पुरुष दूसरों को दु:खों से बचाने के लिए दु:ख सहते हैं और दुष्ट लोग दूसरों को दु:ख में डालने का हर उपक्रम करते हैं।’ बाल्मीकि जी का यह कथन अत्यंत सार्थक है। सो! अपेक्षा व उपेक्षा का त्याग कर जीवन जीएं। आपके जीवन में दु:ख भूले से भी दस्तक नहीं देगा। आपका मन सदा प्रभु नाम की मस्ती में खोया रहेगा–मैं और तुम का भेद समाप्त हो जाएगा और जीवन उत्सव बन जाएगा।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नासिका…“।)
अभी अभी # ८८९ ⇒ आलेख – नासिका श्री प्रदीप शर्मा
नासिका, जिसे हम नाक भी कहते हैं, हमारी काया की नायिका है। हमारी नाक के नीचे क्या हो रहा है, यह उसे देख भले ही नहीं सकती हो, सूंघ ज़रूर सकती है। देखने के लिए इसने अपने ऊपर दो दो आंखें जो बिठा रखी हैं। लेकिन हाय रे बदनसीब आंख, अपनी ही नाक को देखने के लिए भले ही वह इसी नाक पर चश्मा चढ़ा ले, उसे अपनी ही नाक नजर नहीं आती। आइना देखकर इन आंखों को यकीन होता है, अपनी ही नाक पर। लेकिन हाथ कंगन को आरसी क्या, हम दोनों हाथ छूकर ही यकीन कर लेते हैं, अपनी नाक सही सलामत है।
तूने खूब बनाया भगवान, खिलौना माटी का ! यह हमारी काया है, जिसे आप ढांचा भी कह सकते हैं, उस बनाने वाले ने एक जैसे सांचे में ढाला है। कितना दिमाग लगाया होगा, इस माटी के पुतले को बनाने में। दो दो कान, दो दो आंखें, एक छोटी सी नाक, और बड़ा सारा मुंह, और उससे भी बड़ी देह। केवल हाथ पांव ही नहीं, जीती जागती मशीन बना दी उस ऊपर वाले ने और उसमें प्राण फूंक दिए।।
नायक – नायिका भेद की तरह नासिका भेद भी होता है इस हाड़ – मांस के पुतले में। कोई नाक पतली होती है, कोई मोटी, तो कोई चपटी। कहते हैं, नासिक में, राम के भाई लक्ष्मण ने रावण की बहन शूर्पणखा की नाक काटी थी। कोई नायिका अगर प्रणय निवेदन करे, तो क्या नायक उसकी नासिका काट ले ? लेकिन जो किसी दूसरे की सुरक्षा के लिए लक्ष्मण रेखा खींचते हैं, वे स्वयं भी मर्यादित आचरण में रहते हैं। तब से ही लोग अपनी नाक के प्रति सजग हो गए। ऐसा कोई काम नहीं करना, जिससे समाज में हमारी नाक कटे।
बचपन में भाई बहन एक दूसरे को नकटा, नकटी कहकर चिढ़ाते थे। और बचपन की दोस्ती भी कैसी ! जब लड़ाई हुई, तो कट्टी कट्टी, साबुन की बट्टी, इधर दांत से अंगूठे को काटा, और जा तेरे घर। लेकिन कब तक ? जल्द ही यह नौबत ही आ जाती। नकटे की नाक नहीं, बोले बिना चैन नहीं।
और दोनों उंगलियों को चूमकर, फिर से पक्की दोस्ती।।
अगर आपने लक्ष्मण के पुराने कार्टून देखे हैं तो उनमें सबसे अधिक कार्टून इंदिरा गांधी के हैं और पूरे कार्टून की जान होती थी, इंदिरा जी की नाक। एक ऐसी नाक जिसने कभी देश की नाक रखी , तो कभी देश की नाक नीची भी की। अपनी नाक बचाने के लिए आपातकाल भी लगाया और इसी नाक पर मुंह की भी खाई। लगता है लक्ष्मण और नाक का संबंध त्रेता युग से ही चल रहा है। मूंछें हो तो रामलाल जैसी और नाक हो तो लक्ष्मण के कार्टून्स की इंदिरा जैसी।
आज हमें नाक की बहुत चिंता है। समाज में, परिवार में, राजनीति में, सभी जगह कोई अपनी नाक पर मक्खी नहीं बैठने देता। घर में बच्चे हों या राजनीति में विपक्ष, नाक में दम कर रखा है। जानवर हो तो नाक में नकेल डाल दें, बच्चों को तो स्कूल में डाल दिया, अब क्या विपक्ष को जेल में डाल दें।
हम नाक से ही सांस लेते हैं और छोड़ते हैं। आदमी सब कुछ भूल सकता है, सांस लेना नहीं भूल सकता। सांस की बीमारियों से ही दमा होता है जो मरीज को आखिरी सांस तक दम नहीं लेने देता। Ear, nose और throat यानी नाक, कान और गले की आपस में बहुत घुटती है। इनकी आपसी मिलीभगत को ही nexus नेक्सस कहते हैं।।
लंबी गहरी सांस लेना, मुंह से नहीं नाक से सांस लेना, थोड़ी भस्रिका, कपालभाति और अनुलोम विलोम आपको स्वस्थ व प्रसन्न रखेगा और बीमारियों से आपकी रक्षा करेगा। आपके प्राण पर बाबा रामदेव का नहीं, आपका कॉपीराइट है। पहले प्राण बचाएं, वचन बाद में निभाएं। दूसरों के मामलों में व्यर्थ ही अपनी नाक ना घुसाएं। Don’t poke your nose into others affairs !!!
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “मकर संक्रांति – साधना पर्व…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूरज के तेवर…“।)
अभी अभी # ८८८ ⇒ आलेख – सूरज के तेवर श्री प्रदीप शर्मा
ये महाशय सूरज,
ऊंचे घोर अंबर में रहाते हैं
जेठ की भरी दुपहरी में
तो तमतमाते हैं ,
और जब पौस माह में
आसमान में ड्यूटी देते हैं
तो ठंड में कंपकंपाते हैं ।
अजीब फितरत है इनकी
कभी आग का गोला
तो कभी बर्फ का गोला !
दिन के चौकीदार हैं ये
खुद रात को तानकर सोते हैं;
कल तो इन्होंने हद कर दी
दिन भर बादलों का
कंबल ओढ़कर पड़े रहे
और अपनी रोशनी को
भी कंबल में छुपा लिया ।।
तलवार में जंग नहीं लगती
तलवार जंग लड़ने के लिए होती है ;
सूरज भी रोशनी देने के लिए होता है,
उसे भी कहीं जाड़ा लगता है !
लेकिन समय का फेर देखिए,
दिन में भी कभी यह सूरज
मुंह छुपाता है
तो कभी बारिश के रूप में
घड़ियाली आंसू बहाता है ।।
कभी तो मन करता है
एक रूमाल से इसके आंसू
पोंछ दूं,
थोड़ी इसको भी विक्स
की भाप दे दूं
इस बेचारे का कौन है
उस बेरहम आसमान में ।
फिर खयाल आता है
जब सूरज को ग्रहण लगता है तो पुजारी भगवान का मंदिर भी नहीं खोलता !
कौन देवता बड़ा है
मंदिर वाला अथवा
आसमान वाला यही
हमारा आदित्यनाथ ।।
सर्वशक्तिमान भुवन भास्कर की
यह दशा हमसे देखी नहीं जाती ।
इस धरा के हर प्राणी की निगाह आसमान पर ही लगी रहती है । उसका तेज ही हमारा तेज है ।
काश गलत हो हमारा अनुमान !
आज नहीं ऐसा कोई बाल हनुमान,जो फिर सूरज को बर्फ का गोला समझ मुंह में धर ले ।
समस्त वसुन्धरा की ओर से हमारा सूर्य नमस्कार
स्वीकार करें ।
यह ईश्वर का कोप हो
अथवा प्रकृति का प्रकोप
प्रकृति से खिलवाड़ करने वाले हम इंसान ही हैं ।
हमारी खता माफ़ हो ।
अपनी लीला समेटें !
स्वयं प्रकाशित हों
और समस्त चराचर को भी अपनी स्वर्ण रश्मियों से आलोकित एवं आल्हादित करें ।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्यार और कविता…“।)
अभी अभी # ८८७ ⇒ आलेख – प्यार और कविता श्री प्रदीप शर्मा
लोग अक्सर किसी के प्यार में इतने खो जाते हैं कि उनके अंदर का कवित्व किसी निर्झर की तरह फूट पड़ता है और कविता का जन्म हो जाता है। प्यार में इंसान या तो अंधा हो जाता है,या फिर कवि। कुछ हम जैसे अभागे भी होते हैं, न घर के, न घाट के।
हमने बहुत कोशिश की, कि कवि बना जाए,कविता लिखी जाए। सुना है, कलम, दवात , काग़ज़ से ही कविता नहीं लिखी जाती,लिखने की प्रेरणा भी तो होनी चाहिए। प्रेरणा और प्रेम दोनों जब साथ होते हैं,तब किसी कविता का जन्म होता है। पहली बात, मेरा नाम प्रेम नहीं, प्रदीप है ! और दूसरी बात,कविता और प्रेरणा से मेरा दूर का भी कोई रिश्ता नहीं। स्कूल कॉलेज में भी मुझे याद नहीं, कभी किसी प्रेरणा अथवा कविता से मेरा कोई वास्ता रहा हो।।
वियोगी जी को पहला कवि माना गया है। शुक्र है,योगी जी को आखरी कवि नहीं। अटल जी तो कर्मयोगी थे और भीष्म पितामह की तरह आजन्म ब्रह्मचारी थे, फिर भी राष्ट्र प्रेम ही उनकी प्रेरणा रहा और राजनेता के साथ साथ ही, वे एक अच्छे कवि भी सिद्ध हुए।
कौन किस कारण से कवि हुआ, इससे हमें कोई मतलब नहीं। हम सिर्फ अपनी बात कर रहे हैं, हममें ऐसी क्या कमी थी, जो हम एक कवि नहीं बन पाए। शायद प्यार की कमी हो। प्यार का कोई स्कूल नहीं होता। आदमी को अपने आसपास ही प्यार तलाशना चाहिए।।
मेरी मां ने मुझे बहुत प्यार किया। ईश्वर ने मुझे एक नहीं,चार चार बहनें दीं,कई ढेर सारे यार दोस्त दिए,इनसे मुझे भरपूर प्यार मिला लेकिन फिर भी कविता लिखने की प्रेरणा नहीं मिल पाई। जीवन में एक पत्नी ही काफी होती है प्यार करने के लिए,वह भी आई,उसने भी मुझे भरपूर प्यार दिया,लेकिन शायद उस प्रेरणा का फिर भी अभाव ही रहा,जिससे कविता जन्म लेती है।
संयोग और वियोग ही जीवन है। मिलना और बिछड़ना भी लगा ही रहता है,लेकिन जो इसे महसूस कर पाता है,वह शायद कवि बन जाता है। क्या कविता के लिए सफल अथवा असफल प्रेम ही जरूरी है। मुझे लगता है,बार बार सुई,प्रेम के आसपास आकर ही अटक जाती है।।
तो इससे यह सिद्ध हुआ कि या तो मुझमें प्रेम का नितांत अभाव है या फिर किसी का प्यार मुझे एक कवि बनने की प्रेरणा नहीं दे रहा। मैं नहीं मानता,कोई प्रेमिका प्रेरणा बनकर जीवन में आती है,बच्चों की तरह हमारा हाथ पकड़ती है,और एक कविता लिखकर चली जाती है। नाच ना आवे,आंगन टेढ़ा।
कविता लिखने की मैंने बहुत कोशिश की,लेकिन जब भी लिखने बैठा,कुछ और ही लिख गया। कभी कभी तो मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि,माता सरस्वती तो मुझ पर प्रसन्न हैं लेकिन कविता मुझसे नाराज़ है। यह भी सच है कि मुझे कविता से जितना प्रेम है,उतना कवियों से नहीं।।
मेरे जीवन में एकमात्र एक कवि ही ऐसे आए,जिनमें मैंने कविता की सुबह देखी और कविता की शाम देखी। वे हमारे मालवी कवि स्व. रामविलास शर्मा थे,जिनसे संयोगवश मेरे आत्मिक संबंध हो गए। वे प्रकृति के कवि थे। जीवन के संघर्ष और विषाद को उन्होंने अपने पुरुषार्थ और हंसमुख स्वभाव से परास्त कर दिया था। मुझे उनसे ही लिखने की प्रेरणा मिली।
वे जब भी मिलने आते,अपने साथ मानो बहार लेकर ही आते।
खुलकर ठहाके लगाना ही उनकी पहचान थी।
हम कभी नहीं जान पाते, उन ठहाकों के पीछे कितना दर्द छुपा है। जब भी एकांत होगा,उनका दर्द उनकी कविता में बयां हुआ होगा,प्रतीक रूप में,व्यक्ति के रूप में नहीं। प्रकृति ही उनकी प्रेरणा थी,उनकी प्रेयसी थी,उनकी हमदर्द थी। उनका एक ही गुरुमंत्र मुझे जीवन में काम आया,नियम से कागज कलम लेकर बैठ जाएं, जो आता है,आने दें,उसे रोकें मत। नहीं आता है,कोई बात नहीं,इस नित्य कर्म बनाएं,कब तक नहीं आएगा। नहीं लिखेंगे,तो कब्ज हो जाएगी।।
उनकी आत्मीयता और प्रेरणा से भले ही मैं कवि नहीं बन पाया,लेकिन एक कवि हृदय को समझ तो पाया। कोई व्यक्ति हमारा आदर्श हो सकता है,वह आपको मार्ग भी दिखला सकता है,लेकिन चलना तो आपको है।
जीवन एक चलती फिरती कविता है। प्रेम ही इसकी
प्राणवायु है। हमारी वाणी में प्रेम हो मिठास हो,बस यही तो कविता है। प्रकृति हमें प्राकृतिक बनाती है,हमारा जीवन बनावटी कागज के फूलों का ना हो। उसमें प्रेम की खुशबू हो।
जब किसी के जीवन में कोई रत्नावली आती है,वह उसे तुलसीदास बना देती है। लोग रत्नावली को भूल जाते हैं,तुलसी के राम को नहीं भूलते। काश,हमारे जीवन में भी अगर कोई विद्योत्तमा आई होती,तो हम भी कवि कालिदास बन जाते।।
(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है आपकी एक ज्ञानवर्धक एवं विचारणीय आलेख “स्वामी विवेकानंद : आधुनिक भारत के निर्माता, वैश्विक मानवतावाद के प्रवर्तक और भारतीय दर्शन के पुनराख्याता”।
☆ आलेख ☆ स्वामी विवेकानंद : आधुनिक भारत के निर्माता, वैश्विक मानवतावाद के प्रवर्तक और भारतीय दर्शन के पुनराख्याता☆ श्री मनजीत सिंह ☆
भूमिका
उन्नीसवीं शताब्दी का भारत सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से गहरे संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। एक ओर औपनिवेशिक शासन के कारण आत्मविश्वासहीनता, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक हीनता का भाव व्याप्त था, तो दूसरी ओर परंपरागत धार्मिक रूढ़ियाँ समाज की प्रगति में बाधक बनी हुई थीं। ऐसे ऐतिहासिक परिवेश में स्वामी विवेकानंद का उदय हुआ, जिन्होंने भारतीय चेतना को आत्मगौरव, आत्मविश्वास और वैश्विक दृष्टि प्रदान की। वे केवल एक संत या दार्शनिक नहीं थे, बल्कि राष्ट्रनिर्माता, समाज-सुधारक और आधुनिक युग के सांस्कृतिक दूत थे।
स्वामी विवेकानंद ने भारतीय दर्शन को आधुनिक संदर्भों में पुनर्व्याख्यायित किया और धर्म को कर्म, सेवा और मानवतावाद से जोड़ा। उनका चिंतन आज भी अकादमिक विमर्श, सामाजिक चिंतन और आध्यात्मिक साधना—तीनों स्तरों पर अत्यंत प्रासंगिक है।
जन्म, पारिवारिक परिवेश एवं प्रारंभिक संस्कार
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में एक प्रतिष्ठित कायस्थ परिवार में हुआ। उनका मूल नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त एक प्रसिद्ध अधिवक्ता थे, जिनकी रुचि तर्क, दर्शन और साहित्य में थी। माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक, करुणामयी और नैतिक दृढ़ता की प्रतीक थीं।
पिता से विवेकानंद को बौद्धिक तर्कशीलता और माता से आध्यात्मिक संवेदना प्राप्त हुई। इन दोनों तत्वों के समन्वय ने उनके व्यक्तित्व को संतुलित और बहुआयामी बनाया।
शिक्षा, बौद्धिक विकास और तर्कशीलता
नरेंद्र नाथ दत्त की शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय में हुई, जहाँ उन्होंने दर्शन, इतिहास, साहित्य और विज्ञान का गंभीर अध्ययन किया। वे प्लेटो, अरस्तू, कांट, हेगेल, स्पेंसर और मिल जैसे पाश्चात्य दार्शनिकों से प्रभावित थे।
विशेष बात यह थी कि वे किसी भी विचार को आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करते थे। वे अनुभव-सिद्ध सत्य के पक्षधर थे। इसी तर्कशीलता ने उन्हें धार्मिक आस्था के प्रति भी प्रश्नाकुल बनाए रखा।
आध्यात्मिक संकट और सत्य की खोज
युवावस्था में विवेकानंद गहरे आध्यात्मिक संकट से गुज़रे। ईश्वर के अस्तित्व को लेकर उनके मन में संदेह उत्पन्न हुआ। वे ऐसे व्यक्ति की खोज में थे जिसने ईश्वर को प्रत्यक्ष अनुभव किया हो। यह संकट वास्तव में उनके बौद्धिक ईमानदारी का प्रमाण था, न कि नास्तिकता का।
श्रीरामकृष्ण परमहंस से भेंट : निर्णायक मोड़
1881 में दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण परमहंस से उनकी ऐतिहासिक भेंट हुई। विवेकानंद का प्रश्न—“क्या आपने ईश्वर को देखा है?” और श्रीरामकृष्ण का उत्तर—“हाँ, उतनी ही स्पष्टता से जितना तुम्हें देख रहा हूँ”—भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
यह भेंट गुरु-शिष्य परंपरा का आदर्श उदाहरण है। श्रीरामकृष्ण ने विवेकानंद को केवल आध्यात्मिक अनुभूति ही नहीं दी, बल्कि उन्हें मानवता के प्रति उत्तरदायित्व का बोध भी कराया।
पारिवारिक दायित्व, संघर्ष और त्याग
1884 में पिता की मृत्यु के बाद परिवार आर्थिक संकट में डूब गया। विवेकानंद ने परिवार के भरण-पोषण के लिए संघर्ष किया, परंतु नौकरी नहीं मिली। इसी समय श्रीरामकृष्ण गंभीर रूप से बीमार पड़े।
इन परिस्थितियों में विवेकानंद का जीवन त्याग, सेवा और कर्तव्यनिष्ठा का आदर्श बन गया। उन्होंने निजी दुःखों को सामाजिक और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व में रूपांतरित किया।
संन्यास और रामकृष्ण संघ का गठन
श्रीरामकृष्ण के महासमाधि (1886) के बाद विवेकानंद ने अपने गुरु-भाइयों के साथ बरानगर मठ में निवास किया। 1887 में उन्होंने औपचारिक रूप से संन्यास ग्रहण किया और ‘स्वामी विवेकानंद’ कहलाए।
यह संन्यास पलायन नहीं था, बल्कि कर्मयोग की नई परिभाषा थी—“शिव-ज्ञान से जीव-सेवा।”
भारत भ्रमण और सामाजिक यथार्थ का साक्षात्कार
स्वामी विवेकानंद ने संपूर्ण भारत का भ्रमण किया। उन्होंने गाँवों की दयनीय स्थिति, भूख, अशिक्षा और जातिगत शोषण को निकट से देखा। यहीं से उनके चिंतन में ‘दरिद्र नारायण’ की अवधारणा विकसित हुई।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत के पतन का कारण धर्म नहीं, बल्कि जनता की उपेक्षा है।
शिक्षा-दर्शन और मानव निर्माण
विवेकानंद का शिक्षा-दर्शन अत्यंत मौलिक है। उनके अनुसार—
“शिक्षा वह है जिससे मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता का प्रकटीकरण हो।”
वे चरित्र-निर्माण, आत्मविश्वास और स्वावलंबन पर आधारित शिक्षा के पक्षधर थे। उनका शिक्षा-दर्शन आज की नई शिक्षा नीति के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है।
विश्व धर्म संसद (1893) और वैश्विक प्रभाव
शिकागो के विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद का भाषण भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का मील का पत्थर है। उन्होंने सार्वभौमिक धर्म, सहिष्णुता और मानव-एकता का संदेश दिया।
इस भाषण ने पश्चिम में भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता को स्थापित किया और औपनिवेशिक हीनता-बोध को तोड़ा।
धर्म और विज्ञान का समन्वय
विवेकानंद ने धर्म को ‘चेतना का विज्ञान’ बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म और विज्ञान परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यह दृष्टि उन्हें आधुनिक दार्शनिक बनाती है।
रामकृष्ण मिशन : संगठित सेवा का आदर्श
1897 में स्थापित रामकृष्ण मिशन भारतीय समाज में संगठित सेवा का आदर्श बन गया। शिक्षा, चिकित्सा, आपदा-राहत और ग्रामीण विकास में इसका योगदान अकादमिक अध्ययन का विषय है।
भारतीय राष्ट्रवाद में योगदान
विवेकानंद ने प्रत्यक्ष राजनीति में भाग नहीं लिया, परंतु उन्होंने राष्ट्रीय चेतना को वैचारिक आधार प्रदान किया। नेहरू, सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं ने उन्हें अपनी प्रेरणा माना।
हिंदू धर्म का पुनराख्यान
उन्होंने हिंदू धर्म को एक समन्वयवादी, उदार और सार्वभौमिक परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने संप्रदायिक संघर्षों को ‘एक सत्य के विविध मार्ग’ बताकर सुलझाया।
आधुनिक मानवतावाद और नैतिक दर्शन
विवेकानंद का मानवतावाद आध्यात्मिक आधार पर टिका है। उनका नैतिक सिद्धांत भय पर नहीं, आत्मा की पवित्रता पर आधारित है।
उपसंहार
स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत की आत्मा के शिल्पकार थे। उन्होंने अध्यात्म को सामाजिक यथार्थ से जोड़ा और धर्म को मानव-कल्याण का साधन बनाया। विश्वविद्यालय स्तर पर उनका चिंतन दर्शन, समाजशास्त्र, शिक्षा और राजनीति—सभी के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
निष्कर्ष्तः, स्वामी विवेकानंद केवल इतिहास की विभूति नहीं, बल्कि सतत प्रेरणा के स्रोत हैं—एक ऐसे विचारक, जिन्होंने भारत को स्वयं से परिचित कराया और विश्व को भारत से।