हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८६७ ⇒ विचारों की गति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारों की गति।)

?अभी अभी # ८६७ ⇒ आलेख – विचारों की गति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि, जिसने भी कहा हो, सोच समझकर ही कहा होगा। सभी जानते हैं, रॉकेट की तरह कवि भी हवा में ही उड़ते हैं। वैज्ञानिकों ने प्रकाश और ध्वनि की गति को तो आसानी से जान लिया है, किसी ने शायद विचारों की गति को भी नाप लिया हो।

इस ब्रह्माण्ड की खगोलीय गणना इतनी आसान नहीं। प्रकाश और ध्वनि को इंच टैप से नापने से तो रहे। सूर्य के प्रकाश को हम तक पहुंचने में अगर 8.40 आठ मिनिट और चालीस सेकंड लगते हैं तो चंद्रमा का प्रकाश हमारी पृथ्वी तक मात्र 1.30 सेकंड में ही पहुंच जाता है। ।

विचारों का क्या है ! सितारों के आगे जहान और भी है। आओ हुजूर तुमको सितारों में ले चलूं !

कितने प्रकाश वर्ष लगेंगे, किस उड़न खटोले अथवा पुष्पक विमान में बैठकर जाओगे, कुछ पता नहीं। अगर ऐसे विचार ही हमारे मन में नहीं आते, तो क्या हम इस तरह हवा में बातें कर रहे होते।

एक सुर होता है, जिसकी साधना परमेश्वर की साधना होती है। उसके बारे में एक सुर साधक भी सिर्फ यही कह पाया है ;

सुर की गति मैं क्या जानूं।

एक भजन करना जानूं। ।

सुर में शब्द है, ध्वनि है। प्रकाश में अगर किरणें हैं तो ध्वनि में तरंगें हैं। जब रसोईघर में कोई बर्तन अचानक फर्श पर गिर जाता है, तो उसकी आवाज इतनी आसानी से शांत नहीं होती। क्या ध्वनि की तरंगों के साथ आवाज (साउंड) भी शांत हो जाती है। सुर की तरह ही मंत्र की भी साधना है।

शब्द अक्षरों का समूह है।

अक्षर को परम ब्रह्म माना गया है। जिसका कभी क्षरण अर्थात् क्षय ना हो वही तो अक्षर है। शब्द भी कहां मरता है। मंदिर में जब एक घण्टा बजता है तो उसकी ध्वनि को शांत होने में समय लगता है। ।

किसी गीत की जब धुन बनाई जाती है, जब एकांत में बैठकर कोई गीत अथवा रचना का सृजन होता है, तब सबसे पहले हमारा मन एकाग्र होता है। मन का एकाग्र होना ही धारणा है, जो ध्यान का पहला चरण है। हमें कभी लगता है, कुछ हमारे अंदर से आ रहा है और कुछ कुछ ऊपर से भी उतर रहा है। यह उतरना ही वास्तविक सृजन है, ध्यान धारणा और समाधि है।

मतलब हमने यूं ही हवा में ही नहीं कहा था, सितारों के आगे जहान और भी है। मत मानिये आप शनि की साढ़े साती को, राहु और केतु के दुष्प्रभाव को, अपने विचारों के दुष्प्रभाव को तो मानिये। हमारी बुद्धि भ्रष्ट क्यों होती है। क्यों कभी कभी हमारी अक्ल घास चरने जाती है। और क्यों कभी हमारा मन किसी अच्छी फिल्मी धुन पर नाच उठता है। ।

एक ओर हमारे विचारों की गति है और दूसरी ओर मन की गति। मन संकल्प विकल्प करता रहता है।

मन में भेद बुद्धि होती है। अगर भेद बुद्धि ना हो तो हम अच्छे बुरे, लाभ हानि और अपने पराए में भेद ही नहीं कर पाएं। हमारी ज्ञानेंद्रियां ही तो यह तय करती हैं, हम क्या देखें, क्या सुनें, क्या बोलें और क्या खाएं।

एक हमारी मति भी होती है, जिसे आप बुद्धि भी कह सकते हैं। जब बुद्धि भ्रष्ट होती है तो रावण की भी मति मारी जाती है। हमारी मति ही हमारे विचारों को सही दिशा देती है। अगर विचारों को सही दिशा और गति मिल जाए तो वे आसमान छू लें। ।

हमारे विचारों को सही दिशा और गति देने के लिए ही तो अन्य लोकों की रचना हुई है। गंधर्व लोक के कारण सुर, स्वर और संगीत कायम है, जिन्हें स्वर्ग नहीं जाना उनके लिए वैकुंठ लोक भी है। गोलोक और पितृलोक का भी ऑप्शन है। विचारों का मामला है। खिचड़ी अपनी ही है जितना चाहें घी डाल लें। बस इतना जरूर जान लें, समय और विचारों का सदुपयोग कर लें, क्योंकि ये जिन्दगी ना मिलेगी दोबारा ;

चलो दिलदार चलो

चांद के पार चलो

हम हैं तैयार चलो। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ रामधारी सिंह दिनकर: राष्ट्र की अंतरात्मा की आवाज ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 रामधारी सिंह दिनकर: राष्ट्र की अंतरात्मा की आवाज 🌷

आज जब हम भारत के लोकतंत्र के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं, तो कुछ नाम केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि युगों की धड़कन बन जाते हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर उनमें से एक थे—जो अपनी ओजपूर्ण वाणी, देशभक्ति की अटूट भावना और दूरदृष्टि के लिए जाने जाते थे। उनका जीवन राष्ट्र को समर्पित एक यज्ञ था।

​दिनकर जी की निष्ठा, पद या व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि केवल राष्ट्र के प्रति थी। वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हृदय के निकट थे, फिर भी जब चीन के हाथों 1962 में भारत की पराजय हुई, तो उन्होंने राज्यसभा में खड़े होकर सत्ता के मोह को तोड़ दिया। उनकी वाणी में वह अग्नि थी जो किसी भी शासक को कर्तव्य की याद दिलाती है:

​”रे रोक जहाँ-तहाँ मत शंख, देशभक्तों का दल भारी है।

वह बिना कहे ही चलता है, वह शक्ति राष्ट्र की न्यारी है।”

​उनकी यह निर्भीकता बताती है कि उन्होंने राष्ट्र को हमेशा सर्वोपरि माना, और उनकी संवेदनशीलता उन्हें जनता के दुःख से विचलित कर देती थी।

​समय बदला। सत्ता की बागडोर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथ में आई। यह सत्य है कि इंदिरा जी भी दिनकर का सम्मान करती थीं और उन्हें उनकी साहित्यिक गरिमा के अनुरूप आदर देती थीं। मगर दिनकर एक कवि और द्रष्टा थे; उन्हें भविष्य की आहटें सुनाई देती थीं। 1974 तक आते-आते, उन्हें सत्ता के केंद्रीकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण की स्पष्ट अनुभूति होने लगी थी।

​उनके निकटस्थ मित्रों और समकालीनों के संस्मरण बताते हैं कि उन्हें इंदिरा गांधी की नीतियों में घोर तानाशाही प्रवृत्तियाँ झलकने लगी थीं। यह किसी व्यक्तिगत द्वेष का विषय नहीं था, बल्कि लोकतंत्र के भविष्य की गहरी चिंता थी।

​यही वह चिंता थी जो उन्हें 1974 में मद्रास (चेन्नई) खींच लाई, जहाँ वह रामनाथ गोयनका और जयप्रकाश नारायण (जेपी) के साथ एक अति गोपनीय और गहन विमर्श में शामिल हुए। ‘तुगलक’ के संपादक गुरुमूर्ति ने पुष्टि की है कि इन तीन महान विभूतियों की अंतिम बैठक का केंद्रीय विषय यही था: सत्ता का बढ़ता दमनकारी स्वरूप।

​संभवतः दिनकर ने गोयनका से अपनी चिंता साझा करते हुए और जेपी को प्रेरित करते हुए कहा होगा:

“जयप्रकाश, अब समय आ गया है। इस देश को आपकी आवश्यकता है। यदि अब भी क्रांति का शंखनाद नहीं हुआ, तो लोकतंत्र का सूर्य अस्त हो जाएगा।”

​दिनकर ने केवल आग्रह ही नहीं किया, बल्कि क्रांति की पृष्ठभूमि को अपनी कलम से अमर भी कर दिया। उन्होंने देश की जनता को उसकी सर्वोच्च शक्ति का एहसास कराने के लिए एक कालजयी कविता भी तैयार कर दी, जो उनके जीवन की अंतिम राजनीतिक भेंट सिद्ध हुई:

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

​इस गहन राजनीतिक और वैचारिक उथल-पुथल के बीच, वे तिरुपति बालाजी के दर्शन के लिए गए। यहाँ उनकी संवेदनशीलता और त्याग का अद्भुत दर्शन हुआ। उन्होंने बीमार और संघर्षरत जयप्रकाश नारायण की लंबी आयु के लिए प्रार्थना की, यह इच्छा व्यक्त करते हुए कि उनकी शेष आयु भी जेपी को लग जाए—क्योंकि उस क्षण राष्ट्र को एक कवि से अधिक एक निर्भीक क्रांतिदूत की आवश्यकता थी।

​और नियति का चक्र देखिए! उसी यात्रा से लौटकर, 24 अप्रैल 1974 की रात, रामनाथ गोयनका के आवास पर ही, इन दोनों महान मित्रों (जेपी और गोयनका) के सान्निध्य में, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अंतिम साँस ली।

​दिनकर की मृत्यु, आपातकाल (1975) के ठीक पहले, लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक मूक बलिदान बन गई। उनकी कविता जनता के हाथों में मशाल बनी, और उनकी आत्मा की शांति उस ‘संपूर्ण क्रांति’ में समा गई, जिसके लिए उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में आग्रह किया था। वह सिर्फ एक कवि नहीं थे; वह राष्ट्र की अंतरात्मा की आवाज थे—दूरदर्शी, संवेदनशील, और सदैव राष्ट्रहित के प्रति समर्पित।

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९१ ☆ आलेख – “2025 का वर्ष: उत्सव, पुरस्कार और विदाइयों के बीच साहित्य” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९१ ☆

?  आलेख – 2025 का वर्ष: उत्सव, पुरस्कार और विदाइयों के बीच साहित्य ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

2025 साहित्यिक हलचलों से भरापूरा रहा। एक ओर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों और नोबेल सम्मान ने साहित्य को मानवीय अधिकारों, विस्थापन और स्मृति जैसे सवालों से जोड़ते हुए नए अर्थ दिए, तो दूसरी ओर भारत में साहित्य अकादेमी पुरस्कारों, बड़े साहित्यिक संस्कृतिक उत्सवों और प्रकाशन जगत ने हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के भविष्य की संभावना के सफर में कई सोपान पार किए ।

इसी वर्ष कई महत्त्वपूर्ण रचनाकारों के निधन ने भी यह एहसास दिलाया कि साहित्य केवल समकालीन विमर्श नहीं, बल्कि एक दीर्घकालीन सामूहिक स्मृति है, जिसमें हर विदा एक रिक्ति छोड़ जाती है।

साहित्य का नोबेल 2025 भी बीते कई वर्षों की तरह सौंदर्यबोध से आगे बढ़कर राजनीति और नैतिकता के सवालों के बीच अपनी जगह बनाता दिखाई दिया। यह पुरस्कार उस रचनाशील व्यक्तित्व को मिला जिसकी लेखनी ने अपने समय के हिंसा ग्रस्त, विस्थापित और पहचान के संकट से जूझते समुदायों को अपनी कलम से आवाज़ दी, और भाषा ,राजनीति, स्मृति तथा न्याय जैसे प्रश्नों को कथा कला के ज़रिये तीखी लेकिन करुण दृष्टि से समाज के सम्मुख रखा। इस चयन ने यह रेखांकित किया कि विश्व साहित्य के बड़े मंच अब तथाकथित ‘मुख्यधारा’ के बजाय हाशिए की दुनिया को केंद्र में लाने का साहस दिखा रहे हैं। 2025 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार हंगरी के लेखक लास्ज़लो क्रास्ज़नाहोरकाई (László Krasznahorkai) को उनकी प्रभावशाली और दूरदर्शी गद्य शैली के लिए दिया गया है, जो सर्वनाशकारी विषयों के बीच कला की शक्ति और मानवीय भावनाओं को दर्शाती है. स्वीडिश एकेडमी ने अक्टूबर 2025 में इस पुरस्कार की घोषणा की थी.

नोबेल के साथ ही वर्ष 2025 में यूरोप, अमरीका और अन्य क्षेत्रों में आयोजित अनेक पुस्तक महोत्सवों और राइटर्स फेस्टिवलों ने भी साहित्य को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेंसरशिप के विरुद्ध संघर्ष से जोड़कर प्रस्तुत किया । न्यूयॉर्क में आयोजित ‘वर्ल्ड वॉयसेज़ फ़ेस्टिवल 2025’ जैसे आयोजनों में कई देशों के लेखक जुटे, जहाँ कथा, कविता, संस्मरण और निबंध के माध्यम से यह बहस हुई कि डिजिटल पूँजीवाद, युद्ध, जलवायु संकट और माइग्रेशन के दौर में लेखन की ज़िम्मेदारी क्या होनी चाहिए। ऐसे आयोजनों ने यह संदेश दिया कि साहित्य आज भी सत्ता संरचनाओं के बरक्स एक आलोचनात्मक, मानवीय और विश्व नागरिक चेतना का माध्यम बन सकता है।

भारतीय संदर्भ: साहित्य अकादेमी और भाषाविविधता

भारतीय परिदृश्य में 2025 की सबसे महत्त्वपूर्ण संस्थागत घटना साहित्य अकादेमी द्वारा घोषित पुरस्कार रहे, जिनमें मुख्य अकादेमी पुरस्कार के साथ ‘युवा पुरस्कार’ और ‘बाल साहित्य पुरस्कार’ शामिल थे। अकादेमी ने 24 भारतीय भाषाओं में रचनाओं को सम्मानित करके यह दिखाया कि हिंदी, बंगाली, तमिल, मराठी, उर्दू जैसी बड़ी भाषाओं के साथ साथ कोंकणी, बोडो, संताली, डोगरी, राजस्थानी, मैथिली आदि भाषाओं में हो रहे सृजन को भी समान रूप से गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इससे ‘राष्ट्रीय साहित्य’ की अवधारणा, जो लंबे समय तक कुछ केंद्र भाषाओं तक सीमित मानी जाती थी, अब विविध क्षेत्रीय जातीय सांस्कृतिक परिदृश्य तक फैलती नज़र आई। जो देश की विविधता का साहित्यिक सम्मान नजर आ रहा है।

युवा पुरस्कारों के माध्यम से 23 नवोदित लेखकों को मान्यता मिली, जिनकी रचनाएँ शहर और गाँव के नए तनावों, पलायन, नौकरी ,संस्कृति, लैंगिक असमानता, पर्यावरण संकट, तकनीकी बदलाव और आध्यात्मिकता की नई खोज को केंद्र में रखती हैं। इन युवाओं की भाषा में एक तरफ़ लोक अनुभव की जड़ें हैं, तो दूसरी ओर वैश्विक संदर्भों की खुली हवा भी अभिव्यक्त हो रही है। इसीलिए उनकी कविता और कथा में ‘स्थानीय’ और ‘वैश्विक’ अनुभव एक साथ संवाद करते दिखते हैं।

बाल साहित्य पुरस्कारों के ज़रिये 24 रचनाकारों को सम्मान मिला, जिन्होंने बच्चों के लिए ऐसी किताबें लिखीं जिनमें लोक कथा, विज्ञान, पर्यावरण, हास्य और मानवीय संवेदना को जोड़कर नई पीढ़ी के लिए एक जीवंत, कल्पनाशील और नैतिक रूप से संवेदनशील पाठ्य जगत तैयार किया गया।

निश्चित ही सम्मान, पुरस्कार लेखकीय ऊर्जा होते हैं। राज आश्रय से परे ढेरों संस्थान देश में कई साहित्यिक पुरस्कार आयोजन कर रहे हैं, जिनके चलते साहित्यिक समाचार सुर्खियां बनते हैं।

विनोद कुमार शुक्ल की अब तक की सर्वाधिक रॉयल्टी हिंद युग्म प्रकाशन द्वारा दी गई । 2025 की हिंदी दुनिया में ये सबसे उत्साहजनक घटनाओं में से एक रही । वरिष्ठ कथाकार, कवि विनोद कुमार शुक्ल को एक ही पुस्तक पर मिली यह असाधारण रॉयल्टी, उनकी बहुचर्चित कृति ‘दीवार में खिड़की रहती थी’, जो मूलतः दशकों पहले प्रकाशित हुई थी, के नए संस्करणों की अप्रत्याशित बिक्री के परिणामस्वरूप (लगभग 30 लाख रुपये की रॉयल्टी ,करीब छह महीनों की अवधि के लिए) उन्हें प्राप्त हुई। इस घटना ने सोशल मीडिया से लेकर पत्र पत्रिकाओं तक व्यापक चर्चा छेड़ दी,क्योंकि आम धारणा यही रही है कि हिंदी में लेखक को आर्थिक रूप से सम्मानजनक प्रतिफल शायद ही कभी मिल पाता है। रॉयल्टी के विपरीत हिंदी लेखक अपने ही पैसे से किताबें प्रकाशित करवा रहे हैं।

यह रॉयल्टी हिंदी युग्म जैसे अपेक्षाकृत नए प्रकाशक द्वारा दी गई, जिसने आक्रामक मार्केटिंग, सुंदर कलेवर, उचित मूल्य निर्धारण और ऑनलाइन ,ऑफ़लाइन दोनों चैनलों का उपयोग करके एक लगभग ‘क्लासिक’ हो चुकी कृति को नए पाठक वर्ग तक पहुँचा दिया। रिपोर्टों में यह संकेत मिलता है कि कुछ ही महीनों में इस एक किताब की 80से 90 हज़ार के आसपास प्रतियाँ बिकीं, जो हिंदी के लिए इन दिनों असामान्य सा आँकड़ा है। इससे दो बातें स्पष्ट हुईं, पहली, कि यदि पारदर्शी रॉयल्टी प्रणाली और मज़बूत वितरण रणनीति अपनाई जाए तो हिंदी में भी लेखक आर्थिक रूप से सम्मानजनक स्थिति हासिल कर सकता है। दूसरी, कि पाठकों के बीच गंभीर, जटिल और कलात्मक साहित्य के लिए भी पर्याप्त जिज्ञासा और तैयार मनोवृत्ति नई पीढ़ी में भी मौजूद है।

पिछले वर्षों में विनोद शुक्ल की रॉयल्टी को लेकर पुराने प्रकाशकों से हुए विवादों और संघर्षों ने यह प्रश्न बार बार उठाया था कि हिंदी में कॉपीराइट और रॉयल्टी की व्यवस्था कितनी पारदर्शी और न्यायपूर्ण है। 2025 की यह घटना उस संघर्ष के एक सकारात्मक पड़ाव की तरह दिखी, जिसने हिंदी प्रकाशन जगत को अपने तौर तरीकों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया और युवा लेखकों को यह आश्वस्ति भी दी कि वे अपने श्रम के आर्थिक अधिकारों को लेकर मुखर हो सकते हैं।

आशा करना चाहिए कि इस घटना के दूरगामी साहित्यिक प्रभाव आगामी बरसों में देखने मिलेंगे ।

आजतक का साहित्य उत्सव: मीडिया और साहित्य का संगम

2025 में आजतक जैसे बड़े न्यूज़ चैनल द्वारा आयोजित साहित्य उत्सव ने यह दिखाया कि ‘न्यूज़ इंडस्ट्री’ और ‘लिटरेरी पब्लिक स्फ़ेयर’ के बीच की दूरी लगातार कम हो रही है। इस मंच पर कथाकारों, कवियों और आलोचकों के साथ साथ टीवी एंकर, फ़िल्म निर्माता, स्टैंड अप कॉमेडियन और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर भी संवाद में शामिल हुए। इन सत्रों में राजनीति, धर्म, जाति, स्त्री विमर्श, दलित बहुजन चिंतन, पहचान की राजनीति और अभिव्यक्ति की सीमाओं पर खुलकर बातचीत हुई कभी बहस के रूप में, कभी सहज बातचीत के रूप में।

इस उत्सव का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि साहित्य को केवल ‘गंभीर’ और ‘संकुचित’ बौद्धिक दायरे से बाहर निकालकर उसे एक लोकप्रिय, टेलीविज़न फ्रेंडली रूप में देश भर के दर्शकों तक पहुँचाया गया। यहाँ राय निर्माण और ‘ट्रेंड’ बनने की प्रक्रिया लाइव टीवी और सोशल मीडिया के ज़रिये एक साथ चलती है; इसलिए यह उत्सव साहित्य के ‘माध्यमिकरण’ (mediatization) का भी उदाहरण बनता है, जहाँ रचनाकार को यह देखना पड़ता है कि उसकी बात किस तरह क्लिप, रील और वायरल अंशों में बदलेगी, और फिर भी वह अपने विचार की जटिलता और ईमानदारी को कैसे बचाए रखे।

‘विश्व रंग’ और अन्य बड़े महोत्सव: वैश्विक क्षितिज पर हिंदी

भोपाल से शुरू हुआ ‘विश्व रंग’ 2025 तक आते आते हिंदी और भारतीय भाषाओं के बड़े अंतरराष्ट्रीय साहित्य कला उत्सवों में शुमार हो चुका है। इस वर्ष के संस्करण में कविता, कहानी, नाटक, आलोचना, लोक कलाओं, चित्रकला, संगीत और सिनेमा को एक साझा मंच पर रखकर यह दिखाने की कोशिश की गई कि भाषा कला और दृश्य कला के बीच की रेखाएँ कितनी तरल होती जा रही हैं। भारत के विभिन्न राज्यों के साथ साथ यूरोप, एशिया और अफ्रीका के कई रचनाकारों की भागीदारी ने इसे ‘वैश्विक दक्षिण’ के एक बड़े सांस्कृतिक संवाद स्थल में बदल दिया।

‘विश्व रंग’ के कई सत्र अनुवाद पर केंद्रित रहे क्योंकि हिंदी और भारतीय भाषाओं को विश्व पटल पर मज़बूत बनाने के लिए अनुवाद ही वह सेतु है, जो स्थानीय अनुभूतियों को अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक पहुँचाता है। यहाँ यह चर्चा भी हुई कि अनुवाद केवल भाषा बदलाव नहीं, बल्कि सत्ता संबंधों, बाज़ार की रणनीतियों और वैचारिक चयन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। कौन सा लेखक अनूदित होगा, किस भाषा में, किस पाठक समूह के लिए, ये सब जटिल प्रश्न हैं। इसी के समानांतर देश भर में अलग अलग शहरों में होने वाले साहित्य उत्सवों और पुस्तक मेलों ने यह दिखाया कि अब साहित्यिक गतिविधियाँ केवल दिल्ली या कुछ महानगरों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि छोटे टे शहर भी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के साथ इस परिदृश्य में सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं। दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला हर वर्ष ढेरों नई किताबें और विमर्श के नए बौद्धिक आयाम लाता है। भोपाल से भी स्तरीय किताबें , तथा नियमित लेखन किया जा रहा है। और भोपाल साहित्य का मुखर स्वर बन रहा है।

लेखकों के निधन और साहित्यिक स्मृति

2025 के वर्ष में जहाँ एक ओर उत्सवों और पुरस्कारों से भरी हलचल रही, वहीं दूसरी ओर कुछ महत्त्वपूर्ण वैश्विक और भारतीय लेखकों के निधन ने साहित्य जगत को शोकाकुल भी किया। विश्व साहित्य में समलैंगिक जीवन, आधुनिकता, अकेलेपन और प्रेम के जटिल अनुभवों को सूक्ष्मता से दर्ज करने वाले अमेरिकी उपन्यासकार एडमंड व्हाइट का 85 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनकी रचनाएँ केवल व्यक्तिगत कामुकता की नहीं, बल्कि उस सामाजिक और राजनीतिक माहौल की गवाही भी हैं, जिसमें LGBTQ+ समुदाय ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

इसी वर्ष अन्य अनेक देशों के लेखकों, समीक्षकों और अध्येताओं के निधन दर्ज हुए, जिनके नाम और कृतियाँ विभिन्न प्लेटफ़ॉर्मों पर ‘2025 में विदा हुए लेखक’ जैसी सूचियों के रूप में संकलित की गईं। ऐसी सूचियाँ यह याद दिलाती हैं कि समकालीन पाठक जिन किताबों को आज सामान्य मानकर पढ़ता है, उनके पीछे दशकों की साधना, संघर्ष, आर्थिक असुरक्षा और अक्सर सामाजिक अस्वीकार भी छिपा होता है। किसी लेखक का निधन केवल ‘एक व्यक्ति की मृत्यु’ नहीं, बल्कि एक विशिष्ट संवेदना जगत, एक विशिष्ट भाषा लहजे और अनुभव दृष्टि का अवसान भी होता है, जिसे केवल उसकी किताबें ही भविष्य के लिए बचाकर रख पाती हैं।

2025 में हिंदी के कई महत्वपूर्ण साहित्यकारों का निधन हुआ, जिनमें भोपाल के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’जिन्होंने गीता, मेघदूत, रघुवंश जैसे ग्रंथों का हिंदी भाव अनुवाद किया, और उन्हें भारतीय भाषा परिषद के सम्मान से सम्मानित किया गया था, प्रो राम दरश मिश्र, कहानीकार राजी सेठ लखनऊ के वरिष्ठ व्यंग्यकार अनूप श्रीवास्तव, गोपाल चतुर्वेदी आदि का जाना साहित्य जगत को रिक्तता का अहसास करा गया ।

2025: साहित्य की दिशा पर समेकित दृष्टि

इन सारी घटनाओं , नोबेल सम्मान, साहित्य अकादेमी पुरस्कारों, विनोद कुमार शुक्ल की रॉयल्टी, आजतक का साहित्य उत्सव, ‘विश्व रंग’ जैसे अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों और अनेक रचनाकारों के निधन को एक साथ समग्रता से देखें तो 2025 साहित्य के लिए एक द्वंद्वपूर्ण लेकिन आशाजनक वर्ष के रूप में सामने आता है। एक ओर पुरस्कार और उत्सव यह दिखाते हैं कि साहित्य अब भी सांस्कृतिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक संवाद का एक प्रमुख माध्यम है, दूसरी ओर रॉयल्टी, कॉपीराइट और मार्केटिंग से जुड़ी बहसें साफ़ करती हैं कि रचनाकार के श्रम का आर्थिक न्याय अभी अधूरा है, लेकिन उसकी दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठने लगे है।

साथ ही, वैश्विक और भारतीय मंचों पर हाशिए के समुदायों दलित, आदिवासी, स्त्री, प्रवासी, अल्पसंख्यक की आवाज़ों को बढ़ती प्रमुखता मिलना यह संकेत देता है कि भविष्य का साहित्य और अधिक बहुवचन, अधिक लोकतांत्रिक और अधिक आत्म आलोचनात्मक होगा। साहित्यिक उत्सवों का ‘मीडियाकरण’ जहाँ एक जोखिम और चुनौती है, वहीं यह अवसर भी है कि लाखों लोग उन बहसों से परिचित हों, जो पहले केवल पत्रिकाओं के सीमित पाठक समूह तक पहुँचती थीं। इस अर्थ में 2025 को ऐसे वर्ष के रूप में याद किया जा सकता है जिसमें साहित्य ने बाज़ार और मीडिया के दबावों के बीच भी अपने मानवीय, आलोचनात्मक और स्वप्नद्रष्टा रूप को बचाए रखने की ज़िद जारी रखी।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार 

आजकल न्यूयॉर्क में

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८६६ ⇒ हथेली और तलवा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हथेली और तलवा।)

?अभी अभी # ८६६ ⇒ आलेख – हथेली और तलवा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हाथ और पांव हमारे शरीर के दो महत्वपूर्ण अंग हैं। किसी से दो दो हाथ करने के लिए अगर ईश्वर ने हमको दो हाथ दिए है, तो दो कदम चलने के लिए दो पांव भी दिए हैं।

हाथ की पांचों उंगलियों के बीच कोमल, नरम गद्दे सी हथेली स्थित है। जब भी हमारी मुट्ठी बंधती है, हमारी हथेली गर्म हो जाती है। कहा भी तो गया है, बंद मुट्ठी लाख की। वैसे भी मुट्ठी भर पैसे के लिए, जो हाथ का ही मैल है, किसी के आगे हाथ पसारना कहां की समझदारी है। ।

तलवा भी हथेली ही की तरह पांव के पंजों और एड़ियों के बीच सुरक्षित है। तलवा, पांव का सबसे कोमल स्थान है, हथेली की तरह नर्म, गर्म, और कोमल। पूरे शरीर का बोझ पांव के पंजे और एड़ियों पर ही होता है, तलवों को बड़े आराम से रखा जाता है। एड़ियां रगड़ी जाती हैं, तब जाकर काम चलता है। लोगों की एड़ियां ही फटती हैं, तलवे बड़े सुरक्षित रहते हैं।

हथेली और तलवे अपना अपना नसीब लिखाकर लाए हैं ! हथेलियां चूमी जाती हैं, और तलवे चाटे जाते हैं। हम जिसे हथेली पर रखते हैं, उसकी हथेली को प्यार से चूम भी सकते हैं। लेकिन जान हथेली पर कैसे रखी जाती है, यह एक अनबूझ पहेली है।

मैंने लोगों को हथेलियों को चूमते तो देखा है, लेकिन किसी को तलवे चाटते नहीं देखा। बच्चों की प्यारी प्यारी हथेली अक्सर मुट्ठी में बंद रहती है। कहते हैं, बच्चों की मुट्ठी में उनकी तकदीर लिखी होती है। हम जब किसी को अपना हाथ दिखाते हैं, तो वह हमारे हाथ की लकीरें पढ़कर हमारा भविष्य बताता है। ये सारी लकीरें हथेली में ही तो होती है। हथेली, हाथ ही का तो अंग है। ।

हथेली को पाम palm भी कहते हैं, और हस्त रेखा विज्ञान को पामिस्ट्री। हथेली पर पर्वत भी होते हैं, जी हां इन्हें मांउटस कहते हैं। मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और चन्द्र सब यहीं विराजमान होते हैं। हथेली और तलवों पर एक्यूप्रेशर चिकित्सा भी की जाती है। विभिन्न प्रेशर पॉइंट्स को दबाकर रोगों की चिकित्सा ही एक्यूप्रेशर है।

हथेली पर सरसों नहीं जमता, यहां तक तो ठीक है। लेकिन ख़ोपरे का जमा हुआ तेल हथेली की नर्मी और गर्मी से पिघल अवश्य जाता है। इंसान कितना भी कठोर हो, पत्थर दिल हो, उसकी हथेली और तलवे कोमल ही होंगे। ।

बच्चों की नाज़ुक हथेली को अपने हाथ में ले, जब चट्टी, मट्टी खेली जाती है, तो बच्चों का खिलखिलाना शरीर और मन की पूरी थकान दूर कर देता है। उसके कोमल कोमल तलवों पर जब गुदगुदी की जाती है, घोड़ा आया, घोड़ा आया, सुनकर जब वह खुलकर हंसता है, तब एक ऐसी आध्यात्मिक अनुभूति होती है, मानो हमारे साथ साक्षात बाल गोपाल क्रीड़ा कर रहे हों।

गुदगुदी हर उम्र में होती है, कभी मन में, कभी तन में। रात को सोते वक्त अपने तलवों की मालिश करके सोएं, नींद अच्छी आएगी। प्रातःकाल उठते ही अपनी हथेलियों को आपस में रगड़ें, गर्म गर्म हाथों को आंखों पर रखें, बड़ा सुकून मिलेगा। ।

कराग्रे वसते लक्ष्मीः, करमध्ये सरस्वती।

करमूले तु गोविन्दः, प्रभाते करदर्शनम्॥

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५८ – देश-परदेश – राष्ट्रीय गणित दिवस : 22 दिसंबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५८ ☆ देश-परदेश – राष्ट्रीय गणित दिवस : 22 दिसंबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆

प्रातः काल समाचार पत्र से ज्ञात हुआ कि आज देश में गणित दिवस मनाया जाता है। गणित जैसा विषय जिसको याद कर हमारे पसीने छूट जाते हैं। पाठशाला के दिनों में क्या ही हाल हुआ करता होगा?

हमारी गणित की कमजोरी का लाभ सब से अधिक हमारे करीबियों ने उठाया था। बाल्य काल में मोहल्ले  के बच्चे “छुपन छुपाया” के खेल में अस्सी, नब्बे गिन कर हमेशा, हम से ही ढूंढने का कार्य करवाया करते थे। बाकी सभी बच्चे मस्ती कर कहीं छुप जाते थे।

घर में जब सर्दी के दिनों में देसी घी और मेवे से बने लड्डू (पिन्नी) बनती थी, तब हमारे बड़े भाई अपनी गणित विषय की प्रवीणता के कारण हेरा फेरी कर हमारे हिस्से से टी डी एस काट कर अपने हिस्से में रख लेते थे।

घर आए मेहमान जब भी दो रुपए देकर जाते थे, बड़े भैया तीन भाई बहन में पता नहीं कौन से फार्मूले से बांटते थे, हम सब से कम राशि प्राप्तकर्ता हुआ करते थे। हो सकता है, दो बिल्लियों में बंदरबांट वाली कहानी उन्होंने बहुत पहले पढ़ रखी होगी।

आज भी बाज़ार में 70% तक की सेल का ऑफर हो या 10%+10% की छूट के गणित को बिना समझे ठगे चले आ रहें हैं।

गणित की कमजोरी का लाभ हमारे जिगरी दोस्त भी खूब उठाते हैं। ठेले पर जब गोल गप्पे खाने जाते है, हमारे हिस्से के एक दो गोल गप्पे, मित्र डकार ही जाते हैं।

अब और अधिक नहीं बताऊंगा, लेकिन पिछले चार दशकों से धर्मपत्नी भी हमारे द्वारा उनको दी गई धन राशि को कभी जरूरत के समय मांगने पर मय सूद वसूल ही लेती हैं, वैसे इस गणित से तो हम सब ही पीड़ित हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८६५ ⇒ ला – परवाह ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ला – परवाह।)

?अभी अभी # ८६५ ⇒ आलेख – ला – परवाह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बड़ी विचित्र है यह दुनिया। जिसे खुद की परवाह नहीं, जिसे अपने हित अहित की चिंता नहीं, उससे हम यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वह कहीं से परवाह लेकर आए। बस कह दिया लापरवाह ! पर वह जाए तो कहां जाए परवाह ढूंढने, तलाशने।

भाषा कोई भी हो, एक ही शब्द के थोड़े फेर बदल से न केवल उसका अर्थ बदल जाता है, कभी कभी बड़ी विचित्र स्थिति भी पैदा हो जाती है। अब जवाब को ही ले लीजिए ! किसी से जब कोई प्रश्न पूछा जाता है, तो जवाब तलब किया जाता है। अगर उसने जवाब नहीं दिया तो हम नहीं कहते लाजवाब। यही कहते हैं, क्यों क्या हुआ ! मुंह में क्या दही जमा हुआ है ? और अगर कोई सेर को सवा सेर मिल गया, तो वाह जनाब ? अब कहकर देखिए लाजवाब। ।

ऐसी कोई बीमारी नहीं, जिसका इलाज संभव नहीं, लेकिन संजीवनी बूटी लाना भी सबके बस की बात नहीं, इसलिए कुछ बीमारियों को हम लाइलाज मान बैठते हैं। कोई इलाज ला नहीं सकता, बीमारी ठीक नहीं हो सकती, इसलिए वह लाइलाज हो गई। बड़ी से बड़ी बीमारी का इलाज संभव है लेकिन किसी के स्वभाव अथवा फितरत का कोई क्या करे। वह लाइलाज है।

जवाब से ही जवाबदार शब्द बना है जिसे अंग्रेज़ी में रिस्पांसिबल कहते हैं। जो काम जिसके जिम्मे, वह उसके लिए जिम्मेदार। अगर काम नहीं किया तो वह

इरेस्पोंसीबल हो गया। बोले तो गैर ज़िम्मेदार। वैसे गैर का मतलब दूसरा होता है। तो जिसके लिए वह जिम्मेदार है, उसके लिए कोई गैर कैसे जिम्मेदार हो गया। ।

भाषा और व्याकरण में बहस नहीं होती। Put पुट होता है और but बट। जिस तरह knife में k साइलेंट होता है और psychology में पी साइलेंट होता है, उसी तरह जो अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाता, उसके लिए वह ही जिम्मेदार होता है, कोई दूसरा नहीं। और यह गैर जिम्मेदार इंसान भी वह खुद ही होता है, कोई ऐरा गैरा नहीं।

परवाह कहीं से लाई नहीं जाती, उसे भी जिम्मेदारी की तरह महसूस किया जाता है। हमें अपनी ही नहीं, अपने वालों की भी परवाह हो, अपने परिवेश और पर्यावरण के प्रति हम जागरुक रहें, परिवार, समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियों को समझें। सभी समस्याओं और बीमारियों का निदान संभव भी नहीं होता। प्रयत्नरत रहते हुए जीवन के सच को स्वीकारना भी पड़ता है। ।

दो विपरीत दर्शन हैं जीवन के ! मेहनत करे इंसान तो क्या काम है मुश्किल। निकालने वाले पत्थरों और पहाड़ों में से भी रास्ता निकाल लेते हैं तो कहीं कभी कभी जीवन में रास्ता ही नजर नहीं आता। किसी रोशनी की, मददगार की, रहबर की जरूरत महसूस होती है।

जिसका कोई हल नहीं, कोई निदान नहीं, कभी कभी उसके साथ साथ भी चलना ही पड़ता है। What cannot be cured, must be endured. हमारी सहन शक्ति और इच्छा शक्ति की वास्तविक परीक्षा संकट के समय ही होती है। यही वह पल होता है जब हमें अपनी जिम्मेदारी का अहसास होता है, हमें अच्छे बुरे की पहचान होती है। अपनों की परवाह होती है। और लापरवाही दूर खड़े तमाशा देख रही होती है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८६४ ⇒ लेखन और अवचेतन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लेखन और अवचेतन।)

?अभी अभी # ८६४ ⇒ आलेख – लेखन और अवचेतन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लेखन का संबंध सृजन से है, चेतना और विचार प्रक्रिया से है। पठन पाठन, अध्ययन, चिंतन मनन, अनुभव और अनुभूति के प्रकटीकरण का माध्यम है लेखन, जिसमें वास्तविक घटनाओं एवं कल्पनाशीलता का भी समावेश होता है। एक अच्छे लेखक के लिए, एक अच्छी याददाश्त और अनुभवों का खजाना बहुत जरूरी है। अगर चित्रण रुचिकर ना हुआ, तो लेखन नीरस भी हो सकता है।

जिन लोगों का चेतन अधिक सक्रिय होता है, वे अच्छे लेखक बन जाते हैं लेकिन जिनका अवचेतन अधिक प्रबल होता है, वे केवल सपने ही देखते रह जाते हैं। ।

लेखन की ही तरह एक संसार सपनों का भी होता है, जहां कथ्य भी होता है, घटनाएं भी होती है, सस्पेंस, रोमांस और मर्डर मिस्ट्री, क्या नहीं होता अवचेतन के इस संसार में ! लेकिन अफसोस, यहां कर्ता केवल दृष्टा बनकर सोया होता है, मानो किसी ने उसके हाथ पांव बांधकर पटक दिए हों। जब इस लाइव टेलीकास्ट वाले एपिसोड का अंत आने वाला होता है, तब उसे सपने के अवचेतन के चंगुल से मुक्त कर होश में ला दिया जाता है। ना कोई

डायरी ना कोई वीडियो शूटिंग, सब कुछ सपना सपना।

सपना मेरा टूट गया। जागने पर चेतन मन अवचेतन की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश जरूर करता है, लेकिन कामयाब नहीं होता, क्योंकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था। जागृत और सुषुप्तावस्था में यही तो अंतर है। सोते समय बहुत कुछ याद रहता है, जो अवचेतन को प्रभावित करता है, लेकिन जागने के बाद अवचेतन मन इतना प्रभावित नहीं करता। सपनों के सहारे कोई लेखक नहीं बना। केवल जाग्रत प्रयास से ही कई लेखकों के सपने सच हुए हैं और वे एक अच्छा लेखक बन पाए हैं। ।

लेखन साहित्य का विषय है मनोविज्ञान का नहीं, सपने और अवचेतन, मनोविज्ञान का विषय है, लेखन का नहीं। लोग कभी सपनों को गंभीरता से नहीं लेते, उनकी अधिक रुचि सपनों को सच करने में होती है, जो जाहिर है, कभी कभी सपने में भी सच हो जाती है, जब वे कहते हैं, मैने तो सपने में भी नहीं सोचा था, मैं एक सफल लेखक बन पाऊंगा।

सपनों का एक लेखक के जीवन में कितना योगदान होता है, यह तो कोई लेखक ही बता सकता है। सुना है लेखन में एक लेखक को इतना आत्म केंद्रित होना पड़ता है कि भूख प्यास और नींद सब गायब हो जाती है। मुर्गी की तरह विचार अंडा देने को बेताब होते हैं और तब तक देते रहते हैं, जब तक सुबह मुर्गा बांग नहीं दे देता। उधर सूर्योदय और इधर हमारे सूर्यवंशी जी ऐसी तानकर सोते हैं कि आप चाहो तो घोड़े बिकवा लो।

सपना तो पास ही नहीं फटक सकता उनके और गहरी नींद के बीच।

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८६३ ⇒ डाॅ अनोख सिंग☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डाॅ अनोख सिंग।)

?अभी अभी # ८६३ ⇒ आलेख – डाॅ अनोख सिंग ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ लोग अनोखे होते हैं तो कुछ लोगों के नाम में कुछ अनोखापन होता है, लेकिन डाॅ अनोख सिंग तो यथा नाम तथा गुण थे यानी एक अनोखे दिलचस्प इंसान। किसी व्यक्ति के आगे डॉक्टर लगते ही यह भ्रम हो जाता है कि जरूर वह कोई डॉक्टर होगा, और वाकई अनोख सिंग एक डॉक्टर ही थे।

भले ही जात न पूछो साधु की, लेकिन किसी डॉक्टर की डिग्री तो परख ही लेनी चाहिए। चिकित्सा एक व्यवसाय है और आजकल जितने रोग उतने डॉक्टर ! एलोपैथी की तरह ही कई समानांतर चिकित्सा आज उपल्ब्ध है, जिनमें एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर प्रमुख हैं। डा अनोख सिंग एक्यूपंक्चर चिकित्सा में पारंगत थे और दमा यानी अस्थमा का इलाज करने माह में एक बार भटिंडा से इंदौर आते थे। वे नियमित रूप से माह के हर पहले रविवार और सोमवार को आते मरीजों का इलाज करते थे। ।

उनके पास कोई जादू की छड़ी अथवा भभूत नहीं थी, लेकिन हां एक झोला जरूर था जिसमें कुछ सुइयां थीं, जो मरीजों को चुभाई जाती थी। डॉक्टर तो वैसे भी कसाई ही होते हैं, जब कि यह तो सिर्फ सुई ही चुभाता था। हमारे शरीर में हर बीमारी के कुछ पॉइंट्स होते हैं, जिनमें कहीं एक्यूप्रेशर काम करता है तो कहीं /एक्यूपंक्चर।

सर्दी जुकाम, नजला और खांसी जब बेइलाज हो जाती है, तो वह सांस का रोग बन जाती है। कई इलाज हैं अस्थमा के एलोपैथी में ! गोली, इंजेक्शन, और सबसे अधिक कारगर इन्हेलर। बस मुंह खोलें और फुस फुस करते हुए दवा मुंह के अंदर। मछली की तरह तड़फता है एक दमे का रोगी, जब उसकी सांस उखड़ जाती है। एलर्जी टेस्ट से निदान में सहायता अवश्य मिलती है। कुछ लोग तो साउथ जाकर मछली का सेवन भी करने को तैयार हो जाते हैं तो कुछ आयुर्वेद पर भरोसा करते हैं। ।

अगर मैं भी सांस का शिकार ना होता तो शायद इस अनोखे इंसान से मिल भी नहीं पाता। किसी भुक्तभोगी सज्जन ने मुझे ना केवल इनकी जानकारी ही दी, एक दिन इनसे मेरा एक मरीज के रूप में परिचय भी करा दिया। छः फिट का एक आकर्षक खुशमिजाज सरदार, मानो अभी फौज से ही लौटकर आया हो।

नाम बताइए ? मैने अपना नाम बताया, पी के शर्मा !

उन्होंने मुझे घूरा अथवा निहारा, फिर बोले, महाराष्ट्र में हमें एक पी के झगड़े मिले थे, और हंस दिए।

हमारा उपचार शुरू हुआ, हमें भी छाती सहित कुछ जगह सुइयां चुभाई गई। खटमल मच्छर के काटने से थोड़ा अधिक दर्द भी महसूस हुआ, लेकिन असहनीय नहीं। केवल बीस मिनिट का खेल था सुइयां चुभाने का। हिदायतों का पिटारा लिए हमने उनसे विदा ली। ।

नीम हकीम, खतरे जान ! हम जहां भी गए हैं, अंध श्रद्धा नहीं, कुछ शंका लेकर ही गए हैं। सोचा अगर तत्काल असर ना भी हुआ तो अपनी दर्द निवारक सांस की गोली तो पास है ही। कुछ दिन तक हम अपनी सांस ढूंढते रहे लेकिन सांस ने उखड़ने से साफ इंकार कर दिया। हमें लगा डॉक्टर तेरा जादू चल गया।

अगले माह डॉक्टर ने फिर बुलाया था। मरीजों की भीड़ कहां नहीं, कितनी बीमारियां कितने रोग ! मुझे देखकर मुस्कुराए, कैसे हो झगड़े साहब ? यानी यहां मेरा नामकरण भी हो चुका था। अब मैं उनसे झगड़ा करने से तो रहा, क्योंकि उन्होंने मुझे पी.के.झगड़े के इतिहास के बारे में पहले ही बता दिया था। वे जितने आत्मीय थे, उतने ही मजाकिया भी।

हंसते हंसते सुइयां चुभाना कोई उनसे सीखे। ।

हर मरीज से उनका वार्तालाप बड़ा रोचक होता था। एक रिश्ता जो मन को भी मजबूत करे और रोगी में विश्वास का संचार करे। कई क्रॉनिक पेशेंट्स को स्ट्रेचर पर लाया जाता था, दूर दूर से रोगी इसी आस से आते थे, कि सांस में कुछ फायदा हो। लेकिन अगर हर डॉक्टर मसीहा ही होता तो शायद इस संसार में कोई रोगी ही नहीं होता।

हर व्यक्ति के जीवन में उतार चढ़ाव आते है, डाॅ अनोख सिंग भी आखिर थे तो एक इंसान ही। एक बार उन्हें लकवा मारा, फिर उठ खड़े हुए, बेटे की मौत का सदमा भी हंसते हंसते झेला, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी। जब भी वापस आते, उसी उत्साह और उमंग के साथ। जिस माह नहीं आते, मरीज निराश हो जाते। ।

मैं हमेशा उनके लिए मिस्टर पी.के.झगड़े ही रहा। हमेशा सबसे मेरा परिचय यही कहकर कराते, ये झगड़े साहब हैं, लेकिन कभी हमसे नहीं झगड़ते। कोरोना काल में उनका आना जो एक बार बंद हुआ तो हमेशा के लिए ही हो गया। कोरोना ने उनको भी नहीं छोड़ा।

आज जब भी कभी थोड़ी सांस उखड़ती है अथवा किसी अस्थमा के मरीज को देखता हूं, तो अनायास ही इस अनोखे इंसान की याद आ जाती है। कुछ सुइयां रिश्तों की भी होती हैं, जब याद आती है, बहुत चुभती है। एक ऐसा दर्द जो मर्ज को ही गायब कर दे। क्या इसे ही रिश्तों का मीठा दर्द कहते हैं, सुइयां चुभाने वाले डाॅ अनोख सिंग अगर आज होते, तो जरूर जवाब देते। ।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०२ ☆ फ्रेम में सजी तस्वीर… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख फ्रेम में सजी तस्वीर। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०२ ☆

☆ फ्रेम में सजी तस्वीर… ☆

सुगंधा तीन विषयों में एम•ए• थी तथा हर कला में पारंगत थी।वह स्कूल में अध्यापिका के पद पर कार्यरत थी।उसका विवाह एक बैंक कर्मचारी के साथ हुआ था।भरा-पूरा परिवार पाकर वह बहुत प्रसन्न थी।वह दिन भर घर के कामों में व्यस्त रहती तथा सबको खुश रखने की चेष्टा करती। वह सब की आशाओं पर ख़रा उतरने का भरसक प्रयास करती।

एक माह पश्चात् उसने स्कूल जाना प्रारंभ कर दिया। इसी बीच उसके पति ने एक योजना बनाई और उसे कार्यान्वित करने का अवसर तलाशने लगा। एक दिन उसने सुगंधा से कहा कि उसका मित्र मेडिकल अस्पताल में दाखिल है, उसे देखने चलेंगे।सो! उस दिन वह स्कूल से जल्दी लौट आई और तैयार होकर  पति के साथ जल दी।

वह बहुत खुश थी कि आज उसकी पिकनिक हो जाएगी और पति के साथ अकेले समय गुज़ारने का अवसर भी प्राप्त होगा। वे सीधे उसके मित्र के पास गये और उसका पति सुगंधा को अपने मित्र के पास छोड़कर उसकी दवाइयां लेने के बहाने, वहां से चला गया। इसी बीच वह सुगन्धा की पर्ची बनवा कर व उसका ट्रीटमेंट लिखवा कर लौट आया।   

सुगन्धा पति की प्रतीक्षा करते-करते थक गई थी। उसने आते ही पति से शिकायत की और उस ने क्षमा-याचना करते हुए उसे वापस घर चलने को कहा। रास्ते में उन्होंने होटल में खाना खाया और उससे कुछ कागज़ों पर हस्ताक्षर करने को कहा। रास्ते में उसने उसे बताया कि वह उसके नाम कुछ पैसा जमा कर पा रहा है… यह कागज़ उसी पॉलिसी के हैं।

वह मन ही मन फूली नहीं समा रही थी कि उसका भाग्य कितना अच्छा है… कितना अच्छा जीवन साथी मिला है उसे, जो उसका आवश्यकता से अधिक ख्याल करता है। वे दोनों हंसी-खुशी से देर रात घर लौट आए।

एक सप्ताह के पश्चात् सुगन्धा के श्वसुर ने उसके माता-पिता को बुलवाया तथा उसे घर ले जाने का फरमॉन सुनाया, जिसे सुनकर वे सकते में आ गये। उन्होंने उन पर इल्ज़ाम लगाया कि ‘उनके साथ धोखा हुआ है…उन्होंने अपनी पागल बेटी को उनके माथे मढ़ दिया है। इसलिए वे उसे अपने घर में नहीं रख सकते। इसके साथ ही उन्होंने उस पर यह भी आरोप लगाया कि उनकी बेटी चरित्रहीन है तथा वह स्वयं उनके बेटे से तलाक़ लेना चाहती है, जिसका प्रमाण वे अपनी आंखों से देख सकते हैं।

सुगन्धा के माता-पिता की बातें सुनकर उनके पांव तले से ज़मीन खिसक गयी। वे ग़ुहार लगा रहे थे कि उनकी बेटी सुशील है, पढ़ी-लिखी है, नौकरी भी करती है। सो! वे उस पर ऐसे घिनौने इल्ज़ाम लगा कर उन्हें शर्मिंदा न करें।

सुगंधा के आते ही उन्होंने उसे घर से निकल जाने को कहा। उसे काटो, तो खून नहीं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था– कि आखिर माज़रा क्या है? उसके नेत्रों से अजस्त्र अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। सुगंधा उन्हें विश्वास दिलाने का प्रयास कर रही थी कि वह तो कभी ऐसा सोच भी नहीं सकती। वह तो यहां पर बहुत खुश है।

इसलिए सुगन्धा ने अपने माता-पिता से लौट जाने का कहा कि वह स्वयं ही सब ठीक कर लेगी।उसने अपने पति के आने पर उससे सब कुछ कह डाला, परंतु ढाक के वही तीन पात। यह सब तो उनकी चाल थी। उसका पति किसी अन्य लड़की से विवाह करना चाहता था। इसलिए उसने माता-पिता की आज्ञा पालन हेतु उससे विवाह तो कर लिया, परंतु वह अपनी प्रेयसी को धोखा नहीं देना चाहता था। सो! उससे मुक्ति पाने के लिए उसने सुगन्धा को पागल करार कर दिया तथा कोर्ट में तलाक़ की अर्ज़ी लगा दी। रात के घने अंधकार में सुगन्धा को घर से बाहर निकाल दिया।

सुगन्धा के माता-पिता भारी मन से लौट गये, परंतु वे समझ नहीं पा रहे थे कि उनके साथ यह सब क्यों और कैसे हो गया? उनका अनुमान था कि उसने पैसा देकर उसके पागल होने का प्रमाण-पत्र बनवाया होगा तथा पालिसी के बहाने तलाक़ के कागज़ों पर दस्तख़्त करवा लिए होंगे और सुगंधा ने पति पर विश्वास कर, आँखें मूंद कर उन कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिए होंगे, जिसका परिणाम उसे भुगतना पड़ रहा है। एक पत्नी अपने पति से ऐसे विश्वासघात की कल्पना भी कैसे कर सकती है कि उसका जीवन-साथी उसके साथ ऐसा व्यवहार- विश्वासघात कर सकता है… जो सर्वथा ग़लत है, अशोभनीय है, अविश्वसनीय है, असंभव है। परंतु कलयुग में सब चलता है… ख़रा-खोटा, अच्छा-बुरा, मीठा-कड़वा।

गहन कालिमामयी अमावस्या की रात, आकाश में बादलों का गर्जन, सांय-सांय करती तेज़ हवाएं  सुगन्धा को भयभीत कर रही थीं। वह दरवाज़े की चौख़ट पर सिर टिकाए रात भर बैठी अपनी नियति के बारे में सोच रही थी और वह समझ नहीं पा रही थी कि विधाता ने उसे किस जन्म के कर्मों की सज़ा दी है? इस जन्म में तो उसने कभी कोई ग़लत काम किया नहीं, उसने तो कभी किसी के सामने अपनी ज़ुबान भी नहीं खोली… किसी को अप-शब्द तक नहीं कहे…घर से बाहर कदम भी नहीं रखा और न ही किसी के बारे में गलत सोचा है।

सुगन्धा पति के क़ारनामे को देख बहुत परेशान थी। अचानक एक कार वहां आकर रुकी, उसमें से एक व्यक्ति उतरा और उसने उसके श्वसुर का नाम लेकर घर का पता पूछा। सुगन्धा को काटो, तो खून नहीं।

वह असमंजस में थी कि वह उस अजनबी को वांछित पता बताए या चुप रहे। कार के मालिक ने पुन: प्रश्न दोहराया, परंतु उसने अनजान होने का नाटक किया।उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? मूसलाधार वर्षा में वह कहां जाए? वह अजनबी लौटकर वहीं आएगा और उसे घर के बाहर बैठा देख, प्रश्नों की झड़ी लगा देगा। सो! उसने निर्णय लिया कि वह वहां से चली जाएगी। पड़ोस के घर में जाकर दस्तक देगी और उनसे वहां रात गुज़ारने का अनुरोध करेगी। बहुत देर तक वह दरवाज़ा खटखटाती रही, परंतु कोई बाहर नहीं निकला। इसका कारण शायद तेज़ गति से होने वाली वर्षा रही होगी।

रात सुरसा के मुख की भांति लंबी होती जा रही थी। सुगन्धा सूर्य देवता के प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रही थी। विवाह के बाद का एक-एक दृश्य सिनेमा के रील की भांति उसकी आंखों के सामने घूम रहा था। वह उस चक्रव्यूह से बाहर आने की कोशिश कर रही थी, परंतु उसे सफलता नहीं मिल पा रही थी।

वह रात भर सर्दी से कांपती रही। यह कंपन केवल ठंड की नहीं थी, भय व आतंक की थी। वह जानती थी कि रईसज़ादे, गुंडे, मवाली सब रात को अपने- अपने शिकार की तलाश में निकलते हैं। वह भगवान से ग़ुहार लगा रही थी कि जिस प्रकार उसने द्रौपदी की लाज बचाई थी; गज को मगर के पाश से मुक्त कराया था; होलिका की गोद में बैठे प्रह्लाद को अग्नि की लपटों से बचाया था… उसी प्रकार वे स्याह काली रात में, विचरण करने वाले निशाचरों से उसकी रक्षा कर अभयदान प्रदान करें।

सूर्य की प्रथम रश्मि ने भोर होने का संदेश दिया और उसके मन में विश्वास ने करवट ली। उसने पति के घर पर पुन: दस्तक दी। दरवाज़ा खुला और उसे सामने देख बंद कर लिया गया। उसने साहस बटोर कर दोबारा द्वार खटखटाया तो उसके पति ने उसे फटकारते हुए कहा कि ‘कितनी निर्लज्ज हो तुम… फिर लौट आई…लगता है अब तुम्हें धक्के मार कर  इस गली से बाहर करना पड़ेगा।’ उसने रोते हुए क्षमा -याचना की तथा घर के भीतर प्रवेश पाने की ग़ुहार लगाई।

परंतु उस घर के लोग तो थे संवेदनशून्य ‘औ’ हृदयहीन… शायद उनके दिल पत्थर के हो चुके थे, किसी को उस पर तरस नहीं आया। पैदल चलते- चलते स्टेशन पहुंच कर  उसने किसी यात्री से अनुनय-विनय की…वह उसे कोलकाता जाने का टिकट दिलवा दे। पहले तो उसने आश्चर्य से उसे देखा। परंतु उसके भीगे वस्त्र तथा अश्रुसिक्त नेत्रों को देख वह समझ गया कि वह मुसीबत की मारी हुई है। उसने उसे लोकल ट्रेन का टिकट दिलवा दिया।

वह हैरान-परेशान सी अपने माता-पिता के घर पहुंची, जहां से चंद दिन पहले ही वह रुख़्सत हुई थी। माता-पिता भाई-बहन सब ने उसे बड़े अरमानों से विदा किया था। उसने अपनी व्यथा-कथा उन्हें सुनाई और वहां से लौटने की हक़ीक़त से अवगत कराया।

घर में मातम-सा पसर गया। पिता सकते में आ गये और अपने भाग्य को कोसने लगे कि कितनी मुश्किल से उन्होंने पहली बेटी का विवाह किया था, जो ससुराल से लौटा दी गई। ‘लोग क्या कहेंगे… कैसी-कैसी बातें बनाएंगे और उसकी अन्य तीन बेटियों का क्या होगा?

एक महीने पश्चात् उसके पिता ने पंचायत में अर्ज़ी लगाई, परंतु कोई समाधान नहीं निकला। कोर्ट में दर्ज मुकदमे के फैसले का वे तीन वर्ष से इंतज़ार कर रहे हैं… शायद उसे दोबारा उसी नरक में धकेलने के लिए, क्योंकि बेटियां माता-पिता के घर आंगन में अच्छी नहीं लगतीं।

सब कुछ जानते हुए भी माता-पिता ऐसे विश्वासघाती लोगों के यहां पुन: भेजने में तनिक भी संकोच नहीं करते। भले ही वे इस तथ्य से अवगत होते हैं कि उनके चंगुल से बच कर उनकी बेटी कभी ज़िंदा नहीं लौटेगी। परंतु वे अपनी झूठी आन-बान-शान व मान-मर्यादा के लिए उसे नरक में धकेल देते हैं, क्योंकि वे समाज के खोखले नियमों व दकियानूसी मान्यताओं के आतंक से डरते हैं।

सुगन्धा स्वयं को असहाय व फ़ालतू वस्तु-मात्र अनुभव कर रही थी, जो निरुद्देश्य व निष्प्रयोजन होती है और उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि ‘जैसे वह एक तस्वीर है, जिसे सुविधानुसार दो-चार दिन बाद, घर की सफाई करते हुए कभी एक कमरे के कोने में और कभी दूसरे कमरे के कोने में टांग दिया जाएगा।’

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८६२ ⇒ कल्याण ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कल्याण।)

?अभी अभी # ८६२ ⇒ आलेख – कल्याण ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ईश्वर का एकमात्र उद्देश्य इस सृष्टि का कल्याण है। सिरजनहार, पालनहार और संहारक ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही तो हैं। कल्याण

एक सर्वविदित, सार्वभौमिक, सकारात्मक शब्द है, जिसमें सबका हित, मंगल और शुभ-लाभ निहित है। गीता प्रेस गोरखपुर की मासिक पत्रिका कल्याण एक समय घर-घर आती थी। बिना किसी विज्ञापन का, कम कीमत, अधिक ज्ञानवर्धक, धार्मिक सामग्री अपने आप में समेटे हुए। परिवार के लोग बड़ी आस्था और श्रद्धा से इसे उलट-पुलटकर देख लेते थे। यही वह समय था जब सरिता-मुक्ता के साथ बच्चों का चंदामामा घर में प्रवेश पा जाता था।

जब सामंती युग था, तब राजा का जन्म प्रजा के कल्याण के लिए होता था। समय के साथ राजा बदलते गए, सामंती युग का स्थान लोकतंत्र ने ले लिया। आज भी सरकार का प्रथम एवं एकमात्र कर्तव्य आम आदमी का कल्याण है। अंग्रेज़ लोग इसे वेलफेयर ऑफ स्टेट कहते थे।।

पहले मुझे हर शब्द के डिक्शनरी मीनिंग जानने की आदत थी ! आजकल मैं भी गूगल सर्च कर लिया करता हूँ। मन हुआ, kalyaan को गूगल सर्च करूँ ! गूगल सर्च मुझे कल्याण मटके की ओर ले गया। कल्याण का यह अर्थ मेरे लिए नया था। सिर्फ रतन खत्री का मैंने नाम भर सुन रखा था। अंग्रेज़ी में भी कल्याण का एकमात्र अर्थ welfare निकला।

मैंने हिंदी दिवस के उपलक्ष में कल्याण को हिंदी में सर्च किया, तब जाकर उसका अर्थ कल्याण पत्रिका निकला। कल्याण पत्रिका ने कितनों का कल्याण किया, इस पर गूगल सर्च मौन है, लेकिन शायद इस पर, कहीं ना कहीं, कोई ना कोई, रिसर्च अवश्य चल रही होगी।।

पंडितों, महात्माओं और बुजुर्गों का तकिया कलाम है यह शब्द कल्याण ! समाज में देखो तो हर कोई एक दूसरे का कल्याण करने में लगा है। नारायण सेवा संस्थान, उदयपुर कितने वर्षों से अपाहिजों का कल्याण करता चला आ रहा है। कलयुग में केवल एक ही कैलाश ने मानव के रूप में जन्म लिया है, और उनका नाम है अपाहिजों के मसीहा, 1008 संतश्री कैलाश मानव। लेकिन अपाहिज, जो अब दिव्यांग हो गए हैं, कम होने का नाम ही नहीं ले रहे।

एक ओर विदिशा के हमारे कैलाश सत्यार्थी जिन्हें जब तक बाल मजदूरी के लिए, उनके द्वारा किये गए उनके अनथक प्रयासों पर नोबेल पुरस्कार नहीं मिल गया, उन्हें कोई प्रसिद्धि नहीं मिली, और दूसरी ओर अपनी अच्छाई का और समाज कल्याण का सोशल मीडिया पर प्रचार करते व्यक्ति और संस्थाएं, कभी भ्रमित कर देती हैं, तो कभी आश्चर्यचकित, कि इतने लोगों के प्रयत्नों के बावजूद ऐसा क्या है, जो हमें आगे बढ़ने से रोक रहा है। इतना कल्याण, फिर भी यही शिकायत, लो हो गया कल्याण।।

इतने संत, बाबा, समाज सुधारक, एनजीओ, मंदिर, मस्ज़िद, चर्च, गुरुद्वारे किसके लिए ! मानव मात्र की भलाई के लिए। पिछले 70 वर्षों का इतिहास हम टटोलें, उसके पहले ही हमारा ध्यान एक ऐसे शख्स पर चला जाता है, जिसे देश की जनता ने पाँच वर्ष की अवधि के लिए, अपने हित और कल्याण के लिए एक आम- मुख्तयारनामा लिखकर दिया है। और वह इंसान अकेला 135 करोड़ के कल्याण के लिए जी जान एक कर रहा है। आज उसका एक पाँव यहाँ है तो कल चीन में। उसकी आँखों के आँसू थम नहीं रहे, आँखों से नींद गायब है। बस एक झोला लेकर आया है यह मसीहा, हम सबके कल्याण के लिए।

यह देश सदा से धर्म, नैतिकता और सदाचार को सर आंखों पर बिठाता रहा है। जन जन में धर्म के प्रति आस्था का सम्मान करते हुए पहले गीता प्रेस गोरखपुर जैसे संस्थान को ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा और फिर राम की भद्रता का ध्यान धरते हुए प्रज्ञाचक्षु रामभद्राचार्य के चरणों में भी ज्ञानपीठ पुरस्कार अर्पित कर दिया।।

हम अपना कल्याण खुद क्यों नहीं कर पाते ! क्यों हमें बाबा, महात्मा, राजनेता और स्वयंभू मसीहाओं की आवश्यकता पड़ती है, इसका उत्तर जब हमें मिल जाएगा, विश्व का ही या न हो, हमारा कल्याण अवश्य हो जाएगा।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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