हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८७ ⇒ एम. फिल् की महफिल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एम.फिल् की महफिल …“।)

?अभी अभी # १०८७ ⇒ आलेख – एम.फिल् की महफिल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एम फिल् की महफिल सजी है, चले आइए, आपकी बस कमी है, चले आइए! M.Phil. कोई बीमारी नहीं, मास्टर ऑफ फिलोसॉफी की डिग्री है, जिसे अब यूजीसी ने अमान्य कर दिया है। जो एम फिल हो गए, सो हो गए, खेल खतम, पैसा हजम।

डिग्रियों का खेल है ये, डिग्री पर डिग्री लिए जा रहे हो। खुद डॉक्टर होकर, अपनी नब्ज़ नहीं पहचान पा रहे हो। जी हां, एक ढूंढो हजार मिलेंगे, कोई डी लिट्, तो कोई पीएचडी, कोई एमबीबीएस तो कोई एमडी और एमएस! बेचारे दांत वाले की डिग्री अलग है, बीडीएस, मानो कोई बीएएमएस चला आ रहा हो। हमारे जमाने में तो एलएमपी भी डॉक्टर होते थे, यानी लोकल मेडिकल प्रैक्टिशनर। मेरा एक मित्र तो आज भी अपने आपको गर्व से L.M.P. ही कहता था, लोकल मिडिल पास।।

हमारे लिए केबीसी, केवाईसी और यूजीसी में कोई अंतर नहीं। हमें जीवन में ना तो कभी कोई ग्रांट अथवा स्कॉलरशिप मिली और ना ही कोई कमीशन। जब से उच्च शिक्षा में पदोन्नति के लिए पीएचडी अनिवार्य हो गया, सभी बड़े, बूढ़े पीएचडी की दौड़ में शामिल हो गए। पढ़ना और पढ़ाना सबके बस का नहीं होता। या तो हमसे पढ़वा लो, या फिर हमको पढ़ने दो। एक वेतन में दो दो दायित्व क्या तन और मन का शोषण नहीं।

हमें थीसिस, शोध, शोध प्रबंध, डिजर्टेशन अथवा पीएचडी की एबीसी भी नहीं आती क्योंकि हम कोई डिग्रीधारी बुद्धिजीवी भी नहीं। शिक्षा और चिकित्सा के अलावा साहित्य में भी डॉक्टरों का बड़ा सम्मान है। पहले साहित्य रत्न और विशारद से ही काम चल जाता था, लेकिन डॉक्टरेट की एक अलग ही गरिमा है। अब तो साहित्य में आपको टू इन वन डॉक्टर भी मिलेंगे। यानी डिग्री चिकित्सा की और फितरत से साहित्यकार और व्यंग्यकार। ऐसी विलक्षण प्रतिभाओं के आगे तो चार वेदों का ज्ञान भी फीका पड़ जाता है।।

डी लिट मतलब डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर, पीएचडी यानी डॉक्टर ऑफ फिलोसॉफी यहां तक तो आसानी से हजम हो जाता है लेकिन एमफिल यानी मास्टर ऑफ फिलोसॉफी कभी हमारे गले नहीं उतरी। वैसे ऐसी कई विवादित डिग्रियां हैं, जिन पर जनहित और देशहित में चुप रहना ही बेहतर है।

एक आयोजन प्रेमी हाल ही में एक संगीत के प्रोग्राम में जबरदस्ती टकरा गए, परिचय की लपेट में उन्होंने अपने आपको कवि, साहित्यकार, अभिनेता और एंकर के साथ एमफिल भी बता दिया। तब शायद पहली बार यह एमफिल की डिग्री हमारी नजरों से गिरी क्योंकि वे तो बहुत पहले से ही गिर चुके थे।।

जो शिक्षाशास्त्री हैं, शिक्षाविद् हैं वे ही इस मामले कुछ कहने का हक रखते हैं, हम तो मुंह नहीं चला पाए, इसलिए यूं ही कलम चला दी। दुख तो होता है, जब कोई विदा होता है। एमफिल की महफिल को हम दुखी मन से अलविदा कहते हैं ;

हम छोड़ चले हैं एमफिल को ;याद आए कभी तो मत रोना ..!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५१ – तस्मै श्रीगुरवै नम: ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३५१ ☆ तस्मै श्रीगुरवै नम:… ?

गुरु ऐसा शब्द जिसके उच्चारण और अनुभूति के साथ एक प्रकार की दिव्यता जुड़ी है, सम्मान की प्रतीति जुड़ी है। गुरु का शाब्दिक अर्थ है अंधकार को दूर करने वाला।

प्रायः हरेक के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या जीवन में एक ही गुरु हो सकता है? इसका उत्तर दैनिक जीवन के क्रियाकलापों और सांस्कृतिक परम्पराओं में अंतर्भूत है।

वैदिक संस्कृति में भिन्न-भिन्न गुरुकुलों में अध्ययन की परंपरा रही। गुरुकुल में शिक्षा और विचार की भिन्नता भी मिलती है। इन्हें विभिन्न- ‘स्कूल्स ऑफ थॉट’ कहा जा सकता है। वर्तमान में मुक्त शिक्षा का मॉडल काम कर रहा है। छात्र, विज्ञान के साथ कला और वाणिज्य का विषय भी पढ़ सकते हैं। शिक्षा ग्रहण करते हुए कभी भी अपना ‘स्कूल ऑफ थॉट’ बदल सकते हैं।

वर्णमाला का उच्चारण विद्यार्थी के.जी. में सीखता है। प्री-प्राइमरी में वर्ण लिखना सीखता है। शिक्षा के बढ़ते क्रम के साथ शब्द, तत्पश्चात  शब्द से वाक्य, फिर परिच्छेद जानता है, अंततोगत्वा धाराप्रवाह लिखने लगता है। के.जी. से पी.जी. तक के प्रवास में कितने गुरु हुए? जिनसे के.जी. में पढ़ा, उन्हीं से पी.जी. में क्यों नहीं पढ़ते? उलट कर भी देख सकते हैं। जिनसे पी.जी. में पढ़ा, उनसे ही के.जी. में पढ़ाने के लिए क्यों नहीं कहते? यही नहीं भाषा की शिक्षा के लिए अलग शिक्षक, चित्रकला के लिए अलग, शारीरिक शिक्षा, विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र हर एक के लिए अलग शिक्षक। उच्च शिक्षा में तो विषय के एक विशिष्ट भाग में स्पेशलाइजेशन किया हुआ शिक्षक होता है। कोई एम.डी.मेडिसिन, कोई स्त्रीरोग विशेषज्ञ,  कोई हृदयरोग विशेषज्ञ तो एम.एस. याने शल्य चिकित्सक।

काव्य में कोई गीत का विशेषज्ञ है,  कोई ग़ज़ल कहने का व्याकरण बताता है तो कोई मुक्त कविता में लयबद्ध होकर बहना सिखाता है। सभी विधाएँ एक ही से क्यों नहीं सिखी जा सकती? खननशास्त्र का ज्ञाता, गगनशास्त्र नहीं पढ़ा सकता, हवाई जहाज उड़ाने का प्रशिक्षण देनेवाला, पानी का जहाज चलाना नहीं सिखा सकता। भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी, मणिपुरी की साधना एक ही नृत्यगुरु के पास नहीं साधी जा सकती।

गुरु और शिक्षक की भूमिका को लेकर भी अनेक के मन में ऊहापोह होता है। यह सच है कि एक समय गुरु और शिक्षक में अंतर था। शिक्षक अपना पारिश्रमिक स्वयं निर्धारित करता था जबकि गुरु को प्रतिदान शिष्य देता था। कालांतर में बदलती  परिस्थितियों ने इस अंतर-रेखा को धूसर कर दिया। वर्तमान में गुरु और शिक्षक न्यूनाधिक पर्यायवाची हैं। शिक्षक, जीवन को अक्षर और व्यवहार के ज्ञान का प्रकाश देनेवाला गुरु  है।

गुरुदेव दत्त अर्थात भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव का अवतार माना जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समन्वित अवतार की यह आस्था अनन्य है। उन्होंने  चौबीस गुरु बनाये थे। राजा यदु को इन गुरुओं की जानकारी देते हुए भगवान दत्तात्रेय ने आत्मा को सर्वोच्च गुरु घोषित किया। साथ ही  बताया कि चौबीस चराचर को गुरु मानकर उनसे जीवनदर्शन की शिक्षा ग्रहण की है। भगवान के ये चौबीस गुरु हैं,  पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, समुद्र, अजगर, कपोत, पतंगा, मछली, हिरण, हाथी, मधुमक्खी, शहद निकालने वाला, कुरर पक्षी, कुमारी कन्या, सर्प, बालक, पिंगला नामक वैश्या, बाण बनाने वाला, मकड़ी, और भृंगी कीट।  प्रत्येक गुरु से उन्होंने जीवन का भिन्न आयाम सीखा।

बहुआयामी ज्ञानदाता माँ प्रथम गुरु होती हैं। माँ प्रथम होती हैं अर्थात द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम गुरु भी होते हैं। इनमें से कोई किसीका स्थान नहीं ले सकता वरन हरेक का अपना स्थान होता है।

शिक्षक दिवस के संदर्भ में विनम्रता से कहता हूँ कि प्रत्येक का मान करो। ज्ञान को धारण करो, जिज्ञासानुसार एक अथवा अनेक गुरु करो।

..तस्मै श्रीगुरवै नम:।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  शुक्रवार दि. 4 सितंबर (जन्माष्टमी) से गुरुवार 10 सितंबर  तक गोविंद साधना संपन्न होगी। 🕉️

💥 ‘गोविंद साधना’ का जाप मंत्र होगा-  ॐ कृष्णाय नमः.।। इसके साथ ही मधुराष्टकम् का पाठ करेंगे।💥

💥आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे। 💥

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८६ ⇒ दोषारोपण ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दोषारोपण…“।)

?अभी अभी # १०८६ ⇒ आलेख – दोषारोपण ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दोष एक ऐसा पौधा है, जिसे कभी अपने आँगन में लगाया नहीं जाता, इसके लिए किसी दूसरे के घर की मिट्टी तलाशी जाती है। वहाँ यह बहुत फलता-फूलता है। कौन कब किसी पड़ोसी के घर पौधारोपण करता है। हाँ, अगर दोष का पौधा हो, तो खाद मिट्टी की व्यवस्था भी की जाती है।

हम हरे भरे उपवन को उजाड़ कंक्रीट का जंगल बना देते हैं, खेती की जगह औद्योगिकरण को बढ़ावा देते हैं, मज़दूर की जगह मशीन से काम लेने लगते हैं, तो पर्यावरण दूषित होता है। अधिक सड़कें, मॉल और फ्लाईओवर बनाने पड़ते हैं। जब यह सब हो जाता है, तब हमें पौधारोपण का ख्याल आता है और हम भावुक होकर पितृ पर्वत की ओर दौड़ पड़ते हैं।।

दोष किसमें नहीं ! लेकिन जिस तरह आईना सिर्फ चेहरे को देखता है, गुण दोषों को नहीं, हमें भी स्वयं में दोष नज़र नहीं आते। कबीर इंसान नहीं थे ! उन्हें दूसरों में नहीं, स्वयं में दोष नज़र आते थे। वे कहते हैं;

बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा न कोय

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय

लो जी ! कोई खुद पर भी दोषारोपण करता है ? दोषारोपण और करारोपण हमेशा दूसरों पर ही किया जाता है। सभी दोषमुक्त और करमुक्त होने की फिराक में रहते हैं।।

भारत रत्न सचिन जैसे क्रिकेट-रत्न पर लोग आरोप लगाते हैं कि झुमाकर द्वारा भेंट की गई फरारी वे करमुक्त करवाकर ले आए। लो जी ! ये भी कोई बात हुई। फर्राटा कार चलाने वाले झुमाकर ने फर्राटेदार रन बनाने वाले सचिन को सम्मान-स्वरूप जो फर्राटा-फरारी कार भेंट की, उस पर भी करारोपण ? घोर कलयुग ! सचिन कार कमाकर नहीं लाए, भेंट में लाए। केबीसी को छोड़कर बहुत से राष्ट्रीय पुरस्कार करमुक्त होते हैं। सम्मान और करारोपण कभी साथ साथ नहीं चलते। मनोजकुमार की अधिकांश देशभक्ति की फिल्में मनोरंजन कर से मुक्त रहती थी। एक तो फ़िल्म में मनोरंजन नहीं, ऊपर से मनोरंजन कर। और जो इसका विरोध करे, उस पर दोषारोपण।

कुछ तो लोग कहेंगे ! लोगों का काम है कहना। आप तो करते रहिए, आपको जो करना। हाथी जब वन-वे में बाज़ार में चलता है, तब उसका चालान नहीं कटता। कोई ट्रैफिक का सिपाही अगर उसको देख सीटी बजाता है, तो लोग हँसते हैं।

हाथी को कानून सिखा रहा है। ज़रा उसके पास तो जाकर देख।।

हमारे देश में पिछले 70 वर्षों से विपक्ष, सत्ता-पक्ष पर दोषारोपण कर रहा था। दोष का वृक्ष इतना पनपा, कि विपक्ष ही सत्ता-पक्ष हो गया। आज सत्ता-पक्ष विपक्ष पर दोषारोपण कर रहा है। एक दूसरे पर दोषारोपण को हम आगे चलकर राष्ट्रीय दोषारोपण दिवस के रूप में मना सकते हैं।

अगर एक नेता और कुशल प्रशासक, विपक्ष के विरोध और दोषारोपण की ओर ध्यान देगा तो उसे कभी अनुच्छेद 370 और 35-ए नज़र नहीं आएँगे। अगर राजनीति में द्रोणाचार्य जैसा गुरु होगा तो अर्जुन को सिर्फ़ मछली की आँख ही नज़र आएगी। कश्मीर अब स्वर्ग हुआ है, Let opposition go to hell. द्रोणाचार्य उवाच।।

दोस्तों के साथ पौधारोपण हो, लेकिन अगर कभी दुश्मन के घर जाएँ, तो दोषारोपण अवश्य करके आएँ। इस मामले में आनंद बख्शी साहब कुछ ज़्यादा ही तल्ख़ थे।

मेरे दुश्मन, तू मेरी दोस्ती को तरसे !

तू फूल बने पतझड़ का,

तुझ पर बहार न आए कभी।

लगता था, मानो पाकिस्तान में दोषारोपण करके आए हों।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १९१ – देश-परदेश – विश्व का नया मानचित्र ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १९१ ☆ देश-परदेश – विश्व का नया मानचित्र ☆ श्री राकेश कुमार ☆

विगत सप्ताह यूनाइटेड नेशन्स जिसको हम यू एन के नाम से भी जानते हैं, ने एक प्रस्ताव के जरिए विश्व का नया मानचित्र जारी किया है। पूर्व में बनाया गया मानचित्र यूरोप के इटली देश द्वारा सन 1600 से पूर्व काल का है।

अफ्रीका महाद्वीप के कुछ देशों का क्षेत्रफल उनके वास्तविक क्षेत्रफल से कम अनुपात में दिखाया गया है, ऐसी शिकायत के कारण, नए मानचित्र की आवश्यकता आन पड़ी है।

यू एन जैसी संस्था की बात आज के समय कोई मानता ही नहीं है। उसका हाल घर के सबसे बड़े बुजर्ग के समान है, जिसने परिवार के लिए सब कुछ निछावर कर साम्राज्य स्थापित कर, बच्चों के नाम कर दिया था, अब घर के उसके अपने बच्चे ही उसको पूछते ही नहीं है। वो कुछ भी बोले, उसकी बात अनसुनी ही रहती है।

नए मानचित्र को लेकर हमारे एक मित्र जिनका स्टेशनरी सामान का व्यापार है, से लम्बी वार्तालाप हुई, उनको ये शंका हो रही है, इस नए मानचित्र के चक्कर में उनके एक खाली प्लॉट की जमीन कहीं कम ना हो जाय। हमने उनसे कहा ऐसा कैसे हो सकता है, उनका ये मानना है, कि शहर के नए मास्टर प्लान में उनके प्लॉट का साइज एक चौथाई कम हो गया था, अब तो पूरी दुनिया का ही नक्शा बदल रहा है, सरकार इस नाम से उनकी जमीन का कुछ भाग, डकार जाएगी।

हमने उनके दर्द को कम करते हुए कहा, अब सभी स्कूलों, सरकारी दफ्तरों आदि में दुनिया का नए मानचित्र लगाया जाएगा, बच्चे नए “ग्लोब”, गत्ते के स्टेंसिल आदि भी खरीदेंगे। आपकी तो दीवाली हो जाएगी।

इंतजार करें, हमें कब विस्तृत नया नक्शा देखने को मिलेगा।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९९ ☆ जन्माष्टमी विशेष – वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९९ ☆

☆ जन्माष्टमी विशेष – वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

☆

ग्वाल-बाल के संग नंदलाला,

मुरली मनोहर आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

*

भक्त तिहारी राह तके हैं,

यशोदा प्यारे आ जाओ।

माखन-मिश्री के मतवाले,

माधव न्यारे आ जाओ।।

*

कुंज-गलिन में राधा रानी

के मतवाले आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

☆

जब भाद्रपद की अँधेरी रात आस्था के दीपों से जगमगाने लगती है, तब मन के आकाश पर एक अनुपम छवि आकार लेती है—मोरपंख मुकुट धारण किए नटखट नंदलाल, अधरों पर सजी बाँसुरी और चारों ओर पसरा हुआ हरा-भरा वृंदावन। यह वही वृंदावन है, जहाँ प्रकृति केवल कृष्ण की लीलाओं की साक्षी नहीं थी, बल्कि स्वयं उनकी लीला का अभिन्न अंग थी।

कदंब की डालियाँ उनके झूलों की सखी थीं, यमुना उनकी चिर-सहचरी और गौवंश उनके वात्सल्य का विस्तार। वन-पथों पर बिखरी दूब, कुंजों की छाया, फूलों की सुगंध और पक्षियों का कलरव—इन सबके बीच कृष्ण का बालपन जैसे प्रकृति के हृदय पर लिखी कोई मधुर कविता था।

श्रीकृष्ण का जीवन हमें उस आत्मीय संबंध की स्मृति कराता है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक होते हैं। उनकी बाल लीलाओं में मिट्टी की सोंधी गंध है, यमुना की कल-कल है, वृक्षों की शीतल छाया है और जीव-जंतुओं के प्रति सहज करुणा है। इसलिए कृष्ण को जानना केवल उनके दर्शन को जानना नहीं, उस प्रकृति को भी समझना है, जिसमें उनकी चेतना ने आकार पाया।

आज हमारे चारों ओर कंक्रीट के जंगल फैलते जा रहे हैं और वास्तविक वन सिमट रहे हैं। नदियाँ अपना निर्मल स्वर खो रही हैं और पक्षियों का कलरव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। ऐसे समय में यह पर्व हमारे भीतर एक सहज प्रश्न जगाता है—क्या हमारी भक्ति केवल मंदिरों और झाँकियों तक सीमित रहेगी, या हम कृष्ण के उस वृंदावन को भी अपने जीवन में स्थान देंगे, जहाँ हरियाली स्वयं उत्सव थी?

उत्सव की सजावट में यदि जीवित पौधों, पत्तियों, फूलों, मिट्टी के दीपों और प्राकृतिक सामग्री को स्थान दिया जाए, तो सौंदर्य के साथ संवेदना भी जुड़ती है। लड्डू गोपाल के समीप रखा गया एक छोटा-सा पौधा केवल सजावट नहीं, बल्कि आने वाले कल के लिए जीवन का संकल्प बन सकता है।

क्यों न इस अवसर पर ‘एक पौधा कान्हा के नाम’ का संकल्प लिया जाए? पौधा लगाएँ, उसे सींचें, उसकी छाया बढ़ते देखें और उसके साथ अपने भीतर प्रकृति के प्रति प्रेम को भी अंकुरित होने दें।

कृष्ण ने हमें प्रेम का विस्तार सिखाया—मनुष्य से प्रेम, जीव-जंतुओं से करुणा और धरती से आत्मीयता। उनकी बाँसुरी की मधुर तान तभी सार्थक होगी, जब यमुना निर्मल बहे, वृक्षों पर फिर पक्षियों के बसेरे हों और हमारी धरती हरियाली की साँस लेती रहे।

कान्हा को केवल झूले में न झुलाएँ,

उनके वृंदावन को भी अपने जीवन में उतारें।

ऐसी भक्ति हो, जिसमें दीप भी जले और कोई पौधा भी रोपा जाए; ऐसी आराधना हो, जिसमें घंटियाँ भी गूँजें और पक्षियों का कलरव भी सुनाई दे; ऐसा उत्सव हो, जिसमें मंदिर ही नहीं, हमारी धरती भी मुस्कुराए।

☆

राह तके हैं गोपी सारी,

रास-रचैया आ जाओ।

संकट की घड़ियों में कृष्णा,

लाज-बचैया आ जाओ।।

*

भक्तों के हिय आन समाने,

मीरा-मोहन आ जाओ।

प्यासे-प्यासे इन नयनों को,

मनमोहन अब मत तरसाओ।।

☆

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८५ ⇒ बातों के भूत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बातों के भूत…“।)

?अभी अभी # १०८५  ⇒ आलेख – बातों के भूत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पहली बात तो भूत होते ही नहीं, और अगर होते भी हैं, तो उनसे डरने की कोई जरूरत नहीं, बस भृगु बनने की है। भूत बातों से नहीं मानते। घोड़ा हवा से बात करता है, और भूत से लातों से ही बात की जाती है। सुना है, भूत के पांव उल्टे होते हैं, जब कुछ लोग उल्टे पांव लौट आते हैं, तो शंका होती है, कहीं ये वो तो नहीं।

भूत के पाँव तो खैर इसलिए उल्टे होते हैं, कि जब उसे लात पड़े, तो भागने में सहूलियत हो। बेचारे भूत की इतनी फजीहत, कि पहले तो उससे लातों से बात करना, और जब वह उल्टे पांव भागने लगे तो उसकी लंगोटी पर भी नज़र रखना। भागते भूत की लंगोटी भली ! वाह रे इंसानियत।।

वैसे भूत अधिकतर किस्से कहानियों और फिल्मों में ही होते हैं, लेकिन क्या पता, कब, किस पर, किस बात का भूत सवार हो जाए। जब हम पर किसी बात का भूत सवार होता है तो फिर हमें भूत से डर नहीं लगता, लोग हमसे डरने लगते हैं। जब हम पर क्रिकेट का भूत सवार होता था तो मोहल्ले के मकानों की खिड़कियों के शीशे तड़ातड़ टूटने लगते थे। शीशे तो जुड़ गए, लेकिन क्रिकेट का भूत आज भी नहीं उतरा।

अंध विश्वास की भी हद होती है। लोगों को हवा में भूत नजर आता है। सुनसान हवेली की ओर जाने से मना किया था, लेकिन आज की पीढ़ी कभी किसी की सुनती है, अब आठ रोज से बुखार में पड़े हैं, कुछ भी बड़बड़ा रहे हैं, अजीबोगरीब हरकतें कर रहे हैं। ओझा को बुलाया है, अब तो वही भूत उतारेगा। भूत उतरे, ना उतरे, अच्छी लू उतरने वाली है, जब झाड़ुओं से पूजा होगी। भूत भागता नजर आएगा।।

मैं किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ़ हूं। इंसान हो या भूत ! पहले लातों से नहीं, बातों से ही मामला सुलझाना चाहिए। लेकिन इसमें एक समस्या और आ खड़ी होती है। किसी पर अगर बातों का ही भूत सवार हो, तो क्या करना चाहिए। आप समझ रहे हैं न बात को।

कुछ लोगों पर बातों का भूत सवार होता है। बातें ही बातें। जैसे बरसात में किसी छाते की दुकान में छाते ही छाते ! इतनी बातें, इतनी बातें, कि बस बातें ही बातें। पहले बातों के लिए मुलाकातें जरूरी होती थी। लोग किसी बातूनी इंसान को देखते ही, पतली गली से निकल लेते थे, अभी मिलेगा तो चाट जाएगा। इंसान भूत से नहीं, ऐसे बातूनी इंसान से अधिक डरता था।।

आज भी डर लगता है, क्या भरोसा कब, किस पर, बातों का भूत सवार हो जाए। मैने लोगों को आधे आधे घंटे वॉक एंड टॉक शो में मशगूल देखा है। अनलिमिटेड डाटा और अनलिमिटेड बांतां। बस कान में स्पीकर लगे हैं और अपना स्पीकर, यानी मुंह भी चालू है। ऐसे चलते फिरते बातूनी भूत मॉर्निंग वॉक और इवनिंग वॉक में बहुतायत से देखे जा सकते हैं।

कौन अधिक बात करता है और कौन कम, यह नहीं जानते हम, लेकिन हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय जरूर आता है, जब उस पर बातों का भूत सवार होता है। कहीं कहीं तो भोजन की तरह बातें भी हजम नहीं होती। बातें ही उनका हाजमोला होती हैं। पेट में गुड़गुड़ होने लगती है। ठीक से किसी से बात हो जाए, तो सब ठीक हो जाता है।।

जिस तरह लातों के भूत बातों से नहीं मानते, बातों के भूत का इलाज भी लातों से संभव है, यह हम नहीं मानते। यह छोटी सी बात नहीं, गंभीर बात है। कुछ लोग बड़ी प्यारी बातें करते हैं, लगता है, जैसे मुंह से फूल झर रहे हों। बच्चों की बातें कितनी प्यारी लगती हैं।

बातों का एक दर्दनाक पहलू भी है ! किसमें कितना दर्द भरा है, कौन जाने। दो घड़ी अगर बात करने से हल्कापन महसूस होता है तो क्या बुरा है। आधी मानसिक बीमारियां मन ही मन घुटते रहने से होती है;

मेरी बात रही मेरे मन में

कुछ कह ना सकी उलझन में;

से तो अच्छा है;

आपके पहलू में आकर रो दिए।

दास्ताने गम सुना कर रो दिए।।

बातों बातों में कभी कभी ऐसा भी हो जाता है;

जो हमने दास्तां अपनी सुनाई

आप क्यूं रोए !

किसी के दुख दर्द को कम करना, अथवा दूर करना ही तो वास्तव में भूत उतारना है ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ – मेघमल्हार धुन सावन की, जयजयकार शिव जी की! ☆ डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डाॅ. मीना श्रीवास्तव

☆ आलेख ☆

☆ मेघमल्हार धुन सावन की, जयजयकार शिव जी की! ☆ डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

प्रिय पाठकगण,

सादर प्रणाम!

वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थ: प्रतिपत्यये ।

जगत: पितरौ वंदे पार्वतीपरमेश्वरौ ।। १ ।।

(भावार्थ – शब्द और अर्थ का सम्यक ज्ञान प्राप्त हो, इसलिए शब्द और अर्थ के समान ही (परस्पर से भिन्न हो कर भी) परस्पर में समाहित रहने वाले, जो अखिल जगत के जनक जननी हैं, ऐसे पार्वती तथा परमेश्वर {शिव} को मैं प्रणाम करता हूँ।)

महाकवि कालिदास के अमर काव्य ‘रघुवंशम् ‘ का प्रारम्भ शिव-पार्वती स्तुति के इसी श्लोक से होता है। जब मेघों से लरजती रिमझिम फुहार धरती पर बरसने को व्याकुल हो, जब इंद्रधनुषी किनारी से सजी, विविध कुसुमों की भीनी भीनी खुशबू में लिपटी बेलबूटी से सजे वस्त्र ओढ़ कर साँवरी सलोनी वसुंधरा आनन्द गीत गुनगुनाने लगे और जब परमेश्वर की असीम कृपा आप पर हर पल वृद्धिंगत होने को तैयार हो तो, समझ लीजिये कि सावन का महीना आपके द्वार पर दस्तक दे रहा है।

अब कृष्णमेघ नई उमंग के साथ आसमान में छा जाते हैं। जरा सी बारिश हुई नहीं कि मेघों से लुका छुपी खेलती सुनहरी धूप की किरणें झांकती हैं । फिर प्रकृति का एक अनुपम दृश्य, इंद्रधनुष आसमान में तन जाता है। उसके सप्त रंग सुहानी आभा बिखेरते हैं समस्त वातावरण में! जब इंद्रधनुष कहे कि मेरी इस सुंदरता का कोई सानी नहीं, तब कोई है जो कारे कारे बदरा को देख अपने पंखों को फैलाकर अपनी नृत्यकला से समस्त प्रकृति को भावविभोर करे एवं कहे, है कोई मेरा सानी रंगों में और नृत्य में? मित्रों, हमें तो मयूर का नृत्य उतना ही लुभाता है, जितने मोरपखा के रंग। ‘छायावाद’ के शीर्ष लेखक सुमित्रानंदन पंत ने उनकी ‘बरसते बादल’ नामक कविता में सावन के शस्य श्यामल रूप का मनमोहक वर्णन किया है, जो कर्णमधुर भी है।

“झम झम झम झम मेघ बरसते हैं सावन के,

छम छम छम गिरतीं बूँदें तरुओं से छन के।

चम चम बिजली चमक रही रे उर में घन के,

थम थम दिन के तम में सपने जगते मन के।”

वर्षा की फेनिल धाराओं को देख कवि का मन ऐसा डोलने लगता है कि, वह बारम्बार सावन के आने की प्रतीक्षा करने लगता है। 

“पकड़ वारि की धार झूलता है मेरा मन,

आओ रे सब मुझे घेर कर गाओ सावन!

इन्द्रधनुष के झूले में झूलें मिल सब जन,

फिर फिर आए जीवन में सावन मन भावन!”

*

उज्जयिन्यां महाकालं ओम्कारम् अमलेश्वरम्॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।

सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।

हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥

मित्रों, बारह  ज्योतिर्लिंगों में ही नहीं, बल्कि हर शिवभक्त के प्राणों में बसे देवों के देव महादेव की आराधना करने के लिए सर्वोत्तम ऐसा सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित है। जिस मनोरम प्रकृति के हर रूप में ईश्वर का निवास है, वहीं प्रकृति अपने सबसे सुन्दर रूप का शृंगार कर भोलेनाथ की पूजा में तल्लीन हो जाती है। इस माह में चंद्रमा श्रवण नक्षत्र में होते हैं, इसलिए इस महीने को श्रावण या सावन कहा जाने लगा। शास्त्र कहते हैं कि सावन के महीने से भगवन विष्णु चौमासे के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए महादेव सृष्टि का संचालन करने लगते हैं और इस महीने में भूलोक पर आते हैं।

भगवान शिव को सोमनाथ अर्थात सोम (चंद्र के स्वामी) और जलदेव (वर्षा के स्वामी) भी कहा जाता है। जलाभिषेक से सम्बंधित एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, सावन के महीने में समुद्र मंथन के दौरान “हलाहल” नामक विष निकला था। समस्त सृष्टि की रक्षा करने के लिए भगवान शिव ने विष ग्रहण कर लिया था, जिसके कारण उनका गला नीला पड़ गया। तब से वे “नीलकंठ” कहलाए। उस समय उनके गले पर विष का प्रभाव कम करने के लिए देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया था। मुझे तो यहीं प्रतीत होता है कि शिव ऐसे इकलौते अल्पसंतोषी भगवान हैं जो श्रद्धापूर्वक अर्पण किये हुए जल तत्व को ग्रहण कर प्रसन्न होते हैं। भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने के लिए सावन के सोमवार को उपवास, उपासना और जलाभिषेक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। मान्यता है कि इन दिनों में शिवजी को जलाभिषेक करने से सर्वोत्तम फलप्राप्ति होती है और भक्तों की मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं। बेल की पत्तियां और धतूरा भी भोलेनाथ को अतिप्रिय हैं। इस माह के प्रारम्भ से कांवड यात्रा भी प्रारम्भ होती हैं।

श्रावण माह का महत्व इस महीने में आने वाले पूजा अर्चना और त्योहारों के कारण और भी वृद्धिंगत हो जाता है। हर मंगलवार को मंगला गौरी व्रत और श्रावण शुक्ल तृतीया को हरियाली तीज के दिनों में शिव-गौरी को पूजा जाता है। महादेव को प्रसन्न करते करते उनके गले में प्रेम से लिपटे उनके नीलकंठ की शोभा बढ़ाते हुए नागराज वासुकी को कैसे बिसरा दें? इन्होंने ही अमृतमंथन के लिए रस्सी का कार्य किया था। नाग पंचमी का त्यौहार हम इसी सावन में (श्रावण शुक्ल पंचमी) मनाते हैं। देखिये हमारी भारतीय संस्कृति इतनी महान है कि विष उगलने वाले सर्पों को भी हम देवता का दर्जा देकर पूजते हैं। श्रावण पूर्णिमा के दिन मछुआरे सागर को श्रीफल अर्पण कर यह प्रार्थना करते हैं कि वह शान्त रहे। इसी दिन भाई बहन के प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन मनाया जाता है। जन्माष्टमी (श्रावण वद्य अष्टमी) यह कृष्णजन्म का पावन दिवस कृष्णभक्तों के लिए तो आनंदोल्लास का पर्व होता है। हर श्रावण शुक्रवार को किया जाने वाला जरा जीवंतिका पूजन बालकों की मंगल कामना के लिए किया जाता है। इसके आलावा सावन महीने में कामिका एकादशी, सावन पुत्रदा एकादशी, हरियाली अमावस्या आदि व्रत रखे जाते हैं। इन दिनों में नववधुएं मायके में जाने को व्याकुल होती हैं, ऐसे में उन्हें सखियों के साथ बिताये पल याद आते हैं, खास कर ‘सावन के झूले’!

यह मौसम कृषकों को प्राणदान देता है एवं उनकी फसलों को नव-हरीतिमा प्रदान करता है।  

भक्ति और समृद्धि से समाहित यह खुशहाल समां सबको आनंदविभोर करता है। उसकी जलधाराओं के नृत्याविष्कार में ‘ॐ नमः शिवाय’ और नन्हे बालगोपाल की किलकारियां प्रतिध्वनित होती हैं। आइये इस हरित ऋतु का प्रेमोल्लास से स्वागत करें।

© डॉ. मीना श्रीवास्तव

ठाणे 

मोबाईल क्रमांक ९९२०१६७२११, ई-मेल – drmeenashrivastava21@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७७ ☆ आलेख – माह सितंबर और हिंदी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख – “माह सितंबर और हिंदी…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७७ ☆

✍ आलेख ☆ माह सितंबर और हिंदी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

लो सितंबर का महीना भी आ गया। सितंबर का महीना मतलब हिंदी का महीना। आम जनता पर तो कोई अंतर नहीं पड़ता परंतु केंद्रीय सरकारी कार्यालयों, राष्ट्रीयकृत बैंकों, उपक्रमों पर पड़ता है और वे हिंदी मय हो जाते हैं। विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और हिंदी के प्रचार प्रसार में लगीं संस्थाओं में हिंदी के प्रति एक जागृति की भावना पैदा हो जाती है जो साल भर तक उन्हें अनुप्राणित करती रहती है। हिंदी के सुनामधन्य लेखक व कवि प्रतिस्फूर्त हो जाते हैं और स्वर्गीय लेखक कवि भी जीवन पा जाते हैं। क्या हिंदी और क्या हिंदीतर राज्य व क्षेत्र सभी हिंदीमय हो जाते हैं। किसी समारोह या कार्यक्रम में जिन्हें कोई स्थान नहीं मिल पाता वे हिंदी के साथ हो रहे छल के हिमायती बन जाते हैं। पर सितंबर माह हिंदी का माह तो होता ही है।

जहाँ जहाँ हिंदी विभाग हैं उनसे जुड़े अधिकारी, कर्मचारी, प्राध्यापक व अध्यापक स्फूर्ति से भर उठते हैं। सभी किसी न किसी हिंदी के विद्वान को बुला कर अपने संस्थान के अन्य अधिकारियों व कर्मचारियों में हिंदी के प्रति एक नया जोश भर देना चाहते हैं। कोई अपने संस्मरण सुनाते हैं हिंदी की गौरव गाथा व अधोमुखी गाथा के। वे अपने सामने उपस्थित वृंद को मोहित कर देना चाहते हैं।  ऐसा ही एक उदाहरण याद आता है। बात पुरानी है। हिंदीतर क्षेत्र में एक विश्वविद्यालय में हिंदी की एम.फिल के विद्यार्थियों को प्रोफेसर साहब पढा रहे थे कि हम हिंदी दिवस इसलिए मनाते हैं कि 1936 में कांग्रेस ने हिंदी को अपने एक अधिवेशन में राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की थी।  जब उनसे पूछा गया कि संविधान में हिंदी को  भारत संघ की राजभाषा बनाया गया था लेकिन आप यह क्या बता रहे हैं तो वे प्रोफेसर साहब मायूस होकर बोले कि विभाग बना दिया, प्रयोजन मूलक हिंदी की उच्च शिक्षा भी प्रारंभ कर दी लेकिन उसका न तो कोई पाठ्यक्रम है और न ही पुस्तकें। हम जहाँ तहाँ से नोट्स बनाकर पढ़ाते हैं। संस्थान जो केवल सितंबर में हिंदी संबंधी कार्यक्रम करते हैं वे वक्ताओं से उच्च स्तर की नई बात जानना चाहते हैं।

वाक्पटु वक्ता वाह-वाही पाकर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं और जो श्रोताओं को प्रभावित नहीं कर पाते वे ऐसे आमंत्रण से वंचित हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि न वक्ता अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और न ही श्रोता। हिंदी को मान्यता न देने के इच्छुक तो संविधान की ही आलोचना करते हैं कि संविधान में 15 वर्ष तक हिंदी को राजभाषा बनाया गया परंतु अंग्रेजी में काम करते रहने की छूट को अनिश्चितकालीन छूट दे दी तो हिंदी का राजभाषा पद अपने आप ही लुप्त हो गया। तमाम तर्क वितर्क प्रस्तुत होते हैं परंतु हिंदी को भारत संघ की राजभाषा के रुप में सम्मान नहीं देना चाहते। भारत संघ कोई स्थान या क्षेत्र विशेष नहीं है, संपूर्ण भारत है जिसमें सभी प्रदेश व क्षेत्र शामिल हैं और भारत का अस्तित्व उसके सभी मंत्रासय और उनसे संबद्ध अधीनस्थ कार्यालय, विभाग व उपक्रम आदि हैं चाहे वे कहीं भी स्थित हों।  हिंदीतर प्रदेशों में हिंदी को केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में सम्मान दिया जाएगा तो वहाँ की क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान कम नहीं होता।

विश्व के सभी देशों में हिंदी बोली समझी जाती है और वह विश्व में दूसरे स्थान पर है लेकिन भारत में हिंदीतर क्षेत्रों में हिंदी बोलना तक अपराध जैसा माना जाता है, ऐसा महसूस होता है।  विश्व में अनेक देश ऐसे हैं जहाँ राष्ट्रभाषा नहीं है और अनेक राजभाषाएं भी हैं, परंतु नफ़रत की भावना होने का कोई समाचार नहीं मिलता। भारत में यही अफ्सोस  जताया जाता है कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने नहीं दिया जाता और राष्ट्रभाषा चाहते भी हैं।

प्रौद्योगिकी, कंप्यूटरीकरण और ए.आई. ने विश्व में भाषायी अंतर बहुत कम कर दिया है और एक भाषा न जानने वाला भी उस भाषा में काम कर सकता है। अब जरूरत है हर भाषा के प्रति प्रेम की। फिर भी जिस तरह विश्व के सभी देशों में भारत की भाषा हिंदी मानी जाती है वैसे ही भारत में भारत संघ की राजभाषा को हर नागरिक द्वारा  माना जाए और उसे केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में सम्मान दिया जाए तो हिंदी को संविधान सम्मत स्थान व सम्मान अवश्य प्राप्त होगा। हिंदी का उत्थान चाहने वाले विद्वानों व संस्थाओं के प्रयासों को सम्मान दिया जाए।  विश्व के हर देश में हिंदी का प्रचार प्रसार व उसका उत्थान करने वाली संस्थाओं व उनसे जुड़े विद्वानों को हृदय से सम्मान दिया जाए। फिर केवल सितंबर माह ही हिंदी मय नहीं होगा, पूरा वर्ष हिंदी मय होगा।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८३ ⇒ पाप और पुण्य का खेल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पाप और पुण्य का खेल …“।)

?अभी अभी # १०८३ ⇒ आलेख – पाप और पुण्य का खेल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

?

ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या !

रीतों पर धर्म की मोहरें है।

– साहिर

हम जो भी अच्छा-बुरा करते हैं, कुछ खुला, कुछ गुप्त करते हैं !नेकी दरिया में जाती है, बदी बदनामी दिलाती है। बैंक की बैलेंस शीट की तरह पुण्य और पाप जमा और नामे में दर्ज हो जाते हैं। देहमुक्त होते ही, चित्रगुप्त के दरबार में खाता खोला जाता है। पाप-पुण्य का हिसाब होता है, फैसला सुनाया जाता है। या तो स्वर्ग, या नर्क।

हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, विधि हाथ !

– गोस्वामी तुलसीदास

लीजिए ! स्वर्ग-नरक का हिसाब चित्रगुप्त के हाथ और हानि-लाभ, यश-अपयश विधि हाथ। तब तो फिर अपना हाथ जगन्नाथ। लेकिन यह सब इतना आसान कहाँ ! तुम जैसे कर्म करोगे वैसा फल देंगे भगवान। अब आप या तो हानि-लाभ और यश-अपयश की चिंता कर लो, या पाप और पुण्य की।।

पुण्य का खेल तो बहुत आसान है ! पुण्य को दान-पुण्य भी कहते हैं। दान-पुण्य से स्वर्ग मिलता है। शास्त्रों में लिखा है। गंगा-नहा लेने से पापों से मुक्ति मिल जाती है। तीर्थाटन से पुण्य संचित होता है। कथा-भागवत सुनने से मोक्ष मिलता है और कुम्भ स्नान से न केवल पाप नष्ट होते हैं, अमृत की कुछ बूँदों की भी आप पर वर्षा हो जाती है। मतलब हम सबका न केवल स्वर्ग, अपितु मोक्ष और वैकुण्ठ भी सुरक्षित।

चलिए ! अगर आप से इतना भी नहीं होता तो फिकर नॉट। कलयुग नाम अधारा, सिमर सिमर उतरै पारा। जय श्रीराम।

रुकिए रुकिए कहाँ चले ! अपने पापों का भी तो हिसाब करते जाइए। अरे वाह साहब ! अभी तो आपने कहा था, कि गंगा स्नान से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। उस ग्यारंटी का क्या हुआ ? हमें नहीं पता। लेकिन क्या आपको पता नहीं, झूठ बोलना, चोरी करना, किसी की निंदा करना, हिंसा करना, यह सब पाप है। काम, क्रोध, मद, मत्सर के रहते आप स्वर्ग नहीं जा सकते। आपका चित्त मलिन है, फिल्मी गाने गाया करता है। आप स्वर्ग नहीं घोर नर्क के भागी हो। क्या आपको ज्ञात नहीं, महाभारत के युद्ध के पश्चात, पाँच पांडवों में से केवल धर्मराज युधिष्ठिर ही स्वर्गारोहण कर पाए थे। एक के साथ एक फ्री की स्कीम में उनका वफादार कुत्ता भी स्वर्ग चला गया। उनके खाते में केवल आधा झूठ बरामद हुआ, जब उन्होंने कहा, नरो वा कुंजरो वा। वह भी धर्म की रक्षा के लिए। द्युत क्रीड़ा में शकुनि ने उनके साथ छल किया, इसलिए माफी मिल गई।।

तब आखिर एक सदाचारी की परिभाषा क्या ! क्या उसे दूध से धुला हुआ होना चाहिए ? जहाँ शुद्ध दूध और घी की ही गारण्टी नहीं, वहाँ केवल या तो अभिषेक-युक्त भगवान ही पंचामृत से धुले हुए हो सकते हैं, या फिर ऐश्वर्या-युक्त अभिषेक बच्चन। कितनी पीढ़ियों की पुण्याई है बंदे के पास।

हम लोग पूर्वजन्म में विश्वास नहीं रखते, स्वर्ग-नरक में विश्वास करते हैं, इसलिए या तो हमें स्वर्ग दे दो, वर्ना हमको दूसरा जन्म नहीं मंगता। eat, drink and be merry! नरक में जाएँ हमारे दुश्मन। बस, बात ख़तम।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८९ – देश-परदेश – नाम में क्या रखा है? ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८९ ☆ देश-परदेश – नाम में क्या रखा है? ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे यहां लोग अपने इष्ट देव का पर्यायवाची आदि से नाम रखना पसंद करते थे, ताकि उनका बच्चा भी उन्हीं के सामान गुणकारी बने। इसीलिये रावण, कंस, शूर्पनखा  आदि नाम किसी बच्चे का नहीं सुना हैं। इंसान अपने कर्मो से ही पहचान बना लेता है, नाम महत्वपूर्ण नहीं होता हैं।

इन दिनों चर्चित नाम है, तुकाराम मुंडे जोकि वर्तमान में  महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेटर विभाग में कमिश्नर श्री तुकाराम मुंडे इन दिनों बहुत अधिक चर्चा में चल रहे हैं। मई 2026 में इस पद पर विराजमान होते ही उन्होंने अपने तेवर दिखाने आरंभ कर दिए हैं।

कुछ सप्ताह पूर्व करीब चालीस करोड़ के गुटका मसाले जप्त करने के बाद, उन्होंने मुम्बई के बड़े होटल, खाद्य जिंसों के वितरण आदि संस्थाओं के यहां भी छापा मार कर खाद्य उद्योग में खलबली मचा दी हैं। मुम्बई में अमीर और गरीब सब के प्रिय वड़ा पाव बेचने वाले तक को नहीं छोड़ा हैं। अभी तक सस्ता वडा पाव अखबार के पन्ने को टुकड़े में परोसा जाता हैं। अखबार की स्याही हानिकारक होती है, इस लिए इसको अब प्रतिबंधित कर दिया गया हैं।

मुंबई के रद्दी/भंगार आदि व्यवसाय से जुड़े लोगों को आर्थिक हानि हो गई हैं। पुराने अखबार के स्टॉक रखने वाले सकते में आ गए हैं। एक मित्र से मुंबई में बात हुई, तो उसने बताया रद्दी क्रेताओं ने भी अब बहुत कम रेट कर दिए हैं।

विगत दिन ये अफवाह उड़ी थी, कि तुकाराम को राजस्थान स्थानांतरित कर दिया गया हैं। उनके दो दशक के कार्यकाल में दो दर्जन ट्रांसफर हो चुकी हैं। उपरोक्त चित्र हमारे जयपुर के बहुत सारे परिवारों की रसोई का हैं। अब जयपुर की महिलाएं इंतजार में कब तुकाराम मुंडे उनकी किचेन की गंदगी देखकर, उनके रसोई घर बंद करवा देगा और उनको भी इस बोरिंग सी दिनचर्या के काम से मुक्ति मिलेगी।

तुकाराम नाम में कुछ तो है, 26/11 के हमले में पाकिस्तानी आतंकवादी  दरिंदे कसाब को भी तो मुंबई पुलिस के कांस्टेबल स्वर्गीय तुकाराम अंबाले ने ही जान की बाजी लगा कर जिंदा पकड़ा था। हम तो इस बात को नकारते है, कि नाम में क्या रखा हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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