हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०९ ☆ बाल कविता – संस्कार तो मां ही देती… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०९ ☆ 

☆ बाल कविता – संस्कार तो मां ही देती ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

लाड़-प्यार बच्चों से करना,

पर सिर पर तुम नहीं चढ़ाना।

देर अगर यदि हो जाएगी तो,

खूब पड़ेगा फिर पछताना।।

 *

संस्कार तो मां ही देती,

वह ही प्रथम गुरु है।

बनना और बिगड़ना हाथों,

उससे जीवन शुरु है।

 *

मोबाइल जो हाथ हैं देते,

बचपन का छिन जाए बाना।

 **

नरक बनाना है यदि घर को,

बच्चे की जिद पूरी करना।

ज्यों-ज्यों बच्चा बड़ा बनेगा,

अपनों से ही दूरी करना।

 *

जीवन में यदि खुशियां लानी,

कथनी करनी एक बनाना।

 **

मां का त्याग खूब फलता है,

वे ही बच्चे अच्छे बनते।

पिता भी अच्छे यदि बन जाएं,

बच्चे भी सद्गुण को चुनते।

 *

बच्चों से नहीं हिंसा करना,

बस केवल उनको समझाना।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ फूल ☆ वनिता संभाजी जांगळे ☆

वनिता संभाजी जांगळे

?  कवितेचा उत्सव ?

☆ फूल ☆ वनिता संभाजी जांगळे ☆

प्रत्येक फूला -फूलास असतो

फूलण्याचा आनंद

वारा दूरवर वाहून नेतो

दरवळणारा सुगंध

एक दिवसाच्या आयुष्याची

कधी फूलास नसते चिंता

सुकलेल्या पाकळ्यांची फूल

कधी मांडत नाही व्यथा

फूलून सदाची हसावे

काट्या -कुट्यांत सजून रहावे

कधी हारामध्ये गुंफून घ्यावे

कधी पायरीचे प्राजक्त व्हावे

हाच फूलास फूलण्याचा छंद

क्षणभर फुलण्याचा सुध्दा

फूल जपत असते आनंद

 

©  वनिता संभाजी जांगळे (घागरे)

जांभुळवाडी-पेठ, ता. – वाळवा, जिल्हा – सांगली

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५९ ☆ एक गीतिका ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “एक गीतिका” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५९ ☆

☆ एक गीतिका ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पत्ता-पत्ता बूँद झरी है

धूप बिचारी पड़ी मरी है।।

 *

बादल के आँगन में हँसती

चंचल बाला सी बिजुरी है।।

 *

छप्पर से लटकी है बरखा

छानी भरी-भरी गगरी है ।।

 *

ताल-तलैया पोखर बोलें

परे हटो नदिया गहरी है।।

 *

कहाँ रुकेगी मन की फिसलन

जहाँ-तहाँ काई पसरी है।।

 *

धरती पर है यौवन छाया

हरियाली गाती कजरी है ।।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नतमस्तक शक्तिमान है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – नतमस्तक शक्तिमान है…!

☆ ॥ कविता॥ नतमस्तक शक्तिमान है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सबका अपना धर्म है, अपनी पहचान है,

किंतु सबका प्राणाधार एक दिनमान है।

*

सत्कर्मों के कारण व्यक्ति पूजा जाता है,

माँगने  से  नहीं  मिलता मान-सम्मान है।

*

जिंदगी में कब होनी, अनहोनी घट जाए,

कोई समझ न पाया ईश्वरीय विधान है।

*

कंटक- संकट बीच सदा जो खुश रहता,

उसके लिए महल-मढ़ैया एक समान है।

*

स्वाधीनता का अर्थ मिथ्या आरोप नहीं,

प्रजातंत्र में सबका अपना स्वाभिमान है।

*

बड़े-बड़े ज़ोरावर आए, जहां से चले गए,

समय के आगे नतमस्तक शक्तिमान हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विकल्प ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विकल्प? ?

उदय की प्रक्रिया में

ठहरे हैं कई,

मध्याह्न तक पहुँचकर भी

बालसुलभ क्रियाकलापों में

डूबे पड़े हैं कई,

उधर अवसान की देहरी पर

रुके हैं-

संतृप्त-से कई,

अतृप्त-से कई,

सुनो पथिक!

चक्र के आगे भले

हरेक विवश है,

पर तृप्ति-अतृप्ति,

तृष्णा-संतृप्ति पर

हरेक का अपना बस है,

अपना आकलन खुद करो,

अपना विकल्प खुद चुनो!

?

© संजय भारद्वाज   

21.39 बजे, 7 सितम्बर 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  शुक्रवार दि. 4 सितंबर (जन्माष्टमी) से गुरुवार 10 सितंबर  तक गोविंद साधना संपन्न होगी। 🕉️

💥 ‘गोविंद साधना’ का जाप मंत्र होगा-  ॐ कृष्णाय नमः.।। इसके साथ ही मधुराष्टकम् का पाठ करेंगे।💥

💥आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे। 💥

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६६ ☆ मरकर अमर वो हो गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मरकर अमर वो हो गया“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६६ ☆

✍ मरकर अमर वो हो गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

पूछा तू उसके पास  बुलाया न आ गया

बोला कि पलकें छपका इशारा किया गया

 *

फ़रियाद है ग़रीब की हर दर पे अनसुनी

रोता हुआ वो आया था रोता चला गया

 *

मरकर अमर वो हो गया सदियों के वास्ते

जो जान अपनी मुल्क की ख़ातिर लुटा गया

 *

धोखे से कब गिला तेरे मैं शुक्रिया करूँ

आँखों से ये जो यक़ीन का चश्मा हटा गया

 *

भागे है ज़र के पीछे बशर जानते हुए

ले साथ क्या वो आया है ले साथ क्या गया

 *

उम्मीद दर्द से थी मुदावा की जिससे वो

इक ज़ख़्म  मेरे दिल पे है ताज़ा लगा गया

*

अब आज़माने को कोई सूरत नहीं बची

तोड़ा है तुमने जब भी भरोसा किया गया

 *

वो तंगदिल था कर न सका है मुझे मुआफ़

वर्षों का रब्त एक ख़ता पर मिटा गया

 *

इल्ज़ामे-बेवफाई से मैं बच गया अरुण

मुझसे किनारा करके सनम बेवफा गया

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७० – गर इश्क है उर्दू से… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना – गर इश्क है उर्दू से।)

☆ हेमंत साहित्य # ७० ☆

✍ गर इश्क है उर्दू से… ☆ श्री हेमंत तारे  

फ़ासला  नही,  फ़ासिला कहा करो

हादसा  नही,   हादिसा  कहा  करो

गर इश्क है उर्दू से,  पशेमा  क्यों हो

यार,  सरेआम ऐलानिया कहा करो

कुछ  रिवायतें होती हैं उर्दू अदब की

मशायरे सुनो, और ईर्शाद कहा करो

 *

गैरों की नही अपनों की बात करता हूं

गर वो ग़लत है, उन्हें गलत कहा करो

 *

आधा सच कहो,  ये लाजिमी तो नही

जो बात है, वो साफगोई से कहा करो

 *

ख़ामोशी बोलती है जानम, इंकार नही

पर, कभी खुलकर भी  बात  कहा करो

 *

जो मौसम – ऐ – तपिश में देते है पनाह

उन  दरख़्तों को भी शुक्रिया कहा करो

 *

ये दिल है ‘हेमंत’ कोई खिलौना तो नही

टूट जाता है गर खेले कोई ये कहा करो

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लेखनी सुमित्र की – स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – ओ प्राणमयी… ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

✍ लेखनी सुमित्र की – स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – ओ प्राणमयी… ✍

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी जी  की स्मृति में आपकी कविता – ओ प्राणमयी।)

✍ लेखनी सुमित्र की – स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – ओ प्राणमयी… ✍

ओ प्राणमयी, ओ दीप्तिमयी

जीवन संगिनि मेरी ।

 *

लाया था मैं तुम्हें व्याहकर

हुआ यही अनहोना

दुनिया मिली अभावों वाली

दे न सका सुख दौना।

सोचा दूँगा पूरनमासी

सौंपी रात अँधेरी ।

 *

कब रेशम श्रृंगार किया था

कब आभूषण पहने

मेरी लाज बचाने खातिर

उतर गये सब गहने

रानी रानी कहा किया पर

बना दिया था चेरी

 *

उजड़ी उजड़ी सी बगिया में

तुमने फूल खिलाये

पथराये प्राणों में तुमने

नये बीज अँकुराये

बिना कहे ही समझी तुमने

मेरी पीर घनेरी

*

मेरी मान प्रतिष्ठा को ही

जीवन लक्ष्य बनाया

मेरी हर इच्छा को तुमने

शिशु जैसा दुलराया

मन की बात जान लेती हो

लगती नहीं अबेरी

*

अर्पित किया सभी कुछ तुमने

बदले में क्या पाया

जीवन के दु:खों  को तुमने

सदा गीत सा गाया।

कल्पवृक्ष सी बनी रहीं तुम

मैं जैसे झरबेरी ।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६१ – बुन्देली कविता – ”बे तौ बस हड़ताल करत हैं” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – बे तौ बस हड़ताल करत हैं।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६१ ☆

☆  बुन्देली कविता – बे तौ बस हड़ताल करत हैं ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

बे तौ बस हड़ताल करत हैं 

रोजइ  नये बवाल करत हैं 

जब देखौ तब करत बखेड़ा 

हल नईं  कोउ सवाल करत हैं 

 *

आगी सुलगैबे को धंधौ 

जे अगिया बेताल करत हैं 

 *

लै  खें खून गरीबों कौ बे 

घर की रंगत लाल करत हैं 

 *

बे कब सें टरकाउत जा रय 

आज करत हैं, काल करत हैं 

 *

उतै न जइयो, हुरयारे हैं 

कीचड़ से बेहाल करत हैं 

 *

बे मसखरी, चुहुलबाजी सें 

‘भगवत’ दूर मलाल करत हैं

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३३ – खिड़की से अब झाँकते ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “खिड़की से अब झाँकते। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३३ ☆

☆  खिड़की से अब झाँकते  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

खिड़की से अब झाँकते, हर बूढ़े माँ बाप ।

गुम सुम से हैं देखते, सूरज का संताप ।।

*

जीवन भर दौड़े बहुत, नहीं किया विश्राम ।

आया जब संकट समय, उन पर लगा विराम।। 

*

श्वासें अब हैं टूटतीं, रोते नेत्र निचोर ।

नील गगन में डूबती, आशाओं की भोर ।।

*

विश्वासों की पोटली, संजाये थे साथ।

काल परिंदा ले उड़ा, क्षण में किया अनाथ।।

*

जीवन की संध्या घड़ी, अंधकार गहराय ।

आशाओं के दीप को, उर में कौन जलाय।।

*

जिन गलियों में खेलकर, बड़े हुये युवराज ।

उन राहों को लाँघ कर, चले गये सरताज ।।

*

नये क्षितिज पर उड़ गये, बेटा भानु प्रताप।

काट डोर सम्बन्ध कीे, बिछुड़ गये माँ बाप ।।

*

अपेक्षायें न राखिये, अपनों से कुछ आप ।

मन दर्पण सा टूट कर, बन जाये अभिशाप।।8

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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