हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ व्यंग्य भाषण: बेहोशी का लोकतंत्र ☆ श्री रमाकांत ताम्रकार ☆

श्री रमाकांत ताम्रकार

☆ व्यंग्य – व्यंग्य भाषण: बेहोशी का लोकतंत्र श्री रमाकांत ताम्रकार 

भाइयों और बहनों…

आज मैं डॉक्टर बनकर आपके सामने आया हूँ. घबराइए मत इंजेक्शन नहीं लगाऊँगा बस एक बीमारी बताऊँगा

जो आप सबको है. अरे ऐसा नहीं है कि मुझे नहीं है, मुझे भी है मैं भी उससे अछूता नहीं हूं.

इस बीमारी का नाम है सुविधानुसार बेहोशी जो कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक है. वैसे हमारे देश में आदमी मरने से नहीं डरता केवल और केवल जिम्मेदारी से डरता है!आपने भी देखा होगा बिजली का बिल भरने जाओ तो जो लोग लाइन में खड़े हैं उनमें से कई लोग 5  से 10 मिनट बाद ही कहने लगते हैं भाई साहब, चक्कर…आ…आ और… धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ते है

लेकिन…यदि उन्हीं  आदमियों को राशन की दुकान पर देखिए… सुबह 6 बजे से लाइन में दोपहर 2 बजे तक खडे रहेंगे तब ना चक्कर… ना दर्द…ऊपर से कहेगा देश तरक्की कर रहा है इसलिए कि उसके खून में  फ्री की आदत जो हो गई है.  हमारे यहाँ एक ही मेडिकल टेस्ट को पब्लिक में मान्यता हैं—

 ECG को नहीं पर ेक्ग जैसा टेस्ट  RCG को अर्थात राशन कार्ड ग्राफ!

अब तो गाँव गाँव में नया योग शुरू हो गया है फ्री-योग. जिसकी कल्पना सपने में भी किसी बाबा ने भी नहीं की होगी. इस फ्री योग में आदमी—धूप में तपेगा धक्का भी खाएगा फिर भी खुश रहेगा क्योंकि उसे फ्री योग की आदत जो लग गई है  लेकिन जैसे ही कोई कहे – भाई, टैक्स तो भरिए… बस… फिर क्या है  उसका BP डाउन होगा और वह आँखें बंद कर लेगा और सीधा बेहोशी की हालत में चला जाएगा …यही राष्ट्रीय बेहोशी है.

इस देश में अब दो ही लाइनें बची हैं—

 एक जहाँ लोग खड़े रहते हैं और दूसरी जहाँ लोग गिरते रहते हैं.

आज की जनता बहुत ही स्मार्ट हो गयी है उसे सब पता है कि कहाँ क्या फ्री मिलेगा, कब मिलेगा और कैसे मिलेगा

लेकिन…उसे यह नहीं पता  देश कैसे चलता है क्योंकि…कर्तव्य सुनते ही… उसका दिमाग एयरप्लेन मोड में चला जाता है.

हमारे देश में अब नेटवर्क नहीं जाता, लेकिन जिम्मेदारी आते ही दिमाग का सिग्नल चला जाता है.

अब देश दो लाइनों में बंट गया है-

पहली लाइन – अधिकार की हैं, यहाँ भीड़ है…जोश है…सेल्फी है… नारे हैं…शक्ति है.

दूसरी लाइन –  कर्तव्य की हैं, यहाँ केवल पिन पटक सन्नाटा है…

और बीच-बीच में कोई कोई जमीन पर भी पड़ा मिल जाता है. लोग पूछते हैं –  क्या हुआ बेचारे को?

तब जवाब मिलता है – भाई… इसे जिम्मेदारी का अटैक आया हैं.

देश में अब कोरोना नहीं फैलता… कर्तव्य रुपी बीमारी फैलती है… और जिसे लग जाती है वह तुरंत गिर जाता है.

हम सब चाहते हैं कि सड़क अच्छी हो, बिजली आए,अस्पताल ठीक हों, रहन सहन अच्छा हो प्रदूषण न हो दारु भी फ्री मिले और बीमार हो जाओ तो इलाज भी,  नोकरी भी मिले मोटी तनख्वाहें वाली लेकिन  टैक्स कोई और दे,नियम कोई और माने ईमानदारी कोई और दिखाए.

देश में अब नया सर्वे होना चाहिए – 

कितने लोग टैक्स देते हैं और कितने लोग सिर्फ फ्री का लाभ लेते हैं अब तो सरकार भी समझदार हो गई है उसे पता है जिम्मेदारी दोगे तो जनता धड़ाधड़ गिर जाएगी और सरकार गिरा देगी और यदि फ्री योग वाली सुविधा दोगे तो जनता एक टांग पर खड़ी रहेगी. इसलिए तो देश में लोकतंत्र नहीं चल पा रहा हैं. केवल और केवल सुविधातंत्र चल रहा है. अब देश में नागरिक नहीं बन पाते सिर्फ लाभार्थी बनते हैं.

तो भाइयों और बहनों, समस्या यह नहीं है कि लोग बेहोश हो रहे हैं. समस्या यह है कि  लोग सही जगह पर होश में नहीं हैं. इस देश में अब नागरिक नहीं रहते. यहाँ मौके के हिसाब से होश में आने वाली जनता रहती है. अधिकार दिखते ही उन्हें होश आ जाता है और कर्तव्य दिखते ही केवल आदमी नहीं गिरता…उसका चरित्र गिर जाता है… जिम्मेदारी गिर जाती है और पहले तो कभी-कभी देशभक्ति भी बेहोश हो जाती थी अब तो पूर्ण रूप से देश भक्ति जिम्मेदारी की बीमारी से बेहोश होकर रसातल में चली गई.  जनता फ्री का योग कर रही है तो वहीं नेता, अफसर घर भरने का योग कर रहे हैं. देश जाए… भाइयों और बहिनों.

© श्री रमाकान्त ताम्रकार

संपर्क – 423 कमला नेहरू नगर, जबलपुर। 

मोबाइल 9926660150

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर / सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’   ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८८ – व्यंग्य – भाग्य-सेंसर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – भाग्य-सेंसर।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८८ – व्यंग्य  – भाग्य-सेंसर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

बेलतारा गांव के सबसे बड़े लफ्फाज ‘फरेब दास’ ने जब इस बार प्रधानी का परचा भरा, तो उन्होंने सड़कों और बिजली जैसे उबाऊ मुद्दों को दरकिनार कर दिया। उनका नया चुनावी शगूफा था—’एंटी-बदकिस्मती कवच और नक्षत्र-सेंसर योजना’। फरेब दास का तर्क था कि गांव की असली समस्या गरीबी नहीं, बल्कि ‘खराब ग्रहों की चाल’ है, जो सड़क पर बिछे रोड़ों से भी ज्यादा खतरनाक है। उन्होंने घोषणा की कि जीतते ही वे गांव के हर घर की छत पर एक ‘नक्षत्र-फिल्टर’ लगवाएंगे, जो राहु-केतु की कुदृष्टि को सोखकर उसे सकारात्मक ऊर्जा में बदल देगा। गांव के लोग, जो अपनी हर नाकामी का दोष शनिदेव के माथे मढ़कर निश्चिंत हो जाते थे, अचानक इस ‘एस्ट्रो-टेक’ क्रांति के पीछे ऐसे दीवाने हुए कि उन्हें लगने लगा कि अब बिना मेहनत किए ही छप्पर फाड़कर धन बरसेगा।

प्रचार के अंतिम पड़ाव पर फरेब दास ने गांव के चौराहे पर एक ‘किस्मत-स्कैनर’ लगाया। यह वास्तव में एक पुराना कबाड़ हो चुका फोटोकॉपी मशीन का ऊपरी हिस्सा था, जिस पर उन्होंने दीपावली वाली झालरें लपेट दी थीं। उन्होंने गांव वालों को पट्टी पढ़ाई कि जो भी व्यक्ति उन्हें वोट देने का संकल्प लेकर इस मशीन पर अपनी हथेली रखेगा, उसकी हस्तरेखाएं ‘रिफ्रेश’ होकर सीधे इंद्रलोक के डेटाबेस से जुड़ जाएंगी। विपक्षी उम्मीदवार ‘भोला नाथ’ खाद और सिंचाई की बातें कर रहे थे, लेकिन जनता को तो उस भविष्य की चिंता थी जहाँ उनकी फूटी किस्मत की मरम्मत होने वाली थी। फरेब दास ने एक पुराने रेडियो से विचित्र आवाजें निकालकर उसे ‘ग्रहों का सिग्नल’ बताया और ग्रामीणों को विश्वास दिला दिया कि विधाता ने अब गांव की चाबी उन्हें सौंप दी है। लोग अपनी जमा-पूँजी फरेब दास के चरणों में चढ़ाने लगे ताकि उनके भाग्य का ‘सॉफ्टवेयर’ अपडेट हो सके।

जिस दिन चुनाव का परिणाम आया और फरेब दास की प्रचंड जीत हुई, पूरा गांव अपना ‘किस्मत-अपग्रेड’ लेने उनके घर पहुँच गया। लोग चाहते थे कि अब उनके घर में नोटों की बारिश हो और दुख-तकलीफें परलोक सिधार जाएं। फरेब दास अपनी नई चमचमाती एसयूवी से उतरे और सबके हाथ में एक-एक नींबू और लाल मिर्च थमाते हुए बोले— “भाइयों, मशीन का सर्वर डाउन हो गया है क्योंकि गांव में ‘अविश्वास’ का वायरस बहुत ज्यादा है!” जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, फिर हमारे भाग्य का क्या?” फरेब दास ने ठहाका लगाया और गरज कर बोले, “मूर्खों! तुम्हारा भाग्य तो उसी दिन फूट गया था जब तुमने एक कबाड़ मशीन के भरोसे अपना वोट मुझे बेच दिया। अब इन नींबू-मिर्च को अपने दरवाजे पर लटकाओ और अगले पांच साल अपनी बेवकूफी का नजर-बट्टू बनो। मैंने तो तुम्हारे वोटों से अपना ‘राजयोग’ सिद्ध कर लिया है!” जनता सन्न खड़ी उस नींबू को देख रही थी और फरेब दास ‘भाग्य-सुधार’ की धूल उड़ाते हुए शहर की ओर निकल पड़े।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ युद्ध… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ आलेख ☆ युद्ध… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

(वन लाइनर)

वे शांति- स्थापना को संकल्पित हैं। उन्हें कलम की ताकत पर पूरा भरोसा है जितना ट्रंप को अपने सिरफिरे बयानों पर। लिहाज़ा एक बुद्धिवादी संगठन ने बुद्धिजीवियों को आमंत्रित किया है शांति स्थापना के लिए। कुछ लोग दो, तो कुछ लोग चार चक्रवाहिनियों पर सवार होकर बड़ी दूर से आए हैं। भई साहित्यकारों का भी तो कोई कर्तव्य बनता है कि नहीं !

बेशक वे अस्त्र-शस्त्रों से लैस नहीं हैं पर उनके पास शब्दों का आयरन डोम, शब्दों के मिसाइल, शब्दों के ड्रोन, शब्दों के बी-2 बाॅम्बर, शब्दों के एफ-35 क्या नहीं है उनके पास? ईरान-इजराइल युद्ध में इंसानियत का जनाज़ा निकलते देख कर वे कैसे चुप रह सकते हैं? यह तो कायरता हुई।

महाभारत काल, प्रथम विश्वयुद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध ब्ब्रिटेन का साम्राज्यवाद, बांग्लादेश, अमेरिका और वेनेजुएला, वियतनाम, अफगानिस्तान, यूक्रेन, इराक, सीरिया, लीबिया, गाज़ा, यू .एन सभी चर्चा के केंद्र में रहे। बुद्धिजीवियों के माथे पर चिंता का संजाल नज़र आया।

चाय-पानी पीकर लेखक ज्वाला जी निकले। उन्हें जरा भी चैन न था। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खरबपति मालिक या युग के खलनायक, सनकी तानाशाह और बिजूका यू .एन। नक्कारखाने में तूती की आवाज भला कौन सुनेगा? वे बेहद अशांत थे। सभी शब्दों से शांति-शांति पुकार रहे थे जैसे वह आने ही वाली है। इस मंथन से मोहिनी की तरह अमृत घट लेकर प्रकट होने ही वाली है।

ज्वाला जी की आंखों के सामने शब्दों के समानांतर वो तस्वीरें उभर रही थी, ठीक उसी समय कितने ही लोग घायल, अपाहिज, लहूलुहान, मृत या भूखे-प्यासे तड़प रहे होंगे, गैस फील्ड, ऑयल रिफाइनरी जल रही होंगी ! आसमान काले धुएं से भर गया होगा। सायरन बज रहे होंगे। खण्डहर हो रही होंगी सारी इमारतें !

तो सचमुच शब्दों की शांति हुक्मरानों के सनकी दिमाग तक पहुंच पाएगी? ज्वाला जी स्वयं को समझा नहीं पा रहे थे, कहीं यह स्वयं को विचारक, चिंतक सिद्ध करने का निरीह प्रयास तो नहीं? या महज प्रदर्शन स्वयं को शांतिप्रिय सिद्ध करने का। उन्होंने सभी उपस्थितों की आंखों में, अगले दिन अखबार में छपनेवाली अपनी अपनी तस्वीरें, नाम, बयान देख लिए थे।

कहते हैं कुछ न करने से कुछ करना बेहतर है। क्या यह सही है? पर मौन भी तो ठीक नहीं। इसे मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की कोशिश कह सकते हैं ! उन्हें लग रहा है वे खुद को नहीं समझा पाएँगे। और वे लगातार स्वयं से युद्ध रत हैं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२९ ☆ व्यंग्य – बिल्ली और छींका ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम  व्यंग्य  – ‘बिल्ली और छींका’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२९ ☆

☆ व्यंग्य ☆ बिल्ली और छींका

रौनक भाई को खुशी के मारे रात भर नींद नहीं आयी। रात भर भगवान को धन्यवाद देते रहे। रात को ग्यारह बजे तक बधाई के फोन आते रहे। बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा है।

सवेरे छः बजे से ही फोन फिर बजने लगा। बधाइयों का तांता लग गया। फिर आठ बजे से पार्टी के लोग बधाई देने के लिए आने लगे। देखते देखते रौनक भाई का लॉन लोगों से भर गया। कुछ लोग मिठाई का डिब्बा लेकर आये थे।

दरअसल पिछली शाम रौनक भाई के विरोधी दल की एक चुनाव सभा हुई थी, जिसमें एक छुटभइये ने अपनी पार्टी के प्रति ख़ैरख्वाही दिखाने के चक्कर में रौनक भाई का नाम लेकर उन्हें ‘सुअर’ कह दिया था। तभी से राजनीतिक वातावरण गर्म हो गया था और रौनक भाई की पार्टी के लोग विरोधियों को नाना प्रकार के विशेषणों से नवाज़ने में लग गये थे।

रौनक भाई आपदा को अवसर में बदलने के पुराने खिलाड़ी थे। उन्होंने मौके को लपक लिया। तत्काल गालीबाज़ के सैकड़ों वीडियो वायरल हो गये। रौनक भाई का वीडियो भी वायरल हुआ जिसमें वे सन्त की मुद्रा में कह रहे थे कि  यह अपमान उनका नहीं, देश के एक  सौ चालीस करोड़ लोगों का है। जनता विरोधियों की इस बदज़बानी को कभी माफ नहीं करेगी और उसका जवाब वोट के मार्फत देगी।

पिछली शाम से रौनक भाई गद्गद थे। विरोधियों ने अचानक ही ‘सेल्फ गोल’ कर लिया था। रौनक भाई को पक्का भरोसा हो गया था कि इस गाली की बदौलत अगले चुनाव में उनके वोटों में कम से कम लाख डेढ़-लाख का इज़ाफा हो जाएगा। यह गाली विरोधियों को बहुत मंहगी पड़ेगी। उन्हें पता चला था कि विरोधियों में से कई अब पछता रहे थे, लेकिन अब पछताए होत का? तीर कमान से निकल चुका था।

रौनक भाई ने कई बार लॉन में इकट्ठी भीड़ को संबोधित किया। उन्होंने कहा, ‘कल भगवान ने हमें वरदान दिया है। यह गाली हमारे लिए वरदान ही साबित होने वाली है। गाली का हम कोई जवाब नहीं देंगे। जवाब जनता देगी। हम तो ‘जो तोकू कांटा बुवै, ताहि बोउ तू फूल’ वाले सिद्धांत पर चलेंगे। गाली का जवाब गाली में देने से सब गड़बड़ हो सकता है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। हम तो कल से आन्दोलन करेंगे और जनता के दिमाग में ठोक ठोक कर भरेंगे कि हमें गाली दी गयी है, जिसे क्षमा नहीं किया जा सकता।

‘दूसरी बात यह कि भगवान का एक अवतार वराह अवतार है। इस तरह विरोधियों ने सुअर कह कर मुझे भगवान का अवतार बना दिया है। इसलिए मैं तो अपमानित से ज़्यादा सम्मानित महसूस कर रहा हूं। लेकिन मौके की नज़ाकत को देखते हुए आप लोग कल से सड़कों पर उतरें और जनता को बताएं कि हमारे विरोधी कितनी घटिया मानसिकता के लोग हैं। राजनीति में मौके का फायदा उठाने से चूकना बेवकूफी होती है। तो उठिए और काम पर लग जाइए। अब  एक मिनट भी ज़ाया करना गुनाह होगा।’

पार्टी के एक सयाने बोले, ‘गाली दी है तो मानहानि का दावा होना चाहिए।’

रौनक भाई ने जवाब दिया, ‘ज़रूर होगा, लेकिन पहले अच्छी तरह से ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना ज़रूरी है। जनता के मन में हमारी ‘इंसल्ट’ की बात पैठनी चाहिए।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८७ – व्यंग्य – मिशन विसर्जन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – मिशन विसर्जन।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८७ – व्यंग्य  – मिशन विसर्जन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

अरे भैया राम-राम! क्या बताएँ, हमारे मोहल्ले के झुनझुनवाला जी का जो यूरेका-यूरेका है न, वो आर्किमिडीज वाला कम और बॉर्डर वाला सर्जिकल स्ट्राइक ज्यादा लगता है। आर्किमिडीज ने तो टब में बैठ के सिद्धांत खोजा था, पर हमारे झुनझुनवाला जी जब बाथरूम से मुस्कुराते हुए, हवा में मुक्का लहरा के निकलते हैं, तो समझ लो आज उन्होंने गुरुत्वाकर्षण को पटखनी दे दी है। मोहल्ले में सन्नाटा ऐसा रहता है जैसे वर्ल्ड कप के फाइनल में आखिरी गेंद पर छह रन चाहिए हों और स्ट्राइक पर खुद झुनझुनवाला जी का पेट खड़ा हो। सस्पेंस तो देखिए, कबाड़ी भाई हाथ में सिगरेट का बंडल और कड़क चाय की प्याली लेकर ऐसे टहलते हैं जैसे किसी सुसाइड मिशन पे जा रहे हों। बोले— “अरे लल्लन भैया, जब तक ई कैफीन की मिसाइल अंदर जाके धमाका नहीं करती, तब तक नीचे का गेटवे ऑफ इंडिया खुलता ही नहीं है!” उनके पेट को भी रिश्वत चाहिए, बिना ‘पेमेंट’ के वहां का ट्रैफिक सिग्नल लाल ही रहता है। अजीब स्थिति हैं भाई, कोई नाभि के पास सरसों का तेल रगड़ रहा है, तो कोई कहता है कि जब तक हम मोहल्ले के उस काले कुत्ते को दो बार जोर से डांट न लें, तब तक विसर्जन का भाव ही नहीं जागता।

हमारे हेडमास्टर चौरसिया जी का पेट तो भाई साहब एकदम उसूलों वाला है। जब तक दैनिक जागरण का संपादकीय पढ़ के दो-चार भ्रष्ट नेताओं को मन ही मन सस्पेंड न कर दें, तब तक कुदरत अपनी फाइल आगे नहीं बढ़ाती। चौरसिया जी का एडिटर जब तक खुश नहीं होता, तब तक वो एक इंच नहीं हिलते। वहीं दूसरी तरफ, खन्ना जी बाथरूम में जाकर किशोर कुमार के दर्द भरे नगमे गाते हैं। उन्हें लगता है कि मेरे नैना सावन-भादो गाने से अंदर की खुश्की सावन में बदल जाएगी। संगीत का ऐसा प्रेशर-कुकर उपयोग आपने पहले कभी नहीं देखा होगा। उधर एडवोकेट साहब हैं, जो टॉयलेट की सीट पर बैठकर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले और दलीलें पढ़ते हैं। उनका मानना है कि जब तक दिमाग पर लीगल प्रेशर नहीं पड़ता, तब तक कुदरत अपना फाइनल जजमेंट नहीं सुनाती। कोई सुबह-सुबह बायीं आंख मींचकर दायीं नाक से ऐसी लंबी सांस खींचता है जैसे सारा ब्रह्मांड अंदर भर लेगा, उसका दावा है कि इससे इंजन रिवर्स गियर से सीधा टॉप गियर में आ जाता है।

बात यहीं खत्म नहीं होती, हमारे मोहल्ले में तो केमिकल लोचा के उस्तादों की फौज है। चुलबुली चाची का लॉजिक है कि जब तक पेट को आधा चम्मच हींग और काला नमक का हैंड ग्रेनेड न दिया जाए, तब तक मोर्चा नहीं खुलेगा। कोई त्रिफला चूर्ण को ऐसे फांक रहा है जैसे वो अमृत हो, तो कोई रात भर भिगोई हुई इक्कीस किशमिश को सुबह ऐसे घूरता है जैसे पुराने उधार की वसूली करनी हो। एक महाशय तो दीवार के सहारे पैर ऊपर करके शीर्षासन में अपनी किस्मत ढूंढ रहे हैं, तो कोई धनुरासन में ऐसा तना है कि बस अभी तीर छूटने ही वाला है। कुछ लोग तो और भी हाई-टेक हैं, वो बाथरूम में पावर बैंक और ईयरफोन लेकर जाते हैं क्योंकि उनका कहना है कि संदीप माहेश्वरी का मोटिवेशनल पॉडकास्ट सुनने से ध्यान भटकता है और पेट को परफॉर्म करने की क्रिएटिव आजादी मिलती है। उधर मास्टर जी पुराने स्कूल के रजिस्टर खोलकर बैठ जाते हैं क्योंकि अनुपस्थित छात्रों की एब्सेंट लिस्ट देखने से पेट का पुराना स्टॉक भी प्रेजेंट हो जाता है।

जुगाड़ नंबर पच्चीस से आगे बढ़िए तो इमेजिनेशन के उस्ताद मिलते हैं। कुछ लोग आंखें बंद करके सावन की झड़ी या बहते हुए नलों की कल्पना करते हैं, इस उम्मीद में कि शायद अंदर भी लिक्विडिटी बढ़ जाए। एक प्रजाति ऐसी है जो पुराने ट्रांजिस्टर की तरह पेट के दायीं तरफ हल्के हाथ से ट्यूनिंग करती है कि शायद कोई फ्रीक्वेंसी मैच हो जाए। हमारे ताऊ जी तो कहते हैं— “बेटा, जब तक हम पड़ोसी की नई कार को देख के थोड़ा जल न लें, तब तक हमारा हाजमा दुरुस्त नहीं होता।” अब बताइए, ईर्ष्या का कब्ज से क्या रिश्ता? लेकिन यहां तो भावनाओं का गठबंधन चल रहा है। कोई पैर के नीचे स्टूल दबाकर बैठा है, तो कोई दीवार पर छिपकलियों के युद्ध का लाइव टेलीकास्ट देख रहा है। कोई सुबह-सुबह तांबे के लोटे का बासी पानी ऐसे पीता है जैसे वो गंगाजल हो, तो कोई बाथरूम की दीवार पर अपनी मुट्ठियां मार रहा है कि शायद शारीरिक कंपन से कुछ काम बन जाए।

अगली श्रेणी उन तेल मालिशिया लोगों की है जो नाभि में चमेली का तेल डाल के लेटे रहते हैं जैसे पेट नहीं, कोई बेशकीमती विंटेज कार का इंजन हो। एक भाई साहब तो ऐसे हैं जो सुबह-सुबह बासी मुंह अपनी पुरानी प्रेमिका की फोटो देखते हैं, उनका कहना है कि पुरानी यादों का दबाव पेट के दबाव को सक्रिय कर देता है। कुछ लोग तो बाथरूम के अंदर मल्टी-टास्किंग के चैम्पियन होते हैं—वहां बैठकर वो बच्चों का होमवर्क भी चेक कर लेते हैं और घर का पूरा बजट भी बना डालते हैं। उन्हें लगता है कि दिमागी बोझ बढ़ने से गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत ज्यादा मजबूती से काम करेगा। कोई गरम दूध में दो चम्मच शुद्ध देसी घी ऐसे मिलाता है जैसे रॉकेट में लिक्विड फ्यूल डाल रहा हो। चेहरे पर ऐसी गंभीरता जैसे नासा का कोई सैटेलाइट ऑर्बिट में सेट करने जा रहे हों। सस्पेंस ये है कि अगर आज घी ने काम नहीं किया, तो मास्टर जी स्कूल नहीं, सीधे सीधे डिप्रेशन में चले जाएंगे।

हमारे मोहल्ले के पंडित जी कहते हैं कि जब तक सुबह उठकर सूर्य देव को जल न चढ़ाओ और अच्युतम केशवम का जाप न करो, तब तक आंतरिक शांति नहीं मिलती। वहीं पास के दुबे जी का बेटा सुबह-सुबह खाली पेट कच्चा लहसुन ऐसे चबाता है जैसे वो कोई विदेशी च्युइंगम हो, पूरा घर उसकी गंध से बेहोश हो जाता है पर उसका आगमन नहीं होता। कुछ लोग तो रात को सोते समय पैरों के तलवों में विक्स लगाते हैं, उन्हें लगता है कि ठंडक नीचे से ऊपर की तरफ प्रेशर बनाएगी। एक महाशय तो ऐसे हैं जो सुबह-सुबह अपनी घड़ी के अलार्म को पांच-पांच मिनट पर सेट करते हैं, उनका मानना है कि समय की टिक-टिक पेट को याद दिलाती है कि अब उसकी शिफ्ट शुरू हो चुकी है। कोई सुबह उठकर छत पर जाकर कौओं को रोटी खिलाता है, इस उम्मीद में कि शायद दान-पुण्य से कुदरत का दिल पिघल जाए और फाइल आगे बढ़ जाए।

कुछ लोग तो बाथरूम में बैठकर पुरानी डायरियां पढ़ते हैं जिनमें उन्होंने लोगों से लेने वाले उधार की लिस्ट बनाई होती है। जैसे ही उन्हें याद आता है कि फलाने ने उनके पांच सौ रुपये नहीं दिए, वैसे ही गुस्से के मारे पेट में हलचल शुरू हो जाती है। एक भाई साहब तो ऐसे हैं जो सुबह उठकर सबसे पहले अपनी सासू मां को फोन लगाते हैं, उनका दावा है कि सासू मां की तीखी आवाज सुनते ही अंदर का सारा तंत्र डिफेंस मोड में आकर विसर्जन की प्रक्रिया तेज कर देता है। कोई दीवार पर टंगी छिपकली को घूरता है, तो कोई फर्श की टाइल्स के डिजाइन गिनने लगता है। कुछ लोग तो बाथरूम के नल की टिप-टिप आवाज के साथ अपनी धड़कनें मिलाते हैं। एक सज्जन तो ऐसे हैं जो टॉयलेट सीट पर बैठकर स्टॉक मार्केट का उतार-चढ़ाव देखते हैं, जैसे ही सेंसेक्स गिरता है, उनका प्रेशर बढ़ जाता है।

पराकाष्ठा तो तब होती है जब झुनझुनवाला जी अंदर होते हैं और बाहर पूरी पंचायत बैठी होती है। वहां चर्चा चलती है कि आज क्या नया पैंतरा अपनाया गया होगा? क्या आज उन्होंने एलोवेरा का जूस पिया है? या क्या आज उन्होंने रात को सोते समय त्रिफला की जगह कामोद चूर्ण का भारी डोज लिया है? कोई कहता है कि झुनझुनवाला जी आज सुबह-सुबह अग्निसार क्रिया कर रहे थे, जिसमें पेट को ऐसे हिलाते हैं जैसे मिक्सर ग्राइंडर चल रहा हो। दूसरा कहता है कि नहीं भाई, आज उन्होंने नीम की पत्तियां चबाई हैं। मोहल्ले का माहौल ऐसा है जैसे किसी वैज्ञानिक प्रयोग का सफल परीक्षण होने वाला हो। हर कोई अपनी-अपनी थ्योरी दे रहा है, पर असली हकीकत तो सिर्फ उस बंद दरवाजे के पीछे छिपी है। वहां सन्नाटा ऐसा है कि अगर अंदर कोई सुई भी गिर जाए, तो बाहर चौरसिया जी को सुनाई दे जाए।

तभी अचानक, एक जोरदार धमाका हुआ! नहीं भैया, कोई सिलेंडर नहीं फटा और न ही भूकंप आया। वो तो झुनझुनवाला जी के बाथरूम का दरवाजा धड़धड़ाते हुए खुला। मोहल्ले वाले जो साँसें रोके खड़े थे, एकदम सीधे हो गए। लेकिन ये क्या? झुनझुनवाला जी के चेहरे पर वो यूरेका वाली विजयी मुस्कान नहीं थी। उनके कंधे झुके हुए थे, चेहरा पीला पड़ चुका था और वो लड़खड़ाते हुए सीधे सोफे पर आकर ढह गए। हम सब भागे— “क्या हुआ झुनझुनवाला जी? आज तो आपने सैकड़ों जुगाड़ लगाए थे! घी, तेल, हींग, सिगरेट, अखबार, शीर्षासन, रील्स… कुछ तो काम आया होगा? क्या आज भी सन्नाटा ही पसरा रहा?” झुनझुनवाला जी ने एक ठंडी आह भरी, अपनी सूजी हुई आँखों से हमारी तरफ देखा और कांपते हाथों से अपना मोबाइल हमारी तरफ बढ़ा दिया। स्क्रीन पर उनकी पत्नी का व्हाट्सएप मैसेज खुला था जो उन्होंने ठीक दो मिनट पहले बाथरूम के अंदर पढ़ा था।

झुनझुनवाला जी बोले— “अरे लल्लन भैया, सारे जुगाड़ फेल हो गए! विज्ञान, योग, तंत्र-मंत्र और चूर्ण… सबने हाथ खड़े कर दिए थे। लेकिन जैसे ही मैंने मैसेज पढ़ा कि ‘अजी सुनते हो, मेरा भाई (साला) अपने चार बच्चों और पत्नी के साथ पूरे एक महीने के लिए हमारे घर रहने आ रहा है और स्टेशन पहुँच चुका है’… भाई साहब, कसम गंगा मैया की, उस ‘खौफ’ के मारे पेट ने वो ‘सरेंडर’ किया है कि सारा कब्ज पल भर में काफूर हो गया! सारा कचरा ऐसा बाहर निकला जैसे तिहाड़ जेल का गेट टूट गया हो। असली जुगाड़ तो ‘साले का आगमन’ है भैया, बाकी सब मोह-माया है! जब मौत सामने खड़ी हो और बीवी का मायका घर आ रहा हो, तो कुदरत क्या, खुद विधाता को भी रास्ता देना पड़ता है!”

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६१ ☆ व्यंग्य – “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान…” ।)

☆ शेष कुशल # ६१ ☆

☆ व्यंग्य – “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान – शांतिलाल जैन 

आप देख रहे हैं लड़ाई सांडों की. वेन्यू फ़ारस की खाड़ी का,  एरीना ईरान में. दो सांड एक तरफ, एक सांड दूसरी तरफ. जोड़ी में एक सांड अंकल सैम का, एक सांड ज़ायोनिस्टों का. दूसरी तरफ एक अकेला सांड,  पर्शियन नस्ल का. ये क्या!! शुरू मेई बेईमानी! पास के वेन्यू ओमान में शांतिवार्ता चल रही थी कि जोड़ीदार सांडों ने पर्शियन सांड को अकेला पा कर अटैक कर दिया. जुबां शांति की,  अंगुलियाँ मिसाईलों के ट्रिगर पे. बुल फाईट में नुकसान  बागड़ का. कुवैत, बहरीन,  क़तर इस बागड़ पर ज़ख्मी तो लेबनान उस बागड़ पर. नुकसान तो दूर देशों तक पसरी बागड़ का भी हो रहा है. जम्बूद्वीप जैसे देश जो दो रोज़ पहले ही जाकर ‘आ सांड मुझे मार’  कर आए थे, लहुलुहान वे भी कम नहीं है. सांड लड़ वहाँ रहे हैं,  सिलेंडर की कतार में हम और आप यहाँ खड़े हैं. बाज़ार की दुनिया के सांड वाल-स्ट्रीट से दलाल-स्ट्रीट तक हर जगह दुबक गए हैं,  बीयर हावी हैं. क्षत-विक्षत है बागड़ इन्वेस्टर्स की. मज़े में हैं तो बस चीन और रूस. चतुर हैं,  बागड़ पर नहीं दर्शक दीर्घा में जा बैठे हैं. माल भी कमा रहे हैं और मज़े भी ले रहे हैं. उनकी कम्पनियाँ मुनाफ़े में है और तीसरी दुनिया लॉस में. आप देख रहे हैं बुल-फाईट में  दुनिया की शेष बागड़ का सत्यानाश.

आगे का हाल सुनाने से पहले हम आपको बताते चलें दो सांडों की जोड़ी मान कर चल रही थी एक अकेला, दुबला-पतला, कमज़ोर सांड रमजान में क्या तो खुद को बचा पाएगा, क्या आक्रमण कर पाएगा. अनावृत्त मानकर चल रहे थे उसे. सोचा क्या तो नहाएगा, क्या तो निचोड़ेगा. पर्शियन नस्ल को वे चुटकियों में मसल देंगे. मगर ऐसा होता दीख नहीं रहा. सांडो की लडाई जलिकट्टू की लड़ाई नहीं है. ये न परंपरा के लिए है, न मनोरंजन के लिए. असल मकसद तो पर्शियन सांड के कब्ज़े वाली उस दुधारू गाय का अपहरण करना है जिसे तेल का कुआँ कहा जाता है. आँखों में सपने पेट्रो डॉलर के हैं. फाईट टफ़ है, नुकसान जबरजस्त.

और ये दांव. धोबी पछाड़. जोड़ीदार सांडों का पॉवर मूव. प्रतिबंध के सींगों में फँसा कर विचारधारा बदलने का दांव….. ओह्ह मूव फिर फेल हुआ. पर्शियन सांड फिर बच निकला. अबकि बार निज़ाम से बेदख़ल कराने डबल-लेग टेकडाउन लगाया गया है. पर्शियन सांड को सींगों की बजाए पैरों में घुसकर पकड़ने का दांव लगाया गया है. मगर ये क्या…. अधिनायकवादी निज़ाम से बेदख़ल कराने निकले अंकल सैम का अपना चेहरा अधिनायकवादी निकल आया है. पर्शियन सांड है कि लीडरान-दर-लीडरान मारे जाने के बाद भी अंकल सैम के काबू में आ नहीं रहा. अलबत्ता, ड्रोननुमा छोटे छोटे सींगों से अंकल सैम को हलाकान किए दे रहा है. अभी तक दो सांडों की जोड़ी एक भी राउंड पूरी तरह से जीत नहीं पाई है. ‘परमाणु खतरे को रोकना है और मध्यपूर्व में स्थिरता लानी है’   कहते हुए अंकल सैम का सांड एक बार फिर आगे बढ़ा, एक बार फिर मुँह की खाई. न यार मिला,  न विसाले सनम. न परमाणु बम मिला न ख़तरा. जोड़ीदार सांड का हर दांव फेल हो रहा है. वे बार बार मुँह की खा रहे हैं, मगर अभी चुके नहीं हैं. अंकल सैम यूरोप से ला कर एडिशनल सांड्स उतारने के मूड में हैं. लेकिन ये क्या!! सांड-सखाओं ने मना कर दिया. बुल जर्मनी का हो, इटली का हो,  फ़्रांस या ऑस्ट्रेलिया का,  सबने अंकल सैम को अंगूठा दिखा दिया है. कह रहे हैं कि भांडों के लिए सांडों के सींग नहीं पकड़े जाते. अलग-थलग पड़ता जा रहा है पॉवरफुल पेयर ऑफ़ सांड्स. हारने की कगार पर दीखते तो हैं मगर मैच अभी ख़त्म नहीं हुआ है. तरकशों में तीर बाकी हैं. कुछ भी हो सकता है. जो यूरेनियम बुझा सींग मार दिया तो मनुष्यता की बागड़ का गहरे तक झुलस जाना तय है.

जंग जारी है. वैश्विक बागड़ पर बैठे अबोध, निहत्त्थे, निर्दोष नागरिकों को कभी ये सांड कुचल रहा है कभी वो. न कोई अस्पताल बख्श रहा है न स्कूल, न बीमार न अपाहिज, न औरतें न बच्चे, न गरीब न मजलूम. रहम किस चिड़िया का नाम है!!

आप देख रहे हैं लड़ाई सांडों की. वेन्यू फ़ारस की खाड़ी का, एरीना ईरान में.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३ – हास्य-व्यंग्य – “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम हास्य व्यंग्य रचना हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३

☆ हास्य व्यंग्य ☆ “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

 मैं सुबह चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहा था तभी दरवाजा थपथपाते हुए पड़ोसी वर्मा जी ने आवाज लगाई – भाई साहब।

दरवाजा खोलते हुए मैंने कहा – आइए वर्माजी। आज क्या खबर लाए हैं ? वे सोफा संभालते हुए बोले – भाई साहब ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है ? मैंने वर्मा जी के लिए चाय लाने पत्नी को आवाज लगाई और फिर अखबार पढ़ने लगा। कुछ देर की चुप्पी के बाद बेचैन वर्माजी ने पुनः प्रश्न किया – भाई साहब, ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है? मैंने नाक की नोंक पर रखे चश्मे के ऊपर से वर्मा जी पर तरछी नजर फेंकते हुए कहा – भाई जी लफड़ा ही लफड़ा है। इतालवी कलाकार लियोनार्डो दा विंची ने सोलहवीं शताब्दी में मोनालिसा की सुन्दर पेंटिंग बनाई थी। जानकारी के अनुसार मोनालिसा का असली नाम लीसा था जो फ्लोरेंस के एक कपड़ा व्यापारी फ्रांसेस्को डेल की पत्नी थी। मैं वर्मा जी को मोनालिसा के बारे में बता रहा था और वे लगातार भाई साहब, , , भाई साहब कहते हुए मुझे टोक रहे थे। मैंने कहा भाई जी, यदि मोनालिसा के बारे मैं सुनना है तो टोका टाकी मत करो। वे मेरी ओर झुकते हुए बोले – मैं इस मोनालिसा की बात नहीं कर रहा मैं तो उस बड़ी बड़ी शराबी आंखों वाली सांवली सलोनी मोनालिसा की बात कर रहा हूं जो टीवी चैनलों और सोशल मीडिया की मेहरबानी से कुंभ के मेले में माला बेचते बेचते मिस इंडिया जैसी फेमस होकर युवा दिलों की धड़कन बन गई। अनेक युवा तो कुंभ नहाने के बहाने उसे देखने, उससे मिलने के लिए ही इलाहाबाद गए। उसकी झील सी गहरी आंखों में डूब कर दस गुने ज्यादा दाम देकर उससे मालाएं खरीदीं।

मैंने मुस्कुराकर चुटकी लेते हुए कहा भाई जी कुंभ मेला तो आप भी गए थे, नहाया की सिर्फ मोनालिसा से मिलकर आ गए ? वर्मा जी शर्माते हुए बोले भाई साहब अब आपको क्या बताऊं ! उसे देखकर तो मुझे फिल्म आरजू का वह गाना याद आ गया जो राजेंद्र कुमार ने साधना की आंखें देखकर गया था –

छलके तेरी आंखों से शराब और ज्यादा

खिलते रहें होंठों के गुलाब और ज्यादा

मैंने कहा भाई जी फिर तो “आंखों ही आंखों में इशारा और बैठे बैठे जीने का सहारा” हो गया होगा। मेरी बात सुनकर वर्मा जी उदास हो गए बोले – भाई साहब क्या बताऊं, वहां सौ बीमार होते तब भी मैं बाज़ी मार लेता लेकिन वहां तो एक अनार के लाख बीमार वाली स्थिति थी। आखिर उसे फिल्म में हीरोइन बनाकर मुनाफा कमाने एक निर्माता निर्देशक ले उड़ा। गंगाघाट पर खिल उठे लाखों दिल चकनाचूर हो गये। भाई साहब बचे खुचे युवा दिलों पर उस समय नश्तर चल गया जब मोनालिसा ने बड़ी उमर के एक दाढ़ी वाले से शादी कर ली। भाई साहब बताइए मोना ने ऐसा क्यों किया ? मैंने कहा वर्मा जी आपने वह गाना सुना है –

“पसंद आ गई है एक काफिर हसीना,

दाढ़ी वाले को भी वह पसंद आ गई होगी, उसकी मेहनत सफल हुई। मेरी बात सुनकर वर्मा जी के आंसू निकल आए, वे बोले – भाई साहब दाढ़ीवाले ने ऐसा क्यों किया ? मैंने वर्मा जी को सांत्वना देते हुए कहा – प्यारे भाई दुनिया के सब मर्द फिल्म “आई मिलन की बेला” के राजेंद्र कुमार जैसे नहीं हैं जो प्रेम निवेदन कर रही कम उम्र की लड़की से साफ – साफ कह दें –

अभी कमसिन हो, नाजुक हो, नादां हो, भोली हो…

सोचता हूं मैं कि तुम्हें प्यार न करूं…

वर्मा जी के चेहरे को देखकर लग रहा था कि उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आया है। मैंने कहा भाई जी मैं आपके दुख में आपके साथ खड़ा हूं। “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” कहते हुए वे बाहर निकल गए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२८ ☆ व्यंग्य – मंत्री जी का हाज़मा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘मंत्री जी का हाज़मा‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२८ ☆

☆ व्यंग्य ☆ मंत्री जी का हाज़मा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

मंत्री जी लाव-लश्कर के साथ डॉक्टर के दवाखाने पहुंचे। लश्कर को बाहर छोड़कर मंत्री जी डॉक्टर के चेंबर में दाखिल हुए। डॉक्टर ने आने का कारण पूछा तो मंत्री जी ने बताया— ‘पेट में बहुत तकलीफ रहती है। कुछ भी पचता नहीं। कभी उल्टी होती है तो कभी डायरिया। बेचैनी बहुत रहती है। अचानक ही घबराहट होने लगती है। हलक सूखता रहता है।’

डॉक्टर ने पूछा, ‘खाना क्या खाते हैं? कुछ बदपरहेज़ी होती होगी।’

मंत्री जी ने जवाब दिया, ‘बहुत सादा खाना खाता हूं। कोई बदपरहेज़ी नहीं होती।’

डॉक्टर साहब चक्कर में पड़े, बोले, ‘पूरी जांच करनी पड़ेगी।’

मंत्री जी कुछ संकोच में बोले, ‘वैसे आप अपने तक ही रखें तो बताना चाहता हूं कि मेरी तकलीफ तभी बढ़ती है जब लोग पैसा वैसा दे जाते हैं। लोग ब्रीफकेस लेकर आते हैं और छोड़ कर चले जाते हैं। मना करता हूं तो कहते हैं रख लीजिए, नहीं तो हमारा दिल टूट जाएगा। तभी हमें घबराहट होती है और उल्टी डायरिया का सिलसिला शुरू हो जाता है। रात को नींद भी नहीं आती।’

डॉक्टर साहब हंस कर बोले, ‘समझ गया। आपकी दूसरी वाली यानी माल हज़म करने वाली पाचन-शक्ति कमज़ोर है। आपके पिताजी क्या करते थे?’ 

मंत्री जी ने जवाब दिया, ‘स्कूल मास्टर थे।’

डॉक्टर साहब फिर हंसे, बोले, ‘यही रोग की जड़ है। आपके खानदान में माल पचाने की परंपरा नहीं रही। इसीलिए आपको दिक्कत हो रही है।’

फिर कुछ सोच कर बोले, ‘इस मर्ज़ का इलाज आपको डॉक्टर के पास नहीं मिलेगा। आप किसी अनुभवी, तपे हुए राजनीतिज्ञ के पास जाइए। उन्हीं के पास माल पचाने का नुस्खा मिलेगा।’

मंत्री जी डॉक्टर साहब को धन्यवाद देकर रुख़सत हो गये। एक माह बाद डॉक्टर साहब के पास उनका फोन आया, बोले, ‘धन्यवाद, डॉक्टर साहब। आपने सही रास्ता दिखाया। मुझे एक सीनियर राजनीतिज्ञ से पाचन-शक्ति बढ़ाने का मशवरा मिल गया है। अब पेट की गड़बड़, घबराहट वगैरह  कुछ नहीं होती। आपको बहुत धन्यवाद।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ लघु व्यंग्य  # ९९ — धर्म – वृक्ष — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक एक लघु व्यंग्य रचना “– धर्म – वृक्ष…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ लघु व्यंग्य  # ९९ — धर्म – वृक्ष — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

एक अजीब अनोखा सा वृक्ष उग आया था। उसमें चंदन की सुगंध थी। उसे धर्म – वृक्ष नाम दिया गया था। पर उस पेड़ के प्रति अपमान का एक पहलू भी हुआ। लोग उस वृक्ष की टहनियाँ तोड़ कर अपने – अपने घर ले जाने लगे थे, क्योंकि उनसे चूल्हे खूब जलते थे। जिस दिन अंतिम टहनी तोड़ी गई थी उसी दिन पूरा वृक्ष सूख गया था। अब तो युग बीते। पीढ़ी दर पीढ़ी वहाँ उस वृक्ष की बात अब भी होती है। दुहाई यहाँ तक दी जाती है एक हमारा ही देश हुआ जहाँ धर्म – वृक्ष हुआ करता था। तब तो इसे विडंबना ही मानें, धर्म का क्षय सब से अधिक उसी देश में हुआ है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 – 03 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८६ – व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८६ – व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

जैसे ही मैंने थाने के हवालात-ए-हुस्न में कदम रखा, वहां की आबोहवा में न्याय की खुशबू कम और थर्ड डिग्री की महक ज्यादा थी। दरोगा जी अपनी कुर्सी पर ऐसे विराजमान थे जैसे किसी सल्तनत के आखिरी वारिस हों और मैं उनकी प्रजा का सबसे फर्जी फरियादी। मैंने जैसे ही हांफते हुए कहा कि “सर, लूट हो गई,” उन्होंने अपनी मूंछों को कड़क चाय के भाप से सहलाया और बोले, “अबे ओ केस डायरी के फटे हुए पन्ने, ये जो तू सांसें उखाड़कर ‘मुलजिम’ जैसी शक्ल बना रहा है, इसके लिए कोई अलग से ‘धारा’ लगवाऊं या सीधे ‘रोजनामचा’ में तेरी किस्मत का एनकाउंटर कर दूँ?” मैंने दलील दी कि सर चार नामालूम बदमाशों ने मेरा रास्ता रोका, तो उन्होंने बगल में खड़े सिपाही को इशारा किया, “देख हवलदार, प्रार्थी को वारदात से ज्यादा अपनी स्टोरी की चिंता है। लिखो इसमें—मजकूर शख्स अपनी लापरवाही की नुमाइश कर रहा था और बदमाशों ने इसे सरकारी माल समझकर कुर्क कर लिया।” उनके चेहरे पर वो दफा-302 वाली गंभीरता थी, जिससे लग रहा था कि एफआईआर दर्ज होने से पहले मेरा ‘पंचनामा’ पक्का है।

​मुंशी जी ने अपना वो खानदानी रजिस्टर ऐसे निकाला जैसे वो किसी मुजरिम की हिस्ट्रीशीट हो। दरोगा जी ने पेन की निब से मेज पर दस्तक देते हुए कहा, “बेटा, ये जो तूने बैग छिनने की दास्तान सुनाई है, इसमें ‘सबूत’ कम और ‘सिनेमा’ ज्यादा है। बैग में क्या था? कोई ‘खुफिया दस्तावेज’ या बस तेरी ‘बेरोजगारी’ का कच्चा चिट्ठा?” मैंने जैसे ही लैपटॉप और गैजेट्स की लिस्ट गिनानी शुरू की, उन्होंने हाथ उठाकर मुझे बरामदगी के पहले ही खामोश कर दिया। बोले, “इतना तामझाम लेकर तू इस गली में ‘गश्त’ कर रहा था जैसे तू इस इलाके का ‘बीट ऑफिसर’ हो? ये तो वही बात हुई कि ‘माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम’। चोरों ने तो तुझ पर एहसान किया है कि तुझे बोझ से आजाद कर दिया, वरना तू तो ताजीरात-ए-हिंद की किताब बनकर ही घूमता रहता।” वहां मौजूद स्टाफ ऐसे ठहाके लगा रहा था जैसे थाना न होकर कॉमेडी सर्कस का रिमांड रूम हो। मुंशी जी ने चुटकी ली, “साहब, लिख दो कि बैग को जमानत मिल गई है, इसलिए वो प्रार्थी के पास से फरार हो गया।”

​जब मेरी आंखों से आंसू मुलजिम की तरह टपकने ही वाले थे, तभी दरोगा जी ने एक जोर का ठहाका लगाया और मेज के नीचे से वही बैग निकाल कर मेरे सामने पटक दिया। मेरी तो जैसे शिनाख्त ही खो गई! वो मुस्कुराकर बोले, “अबे ओ ‘चश्मदीद गवाह’, ये बैग बाहर बेंच पर लावारिस पड़ा था। हम तो बस ये देख रहे थे कि अगर सच में तेरी ‘कुर्की’ हो जाए, तो तू थाने में बयान दर्ज कराएगा या सीधा सुसाइड नोट लिखेगा? ये जो अभी तूने सस्पेंस ड्रामा झेला है, ये तेरी सुरक्षा का चालान था।” मैंने कांपते हाथों से बैग उठाया, तो उन्होंने पीछे से आवाज दी, “अरे सुन, जाते-जाते इस मुठभेड़ की मिठाई तो खिलाता जा, वरना अगली बार हम तेरी एफआईआर में ‘क्लाइमेक्स’ ऐसा डालेंगे कि तू खुद को ही मुजरिम घोषित कर देगा!” मैं बैग लेकर ऐसे नौ-दो-ग्यारह हुआ जैसे कोई सजायाफ्ता कैदी जेल तोड़कर भागा हो, और पीछे से पूरा थाना ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के बजाय ‘हाहाकार जिंदाबाद’ के नारों से गूँज रहा था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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