हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४४ – अस्पताल के गलियारे में टँगा पुराना स्टेथस्कोप – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – अस्पताल के गलियारे में टँगा पुराना स्टेथस्कोप।)  

☆  चुभते तीर # १४४ – व्यंग्य  – अस्पताल के गलियारे में टँगा पुराना स्टेथस्कोप ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के सबसे पुराने राजकीय हृदय रोग संस्थान के मुख्य ओपीडी गलियारे की सीलन भरी दीवार पर पीतल के फ्रेम वाला एक पुराना स्टेथस्कोप पिछले बीस सालों से एक लोहे की खूंटी पर टँगा हुआ था जिसकी रबर वाली नली धूप और हवा से अकड़कर जगह-जगह से चटक चुकी थी। उस स्टेथस्कोप की गोल छाती वाली टिकिया पर वक्त की गर्द जम चुकी थी जो कभी धड़कनों के धीमे और तेज होने का सच बताती थी। दीवार के ठीक नीचे सीमेंट के टूटे चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही वैद्य दीनानाथ काका अपनी शीशम की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला अंगोछा डाले दीनानाथ काका दिन भर उस अकड़ी हुई नली वाले स्टेथस्कोप को अपनी पथराई आँखों से एकटक निहारते रहते थे। अस्पताल परिसर में सुबह से ही आधुनिक कार्डियक एम्बुलेंस, आर्टिफिशियल वाल्व और महंगी पेसमेकर मशीनों का प्रदर्शन करने के लिए शहर के बड़े-बड़े निजी अस्पतालों के कॉरपोरेट डॉक्टरों और अफसरों की चमचमाती गाड़ियाँ आ रही थीं। मंच से दिल की धड़कन बचाने के लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे। उन नए कार्डियोलॉजिस्टों और सूट-बूट पहने अफसरों को दीवार के कोने में टँगे उस पुराने कबाड़ औजार से कोई लेना-देना नहीं था। अस्पताल का पुराना वार्ड ब्वॉय लखन जब भी हाथ में ईसीजी रोल का बंडल लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती और धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे लखन आज विश्व हृदय दिवस के इस मेले में इस पुराने स्टेथस्कोप से किसी गरीब की धड़कन सुनने का कोई हुक्म आया क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों की धड़कनें ही बेची जा रही हैं?” लखन बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

अस्पताल में हाल ही में राजधानी के बड़े चिकित्सा संवर्धन निदेशालय से नए मुख्य चिकित्सा अधीक्षक बनकर आए डॉक्टर अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी के जानकार और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए कैथ लैब का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे दीनानाथ काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस दीवार पर लटके पुराने स्टेथस्कोप पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को विश्व हृदय दिवस के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और डिजिटल हार्ट मॉनिटरों के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक कबाड़ औजार के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और अस्पताल के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य सत्र समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में भोजन के लिए चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे दीनानाथ काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य रास्ते में क्यों बैठते हैं, अगर आपको कोई दिल की बीमारी की मुफ़्त दवा या सरकारी पेंशन की पर्ची बनवानी है तो भीतर ओपीडी काउंटर पर जाइए, इस तरह बाहर बैठकर दीवार पर लटके एक पुराने बेकार स्टेथस्कोप को घूरने से इस देश के दिल की बीमारी ठीक नहीं होने वाली है।” दीनानाथ काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “अधीक्षक साहब मैं अपनी किसी बीमारी के इलाज की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस स्टेथस्कोप में वह खोई हुई धड़कन लौटेगी जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीनी गई थी।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोई हुई धड़कन की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस विश्व हृदय दिवस पर करोड़ों का बजट जारी करके गरीबों के मुफ्त स्टेंट लगाने की योजनाएं चला रही है, फिर आपकी इस पुरानी अकड़ी हुई नली का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त ईसीजी तकनीशियन पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस केंद्र के हर मरीज और हर धड़कन के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “अधीक्षक साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस पूरे इलाके में हार्ट अटैक से गरीब मजदूर तड़प-तड़प कर दम तोड़ देते थे तब काका के इकलौते बेटे मानस ने इसी दालान में खड़े होकर गरीब के दिल की हिफाजत की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “मानस ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस पुराने स्टेथस्कोप से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब मानस उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और स्वाभिमानी युवा कार्डियोलॉजिस्ट था, जब बड़े निजी अस्पताल गरीबों की छाती पर हाथ रखने के भी हजारों रुपए लूटते थे तब मानस ने अपनी साइकिल पर यही स्टेथस्कोप लेकर गाँव-गाँव जाकर रात-बिरात सीने के दर्द से तड़पते गरीबों की मुफ्त जांच की थी, उसने इस औजार को खूंटी पर टांगकर कसम खाई थी कि जब तक इस कस्बे का अंतिम गरीब मरीज बिना पैसे के दिल का इलाज नहीं पा लेगा तब तक वह किसी बड़ी विदेशी मेडिकल लॉबी के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”

दीनानाथ काका ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस स्टेथस्कोप की टिकिया को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे मानस ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह स्टेथस्कोप केवल कान में लगाने वाली नली नहीं बल्कि गरीब की धड़कनों का सच्चा पहरेदार है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय हृदय स्वास्थ्य मिशन का सबसे बड़ा मुफ़्त ग्रामीण कार्डियक केयर प्रोजेक्ट लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस स्टेथस्कोप से मेरी छाती की धड़कन सुनेगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी कार्डियक प्रोजेक्ट फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब मानस ने गरीबों के इलाज की मुहिम छेड़ी थी तो विदेशी स्टेंट निर्माताओं और कॉरपोरेट हॉस्पिटलों के सिंडिकेट ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए मानस को अपनी सबसे बड़ी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल चेन का मुख्य कार्डियक सर्जन और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त साझेदारी देकर खरीद लिया था। मानस ने अपने सारे आदर्शों और उस स्टेथस्कोप का वास्ता ताक पर रखकर उन समझौतों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा अरबपति हार्ट सर्जन माफिया बन गया जो आज गरीब मरीजों के सीने में बिना जरूरत के भी लाखों रुपए के फर्जी स्टेंट ठूंसने का सबसे बड़ा सौदागर था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि मानस तो खुद दिल की धड़कनों का सबसे बड़ा कसाई बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर विश्व हृदय दिवस पर धड़कनों को बचाने का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही बाप के सीने की धड़कन को मुनाफे की कैथ लैब में गिरवी रख देते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई संवेदना से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस धूल भरे स्टेथस्कोप को ताकते रह गए और पूरा हृदय रोग संस्थान उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४३ – जीरो बैलेंस – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – जीरो बैलेंस।)  

☆  चुभते तीर # १४३ – व्यंग्य  – जीरो बैलेंस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

अग्रणी राष्ट्रीयकृत बैंक की मुख्य शाखा के बाहर सीमेंट की ठंडी सीढ़ियों पर बहत्तर साल के परमानंद जी हर शुक्रवार सुबह ठीक दस बजे आकर बैठ जाते थे। उनके कांपते हाथों में हरे रंग की एक पुरानी बैंक पासबुक और तांबे जैसा घिसा हुआ दो रुपये का एक सिक्का हमेशा चमकता रहता था। आज अट्ठाईस अगस्त को जन धन योजना के राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन दिवस के अवसर पर जब सुरक्षा गार्ड ने उन्हें मुख्य द्वार पर बैठा देखा तो अपनी बंदूक संभालते हुए ठहाका लगाकर बोला कि “बाबा जब आज पूरे देश में करोड़ों नए खाते खुलने और डिजिटल लेनदेन का जश्न मनाया जा रहा है तो इस पुरानी पासबुक को रोज़ अपनी छाती से चिपकाकर यहाँ क्या भीख मांगने का नया स्वांग रचते हो।” परमानंद जी अपनी पुरानी धुंधली ऐनक को धोती के छोर से साफ करते और बहुत धीमी आवाज में मुस्कुराकर कहते कि “बेटा यह खाली पासबुक केवल कागज़ का पुलिंदा नहीं है बल्कि इस पूरे चमकते हुए बैंकिंग तंत्र की वो जमीनी हकीकत है जिसे तुम्हारे ये बड़े-बड़े डिजिटल स्क्रीन कभी नहीं दिखा पाएंगे।” आसपास खड़े तमाम दलाल और खाताधारक उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में दादा की मति मारी गई है जो जीरो बैलेंस के खाते को अपनी जागीर समझकर पूरे बैंक प्रशासन से हिसाब चुकता करने चले आए हैं।” परमानंद जी किसी की बात का तनिक भी मलाल किए बिना उस पासबुक के पन्नों को अपनी कांपती उंगलियों से सहलाते और चुपचाप वीआईपी गाड़ियों के काफिले का इंतज़ार करते रहते थे।

बैंक शाखा के सभी बाबू और अधिकारी परमानंद जी की इस साप्ताहिक मूक उपस्थिति से पूरी तरह वाकिफ थे और उन्हें एक हठी बुजुर्ग मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। बैंक का बड़ा कैशियर जब भी नोटों की गड्डियों का बंडल लेकर मुख्य प्रबंधक के केबिन की तरफ बढ़ता तो परमानंद जी बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि “बाबू जी क्या आज उस ज़ीरो बैलेंस वाले खाते में कोई सरकारी सब्सिडी की राशि आई।” कैशियर गुस्से में काउंटर की खिड़की खटखटाते हुए डांटकर कहता कि “अरे बाबा जब तक सरकार ऊपर से प्रत्यक्ष लाभ अंतरण का पैसा नहीं भेजेगी और सर्वर से हरी बत्ती नहीं जलेगी तब तक खाता खाली ही रहेगा और तुम इस दो रुपये के सिक्के को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे।” परमानंद जी बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाते और उस दो रुपये के सिक्के को पासबुक के पहले पन्ने पर दबाकर रखने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे जो हर बार फिसलकर उनकी गोदी में गिर जाता था। कस्बे के लोग आपस में तरह-तरह की बातें करते थे कि शायद बाबा अपने किसी पुराने कर्ज़ की माफी के लिए यह सब कर रहे हैं लेकिन किसी को भी उस खाली पासबुक और वित्तीय समावेशन के इस भव्य आयोजन के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी थाह नहीं लग पा रही थी।

दोपहर में अचानक वित्त मंत्रालय के क्षेत्रीय निदेशक महोदय प्रधानमंत्री जन धन योजना के राष्ट्रीय दिवस पर आयोजित मेगा क्रेडिट कैंप और वित्तीय साक्षरता मेले की समीक्षा करने बैंक पहुँचे। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए नए गुब्बारे और नीले बैनर लगाए जाने लगे ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर दीप प्रज्वलन और हर गरीब को बैंकिंग तंत्र की मुख्यधारा से जोड़ने पर लंबा भाषण देने के बाद जब निदेशक महोदय पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र सीढ़ियों पर शांत बैठे परमानंद जी पर पड़ी जिनकी गोद में वही हरी पासबुक रखी थी। अपनी संवेदनशील और जनप्रिय छवि का प्रदर्शन करने के लिए निदेशक महोदय तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर परमानंद जी के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “बाबा आज के इस ऐतिहासिक वित्तीय दिवस पर हम हर गरीब को आर्थिक आज़ादी की बधाई देते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है क्या आपको बैंकिंग सुविधाओं का लाभ नहीं मिल रहा है जिसे मैं तुरंत स्वीकृत करवाऊँ।” परमानंद जी ने अपनी पथराई आँखों से निदेशक महोदय को देखा और अपने कांपते हाथों से वह हरी पासबुक आगे बढ़ाते हुए बोले कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस पासबुक के अंतिम पन्ने पर छपी लाल स्याही की मुहर का सच पहचान लीजिए।”

निदेशक महोदय ने जब उस पासबुक को हाथ में लेकर खोला तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं क्योंकि उस पर दर्जनों बार न्यूनतम बैलेंस न होने और एसएमएस सेवा शुल्क के नाम पर खाते से पैसे कटने की लंबी फेहरिस्त छपी थी। परमानंद जी की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस घिसे हुए दो रुपये के सिक्के पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि “साहब बारह साल पहले जब आपने ढोल बजाकर मेरा ज़ीरो बैलेंस खाता खोला था तो कहा था कि यह गरीब का अपना बैंक है। लेकिन पिछले पाँच सालों में मेरी बीमारी की दवाई के लिए जमा की गई पाई-पाई आपके बैंक ने पेनल्टी और सर्विस चार्ज के नाम पर चुपचाप काट ली और जब खाता बिल्कुल खाली हो गया तो मुझे लाइन से धक्का देकर बाहर निकाल दिया। मेरी बूढ़ी पत्नी आज भी घर में बिना दवा के दर्द से कराह रही है क्योंकि उसके हिस्से के पैसे आपके इस डिजिटल तंत्र ने निगल लिए। मैं आज यह आखिरी दो रुपये का सिक्का आपके बैंक को दान करने आया हूँ ताकि आपके इस मुनाफ़ाखोर तंत्र को बता सकूँ कि जिस गरीब को तुम वित्तीय समावेशन का सपना दिखाते हो उसी गरीब की जेब काट कर तुम्हारी ये आलीशान शाखाएं खड़ी हुई हैं।” यह सुनते ही निदेशक महोदय का सिर शर्म से झुक गया और पूरा बैंक परिसर गहरे सन्नाटे में डूब गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३७ – हास्य-व्यंग्य – “चोरी मेरा काम यारो, चोरी मेरा काम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “चोरी मेरा काम यारो, चोरी मेरा काम”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३७ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “चोरी मेरा काम यारो, चोरी मेरा काम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆☆

जो स्वयं राम जैसे नहीं होते वे भी लक्ष्मण और भरत जैसे भाई चाहते हैं। इसी तरह जो लक्ष्मण और भरत जैसे नहीं होते वे भी राम जैसा भाई चाहते हैं। भाइयों की महिमा अपरम्पार है। हम सभी के तरह-तरह के भाई होते हैं। सगे भाई, सौतेले भाई, चचेरे भाई, ममेरे भाई, फुफेरे भाई, मौसेरे भाई और साडू भाई आदि। इन भाइयों के अलावा भी एक भाई होता है वह भाई जरूर कहलाता है, लेकिन उसका असल काम लोगों को डरा धमका कर वसूली करने का होता है। फिल्म अभिनेता संजय दत्त अनेक फिल्मों में इसी तरह के भाई बने हैं। खैर, जितने भी तरह के भाई होते हैं, उनमें मौसेरे भाइयों का विशेष महत्व है। लोग सदियों से कहते आ रहे हैं “चोर – चोर मौसेरे भाई”। समझ में नहीं आता कि लोगों ने क्या देखकर, क्या सोच कर चोरों को मौसेरा भाई बना दिया। कोई भी कहावत अथवा जनश्रुति यों ही नहीं बन जाती, उसके पीछे अनेक पीढ़ियों का चिंतन – मनन, अनुभव होता है। यदि हमारे पूर्वजों ने चोरों को मौसेरा भाई कहा है तो निश्चय ही इसके पीछे कुछ न कुछ बात अवश्य होगी जो शोध का विषय है। अपने पूर्वजों की बात पर भरोसा कर आज भी लोग चोरों को मौसेरा भाई ही मानते हैं।

अब जब प्रश्न उठता है कि चोर कौन है? तो उत्तर देना आसान नहीं रह जाता। लगता है कि पूरी दुनिया ही चोरों से भरी है। कोई छल – कपट, भ्रष्टाचार से धन चुरा रहा है, कोई मन चुरा रहा है, कोई नींद चुरा रहा है तो कोई लोगों को मीठी – मीठी बातों और वादों में फंसा कर उनका विश्वास हरण कर रहा है अर्थात चुरा रहा है। अब तो सरकार पर वोट की चोरी, सरकार की चोरी तक के आरोप लग रहे हैं। चोरी करना कोई आसान काम नहीं है। इंटेलीजेंट अर्थात चतुर – चालक और हिम्मतवाला व्यक्ति ही चोरी कर सकता है। चोरी करना दिलेरी का काम है, यह बुज़दिलों के बस की बात नहीं है। पीड़ितों को चोरी का पता हमेशा बाद में ही चलता है। निःसंदेह अगर लोगों को चोरी की आशंका पहले से ही हो जाए तो चोर चोरी नहीं कर पाएगा। अतः पक्का चोर वही है जिसकी चोरी का पता लोगों को चोरी होने के बाद चले। ऊंट की चोरी की बात अलग है। कहा गया है कि “ऊंट की चोरी निहुंरे – निहुंरे नहीं होती”, लेकिन चुराने वाले तो आँखों से काजल तक चुरा लेते हैं फिर ऊंट क्या चीज है?

कुछ वर्षों पहले फिल्म “चोरी मेरा काम” आई थी। उसके हीरो शशि कपूर एक दिलेर चोर थे वे सड़कों पर शान से गाते हुए घूमते थे –

चोरी मेरा काम, यारो चोरी मेरा काम।

वो करते हैं चोरी – चोरी,

करूँ मैं खुल्लेआम।

चोरी मेरा काम, यारो चोरी मेरा काम।

इस गाने का उल्लेख मैंने इसलिए किया कि आज लोग साधु, पंडित, गुरु, रिश्तेदार, पड़ोसी, डॉक्टर, अफसर, पुलिस, चौकीदार, नेता के विविध वेशों में ईमान, धर्म, नियम कायदे कानून की, इज्जत और विश्वास की न सिर्फ खुलेआम चोरी कर रहे हैं वरन सीनाज़ोरी भी कर रहे हैं। हमने सुना था कि एक चोर कभी भी दूसरे चोर की पोल नहीं खोलता, किंतु समय बदल गया है। आज जिसे देखो वह दूसरे को चोर कह रहा है। सभी राजनीतिक दलों के नेता एक दूसरे के पार्टी नेताओं पर तरह – तरह के आरोप लगा कर उन्हें चोर कह रहे हैं। वे एक दूसरे पर चोरी के आरोप इतनी ताकत और विश्वास से लगा रहे हैं कि अब नेताओं के वादों और आश्वासनों से छली जनता की नजरों में सभी नेताओं की छवि चोरों की बन गई है। इससे उन चंद ईमानदार नेताओं की छवि भी धूमिल हो गई है जो चोर नहीं हैं। जनता की समझ में आ गया है कि पार्टी कोई भी हो, नेता अथवा नेत्रियां कोई भी हों सब मौसेरे भाई बहिन हैं। जैसे – जैसे चुनाव पास आएगा, हमें अपने नेताओं की तरह – तरह की नई – चोरियों की जानकारियां मिलेंगी। चुनाव के वक्त अनेक अलीबाबा अपने- अपने चालीस साथियों के साथ चुनाव – मैदान में चोरी का लाइसेंस लेने ताल ठोंकते दिखेंगे। भाइयो, हमें इन्हीं “मौसेरे भाइयों” में से अपने नेताओं का चुनाव करके अपना और अपने देश का भविष्य उनके हवाले करना पड़ेगा!

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४२ – अंगूठे का निशान – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – अंगूठे का निशान।)  

☆  चुभते तीर # १४२ – व्यंग्य  – अंगूठे का निशान ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के संभागीय कार्यालय के बाहर नीम के चबूतरे पर पचहत्तर साल के जगदेव बाबा हर गुरुवार सुबह ठीक दस बजे आकर बैठ जाते थे। उनके कांपते हाथों में जूट की एक पुरानी मैली थैली होती थी जिसके दोनों किनारों पर कभी सरकारी सस्ते गल्ले का लाल लोगो छपा हुआ था जो अब घिसकर बिल्कुल धुंधला पड़ चुका था। दफ़्तर का नया चपरासी जब भी उन्हें वहाँ आकर बैठते देखता तो चाय का कुल्हड़ मेज़ पर पटकते हुए ठहाका लगाकर कहता कि “बाबा जब गाँव की सरकारी राशन दुकान पर मुफ़्त का अनाज बंट रहा है तो इस फटी जूट की थैली को रोज़ अपनी छाती से चिपकाकर यहाँ बड़े अफ़सरों के आगे नुमाइश क्यों लगाते हो।” जगदेव बाबा अपनी पुरानी ऐनक के धुंधले शीशे को संभालते और बहुत शांत स्वर में उत्तर देते कि “बेटा यह खाली थैली केवल जूट का टुकड़ा नहीं है बल्कि इस पूरे महकमे की वो अंधी संवेदनहीनता है जिसने मेरी भूख को डिजिटल मशीन की स्क्रीन में कैद कर दिया है।” आसपास खड़े तमाम मुंशी और दलाल उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में बाबा की मति मारी गई है जो एक फटी थैली को अपनी ढाल बनाकर पूरे आपूर्ति तंत्र से अनाज का हिसाब मांगने चले आए हैं।” जगदेव बाबा किसी की कड़वी बात का तनिक भी बुरा माने बिना उस खाली थैली की सिलाई को अपनी कांपती उंगलियों से सहलाते और चुपचाप गाड़ियों के काफिले का इंतज़ार करते रहते थे।

आपूर्ति विभाग के सभी कर्मचारी जगदेव बाबा की इस साप्ताहिक मूक उपस्थिति से भलीभांति परिचित हो चुके थे और उन्हें एक हठी बुज़ुर्ग मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। दफ़्तर का बड़ा बाबू जब भी राशन डीलरों की नई सूची लेकर ज़िला आपूर्ति अधिकारी के केबिन की तरफ बढ़ता तो जगदेव बाबा बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि “बाबू जी क्या आज उस आधार कार्ड और अंगूठे के मिलान वाली अर्ज़ी पर साहब के दस्तखत हो गए।” बाबू गुस्से में फ़ाइलें पटकते हुए डांटकर कहता कि “अरे बाबा जब तक पीओएस मशीन में तुम्हारी उंगलियों की रेखाएं मैच नहीं करेंगी और भोपाल के सर्वर से हरी बत्ती नहीं जलेगी तब तक एक दाना नहीं मिलेगा और तुम इस फटी थैली को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे।” जगदेव बाबा बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाते और अपने दोनों अंगूठों की घिस चुकी लकीरों को अपनी फटी धोती से रगड़कर साफ करने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे। गाँव के लोग आपस में तरह-तरह की बातें करते थे कि शायद बाबा अपने किसी पुराने कोटे के लिए यह सब कर रहे हैं लेकिन किसी को भी उस सूखी थैली और सरकारी राशन के बड़े-बड़े विज्ञापनों के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी भनक नहीं थी।

दोपहर में अचानक सूबे के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री महोदय राष्ट्रीय अन्न सुरक्षा पखवाड़े की समीक्षा करने के लिए उसी ज़िला कार्यालय में औचक निरीक्षण करने पहुँचे। मंत्री जी की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए नए फ्लेक्स बोर्ड टांगे जाने लगे ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर दीप प्रज्वलन और हर गरीब तक मुफ़्त अन्न पहुँचाने के सरकारी वादों पर लंबा भाषण देने के बाद जब मंत्री जी पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र चबूतरे पर शांत बैठे जगदेव बाबा पर पड़ी जिनकी गोद में वही जूट की थैली रखी थी। अपनी जनप्रिय और संवेदनशील छवि का प्रदर्शन करने के लिए मंत्री जी तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर जगदेव बाबा के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “बाबा आज के इस अन्न उत्सव पर हम हर नागरिक को सम्मान देते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है क्या आपको मुफ़्त राशन नहीं मिल रहा है जिसे मैं तुरंत स्वीकृत करवाऊँ।” जगदेव बाबा ने अपनी पथराई आँखों से मंत्री जी को देखा और अपने कांपते हाथों से वह खाली थैली आगे बढ़ाते हुए बोले कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस थैली के अंदर रखे इस कागज़ के टुकड़े को अपने हाथों से छूकर इसका सच पहचान लीजिए।”

मंत्री जी ने जब उस थैली के भीतर से निकली मुड़ी-तुड़ी पर्ची को गौर से देखा तो उस पर डिजिटल राशन मशीन की लाल पर्ची चिपकी थी जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था कि उंगलियों के निशान अस्पष्ट होने के कारण बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण अस्वीकृत। जगदेव बाबा की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस जूट की थैली पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि “साहब पचास साल तक मैंने अपने इन्हीं हाथों से मिट्टी खोदकर और हल चलाकर देश के लिए अनाज उपजाया था जिसके कारण मेरे अंगूठे की चमड़ी पूरी तरह घिस गई। आज जब बुढ़ापे में मुझे दो वक्त की रोटी की ज़रूरत है तो आपकी यह आधुनिक मशीन कहती है कि मेरी उंगलियों के निशान मिट जाने से मेरा इंसान होना ही झूठा साबित हो गया है। मेरा परिवार पिछले आठ महीनों से सिर्फ इस एक मुट्ठी अनाज के लिए दाने-दाने को मोहताज होकर पानी पीकर रातें काट रहा है। मैं रोज़ यह खाली थैली यहाँ इसलिए लाता हूँ ताकि आपके इस डिजिटल तंत्र को दिखा सकूँ कि जिस मजदूर ने अपनी उंगलियां घिसकर तुम्हारी रोटियां सेकी थीं आज तुम्हारी मशीनें उसी मजदूर को कागज़ों पर ज़िंदा मानने से मुकर चुकी हैं।” यह सुनते ही मंत्री जी का सिर शर्म से झुक गया और पूरा आपूर्ति दफ़्तर गहरे सन्नाटे में डूब गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४१ – पीतल की कैंची – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – पीतल की कैंची।)  

☆  चुभते तीर # १४१ – व्यंग्य  – पीतल की कैंची ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के पुराने महिला कल्याण केंद्र के मुख्य बरामदे की दीवार पर लकड़ी के एक चौकोर खांचे में पीतल की एक भारी और पुरानी कैंची पिछले बीस सालों से टँगी हुई थी जिसकी धार पर वक्त की गर्द जम चुकी थी। उस दीवार के ठीक नीचे सीमेंट की एक पुरानी और टूटी हुई बेंच पर हर सुबह आठ बजते ही पार्वती अम्मा अपनी पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाती थीं। सफेद सूती साड़ी पहने और अपने कांपते हाथों में मखमल का एक पुराना खाली टुकड़ा थामे पार्वती अम्मा दिन भर उस पीतल की कैंची को एकटक निहारती रहती थीं। केंद्र में सुबह से ही आधुनिक महिला संगठनों की गाड़ियाँ आ रही थीं, शहर की पढ़ी-लिखी और रसूखदार महिला नेत्री मंच पर बराबरी और अधिकारों के पर्चे बाँट रही थीं और कैमरों की रोशनी चमक रही थी। उन नए समाजसेवियों और स्वागत गीत गाती छात्राओं को उस कोने में टँगी धूल भरी पुरानी कैंची से कोई सरोकार नहीं था। केंद्र का पुराना चपरासी मंगरू जब भी चाय की केतली लेकर उधर से निकलता तो अम्मा की उस निश्चल मूरत को देखकर सहम जाता था। अम्मा बहुत ही धीमे और कांपते स्वर में उससे पूछती थीं “क्यों रे मंगरू आज इस महिला समानता दिवस पर इस पुरानी कैंची से कोई नया फीता काटने का हुक्म हुआ क्या या आज भी सिर्फ मंच से बराबरी के खोखले वादे ही बाँटे जा रहे हैं?” मंगरू बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

कल्याण केंद्र में हाल ही में शहर के बड़े मंत्रालय से स्थानांतरित होकर आईं नई जिला महिला कल्याण अधिकारी अनुराधा शर्मा बहुत ही कड़क, आधुनिक सोच की धनी और प्रशासनिक अनुशासन की पक्की अफसर मानी जाती थीं। अनुराधा मैडम जब भी अपनी फाइलों के साथ समारोह स्थल का मुआयना करने निकलतीं तो उनकी नजर सबसे पहले उसी बेंच पर बैठी पार्वती अम्मा पर जाकर टिक जाती थी जिनकी नजरें हमेशा उस दीवार पर टँगी पीतल की कैंची पर जमी रहती थीं। अनुराधा मैडम को महिला समानता दिवस के इतने बड़े सरकारी आयोजन के बीच किसी वृद्ध महिला का इस तरह रोज आकर एक जंग लगी कैंची के आगे हाथ जोड़ना अंधविश्वास और केंद्र के माहौल को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय उद्घाटन सत्र का मुख्य भाषण समाप्त हुआ और मुख्य अतिथि वीआईपी कक्ष में जलपान के लिए चली गईं तो अनुराधा मैडम अपने सहायकों को छोड़कर सीधे पार्वती अम्मा के पास पहुँच गईं। अनुराधा मैडम ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “अम्मा आप इस उम्र में यहाँ बाहर बैठकर केंद्र का रास्ता क्यों रोक रही हैं, अगर आपको कोई विधवा पेंशन या सिलाई मशीन की सरकारी मदद चाहिए तो भीतर जाकर फॉर्म भरिए, इस तरह बाहर बैठकर दीवार पर टँगी एक पुरानी बेकार कैंची को घूरने से आपको कोई अधिकार नहीं मिलने वाला है।” पार्वती अम्मा ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोलीं “मैडम जी मैं किसी सरकारी खैरात या पेंशन के लिए यहाँ नहीं बैठी हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रही हूँ जब इस कैंची की धार उस बंधन को काटेगी जो किसी जमाने में इसी केंद्र की चौखट पर मुझ पर लादा गया था।”

अनुराधा मैडम को अम्मा का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “अम्मा आप किस बंधन की बात कर रही हैं, सरकार तो हर साल इस दिवस पर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लाखों का बजट और प्रशस्ति पत्र बाँटती है, फिर आपकी इस पुरानी कैंची का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध क्लर्क पंडित कृपाशंकर जी जो पिछले तीस सालों से उस केंद्र के हर उतार-चढ़ाव और इतिहास के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “मैडम जी अम्मा की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस कस्बे में पहली बार इस महिला स्वावलंबन केंद्र की स्थापना हुई थी तब अम्मा की इकलौती बेटी कल्याणी ने पूरे जिले में एक बहुत बड़ा कीर्तिमान रचा था।” अनुराधा मैडम ने उत्सुक होकर पूछा “कल्याणी ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस पीतल की कैंची से जुड़ा हुआ है?” पंडित कृपाशंकर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “मैडम कल्याणी उस समय पूरे जिले की सबसे होनहार और बहादुर लड़की थी, उसने कस्बे की सैकड़ों शोषित और बेबस महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए इस सिलाई केंद्र की नींव रखी थी, उसने अपने अभियान के प्रतीक के रूप में यह पीतल की कैंची इस दीवार पर टांगी थी और कसम खाई थी कि जब तक इस कस्बे की हर बेटी को पुरुषों के बराबर हक और सम्मान नहीं मिल जाएगा तब तक वह इस कैंची को यहाँ से नहीं हटाएगी।”

पार्वती अम्मा ने कृपाशंकर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस कैंची के हत्थे को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोलीं “हाँ मैडम मेरी कल्याणी ने उस दिन मंच पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि माँ यह कैंची केवल कपड़ा काटने का औजार नहीं बल्कि इस पूरे समाज में नारी की बराबरी का वह परचम है जिसे मुझे अपने हाथों से बुलंद करना है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह राजधानी से महिला आयोग का सबसे बड़ा समानता पुरस्कार जीतकर लौटेगी उस दिन वह खुद अपने हाथों से इस कैंची से एक नया सुनहरा फीता काटकर इस केंद्र को पूरे देश का सबसे बड़ा महिला आश्रम बनाएगी।” अनुराधा मैडम ने बहुत ही भावुक होकर पूछा “तो क्या बीस सालों में कल्याणी वह पुरस्कार लेकर वापस नहीं लौटी, क्या वह शहर जाकर किसी बड़े पद के अहंकार में अपनी इस बूढ़ी माँ और इस छोटे से कस्बे के केंद्र को हमेशा के लिए भूल गई?” अम्मा की आँखों में आँसू छलक आए और उन्होंने कहा “नहीं मैडम मेरी कल्याणी बहुत सच्ची लड़की थी, उसने मुझे पत्र में लिखा था कि माँ तुम इस कैंची पर नजर रखना, जिस दिन देश में महिला समानता दिवस की असली सार्थकता साबित होगी उस दिन मैं अपनी सबसे बड़ी जीत लेकर तुम्हारे चरणों में आऊँगी।” अनुराधा मैडम के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने ठान लिया कि वे खुद रिकॉर्ड रूम में जाकर उस बीस साल पुरानी पहली फाइल और कल्याणी की असलियत का पता लगाएंगी।

अनुराधा मैडम तुरंत केंद्र के गोपनीय अभिलेखागार में पहुँचीं और उन्होंने चपरासी को उस बीस साल पुराने महिला मंडल रजिस्टर और कल्याणी के प्रोजेक्ट की फाइल खोजने का हुक्म दिया। लगभग दो घंटे की कड़ी मशक्कत और धूल भरे बस्तों को खंगालने के बाद आखिरकार वह लाल कपड़े में बंधी पुरानी फाइल मिल गई। जैसे ही अनुराधा मैडम ने उस फाइल के आखिरी पन्नों को खोला और उसमें लगे सरकारी दस्तावेजों, बजट आवंटन रसीदों और अंतिम जांच रिपोर्टों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई और उनके हाथ बुरी तरह थरथराने लगे। उस फाइल में एक बहुत ही चौंकाने वाला कानूनी दस्तावेज लगा था जिसमें लिखा था कि बीस साल पहले जब कल्याणी ने उस आंदोलन की शुरुआत की थी तो तत्कालीन बड़े अफसरों और नेताओं ने महिला उत्थान के नाम पर आए करोड़ों के सरकारी फंड को अपनी निजी संस्थाओं में डकार लिया था। कल्याणी ने जब इस भारी भ्रष्टाचार का विरोध किया तो उसे डराने के लिए उसके परिवार को तबाह करने की धमकियाँ दी गईं और अंत में उसे राजधानी में एक बहुत बड़े महिला आयोग का निदेशक पद और आलीशान कोठी देकर चुप करा दिया गया। कल्याणी ने अपनी सारी कसमें ताक पर रखकर उस समझौते को स्वीकार कर लिया और उसी पैसे और रसूख के दम पर शहर की सबसे बड़ी अमीर समाजसेवी बन गई। अनुराधा मैडम ने जब उस फाइल के सबसे अंतिम पन्ने पर आज के इस राष्ट्रीय महिला समानता दिवस समारोह की मुख्य अतिथि और राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष का नाम और तस्वीर देखी तो उनका पूरा शरीर पसीने से भीग गया क्योंकि वह तस्वीर किसी और की नहीं बल्कि उसी कल्याणी की थी जो आज मंच पर मुख्य वक्ता बनकर भाषण दे रही थी।

अनुराधा मैडम कांपते कदमों से दौड़ते हुए बाहर बरामदे में आईं जहाँ पार्वती अम्मा अपनी लाठी के सहारे उस पीतल की कैंची से अपना माथा टिकाए खड़ी थीं। अनुराधा मैडम ने बहुत ही रुँधे गले से अम्मा के कांपते हाथों को पकड़ा और बिलखते हुए बोलीं “अम्मा आप जिस कल्याणी के लौटने और नारी को बराबरी दिलाने की राह देख रही हैं, वह तो बीस साल पहले ही अपने आदर्शों को बेचकर बहुत बड़ी हुक्मरान बन चुकी है और आज वही मंच पर बैठकर महिला समानता पर भाषण दे रही है, फिर आप बीस सालों से इस जंग लगी कैंची के आगे बैठकर किसका मातम मना रही हैं?” अम्मा ने अपनी धुंधली आँखों से अफसर मैडम को देखा और उनके चेहरे पर एक ऐसी दिल दहला देने वाली कड़वी मुस्कान तैर गई जिसने पूरे महिला कल्याण तंत्र और समाज के झूठे दावों की धज्जियाँ उड़ा दीं। अम्मा ने अपनी जेब से एक पुराना मुड़ा हुआ सरकारी पत्र निकाला और रोते हुए बोलीं “मैडम मुझे सब पता था कि वह सौदा हो चुका है और मेरी बेटी बहुत बड़ी साहिबा बन चुकी है।” अनुराधा मैडम ने स्तब्ध होकर पूछा “तो फिर अम्मा आप रोज यहाँ क्यों आती हैं?” अम्मा ने बिलखते हुए भरे गले से कहा “बेटी मैं बीस सालों से यहाँ किसी अफसर बेटी का इंतजार नहीं कर रही बल्कि रोज यहाँ आकर यह देखने आती हूँ कि जो औरतें बाहर दुनिया में नारी समानता और त्याग के बड़े-बड़े उपदेश देती हैं, जब वे अपने ही घर में अपनी अनपढ़ और बूढ़ी माँ को एक फटी साड़ी में बेसहारा छोड़ देती हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई बराबरी के पीछे छुपे इस खोखलेपन का अहसास होता है या नहीं।” अनुराधा मैडम सुन्न होकर उस पीतल की कैंची को ताकती रह गईं और पूरा महिला केंद्र उस बेबस माँ के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४० – महिला कल्याण विभाग – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – महिला कल्याण विभाग।)  

☆  चुभते तीर # १४० – व्यंग्य  – महिला कल्याण विभाग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

विकास भवन के महिला सशक्तीकरण प्रकोष्ठ के बाहर पीपल के पुराने चबूतरे पर बहत्तर साल की कौशल्या देवी हर बुधवार सुबह ठीक दस बजे आकर बैठ जाती थीं। उनकी कांपती गोद में लोहे की एक पुरानी सिलाई मशीन का जंग लगा गोल पहिया और बिना धागे की एक मुड़ी हुई सुई हमेशा रखी रहती थी। दफ़्तर का नया चपरासी जब भी उन्हें धूप में बैठा देखता तो चाय का कुल्हड़ मेज़ पर रखते हुए ठहाका लगाकर कहता कि “अम्मा जब आज छब्बीस अगस्त को महिला समानता दिवस के मौके पर बड़े साहब खुद नई सिलाई मशीनें और चेक बांटने आ रहे हैं तो इस लोहे के कबाड़ वाले पहिये को रोज़ अपनी छाती से लगाकर यहाँ अफ़सरों के आगे क्या तमाशा खड़ा करती हो।” कौशल्या देवी अपनी पुरानी धुंधली ऐनक को धोती के छोर से साफ करतीं और बहुत धीमी आवाज में मुस्कुराकर कहतीं कि “बेटा यह लोहे का गोल पहिया केवल कबाड़ नहीं है बल्कि इस पूरे महिला कल्याण विभाग की वो टूटी हुई धुरी है जिसने मेरी बेटी के स्वाभिमान को कागज़ों की स्याही में हमेशा के लिए दफ़न कर दिया है।” आसपास खड़े तमाम मुंशी और क्लर्क उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में अम्मा की मति मारी गई है जो समानता दिवस के पावन उत्सव को अपनी हठ की भेंट चढ़ाने चली आई हैं।” कौशल्या देवी किसी की बात का तनिक भी मलाल किए बिना उस लोहे के पहिये को अपनी कांपती उंगलियों से सहलातीं और चुपचाप गाड़ियों के काफिले का इंतज़ार करती रहती थीं।

महिला कल्याण विभाग के तमाम बाबू और अधिकारी कौशल्या देवी की इस साप्ताहिक मूक उपस्थिति से पूरी तरह वाकिफ थे और उन्हें एक सनकी वृद्धा मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। दफ़्तर का बड़ा बाबू जब भी फाइलों का पुलिंदा लेकर निदेशक के केबिन की तरफ बढ़ता तो कौशल्या देवी बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़ी हो जातीं और हाथ जोड़कर कहतीं कि “बाबू जी क्या आज उस स्वरोज़गार अनुदान और सुरक्षा वाले कागज़ पर साहब के दस्तखत हो गए।” बाबू गुस्से में फाइलें पटकते हुए डांटकर कहता कि “अरे अम्मा जब तक डिजिटल पोर्टल पर आधार का ऑनलाइन सत्यापन पूरा नहीं होगा और तहसील से जांच रिपोर्ट नहीं आएगी तब तक कागज़ आगे नहीं बढ़ेगा और तुम इस जंग लगे पहिये को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटती रहोगी।” कौशल्या देवी बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जातीं और उस लोहे के पहिये को अपनी हथेली पर घुमाने का निरर्थक प्रयास करने लगतीं जो हर बार लड़खड़ाकर उनकी गोदी में गिर जाता था। कस्बे के लोग आपस में तरह-तरह की बातें करते कि शायद अम्मा अपने किसी पुराने भत्ते के लिए यह सब कर रही हैं लेकिन किसी को भी उस पहिये और महिला समानता के इस भव्य जलसे के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी भनक नहीं थी।

दोपहर में अचानक महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रमुख सचिव महोदय महिला समानता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य राज्य स्तरीय सम्मेलन का उद्घाटन करने उसी विकास भवन पहुँचे। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए नए बैनर टांगे जाने लगे ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर दीप प्रज्वलन और नारी सशक्तिकरण पर लंबा भाषण देने के बाद जब सचिव महोदय पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र चबूतरे पर शांत बैठी कौशल्या देवी पर पड़ी जिनकी गोद में वही जंग लगा पहिया रखा था। अपनी संवेदनशील और जनहितैषी छवि का प्रदर्शन करने के लिए सचिव महोदय तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर कौशल्या देवी के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “अम्मा आज महिला समानता दिवस पर हम मातृशक्ति को नमन करते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है क्या आपको स्वरोज़गार योजना का लाभ नहीं मिल रहा है जिसे मैं तुरंत स्वीकृत करवाऊँ।” कौशल्या देवी ने अपनी पथराई आँखों से सचिव महोदय को देखा और अपने कांपते हाथों से वह जंग लगा पहिया आगे बढ़ाते हुए बोलीं कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस पहिये पर खुदी हुई सरकारी योजना की संख्या और यह मुड़ी सुई पहचान लीजिए।”

सचिव महोदय ने जब उस लोहे के पहिये को हाथ में लेकर गौर से देखा तो उस पर महिला स्वावलंबन योजना की मुहर के साथ उनकी खुद की पुरानी तारीख दर्ज थी। कौशल्या देवी की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस ठंडे पहिये पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोलीं कि “साहब पाँच साल पहले मेरी पढ़ी-लिखी बेटी ने अपने पैरों पर खड़े होने के लिए आपके इसी दफ़्तर से सिलाई केंद्र का लोन मांगा था। लेकिन आपके भ्रष्ट अफ़सरों ने उसे सिलाई मशीन देने के बहाने महीनों दफ़्तर के चक्कर कटवाए और बंद कमरों में उसका मानसिक और शारीरिक शोषण करने की कोशिश की। मेरी बेटी उस अपमान और बेबसी के बोझ को बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने समाज के डर से अपनी जुबान बंद कर ली और आज वह घर के एक कोने में मानसिक रूप से अपंग होकर जिंदा लाश की तरह पड़ी है। मैं रोज़ यह सिलाई मशीन का पहिया यहाँ इसलिए लाती हूँ ताकि आपके इस मंच को बता सकूँ कि साल में सिर्फ एक दिन भाषण देकर नारी को देवी कह देने से समानता नहीं आती जब तक कि तुम्हारे दफ़्तर की कुर्सी पर बैठे दरिंदे एक बेबस औरत के स्वाभिमान को सरेआम नोंचना बंद न कर दें।” यह सुनते ही सचिव महोदय का चेहरा शर्म से झुक गया और पूरा विकास भवन गहरे सन्नाटे में डूब गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३९ – वरिष्ठ नागरिक – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – वरिष्ठ नागरिक।)  

☆  चुभते तीर # १३९ – व्यंग्य – वरिष्ठ नागरिक ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

सभागार के वातानुकूलित कमरे के मुख्य द्वार पर अठहत्तर साल के विश्वंभर दयाल अपनी लाठी टेकते हुए सुबह ठीक दस बजे आकर बैठ जाते थे। उनके कांपते हाथों में जरी के गोटे वाला एक पुराना पीला शॉल और मखमली डिब्बे में रखा एक सूखा हुआ मुरझाया गुलाब का फूल रहता था जिसे वे अपनी हथेली पर रखकर लगातार सहलाते रहते थे। सभागार का नया सुरक्षाकर्मी जब भी उन्हें गेट के पास बैठा देखता तो चाय का कुल्हड़ मेज़ पर पटकते हुए ठहाका लगाकर कहता कि “बाबा जब आज इक्कीस अगस्त को वरिष्ठ नागरिक दिवस के मौके पर बड़े साहब खुद नए शॉल और सम्मान बांटने आ रहे हैं तो इस फटे पुराने शॉल को रोज़ अपनी छाती से लगाकर यहाँ अधिकारियों के आगे नुमाइश क्यों लगाते हो।” विश्वंभर दयाल अपनी पुरानी ऐनक के धुंधले शीशे को धोती से पोंछते और बहुत धीमी आवाज़ में मुस्कुराकर कहते कि “बेटा यह जरीदार कपड़ा केवल रेशम का टुकड़ा नहीं है बल्कि इस पूरे समाज की उस अंधी संवेदनहीनता का वो ढोंग है जिस पर साल में सिर्फ एक दिन भाषणों की माला पहनाई जाती है।” सभागार में आने वाले तमाम मुंशी और युवा कार्यकर्ता उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में बाबा की मति मारी गई है जो सम्मान के इस पावन उत्सव को अपनी हठ की भेंट चढ़ाने चले हैं।” विश्वंभर दयाल किसी की कड़वी बात का तनिक भी बुरा माने बिना उस सूखे गुलाब की पंखुड़ियों को अपनी कांपती उंगलियों से संभालते और चुपचाप गाड़ियों के काफिले का इंतज़ार करते रहते थे।

सभागार के तमाम कर्मचारी विश्वंभर दयाल की इस मूक उपस्थिति से पूरी तरह परिचित हो चुके थे और उन्हें एक सनकी बुजुर्ग मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। आयोजन समिति का बड़ा सचिव जब भी गुलदस्तों और मोमेंटो का ढेर लेकर मुख्य मंच की तरफ बढ़ता तो विश्वंभर दयाल बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि “बाबू जी क्या आज उस बुजुर्ग पेंशन और भरण-पोषण वाले कागज़ पर साहब की मुहर लग गई।” सचिव गुस्से में अपने चश्मे को ठीक करते हुए डांटकर कहता कि “अरे बाबा जब तक डिजिटल पोर्टल पर सत्यापन पूरा नहीं होगा और तहसील से नई रिपोर्ट नहीं आएगी तब तक कागज़ आगे नहीं बढ़ेगा और तुम इस पुराने शॉल को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे।” विश्वंभर दयाल बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाते और उस मखमली डिब्बे के ढक्कन को बार-बार खोलने और बंद करने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे। शहर के लोग आपस में खुसर-पुसर करते कि शायद बाबा अपने बेटे से संपत्ति का कोई पुराना विवाद सुलझाने के लिए यह स्वांग रच रहे हैं लेकिन किसी को भी उस सूखे गुलाब और वरिष्ठ नागरिक दिवस के इस भव्य तमाशे के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी थाह नहीं लग पा रही थी।

दोपहर में अचानक जिले के नए जिलाधिकारी महोदय और समाज कल्याण अधिकारी वरिष्ठ नागरिक दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य समारोह का उद्घाटन करने सभागार पहुँच गए। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए रेड कारपेट बिछाया जाने लगा ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर दीप प्रज्वलन और बुजुर्गों के सम्मान में कसीदे पढ़ने के बाद जब जिलाधिकारी महोदय पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र मुख्य द्वार के कोने में शांत बैठे विश्वंभर दयाल पर पड़ी जिनकी गोद में वही पीला शॉल और सूखा गुलाब रखा था। अपनी जनप्रिय और संवेदनशील छवि का प्रदर्शन करने के लिए साहब तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर विश्वंभर दयाल के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “बाबा आज वरिष्ठ नागरिक दिवस पर हम आप जैसे पूज्य बुजुर्गों को नमन करते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है जिसे मैं तुरंत हल करवाऊँ क्या आपको वृद्धावस्था सम्मान का लाभ नहीं मिल रहा है।” विश्वंभर दयाल ने अपनी सूजी हुई आँखों से साहब को देखा और अपने कांपते हाथों से वह पीला शॉल और सूखा गुलाब साहब की हथेली पर रखते हुए बोले कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस शॉल के कोने पर छपा हुआ नाम और यह सूखा हुआ फूल पहचान लीजिए।”

साहब ने जब उस शॉल के कोने पर सुनहरे धागों से लिखी इबारत को पढ़ा तो उनके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ गया और हाथ कांपने लगे क्योंकि उस पर पिछले साल का तारीखवार सरकारी सम्मान और खुद उनके अपने दस्तखत दर्ज थे। विश्वंभर दयाल की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस सूखे गुलाब पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि “साहब ठीक पिछले साल इसी इक्कीस अगस्त को आपने इसी मंच पर मुझे जिले का सबसे सम्मानित वरिष्ठ नागरिक घोषित करके यह शॉल और फूल पहनाया था। लेकिन अगले ही दिन जब मेरे अफ़सर बेटे ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया तो मैं आपके दफ्तर में भरण-पोषण कानून की अर्जी लेकर साल भर भटकता रहा और आपके बाबू मुझसे फाइल आगे बढ़ाने के लिए रिश्वत मांगते रहे। मैं भूखा प्यासा फुटपाथ पर सोता रहा और कोई भी अफ़सर मेरी सुध लेने नहीं आया। मैं आज यह सरकारी शॉल और सूखा फूल आपको वापस लौटाने आया हूँ ताकि आपकी इस व्यवस्था को बता सकूँ कि साल में तीन सौ चौसठ दिन लावारिस छोड़ दिए जाने वाले बूढ़े बाप को साल के सिर्फ एक दिन मंच पर शॉल ओढ़ाकर देवता बना देना ही इस सभ्य समाज का सबसे घिनौना मज़ाक है।” यह सुनते ही जिलाधिकारी का सिर शर्म से पूरी तरह झुक गया और पूरे सभागार में ऐसा सन्नाटा छा गया जिसने वहाँ खड़े हर इंसान के ज़मीर को झकझोर कर रख दिया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४८ ☆ व्यंग्य – बेमिसाल यूनिवर्सिटी के छात्र-हितकारी पाठ्यक्रम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘बेमिसाल यूनिवर्सिटी के छात्र-हितकारी पाठ्यक्रम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४८ ☆

☆ व्यंग्य ☆ बेमिसाल यूनिवर्सिटी के छात्र-हितकारी पाठ्यक्रम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

देश के मशहूरो-मारूफ़ शिक्षा संस्थान बेमिसाल यूनिवर्सिटी ने 20 जून को एक विज्ञप्ति निकाली जिसमें घोषणा की गयी कि यूनिवर्सिटी छात्रों के लिए दो नये रोज़गारोन्मुख पाठ्यक्रम आरंभ करने जा रही है जिनका उद्घाटन राज्य के माननीय राज्यपाल के कर कमलों द्वारा शीघ्र होगा।

विज्ञप्ति में कहा गया कि पिछले साल यूनिवर्सिटी छात्रों के लिए पन्द्रह दिन का अति उपयोगी ‘उपला मेकिंग‘ कोर्स चला चुकी है जो बहुत लोकप्रिय हुआ और जिसमें छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। विशेषकर छात्राओं का मत था कि यह कोर्स साधारण पढ़ाई की तुलना में बहुत दिलचस्प और उपयोगी साबित हुआ।

यूनिवर्सिटी ने अब निम्नलिखित दो उपयोगी पाठ्यक्रमों के आरंभ होने की घोषणा की है जिनकी अवधि एक वर्ष होगी और जिनमें सफल छात्रों को डिप्लोमा प्रदान किया जाएगा। विज्ञप्ति में यह विश्वास दिलाया गया कि ये पाठ्यक्रम छात्रों को नौकरी या व्यवसाय करने में बहुत सहायक सिद्ध होंगे।

  1. एडवांस्ड कोर्स इन सायकोफ़ैंसी :-

इस पाठ्यक्रम को हिन्दी में ‘चाटुकारी का उन्नत पाठ्यक्रम‘ कहा जाएगा। यूनिवर्सिटी में बहुत समय से यह शिद्दत से महसूस किया जा रहा था कि- कोरी शिक्षा और डिग्री से जीवन में सफलता और तरक्की हासिल करना मुश्किल है। पढ़-लिख कर आदमी नौकरी तो पा सकता है, लेकिन प्रोमोशन के लिए कुछ और गुण आवश्यक महसूस होते हैं, वर्ना काबिल लोग पांव पीटते रह जाते हैं और चतुर गधे बुलन्दी पर पहुंच जाते हैं। इसी तरह बिज़नेस में ऊंचाई हासिल करने के लिए सत्ता के रसूखदारों को साधना ज़रूरी होता है, जिसके लिए चाटुकारी अत्यावश्यक होती है। इसलिए शैक्षणिक योग्यता में ठकुरसुहाती या ब्याजस्तुति की गोटा-किनारी लगाना ज़रूरी है। राजाओं के ज़माने में यह काम भाटों और चारणों के द्वारा किया जाता था।

इस पाठ्यक्रम के सफल संचालन के लिए यूनिवर्सिटी देश के शीर्षास्थ चाटुकारों को ‘विज़िटिंग प्रोफेसर’ के रूप में आमंत्रित करेगी। सौभाग्य की बात है कि देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है। अनेक जन-प्रतिनिधि इस कला में सिद्ध हैं। नेता के मुख से कोई प्रस्ताव निकलते ही तुरंत समर्थन में हाथ उठाते हैं। सोचने-समझने की ज़रूरत नहीं।  इन्हें देखकर एक फिल्मी गीत याद आता है— ‘जो तुमको हो पसन्द वही बात कहेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे।’ हमारे बॉलीवुड में इस कला में सिद्ध अनेक कलाकार बैठे हैं। एक बुज़ुर्ग कलाकार सार्वजनिक रूप से गर्व के साथ अपने को एक बड़े नेता का ‘चमचा’ घोषित कर चुके हैं। समझदार फिल्म निर्माता ऐसी फिल्में बना रहे हैं जिनसे सरकार खुश हो और टैक्स में छूट मिले, भले ही समाज में ज़हर फैले। इस गुण से संपन्न अनेक मीडिया चैनल भी हैं जिन्हें  ‘गोदी मीडिया’ नाम से विभूषित किया गया है।

कुछ लोगों में चाटुकारी की नैसर्गिक प्रतिभा होती है। वे हवा का रुख देखते ही अपने व्यवहार में पलटी मारते हैं। बनारस विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर साहब ने गोबर के उपले बनाने का प्रशिक्षण दिया, और  इस तरह छात्रों के दिमाग़ में भरपूर गोबर भरा। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज की प्रिंसिपल महोदया ने अंतरात्मा की पुकार पर छात्रों के क्लासरूम की दीवारों को गोबर से पुतवा दिया। परिणामत: छात्रों ने वही सलूक प्रिंसिपल महोदया के ऑफिस के साथ किया।

एक महंत जी हैं जो प्रभु के निर्देश पर एक राजनीतिक पार्टी में प्रवेश कर गये। फिर प्रभु के निर्देश पर दूसरी पार्टी में चले गये। फिलहाल वे अपनी नयी पार्टी के नेता में बुद्ध, महावीर और गांधी की छवि देख रहे हैं।

विज्ञप्ति में कहा गया कि भगवान भी अपनी प्रशंसा सुनना पसंद करते हैं। अजामिल की कथा इसका प्रमाण है। इसीलिए चतुर लोग मन में भक्ति न होते हुए भी मुंह से नारायण का जाप करते रहते हैं ताकि उन्हें भी धोखे से स्वर्ग में ‘एंट्री’ मिल जाए।

‌यूनिवर्सिटी की विज्ञप्ति में निष्कर्ष स्वरूप कहा गया कि संसार की बड़ी बाधाओं को चाटुकारी के अमोघ अस्त्र से जीता जा सकता है, और अन्त में रामायण की चौपाई उद्धृत की— ‘सकल पदारथ हैं जग माहीं, करमहीन नर पावत नाहीं।’  मतलब यह कि जो जन चाटुकारी नहीं कर पाते, उन्हें संसार में कुछ नहीं मिलता। वे मुट्ठी बांधे आते हैं और हाथ पसारे संसार से विदा हो जाते हैं।

  1. एडवांस्ड कोर्स इन डिस्सिम्युलेशन :-

इस कोर्स को ‘वाक्छल का उन्नत पाठ्यक्रम‘ कहा जा सकता है। यह भी बहुत उपयोगी और ज़रूरी पाठ्यक्रम है, ख़ासकर राजनीतिज्ञों और अफसरों के लिए। राजनीति में जनता को छलने और उनका वोट लेने के लिए बड़े-बड़े वादे करने पड़ते हैं। फिर वादे पूरे न होने पर जब जनता जवाब मांगती है तो वाक्छल की कला जान छुड़ाने के लिए बहुत काम आती है। जब जनता देश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल पूछने लगती है तो मंत्री जी फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था की बात करने लगते हैं। एक जन- प्रतिनिधि को देखा जो अपने चुनाव-क्षेत्र गये थे। जब जनता उनके सामने अपनी शिकायतें रखने लगी तो नेताजी मुट्ठी उठाकर ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम’ के नारे लगाने लगे। इसके बाद वे कार में बैठकर वहां से फुर्र हो गये।

जनसेवा के जज़्बे से भरे नेताओं को कई बार दुखी मन से दल बदलना पड़ता है। तब जनता का सामना होने पर वाक्छल की कला बहुत काम आती है।

वाक्छल का उत्तम नमूना महाभारत में युधिष्ठिर का वक्तव्य था जिसमें वे गुरु द्रोण को अश्वत्थामा की मृत्यु का झूठा समाचार देते समय ‘अश्वत्थामा हत:‘ के पीछे ‘नरो वा कुंजरो वा’ जोड़ देते हैं।

अफसरों को भी जनता की शिकायतों का सामना करते समय अपना और अपने आकाओं का बचाव करना पड़ता है। इसके लिए जनता को नाना प्रकार से बहलाना और बहकाना पड़ता है। जब जनता के तर्कों का जवाब नहीं सूझता तो अफसर अंग्रेजी और कथा वाचक संस्कृत बोलने लगते हैं। पंडितों के मंत्रों के बारे में एक लेख में परसाई जी लिखते हैं— ‘जिन मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, वे अगर संस्कृत से हिन्दी में कर दिये जाएं तो प्राइमरी स्कूल की किताब के लायक हैं।’

यूनिवर्सिटी की विज्ञप्ति में कहा गया है कि हमारे देश में वाक्छल में माहिर लोग बड़ी संख्या में हैं। देश में ज़्यादातर लोगों के अल्पशिक्षित होने के कारण इस कला में माहिर लोगों की जनता को बहलाने में सफलता निश्चित रहती है। यूनिवर्सिटी ने लिखा कि वह इस  कला में उच्च योग्यता प्राप्त विद्वज्जन को आमंत्रित कर छात्रों को इस कला में दीक्षित करेगी।

विज्ञप्ति के अन्त में लिखा गया कि यूनिवर्सिटी आगे भी इसी प्रकार छात्रोपयोगी पाठ्यक्रमों का अन्वेषण कर छात्रों का हित करने के उपक्रम में सन्नद्ध रहेगी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३८ – पंडित जी की भविष्यवाणी – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – पंडित जी की भविष्यवाणी।)  

☆  चुभते तीर # १३८ – व्यंग्य  – पंडित जी की भविष्यवाणी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शर्मा जी भाग्य और हस्तरेखा पर इतना अटूट विश्वास रखते थे कि सुबह का पहला कदम भी पंचांग देखकर ही घर की चौखट से बाहर निकालते थे। उनके मोहल्ले में नए आए पंडित विद्याधर शास्त्री का दावा था कि वे इंसान के पैर का अंगूठा देखकर बता सकते हैं कि उसका आने वाला समय कैसा बीतेगा।

शर्मा जी रविवार की सुबह अपनी दाहिनी हथेली और पैर का अंगूठा लिए पंडित जी के आश्रम पहुँच गए। आश्रम में पहले से ही दफ़्तर के दो-तीन लोग अपनी किस्मत का ताला खुलवाने के इंतज़ार में बैठे थे।

पंडित जी ने अपनी बड़ी सी ऐनक नाक पर टिकाई, शर्मा जी के पैर के अंगूठे को दो मिनट तक गौर से देखा, फिर गहरी सांस छोड़कर अपना सिर हिलाया।

“शर्मा जी, मामला बहुत गंभीर है,” पंडित जी ने गंभीर आवाज़ में कहा, “आपके ग्रह बता रहे हैं कि अगले चौबीस घंटे के भीतर आपके साथ एक बहुत बड़ा धोखा होने वाला है। कोई अपना ही व्यक्ति आपके धन पर हाथ साफ़ करने वाला है।”

शर्मा जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके दिमाग में तुरंत अपने साले, दफ़्तर के जूनियर और दूध वाले का चेहरा घूमने लगा। उन्होंने तुरंत पूछा, “पंडित जी, कोई उपाय? कोई ताबीज?”

पंडित जी ने मुस्कुराकर एक लाल धागा निकाला और बोले, “यह सिद्ध धागा अपनी दाहिनी कलाई पर बांधिए और अगले चौबीस घंटे तक अपने सारे पैसे, बटुआ और क्रेडिट कार्ड किसी गुप्त स्थान पर छुपाकर रख दीजिए। किसी पर विश्वास मत कीजिए।”

शर्मा जी ने ₹1100 दक्षिणा दी, धागा बंधवाया और भागे-भागे घर आए। घर पहुँचते ही उन्होंने अलमारी से अपना सारा नकद और पर्स निकाला और उसे अपने पुराने जूतों के डिब्बे में डालकर पलंग के सबसे गहरे कोने में छुपा दिया। यहाँ तक कि पत्नी को भी भनक नहीं लगने दी, क्योंकि पंडित जी ने कहा था—’कोई अपना ही धोखा देगा!’

पूरा दिन शर्मा जी जासूसों की तरह घर के हर कोने पर नज़र रखे रहे। जब भी पत्नी पास आती, वे अपना हाथ जेब पर रख लेते। रात भर वे सो नहीं पाए। हर आहट पर उन्हें लगता कि कोई चोर उनका जूतों का डिब्बा चुराने आ रहा है।

अगली सुबह आठ बज गए। पूरे चौबीस घंटे बीत चुके थे। शर्मा जी ने राहत की लंबी सांस ली। पंडित जी की भविष्यवाणी झूठी साबित हुई थी! उनका खजाना सुरक्षित था।

वे मुस्कुराते हुए पलंग के नीचे झुके और जूतों का डिब्बा बाहर निकाला। डिब्बा खोला तो शर्मा जी के होश उड़ गए! डिब्बा बिल्कुल खाली था। अंदर न पर्स था, न एक भी रुपया!

शर्मा जी चीखते हुए बाहर भागे, “चोरी हो गई! धोखा हो गया!”

तभी उनकी पत्नी हाथ में झाड़ू लिए आई और शांत भाव से बोलीं, “चिल्लाना बंद कीजिए। कल जब आप पंडित जी के यहाँ गए थे, तो कबाड़ी आया था। मैंने आपके पलंग के नीचे पड़े पुराने गल चुके जूतों के डिब्बे कबाड़ में ₹50 में बेच दिए। पर हाँ, डिब्बे के अंदर आपका पर्स मिला था, तो मैंने उससे पंडित जी की ₹1100 दक्षिणा और महीने का राशन चुकता कर दिया।”

शर्मा जी का मुंह खुला का खुला रह गया। पंडित जी की भविष्यवाणी सौ फ़ीसदी सच साबित हुई थी—धोखा चौबीस घंटे के अंदर ही हुआ था, और करने वाला कोई ‘अपना’ ही था!

शर्मा जी सिर पकड़कर वहीं बैठ गए। पूरा मोहल्ला एकत्र हो गया और पंडित जी की इस ‘सटीक भविष्यवाणी’ की महिमा पर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाने लगा।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३७ – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर।)  

☆  चुभते तीर # १३७ – व्यंग्य  – गुप्ता जी का ऑनलाइन ऑफर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

गुप्ता जी के जीवन का एक ही स्वर्णिम सिद्धांत था—’छूट चाहे एक रुपये की हो, उसे छोड़ना पाप है।’ उनके फ़ोन में दुनिया भर की शॉपिंग ऐप्स का ऐसा जाल बिछा था कि नोटिफिकेशन आते ही उनका अंगूठा अपने आप ‘बाय नॉव’ पर चला जाता था।

एक दिन अचानक उनके फोन पर लाल अक्षरों में चमचमाता हुआ मैसेज आया—’महा-बचत ऑफर! केवल अगले दस मिनट के लिए, ₹50,000 का प्रीमियम एयर प्योरिफायर पाएं मात्र ₹499 में!’

गुप्ता जी की बाछें खिल गईं। उन्होंने न बाएं देखा न दाएं, तुरंत क्रेडिट कार्ड का नंबर डाला और ऑर्डर कन्फर्म कर दिया। अगले ही पल उनके खाते से ₹499 कटने का मैसेज आ गया। गुप्ता जी ने ऐसे राहत की सांस ली जैसे किसी युद्ध में आख़िरी किला फतह कर लिया हो। वे पूरे मोहल्ले में घूम-घूमकर अपनी इस ‘ऐतिहासिक खरीददारी’ की शेखी बघारने लगे।

तीन दिन बाद कूरियर वाला एक बहुत बड़ा कार्डबोर्ड का बक्सा लेकर आया। बक्से का आकार इतना विशाल था कि उसे ड्राइंग रूम में रखने के लिए गुप्ता जी को अपने सोफ़े की जगह बदलनी पड़ी। पत्नी ने संदेह भरी नजरों से बक्से को देखा, “इस बक्से में सचमुच पंखा और फिल्टर है भी या केवल डिब्बा खरीद लाए हैं?”

गुप्ता जी ने मूंछों पर ताव दिया, “अरे तुम क्या जानो कॉर्पोरेट मार्केटिंग के दांव-पेच! कंपनियां कई बार प्रचार के लिए घाटे में सामान बेचती हैं।”

गुप्ता जी ने कैंची उठाई और बक्से को टेप काटकर खोला। अंदर एक और बक्सा था। उस बक्से को खोला तो उसके अंदर एक और छोटा बक्सा निकला। जैसे-जैसे बक्से खुलते गए, गुप्ता जी के माथे पर पसीने की बूंदें गहरी होती गईं। यह किसी जापानी खिलौने की तरह डिब्बे के अंदर डिब्बे का सिलसिला था।

आखिरकार जब छठा और सबसे छोटा बक्सा खुला, तो उसके अंदर से एक छोटा सा प्लास्टिक का पौधा और एक छोटी सी पर्ची निकली।

पर्ची पर लिखा था: “बधाई हो! यह मनी प्लांट का प्राकृतिक एयर प्योरिफायर है। यह हवा में ऑक्सीजन घोलता है और ज़हरीली गैसों को सोखता है। 100% प्राकृतिक और बिना बिजली का!”

पत्नी ने अपना माथा पीट लिया और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगीं। गुप्ता जी का चेहरा ऐसा उतर गया जैसे किसी ने गरमा-गरम चाय में नींबू का रस निचोड़ दिया हो। ₹499 में उन्होंने दरअसल ₹10 का एक प्लास्टिक का गमला और उसकी पैकिंग का खर्च उठाया था।

तभी दरवाज़े पर पड़ोसी शर्मा जी आ पहुंचे। शर्मा जी ने उस बड़े बक्से और छोटे गमले को देखा और मुस्कुराते हुए बोले, “क्यों गुप्ता जी, हवा शुद्ध हुई या सिर्फ़ पॉकेट हल्की हुई?”

गुप्ता जी ने एक पल का विराम लिया, तुरंत अपना चश्मा ठीक किया और मुस्कुराकर बोले, “शर्मा जी, इसे कहते हैं असली दूरदर्शिता! बिजली का बिल शून्य, ज़ीरो मेंटेनेंस, और देखिए डिब्बों का कबाड़ बेचकर मुझे ₹500 वापस भी मिल गए! यानी प्योरिफायर बिल्कुल मुफ़्त!”

शर्मा जी का मुंह खुला का खुला रह गया और पूरा परिवार गुप्ता जी की इस बेमिसाल जुगाड़-बुद्धि पर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाने लगा।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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