हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५६ ☆ लघुकथा – प्रश्नविहीन… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “प्रश्नविहीन“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५६ ☆

✍ लघुकथा – प्रश्नविहीन… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

प्रतीक की कार्यालय में नौकरी लगी तो भंडार विभाग में लिपिक के रूप में और धीरे धीरे प्रमोशन पाकर अधीक्षक के पद तक प्रोन्नत हो गए। भंडार विभाग से उनका कहीं ट्रांसफर नहीं हुआ। भंडार विभाग के जरिए ही हर विभाग के हर सामान की खरीद हुआ करती थी और मरम्मत कार्य भी। पता नहीं क्यों किसी भी वस्तु का डैड स्टाक रजिस्टर नहीं मिलता था। शायद कोई देखता ही नहीं। हालांकि हर साल ऑडिट होता। विजिलेंस द्वारा भी इंसपेक्शन हुआ करता। लेकिन प्रतीक पर कभी आंच नहीं आई। हर अफसर के परिवार के लोग प्रतीक को जानते थे और बच्चे तो उनसे लिपट जाते थे। कुछ भी चाहिए प्रतीक अंकल मौजूद।

सभी अफसरों की वे नाक का बाल थे। नए अफसर कहीं से ट्रांसफर होकर आते तो प्रतीक उनकी सेवा में हाजिर। चैंबर के पर्दे साहब की मरजी के अनुसार बदल जाते । नया फर्नीचर आ जाता। नई डिजाइनदार टेबल व कुर्सियाँ। पुराने पर्दे व फर्नीचर कहां जाते किसी को पता नहीं।

एक डायरेक्टर आए कोलकाता से ट्रांसफर होकर। नाम था सदानंद कुरील। बहुत तेज तर्रार। उन्होंने पदभार संभाला तो दूसरे दिन प्रतीक उनके चेंबर में हाजिर। कुरील साहब ने उनकी तारीफ पूछी तो बताया मैं प्रतीक, अधीक्षक भंडार विभाग। कुरील साहब ने कहा, मैंने तो आपको बुलाया नहीं फिर कैसे चैंबर में सीधे आ गए। प्रतीक ने कहा कि आपके पी.ए. ने बुलाया। कुरील साहब ने पी.ए. को बुलाकर पूछा कि मैंने तो नहीं कहा कि भंडार अधीक्षक को बुलाओ, फिर ये यहां क्यों आए। पी.ए. ने कहा कि सर जो भी नए डायेक्टर आते हैं तो उन्हें नया फर्नीचर पर्दे आदि लगते हैं, इसलिए। अच्छा, कुरील साहब ने हुंकार भरी। अच्छा प्रतीक बाबू आप आ ही गए हैं तो बताइए, नए अफसरों के लिए क्या क्या मंगाते हैं और पुराना सामान कहां जाता है। अब तक की खरीद और पुराने सामान के निपटारे का रिकार्ड ले आइए।

प्रतीक की बोलती बंद। जी सर कहकर चैंबर से बाहर निकल आए। कई दिनों बाद तक वे नहीं आए तो कुरील साहब ने पी.ए. से प्रतीक को बुलाने को कहा। पी.ए. ने बताया कि वह अस्पताल में भरती हैं। कुरील साहब ने पी.ए. से उनकी छुट्टी और सिक रिपोर्ट का रिकार्ड मंगवाया। रिकार्ड देखकर कुरील साहब ने भंडार अधिकारी को बुलाया। उनसे पूछा कि प्रतीक आपके अधीक्षक हैं, उन्हें क्या हुआ है। भंडार अधिकारी का मुंह सूख गया। बोल नहीं पाए। कुरील साहब बोले चलिए प्रतीक को देखने अस्पताल चलते हैं। दोनों पहुंचे तो अस्पताल में अफरा तफरी मची थी। कुरील साहब को देखकर चिकित्सा अधिकारी और घबडा गए, तुतलाते से बोले, सर प्रतीक ने विष पान कर लिया। कुरील साहब बोले कि आप यहां क्या कर रहे हैं. जाइए उसे बचाइए। चिकित्सा अधिकारी भर्राए स्वर में बोले, नहीं बचा पाए सर। अस्पताल के बाहर मीडिया कर्मी और प्रेस प्रतिनिधियों की भीड थी। हर एक का चेहरा प्रश्नविहीन।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०५ – सुकून… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुकून।)

☆ लघुकथा # १०५ – सुकून श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

इस भाग दौड़ की जिंदगी में समझ में नहीं आता क्या करूँ क्या न करूँ?

आज पैदल चल रही हूँ तो यह रास्ता भी मुझे बहुत लंबा लग रहा है कमल जी अपने आप से बातें करते हुऐ आराम से धीरे-धीरे चल रही थी।

दीवार पर लिखे हुए सभी पोस्ट को ध्यान से पढ़ रही थी और आसपास की दुकानों के बोर्ड भी पढ़ रही थी। चलो अच्छा है आज गाड़ी खराब हो जाने से कुछ तो फायदा हुआ पता चल जाएगा कि कहाँ क्या मिलता है?

तभी अचानक  एक पोस्ट दिखाई दिया उसमें लिखा था कि चाय कॉफी के साथ यहाँ बातों का आनंद लें।

यह कैसी दुकान है कमल जी ने सोचा कुछ देर रुकने के बाद उनके मन में विचार आया चलो अंदर चल कर देखती हूँ घर जल्दी जाकर क्या करूंगी अकेली ही तो रहती हूँ बच्चों ने तो मुझे अकेला छोड़कर विदेश चले गए समय काटने के लिए पास के स्कूल में पढ़ाती हूँ।

उन्होंने देखा काफी सारे लोग बैठे हैं एक लाइब्रेरी है उसमें कुछ लोग ऑनलाइन पढ़ रहे हैं कुछ पेपर और किताबें पढ़ रहे है, चाय कॉफी और नाश्ता भी मिल रहा है।

तभी एक मुस्कुराती हुई महिला ने कहा -” मैडम आप क्या लेंगे लिए यहाँ बैठ जाइए।”

कमल जी ने कहा बहन जी कैसी जगह है इसके बारे में आप मुझे कुछ बताइए?

उसे महिला ने कहा मेरा नाम कविता है, हम पति-पत्नी यहां रहते हैं हमारा बहुत बड़ा घर था सड़क के किनारे हम अकेले रहते थे इसलिए हम लोगों ने सारी किताब कॉपी को एक जगह रख दिया और कुछ कंप्यूटर भी खरीद लिए हैं बच्चे पढ़ते हैं और जो हमारी तरह बुजुर्ग हैं वह भी यहां आते हैं हम सभी एक दूसरे के साथ अपना अनुभव बताते हैं और इतनी देर हम सब कैसे बैठ पाएंगे इसलिए यहाॅं पर चाय कॉफी नमकीन बिस्कुट सैंडविच और पकौड़ी मिलती है।

बाबाजी आप लोग तो बहुत अच्छे कार्य कर रहे हो मुझे तो यह पता ही नहीं था।

कविता ने कहा बहन क्या करें हमारी मजबूरी है और वक्त की मांग है आज के जमाने में किसी के पास समय नहीं है और हमारे पास समय ही समय है तो क्यों ना हम सभी को सुकून बाँटे।

कविता ने कहा ठीक कह रही हो बहन मुझे भी एक कप चाय पिला दो। कविता और रागिनी दोनों मुस्कुराने लगती हैं उनकी आंखों में एक चमक आ जाती है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९७ – रोग ग्रसित राजा… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– रोग ग्रसित राजा…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९७ — रोग ग्रसित राजा — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

राजा के तीन रोग थे। उसने अपने रोग स्वयं में छिपाये रखा क्योंकि रोग प्रकट होने से उसका मस्तक झुकता। आश्चर्य, उसके देश के कवि ने उसके तीन रोगों से मिलती जुलती कविता लिख दी। राजा क्रोधित हुआ। उसने कवि की हत्या करवा दी। जहाँ लाश फेंकी गई वहाँ सुन्दर फूल खिले। राजा को ये फूल बहुत पसंद आए। पर उसे जब पता चला ये फूल उसके शत्रु के वक्ष पर उगे हुए हैं बिलखने पर चौथे रोग ने उसे ग्रस लिया।

 © श्री रामदेव धुरंधर

07 – 03 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “अंतिम पड़ाव में…” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  लघुकथा – अंतिम पड़ाव में… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

गांव से विधुर पिता जी बेटे के पास रहने शहर आ गये थे। उनके आते ही बहू बेगम के चेहरे की भाव भंगिमा बिगड़ी हुई थी। अनुभवी पिता तुरंत ताड़ गये। बहू बेटे को बुला कर बोले- देखो बेटा, तुम दोनों नौकरी पेशा हो और बहुत बिज़ी रहते हो इसलिये

मैं अपने लिये कुछ व्यवस्थाएं प्लान करके आया हूँ। वो ये कि – मेरे नाश्ते, और दोनों टाईम खाने के लिये टिफ़िन सर्विस और कपड़े धुलवाने लांड्री वाला तय कर देना। एक इंडक्शन कुकर ले आया था और चाय बनाने की सामग्री, तो सुबह जल्दी उठता हूं इसलिये चाय अपनी मैं बना लिया करूँगा। अपनी दवाईयां भी होम डिलीवरी से आनलाईन मंगवा लिया करूँगा। अपने सभी खर्च भी अपनी पेंशन से वहन कर लूंगा। जब भी समय मिले मेरे साथ कुछ देर बैठ लिया करना।

बहू बेगम फिर भी चहक पड़ीं -” तो हमारे यहाँ वृद्धाश्रम जैसे रहने का मतलब क्या हुआ,पिता जी ? पिता जी शांत स्वर में बोले- मैं तो बस इस अंतिम समय में तुम लोगों और पोते पोती का साथ और लाड़ दुलार को जीने यहाँ चला आया हूँ। अन्यथा न लेना। तुम लोगों की निजी ज़िंदगी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता हूं। सेवक तो गाँव में भी बहुत थे पर तुम सबका साथ कहाँ था वहां। इतना हक मुझे दे देना ,बस और कुछ नहीं चाहिए मुझे। अब न केवल बहू बेगम बल्कि बेटा भी पूर्णतः निरुत्तर थे। 

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कथा # १०४ – ई-ग्रुप… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कहानी – ई-ग्रुप।)

☆ कथा कहानी # १०४ – ई-ग्रुप श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“वाह!  आग लेने आए थे और पैगंबर  मिल गए।”

सभी दोस्तों को बैठे देख कर रवि ने बोला,” हम लोग यहाँ निमंत्रण देने आए थे पर लग रहा है कि अब दावत खाकर ही जाएंगे।”

“दावत तो शौक से खाइए पर जो निमंत्रण देने आए थे कहीं उसे अकेले ही हजम मत कर लेना।”

ज्योति की यह बात सुनकर सभी जोर से ठहाका लगाकर हँस पड़े।

विकास ने कहा -“नहीं ऐसी गलती कभी नहीं कर सकते पार्टियाँ तो अपनी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा है, खुशियाँ मनाने के लिए यानी वह दिन जो रोज – रोज आएंगे।

रवि ने कहा-“ऐसा हम चाहते हैं।”

“ओह! लगता है तुम्हारी शादी की सालगिरह है, मुबारक हो” रवि के दोस्तों ने कहा।”

” मुबारकबाद आज नहीं देना परसों हमारे घर आकर ही देना” ज्योति ने कहा” वैसे आप सभी के घर आकर निमंत्रण देने वाले थे, हम लेकिन सब लोग यहीं मिल गए इसीलिए एक साथ बोल दिया।”

“अरे, छोड़ो भी ज्योति इतनी तकलीफ और औपचारिकता की क्या जरूरत है ?”

“आप तो बस बताइए कब आना है हम लोग स्वयं पहुंच जाएंगे व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज डाल देती तब भी हम पहुंच जाते।”

विकास ने कहा-“परसों यानि शुक्रवार को 7:00 बजे यार पार्टी यदि शनिवार को रखें, तो ज्यादा अच्छा रहता रविवार को आराम से सोते।”

रवि ने कहा-“यार क्या कहें हमारी सालगिरह शुक्रवार को है उसी दिन आना तो अच्छा रहेगा क्योंकि 15वीं सालगिरह है और आप जैसे जिंदादिल लोग यदि आएँगे तो पार्टी में चार चांद लग जाएंगे।”

ज्योति ने कहा- ” फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग वाले को भी बुलाया है समाचार पत्रों में भी भेजना है इसलिए देर मत करना अच्छे से तैयार होकर समय पर आना।”

सभी दोस्तों में से अचानक विकास ने कहा-” जिंदादिल तो हम सभी हैं पर यह नुमाइश करने की क्या जरूरत है वह जोर से हॅंसने लगा।”

रवि ने कहा-“क्या मतलब है?”

विकास ने कहा-“शादी की सालगिरह  हल्ले गुल्ले के साथ मनाना मेरे ख्याल से तो यार नुमाइश करना ही है दोस्तों को बुलाने की किसी बहाने की जरूरत नहीं होती।”

रवि ने कहा-“पार्टी एक दूसरे के साथ मनानी चाहिए पर  फेसबुक और समाचार पत्रों के माध्यम से ही तो असली आनंद आता है वरना रोज तो हम एक दूसरे के साथ कहां रहते हैं।”

“तुम नौकरी वाले हम बिजनेसमैन की बात नहीं समझोगे इसी बहाने हमें बिजनेस और नए-नए रिलेशन भी मिलते हैं।”

“यह खुफिया बात है । वह जोर से हॅंसा।”

सभी दोस्तों ने कहा-” तो मियां बीवी मिलकर हमें परेशान  करने का सोच रहे हो।”

विषय बदलें और वातावरण से तनाव हटे इसके लिए ज्योति ने कहा।

विकास की पत्नी ने कहा- “चलो हम सभी लोग खाना खा लेते हैं।”

“कहाँ हो विकास भाई, ठहाके के इस गुलजार माहौल में किसी की तुलना नहीं करनी चाहिए।”

विकास की पत्नी (रजनी) ने कहा- “भाई साहब यह सब बातें छोड़िए आज तो आपकी पार्टी हो रही है ना, आप मजे लीजिए?”

रवि ने कहा-“कुछ लोग जैसे विकास बहुत बड़ा कंजूस हैं अकेले पार्टी मनाने को ही खुशी कहते हैं ।”

ज्योति ने कहा- “खुशी जब तक व्हाट्सएप और फेसबुक में फोटो न डालो तो कैसे आनंद प्राप्त होता है।”

सभी लोग ज्योति और रवि के घर शुक्रवार के दिन गए उन्हें शादी की सालगिरह की बधाई दे रहे थे दोनों बहुत अच्छे लग रहे थे रवि डॉ शंकर का बेटा था डॉक्टर साहब अब बहुत बुजुर्ग और कमजोर हो गए थे ।

दोस्तों ने पूछा- “तुम्हारे पिताजी नजर नहीं आ रहे हैं उन्हें क्यों नहीं बुलाया? क्या वह कहीं बाहर गए हैं?”

रवि ने कहा-“हम यंगस्टर की पार्टी में पिताजी आकर क्या करेंगे? शायद इसीलिए वे अपने अस्पताल में गए होंगे, आजकल ज्यादातर  वे वहीं रहते हैं।”

तभी अचानक उनके घर के ऊपर की मंजिल से जोर से आवाज आई ।

ऐसा लगा कि कोई गिर पड़ा है।

विकास ने कहा- “यार लगता है ऊपर कुछ गिरा है।”

रवि ने कहा- “यार तू पार्टी के मजे ले नहीं तो ऊपर जा आराम कर हमें परेशान मत कर?”

विकास जब कमरे में गया तो उसने देखा – “डॉक्टर शंकर गिर पड़े थे उनके सिर से खून निकल रहा था।”

वह तुरंत उन्हें लेकर अस्पताल गया उनके सिर पर गहरी चोट लग गई थी और उनका बीपी बहुत लो हो गया था वह अस्पताल से रवि को और ज्योति को फोन कर रहा था लेकिन किसी ने उसका फोन नहीं सुना और सब फोटो खींचा रहे थे रात के 10:00 बजे रवि ने विकास को फोन करके कहा कि यार तुम कहाँ चले गए थे? कितनी सुंदर सुंदर फोटो पेपर के फ्रंट पेज में मैं कल की न्यूज़ के लिए दे दिया हूं लेकिन तुम क्यों नहीं आए और तुम्हारा एक भी फोटो नहीं है।

विकास ने कहा- ” मैं शंकर अंकल के साथ अस्पताल में हूँ अंकल की हालत बहुत गंभीर है।” तुम्हें बहुत फोन किया लेकिन तुमने फोन नहीं उठाया किसी क्षण कुछ भी हो सकता है बचपन में जब हम तुम छोटे थे तो अंकल ने मेरी बहुत मदद की इसलिए ऊपर जब आवाज आई तो मैं अपने आप को नहीं रोक पाया लेकिन तुम अब बहुत बड़े आदमी बन गए हो? इसलिए हम जैसे छोटे लोगों की अब तुम्हें परवाह नहीं रह गई है।

रवि ने कहा-“छोड़ो विकास मुझे नीचा मत दिखाओ तुमने कोई महान कार्य नहीं किया है आखिर मेरे पिताजी डॉक्टर थे और तुम उन्हीं के अस्पताल में उन्हें भर्ती कराने के लिए लेकर गए और मेरे ऊपर इल्जाम लगा रहे हो।”

“ठीक है मैं आता हूँ।”

ज्योति और विकास अस्पताल पहुंचते हैं और साथ ही साथ मीडिया और प्रेस वाले को भी बुलाते हैं ।

दोनों रोनी सूरत बनाने का नाटक करते हैं और कहते हैं।

“मेरे पिताजी बहुत बीमार हैं।”

रवि ने पत्रकारों से कहा- इस तरह की अच्छी सी न्यूज़ अखबार में फ्रंट पेज पर फोटो के साथ छापना चाहिए।

विकास दूर से यह सब कुछ देखते हुए मुस्कुराता रहता है ।

  एक लंबी सांस लेते हुए गहरी चिंता में खो जाता है। उसके मस्तिष्क में अचानक विचार आता है कि क्या यही जो मैं देख रहा हूँ सच है क्या एक पुत्र भी इतना स्वार्थी होता है?

वाह-वाह ई- ग्रुप और इसकी महिमा।

अब लोग पिताजी की भी फोटो को अपने सोशल प्लेटफॉर्म में डालकर हमदर्दी लेते हैं और महान बनने का स्वांग रचते हैं।

सही परिभाषा सेवा करने की बस फोटो और स्टेटस में ही है, घर से भी ज्यादा महत्वपूर्ण ये ई ग्रुप है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५७ – होलिका दहन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “होलिका दहन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५७ ☆

🌻लघु कथा🌻 🔥 होलिका दहन🔥

मोहल्ले में होलिका रखी गई थी। साज सजावट, डीजे की धुन, आनंद उल्लास, उमंग को बढ़ा रही थी। मस्ती में झूमते सभी नजर आ रहे थे।

फूल बताशामाला, धूप, कच्चा धागा, हल्दी गाँठ लाईलावा, सुखे श्रीफल, मावा की थाली, सजा सभी महिला पुरुष होली पूजन के लिए जाने लगे।

देखते- देखते पूरा प्रांगण भर उठा सृष्टि अभी दो महिने ही हुए थे पति का स्वर्गवास हो गया था। छोड़ गए थे अपने पीछे यौवन से भरपूर सृष्टि और दो मासूम बच्चे।

बच्चों को लेकर वह भी थाल सजा होलिका पूजन में पहुंच गई। अरे यह क्या?? सभी की निगाहें सृष्टि की तरफ – – बातें बनने लगी इशारे इशारों में सभी तानों की फाग छेड़ने लगे।

गाना बज रहा था। माइक पर पंडित जी बैठे शुभ मुहूर्त का समय और होली की पौराणिक कथा बता रहे थे। सृष्टि ने हाथ जोड़ माईक हाथ में ले लिया। बड़े विनम्र भाव से सभी को प्रणाम कर कहने लगी— आप सभी मेरे आत्मिय और मार्गदर्शक है। मुझे बता दे क्या मैं अपने बच्चों के लिए जी नहीं सकती।

यदि आप में से कोई इनका भरण-पोषण भविष्य बनाने के लिए तैयार हैं, तो मैं यहीं पर आज इसी होलिका में अपने आप को दहन कर लूंगी।

परंपरा और रीत जीवंत तो उठेगी। यदि नहीं तो मुझे भी रंगों के साथ  जीने दीजिए और बच्चों के लिए दोहरी भूमिका निभाने दीजिए।

पंडित जी ने माइक हाथ में ले, दूसरे हाथ से गुलाल उड़ा होली की शुभ बधाई देने लगे। देखते-देखते सृष्टि की श्वेत साड़ी गुलाबी, लाल हो चली।

बच्चे खूब ताली बजा- बजा कर नाच रहे थे। रूढ़िता, द्वेष, ईर्ष्या, होलिका में दहन हो गई। सृष्टि को जीने का रंग मिल गया।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९६ – वंदन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– वंदन…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९६ — वंदन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मैंने देखा मेरी टूटी हुई वीणा ने स्वयं अपनी मरम्मत कर ली है। पर मैं तो वीणा के मामले में छलिया हूँ। मेरे पास वीणा हो सकती है, लेकिन मैं उसके तारों को झंकृत नहीं कर सकता। पर मेरी वीणा की बात कुछ और है। विशेष कर आज मेरी वीणा आकंठ जागृत थी। मैं चुप था। मेरी वीणा ने स्वयं गाया, “मॉरिशस पहुँचे उन प्रथम भारतीय मजदूरों को वंदन जिनकी कुदाल से इस देश की धरती पहली बार स्पंदित हुई थी।”

 © श्री रामदेव धुरंधर

24 – 02 – 26

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – समाधान… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – समाधान

? लघु कथा – समाधान ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

पांचवी कक्षा में पढ़ने वाला आशीष शाम को चार बजे घर लौटता तो स्कूल बैग, यूनिफॉर्म और जूते उतारने  के बाद अलमारी में से अपना मोबाइल निकालता और डाइनिंग टेबल पर पहुंच जाता.

दादी गीता उसे गर्म गर्म नाश्ता बना कर देती. वह नाश्ता खाते-खाते लगातार मोबाइल में आ रहे गेम्स खेलने लगता. गीता जी को बहुत बुरा लगता .एक दो बार उन्होंने टोक भी दिया – “बेटा खाते समय मोबाइल को कुछ देर साइड में रख दिया करो…” लेकिन वह उनकी बात को अनसुना करके अपने मोबाइल में ही व्यस्त रहता.

आज फिर उसके मोबाइल देखने पर गीता ने कह दिया- ” बेटा, थोड़ी देर मोबाइल रख दो ना. मुझसे बात करो मैं भी तो यहीं बैठी हूं…” एकाएक वह गुस्से से भड़क उठा- ” मुझे  दो घंटे बाद ट्यूशन पर जाना है फिर मोबाइल कब देखूंगा..? और आपके साथ  मैं क्या बात करूं..? हमेशा मेरे पीछे पड़ी रहती हो मोबाइल मत देखो..…आप अपना काम करो और मुझे मोबाइल देखने दो….”

और वह फिर से मोबाइल देखने में व्यस्त हो गया. अपने पोते के व्यवहार से गीता जी भीतर तक आहत हो  गईं. उनकी आंखें भीग गईं.

रात को बेटे बहू को उन्होंने पूरा किस्सा सुनाया तो दोनों एकदम चुप हो गए और एक दूसरे का मुंह देखने लगे.

अगले दिन शाम को ऑफिस से लौटने पर बहू बेटे ने गीता जी के हाथ में एक मोबाइल फोन रख दिया और बोले – ” मां,अब आप भी अपने आप को इसमें व्यस्त कर लो… हमारे पास यही एक समाधान है…”

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ बस इतना सा ख्वाब है ! – भाग – २ – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डॉ. मीना श्रीवास्तव

☆  कथा-कहानी ☆

बस इतना सा ख्वाब है ! – भाग – २ – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

उसके मन को बस एक ही सवाल निरंतर कुरेदता रहता … पति की सात-आठ हजार रुपये की तनख्वाह में मनमाफिक जीवन कैसे जिया जाए? यथा काल घर में नए मेहमान आने का अंदेशा होने लगा। दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा। पति यथाशक्ति उसको लाड प्यार से जतन कर उसकी मांगें पूरी करने में लगा रहता। प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुई और एक शुभ दिन उनके जीवन में नन्ही परी ने कदम रखा। उसके आगमन के साथ ही उन दोनों के जीवन में एक नया मोड़ आया। उसके कार्यकलाप काफी हद तक बढ़ गए और साथ साथ खर्चे भी! लेकिन वह बदलते हालात के साथ पूरी तरह से जी जान लगा कर तालमेल बिठाने में लगी रही। चॉल में हमउम्र सहेलियों के साथ गपशप के दौरान विचारों और समस्याओं का आदान-प्रदान करते हुए, अनायास ही उसने एक गांठ मन में बांध ली कि, अपने सवालों के जवाब खुद को ही खोजने होते हैं। ऐसे में पहली बिटिया सवा साल की होते-होते फिर एक बार नया कोंपल फूटा। उसने सही समय पर दूसरे बच्चे को जन्म दिया और इस बार भी बेटी ही हुई। एक पल के लिए, अनजाने में ही उसके मन में हूक उठी कि काश इस बार बेटा होता तो कितना ही अच्छा होता! यह तो उस क्षण का आवेग था, परन्तु बेटा हो या बेटी… वात्सल्य भाव से भरपूर दूध की धारा माँ के अंचल से अपने आप ही झरने लगती है… और फिर इसी से समानांतर खर्चे का भी झरना तेजी से बहने लगा। अब तो ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैय्या’ जैसी हालत होने लगी।   

एक दिन, उसके पति ने नौकरी का विज्ञापन पढ़ा और अपने दिल पर पत्थर रखकर अकस्मात ही उसे सुझाव दिया कि यह नौकरी उसके लिए ठीक रहेगी। नौकरी के लिए एकमात्र शैक्षणिक योग्यता बारहवीं पास होना था। वह आयु सीमा भी पूरी कर रही थी। बस बाधा उत्पन्न करने वाली एकमात्र शर्त यह थी कि, उसे नगर निगम के मुख्य कार्यालय जाना पड़ेगा। अब तक वह मुंबई के जीवन से अच्छी तरह से परिचित हो चुकी थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या वह अकेली बस से यात्रा कर पाएगी? लोकल ट्रेन का सफर तो दूर की बात थी। इस घडी तक तो घर की चारदीवारी में ही उसका विश्व समाया था । घर-आंगन के परे भी जग होता है, इस वास्तविकता को मानों वह भूल चुकी थी। लेकिन घर में आमदनी बढ़ाना अत्यावश्यक था। माता-पिता की दवाइयों और लड़कियों की स्कूल का खर्चा आए दिन बढ़ता ही जा रहा था। और पति के दोनों हाथ कमजोर पड़ने लगे थे। इस परिस्थिति में मजबूरन पति बहुत अनिच्छा से ही सही, उसे नौकरी के लिए आवेदन करने का आग्रह करने लगा। वह भी घर दर्दनाक हालत समझ पा रही थी, साथ ही पैसे की बढ़ती आवश्यकता उससे छिपी नहीं थी। एक ओर, खुद पैसे कमाने का विचार लुभावना प्रतीत हो रहा था, लेकिन दूसरी ओर उसके मन पर भय का गहरा साया छाया था। हर दिन उसे इतनी लंबी दूरी की यात्रा अकेले तय करनी होगी, उस प्रचंड भीड़भाड़ में अकेले मजबूती से डटे रहना, दिन भर अजनबी इन्सानों के बीच आना-जाना… और तिस पर काम? उसने तो महीनों से कलम छुई तक नहीं थी… वह जटिल सरकारी कार्य… क्या वह समझ पाएगी? क्या वह उसे सक्षमता से निभा पायेगी?… और उसकी छोटी बेटियां, सास-ससुर का क्या होगा? उनकी देखभाल कौन करेगा?… ऐसे अनगिनत सवाल उसके दिमाग को घेरे हुए थे, जिनके उत्तर ढूंढते हुए वह और भी भयकंपित होने लगी । “अरी भागवान! आवेदन करने में हर्ज क्या है? तुरन्त नौकरी मिलेगी इसकी कोई गुंजाईश तो है नहीं।”…उसके पति ने इन आश्वासक शब्दों से उसे मना ही लिया… उसने आवेदन किया। उसे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया… उसने अत्यधिक घबराहट की स्थिति में किसी तरह साक्षात्कार भी दिया… और आश्चर्यजनक रूप से, उसे एक महीने के भीतर नियुक्ति पत्र तक मिल गया…अब उसकी वास्तविक सत्वपरीक्षा का प्रारम्भ हुआ।

चॉल में ही रहने वाली एक चाची मामूली पैसे के ऐवज में बच्चियों की देखभाल करने के लिए राजी हो गई। लेकिन उसे नौकरी मिल जाने के बावजूद गृहकार्यों के लिए किसी नौकरानी को पालना नामुमकिन था, क्योंकि नौकरी ‘लोअर डिविजन क्लर्क’ की थी… और वेतन भी उसके पदानुसार ही सीमित था।  एक राहत की बात थी कि, एक नौकरानी सास-ससुर को दोपहर के नियत समय पर खाना देने के लिए तैयार हो गई। उस नौकरानी का वेतन एक अनिवार्य खर्च ही था। धीरे-धीरे एक के बाद एक सारे परिवारजनों की रोजमर्रा जिंदगी सुस्थिति में आ गई। इन खर्चों को घटाने के पश्चात भी उसके पास कम से कम चार-पाँच हज़ार रुपये बचेंगे, ऐसा उसका अनुमान था। अब सबसे कठिन कार्य बचा था अपने अस्थिर मन को आत्मविश्वास के अश्व पर आरूढ़ करवाना।

अपने पति के विश्वास का हाथ मजबूती से थामे हुए, उसने यह व्यवधान भी दूर किया और उसकी नौकरी शुरू हो गई… और जीवन की रेलगाड़ी वक्त की पटरियों पर बेतहाशा भागने लगी। यादों के झुरमुट की हरियाली भी उसी द्रुतगति से पीछे हटती गई… एक-एक करके, वे इतने पीछे हो गई कि नजर की ओट से भी अदृश्य हो गई…ठीक वैसे ही, जैसे लोकल ट्रेन की खिड़की से ओझल होती रहती थी। … जब उसने पहली बार मुंबई में कदम रखा, तो वह अपने साथ सपनों की बड़ी सी गठरी भी साथ संजो कर लाई थी। उस गठरी में बंद सपने अपेक्षाकृत छोटे-छोटे ही थे! …वह चाहती थी, ‘राणीचा बाग’ (रानी का बगीचा) जी भरकर घूमूं, … कमला नेहरू पार्क में बने ‘बूट हाऊस’ अर्थात बूढ़ी औरत के जूते में जाते हुए मरीन ड्राईव्ह का मनोरम नजारा देखूँ,  … उसने सुना था, जहाँ देखो वहीं सड़कों के किनारे बाजार सजते हैं रोज, अलीबाबा की गुफा जैसी तरह-तरह की चीज़ों से भरे रहते हैं…… उसने सोचा था, जहाँ तहाँ इतराते हुए चक्कर काटूंगी और मनचाही छोटी-मोटी चीज़ें खरीद लूँगी…उसे नमक की खदानें (मीठागर) देखने की बहुत उत्सुकता थी…इसके अलावा, वह  देखना चाहती थी कि डबल-डेकर बस वास्तव में कैसी होती है… उसमें सवारी करने की चाह भी थी मन में… और उसका सबसे बड़ा सपना था मुंबई के समुन्दर का दर्शन करने का… मुंबई में भी समुन्दर है, यह जानने के तुरन्त बाद तो नीलवर्णी मनोरम सागर से गर्भनाल के अटूट बंधन द्वारा जुड़े सुहाने रिश्ते को वह किसी भी हालत में टूटने नहीं देना चाहती थी।  लेकिन जैसे ही उसका जीवन उस चॉल में सिमटी छोटी-सी दुनिया में उलझ गया, वैसे ही ये नन्हे कोंपल से खिले सपने भी उसके मन की गठरी में उलझ गए… बंद होने से उनका दम घुटने लगा … और फिर धीरे-धीरे विस्मृति के काले धुंए में लुप्त हो गए।

शीघ्रगामी कालचक्र रुकने का नाम तक नहीं ले रहा था। बेटियाँ बड़ी हो गईं। वह हर हाल में उन्हें स्नातक होने तक तक पढ़ाना चाहती थी, और इस आकांक्षा को पूरा करने हेतु वह खुद के मामले में बेहद कृपणता दिखाकर पाई पाई जोड़ रही थी। उसने और उसके पति ने केवल बारहवीं कक्षा तक ही शिक्षा पाई थी। इस कारण स्टोर कीपर और एलडीसी (निम्न श्रेणी लिपिक) इन दोनों ही पदों के चलते पदोन्नति का कोई सवाल ही नहीं था… लोकल ट्रेन एवं और कार्यालय की चिट फंड योजना में नियमित रूप से भाग लेने से, और वेतन में वृद्धि होने पर भी, उस वृद्धि को छुए बिना उसने कुछ रकम और थोड़ा बहुत सोना इकठ्ठा कर रखा  था। एक के बाद एक पैदा हुई दोनों बेटियों का विवाह भी थोड़े ही अंतराल में करना था। इसलिए बहुत समय पहले, उसने अपने माता-पिता द्वारा उसकी शादी में पहनाई गईं चार चूड़ियाँ और एक छोटा गले का हार बिना ज्यादा उपयोग में लाते हुए इसी समय के लिए संजो कर रखे थे। दोनों ही लड़कियों के नाक नक्श सुन्दर थे। परिस्थितिनुसार वे समझदार और सुशील थीं। उनकी स्नातक परीक्षा समाप्त होते ही, उन दोनों के लिए खातेपीते परिवारों से रिश्ते के प्रस्ताव आने लगे। उसका बड़ा ही सीधा और सटीक सा विचार था कि जब उसकी अपनी झोली खाली है, तो दूसरे की खाली झोली के बारे में शिकायत कैसी? भाग्यवश दोनों ही होने वाले दामाद भी शालीन, व्यसन-मुक्त और शिष्ट थे। उन पर ज्यादा जिम्मेदारियां भी नहीं थीं। वेतन भी संतोषजनक थे। भला उसके पास इससे अधिक सोचविचार करने का वक्त कहां था? एक वर्ष के अंतराल से दोनों बेटियां ससुराल चलीं गईं। लेकिन घर में पैसों की तंगी की कहानी तो चल ही रही थी। बेटियों की शादी के लिए पति-पत्नी को कुछ कर्ज लेना पड़ा। फिर लड़कियों पर होने वाले खर्चों की जगह ऋण की किश्तें चुकानी शुरू हो गईं; बस यही एक अंतर था। वक्त के प्रवाह में वृद्धावस्था की सीमा लाँघ चुके उसके ससुर एवं फिर थोड़े अंतराल के भीतर उसकी सास, दोनों ही चल बसे। इतनी तसल्ली थी कि इन दुखद घटनाओं के पहले उसे, उसके पति और दोनों विवाहित बेटियों को उनके भरपूर आशीष प्राप्त हुए।     

… इतने वर्षों तक लगातार भागदौड़ करने के बाद न केवल उसका शरीर बल्कि, उसका मन भी अत्यधिक क्लांत हो चला था… लेकिन अब वह बहुत ही तटस्थ, शांत और बेहद मजबूत हो गया था। इतने वर्षों की अथक मेहनत के बाद उसने जिन जिम्मेदारियों का बोझ उठाया था, वह वाकई थोड़ा कम हो गया था,  परन्तु इस हालात में तुरन्त नौकरी छोड़ने के बारे में सोचना बिलकुल असंभव लगता था। पति की नौकरी एकाध साल में खत्म होने वाली थी, लेकिन उसकी नौकरी के फ़िलहाल ४-५ वर्ष बाकी थे। पति की निजी नौकरी में पेंशन की कोई गुंजाईश ही नहीं थी। यदि निवृत्ति के वक्त पति को फंड की थोड़ी बहुत  धनराशि भी मिलती, तो उसे दोनों की वृद्धावस्था के खर्चों में ही लगाना पड़ता। इसके अलावा, यदि वह सेवानिवृत्ति की आयु से पहले ही नौकरी छोड़ देती, तो उसकी निवृत्ति- निधि अर्थात पेंशन की राशि कम हो जाती। इसलिए अभी नौकरी छोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता था। चाहे वह कितनी भी थकी-हारी हो, चाहे उसका प्रकृति स्वास्थ्य बिगड़ने लगा हो, वह बीच में नौकरी से छुटकारा पाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। आजकल उसके पैर शिथिल हो गए थे सो तेज़ी से नहीं उठ पा रहे थे… उन्हें जोर जबरदस्ती से घसीटना पड़ता था। लेकिन इन सब मुसीबतों को झेलते हुए, उसको सुबह नौ सात (९.०७ ) वाली लोकल ट्रेन पकड़ना आज की तारीख में भी परम आवश्यक था…

… लेकिन हाल ही में, कोल्हू के बैल जैसी अनवरत पिसती जिंदगी के बीच एक नवीनतम सपना उसे पुकार रहा था…. पहले वाले सपनों जैसा ही, बहुत छोटा सा…. सेवानिवृत्ति से पहले कम से कम एक महीने के लिए उस ९. ०७ की लोकल ट्रेन का फर्स्ट क्लास पास खरीदना, और महीन साड़ियों और पोशाकों से सजी, इत्र की खुशबू महकाती खुशहाल स्त्रियों के धक्के खाते ही सही, इत्मीनान से ऑफिस पहुंचना, और इसके बाद ही निवृत्त होना…. बस इतना ही… यह तो कुंवारी कली सा अछूता सपना था…. वैसे, सच में देखा जाए तो यह अंतिम ही समझना होगा… परन्तु कम से कम यह तो पूरा होगा न? –

…. वह फिर एक बार शांतिपूर्वक उस भीड़ का एक बेनाम हिस्सा बनकर उसमें घुल जाती!…

♦ ♦ ♦ ♦

मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

सांगली, महाराष्ट्र मो ९८२२८४६७६२

हिंदी भावानुवाद  – डॉ. मीना श्रीवास्तव

संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आखिर सुनती क्यों नहीं ? ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक हृदयस्पर्शी एवं  विचारणीय कथा “आखिर सुनती क्यों नहीं ?“.)

 ☆ कथा कहानी  ☆ आखिर सुनती क्यों नहीं ? ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

अरे यार इतनी देर हो गई है, मैं मार्निंग वाक करके   वापस भी चला आया और तुम अभी तक सो ही रही हो. उठो, मैं तब तक चाय बनाता हूँ. मैं जानता हूँ कि तुम्हें मेरे हाथ की चाय अच्छी नहीं लगती, लेकिन भाई मुझे तो पीना है. मैं बना रहा हूँ, अभी मेरे हाथ का चाय पी लो, फिर उठना तो बनाना, फिर तुम्हारा बनाया भी पी लेंगे. अरे अभी तक तुम फ्रेस नहीं हुई. मैं  तो ज्यादा इंतजार नहीं कर सकता, चाय ठंडी हो जायेगी, तो मजा़ नहीं आयेगा, मैं तो चाय पी लेता हूँ.

वह भी क्या दिन थे, हम दोनों सुबह – सुबह टहलने जाते, और टहलने के बाद वहीं मैदान के बगल में एक अन्ना की इडली डोसा की दुकान थी, वहीं इडली खाते थे और वहीं पर काफी पीते थे. तुम्हें उसकी काफी बहुत पसंद थी. बहुत दिन हो गया, हम उधर गयेे नहीं. कोई कह रहा था कि अन्ना ने एक बहुत बड़ा साउथ इंडियन रेस्टोरेंट खोल लिया है और वहाँ केले के पत्ते पर दक्षिण भारतीय ढंग से बड़ा अच्छा खाना मिलता है. एक काम करना, एक दिन  तुम दोपहर में खाना मत बनाना, हम दोपहर का खाना वहीं खायेंगे. बहुत दिन हो गया दक्षिण भारतीय  खाना खाये हुए. उस साल हम लोग बच्चों के साथ मदुरै गये थे, मीनाक्षी मंन्दिर में, मीनाक्षी देवी के दर्शन करने के बाद, वहीं बगल के  होटल में हम सबों ने खाना खाया था. कितना अच्छा खाना था! तुम्हें इतना अच्छा लगा कि दक्षिण भारत के दस दिनों की  यात्रा में हम दोनों समय दक्षिण भारतीय खाना ही खाते रहे.

ठीक है चलो जाड़े में एक बार फिर दक्षिण भारत घूमने की योजना बनाते हैं. अब नौकरी से भी रिटायर हो चुका हूँ, छुट्टी की भी कोई चिंता नहीं, और बच्चे भी अपनी- अपनी जगह लग गये हैं, जितना दिन तुम्हारा मन होगा, हम घूमेंगे. देखो तुम अभी तक नहीं उठी! अरे यार रिटायर मैं हुआ हूँ, तुम नहीं. लगता जैसे तुम्हीं रिटायर हुई हो. जब नौकरी करता था तो कैसे मेरे उठने के पहले ही मेरा और बच्चों का नाश्ता और टिफिन बना कर तैयार कर देती थी और आश्चर्य तो यह कि तुम भी सुबह-  सुबह ही तैयार हो जाती थी और मेरे साथ ही सुबह की चाय पीती थी. पूछने पर कहती थी कि सबके जाने के बाद अकेले के लिए एक कप चाय बनाने का मन नहीं करता. दोपहर में जब बर्तन माजने वाली आती है तो उसी से बनवा कर, उसके साथ दुबारा चाय पी लेती हूँ.  लेकिन तुम खाना पहले भी बहुत देर से खाती थी. अरे अब तो जल्दी खाया करो, तुम्हारे चक्कर में आजकल  मुझे भी देर हो जाती  है. लेकिन तुम भी क्या करोगी, जिन्दगी भर का आदत कहाँ छूटता है! खैर चलो, कौन जल्दी है! लेकिन तुम आजकल सोने बहुत लगी हो.

इतने में दरवाजे की घंटी बजती है. अरे जरा देखो कौन घंटी बजा रहा है, शायद कचरा वाला होगा, रात में कचरे का डब्बा बाहर नहीं रखा था क्या? दुबारा घंटी बजने पर राघव बाबू दरवाजा खोलते हैं. सामने बेटी शीला खड़ी थी. शीला जैसे ही अन्दर आयी देखी कि टेबल पर एक कप चाय बिना पिये रखा है. बोली पापा कौन आया है? और अभी तक उसने चाय क्यों नहीं पिया, चाय ठंडी हो गई है. राघव बाबू ने कहा अरे तुम्हारी मम्मी के लिए बनाया था, अभी तक उठी नहीं! कोई बात नहीं, उठने पर दूसरा कप बना देंगे. तुम कैसी हो, दामाद जी कैसे हैं, मेरा छोटका नाती कैसा है?

शीला स्तब्ध खड़ी थी, उसके ऑंखों से ऑंसू  बह रहे थे. राघव बाबू ने देखा. चौंक गए! बोले बेटी क्यों रो रही हो? ससुराल में सब लोग ठीक तो हैं? शीला ने राघव बाबू को सीने से लगा लिया और बच्चे की तरह रोने लगी. राघव बाबू कुछ समझ नहीं पा रहे थे. वहीं से बोले अरे देखो शीला बेटी आयी है. थोड़ी देर बाद शीला बोली पापा आप कब स्वीकार करेंगे कि मम्मी अब नहीं है, वर्षों पहले हम लोगों को छोड़ कर वह  भगवान के यहाँ चली गई. थोड़ी देर तक दोनों बाप – बेटी एक दूसरे के ऑंखों से ऑंसू पोछते रहे.

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

31.01.2026

संपर्क – 1901 साई आराध्य, प्लाट नंबर- 18, सेक्टर- 35F, खारघर, नवी मुंबई – 410210

ई-मेल – om1955prakashpandey@gmail.com मो – 9619885135

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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