हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “राजनीति के कान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “राजनीति के कान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– मंत्री जी, बड़ा कहर ढाया है ,,,आपने।

– किस मामले में भाई?

– अपने इलाके के एक मास्टर की ट्रांस्फर करके।

– अरे , वह मास्टर? वह तो विरोधी पार्टी के लिए भागदौड़,,,

– क्या कहते हैं हुजूर?

– उस पर यही इल्जाम है।

– ज़रा चल कर कार तक पहुंचने का कष्ट करेंगे?

– क्यों?

– अपनी आंखों से उस मास्टर को देख लीजिए। जो चल कर आप तक तो पहुंच नहीं पाया। बदकिस्मती से उसकी दोनों टांगें बेकार हैं। और भागदौड़ करना उसके बस की बात कहां? जो अपने लिए भागदौड़ नहीं कर सकता, वह किसी के विरोध में क्या भागदौड़ करेगा?

– अच्छा भाई। तुम तो जानते हो कि राजनीति के कान बहुत कच्चे होते हैं और आंखें तो होती ही नहीं। खैर। आपने कहा है तो मैं इस गलती को दुरुस्त करवा दूंगा।

खिसियाए हुए मंत्री जी ने कहा जरूर लेकिन आंखों में कहीं पछतावा नहीं था।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – मुझे चाँद चाहिए ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा मुझे चाँद चाहिए

☆ लघुकथा – मुझे चाँद चाहिए ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

रामा की मम्मी की मम्मी, उसकी मम्मी की मम्मी यानी पीढ़ियों से एक ही ख़ानदानी बड़े साहब के घर चूल्हे-चौके का काम कर रही है…!

रामा की उम्र यही कोई पंद्रह-बीस के क़रीब होगी। एक दिन वह अपनी मम्मी से बोला- ‘मम्मी…! मम्मी…! मेरे दोस्तों का कहना है कि तुम जिन साहब के घर पर काम करती हैं उनका बेटा जरा खिसका हुआ है।’

और यह भी कह रहे थे कि वह सड़क पर खड़ा होकर कपड़े फाड़ने लगता है। आते-जाते लोगों को गाली-गलौज करने लगता है। एक दोस्त का तो यहाँ तक कहना है कि अगर उसके मन में आ जाए तो वह राह चलते मुसाफ़िर को पत्थर उठाकर मार देता है। ‘मम्मी…! क्या राजा भैया… घर में भी ऐसे ही हरकतें करते हैं।’

‘अरे! नहीं रे रामा…! मुझे तो उसमें कभी कोई ऐसा-वैसा पागलपन देखने में नहीं आया। इतना भर सुनने में आया है कि जबसे उसकी ख़ानदानी जागीर पर किसी दूसरे ने क़ब्ज़ा कर लिया है, तब से वह अक्सर बहकी-बहकी सी बातें करता रहता है। और हाँ! अक्सर अपनी माँ से ‘मुझे चाँद चाहिए… मुझे चाँद चाहिए… की ज़िद करते हुए जरूर सुना है…!’

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १५५ ☆ लघुकथा – वाह रे इंसान! ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा वाह रे इंसान!। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १५५ ☆

☆ लघुकथा – वाह रे इंसान! ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

लक्ष्मी जी दीवाली-पूजा के बाद पृथ्वीलोक के लिए निकल पड़ीं। एक झोपड़ी के पास पहुँचीं, चौखट पर रखा नन्हा- सा दीपक अमावस के घोर अंधकार को चुनौती दे रहा था। लक्ष्मी जी अंदर गईं, देखा एक बुजुर्ग स्त्री छोटी बच्ची के गले में हाथ डाले निश्चिंत सो रही थी। वहीं पास में लक्ष्मी जी का चित्र रखा था उस पर दो- चार फूल चढ़े थे और एक दीपक यहाँ भी मद्धिम जल रहा था। प्रसाद के नाम पर थोड़े से खील – बतासे एक कुल्हड़ में रखे हुए थे।  

लक्ष्मी जी को ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ कहानी की बूढ़ी स्त्री याद आ गई- ‘जिसने जबरन उसकी झोपड़ी हथियानेवाले जमींदार से चूल्हा बनाने के लिए झोपडी में से एक टोकरी मिट्टी उठाकर देने को कहा था। ‘लक्ष्मी जी ने फिर सोचा – ‘बूढ़ी स्त्री तो अपनी पोती के साथ चैन की नींद सो रही है, अब जमींदार का भी हाल लेती चलूँ। ‘

जमींदार की आलीशान कोठी के सामने दो दरबान खड़े थे। कोठी पर दूधिया प्रकाश की चादर बिछी हुई थी। जगह- जगह झूमर लटक रहे थे। सब तरफ संपन्नता थी,मंदिर में भी खान -पान का वैभव भरपूर था। लक्ष्मी जी ने जमींदार के कक्ष में झांका, तरह- तरह के स्वादिष्ट व्यंजन खाने के बाद भी उसे नींद नहीं आ रही थी। कीमती साड़ी और जेवरों से सजी अपनी पत्नी से वह कह रहा था –“एक बुढ़िया की झोपड़ी लौटाने से दुनिया में मेरे नाम की जय-जयकार हो गई। यही तो चाहिए था मुझे, लेकिन गरीबों पर ऐसे ही दया दिखाकर उनकी जमीन वापस करता रहा तो यह वैभव कहाँ से आएगा। एक बार दिखावा कर दिया,बस बहुत हो गया। “ वह घमंड से हँसता हुआ मंदिर की ओर हाथ जोड़कर बोला– “यह धन–दौलत सब लक्ष्मी जी की ही तो कृपा है। “ 

जमींदार की बात सुन लक्ष्मी जी सोच में पड़ गईं।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६९ – लघुकथा – आउटडेटेड ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा – आउटडेटेड)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६९ – लघुकथा – आउटडेटेड ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कभी-कभी परिवार की गर्माहट एक ठंडी हवा की तरह लगती है, जो आपको घर से बाहर धकेल देती है, ठीक वैसे ही जैसे उस छोटे से शहर के नर्सिंग होम में अभी-अभी पहुंचे बुजुर्ग कृष्णदास के चेहरे पर खिली मुस्कान ने सबको हैरान कर दिया, जहां बाकी वृद्ध उदास कोनों में बैठे अपनी यादों से जूझ रहे थे। वहां एक साथी ने हारकर पूछ ही लिया कि ऐसी जगह पर आकर वह इतने खुश कैसे दिख रहे हैं, मानो कोई त्योहार मनाने आए हों, कृष्णदास की हंसी और फैल गई, जैसे कोई पुराना राज खोल रहे हों। उन्होंने बताया कि वह सरकारी दफ्तर से क्लर्क की नौकरी से सेवानिवृत्त हुए हैं, पत्नी को दुनिया छोड़े चार साल बीत चुके, बेटी अब बड़ी कंपनी में मैनेजर है, उसके पति और बच्चों के साथ उनके बनाए उस आलीशान फ्लैट में रहती है, जहां हर कमरा चमकता है, लेकिन वह खुद तो बस एक साधारण क्लर्क थे, उनकी सादगी उस चमचमाती जिंदगी से मेल नहीं खाती।

बेटी की पार्टियों में वह पुराने कुर्ते में फिट नहीं बैठते, उनके पुराने किस्से नए दोस्तों को बोरिंग लगते, और ऊपर से उनकी आदतें जैसे सुबह की चाय खुद बनाना या शाम को पुरानी किताबें पढ़ना, वह सब बेटी के आधुनिक घर में ‘आउटडेटेड’ लगतीं। 

सच तो यह है कि अकेले रहने की सारी काबिलियत उनमें है, अपना खाना बनाना, दवाइयां याद रखना, यहां तक कि छोटी-मोटी मरम्मत भी, लेकिन परिवार ने सोचा कि नर्सिंग होम में वह ‘बेहतर’ रहेंगे, जहां कोई उनकी देखभाल करेगा, व्यंग्य की ठंडक देखिए कि जो घर उन्होंने अपनी हड्डियां गलाकर बनाया, वह अब उनके लिए अनफिट हो गया, जैसे कोई पुराना फर्नीचर जो स्टाइल से बाहर हो गया हो, कृष्णदास हंसते हुए कहते हैं कि यहां कम से कम वह किसी की राह में रोड़ा नहीं बनते, कोई उनका इंतजार नहीं करता, कोई उनकी आदतों पर नाक-भौं सिकोड़ता नहीं, लेकिन जैसे-जैसे बात आगे बढ़ती है, उनकी हंसी में एक हल्की सी कंपकंपी आ जाती है।

वह बताते हैं कि बेटी कभी-कभी फोन करती है, पूछती है ‘पापा ठीक हो न’, लेकिन विजिट करने का वादा हमेशा ‘बिजी शेड्यूल’ में टल जाता है, नाती-नातिन की तस्वीरें व्हाट्सएप पर आती हैं, लेकिन उनके हाथों में वह गर्माहट नहीं, कृष्णदास की आंखें अब चमकने लगती हैं, लेकिन हंसी से नहीं, बल्कि उन अनकहे आंसुओं से जो परिवार की इस ‘देखभाल’ की सच्चाई छिपाते हैं, वह याद करते हैं पत्नी के साथ बिताए वे दिन जब घर में हंसी गूंजती थी, बेटी की शादी का वह पल जब उन्होंने सब कुछ दांव पर लगाया था, लेकिन अब वह घर एक ठंडा महल है जहां उनकी जगह नहीं, सिस्टम की यह क्रूर विडंबना ऐसी है कि बुजुर्गों को ‘आराम’ के नाम पर अलग कर दिया जाता है, जैसे कोई पुरानी किताब को शेल्फ से हटा देना, और जैसे-जैसे शाम ढलती है, कृष्णदास की मुस्कान फीकी पड़ जाती है, वह अकेले में फुसफुसाते हैं ‘मैं योग्य हूं अकेले रहने का, लेकिन क्या परिवार योग्य है मुझे रखने का’, और वह आखिरी हंसी एक करुण सिसकी में बदल जाती है, जब वह पुरानी फोटो देखते हैं जहां बेटी उनकी गोद में खेल रही थी, अब वह गोद सूनी है।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८८ – परहित… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – परहित।)

☆ लघुकथा # ८८ – परहित श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

क्या बात है सब बच्चे चले गए पर यह अचानक देवेंद्र क्यों यहां पर आ पड़ा है क्लास के अंदर जाकर दिवाकर जी ने देखा।

आज घर नहीं जाना क्या?

दिवाकर जी ने जोर से देवेंद्र को उठाया।

हां सर मेरी आंख लग गई थी पता नहीं क्यों अच्छा किया आपने उठा दिया अब मैं घर जाता हूं चलो मैं छोड़ देता हूं तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही है तुम मुझसे क्यों नजरे चुरा रहे हो?

कोई बात नहीं है सर।

तुमने मुंह पर कपड़ा क्यों बांधा है और आंखें भी तुम्हारी लाल लग रही है। कोई कारण और बात हो तो मुझे बताओ?

क्या तुमने नशा किया है?

नहीं सर मैं नशा नहीं किया है.

सब मुझे बेचारा नौकर इस तरह से बोलते हैं मैं गरीब झोपड़ी से आता हूं ना इसलिए लग रहा है आप भी मेरा अपमान करना चाह रहे हैं।

दिवाकर ने कहा – देखो तुम बहाने मत बनाओ और नौटंकी मत करो मुझे सब पता है तुम लोगों ने जरूर बियर पिया है।

यह सुनकर देवेंद्र सन्न रह गया कुछ देर गुमसुम रहा।

और बोल कर यह शराब थोड़ी ना होती है। पर शुरुआत तो ऐसे ही होती है तुम बोल रहे हो कि तुम गरीब हो मेहनत करके तुम्हें कुछ बनना है तो क्या तुम इस तरह बनोगे कॉलेज में आकर अय्याशी करके।

चुपचाप मेरे साथ चलो उसे अपने घर लेकर गए और नींबू पानी पिलाया, दिवाकर जी ने और समझाया अपना काम खुद करना चाहिए दूसरों पर हमें निर्भर नहीं रहना चाहिए और दूसरे क्या करते हैं उस बारे में सोचोगे तो कभी जीवन में कुछ नहीं कर पाओगे मैं तो तुम्हें होनहार और अच्छा बच्चा समझता था थोड़ी देर सो जाओ नशा कम हो जाएगा तब घर जाना अपनी मां बहन को तो दुख मत दो।

मेरा तो तुमने दिल तोड़ा ही है कम से कम उनके मन में तो एक गलतफहमी की ख्वाहिश रहने दो कि तुम उन्हें एक अच्छा जीवन दोगे लेकिन तुम्हारा ही भविष्य अब मुझे अंधकार में दिख रहा है।

सर बस बहुत हुआ। आप मुझे बहुत सूना चुके। देवेंद्र ने कहा।

आप ही इतनी होशियार और आदर्शवादी थे तो क्यों नहीं जज, मजिस्ट्रेट, जज कलेक्टर किसी अच्छी पोस्ट पर चले गए रहते। आप तो हो गए शिक्षक ना और ज्ञान मुझे दे रहे हो इतना परहित करना छोड़ दो अपना भला बुरा मैं स्वयं समझ लूंगा।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ८० – मंत्री द्वारे — द्वारे… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– मंत्री द्वारे — द्वारे…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ८० — मंत्री द्वारे — द्वारे — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

दादी को पता चला शिक्षा मंत्री शिवचरण गाँव में आया है। उसने नाती सुरेश से पूछा, “चुनाव आया है क्या नाती?” चुनाव आया तो था। मंत्री शिवचरण द्वार — द्वार जाने की प्रक्रिया में इस द्वार भी आता। दादी के इस तरह आश्चर्यकित होने का रहस्य वहाँ से था पाँच साल पहले शिवचरण जब यहाँ आया था दादी के पाँवों पर तो बस माथा पटकता था। उसने दादी से वचन लिया था, “मुझे ही वोट देना दादी।”

© श्री रामदेव धुरंधर

25 – 10 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “बासी धूप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “बासी धूप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

हम सभी साथी धूप में बैठे हुए थे। और दिनों की तरह लंच की छुट्टी में। हम हर रोज़ धूप में बैठते हैं। गप्पें हांकते हैं। मन बहलाते हैं। फिर सर्दियों की धूप भला किसे अच्छी नहीं लगती? मीठी धूप , प्यारी धूप , गर्माती हुई धूप , अपनी धूप और बराबर बंटती हुई धूप। आज भी एक गोल दायरे में कुर्सियां डाले हुए हम धूप सेंक रहे थे।

एकाएक चपरासी आया और बड़े साहब का संदेश सुना गया। यों यह संदेश न होकर हुक्म ही था -काला हुक्म। मानों बात न कह कर वह कोई बम फेंक गया हो। हम सभी के मध्य या उठाकर बीच सड़क में फेंक गया हो। निर्ममतापूर्वक किसी ट्रक तले। कुचलने के लिए।

बड़े साहब धूप सेंकना चाहते हैं। उन्होंने संदेश दिया है कि अपनी कुर्सियां यहां से हटा लें। कहीं और बैठ जायें। बड़े साहब धूप सेंकना चाहते हैं ,,,इसलिए हम कहीं और चले जायें। सभी दांतों में चबा चबा कर इसे दुहराते हुए कुर्सियां उठाने लगे थे। पर…धूप बराबर कहां बंट रही थी?

क्या मीठी धूप पर भी बड़े साहबों का ही हक है?

हम लोग बड़े साहबों द्वारा सेंकी जाने के बाद बची बासी धूप के ही हकदार हैं?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २८ – लघुकथा ☆ ~ लेखक की बेशकीमती संपत्ति ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २८ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ लेखक की बेशकीमती संपत्ति ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

लेखक की संपन्नता देखकर कुछ लोग उससे ईर्ष्या किया करते थे। वे लेखक की संपत्ति का आकलन कर पाने में स्वयं को अक्षम पाते थे।

लेखक के परिजन इस बात से बेखबर और मन ही मन निराश रहते थे कि लोग उसके पिता के किस संपत्ति की बात करते हैं। पिता नें मरने के काफी दिनों बाद तक लेखक के पुत्रों में यह चर्चा होती थी कि आखिर उसके पिता नें वह बहुमूल्य संपत्ति कहां छुपा रखी है जिसकी बात अक्सर आम लोगो में होती रहती है।

कुछ रहस्यमयी एवं गूढ चीजों की तलाश में विदेशी विद्वानो एवं राजनायिको का प्रतिनिधि मंडल लेखक के शहर में आया था।

लेखक के घर के चारों तरफ की सुरक्षा कड़ी कर दी गई। आला अधिकारियों आना-जाना शुरू हो गया। घर को पूरी तरह से सरकारी कब्जे में ले लिया गया। घर के सभी लोगों की सिक्योरिटी चेकिंग की जा चुकी थी। लेखक के परिजन अभी इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। इसी बीच उन्होंने किसी अधिकारी को यह कहते हुए सुना कि इस घर के लोगों के पिता के पास एक ऐसी बेशकीमती चीज है, जो शायद विश्व के किसे लेखक के घर या किसी लाइब्रेरी में नहीं है।

कुछ ही घंटे बाद गाड़ियों का काफिला लेखक के घर के सामने आकर रुका। मुश्किल से तीन या चार लोग लेखक के अध्ययनशाला में प्रवेश किये। जिसमें स्थानीय अधिकारी एवं कुछ विदेशी विद्वान थे। लेखक की अलमारी में रखी हुई एक पुस्तक से कुछ पंक्तियों के तस्वीर उतारते हुए, लेखक के घर पधारे प्रतिनिधियों नें लेखक के पुत्र -पुत्रियों से बड़े ही अदब के साथ भेंट की। साथ ही साथ कुछ बेशकीमती चीजे एवं उपहार भेंट करते हुए उनके साथ फोटो भी खिंचवाई।

अगले दिन यह खबर देश-विदेश के अखबार के पन्नों में थी कि अमुख बेशकीमती साहित्यिक दस्तावेज स्वर्गीय फलां (लेखक का नाम) के घर से प्राप्त किए गए। यह वैश्विक साहित्य जगत की बड़ी उपलब्धि है।

लेखक के परिजनों को अब अपनें स्वर्गीय लेखक पिता की वास्तविक संपन्नता का भान हो चुका था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – (१) देट साइड ऑफ़ स्क्रीन (२) दिया, बाती और तेल ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ (१) देट साइड ऑफ़ स्क्रीन (२) दिया, बाती और तेल ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

मराठी अनुवाद : सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे 👉 ☆ दोन अनुवादित कथा – (१) ‘स्क्रीनच्या अलीकडे.. पलिकडे‘ (२) ‘दिवे, वाती आणि तेल’

 

देट साइड ऑफ़ स्क्रीन ☆

अक्सर होता तो यही था कि जब भी कोई विशेष अवसर या त्यौहार होता तो सेवकराम जी और उनकी धर्मपत्नी अनुराधा जी अपने बच्चों के साथ विडियो कांफ्रेंस कॉल कर उस अवसर या त्यौहार का आनंद ले लेते थे. जन्मदिवस किसी का भी हो मोबाईल के सभी स्क्रीन्स पर एक-एक केक होता. एक साथ सभी केक काटे जाते और जन्मदिवस मनाया जाता.

इस बार दीपावली पर्व पर उनके बेटे का विदेश से विडियो कॉल आया. स्क्रीन के दूसरी ओर उनके बेटे बहू के साथ ही उनका आठ साल का बड़ा पोता और दूसरा पोता जो कुछ ही महीनों में दो साल का होने जा रहा था बड़ी उत्सुकता से दीपावली की पूजा देखने लगे. बड़ा पोता कुछ समझदार था और यह सब पहले भी देख चुका था, किन्तु, छोटे पोते को यह सब बड़ा विचित्र लग रहा था. सेवकराम जी ने उन सभी को घर के आसपास के रंगबिरंगी रोशनी से जगमगाते हुए परिदृश्य को दिखाया. छोटा पोता देव बड़े कौतुहल से यह सब देख रहा था. जैसे ही उन्होंने उसे फुलझड़ियाँ जलाते बच्चे और पड़ोस के लोगों को आतिशबाजी करते हुए दिखाया तो देव की आँखों में कौतुहलवश अद्भुत चमक दिखाई दी. वे अकस्मात ही देव से बोले – “Next year we all will celebrate Diwali in India.”

देव थोड़ी देर चुप रहा. फिर अत्यंत कौतुकता से दिवाली की रंगबिरंगी जगमगाती रोशनी और आतिशबाजी देखते हुए उनसे बोला – “No Grandpa.. I would like to come to that side of screen just now..”

वह स्क्रीन के इस ओर आने की जिद के साथ रोने लगा. सेवकराम-अनुराधा और बेटा-बहू असहाय एक दूसरे की ओर देखते रह गए और थोड़ी ही देर में विडियो कॉल कट गया.  

☆ दिया, बाती और तेल ☆

पुन्य सलिला नदी के तट, जिन्हें आज कल रिवर-फ्रंट कहते हैं, देखते ही बनते हैं. सेवकराम जी अक्सर प्रातःकाल पास के बगीचे में और कभी कभी शाम के समय उसी रिवर फ्रंट पर अपने समवयस्क वरिष्ठ नागरिक मित्रों के साथ टहलने चले जाया करते हैं.

नदी के तट अब पहले जैसे प्राकृतिक नहीं रह गए. सुन्दर हरे भरे तटों का स्थान अब सपाट पार्क / मैदान और कंक्रीट की चौड़ी सडकों ने ले लिया है. पुण्य सलिला नदी के तट के प्राचीन मंदिर से मुख्य सड़क तक तीर्थ यात्रियों/पर्यटकों के लिए वाणिज्यिक कॉरिडोर बन गया था. मंदिर के सामने नदी के तट की सीढ़ियों पर अब संध्या की विशाल आरती होने लगी थी.

समय के साथ हो रहे परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए ऐसा सभी का मानना है.

प्रतिदिन प्रातः और संध्या वेला में दिया बाती लगभग सभी घरों में एक अध्यात्मिक एवं सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है. नदी के दोनों ओर बसे घर-मंदिरों के दीपक और कृत्रिम तथा आधुनिक विद्युत् प्रकाश से जगमगाने लगते हैं. नदी के तट पर बैठ कर नदी की लहरों पर इस झिलमिलाते हुए प्रकाश को देखने का अपना ही आनंद है.

सोशल मीडिया और स्थानीय समाचार पत्रों के माध्यम से पता चला कि इस बार रिवर-फ्रंट पर लाखों की संख्या में दीप जलाकर विश्व रिकॉर्ड बनाने की तैयारियां चल रही है. हरिलाल भाई काफी जिद कर रहे थे कि हमें इस वेला का साक्षी बनने का अवसर हाथ से नहीं छोड़ना चाहिए. रात्रि दस से ग्यारह बजे के मध्य इस कार्यक्रम को संपन्न होना था और तब तक लोग घर की पूजा भी संपन्न कर ही लेते हैं.

तय समय पर हरिलाल भाई और सेवकराम जी नदी तट पर पहुँच गये. सुरक्षा व्यवस्था काफी चाक-चौबंद थी. काफी भीड़ थी. कई लोग स्वेच्छा से अपनी सेवायें दे रहे थे. छोटे छोटे समूह में आयोजकों ने दीपकों को सजाकर रखा था. तय समय पर दीप प्रज्वलित किये गए. साथ ही आकाश में ड्रोन कैमरे प्रकट हो गए. उन्होंने उन लाखों दीपकों के विभिन्न कोणों से विडियो और चित्र लिए और थोड़ी ही देर में विश्व रिकॉर्ड बनने की घोषणा की गई. इसी के साथ ही जयघोष प्रारंभ हो गया और कार्यक्रम के संपन्न होने की घोषणा भी हो गई.

हरिलाल भाई और सेवकराम जी ने भी आपस में एक दूसरे को इस क्षण के साक्षी होने के लिए बधाई दी. वे वापिस जाने के लिए दीपकों के समूह के बीच से जाने को तत्पर हुए तो वहां का दृश्य देख कर सन्न रह गए.

समय के साथ ही दीपक बुझने लग गए थे और तट की सुरक्षा व्यवस्था के हटते ही कुछ नर नारियों और बच्चो का हुजूम दीपकों पर टूट पड़ा. वे अपने साथ लाए गए पोलिथीन की थैलियों में दीयों का तेल उड़ेल रहे थे.

सेवकराम जी और हरिलाल भाई एक दूसरे को हतप्रभ देखने लगे.

विश्व रिकॉर्ड बन चुका था. पॉलिथीन की थैलियों में दीयों का तेल भरने वाले नर नारियों बच्चों को विश्व रिकॉर्ड से कोई लेना देना नहीं था. शायद इस तेल से उनके घरों में कुछ दिनों का खाना बन जायेगा. आसपास का उमंग भरा वातावरण शोरगुल में खो चुका था और ड्रोन विडियो और चित्र लेकर अपने कैमरामेन की ओर वापिस जा रहे थे.

©  हेमन्त बावनकर  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ नई सुबह ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

जगत सिंह बिष्ट

(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)

☆ कथा कहानी ☆ नई सुबह ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

भोर की पहली किरण धरती पर उतर रही थी। हवा में ठंडक थी और खेतों पर ओस की बूँदें चमक रही थीं। टोपी और छड़ी लिए गांव के बुजुर्ग धनीराम अपनी रोज़ की सैर पर निकले थे। रास्ते के किनारे अचानक उन्होंने देखा—एक युवक मिट्टी पर औंधा पड़ा है। उसके पास एक भूरा, दुबला कुत्ता चौकन्ना बैठा था, जैसे उसकी रखवाली कर रहा हो।

 

सूरज की किरण जब युवक के चेहरे पर पड़ी, तो कुत्ते ने उसकी नाक के पास सूंघकर एक गरम बौछार छोड़ दी। युवक कराहा, होंठ खुले, कुछ बूंदें भीतर चली गईं। उसने बड़बड़ाया—“और डालो रे, एक और पैग!”

 

धनीराम ठिठक गए। पास जाकर देखा—यह तो पारगांव का पंकज है! अच्छे किसान परिवार का लड़का, पर हाल के दिनों में बुरी संगत में पड़ गया था। उन्होंने छड़ी से कुत्ते को हलका इशारा किया और बोले—

“उठ भुला, घर जा। तेरी ईजा तेरे लिए रातभर जाग रही होगी।”

पंकज ने आंखें मलते हुए चारों ओर देखा। सिर भारी था, मुंह कसैला। कल रात के नशे और दोस्तों की हंसी-मजाक की धुंधली यादें दिमाग में तैर गईं। वह धीरे-धीरे उठा, लड़खड़ाते कदमों से घर की ओर बढ़ा। कुत्ता उसके पीछे-पीछे चला।

 

घर पहुंचा तो मां मवेशियों को चारा डाल रही थी। आंगन में चिड़ियां चहचहा रही थीं। पंकज चुपचाप दहलीज पर बैठ गया। सिर झुका हुआ, चेहरा अपराधबोध से भरा। कुत्ता उसके पैरों के पास बैठा पूंछ हिलाने लगा।

मां ने देखा, पर कुछ नहीं कहा। न ताना, न डांट। बस थाली में दो रोटियां रख दीं। वही मौन, वही करुणा—जिसकी आवाज़ शब्दों से कहीं अधिक गहरी होती है।

पंकज ने एक रोटी का टुकड़ा तोड़कर कुत्ते के आगे डाल दिया, फिर बोला—

“चल साथी, खेत चलते हैं।”

 

दिनभर खेत में वही रहा। धान की बालियां हवा में झूम रही थीं, जैसे प्रभात की प्रार्थना कर रही हों। पसीना बहता गया, और हर बूंद के साथ भीतर की गंदगी भी धुलती गई।

दोपहर में दाल-चावल खाया, और उसी कटोरे में कुत्ते को दूध में चावल मिलाकर दिया। दोनों ने साथ भोजन किया।

शाम को जब घर लौटा, तो मां शांत थी। दीपक की लौ स्थिर थी।

पंकज ने उस मौन में वह पुकार सुनी, जो किसी प्रवचन में नहीं मिलती—मां की मूक क्षमा की पुकार।

 

रात हुई। पंकज के भीतर फिर बेचैनी उठी। दरवाजे की ओर बढ़ा ही था कि कुत्ता उछलकर उसकी पैंट पकड़ लेता है—बिना भौंके, बिना गुर्राए, बस रोकता है।

उसकी आंखों में जैसे लिखा था—“अब नहीं, बस अब लौट चल।”

 

पंकज ठिठक गया। मां का चेहरा आंखों के आगे घूम गया।

वह लौट आया, चुपचाप थाली में बैठा, खाना खाया और कुछ कौर कुत्ते को दिए।

रात गहरी थी, पर मन में एक अजीब-सी शांति थी।

 

सुबह पक्षियों की मधुर बोली ने उसे जगाया। सूरज की किरणें कमरे में उतर आई थीं। उसने शुद्ध जल से मुंह धोया, कुल्ला किया, आंखों में बूंदें डालीं।

तभी मां की आवाज़ आई—

“बेटा, बछिया को घास डाल दे, दूध दुहने का समय हो गया।”

 

पंकज मुस्कुराया—वह मुस्कान जो भीतर से आती है।

उसने कुत्ते के सिर पर हाथ फेरा और बोला—

“चल साथी, आज सच में नई सुबह है।”

 

दोनों खेत की ओर चले—एक प्राणी, जिसने अपने मालिक को जगाया; और एक मनुष्य, जिसने खुद को पाया।

गांव की गलियों में रोशनी फैल चुकी थी।

 

©  जगत सिंह बिष्ट

इंदौर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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