हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११६ – टूटता हुआ घर ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – टूटता हुआ घर।)

☆ लघुकथा # ११६ – टूटता हुआ घर श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

संध्या धीरे-धीरे रात की बाँहों में समा रही थी। आँगन में रखे तुलसी चौरे का दीपक टिमटिमा रहा था। हल्की हवा में चमेली की भीनी सुगंध घुली थी, पर घर के भीतर वातावरण भारी और उदास था।

रसोई में खड़ी सविता दर्द से कराहते हुए भी चुपचाप खाना बना रही थी। सुबह से पैरों में सूजन थी, शरीर बुखार से तप रहा था, लेकिन पति और परिवार की चिंता में उसने अपनी तकलीफ़ को जैसे भीतर ही कैद कर लिया था।

चूल्हे की आँच से उसका चेहरा लाल हो गया था। माथे से पसीने की बूंदें लगातार टपक रही थीं।

उधर बैठक में बैठे उसके पति विकास बार-बार घड़ी देख रहे थे। स्वभाव से वह अत्यंत गुस्सैल और अहंकारी थे। उन्हें ज़रा-सी देरी भी बर्दाश्त नहीं होती थी।

सविता ने थरथराती आवाज़ में कहा—

“खाना तैयार है…”

बस इतना सुनना था कि विकास भड़क उठे।

“अब याद आया खाना? क्या कर रही थी इतनी देर से?”

उन्होंने क्रोध में भरी गरम दाल की थाली उठाकर ज़ोर से फर्श पर फेंक दी।

थाली पलट गई।

उबलती दाल पास खड़ी सात वर्ष की बेटी गुड़िया के हाथ और चेहरे पर गिर गई।

“माँऽऽ…!”

उसकी दर्दभरी चीख पूरे घर में गूँज उठी।

सविता का कलेजा काँप गया।

वह बदहवास होकर बेटी को सीने से चिपकाए अस्पताल की ओर भागी।

डॉक्टर मरहम लगाते हुए बोले—

“जलन तो ठीक हो जाएगी… लेकिन बच्ची बहुत डर गई है।”

गुड़िया लगातार काँप रही थी।

उसकी छोटी-सी उँगलियाँ माँ का आँचल कसकर पकड़े थीं।

सविता की आँखों से आँसू बहते रहे।

शायद दर्द बेटी के हाथ से ज्यादा उसके अपने हृदय में था।

रात गहरा चुकी थी। घर लौटकर वह चुपचाप बरामदे में बैठ गई।

पास ही बैठी दादी सब देख रही थीं। उनकी बूढ़ी आँखों में अनगिनत प्रश्न तैर रहे थे।

उन्होंने मन ही मन सोचा—

“कैसा दुर्भाग्य है… लोग मंदिरों में सिर झुकाते हैं, रामायण-महाभारत देखते हैं, पर अपने भीतर बैठे रावण को नहीं पहचानते।”

इतने में दरवाज़ा खुला।

विकास भीतर आए।

चेहरा बुझा हुआ था। हाथ में कुछ कागज़ थे और आँखों में टूटा हुआ अभिमान।

माँ ने धीरे से पूछा—

“क्या हुआ बेटा?”

विकास कुर्सी पर ढहते हुए बोले—

“आज मेरा प्रमोशन रुक गया…

बॉस ने साफ कह दिया—

‘जिस इंसान को अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं, वह दूसरों का नेतृत्व नहीं कर सकता।’”

कमरे में सन्नाटा फैल गया।

माँ उठीं, बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—

“बेटा…अहंकार इंसान से पहले उसका सुख छीनता है, फिर अपनों का विश्वास… और अंत में उसका सब कुछ।”

फिर उनकी भर्राई आवाज़ कमरे में गूँज उठी—

“अहंकार की आग में, जल जाते संबंध, रावण जैसा ज्ञान भी, नहीं बचा पाया वंश।”

विकास की नज़र धीरे-धीरे गुड़िया के जले हाथों पर गई…

फिर सविता के सूजे पैरों पर…

और अंत में अपने हाथ में पकड़े अस्वीकृत प्रमोशन पत्र पर टिक गई।

उन्हें पहली बार एहसास हुआ—

आज उनका प्रमोशन नहीं रुका था…

आज उनका घर टूटते-टूटते बचा था।

उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

वह धीरे से सविता के पास गए और काँपती आवाज़ में बोले—

“सविता… मुझे माफ़ कर दो…

मैं अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि तुम्हारा दर्द भी नहीं देख पाया।”

सविता ने कुछ नहीं कहा।

बस उसकी आँखों से बहते आँसू वर्षों से दबे दर्द की कहानी कह रहे थे।

उधर तुलसी चौरे का दीपक अब भी जल रहा था—

धीमा, शांत…मानो टूटते रिश्तों को फिर से रोशनी देने की प्रार्थना कर रहा हो।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – बुत युग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बुत युग ? ?

सारे बदहवास थे। इस तरह की बीमारी इससे पहले न देखी, न सुनी। उस लेटे हुए आदमी के अंग एक-एक कर धीरे-धीरे पत्थर होते जा रहे थे।

अचानक एक औरत की चीख सन्नाटे को चीरने लगी। एक आदमी बालों से पकड़कर औरत को लात, मुक्कों से बेदम मार रहा था। वह चीख रही थी, मदद की गुहार लगा रही थी। भीड़ चुप थी। आदमी ने हैवान की मानिंद चाकू से कई वार औरत पर किए।

औरत अब लोथड़ा थी। आदमी जा चुका था। भीड़ मर चुकी थी।

उधर शोर उठा, ‘अरे आदमी बुत में बदल गया, आदमी बुत में बदल गया।’ लेटा हुआ आदमी ऊपर से नीचे तक पूरा पत्थर हो चुका था।

बुत युग की यह शुरुआत थी।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६७ – शोभा की सुंदरता ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा शोभा की सुंदरता ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६७  ☆

🌻लघु कथा🌻 शोभा की सुंदरता 🌻

आज सुबह शोभा कार्यक्रम का वीडियो बना रही थी। सामने मोबाइल पर अपना चेहरा देख अंर्तमन से आवाज आई– अब तुम बूढ़ी हो चली। सफेद होते केश झुर्रियाँ लटकते गाल, शिकन पड़े ललाट और होठों पर बरसों की चुप्पी साधे। वह घटना जिसने उसके मुस्कान पर ताला लगाया।

जीना तो सीखा, धैर्य सहनशीलता की मूरत बन पति का असमय संग छोड़ जाना, पूरा कारोबार संभाला, बच्चों की परवरिश करते उसने हिम्मत और हौसला बुलंद रखा।

मोबाइल का स्क्रीन बंद करते हुए वह बोल पड़ी— अब मैं बूढ़ी हो चली। सामने बैठी सहेली उठी धीरे से मुस्कुराया और उसने शोभा के उलझे बंधे लटों को खोल होठों पर लाली लगाई और छोटी सी लाल बिंदी माथे पर लगा बोली– शोभा कभी बूढ़ी नहीं होती। चाहे सृष्टि हो, सरिता हो, सृजन हो, प्रकृति हो, पूजन हो, धर्म हो, कर्म हो, अपने हो, सपने हो, खुशियाँ हो और हरियाली हो, कल आज और कल शोभा न कभी बूढ़ी हुई है और न कभी होगी।

उसकी सुंदरता सदैव रहती है तुम वही शोभा हो। दोनों एक दूसरे के गले लग मुस्कुरा उठी।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३७ ☆ कथा-कहानी – समाधान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘समाधान‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३७ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ समाधान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

रोज़ शाम को शुभा का इंतज़ार होता है। पांच बजे के बाद दरवाज़े पर आहट होने पर सबकी  निगाहें इसी उम्मीद के साथ उठती हैं कि दरवाज़े पर शुभा होगी।

दो महीने पहले शुभा की नियुक्ति एक सरकारी महाविद्यालय में  व्याख्याता के पद पर हुई थी। नियुक्ति में कोई दिक्कत नहीं हुई। परेशानी तब हुई जब पोस्टिंग ऐसे  महाविद्यालय में हुई जो शहर से करीब साठ मील दूर था। अब रोज़ सुबह आठ बजे तीन चार मील दूर स्टेशन जाना पड़ता है। उसके बाद दो घंटे की ट्रेन यात्रा के बाद महाविद्यालय पहुंचना पड़ता है। फिर भी अपने पैरों पर खड़े होने और समाज में अपनी जगह बनाने के ख़याल से अच्छा लगता है। शुभा का संसार अब बड़ा हो गया है। समाज में अब उसकी हैसियत बन गयी है। अभी ट्रेन में अकेले यात्रा करने की आदत नहीं थी। शुरू शुरू में काफी मुश्किल महसूस होती थी। सिमट सिकुड़ कर यात्रा पूरी करनी पड़ती थी। कभी किसी के  उड़ते हुए फ़िकरे को सुनकर अनसुना करना पड़ता था। फिर धीरे-धीरे आदत होने लगी। शुभा को भी लगने लगा कि सब कुछ इतना ख़तरनाक नहीं होता जितना  दूर से महसूस होता है।

संबंधियों, पड़ोस और नगर में अब शुभा का अपना वजूद है। कहीं आयोजनों, कार्यक्रमों में जाती है तो लोगों की निगाहें उसकी तरफ उठतीं और टिकतीं हैं। उसकी बात कान देकर सुनी जाती है। परिवार में भी उसकी बात लगभग निर्णयात्मक होती है।

लेकिन ज़िन्दगी का रास्ता हमवार नहीं होता। एक शाम शुभा लौटी, लेकिन रोज़ की तरह नहीं। जब लौटी तो ख़ामोश, चेहरे पर परेशानी। घर में आकर बिना किसी से बात किये पलंग पर लेट गयी। सब हतप्रभ। मां के प्राण हलक में आये। कौन सी मुसीबत आयी?

पूरा घर से शुभा के आसपास इकट्ठा हो गया। सब तरफ से चिन्तित सवाल। पूछताछ से पता चला कि कुछ लड़के थे जिन्होंने लौटते में पूरे रास्ते शुभा को तंग किया। पूरे रास्ते फ़िकरेबाज़ी। अपने स्टेशन तक पहुंचना पहाड़ हो गया। डिब्बे के सारे यात्री तटस्थ बने रहे। कुछ ऐसे भी थे जो ख़ुद शरीफ़ बने स्थिति का आनंद लेते रहे। अब शुभा भयभीत थी। पता नहीं वे लड़के कहां के थे। उन्होंने अगर उसे ही लक्ष्य बनाकर रोज़ परेशान करना शुरू कर दिया तो आना जाना संकट का काम हो जाएगा।

उसकी रिपोर्ट सुनकर घर के सभी बड़े लोग अपराध-बोध से ग्रस्त हो गये। सभी को लगा लड़की से नौकरी करा के गलती की। सदियों से लड़कियां घर में बैठती रही हैं। सिर्फ शादी करके दूसरे के घर की शोभा बनती रही हैं। अगर शुभा भी नौकरी न करती तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता। जिन  जिन सदस्यों ने पहले शुभा की पीठ ठोंकी थी उन्हें लगने लगा कि उनसे गलती हो गयी।

सबसे पहले टिप्पणी शुभा के बूढ़े दादाजी की तरफ से आयी। वे शुरू से ही लड़कियों की नौकरी के खिलाफ थे। उन्होंने अपना गुस्सा बेटे-बहू पर उतारा। तमतमाकर बोले, ‘हमने पहले ही कहा था कि लड़कियों को घर में ही रखो, लेकिन तुम्हें तो लड़कियों की कमाई से घर भरने की पड़ी है।’

बेटा-बहू चुप, जैसे चोरी करते पकड़े गये हों। शुभा फिलहाल अकेले यात्रा करने को तैयार नहीं है। मन में भय बैठ गया है, उससे मुक्ति पाने में समय लगेगा।

मां पति से पूछती हैं, ‘शुभा का ट्रांसफर अपने शहर में नहीं हो सकता?’

शुभा के पिता पहले ही अपने पिता की डांट खाकर झल्लाये हैं। खीझ कर कहते हैं, ‘ट्रांसफर रातोंरात नहीं होते। रातोंरात ट्रांसफर उनके होते हैं जिनकी लंबी पहुंच होती है। अपनी बेटी की तो नौकरी लग गयी, यही बहुत समझो।’

शुभा छुट्टी लेकर घर बैठ गयी है। फिलहाल कुछ सोचना नहीं है। पिता कई बार कह चुके हैं, ‘बेटा, नहीं चलती तो छोड़ो नौकरी वौकरी। तुम्हारे नौकरी न करने के बावजूद गृहस्थी  तो चलेगी ही। अभी हमारे हाथ  पांव चलते हैं।’ लेकिन उनकी आवाज़ में दम नहीं है। शुभा की तनख्वाह से घर में रौनक आयी है। घर के अविवाहित बच्चों की कमाई ज़्यादातर चमक-दमक और शौक पूरे करने में जाती है, इसलिए उसका असर तत्काल दिखायी पड़ता है। अब बेटी घर में बैठी है इसलिए वीर-भाव के प्रदर्शन के बावजूद पांव के नीचे से खिसकती ज़मीन का एहसास होता है।

शुभा के दादाजी एकदम तुले हैं कि नौकरी से तत्काल इस्तीफा दे दिया जाए और शुभा के पिता उनसे कन्नी काटते घूमते हैं। घर में चूहा- बिल्ली का खेल चलता है। दादाजी पुराने ज़माने के, आज की ज़मीन से कटे हैं। उनके पुत्र सारी मान्यताओं और परंपराओं के बावजूद आज के दबावों को समझते हैं।

इस बीच शुभा के पिता कॉलेज के प्रिंसिपल से मिल आये हैं। वहां से कोई उत्साहवर्धक जवाब नहीं मिला। प्रिंसिपल ने कहा, ‘नौकरी करना है तो कुछ दिक्कतें उठानी पड़ेंगीं, कुछ रिस्क लेना पड़ेगा। आप उन लड़कों के बारे में जानकारी दे सकें तो मैं पुलिस में रिपोर्ट करा दूंगा।’ शुभा के पिता को लड़कों की कुछ जानकारी मिली थी, लेकिन वे बड़े झमेले में नहीं फंसना चाहते थे। पूरे रास्ते पुलिस उनकी बेटी की चौकीदारी करने से रही।

चार-छ: दिन गुज़रने पर विचार बदलने लगे। शुभा को भी कुछ अटपटा लगने लगा और घर के लोगों के स्वर बदलकर कुछ ऐसे हो गये कि लंबी छुट्टी लेना ठीक नहीं है। नयी नौकरी है, कोई अड़चन आ सकती है। मोटी तनख्वाह वाली  नौकरी पर इस तरह लात मार देना अक्लमंदी की बात नहीं।

तय हुआ कि शुभा का छोटा भाई मुन्नू उसके साथ रोज़ सफर करेगा। पुरुष का होना ज़रूरी है, भले ही छोटा भाई हो। घर के वातावरण को देखते हुए मुन्नू ने मना नहीं किया। अब फिर शुभा की कॉलेज यात्रा शुरू हो गयी। तीन-चार दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा, फिर मुन्नू ने असहयोग शुरू कर दिया। कहा, ‘सब कुछ तो ठीक चल रहा है। फालतू मुझको इतनी दूर दौड़ना पड़ता है।’ उसने जानबूझ कर हीला-हवाला करना शुरू कर दिया। कभी सो कर उठने में घंटों लगाता, कभी बाथरूम में घुसकर समाधि लगा लेता।

तीन-चार दिन बाद उसने विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया। अब यह व्यर्थ का काम उसके वश का नहीं। उसका पूरा दिन नाश हो जाता है। पढ़ाई लिखाई का नुकसान अलग होता है। शुभा के माता-पिता के सामने फिर समस्या खड़ी हुई। आज के ज़माने में बेटी के साथ रोज़ जाने वाला कौन है, और फिर हर किसी पर भरोसा कैसे किया जाए? किसी पराये व्यक्ति के साथ रोज़ जाने पर लोगों को टिप्पणी करने का मौका मिलता है।

मुन्नू के मना करने के बाद शुभा के पिता ने दो-तीन दिन की छुट्टी ली। लेकिन अब शुभा को इस इंतज़ाम से कष्ट होने लगा। पहले  मुन्नू कॉलेज के आसपास वक्त गुज़ारने के लिए निरर्थक घूमता था, अब पिता कॉलेज के किसी कोने में बैठकर ऊंघते थे। कॉलेज के लोगों के सामने कैफियत देते शुभा को शर्म आती थी। और भी शिक्षिकाएं थीं जो निर्द्वंद्व आती जाती थीं और वे कभी रास्ते में हुई दिक्कतों का रोना नहीं रोती थीं। ऐसी भी शिक्षिकाएं थीं जो अकेले शहर में कमरा लेकर रह रही थीं और फिर भी कभी कोई शिकायत नहीं करती थीं।

पिता तीसरे दिन शुभा के साथ जाने की तैयारी कर रहे थे कि शुभा ने उन्हें रोक दिया, कहा, ‘मैं चली जाऊंगी। आप अपनी नौकरी पर जाइए।’

पिता अचकचाये, बोले, ‘बेटा रास्ते में फिर कुछ गड़बड़ हुआ तो?’

शुभा ने संयत स्वर में जवाब दिया, ‘चिन्ता छोड़ दीजिए। वहां प्रिंसिपल हैं, पुलिस है, इतने सारे साथी हैं। फिर ये छेड़छाड़ करने वाले किस सीमा तक जाएंगे यह मेरी समझ में आ गया है। मैं आराम से वापस लौट आऊंगी।’

बहुत दिनों बाद पिता के मन से एक भारी बोझ हटा। धूप का एक टुकड़ा जो इतने दिनों तक ग़ायब था, फिर घर में कौंध कर उसे रौशन कर गया।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०९ – श्रद्धा सुमन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– श्रद्धा सुमन…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०९ — श्रद्धा सुमन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

भारतीय आप्रवासी मजदूरों में से बहुतों ने मॉरिशस में साहसिक जीवन शैली की छाप छोड़ी थी। मैंने उन पर आधारित खूब लिखा है। मैं अपने शब्द लेखन को उनके प्रति श्रद्धा सुमन मानता हूँ। आज मैं आप्रवासी भारतीय मजदूर हल्कू को शब्दों का श्रद्धा सुमन समर्पित कर रहा हूँ। जवान अविवाहित हल्कू बिहार से आया था। वह बेल्ज़ामें नाम के आततायी फ्रांसीसी गोरे जमींदार का बंधुआ सा मजदूर था। उसने किसी तरह युक्ति से बेल्ज़ामें की हत्या की और दूसरे इलाके में भाग गया। उसने वहीं बस कर शादी कर ली। नब्बे बरस के बुढ़ापे में उसकी मृत्यु के दिन उसकी पत्नी ने कहा उसे मालूम था वह एक नीच को जान से मार कर यहाँ आया था। इतने बरस दर बरस दोनों समानता के स्तर पर बड़े ही प्रेमल पति पत्नी हुए। आज जाने वाला उसका पति उसके लिए देवता बन कर चला। इनकी संतान नहीं थी।

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “यह कैसा स्वागत ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “यह कैसा स्वागत ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

अस्पताल में एक उच्च पद पर कार्यरत महिला ने बच्ची को जन्म दिया । अस्पताल की सबसे सीनियर महिला डाॅक्टर आई और उस।अधिकारी को बुरा सा मुंह बना कर कहने लगी-हमने सोचा था कि आप पढ़ी लिखीं हैं और आपने अल्ट्रासाउंड करवा रखा होगा । पर हमें क्या मालूम था कि आपने भगवान् भरोसे सब कुछ छोड़ रखा है ।

महिला अधिकारी चौंकी । फिर पूछा -यदि मैंने पहले से सब कुछ करवा रखा होता तो फिर क्या फर्क पड़ता?

– कम से कम हमारे स्टाफ को तो इनाम मिल जाता । महिला डाॅक्टर ने बड़ी बेशर्मी से कहा ।

– बस । इसी कारण आपने मेरी नवजात बच्ची का स्वागत् नहीं किया ?

– हां । हमारे स्टाफ को कुछ ऐसी ही उम्मीद थी आपसे ।

– कोई बात नहीं । आप स्टाफ को बुलाइए ।

सारा स्टाफ आ गया और महिला अधिकारी ने सबको इनाम दिया लेकिन उसके बाद अपने पति को बुलाकर अपना सारा सामान समेट लिया । पति ने पूछा -ऐसा क्यों कर रही हो ?

महिला अधिकारी ने पति के गले लगकर रोते कहा -इस अस्पताल में मैं एक पल और नहीं रहूंगी क्योंकि इन लोगों ने मेरी बच्ची का स्वागत् नहीं किया ।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५४ – लघुकथा ☆ पिता की चिंता ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५४ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ पिता की चिंता ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

ट्रेन में बड़ी भीड़ थी, लेकिन देवीदयाल को अपनी बिटिया के घर जाना जरुरी था। बेटी की ससुराल की तरफ से आयी एक खबर ने देवी दयाल को डरा दिया था । उन्हें हर हाल में आज ही अपनी बेटी की ससुराल जाना था । ट्रेन में बहुत भीड़ थी, लेकिन उन्हें हर हाल में ट्रेन पर चढ़ना ही था।

आइए बाबूजी, आप ऊपर आ आइए,यह कहते हुए उस युवक ने देवीदयाल की बांह को पकड़कर ट्रेन के अंदर खींच लियाl बाबूजी आपने अपने इन्हीं हाथों से सुधा का हाथ मेरे हाथ में दिया थाl आप सुधा की चिंता मत कीजिए, उसे कोई भी इस घर से निकाल नहीं सकताl अब वह मेरे पास ही रहेगीl देवीदयाल ने युवक के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,बेटा..मेरी यात्रा का उद्देश्य पूरा हो गया, अब अगले स्टेशन पर उतर जाऊँगाl

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कथा कहानी ☆ चरित्रहीन ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंकविता , विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “चरित्रहीन“.)

 ☆ कथा कहानी ☆ चरित्रहीन ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

क्या जमाना आ गया! घोर कलयुग ! इसी को कहते हैं कि कलयुग अपने चरम सीमा पर चल रहा है ! क्या हो गया दादू ? अचानक आपको कलयुग का  याद कहाँ से आने लगा. बबलू ने दादू से पूछा. दादू यानी चौधरी रमाशंकर जी. अस्सी साल की आयु पार कर चुके हैं, वास्तविक आयु कितना है, कोई नहीं जानता, लेकिन बच्चे से लेकर बूढ़े तक, सब लोग इनको दादू ही कहते हैं और आप का बड़ा सम्मान करते हैं.

हाँ तो बात हो रहा था, कलयुग का, दादू का परिचय देने में मैं रह गया और बबलू का प्रश्न पीछे  छूट गया. बबलू ने फिर पूछा कि दादू क्या हो गया कि आप को कलयुग याद आ गया. चौधरी जी ने एक गहरा  सांस लिया और बोले कि क्या बताऊँ बेटा, अब कहने को रह ही क्या गया है. बबलू बोला नहीं दादू आपको बताना तो पड़ेगा ही. चौधरी बोले बेटा देखो पंडित रघुराज जी के परिवार के किसी बहु बेटियों  को कभी घर से बाहर अकेले निकलते किसी ने देखा है क्या ? बबलू थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला कभी ध्यान तो नहीं दिया है, लेकिन देखा भी नहीं है.

अभी ये बातें हो ही रहा था कि रमापति बाबू भी आ गए. उन्होंने दादू का प्रश्न सुना तो रुक गये, बोले लेकिन आप यह प्रश्न पूछ ही क्यों रहें हैं, ऐसा क्या कर दिया उनके परिवार के महिलाओं ने. दादू बोले कि चिंता का विषय तो है ही , देखिये पडिंत रघुराज जी के देहांत के बाद उनकी बहु और बेटियों  को जब देखिये वे घर से बाहर निकल जाती हैं और देर रात को वापस आतीं हैं. पता नहीं कहाँ जातीं हैं और क्या- क्या करतीं हैं. रमापति बाबू ने कहा कि कहीं जाती होंगी, कोई काम रहता होगा. लेकिन जब दादू ने अपनी बात पुनः दोहरायी तो रमापति बाबू  उनके कहने का अर्थ कुछ-कुछ समझने लगे.

रमापति बाबू ने कहा कि दादू आप आधी बात कह रहे हैं. पंडित रघुराज जी के देहांत के उपरांत, उनका जवान बेटा, आनन्द का  कोविड से देहांत हो गया. परिवार में आनन्द ही एक मात्र कमाने वाला था. सरकार ने कुछ सहायता किया , लेकिन उससे कितना दिन काम चलता ! तो परिवार आर्थिक रूप से बहुत ही कठिन समय से गुजर रहा है. मैं आप से एक बात पूछता हूँ कि क्या हममें से कोई एक बार भी जा कर उनके परिवार से उनकी आर्थिक कठिनाईयों के बारे में पूछा, किसी ने कोई सहायता किया. आज महंगाई के जमाने में हर व्यक्ति किसी प्रकार से अपने परिवार का ही खर्चा चला पा रहा है, तो वह दूसरे की सहायता क्या करेगा. मैं आप ही से पूछता हूँ , आप तो पंडित जी के बहुत ही घनिष्ठ परिवारिक मित्र रहे हैं, आप ने क्या किया. दूसरी बात इस प्रकार से रोज- रोज दूसरों से सहायता की प्रतिक्षा करने की जगह, अगर उनके परिवार के महिलाओं ने ख़ुद ही पैसा कमाने का प्रयास किया है और अपने पैरों पर खड़े होने का संकल्प लिया  है, तो हमें उनके इस बात की प्रशंसा करनी चाहिए न कि उनके चरित्र पर किसी प्रकार का संदेह करना. वे पढ़ी लिखी महिलायें हैं, हमें उनके चरित्र पर अनावश्यक संदेह या प्रश्न नहीं करना चाहिए. आखिर हम अपनी लड़कियों को क्यों पढ़ाते हैं?

रमापति बाबू ने फिर आगे पूछा कि आप ने यह धारणा क्यों बना रखा है कि जो महिलाऐं अकेले घर से बाहर निकलतीं हैं, उनका चरित्र ठीक नहीं होता या उनके चरित्र पर संदेह किया जा सकता है. चरित्रवान होना या चरित्रहीन होना, एक बिल्कुल अलग विषय है. आखिर कब तक हम अपनी घर की माँ, बहन व बेटियों को अपंग बना कर रखेंगे. वास्तव में हम सबको यह प्रयास करना चाहिए कि हमारे घर की महिलाऐं, चाहे वह कोई भी हों, वे हर तरह से सशक्त होनी ही चाहिए. नौकरी करना या न करना, यह निर्णय उन  पर छोड़ दें, लेकिन अगर  वह नौकरी करना चाहती है, तो मना न करें. परन्तु अगर  किसी कारणवश वह नौकरी  नहीं करना चाहती है, तो उसे नौकरी करने के लिए बाध्य भी न करें. लेकिन वे घर से बाहर अकेले जातीं हैं, इस कारण से उनके चरित्र पर संदेह करना बहुत ही  गलत है.

दादू के चेहरे के भाव से ऐसा लग रहा था कि वे रमापति बाबू के बातों से सहमत नहीं थे. उन्हें पंडित रघुराज जी के परिवार के बारे में चिंता सता रहा था. बबलू रमापति बाबू के बात से पूरी तरह से सहमत तो था,लेकिन वह पंडित रघुराज जी के परिवार के बारे में ज्यादा नहीं जानता था, अत: कुछ बोलना उसे उचित नहीं लगा. खैर उस समय बात वहीं पर समाप्त हो गया और सब लोग अपने अपने घर चले गए.

लेकिन दादू के मन में संदेह तो बैठ ही गया था और यह संदेह उन्हें परेशान किये था. एक दिन हिम्मत कर के दादू पंडित रघुराज जी के घर चले ही गये. उनका आना जाना तो पहले से ही था. दादू पंडित रघुराज जी के पुराने मित्र थे और परिवार में सब लोग इनको जानते थे. घंटी बजाया,  थोड़ी देर बाद पंडित रघुराज जी की छोटी बेटी पुष्पा ने दरवाजा  खोला. दादू को देखते ही उसने दादू का चरण स्पर्श किया और बैठने के लिए कहा. पुष्पा ने आवाज लगाई कि मम्मी देखो दादू आये हैं. थोड़ी देर में पुष्पा की माँ मालती आ गयी और  दादू से बोली अरे भाई साहब आज इधर कैसे, आप तो लगता है कि मेरे घर का रास्ता ही भूल गए. अब दादू बोलते क्या, पंडित रघुराज जी के समय लगभग हर सप्ताह आना होता था, लेकिन कुछ तो कारण बताना ही था.  बोले अरे बहन जी अब मैं भी तो बूढ़ा हो गया हूँ, फिर कोविड ने और भी निकलना बंद कर दिया, इसीलिए नहीं आ पाया. मालती बोली बात तो आप सही कह रहे हैं.  वैसे बाहर निकलना तो मेरा भी लगभग बन्द ही हो गया है, वैसे आप के परिवार में सब लोग कैसे हैं. आप का छोटा पौत्र तो अब बड़ा हो गया होगा. मुझे भी बहुत दिन हो गया आप के घर गए हुए.

दादू बोले घर पर सब लोग ठीक हैं, छोटका तो अब प्ले स्कूल जाता है. थोड़ी देर बैठने के बाद दादू ने कहा चलता हूँ. मालती बोली नहीं भाई साहब इतने दिनों बाद आये हैं, बिना चाय पिये आप कैसे जा सकते हैं. पुष्पा बेटी दादू के लिए चाय बनाओ, मैं तब तक पकौड़ियां छानती हूँ और भाई साहब तब तक आप अखबार पढ़िये.

खैर दादू बैठ गए, अखबार पढ़ने लगे, लेकिन मन में शंका थी कि घर का खर्चा कैसे चलता होगा. इतने में एक लड़का आया, उसने घंटी बजाया, पुष्पा ने दरवाजा खोला और उससे बोली, रुको. पुष्पा घर के अन्दर गयी और दो टिफिन कैरियर ला कर उसे दे दिया. इसी तरह दो तीन लोग और भी  आये टिफिन कैरियर ले कर चले गए. दादू कुछ- कुछ समझ रहे थे. उन्होंने पुष्पा से पूछा बेटी तुम किस कक्षा में पढ़ती हो. पुष्पा बोली दादू इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ दिया और आज कल एक दूकान पर काम करतीं हूँ. इतने में मालती एक बड़े प्लेट में पकौड़ियां और चटनी लेकर आ गयी और बोली भाई साहब लीजिए.

दादू के चाय पीने के दौरान मालती को कई फोन आये, मालती हां , हूँ में जबाब दे कर फोन बन्द कर देती. दादू यह सब बड़े ध्यान से देख रहे थे. दादू के चेहरे का भाव देख कर मालती कुछ समझ गयी. बोली भाई साहब आजकल मैं घर में ही किचन चलाती हूँ और ये जो लोग अकेले रहते हैं , उन्हें खाना बना कर देतीं  हूँ. आजकल वे लोग जो नौकरी या पढ़ाई करते हैं, या पति पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, वे खाना तो बना नहीं सकते, तो ऐसे लोगों को मैं खाना देतीं हूँ. एक बाई भी है, वह भी सहायता करती है. अब क्या किया जाय भाई साहब, पेट  तो भरना ही है. बेटे के अचानक मौत के बाद तो कुछ दिन बुद्धि ही काम नहीं कर रही थी कि कुछ सोच सकुं. फिर धीरे- धीरे अपने मन को समझाया कि जिन्दा तो रहना ही है! दोनों बेटियों ने पैसे के अभाव में पढ़ाई छोड़ दिया और नौकरी करने लगीं. बड़ी वाली तो एक प्राइवेट स्कूल में पढा़ती है और यह पुष्पा एक दूकान पर सेल्सगर्ल का काम करती है. किसी प्रकार परिवार का खर्चा चल रहा है.

दादू को यह सब सुन कर काटो तो खून नहीं. मन आत्मग्लानि से भर गया. उन्हें ऐसा लगने लगा कि कब जमीन फट जाये और वे उसमें समा जाये. मन तुरन्त उठ कर कमरे से निकलने को कहने लगा. किसी प्रकार से जल्दी- जल्दी चाय पी कर उठ गए और मालती को नमस्ते करते हुए कहा कि अब मैं चलूंगा. फिर बोले कभी समय मिले तो मेरे घर आओ. मालती बोली रविवार को किचन बंद रखतीं हूँ, जरूर आऊंगी. आप भी कभी बहन जी को लेकर आईये. पुराने लोग आतें हैं, तो अच्छा लगता है.

 

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

29.04.2026

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “भरोसा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆

✍ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

शंकर दयाल जी के रिटायर होने में दो साल बाकी रह गए हैं। उनका बड़ा बेटा राम रतन अभी बारहवीं क्लास में है। दसवीं में अच्छे अंक लाने पर भी बारहवीं में बड़ी मुश्किल से एडमिशन हुआ।

बारहवीं में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की और बिना कोचिंग क्लास के पचानवे प्रतिशत अंक लेकर आया। उसके पिता बहुत खुश हुए। साइंस बायोलॉजी में से उसने साइंस और मैथ्स लिया ताकि वह तकनीकी क्षेत्र में यानी इंजीनियरिंग क्षेत्र में जा सके, परंतु इंजीनियरिंग में एडमिशन से पहले नीट की परीक्षा पास करनी होती है। वह नीट की परीक्षा में शामिल हुआ, परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की। उसे पूरी उम्मीद थी की अच्छे अंकों से में पास हो जाएगा। लेकिन रिजल्ट आने से पहले पता चला की नीट का पेपर लीक हो गया और परीक्षा फल रोक दिया गया। यह देख कर उसका दिल बैठ गया। शंकर दयाल को भी चक्कर आने लगे कि इतना पैसा और मेहनत और नतीजा कुछ नहीं। भविष्य अंधकारमय लग रहा है।

ऐसी स्थिति में वह क्या करें यह समझ नहीं आ रहा। शंकर दयाल भी बहुत दुखी हुए कि उनके बेटे ने इतनी मेहनत की लेकिन वह किसी काम नहीं आई। व्यवसाय करने के लिए उनके पास इतने पैसे नहीं है कि वह कोई दुकान खोल सके या कोई अन्य व्यवसाय शुरू कर सके। उनकी समझ में नहीं आ रहा है। बड़े बेटे की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्होंने बेटी का विवाह टाल दिया। छोटा बेटा जो दसवीं में है उसके लिए क्या करें आगे पढ़ाई किस तरह करें। इसी सोच में डूबे थे कि उनकी पत्नी आई कहा चलो खाना खा लो। ईश्वर सब ठीक करेंगे उनका ही भरोसा है। जो सबके साथ होगा वही हमारे साथ होगा।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन की छाँव।)

☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

गर्मियों के दिन के 12:00 बजे थे  बालकनी में झूले में बैठकर रामचंद्र जी अखबार पढ़ रहे।

और अपने गांव को और पुराने दिनों को याद कर रहे थे।

तभी उनकी पत्नी कमला ने आवाज दिया- “अंदर आ जाओ दोपहर में बाहर क्यों बैठे हो  लू चल रही है?”

“कच्चे आम का पन्ना बनाया है अंदर आओ बैठकर पी लो यह गाँव नहीं है जो आम के पेड़ के नीचे बैठे रहते थे?”

रामचंद्र जी ने कहा कमल-” तुम्हें तो पता है कूलर, ए.सी सूट नहीं करता।”

रामचंद्र जी ने गंभीर स्वर में कहा- “कमला इधर आओ मेरे पास बैठो चलो हम गाँव चलते हैं कुछ दिनों के लिए।”

कमला ने कहा- “अब गाँव में क्या रखा है घर की साफ सफाई करनी पड़ेगी बेटे बहू के साथ यही जब रहते हैं हम ठंड में चलेंगे। “

रामचंद्र जी ने कहा- “देखो कमला तुम बातें मत बनाओ तुम्हें नहीं जाना तो मैं जा रहा हूँ यहाँ तो पेड़ फल हुए आम देखने को तरस जा रहा हूँ।”

वैसे तुम्हारी बातों से मुझे शीतल छाया मिलती है लेकिन यहाँ पर घूमने फिरने भी कहाँ  जाऊॅं पार्क में जाओ तो इतनी भीड़ है।

कमला ने मुस्कुराते हुए कहा-

“क्या तुम्हें गाँव में भी छाँव मिलेगी वहां भी तो विकास हो रहा है।”

रामचंद्र जी ने कहा- इस नव विकास के ऑंधी में जीवन की छाँव खोती जा रही है, उनकी ऑंखों से ऑंसू बहने लगते हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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