हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०३ – मौत की फकीरी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– मौत की फकीरी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०३ — मौत की फकीरी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

गरीब और धनवान धरती पर जीवन से बने रहे। धनवान ने खूब पाया और गरीब ने खूब खोया। गरीब कपड़े के लिए तरसता था और धनवान कपड़ों में बादशाह था। पर दोनों दो गज के कफन में लिपट कर भगवान के घर जाते। जाने में गरीब अपने दायरे से होताऔर धनवान इस तरह से होता दो गज से अधिक कफन में जाने की व्यवस्था हो तो वह जाने का रास्ता भूल जाता।

 © श्री रामदेव धुरंधर

14 — 04 — 2024

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ आभासी… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ आभासी… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

राजेशजी मन ही मन बुदबुदा रहे थे–कयामत की धूप है पर जाना तो पड़ेगा। श्रद्धांजलि अर्पित करनी होगी। मन, हां कहे या ना कहे, समाज के कायदे कानून निभाने ही पड़ते हैं। उन्होंने  अल्मारी खोली और एक सफेद पुराना सा कुर्ता पाजामा निकाला। अवसर के अनुकूल परिधान पहनने ही पड़ते हैं। पड़ोसी चन्द्रप्रकाश को फोन किया साथ चलने के लिये। रमन इन दोनों का अच्छा मित्र है। लेखक होने के साथ समाज सेवक भी है।

वे रास्ते में बात करते हुये जा रहे थे। यार राजेश — रमन के पिता की उम्र 90 वर्ष थी ना। पकी उम्र में गये।

–मुझे एक बात समझ में नहीं आती लोग सबसे पहले मरनेवाले की उम्र क्यों पूछते हैं। नब्बे से ऊपर सुनते ही ऐसी मुद्रा बनाते हैं मानों मृतक बेचारा धरती पर रहकर गुनाह कर रहा था। अच्छा हुआ चला गया। ज्यादा जीकर भी क्या करता।

—-राजेश ऐसे सवालों के गणित में उत्तर नहीं दिये जा सकते। मरनेवाला कोई बेहद अपना हो तब भी क्या उनका यही जवाब होगा।

बातों बातों में उन्होंने चार किलोमीटर की दूरी कब तै कर ली पता भी नहीं चला। देखा तो श्मशान घाट सामने था।

रमन के पिता का शव रखा था फूल-मालाओं से सजा हुआ।

कुछ रिश्तेदार और आठ दस पत्रकार /समाज सेवक/ राजनीतिक कार्यकर्ता /लेखक प्रजाति के लोग।

शोक सभा में विलंब था। सब आपस में बतियाने लगे। किसी ने अपने सद्यः प्रकाशित नाटक संग्रह की खासियत बताई। दूसरा कुछ लोगों के कड़क इस्त्रीदार कपड़ों पर टिप्पणी कर रहा था। तीसरा जाति धर्म को लेकर अंत्यविधियों का अंतर बता रहा था। सारे कसमसा रहे थे कि कब कब श्रद्धांजलि सभा खत्म हो और पिंड छूटे।

इतने में नुक्कड़ वाले नेताजी भी आ गये जिनकी प्रतीक्षा हो रही थी।

फोटोग्राफर और माइक का इंतजाम हो चुका था। सभी को फिक्र थी कि कल के अखबार में वे प्रमुखता से नज़र आयें। वर्ना इतनी मशक्कत करके जानलेवा धूप में इतनी दूर आने का क्या फायदा।

वैसे भी दो मिनट खामोश रहकर शोक व्यक्त करना किसी हर्क्युलियन टास्क से कम नहीं लगता।

नेताजी ने बोलना शुरू किया। इतने में एक शव यात्रा श्मशान में प्रकट हुई। बैंड-बाजे के साथ। बैंड-बाजे शोख धुनें बजा रहे थे जैसे किसी शादी में बजाते हैं।

राजेश जी सकपका गये। वे समझ नहीं पाये आखिर माजरा क्या है !

चन्द्रप्रकाश का कहना था – यह मृतक की अंतिम इच्छा रही होगी। या फिर ओशो का अनुगामी रहा होगा।

उधर नेताजी परेशान निगलते बने न उगलते। बैंड बाजे की उग्र तेजतर धुनों के बीच लोगों तक उनकी आवाज नहीं पहुँच पा रही थी। एक तो शोकाकुल चेहरा बनाओ दूसरे सबसे महत्वपूर्ण उनके श्रीवचन अनसुने रह जाने की टीस।

खैर। राजेशजी, रमन से मिले और श्मशान के बाहर निकलते ही चन्द्रप्रकाश से बोले–एक बात का जवाब दोगे ?

–बोलो

— रमन ने पिताजी की मृत्यु की सूचना दी तो fb. पर 400 लोगों ने श्रद्धा सुमन अर्पित किये और श्मशान में केवल आठ ?

–बस इतना जान लो, अब रिश्ते भी आभासी हो गये हैं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “चाय पानी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “चाय पानी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-सर…

-कहो। क्या बात है?

-सर, वो अधिकारी हरिजन छात्रवृत्ति पास करने के प्रति छात्र पैसे मांग रहा है।

-कोई जरूरत नहीं इसकी।

-फिर बिल पास नहीं होगा, सर !

-न हो। बोलो जो आब्जेक्शन‌ लगाना हो लगा दो !

वह मेरा संदेश लेकर ऑफिस के अंदर‌ चला गया ! कुछ पल बाद वापस आया।

-सर, वे कहते हैं कि चलो, प्रति छात्र न सही लेकिन एक अच्छी चाय पानी लायक पैसे तो दे दो !

-बोलो! जल्द प्रबंध करके बताते हैं !

वह संदेश दे आया, तब मैंने उसे अपनी बाइक के पीछे बिठाया और जान पहचान वाले मित्र अधिकारी के पास पहुंच गया !

अधिकारी ने स्वागत् किया और चाय पानी पूछा तो मैंने कहा कि चाय पानी तो पीयेंगे लेकिन पहले अपने राजस्व अधिकारी को भी बुला लीजिये।

-क्यों?

-क्योंकि उन्होंने मुझसे चाय पानी की फरमाइश की है। सोचा, जब आप, पिलायेंगे तब उन्हें भी पिला दूंगा ! मेरे पास इतने पैसे कहां कि हरिजन छात्रों के पैसे काट कर अधिकारी को चाय पिला सकूं?

वे मित्र अधिकारी बहुत हंसे और सारा माजरा समझ गये। तुरंत उस राजस्व अधिकारी को फोन कर बुला लिया !

वह मुझे तो पहचानता नहीं था लेकिन क्लर्क को देखकर कुछ चौंका !

-हां भई, ये प्रिंसिपल महोदय चाय पानी पिलाने मेरे पास आ गये हैं ! बोलो चाय मंगवा लूं?

राजस्व अधिकारी हाथ जोड़कर खड़ा हो गया- नहीं सर! बिना चाय के ही ठीक है!

-फिर इनको ऑफिस जाकर चाय पानी पिलाओ और इनके बिल पास कर दे दो।

उस अधिकारी को काटो तो खून नहीं! सिर झुकाये बाहर निकल गये!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ “अभिनय का देवता” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆

श्री घनश्याम अग्रवाल

☆ लघुकथा – “अभिनय का देवता” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

(महान अभिनेता बलराज साहनी के स्मरण दिवस पर प्रणाम स्वरुप यह लघुकथा)

बलराज साहनी  यह लोक छोड़कर देवलोक चले गये। वहाँ नारदमुनी इन्द्र को बता  रहे थे कि आज पृथ्वी लोक से एक बहुत बड़ा अभिनेता आया  है। आप उसे अपने अभिनय विभाग में अभिनय का देवता  बना ले ।”

” हे नारद, हमारे यहाँ तो बड़े-बडे कलाकार रोज ही आते रहते हैं। हमारे विभाग में एक से बढ़कर एक अभिनय सम्भ्राट हैं। यूँ  हर किसी को अभिनय का देवता बनाते रहे तो हो लिया…, फिर भी तुम्हारी बात पर कल हम उसकी परीक्षा लेगे।” कहकर इन्द्र ने अपने अभिनय विभाग के सभी देवताओं को बुलाया और उन्हें बलराज साहनी के सभी फिल्मों की सीडी देते हुए कहा-” तुम इनमें से अपना-अपना किरदार चुन लो। तुम्हें इससे बढ़कर अभिनय करना  है। निर्णायक के लिए बी आर चोपड़ा और  बिमल राय  को बुलाया है। देखो, ये देवताओं की इज्जत का सवाल है। तुम्हें  बलराज साहनी के किरदारों को उससे बढ़कर करके दिखाना है। अब जाओ, और तैयारी में लग जाओ। ” सारे देवता सीडी लेकर चले गए।

दूसरे दिन परीक्षा शुरू हुई। देवताओं ने उनके किरदारों का इतना हूबहू अभिनय किया कि बिमल राय और बी आर चोपडा दोनों “O.K.-O.K  वाह-वाह ” कहते रहे। बस अब एक-दो किरदार ही बचे थे। इन्द्र ने गर्व से नारद की ओर देखते कहा- ” देखा नारद, मेरे देवताओं का कमाल! हमने बहुत देखे ऐसे बलराज – वलराज साहनी को। अब तो परीक्षा भी पूरी  होने को है। “

” पूरी होने को है, पर पूरी  हुई नहीं ” नारद के इतना कहते ही दो देवता सिर झुकाये आये और बोले-” क्षमा  करें देवराज । हम हार गये।

“दो बीघा जमीन ” के शम्भू महतो व काबुलीवाला का रोल कोई देवता करने को तैयार नहीं । तीनों लोक हो आये।

सभी कहते हैं कि ये रोल बलराज साहनी के सिवा इसे कोई  नहीं  कर सकता। हमें क्षमा करे देवराज ।”

इन्द्र  फिर झुकाये  सोचते रहे। तब नारद ने हँसते हुए कहा-” क्या सोच रहै हो इन्द्र ? कहीँ  ऐसा न हो कि ये दो बीघा जमीन व काबुलीवाला के रोल की ताकत लेकर यदि इसने तुम्हारा यानी इन्द्र का रोल कर लिया तो, ब्रम्हा-विष्णु-महेश तीनों इसे ही असली  इन्द्र मानकर इसे तुम्हारा इन्द्रासन सौंप दे। और तुम पर दफा चार सौ..बीस , नहीं -नहीं,श्रीचारसो…बीस लगा दे। “

” नहीं-नहीं । गर ऐसा हुआ तो मैं …., हे देवर्षी हे महर्षी, हे महामुनि अब आप ही कोई रास्ता निकालिये। हाथ जोड़ते हुए  इन्द्र ने कहा।

” ना..रायण-ना..रायण “। नारदजी ने  शरद जोशी की तरह व्यंग्य से मुस्कुराते हुए इन्द्र की ओर देखा। जो कुछ देर पहले तक नारद-नारद बोलता था, जब बोलती बंद हुई तो देवर्षी-महर्षी- महामुनि बोलने लगा। इसे कहते हैं- ” वक्त पड़ा बाँका तो….,हँसते हुए नारदजी  बोले-“

हम तो पहले ही कह रहे वे, इसे अभिनय का देवता बना ले । इससे तुम्हारा देवलोक और भी समृध्द होगा। दिलीप कुमार से भी तो  बात करने वाला कोई तो देवलोक में  होना चाहिए  न। ना..रायण-ना..रायण।”

” आप ठीक कहते हैं  ऋषिराज। ” हाथ जोड़ते हुए इन्द्र बोले।

दोनों  बलराज साहनी के पास आकर कहते हैं-”

हे अभिनय के देवता, देवलोक में आपका स्वागत  है। आइये- पधारिये “

***

© श्री घनश्याम अग्रवाल

(हास्य-व्यंग्य कवि)

मो 94228 60199

 संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९१ – कथा कहानी – सावधान! यहाँ यादें वर्जित हैं – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके उपन्यास “यादों में गौरैया” के विचारणीय अंश – – सावधान! यहाँ यादें वर्जित हैं )  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९१ ☆

☆ कथा कहानी – सावधान! यहाँ यादें वर्जित हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

(‘यादों में गौरैया’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि हमारी लुप्त होती संवेदनाओं और व्यवस्था के खोखलेपन पर प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ का एक अत्यंत तीखा और मर्मभेदी प्रहार है। कहानी एक नन्ही गौरैया के बहाने शुरू होती है, लेकिन देखते ही देखते सत्ता के गलियारों, स्वार्थी राजनेताओं और भ्रष्ट ठेकेदारों के उस तिलिस्म को बेनकाब कर देती है, जहाँ मासूमियत भी ‘फंड’ और ‘घपलों’ की भेंट चढ़ जाती है। महान व्यंग्यकारों की परंपरा को आगे बढ़ाता यह उपन्यास अपनी चुटीली भाषा और गहरे कटाक्षों से पाठक को भीतर तक झकझोरता है और एक चुभता हुआ सवाल छोड़ जाता है कि क्या विकास की इस अंधी दौड़ में हमने अपनी मनुष्यता खो दी है? यदि आप समाज की कड़वी सच्चाइयों को व्यंग्य के आईने में देखना चाहते हैं, तो यह कृति आपके संग्रह में अनिवार्य रूप से होनी चाहिए, क्योंकि यह गौरैया की तलाश नहीं, बल्कि हमारे अपने भीतर मरती संवेदनाओं की पुकार है। यह उपन्यास ई-कॉमर्स  प्लेटफोर्म अमेज़न पर उपलब्ध है।)

उस पुराने मकान की ढहरी हुई मुंडेर पर बैठी वह गौरैया अब घर की मालकिन नहीं, बल्कि एक अनधिकार चेष्टा थी। पिता की मृत्यु के बाद घर की चौखट अचानक ऊँची हो गई थी और माँ की अर्थी के साथ ही वे तमाम स्मृतियाँ भी विदा हो गईं जो ईंट-गारे के इस ढाँचे को ‘मायका’ कहती थीं। अब वहाँ नीम का वह पेड़ मात्र एक लकड़ी का लट्ठा था, जिसके नीचे बचपन की सिसकियाँ दफन थीं। भाई की आँखों में अब ममत्व की जगह खतौनी के नंबर चमकते थे और भौजाई की मुस्कुराहट में उस बासी बची हुई चाय की कड़वाहट थी, जो औपचारिकता के चूल्हे पर खौल रही थी। वह घर, जो कभी फेफड़ों की तरह साँस लेता था, अब एक निर्जीव अजायबघर बन चुका था जहाँ उसकी गुड़िया के टूटे हाथ और पुरानी कापियाँ ‘अतिक्रमण’ की श्रेणी में डाल दी गई थीं। वह अपनी ही जड़ों से उखड़े हुए उस गमले की तरह थी जिसे अब बरामदे के कोने में जगह मिलने पर अहसान मानना था।

सम्बन्धों की इस ढहती हुई सल्तनत में प्रतीक अब बदल चुके थे। पिता के चश्मे का शीशा जो कभी नैतिकता का लेंस था, अब धूल की परतों में सुबक रहा था। जिस कमरे में वह कभी बेखौफ होकर पैर फैलाती थी, वहाँ अब संदूक और फालतू सामान का पहरा था—मानो घर ने अपनी बेटी को पहचानने से इनकार कर दिया हो। मायका अब उस पुराने कोट की तरह था जिसे सहेजने का मन तो सबका था, पर पहनने का साहस किसी में नहीं। भाई के शब्द अब शहद में डुबाए हुए नश्तर थे, जो बार-बार यह अहसास दिलाते थे कि संभ्रांत परिवारों में विवाहित बेटियाँ केवल ‘अतिथि’ होती हैं, और अतिथि का अधिक ठहरना शास्त्र सम्मत नहीं। वह घर अब एक ऐसा भूगोल बन गया था जिसकी सीमा रेखाएं उसकी विदाई के दिन ही खींच दी गई थीं, बस सूचना का प्रेषण माता-पिता की अंतिम सांसों तक रुका हुआ था।

मायका एक मानसिक अवस्था थी, जो भौतिक देह के पंचतत्व में विलीन होते ही लुप्त हो गई। अब वहाँ केवल स्मृतियों का एक कबाड़खाना था जहाँ वह अपनी पहचान ढूँढने आई थी, पर उसे मिला केवल सन्नाटा और दीवारों पर जमी हुई सीलन। जिस आंगन को वह अपना ब्रह्मांड समझती थी, वह अब एक विवादित भूखंड मात्र था। वह खुद को उस डाकघर की तरह महसूस कर रही थी जहाँ पत्र तो आते हैं, पर पाने वाले का पता बदल चुका होता है। माँ की रसोई अब एक प्रयोगशाला थी जहाँ केवल नपे-तुले रिश्तों का स्वाद चखा जाता था। वहाँ अब प्रेम की जगह प्रोटोकॉल ने ले ली थी। वह समझ गई कि माता-पिता के बिना मायका केवल एक रूपक है, जिसे समाज ने लड़कियों को बहलाने के लिए गढ़ा था ताकि वे अपनी जड़ों की तलाश में भटकती रहें।

अंतिम दिन जब वह चलने लगी, तो भाई ने उसे एक पुराना पीतल का लोटा थमा दिया—शायद विरासत का अंतिम अवशेष। उसने लोटे में झाँका, वह खाली था, बिल्कुल उसके मायके के अहसास की तरह। तभी उसने देखा कि आँगन के बीचों-बीच लगा वह पुराना अमरूद का पेड़, जिसे उसने अपने हाथों से सींचा था, रातों-रात काटकर जड़ से उखाड़ दिया गया था। उसने सिसकते हुए पूछा—”यह क्या हुआ?” भाई ने बड़ी सहजता से कहा—”बहन, इस जगह अब कार पार्किंग बनेगी, बेवजह जड़ें नींव हिला रही थीं।” उसने अपना सूटकेस उठाया और मुड़कर देखा, तो पाया कि घर के मुख्य द्वार पर उसके नाम की नेमप्लेट (पिता ने अपनी बेटी के नाम पर ही घर का नेमप्लेट बनवाया था) की जगह ‘सावधान, कुत्तों से बचें’ का बोर्ड टंग चुका था। वह घर जिसे वह अपना समझ रही थी, दरअसल एक श्मशान था जहाँ उसकी यादों का अंतिम संस्कार पहले ही हो चुका था। उसने लोटा वहीं छोड़ा और बिना पीछे मुड़े उस ‘पार्किंग लॉट’ से बाहर निकल गई।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११० – प्रीति की डोर… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – प्रीति की डोर।)

☆ लघुकथा # ११० – प्रीति की डोर श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

कामवाली बाई एकदम से बोली-“दीदी यह कितनी सुंदर साड़ी है आज आप अपनी अलमारी की सफाई कर रही हो क्या?”

“दीदी यह साड़ी आपने कहां से खरीदी कितने की है मेरे लिए भी एक ऐसी ला देना अपनी तनख्वाह में से थोड़े-थोड़े पैसे में आपको दे दूंगी” कामवाली कमलाबाई ने कहा।

नेहा बोली -“अच्छा काम तो करो जल्दी-जल्दी आज मुझे अपनी फ्रेंड के यहाँ जाना है।”

“दीदी  मेरे भाई की बेटी की भी शादी है तो आप ऐसे दो साड़ी ला सकती है।”

“एक अपनी भतीजी को गिफ्ट करूंगी और एक मैं खुद पहनूंगी।”

नेहा ने कहा-“अच्छा ठीक है ला दूंगी अब जा बाहर घंटी बज रही है, देख दरवाजे पर कौन आया है?”

“दीदी पड़ोस वाली शर्मा आंटी आई है” कमला ने कहा।

नेहा ने कहा-” ठीक है उन्हें बताओ मैं आ रही हूँ चाय भी बना देना।”

 

“शर्मा आंटी आज कैसे आना हुआ आपका आप तो हमें भूल ही गए?”

शर्मा आंटी ने कहा “नहीं बेटा आज सुबह मेरे पड़ोस में जो मिस्टर मैसेज चड्ढा जी रहते हैं  अपनी कार से सुबह अपने बेटे बहू के पास जा रहे थे खबर आई उनका एक्सीडेंट हो गया है अभी कुछ देर बाद उनकी डेड बॉडी घर आएगी मैं उनके पास जा रही हूँ तुम भी वहां आ जाना बस यही बात बताने आई हूँ।“

सुनते ही नेहा चौक गई “आंटी रुकिए मैं आपके साथ आती हूँ।“

“पर शर्मा आंटी मैंने आज सुबह ही उन्हें देखा था वह सब्जी वाले के साथ झगड़ा कर रही थी फल खरीद रही थी ₹10 कम भी दिए उन्होंने।”

रोते हुए नेहा बोली “उनके पास इतनी प्रॉपर्टी थी खेती बाड़ी चार मकान किराए के तभी आंटी कंजूसी से हमेशा रहती थी। बेटे बहु किसी को अपने पास रहने नहीं देती थी हमेशा सबसे झगड़ा ही करती थी।”

श्रीमती शर्मा ने बोला “छोड़ बेटा नेहा जो हुआ सो हुआ जीते जी हम ऐसे ही करते हैं जैसे सारा कुछ जमीन जैसा हमें लेकर ऊपर ही जाना है”

“ठीक है आंटी 2 मिनट रुकिए मैं आती हूँ।”

अंदर से दो साड़ी निकाल के लाती है और कहती है “कमल में थोड़ी देर में आ रही हूं यह साड़ी तुम्हें पसंद थी तुम पहन लेना यह नई साड़ी ही मैंने खरीदी थी आज किट्टी में पहन के जाने वाली थी, यह अपने भतीजी को दे देना घर का ध्यान रखना खाना बना कर रखना मैं थोड़ी देर में आता हूँ”, वह रोने लगाती हैं।

कमला ने कहा “नेहा दीदी मत रो अब मैं कौन सा आपको छोड़कर कहीं जाऊंगी चिंता मत करो एक साड़ी से नहीं मानूंगी अभी और साड़ियाँ आपसे लेनी है।”

“सच कह रही हो कमल तुमसे मेरी प्रीत की डोर जो है अब यह टूटेगी नहीं।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ लघु कथा # १०२ – राज — तंत्र… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– राज — तंत्र …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ लघु कथा # १०२ राज — तंत्र  ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

क्रांति — दूत के अपाहिज होने पर राज द्रोह के उसके खाते बंद कर दिये गए। इसके पीछे जानी बूझी सोच यह थी जो अपाहिज हो गया उससे अब आतंकित होने का काई कारण शेष रहा नहीं। पर इस कोण से सतर्कता की एक दृष्टि तो रखी ही जाती थी जो निढाल हो गया कहीं वह फिर से सक्रिय न हो जाए। कुछ दिनों बाद क्रांति — दूत की दयनीय मृत्यु होने पर वे खाते जला दिये गए। इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण था। इन लोगों के दुर्योग से अगले चुनाव में इनकी हार हो जाती और नई सरकार क्रांति — दूत के उन बंद खातों को खुलवाती तो शर्म के मारे इन्हें नर्क में भी मुँह छिपाना भारी पड़ता। वास्तव में क्रांति — दूत के राज द्रोह थे कहाँ। उसकी तो समर्पित राज भक्ति थी।

 © श्री रामदेव धुरंधर

10 — 04 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ मेरे पास ‘भूख’ की कहानी है! ☆ श्री परम शिवम ☆

श्री परम शिवम

(श्री परम शिवम (डी आई जी – सी आर पी एफ) पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक तथा वाणिज्य में स्नातकोत्तर। अनुशासित जीवन के साथ एक संवेदनशील हृदय. हम श्री परम शिवम जी का साहित्य आपसे समय समय पर साझा करते रहेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक हृदयस्पर्शी संस्मरणात्मक कथा – मेरे पास ‘भूख’ की कहानी है!.)

 

कथा कहानी – मेरे पास ‘भूख’ की कहानी है! ☆ श्री परम शिवम

(‘सतरंगी दस्तरख्वान’ (संपादन- सुमना रॉय, कुणाल रे अनुवाद- वंदना राग, गीत चतुर्वेदी) में खाने की कहानियाँ हैं, अन्न की कहानियाँ- फार्मचे पाव, साउरडॉ, रसम, सारस्वत तमड़ी, भाकरी, पचडी-हुग्गी, किकोड़े, बैंगुनभाजा….. भोजन के विविध रूपों, व्यंजनों, पाक-कला की कहानियाँ, पर दुनिया का ऐसा कौन सा स्वाद जो मेरी ‘भूख’ की कहानी के बिना पूरा हो जाए-  श्री परम शिवम् )

बेसिक ट्रेनिंग संपन्न हो गयी थी और चालीस किलोमीटर की रेस सफलतापूर्वक करने के बाद कमांडो-ट्रेनिंग की भी इति हो आयी थी. अब प्रयाण था- बटालियन की पहली तैनाती पे सुदूर उत्तर पूर्व में मणिपुर जाना था, यही जीवन मे ‘दूर’ का आरम्भ था इसके बाद जीवन में अनगिन ‘दूर’ आए, करीबी शायद एकाध !

अकादमी से निकलते बरास्ता तीन दिन की छुट्टी ली गयी थी उसके बाद कमज़ोर मन ने पाँच दिन एक्स्ट्रा भी निकाल लिए थे, फिर भी तैयार ना था. अप्रेल-मई की गर्मियों की साँय-साँय करती दोपहर में ‘घर’ सोचते तो घर का कोना-कोना रस्सी होकर पाँव से लिपटने लगता, पाँव खुद-ब-ख़ुद स्तम्भित हो जाते, अडिग…अचल…अहिल.

यात्रा लम्बी थी-पहले जबलपुर से गुवाहाटी फिर आगे दीमापुर और फिर उसके बाद कॉन्वॉय से इम्फाल, लगे कित्ता दूर है, मन नहीं सोचता था पाँव ही सोचने लग पड़े थे और सोच-सोच जमते जाते थे, सून-सपाटा ऐसा कि कोई बोलने वाला भी न था-

सूखी रोटी तोड़ लें, कोई कहीं न जाए

आ पिया घर रहें मैं कमाउँ तू खाए

मन को मारा गया, कोनों की रस्सियों को खोला गया, पाँव उठाए गए और घर को छोड़ा गया, अजानी दिशाओं का प्रयाण और विलम्बित नहीं किया जा सकता था पर रत्ती भर भी मन नही, जबलपुर में हिले-डुले का धर्म भूलने वाले पाँव दादर-गुवाहाटी के स्लीपर कोच में चढ़े हैं, रात के दो बजे. जबलपुर से टिकट कन्फर्म नही हुई थी, टी टी ने मरी सी आश्वस्ति कर रखी थी-देखते हैं !

सिहोरा, स्लीमनाबाद, कटनी, मैहर, सतना… सब निकल रहे खड़े-खड़े, आस-पास ‘खड़ों’ की भीड़ है, सब खड़े-खड़े ही जा रहे, किसी के पास आश्वस्ति है, बाकियों के पास वो भी नहीं. सामान- एक सूटकेस, एक ट्रंक, एक बैग और एक होल्डाल-बेडिंग भी इधर-उधर हो रखी, मन के क्षेत्रफल मे किसी अन्य बात का अवसर ही न हो रहा, बस टुकुर-टुकुर टी टी को ताके जाएं, वो भी दृष्टि बचाते दूसरे कोच निकल गए. बाहर पौ फट रही, उषा की चमकीली रेख उभर रही किन्तु बर्थ-रहित अंतस में प्रत्यूषा का कोई आकर्षण नहीं, आंतरिकता निश्चिंत हो तो कोई सौंदर्य जगे इस अनिश्चय में क्या तो तुम्हें निरखें जगती ! मन, चेतना, ह्रदय, मस्तिष्क सब का केंद्र एक- बर्थ मिले तो प्रकृतिस्थ हों,तब बताते तुम्हें ओ दृश्यावलियों !

घर से निकले आठ घण्टे हो चुके, अंधकार का चँदोवा तो सतना में ही उठ गया था अब सूरज पूरा का पूरा चढ़ आया है, दिन का चमकीला थान खुल-बिछ गया. गाड़ी मुगलसराय पहुँची है, टी टी ने बर्थ भी कन्फर्म कर दी – साइड अपर ! सामान व्यवस्थित कर लिया गया है, बर्थ मिलते ही खंड-खंड व्यवस्थित हो आया है, अणु-परमाणु अपने घेरे में घूमने लगे हैं- आत्मस्थ, प्रकृतिस्थ, चेतनस्थ सब हो आया. सारी अनाश्वस्तियाँ पलक झपकते लुप्त हुई हैं, नासिका में वास आने लगी, कानों को सुनाई दे रहा, दृष्टि को दिखाई देने लगा-सामने जूस सेंटर है, कोई तृष्णा नहीं, बस नई-नई आश्वस्ति को सेलिब्रेट करना है, उतरता हूँ.

सद्य हासिल अचिंता को एन्जॉय करते एप्पल-जूस पिया गया है, हर घूँट में बर्थ प्राप्ति की स्वास्ति उतरी है, मन्यस्कता स्थिर हो रही, भुगतान के लिए पैसे बाहर निकाले फिर वापिस रखे है, कोई दो हज़ार रु कत्थई, ढीली जीन्स की पिछली पॉकेट में और आकर आश्वस्ति की पुष्टि के लिए बर्थ पर लेटता हूँ, जाने किस कौंध में पीछे पॉकेट पे हाथ मारता हूँ-‘अरे दूसरे पॉकेट में होंगे’ हाथ तत्क्षण दूसरे पॉकेट पर जाता है, हड़बड़ाहट सी हो जाती है, एक धड़के में वाशरूम की तरफ भागता हूँ, क्या उतार दूँ, क्या निकाल फेंकू कि दो हज़ार वापिस मिल जाएं, कहीं से झटक आएं, माँ ने बोला भी था सारे पैसे एक जगह मत रखना पर मलंग को किसका सुनना ठहरा, नहीं सुनी अब भुगतो ! वाशरूम की सीमित जगह में क्या-क्या न झटका गया, बस ट्रेन को झटकना रह गया था, दो हज़ार रुपए जा चुके थे, जेब कट गई थी. मन कैसा-कैसा हो आया था और कैसी तो नाउम्मीदी उतर आई थी ट्रेन के उस गंधाते प्रसाधन में. इधर-उधर खंगालने में सिर्फ छह रुपए और गुवाहाटी तक का टिकट ही निकल पाया. निढाल और विरक्त कदमों से बर्थ तक पहुँचता हूँ, ट्रेन कहाँ जा रही, क्यों जा रही, क्या जा रही, कोई लेना-देना नही, बोध-दर्पण हठात ही चटक-तिड़क उठा है, जगत बहा जा रहा पर कोई बिम्ब, कोई छवि नही उभर रही और तो और माँ के गर्भ से साथ हो लिया ‘आत्मालाप’ भी गूँगा पड़ गया है, सन्न पड़ा है, एक सपाटता सी पसर गयी है हर ओर हर छोर !

पिछली रात खाना खाया था, मुगलसराय में जूस पिया अब पेट पकड़ के साइड अपर पे लेटा हूँ, आँतों में हलचल है, भूख लग रही…

दोपहर भूखे पेट ही निकाल दी, पानी की बोतल साथ है, वही पी लेते हैं. मन रो रहा, घर वापिस लौट जाएं ! माँ ने सूजी के लड्डू साथ दिए थे, एकाध जैसे-तैसे गटका गया है, गला सूख रहा. कैसी तो बेकसी पसर रही अस्ति के सारे संभव में, जीवन का प्रवाह, आत्मा का प्रवाह, देह का प्रवाह, सारे प्रवाह रुद्ध हो आए हैं. बक्सर-दानापुर के आस-पास का इलाका है कुछ विद्यार्थी कोच में चढ़ें हैं, भीड़ बढ़ गयी है, मैने मुद्रा बदल ली है और उठ बैठा हूँ, एक छात्र बची जगह में ऊपर चढ़ आया है, साथ बैठ गया है. मन होता है उससे कुछ अनुरोध करूँ, आँतें बात-बात में ख़ुद को उमेठने सी लगती हैं. बातों का सिलसिला शुरू करता हूँ, अपना दुखड़ा रोता हूँ, बताता हूँ कि जेब कट गयी है अब पास कुछ नहीं किन्तु इसके आगे स्पष्ट रूप से माँग नहीं पाता, माँगने की सामर्थ्य नहीं, दीनता नहीं जुटा पा रहा, भूख के आगे अभी समर्पण नहीं, किसी के आगे समर्पण नहीं !

छात्र से कोई खाद्य न जुटता वो बस इतना ही बोलता है -“अरे ! मुगलसराय बहुत खराब है वहाँ तो यही होता है”

चौबीस घण्टे बीत गए कुछ खाए हुए, अन्न को देखे उसकी गंध लिए हुए…अन्न, अनाज, गंदुम, दालें, बासमती कितने नाम-रूप सब भीतर बन-बिगड़ रहे. रात के तिमिर को चीरती ट्रेन भागी जा रही.

गर्मियों के दिन, कोच में भी गर्मी पसरी है  पर प्यास नहीं लग रही, भूख लग रही है,

नींद नहीं आ रही, भूख लग रही है,

आँख नहीं लग रही, भूख लग रही है,

घर की याद आ रही, भूख लग रही है,

लौट जाऊँ, लौट जाऊँ भूख लग रही है.

आस-पास सबने खाना खाया है, किसी ने शिष्टतावश भी नहीं पूछा, भूख लग रही है.

कैसी कातरता है ! घर से लेकर चले ग्लूकोज़ पैकेट से बीच-बीच में ग्लूकोज़ मिला पानी पीता हूँ तो घड़ी दो घड़ी राहत होती है जैसे आँतें सो गई हों किन्तु थोड़ी देर में ही फिर मरोड़ उठने लगते हैं जैसे कोई शक्तिशाली पँजों से गीले कपड़ों के समान आँतों को मरोड़ रहा हो, यही क्रम हो रखा. थोड़ा ग्लुकोज-पानी पीता हूँ आँतें भ्रमित हुई हैं, आँख लग जाती है, करवट नहीं लेटता, पीठ के बल भी नहीं, पेट के बल लेटता हूँ आँतों पर दबाव डाल उनके उमेठ, उनके दर्द को काबू करता.

एक बस व्यवधान हो रखा शेष सब क्रम से हो रहा- दूसरी सुबह भी समय पर खुल रही, भगवान भुवन भास्कर, अनंत रश्मियों के चमकीले रथ पर सवार धरा तक आए तो, किंतु निपट खाली हाथ – ऐसे सूरज का मैं क्या करूँ, अन्नहीन…. खाद्यहीन….नाश्ता हीन ! तुम्हारा प्रकाश लेकर क्या करूँ अंशुमाली ! गेहूँ चाहिए चावल चाहिए मुझे ! क्षुधा की अरश्मियों ने तिमिर फैला रखा है उदर में, एक दाने का प्रकाश ही इस तिमिराच्छन्न को भेद पाएगा, इस जठराग्नि का शमन कर पाएगा जिसमें तिल-तिल मै स्वाहा हो रहा.

खाने को कुछ नहीं तो क्या ब्रश का स्वांग किया जाए. जिनके पास अन्न है, अन्न की सामर्थ्य है, ब्रश कर रहे, मुँह धो रहे, हँस-हँस कर अन्न की बातें कर रहे. मैं एक निरान्न आँतों को भरमाए रखने की जुगत में लगा हूँ- बोतल में पानी भर लिया जाए, ग्लूकोज़ मिलाकर घूँट-घूँट उतारते रहेंगे, बरगलाएँगे उन आँतों को जिनमें सहस्त्रों कांटे से उग आए हैं, जिनकी नोक हरपल आँतों की भीतरी दीवार को छेद रही. ट्रेन किसी छोटे निर्जन स्टेशन पर खड़ी है, नल से पानी भर लिया जाए !

आह ! अब यही बचा था, विपदा ! ऐसी परीक्षा करोगी भूख-आपदा में फँसे और होम-सिकनेस से जूझते मन की बोतल का ढक्कन गिरकर ट्रेन के नीचे पटरियों में चला गया है.

हे मालिक ! यही बोतल तो जीवन-रेखा हो रखी, इसके बिना तो आँतों को भ्रमित करना भी मुश्किल हो जाएगा.

जान की परवाह नहीं करता, भूख की परवाह करता हूँ, उतरता हूँ, ट्रेन के नीचे जाता हूँ, कोई भय नही, ट्रेन चल पड़ने की कोई आशंका नहीं, बस आँतों को शांत रखने का ध्येय ही आत्मा पर फहरा रहा, आत्मा भी रिक्त, क्षीण और कृश हो चली, अन्नहीन देहता में आत्मा का वो स्वरूप नहीं होता जो खाते-पीते इतराते बदनों में होता है.

तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है

बाग के बाग़ को बीमार बना देती है

भूखे पेटों को देशभक्ति सिखाने वालों

पेट की भूख इन्सान को ग़द्दार बना देती है

‘नीरज’ याद आते हैं और तिरोहित भी हो जाते हैं

नीचे वाली बर्थ पर सफेद कुर्ते पाजामे में तुंदियल से सज्जन जमे हैं. आते-जाते हर फेरीवाले से कुछ न कुछ लेकर खाने और लगातार चना-मूँगफली से अपना मुँह चलाते रहने के कारण सिंधी लगते हैं, मन में आता इनसे याचना करता हूँ , टूटने लगा हूँ, अब टूटने लगा है सब-कुछ, घर वाले कहते रहे हैं घुन्ना है,संकोची है, जिसे अब तक किसी संपदा सा सम्हाला वो संकोच भी टूटा जा रहा, माँग लेता हूँ, भयँकर भूख लग रही, माँग की अनुनय भीतरों में भाषा हो आयी है, बस ध्वनि होने को है, लेकिन जो भी चेष्टा सी पनपी थी गले में फंसकर रह जाती है फड़फड़ाती सी, नहीं माँग पाता ! उन्हें खाते देखता हूँ, बर्थ पे लेटा सामने पीली सी छत देखता हूँ, घरघराते पँखे को देखता हूँ, छत पे आड़ी-तिरछी लकीरों से उभर आई भिन्न-भिन्न आकृतियाँ देखता हूँ, आँते फिर दुखने लगी हैं सहन नहीं हो रहा.

सिंधी सज्जन उठकर वाशरूम की तरफ गए हैं, कोई स्टेशन आया है हबड़-तबड़ मची है. सज्जन की बर्थ पर सिक्का नज़र आता है, और दिन होते तो सोने के सिक्कों के ढेर को भी हेय-दृष्टि देखता किन्तु आज यही सिक्का समूची दृष्टि में भर आया है, उतरकर सिक्का उठा लेता हूँ. अपने पास से एक रुपए मिलाकर दो रुपए का खीरा खरीदा है. समय को खींचकर, तानकर एक-एक टुकड़ा खाया जा रहा ताकि अधिक लगते समय से अधिक परिमाप का भ्रम-बोध हो, ख़ुद को नहीं आँतों को छलने का उपक्रम है किन्तु एकाध घण्टे बाद आंतें फिर दुखने लगी हैं इस बार दुगुनी प्रबलता से, असहनीय मरोड़ उठती है, अब ग्लूकोज़ पानी भी आँतों को तुष्ट नहीं कर पा रहा, गला इतना सूख गया है कि सूजी के लड्डू निगलने के क्रम में लगता जैसे गले के भीतर खरोंचे पड़ रहीं, गला छिल जाएगा. कमांडो ट्रेनिंग के सर्वाइवल कोर्स में भी ‘बर्दाश्त का माद्दा’ बढ़ाने भूखा रखा गया था पर ऐसा भूखा नहीं कि दाने को तरस जाए आदमी, मोहताजी हो जाए.

ट्रेन पता नहीं किस भू-भाग से गुज़र रही, लेट हो आयी है- शाम तक गुवाहाटी पहुँचना था पर रात ग्यारह बजे पहुंची है. अगली ट्रेन कल सुबह दस बजे वो भी एक नम्बर प्लेटफार्म से. चार नम्बर प्लेटफार्म पर माँदा सा खड़ा, सामान एक नम्बर प्लेटफार्म तक ले जाने की योजना बनाता हूँ, खाली पेट योजना नहीं बनती. पीछे बाकी सामान छोड़ ट्रंक उठाता हूँ, प्लेटफार्म से सीधे पटरियों पे उतरता, पार करता, अगले प्लेटफार्म पे चढ़ता, फिर उतरता, पार करता अन्ततः एक नम्बर पर पहुँच ट्रंक रखता हूँ, लौट पड़ता हूँ. यही क्रम बाकी सामान के लिए भी दोहराता हूँ. लोगों का आना-जाना लगा है, सब खाए-पिये लग रहे, क्या-क्या खाया होगा इन लोगों ने, दुनिया भर के स्टॉल लगे हैं,हर स्टॉल पे भीड़ लगी है सबको कुछ न कुछ मिल रहा, कोई मेरा पेट क्यों नहीं पढ़ता, कोई मेरी निरीहता क्यों नहीं पढ़ता. चारों सामान एक नम्बर प्लेटफार्म पर पहुँचा ट्रंक पर ही दुहरा हो जाता हूँ. 48 घण्टे से अधिक हो रहे पेट में अन्न का दाना नहीं, आँखों के नीचे हल्की कालिमा उभर रही.

गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म क्रमांक एक पर तीसरी सुबह खुल रही पर जीवन का क्रम वही आँतों पे टिका हुआ, मन में आया कि जी आर पी थाने में जाकर बात करता हूँ, पर सामान का क्या करूँ, कहाँ ढोउँ, जेब तो कटवा ही ली अब यदि सामान भी हाथ से जाए ? तिस पर संकोच अलग, कहीं नहीं जाता नियति के समक्ष अड़ा रहता हूँ.

आगे दीमापुर की तरफ जाने वाली गाड़ी को दस बजे इसी एक नम्बर पे लगना था किन्तु ऐन वक्त पे घोषणा हुई कि ट्रेन एक नम्बर पर नहीं सात नम्बर पर लगेगी एक भूखे-टूटे मनुष्य की असहायता की ऐसी पराकाष्ठा, ऐसी परीक्षा !

भारतीय रेल व्यवस्था ! तुम नहीं जानतीं क्या पाप कर रही हो, क्या अघट कर दिया है तुमने ! तुम्हारे लिए प्लेटफार्म बदलना एक प्रशासनिक आदेश है किन्तु एक मनुज टूटन की कगार पे है, नियति के षड्यंत्र में भारतीय-रेल तुम भी शामिल हो रही ! रोज़े-महशर ये हिसाब भी रखा जाएगा दावरे-हश्र के हुज़ूर में ताकता हूँ इधर-उधर, कैसी विदीर्णता है, कैसी लाचारी ने जकड़ लिया है कि कोई कँधे पे हाथ भी धर दे तो फूट-फूट कर रो पडूँ, सोचता हूँ चारों सामान उठा लूँ किन्तु उठाऊँ तो उठाऊँ कैसे

ट्रेन की तरफ भाग रहे लोगों पर दृष्टि बिछलती है. ‘सामान उठाए साहेब !’ बाजू से ध्वनि आयी है, चन्द्रभान कुली,-” बटालियन जॉइन करने जा रहे…जेब कट गई…पाँच रुपए बचे हैं, दे देंगे, उठाना है तो उठाओ !” बहुत करके भी इतना ही माँग पाता हूँ.

-“आइये ! एकाध आप उठाइये बाकी हम ले चलते हैं”.

चन्द्रभान ने लाकर लामडिंग जाने वाली पैसेंजर ट्रेन की काष्ठ-कुर्सी पर बिठा दिया है. सामने साधु बाबा हैं. पाँच रुपए चन्द्रभान को दे दिए गए हैं अब दमड़ी नहीं, हाय ! क्या तो घट रहा.

कुछ समय बीतता है

चन्द्रभान वापिस आया है

-” यदि आपके पास पैसे नहीं तो ये दस रुपए रख लीजिए”

-“नहीं, हो जाएगा”

‘हाय रे संकोची ! तेरे संकोच को आग लगे’ आँतें बिफर पड़ी हैं. पेट की भूख के आगे चन्द्रभान के लिए कृतज्ञता भी आकार नहीं ले पाती, हल्की नमी है आँख के कोरों में. चेहरे का हाल-मुहाल देख सामने वाले साधु बाबा भी पूछ बैठते हैं-“परेशान दिखता है बच्चा !”

घर-घर जाते हैं, हर घर से न मिले फिर भी विविध तो मिलता ही होगा सो एकाध रोटी तो होगी बाबा के झोले में इसी आस में झोले को ताकते साधु को पूरा दुखड़ा सुना डालते हैं वो पूरा सुनते हैं पर मिलता कुछ नहीं तो क्या खुलकर ही माँगना पड़ेगा ‘कोई रोटी वोटी है तो दो”

अजब समय है जब तक हाथ पसारकर नहीं मांगेंगे तो क्या कोई देगा नहीं, क्यों ये जगत ऐसा संवेदनहीन हो रखा, क्यों कोई इस असहनीय भूख को नही पढ़ पा रहा

न ! नहीं माँगूगा !

साधु दो लड्डू ले लेते हैं, देते कुछ नहीं.

गुवाहाटी स्टेशन से ट्रेन चल पड़ी है. असम की भू-दृश्यावली खिड़की के पार एक चक्कर में गुज़र रही पर भीतर कोई भाव नहीं उपजता, सारी शक्तता जैसे लुट गयी हो, पेट में दाना होता तो इन दृश्यों को पी रहा होता- दृश्यों को तरल बनाकर पीने की कला आती है मुझे !

प्रथमतया गुज़र रहा अहोम भूमि से, ओ ब्रह्मपुत्र ! ओ सुपारी के पेड़ों की श्रृंखला तुम ही साक्षी रहना मेरी इस भूख की जिसने तुम्हें न निरखने दिया.

शाम तक ट्रेन लामडिंग पहुँचाती है, प्लेटफार्म पर सामान रख ट्रंक के ऊपर ही ढेर हो जाता हूं. यहां से दीमापुर के लिए ट्रेन पकड़नी जो देर रात आएगी. समीप ही जवानों का एक ग्रुप पटरी पार बाज़ार में मिल रही स्वादिष्ट मछली और दाल का चटखारे लेकर ज़िक्र कर रहा, सी आर पी एफ के ही जवान लग रहे.

“इनसे माँग लेता हूँ”

किन्तु कैसे स्वयं को दयनीय प्रस्तुत करूँ, देह अशक्त हुई है पर अभी भी दैन्य नहीं, नहीं माँगता !

यहाँ-वहाँ दृष्टि दौड़ाता हूँ, प्लेटफार्म में कही रोटी का टुकड़ा दिख जाए तो उठाकर खा लूँ, खड़े नहीं हुआ जा रहा आँतें तो लगता मर चुकीं, अब दर्द नहीं बल्कि अब दर्द महसूसने की क्षमता ही नहीं.

ट्रंक पर ही पड़ा रह जाता हूँ.

रात दो बजे दीमापुर की ट्रेन आयी है सुबह सात बजे दीमापुर पहुँचा हूँ.

हवलदार नायर आया है लेने, “क्या हुआ साब !” आंखों के नीचे गाढ़े काले घेरे और चेहरे पे उतर आई दीनता को देख पूछता है

कुछ नहीं बोलता

मेस पहुँचा हूँ

तीन पूरे दिन और एक रात के बाद अन्न सामने है

रोटी और भिंडी की सूखी सब्ज़ी

पहला कौर लेता हूँ…

अन्न पधारो आँत में भूखन को सुख दो

सबकी विधी में जा बसो कोई को न दुख दो

© श्री परम शिवम्  

डी आई जी, सी आर पी एफ, गुरुग्राम  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ मुझे जीना है (जिजीविषा) — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “मुझे जीना है (जिजीविषा)“.)

 ☆ कथा कहानी  ☆ मुझे जीना है (जिजीविषा) — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

त्रिपाठी जी का अच्छा खासा परिवार था, तीन बेटे, दो बेटियां और पत्नी सरला. त्रिपाठी जी स्वयं रेलवे में एक बहुत बड़े अधिकारी थे. सारे बेटे – बेटियां पढ़ाई कर रहे थे. सबसे बड़ा वाला बेटा सागर, कानून की पढ़ाई कर रहा था, बाद वाला एम एस सी, उससे छोटा बी एस सी. एक लड़की हाईस्कूल में, सबसे छोटी वाली कक्षा आठ में थी. परिवार में सब कुछ ठीक था.

अब त्रिपाठी जी बहुत बड़े अधिकारी थे, तो उनके उपर हमेशा काम का काफी दबाव भी  रहता ही था. यह किस्सा आज से लगभग पचास- पचपन साल पहले की है. बड़े अधिकारियों पर कई तरह के दबाव हुआ करते थे. कर्मचारी, मजदूर यूनियन, रेलवे बोर्ड आदि. एक दिन शाम को देर तक त्रिपाठी जी  आफिस में काम कर रहे थे, उसी समय उनके सीने में दर्द शुरू हुआ. अपने पी ए , रमन को उन्होंने कहा कि दर्द काफी हो रहा है. तुरन्त कार से रेलवे के हास्पिटल में त्रिपाठी जी को ले जाया गया. पता लगा कि हर्ट अटैक हुआ था. खैर तत्काल चिकित्सा शुरू हो जाने से, काफी लाभ हुआ. घर वालों को पता लगा तो पूरा परिवार आ गया. डाक्टर ने कहा कि कोई घबराने की बात नहीं है, हल्का सा ही था. त्रिपाठी जी को एक सप्ताह अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा. लगभग दस दिन आराम करने के बाद, त्रिपाठी जी फिर से  आफिस पहले की तरह ही जाने लगे और आफिस का काम यथावत  करने लगे.

लगभग तीन महीने के बाद, आफिस में त्रिपाठी जी को फिर घबराहट हुई, तत्काल उन्हें अस्पताल ले जाया गया. पता लगा कि इस बार फिर हार्ट अटैक हुआ था और पहले की तुलना में काफी अधिक था. परिवार के लोग घबड़ा गए. खैर समय पर सही चिकित्सा हो जाने के कारण त्रिपाठी जी ठीक हो गये, लेकिन लगभग दो महीने अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा. एक दिन रोज की तरह त्रिपाठी जी आफिस गये और दोपहर में ही घर वापस आ गए. सामान्यतः त्रिपाठी जी रात आठ बजे तक ही घर आते थे. आज जल्दी आ जाने पर पत्नी सरला ने पूछा कि आज जल्दी आ गए, सब ठीक तो है? त्रिपाठी जी ने कहा कि सब ठीक है, लेकिन मैंने आज नौकरी से इस्तीफा दे दिया . सरला एकदम स्तब्ध हो गई, लेकिन कुछ कहा नहीं, बोली ठीक है, दोपहर का खाना खा कर आराम करो. त्रिपाठी जी ने खाना खाया और सोने चले गए.

 शाम तक पूरे परिवार को त्रिपाठी जी के नौकरी से इस्तीफा देने की जानकारी हो गई, लेकिन किसी ने भी त्रिपाठी जी से कुछ नहीं पूछा और न तो कुछ कहा. पहले की तरह सब लोग त्रिपाठी जी से व्यवहार करते रहे, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो. लेकिन त्रिपाठी जी के बचपन के मित्र पाण्डेय जी को, त्रिपाठी जी का अचानक नौकरी से इस्तीफा देना, जबकि परिवार में कोई कमाने वाला नहीं था और परिवार का इतना खर्चा था, समझ नहीं आ रहा था. एक दिन शाम को उन्होंने पूछ ही लिया कि त्रिपाठी एक बात बताओ, तुम तो पूरी तरह ठीक हो गये थे, फिर अचानक बिना किसी को कुछ बताये, परामर्श किये, नौकरी से इस्तीफा क्यों दे दिया? त्रिपाठी जी मुस्कुराये और बोले कि मैं इस प्रश्न की प्रतिक्षा बहुत दिनों से कर रहा था, आज तुमने पूछ ही लिया तो, सुनो. मैं जीना चाहता हूँ. पाण्डेय जी चौंक गए! क्या मतलब है तुम्हारा, कौन मार रहा है तुम्हें! त्रिपाठी जी बोले मुझे मेरा आफिस का काम मार रहा है. देखो पाण्डेय, मैंने जिन्दगी में कभी भी हरामखोरी नहीं किया है. अब नौकरी करुंगा तो काम का दबाव तो रहेगा ही. मुझे दो बार हर्ट अटैक हो चुका है, अगर काम के दबाव से तीसरी बार हर्ट अटैक हुआ तो मैं बच नहीं पाऊँगा, मैं अभी जीना चाहता हूँ. मैं जानता हूँ कि मेरे इस तरह से इस्तीफा देने से परिवार में बहुत बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है, लेकिन सब ईश्वर ठीक कर देगा. हर किसी का अपना – अपना भाग्य होता है, मेरे बच्चों का भी अपना भाग्य है, सब ठीक हो जायेगा. पाण्डेय जी, त्रिपाठी जी का चेहरा देखते रहे. कुछ देर बाद बोले ठीक किया त्रिपाठी!

खैर साहब, समय कहाँ रुकता है! परिवार ने त्रिपाठी जी के पेंशन में ही गुजारा करना सीख लिया. पांच सालों के भीतर सारे लड़कों को अच्छी जगह  नौकरी मिल गयी और उसके बाद धीरे-  धीरे लड़कियों की भी शादी हो गई. त्रिपाठी जी भी इस्तीफा देने के बाद तीस से अधिक सालों तक अपना स्वस्थ जीवन जिये.

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

25.03.2026

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४५ – बाल कहानी — जादूई पेन – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक बालकहानी  बाल कहानी — जादूई पेन ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४५ 

☆ बाल कहानी — जादूई पेन ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

दादीजी सुबह जल्दी उठीं। देखा, श्रेया को बुखार था। 

‘‘क्या हुआ बेटी?’’ दादीजी ने पूछा, ‘‘आज तुम्हारी परीक्षा है, तुम सो रही हो?’’ कहते हुए दादीजी ने उसे छुआ। उसका शरीर गरम हो रहा था। 

‘‘दादीजी! बुखार आ गया है,’’ श्रेया ने कहा। तभी उसकी मम्मी आ गईं, ‘‘मांजी! जब भी परीक्षा आती है, इसे बुखार आ जाता है।’’ 

‘‘अच्छा!’’ दादीजी ने कहा। 

मम्मी ने फोन लगाकर डॉक्टर को बुला लिया। डॉक्टर ने श्रेया को देखा और बुखार उतरने की गोली दे दी। 

कुछ ही देर में श्रेया का बुखार उतर गया। तभी दादीजी पास आकर बोलीं, ‘‘श्रेया! अब कैसी हो?’’ 

‘‘ठीक हूं दादीजी,’’ श्रेया ने बैठते हुए कहा। 

तब दादीजी ने उससे पूछा, ‘‘अच्छा! यह बताओ कि तुम्हें सबसे ज़्यादा डर किससे लगता है?’’ 

‘‘परीक्षा से,’’ श्रेया ने तुरंत कह दिया, ‘‘पेपर में क्या आता है, पता नहीं चलता। उसमें याद किया हुआ लिख पाऊंगी या नहीं — इससे ज़्यादा डर लगता है,’’ श्रेया ने जवाब दिया। 

‘‘परीक्षा से डर कैसा?’’ दादीजी ने कहा, ‘‘मेरे पास ऐसा पेन है जो परीक्षा में डर को दूर करता है। वह पेन जादू का काम करता है।’’ 

‘‘जादूई पेन!’’ 

‘‘हां, जादूई पेन,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘इससे परीक्षा में डर भाग जाता है। बस आप एक अक्षर इस पेन से लिख दीजिए, फिर किसी भी पेन से लिखिए — आप अपना याद किया हुआ भूलते नहीं हैं। जो याद किया है, वह तुरंत लिखते चले जाते हैं।’’ 

‘‘तब तो यह जादूई पेन मुझे दे दीजिए,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मुझे परीक्षा में लिखते हुए डर लगता है। यह पेन मेरी सहायता करेगा?’’ 

‘‘बिलकुल करेगा,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘मगर यह पेन तभी काम करता है, जब वह परीक्षा में छात्र के पास हो, और छात्र परीक्षा देने से पहले लिख-लिखकर याद करता हो, उसे दो बार दोहराता हो — तभी यह पेन काम करता है।’’ 

‘‘तब तो यह पेन मुझे दे दीजिए,’’ कहते हुए श्रेया ने दादीजी से जादूई पेन लिया। अपनी कॉपी-किताब खोलकर बैठ गई। फिर अपना अभ्यास दोहराने लगी। जब यह कार्य कर लिया, तब तैयार होकर परीक्षा देने गई। 

आज उसमें आत्मविश्वास था। वह बेफिक्र होकर परीक्षा देने गई। उसका पेपर अच्छा हुआ था। परीक्षा का डर चला गया था। आखिर उसे जादूई पेन मिल गया था। 

श्रेया ने हर दिन अच्छी मेहनत की। अपना पेन संभालकर रखा। इससे सभी पेपर अच्छे से हल हुए। मगर, आखिरी पेपर के दिन उसका पेन गुम हो गया। वह चिंतित हो गई — अब क्या होगा? मगर उसके सभी पेपर हो गए थे, इसलिए उसे ज़्यादा चिंता नहीं थी। 

वह घर आते ही दादीजी से बोली, ‘‘दादीजी! मेरा जादूई पेन गुम गया।’’ 

‘‘कोई बात नहीं, जब स्कूल खुलेंगे तो हम दूसरा ला देंगे,’’ दादीजी ने कहा और वे श्रेया से बातें करने लगीं। 

श्रेया की दादीजी गांव में रहती थीं। वे कुछ समय के लिए शहर आई थीं। श्रेया दादीजी के साथ गांव चली गई। वहां उसने खूब मस्ती की। गांव में घूमी, खेत पर गई, वहां की ताज़ी सब्ज़ियां खाईं। इस तरह खेलते-कूदते उसकी गर्मी की छुट्टियां बहुत जल्दी बीत गईं। 

जब उसका परीक्षाफल आया तो वह इस बार ज़्यादा अंकों से पास हुई थी। वह खुश होकर चिल्लाई, ‘‘वाकई! जादूई पेन ने अपना कमाल कर दिया।’’ 

उस वक्त दादीजी मुस्कराकर रह गईं। मगर जब श्रेया वापस शहर आने लगी तो उसने दादीजी से कहा, ‘‘दादीजी! मुझे वह जादूई पेन दिलवा दीजिए, वह मेरे काम आएगा।’’ 

‘‘चलो! अभी दिलवा देती हूं,’’ कहते हुए दादीजी उसे एक दुकानदार के पास ले गईं, ‘‘लाला! वह पेन देना,’’ दादीजी ने कहा। 

लाला ने एक पेन निकालकर दादीजी को दे दिया। दादीजी ने उस पेन के ऊपर लगा नाम का स्टीकर हटा दिया। फिर बोलीं, ‘‘लो श्रेया! यह जादूई पेन।’’ 

यह देखकर श्रेया चकित रह गई, ‘‘मगर दादीजी! यह तो साधारण पेन है।’’ 

इस पर दादीजी ने कहा, ‘‘किसने कहा कि यह साधारण पेन है? इसने हमारी श्रेया में आत्मविश्वास का जादू भरा था। वह अपने अभ्यास को पूरे विश्वास के साथ और मन लगाकर दोहराने लगी थी। फिर यह सोचकर परीक्षा देने गई कि उसे सब याद है — तब यह पेन साधारण कैसे हो सकता है?’’ 

‘‘मगर दादीजी! यह पेन तो आपने इस साधारण दुकान से खरीदा है।’’ 

‘‘हां, मगर इसके सहारे परीक्षा का डर निकल गया था। इसलिए यह जादूई पेन हुआ कि नहीं?’’ 

‘‘हां दादीजी,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मैं बेकार ही परीक्षा से डरती थी। अब नहीं डरूंगी। मुझे सब याद है, तो परीक्षा में आराम से लिख सकती हूं। यही मेरा विश्वास है। यह सोचकर परीक्षा दूंगी।’’ 

‘‘शाबाश श्रेया,’’ दादीजी ने कहा और श्रेया पूरे आत्मविश्वास के साथ शहर आ गई। तब से उसका परीक्षा का डर सदा के लिए खत्म हो गया।     

 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

दिनांक- 10.01.2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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