(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कारा…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९२ —कारा—☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
दोनों कहते थे पिंजड़े में बंद उनका तोता उनके प्रेम का साक्षी है। तोते को दिखा कर वे हाथ पर हाथ रखते और कभी एक दूसरे को चूम लेते थे। तोता पिंजड़े में जैसे उनका यह प्रेम देख कर नाचने लगता था। आवाज़ तो वह खूब लगाता था। पर तोता एक दिन पिंजड़ा तोड़ कर उड़ गया। दोनों समझ रहे थे तोता उनके प्रेम का मोहताज नहीं था। वह भी एक जीव है। उसका अपना प्रेम कहीं और है।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “आज के संजय”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है। महाभारत के युद्ध की दोनों सेनायें अपने अपने शिविरों में लौट रही हैं। रथों के घोड़े हिनहिना रहे है। कौन आज युद्ध में वीरगति पा गये और कौन कल तक बचे हुए हैं। संजय यह आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। महाराज व्यथित होकर दिन भर का हाल सुन रहे हैं। गांधारी भी पास ही बैठी हैं।
वह एक युग था। तब संजय जन्मांध धृतराष्ट्र को युद्ध का हाल बताने के लिए मिली दिव्य शक्ति से सब वर्णन करते थे। कहा जा सकता है कि उस युग के पत्रकार थे संजय।
अब युग बदल गया। इन दिनों चुनाव की महाभारत है। महाभारत अठारह दिन चली थी लेकिन यह चुनाव प्रचार की महाभारत पूरे इक्कीस दिन चलती है। यहां किसी एक संजय को दिव्य शक्ति नहीं दी जाती। यहां तो सैंकड़ों संजय हैं जो ‘वीडियो’ नाम की दिव्य शक्ति लेकर आये हैं और कुछ भी वायरल कर देने की शक्ति रखते हैं! मनचाहा वीडियो बना कर सारा आंखों देखा हाल सुनाने में जुटे हैं। संजय तो एक राष्ट्रीय पत्रकार था और राष्ट्र की सेवा में जुटा था। निष्पक्ष! निरपेक्ष! ये आज के युग के संजय तो निष्पक्ष और निरपेक्ष नहीं। इन्हें तो रोटी रोटी कमानी है, अपनी गृहस्थी चलानी है। मनभावन शौक पूरे करने हैं। खाना पीना है और वह दिखाना है जो सामने वाला चाहता है लेकिन इसकी एक निश्चित कीमत है! जो चुकाये वह पा मनचाहा पा ले! नहीं चुकाये तो हश्र भुगते!
ये कैसे संजय हैं?
ये कलियुग के महाभारत के संजय हैं! जो अंधे लोगों को युद्ध का हाल नहीं सुनाते बल्कि ऐसा हाल सुनाते हैं कि आंखों वालों को ही अंधा बना रहे हैं! आप इन्हें पहचानते हैं?
(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित। पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नेम प्लेट।
लघुकथा – नेम प्लेटसुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा
रात के खाने के बाद घर के सभी सदस्य इकट्ठे बैठे. पति, पत्नी, बेटा, बेटी और दूर कोने में कुर्सी पर बैठी उदासीन, स्वयं को उपेक्षित मानती मां. नया घर पूरा बन चुका था और अब उसके नाम के बारे में चर्चा चल रही थी.
“आशियाना” नाम कैसा रहेगा? बेटी उत्साह से बोली.
“कोई नया नाम सुझाओ… वैसे “ उपवन “ कैसा रहेगा..? बेटा उत्साह से बोला.
“अच्छा, “ हार्मनी “ या “ हरसिंगार “ कैसा रहेगा…? पत्नी ने अपनी राय रखी.
“दोनों अच्छे हैं. लेकिन मैं सोच रहा हूं पिताजी के नाम पर अगर” घनश्याम कृपा” रखा जाए तो कैसा रहेगा..? पति ने भी अपना सुझाव दिया.
सर्वसम्मति से इस नाम को स्वीकृति दे दी गई.
पति के जाने के बाद मां धीरे-धीरे स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगीं थीं जैसा अक्सर होता है. आजकल तो वे डाइनिंग रूम के कोने में कुर्सी पर बैठी रहतीं और वहीं पर खाना मांग लेती. शेष समय तो अपने कमरे में ही पड़ी रहतीं. बहू बेटे ने उन्हें कितनी ही बार समझाया कि शाम के वक्त आप सोसायटी में जहां बुजुर्ग बैठकर बतियाते, हंसते, गपशप, मनोरंजन करते हैं उनके पास जाकर बैठ जाया करें. आपका भी दिल बहल जाया करेगा लेकिन वह इस बात को मानने को तैयार ही नहीं थीं. उन्हें लगता उनसे दो घड़ी बातें करने के लिए किसी के पास वक्त नहीं था. सभी अपने अपने कार्यों में उलझे रहते हैं. कितनी ही बार पति की फोटो देखकर शिकायत करने लगतीं-“ मुझे बीच मँझधार में छोड़कर आप तो चले गए. कितनी अकेली रह गई हूं मैं आपके बिना… किसी को फुर्सत नहीं मेरे पास बैठने की, बातें करने की… ”
नेम प्लेट बनकर आ गई. काले रंग पर सुनहरे अक्षरों से “घनश्याम- रमा कृपा“ के चारों तरफ बेल बूटों से बनी हुई अत्यंत आकर्षक और सुंदर नेम प्लेट देखकर घर के सभी सदस्य चहक उठे.
सबके देख चुकने के बाद नेम प्लेट को लेकर पोती दादी के पास गई और बोली – “ देखो दादी अपने नए घर की नेम प्लेट, दादू और आपके नाम पर. है न सरप्राइज़… “
मां ने नेम प्लेट हाथ में ली एकटक उसे निहारती रहीं. फिर ना जाने क्या हुआ कि उसे आंखों से लगाकर लगातार चूमने लगीं. उनकी आंखों से निरंतर आंसुओं की झड़ी लग गई जिसमें बच्चों के प्रति उनके मन में जबरन पनपते उपेक्षा, अनगिनत शिकायतों, तिरस्कार के भाव धुलने लगे थे. आंखों में छाई धुंध भी छंटने लगी थी.
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – आग
दोनों कबीले के लोगों ने शिकार पर अधिकार को लेकर एक-दूसरे पर धुआँधार पत्थर बरसाए। बरसते पत्थरों में कुछ आपस में टकराए। चिंगारी चमकी। सारे लोग डरकर भागे।
बस एक आदमी खड़ा रहा। हिम्मत करके उसने फिर एक पत्थर दूसरे पर दे मारा। फिर चिंगारी चमकी। अब तो जुनून सवार हो गया उसपर। वह अलग-अलग पत्थरों से खेलने लगा।
वह पहला आदमी था जिसने आग बोई, आग की खेती की। आग को जलाया, आग पर पकाया। एक रोज आग में ही जल मरा।
लेकिन वही पहला आदमी था जिसने दुनिया को आग से मिलाया, आँच और आग का अंतर समझाया। आग पर और आग में सेंकने की संभावनाएँ दर्शाईं। उसने अपनी ज़िंदगी आग के हवाले कर दी ताकि आदमी जान सके कि लाशें फूँकी भी जा सकती हैं।
वह पहला आदमी था जिसने साबित किया कि भीतर आग हो तो बाहर रोशन किया जा सकता है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “जानूमेट ” ।)
करीने से सजे ड्राइंग रूम के एक कोने पर अपनी राकिंग चेयर पर आगे पीछे डोलते हुए राजन एल्बम के पन्ने पलटते और खुद ही मुस्कराने लगते ।
तभी जुनू आई और इस तरह उन्हें मुस्कुराते देख बोलीं, क्या हुआ जानू, राजन बोले आई लव यू।
पिछले पैंतीस सालों के वैवाहिक जीवन में यह वाक्य हजारों बार जुनू और उनके जानू राजन के बीच संवाद, समझ, और प्यार व्यक्त करता ही रहा है।
नाश्ते के पहले अपनी दवा निकालते हुए डिब्बे पर छपा नाम जानुमेट 500 देख रंजन हमेशा मुस्कुरा देता था। जानूमेट। जैसे डाक्टर ने बीमारी की दवा नहीं, रिश्ते का नाम दे दिया हो। जब पहली नार्मल चेकअप में उसका शुगर लेवल अधिक आया था, तो मन में डर था, भविष्य का, परहेज का ।
डॉक्टर ने सहज स्वर में कहा था हर भोजन के साथ एक जानूमेट500, जीवन भर।
जीवन भर शब्द ने राजन को भीतर तक हिला दिया था, लेकिन जानूमेट ने उसे थाम लिया।
अब दिन के खाने की शुरुआत घड़ी से नहीं, जानूमेट से होती थी। नाश्ते की प्लेट लगे या देर हो जाए, उसका ध्यान पहले छोटी सी इस गोली पर जाता। जेब में, पर्स में, दराज में, कार में, हर जगह उसकी मौजूदगी रहती। जैसे कोई प्रेमी बिना बोले याद दिलाता रहे कि लापरवाही मत करना। दफ्तर में मीटिंग लंबी हो जाए तो वह घबराता नहीं था, बस जेब टटोलता था। जानूमेट है न।
धीरे धीरे उसने देखा कि दवा ने उसके भीतर एक अनुशासन जगा दिया है। वह समय पर खाने लगा, पैदल घूमने जाने लगा, मीठे से दूरी रखने लगा। हर तीन महीने में जांच करवाना अब मजबूरी नहीं, जिम्मेदारी बन गई थी। रिपोर्ट आते ही वह पहले खुद को देखता, फिर जानूमेट के डिब्बे को। जैसे कह रहा हो देखा, तुम्हारा साथ ।
कभी कभी उसे लगता यह गोली उससे ज्यादा फिक्र करती है उसकी। जब वह थक कर सब कुछ भूल जाना चाहता, तब जानूमेट उसे रोक लेती। जब वह कहता एक दिन न लेने से क्या होगा, तब जानूमेट चुपचाप आईने में उसका भविष्य दिखा देती। कोई डांट नहीं, कोई शोर नहीं, बस खामोश मौजूदगी।
एक दिन उसकी बेटी ने मुस्कुराकर पूछा, पापा ये जानूमेट क्या है। उसने हंसते हुए कहा, यह मेरी जानू है। जो मुझे हर दिन याद दिलाती है कि खुद से प्यार कैसे किया जाता है। बेटी ने चौंक कर देखा, फिर समझ गई। उसने डिब्बे को आदर से उठाया, जैसे परिवार का कोई सदस्य हो।
शुगर की बीमारी ने उसे जो सिखाया, वह किसी प्रवचन में नहीं था। जीवन की देखभाल भी एक प्रेम है, बस उसमें, नियमित जांच होती है। जानूमेट ने उसे यह प्रेम करना सिखा दिया था। बिना शिकायत, बिना शर्त, हर भोजन के साथ। अपनी जिंदगी में जुनू और जानूमेट के अनुप्रास पर वह बरबस एक बार फिर मुस्करा पड़ा ।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय बाल कहानी — “जबान फिसली ” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३७ ☆
बेक्टो नींद में था. तभी जबान ने पूछा, ” आप मुझे जानते हो? मैं कौन हूं?”
यह सुन कर बेक्टो हंसा, ” आप को कौन नहीं जानता है. आप हमारी जबान हो. आप को जिह्वा भी कहते हैं.”
” बिलकुल ठीक कहा बेक्टो , ” जबान बोली, ” मगर, आप यह नहीं जानते हो कि मैं एक मांसपेशी हूं. भले ही आप ने मुझे एक नाम दे दिया हो. मगर, मैं कहलाती हूं एक मांसपेशी.”
बेक्टो को यह पता नहीं था. जबान एक मांशपेशी है. वह खुश हो कर बोला, ” मुझे आज मालुम हुआ कि आप एक मांसपेशी हो.”
तब जबान ने कहा, ” मैं शरीर की सब से मजबूत मांसपेशी हूं. केवल एक जगह जुड़ी रहती हूं. मगर, काम बहुत करती हूं. जब चलती हूं तो अच्छेअच्छे की छूटी कर देती हूं. मेरी वजह से कई लोग मार खा जाते हैं. मेरे मुंह के आसपास जो दांत देख रहे हो. ये बहुत मजबूत होते है.
” जब मैं चलती हूं तो लोग इन्हें भी तोड़ डालते हैं. मैं इन मजबूत दांतों के बीच आराम से रह लेती हूं. यह बात दूसरी है कि ये मजबूत दांत कभीकभी मुझे भी खा जाते हैं. इस कारण मेरे अंदर घाव हो जाता है. मगर, मैं इस घाव को जल्दी भर देती हूं.”
जबान बोले जा रही थी. बेक्टो ने कहा, ” अपने मुंह मियां मिटठु मत बनो. यह अच्छी बात नहीं है.”
जबान को इस मुहावरे का अर्थ मालुम था. उस ने कहा, ” अरे हां. मैं तो भूल ही गई कि मैं मांसपेशियों के बारे में बता रही थी. मैं अपने मुंह अपनी ही प्रशंसा करने लगी. इसे ही अपने मुंह मिया मिटठू बनना कहते हैं.”
” खैर जाने दो.” जबान ने कहना शुरू किया, ”आप के पूरे शरीर में 600 तरह की मांसपेशियां होती हैं. इन्हीं की वजह से शरीर को गति और ऊर्जा मिलती है. मुंह से बोलना हो या खाना चबाना सब में मेरा उपयोग होता है. यदि शरीर में मांसपेशियां न हो तो आप लोग जिंदा नहीं रह सकते हो. यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे.”
” क्या ! ” बेक्टो को यह मालुम नहीं था. वह चौंक उठा, ” बिना मांसपेशी के हम जिंदा नहीं रह सकते हैं ! ” उस की आंखे फेल गई.
” हां, ” जबान ने कहा, ” आप के हृदय और फेफड़े भी मांसपेशियों के बने होते हैं. जिन की वजह से आप पूरे शरीर में खून पंप कर पाते हो. सांस लेना इन्हीं की वजह से संभव है. यदि ये मांसपेशियों के न बने होते तो आप जीवित न होते.
” शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं मांसपेशियों से बना होता है. जब आप मुस्कराते हो तो चेहरे पर प्रसन्नता के भाव इन्हीं मांसपेशियो की वजह से आता है. यदि ये काम न करें तो तुम मुस्करा नहीं पाओ. रोने में इन्हीं का हाथ होता है. लिखने में इन्हीं के कारण आप लिख पाते हो. यानी हरेक काम जो आप करते हो सभी में इन का हाथ होता है ?”
” तब तो हम सब काम अपनी मरजी से इन्हीं मांसपेशियों की वजह से करते हैं ?”
” नहीं नहीं, ” जबान झट से कैंची की तरह चलती हुई बोली, ” कुछ मांसपेशियां ऐसी होती है जो स्वयं संचालित होती रहती है. उन्हें किसी के द्वारा चलाने की आवश्यकता नहीं होती है. इन्हें अस्वैचिछक मांसपेशिया या स्वचलित मांसपेशियां कहते हैं. जैसे हृदय का धड़कना और फेफड़े का खून पंप करना. ये काम स्वत: होते रहते हैं. इन्हें हम स्वयं नहीं करते हैं. इसलिए इन्हें स्वसंचालित या अस्वैच्छिक मांसपेशियां कहते हैं.
” कुछ मांसपेशियां हमारी मरजी से चलती है. जैसे अभी तुम कुछ सोच रहे हो. इस के पहले मुझसे कुछ पूछ रहे थे. ये कार्य तुम्हारी द्वारा नियंत्रित हो रहा था. इसलिए इस तरह के कार्य करने वाली पेशियों को स्वैच्छिक पेशी कहते हैं. इस पर आप का नियंत्रण होता है.”
जबान अभी कुछ कहना चाह रही थी. दांत को उस का बोलना अच्छा नहीं लगा. उस ने उसे रोकना चाहा, ” ज्यादा बोलना अच्छा नहीं रहता है ,” मगर, जबान कब मानने वाली थी. वह जब एक बार चलना शुरू हो जाती है तो बंद नहीं होती है. इसलिए कहते हैं कि जबान बहुत ज्यादा चलती है.
” अब चुप हो जा ! ” दांत ने उसे ललकारा. मगर, जबान बंद नहीं हुई. इस पर दांत ने जबान को काट लिया . उस पर घाव हो गया. वह चुप हो गई.
इस वक्त बेक्टो सोया हुआ था. उसे जोर का दर्द हुआ. वह उठ बैठा. उस ने देखा कि उस की जबान दर्द कर रही थी. उस ने जबान मुंह से बाहर निकाल कर देखी. उस पर घाव था. सोते समय वह अपनी जबान स्वयं काट चुका था.
बेक्टो तुरंत बैठ गया. वह एक अच्छे सपना देख चुका था. इसलिए वह बहुत खुश था.
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– सिकंदर…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९१ — सिकंदर —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
मैं सिकंदर को कहानियों से जानता हूँ। आज उसके लिए लिख रहा हूँ। तुम पराजित योद्धा के रूप में पीछे लौटे हो सिकंदर। तुम जहाँ खड़े हो यह तुम्हारी विजय की जमीन नहीं है। इस जमीन को पता नहीं था तुम किस इरादे से आगे बढ़े थे। अब पता है तुम क्यों वापस आए हो। फिर भी यह तुम्हें स्वीकार करेगी। जमीन होती ही ऐसी है। तुम हो, कोई और हो, हर किसी के लिए यह दो गज की जमीन सुरक्षित रखती है।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “स्वाभिमान”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
सुबह सवेरे अखबार बांटने जब एक छोटा सा लड़का आने लगा तब मन में उत्सुकता जगी कि पूछ लूं कि पढ़ते लिखते क्यों नहीं? या पापा पढ़ाते क्यों नहीं? इस कंपकंपाती सर्दी में जब बच्चे रजाई से बाहर नहीं निकलते तब वह अखबार बांटने क्यों और किन मजबूरियों में आता है?
एक दिन जैसे ही वह अखबार फेंक कर जाने लगा तब मैंने रोक कर पूछा -रुकना, ऐ लड़के।
-कहिए।
-क्या स्कूल पढ़ने नहीं जाते?
-जाता हूं और नौवीं में पढ़ता हूं।
-फिर तुम्हारे पापा तुम्हें इस काम के लिए क्यों भेजते हैं?
-पापा बीमार हैं और मैं उनकी मदद करना चाहता हूं।
-कल सुबह मैं तुम्हें कुछ नोट बुक्स देना चाहता हूं।
-क्यों? मैं खुद कापियां किताबें ले सकता हूं , सर। जो नहीं ले सकते उन्हें दीजिए न।
इतना कह कर उसने साइकिल के पैडल पर पांव जमाया और अखबार बांटने चल दिया।
☆ लघुकथा ☆ ~ ए.सी. बस ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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शिशिर अपने कड़ाके भरी क्रूर शीतलहर के माध्यम से सबको अपने आगोश में लेने की पूरी कोशिश में लग गया था। सूर्य की किरणें डर कर न जाने कहां छुप गयीं थीं। शीतलहर की क्रूरता की स्थिति यह थी कि वह शरीर के मांस, मज्जा क्या हड्डियों के भीतर तक घुस कर जान खींचने को तैयार था। बुढ़ापे की ओर बढ़ चली रंजू की माँ बिस्तर से उठने की लगातार कोशिश कर रहीं थी,लेकिन उनके पैर के घुटने उन्हें उठने से बुरी तरह रोक रहे थे। वहीं छोटी बेटी रंजू को प्रत्येक दिन घर का खाना नाश्ता बनाकर हर हाल में प्रातः आठ बजे कोचिंग जाने के लिए निकलना ही होता था।
आखिरकार रंजू शहीद पथ पुल के नीचे साऊथ सिटी बस स्टॉप पर पहुंच गयी थी। कंधे से लटका स्कूल बैग, शरीर पर एक पतले से स्वेटर के अलावा और कुछ भी नहीं था। कई ऑटो वाले आए और चले गए लेकिन रंजू इतना हिम्मत नहीं जुटा सकी कि वह उन ऑटो में बैठ सके। कारण यह नहीं था कि उसका किराया ₹15 था। ट्रांसपोर्ट नगर तक का सिटी बस का किराया भी ₹11 /- था। जिसे देकर रंजू किसी तरह से अपने महीने के हिसाब किताब में जोड़कर चल सकती थी। कारण यह था कि शरीर को कंपा देने वाले जाड़े से बचने के लिए बस ही एक अच्छा साधन था। ऐसी ठण्ड में खुली ऑटो में चलना किसी बड़ी मुसीबत से कम नही था। एक के बाद एक- दो इलेक्ट्रिक ए.सी. बस आयीं और चली गई,लेकिन बेचारी रंजू यह हिम्मत नहीं जुटा पायी कि वह उन ऐसी बसो में बैठकर चली जाए। कारण वही जो उनका किराया साउथ सिटी से ट्रांसपोर्ट नगर ₹20/- था।
अचानक तीसरी एसी बस आयी और रुकी। तेज ठंडी हवाओं से दो चार हाथ कर रही रंजू ने अपने पांव बस की तरफ बढ़ाये लेकिन गरीबी ने फिर उसके पैरों को पीछे खींच लिया। सवाल ₹9/- बढ़ाने का था। लेकिन आज इस बार का दृश्य कुछ बदला सा था।
बस के कंडक्टर ने कहा बिटिया क्यों रुक गई, आओ बस में बैठ जाओ।
नहीं भैया, ! हम ₹20 /-नहीं दे सकते। ₹20/- हम गरीब घरों के स्टूडेंट की क्षमता के बाहर है।
अरे बिटिया ₹ 20 /- नहीं, ₹15 /- तो दे सकती हो न.. कंडक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा।
हां भैया..मैं ₹15 दे सकती हूं लेकिन आप ₹15 /-में तो नही ले जा सकते ..रंजू ने कहा।
आओ.. आओ जल्दी करो बैठ जाओ। हम ₹15 में तुझे ले जाएंगे और टिकट भी देंगे। बिटिया! अब ए.सी. (इलेक्ट्रीक) बस के किराए को सरकार ने ₹20 से घटकर ₹15 कर दिए है। अब तो इस रूट पर जनरल बसें चलती भी नहीं है। रंजू के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई और वह जाकर एसी बस में बैठ गयी।
रंजू आज बहुत खुश थी। आज वह पहली बार स्कूल जाने के लिए ए.सी. बस में बैठी थी।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय कथा – “बर्फ में धूप ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९६ ☆
कथा – कहानी – बर्फ में धूप श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
डॉक्टर राजिंदर कुमार अपने टोरंटो स्थित अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर देख रहे थे। कनाडा की सफेद, चुभती ठंड शीशे के पार दुनिया को जमा देना चाहती थी। सब कुछ बर्फ़ से ढका था। गाड़ियाँ, पेड़, सड़क, दिख रहे थे तो बर्फ पर कदमों के निशान। यह एकांगी, निस्तब्ध सफेद सुंदरता थी, जिसमें उनकी आत्मा की गूँज खो जाती थी। अंदर, हीटर की समान गरमाहट थी, सरकारी पेंशन की नियमितता थी, स्वास्थ्य सेवाओं का भरोसा भी था, एक आत्मनिर्भर, पूर्ण दुनिया, जो अचानक बहुत खोखली लगने लगी थी।
उनकी नज़र सोफे के पास टंगे एक फोटो फ्रेम पर टिक गई। पंजाब के अपने गाँव ‘चमकपुर’ की एक पुरानी तस्वीर। गर्मी की दोपहर, नहर का पानी चमक रहा है, खेतों में हरियाली लहरा रही है, और दूर, गुरुद्वारे का निशान साहब, चमक रहा है। यह वह गाँव था जिसे उन्होंने पचास साल पहले, डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ आने के बाद छोड़ा था। फिर संघर्ष, फिर सपना, बेहतर जीवन, बेहतर कमाई। राकेश कौर उनके साथ थीं, उनका प्यार, उनका सहारा था। कनाडा आने का फैसला साथ में किया था, नए सिरे से शुरुआत करने का जोश। राकेश ने ही इस अपार्टमेंट को घर बनाया था, पंजाबी मसालों की खुशबू से, गुरबाणी के शब्दों से, उनकी मंजिल को गर्मजोशी से सराबोर कर दिया था।
पर पाँच साल पहले, राकेश चली गईं, एकाएक, दिल का दौरा पड़ने से। उनके साथ वह धूप भी चली गई जो कनाडा की सबसे अधिक ठंडक में भी धूप से ज़्यादा गर्म प्यार का अहसास थी। राजिंदर अकेले रह गए। इसी अकेलेपन ने, रिटायरमेंट के बाद, उन्हें फिर से जड़ों की तलाश में चमकपुर ने बुला लिया।
लेकिन गाँव बदल चुका था। नहर अब कंक्रीट की नाली थी। पुराने पेड़ कट चुके थे। चौपाल की जगह एक ‘यूथ क्लब’ ने ले ली थी, जहाँ लड़के मोबाइल पर बिजी रहते। रिश्तेदार मिले, पर उनकी बातचीत का केंद्र बिंदु अक्सर यही होता “कनाडा में तो बहुत पैसा है न?”, “हमारे बेटे के लिए वीजा स्पॉन्सर कर दो। ” उस ‘अपनेपन’ की तलाश, जो राजिंदर की यादों में कैद था, वह हवा हो चुकी थी।
एक दिन, स्थानीय ‘शब्द साधना साहित्य परिषद’ के सचिव, श्री ओमप्रकाश शर्मा, उनसे मिले। बड़े आदर से, फूलमाला पहनाकर।
ओमप्रकाश ने कहा “डॉक्टर साहब! आप तो विदेश से आए हुए साहित्य के महान पारखी हैं! हम आपके नाम पर एक ‘राजिंदर कुमार साहित्य रत्न सम्मान’ शुरू करना चाहते हैं। देश की सेवा का यह पुनीत अवसर है। “
राजिंदर ने खुश होकर कहा, “ज़रूर, यह तो बहुत अच्छी बात है। मैं कैसे मदद कर सकता हूँ?”
ओमप्रकाश अपनी योजना सफल समझ मुस्कुराते हुए बोले “बस एक छोटी सी संस्थागत फीस है… तीन लाख रुपये। हमारे पास आपका चेक स्वीकार करने की सुविधा भी है। “
राजिंदर का दिल बिना कहे एक पल में काफी कुछ समझ गया। यह पहला झटका नहीं था। कई ‘संस्थाओं’ के फोन आ चुके थे। उनके ‘विदेशी’ होने ने, उनकी साहित्यिक रुचि को एक ‘लेन-देन’ में बदल दिया था। उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। लेकिन फोन आते रहे। कभी सुबह, कभी रात। एक तरफ पंजाब की वह याद, दूसरी तरफ इस तरह की मांगों से उपजी विरक्ति।
और फिर वह दिन आया। भारत में सुबह के दस बजे थे, धूप फैलने का वक्त। पर टोरंटो में अँधेरी, बर्फ़ीली रात के दो बजे थे। फोन की कर्कश घंटी ने नींद तोड़ दी।
अनजान आवाज़, “नमस्ते डॉक्टर साहब, मैं ‘काव्य भारती’ से बोल रहा हूँ। आपको ‘वैश्विक पंजाबी रत्न’ से सम्मानित किया जाएगा। बस कुछ प्रबंध खर्च…”
राजिंदर ने फोन काट दिया। उनकी नींद उचट गई थी। वह खिड़की के पास गए। बाहर, एक निर्मम, खामोश बर्फ़बारी जारी थी। उन्हें लगा जैसे वह खुद दो टुकड़ों में बँट गए हैं। एक टुकड़ा यहाँ, इस बर्फीली नियमितता में फँसा हुआ तो दूसरा टुकड़ा, उस चमकपुर में भटक रहा है जो अब है पर बचा ही नहीं। वह न तो यहाँ के थे, न वहाँ के। एक ‘विभक्ति’ उनके भीतर घर कर गई।
कई रातों की मानसिक जद्दोजहद के बाद, एक सुबह, जब पहली किरण बर्फ पर पड़ी और सब कुछ हीरे की तरह जगमगा उठा, तो एक शांति उन पर छा गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। यह दृश्य उनका था। यह ठंड उन्होंने झेली थी। यहाँ उन्होंने दाँत दर्द से तड़पते मरीजों को राहत दी थी। यहीं राकेश उनके साथ थीं। “प्रारब्ध, ” उन्होंने धीरे से कहा, “यही हमारी कर्मभूमि बना दी गई। यहाँ हमारा दाना-पानी रहा। अब यही घर है। “
उसी दिन उन्होंने अपनी वसीयत लिखी। कोई भव्यता नहीं। सादगी से। इलेक्ट्रिक भट्टी में शवदाह। और फिर… उनकी चुटकी भर राख नियाग्रा प्रपात के उफनते, गर्जते जल में प्रवाहित कर दी जाए। वह शक्तिशाली, अनंत प्रवाह, जो सब कुछ अपने में समा लेता है। उनकी जीवन यात्रा, उनकी यादें, उनका पंजाब और उनका कनाडा, सब कुछ एक हो जाए।
और एक अंतिम निर्देश, टोरंटो के ही एक गुरुद्वारे में, ‘डॉ. राजिंदर कुमार एंड राकेश कौर साहित्य संवाद’ नाम से एक वार्षिक कोष स्थापित किया जाए। बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी फीस के, सिर्फ़ शब्दों के लिए, विश्व हिंदी साहित्य के लिए।
डॉक्टर राजिंदर कुमार ने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा। बर्फ अब भी गिर रही थी। पर अब वह उसकी खामोशी में एक संगीत सुन पा रहे थे। यह उनकी ख़ामोशी थी। यह उनका घर था। और इस बार, देर रात फोन बजने से उनकी नींद उचटने वाली नहीं थी, वे वसीयत कर चुके थे।