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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सामाजिक चेतना – #50 ☆ प्राथमिकता ☆ सुश्री निशा नंदिनी भारतीय

सुश्री निशा नंदिनी भारतीय  (सुदूर उत्तर -पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना की अगली कड़ी में  प्रस्तुत है एक ह्रदयस्पर्शी  विचारणीय लघुकथा प्राथमिकता ।आप प्रत्येक सोमवार सुश्री  निशा नंदिनी  जी के साहित्य से रूबरू हो सकते हैं।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना  #50 ☆ ☆  प्राथमिकता ☆   श्रीमती कनिका शर्मा एक अध्यापिका व  प्रतिष्ठित महिला है। गुवाहाटी में उनका अपना छोटा सा दो बेडरूम का घर है। दो बच्चे हैं।जो बड़े हो चुके हैं। अब सारा लाड़-प्यार वह अपने पालतू कुत्ते कालू पर लुटाती रहती थीं। श्रीमती शर्मा के यहाँ काम करने वाली मालती अपने साथ पांच वर्ष की बेटी बुलबुल को लेकर आती थी क्योंकि घर पर कोई नहीं रहता था। मालती दौड़- दौड़ कर काम में लग जाती थी और बुलबुल को दरवाजे के एक कोने में बैठा देती थी। कनिका कालू को प्यार से अपने हाथ से बिस्कुट खिलाती थी। उसका मुंह साफ करती थी। उसके पंजे पोंछ कर थपकी देकर सुलाती थी। बुलबुल की नाक...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #48 ☆ सीढ़ियां ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।” हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # सीढ़ियां ☆ (दो दिन पूर्व 'सीढ़ियाँ' शीर्षक से अपनी एक कविता साझा की...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 8 ☆ सन्नाटा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आपकी एक सामयिक लघुकथा  “सन्नाटा”) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 8 ☆  ☆ लघुकथा -  सन्नाटा ☆  घन् घन्, टन् टन्, ठक् ठक्, पों पों... सुबह से शाम तक आवाजें ही आवाजें। चौराहे के केंद्र में खड़ी वह पूरी ताकत के साथ सीटी बजाती पर शोरगुल में सीटी की आवाज दबकर रह जाती। बचपन से बाँसुरी की धुन उसे बहुत पसंद थी। श्रीकृष्ण जी के बाँसुरीवादन के प्रभाव के बारे में पढ़ा था। हरिप्रसाद चौरसिया जी का...
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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 30 ☆ लघुकथा – इंसानियत ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

  डॉ. ऋचा शर्मा (डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक समसामयिक , भावुक एवं मार्मिक लघुकथा  “ इंसानियत ”। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस हृदयस्पर्शी लघुकथा को सहजता से रचने के लिए सादर नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 30☆ ☆ लघुकथा – इंसानियत ☆   प्लीज अंकल, दो महीने से मुझे सैलेरी नहीं मिल रही है जैसे ही मिलेगी मैं आपको किराया दे दूंगी . मुझे कुछ नहीं पता, रहना हो तो  किराया दो, नहीं तो मकान खाली कर दो. इस समय मुझे यहीं रहने दीजिए. आप ही बताइए ना मैं कहाँ जाऊँ इस समय ?   . मुझे कुछ नहीं पता...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 48 – परीक्षा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”   (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा  “परीक्षा”। ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 48 ☆ ☆ लघुकथा –  परीक्षा☆ मैंने परीक्षा कक्ष में जा कर मैडम से कहा, "अब आप बाथरूम जा सकती है."मैडम ने  "थैं" कहा और बाहर चली गई.  मैं परीक्षा कक्ष में घूमने लगा. मगर, मेरी निगाहे बरबस छात्रों की उत्तरपुस्तिका पर चली गई थी. सभी छात्रों ने वैकल्पिक प्रश्नों के सही उत्तर कांट कर गलत उत्तर लिख रखे थे. यानी सभी छात्रों ने एक साथ नकल की थी. छात्रों के 20 अंकों के उत्तर गलत थे.  मुझ से  रहा नहीं गया.  एक छात्र से पूछ लिया, "ये गलत उत्तर किस ने बताएं है ?" सभी छात्र आवाक रह गए. और एक...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 45 ☆ व्यवहार ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल (डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है  आज के सामाजिक परिवेश में जीवन के कटु सत्य को उजागर करती एक लघुकथा  “व्यवहार”। )  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 45 – साहित्य निकुंज ☆ ☆ व्यवहार ☆ मंजू कॉलेज और घर का सब काम करते हुए साथ में सास की सेवा भी तल्लीनता से कर रही थी पतिदेव भी प्रोफेसर है। पता नहीं क्यों वह मंजू में इंटरेस्ट नहीं लेते हैं।  मंजू ने एक दिन पूछ लिया.." क्या बात है आखिर हमारे दो-दो बच्चे हो गए हैं सब की शादी हो गई है। अब बुढ़ापा हम दोनों का ही साथ में कटेगा आपको क्या हो गया है। आप हमसे बात क्यों नहीं करते।" पतिदेव ने कहा.." देखो हमें पता है तुम्हारा...
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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 29 ☆ लघुकथा – एक सवाल मजदूर का ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा (डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक समसामयिक लघुकथा  “एक सवाल मजदूर का”। मजदूर का ही नहीं हम सब का भी एक सवाल है कि जिन  मजदूरों को गाड़ियों में भर भर कर जैसे भी भेजा है उनमें से कितने वापिस आएंगे ? डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस हृदयस्पर्शी लघुकथा को सहजता से रचने के लिए सादर नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 29 ☆ ☆ लघुकथा – एक सवाल मजदूर का ☆   बाबा मजदूर क्या होता है? मजदूर बहुत मेहनतकश इंसान होता है बेटवा! अच्छा! मजदूर  काम क्या करता है? बडी-  बडी इमारतें बनाता है, पुल बनाता है, मेहनत...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 47 – प्यार बढ़ता गया ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”   (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी  एक शिक्षाप्रद लघुकथा  “प्यार बढ़ता गया”। ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 47 ☆ ☆ लघुकथा –  प्यार बढ़ता गया☆ नौ को आठ का जबान लड़ाना अच्छा नहीं लगा. उस ने गुस्से में सात को थप्पड़ रसीद कर दिया. सात ने छः को, छः ने पांच को. मगर यह सिलसिला एक पर आ कर रुक गया. एक किस को थप्पड़ रसीद करता. यह उस का स्वभाव नहीं था . उस ने प्यार से शून्य को बुलाया और पास बैठा लिया. यह देख कर नौ घबरा गया. वह समझ गया कि शून्य के साथ लग जाने से एक का मान उस से एक ज्यादा हो गया, “ अब आप मेरे साथ भी वही सलूक...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 45 – लघुकथा – अदृश्य ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी  एक अप्रतिम लघुकथा  “अदृश्य”। अतिसुन्दर लघुकथा जिसके पीछे एक लम्बी कहानी दिखाई देती है जो वास्तव में अदृश्य है और पाठक को उसकी विवेचना स्वयं करनी होगी। इस लघुकथा की खूबसूरती यह है कि प्रत्येक पाठक की भिन्न विचारधारा के अनुरूप इस लघुकथा के पीछे विभिन्न कथाएं दिखाई देंगी जो उनकी  विभिन्न परिकल्पनाओं पर आधारित होंगी । इस सर्वोत्कृष्ट विचारणीय लघुकथा के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।)  ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 45 ☆ ☆ लघुकथा  – अदृश्य ☆ प्रतिदिन की भांति दिव्या उठी। माँ से लाड प्यार कर ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगी। फिर माँ के पूजन के बाद एक लिफाफे को निकाल प्रणाम कर, फिर पूजा के जगह पर रख देना प्रतिदिन का नियम था। कभी उसने लिफाफे को देखने के लिए जिद नहीं की,...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सामाजिक चेतना – #48 ☆  महामारी और रिश्ते ☆ सुश्री निशा नंदिनी भारतीय

सुश्री निशा नंदिनी भारतीय  (सुदूर उत्तर -पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना की अगली कड़ी में  प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित लघुकथा  महामारी और रिश्ते   ।आप प्रत्येक सोमवार सुश्री  निशा नंदिनी  जी के साहित्य से रूबरू हो सकते हैं।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना  #48 ☆ ☆   महामारी और रिश्ते  ☆ हमारी पड़ोस में रहने वाले वर्मा जी स्टेट बैंक में मैनेजर थे। सेवा निवृत्त हुए लगभग दस साल हो चुके थे। इस समय उनकी उम्र सत्तर के करीब थी। आस पास के सभी लोग उन्हें बाबूजी कहकर पुकारते थे। वर्मा जी बहुत ही सज्जन व्यक्ति थे। बच्चे, बड़े व हमउम्र सभी के साथ उनका व्यवहार बहुत अच्छा था। बाबूजी को अपने अनुशासन युक्त उत्तम कार्य के लिए सरकार की ओर से एवार्ड भी मिल चुका था। उनके परिवार में उनकी धर्मपत्नी कृष्णा तथा चार बच्चे थे। दोनों बेटियां अपना सुखमय वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रही थी। दोनों बेटे सुमित और अमित अपनी पत्नियों के साथ बाबूजी के...
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