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हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ रोटियां सेंकने जाना था ☆ – श्री कपिल साहेबराव इंदवे

श्री कपिल साहेबराव इंदवे    (युवा एवं उत्कृष्ठ  मराठी कथाकार, कवि, लेखक श्री कपिल साहेबराव इंदवे जी का एक अपना अलग स्थान है. आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशनधीन है. एक युवा लेखक  के रुप  में आप विविध सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने के अतिरिक्त समय समय पर सामाजिक समस्याओं पर भी अपने स्वतंत्र मत रखने से पीछे नहीं हटते. हम भविष्य में श्री कपिल जी की और उत्कृष्ट रचनाओं को आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे. आज प्रस्तुत है   ई-अभिव्यक्ति  पहली हिंदी लघुकथा "रोटियां सेंकने जाना था." )   ☆ लघुकथा -  रोटियां सेंकने जाना था ☆   दिन भर कि थकान से हरीश घर वापिस लौटा । आते ही वह बेड पर लेट गया। थकान से चूर होने कि वजह से उसकी कब आँख लग गई पता ही नही चला। उसके बेटे ने उसे जगाया कहा- "पापा उठिए मम्मी खाने पर बुला रही है।" तब जा कर वह जागा लेकिन बेटे के इन शब्दो ने उसे उसके अतीत में ले जा कर छोड़ दिया। जब वह छोटा...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं – # 18 – जीवन साथी ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’   (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक अतिसुन्दर लघुकथा “जीवन साथी”।  श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ़ जी  ने  इस लघुकथा के माध्यम से  एक सन्देश दिया है कि -  पति पत्नी अपने परिवार के दो पहियों की भाँति होते हैं ।  यदि वे  मात्र आपने परिवार ही नहीं अपितु एक दूसरे के परिवार का भी ध्यान रखें तो जीवन कितना सुखद हो सकता है।  )    ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 18 ☆   ☆  जीवन साथी ☆   जीवनसाथी कहते ही मन प्रसन्न हो जाता है।  दोनों परिवार वाले और पति पत्नी का साथ सुखमय होता है। ऐसे ही ममता और विनोद की जोड़ी बहुत ही सुंदर जोड़ी। ममता अपने गांव से पढ़ी लिखी थी और विनोद एक इंजीनियर। ममता के घर खेती बाड़ी का काम होता था। भाई भी ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। सभी खेती किसानी में लगे थे परंतु सभी खुशहाल थे। ममता...
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हिन्दी साहित्य – नवरात्रि विशेष – लघुकथा – ☆आलोचक बुद्धि… ☆ – डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

नवरात्रि विशेष  डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’   (अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आज प्रस्तुत हैं नवरात्रि पर विशेष लघुकथा   “आलोचक बुद्धि... "। )   ☆ लघुकथा - आलोचक बुद्धि... ☆     दुर्गोत्सव पर्व पर भक्तवृन्द की भारी उपस्थिति के साथ मंदिर में आरती हो रही थी। इसी बीच आज के कार्यक्रम में आमंत्रित मुख्य अतिथि के रूप में स्थानीय नेता जी का आगमन हुआ। अग्रिम पंक्ति में खड़े समिति के गणमान्य नागरिकों में एक-दूसरे के सूचनार्थ खुसर-फुसर के साथ वे सब शांति से भीड़ को चीरते हुए नेताजी की अगवानी को दौड़ पड़े। ससम्मान उन्हें भीड़ में रास्ता बनाते हुए देवी प्रतिमा के सम्मुख ले आये। समापनोपरांत स्वभावानुसार रामदीन मुझसे कहने लगा - बंधु! अभी आपको कुछ गलत नहीं लगा? क्या गलत हो गया भाई? मैंने जानना चाहा बोले वे,- आरती...
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हिन्दी साहित्य – लघुकथा – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – तीन – ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )    ☆ संजय दृष्टि  – तीन ☆ तीनों मित्र थे। तीनों की अपने-अपने क्षेत्र में अलग पहचान थी। तीनों को अपने पूर्वजों से 'बुरा न देखो, बुरा न सुनो, बुरा न कहो' का मंत्र घुट्टी में मिला था। तीनों एक तिराहे पर मिले। तीनों उम्र के जोश में थे। तीनों ने तीन बार अपने पूर्वजों की खिल्ली उड़ाई।  तीनों तीन अलग-अलग दिशाओं में निकले। पहले ने बुरा देखा। देखा हुआ धीरे-धीरे आँखों के भीतर से होता हुआ कानों तक पहुँचा। दृश्य शब्द बना, आँखों देखा बुरा कानों में लगातार गूँजने...
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हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2☆ मानव ☆ श्री सदानंद आंबेकर 

ई-अभिव्यक्ति -गांधी स्मृति विशेषांक-2  श्री सदानंद आंबेकर            (महात्मा गांधी जी के  150वें  जन्म दिवस पर श्री सदानंद आंबेकर  जी  द्वारा रचित विशेष लघुकथा 'मानव'.  श्री सदानंद आंबेकर जी की हिन्दी एवं मराठी साहित्य लेखन में विशेष अभिरुचि है।  गायत्री तीर्थ  शांतिकुंज, हरिद्वार के निर्मल गंगा जन अभियान के अंतर्गत गंगा स्वच्छता जन-जागरण हेतु गंगा तट पर 2013 से  निरंतर प्रवास।)    ☆ लघुकथा - मानव ☆   शहर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं वरिष्ठ नागरिक श्री नाना देशपाण्डे साग भाजी लेकर बाजार से लौट रहे थे कि दंगों के लिये कुख्यात क्षेत्र महात्मा गांधी मार्ग पर अचानक किसी बात पर दो धर्मों के लोग आपस में भिड़ गए। मारकाट एवं लूट आरंभ हो गई। नाना ने तत्काल एक गली में प्रवेश किया व तेजी से घर जाने लगे। थोड़ी दूर गए थे कि सामने से हथियारबंद भीड़ आ गई। नाना को घेरा तो वे चिल्लाते हुए भागे कि अरे मैं तो हिंदू हूँ, मुझे जाने दो। लेकिन फिर भी भागते भागते दो चार लाठियाँ पड़ ही गईं ओर वे किसी...
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हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2 ☆ दृष्टि ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

ई-अभिव्यक्ति -गांधी स्मृति विशेषांक-2 श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”   (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। आज  महात्मा गाँधी जी की 150 वीं जयंती पर  प्रस्तुत है उनकी लघुकथा  “दृष्टि ”। ) ☆ लघुकथा— दृष्टि ☆   महात्मा गाँधी जी की मूर्ति के हाथ की लाठी टूटते ही मुँह पर अँगुली रखे हुए पहले बंदर ने अँगुली हटा कर दूसरे बंदर से कहा, “अरे भाई ! सुन. अपने कान से अँगुली हटा दे.” उस का इशारा समझ कर दूसरे बंदर ने कान से अँगुली हटा कर कहा, “भाई मैं बुरा नहीं सुनना चाहता हूं. यह बात ध्यान रखना.” “अरे भाई! जमाने के साथ साथ नियम भी बदल रहे हैं.” पहले बंदर ने दूसरे बंदर से कहा, “अभी-अभी मैंने डॉक्टर को कहते हुए सुना है. वह एक भाई को शाबाशी देते हुए कह रहा था आप ने यह बहुत बढ़िया काम किया. अपनी जलती हुई पड़ोसन के शरीर पर कंबल न डाल कर पानी डाल दिया. इस...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य लघुकथा – ☆ 150वीं गांधी जयंती विशेष -2☆ महात्मा गाँधी की जय ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

ई-अभिव्यक्ति -गांधी स्मृति विशेषांक-2 श्री घनश्याम अग्रवाल   (श्री घनश्याम अग्रवाल जी का ी-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है. श्री घनश्याम अग्रवाल जी वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि हैं. आज प्रस्तुत है उनकी एक पुरानी लघुकथा. उनके ही शब्दों में - आज महात्मा गाँधी का जन्मदिन है। बिना लागलपेट, सियासत से दूर, केवल दिलों में समाते हुए पता ही नहीं चला वो कब राष्टपिता बन गये। मगर आज? पढिए एक व्यंग्य लघुकथा। पुरानी है, फिर भी आज ज्यादा सार्थक है.)   ☆ व्यंग्य लघुकथा - महात्मा गांधी की जय ☆   'जुरासिक पार्क इतनी अद्भुत फिल्म बनी कि उसका एक विशेष शो संसद में रखा गया। पहली  बार पक्ष और विपक्ष ने बिना किसी शोरशराबे के पूरी फिल्म  देखी। फिल्म समाप्त होने पर दोनों ने न केवल एक साथ  तालियाँ बजाई, एक साथ  चाय भी पी और फिर वे दोनों एक साथ सोचने भी लगे। सोचते-सोचते उन्हें खयाल आया कि जब करोड़ों साल पुराना डायनासोर फिर से पैदा हो सकता है तो सौ-दो सौ साल पुराने नेता क्यों नहीं पैदा हो...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं – # 17 – नाम की महिमा ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’   (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक बेहतरीन लघुकथा “लघु कथा -संस्मरण -नाम की महिमा”।  श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ़ जी  ने  इस लघुकथा के माध्यम से  एक सन्देश दिया है कि कैसे धार्मिक स्थल पर तीर्थयात्रियों को श्रद्धा एवं अज्ञात भय से परेशान किया जाता है किन्तु, उनसे सुलझाने के लिए त्वरित कदम उठाना आवश्यक है।  )    ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 17 ☆   ☆ लघु कथा - संस्मरण - नाम की महिमा ☆   हमारे यहाँ हिंदू धर्म में आस्था का बहुत ही बड़ा महत्व है। इसका सबूत है कि यहां पेड़- पौधे, फूल-पत्तों, नदी-पर्वत, कोई गांव, कोई विशेष स्थान अपना अलग ही महत्व लिए हुए हैं। चारों धाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग और ना जाने कितने धर्म स्थल अपने विशेष कारणों से प्रसिद्ध हुए हैं। जहाँ पर ना जाने हमारे 33 करोड़ देवी देवताओं का निवास (पूजन स्थल) माना गया है। ऐसी ही एक सच्ची...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 17 – लघुकथा – दयालु लोग ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार   (आपसे यह  साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं.  हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे.  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं. कुछ पात्र तो अक्सर हमारे गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं.  उन पात्रों की वाक्पटुता को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं जो कथानकों को सजीव बना देता है. अक्सर  समय एवं परिवेश बच्चों की विचारधारा को भी परिपक्व बना देता है. आज प्रस्तुत है  उनकी एक ऐसी ही लघुकथा  “दयालु लोग” .)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 17 ☆   ☆ लघुकथा – दयालु लोग ☆ मिसेज़ लाल के घर महीना भर पहले नयी...
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हिन्दी साहित्य- पितृ पक्ष विशेष – कथा-कहानी – लघुकथा – ☆ पितर चले गये ☆ – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक    (डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा 16 वर्ष पूर्व लिखी गई लघुकथा “पितर चले गये ” आज भी सामयिक लगती  है.)   ☆ लघुकथा – पितर चले गये  ☆   कौआ सुबह सुबह एक छत से दूसरी छत पर कांव कांव करता हुआ उड़ उड़ कर बैठ रहा था किंतु उसे आज कुछ भी खाने को नहीं मिल रहा था । कल ही पितृ मोक्ष अमावस्या के साथ पितृ पक्ष समाप्त हो गए । इन पन्द्रह दिनों में कौओं को भरपेट हलुआ पूड़ी एवम तरह तरह के पकवान खाने को मिले थे । इसी आस में आज भी कौआ इस छत से उस छत पर भटक रहा था । थक हार कर वह एक छत की मुंडेर पर बैठ गया । उसे महसूस हो गया था कि पितर चले गए हैं ।अतः वह पुनः कचरे के ढेर में अपना भोजन तलाशने उड़ गया ।   © डॉ . प्रदीप शशांक  37/9 श्रीकृष्णपुरम इको सिटी, श्री राम इंजीनियरिंग कॉलेज के पास, कटंगी रोड, माढ़ोताल, जबलपुर ,मध्य प्रदेश – 482002 ...
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