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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ हिंदी दिवस विशेष – लघुकथा – हिंदी ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) संजय दृष्टि – हिंदी दिवस विशेष - लघुकथा – हिंदी  "...हिंदी की बात छोड़ दीजिए। कल्पनालोक से बाहर आइए। हिंदी कभी पढ़ाई-लिखाई, एडमिनिस्ट्रेशन, डिप्लोमेसी की भाषा नहीं हो सकती। हिंदी एंड इंग्लिश का अभी जो स्टेटस है, वही परमानेंट है...।" उनकी बात सुनकर मेरी आँखों में चमक आ गई। यह वही शख्स है जिसने कहा था,..."जम्मू एंड कश्मीर की बात छोड़ दीजिए। जे...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 95 – लघुकथा – अनंता ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है भाई-भाई केसंबंधों पर आधारित एक लघुकथा  “अनंता”। इस विचारणीय लघुकथा के लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन। )  ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 95 ☆   लघुकथा – अनंता गणपति का पूजन, अर्चन और अनंत रूप के दर्शन कर सभी बहुत प्रसन्न और शांत मन से अपने अपने घरों की ओर बढ़ रहे थे। एक ही अपार्टमेंट में दो भाइयों का घर, पर दोनों अनजान ऐसे रहते थे कि सभी को लगता था कि दोनों अलग-अलग है। सुधीर इसी ख्याल को लेकर पंडाल में बैठे देख रहा था कि बिना परिवार के भी यहां सभी परिवार जैसा रहते हैं। परंतु मैंने  अपने छोटे भाई अधीर से क्यों दूरी बना लिया है । उधर आगे बढ़ते पैर ठिठक से गए ।  अधीर का बस यही विचार उसके मन में भी आ रहा...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सृजन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) संजय दृष्टि – लघुकथा - सृजन  जल शांत था। उसके बहाव में आनंदित ठहराव था। स्वच्छ, निरभ्र जल और दृश्यमान तल। यह निरभ्रता उसकी पूँजी थी, यह पारदर्शिता उसकी उपलब्धि थी। एकाएक कुछ कंकड़ पानी में आ गिरे। अपेक्षाकृत बड़े आकार के कुछ पत्थरों ने भी उनका साथ दिया। हलचल मची। असीम पीड़ा हुई। लहरें उठीं। लहरों से मंथन हुआ। मंथन से सृजन...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #57 – आखिरी प्रयास ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है।  अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।” ) ☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #57 –  आखिरी प्रयास ☆ श्री आशीष कुमार☆ किसी दूर गाँव में एक...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 71 ☆ नॉट रिचेबल ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा (डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  वर्तमान परिस्थितयों में ह्रदय कठोर कर निर्णय लेने के लिए प्रेरित करती लघुकथा नॉट रिचेबल। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस संवेदनशील एवं विचारणीय लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 71 ☆ ☆ लघुकथा - नॉट रिचेबल ☆ पत्नी का देहांत हुए महीना भर ही हुआ था । घर में बडा अकेलापन महसूस कर रहे थे । बेटा - बहू , बच्चे अपना - अपना लैपटॉप लेकर कमरों में बंद हो जाते थे । घर खाने को दौड रहा था । पत्नी के जाते ही हाथ-...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 87 – लघुकथा – अंतिम इच्छा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण लघुकथा  “अंतिम इच्छा”।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 86 7 ☆ लघुकथा — अंतिम इच्छा ☆  "मेरी एक अंतिम बात मानोगे?" "जी!", डॉ ने अपने हाथ सैनिटाइजर्स धोते हुए पूछा। वह कुछ देर चुप रही। फिर बोली, " एक बार आपने एक इच्छा जाहिर की थी।" "जी !" "आपने कहा था- एक बार मुझे गले से लगा कर प्यार कर लो। मगर तब मैं मजबूर थी। मेरी सगाई हो चुकी थी।" "जी।" "अब पति भी जा चुका है। चाहती हूं मेरी भी इच्छा पूरी कर लूं।" " क्या !" " क्या आखरी बार मुझे आलिंगन करके प्यार नहीं करोगे? ताकि यहां नहीं मिल सके तो क्या हुआ वहां तो…..,"  कह कर वह डॉक्टर को निहारने लगी। © ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” 18-05-2021 पोस्ट...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #98 – सुख-दुख के आँसू…… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ (सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा “रात  का चौकीदार” महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक विचारणीय लघुकथा “सुख-दुख के आँसू......” । ) ☆  तन्मय साहित्य  # 98 ☆  ☆ सुख-दुख के आँसू...... ☆ "चलिए पिताजी- खाना खा लीजिए" कहते हुए बहू ने कमरे में प्रवेश किया।" "अरे--!आप तो रो रहे हैं, क्या हुआ पिताजी, तबीयत तो ठीक है न?" "हाँ, हाँ बेटी कुछ नहीं हुआ तबीयत को। ये तो आँखों मे दवाई डालने से आँसू निकल रहे हैं, रो थोड़े ही रहा हूँ मैं, मैं भला क्यों रोऊँगा।" "तो ठीक है पिताजी, चलिए मैं थाली लगा रही हूँ।" दूसरे दिन सुबह चाय पीते हुए बेटे ने पूछा-- "कल आप रो क्यों रहे थे, क्या हुआ पिताजी, बताइये न हमें?" "कुछ नहीं बेटे, बहु से कहा तो था मैंने कि, दवाई के कारण आँखों से आँसू निकल रहे हैं।" "पर आँख...
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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – ऐसे थे तुम ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय (जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता) ☆ कथा – कहानी ☆ लघुकथा – ऐसे थे तुम ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆  बरसों बीत गये इस बात को । जैसे कभी सपना आया हो । अब ऐसा लगता था । बरसों पहले काॅलेज में दूर पहाड़ों से एक लड़की पढ़ने आई थी । उससे हुआ परिचय धीरे धीरे उस बिंदु पर पहुंच गया जिसे सभी प्रेम कहते हैं । फिर वही...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा- गोटेदार लहंगा ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) संजय दृष्टि – लघुकथा- गोटेदार लहंगा  ..सुनो। ...हूँ। ...एक गोटेदार लहँगा सिलवाना है.., कुछ झिझकते, कुछ सकुचाते हुए उसके बच्चों की माँ बोली। ....हूँ......हाँ...फिर सन्नाटा। ...अरे हम तो मजाक कर रहीं थीं। अब तो बच्चों के लिए करेंगे, जो करेंगे।...तुम तो यूँ ही मन छोटा करते हो...। प्राइवेट फर्म में क्लर्की, बच्चों का जन्म, उनकी परवरिश, स्कूल-कॉलेज के खर्चे, बीमारियाँ, सब संभालते-संभालते उसका जीवन बीत गया। दोनों...
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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – कोरोना की रोटी ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

श्री घनश्याम अग्रवाल (श्री घनश्याम अग्रवाल जी वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि हैं. आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा कोरोना की रोटी। ) ☆ लघुकथा – कोरोना की रोटी ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆  रिपोर्ट पॉज़िटिव निकली। घर भर में सन्नाटा फैल गया । बूढे को अटैच -बाथरूम वाले छोटे से कमरे में 14 दिनों के लिए क्वारनटाइन कर दिया गया । बच्चों को उस कमरे से दूर रहने की हिदायत दे दी गई।  बहू सुबह-शाम डरते-डरते चाय और दो वक्त का खाना दहलीज़ पर रख आती। फिर हाथों को सेनीटाइज कर लेती। बूढे ने आज तीन में से दो ही रोटी खाई। बची हुई तीसरी रोटी का क्या करें ? जिसकी  थाली तक नहीं छूते उसकी थाली की रोटी भला कौन खायेगा? कमरे में खिड़की नहीं थी वरना वह रोटी फेंक देता। क्या करे इस रोटी का?  जी में आया बाहर जाकर गाय या किसी भिखारी को दे दूँ । पर पॉज़िटिवों के लिए तो घर की दहलीज़ 14 दिनों के लिए लक्षमण रेखा...
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