हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८१ ☆ लघुकथा – बेटे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “बेटे…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८१ ☆

✍ लघुकथा ☆ बेटे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

कहानी  – 

सूरज की तपिश ठंडी होती  जा रही थी और प्रकाश लालिमा में बदल कर सुमधुर वातावरण बनाता जा रहा था तभी राम नारायण अपने चिर-परिचित बरगद के नीचे बिछी बैंच पर बैठते जा रहे थे। वे बैठ भी नहीं पाए थे कि आवाज आई, “अरे राम, आ गए?”, उन्होंने एक नजर डाली और ओठों पर मुस्कान लाने का प्रयास करते हुए बैठ गए। तभी मनजीत सिंह उनके पास आ गए। यह उनके शाम की चौपाल की जगह थी, जहाँ रोज इकट्ठे होते और चर्चा किया करते। मनजीत ने राम नारायण का चेहरा उदास देखा तो पूछा कि सब खैरियत है न, चेहरा लटका क्यों है?

राम नारायण कुछ उत्तर देते कि उससे पहले कई आवाजें आसमान में तैर गईं। दोनों ने देखा चौपाल के अन्य साथी मुश्ताक, जोसेफ, गौतम, जहांगीर, महावीर, फ़ीरोज़ व एरियल हँसते बोलते चले आ रहे हैं। राम नारायण और मनजीत को शांत देखकर वे भी सहम गए और चुपचाप बैठ गए।  एरियल ज्यादा देर शांत न रह सके । वरी सांई कुछ तो बोलो। मनजीत ने चुप्पी तोडी और बोले ,”राम प्रा के बड़े बेटे की तबीयत अचानक खराब हो गई है।” “बस” एरियल चिहुंके। राम नारायण बोले, “भाई हिंदू धर्म में बेटों का बड़ा महत्व होता है खास कर बड़े बेटे का, क्योंकि वही पिता को मुखाग्नि देता है, पिंडदान करता है और पिता को मोक्ष दिलाता है। इसलिए बेटों का बहुत महत्व है।  बेटों को बुढ़ापे की लाठी माना जाता है। इससे बेटी का महत्व कम नहीं होता, वरन् वह कन्यादान का अवसर प्रदान करके माता पिता का जीवन सफल बनाती है।”

इस पर मुश्ताक बोले, ”  इस्लाम धर्म में बेटा बेटी दोनों को अल्लाह की नेमत माना जाता है। बेटी को रहमत और बेटे को नेअमत बताया गया है। रहमत का मतलब अल्लाह की दया है और नेअमत अल्लाह का इनाम है। बेटों को बुढ़ापे का सहारा तो माना जाता है क्योंकि बेटियाँ पराए घर चली जाती हैं।”  मुश्ताक चुप हुए ही थे कि जोसेफ बोल पडे, ” ब्रदर ईसाई धर्म में बेटा बेटी में कोई आध्यात्मिक अंतर नहीं माना जाता। दोनों  ईश्वर की संतान हैं।”  आगे एरियल बोले, ” यहूदी धर्म में सबसे बड़े बेटे को धार्मिक महत्व ज्यादा मिलता है। उसे पिता की विरासत में अन्य संतान की अपेक्षा दोगुना हिस्सा मिलता है।  धार्मिक कर्तव्यों के लिए बेटों का होना जरूरी माना जाता है। लेकिन अब अंतर आ गया है। बेटियाँ भी धार्मिक कर्तव्यों में हिस्सा लेने लगी हैं।”

“ओ बादशाहो, गुरु ग्रंथ साहिब में स्त्री पुरुष समानता पर बहुत जोर दिया गया है। इसलिए सिख धर्म में बेटा बेटी में कोई भेद नहीं होता।” गुरमीत सिंह ने अपनी सहज बुलंद आवाज में कहा। गौतम ने कहा, “बौद्ध धर्म में आदमी को मोक्ष स्वयं के कर्मों से मिलता है। बेटा बेटी का इससे कोई संबंध नहीं। हां, उन दोनों का अपना अपना महत्व तो होता ही है।” महावीर बोले, “जैन धर्म में भी बेटा बेटी में कोई भेद नहीं है।” सबकी बातें सुनकर फ़ीरोज़ गंभीरता से बोले, “पारसी धर्म में धर्म और पहचान दोनों पिता से चलती हैं। इसलिए पुत्र का महत्व ज्यादा है। उसे वंश चलाने वाला माना जाता है। लेकिन अब बेटियों को बराबर महत्व दिया जाने लगा है।”

चौपाल खत्म होने का समय हो गया। सबने उठते उठते कहा भाइयों समाज में स्त्री विमर्श पर खूब चर्चा होती है पर पुरुष विमर्श पर नहीं होती। वृद्धों पर बेटों के अत्याचार की चर्चा भी खूब होती है परंतु उनके त्याग, तनाव, भावना व श्रम की चर्चा नहीं होती। जब बेटा बेटी बराबर हैं तो हर क्षेत्र में बराबरी रहनी चाहिए। दोनों में किसी भी स्तर पर भेद नहीं देखना चाहिए। और एक दूसरे से हाथ मिला कर सभी अपने अपने घर चल दिए।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

Please share your Post !

Shares
1

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १३१ – एक फूल और एक नई राह… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – एक फूल और एक नई राह।)

☆ लघुकथा # १३१ – एक फूल और एक नई राह ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

अनंत चतुर्दशी के दिन  शहर की सड़कें गणपति विसर्जन की तैयारियों से गुलजार थीं। कहीं ढोल-नगाड़े बज रहे थे, कहीं श्रद्धालु जयकारे लगा रहे थे—“गणपति बप्पा मोरया!”

सीता मंदिर से पूजा करके लौट रही थी। हाथ में पूजा की थाली थी, लेकिन मन वर्षों से एक अनकही पीड़ा से भरा था। विवाह को कई साल बीत चुके थे। हर दूसरे दिन कोई न कोई पूछ ही देता—“अभी तक कोई खुशखबरी नहीं?” वह मुस्कुराकर बात टाल देती, मगर हर सवाल उसके भीतर एक खालीपन छोड़ जाता।

आज मंदिर में उसने माँ गौरी के सामने बस इतना कहा था—“माँ, मेरी गोद भरना मेरे हाथ में नहीं है, पर मुझे किसी के काम आने का अवसर जरूर देना।”

वह सड़क पार करने ही वाली थी कि अचानक भीड़ के बीच एक छोटा बच्चा रोता हुआ दिखाई दिया।

“माँ… माँ…!”

लोग अपनी-अपनी धुन में आगे बढ़ रहे थे। बच्चा घबराकर इधर-उधर देख रहा था।

सीता तुरंत उसके पास पहुँची।

“बेटा, घबराओ मत। तुम्हारी माँ मिल जाएगी। मेरा हाथ पकड़ो।”

बच्चे ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

सीता उसे सड़क किनारे ले आई। पानी पिलाकर प्यार से पूछा, “तुम्हारी माँ कैसी दिखती हैं?”

बच्चा सुबकते हुए बोला, “लाल साड़ी… माथे पर बड़ी बिंदी…”

सीता ने आसपास नजर दौड़ाई। कुछ ही मिनटों बाद एक महिला बदहवास-सी दौड़ती हुई आई।

“मेरा बेटा! मेरा बेटा कहाँ है?”

बच्चा सीता का हाथ छोड़कर माँ की ओर दौड़ पड़ा।

महिला ने उसे सीने से लगा लिया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

“बहनजी, आपने आज मेरी जान बचा ली। भीड़ में इसका हाथ छूटा तो लगा सब कुछ खत्म हो गया।”

सीता ने मुस्कुराकर कहा, “बच्चा मिल गया, बस यही बड़ी बात है।”

बच्चा माँ की बाँहों से झाँककर बोला, “आंटी, धन्यवाद!”

सीता कुछ क्षण उसे देखती रही। उसके चेहरे पर बरसों बाद सहज मुस्कान आई।

वापस लौटते समय सड़क किनारे फूलों की दुकान दिखाई दी। उसकी नजर लाल गुड़हलों पर पड़ी। उसने दो फूल खरीदे और थाली में रख लिए।

घर पहुँचते ही पति ने पूछा, “आज देर कैसे हो गई?”

सीता ने सारी घटना सुना दी।

कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोली, “आज मुझे एक बात समझ आई।”

“क्या?”

“माँ होना केवल बच्चे को जन्म देना नहीं है। किसी रोते हुए बच्चे का हाथ थामना भी माँ होना है।”

वह रुकी, फिर धीमे स्वर में बोली, “हमारी गोद भरेगी या नहीं, मैं नहीं जानती। लेकिन अगर किसी बच्चे को माँ, घर और अपनापन चाहिए… तो क्या हम उसे अपना नहीं सकते?”

पति ने उसकी ओर देखा और उसका हाथ थाम लिया।

“इस बारे में आज से साथ मिलकर सोचेंगे।”

सीता की आँखें भर आईं। उसकी नजर थाली में रखे दो लाल गुड़हलों पर टिक गई।

सुबह वह एक फूल लेने निकली थी, शाम तक उसके हाथ में दो फूल थे।

एक उसकी बरसों पुरानी इच्छा का प्रतीक था, दूसरा शायद नई राह का संकेत।

बाहर गणपति विसर्जन की जयकार गूँज रही थी—”गणपति बप्पा मोरया!”

सीता ने आँखें बंद कर लीं।

आज उसने कोई मन्नत नहीं माँगी।

बस मुस्कुराकर कहा— “बप्पा, आज समझ गई… माँ बनने के लिए गोद भरना जरूरी नहीं, किसी का हाथ थामना जरूरी है।”

आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार वे कमी के नहीं, एक नई शुरुआत के आँसू थे।

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – छूटता हुआ शहर… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – छूटता हुआ शहर।)

☆ कथा-कहानी – लघुकथा – छूटता हुआ शहर… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

जब मैंने पीछे पलटकर देखा तो पाया कि रेलगाड़ी धड़धड़ाती हुई सुनार नदी का पुल पार कर रही थी। उसी पुल के उस पार मेरी किशोरावस्था और यौवन की दहलीज छूट रही थी । रेलगाड़ी आगे बढ़ती रही, और पीछे छूटते दृश्यों के साथ हटा, जैतवारा और दमोह भी स्मृतियों में एक-एक कर उतरते चले गए। और फिर अचानक जैतवारा से दमोह तक का सफ़र याद आ गया। बघेली मिश्रित हिन्दी पर सहपाठियों की हँसी, विज्ञान छोड़कर कला संकाय पढ़ने की अधूरी इच्छा, माँ के निर्णय, रसायनशास्त्र की कठिन पढ़ाई, घर की आर्थिक जिम्मेदारियाँ—सबने मिलकर जैसे मुझे समय से पहले बड़ा कर दिया था। आज भी मुझे याद है माँ का वाक्य – “बेटा, विज्ञान पढ़कर कला में कौन जाता है? ज़रा सोचो, आगे का जीवन कैसे बनेगा।” अब वही जीवन मुझे स्टेट बैंक की नौकरी के लिए सागर ले जा रहा था ।  “रेलगाड़ी आगे बढ़ती रही, और पीछे छूटता दमोह धीरे-धीरे स्मृतियों में बदलता गया। मन ने जैसे फुसफुसाकर पूछा—”अब कब तक पीछे पलटकर देखते रहोगे?” मैंने एक बार फिर पीछे देखा। पुल अब दिखाई नहीं दे रहा था। सागर स्टेशन सामने था—जैसे जीवन का नया पड़ाव, जहाँ जिम्मेदारियों की गाड़ी उतरने वाली थी। मैंने खिड़की से सिर भीतर खींच लिया।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १२० – शिल्पी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– शिल्पी…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १२० — शिल्पी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

कोई पत्थर चिंतन में खोया होगा कि सहसा आकाश से दो मोटी बूँदें टपक कर उसके ललाट पर स्थायी रह गयी हों। राह चलते एक आदमी ने देखने पर सोचा होगा दो आँखों वाला पत्थर है। संयोग से वह एक शिल्पी होगा। पत्थर की आँखें हुईं तो शरीर क्यों न हो? शिल्पी ने पत्थर को शरीर में तराश दिया होगा। इस तरह पत्थर से भगवान का अस्तित्व बन गया होगा। उसके आँसू प्रतीक हुए, वह ईश्वर की करुणा थी।

 © श्री रामदेव धुरंधर

20 – 09 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथाः ये जीवन है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय  – लघुकथाः ये जीवन है…!

☆ लघुकथा –  लघुकथाः ये जीवन है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆ 

सालों बाद राघव और रागिनी का माल में अचानक आमना-सामना हो गया। राघव के साथ उसकी पत्नी, बेटे और बेटी थी, पर रागिनी निपट अकेली। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। नज़रें मिली और पल भर के लिए एकबारगी अतीत की स्मृति में कौंध खो गए। चंद लम्हों के लिए दोनों की नज़रें मानो थिर हो गई।

तभी राघव ने अपने समक्ष जड़वत खड़ी रागिनी का अपनी धर्मपत्नी से परिचय कराते हुए- यह रागिनी है। दोनों ने परस्पर औपचारिक अभिवादन किया। राघव ने बात को आगे बढ़ाते हुए बताया कि हम कभी एक कॉलेज, एक क्लास में पढ़ा करते थे। रागिनी ने कॉलेज में होने वाली सौंदर्य प्रतियोगिता में अव्वल ख़िताब जीता था। इसके अनगिनत चाहने वाले थे, पर इसने सबकी चाहत को दरकिनार करते हुए शहर के नामी-गिरानी रईस के बेटे से शादी कर अपनी पढ़ाई अधबीच में ही छोड़ दी थी।

कुछ पल के लिए राघव रूका। रागिनी के चेहरे को गौर से देखा और हाल-चाल पर टिप्पणी करते हुए पूछा- ‘तुम्हारी जिंदगी, तो बड़े मौज में गुजर रही होगी और हाँ! तुम्हारे श्रीमान के क्या हाल-चाल हैं।’ रागिनी दुखी और थकी हुई आवाज़ में बोली- ‘पिछले साल पति महोदय की दिल का दौरा पड़ने से आकस्मिक मृत्यु हो गई और पंद्रह दिन पहले बेटा कार दुर्घटना में अपनी एक पाँव गँवा बैठा है। भौतिक सुख-सुविधाओं का अंबार है, बावजूद कहीं कुछ कमी सी खलती है।’ अब तुम अपने बारे में बताओ कि तुम्हारी जिंदगी कैसी गुजर रही है।

राघव ने पहले रागिनी के दुख के प्रति खेद प्रकट किया। फिर अपने बगल में खड़े बेटे-की ओर इशारा कराते हुए- ‘यह मेरा बेटा है इसने हाल ही में इसी शहर में कलेक्टर का कार्यभार ग्रहण किया है और बेटी व दामाद का अपना हास्पीटल है। बाकी सब ईश्वर की कृपा है।’

तभी रागिनी के मोबाइल में ‘’पिया का घर’’ फिल्म के गीत के बोल सुनाई दिए- ‘ये जीवन है, इस जीवन का, यही है यही है यही है रंग-रूप।’

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – परखना ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ परखना ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

श्वेता ने चाय का कप ज़ोर से मेज़ पर रख दिया।

“बस! अब मैं किसी के लिए कुछ नहीं करूँगी।”

ऐश ने उसे देखा, “पहले पूरी बात तो बता।”

“कल माँ को अस्पताल ले गई। लौटने में देर हो गई तो पति बोले—‘तुम्हें मेरी कितनी परवाह है, आज पता चल गया।’”

“ओह…”

“मैंने भी कह दिया—‘हर बार परवाह साबित क्यों करनी पड़ती है?’”

श्वेता कुछ पल चुप रही।

“सच कहूँ ऐश, उनकी बात से ज्यादा चोट इस बात से लगी कि मैं भी अब हर रिश्ते को परखने लगी हूँ।”

ऐश ने धीरे से पूछा, “तू भी?”

“हाँ। बहन फोन न करे तो लगता है, उसे मेरी जरूरत नहीं। पति मेरी खामोशी न समझें तो लगता है, उन्हें मेरी परवाह नहीं।”

“श्वेता… शायद हम रिश्तों में प्यार से ज्यादा हिसाब रखने लगे हैं।”

“तो क्या करूँ? हर बार मैं ही आगे बढ़ूँ?”

ऐश ने उसकी ओर देखा, “हर बार नहीं… पर कभी-कभी बिना हिसाब के भी तो बढ़ना पड़ता है।”

तभी मोबाइल पर बहन का नाम चमका।

श्वेता ने स्क्रीन देखी।

उँगली कॉल बटन के ऊपर ठहरी रही।

ऐश चुपचाप उठकर बाहर चली गई।

कुछ देर बाद कमरे से धीमी आवाज़ आई—

“हैलो…”

फिर श्वेता की आवाज़ सुनाई नहीं दी।

बस, उसकी आँखों से गिरते दो आँसू मोबाइल की स्क्रीन पर ठहर गए।

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆  स्त्री पर तीन लघुकथाएं  ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ कथा-कहानी ☆  स्त्री पर तीन लघुकथाएं  ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆ 

1. तिलस्म

रात के गहरे सन्नाटे में किसी वीरान फैक्ट्री से युवती के चीरहरण की आवाज सुनी नहीं गयी पर दूसरी सुबह सभी अखबार इस आवाज को हर घर का दरवाजा पीट पीट कर बता रहे थे । दोपहर तक युवती मीडिया के कैमरों की फ्लैश में पुलिस स्टेशन में थी ।

किसी बड़े नेता के निकट संबंधी का नाम भी उछल कर सामने आ रहा था । युवती विदेश से आई थी और शाम किसी बड़े रेस्तरां में कॉफी की चुस्कियां ले रही थी । इतने में नेता जी के ये करीबी रेस्तरां में पहुंच गये । अचानक पुराने रजवाड़ों की तरह युवती की खूबसूरती भा गयी और फिर वहीं से उसे बातों में फंसा कर ले उड़े । बाद की कहानी वही सुनसान रात और वीरान फैक्ट्री ।

देश की छवि धूमिल होने की दुहाई और अतिथि देवो भवः  की भावना का शोर । ऊपर से विदेशी दूतावास । दबाब में नेता जी को मोह छोड़ कर अपने संबंधियों को समर्पण करवाना ही पड़ा । फिर भी लोग यह मान कर चल रहे थे कि नेता जी के संबंधियों को कुछ नहीं होगा । कभी कुछ बिगड़ा है इन शहजादों का ?  केस तो चलते रहते हैं । अरे ये ऐसा नहीं करेंगे और इस उम्र में नहीं करेंगे तो कौन करेगा ? इनका कुछ नहीं होता और लोग भी जल्दी भूल जाते हैं । क्या यही तिलस्म था या है ? ये लोग तो बाद में मजे में राजनीति में भी प्रवेश कर जाते हैं ।

थू थू  सहनी पड़ी पर युवती विदेशी थी और उसका समय और वीजा ख़त्म हो रहा था । बेशक वह एक दो बार केस लड़ने , पैरवी करने आई लेकिन कब तक ? 

बस । यही तिलस्म था कि नेता जी के संबंधी बाइज्जत बरी हो गये ।

2. स्त्री

वह जार जार रोये जा रही थी और फोन पर ही अपने पति से झगड रही थी । बार बार एक ही बात पर अडी हुई थी कि आज मैं घर नहीं आऊंगी । बहुत हो गया । संभालो अपने बच्चे । मुझे कुछ नहीं चाहिए ।

पति दूसरी तरफ से मनाने की कोशिश में लगा था और वह आंसुओं में डूबी कह रही थो कि आखिर मैं कलाकार हूं तो बुराई कहां है ? क्या मैं घर का काम नहीं करती ? क्या मैं आदर्श बहू नहीं ? यदि कला का दामन छोड दूं और मन मार कर रोटियां थापती और बच्चे पालती रहूं तभी आप बाप बेटा खुश होंगे ? नहीं । मुझे अपनी खुशी भी चाहिए । मेरो कला मर रही है । आज मेरा इंतजार मत करना । मैं नौकरी के बाद सीधे मायके जाऊंगी । मेरे पीछे मत आना ।

इसी तरह लगातार रोते बिसूरती वह ऑफिस का टाइम खत्म होते ही सचमुच अपने मायके चली गयी ।

मां बाप ने हैरानी जताई । अजीब सी नजरों से देखा । कैसे आई ? कोई जरूरी काम आ पडा ? कोई स्वागत् नहीं । कहीं बेटी के घर आने की कोई खुशी नहीं । चिंता, बस चिंता । क्या करेगो यहां बैठ कर ? मुहल्लेवाले क्या कहेंगे ? हम कैसे मुंह दिखायेंगे ?

शाम को पति मनाने और लिवाने आ गया । कहां है मेरा घर ? यह सोचती अपने रोते बच्चों के लिए घर लौट गयी । पर कौन सा घर ? किसका घर ? कहां खो गयी कला ? किसी घर में नहीं ?

3. सात ताले और चाबी

-अरी लडक़ी कहां हो ?

-सात तालों में बंद ।

-हैं ? कौन से ताले ?

-पहले ताला -मां की कोख पर । मुश्किल से तोड़ कर जीवन पाया ।

-दूसरा ?

-भाई के बीच प्यार का ताला । लड़का लाडला और लड़की जैसे कोई मजबूरी मां बाप की । परिवार की ।

-तीसरा ताला ?

-शिक्षा के द्वारों पर ताले मेरे लिए ।

-आगे ?

-मेरे रंगीन , खूबसूरत कपड़ों पर भी ताले । यह नहीं पहनोगी । वह नहीं पहनोगी । घराने घर की लड़कियों की तरह रहा करो । ऐसे कपड़े पहनती हैं लड़कियां?

-और आगे ?

-समाज की निगाहों के पहरे । कैसी चलती है ? कहां जाती है ? क्यों ऐसा करती है ? क्यों वैसा करती है ?

-और ?

-गाय की तरह धकेल कर शादी । मेरी पसंद पर ताले ही ताले । चुपचाप जहां कहा वहां शादी कर ले । और हमारा पीछा छोड़ ।

– और?

-पत्नी बन कर भी ताले ही ताले । यह नहीं करोगी । वह नहीं करोगी । मेरे पंखों और सपनों पर ताले । कोई उड़ान नहीं भर सकती । पाबंदी ही पाबंदी ।

-अब हो कहां ?

-सात तालों में बंद ।

-ये ताले लगाये किसने ?

-बताया तो । जिसका भी बस चला उसने लगा दिये ।

-खोलेगा कौन ?

-मैं ही खोलूंगी । और कौन ?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६८ – लघुकथा – दादी ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६८ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ दादी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

कमर पर हाथ रखे हुए लगभग ८० वर्ष की दादी ने जब अपनी नजर ऊपर की तरफ उठाई, तो एक सुंदर सा स्मार्ट बालक उनकी नजरों के सामने था।

दादी ! आपके किस पैर में दर्द है? आप बैठ जाइए, मैं इसे देखता हूँ।

तुम कौन हो बेटा? तुम्हें किसने भेजा है?.. उस वृद्ध महिला ने उस नौजवान से पूछा .

दादी, दादी मैं आपका पोता हूँ ? अरे.. अरे हाँ, नहीं दादी ! मैं कृष हूँ , आपका फिजियोथैरेपिस्ट। बुआ जी ने भेजा है दादी।

हाँ..बुआ जी ने मुझसे कहा है कि मैं आपके यहाँ प्रतिदिन आऊँ और आपकी एक्सरसाइज कराऊँ।

दादी तखत पर लेट गयीं। कृष ने उनकी एक्सरसाइज करानी शुरू कर दी। वह प्रतिदिन आता, दादी..दादी कहते हुए, कमरे में प्रवेश करता और दादी की एक्सरसाइज कराता। कृष के रूप में दादी को उनका पोता मिल चुका था तो वहीं कृष जिसकी आँखों ने न दादी और न ही नानी किसी को देखा था, उसे एक नई दादी और नानी मिल गयी थी।

उसकी स्वयं की दादी और नानी, उसके जन्म से बरसों पहले ईश्वर को प्यारी हो गयी थीं।

शायद इसी कारण, ईश्वर ने उसपर कृपा की और उसे उस वृद्ध महिला के रूप में उसकी दादी मिल गई थी। दादी का दर्द न जाने फिजियोथैरेपिस्ट के फिजियो करने से कम हुआ या पौत्र के रूप में कृष के मिलने से कम हुआ, यह हम नहीं कर सकते हैं, लेकिन दर्द तो पहले से बहुत कम था। अब कृष, दादी के घर में बेरोक -टोक आया करता था। दादी के घर में जब कुछ खास चीजें बनती, दादी उसे सहेज कर, अपने कृष के लिए अवश्य रखती। दादी का दुर्भाग्य था कि उनका इकलौता बेटा और एकलौता पौत्र दोनों ही उनके पास रहकर भी दूर थे।

वे सभी दादी के घर से तीन चार मकान आगे,उसी गली रहते थे, लेकिन बीबी की धमक, स्वयं बुजुर्ग हो रहे, पुत्र पर काफी भारी पड़ रही थी। उसकी हिम्मत इतनी नहीं थी कि वह खुले आम जाकर अपनी माँ को देख ले, उनका हाल-चाल पूछ ले।

हालाँकि उसकी यह बंदिश उतनी बड़ी रही थी जितनी कहानी में कहीं जा रही थी। स्वभावत: अब दादी का यह बुजुर्ग बेटा, अपनी माँ से मिलना नहीं चाहता था। निराशा भाव में भीग चुका दादी का यह बेटा! शुरुआती दौर में मजबूरी के कारण, लेकिन बाद में अपने बदले हुए स्वभाव के कारण, अपनी माँ से नहीं मिलता था।

उसकी माँ भी अब उससे घृणा करने लगी थी। वह अपने ऐसे मनहूस -नीरस पुत्र से बिल्कुल बात नहीं करना चाहती थी, जिसने उनकी जिंदगी में कष्ट के कांटे रोप दिए थे।

इधर कृष की कितनी भी व्यस्तता में हो, वह फिजियो- एक्सरसाइज कराने के लिए दादी के यहाँ तो अवश्य जाता था। दादी और उनका यह पोता, नि:स्वार्थ भाव से एक दूसरे से मिलते थे। दादी अपने इस फिजियोथैरेपिस्ट पोते को जब तक देखती नहीं थीं, उन्हें चैन ही नहीं मिलता था। हालाँकि दादी की इकलौती बेटी, यानि बुआ जी, समय से कृष को उनकी एक्सरसाइज का चार्ज दे दिया करती थी। दादी की एक्सरसाइज करते हुए दो वर्षों से अधिक हो गए थे। अक्सर कृष सोचता कि आखिर बुआ जी, दादी की एक्सरसाइज पर इतने पैसे क्यों खर्च करती हैं। यह तो बस बुढ़ापे वाली एक ऐसी पीड़ा का एक छोटा सा उपाय है, जिसमें कुछ समय के लिए दर्द से आराम मिलता है, पर दर्द बिल्कुल चला जाए ऐसा नहीं होता है। जीवन में अपना सब कुछ खो चुकी, बुआ जी, अपनी ८० वर्षीय माँ के इस पौत्र प्रेम की खुशी को छिनना नहीं चाहती थीं।

एक दिन कृष दादी की फिजियोथैरेपी करने, दादी के घर पहुँचा तो वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था। दो, चार, दस लोग दादी के शव के पास बिल्कुल शांत मुद्रा में बैठे हुए थे।

इधर दादी अपनी आँखों को बंद कर चिर निद्रा में सो चुकी थीं। इस मार्मिक दृश्य को देखकर कृष की आँखों से आँसू के दो बून्द छलक पड़े, मानो आँसू के ये दो बूँद, दादी के चरणों में श्रद्धा सुमन के रूप में गिरे हो रहे हों।

वहीं शव से दूर अकेले में बैठे एक शख्स, जिससे कोई भी बात नहीं कर रहा था, उसकी आँखें न जाने अतीत की किन यादों में खोयी हुईं थी, यह पता नहीं चल पा रहा था। शायद पश्चाताप की अग्नि में जलकर उसके आँशु अब स्वाहा हो गये थे।

मृत्यु के तीसरे दिन शांति पाठ के दिन भी कृष दादी के घर पहुँचा था। उसके हाथों में श्रद्धा के पुष्प थे, जिसे वह दादी के चित्र पर अर्पित करते हुए मन ही मन कह रहा था,दादी, अब मैं किसे दादी कहूँगा और किसकी फिजियोथैरेपी करूँगा।

आप बहुत याद आएँगी.. दादी।

नोट :- इस लघु कथा की कहानी के पात्र के नाम काल्पनिक है। लेखक के मन में उपजे हुए भाव के आधार पर यह कहानी लिखी गई है। यदि कहानी किसी व्यक्ति चरित्र से मेल खाती है तो इसे मात्र संयोग समझाया जाए।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – एकदा नैमिषारण्ये… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – एकदा नैमिषारण्ये… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक सुंदर भूखंड हुआ करता है..।’ श्रद्धालुओं के चेहरे पर उस सौंदर्य का वर्णन सुनने की उत्सुकता जगी।

‘उस भूखंड के बारे में बताइए न प्रभु!’, सामूहिक स्वर में मनुहार थी।

‘इस भूखंड में हर तरफ हरीतिमा है। भूखंड का प्रत्येक नगर आकर्षक उद्यानों से सुशोभित है। यहाँ की नदियों में प्रवाहित होता सलिल अमृत-सा निर्मल और प्राणों को पुष्ट करने वाला  है। यहाँ के निवासी नदियों को माता के रूप में पूजते हैं। उनकी आरती उतारते हैं। गौ को वे अपनी जननी के समान मान देते हैं। अपने स्वामित्व की आधी भूमि पर ही वे अलट-पलट कर कृषि करते हैं, शेष भूमि पशुओं के चरने के लिए छोड़ दी जाती है। यहाँ हरे वृक्षों की कटाई प्रतिबंधित है, उनकी रक्षा करने और महात्म्य सुनने का भी विधान है। पंचमहाभूतों की प्रतिष्ठा है। प्रकृति के घटकों में ही ईश्वर के दर्शन किये जाते हैं। स्वर्ग के सुख और देवता भी ईर्ष्या करें, ऐसा मनोरम है ये भूखंड!’

कथा सुनाई जाती रही, पीढ़ियों तक श्रोता तृप्त होते रहे। कालांतर में अपने पूर्वजों से इस भूखंड का वर्णन सुनने वाली नई पीढ़ी को भी पुरानी कथा में उत्सुकता जगी।

खेत और पेड़ रौंद कर खड़ी की गई चमचमाती गगनचुम्बी इमारत के एअर कंडीशंड कक्ष में प्लास्टिक  की बोतल से मिनरल पानी पीते हुए नई पीढ़ी ने सूत जी से कहा, ‘उस सुंदर भूखंड की कथा सुनाइए न!’

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक समय ऐसा सुंदर भूखंड हुआ करता था..!’

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – सच्ची पूजा ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ सच्ची पूजा ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

“माँ, चार धाम करके आया हूँ।”

“अच्छा! मन शांत हुआ?”

“बहुत। भगवान खुश हो गए होंगे।”

माँ मुस्कुराई, “पक्का?”

“क्यों?”

“कल शर्मा जी का दिल क्यों दुखाया?”

“वो गलत बोल रहे थे।”

“बहू से भी नाराज़ थे?”

“हाँ… थोड़ा।”

माँ चुप रही।

“क्या हुआ?”

“मंदिर में भगवान को खुश करते हो…”

“तो?”

“घर में इंसानों को क्यों दुख देते हो?”

वह चुप हो गया।

“माँ, पूजा-पाठ तो जरूरी है।”

“बिल्कुल।”

“फिर?”

“भगवान के घर हिसाब भी तो होगा।”

“कैसा हिसाब?”

माँ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा-

“कितनी बार मंदिर गए, ये नहीं…

तुम्हारी वजह से कितने दिल रोए, ये गिना जाएगा।”

वह सिर झुका गया।

माँ ने बस इतना कहा-

“भगवान को ढूँढ़ने से पहले, इंसान को मत खोना।”

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares