हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#66 – ~ काल नगरी ~ – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

रविंद्रनाथ टैगोर इंस्टिट्यूट, मॉरिशस के छात्रों द्वारा श्री रामदेव धुरंधर जी के जीवन पर आधारित एक लघु फिल्म बनाई गई थी जिसे आप इस लिंक 👉 https://www.facebook.com/share/v/16dYs5pG1o/ पर क्लिक कर अथवा निम्न  QR कोड को स्कैन कर देख सकते हैं – 

(This film is created by the Students of RTI Film Production graduation course as a final project for their second semester. This film is an interview based profile film of well-known Mauritian Hindi Writer Mr. Ramdeo Dhurandhar.) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– ~ काल नगरी ~” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # 66 — ~ काल नगरी ~ — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

सदाव्रत चक्षु विहीन था। ज्ञानी ‘नरोत्तम’ चालाकी से उससे तमाम अनकही बातें निकाल कर अपनी एक कृति लिख रहा था। एक दिन सदाव्रत ‘अनकही काल नगरी’ की बातें कर रहा था कि नरोत्तम सुनने पर काँप सा पड़ा। ‘अनकही काल नगरी’ की न अपनी कोई भित्ति थी और न वह स्वयं में कोई खंडहर थी। पर नरोत्तम को लगा कुछ अटूट अखंड सा तो है, जिसमें वह प्रवेश नहीं कर पाता। वह नि: शब्द हालत में वहाँ से लौट गया।

 © श्री रामदेव धुरंधर

20 / 06 / 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – अपशब्द ☆ प्रो. नव संगीत सिंह ☆

प्रो. नव संगीत सिंह

☆ लघुकथा ☆ अपशब्द प्रो. नव संगीत सिंह

यूं ही बातें करते-करते वह ऊंची आवाज में बोलने लगा – “अरे भाई, क्या हाल है, रिटायरमेंट के बाद… आजकल क्या कर रहे हो… तुम्हारे तो सारे दांत टूट गए हैं, देखो – मेरे सारे दांत पूरे हैं… बाल डाई करते हो क्या? देखो, मेरे सारे बाल सफेद हो गए हैं… बहुत पतले हो गए हैं, मैं तुमसे दस साल बड़ा हूं… फिर भी स्वस्थ दिखता हूं…” और मैं ‘हां-हां’ कहता रहा और उसे टालता रहा। लेकिन वह सोच रहा था कि मैं प्रतिक्रिया क्यों नहीं करता? कई अन्य अजीबोगरीब बातें करने के बाद उसने कहा, “क्या आप कभी अमेरिका गए हैं? वहां बहुत सारी सुविधाएं हैं। भारत में क्या है? समय की बर्बादी…। कभी आइए वहां मेरे पास…विदेशी शराब, अंग्रेजी कल्चर, झीलें, समुद्र, दृश्य, और भी बहुत कुछ है…”

उसने मुझे उत्तेजित करने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। वो बेचारा हाथ मलता ही रह गया, इस उम्मीद में कि शिकार आएगा, लेकिन मैं उसके जाल में नहीं फंसा। आज मुझे अपने पिता के शब्द सच लगे – ‘एक चुप सौ सुख।’ अगर मैं भी उसकी बातों पर प्रतिक्रिया देने लगता तो बात ‘तू-तू मैं-मैं’ से होती हुई बहुत आगे बढ़ जाती। फिर बाबा फ़रीद जी की ये पंक्तियां दोहराने से क्या फायदा – “फ़रीदा, बुरे दा भला कर, गुस्सा मन न हडाए। देही रोग न लगई, पलै सब किछ पाए।” आज मैंने बाबा फ़रीद के श्लोकों को असली रूप से जाना। इससे पहले मैं इन्हें केवल पढ़कर ही बात खत्म कर देता था। मुझे उनकी शिक्षाओं और श्लोकों का पालन करने पर गर्व महसूस हुआ।

© प्रो. नव संगीत सिंह

संपर्क – # १, लता ग्रीन एन्क्लेव पटियाला-१४७००२ (पंजाब)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “सरकार का दिन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “सरकार का दिन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

घंटाघर चौक। काफी समय से खड़ा हूँ। लोकल बस वही आ रही। दो चार आईं भी तो बुरी तरह ठसाठस भरी हुईं। मैं कस्बे का आदमी ठहरा। धक्कमपेल से घबरा गया। इसी डर से रुका रहा।

– आप तांगे में चले जाये़ं !

एक भला आदमी सलाह देता है।

मिलना जरूर होगा। उससे मिले साल डेढ़ साल हो गया ! समय कम है मेरे पास ! फिर भी जाऊंगा। क्या सोचेगी? व्यस्तताओं के सरकंडे बिना वजह फैलते जा रहे हैं।

पांच कदम स्टेशन की ओर जाता हूँ। तांगा बिल्कुल खाली है। आगे की सीट पर एक काला, गोल मटोल, चौदह पंद्रह साल का लड़का बैठा है।

– नये बस अड्डे चलेगा?

– हां, साब !

– कितने पैसे?

– तीस।

– चल फिर।

– पीछे की सीट पर बैठ जाता हूँ।

– नये बस अडडे, नये बस अड्डे का शोर चौड़ा बाज़ार के आसपास गूंजने लगता है। दो बाबू और आते हैं। एक वृद्ध भी आ जाता है ! इस तरह आधा दर्जन सवारियां हो जाती हैं।

– चल मेरे शेर‌!

– लगाम खींच देता है और घोड़ा हिनहिनाकर चल पड़ता है।

– एक सवारी बस अड्डे!

– वह लड़का फिर आवाज़ लगाता है तब बाबू कहता है कि, सवारियां तो पूरी हैं। क्यों भर रहा है मुर्गियों की तरह !

– एक कप चाय बनाऊंगा साब !

– वह दयनीय स्वर में कहता है !

दो सवारियां और मिल जाती हैं। टप् टप् शुरू होती है और साथ ही घोड़े को हल्ला शेरी !

चौराहे पर पहुंचते ही विफल बजती है।

लाइसेंस निकाल !

– है नहीं, साब !

– है क्यों नहीं? ऊपर से बारह सवारियां  !

आज जाने दो, साब !

गवर्नर का पुत्तर है क्या? ला, पैसे निकाल, तेरा चालान करूं।

– माफ कर दो, साब !

सवारियों में खलबली मच गयी है‌। बस पकड़नी है। यहां जाना है, वहां जाना है।

सभी मिलकर कहते हैं कि इसे माफ कर दो  !

– अच्छा, जा बेटा !

आंखें निकाल कर सिपाही चौक पर अपनी ड्यूटी देने लगता है।

सवारियां सलाह देती हैं – फिर न बिठाना इतनी सवारियां ! लाइसेंस पास रखो ! अभी बच्चे हो।

– साब, खायेंगे कहाँ से? महीना बांध रखा है ! घंटाघर चौक पर पान वाले की दुकान पर पहुंचाते हैं। इस बार घर में फाकाकशी चल रही है। इसे कहां से दें? हफ्ते बाद तांगा निकाला है। और वह आज के दिन ही मांग रहा है पैसे !

इतने में एक टैक्सी सिपाही के पास रुकती है। कुछ नोट हाथ में थमाये जाते हैं और फिर फुर्र हो जाती है !

मुझे लगने लगता है कि सरकार के सारे कानून इस तांगे वाले लड़के पर ही लागू होते हैं !

टप् ! टप्! तांगा चल रहा है !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – गलत गणित… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह तथा 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह। कुल 9 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कलेलकर पुरुसकर 2013 लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 35 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभरती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा गलत गणित

? लघुकथा – गलत गणित ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

सेठ रौनक मल के इकलौते बेटे की शादी का निमंत्रण पत्र मिला तो महेश ने अपने दोनों बच्चों से कहा –” देखो बेटा वहां ढेर से व्यंजन होंगे। आइसक्रीम , कोल्ड ड्रिंक्स, मिठाई सभी को जी भर कर खा लेना। आखिर ₹501 देने हैं पूरी तरह वसूल हो जाने चाहिए। पास खड़ी पत्नी भी मुस्कुरा दी।

पार्टी खत्म होने के बाद घर लौटते ही दोनों बच्चे बड़े उत्साह से चहकने लगे –” पापा मैंने तीन आइसक्रीम खाई ….. , मैंने दो कोलड्रिंक पी….”

“ शाबास , आज तो तुमने पूरे पैसे वसूल कर लिए….” महेश ने उनकी पीठ थपथपाई।

घंटाघर बीता होगा कि बड़ा बेटा मां के पास आया –” मम्मी पेट में दर्द हो रहा है ….”उसके साथ ही उसे उल्टियां होने लगी। पति पत्नी घबरा गए फौरन अस्पताल ले गए।

“ शायद उसे खाने में विषबाधा हो गई है दो-तीन दिन अस्पताल रखना पड़ेगा “डॉक्टर ने बताया। दवाइयों, इंजेक्शनों, ग्लूकोज से बेटे की हालत सुधरी। तीसरे दिन पांच हजार रुपए का बिल थमा कर जब घर लौटे तो शादी में दिए रुपयों के  हिसाब से मन मसोसते रह गए।

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ११ – कथा-कहानी – यह एक सुखद संयोग था ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ११ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ ~ यह एक सुखद संयोग था ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

रुनझुन लिफ्ट से नीचे उतरकर अभी पहले तल पर ही पहुंची थी कि आकाश ने लिफ्ट में प्रवेश किया। आकाश को सातवें तल पर जाना था, जबकि रुनझुन को ग्राउंड फ्लोर जाना था। उसके बाद वह कहीं और जाने की तैयारी में थी।

लिफ्ट ग्राउंड फ्लोर पर पहुंच चुकी थी। रुनझुन लिफ्ट से बाहर निकलने वाली थी कि आकाश बोल पड़ा…

रुनझुन..मेरे साथ 7th फ्लोर पर चलो न !!!!!

रुनझुन ने बाहर निकलने की कुछ एक्टिंग सी क़ी लेकिन अचानक उसके मन में क्या आया कि वह 7th फ्लोर पर जाने के लिए राजी हो गई।

संयोग ऐसा हुआ कि ग्राउंड फ्लोर से लेकर 7th फ्लोर तक किसी भी फ्लोर पर किसी ने भी एंट्री नहीं की।

लिफ्ट बिना रुके तेजी से 7th फ्लोर ऊपर क़ी ओर चली जा रही थी। खास बात यह भी थी कि इस बीच रुनझुन और आकाश के बीच में किसी प्रकार का कोई वार्तालाप नहीं हुआ।

एक दो बार ऐसा हुआ कि आकाश ने रुनझुन की आंखों में आंखें डालकर देखा, तो रुनझुन ने भी शर्म से अपनी पलके नीचे झुका ली।

अब दोनों टावर के 7th फ्लोर पर बने ओपन काफी हाउस में टेबल पर आमने-सामने बैठे थे। कॉफी के दो कप आपस में गपशप कर रहे थे, लेकिन ये दोनों आपस में कुछ भी नहीं बोल रहे थे।

दो जोड़ों को एक साथ बैठे, लेकिन आपस में बात न करते देख, बेटर संजीव आश्चर्यचकित भी हो रहा था और सशंकित भी हो रहा था। संजीव ने जानबूझकर के अपनी जूठी प्लेट से दो दो चम्मचे उनके टेबल के पास गिरा दीं, ताकि इनकी खनक से शायद इन दोनों की तंद्रा टूट जाए और हुआ भी ठीक ऐसा ही।

अपनी चुप्पी तोड़ते हुए आकाश ने कहा,

मैं तुमसे एक बात करना चाहता हूँ..रुनझुन।

रुनझुन ने भी उसे कुछ भी कहने की मौन स्वीकृति दे दी।

आकाश कुछ कहते कहते अचानक रुक गया। उसके माथे पर पसीने की ढेर सारी बूंदें छिटक पड़ी। उसका शरीर स्थूल सा हो गया। उसे इस तरह से नर्वस देख, रुनझुन घबरा गई, और उठ खड़ी हुई। अपने दुपट्टे से उसके माथे के पसीने की बूंद को पोछते हुए, रुनझुन ने कहा, ..

क्या कहना चाहते हो आकाश.. कहो, बेहिचक कहो।

लगभग भावुक होते हुए आकाश ने कहा, रुनझुन.. कह दूँ।

आकाश के सिर पर अपना प्यारा सा हाथ फेरते हुए रुनझुन ने गर्दन धीरे से हिलाई, मानो वह उसकी स्वीकृति थी।

एक करोड़पति बाप का बेटा आकाश, जिसके आगे पीछे ऐश्वर्य और धन संपदा नर्तकियों जैसी नाचती है, वह इस वक्त काफी के टेबल पर अपने जीवन की असली खुशी को ढूंढ रहा था।

रुनझुन, .. मैं तुझे सगाई की अंगूठी आज और अभी पहनाना चाहता हूँ।

मैं किसी ऐसे अमीर करोड़पति ससुर का दामाद नहीं बनना चाहता जिसकी बेटी के एशोआराम, शौक और शोहरत के किस्से तो हर दिन सुनता हूँ, लेकिन उसके दिल की बात को जानता ही नहीं हूँ। कोई अनजान, मेरी जीवन संगिनी कैसे बन सकती है।

यह क्या कह रहे हो?..आकाश।

तुम मेरे साथ ऐसे बेमेल रिश्ते क़ी बात ही क्यों सोचते हो।

मेरी हैसियत और तुम्हारी हैसियत में जमीन आसमान का अंतर है। कहां तुम्हारे डैडी कई कंपनियों के ओनर है, वहीं मेरे बापू तुम्हारे डैडी क़ी एक छोटी सी कंपनी में, एक छोटी सीए क़ी नौकरी करते हैं।

आकाश, .!!! ये बेमेल रिश्ते, तुम्हारे परिवार और तुम्हारे होने वाले ससुराल वालों के परिवार के कितने सदस्यों के दिल तोड़ देंगे, क्या तुम्हें यह पता है !!

रुनझुन…! तो क्या तुम यह चाहती हो कि मेरा इकलौता दिल, जो शहर के एक बड़े रईसजादे के इकलौते वारिस का दिल है वह टूट जाए। क्या इस टूटे हुए दिल के दर्द को जानने के बाद मेरे डैडी और मम्मी बर्दाश्त कर पाएंगे।

रुनझुन तुम बेफिक्र रहो मैं सब कुछ मैनेज कर लूंगा। मेरे डैडी और मॉम सिर्फ एक अमीर- रईस बिजनेसमैन नहीं है बल्कि एक सच्चे दिल के इंसान भी है।

बेटर संजीव दूर से इन दोनों की बातों को बड़े ही ध्यान से सुन रहा था।

संजीव ने आनन फ़ानन में एक कॉफी टेबल को सजाते हुए एक छोटा सा केक लाकर धर दिया।

रुनझुन ने आकाश के हाथों में बड़े ही प्यार से हीरे की अंगूठी पहनाई, तो आकाश ने भी रुनझुन के हाथों में वैसी अंगूठी पहनाते हुए उसके माथे को चूम लिया।

कॉफी हाउस के मंद मंद प्रकाश में बैठे कई जोड़े खुद को रोक नहीं पाए, और आकाश के कॉफी टेबल के पास इन जोड़ों के प्रति प्यार लुटाने के लिए जमा हो गए।

अचानक दो बुजुर्ग जोड़ों को अपने पास देखकर आकाश और रुनझुन हक्के-बक्के रह गए। दोनों ने झुककर उन बुजुर्ग जोड़ों के पैर छुए तो, उन्होंने भी दोनों को अपने गले लगा लिया और आँखों में प्यार भरे स्नेहिल आंशुओ को भरते हुए हुए कहा, ..

बेटा.. आज से 30 बरस पहले आज ही के दिन इसी जगह पर मैंने तुम्हारी मॉम को सगाई क़ी अंगूठी पहनाई थी। आज इतिहास स्वयं को दुहरा रहा है।

आज उन्ही प्यारी यादों को ताजा करने के लिए हम दोनों तड़क-भड़क की दुनिया से दूर इस कॉफी हाउस आए थे और आज तुम दोनों यहाँ……

कॉफी हाउस की सारी लाइटे एक साथ जल गई, अब सभी सबको देख रहे थे। संगीत की मधुर धुन सबके कानों में जा रही थी। सभी एक साथ ठुमक रहे थे।

बेटर संजीव का खाली प्लेट भी ढेर सारे रूपयों से भर चुका था।

यह एक सुखद संयोग था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #215 – बाल कहानी  – “मगर और मछली” – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल कहानी  – मगर और मछली।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 215 ☆

☆ बाल कहानी – मगर और मछली ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

होशियार पुर गांव के पास एक नदी थी. उस में एक मछली रहती थी. उस का नाम मीना था. वह बहुत होशियार व चंचल थी. उस नदी में एक मगर आ गया. वह मछलियों को मार कर खाने लगा.

यह देख कर मीना की मां ने कहा, ” मीना ! तुम मगर से होशियार रहना. वह बहुत दुष्ट है.”

” ठीक है मां, ” मीना ने कहा और वह नदी की लहरें से खेलने चली गई.

दुष्ट मगर वही बैठा था. उस मीना बहुत अच्छी लगी. उस ने सोचा,’ यह बहुत प्यारी मछली है. यदि इसे मार कर खा लिया जाए तो यह बहुत स्वादिष्ट लगेगी.’ यह सोच कर दुष्ट मगर उस के पीछे पड़ गया.

मीना सतर्क थी. जब उस ने मगर को अपने पीछे आता देखा तो भागी. वह घबरा गई थी. फिर उस ने सोचा कि घबराने से काम नहीं चलेगा. उसे हिम्मत से काम लेना होगा. यह सोच कर उस ने अपने दिमाग को शांत किया.

तब उसे याद आया कि वही पास में नदी में एक चट्टान के नीचे गुफा है. उसी की तरफ दौड़ लगाई जाए. वह तेजी से उस ओर भागी. मगर, उस के पीछे हो लिया.

अब आगेआगे मीना तैर रही थी, पीछेपीछे मगर. मगर, मीना छोटी थी. वह तेजी से तैर नहीं पा रही थी. मगर, उस के पास तेजी से आ गया.

तभी मीना पलटी. वह दो चट्टानों के पास से गुजरी.

गुफा पास ही थी. उसे शरारत सूझी. उस ने मगर को छेड़ा, ” क्यों मामा ! तैरना नहीं आता है. या मुझे मार कर खाने की इच्छा नहीं है.”

मगर, यह सुन कर चौंका. मछली की इतनी हिम्मत. वह मगर को चुनौती दे. इसलिए वह उस के पीछे तेजी से भागा. अब मीना बहुत पास थी. वह चिल्लाई, ” पकड़ो मामा !”

मगर, ने अपना मुंह बढ़ाया. मगर, यह क्या ? वह दो चट्टानों के बीच फंस गया था.

” डर गए मामाजी !” मीना ने मगर को चिढ़ाया, ” क्या सारी ताकत खत्म हो गई है ?”

मगर को गुस्सा आ गया. वह तेजी से हाथपैर से जोर लगा कर आगे बढ़ा. वह जितना आगे बढ़ता गया, उतना चट्टानों के बीच फंसता चला गया. जब वह निकल नहीं पाया तब उस के समझ में आया कि एक छोटीसी समझदार मछली ने उसे चट्टानों  के बीच फंसा दिया था.

वह उस चट्टानों के बीच फंसा हुआ भूख से मर गया.

इस तरह समझदार मीना ने दुष्ट मगर से छुटकारा पा लिया.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

06/03/2017

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # 125 – स्वर्ण पदक – अंतिम भाग (क्लाइमेक्स) – 6 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक विचारणीय संस्मरणात्मक कथा  स्वर्ण पदक

☆ कथा-कहानी # 125 – 🥇 स्वर्ण पदक – अंतिम भाग (क्लाइमेक्स) – 6 🥇 श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

स्टार हाकी प्लेयर रजत और विशालनगर ब्रांच के स्टाफ के बीच स्वागत सत्कार की औपचारिकता के बाद प्रश्न उत्तर का सेशन हुआ जो सभी के लिये सांकेतिक रुप से बहुत कुछ कह गया , सभी समझे भी पर किसको कितना अपनाना है यह भी तो समझदारी है.प्रतिभा, सामाजिक और पारिवारिक परिवेश व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं और व्यक्तित्व निर्माण की यह प्रक्रिया जीवन भर चलती है.इस जीवन यात्रा में उलझाव भी आते हैं, सुपीरियर होने का भ्रम, इन्फीरियर होने की कुंठा एक ही सिक्के के दो पहलू कहे जा सकते हैं, क्योंकि दोनों ही स्थिति में व्यक्ति खुद को वह मान लेता है जो वह होता नहीं है.व्यक्ति के अंदर की यह शून्यता न केवल उसे नुकसान पहुंचाती है बल्कि संपर्क में आये व्यक्तियों को भी प्रभावित करती है.सम्मान और स्नेह दोनों ही क्षत-विक्षत हो जाते हैं.संबंधों में आई ये दरार दिखती तो नहीं है पर महसूस ज़रूर की जाती है.शायद यही कहानी का मर्म भी है.अब आपको सवालों जवाबों की ओर ले चलते हैं.प्रश्नकर्ता के रूप में नाम काल्पनिक हैं , उत्तर अधिकतर रजतकांत ने ही दिये हैं.

अनुराग:आप फाइनल जीतने का श्रेय किसे देंगे

रजत : ये मेरी टीम की जीत है

अशोक: पर फील्ड गोल तो आपने किये,सारी नजरें आप पर थीं, रजत रजत का शोर ही मैदान में गूंज रहा था, रेल्वे का नाम हमारे दिमाग में बिलकुल नहीं आया.

रजत: आपका प्रश्न बहुत अच्छा है पर गोल करना और गोल बचाना तो पूरी टीम का लक्ष्य था, अकेला चना कुछ फोड़ नहीं सकता, ये कहावत मुझे पूरी याद नहीं है पर पिताजी अक्सर कहा करते थे,भैया क्या आपको याद है?

स्वर्ण कांत ने याद नहीं होने का वास्ता दिया हालांकि भावार्थ सब समझ गये पर अशोक ने फिर प्रश्न दागा: माना कि जीत पर हक पूरी टीम का होता है पर स्टार खिलाड़ी, कैरियर, लाइमलाइट,पैसा सबमें बाजी मारी लेते हैं और बाक़ी लोग लाइमलाइट की जगह बैकग्राउंड में रहते हैं.

इस प्रश्न पर टीम के खिलाड़ी रजत की ओर मुस्कुराहट के साथ देख रहे थे, बैंक के स्टाफ के लिए भी इस प्रश्न का उत्तर पाना उत्सुकता पूर्ण था.

रजत: देखिए कुछ गेम में सोलो परफार्मेंस ही रिजल्ट ओरियंटेड बन जाती है पर हाकी, फुटबॉल, वालीबाल, बास्केटबॉल, तो पूरी टीम का खेल है कोई गोल बचाता है, कोई अफेंडर को रोकता है, कोई गोल के लिए मूव बनाता है, पास देता है, अंत में किसी एक खिलाड़ी के शाट से ही बाल गोलपोस्ट में प्रवेश करती है कभी कभी गोलकीपर से वापस की हुई बाल को भी कोई खिलाड़ी वापस गोलपोस्ट में डाल देता है.यह सब टीम वर्क से ही हो पाता है. हम लोग भी उसी टीम वर्क से खेलते हैं जिस तरह आप लोग ये बैंक चलाते हैं.

अभिषेक: जिस तरह क्रिकेट में मेन आफ दी मैच, मेन आफ सीरीज, टाप टेन बेट्समेन, टाप टेन बालर्स होता है, हाकी में क्यों नहीं होता, हमारे यहां भी बेस्ट ब्रांच मैनेजर, बेस्ट रीजनल मैनेजर अवार्ड दिए जाते हैं.

रजत: मेरा सोचना है कि जहां खेल के साथ व्यापार भी जुड़ा रहता है वहां पर कमर्शियल स्पांसर्स ये सब बनाते हैं. बाद में फिर यही प्लेयर्स उनके प्रोडक्ट की मार्केटिंग में लगाये जाते हैं.लोग क्वालिटी की जगह चेहरे पर आकर्षित होकर मार्केटिंग के मायाजाल में फंसते हैं. अधिकांश खेलों में टीम ही सफलता का फैसला करती है. ध्यानचंद हाकी के ब्रेडमेन थे, गावस्कर और तेंदुलकर से कई गुना प्रतिभा के धनी रहे होंगे पर उनके पीछे कमर्शियल स्पांसर्स नहीं थे, पहले भी नहीं और आज भी नहीं. बैंक के बारे में आप लोग मुझसे बेहतर जानते होंगे.

अश्विन: पर फिर भी टीम इंडिया में तो सिलेक्शन का बेनिफिट आपको ही मिलने की संभावना बन रही है.

रजत : अगर ऐसा हुआ भी तो वहां भी टीम में ही खेलना है. हर खिलाड़ी का कैरियर होता है, सफलता दूसरों को भी वैसा करने की प्रेरणा देती है पर अगर किसी खिलाड़ी को ये लगने लगे कि सब उसके कारण होता है तो उसका डाउनफॉल वहीं से शुरू हो जाता है.

बात हाकी के संबंध में चल रही थी पर हर सुनने वाले के दिल तक पहुंच रही थी. सभी परिपक्व और समझदार थे, कही गई हर बात क्रिस्टल क्लियर थी, तो अब और कुछ कहने की जरूरत ही नहीं थी.

विदा लेते समय जब रजतकांत ने अपने बड़े भाई से विदा ली तो उन्होंने कई अरसे बाद रजत को गले लगा लिया पर उन्हें न जाने ऐसा क्यों लगा कि वो अपने छोटे भाई से नहीं बल्कि अपने अनुभवी भाई से गले मिल रहे हैं.

अंततः समाप्त… 

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 74 – बदलाव… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बदलाव।)

☆ लघुकथा # 74 – बदलाव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

गौरी इस साल गर्मी की छुट्टी में चलो हम लोग  बाबूजी के गाँव चलते हैं।

माँ के गुजर जाने के बाद बाबूजी चाचा चाची के साथ वहीं पर ही रहते हैं। कभी कल हमारे पास आते हैं उन्हें वही अच्छा लगता है।

इस बार बच्चे छुट्टियों में घर आए हैं। बच्चों से पूछते हैं। माँ शालिनी ने गंभीर स्वर में कहा।

बोलो विवेक और चारु क्या तुम छुट्टियों में घर चलोगे?

जब देखो तब पापा आप गाँव चलने को बोलते रहते हैं हम लोग नहीं जाएंगे वहां बहुत गर्मी है।

चलो दो-चार दिन रहकर आएंगे पिकनिक हो जाएगी। शुद्ध हवा और खाना पीना सब कुछ अच्छा रहेगा। गाँव जंगल और पहाड़ी के किनारे है, इसी तरह तुम लोगों को प्रकृति की गोद में रहने का मौका मिलेगा और जो तुम लोग बहुत ऑर्गेनिक करते हो वह भी तुम्हें सही मायने में पता चलेगा।

तो सामान पैक कर लो हम अभी निकलते हैं 3 घंटे में पहुंच जाएंगे।

ठीक है, सभी लोग तैयार होकर जाते हैं और गाँव पहुंचते हैं। गाँव पहुंचकर उन्हें बहुत अच्छा लगता है। बड़ा सा बगीचा और बगीचे में सारे फलदार पेड़ लगे थे। आम, जामुन, नींबू कटहल, बेलपत्र का उसमें बेल भी बहुत लगे हुए थे। बाबूजी ने एक बड़े से बर्तन में बेल का शरबत बनाकर रखा था। सभी को उन्होंने पीने के लिए दिया और शाम को वह अपने बगीचों को पानी डालने के लिए चले गए उनके साथ विवेक और चारु भी गए।

उन लोगों ने खूब सारे फल तोड़े और सब्जियां भी टोडी और माँ लाकर दिया। माँ हम लोग समझ गए दादाजी वहां क्यों नहीं आते सच में यहां हमें बहुत अच्छा लग रहा है। दादाजी लेकिन आपके लिए हम लोग एक एसी लगवा देते हैं।

नहीं बच्चों तुम लोग यह सब अपने शहर के घर में ही करना चाहे जो करना। इसे ऐसा ही रहने दो। तुम लोग मायाजाल जैसा छोटे से डिब्बे के समान फ्लेट में रहते हो। मैं टोकरी में फल रखवा देता हूं।

इतने में बाबूजी के लिए चाची जी रात का खाना लेकर आती है। सभी लोगों को देख कर कहती हैं – अरे तुम लोग भी आई हो चलो घर चलकर खाना खाओ।

नहीं रहने दो यह लोगों का जो मन करेगा ये लोग बना कर खा लेंगे मेरे लिए तो तुम लोग ही सहारा हो। नए जमाने के बच्चे हैं।

जैसे मैं वहां नहीं रहता शायद वैसे ही तुम लोग यहां नहीं रहते जैसे मैंने बदलाव को समझ लिया है तुम लोग भी मुझे थोड़ा समझो।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – ब्रेकिंग न्यूज़ और आपदा में अवसर ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ ब्रेकिंग न्यूज़ और आपदा में अवसर ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

हर दिन की तरह आज शाम को भी कॉम्प्लेक्स के सीनियर सिटीजन दोनों बेंचों पर जाकर बैठ आए गए जिन्हें नगर पार्षद ने मुहैया कराई थी।

हर दिन किसी न किसी मतलब-बेमतलब के टॉपिक पर बेमतलब की चर्चा छिड़ जाती। कुछ लोग सत्तापक्ष की विचारधारा से प्रेरित होकर बहस करते तो कुछ लोग विपक्ष की। सेवकराम जी जैसे कुछ सीनियर सिटिज़न तटस्थ या निष्पक्ष भाव से कभी कभार अपने विचार रखने का प्रयास करते।

वैसे तो टी वी पर आए दिन हर शाम विभिन्न पार्टी के प्रवक्ताओं की नूरा कुश्ती होती ही रहती थी और अक्सर कोई न कोई ब्रेकिंग न्यूज़ चलती रहती थी। ब्रेकिंग न्यूज़ का विषय तो कुछ भी हो सकता है। जैसे किसी नेता/बिजनेसमेन के घर ऑफिस में छापा पड़ना, राष्ट्रीय महत्व के नेता का शपथ ग्रहण, आतंकवादी घटना, सैनिकों का शहीद होना और बहुत कुछ।

आज के ब्रेकिंग न्यूज़ की बहस को नया मोड़ देते हुए हरीलाल जी बोले – “आप लोग बेमतलब परेशान हो रहे हो। कल को नई ब्रेकिंग न्यूज़ आएगी और आप लोगों के मन में जो संवेदनाएं हैं उस नई ब्रेकिंग न्यूज़ से जुड़ जाएंगी। फिर आज की ब्रेकिंग न्यूज़ पुरानी ब्रेकिंग न्यूज़ के ढेर में दब जाएंगी।”

कृष्णकांत जी बोले – “आप सही कह रहे हैं। संवेदनशील मुद्दों पर भी राजनीति होने लगती है। अब इंसानियत तो जैसे रही ही नहीं। ऐसी न जाने कितनी ब्रेकिंग न्यूज़ गुजर चुकी हैं जिनपर हम लोगों ने घंटों बहस की और आज हम उनका अंजाम तक नहीं जानते।”

रिटायर्ड प्रो. रामलाल मुस्कराते हुए बोले – “कुछ मुद्दों पर तो हम लोगों में से कुछ लोगों में मतभेद भी हुए और संबंध भी बिगड़ गए। सेवकराम जी, आप क्या कहते हैं?”

सेवकराम जी जरा कम ही बोलते हैं किन्तु जो भी बोलते हैं लोग बड़े ध्यान से सुनते हैं। सब लोगों का ध्यान सेवकराम जी की ओर चला गया।

सेवकराम जी थोड़ा मुस्कराए और बोले – “शायद आज तक किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि हम लोगों ने अपने जीवन में जितनी भी ब्रेकिंग न्यूज़ देखी हैं उन घटनाओं का अंजाम क्या हुआ? बस नई ब्रेकिंग न्यूज़ देखी सुनी और पिछली ब्रेकिंग न्यूज़ को किताब के पन्नों की तरह पलट दिया। फिर उन्हें दुबारा पलट कर उनका अंजाम न तो दिखाया गया न ही देखने मिला। यह तो शोध का विषय होना चाहिए। शायद साहिर लुधियानवी ने सच ही कहा है कि –

वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन

उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा।

सेवकराम जी उठे हाथ जोड़ कर विदा ली और घर की ओर चल दिये।

समय के साथ वर्तमान ब्रेकिंग न्यूज़ की संवेदनशीलता रोज़मर्रा की जिंदगी में शनैः शनैः संवेदनहीनता में परिवर्तित होने लगी। टी वी चैनलों को अगली ब्रेकिंग न्यूज़ तक टी आर पी बढ़ाने का मुद्दा मिल गया था। राजनीति अपनी जगह चलती रही। कुछ समय के लिए ही सही लोगों का ध्यान अत्यावश्यक मुद्दों से भटक गया या भटका दिया गया।    

प्रो. रामलाल जी के मस्तिष्क में कुछ हलचल हुई। उनके विचारों को तो जैसे संजीवनी मिल गई। वे अपने परम शिष्य अनुराग के पी एच डी के लिए विषय ढूंढ रहे थे। भला ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ से बेहतर विषय क्या हो सकता है?

 

©  हेमन्त बावनकर  

16 जून 2025, 11.30 रात्रि 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 231 – सिंदूर की महिमा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा सिंदूर की महिमा”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 231 ☆

🌻लघु कथा🌻सिंदूर की महिमा 🌻

कालेज का अंतिम वर्ष हॉस्टल में रेखा बहुत परेशान रहती थी।

रोज-रोज की चिंता, मनचले युवाओं की छींटाकसी से वह परेशान हो चुकी थी। इस बार घर जाऊगीं, तो लौटकर नहीं आऊंगी।

लेकिन रेखा जब आज लौटकर हॉस्टल आई तो सिंदूर भरी हुई मांग को देखकर, बाकी सब छात्राएं बोलने लगी – – – – क्या बात है बहुत छुपी हुई रुस्तम निकली, शादी कर ली बताया तक नहीं।

रेखा बहुत सुंदर शरमाते हुए मुस्कुरा कर बोली— गाँव में तो ऐसा ही होता है। माँ-बाप पसंद से शादी ब्याह करा देते हैं।

हॉस्टल से सभी बातें करते-करते कॉलेज चली जा रही थी। आज रेखा सबसे आगे बड़ी निडर होकर चल रही थी। न जाने कहाँ से उसके मन में यह भावना आ गई थी।

सभी छात्राएं कहने लगी– सच में शादी के बाद तो रेखा बहुत होशियार और निडर हो गई। अब तो हमें भी घर में मम्मी-पापा जो कहेंगे तैयार हो जाएंगे।

पलड़ा भारी होते देख, रेखा ने भगवान को दोनों हाथ उठाकर धन्यवाद दिया। जो लड़कियाँ सीधी बात नहीं समझ रही थी। दुनिया की चका-चौध में खिंची चली जा रही थी। उनको रास्ता दिखाने के लिए रेखा को यह सब नाटक करना पड़ा।

लड़कों के लिए यह चुनौती था। बेधड़क रेखा अब सभी को लेकर अपनी बात कह सकने में सक्षम हो चुकी थी। और आने-जाने में निडर हो चुकी थी।

गाँव से चुनिया काकी ने यह समझाया था – – – बिन माँ – बाप की बेटी हो होशियार बने रहना। सिंदूर को ही ईश्वर मानना और यह शस्त्र धारण कर लो।

बाकी समय आने पर सब ठीक होगा।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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