(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंगड़ाई…“।)
अभी अभी # ७७२ ⇒ आलेख – अंगड़ाई श्री प्रदीप शर्मा
(Pandiculation)
करवटबदली,
अंगड़ाई ली
सोया हिंदुस्तान उठा…
हिंदुस्तान तो कब का उठकर और जागकर विकास के रास्ते विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर है, और इधर हम एक सूर्यवंशी हैं,जो सूरज से आँखें मिलाने के बजाय बिस्तर पर पड़े पड़े अंगड़ाई ले रहे हैं। वैसे देखा जाए तो हम इतने आलसी हैं कि अंगड़ाई लेने में भी हमें जोर आता हैं। काश, हमारी अंगड़ाई भी कोई और ले लेता,तो हम तो हाथ पाँव भी नहीं हिलाते।
लेकिन वह कहावत है न, “न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः”,इसलिए उबासी लेने से अंगड़ाई लेने तक का काम भी हमें खुद ही करना पड़ता है। वह भी अगर पत्नी गर्मागर्म चाय का प्याला लेकर,सर पर खड़ी नहीं हो जाती,तो हमारे अंग का कोई भी भाग अंगड़ाई में भाग नहीं लेता। ।
हमारी पत्नी की आंख हम पर गड़ी हुई है और हमारी आँखें उनके कोमल हाथों में मौजूद चाय के प्याले पर टिकी हुई है। सुबह सुबह जो चाय के लिए नटे,उसका पुण्य घटे। हमने भी आखिर प्याला उनके हाथों से लेकर मुंह को लगा ही लिया। चाय की चुस्की में ऐसा क्या है, कि बदन की सुस्ती तुरंत हवा हो जाती है। रात भर के अलसाए अंग का एकाएक कायाकल्प हो जाता है।
शरीर की एक स्वाभाविक क्रिया है अंगड़ाई जो आलस्य या थकावट के कारण होती है और जिसके फलस्वरूप सारा शरीर कुछ पलों के लिए ऐंठ, तन या फैल जाता है।
अंग्रेजी में इसके लिए सही शब्द “पैंडिक्यूलेशन” है। इसके साथ जम्हाई भी आ सकती है और नहीं भी। इसे “विशेष रूप से धड़ और हाथ-पैरों में खिंचाव और अकड़न (जैसे थकान और नींद आने पर या नींद से जागने के बाद)” के रूप में परिभाषित किया गया है। ।
शरीर सबका टूटता है,अंगड़ाई सब लेते हैं।
हमने तो कुत्ते बिल्लियों तक को अंगड़ाई लेते देखा है। बच्चे जब तक पूरी तरह खेलकर थकते नहीं,सोते नहीं और एक बार सो गए,तो पूरी नींद लेने के बाद ही उठते हैं।
वे इतनी जल्दी बिस्तर नहीं छोड़ सकते।
वैसे शायर लोग अंगड़ाई को हुस्न और जवानी से जोड़ देते हैं। बिना अंगड़ाई के कोई हसीना जवान नहीं होती। उम्र की एक दहलीज पर अंगड़ाई ली जाती है,और जवानी की ओर कदम उठ जाता है। अंगड़ाई,शायरों की जुबानी ;
🟢 शिक्षाविद्, लोक-विज्ञानी स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव 🟢☆ श्री प्रभातचंद श्रीवास्तव ☆
(1 सितम्बर 109वें जन्मोत्सव “बुन्देली दिवस” पर विशेष)
लोक विज्ञान के मूर्धन्य, आधिकारिक विद्वान डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का अवतरण 1 सितम्बर 1916 को कटनी-कन्वारा-विजयराघवगढ़ मार्ग पर ग्राम पिपरहटा, जिला कटनी में एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रामीण परिवेश में हुई, पहले ग्राम कन्वारा में शिक्षा ली फिर साधूराम स्कूल, कटनी से मैट्रिक पास किया। कालांतर में आपने जबलपुर का रुख किया। उन्होंने अपनी जीविका एक स्कूल शिक्षक के रूप में हितकारिणी सभा से प्रारम्भ की और उत्तरोत्तर प्रगति करते हुए एम. ए. हिंदी नागपुर विश्वविद्यालय से मैरिट में स्थान बनाते हुए किया। हितकारिणी महाविद्यालय में क्रमशः शिक्षक, असिस्टेंट प्रोफेसर, रीडर, प्रोफेसर और महाविद्यालय के प्राचार्य के रूप में कार्य किया। आपने विश्वविद्यालय के अनेक शोधार्थियों के निर्देशक के रूप में भी कार्य किया।
सम्पूर्ण जीवन लोक साहित्य के लिए समर्पित रहे डॉ. श्रीवास्तव ने जबलपुर विश्वविद्यालय से “बुन्देली का भाषा विज्ञान और आलोचनात्मक अध्ययन” विषय पर शोध किया जो बुन्देली पर किया गया प्रथम शोध रहा। बुन्देली के शब्द भंडार का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन, शब्दों के स्रोत एवं शब्दकोष पर काम किया तथा पर्यावरण, पेड़-पौधों की पूजा आदि पर पांडित्यपूर्ण लेखन किया। विभिन्न विषयों पर आपके लेख देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित और आकाशवाणी व दूरदर्शन केंद्रों से प्रसारित होते रहे। आपने चेतन का बोध कराने वाली आत्मकथाएं जैसे तुलसी, सातवां मील, वर्षा मेघ, चिड़ियाँ, सठिया कुँआ आदि लिखीं जो अपनी जीवन कथा स्वयं कहते हैं। शिक्षण काल के दौरान उन्होंने सामान्य भू ज्ञान, प्राकृतिक भू ज्ञान, आर्थिक भू ज्ञान एवं सामाजिक अध्ययन पर छात्रोपयोगी पुस्तकें लिखीं जिनमें से कुछ का महाराष्ट्र के लिए मराठी में भी अनुवाद हुआ।
डॉ. श्रीवास्तव के बहुउपयोगी साहित्य सृजन और हिंदी-बुन्देली की मधुर सन्देश प्रधान कविताओं को देखते हुए अनेक साहित्यिक, सामाजिक संस्थाओं ने इनका नागरिक अभिनन्दन किया जिनमें प्रमुख हैं- मिलन, गुंजन कला सदन, सेठ गोविन्ददास आयोजन समिति, हमसी, रानी दुर्गावती बलिदान दिवस पर म. प्र. के तत्कालीन मुख्य मंत्री अर्जुन सिंह द्वारा संग्रामपुर में, म. प्र. आंचलिक साहित्यकार परिषद् द्वारा कटंगी में आदि।
डॉ. श्रीवास्तव के साहित्य में ग्राम्य जीवन का सजीव चित्रण है। उनकी जन्म स्थली ग्राम पिपरहटा उस समय पूर्णतः नदी-नालों और पहाड़ियों के वेष्टिक परिवेश वाला गांव था। उनकी एक लम्बी बुन्देली कविता “भौंरहा पीपर” में गांव का पीपल स्वयं अपनी और बदलते युग की कहानी सुनाता है-
मैं पीपर को बिरछ-
गांव में अब लौं एक खड़ो हों,
बहुत दिना भए बीरन सें-
अकबर सें तनक बड़ो हों।
बड़ी डारैयाँ लाखन कनखा, लाखन के लाख-लाख पत्ता,
गीधन के दो सौ आठ घोंचुआ,
डार-डार भौंरन छत्ता।
इतना ही नहीं डॉ. श्रीवास्तव की लेखनी गांव के तत्कालीन व्यक्तियों और परिस्थितियों का उल्लेख भी करती है-
अब तौ करिया चैतू कुम्हार है
ई खेरे को ठाकुर,
थानेदारन सें मिलजुर बो,
खाय-खबाय घी-गुर।
परमोला रतनसींग कारिंदा की
पांचउ अब घी में,
पंडा बाबा छिरिया लैकें,
नित जाओ करत पहरैं,
ढारैं महादेव मुरलीधर,
चौथे पहर सकारें।
जिरिया दाई मंहतैंन सयानी,
दांत घुरे से जी के,
मालगुजारन कक्को सबकी,
दएं गुदनहा टीके।
इसी प्रकार बैलों एवं बैलगाड़ी को संबोधित एक बुन्देली गीत में पर्यावरण परिवेश का वर्णन दृष्टव्य है- (इसमें बैलों को छैल-छबीले कहा गया है)
चले चलौ रे छैल-छबीले
थोड़ी और कसर है।
रपटा चढ़ें मुरें पूरब खों,
होय सड़क जा आड़ी,
पटपर-पथरा पै मचकै फिर
जजर-मजर जा गाड़ी।
खैर-करौंदा और मकुइया-
के जरवा दोई बगलें,
क्विइल तलैया बड़ी पुरानी,
बढ़ें पार पै लगलें।
आंगें तनक चलें फिर पर है
चित्तावर की मढ़िया,
बिजराघोगढ़ के राजा की
गिरी-परी सी गढ़िया।
“पीपर बारो गांव हमारो”, डॉ. श्रीवास्तव की एक लंबी कविता है जिसके प्रारम्भ में उन्होंने लिखा है-
पीपर बारो गांव हमारो
कुल तीनक सौ घर बारो
पिपरहटा कहाउत है
कभऊं उतै पीपरई- पीपर हते
अब पीपर-ईपर नैयां।
डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ने 1950 के आसपास श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं “युगारम्भ” एवं “धरती” का संपादन भी किया। इनमें उन्होंने “पूर्णेन्दु” नाम से अनेक लेख और कविताएं लिखीं। वे एक अच्छे चित्रकार भी थे, उन्होंने अनेक पत्रिकाओं और पुस्तकों की लिए चित्र और रेखा चित्र बनाए। “देशबंधु और “स्वतंत्रमत” समाचार पत्रों में उन्होंने बुन्देली में वर्षों “अपनी बोली में अपनी बात” शीर्षक से एक कॉलम लिखा को काफी लोकप्रिय हुआ। “बुन्देली लोकायन में राम” में उनके सृजित पद अद्भुत हैं-
अकल-विकल हैं प्रान राम के,
बिन संगिनि बिन गुंइयां।
फिरैं नाँय सें माँय बिसूरत,
करैं झांवरी मुइयाँ।
पूँछत फिरैं सिंसुपा साल्हें,
बरसज साज बहेरा।
धवा सिहारू महुआ-कहुआ,
पाकर बाँस लमेरा।
डॉ. श्रीवास्तव ने बुन्देली में एक खंड काव्य “वीरांगना रानी दुर्गावती” का सृजन भी किया, जिस पर देश के सभी आकाशवाणी केंद्रों से लगभग 1 घंटे का संगीत रूपक प्रसारित किया गया। रानी दुर्गावती की वीरता का एक शब्द चित्र-
चली प्रलय सें जूझन रानी,
रन चण्डी अकुलाई।
गंग जमुन उत उठीं हिलोरें,
इत रेवा उमड़ाई।
“डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव लोकविज्ञान शोध संस्थान” द्वारा डॉ. श्रीवास्तव रचित पुस्तकों के द्वितीय/तृतीय संस्करणों के प्रकाशन भी किए जा रहे हैं। प्रति वर्ष 1 सितम्बर को स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का जन्मोत्सव समारोह जबलपुर व आसपास के क्षेत्रों में “बुन्देली दिवस” के रूप में आयोजित किया जाता है। इस दिन देश के विविध क्षेत्रों के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वानों को सम्मानित किया जाता है। बुंदेलखंड के साहित्य, कला, संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम होते हैं। उन्हें सादर श्रद्धान्जलि।
(डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं। आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख “बुंदेली के प्रकांड विद्वान डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव”।)
☆ बुंदेली के प्रकांड विद्वान डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ☆ डॉ. विजय तिवारी ‘किसलय’ ☆
सभी जानते हैं कि संस्कारधानी ही नहीं अपितु पूरे बुंदेल क्षेत्र में जब भी बुंदेली भाषा एवं साहित्य की बात आती है तो स्व. डॉ. पूरन चंद श्रीवास्तव जी के नाम और उनके द्वारा किये गए कार्यों का उल्लेख अवश्य ही होता है।
पितृतुल्य स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव जी का जन्म 1 सितंबर 1916 में कटनी के पिपरहटा गाँव में हुआ था। एम. ए. (हिन्दी) तथा पी-एच. डी. की शैक्षिक अर्हता उनकी अध्ययनशीलता का प्रतीक है। शिक्षकीय जीवन जीते हुए ये सन 1976 में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। इनका बाल्यकाल प्रकृति की गोद में बीता, जहाँ प्रकृति भरपूर प्यार लुटाती है। पेड़-पर्वत, झरने-नदियाँ, करौंदे, बेर, मकोये, आम, जामुन, महुआ, अमरूद आदि खाने को मिलते थे। अंतहीन हरियाली से सजी वसुंधरा में खरगोश, मोर, गौरैया आदि पशु-पक्षी दिखाई देते थे। इन सबके बीच रहने वाले डॉ. श्रीवास्तव जी का प्रकृति प्रेम भला उनके साहित्य में कैसे नहीं आता। इनकी तो एक कृति का नाम ही हमें प्रकृति से जोड़ने हेतु पर्याप्त है। वह है बुंदेली काव्य कृति “भौंरहा पीपर”।
डॉ. पूरनचंद जी श्रीवास्तव बुंदेली के प्रति आजीवन समर्पित रहे। वे एक संवेदनशील, अध्ययनशील एवं वरिष्ठ बुन्देली भाषा मर्मज्ञ तो थे ही, बुंदेली गुणज्ञता के विरले व्यक्तित्व भी थे। सन 1984 में प्रकाशित अपने बुंदेली काव्य संग्रह भौंरहा पीपर के संबंध में इन्होंने कहा है कि इस संग्रह की सारी रचनाएँ मेरे ग्राम्यांचल में बिताए वक्त की देन है, जिससे उनका ग्रामीण जगत से अतीव जुड़ाव परिलक्षित होता है। इसके आगे वे कहते हैं कि उन दिनों गाँव में पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों का निर्वहन ईमानदारी और निष्ठा के साथ किया जाता था।
संस्कारधानी एवं बाहरी साहित्यकारों को सदैव मार्गदर्शन देने वाले डॉ. श्रीवास्तव जी के निष्णात एवं यशस्वी शिष्यों की एक लंबी फेहरिस्त है। अंतरराष्ट्रीय प्रज्ञा मिशन नई दिल्ली के संस्थापक ख्यातिलब्ध ब्रह्मलीन स्वामी प्रज्ञानंद जी ने डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव जी के बारे में लिखा है कि उनके समक्ष होने पर मुझे उनका सौम्य तथा गुरु गाम्भीर्य रूप साकार होने लगता था। जब मैं एक छात्र के रूप में उनके द्वारा कराए जाने वाले लोक साहित्य का बोध करते समय करता था।
डॉ. श्रीवास्तव की कालजयी कृतियों में बुंदेली काव्य संग्रह “भौंरहा पीपर” एवं सन 1958 में सृजित खंडकाव्य “वीरांगना रानी दुर्गावती” प्रमुख हैं। इसके इतर इनका हिन्दी एवं बुन्देली सृजन का व्यापक साहित्य सागर है। निबंध आत्मकथाएँ, शैक्षणिक साहित्य की रचनाएँ और बुंदेली शब्दकोश आदि इनके द्वारा रचे गये हैं। वर्ष 1990 के पूर्व तक ऐसे विद्वत मनीषी का जन्मदिवस गुंजन कला सदन द्वारा प्रतिवर्ष 1 सितंबर को मनाया जाता रहा। इनकी सक्रिय बुन्देली भाषा सेवा तथा समर्पण से प्रेरित होकर सन 1990 से इनके जन्मदिवस को गुंजन ने “बुन्देली दिवस” के रूप में मनाना शुरू किया। इसमें संस्कारधानी के लोगों तथा साहित्यकारों का भी योगदान मिलना प्रारंभ हो गया।
इनके 90 वें जन्मदिवस की तैयारियाँ जोरों से चल ही रहीं थी तभी इस बुन्देली दिवस के 12 दिन पूर्व ही अर्थात 20 अगस्त 2005 को संस्कारधानी का यह प्रकांड बुंदेली मर्मज्ञ हमें छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल गया। संस्कारधानी की यह अपूर्णीय क्षति थी। सबको मात्र इस बात का संतोष है कि उनके जीवन काल में ही सन 1990 से इनका जन्म दिवस “बुंदेली दिवस” के रूप में मनाया जाने लगा था। इस तरह वर्तमान वर्ष 2025 में हम 36 वाँ बुंदेली दिवस और उनका 109 वाँ जन्मदिवस मना रहे हैं, जो प्रतिवर्ष 1 सितम्बर के 30 दिन पूर्व से मनाया जाने लगता है। जबलपुर और आसपास की समस्त साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाएं अपने अगस्त माह के कार्यक्रम स्व. डॉ. पूरनचंद जी को समर्पित करती हैं। यहां अगस्त माह बुंदेली मास कहलाता है।
ऐसे प्रसिद्धि प्राप्त बुंदेली भाषा विज्ञानी की स्मृति में हम बुंदेली दिवस विगत 35 वर्ष से व्यापक स्तर पर मना रहे हैं और इसमें हमें पूरे बुन्देली भाषायी क्षेत्र से सहयोग तथा समर्थन मिल रहा है। इन सभी तथ्यों व उपलब्धियों के आधार पर हम मध्य प्रदेश शासन व संस्कृति विभाग से माँग करते हैं कि इस “बुन्देली दिवस” को शासकीय मान्यता प्रदान कर शासकीय स्तर पर बुंदेली दिवस घोषित किया जाये।
☆ “बुंदेली के सुप्रसिद्ध साहित्यकार – डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
किसी भी विषय पर कोई लेखन अगर उससे संबंधित क्षेत्रीय भाषाओं में किया जाता है तो उसकी सार्थकता और उपयोगिता दोनों ही बढ़ जाती है। हिन्दी साहित्य में ऐसा ही सार्थक सृजन सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव का भी रहा है। वैसे तो उन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी भाषा दोनों ही में अत्यंत ज्ञानवर्धक लेखन किया लेकिन बुंदेली भाषा में किये गये साहित्य सृजन के लिए वे अपेक्षाकृत अधिक चर्चित रहे। बुंदेली भाषा में किया गया उनका सृजन बुंदेलखंड के क्षेत्रों में पठनीय और लोकप्रिय दोनों ही सिद्ध हुआ। डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव द्वारा बुंदेली भाषा में रचा गया वीरांगना रानी दुर्गावती पर आधारित खंड काव्य साहित्यिक क्षेत्र में एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी माना जाता है। इस संबंध में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. गार्गीशरण मिश्रा मराल ने अपने एक लेख में लिखा है कि डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव एक सिद्धहस्त साहित्यकार हैं। उनकी अनेक कृतियां- साहित्य खड़ी बोलीं में है किन्तु वीरांगना रानी दुर्गावती खंड काव्य बुंदेली भाषा में है। संभवतः बुंदेलखंड की वीरांगना रानी दुर्गावती का यशोगान बुंदेली भाषा में करना कवि को अधिक समीचीन लगा होगा ताकि बुंदेलखंड की जनता अपनी ही भाषा में महिमा मंडित रानी दुर्गावती की वीरगाथा सुनकर आल्हादित हो। सकें। कवि डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव ने बुंदेली जैसी लोक भाषा को काव्य भाषा का रुप देकर उसे कलात्मक सौंदर्य प्रदान किया है। श्रीवास्तव जी ने वीरांगना रानी दुर्गावती की महिमा का जो यशोगान बुंदेली भाषा में किया है, वह अत्यंत प्रभावी और पठनीय है। एक जगह वे लिखते हैं –
चली प्रलय से जूझन रानी, रणचंडी अकुलाई।
गंगा – जमुन उत उठीं हिलोरें, इत रेवा उमड़ाई।
डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव जी का मानना था कि बुंदेली भाषा के विकास और प्रचार के लिए यह जरूरी है कि इसका दैनिक जीवन में अधिकाधिक उपयोग किया जाये और इसे बोलने में हम गर्व महसूस करें। एक बार साहित्यकार एवं शिक्षाविद श्री अभय तिवारी जी से साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा था कि- “आज हमें जरुरत ए की है कि मुहावरों और लोकोक्तियो खों आगे लायें। ओमें लोगन के बीच में जो कहनातें हैं ऊखों आगे लायें।”
पितृ तुल्य डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव मेरे पूज्य पिता स्व. पं. भगवती प्रसाद जी पाठक के अत्यंत आत्मीय मित्र थे। इसी के साथ वे मेरे अग्रज स्व. श्री हर्षवर्धन जी पाठक के गुरु भी थे। पारिवारिक आत्मीयता होने के कारण मैं भी उन्हें श्रद्धा से चाचा जी के रुप में संबोधित और सम्मानित करता। चूंकि उनका निवास मेरे गलगला स्थित निवास के समीप था, इसलिए प्रायः रविवार को श्रीवास्तव जी मेरे घर आते और फिर चाय नाश्ता करके पिताजी के साथ पास ही सब्जी खरीदने बाजार जाते। घर पर मैं दोनों की बौद्धिक चर्चाओं को बड़े ध्यान से सुना करता। इस दौरान मैंने अनेक बार श्रद्धेय श्रीवास्तव जी की ओज और मस्ती का साक्षात्कार किया है। घर पर जब वे बुंदेली कविताएं सुनाते तो हम सब उन्हें घेर कर बैठ जाया करते।
यह उल्लेखनीय है कि डा . पूरनचन्द श्रीवास्तव देश के हिन्दी साहित्य और बुंदेली लोक साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वान थे। उनका जन्म 1 सितंबर 1916 को कटनी के ग्राम पिपरहटा में। हुआ था। शिक्षा तो उन्होंने नागपुर और जबलपुर में प्राप्त की लेकिन कर्म क्षेत्र उनका जबलपुर रहा। हितकारिणी महाविद्यालय में अपने शिक्षकीय दायित्वों का निर्वाह करते हुए श्रीवास्तव जी 1976 में सेवानिवृत्त हुए। बुंदेली भाषा और साहित्य में उनके सक्रिय योगदान के कारण ही अनेक वर्षों से गुंजन कला सदन विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं के साथ बुंदेली दिवस के रूप में उनके जन्म दिवस का व्यापक आयोजन करती आ रही है और मेरे विचार से बुंदेली दिवस के रूप में याद करना ही उनके प्रति हमारा सच्चा श्रद्धा भाव है।
ऐसे प्रेरणास्रोत और प्रणम्य साहित्यकार और शिक्षाविद डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव जी के विषय में शायद किसी कवि ने सही लिखा है –
पद : प्राचार्य,सी.पी.गर्ल्स (चंचलबाई महिला) कॉलेज, जबलपुर, म. प्र.
विशेष –
39 वर्ष का शैक्षणिक अनुभव। *अनेक महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय के अध्ययन मंडल में सदस्य ।
लगभग 62 राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में शोध-पत्रों का प्रस्तुतीकरण।
इंडियन साइंस कांग्रेस मैसूर सन 2016 में प्रस्तुत शोध-पत्र को सम्मानित किया गया।
अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान शोध केंद्र इटली में 1999 में शोध से संबंधित मार्गदर्शन प्राप्त किया।
अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘एनकरेज’ ‘अलास्का’ अमेरिका 2010 में प्रस्तुत शोध पत्र अत्यंत सराहा गया।
एन.एस.एस.में लगभग 12 वर्षों तक प्रमुख के रूप में कार्य किया।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में अनेक वर्षों तक काउंसलर ।
आकाशवाणी से चिंतन एवं वार्ताओं का प्रसारण।
लगभग 110 से अधिक आलेख, संस्मरण एवं कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
प्रकाशित पुस्तकें- 1.दृष्टिकोण (सम्पादन) 2 माँ फिट तो बच्चे हिट 3.संचार ज्ञान (पाठ्य पुस्तक-स्नातक स्तर)
☆ “बुंदेली की पाठशाला – डॉ पूरनचंद श्रीवास्तव” ☆ डॉ. वंदना पाण्डेय दुबे ☆
(जन्म दिवस 1 सितम्बर “बुन्देली दिवस” पर विशेष)
☆
देखना चाहा न अपना भार कितना ?
और कलियों में चटक श्रृंगार कितना ?
चल रहे दो पैर जिस विश्वास में
कर्म का निर्वाह थकती सांस में
दे चुके सर्वस्य यह जीवन त्याग में
डूब कर मिलजुल सजल अनुराग में।
किसी विद्वान कवि की यह पंक्तियां मानो डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव के लिए ही लिखी गई हैं, जो कि उनके व्यक्तित्व को उजागर करती हैं। 01 सितंबर 1916 को डॉ. श्रीवास्तव का जन्म कटनी जिले के पीपल के वृक्षों से घिरे हुए गाँव “पिपरहटा” में हुआ। चूँकि आपके पिताश्री प्यारेलाल श्रीवास्तव कटनी में ही शासकीय सेवा में थे अतः आप की प्रारंभिक शिक्षा कटनी में हुई। शिक्षा के प्रति गहन रुचि और परिश्रमी स्वभाव ने उन्हें उच्च शिक्षा हेतु जबलपुर आने बाध्य कर दिया। शिक्षा प्राप्ति के साथ आपने लेखन कार्य भी जारी रखा। नागपुर विश्वविद्यालय से आपने हिंदी विषय में स्नातकोत्तर परीक्षा मेरिट में पास की। बुंदेली भाषा के अटूट प्रेम ने ही आपको ‘बुंदेली लोक साहित्य’ पर शोध कार्य हेतु प्रेरित किया। जबलपुर विश्वविद्यालय के इतिहास में ‘बुंदेली साहित्य’ पर यह प्रथम शोध था। डॉ. श्रीवास्तव ने जबलपुर के सर्वाधिक प्राचीन शिक्षा संस्थान हितकारिणी महाविद्यालय में प्राध्यापकीय कार्य किया एवं प्राचार्य पद को भी सुशोभित किया। उन्होंने जबलपुर विश्वविद्यालय के एम. ए. के पाठ्यक्रम में ‘लोक- साहित्य’ को एक विषय के रूप में सम्मिलित कराया। आपके निर्देशन एवं मार्गदर्शन में अनेक शोधार्थियों ने ‘विद्यावाचस्पति’ की उपाधियाँ प्राप्त कीं।
डॉक्टर श्रीवास्तव एक श्रेष्ठ शिक्षक थे। वे अपने विद्यार्थियों के अंतस से सदैव जुड़े रहे। उनके विद्यार्थी उन्हें अपना सच्चा हितैषी एवं पथ प्रदर्शक मानते थे। देश- प्रदेश को उन्होंने संस्कारवान एवं ख्यातिलब्ध शिष्य प्रदान किए। जिनमें प्रमुख रूप से रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ शिव प्रसाद कोष्टा, प्रसिद्ध दार्शनिक डॉ. जे. पी. शुक्ला, आध्यात्म गुरु स्वामी प्रज्ञानंद जी, पूर्व राज्यपाल निर्मल चंद जैन, पूर्व महाधिवक्ता श्री राजेंद्र तिवारी, जबलपुर के पूर्व महापौर शिवनाथ साहू, मानस मर्मज्ञ डॉ. रामदयाल कोष्टा “श्रीकांत”, मध्यप्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री राजबहादुर सिंह ठाकुर आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यद्यपि डॉ. पूरनचंद जी की लोक साहित्य, संस्कृति एवं लोक विज्ञान में विशेष रुचि थी किंतु उनकी कलम भूगोल, सामाजिक विज्ञान, प्रकृति के सौंदर्य, पर्यावरण, व्रत व त्यौहारों, विभिन्न व्यक्तित्व और उनके कृतित्व, आत्मकथा, बाल साहित्य के साथ-साथ अन्य विषयों पर भी खूब चली। ‘यदि ये बोल पाते’ के रूप में उन्होंने चेतन बोध कराने वाली अद्भुत कथाएं भी लिखीं, जिसमें वृक्षों, पक्षियों, पत्थरों आदि के भावों को सुंदर शब्दों में व्यक्त कर अनोखा सृजन किया। ‘भौंरहा पीपर’, ‘रानी दुर्गावती खण्ड-काव्य’, ‘यदि ये बोल पाते’ आदि उनकी अत्यंत ही चर्चित बुंदेली-हिंदी रचनाएं हैं। बुंदेली लोक साहित्य का अध्ययन, उनकी समालोचनात्मक व्याख्या, बुंदेली शब्द भंडार का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन, बुंदेली शब्द भंडार के स्रोत, बुंदेली शब्दकोश, संस्कृत की कहावतों और मुहावरों का बुंदेली कहावतों और मुहावरों पर प्रयोग, लोक साहित्य और परिनिष्ठित साहित्य का पारस्परिक संबंध आदि आदि उनकी प्रमुख और प्रतिष्ठित रचनाएं हैं। ‘बुंदेली साहित्य’ पर सम्भवतः इतना अधिक कार्य किसी ने नहीं किया। आपने बुंदेली-साहित्य का न केवल संरक्षण किया वरन उसका संवर्धन कर उसे क्षितिज तक पहुँचाने का प्रयास भी किया। लेखन के साथ-साथ नागपुर, जबलपुर, भोपाल के आकाशवाणी और दूरदर्शन केंद्र द्वारा उनकी कविताओं, लेखों और वार्ताओं का समय-समय पर प्रसारण होता रहा। अनेक गायक-गायिकाओं ने उनके लिखे बुन्देली गीत गाए जो आज भी पसंद किए जाते हैं। अनेक गौरवशाली संस्थाओं ने संस्कारधानी के इस ‘गौरव- पुरुष’ को सम्मानित किया। बुंदेली साहित्य के उनके इस अनुपम और अद्वितीय महत्वपूर्ण योगदान के कारण ही उनके जन्मदिवस 01 सितम्बर को ‘बुंदेली दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी बहुआयामी व्यक्तित्व वाले डॉ पूरनचंद श्रीवास्तव अक्खड़-फक्कड़ प्रवृत्ति के माने जाते थे, किंतु वे अत्यंत सहृदय और सर्वप्रिय थे। वे आत्मवंचना एवं आत्मप्रदर्शन से सदैव दूर रहे। ग्रामीण परिवेश, वहां के प्राकृतिक सौंदर्य को बड़ी खूबी के साथ उन्होंने शब्दों में उकेरा। अनुपम कृति “भौंरहा पीपर” की अविस्मरणीय पंक्तियों में उनका लेखन बड़ा अद्भुत और मर्मस्पर्शी जान पड़ता है। जिसमें उनके गांव का पीपल अपना इतिहास बताता है-
मैं पीपर को बिरछ, गांव में अबलौं एक खडो हों,
बहुत दिना भए बीरन सें, अकबर सें तनक बड़ो हों।
प्रेम-उल्लास से भरे बुंदेली तीज-त्यौहारों का वर्णन आपकी कविताओं में बड़ी सरसता के साथ देखने को मिलता है। दूसरी ओर वीर-रस से भरी कविताएं जिसमें “वीरांगना रानी दुर्गावती” (खंडकाव्य) अत्यंत ही चर्चित और रोमांचित करने वाला बुंदेली खंडकाव्य है –
चली प्रलय से जूझन रानी रणचंडी अकुलाई।
गंग-यमुन उत उठीं हिलौरें, इत रेवा उमड़ाई।।
सदैव संतुष्ट दिखाई देने वाले डॉ. श्रीवास्तव जी के जीवन में संघर्ष और बाधाएं भी आईं, किंतु उन्होंने न केवल उन बाधाओं, कंटकों को हटाया वरन लोगों को भी साहस और धीरज का पाठ पढ़ाया। उनकी एक कविता की बानगी देखिए-
साहस ही सम्बल है,
धीरज धर भरिए डग. .
करिए सब काम।
डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव जी प्राध्यापक होते हुए भी उपदेश देने पर विश्वास नहीं रखते थे वरन उनका व्यक्तित्व ही उपदेश था। उनका आंतरिक मन जितना मानवीय गुणों से श्रृंगारित था बाह्य स्वरूप उतना ही सादगी पूर्ण और आडंबर रहित था। उनकी स्मृति कर्म और कर्तव्य का बोध कराती है। डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव साहित्य के ऐसे अमिट हस्ताक्षर हैं, जिन्हें भूल पाना नामुमकिन है। व्यक्ति अपने व्यक्तित्व से सुरभित होता है और व्यक्तित्व, कृतित्व से। अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के कारण उन्हें याद किया जाता रहेगा। हर बार, और बार-बार…कहा गया है –
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हाइपर बोल…“।)
अभी अभी # ७७१ ⇒ आलेख – हाइपर बोल श्री प्रदीप शर्मा
|•• hyperbole ••|
हिंदी व्याकरण में एक अलंकार है, अतिशयोक्ति अलंकार, जिसे अंग्रेजी में hyperbole (हाइपरबोल) कहते हैं। हमने अंग्रेजी सहित कई भाषाओं को आत्मसात किया है, और उन्हें हमारी बोलचाल की भाषा में ढाल लिया है।
अधिक बोलने वाली महिलाओं को अक्सर सर में हेडएक (headache) और अपच के कारण कई पुरुषों को पेट में भी हेडएक होने लगता है।
Ten thousand saw I at a glance. यह मैं नहीं कह रहा, अंग्रेजी कवि विलियम वर्डस्वर्थ कह रहे हैं। जिसे हम अतिशयोक्ति अलंकार कहते हैं, वह अंग्रेजी का figure of speech, hyperbole ही है। ।
मान लिया आप कवि हो, पर दस हज़ार डफोडिल्स एक झलक में, भाई साहब आप भले ही इसे अपनी भाषा में हाइपरबोल कह लें, लेकिन ये बोल ज़रा, जरूरत से ज्यादा ही हाइपर हो गए हैं। जिस तरह आपकी भाषा है, हमारी भी एक भाषा है, संस्कृति है, विचार है।
जब कोई ज्यादा फेंकता है, तो हम भी हाइपर हो जाते हैं।
ऐसे बोल जिससे हमारे सर में हेडएक हो, हमारा टेंपर हाइपर हो, उसे हम हाइपरबोल ही कहते हैं। हमारे हिंदी कवियों ने भी अतिशयोक्ति अलंकार का भरपूर प्रयोग किया और आजकल हमारे राजनेता भी इन्हीं अलंकारों से लदे हुए हैं। अतिशयोक्ति की भी हद होती है। पहले जहां तौलकर बोला जाता था, वहीं आजकल, बिना तराजू से तौले, क्विंटल में फेंका जा रहा है। ।
कितना बढ़िया शब्द चुना है आप लोगों ने अतिशयोक्ति अलंकार के लिए, हाइपरबोल ! हम गांव के सीधे सादे आपस में राम राम से अभिवादन करने वाले, आज कहां से कहां पहुंच गए। इस्स, लाज आती है बताते हुए। किसी ने कहा हरि बोल, तो हमने भी हरि बोल कहा। हनुमान जी के भक्त ने जय बजरंग बली कहा, तो हमने हनुमान जी की भी जय जयकार करी।
हमारे लिए सब भगवान एक हैं, आप चाहे जय श्री कृष्ण कहें अथवा जय श्री राम, हमें तो बस भगवान का नाम लेने से काम।
लेकिन हमारे राजनेता बड़े चतुर निकले। उन्हें जब अपनी भी जय जयकार करवानी हो, रैलियां निकालनी हों, तो वे अपने नाम के साथ भगवान के नाम की भी जय जयकार करवाने लगे। क्या यह अतिशयोक्ति नहीं हुई, इसमें कोई आभूषण नहीं, कोई अलंकार नहीं, हमारे लिए यह बकवास बोल है, जिसके लिए हमने आपका अलंकार hyperbole हाइपर बोल उधार लिया है। ।
हाइपरबोल में आज हम thousand से मिलियन और बिलियन तक पहुंच गए हैं। हमारा राजनेताओं का आंकड़ों का गणित आज जहां तक पहुंचा हुआ है, वहां तक कभी आपका कोई पहुंचा हुआ कवि, नहीं पहुंच पाया होगा। हमारी नज़र हजारों से हटकर करोड़ों तक पहुंच गई है।
आपका तो नाम ही कविवर Wordsworth था, जिसका हर शब्द कीमती था, words worth, अतः आपसे क्षमा मांगते हुए हमने आपके अलंकार हाइपरबोल पर अपना कॉपीराइट स्थापित कर लिया है। अतिशयोक्तिपूर्ण कथन में कोई हमसे बाजी नहीं मार सकता। बोल बोल, जब भी बोल हाइपरबोल। ।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३०४ ☆ मन एव मनुष्याणां…
‘मेरे शुरुआती दिनों में उसने मेरे साथ बुरा किया था। अब मेरा समय है। ऐसी हालत की है कि ज़िंदगी भर याद रखेगा।’…’मेरी सास ने मुझे बहुत हैरान-परेशान किया था। बहुत दुखी रही मैं। अब घर मेरे मुताबिक चलता है। एकदम सीधा कर दिया है मैंने।’…’उसने दो बात कही तो मैंने भी चार सुना दीं।’…आदि-आदि।
सामान्य जीवन में असंख्य बार प्रयुक्त होते हैं ऐसे वाक्य।
यद्यपि पात्र और परिस्थिति के अनुरूप हर बार प्रतिक्रिया भिन्न हो सकती है पर मनुष्य के मूल में मनन न हो तो मनुष्यता को लेकर चिंता का कारण बनता है।
मनुष्यता का सम्बंध मन में उठनेवाले भावों से है। मन के भाव ही बंधन या मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। कहा गया है,
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः
अर्थात मन ही सभी मनुष्यों के बन्धन एवं मोक्ष का प्रमुख कारण है।
वस्तुत: भीतर ही बसा है मोक्ष का एक संस्करण, उसे पाने के लिए, उसमें समाने के लिए मन को मनुष्यता में रमाये रखो। मनुष्यता, मनुष्य का प्रकृतिगत लक्षण है।प्रकृतिगत की रक्षा करना मनुष्य का स्वभाव होना चाहिए।
एक साधु नदी किनारे स्नान कर रहे थे। डुबकी लगाकर ज्यों ही सिर बाहर निकाला, देखते हैं कि एक बिच्छू बहे जा रहा है। साधु ने समय लगाये बिना अपनी हथेली पर बिच्छू को लेकर जल से निकालकर भूमि की ओर फेंकने का प्रयास किया। फेंकना तो दूर जैसे ही उन्होंने बिच्छू को स्पर्श किया, बिच्छू ने डंक मारा। साधु वेदना से बिलबिला गये, हथेली थर्रा गई, बिच्छू फिर पानी में बहने लगा। अपनी वेदना पर उन्होंने बिच्छू के जीवन को प्रधानता दी। पुनश्च बिच्छू को हथेली पर उठाया और क्षणांश में ही फिर डंक भोगा। बिच्छू फिर पानी में।…तीसरी बार प्रयास किया, परिणाम वही ढाक के तीन पात। किनारे पर स्नान कर रहा एक व्यक्ति बड़ी देर से घटना का अवलोकन कर रहा था। वह साधु से बोला, ” महाराज! क्यों इस पातकी को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। आप बचाते हैं और यह काटता है। इस दुष्ट का तो स्वभाव ही डंक मारना है।” साधु उन्मुक्त हँसे, फिर बोले, ” यह बिच्छू होकर अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकता तो मैं मनुष्य होकर अपना स्वभाव कैसे छोड़ दूँ?”…
लाओत्से का कथन है, “मैं अच्छे के लिए अच्छा हूँ, मैं बुरे के लिए भी अच्छा हूँ।” यही मनुष्यता का स्वभाव है। मनन कीजिएगा क्योंकि ‘मन एव मनुष्याणां…।’
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी (बुधवार 27 अगस्त) को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी (शनिवार 6 सितम्बर) तक चलेगी
साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः। इस मंत्र की कम से कम एक माला का संकल्प लेना होगा, साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “• स्पर्श •“।)
अभी अभी # ७७० ⇒ आलेख – • स्पर्श • श्री प्रदीप शर्मा
(sense of touch)
एक पौधा होता है छुईमुई का (Mimosa pudica), जिसे छुओ, तो मुरझा जाता है, और थोड़ी देर बाद पुनः पहले जैसी स्थिति में आ जाता है। हर पालतू प्राणी, स्पर्श का भूखा होता है, इंसान की तो बात ही छोड़िए। छेड़ा मेरे दिल ने तराना तेरे प्यार का, किसी वाद्य यंत्र के तार मात्र को छूने से वह झंकृत हो जाता है, स्पर्श की महिमा जानना इतना आसान भी नहीं।
हमारी पांच ज्ञानेंद्रियां हैं, आंख, नाक, कान, जीभ और त्वचा ! वैसे तो कर्मेंद्रियां भी पांच ही हैं, लेकिन त्वचा ही वह ज्ञानेंद्रिय है, जहां हमें कभी सुई तो कभी कांटा चुभता है, और गर्मागर्म चाय जल्दी जल्दी सुड़कने से जीभ जल जाती है। चाय का जला, कोल्ड्रिंक भी फूंक फूंक कर पीता है। ।
बड़ों के पांव छूना, हमारे संस्कार में है। मंदिर में प्रवेश करते ही, हमारे हाथ एकाएक जुड़ जाते हैं। हमारी इच्छा होती है, मूर्ति के करीब जाकर प्रणाम करें, वह तन का ही नहीं, मन का भी स्पर्श होता है। कुछ भक्त तो अपने इष्ट के सम्मुख साष्टांग प्रणाम भी करते हैं, जिसमें शरीर के सभी अंग(पेट को छोड़कर) ठुड्डी, छाती, दोनों हाथ, घुटने, पैर और पूरा शरीर धरती को स्पर्श करता है। इसे साष्टांग दंडवत प्रणाम भी कहते हैं। अहंकार त्यागकर स्वयं को अपने इष्ट अथवा ईश्वर को सौंप देना ही साष्टांग दंडवत प्रणाम का अर्थ है।
समय के साथ मानसिक स्पर्श अधिक व्यावहारिक हो चला है। मुंह से बोलकर अथवा चिट्ठी पत्री में ही पांव धोक, प्रणाम और दंडवत होने लग गए हैं। हृदय पर हाथ रखकर भी आजकल प्रणाम किया जाने लगा है। नव विवाहित युगल जब बड़ों को प्रणाम करता था तो दूधों नहाओ और पूतों फलो तथा मराठी में महिलाओं को अष्टपुत्र सौभाग्यवती का आशीर्वाद मिलता था। ।
हैजा एक संक्रामक बीमारी है। महामारी की बात छोड़िए, हाल ही में, मानवता ने कोरोनावायरस जैसी त्रासदी का सामना किया है, जिसके आगे विज्ञान क्या, ईश्वरीय शक्ति भी नतमस्तक हो गई थी। इंसान इंसान से दूर हो गया था, मंदिर का भगवान भी अपने भक्त से दूर हो गया था। लेकिन सृजन और प्रलय सृष्टि का नियम है, आज मानवता पुनः खुली हवा में सांस ले रही है। प्रार्थना और पुरुषार्थ में बल है। God is Great!
स्पर्श एक नैसर्गिक गुण है। इसे भौतिक सीमाओं में कैद नहीं कर सकते। डाली पर खिला हुआ एक फूल हमारे मन को स्पर्श कर जाता है। फूलों का स्पर्श अपने इष्ट को, अपने आराध्य को और अपनी प्रेमिका को, कितना आनंदित और प्रसन्न कर जाता है। पत्रं पुष्पं, नैवेद्यं समर्पयामी ! एक फूल तेरे जूड़े में, कह दो तो लगा दूं मैं; गुस्ताखी माफ़। ।
एक नवजात, फूल जैसे बालक का स्पर्श, एक बालक का अपने गुड्डे गुड़ियों और आज की बात करें तो टैडी बच्चों की पहली पसंद होती है। मिट्टी के खिलौनों में बच्चों का स्पर्श जान डाल देता है। आज हमारे हाथ का मोबाइल और डेस्कटॉप महज कोई हार्डवेयर अथवा सॉफ्टवेयर नहीं, अलादीन का चिराग है। मात्र स्पर्श से खुल जा सिम सिम।
अब बहुत पुरानी हो गई स्पर्श की थ्योरी, जब आंखों आंखों में ही बात हो जाती है और दिल से दिल टकरा जाता है, मत पूछिए क्या हो जाता है। नजरों के तीर से दिल घायल होता है, फिर भी कोई शिकवा शिकायत नहीं, कोई एफआईआर नहीं। ।
किसी के मन को छूना आज जितना आसान है, उतना ही कठिन है, किसी के मन को पढ़ पाना। कोई गायक किसी गीत को अपने होठों से मात्र छू देता है और वह गायक और गीत अमर हो जाता है। ये किसने गीत छेड़ा।
स्पर्श शरीर की नहीं, मन की वस्तु है। केवल सच्चे मन से मीठा बोला जाए, तो रिश्तों में चाशनी घुल जाए। किसी तन और मन से बीमार व्यक्ति को संजीदा शब्दों का स्पर्श भी कभी कभी संजीवनी का काम करता है। और कुछ नहीं है, स्पर्श चिकित्सा अथवा spiritual healing, कुछ दिल से दिल की बात कही, और रो दिए। लोगों पर हंसना छोड़िए, किसी के आंसू पोंछिए, रूमाल से नहीं, अपने शब्दों के स्पर्श से।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें…“।)
अभी अभी # ७६९ ⇒ आलेख – अंतिम साँसें श्री प्रदीप शर्मा
जब घर में बच्चे होते हैं, छोटा घर भी बड़ा लगने लगता है। बच्चे बड़े होने लगते हैं। समय के साथ, ज़रूरत के साथ, घर भी बड़ा होने लगता है। अचानक बच्चे बहुत बड़े हो जाते हैं। घर में नहीं समाते। उनके पर लग जाते हैं। वे परदेस चले जाते हैं। घर फिर छोटा हो जाता है।
बच्चों के बिना, घर बहुत ही छोटा हो जाता है।
पहले घर, सिर्फ़ घर नहीं होता था, घर के साथ आँगन भी होता था, जिसमें आम, नीम, जाम और जामुन के पेड़ भी होते थे। आँगन में बाहर खाट पड़ी रहती थी, बच्चे खेलते रहते थे, सुबह-शाम दरवाज़े पर गाय रंभाती रहती थी। घर के साथ आँगन भी बुहारा जाता था। सभी वार त्योहार, शादी ब्याह तक उस अँगने में सम्पन्न हो जाते थे।।
इंसानों के दायरे विस्तृत हुआ करते थे। कुछ घर-आँगन मिलकर मोहल्ला हो जाता था। सभी घर बच्चों के हुआ करते थे। कौन बच्चा किस घर में खा रहा है, और किस घर में सो रहा है, कोई हिसाब किताब नहीं रखा जाता था। एक घर के अचार की खुशबू कई दीवारें पार कर जाती थी।
ज़िन्दगी घरों में नहीं, आंगनों में ही गुज़र जाती थी। गर्मी के दिनों में कौन घरों के अन्दर मच्छरदानी और आल आउट में सोता था ! माँ की लोरी और आसमान के तारे गिनते-गिनते, कब नींद लग जाती, कुछ पता ही नहीं चलता था। सुबह उठो, तो सूरज आसमान में सर पर नज़र आता था। अब किसी के घोड़े नहीं बिकते। सुबह का अलार्म, दूधवाला और अखबार वाला, बच्चों के स्कूल की तैयारी और काम वाली बाई की दस्तक, सब नींद चुराकर ले जाते हैं।।
अब घर बड़े हो गए, आँगन साफ़ हो गए, पड़ोस से सटी मोटी-मोटी दीवारें चार इंची हो गई, इस पार से उस पार की ताका-झाँकी, वस्तुओं का आदान-प्रदान बंद हो गया। सब घरों में सबके अपने अपने बेडरूम हो गए, अलग अलग सपने हो गए। इंसान सम्पन्न होता गया, अपने आप में सिमटता चला गया।
आज घर की पक्की दीवारें महँगे एक्रेलिक पेंट से पुती हुई होती हैं, जिनमें एक खील भी ड्रिलिंग मशीन से ठोकी जाती है। याद आती हैं वे दीवारें, जिनमें ताक हुआ करती थी। बच्चे, पेंसिल, पेन जो हाथ लगे, से दीवारों पर चित्रकारी किया करते थे। आड़ी-तिरछी लकीरें बच्चों की मौज़ूदगी का अहसास दिलाती थी। हर भगवान के कैलेंडर के लिए एक नई खील ठोकी जाती थी। कपड़े खूँटी पर टांगे जाते थे।
आज सहमी सी, सिमटी सी, साफ-सुथरी दीवारें बच्चों के लिए तरस जाती हैं। छोटे छोटे नाखूनों से दीवार में बड़े बड़े छेद कर दिये जाते थे, चोरी से वही मिट्टी खाई जाती थी। आज दीवारों से बात करने वाला कोई नहीं। महँगे कालीन को बच्चों से बचाया जाता है। बच्चे घर गंदा कर देते हैं। घरों को बच्चों से बचाया जाता है। घर मन मसोसकर रह जाता है। घर की खामोश लिपी-पुती दीवारें मन ही मन सोचती हैं, अरे नादानों ! बच्चों से ही तो घर, घर होता है।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख प्रतिशोध नहीं परिवर्तन। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # २९० ☆
☆ प्रतिशोध नहीं परिवर्तन… ☆
‘ऊंचाई पर पहुँचते हैं वे, जो प्रतिशोध के बजाय परिवर्तन की सोच रखते हैं।’ प्रतिशोध उन्नति के पथ में अवरोधक का कार्य करता है तथा मानसिक उद्वेलन व क्रोध को बढ़ाता है; मन की शांति को मगर की भांति लील जाता है… ऐसे व्यक्ति को कहीं भी कल अथवा चैन नहीं पड़ती। उसका सारा ध्यान विरोधी पक्ष की गतिविधियों पर ही केंद्रित नहीं होता, वह उन्हें नीचा दिखाने के अवसर की तलाश में मग्न रहता है। उसका मन अनावश्यक उधेड़बुन में उलझा रहता है, क्योंकि उसे अपने दोष व अवगुण नज़र नहीं आते और अन्य सब उसे दोषों व बुराइयों की खान नज़र आते हैं। फलत: उसके लिए उन्नति के सभी द्वार बंद हो जाते हैं। उन विषम परिस्थितियों में अनायास सिर उठाए कुकुरमुत्ते, हर दिन सिर उठाए उसे प्रतिद्वंद्वी के रूप में नज़र आते हैं और हर इंसान उसे उपहास अथवा व्यंग्य करता-सा दिखाई पड़ता है।
ऊंचा उठने के लिए पंखों की ज़रूरत पक्षियों को पड़ती है। परंतु मानव जितना विनम्रता से झुकता है; उतना ही ऊपर उठता है। सो! विनम्र व्यक्ति सदैव झुकता है; फूल-फल लगे वृक्षों की डालियों की तरह… और वह सदैव ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर के भाव से मुक्त रहता है। उसे सब मित्र-सम भासते हैं और वह दूसरों में दोष-दर्शन न कर आत्मावलोकन करता है… अपने दोष व गुणों का चिंतन कर वह ख़ुद को बदलने में प्रयासरत रहता है। प्रतिशोध की बजाय परिवर्तन की सोच रखने वाला व्यक्ति सदैव उन्नति के अंतिम शिखर पर पहुंचता है। परंतु इसके लिए आवश्यकता है– अपनी सोच व रुचि बदलने की; नकारात्मकता से मुक्ति पाने की; स्नेह, प्रेम व सौहार्द के दैवीय गुणों को जीवन में धारण करने की; प्राणी-मात्र के हित की कामना करने की; अहं को कोटि शत्रुओं-सम त्यागने की; विनम्रता को जीवन में धारण करने की; संग्रह की प्रवृत्ति को त्याग परमार्थ व परोपकार को अपनाने की; सबके प्रति दया, करुणा और सहानुभूति भाव जाग्रत करने की। यदि मानव उपरोक्त दुष्प्रवृत्तियों को त्याग, सात्विक वृत्तियों को जीवन में धारण कर लेता है, तो संसार की कोई शक्ति उसे पथ-विचलित व परास्त नहीं कर सकती।
इंसान, इंसान को धोखा नहीं देता, बल्कि उम्मीदें धोखा देती हैं; जो वह दूसरों से करता है। इससे संदेश मिलता है कि हमें दूसरों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इंसान ही नहीं, हमारी अपेक्षाएं व आकांक्षाएं ही हमें धोखा देतीं हैं, जो इंसान दूसरों से करता है। वैसे यह कहावत भी प्रसिद्ध है कि ‘पैसा उधार दीजिए; आपका पक्का दोस्त भी आपका कट्टर निंदक अर्थात् दुश्मन बन जाएगा।’ सो! उधार देने के पश्चात् भूल जाइए, क्योंकि वह पैसा लौट कर कभी भी नहीं आने वाला है। यदि आप वापसी की उम्मीद रखते हैं, तो यह आपकी ग़लती ही नहीं, मूर्खता है। जिस प्रकार दुनिया से जाने वाले लौट कर नहीं आते; वही स्थिति ऋण के रूप में दिये गये धन की है। यदि वह लौट कर आता भी है, तो वह आपके सबसे प्रिय मित्र भी शत्रु के रूप में सीना ताने खड़ा दिखाई पड़ता है। सो! प्रतिशोध की भावना को त्याग, अपनी सोच व विचारों को बदलें– जैसे एक हाथ से दिए गए दान की खबर, दूसरे हाथ को कदापि नहीं लगनी चाहिए। उसी प्रकार उधार देने के पश्चात् उसे भुला देने में ही सबका मंगल है। सो! जो इंसान अपने हित के बारे में ही नहीं सोचता; वह दूसरों के लिए क्या ख़ाक सोचेगा?
समय परिवर्तनशील है और प्रकृति भी पल-पल रंग बदलती है। मौसम भी यथा-समय बदलते रहते हैं। सो! मानव को श्रेष्ठ संबंधों को कायम रखने के लिए स्वयं को बदलना होगा। जैसे अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस को छोड़ना पड़ता है; उसी प्रकार आवश्यकता से अधिक संग्रह करना भी मानव के लिए कष्टकारी
होता है। सो! अपनी ‘इच्छाओं पर अंकुश लगाएं और तनाव को दूर भगाएं…दूसरों से उम्मीद मत रखें, क्योंकि वह तनाव का कारण होती हैं।’ महात्मा बुद्ध की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है कि ‘आवश्यकता से अधिक सोचना, संचय करना व सेवन करना– दु:ख और अप्रसन्नता का कारण है, जो हमें सोचने पर विवश करता है कि मानव को व्यर्थ के चिंतन से दूर रहना चाहिए। परंतु यह तभी संभव है, जब वह आत्मचिंतन करता है और दुनियादारी व दोस्तों की भीड़ से दूरी बनाकर रखता है।
वास्तव में दूसरों से अपेक्षा करना हमें अंध-कूप में धकेल देता है, जिससे मानव चाह कर भी बाहर निकल नहीं पाता। वह आजीवन ‘तेरी-मेरी’ में उलझा रहता है तथा ‘लोग क्या कहेंगे’–यह सोचकर अपने हंसते-खेलते जीवन को अग्नि में झोंक देता है। यदि इच्छाएं पूरी नहीं होती, तो क्रोध बढ़ता है और पूरी होती हैं तो लोभ। सो! उसके लिए हर स्थिति में धैर्य बनाए रखना अपेक्षित है। ‘इच्छाओं को हृदय में अंकुरित मत होने दें, अन्यथा आपके जीवन की खुशियों को ग्रहण लग जाएगा और आप क्रोध व लोभ के भंवर से कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे। कठिनाई की स्थिति में केवल आत्मविश्वास ही आपका साथ देता है, इसलिए सदैव उसका दामन थामे रखिए। ‘तुलना के खेल में स्वयं को मत झोंकिए, क्योंकि जहां इसकी शुरुआत होती है, वहां अपनत्व व आनंद समाप्त हो जाता है और कोसों दूर चला जाता है।’ इसलिए जो मिला है, उससे संतोष कीजिए। स्पर्द्धा भाव रखिए, ईर्ष्या भाव नहीं। ख़ुद को बदलिए, क्योंकि जिसने संसार को बदलने की कोशिश की, वह हार गया और जिसने ख़ुद को बदल लिया, वह जीत गया। दूसरों से उम्मीद रखने के भाव का त्याग करना ही श्रेयस्कर है। सो! उस राह को त्याग दीजिए, जो कांटों से भरी है, क्योंकि दुनिया भर के कांटों को चुनना व दु:खों को मिटाना संभव नहीं। इसलिए उस विचार को समूल नष्ट करने में सबका कल्याण है। इसके साथ ही बीती बातों को भुला देना कारग़र है, क्योंकि गुज़रा हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। इसलिए वर्तमान में जीना सीखिए। अतीत अनुभव है। उससे शिक्षा लीजिए तथा उन ग़लतियों को वर्तमान में मत दोहराएं, अन्यथा आपके भविष्य का अंधकारमय होना निश्चित है।
वैसे तो आजकल लोग अपने सिवाय किसी के बारे में सोचते ही नहीं, क्योंकि वे अपने अहं में इस क़दर मदमस्त रहते हैं कि उन्हें दूसरों का अस्तित्व नगण्य प्रतीत होती है। अब्दुल कलाम जी के शब्दों में ‘यदि आप किसी से सच्चे संबंध बनाए रखना चाहते हैं, तो आप उसके बारे में जो जानते हैं; उस पर विश्वास रखें… न कि जो उसके बारे में सुना है’… यह कथन कोटिश: सत्य है। आंखों-देखी पर सदैव विश्वास करें, कानों-सुनी पर नहीं, क्योंकि लोगों का काम तो होता है कहना व आलोचना करना; संबंधों में कटुता उत्पन्न करने के लिए इल्ज़ाम लगाना; भला-बुरा कहना व अकारण दोषारोपण करना। इसलिए मानव को व्यर्थ की बातों में समय नष्ट न करने, बाह्य आकर्षणों व ऐसे लोगों से सचेत रहने की सीख दी गयी है, क्योंकि ‘बाहर रिश्तों का मेला है/ भीतर हर शख्स अकेला है/ यही ज़िंदगी का झमेला है।’ इसलिए ज़रा संभल कर चलें, क्योंकि तारीफ़ के पुल के नीचे सदैव मतलब की नदी बहती है अर्थात् यह दुनिया पल-पल गिरगिट की भांति रंग बदलती है। लोग आपके सामने तो प्रशंसा के पुल बांधते हैं, परंतु पीछे से फब्तियां कसते हैं; भरपूर निंदा करते हैं और पीठ में छुरा घोंपने से तनिक भी गुरेज़ नहीं करते।
‘इसलिए सच्चे दोस्तों को ढूंढना/ बहुत मुश्किल होता है/ छोड़ना और भी मुश्किल/ और भूल जाना नामुमक़िन।’ सो! मित्रों के प्रति शंका भाव कभी मत रखिए, क्योंकि वे सदैव तुम्हारा हित चाहते हैं। आपको गिरता हुआ देख, आगे बढ़ कर थाम लेते हैं। वास्तव में सच्चा दोस्त वही है, जिससे बात करने में खुशी दोगुनी व दु:ख आधा हो जाए…केवल वो ही अपना है, शेष तो बस दुनिया है अर्थात् दोस्तों पर शक़ करने से बेहतर है… ‘वक्त पर छोड़ दीजिए/ कुछ उलझनों के हल/ बेशक जवाब देर से मिलेंगे/ मगर लाजवाब मिलेंगे।’ समय अपनी गति से चलता है और समय के साथ मुखौटों के पीछे छिपे लोगों का असली चेहरा उजागर अवश्य हो जाता है। सो! यह कथन कोटिश: सत्य है कि ख़ुदा की अदालत में देर है, अंधेर नहीं। अपने विश्वास को डगमगाने मत दें और निराशा का दामन कभी मत थामें। इसलिए ‘यदि सपने सच न हों/ तो रास्ते बदलो/ मुक़ाम नहीं/ पेड़ हमेशा पत्तियां बदलते हैं/ जड़ नहीं।’ सो! लोगों की बातों पर विश्वास न करें, क्योंकि आजकल लोग समझते कम और समझाते ज़्यादा हैं। तभी तो मामले सुलझते कम, उलझते ज़यादा हैं। दुनिया में कोई भी दूसरे को उन्नति करते देख प्रसन्न नहीं होता। सो! वे उस सीढ़ी को खींचने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देते हैं तथा उसे सही राह दर्शाने की मंगल कामना नहीं करते।
इसलिए मानव को अहंनिष्ठ व स्वार्थी लोगों से सचेत व सावधान रहने का संदेश देते हुए कहा गया है, कि ‘घमंड मत कर ऐ!दोस्त!/ सुना ही होगा/ अंगारे राख ही बनते हैं’…जीवन को समझने से पहले मन को समझना आवश्यक है, क्योंकि जीवन और कुछ नहीं, हमारी सोच का साकार रूप है…’जैसी सोच, वैसी क़ायनात और वैसा ही जीवन।’ सो! मानव को प्रतिशोध के भाव को जीवन में दस्तक देने की कभी भी अनुमति नहीं प्रदान करनी चाहिए, क्योंकि आत्म-परिवर्तन को अपनाना श्रेयस्कर है। सो! मानव को अपनी सोच, अपना व्यवहार, अपना दृष्टिकोण, अपना नज़रिया बदलना चाहिए, क्योंकि नज़र का इलाज तो दुनिया में है, नज़रिए का नहीं। ‘नज़र बदलो, नज़ारे बदल जाएंगे। नज़रिया बदलो/ दुनिया के लोग ही नहीं/ वक्त के धारे भी बदल जाएंगे।