(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आए गए का घर…“।)
अभी अभी # ९५० ⇒ आलेख – आए गए का घर श्री प्रदीप शर्मा
किसी भी घर की रौनक ही इसी में है, कि वहां मिलने जुलने वाले और रिश्तेदारों का आना जाना बना रहे। किसी घर की घंटी बजना, अथवा घर के सामने जूते चप्पलों का ढेर यह दर्शाता है कि इस घर में काफी चहल पहल है।
वैसे भी घर में खामोशी किसे पसंद है, दीवारें तक कान लगाए सुनती रहती हैं, जिस घर में हमेशा महफिल जमी रहती है।
ऐसे घर को हमारी मां, आए गए का घर कहती थी। जब तक हमारे घर में मां और पिताजी मौजूद रहे, ना तो घर कभी खाली अथवा खामोश रहा और ना ही घर में कभी ताला लगा।।
तब कहां घरों में फोन अथवा मोबाइल थे। कभी कभी तो चिट्ठी के आने के पहले ही मेहमान टपक पड़ते थे लेकिन अधिकतर अतिथि शब्द का मान रखते हुए समय और तारीख बताए बिना ही पधार जाते थे।
पिताजी रात को जब घर आते तो भोजन के वक्त, कोई ना कोई परिचित अवश्य उनके साथ होता। बहन स्कूल से घर आती, तो एक दो सहेलियों को साथ लेकर आती। तब ना तो इतनी मोहल्लों में दूरी थी और ना ही दिलों में। तब शायद सबको प्यास भी बहुत लगती थी, वॉटर बॉटल का तब शायद आविष्कार ही नहीं हुआ था।।
हर तरह की परिस्थिति से घर में तब मां को ही जूझना पड़ता था। अनाज, मसाले और दाल चावल का साल भर का संग्रह जरूरी होता था। मौसम के हिसाब से घरों में एक्सट्रा बिस्तर और रजाई गद्दों की भी व्यवस्था करनी पड़ती थी। टेंट हाउस की याद तो बस शादी ब्याह के वक्त ही आती थी। किराने और दूध का हिसाब महीने में एक बार करना पड़ता था।
इस तरह की सभी युद्ध स्तर की तैयारियों से सुसज्जित घर ही आए गए का घर कहलाता था। मेहमानों की पसंद का भी पूरा खयाल रखा जाता था। फूफा जी को चावल में घी और शक्कर प्रचुर मात्रा में लगता था और वे पूड़ी ही पसंद करते थे, रोटी नहीं।।
लेकिन यह सब कल की बात है। आज तो मेहमानों के लिए नाश्ता भी बाहर से ही आता है और भोजन भी
बाहर होटल में ही किया जाता है। फोन और मोबाइल की सुविधा के बावजूद ना किसी को आने की फुर्सत है और ना ही किसी को बुलाने की।
परिवार छोटे होते जा रहे हैं, घर बड़े होते जा रहे हैं।
छोटे घर में तब कितने सदस्य समा जाते थे, आज आश्चर्य होता है। तब कहां किसी का अटैच बेडरूम और बाथरूम था। घर की महिलाएं अपने कपड़े ताक में रखती थी। आज घरों में सोफ़ा, अलमारी, अपनी अपनी वॉर्डरोब और मॉड्यूलर किचन है, बस खाने वाला कोई नहीं है।।
हंसी आती है, जब धर्मपत्नी पुराने बर्तनों और एक्सट्रा बिस्तरों को आज भी सहेजकर रखती है। वह कहती है, आप नहीं समझते, आए गए के घर में घर घृहस्थी का सभी सामान जरूरी होता है।
बड़ी भोली और घरेलू टाइप की गृहिणी है वह।
अनायास कोई मेहमान आता है तो उसकी बांछें खिल जाती हैं। घर में दावत हो जाती है। लेकिन
ऐसे अवसर आजकल कम ही आते हैं। लगता है अपने परिचित कहीं बहुत दूर चले गए हैं, यह दूरी दिलों की है अथवा मजबूरी की, समझ नहीं पाते। कोई आए, जाए, कितना अच्छा लगता है।।
होते हैं कुछ ऐसे खामोश घर, जहां कोई ज्यादा आता जाता नहीं। किसी आहट पर उम्मीद सी बंधती है लेकिन फिर खयाल आता है ;
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – विश्व कविता दिवस विशेष – शिलालेख
आज वैश्विक कविता दिवस है। यह बात अलग है कि स्वतः संभूत का कोई समय ही निश्चित नहीं होता तो दिन कैसे होगा? तब भी तथ्य है कि आज यूनेस्को द्वारा मान्य अधिकृत विश्व कविता दिवस है।
बीते कल गौरैया दिवस था, आते कल जल दिवस होगा। लुप्त होते आकाशी और घटते जीवनदानी के बीच टिकी कविता की सनातन बानी। जीवन का सत्य है कि पंछी कितना ही ऊँचा उड़ ले, पानी पीने के लिए उसे धरती पर उतरना ही पड़ता है। आदमी तकनीक, विज्ञान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में कितना ही आगे चला जाए, मनुष्यता बचाये रखने के लिए उसे लौटना पड़ता है बार-बार कविता की शरण में।
इसी संदर्भ में कविता की शाश्वत यात्रा का एक चित्र प्रस्तुत है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी।
इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख “ईद-उल-फितर : मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम” पर चर्चा।
☆ आलेख ☆ ईद-उल-फितर : मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम☆ श्री मनजीत सिंह ☆
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ईद-उल-फितर इंसानियत, मोहब्बत और भाईचारे का वह पाक त्योहार है जो रमज़ान के मुकद्दस महीने के बाद आता है और दिलों में रहमत, बरकत और सुकून की रोशनी भर देता है। यह सिर्फ एक मजहबी त्योहार नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बात का ऐसा इज़हार है जिसमें प्यार, हमदर्दी, माफी और अपनापन अपने पूरे जलवे के साथ सामने आता है। जब चांद रात को आसमान में हिलाल नजर आता है, तो हर दिल में खुशी की एक लहर दौड़ जाती है। यह लम्हा सिर्फ एक नए महीने की शुरुआत नहीं, बल्कि एक नई सोच, नई उम्मीद और नई मोहब्बत का पैग़ाम लेकर आता है।
रमज़ान का महीना सब्र, इबादत और तजुर्बे का महीना होता है। इस दौरान रोज़ेदार सुबह से शाम तक भूख-प्यास सहकर अल्लाह की इबादत में मशगूल रहते हैं। यह अमल सिर्फ भूखा रहने का नहीं, बल्कि अपने नफ्स पर काबू पाने, अपने दिल को साफ करने और दूसरों के दर्द को महसूस करने का तरीका है। जब इंसान खुद भूख की तकलीफ को महसूस करता है, तो उसके दिल में गरीबों और जरूरतमंदों के लिए रहम और हमदर्दी पैदा होती है। यही एहसास आगे चलकर ईद के दिन मोहब्बत और खैरात के रूप में सामने आता है।
ईद-उल-फितर का असली मकसद इंसान को इंसान से जोड़ना है। इस दिन हर कोई अपने गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को गले लगाता है और “ईद मुबारक” कहकर मोहब्बत का इज़हार करता है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि जिंदगी में नफरत, अदावत और तफरका की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अगर दिल में कोई शिकवा या रंजिश है, तो उसे खत्म कर देना ही असली ईद है। जब दो लोग गले मिलते हैं, तो उनके दिलों की दूरियां मिट जाती हैं और एक नई शुरुआत होती है।
ईद के दिन नमाज़-ए-ईद अदा करना एक अहम रस्म है। मस्जिदों और ईदगाहों में जब हजारों लोग एक साथ खड़े होकर सज्दा करते हैं, तो वहां का मंज़र इंसानी बराबरी और एकता की बेहतरीन मिसाल बन जाता है। अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा, हर कोई एक ही सफ में खड़ा होता है। यह हमें यह पैग़ाम देता है कि अल्लाह के सामने सभी इंसान बराबर हैं और असली इज़्ज़त इंसानियत और नेक नियत में होती है।
ईद का एक अहम पहलू ज़कात-उल-फितर या फितरा है, जिसे ईद की नमाज़ से पहले अदा किया जाता है। इसका मकसद यह है कि समाज का कोई भी गरीब या जरूरतमंद इस खुशी से महरूम न रहे। जब हर इंसान अपनी कमाई का एक हिस्सा दूसरों के लिए निकालता है, तो समाज में बराबरी और इंसाफ का माहौल बनता है। यह अमल हमें सिखाता है कि असली खुशी सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के साथ बांटने में है।
ईद के मौके पर घरों में तरह-तरह के लज़ीज़ पकवान बनाए जाते हैं। सेवइयां, शीरखुरमा और कई किस्म के पकवान मेहमाननवाजी का हिस्सा होते हैं। लोग अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के घर जाते हैं और उन्हें दावत देते हैं। यह मेल-जोल मोहब्बत को और मजबूत करता है। खास बात यह है कि ईद सिर्फ मुसलमानों का त्योहार नहीं रह जाता, बल्कि इसमें हर मजहब के लोग शामिल होकर एक-दूसरे की खुशी में शरीक होते हैं। यही गंगा-जमुनी तहज़ीब की खूबसूरती है, जो भारत जैसे मुल्क की पहचान है।
ईद-उल-फितर हमें माफी और दरगुज़र का सबक भी देती है। अगर किसी से कोई गलती हो गई हो, तो उसे माफ कर देना और दिल साफ कर लेना ही असली ईद की रूह है। इस दिन लोग अपने बड़ों से दुआ लेते हैं और छोटों को ईदी देकर खुश करते हैं। यह रिवाज रिश्तों में मिठास और अपनापन भरता है। ईदी सिर्फ पैसों का लेन-देन नहीं, बल्कि प्यार और दुआओं का इज़हार होता है।
आज के दौर में जब दुनिया नफरत, तफरका और खुदगर्जी की आग में जल रही है, तब ईद-उल-फितर का पैग़ाम और भी अहम हो जाता है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि इंसानियत सबसे बड़ा मजहब है और मोहब्बत सबसे बड़ी ताकत। अगर हम ईद के इस पैग़ाम को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल कर लें, तो समाज में अमन, सुकून और खुशहाली कायम हो सकती है।
ईद हमें यह भी सिखाती है कि असली कामयाबी सिर्फ दुनियावी चीजों में नहीं, बल्कि अच्छे किरदार और नेक अमल में है। जब इंसान दूसरों की मदद करता है, उनके साथ मोहब्बत से पेश आता है और अपने दिल को साफ रखता है, तभी वह असल मायनों में कामयाब होता है। ईद का त्योहार हमें यही याद दिलाता है कि हमें अपने अंदर की बुराइयों को खत्म कर अच्छाइयों को अपनाना चाहिए।
इस त्योहार का एक और खूबसूरत पहलू यह है कि यह हमें शुक्रगुजार बनना सिखाता है। रमज़ान के महीने में इबादत और सब्र के बाद जब ईद आती है, तो इंसान अपने रब का शुक्र अदा करता है कि उसने उसे इतनी ताकत दी कि वह इस महीने के फर्ज को पूरा कर सका। यह शुक्रगुजारी इंसान को और भी विनम्र और बेहतर बनाती है।
ईद-उल-फितर का पैग़ाम सिर्फ एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे पूरे साल अपने दिल और अमल में जिंदा रखना चाहिए। अगर हम हर दिन को ईद की तरह मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत के साथ जीएं, तो दुनिया एक बेहतर जगह बन सकती है। नफरत की जगह मोहब्बत, तकरार की जगह बातचीत और दूरी की जगह अपनापन अगर हमारी सोच का हिस्सा बन जाए, तो हर दिन ईद जैसा महसूस होगा।
अंत में यही कहा जा सकता है कि ईद-उल-फितर सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि इंसानियत का जश्न है। यह हमें सिखाता है कि जिंदगी की असली खूबसूरती मोहब्बत, खैरात और भाईचारे में है। जब हम दूसरों की खुशी में अपनी खुशी तलाश करते हैं और अपने दिल को नफरत से दूर रखते हैं, तभी हम ईद के असली मायने को समझ पाते हैं। ईद का यह पैग़ाम हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहना चाहिए, ताकि हम एक ऐसी दुनिया बना सकें जहां अमन, मोहब्बत और इंसानियत का राज हो।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चरण-पादुका …“।)
अभी अभी # ९४९ ⇒ आलेख – चरण-पादुका श्री प्रदीप शर्मा
जिसे हम कलजुग में जूता कहते हैं, उसे रामराज्य में चरण-पादुका कहा जाता था। भगवान रामचंद्र को जब वनवास हुआ था, तब वे लछमन-जानकी सहित, चौदह वर्ष के लिए, नंगे पाँव, अर्थात bare-foot जंगल प्रस्थित हो गए थे, और उनके भ्राता भरत ने उनकी चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर विराजमान कर, अजोध्या का राजपाट संभाला था।
चरण-पादुका शब्द से ऐसा प्रतीत होता है कि कोई ऐसी भी पादुका रही होगी, जिसे हाथों में पहना जाता होगा, और उसे शायद हस्त-पादुका कहा जाता होगा। लेकिन रामायण में ऐसी किसी हस्त-पादुका का जिक्र नहीं है, हाँ एक मुद्रिका का वर्णन ज़रूर आता है, जिसे हनुमानजी अशोक वाटिका में सीता जी को भेंट करते हैं, और जिसे आज अंगूठी कहा जाता है, लेकिन जिसे अंगूठे के बजाय अनामिका में धारण किया जाता है।।
पादुका उतनी ही पवित्र मानी जाती है, जितने संत-महात्माओं के चरण। मांगी नाव न केवट आना, प्रसंग में केवट पहले रामचंद्रजी के चरण धोता है और फिर उन्हें अपनी नाव में प्रवेश देता है। सज्जनों! बड़ा मार्मिक प्रसंग है। जिनके चरण-रज से पत्थर की मूरत, अहिल्या बन गई, अगर वे ही चरण केवट की नाव पर पड़ गए, तो उसकी रोजी-रोटी का क्या होगा? और हज़ारों वर्षों बाद प्रयागराज में उल्टी गंगा बहने लगी जब कोई प्रधान-सेवक, नमामि गंगे के स्वच्छता-सेवकों के चरण धोता है, तो कलेजा मुँह को आ जाता है। धन्य है भारत भूमि, और यहाँ के महान अवतारी पुरुष।
महान विभूतियों का केवल पाद-प्रक्षालन ही नहीं होता, उनकी पादुकाओं का विधिवत पूजन भी होता है, जिसे सद्गुरु-पादुका-पूजन कहते हैं। गुरु-पूर्णिमा के पर्व पर सद्गुरु एवं उनकी पादुका-पूजन का विशेष महत्व होता है। यह आस्था का विषय है, जिसके लिए तुलसी और राम भक्त हनुमान की तरह श्रीराम को हृदय में विराजमान करना पड़ता है।।
ये कहाँ आ गए हम! आइए, वर्तमान में प्रवेश करते हैं। चरण अब सामान्य पाँव हो गए हैं, जिनकी साँप-बिच्छू, धूल-मिट्टी, काँटे और कंकड़-पत्थर से सुरक्षा के लिए पाँवों में जूता धारण किया जाता है। ऐसा नहीं है कि केवल मर्द ही पाँवों में जूता पहन सकते हैं, लेकिन महिलाओं को चप्पल पहनने में आसानी होती है, और साड़ी के साथ न जाने क्यों, जूते को कुछ शर्म सी महसूस होती है।
दूसरी बात! कुछ मजनुओं की पूजा के लिए, पाँव से चप्पल निकालकर पूजा करने में बड़ी आसानी होती है। अभी-अभी एक सांसद ने पाँव से जूता निकालकर एक विधायक की पूजा कर दी। जहाँ चाह है, वहाँ राह है, और आवश्यकता, आविष्कार की जननी है। किसे पता था, जिस पादुका की श्रद्धा और समर्पण से पूजा होती है, वही पादुका, जूते का विकराल रूप धारण कर, समय आने पर, किसी के सर की पूजा के काम आएगी।।
उपनयन संस्कार की ही तरह घरों में एक और संस्कार होता था, जिसे कोई विधिवत नाम तो नहीं दिया जाता था, लेकिन जब भी बच्चों की अकल ठिकाने लगाना होती थी, उनकी बाबूजी द्वारा जूतों से पूजा की जाती थी। कालांतर में किसी की भी अकल ठिकाने लगाने के लिए, इस विधि का उपयोग किया जाने लगा। राग दरबारी में इस विधि को जुतियाना कहा गया है। सुधिजन इसे पढ़कर लाभान्वित हों, और यह ज्ञान उन्हें वक्त ज़रूरत काम आवे।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख परखिए नहीं–समझिए। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३१४ ☆
☆ परखिए नहीं–समझिए… ☆
जीवन में हमेशा एक-दूसरे को समझने का प्रयत्न करें; परखने का नहीं। संबंध चाहे पति-पत्नी का हो; भाई-भाई का हो; मां-बेटे का हो या दोस्ती का… सब विश्वास पर आधारित हैं, जो आजकल नदारद है; परंंतु हर व्यक्ति को उसी की तलाश है। इसलिए ‘ऐसे संबंध जिनमें शब्द कम और समझ ज्यादा हो; तक़रार कम, प्यार ज़्यादा हो; आशा कम, विश्वास ज़्यादा हो’ की दरक़ार हर इंसान को है। वास्तव में जहां प्यार और विश्वास है; वही संबंध सार्थक है, शाश्वत है। समस्त प्राणी जगत् का आधार प्यार है, जो करुणा का जनक है और एक-दूसरे के प्रति स्नेह, सौहार्द, सहानुभूति व त्याग का भाव ‘सर्वे भवंतु सुखीन:’ का प्रेरक है। वास्तव में जहां भावनाओं का सम्मान है; वहां मौन भी शक्तिशाली होता है। इसलिए कहा जाता है कि ‘खामोशियां भी बोलती हैं और अधिक प्रभावशाली होती हैं।’
यदि भरोसा हो, तो चुप्पी भी समझ में आती है, वरना एक-एक शब्द के अनेक अर्थ निकलने लगते हैं। इस स्थिति में मानव अपना आपा खो बैठता है। वह सब सीमाओं को लांघ जाता है और मर्यादा के अतिक्रमण करने से अक्सर अर्थ का अनर्थ हो जाता है, जो हमारी नकारात्मक सोच को परिलक्षित करता है, क्योंकि ‘जैसी सोच, वैसा कार्य व्यवहार।’ शायद! इसलिए कहा जाता है कि कई बार हाथी निकल जाता है और पूंछ रह जाती है।
संवाद जीवन-रेखा है और विवाद रिश्तों में अवरोध उत्पन्न करता है, जो वर्षों पुराने संबंधों को पलभर में मगर की भांति लील जाता है। इतना ही नहीं, वह दीमक की भांति संबंधों की मज़बूत चूलों को हिला देता है और वे लोग, जिनकी दोस्ती के चर्चे जहान में होते हैं; वे भी एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। उनके अंतर्मन में वह विष-बेल पनप जाती है, जो सुरसा के मुख की मानिंद बढ़ती चली जाती है। इसलिए छोटी-छोटी बातों को बड़ा न किया करें; उससे ज़िंदगी छोटी हो जाती है…बहुत सार्थक संदेश है। परंंतु यह तभी संभव है, जब मानव क्रोध के वक्त रुक जाए और ग़लती के वक्त झुक जाए। ऐसा करने पर ही मानव जीवन में सरलता व असीम आनंद को प्राप्त कर सकता है। सो! मानव को ‘पहले तोलो, फिर बोलो’ अर्थात् सोच-समझ कर बोलने का संदेश दिया गया है। दूसरे शब्दों में तुरंत प्रतिक्रिया देने से मानव मन में दूरियां इस क़दर बढ़ जाती हैं, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है और जीवन-साथी– जो दो जिस्म, एक जान होते हैं; नदी के दो किनारों की भांति हो जाते हैं, जिनका मिलन जीवन-भर संभव नहीं होता। इसलिए बेहतर है कि आप परखिए नहीं, समझिए अर्थात् एक-दूसरे की परीक्षा मत लीजिए और न ही संदेह की दृष्टि से देखिए, क्योंकि संशय, संदेह व शक़ मानव के अजात-शत्रु हैं। वे विश्वास को अपने आसपास भी मंडराने नहीं देते। सो! जहां विश्वास नहीं; सुख, शांति व आनंद कैसे रह सकते हैं? परमात्मा भाग्य नहीं लिखता; जीवन के हर कदम पर हमारी सोच, विचार व कर्म हमारा भाग्य लिखते हैं। इसलिए अपनी सोच सदैव सकारात्मक रखिए। संसार में जो भी अच्छा लगे, उसे ग्रहण कर लीजिए और शेष को नकार दीजिए। परंतु किसी की आलोचना मत कीजिए, आपका जीवन सार्थक हो जाएगा। वे सब आपको मित्र सामान लगेंगे और चहुंओर ‘सबका मंगल होय’ की ध्वनि सुनाई पड़ेगी। जब मानव में यह भावना घर कर लेती है, तो उसके हृदय में व्याप्त स्व-पर व राग-द्वेष की भावनाएं मुंह छिपा लेती हैं; सदैव के लिए लुप्त हो जाती हैं और दसों दिशाओं में आनंद का साम्राज्य हो जाता है।
अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। वह हमें किसी के सम्मुख झुकने अर्थात् घुटने नहीं टेकने देता, क्योंकि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है और दूसरों को नीचा दिखा कर ही सुक़ून पाता है। सुख व्यक्ति के अहं की परीक्षा लेता है और दु:ख धैर्य की। इसलिए दोनों परीक्षाओं में उत्तीर्ण व्यक्ति का जीवन ही सार्थक व सफल होता है। इसलिए मानव को सुख में अहं को निकट नहीं आने देना चाहिए और दु:ख में धैर्य नहीं खोना चाहिए। दोनों परिस्थितियों में सम रहने वाला मानव ही जीवन में अलौकिक आनंद प्राप्त कर सकता है। सो! जीवन में सामंजस्य तभी पदार्पण कर सकेगा; जब कर्म करने से पहले हमें उसका ज्ञान होगा; तभी हमारी इच्छाएं पूर्ण हो सकेंगी। परंतु जब तक ज्ञान व कर्म का समन्वय नहीं होगा, हमारे जीवन की भटकन समाप्त नहीं होगी और हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी। इच्छाएं अनंत है और साधन सीमित। इसलिए हमारे लिए यह निर्णय लेना आवश्यक है कि पहले किस इच्छा की पूर्ति, किस ढंग से की जानी कारग़र है? जब हम सोच-समझकर कार्य करते हैं, तो हमें निराशा का सामना नहीं करना पड़ता; जीवन में संतुलन व समन्वय बना रहता है।
संतोष सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम धन है। इसलिए हमें जो भी मिला है, उसमें संतोष करना आवश्यक है। दूसरों की थाली में तो सदा घी अधिक दिखाई देता है। उसे देखकर हमें अपने भाग्य को कोसना नहीं चाहिए, क्योंकि मानव को समय से पहले और भाग्य से अधिक कभी, कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता। संतोष अनमोल पूंजी है और मानव की धरोहर है। ‘जे आवहिं संतोष धन, सब धन धूरि समान,’ रहीम जी की यह पंक्ति इस तथ्य की ओर इंगित करती है कि संतोष के जीवन में पदार्पण करते ही सभी इच्छाओं का शमन स्वतः हो जाता है। उसे सब धन धूलि के समान लगते हैं और मानव आत्मकेंद्रित हो जाता है। उस स्थिति में वह आत्मावलोकन करता है तथा दैवीय व अलौकिक आनंद में डूबा रहता है; उसके हृदय की भटकन व उद्वेलन शांत हो जाता है। वह माया-मोह के बंधनों में लिप्त नहीं होता तथा निंदा-स्तुति से बहुत ऊपर उठ जाता है। यह आत्मा-परमात्मा के तादात्म्य की स्थिति है, जिसमें मानव को सम्पूर्ण विश्व तथा प्रकृति के कण-कण में परमात्म-सत्ता का आभास होता है। वैसे आत्मा-परमात्मा का संबंध शाश्वत है। संसार में सब कुछ मिथ्या है, परंतु वह माया के कारण सत्य भासता है। इसलिए हमें तुच्छ स्वार्थों का त्याग कर अलौकिक आनन्द प्राप्त करने का अनवरत प्रयास करना चाहिए। इसके लिए आवश्यकता है… उदार व विशाल दृष्टिकोण की, क्योंकि संकीर्णता हमारे अंतर्मन में व्याप्त दुष्प्रवृत्तियों को पोषित करती है। संसार में जो अच्छा है, उसे सहेजना बेहतर है और जो बुरा है, उसका त्याग करना बेहतर है। इस प्रकार आप बुराइयों से ऊपर उठ सकते हैं। इस स्थिति में संसार आपको सुखों का सागर प्रतीत होगा; प्रकृति आपको ऊर्जस्वित करेगी और चहुंओर अनहद नाद का स्वर सुनाई पड़ेगा।
अंत में मैं कहना चाहूंगी कि जीवन में दूसरों की परीक्षा मत लीजिए, क्योंकि परखने से आपको दोष अधिक दिखाई पड़ेंगे। इसलिए केवल अच्छाई को देखिए; आपके चारों ओर आनंद की वर्षा होने लगेगी। सो! दूसरों की भावनाओं को समझने और उनकी बेरुखी का कारण जानने का प्रयास कीजिए। जितना आप उन्हें समझेंगे, आपकी दोष-दर्शन की प्रवृत्ति का अंत हो जाएगा। इंसान ग़लतियों का पुतला है और कोई भी इंसान पूर्ण नहीं है। फूल व कांटे सदैव साथ-साथ रहते हैं, उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। सृष्टि में जो भी घटित होता है मात्र किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं; सबके मंगल के लिए कारग़र व उपयोगी होता है।
क्या आपने कभी सोचा है—गंगा आखिर जन्म कहाँ लेती है?
क्या वह किसी एक पहाड़ की गोद से निकलती है, या फिर अनेक नदियों की संगति से बनती है?
यह प्रश्न जितना सरल लगता है, उसका उत्तर उतना ही रोचक है।
गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि अनेक धाराओं, पर्वतों, मिथकों, तपस्याओं और सभ्यताओं की संयुक्त यात्रा है।
वह हिमालय की बर्फीली चट्टानों से जन्म लेकर, ऋषियों की भूमि से गुजरते हुए, मैदानों को जीवन देती है, और अन्ततः सागर की अनन्त गोद में समा जाती है।
इस यात्रा में वह केवल जल नहीं बहाती—वह इतिहास, संस्कृति, श्रद्धा और जीवन की धारा बहाती है।
भगीरथ की तपस्या और भागीरथी का जन्म 🏞️
हिमालय की ऊँचाइयों में, लगभग 4,000 मीटर की ऊँचाई पर, एक विशाल हिमनद है—गंगोत्री ग्लेशियर। उसके अग्रभाग पर स्थित गुफानुमा स्थान को गोमुख कहा जाता है। यहीं से निकलती है वह पतली सी धारा जिसे हम भागीरथी कहते हैं।
कहानी यहाँ से नहीं, उससे बहुत पहले से शुरू होती है।
कहते हैं कि राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की मुक्ति के लिए उनके वंशज राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की। वर्षों की साधना के बाद ब्रह्मा ने गंगा को पृथ्वी पर उतरने की अनुमति दी। पर समस्या यह थी—स्वर्ग से उतरती गंगा का वेग इतना प्रचण्ड था कि पृथ्वी उसका आघात सह न पाती।
तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया। उनकी उलझी जटाओं से छनकर जब गंगा पृथ्वी पर उतरी, तब वह शांत, कोमल और जीवनदायिनी बन गई।
यही कारण है कि हिमालय से उतरती धारा को भागीरथी कहा गया—भगीरथ की तपस्या का फल।
हिमालयी घाटियों में भागीरथी की यात्रा 🏞️
गोमुख से निकलकर भागीरथी गंगोत्री, हर्षिल और उत्तरकाशी की घाटियों से गुजरती है। रास्ते में छोटी-छोटी नदियाँ—जाह्नवी, अस्सी गंगा और भिलंगना—उससे मिलती जाती हैं।
यहाँ का हर मोड़ कथा सुनाता है।
कहीं देवदार के जंगल हैं, कहीं बर्फ से ढकी चोटियाँ, और कहीं प्राचीन मंदिर जहाँ साधु-संत सदियों से ध्यान करते आए हैं।
टिहरी का बदलता हुआ दृश्य 🏞️
इसी मार्ग में एक स्थान आता है—टिहरी।
कभी यहाँ एक पुराना, जीवंत पहाड़ी शहर था, जहाँ बाज़ारों में जीवन गूँजता था। आज वही स्थान टिहरी बाँध की विशाल झील के नीचे सोया हुआ है।
भागीरथी पर बने इस बाँध ने आधुनिक भारत को बिजली और जल तो दिया, पर साथ ही पुरानी टिहरी की स्मृतियाँ भी जल में समा गईं।
मानो नदी कह रही हो—समय के साथ सब बदलता है, पर प्रवाह नहीं रुकता।
गोमुख से लगभग 205 किलोमीटर की यात्रा के बाद भागीरथी एक विशेष स्थान पर पहुँचती है—देवप्रयाग।
पर उससे पहले हमें उस दूसरी महान धारा की कहानी जाननी होगी जो यहाँ आकर उससे मिलती है—अलकनन्दा।
अलकनन्दा और पंच प्रयागों की अद्भुत यात्रा 🏞️
अलकनन्दा का जन्म भी हिमालय की गोद में, सतोपंथ और भागीरथ खड़क ग्लेशियर के पास माना जाता है।
यह नदी सीधे गंगा नहीं बनती। रास्ते में पाँच महत्वपूर्ण संगमों से गुजरती है जिन्हें पंच प्रयाग कहा जाता है।
विष्णुप्रयाग 🏞️
यहाँ धौलीगंगा आकर अलकनन्दा से मिलती है।
ऊँचे पर्वतों के बीच यह संगम ऐसा लगता है मानो दो उत्साही युवतियाँ हाथ थामकर आगे बढ़ रही हों।
नन्दप्रयाग 🏞️
यहाँ नन्दाकिनी नदी अलकनन्दा में समाहित होती है।
कहते हैं यह स्थान नन्द बाबा की स्मृति से जुड़ा है—वही नन्द जिनकी गोद में बालक कृष्ण ने लीलाएँ की थीं।
कर्णप्रयाग 🏞️
यहाँ पिण्डर नदी अलकनन्दा से मिलती है।
महाभारत के महान योद्धा कर्ण ने यहाँ तप किया था—इसीलिए इसका नाम कर्णप्रयाग पड़ा।
रुद्रप्रयाग 🏞️
यहाँ मन्दाकिनी नदी आती है, जो केदारनाथ की घाटियों से निकलती है।
यह संगम अत्यन्त भावपूर्ण है—मानो शिव की भूमि से आई मन्दाकिनी, विष्णु की धारा अलकनन्दा से आलिंगन कर रही हो।
देवप्रयाग 🏞️
और अन्ततः, अलकनन्दा पहुँचती है देवप्रयाग, जहाँ उसकी भेंट भागीरथी से होती है।
देवप्रयाग: जहाँ गंगा जन्म लेती है 🏞️
देवप्रयाग का दृश्य अद्भुत है।
एक ओर गहरे हरे रंग की अलकनन्दा, दूसरी ओर तेज़ और कुछ मटमैली भागीरथी—दोनों स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देती हैं।
यहीं एक रोचक लोककथा सुनाई जाती है।
स्थानीय लोग हँसते हुए कहते हैं—
“देखो, यह तो सास और बहू का मिलन है!”
अलकनन्दा को “सास” कहा जाता है—अनुभवी, लम्बी यात्रा करके आई हुई।
भागीरथी को “बहू”—चंचल, तेज़ और नई।
जब दोनों मिलती हैं तो थोड़ी देर तक उनका रंग अलग-अलग दिखता है, जैसे सास-बहू अपनी-अपनी बात पर अड़ी हों। फिर धीरे-धीरे वे एक हो जाती हैं—और तब जन्म लेती है गंगा।
ऋषिकेश और हरिद्वार: आध्यात्मिक द्वार 🏞️
देवप्रयाग से आगे गंगा ऋषियों की भूमि में प्रवेश करती है।
सबसे पहले आता है ऋषिकेश—योग और ध्यान की विश्व राजधानी। यहाँ लक्ष्मण झूला, राम झूला और गंगा आरती का दिव्य दृश्य मन को शान्त कर देता है।
फिर आती है हरिद्वार, जहाँ गंगा पहली बार विशाल मैदानों में उतरती है।
हर की पौड़ी की आरती में हजारों दीपक जब जलते हैं, तो ऐसा लगता है मानो तारे धरती पर उतर आए हों।
मैदानों की जीवनदायिनी धारा 🏞️
हरिद्वार से आगे गंगा फैलती जाती है और उत्तर भारत के विशाल इंडो-गंगेटिक मैदान को जीवन देती है।
इस यात्रा में अनेक नदियाँ उससे मिलती हैं।
उत्तर से आने वाली नदियाँ—
रामगंगा, घाघरा (जिसे सरयू भी कहते हैं), गंडक, कोसी और महानन्दा।
दक्षिण से आने वाली नदियाँ—
यमुना, टोंस, सोन और पुनपुन।
इनमें सबसे बड़ा संगम होता है प्रयागराज में—जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम माना जाता है।
यहीं लगता है विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक समागम—कुम्भ मेला। करोड़ों श्रद्धालु एक साथ गंगा में स्नान करते हैं। वह दृश्य किसी आधुनिक चमत्कार से कम नहीं।
प्रदूषण और हमारी जिम्मेदारी 🏞️
मैदानों में पहुँचते-पहुँचते गंगा का स्वरूप बदल जाता है।
जहाँ वह हिमालय में निर्मल थी, वहीं शहरों के बीच उसे प्रदूषण का सामना करना पड़ता है।
सरकार ने नमामि गंगे परियोजना के माध्यम से उसे स्वच्छ बनाने का अभियान चलाया है।
पर नदी को सचमुच बचाना केवल सरकार का नहीं, हर नागरिक का कर्तव्य है।
गंगा केवल जलधारा नहीं—वह हमारी माँ है।
और माँ को स्वच्छ रखना सन्तानों का धर्म है।
भारत से बांग्लादेश तक: पद्मा की यात्रा 🏞️
पश्चिम बंगाल में पहुँचकर गंगा का स्वरूप फिर बदलता है।
सीमा पार करते ही बांग्लादेश में उसे नया नाम मिलता है—पद्मा।
यहाँ वह जमुना (ब्रह्मपुत्र की धारा) और फिर मेघना से मिलती है।
तीनों मिलकर एक विशाल डेल्टा बनाते हैं—दुनिया का सबसे बड़ा नदी डेल्टा।
यहाँ के सुन्दरबन के मैंग्रोव जंगल, रॉयल बंगाल टाइगर और असंख्य पक्षियों का संसार इसी जल से जीवित है।
सागर से मिलन: एक अनन्त चक्र 🏞️
अन्ततः, हजारों किलोमीटर की यात्रा के बाद गंगा बंगाल की खाड़ी में समा जाती है।
पर क्या यह यात्रा सचमुच समाप्त होती है?
नहीं।
सागर का जल फिर बादल बनता है, बादल हिमालय पर बरसते हैं, और वही जल फिर से गंगा बनकर बह निकलता है।
यही प्रकृति का अनन्त चक्र है।
भारत की आत्मा 🏞️
गंगा केवल एक नदी नहीं—वह भारत की आत्मा है।
उसके किनारे सभ्यताएँ पलीं, ऋषियों ने ज्ञान पाया, कवियों ने गीत लिखे और करोड़ों लोगों ने जीवन पाया।
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी।
इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दलित के घर भोजन…“।)
अभी अभी # ९४८ ⇒ आलेख – दलित के घर भोजन श्री प्रदीप शर्मा
क्या आपने किसी दलित के घर जाकर भोजन किया है, क्या कृष्ण की तरह कभी आपने भी किसी दुर्योधन का मेवा त्याग विदुर के घर का साग खाया है। सुदामा तो खैर, कृष्ण के सखा थे, ब्राह्मण देवता होते हैं दलित नहीं, कृष्ण यह जानते थे, इसलिए उनके चरण भी अपने अंसुओं से धोए। सबसे ऊंची, प्रेम सगाई।
हमने अपने जीवन में ऐसा कोई सत्कार्य नहीं किया जिसका छाती ठोंककर आज गुणगान किया जा सके। बस बचपन में जाने अनजाने हमने भी एक दलित के घर भोजन करने का महत कार्य संपन्न कर ही लिया। हम जानते हैं, हम कोई सेलिब्रिटी अथवा नामी गिरामी जनता के तुच्छ सेवक भी नहीं, हमारे पास इस सत्कार्य का कोई वीडियो अथवा प्रमाण भी नहीं, फिर भी हमारे लिखे को ही दस्तावेज़ समझा जावे, व वक्त जरूरत काम आवे।।
यह तब की बात है, जब हम किसी सांदीपनी आश्रम में नहीं, हिंदी मिडिल स्कूल में पढ़ते थे। सरकारी स्कूल था, जिसे आज की भाषा में शासकीय कहा जाता है।
पास में ही मराठी मिडिल स्कूल भी था, जहां कभी अभ्यास मंडल की ग्रीष्मकालीन व्याख्यानमाला गर्मी की छुट्टियों में आयोजित हुआ करती थी। आज वहां भले ही मराठी मिडिल स्कूल का अस्तित्व नहीं हो, अभ्यास मंडल जरूर जाल ऑडिटोरियम में सिमटकर रह गया है।
तब सिर्फ हिंदी और मराठी मिडिल स्कूल ही नहीं, उर्दू और सिंधी मिडिल स्कूल भी होते थे। जैसा पढ़ाई का माध्यम, वैसा स्कूल!
कक्षा में हर छात्र का एक नाम होता था, और बस वही उसकी पहचान होती थी। अमीर गरीब की थोड़ी पहचान तो थी, लेकिन जाति पांति की नहीं। दलित जैसा शब्द हमारे शब्दकोश में तब नहीं था।
बस यहीं से हमारी दोस्ती की दास्तान भी शुरू होती है।।
जो कक्षा में, आपकी डेस्क पर आपके साथ बैठता है, वह आपका दोस्त बन जाता है। आज इच्छा होती है यह जानने की, हमारे वे दोस्त आज कहां हैं, कैसे हैं। दो दिन साथ रहकर जाने किधर गए। किसी का नाम याद है तो किसी का चेहरा। धुंधली, लेकिन सुनहरी यादें।
उस दोस्त का चेहरा आज तक याद है नाम शायद कहीं गुम गया। वहीं रिव्हर साइड रोड पर वह रहता था। स्कूल, घर और दोस्तों को आपस में जोड़ने वाली हमारे शहर की नदी पहले खान नदी कहलाती थी। आजकल इसके सौंदर्यीकरण के साथ ही इसका नामकरण भी कान्ह नदी कर दिया गया है। गरीब दलित हो गया और खान कान्ह।।
खातीपुरा और रानीपुरा जहां मिलते हैं, वही रिव्हर साइड रोड है, जहां आज की इस कान्ह नदी पर एक कच्चा पुल था, जिसके आसपास की बस्ती तोड़ा कहलाती थी। नार्थ तोड़ा और साउथ तोड़ा। ठीक उसी तरह, जैसे अमीरों की बस्ती में नॉर्थ और साउथ ब्लॉक होते हैं। इसी तोड़े में मेरा यह दोस्त रहता था और जिसके आग्रह पर मैं आज से साठ वर्ष पूर्व उसकी झोपड़ी में प्रवेश कर चुका था।
कच्चा घर था, घर में सिर्फ उसकी मां और एक जलता हुआ चूल्हा था, जिस पर मोटी मोटी गर्म रोटी सेंकी जा रही थी। एक डेगची में गुड़ और आटे की बनी लाप्सी रखी थी। मैं संकोचवश उसके आग्रह को ठुकरा ना सका और एक पीतल की थाली में मैंने भी भोग लगा ही दिया।।
हम इंसान हैं, कोई भगवान नहीं। हर व्यक्ति बुद्ध नहीं बन सकता। गरीबी अमीरी और जात पांत, ऊंच नीच की दीवार नहीं तोड़ सकता और ना ही संसार से पलायन कर सकता। जो हमें आज ईश्वर ने दिया है, वह सबको नहीं दिया। आज भी वह दोस्त मेरी आंखों के सामने नजर आता है। उसकी मां और उसके हाथ की लाप्सी रोटी का सात्विक स्वाद।
कुंती ने कृष्ण से यही तो मांगा था। अगर कष्ट में आपकी याद आती है, आप हमारे करीब होते हो, तो थोड़ा कष्ट ही सही, थोड़ा अभाव ही सही। जीवन में कुछ दोस्त ऐसे बने रहें, जिनके बीच हम सिर्फ इंसान बने रहें। कितनी दीवारें, कितने क्लब और सर्कल हमें मानवीय मूल्यों से जोड़ रहे हैं, अथवा तोड़ रहे हैं, हमसे बेहतर कौन जान सकता है।।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “नवदुर्गा का आगमन: नारी सृजनधर्मिता का उत्सव…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २८२ ☆नवदुर्गा का आगमन: नारी सृजनधर्मिता का उत्सव… ☆
शारदीय आकाश की कोमल आभा के साथ ही मन में एक दिव्य अनुभूति जाग उठती है—माँ के आगमन की। नवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, श्रद्धा और सृजन का उत्सव है, जहाँ सम्पूर्ण सृष्टि अपनी जननी के स्वागत में नत होती है।
इस पावन आरंभ में जवारे बोने की परंपरा विशेष महत्व रखती है। मिट्टी में डाले गए ये बीज केवल अन्न नहीं, बल्कि आशा, उर्वरता और नवजीवन के प्रतीक होते हैं—मानो माँ के आशीष से जीवन हरा-भरा हो उठे।
“पूजन करते भक्त, जवारे बो कर मैया,
खुशहाली चहुँओर, मिले हम सब को छैया।”
इन पंक्तियों में जनमानस की वही प्रार्थना है, जो हर हृदय में धड़कती है।
भारतीय संस्कृति में नारी को सदा “शक्ति” माना गया है। नवदुर्गा के नौ स्वरूप हमें याद दिलाते हैं कि नारी केवल सृजन ही नहीं, बल्कि संरक्षण और परिवर्तन की आधारशिला भी है। आज की नारी हर क्षेत्र में अपने सामर्थ्य का परिचय देते हुए अपने भीतर की दुर्गा को जागृत कर रही है।
जब एक स्त्री घर, समाज और अपने स्वप्नों को संवारती है, तब वह केवल जीवन नहीं जीती—वह सृजन करती है। यही उसकी सच्ची “सृजनधर्मिता” है, जिसे नवरात्रि का यह पर्व और अधिक उजागर करता है।
“हरीभरी हो गोद, यही माँगे जन सारे,
शेर सवारी दिव्य, मातु वर दायक धारे।”
इन भावों में माँ के प्रति विश्वास, सुरक्षा और समृद्धि की कामना सहज ही झलकती है।
नवरात्रि हमें यह भी सिखाती है कि शक्ति की पूजा केवल अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि हर नारी के सम्मान में होनी चाहिए। यही सच्ची आराधना है।
माँ दुर्गा का यह पावन पर्व हम सभी के जीवन में सुख, शांति और नवसृजन का प्रकाश भर दे—
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “ईरान की संस्कृति” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०५ ☆
आलेख – ईरान की संस्कृति श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ईरान की संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है। इसे ‘फारसी संस्कृति’ के रूप में भी जाना जाता है, जिसने न केवल मध्य पूर्व बल्कि मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के साहित्य, कला और दर्शन पर भी गहरा प्रभाव डाला है।
ईरानी संस्कृति की आत्मा उसकी कविता में बसती है। फारसी साहित्य दुनिया के गौरवशाली साहित्य में गिना जाता है।
महान कवि: फिरदौसी, हाफ़िज़, रूमी और सादी जैसे कवियों की रचनाएँ आज भी विश्वभर में पढ़ी जाती हैं।
शाहनामा: फिरदौसी द्वारा रचित ‘शाहनामा’ ईरान का राष्ट्रीय महाकाव्य है, जो प्राचीन फारस के इतिहास और मिथकों को संजोए हुए है।
कला और वास्तुकला
ईरानी वास्तुकला अपनी भव्यता, ज्यामितीय सटीकता और नीले रंग की टाइलों के काम के लिए प्रसिद्ध है।
इस्फहान की मस्जिदें: इस्फहान शहर को ‘निसफ-ए-जहाँ’ (आधी दुनिया) कहा जाता है, जहाँ की ‘मस्जिद-ए-शाह’ और ‘शेख लुतफुल्ला मस्जिद’ वास्तुकला के बेजोड़ नमूने हैं।
कालीन : ईरानी कालीन दुनिया भर में अपनी बुनाई, रंगों और जटिल डिजाइनों के लिए मशहूर हैं। यह ईरान की एक प्राचीन हस्तकला है।
त्यौहार और परंपराएँ
ईरानी संस्कृति में कई ऐसे त्यौहार हैं जो इस्लाम के आगमन से पहले के हैं और आज भी उतनी ही धूमधाम से मनाए जाते हैं।
नौरोज़ : यह फारसी नव वर्ष है, जो वसंत ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है। यह प्रकृति के पुनर्जन्म का प्रतीक है।
शब-ए-यल्द: साल की सबसे लंबी रात को परिवार के साथ मिलकर फल (विशेषकर अनार और तरबूज) खाकर और कविताएँ पढ़कर मनाया जाता है।
खान-पान
ईरानी भोजन अपने संतुलित स्वाद और सुगंध के लिए जाना जाता है। इसमें केसर, सूखे मेवे, गुलाब जल और अनार का भरपूर उपयोग होता है।
चेलो कबाब: यह ईरान का राष्ट्रीय व्यंजन है, जिसमें सुगंधित चावल (बेरेंज) के साथ ग्रिल्ड कबाब परोसा जाता है।
सब्जी खोरेश: विभिन्न प्रकार की हरी सब्जियों और मांस से बना स्टू भी यहाँ काफी लोकप्रिय है।
शिष्टाचार: ‘तारोफ़’
ईरानी संस्कृति में ‘तारोफ़’ एक अनूठी सामाजिक शिष्टाचार पद्धति है। यह अत्यधिक विनम्रता और सम्मान दिखाने की कला है, जिसमें अक्सर दुकानदार या मेजबान पहली बार में पैसे लेने से मना कर देते हैं या मेहमान को अत्यधिक सम्मान देते हैं। यह आपसी रिश्तों में कोमलता और सम्मान बनाए रखने का एक तरीका है।
ईरान की संस्कृति प्राचीन परंपराओं और आधुनिकता का एक अनूठा संगम है, जो मनुष्य को सौंदर्य, प्रेम और दर्शन की ओर प्रेरित करती है।