(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का रूपक” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०७ ☆
आलेख – साहित्य का ‘सम्मान’ बनाम ‘गुणवत्ता’ की कसौटी श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
सोशल मीडिया के इस दौर में स्थिति यह है कि लेखक बाद में पैदा होता है, सम्मानों की ‘फ़ेहरिस्त’ पहले तैयार हो जाती है। हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी ‘अकादमी’ या ‘फाउंडेशन’ का अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष है और एक दूसरे को ‘शताब्दी रत्न’ घोषित कर चुका है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या ये चमचमाती ट्राफियां और शॉल, रचना की साहित्यिक गुणवत्ता की गारंटी हैं?
साहित्यिक गुणवत्ता किसी प्रयोगशाला में मापी जाने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि यह समय की कसौटी पर कसी जाने वाली निरंतरता तथा लेखन की पाठकीय पसंद , एवं उसकी उपयोगिता है। लेकिन वर्तमान समय में ‘साहित्यिक गुणवत्ता’ और ‘पुरस्कार’ के बीच का संबंध कुछ वैसा ही हो गया है जैसा राजनीति और नैतिकता का होता है, दोनों साथ दिखते जरूर हैं, पर होते बहुत दूर हैं।
आज लेखक की लेखनी से ज्यादा उसकी ‘लॉबिंग’ महत्वपूर्ण हो गई है। गुणवत्ता घर की खिड़की से झांकती रह जाती है और ‘जुगाड़’ दरवाजे से अंदर आकर मुख्य अतिथि की कुर्सी संभाल लेता है।
ऐसा हर छोटे बड़े पुरस्कार तथा सम्मान में देखने मिल रहा है। सम्मान मिलते ही लेखक को लगने लगता है कि वह अब आलोचना से ऊपर है। यही आत्म-मुग्धता गुणवत्ता के क्षरण का सबसे बड़ा कारण बनती है।
इतिहास गवाह है कि प्रेमचंद को जीते-जी कोई बड़ा सरकारी सम्मान नहीं मिला, पर आज उनके बिना साहित्य अधूरा है। दूसरी ओर, ऐसे सैंकड़ों ‘पुरस्कार प्राप्त’ लेखक हैं जिनकी किताबें आज कबाड़ के भाव भी कोई नहीं पढ़ना चाहता।
साहित्यिक गुणवत्ता का अंतर्संबंध पुरस्कारों से केवल तब ही सार्थक है, जब पुरस्कार ‘सृजन’ का परिणाम हो, न कि ‘अभियान’ का। जब किसी योग्य रचना को सम्मानित किया जाता है, तो सम्मान की गरिमा बढ़ती है, रचना की नहीं।
ऐसे पुरस्कार में विवाद नहीं होते । रचना तो अपनी गुणवत्ता के कारण पहले ही कालजयी हो चुकी होती है।
समकालीन विडंबना इसके विपरीत इसलिए है, क्योंकि गुण धर्मियों की उपेक्षा कर लॉबी जनित राजनैतिक प्रभाव से पुरस्कार तय हो रहे हैं।
आज के दौर में ‘सम्मान वापसी’ से लेकर ‘सम्मान पाने की होड़’ तक, साहित्य का बाजारवाद हावी है। गुणवत्ता कहीं हाशिए पर खड़ी इस बात का इंतज़ार कर रही है कि काश कोई पाठक बिना किसी ‘प्रशस्ति पत्र’ को देखे किताब के पन्ने पलटे।”सच तो यह है कि असली पुरस्कार पाठक की वह आँखें हैं, जो आधी रात को आपकी किताब पढ़ते हुए नम हो जाती हैं। बाकी सब तो ड्राइंग रूम की धूल झाड़ने वाली निर्जीव वस्तुएं हैं।”
पुरस्कार और गुणवत्ता का अंतर्संबंध तब तक ही पवित्र है जब तक चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और रचना में ईमानदारी है। यदि पुरस्कार केवल ‘रेवड़ियां’ बनकर बंटेंगे, तो वे गुणवत्ता को निखारने के बजाय उसे दफन करने का काम करेंगे। साहित्य को पदकों की नहीं, बल्कि उस ‘दृष्टि’ की जरूरत है जो समाज के अंधेरों को चीर सके।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उम्मीद की भैंस…“।)
अभी अभी # ९५४ ⇒ आलेख – उम्मीद की भैंस श्री प्रदीप शर्मा
मुझे भैंस से विशेष लगाव है, और अधिकतर मैं इसी का दूध पीता चला आया हूं क्योंकि इसका दूध गाढ़ा और मलाईदार होता है। गाय का दूध अधिक पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होता है, यह जानते हुए भी शायद मेरी अक्ल घास चरने चली जाती है, जो मैं अधिक मलाई और स्वाद के चक्कर में भैंस के दूध को ही अधिक पसंद करता हूं।
बचपन में मैंने भी बहुत गाय का दूध पीया है। सुबह स्विमिंग पूल में तैरने जाना और वापसी में एक ग्वाले के यहां पीतल के बड़े ग्लास में शुद्ध गाय के इंस्टंट यानी ताजे कच्चे दूध का सेवन करना और अपनी सेहत बनाना।।
आज भी केवल दो ही दूध तो आम है, गाय का और भैंस का। होता है बकरी का दूध भी, जिसे गांधीजी पीते थे। जो लोग बकरी पालते हैं, वे बकरी का तो दूध पी जाते हैं और बकरा बेच खाते हैं। बकरा खाने से बकरा बेच खाना उनके लिए अधिक आय का साधन भी हो सकता है।
भैंस की तरह बकरी भी उम्मीद से होती है। वह भी खैर मनाती होगी कि बकरी ही जने। अगर बकरी हुई तो दूध देगी और अगर बकरा हुआ तो वह बलि का बकरा ही कहलाएगा। अगर बकरी का भी उम्मीद के वक्त भ्रूण परीक्षण हो, तो वह भी मेमना गिरा देना ही पसंद करेगी। मुर्गी दूध नहीं अंडे देती है और अगर उम्मीद से हुई तो मुर्गा भी दे सकती है। आज तक किसी उम्मीद की मुर्गी ने सोने के अंडे नहीं दिए, खाने के ही दिए हैं।।
उम्मीद पर दुनिया जीती है। भैंस ही उम्मीद से नहीं होती, गाय भी उम्मीद से होती है। वह भी या तो बछिया जनेगी अथवा बछड़ा। दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते, यानी यहां भी बछड़े का दान नहीं होता, बछिया देख किसकी बांछें नहीं खिलेंगी। रोज जब भी शिव जी को जल चढ़ाएं तो नंदी महाराज को नहीं भूलें, लेकिन अगर उम्मीद की भैंस पाड़ा जन दे, तो नाउम्मीद ना हों, समझें एक और नंदी ने अवतार लिया है।
प्राणी मात्र की सेवा से पुण्य मिलता है, लेकिन ईश्वर गवाह है, गौ सेवा की तो बात ही निराली है। गाय भैंस पालने के लिए तो आपको डेयरी खोलनी होगी, स्टार्ट अप में इसका भी प्रावधान है। आप चाहें तो देश में फिर से घी दूध की नदियां बहा सकते हैं। उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है। कुक्कुट पालन भी एनिमल हस्बेंड्री का ही एक प्रकार है। सेवा की सेवा, और मेवा ही मेवा।।
भैंस में भले ही अक्ल ना हो, वह चारा खाती हो, लेकिन जिनकी अक्ल भैंस चरने नहीं जाती, वे ही भैंस का चारा खा सकते हैं। आम के आम और गुठलियों के दाम। चारा बेचने से चारा खाने में अधिक समझदारी है। यानी भैंस का दूध भी डकारा और चारा भी खा गए। मेरे भाई, फिर गोबर को क्यूं छोड़ दिया।
अन्य पशुओं की तुलना में भैंस अधिक शांत प्राणी है, क्योंकि मन की शांति के लिए ये कहीं हिमालय नहीं जाती, बस चुपके से पानी में चली जाती है। आप भी पानी में पड़े रहो, देखिए कितनी शांति मिलती है। हर भैंस पालक की भी यही उम्मीद होती है कि उसकी भैंस अधिक दूध दे, और जब भी जने, तो बस पाड़ी ही जने, पाड़ा ना जने।।
(ई- अभिव्यक्ति में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ उमेश चंद्र शर्मा जी का स्वागत. आप एक वरिष्ठ लेखक, हिंदुस्थान समाचार बहुभाषी न्यूज एजेंसी एवं संवाद एजेंसी ईएमएस से संबद्ध है, तथा श्रीमद्भागवत कथा प्रवक्ता और साहित्यकार है. हिंदुस्थान समाचार, ईएमएस, फ्री प्रेस जर्नल एवं हिंदी फ्री प्रेस में आलेख, फीचर एवं इंटरव्यू प्रकाशित, साप्ताहिक प्रभातकिरण में स्तंभ लेखन, कुछ कहानियां सहित शताधिक कविताओं एवं गीतों का स्वांत: सुखाय सृजन.आज प्रस्तुत है नव संवत्सर पर्व पर आपका एक ज्ञानवर्धक एवं विचारणीय आलेख – अरण्यपथ के गर्भ से ही जन्म लेता है संभावनाओं का महासागर।)
☆ आलेख – अरण्यपथ के गर्भ से ही जन्म लेता है संभावनाओं का महासागर☆ डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा ☆
भारतीय संस्कृति के विभिन्न पर्वोत्सवों पर हमारी उत्सव धर्मिता की सहज अभिव्यक्ति होती आई है, साथ ही उत्सवी दिनों को पूरी जिंदादिली से मनाया जाता रहा है, और चूंकि हिंदू नव संवत्सर गुड़ी पड़वा हमारी गौरवमयी एवं समृद्ध सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्व है, इसलिए इस पर्व पर स्वाभाविक रूप से हमारी उत्सव धर्मिता की शानदार अभिव्यक्ति हुई, जो कि सहज एवं स्वाभाविक है, ओर ऐसे रंगारंग उत्सवी माहौल में हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भी हमें अपने महाभावो को अभिव्यक्त करने हेतु प्रेरित करती है. अतः महान् आध्यात्मिक वैभव से युक्त पंचाक्षर “नमः शिवाय” और सनातन आध्यात्मिक संस्कृति के महानतम वंदनीय वाक्यों “जय श्री राम” और जय श्री “कृष्ण” के महाबोधि संबोधन से हम समवेत स्वरों में सनातन संस्कृति के महापर्व गुड़ी पड़वा से आरंभ नव संवत्सर २०८३ का स्वागत अभिनन्दन करते हुए सभी प्राणियों के कल्याण के निमित्त अति प्रासंगिक एवं समीचीन यह शुभमङ्गलकामना करते हैं कि “सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी का जीवन मंगलमय हो, और किसी को भी कोई दुःख न हो.”
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भागभवेत्.”
गुड़ी पड़वा से आरंभ नूतन संवत्सर के साए में यह शुभमङ्गलकामना की जानी भी समीचीन ही होगी कि नव संवत्सर संपूर्ण विश्व के लिए सुख समृद्धि दायक,अहिंसा, शांति और सौहार्द का संदेश वाहक तथा वैभव कारक होगा, और हम जीवन में सर्वोच्च सफलताओं की और अपने कदम बढ़ाते हुए अविरल गति से निरंतर आगे बढ़ते जाएंगे.
जीवन में सर्वोच्चता की और बढ़ने की यह संकल्प शक्ति ही यकीनन हमें एक बेहतर कल की तरफ ले जाती है, जहां से उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, और उस मार्ग पर चलते हुए हम अपनी मंजिल तक पहुंचने में कामयाब हो सकते है, किंतु जीवनपथ में आने वाली वास्तविकताओं को भी हम नहीं नकार सकते, इसलिए उन्हें दृष्टिगत रखते हुए ही हमें अपने उद्देश्य प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होना होगा.
जीवन के आलोक पथ पर की ओर बढ़ते हुए मानसिक स्तर पर चाहे हम सागर की अनंत गहराइयों को पा जाएं, अथवा विंध्याचल की शैली श्रंखलाओं को अपनी फौलादी बांहों में भर लें, किंतु वास्तविकताओं की विराटता भी हमें बार बार अपनी जमीनी हकीकत बताती ही रहती है, ऐसे में जीवन की वास्तविकताओं से रूबरु होते हुए एवं एक एक दिन के मैदानी अनुभव से ही श्रेष्ठता के आयामों को छुआ जा सकता है. महान् उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु उठे कदम अंततः अपनी मंजिल पर पहुंच ही जाते हैं, किंतु जीवन पथ पर आगे बढ़ते हुए हमें यह समझना होगा कि रास्ते कभी भी सीधे सपाट नहीं हुआ करते हैं, इसलिए कठिन रास्तों से गुजरने की क्षमताएं भी हमें पहले ही विकसित करनी होगी, साथ ही हौसलों की बुलंदियों को बरकरार रखना होगा, क्योंकि एक वह हौंसला ही तो है, जो भूतकाल की असफलताओं को नई नई सफलताओं में तब्दील कर देता है, और एक मुकम्मल जहां हमारे हाथों में सौंप देता है.
जीवन में आगे बढ़ते हुए कदाचित् ऐसे मोड़ भी आते हैं जब धैर्य ही हमारा आदर्श मित्र साबित होता है, क्यौकि धैर्यहीनता ही एक ऐसी बेड़ी है, जो हमारे कदमों को बरबस ही थाम लेती है, तब दिखाई दे रही मंजिल भी सहसा ही दूर दिखाई देने लगती है, ओर तब उस गतिमान समय की परिधि में आबद्ध हम लोग सहसा ही विचलित हो कर नियति पर नाराज हो जाते हैं, और तब व्यथा की विपरीतता में कह उठते हैं कि एक एक क्षण पहाड़ बन गया है, और जब खुशी का अवसर मिलता है तो कहने लगते हैं कि समय कितना जल्दी व्यतीत हो गया, ऐसा लगता है कि जैसे बात आजकल की ही हो, किंतु वह क्षण न तो पहाड़ की मानिंद था, और न ही चींटी द्वारा ले जाए जा रहे एक महीन कण की तरह अतिलघु ही था, वक्त का वह कतरा परिंदे की तरह आसमान को अपने आगोश में भर लेने के कथित मानसिक भावों से युक्त भी नहीं था, वास्तविकताओं में हमने ही उसे अपने संकीर्ण सुख दुःखों से, हानि लाभ से या फिर जय पराजय से संयुक्त कर दिया था, शायद इसीलिए वह शुचि वक्त अच्छा या खराब नाम पा गया. दरअसल वह कालचक्र के परिक्रमा पथ का एक नन्हा सा हिस्सा था, समय का वह एक कतरा था, जिस पर दौड़ते हुए हम कभी उत्कर्ष पर पहुंचे थे, और वह भी समय का ही एक कतरा था, जिस पर चलते हुए कदाचित हम लड़खड़ाते हुए गिर पड़े थे, और तब उस गतिमान शुचि समय को हमारे ही द्वारा कई संज्ञाओं से विभूषित कर दिया गया था, जबकि समय के उसी प्रवाह ने अन्य अनगिनत लोगों को अमृत तत्व से अभिसिंचित भी किया. निश्चित तौर पर उस एक ही समय को देखने का हमारा नजरिया तात्कालिक लाभ हानि के अल्पकालिक प्रवाह से ही संयुक्त था, शायद इसीलिए अनुभूतियां भी पृथक पृथक रूप ग्रहण कर गईं.
समय के उसी महावैभवी पथ पर एक तरफ जहां फूलों की सौंदर्य सुरभि समाई है, वहीं कंटक भी बिखरे पड़े हैं. यह वही पथ है जो एकबारगी हमें लहुलुहान कर देता है, किंतु संभावनाओं का अनन्त सागर भी तो वहीं से आकार ग्रहण करता है. यही है वह अरण्यपथ जो कठिन है, किंतु असीम संभावनाओं एवं उपलब्धियों से युक्त भी है. शायद यही है वह उपलब्धियो से ओतप्रोत रास्ता जिस पर चलते हुए दुविधाओं की सड़ांध समाप्त हो जाती है, और उद्देश्य पूर्ण यात्रा के प्रसून खिलते हुए दिखाई देते हैं, किंतु हमें यह समझना होगा कि यात्रा की इस सुख सुरभि में कांटों की वेदना भी समाई होती है, इसलिए प्रत्येक कदम सम्हाल कर रखने की जरूरत पेश आती है, क्यौकि कठिन कंटकाकीर्ण मार्ग को, अरण्यपथ को चुन लिया है जिसने, परीक्षाओं के सिलसिले उसके समक्ष कतारबद्ध खड़े नजर आते ही हैं. सफलताओं के ये आसान से लगने वाले रास्ते परीक्षाओं की वह पूर्व दिशा है, जिसे बादलों ने आच्छादित कर रखा है, किंतु सतत प्रयासों रुपी पुरुषार्थ उन्हें छिन्न भिन्न कर देता है, ओर सफलता रुपी स्वर्णिम प्रभात की नूतन रश्मियां प्रस्फुटित हो ही जाती है. कठिनाइयों के उन बेतरतीब सिलसिलों से होकर ही सफलताओं के महाद्वार खुलते हैं. यही है, वह दिव्यतम सुख की अनुभूति का महाद्वार, जहां से आसमानी बुलंदियां हमारे स्वागत समारंभ हेतु तत्पर दिखाई देती है. यही है वह चिरंतन शाश्वत सत्य के अनुसंधान का पथ जहां पर आगे बढ़ जाने पर फिर होकर भी नहीं होने की विराट संभावनाएं दस्तक देने लगती है. यही है वह अमृत का महाकोश, युग युगान्तर से जिसे हम खोजते आए हैं, और जिसकी छत्रछाया ने अनगिनत मानवों को महामानव के रूप में स्थापित कर दिया है.
आलोक पथ की ओर अग्रसर होते हुए तथा अपने कर्तव्य बोध, कर्मशीलता और राष्ट्र हित के महाभावों को सर्वोपरि स्थान प्रदान करते हुए हम नवोन्मेष के पथ पर सतत रूप से अग्रसर होने हेतु कृत संकल्पित हैं.
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ईमानदारी का तावीज…“।)
अभी अभी # ९५३ ⇒ आलेख – ईमानदारी का तावीज श्री प्रदीप शर्मा
ईमानदारी का कोई कॉपीराइट नहीं होता। सबको ईमानदार बनने का हक है। किताबों के शीर्षक और फिल्मों के शीर्षकों का भी कॉपीराइट होता है, फिर भी एक अवधि के पश्चात देवदास और दीवाना दुबारा बन ही जाती है। ईमानदारी के तावीज पर किसी और का कॉपीराइट सही, मेरी ईमानदारी मौलिक है।
गंडा-तावीज एक टोटका भी हो सकता है, मन्नत भी हो सकती है। हर तरह की बला से सुरक्षा भी हो सकती है। तावीज भूत-प्रेतों से भी रक्षा करता है। यह गले में एक इन-बिल्ट हनुमान चालीसा है, अपने आप में संकट-मोचक है।।
मनमोहन देसाई की फिल्मों में हीरो के गले में बंधा एक तावीज उसकी आजीवन रक्षा करता है, छाती पर बरसती गोली तक को वह आसानी से झेल लेता है लेकिन जब वह तावीज अपनी जगह छोड़ देता है, कयामत आ ही जाती है।
आप अपना काम कीजिए, तावीज अपना काम करेगा। उस्तादों और पहलवानों से गंडा बंधवाया जाता है। आप सिर्फ रियाज कीजिये, गंडा अपना काम करेगा। संगीत की तरह ही अब राजनीति, और साहित्य में भी गंडा-प्रथा ने अपने पाँव जमा लिए हैं।।
जब से मैंने ईमानदारी का तावीज पहना है, मेरे सभी काम आसानी से होने लग गए हैं। लोग मेरा चेहरा और आधार कार्ड तक नहीं देखते, जब ईमानदारी का इतना बड़ा चरित्र प्रमाण-पत्र गले में किसी विश्वविद्यालय की डिग्री की तरह सुशोभित है, तो फिर कैसी औपचारिकता।
जिस तरह एक ड्राइविंग लाइसेंस आपको गाड़ी चलाने की छूट प्रदान करता है, ईमानदारी का तावीज हमेशा बेईमानी और भ्रष्टाचार के लांछन से मेरा बचाव करता है। मेरी नीयत पर कोई शक नहीं करता। दुनिया मुझे दूध से धुला हुआ समझती है।।
पर हाय रे इंसान का नसीब!
मेरी पत्नी को ही मेरी ईमानदारी पर शक है। घर में हमेशा एक ही राग, और एक ही गाना गाया करती है। जा जा रे जा, बालमा! उसे मेरे ईमानदारी के तावीज पर रत्ती भर विश्वास नहीं। वह इन ढकोसलों को नहीं मानती। उसका मानना है कि ईमानदारी व्यवहार में होनी चाहिए, दिखावे में नहीं।
आस्था और संस्कार में द्वंद्व पैदा हो गया है। वह रूढ़ि और अंध-विश्वास के खिलाफ है। गंडे तावीज लटकाने से कोई ईमानदार नहीं हो जाता! ईमानदारी आचरण में उतारने की चीज है, गले में तमगे की तरह लटकाने की नहीं। पत्नी की बात में दम है। मैंने आव देखा न ताव! बजरंग बली का नाम, और पत्नी की प्रेरणा से ईमानदारी का तावीज तोड़ ही डाला। ईमानदारी की देवी, जहाँ भी कहीं हो, मुझे क्षमा करे।।
मेरी पत्नी चतुर सुजान है! मैंने कभी उसके इरादों पर शक नहीं किया। लेकिन जब रात को ही ईमानदारी का तावीज उतरवाया और सुबह एक दूसरा तावीज पहनने का आग्रह किया, तो मैं कुछ समझा नहीं!
वह बोली, कोई प्रश्न मत करो! चुपचाप यह तावीज पहन लो। यह देशभक्ति का तावीज है। चुनाव में बहुत काम आएगा! और उसने अपने कोमल हाथों से मुझे देशभक्ति का तावीज पहना दिया। पत्नी-भक्त तो में था ही, आज से देशभक्त भी हो गया।।
☆ आलेख ☆ “संविधान और समझ की आवश्यकता” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆
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“संविधान लिखने वाले के पास 32 डिग्रियां और 9 भाषाओं का ज्ञान था,
और आज अनपढ़ लोग संविधान में कमियां निकाल रहे हैं।”
यह वाक्य केवल एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि हमारे समय की एक विडंबना को उजागर करता है।
भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर केवल एक नाम नहीं, बल्कि विद्वता, संघर्ष और दूरदर्शिता का प्रतीक थे। उन्होंने Columbia University तथा London School of Economics जैसे विश्वविख्यात संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे विधि, अर्थशास्त्र, राजनीति, समाजशास्त्र और इतिहास के गहरे ज्ञाता थे। अनेक डिग्रियों और बहुभाषीय ज्ञान से सम्पन्न होकर उन्होंने भारत जैसे विविधताओं से भरे देश के लिए ऐसा संविधान रचा, जो समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है।
भारतीय संविधान कोई साधारण दस्तावेज़ नहीं है। यह सदियों के अनुभव, संघर्ष और चिंतन का परिणाम है। इसमें प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ कर्तव्यों का भी उल्लेख है। यह केवल शासन का ढांचा नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा है।
परंतु आज सोशल मीडिया के युग में बिना अध्ययन और बिना गहराई के समझ के लोग संविधान की आलोचना करने लगते हैं। आलोचना करना गलत नहीं है—लोकतंत्र में यह अधिकार है। परंतु बिना जानकारी, बिना अध्ययन और बिना संदर्भ के आलोचना करना समाज को भ्रमित करता है।
संविधान में संशोधन की व्यवस्था स्वयं इसी दस्तावेज़ में दी गई है। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं, इसलिए संशोधन भी होते हैं। अब तक कई संशोधन हुए हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि संविधान लचीला भी है और जीवंत भी।
वास्तव में आवश्यकता संविधान की आलोचना करने की नहीं, बल्कि उसे पढ़ने और समझने की है। जब तक हम संविधान के मूल सिद्धांत—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—को आत्मसात नहीं करेंगे, तब तक उसकी महत्ता को पूर्ण रूप से नहीं समझ पाएंगे।
डॉ. अम्बेडकर ने संविधान बनाते समय चेतावनी दी थी कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे तो वह प्रभावी नहीं रहेगा। इसका अर्थ स्पष्ट है—दस्तावेज़ से अधिक महत्वपूर्ण उसे लागू करने की निष्ठा और समझ है।
आज हमें आवश्यकता है अध्ययनशील नागरिक बनने की। केवल डिग्रियों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि समझ और विवेक आवश्यक है। संविधान पर प्रश्न उठाने से पहले हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए—क्या हमने उसे पढ़ा है? क्या हमने उसके मूल भाव को समझा है?
संविधान में कमियां खोजने से पहले हमें अपनी समझ को समृद्ध करना होगा। तभी हम सच्चे अर्थों में लोकतंत्र के सजग और जिम्मेदार नागरिक बन सकेंगे।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारक और प्रचारक…“।)
अभी अभी # ९५२ ⇒ आलेख – विचारक और प्रचारक श्री प्रदीप शर्मा
विचारक और प्रचारक का रिश्ता भी कुछ कुछ लेखक और पाठक जैसा ही होता है, बस अंतर यह है कि हर पाठक लेखक का प्रशंसक नहीं होता, जब कि हर प्रचारक, विचारक का प्रशंसक भी होता है।
पहले विचार आया, फिर विचार का प्रचार आया। आप चाहें तो विचारक को चिंतक भी कह सकते हैं, लेकिन चिंतक इतना अंतर्मुखी होता है कि उसे अपने विचार से ही फुर्सत नहीं मिलती। हमारी श्रुति, स्मृति और पुराण उसी विचार, गूढ़ चिंतन मनन का प्रकटीकरण ही तो है। जिस तरह वायु, गंध और महक को अपने साथ साथ ले जाकर वातावरण को सुगंधित करती है, ज्ञान का भी प्रचार प्रसार विभिन्न माध्यमों से होता चला आया है।।
चिंतन सामाजिक मूल्यों का भी हो सकता है और मानवीय मूल्यों का भी। विचारक जहां सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा होता है, एक दार्शनिक जीवन के मानवीय और भावनात्मक पहलुओं पर अपनी निगाह रखता है। विचार और दर्शन हमेशा साथ साथ चले हैं। विचार ने ही क्रांतियां की हैं, और विचारों के प्रदूषण ने ही इस दुनिया को नर्क बनाया है। ऐसा क्या है बुद्ध, महावीर, राम और कृष्ण में कि वे आज भी किसी के आदर्श हैं, पथ प्रदर्शक हैं, कोई उन्हें पूजता है तो कोई उन्हें अवतार समझता है। मार्क्स, लेनिन आज क्यों दुनिया की आंख में खटक रहे हैं। विचार ही हमें देव बना रहा है, और विचार ही हमें असुर। देवासुर संग्राम अभी थमा नहीं।
एक अनार सौ बीमार तो ठीक, पर एक विचारक और इतने प्रचारक! अगर सुविचार हुआ तो सबका कल्याण और अगर मति भ्रष्ट हुई तो दुनिया तबाह। देश, दुनिया, सभ्यता, संस्कृति विचारों से ही बनती, बिगड़ती चली आ रही है। मेरा विचार, मेरी सभ्यता, मेरी संस्कृति सर्वश्रेष्ठ, हमारा नेता कैसा हो, इसके आगे हम कभी बढ़ ही नहीं पाए। जो विचार भारी, जनता उसकी आभारी।।
आज सबके अपने अपने फॉलोअर हैं, प्रशंसक हैं, आदर्श हैं। सोशल मीडिया और प्रचार तंत्र जन मानस पर इतना हावी है कि आम आदमी की विचारों की मौलिकता को ग्रहण लग गया है। एक भेड़ चाल है, जिससे अलग वह चाहकर भी नहीं चल सकता।
हमारी विचारों की बैलगाड़ी दो बैलों की जोड़ी से शुरू हुई और गाय बछड़े पर आकर रुक गई। विकास ट्रैक्टर पर चढ़कर आया और कीचड़ में कमल खिल गया। हमने बछड़े को हटा दिया, गाय को माता बनाकर गौशाला में भेज दिया। अब यह गऊ माता ही हमें इस भव सागर से पार लगाएगी। आज हमारे पास अच्छे विचारक भले ही नहीं हों, अच्छे प्रचारक जरूर हैं।।
आज का युग विचार का नहीं, प्रचार का युग है। अच्छाई एक ब्रांड है, जो बिना अच्छे पैकिंग, विज्ञापन और ब्रांड एंबेसेडर के नहीं बेची जा सकती। धर्म, राजनीति, आदर्श, नैतिकता और समाज सेवा बिना प्रचार और प्रचारक के संभव ही नहीं। कोई सेवक है, कोई स्वयंसेवक, कोई गुरु है कोई चेला, कोई स्वामी है कोई शिष्य, कोई भगवान बना बैठा है तो कोई शैतान। सबकी दुकान खुली हुई है, मंडी में बोलियां लगवा रही हैं समाजवाद, पूंजीवाद, वंशवाद और राष्ट्रवाद की। सबके आदर्श, सबके अपने अपने विचारक, प्रचारक और डंडे झंडे। मंडे टू संडे। जिसका ज्यादा गल्ला, उसका बहुमत। लोकतंत्र जिंदाबाद।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७१ ☆ देश-परदेश – विश्व निद्रा दिवस : 13 मार्च 2026 ☆ श्री राकेश कुमार ☆
जब निद्रा दिवस की जानकारी मिली तो आरंभ में लगा, ये अवश्य ही कुंभकरण का जन्मदिवस होगा। हमारे जैसे निद्रा प्रेमी उसकी याद में इसको मनाते होंगे।
आखिर, आज वो दिन आ ही गया, जिसका हम पूरे साल भर इंतजार करते करते, सोते ही रहते हैं। इस खुशी को मानने के लिए हमारी पूरी योजना रहती हैं।
सभी संबंधित आवश्यक सामग्री ऑनलाइन मंगवा कर रखी पड़ी रहती हैं। शयन कक्ष की खिड़कियों को मोटे पर्दे से ढकना हो, या आंख पर पहनने वाली पट्टी से लेकर कान में ठूसने वाली रुई, सब तैयार हैं।
घर के द्वार पर बाहर से ताला लगवा दिया जाता हैं। टीवी, मोबाइल, पेपर सब कोसों दूर रख कर सोने की शुरुआत होती हैं।
भरपेट गरिष्ठ भोजन के पश्चात मीठी लस्सी की ओवरडोज लेकर, वातानुकूल कमरे में नींद लेने में सहायक सभी उपकरणों का उपयोग कर, मखमली शैय्या पर शांत चित्त लेटते ही, दूसरी दुनिया में चल देते हैं।
कितना मज़ा आता है, इसकी कल्पना करना भी संभव नहीं हैं। आप भी इसका आनंद लेवें।
अभी आंखें बंद ही हुई थी, हमारे कमरे के दरवाजे पर इतनी तेज आवाज़ आई, मानो पश्चिम एशिया की कोई मिसाइल हमारे कक्ष के दरवाजे के बाहर गिरी हैं। हड़बड़ाहट के मारे गिरते पड़ते दरवाजा खोला, बाहर श्रीमती जी खाली गैस के सिलेंडर के साथ खड़ी थी, और बोली गैस एजेंसी जाएं और सिलेंडर भरवा कर आए, ऑनलाइन बुकिंग सिस्टम बंद पड़ा है, घर में गैस खत्म हो गई, अब खाना नहीं बन सकता हैं।
मरता क्या ना करता, खाली सिलेंडर लेकर डीलर के यहां कूच कर रहें हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खरी खरी…“।)
अभी अभी # ९५१ ⇒ आलेख – खरी खरी श्री प्रदीप शर्मा
जो व्यक्ति खरे होते हैं, वे हमेशा खरी बात ही करते हैं। खरा, निखालिस शुद्ध को कहते हैं। खरा केवल सोना ही नहीं होता, खरे सोने जैसी बहू भी होती है, जिसमें कोई खोट नहीं होता। ऐसी बहू लाखों में एक होती है।
जब ऐसी बहू की तारीफ़ में कसीदे कढ़े जाते हैं, तो सास से बर्दाश्त नहीं होता, और वह कह उठती है, हमारा लड़का भी हीरा है हीरा।
जब सोने के आभूषण बनते हैं, तब उसमें थोड़ा खोट मिलाना पड़ता है, वह पीतल, चाँदी, तांबे का भी हो सकता है। शुद्ध सोने को टंच कहते हैं, इसके केवल बिस्किट बनते हैं, जो खाये नहीं जाते, केवल स्मगलिंग के काम आते हैं। खरे, खोटे, लोगों के नाम भी हो सकते हैं। शुभा खोटे और दुर्गा खोटे दोनों अच्छी मंजी हुई कलाकार थी, लेकिन उनमें कोई खोट नहीं था।।
जो लोग स्पष्टवक्ता होते हैं, वे ज़्यादा लाग-लपेट में विश्वास नहीं करते। चाहे किसी को बुरा लगे या भला, खरी-खरी सुना देते हैं। खरी खरी सुनने वाले को इतनी खरी तो नहीं लगती, लेकिन सुनाने वाले के चेहरे पर एक विजयी भाव अवश्य देखा जा सकता है।
जब मन में बहुत-कुछ उबल रहा होता है, और बाहर आने को आमादा होता है, तब खरी-खरी ही नहीं, खरी-खोटी भी सुनाई जाती है। खरी-खोटी सुनाना पराक्रम है, और सुनना पराजय। खरी-खरी में जहाँ हल्का सा समझाइश का पुट होता है वहीं खरी-खोटी में अच्छा-गलत, भला- बुरा, अपमानजनक और शालीन भाषा में अपशब्दों का प्रयोग होता है। खरी खरी, और खरी खोटी कभी शालीनता की मर्यादा नहीं लांघते। जब पानी सर से ऊपर चला जाता है तब गाली-गुप्ता की नौबत आती है। खरे गाली नहीं बकते। सभी खोटे गुप्ता नहीं होते।।
खरी खरी और खरी खोटी अक्सर सुनाई जाती है। इनके अलावा एक अवस्था और होती है, जिसमें कुछ कहा-सुनी नहीं होती, केवल भूरि भूरि प्रशंसा होती है। यह न तो चापलूसी की श्रेणी में आती है, और न ही कटाक्ष की। आप इसे जमकर तारीफ करना भी कह सकते हैं, लेकिन तारीफ भी वहीं की जाती है, जहाँ कुछ निहित स्वार्थ होता है।
आजकल भूरि भूरि प्रशंसा नहीं होती। यह प्रशंसा निःस्वार्थ होती है, और व्यक्ति के गुणों के आधार पर की जाती है। मुझे खुशी है कि इस प्रशंसा का अभी तक राजनीतिक प्रयोग नहीं हुआ है। तब शायद इसका रंग भूरा न रहे, मटमैला या बदरंग हो जाए।।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३२८ ☆ परिवर्तन का संवत्सर…
नूतन और पुरातन का अद्भुत संगम है प्रकृति। वह अगाध सम्मान देती है परिपक्वता को तो असीम प्रसन्नता से नवागत को आमंत्रित भी करती है। जो कुछ नया है स्वागत योग्य है। ओस की नयी बूँद हो, बच्चे का जन्म हो या हो नववर्ष, हर तरफ होता है उल्लास, हर तरफ होता है हर्ष।
भारतीय संदर्भ में चर्चा करें तो हिन्दू नववर्ष देश के अलग-अलग राज्यों में स्थानीय संस्कृति एवं लोकचार के अनुसार मनाया जाता है। महाराष्ट्र तथा अनेक राज्यों में यह पर्व गुढी पाडवा के नाम से प्रचलित है। पाडवा याने प्रतिपदा और गुढी अर्थात ध्वज या ध्वजा। मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था। सतयुग का आरंभ भी यही दिन माना गया है।
स्वाभाविक है कि संवत्सर आरंभ करने के लिए इसी दिन को महत्व मिला। गुढीपाडवा के दिन महाराष्ट्र में ब्रह्मध्वज या गुढी सजाने की प्रथा है। लंबे बांस के एक छोर पर हरा या पीला ज़रीदार वस्त्र बांधा जाता है। इस पर नीम की पत्तियाँ, आम की डाली, चाशनी से बनी आकृतियाँ और लाल पुष्प बांधे जाते हैं। इस पर तांबे या चांदी का कलश रखा जाता है। सूर्योदय की बेला में इस ब्रह्मध्वज को घर के आगे विधिवत पूजन कर स्थापित किया जाता है।
माना जाता है कि इस शुभ दिन वातावरण में विद्यमान प्रजापति तरंगें गुढी के माध्यम से घर में प्रवेश करती हैं। ये तरंगें घर के वातावरण को पवित्र एवं सकारात्मक बनाती हैं। आधुनिक समय में अलग-अलग सिग्नल प्राप्त करने के लिए एंटीना का इस्तेमाल करने वाला समाज इस संकल्पना को बेहतर समझ सकता है। सकारात्मक व नकारात्मक ऊर्जा तरंगों की सिद्ध वैज्ञानिकता इस परंपरा को सहज तार्किक स्वीकृति देती है। प्रार्थना की जाती है,” हे सृष्टि के रचयिता, हे सृष्टा आपको नमन। आपकी ध्वजा के माध्यम से वातावरण में प्रवाहित होती सृजनात्मक, सकारात्मक एवं सात्विक तरंगें हम सब तक पहुँचें। इनका शुभ परिणाम पूरी मानवता पर दिखे।” सूर्योदय के समय प्रतिष्ठित की गई ध्वजा सूर्यास्त होते- होते उतार ली जाती है।
प्राकृतिक कालगणना के अनुसार चलने के कारण ही भारतीय संस्कृति कालजयी हुई। इसी अमरता ने इसे सनातन संस्कृति का नाम दिया। ब्रह्मध्वज सजाने की प्रथा का भी सीधा संबंध प्रकृति से ही आता है। बांस में काँटे होते हैं, अतः इसे मेरुदंड या रीढ़ की हड्डी के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया है। ज़री के हरे-पीले वस्त्र याने साड़ी-चोली, नीम व आम की माला, चाशनी के पदार्थों के गहने, कलश याने मस्तक। निराकार अनंत प्रकृति का साकार स्वरूप में पूजन है गुढी पाडवा।
कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में भी नववर्ष चैत्र प्रतिपदा को ही मनाया जाता है। इसे ‘उगादि’ कहा जाता है। केरल में नववर्ष ‘विशु उत्सव’ के रूप में मनाया जाता है। असम में भारतीय नववर्ष ‘बिहाग बिहू’ के रूप में मनाया जाता है। बंगाल में भारतीय नववर्ष वैशाख की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इससे ‘पोहिला बैसाख’ यानी प्रथम वैशाख के नाम से जाना जाता है।
तमिलनाडु का ‘पुथांडू’ हो या नानकशाही पंचांग का ‘होला-मोहल्ला’ परोक्ष में भारतीय नववर्ष के उत्सव के समान ही मनाये जाते हैं। पंजाब की बैसाखी यानी नववर्ष के उत्साह का सोंधी माटी या खेतों में लहलहाती हरी फसल-सा अपार आनंद। सिंधी समाज में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ‘चेटीचंड’ के रूप में मनाने की प्रथा है। कश्मीर में भारतीय नववर्ष ‘नवरेह’ के रूप में मनाया जाता है। सिक्किम में भारतीय नववर्ष तिब्बती पंचांग के दसवें महीने के 18वें दिन मनाने की परंपरा है।
सृष्टि साक्षी है कि जब कभी, जो कुछ नया आया, पहले से अधिक विकसित एवं कालानुरूप आया। हम बनाये रखें परंपरा नवागत की, नववर्ष की, उत्सव के हर्ष की। साथ ही संकल्प लें अपने को बदलने का, खुद में बेहतर बदलाव का। इन पंक्तियों के लेखक की कविता है-
न राग बदला, न लोभ, न मत्सर,
बदला तो बदला केवल संवत्सर।
परिवर्तन का संवत्सर केवल काग़ज़ों तक सीमित न रहे। हम जीवन में केवल वर्ष ना जोड़ते रहें बल्कि वर्षों में जीवन फूँकना सीखें। मानव मात्र के प्रति प्रेम अभिव्यक्त हो, मानव स्वगत से समष्टिगत हो।
सभी पाठकों को शुभ गुढी पाडवा। नव संवत्सर आप सबके लिए शुभ हो।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी।
इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ आलेख ☆ “रानी झांसी जैसे नारी-वाद की सर्जक – डा. मुक्ता” ☆ श्री सिमर सदोष ☆
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डा. मुक्ता एक विदुषी लेखिका हैं। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी है। वह प्रतिभाशाली कवयित्री हैं। वह प्रसिद्ध कथा-लेखिका हैं। उनकी लघु-कथाओं में एक साथ, एक से अधिक संवेदनाओं की सरिताएं प्रवाहमान होते दिखाई देती हैं। इनकी कहानियों का सुर और स्वर भी अनेकानेक आयाम अपने साथ लिये चलते हैं। इनकी कहानियां सरपट नहीं चलतीं, खरामा-खरामा आगे बढ़ती हैं, और आगे बढ़ते जाने की इस यात्रा के दौरान पीछे से लाया गया कुछ यहां-वहां छोड़ती रहती हैं, और यहां का बहुत कुछ अपने अंग-संग लिये अगली मंज़िल की ओर सरक जाती हैं।
उन्होंने निबंध भी लिखे हैं। चिन्ता को चिन्तन का आवरण ओढ़ा कर डा. मुक्ता ने अपने इस निबंध संग्रह में मनुष्य को जीने का तरीका और सलीका तो सुझाया ही है, ज़िन्दगी सार्थकता को किस मुकाम पर हासिल किया जा सकता है, यह लब-ओ-लुबाब भी इस संग्रह का निष्कर्ष है।’ आधुनिक काव्य में प्रकृति’ डा. मुक्ता जी का आलोचना साहित्य है।
प्रकृति काव्य की प्रारम्भ से सहोदर रही है। कविता किसी भी काल-युग में लिखी गई हो, प्रकृति कदम-कदम और शाना-ब-शाना उसके साथ-साथ चली है। अपने दौर की कविता में प्रकृति के कदमों के निशानों और हाथों के स्पर्श को ढूंढने के प्रयत्नों का प्रतिरूप है यह संग्रह। डा. मुक्ता के आलोचनापरक स्वर और स्पर्श भी ऐसे हैं जैसे कोई यौवना किसी उपवन के फूलों को अपने मेहंदी-युक्त हाथों से हौले-हौले सहला रही हो।
डा. मुक्ता
माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक,हरियाणा साहित्य अकादमी
डा. मुक्ता ने अब तक नौ कविता संग्रह समाज की झोली में डाले हैं। इनमें एक ग़ज़ल संग्रह और एक मुक्तक संग्रह भी है। पांच लघुकथा संग्रह भी उनकी साहित्यिक निधि का हिस्सा हैं। एक कहानी संग्रह, एक निबन्ध संग्रह, एक आलोचना कृति भी उनके हिस्से में है। इनकी कविताओं में आस्था और भक्ति के साथ स्नेह के अनेक स्त्रोत बहते प्रतीत होते हैं। इनकी कविताओं का स्वर बूंद-बूंद श्रद्धा भाव के घट को भरते महसूस होता है। डा. मुक्ता का काव्य-स्वर मौन की समाधि के बाद उपजे ओम् के नाद जैसा है।
इसी प्रकार डा. मुक्ता की कहानियों और लघु कथाओं की सत्ता भी शब्द और स्वर की अनुभूतियों से परिपूर्ण है। इनकी लघुकथाओं से यथार्थ की उर्वरा भूमि पर कल्पना का बीज बोया गया है। इनकी लघुकथाएं पथिक की ज्ञान-क्षुधा को शांत करती हैं, तो आम जन की आकांक्षा की भूख भी मिटाती हैं। इनकी लघुकथाएं जितनी मैंने पढ़ी/जानी हैं- सतसैया के दोहरों जैसी हैं-आकार में छोटी किन्तु प्रहार में तीक्ष्ण। वे अपने होने का आभास तो देती हैं, परंतु अपनी सत्ता के मद का प्रदर्शन करने के लिए घाव नहीं देतीं। इनकी कथा-कहानी ज़िन्दगी में यथार्थ की उदात्त अभिव्यक्ति होती है। साधारण भाषा-शैली में लिखी गई इनकी कहानियां समर्पण भाव को अधिक तरजीह देती हैं।
बहुत भला लगता है, अक्सर… मध्य आकाश में जगे चांद की बीथियों में उस दादी नानी मां के अक्स की तलाश करना जो किसी एक कोने में बैठ सदियों से कात रही है चरखा। तब भी बहुत भला लगता है…. वसन्त से पहले प्रहर की उगती हुई स्वर्ण जैसी धूप के बालों में से, अपनी उंगलियों के पोरों से नर्म आभा की तलाश करना (‘अंजुरी भर धूप’ डा. मुक्ता का लघु कथा संग्रह है)।
गेहूं की हरितमा के बीच, सरसों के पत्तों पर से उतरती आती किसी बीर बहूटी के मखमली पांवों को अपनी हथेली पर रख, हल्की-हल्की गुदगुदी को महसूस करना किसे भला नहीं लगता। सच, एक ऐसा संगीत उभरता है तब जो रूह तक सुकून दे जाता है। दिसम्बर के पहले पक्ष की किसी अल-सुबह, किसी जंगल-बेले में आप-मुहारे उग आए किसी जंगली गुलाब की पत्ती पर फिसलते-फिसलते अटक गई ओस की किसी बूंद के भीतर सिमटे/दुबके आकाश के अस्तित्व को महसूस करने के लिए वैसी आंखें चाहिएं जैसी तूर के नूर को देखने के वक्त मूसा के पास थीं। संगीत के इस सुर को गीत के स्वर द्वारा छू लेने के बीच का सफ़र बेशक ख़ामोशियों के फूलों से सराबोर हो सकता है, लेकिन इन फूलों से सटी पत्तियों की सरसराहट की आवाज़ एक ऐसे वातावरण का सृजन करती है जिसमें ज़िन्दगी है, जिसमें सृष्टि है (‘ख़ामोशियों का सफ़र’ डा. मुक्ता का कहानी संग्रह है)।
शहरों की तारकोल से सनी स्याह सड़कों के कोलाहल की अपनी एक भिन्न भाषा होती है, एक भिन्न ज़िन्दगी होती है, जो बेशक आम जैसी होती है-वही शोर-गुल, वही चिल्ल-पों… चुप्पी और मौन भी एक-से होते हैं, परन्तु गांवों की पगडंडियों पर से सुबह की आगे बढ़ती बेला, और सायं को धुंधलके के बीच में उपजती गो-धूलि के समय, गाय-बैलों के गले में बंधे घुंघरुओं की आवाज़ से जो संगीत उपजता है, वह स्वर्गिक होता है, नैसर्गिक भी। कहते हैं, शब्द की सत्ता/शक्ति बन्दूक की गोली और तोप के बारूद से भी अधिक होती है। तोप और बन्दूक से शरीर की ताकत तो खत्म हो सकती है, परन्तु इतिहास गवाह है कि दुनिया का कोई बारूद शब्द की सत्ता को कभी चुनौती नहीं दे सका। दुनिया की तवारीख मानती है कि बन्दूकों ने तानाशाह तो बेशक खत्म किये, परन्तु तानाशाही तो हर युग/दौर में रही है, आज भी किसी न किसी रूप में मौजूद है। धर्म के नाम पर लड़ी गई जंगों ने धर्म-गुरुओं के बलिदान तो लिये, परन्तु धर्म की भौतिक/अलौकिक सत्ता पहले से भी अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुई है। लफ्ज़ों की जुबां होती है, इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकतीं। लफ्ज़ जब जुबां खोलते हैं, तो अनेक वो सत्य भी रहस्योद्घाटित हो जाते हैं, जो सदियों से दबे / कुचले पड़े थे। ‘लफ्ज़ों ने जुबां खोली’ (ग़ज़ल संग्रह) की ग़ज़लें शब्द और उसके अर्थ की सत्ता का एक मुजस्समा होने जैसी हैं।
डा. मुक्ता का साहित्य नारीवादी न होकर नारी के भीतरी उजास का संवाहक है। इस साहित्य में नारी के उत्तेजक स्वभाव का प्रदर्शन नहीं तथापि इसमें नारी दोयम दर्जे की तो कदापि नहीं दिखी। डा. मुक्ता ने नारी को उसकी तमाम भीतरी/बाहरी योग्यताओं/क्षमताओं और उपलब्धियों के साथ चित्रित किया है, तथापि उन्होंने उसे बाज़ार की वस्तु के तौर पर दर्शाने से भी संकोच किया है। उनके साहित्य में नारी घर-परिवार और समाज की शोभा, उपयोगिता है, और नर-समाज की शक्ति है। डा. मुक्ता एक ओर नारी-चेतना का शंखनाद करती हैं, तो उसी स्वर में नारी की अस्मिता की रक्षा के लिए स्वयं नारी को काली, चंडी, दुर्गा का रूप धारण करने का आह्वान भी करती हैं। इनकी कविताएं नारी को जौहर का संदेश नहीं देतीं, अपितु झांसी की रानी बनने की प्रेरणा देती हैं।
डा. मुक्ता स्वयं भी बेहद सौम्या, सजग, उदार-मना एवं महामना नारी हैं। उच्च शिखर तक सम्मानित, अलंकृत और पुरस्कृत नारी डा. मुक्ता बहुत कम बोलती हैं, परन्तु जितना बोलती हैं, बड़ी मधुर वाणी से नपे-तुले शब्दों का उच्चारण करती हैं। वह नारी मन के भीतर उतर जाने का हुनर जानती हैं, यह उनकी कहानियों को पढ़ने से पता चल जाता है। वह नारी मन और प्रकृति-तत्व की कोमलता से भली प्रकार परिचित एवं अवगत हैं, यह उनकी कविताओं के मनन/ मन्थन से ज्ञात होता है। साहित्य के पानियों में बहुत गहरे उतरने की कला भी उन्हें आती है… तभी तो इतने सारे माणिक-मोतियों की माला उन्होंने मां सरस्वती/शारदे मां के लिए तैयार कर रखी है।
डा. मुक्ता का साहित्य बाज़ारवाद, उपभोक्तावादी संस्कृति और भौतिकतावाद की अंधी दौड़ का हिस्सा नहीं बनता, तथापि वह मौजूदा दौर की ज़रूरतों को स्वीकार अवश्य करता है। डा. मुक्ता ने साहित्य के प्रत्येक पक्ष को बड़ी सुघढ़ता से छुआ है। इनकी कविताएं यदि किसी मैदानी नदी के पानी में उतरती-लांघती लहरों जैसी हैं, तो इनकी कहानी पहाड़ से उतरी किसी नदी की पहली जल-रेखा जैसी है जो उच्छृंखल भी नहीं, और आलस्य की जायी भी नहीं है। कुल मिला कर डा. मुक्ता द्वारा रचित सम्पूर्ण साहित्य अपने आप में एक सर्वांग, सम्पूर्ण और उपयोगी पक्ष जैसा है।
निःसंदेह, यह जो कुछ मैंने लिखा/कहा है, यह कोई अतिश्योक्ति नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही सत्य है जैसे कि आकाश पर चांद का होना, जैसे कि किसी घने वन-प्रांतर में धूप का संवरना, और वह सत्य तथ्य यह है कि डा. मुक्ता साहित्यिक फलक का वह सितारा हैं जिसका प्रभा मंडल बहुत विशाल और व्यापक है। डा. मुक्ता कल्पना की धरा पर एक ऐसी धवल/स्वच्छ नदिया की भांति हैं जिसकी लहरों के आईने में से हर कोई अपनी भावनाओं की छवि देख सकता है।
डा. मुक्ता एक ऐसी लेखिका हैं, जो एक हाथ से समाज से कुछ ग्रहण करती हैं, तो दूसरे हाथ से समाज की विरासत पिटारी में ब्याज समेत लौटाना भी जानती हैं। डा. मुक्ता चिरजीवी हों, उनकी कलम सलामत रहे, उनकी विचार-ऊर्जा बनी रहे, उनकी कल्पना-शक्ति की उड़ान बुलंद रहे…. वह लिखती रहें, कहती रहें और सुनती भी रहें-उनके साहित्य से जुड़ा हर शख्स ऐसा अवश्य चाहेगा। आमीन !