हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४९ – लघुकथा – मैं ऐसा नहीं – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारानी लघुकथा मैं ऐसा नहींकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४९ 

☆ लघुकथा – मैं ऐसा नहीं ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

वह फिर गिड़गिड़ाया, “साहब ! मेरी अर्जी मंजूर कर दीजिए. मेरा इकलौता पुत्र मर जाएगा.”

मगर, नरेश बाबु पर कोई असर नहीं हुआ, “साहब नहीं है. कल आना.”

“साहब, कल बहुत देर हो जाएगी. मेरा पुत्र बिना आपरेशन के मर जाएगा.आज ही उस के आपरेशन की फीस भरना है. मदद कर दीजिए साहब. आप का भला होगा,” वह असहाय दृष्टि से नरेश की ओर देख रहा था.

“ कह दिया ना, चले जाइए, यहां से,” नरेश बाबु ने नीची निगाहें किए हुए जोर से चिल्लाते हुए कहा.

तभी उस का दूसरा साथी महेश उसे पकड़ कर एक ओर ले गया.

“क्या बात है नरेश! आज तुम बहुत विचलित दिख रहे हो.” महेश बाबु ने पूछा, “वैसे तो तुम सभी की मदद किया करते हो ? मगर, इस व्यक्ति को देख कर तुम्हें क्या हो गया?” वह नरेश का अजीब व्यवहार समझ नहीं पाया था.

नरेश कुछ नहीं बोला. मगर, जब महेश बाबु ने बहुत कुरैदा तो नरेश बाबु ने कहा, “क्या बताऊ महेश ! यह वही बाबु है, जिस ने मेरी अर्जी रिश्वत  के पैसे नहीं मिलने की वजह से खारिज कर दी थी और मेरे पिता बिना इलाज के मर गए थे.”

“क्या !’’ महेश चौंका.

“हां, ये वहीं व्यक्ति है.”

“तब तू क्या करेगा?” महेश ने धीरे धीरे से कहा, “जैसे को तैसा?”

“नहीं यार, मैं ऐसा नहीं हूं,” नरेश ने कहा, “मैंने इस व्यक्ति की अर्जी कब की मंजूर कर दी है और इलाज का चैक अस्पताल पहुंचा दिया है. यह बात इसे नहीं मालुम है.’’ कहते हुए नरेश खामोश हो गया.

महेश यह सुन कर कभी नरेश को देख रहा था कभी उस व्यक्ति को. जब कि वह व्यक्ति माथे पर हाथ रख कर वहीं ऑफिस में बैठा था. 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ दिल की तस्वीरें ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ दिल की तस्वीरें ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“मम्मी, आपके बचपन की फ़ोटो इतनी कम क्यों हैं?” रिया ने पुराना एल्बम पलटते हुए पूछा।

माँ मुस्कुराईं, “क्योंकि बेटा, तब हर पल को कैमरे में नहीं, दिल में कैद किया जाता था।”

“मतलब?”

“मतलब, जब गर्मियों में हम सब खुले आँगन में चारपाइयाँ बिछाकर सोते थे, तब किसी ने फ़ोटो नहीं ली। जब नानी अपने हाथों से आम काटकर खिलाती थीं, जब मोहल्ले के बच्चे गिल्ली-डंडा, कंचे और पिट्ठू खेलते थे, तब भी कोई रिकॉर्डिंग नहीं होती थी।”

“फिर याद कैसे है सब?”

“क्योंकि उन पलों में मोबाइल नहीं, अपने लोग साथ होते थे। ट्रेन के सफ़र में सुराही का पानी, घर से बने पराठे, छत पर पतंगबाज़ी, बरसात में कागज़ की नाव, दादी की कहानियाँ, त्योहारों की रौनक—इन सबकी तस्वीरें नहीं हैं, लेकिन यादें आज भी ताज़ा हैं।”

रिया ने अपना मोबाइल मेज़ पर रख दिया।

“मम्मी, आज शाम दादी से उनकी पुरानी कहानियाँ सुनेंगे?”

माँ की आँखें चमक उठीं।

“हाँ बेटा, कुछ यादें कैमरे से नहीं, अपनों के साथ बिताए समय से बनती हैं।” ❤️

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२० – रसेदार सब्ज़ी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रसेदार सब्ज़ी)

☆ लघुकथा # १२० – रसेदार सब्ज़ी श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शाम के पाँच बज चुके थे। सरकारी दफ़्तर में हिसाब-किताब देखते-देखते रामप्रसाद बाबू की आँख लग गई थी।

नींद में वह मुस्कुरा रहे थे—”आज घर जाऊँगा तो रसेदार सब्ज़ी बनी होगी। सुबह दाल बनाने को भी कह दिया था। दाँत अब पहले जैसे नहीं रहे, पर रसेदार सब्ज़ी के साथ रोटी आराम से खा लेता हूँ।”

तभी चपरासी ने आवाज़ दी, “बाबूजी! पाँच बज गए। घर नहीं जाना क्या?”

वह चौंककर उठे, झोला उठाया और रास्ते में आलू-टमाटर खरीद लिए। एक दुकान पर नज़र पड़ी तो पत्नी के लिए एक छोटा-सा पर्स भी ले लिया। मन ही मन सोचने लगे, “बहुत खुश होगी।”

घर पहुँचे। ताला खोला। भीतर सन्नाटा था।

उन्होंने सब्ज़ियाँ मेज़ पर रखीं और नया पर्स निकालकर दीवार पर टँगी पत्नी की तस्वीर के सामने रख दिया।

काँपती आवाज़ में बोले, “देखो… तुम्हारे लिए पर्स लाया हूँ।”

फिर रसोई में जाकर डिब्बे से सूखी रोटियाँ निकालीं, पानी में भिगोकर खाने लगे।

आँखों से आँसू लगातार गिरते रहे।

पत्नी को गुज़रे तीन वर्ष हो चुके थे, पर प्रेम ने आज तक यह स्वीकार नहीं किया था कि वह अब लौटकर नहीं आएगी।

उधर उसी समय उनका बेटा और बहू एक महंगे भोजनालय में परिवार के साथ भोजन कर रहे थे। तस्वीर खिंची और सामाजिक माध्यम पर लिखा गया—

“माता-पिता का आशीर्वाद ही सबसे बड़ी दौलत है।”

कुछ ही देर में सैकड़ों प्रशंसाएँ मिल गईं।

इधर रामप्रसाद बाबू की थाली में आज भी सूखी रोटी थी… और उधर बेटे की तस्वीर में संस्कार।

विडंबना यह नहीं कि पिता अकेला था, विडंबना यह थी कि उसका बेटा कभी अकेला दिखाई नहीं देता था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७० – बारिश ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बारिश”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७०  ☆

🌻 अति लघु कथा (अ ल क) 🌻 🌧️बारिश🌧️

आज बारिश की बूँदों ने श्रेया के मन में ही नही, तन को भी फफोले बना रही थी। तेज, तर्रार, तीखे नयन नक्श, चुल्हे के जैसी धधकी ज्वाला जिसे अनजाने में ही किसी ने सुलगती धुंआ- धुंआ कर डाला।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १०९ – कथा – मुसाफिर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक रहस्यमय कथा – मुसाफिर।)  

☆  चुभते तीर # १०९ – कथा – मुसाफिर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

दिल्ली के सराय काले ख़ां बस टर्मिनल पर शाम के साढ़े सात बजे थे। जून की उस उमस भरी गर्मी में हवा ऐसे चल रही थी मानो कोई बूढ़ा चूल्हा फूंक रहा हो।

राजीव अपनी पुरानी सुटकेस पर बैठा हुआ अपनी सड़ी सी चाय की चुस्की ले रहा था। चाय का स्वाद बिल्कुल वैसा ही था जैसी उसकी ज़िंदगी थी यानी फीकी, बेस्वाद, लेकिन मजबूरी में हलक से नीचे उतारनी ही थी। ठीक तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन टिमटिमाई। सफरनामा ऐप पर एक राइड शेयरिंग रिक्वेस्ट थी। रूट था दिल्ली से लखनऊ।

गाड़ी राजीव की ही थी यानी एक पुरानी वैगनआर, जो अब सिर्फ पेट्रोल पर नहीं, बल्कि राजीव की किस्मत के भरोसे चलती थी। उसने रिक्वेस्ट एक्सेप्ट की। सह यात्री का नाम लिखा था मुसाफिर।

जब पैसेंजर गाड़ी की पिछली सीट पर आकर बैठी, तो गाड़ी की लाइट में राजीव ने शीशे से उसका चेहरा देखा। रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी सनसनी दौड़ गई।

वह पल्लवी थी।

वही पल्लवी, जो आज से सात साल पहले इसी सराय काले ख़ां पर राजीव का हाथ छोड़कर बेहतर भविष्य की तलाश में एक चमचमाती ऑडी में बैठ कर चली गई थी। आज वही पल्लवी उसकी खटारा वैगनआर की पिछली सीट पर बैठी थी।

राजीव ने गला साफ़ किया, मैडम, रूट लंबा है। रात को ढाबे पर रुकेंगे।

पल्लवी ने खिड़की के बाहर देखते हुए ठंडी आवाज़ में कहा, जल्दी पहुँचाइए भैया, मेरी माँ की तबीयत ठीक नहीं है।

भैया।

राजीव के कलेजे पर जैसे किसी ने सुलगती हुई सिगरेट बुझा दी। सात साल में जान से भैया तक का सफर सिर्फ तीन अक्षरों का नहीं था, इसमें सात जन्मों की बेबसी घुली थी। व्यंग्य देखिए, जिस औरत के लिए राजीव ने कभी पूरी दिल्ली नाप डाली थी, आज वह उसे तीन सौ रुपये प्रति सीट के भाड़े पर अपनी गाड़ी में ले जा रहा था। वही कारवाँ था, वही रास्ते थे, वही ज़िंदगी थी… बस मक़ाम बदल गए थे।

गाड़ी यमुना एक्सप्रेसवे पर अस्सी की स्पीड से दौड़ रही थी। रेडियो पर किशोर कुमार रो रहे थे जीना क्या जी का जंजाल…

गाड़ी में एसी ठीक से काम नहीं कर रहा क्या? पल्लवी ने पीछे से टोका। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कपकपाहट थी।

राजीव ने शीशे में देखा। पल्लवी का चेहरा पीला पड़ चुका था। उसकी आँखों के नीचे काले गड्ढे थे। वह लगातार अपने हाथों को आपस में रगड़ रही थी, जैसे उसे बहुत ठंड लग रही हो, जबकि बाहर पारा चालीस के पार था।

पुरानी गाड़ी है मैडम, जितना रोती है उतना ही चलती है, राजीव ने अपनी कड़वाहट को व्यंग्य के पीछे छिपाते हुए कहा। सुना है आपके पति के पास बड़ी गाड़ियाँ हैं? फिर इस खटारा में?

पल्लवी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस शून्यता में ताकती रही।

तभी गाड़ी के स्टीयरिंग में एक ज़ोर का झटका लगा। हेडलाइट की रोशनी में सड़क के बीचों बीच एक साया खड़ा दिख। राजीव ने पूरी ताकत से ब्रेक मारा। टायर चीख उठे। गाड़ी सड़क किनारे एक बड़े से मील के पत्थर के ठीक सामने जाकर रुकी।

राजीव हांफ रहा था। उसने बाहर देखा, वहाँ कोई नहीं था।

क्या हुआ? पल्लवी ने पूछा। उसकी आवाज़ अब और भी भारी और गूँजती हुई सी लग रही थी।

कोई… कोई सामने था शायद, राजीव ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा।

इस रास्ते पर कोई किसी के सामने नहीं आता राजीव। सब अपने अपने मक़ाम पर अकेले ही छूट जाते हैं, पल्लवी ने धीरे से कहा।

राजीव चौंक गया। पल्लवी ने उसे भैया नहीं, राजीव कहा था। और उसकी आवाज़… वह इतनी खोखली क्यों लग रही थी?

रात के दो बजे गाड़ी एक सुनसान ढाबे पर रुकी। ढाबे पर अजीब सा सन्नाटा था। न कोई ट्रक ड्राइवर, न कोई और गाड़ी। बस एक बूढ़ा आदमी लालटेन लिए बैठा था।

राजीव नीचे उतरा। पल्लवी भी पीछे पीछे आई। दोनों एक खाट पर बैठ गए।

चाय पियोगी? राजीव ने पूछा।

हाँ, बिना चीनी की। मीठे से अब डर लगता है, पल्लवी ने अपनी उँगलियों को देखते हुए कहा, जिन पर कोई अंगूठी नहीं थी।

राजीव ने गौर किया कि पल्लवी के पैरों में चप्पल नहीं थी। पैर धूल से सने थे और उन पर नीले रंग के अजीब से निशान थे।

तुम्हारी ये हालत कैसे हुई पल्लवी? वह ऑडी वाला कहाँ गया? तुम्हारा वो आलीशान मक़ाम? राजीव के भीतर का दबा हुआ गुबार व्यंग्य बनकर फूट पड़ा।

पल्लवी सूखी हँसी हँसी। उस हँसी में इतनी पीड़ा थी कि ढाबे की लालटेन भी थरथरा गई। मक़ाम? मक़ाम तो बस श्मशान का सच होता है राजीव। बाकी सब तो मुसाफिरखाना है। जिस ऑडी के पीछे मैं भागी थी, उसने मुझे दो ही साल में सड़क पर ला दिया। रोज़ की मार पिटाई, गाली गलौज… और एक दिन… वह चुप हो गई।

और एक दिन क्या? राजीव ने उत्सुकता और सिहरन के बीच पूछा।

एक दिन उसने मुझे चलती गाड़ी से बाहर फेंक दिया। इसी एक्सप्रेसवे पर। पल्लवी ने अपनी आँखें उठाईं। उसकी आँखों में पुतलियाँ नहीं थीं, सिर्फ एक गहरा, डरावना कालापन था।

राजीव के हाथ से चाय का कुल्हड़ छूटकर गिर गया। चाय ज़मीन पर फैल गई।

तुम… तुम क्या बकवास कर रही हो? राजीव का गला सूख गया। उसने डर कर पीछे कदम बढ़ाए।

मैं सच कह रही हूँ राजीव। आज ठीक सात साल हो गए उस बात को। मैं रोज़ इसी रास्ते पर किसी न किसी गाड़ी में बैठती हूँ, इस उम्मीद में कि कोई मुझे घर पहुँचा दे। आज तुम्हारी गाड़ी मिली। पल्लवी खड़ी हो गई। उसके जिस्म से अब सड़न की एक अजीब सी बू आ रही थी।

राजीव ने काँपते हाथों से अपना फोन निकाला। उसने सफरनामा ऐप खोला। पैसेंजर की प्रोफाइल देखने के लिए। वहाँ मुसाफिर नाम की कोई राइड ही नहीं थी। स्क्रीन पर सिर्फ एक पुराना न्यूज़ आर्टिकल खुला हुआ था, जो शायद इंटरनेट ने उसकी लोकेशन के आधार पर रीकमेंड किया था।

हेडलाइन थी सात साल पहले यमुना एक्सप्रेसवे पर मिली महिला की लाश की अब तक नहीं हुई पहचान। नीचे पल्लवी की सात साल पुरानी तस्वीर थी।

राजीव के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। वह चीखने ही वाला था कि ढाबे के उस बूढ़े आदमी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

बाबूजी, किससे बात कर रहे हो? यहाँ तो कोई नहीं है। आप आधे घंटे से अकेले खाट पर बैठकर रो रहे हो।

राजीव ने पलटकर देखा। खाट खाली थी। पल्लवी वहाँ नहीं थी। सिर्फ उसकी चाय का कुल्हड़ ज़मीन पर टूटा पड़ा था।

वह भागकर अपनी वैगनआर की तरफ गया। उसने गाड़ी का दरवाज़ा खोला। पिछली सीट खाली थी। लेकिन सीट पर एक पुरानी, धूल से सनी हुई पायल रखी थी। वही पायल, जो राजीव ने पल्लवी को उनके पहले वेलेंटाइन डे पर अपनी जेबखर्च काटकर दी थी।

राजीव सड़क के बीचों बीच घुटनों के बल बैठ गया। आसमान से अचानक तेज़ बारिश होने लगी, जैसे कुदरत भी उसकी बेबसी पर ठहाके मार रही हो।

सात साल तक राजीव जिस औरत से नफ़रत करता रहा, जिसे कोसता रहा कि उसने उसे छोड़ दिया… वह तो इस दुनिया में थी ही नहीं। वह तो कब की मिट चुकी थी। और वह यहाँ अपनी टूटी गाड़ी और टूटी किस्मत लेकर घूम रहा था, यह सोचकर कि वह ज़िंदा है।

राजीव ने उस पायल को छाती से लगा लिया। बारिश का पानी और उसके आँसू एक होकर सड़क पर बह रहे थे। वह चीख चीखकर रोने लगा। उसकी रुलाई एक्सप्रेसवे के सन्नाटे को चीर रही थी।

वही कारवाँ था, वही रास्ते थे, वही ज़िंदगी थी… और आज दोनों एक ही मक़ाम पर थे। दोनों लावारिस थे, दोनों भटके हुए थे, और दोनों ही मर चुके थे, एक जिस्म से, और एक रूह से।

रात के उस सन्नाटे में सिर्फ एक इंसान (या शायद एक साया) रो रहा था, और दूर कहीं कोई मुसाफिर अपनी अगली मंज़िल की तलाश में भटक रहा था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “महिला लेखन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “महिला लेखन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

युवा लेखिका की पहली पहली किताब के विमोचन पर जाना हुआ। सबने न केवल लेखिका बल्कि उनके परिवार और खासतौर पर पति की जमकर तारीफ की। एक सफल कवयित्री के पीछे पति का जिक्र बार बार होता रहा। सभागार तालियों से गूंजता रहा।

समारोह के बाद घर पहुंचते ही पतिदेव ने कहा- देखो। बहुत हो गया यह साहित्य वाहित्य। बस। तुम्हारा शौक पूरा करवा दिया। अब बच्चों को देखो। पढ़ाओ लिखाओ इन्हें और एक औरत की तरह घर संभालो। समझी?

नयी नवेली किताब एक तरफ पड़ी मानो मुंह चिढ़ा रही थी।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५८ – लघुकथा – गर्भस्थ शिशु ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५८ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ गर्भस्थ शिशु ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

माँ के गर्भ में फंसा शिशु, गर्भ से बाहर निकलने का इंतजार कर रहा था लेकिन न जाने क्यों, वह बार-बार आगे पीछे की सोच रहा था। कभी तो उसके मन में आता कि बाहर चला आऊं और फिर कभी वह स्वयं को वापस गर्भ की ओर लेकर चला जाता।

यद्यपि वह यह सोचकर वह बाहर आना चाहता था कि उसे एक बहुत बड़ी दुनिया देखनी है, लेकिन जब उसे यह भी लगता कि बाहर आने पर जब लोग उसे वैश्या का बेटा कह कर ताना मारेंगे तो कहीं उसकी खुशहाली को तरसती जिंदगी नरक न बन जाए।

वह घोर चिंता में डूबा हुआ था। अचानक हिंदी के एक बड़े लेखक के लिखे एक लेख को जो एक पाठक द्वारा अपने मित्र श्रोता को पढकर सुनाई जा रही थी, उसकी आवाज उस गर्भस्थ शिशु के कान में पड़ गयी।

उस बड़े लेखक के व्यंग आलेख को पढ़ते हुए गंभीर श्रोता ने कहा – भाई ध्यान से सुनो! इस ख्याति प्राप्त लेखक ने क्या लिखा है। लेखक ने लिखा है कि –

“औरत ने बच्चे की गर्दन अब छोड़ी। उसने बच्चे का मुख चूम लिया और अस्पताल से चल निकलने के लिए तत्पर हो गई। उसने जाते – जाते बच्चे से कहा, “किसी तरह पल ही जाओगे। बड़ा होने पर मेरे कोठे में जरूर आना। पहचान जाऊँगी तो अपने पेट से निकला हुआ बेटा कहूँगी, न पहचानूँ तो अपने पेट के लिए तुम्हें अपना शरीर दूँगी।”

नहीं.. नहीं.. लेखक ने एक सच्चाई व्यंग्य में लिखा था, जो अक्सर होता है।

लेकिन मेरी इस कहानी का बच्चा और मां ऐसा बिल्कुल नही सोच रहे थे कि समाज क्या सोचेगा।

दरअसल मां और बेटे दोनों प्रसन्न थे। माँ यह सोचकर गदगद हो रही थी कि आगे चलकर मेरा बेटा! अपने कौशल और बुद्धि के बल पर स्वयं को ऐसी जगह स्थापित कर लेगा, जहां से मेरी पहचान बदल ही जाएगी, लोग मुझे वैश्या नहीं कहेंगे। लोग मुझे एक विद्वान बेटे की मां कहेंगे।

उधर बेटे के मन में दूसरी बात चल रही थी।

बेटा सोच रहा था, क्या हुआ मेरी मां वैश्या है तो क्या। सब कुछ बदला जा सकता है लेकिन माँ तो नहीं बदली जा सकती है। बशर्ते मैं वैश्या मां के गर्भ से पैदा हूँ, लेकिन माँ तो सिर्फ और सिर्फ यही है न। मेरी मां मुझे बहुत प्यार करेगी मुझे अपने आंचल में छुपा कर दूध पिलाएगी, मुझे खूब पढ़ायेगी और मैं पढ़ लिख कर एक बड़े मुकाम को हासिल करूँगा और अपनी माँ का नाम रोशन करुंगा।

©® राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११९ – कौन अपना?… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कौन अपना?।)

☆ लघुकथा # ११९ – कौन अपना? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

श्मशान की लपटें शांत हो चुकी थीं। माँ की सूनी आँखें अब भी बेटी की चिता की राख को निहार रही थीं। जिस बेटी को उसने नौ महीने कोख में रखा, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को आज अपने हाथों विदा करना पड़ा।

सबसे अधिक पीड़ा बेटी की मृत्यु की नहीं, बल्कि उन रिश्तों की थी जो उसके साथ ही मर गए। जीते-जी जिसे घर की लक्ष्मी कहा गया, उसके अंतिम सफ़र में वही लोग साथ छोड़ गए।

पास खड़ी एक वृद्धा की भर्राई आवाज़ गूँजी—

“हे ईश्वर! यदि संतान ऐसी हो, जो अपने ही रिश्तों का धर्म भूल जाए, तो निःसंतान रहना ही कहीं अधिक अच्छा है।”

चिता की राख हवा में उड़ रही थी और उसके साथ समाज के खोखले रिश्तों का सच भी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ चुभते तीर # १०७ – वाह री किस्मत! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – वाह री किस्मत!)  

☆ चुभते तीर # १०७ – कथा  – वाह री किस्मत! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

चाय की प्याली से उठते उस बेरहम धुएं में जिंदगी बिलकुल वैसे ही उलझी हुई दिखती थी, जैसे दराज के किसी कोने में पड़ी पुरानी इयरफोन की केबल, जिसे सुलझाने की कोशिश करो, तो गांठें और कस जाती हैं। मेज के उस पार वो बैठी थी, अपनी चमचमाती स्क्रीन के पीछे एक सुरक्षित दूरी बनाए हुए, और इस पार मैं था, अपने ढहते हुए वजूद के मलबे पर मुफ़्त की उस सलाह की तरह बिखरा हुआ जिसकी किसी को जरूरत नहीं होती। हम दोनों के बीच एक ऐसा भयानक सन्नाटा पसरा था, जो सिर्फ उस घर में होता है जहाँ वेंटिलेटर पर पड़े आखिरी बुज़ुर्ग की सांसें गिनते हुए लोग वसीयत के पन्नों पर दस्तखत होने का इंतजार कर रहे हों।

वह मुझसे बात कर रही थी, या शायद अपनी स्क्रीन पर रेंडर हो रहे किसी और अक्स को अपनी हंसी दान कर रही थी। उसकी उंगलियां की-बोर्ड पर इस बेरहमी और तेज़ी से नाच रही थीं जैसे कोई तजुर्बेकार कसाई बकरे की खाल उतार रहा हो या कोई बेहद सगा संबंधी आपकी सबसे दुखती रग को कुरेद रहा हो। अचानक मेरी आंखों में डिजिटल टॉर्च जैसी रोशनी मारते हुए उसने कहा, “तुम बदल गए हो।” मुझे एक तीखी हंसी आ गई। जब खुद आईने के सामने खड़े होकर अपनी ही शक्ल ढूंढने के लिए आधार कार्ड की तस्वीरों का सहारा लेना पड़े, तो सामने वाले का यह इल्जाम किसी मीठे जहर की तरह हसीन लगता है। हम सब चलते फिरते आईना हैं। वह मुझे देख रही थी, मैं उसमें अपना खोया हुआ ज़मीर ढूंढ रहा था और वह खुद को किसी तीसरे अनजान शख्स के लाइक्स और हार्ट वाले कमेंट्स के चश्मे से री-इमेजिन कर रही थी। क्या ख़बर कौन कहाँ किस की तरफ़ देखता है! पूरी कायनात ही जैसे किसी सस्ते सीसीटीवी कैमरे की फुटेज हो गई थी जिसमें कोई किसी का सगा नहीं था।

उसने नजरें उठाईं। उसकी आंखों में एक अजीब सा रहस्य था, ठंडा, गहरा और उतना ही खोखला, जैसे उस लावारिस सूटकेस का खालीपन जो रेलवे स्टेशन पर पड़ा रह जाता है। जैसे किसी बंद पड़े तहखाने का जंग लगा दरवाजा, जिसके भीतर अनाज सड़ चुका हो पर बाहर खुशखबरी का बोर्ड टंगा हो। उसने मुस्कुराने की ज़हमत उठाई, पर वो मुस्कान होठों के कॉर्नर पर आकर ऐसे दम तोड़ गई जैसे बिना पेट्रोल के भरे चौराहे पर किसी का सेकेंड हैंड स्कूटर खटखटाकर बंद हो जाता है।

“तुम बहुत ओवरथिंक करते हो,” उसने टका सा जवाब दिया और अपने फोन को बैग में ऐसे ठूंस लिया जैसे कोई चोर चुराया हुआ सामान छुपाता है। यही तो इस इक्कीसवीं सदी का सबसे मखमली व्यंग्य है। जब इंसान का दम घुट रहा हो, तो दुनिया कहती है कि मौसम की खराबी है। जब आत्मा अंदर से लहूलुहान होकर आईसीयू में भर्ती हो, तो लोग कंधे पर हाथ रखकर ज्ञान बघारते हैं कि ‘चिल ब्रो, तुम डीप थिंकिंग के शिकार हो।’

हम कैफ़े के उस ठंडे पाखंड से बाहर निकले। सड़क पर आसमान से बूंदें टपक रही थीं, पर दिल्ली की उस घुटन भरी शाम में वो बारिश राहत की फुहार नहीं, बल्कि जलती हुई चिता पर डाले जाने वाले घी की तरह रिस रही थी। वह दो कदम आगे-आगे चल रही थी, उसकी परछाई सड़क पर बिछे गंदे पानी में तैर रही थी। मैं उस परछाई को कुचलता हुआ, उसके पीछे-पीछे घिसट रहा था। एक अजीब सा रोमांच मेरे भीतर कुलबुला रहा था, एक ऐसा रहस्य जो दिल की धड़कनों को किसी मर्डर मिस्ट्री के क्लाइमेक्स जैसी रफ्तार दे रहा था। मुझे साफ़ अहसास हो रहा था कि आज कुछ बहुत बड़ा टूटने वाला है. कोई पुराना भ्रम, कोई मुगालता, या शायद खुद मेरी रीढ़ की हड्डी।

वह अचानक एक बड़े से शोरूम के विशालकाय शीशे के सामने ठिठक गई। वो शीशा इतना साफ़, इतना पारदर्शी था कि उसमें खड़े होकर आप अपने चेहरे के दाग-धब्बे और अपनी आत्मा की सारी कमियां बिलकुल साफ-साफ़ देख सकते थे। उसने उस चमचमाते कांच में खुद को निहारा, अपने बिखरे हुए बालों को इस तरह सेट किया जैसे कोई कफ़न ओढ़ने से पहले सजता है, और फिर अचानक मेरी तरफ मुड़ी। उसकी आंखों में पानी था, नहीं, आंसू थे, जो शायद इस नकली शहर की सबसे असली और सबसे महँगी चीज़ थे।

मैंने घबरा कर, अपनी बची-कुची संवेदनशीलता को समेटते हुए पूछा, “क्या हुआ? एनी प्रॉब्लम?”

उसने अपनी जींस की जेब से एक मुड़ा-तुड़ा, सिसकता हुआ कागज निकाला और मेरी हथेली पर ऐसे रख दिया जैसे कोई हारा हुआ जुआरी अपनी आखिरी सांस सौंपता है। उसके हाथ उस वक़्त बर्फ से भी ज्यादा ठंडे थे, मानो मौत ने अभी-अभी उनसे बहुत तसल्ली से हाथ मिलाया हो और कहा हो कि ‘बस दो मिनट रुको, तुम्हारा तमाशा पूरा देख लूं।’ वह बिना कोई शब्द बोले, बिना कोई पल बर्बाद किए मुड़ी और उस अंधी भीड़ में इस तरह ग़ायब हो गई जैसे श्मशान का धुआं हवा में उड़ जाता है। मैं उसे पुकारता रह गया, पर मेरी आवाज गाड़ियों के हॉर्न और तमाशबीन राहगीरों के शोर-शराबे में घुट कर वहीं ढेर हो गई।

मेरे हाथ ऐसे कांप रहे थे जैसे पहली बार किसी अपने की अर्थी को कंधा देते हुए कांपते हैं। दिल सीने के पिंजरे को तोड़कर बाहर छलांग लगाने को बेताब था। उस मुड़े हुए कागज की तह को खोलते हुए मेरी रूह के भीतर जैसे एक ठंडी सनसनी दौड़ गई। मुझे पूरा यकीन था कि इसमें कोई फिल्मी विदाई का खत होगा, कोई बेवफाई का शिकवा होगा, या किसी तीसरे रईसजादे का नाम और पता होगा जिसके पास मुझसे बड़ा सैलरी पैकेज था।

पर अफ़सोस, उस कागज पर कोई शायरी नहीं थी, कोई तोहमत नहीं थी। वह एक न्यूरोलॉजिस्ट की पर्ची थी। उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में डॉक्टर की स्याही चीख रही थी ‘एडवांस्ड स्टेज अल्जाइमर (स्मृति लोप)। मरीज अब चेहरों और रिश्तों को पहचानने की क्षमता पूरी तरह खो चुका है। वह सिर्फ आईनों और चमकीली सतहों में अपनी खोई हुई पहचान ढूंढने की आत्मघाती कोशिश करता है और सामने खड़े जीते-जागते व्यक्ति को महज़ एक बेजान अक्स, एक रिफ्लेक्शन समझता है।’

पैरों के नीचे की जमीन ऐसे सरक गई जैसे किसी बड़े बिल्डर की बनाई हुई बहुमंजिला इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है। मेरी आंखों से आंसुओं का वो सैलाब फूटा जिसकी उम्मीद खुद बादलों को भी नहीं रही होगी। हे भगवान! वह मुझे देख ही नहीं रही थी। वह तो उस आईने को, उस अक्स को ढूंढ रही थी जो मैं उसके धुंधलाते हुए दिमाग के लिए बनने का नाटक कर रहा था। वह हर रोज मुझसे कैफ़े में आकर इसलिए मिलती थी ताकि अपनी मरती हुई याददाश्त के मलबे में, अपने खुद के वजूद को दो पल के लिए ज़िंदा देख सके। मैं जिसे उसका मॉडर्न अकेलापन, उसका एटीट्यूड और उसकी स्क्रीन की दीवानगी समझकर उस पर ताने कस रहा था, वह दरअसल उसकी बुझती हुई दिमागी बत्तियों के बीच एक खामोश, चीखती हुई आख़िरी इल्तजा थी।

सड़क पर गाड़ियां बदस्तूर दौड़ रही थीं, वीकेंड का जश्न मनाते लोग ठहाके लगा रहे थे। मैं उस कीचड़ और बारिश के बीच खड़ा होकर पागलों की तरह हंस रहा था और रो रहा था। कैसा गजब का तमाशा है इस मुई जिंदगी का! हम पूरी उम्र दूसरों की आंखों में अपना चेहरा और अपना वजूद ढूंढते रहे, यह जाने बिना कि सामने वाले की आंखें तो खुद अपनी रोशनी और यादों का दीवाला निकाल कर बैठी हैं। सीने से एक ऐसी हूक उठी, एक ऐसी आह निकली, जो लफ्ज़ों के सारे व्याकरण को तोड़कर बिखर गई, वाह री किस्मत! तूने रुलाया भी तो इतने गहरे और ज़हरीले व्यंग्य के साथ कि रोने वाले अभागे को अपनी इस बदकिस्मती पर भी रश्क आ जाए और ज़माना तालियाँ पीटकर कहे, ‘क्या कमाल का क्लाइमेक्स है!’

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – शॉर्टकट… ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता

☆ ☆ लघुकथा – शॉर्टकट… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(यह लघुकथा कुछ वर्ष तक पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड की पाठ्य पुस्तक में शामिल रही)

– भाई साहब , ज़रा रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए कोई शाॅर्टकट…

– शॉर्टकट तो है पर …

– पर क्या ? जल्दी बताइए न ।

– आप उस रास्ते से नाक पर रूमाल रख कर और दीवारों का सहारा लेकर पांव रखकर ही जा सकोगे । आपको लगेगा कि अब गिरे… अब कीचड़ में फंसे… कब जाने … क्या हो जाए …

– शॉर्टकट की ऐसी हालत क्यों ?

– क्योंकि आपकी तरह हर कोई शॉर्टकट ही इस्तेमाल करता है । बड़े रास्ते से होकर , चक्कर काट कर कोई जाना नहीं चाहता । पर ठहरिए…

– हां , कहिए ।

– बुरा तो नहीं मानेंगे ?

– अरे भाई जल्दी कहो न । मुझे गाड़ी पकड़नी है । छूट जाएगी ।

– …यही बात ज़िंदगी पर लागू नहीं होती ?

– सो कैसे ?

– अब देखो न । सफलता की गाड़ी हर कोई पकड़ना चाहता है और इसके लिए हर आदमी शॉर्टकट अपना रहा है । चाहे शॉर्टकट कितना ही…

– बस । बस । अपने उपदेश अपने पास रखो । जनाब मुझे भी सफलता चाहिए ।

– तो चलते चलते इतना तो सुनते जाइए कि मेहनत का कोई शॉर्टकट इस दुनिया में नहीं है ।

 

© श्री कमलेश भारतीय

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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