हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५१ ☆ लघुकथा – आत्ममुग्ध… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “आत्ममुग्ध“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५१ ☆

✍ लघुकथा – आत्ममुग्ध… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

संतोष जी को अपने अलावा किसी के अस्तित्व की जानकारी ही नहीं थी, ऐसा लगता था। तारीफ करते तो अपनी या अपनी संतान की जैसे किसी और की तो औलाद होती ही नहीं। उनकी नज़र में कोई कुछ नहीं जानता है सिवाय उनके। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं कि सुनने वाले पर क्या असर पड़ता है। बस अपनी बात कहने और सामने वाला कुछ कहने को उद्यत हो तो उसे रोक देते। फिर अपनी बात पूरी करके सामने वाले से तपाक् से हाथ मिला कर चल देते। साथ ही चलते चलते  एक सप्ताह का अपना कार्यक्रम बताते जाते कि किस किस बड़े आदमी के साथ किस दिन क्या कार्यक्रम है,  क्योंकि प्रसिद्ध व्यक्तियों से उनकी गहरी मित्रता रहती है।

सामने वाले सज्जन अवाक् रह गए।  न कुछ कहते बना और न कुछ सोचते । ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी मंच पर विराजमान थे। उसी कार्यक्रम में उनके एक सहयोगी शशिकांत भी उपस्थित थे जो उन्हीं की रैंक से रिटायर हुए थे परंतु नौकरी की शुरुआत में वे संतोष जी से जूनियर साथी रहे थे। कार्यक्रम के मध्याह्न में  शशिकांत जी अपने एक मित्र के साथ वॉशरूम जा रहे थे तो संतोष जी मिल गए और मित्र का संतोष जी से अच्छा परिचय था तो उन्होंने शशिकांत जी का परिचय कराना चाहा तो संतोष जी तपाक् से बोले , “हाँ हाँ मैं शशिकांत को जानता हूँ, ही वाज़ माय जूनियर” और वाशरूम में घुस गए। शशिकांत जी ने महसूस किया कि संतोष जी को अपना सीनियरपन याद है पर उनकी प्रोन्नति नहीं, पद भी नहीं। नहीं याद है तो कहने की क्या आवश्यकता थी।

ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी को कुछ कहने का अवसर मिला तो अपनी  बात के समर्थन में किसी ग्रंथ, किसी विद्वान को उद्धृत न कर अपनी ही कविता या अपनी किसी उपलब्धि की कहानी उद्धृत करते रहे।  उनकी आत्ममुग्धता पर उपस्थित जन कनखियों से एक दूसरे की ओर देखते हुए मुग्ध होते रहे।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०० – नई ऊर्जा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नई ऊर्जा।)

☆ लघुकथा # १०० – नई ऊर्जा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सीता जल्दी-जल्दी अपने कदम बढ़ा रही थी मंदिर की ओर तभी उसके मन में ख्याल आता है कि एक बार अपनी पूजा की थाली को देख लूं सब सामान बराबर रखी हूँ।

अरे! भगवान मुझसे गलती हो गई फूल रखना भूल गई?

वह सोचने लगती है। भगवान को जल चढ़ाऊंगी अक्षत चढ़ाऊंगी टीका लगाऊंगी आरती भी करूंगी पर फूल नहीं, तो अच्छा नहीं लगेगा तभी अचानक उसे सामने एक फूल वाला बैठे दिखता है।

“भैया फूल ₹5 के दे दो?”

“मेरा नाम मोहन है, मैं कोई भैया दूध वाला नहीं हूं?”

सीता ने गुस्से में कहा- “ओ मोहन ₹5 के फूल दे दो?”

मोहन ने कहा- “₹5 के फूल नहीं मिलेंगे?”

सीता ने कहा- “अरे! मुझे दो-चार फूल ही चाहिए है? कोई बात नहीं ₹10 के दे दो?”

मोहन सभी फूलों को एक कागज में रखता है।

सीता ने कहा- “ये लाल गुड़हल के २ फूल दो न? गौरी माता को जोड़ा फूल चढ़ाने की मन में इच्छा है।”

मोहन ने कहा – “मैडम यह फूल तो ₹5 का एक मिलता है एक फूल आपको दे रहा हूँ।”

सीता ने कहा – “फूल बेचने बैठे हो या सोना बेच रहे हो। अच्छा सुबह-सुबह मेरा दिमाग मत खराब करो,मुझे पूजा करना है।”

सीता मंदिर में प्रवेश करती है और भगवान शिव की पूजा करती है उन्हें फूल चढ़ाती  है और सामने जब माँ गौरी के चरणों में जल चढ़ाती है और सिंदूर चढ़ाने के बाद जब वह फूल चढ़ाने लगती है तो देखी है कि उसके हाथ में दो फूल आ जाते हैं उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता और वह मां को श्रद्धापूर्वक नमन करती है और आरती पूजा करती है।

 मंदिर में भगवान के सामने बैठकर वह सोचती है, भगवान से जो मांगो वह मिलता है माता तुम तो सब जानती हो जिस तरह दो फूल दिए हैं। इस तरह मेरी गोद भी भर देना।

दुनिया के तानों से अब मेरा मन भर गया है और सीता के मन में एक नई ऊर्जा का संचार होता है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५३ – ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५३ ☆

🌻लघु कथा🌻ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड 🌻

सभी कहते हैं सोशल मीडिया ने रिश्ता तो खतम ही कर दिया अब तो भगवान भी दिन भर छाये रहते हैं।

पोस्टर बना बना भेज दिये। अब डिलीट करने वाला मोबाइल को सिर माथे लगा रट सपाट सभी ऊँगलियाँ चला डिलीट करते चलते हैं।

भला हो उस मेसेज का अभी कुछ दिनों से बंद है – – 👉 ये मेसेज दस लोगों को भेजों नहीं तो अनर्थ हो जायेगा।

बात करते हैं शादी ब्याह के सुंदर- सुंदर कार्डों का। किटी आयोजन में भरपूर उपयोगिता 😊

अपने दादा जी के साथ चाचा का कार्ड बाँटते बच्चा बड़ा खुश हो रहा था। घर आते ही कहने लगा इसमें मेरा नाम लिखा है आंटी पढिये।

यहाँ से वहाँ तक पूरा कार्ड अंग्रेजी के अक्षरों से भरा। हमें तो अंग्रेजी आती नहीं है।

भोले पन से बच्चे ने हिन्दी पर लिखें अक्षरों को दिखाते कहा – – ये है न हिन्दी आप पढ़ लिजियेगा।

और धीरे से कान के पास आकर बोला–गणपति बप्पा को भी अंग्रेजी कहाँ आती है। इसलिये उनका नाम बस हिन्दी में लिखा गया है।

सौ टके की बात कहते मासूम से बच्चे की मासूमियत पर ह्रदय सोचने पर मजबूर हो गया।

पूरे कार्ड में गणपति वंदन हिन्दी में लिख कर बाकी पढ़ने वाले भी उसी दो लाईन को पढते है बाकी तो इधर की जुबानी कुछ उधर की जुबानी।

हाँ कार्ड मिल गया।

ढेरों बधाईयाँ 💐💐

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९२ – कारा… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कारा…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९२ कारा  ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

दोनों कहते थे पिंजड़े में बंद उनका तोता उनके प्रेम का साक्षी है। तोते को दिखा कर वे हाथ पर हाथ रखते और कभी एक दूसरे को चूम लेते थे। तोता पिंजड़े में जैसे उनका यह प्रेम देख कर नाचने लगता था। आवाज़ तो वह खूब लगाता था। पर तोता एक दिन पिंजड़ा तोड़ कर उड़ गया। दोनों समझ रहे थे तोता उनके प्रेम का मोहताज नहीं था। वह भी एक जीव है। उसका अपना प्रेम कहीं और है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

26 — 01 — 2026 

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज के संजय” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज के संजय” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है। महाभारत के युद्ध की दोनों सेनायें अपने अपने शिविरों में लौट रही हैं। रथों के घोड़े हिनहिना रहे है। कौन आज युद्ध में वीरगति पा गये और कौन कल तक बचे हुए हैं। संजय यह आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। महाराज व्यथित होकर दिन भर का हाल सुन रहे हैं। गांधारी भी पास ही बैठी हैं।

वह एक युग था। तब संजय जन्मांध धृतराष्ट्र को युद्ध का हाल बताने के लिए मिली दिव्य शक्ति से सब वर्णन करते थे। कहा जा सकता है कि उस युग के पत्रकार थे संजय।

अब युग बदल गया। इन दिनों चुनाव की महाभारत है। महाभारत अठारह दिन चली थी लेकिन यह चुनाव प्रचार की महाभारत पूरे इक्कीस दिन चलती है। यहां किसी एक संजय को दिव्य शक्ति नहीं दी जाती। यहां तो सैंकड़ों संजय हैं जो ‘वीडियो’ नाम की दिव्य शक्ति लेकर आये हैं और कुछ भी वायरल कर देने की शक्ति रखते हैं! मनचाहा वीडियो बना कर सारा आंखों देखा हाल सुनाने में जुटे हैं। संजय तो एक राष्ट्रीय पत्रकार था और राष्ट्र की सेवा में जुटा था। निष्पक्ष! निरपेक्ष! ये आज के युग के संजय तो निष्पक्ष और निरपेक्ष नहीं। इन्हें तो रोटी रोटी कमानी है, अपनी गृहस्थी चलानी है। मनभावन शौक पूरे करने हैं। खाना पीना है और वह दिखाना है जो सामने वाला चाहता है लेकिन इसकी एक निश्चित कीमत है! जो चुकाये वह पा मनचाहा पा ले! नहीं चुकाये तो हश्र भुगते!

ये कैसे संजय हैं?

ये कलियुग के महाभारत के संजय हैं! जो अंधे लोगों को युद्ध का हाल नहीं सुनाते बल्कि ऐसा हाल सुनाते हैं कि आंखों वालों को ही अंधा बना रहे हैं! आप इन्हें पहचानते हैं?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – नेम प्लेट… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नेम प्लेट

? लघुकथा – नेम प्लेट ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

रात के खाने के बाद घर के सभी सदस्य इकट्ठे बैठे. पति, पत्नी, बेटा, बेटी और दूर कोने में कुर्सी पर बैठी उदासीन, स्वयं को उपेक्षित मानती मां. नया घर पूरा बन चुका था और अब उसके नाम के बारे में चर्चा चल रही थी.

“आशियाना” नाम कैसा रहेगा? बेटी उत्साह से बोली.

“कोई नया नाम सुझाओ… वैसे “ उपवन “ कैसा रहेगा..? बेटा उत्साह से बोला.

“अच्छा, “ हार्मनी “ या “ हरसिंगार “ कैसा रहेगा…? पत्नी ने अपनी राय रखी.

“दोनों अच्छे हैं. लेकिन मैं सोच रहा हूं पिताजी के नाम पर अगर” घनश्याम कृपा” रखा जाए तो कैसा रहेगा..? पति ने भी अपना सुझाव दिया.

सर्वसम्मति से इस नाम को स्वीकृति दे दी गई.

पति के जाने के बाद मां धीरे-धीरे स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगीं थीं जैसा अक्सर होता है. आजकल तो वे डाइनिंग रूम के कोने में कुर्सी पर बैठी रहतीं और वहीं पर खाना मांग लेती. शेष समय तो अपने कमरे में ही पड़ी रहतीं. बहू बेटे ने उन्हें कितनी ही बार समझाया कि शाम के वक्त आप सोसायटी में जहां बुजुर्ग बैठकर बतियाते, हंसते, गपशप, मनोरंजन करते हैं उनके पास जाकर बैठ जाया करें. आपका भी दिल बहल जाया करेगा लेकिन वह इस बात को मानने को तैयार ही नहीं थीं. उन्हें लगता उनसे दो घड़ी बातें करने के लिए किसी के पास वक्त नहीं था. सभी अपने अपने कार्यों में उलझे रहते हैं. कितनी ही बार पति की फोटो देखकर शिकायत करने लगतीं-“ मुझे बीच मँझधार में छोड़कर आप तो चले गए. कितनी अकेली रह गई हूं मैं आपके बिना… किसी को फुर्सत नहीं मेरे पास बैठने की, बातें करने की… ”

नेम प्लेट बनकर आ गई. काले रंग पर सुनहरे अक्षरों से “घनश्याम- रमा कृपा“ के चारों तरफ बेल बूटों से बनी हुई अत्यंत आकर्षक और सुंदर नेम प्लेट देखकर घर के सभी सदस्य चहक उठे.

सबके देख चुकने के बाद नेम प्लेट को लेकर पोती दादी के पास गई और बोली – “ देखो दादी अपने नए घर की नेम प्लेट, दादू और आपके नाम पर. है न सरप्राइज़… “

मां ने नेम प्लेट हाथ में ली एकटक उसे निहारती रहीं. फिर ना जाने क्या हुआ कि उसे आंखों से लगाकर लगातार चूमने लगीं. उनकी आंखों से निरंतर आंसुओं की झड़ी लग गई जिसमें बच्चों के प्रति उनके मन में जबरन पनपते उपेक्षा, अनगिनत शिकायतों, तिरस्कार के भाव धुलने लगे थे. आंखों में छाई धुंध भी छंटने लगी थी.

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७९ – कहानी – साहब की घड़ी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय कहानी – साहब की घड़ी)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७९ – कहानी – साहब की घड़ी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

इस देश में समय का हाल वही है जो किसी सरकारी अस्पताल के वेंटिलेटर का—धड़कन चल रही है, पर भरोसा किसी को नहीं। लोग कहते हैं ‘समय बीत रहा है’, जबकि सच्चाई यह है कि हम बीत रहे हैं और समय हमें किसी पुराने अखबार की तरह रद्दी के भाव तौल रहा है।

एक महाशय थे, जो ‘पंचवर्षीय योजनाओं’ की तरह अपना भविष्य बुन रहे थे। उन्हें गुमान था कि वे समय के सारथी हैं। वे हाथ में ऐसी ‘स्मार्ट’ घड़ी बाँधते थे जो उनके दिल की धड़कन से लेकर उनके बैंक बैलेंस तक का हिसाब रखती थी। पर उस दिन मामला ‘ऊपर की अदालत’ का था। सुबह-सुबह उनके घर के बाहर एक आदमी आकर बैठ गया, जिसके चेहरे पर वैसी ही शांति थी जैसी किसी घोटाले की फाइल दब जाने के बाद किसी मंत्री के चेहरे पर होती है।

साहब ने पूछा, “कौन हो भाई? यहाँ क्यों धरना दे रखा है?” वह बोला, “हुजूर, मैं समय का पटवारी हूँ। आपकी सांसों का खसरा-खतौनी जाँचने आया हूँ। सुना है आप वक्त को मुट्ठी में करने की फिराक में हैं?”

साहब बिफर पड़े, “अबे, जा यहाँ से! हम वर्तमान के मालिक हैं और भविष्य के सट्टेबाज।” पटवारी मुस्कुराया—वैसी ही मुस्कान जैसे शेर शिकार को देखकर ‘शाकाहार’ पर प्रवचन देने से पहले देता है। वह बोला, “मालिक, आप तो ‘धोबी के कुत्ते’ वाली स्थिति में हैं। वर्तमान आपको पहचानता नहीं और भविष्य ने अभी गोद लिया नहीं। आप तो बस उस ‘त्रिशंकु’ की तरह लटके हैं जो सोचता है कि स्वर्ग जा रहा है, पर असल में ग्रेविटी का शिकार है।”

शहर में शोर मच गया कि साहब का ‘वक्त’ रुक गया है। साहब ने सेल बदला, घड़ी पटकी, यहाँ तक कि कैलेंडर के पन्ने भी फाड़ दिए। पर अजीब बात! बाहर सूरज ढल ही नहीं रहा था। चिड़ियाँ हवा में रुकी थीं और साहब की चाय का धुआं भी किसी ‘स्टैच्यू’ की तरह खड़ा था।

साहब को लगा कि वे अमर हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी को पुकारा, पर पत्नी की आवाज़ ऐसे फंसी थी जैसे किसी ‘बफटिंग’ करते हुए वीडियो की तस्वीर। वे समझ गए—यह वरदान नहीं, यह ‘सस्पेंस’ का चरम है। क्या वे मर चुके हैं? या खुदा ने उनके लिए समय का चक्का ‘हाफ-क्लच’ पर छोड़ दिया है?

तभी उस पटवारी की आवाज़ आई, “साहब, इसे कहते हैं ‘सन्नाटा’। जब इंसान खुद को वक्त से ऊपर समझने लगता है, तब वक्त उसे अपनी लाइब्रेरी की एक ऐसी किताब बना देता है जिसे कोई नहीं पढ़ता। आप अपनी ‘महिमा’ के विज्ञापन छापते रहे, और यहाँ समय ने आपकी ‘एक्सपायरी डेट’ पर अपनी मुहर लगा दी।”

साहब घिघियाने लगे, “कोई तो रास्ता होगा? कोई तो रिश्वत? कोई तो गॉडफादर?” पटवारी ने एक कागज़ निकाला और कहा, “रास्ता एक ही है। अपनी इस ‘मैं’ वाली घड़ी को उतारकर उस ईश्वर की खूँटी पर टांग दो, जो बिना सुइयों के ब्रह्मांड चला रहा है। वरना आप ‘माया मिली न राम’ वाले मुहावरे का जीता-जागता विज्ञापन बन जाएंगे।”

साहब ने कांपते हाथों से अपनी स्मार्ट घड़ी उतारी। जैसे ही घड़ी ज़मीन पर गिरी, अचानक सब कुछ तेज़ी से घूमने लगा। सूरज बिजली की रफ़्तार से डूबा और उगा। साहब को लगा कि अब वे बच गए, अब वे भविष्य की गोद में हैं।

हवा चली, सन्नाटा टूटा। साहब ने चैन की सांस ली और अपने चेहरे पर हाथ फेरा। पर हाथ को चेहरा मिला ही नहीं! सामने वही पुराना पटवारी खड़ा था, जो अब हाथ में एक झाड़ू लिए फर्श साफ कर रहा था।

साहब ने चीखकर पूछा, “मैं कहाँ हूँ? मेरा भविष्य कहाँ है?” पटवारी ने इत्मीनान से जवाब दिया, “साहब, आप भविष्य की चिंता कर रहे थे, जबकि आप पिछले दस मिनट से एक ‘संस्मरण’ बन चुके हैं। अभी जो आपने जीया, वह आपकी आत्मा का ‘एक्जिट पोल’ था। अब आप न वर्तमान में हैं, न भविष्य में। आप बस इस कहानी का एक ‘फुल स्टॉप’ हैं, जिसे पाठक पढ़कर पन्ना पलटने वाला है।”

साहब गायब थे। कुर्सी खाली थी। घड़ी टूट चुकी थी। और ऊपर बैठा वह ‘महान मुनीम’ अपनी डायरी में लिख रहा था—”एक और गया, जो समझता था कि अलार्म लगाने से सूरज उसके इशारे पर जागता है।”

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आग ? ?

दोनों कबीले के लोगों ने शिकार पर अधिकार को लेकर एक-दूसरे पर धुआँधार पत्थर बरसाए। बरसते पत्थरों में कुछ आपस में टकराए। चिंगारी चमकी। सारे लोग डरकर भागे।

बस एक आदमी खड़ा रहा। हिम्मत करके उसने फिर एक पत्थर दूसरे पर दे मारा। फिर चिंगारी चमकी। अब तो जुनून सवार हो गया उसपर। वह अलग-अलग पत्थरों से खेलने लगा।

वह पहला आदमी था जिसने आग बोई, आग की खेती की। आग को जलाया, आग पर पकाया। एक रोज आग में ही जल मरा।

लेकिन वही पहला आदमी था जिसने दुनिया को आग से मिलाया, आँच और आग का अंतर समझाया। आग पर और आग में सेंकने की संभावनाएँ दर्शाईं। उसने अपनी ज़िंदगी आग के हवाले कर दी ताकि आदमी जान सके कि लाशें फूँकी भी जा सकती हैं।

वह पहला आदमी था जिसने साबित किया कि भीतर आग हो तो बाहर रोशन किया जा सकता है।

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९८ ☆ लघुकथा – “जानूमेट” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९८ ☆

?  आलेख – लघुकथा – जानूमेट ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

करीने से सजे ड्राइंग रूम के एक कोने पर अपनी राकिंग चेयर पर आगे पीछे डोलते हुए राजन एल्बम के पन्ने पलटते और खुद ही मुस्कराने लगते ।

तभी जुनू आई और इस तरह उन्हें मुस्कुराते देख बोलीं, क्या हुआ जानू, राजन बोले आई लव यू।

पिछले पैंतीस सालों के वैवाहिक जीवन में यह वाक्य हजारों बार जुनू और उनके जानू राजन के बीच संवाद, समझ, और प्यार व्यक्त करता ही रहा है।

नाश्ते के पहले अपनी दवा निकालते हुए डिब्बे पर छपा नाम जानुमेट 500 देख रंजन हमेशा मुस्कुरा देता था। जानूमेट। जैसे डाक्टर ने बीमारी की दवा नहीं, रिश्ते का नाम दे दिया हो। जब पहली नार्मल चेकअप में उसका शुगर लेवल अधिक आया था, तो मन में डर था, भविष्य का, परहेज का ।

डॉक्टर ने सहज स्वर में कहा था हर भोजन के साथ एक जानूमेट500, जीवन भर।

जीवन भर शब्द ने राजन को भीतर तक हिला दिया था, लेकिन जानूमेट ने उसे थाम लिया।

अब दिन के खाने की शुरुआत घड़ी से नहीं, जानूमेट से होती थी। नाश्ते की प्लेट लगे या देर हो जाए, उसका ध्यान पहले छोटी सी इस गोली पर जाता। जेब में, पर्स में, दराज में, कार में, हर जगह उसकी मौजूदगी रहती। जैसे कोई प्रेमी बिना बोले याद दिलाता रहे कि लापरवाही मत करना। दफ्तर में मीटिंग लंबी हो जाए तो वह घबराता नहीं था, बस जेब टटोलता था। जानूमेट है न।

धीरे धीरे उसने देखा कि दवा ने उसके भीतर एक अनुशासन जगा दिया है। वह समय पर खाने लगा, पैदल घूमने जाने लगा, मीठे से दूरी रखने लगा। हर तीन महीने में जांच करवाना अब मजबूरी नहीं, जिम्मेदारी बन गई थी। रिपोर्ट आते ही वह पहले खुद को देखता, फिर जानूमेट के डिब्बे को। जैसे कह रहा हो देखा, तुम्हारा साथ ।

कभी कभी उसे लगता यह गोली उससे ज्यादा फिक्र करती है उसकी। जब वह थक कर सब कुछ भूल जाना चाहता, तब जानूमेट उसे रोक लेती। जब वह कहता एक दिन न लेने से क्या होगा, तब जानूमेट चुपचाप आईने में उसका भविष्य दिखा देती। कोई डांट नहीं, कोई शोर नहीं, बस खामोश मौजूदगी।

एक दिन उसकी बेटी ने मुस्कुराकर पूछा, पापा ये जानूमेट क्या है। उसने हंसते हुए कहा, यह मेरी जानू है। जो मुझे हर दिन याद दिलाती है कि खुद से प्यार कैसे किया जाता है। बेटी ने चौंक कर देखा, फिर समझ गई। उसने डिब्बे को आदर से उठाया, जैसे परिवार का कोई सदस्य हो।

शुगर की बीमारी ने उसे जो सिखाया, वह किसी प्रवचन में नहीं था। जीवन की देखभाल भी एक प्रेम है, बस उसमें, नियमित जांच होती है। जानूमेट ने उसे यह प्रेम करना सिखा दिया था। बिना शिकायत, बिना शर्त, हर भोजन के साथ। अपनी जिंदगी में जुनू और जानूमेट के अनुप्रास पर वह बरबस एक बार फिर मुस्करा पड़ा ।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३७ – बाल कहानी – जबान फिसली – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय बाल कहानी — जबान फिसली की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३७

☆ बाल कहानी — जबान फिसली ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

बेक्टो नींद में था. तभी जबान ने पूछा, ” आप  मुझे जानते हो? मैं कौन हूं?”

यह सुन कर बेक्टो हंसा, ”  आप को कौन नहीं जानता है. आप हमारी जबान हो. आप को  जिह्वा भी कहते हैं.”

” बिलकुल ठीक कहा बेक्टो , ” जबान बोली, ” मगर, आप यह नहीं जानते हो कि  मैं एक मांसपेशी हूं. भले ही आप ने मुझे एक नाम दे दिया हो. मगर, मैं  कहलाती हूं एक मांसपेशी.”

बेक्टो को यह पता नहीं था. जबान एक मांशपेशी है. वह खुश हो कर बोला, ” मुझे आज मालुम हुआ कि आप एक मांसपेशी हो.”

तब जबान ने कहा, ” मैं शरीर की सब से मजबूत मांसपेशी हूं. केवल एक जगह जुड़ी रहती हूं. मगर, काम बहुत करती हूं. जब चलती हूं तो अच्छेअच्छे की छूटी कर देती हूं. मेरी वजह से कई लोग मार खा जाते हैं. मेरे मुंह के आसपास जो दांत देख रहे हो. ये बहुत मजबूत होते है.

” जब मैं चलती हूं तो लोग इन्हें भी तोड़ डालते हैं. मैं इन मजबूत दांतों के बीच आराम से रह लेती हूं. यह बात दूसरी है कि ये मजबूत दांत कभीकभी मुझे भी खा जाते हैं. इस कारण मेरे अंदर घाव हो जाता है. मगर, मैं इस घाव को जल्दी भर देती हूं.”

जबान बोले जा रही थी. बेक्टो ने कहा, ” अपने मुंह मियां मिटठु मत बनो. यह अच्छी बात नहीं है.”

जबान को इस मुहावरे का अर्थ मालुम था. उस ने कहा, ” अरे हां. मैं तो भूल ही गई कि मैं मांसपेशियों के बारे में बता रही थी. मैं अपने मुंह अपनी ही प्रशंसा करने लगी. इसे ही अपने मुंह मिया मिटठू बनना कहते हैं.”

” खैर जाने दो.” जबान ने कहना शुरू किया, ”आप के पूरे  शरीर में 600 तरह की मांसपेशियां होती हैं. इन्हीं की वजह से शरीर को गति और ऊर्जा मिलती है. मुंह से बोलना हो या खाना चबाना सब में मेरा उपयोग होता है. यदि शरीर में मांसपेशियां न हो तो आप लोग जिंदा नहीं रह सकते हो. यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे.”

” क्या  ! ” बेक्टो को यह मालुम नहीं था. वह चौंक उठा, ” बिना मांसपेशी के हम जिंदा नहीं रह सकते हैं ! ” उस की आंखे फेल गई.

” हां, ”  जबान ने कहा, ”  आप के हृदय और फेफड़े भी मांसपेशियों के बने होते हैं. जिन की वजह से आप पूरे शरीर में खून पंप कर पाते हो. सांस लेना इन्हीं की वजह से संभव है. यदि ये मांसपेशियों के न बने होते तो आप जीवित न होते.

” शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं मांसपेशियों से बना होता है. जब आप मुस्कराते हो तो चेहरे पर प्रसन्नता के भाव इन्हीं मांसपेशियो की वजह से आता है. यदि ये काम न करें तो तुम मुस्करा नहीं पाओ. रोने में इन्हीं का हाथ होता है. लिखने में इन्हीं के कारण आप लिख पाते हो. यानी हरेक काम जो आप करते हो सभी में इन का हाथ होता है ?”

” तब तो हम सब काम अपनी मरजी से इन्हीं मांसपेशियों की वजह से करते हैं ?”

” नहीं नहीं, ” जबान झट से कैंची की तरह चलती हुई बोली, ” कुछ मांसपेशियां ऐसी होती है जो स्वयं संचालित होती रहती है. उन्हें किसी के द्वारा चलाने की आवश्यकता नहीं होती है. इन्हें अस्वैचिछक मांसपेशिया या स्वचलित मांसपेशियां कहते हैं. जैसे हृदय का धड़कना और फेफड़े का खून पंप करना. ये काम स्वत: होते रहते हैं. इन्हें हम स्वयं नहीं करते हैं. इसलिए इन्हें स्वसंचालित या अस्वैच्छिक मांसपेशियां कहते हैं.

” कुछ मांसपेशियां हमारी मरजी से चलती है. जैसे अभी तुम कुछ सोच रहे हो. इस के पहले मुझसे कुछ पूछ रहे थे. ये कार्य तुम्हारी द्वारा नियंत्रित हो रहा था. इसलिए इस तरह के कार्य करने वाली पेशियों को स्वैच्छिक पेशी कहते हैं. इस पर आप का नियंत्रण होता है.”

जबान अभी कुछ कहना चाह रही थी. दांत को उस का बोलना अच्छा नहीं लगा. उस ने उसे रोकना चाहा,  ” ज्यादा बोलना अच्छा नहीं रहता है ,” मगर, जबान कब मानने वाली थी. वह जब एक बार चलना शुरू हो जाती है तो बंद नहीं होती है. इसलिए कहते हैं कि जबान बहुत ज्यादा चलती है.

” अब चुप हो जा ! ” दांत ने उसे ललकारा. मगर, जबान बंद नहीं हुई. इस पर दांत ने जबान को काट लिया . उस पर घाव हो गया. वह चुप हो गई.

इस वक्त बेक्टो सोया हुआ था. उसे जोर का दर्द हुआ. वह उठ बैठा. उस ने देखा कि उस की जबान दर्द कर रही थी. उस ने जबान मुंह से बाहर निकाल कर देखी. उस पर घाव था. सोते समय वह अपनी जबान स्वयं काट चुका था.

बेक्टो तुरंत बैठ गया. वह एक अच्छे सपना देख चुका था. इसलिए वह बहुत खुश था.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

27/03/2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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