(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– आत्म कथ्य…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ८४ — आत्म कथ्य —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
मैं अपनी इस उम्र तक विद्वानों की अपेक्षा ग्रामीण अशिक्षितों के बीच अधिक रहा हूँ। उनसे मिली हुई भाषा मेरे लेखन की आत्मा है। मैं जानता हूँ उनके मुहावरे मैं आधे ही समेट पाया हूँ। उनका रोदन हो, हँसी हो मैंने तो उनसे पूछ पूछ कर लिया है। मेरा एक अनपढ़ मित्र कहता था सब ले कर अचार बनाओगे क्या? वह न जानता अपने इस प्रश्न से उसने मुझे तो एक मुहावरा दे दिया। मैंने यह बड़े चाव से लिखा है।
☆ लघुकथा ☆ 🇮🇳 जय हिंद की सेना 🇮🇳 ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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( लघुकथा )
बिटिया बिलख बिलख कर रोये जा रही थी। जबसे शहीद पिता के शव के गांव पहुंचने की खबर मिली, उसके आंसू थमने के नाम ही नही ले रहे थे।
मां का तो और भी बुरा हाल था। वह दहाड़े मारकर जमीन पर लोटलोट कर रो रही थी। उसके जीवन की गाड़ी थम गई थी। चूड़ियों के खनक गुम हो गयी थी।
पिछले महीने हवलदार जगदेव जब छुट्टी में गाँव आये थे तो अपनी घरइतीन सुखमणि से अपनी एकलौती बिटिया के हाथ पीले करने की चिंता, और उसके लिए एक सुयोग्य वर ढूंढने की बात करते-करते उनकी पूरी रात गुजर गई थी। अपने माई और बाबूजी के बीच हुई चर्चा को, सुमन ने जब से सुना न जाने क्यों उसके दिल में उसके सपनो के राजकुमार के आने की धमक सुनाई देने लगी थी।
लेकिन आज सब कुछ शांत था। न किसी पति-पत्नी के मध्य कोई चर्चा थी न किसी बेटी के दिल में किसी के आने की धमक थी। बस था तो सिर्फ सिर्फ एक कारूणिक मंजर, जहां एक शहीद का शव एक तख़्त पर लिटाया गया था। गांव के हर एक व्यक्ति की आंखों में उस शहीद का चेहरा चमक रहा था लेकिन खुली आंखों से देखने के शव के साथ उसका चेहरा मौजूद नहीं था।
सेना की टुकड़ी के द्वारा मातमी धुन बजायी जा रही थी। बंदूको से सलामी दिए जाने की रस्म पूरी हुई तो सुमन ने रोते रोते अंजुली भर फूल पिता के चरणों में रख दिए।
शव को अपने साथ ले आने वाले कैप्टन राघवेंद्र यह सब कुछ देख रहे थे। भीड़ में खड़ी एक बुजुर्ग महिला ने जब रोते -रोते यह कहा कि अब जगदेव की बिटिया के लिए वर कौन ढूढ़ेगा। उसके हाथ पीले कब होंगे, बगल में खड़े कैप्टन राघवेंद्र के मन में करुणा और मानवता के बादल उमड़ने लगे। सुमन अपने पिता के शव को देखकर दहाड़े मारकर रो रही थी और बेहोश हुए जा रही थी। एक बार तो ऐसा लगा कि सुमन पूरी तरह से बेहोश होकर जमीन पर गिर जाएगी लेकिन बगल में खड़े कैप्टन राघवेंद्र ने उसका हाथ थाम लिया। बेहोश सुमन को कैप्टन के मजबूत बाहों ने जमीन पर गिरने से रोक लिया।
कैप्टन राघवेंद्र के दिल में उमड रहे मानवता और करुणा के बादल शांत नदी के नीर के रूप में बदल गए थे। यहां से उनके मन में चिंतन प्रारंभ हो गया था।
इस दर्दनाक घटना के बीते कई महीने गुजर गए। आज बहुत दिनों बाद शहीद हवलदार जगदेव के घर पर मातमी धुन की जगह शुभ मंगल शहनाई की धुन बज रही थी। बरात शहीद के घर की तरफ पहुंची, तो भीड़ में खड़ा हर कोई व्यक्ति दूल्हे के चेहरे को देखना चाहता था।
पर यह क्या !! आज गाँव का हर कोई यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित और खुशी से झूम रहा था जब कैप्टन राघवेंद्र फौजी वर्दी में नहीं बल्कि दूल्हे के वेश में सुमन का हाथ था में जयमाल मंडप की तरफ बढ़ रहे थे।
लोगो ने जब अपनी स्मृतियों को खंघाला तो उन्हें बीते दिनों का वह दृश्य दिखाई दे रहा था, जब दूल्हे के वेश में खड़े इस नौजवान ने फौजी के वेश में बेहोश होकर जमीन पर गिर रही सुमन का हाथ थामा था।
बटालियन की वही टुकड़ी आज एक बार फिर शहीद हवलदार जगदेव के दरवाजे पर बाराती के भेषभूषा में खड़ी थी। लाल जोड़े में सजी सुमन ने कैप्टन राघवेंद्र के गले में वरमाला डाला तो कैप्टन राघवेंद्र ने एक जयमाला सुमन को भी पहना दिया। हवलदार जगदेव के दरवाजे पर खड़ी भीड़ ने भारत माता की जय के उद्घोष के साथ फूलों की वर्षा की तो कैप्टन राघवेंद्र और सुमन ने भी शहीद हवलदार जगदेव के चित्र पर पुष्पांजलि की। शहनाई की धुन बज रही थी। प्रत्येक दिशाओं में मंगल मंगल हो रहा था और एक अनोखा दृश्य उभर कर आ रहा था।
भारतीय सेना के एक जवान ने आज सीमा पर नहीं बल्कि समाज के बीच एक अलग मिसाल पेश करते हुए, सबका दिल जीत लिया था। सबकी नज़रें नम थी और सभी कैप्टन राघवेंद्र को हृदय से बधाई दे रहे थे।
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘आ अब लौट चलें। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५६ ☆
☆ लघुकथा – आ अब लौट चलें☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
वही धरती, वही आसमान, वही सूरज, चाँद वही। इधर- उधर उड़ते पक्षी भी वही, फिर क्यों लग रहा है कि कुछ तो अलग है? आसमान कुछ ज़्यादा ही साफ दिख रहा है, सूरज देखो कैसे धीरे- धीरे आसमान में उग रहा है, नन्हें अंकुर सा। पक्षियों की आवाज कितनी मीठी है? अरे! ये कहाँ थे अब तक? अहा! कहाँ से आ गईं इतनी रंग – बिरंगी प्यारी-प्यारी चिड़ियाँ?
वह मन ही मन हँस पड़ा। सब यहीं था, मैं ही शायद आज देख रहा हूँ ये सब! प्रकृति हमसे दूर होती है भला कभी? पेड़ – पौधों पर रंग- बिरंगे सुंदर फूल रोज खिलते हैं, हम ही इनसे दूर रहते हैं? जीवन की भाग – दौड़ में हम जीवन का आनंद उठाते कहाँ हैं? बस भागम -भाग में लगे रहते हैं, कभी पैसे कमाने और कभी किसी पद को पाने की दौड़, जिसका कोई अंत नहीं? रुककर क्यों नहीं देखते धरती पर बिखरी अनोखी सुंदरता को? वह सोच रहा था —–
– -अरे, खुद को ही तो समझाना है, हँसते हुए एक चपत खुद को लगाई और फिर मानों मन के सारे धागे सुलझ गये। कोरोना के कारण इक्कीस दिन घर में रहना अब उसे समस्या नहीं समाधान लग रहा था। बहुत कुछ पा लिया जीवन में, अब मौका मिला है प्रकृति की सुंदरता देखने का, उसे जीने का —–
अगली अलसुबह वह चाय की चुस्कियों के साथ छत पर पक्षियों से घिरा उन्हें दाना खिला रहा था। सूरज लुकाछिपी कर आकाश में लालिमा बिखेरने लगा था। उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान पहले कभी न आई थी।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय कथा कहानी – विज्ञापन व्यथा ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७२ – कथा कहानी – विज्ञापन व्यथा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
…यह घर अब घर नहीं रहा, यह तो उनकी ज़िंदगी की सड़ांध थी, जिसे बाज़ार के बिल्डर ने दो पन्नों के विज्ञापन से उनके मुँह पर फेंक दिया था। वे घबराकर फिर पन्ना पलट दिए। अब देश के मुख्य समाचार थे। लेकिन क्या ख़बरें? मन पर ज्वेलरी और घर के विज्ञापनों का नशा ऐसा तारी हो चुका था कि देश की लूट, नेता की बकवास, या कहीं हुए बड़े घोटाले की ख़बरें भी फीकी पड़ गईं। अब उन्हें लगा कि असली लूट तो उनके भीतर मची है, जो उन्हें पल-पल ख़ुद से दूर कर रही है। ऊपर लाल स्याही में लिखा था—आज धनतेरस पर ग्रहों का ऐसा योग बना है जो चार सौ साल बाद आया है। “ऐसे शुभ मुहूर्त को व्यर्थ न जाने दें, कुछ न कुछ ज़रूर खरीदें!” इस वाक्य ने श्रीधर बाबू के जले पर नमक नहीं, सीधे तेज़ाब डाल दिया। वे सोचने लगे, ‘क्या ख़रीदूँ?’ महीने के अंत में दीवाली आई है। जो थोड़ा-सा पैसा बचा था, वह घर की अनिवार्य पूजा सामग्री और तेल-बत्ती में चला गया। अब क्या ख़रीदें? शायद ‘चार सौ साल बाद’ वाले इस योग का मतलब यही है कि चार सौ साल तक श्रीधर बाबू जैसा आदमी कुछ नहीं ख़रीद पाएगा। यह शुभ मुहूर्त उनके लिए नहीं, उन विज्ञापन देने वालों के लिए आया था, जिनके ग्रह एकदम ‘उच्च’ चल रहे थे।
तभी अगले पन्ने पर नज़र गई। यह इलैक्ट्रॉनिक सामानों की पूरी बारात थी। मोबाइल, टीवी, फ्रिज… और टीवी? मत पूछिए। एक तो कमरे की दीवार के साइज़ का, दूसरा ऐसा जो सिर्फ़ बोलने से चलता है—जैसे मालिक से भी ज़्यादा होशियार हो। और दाम? श्रीधर बाबू, जो एक प्राइमरी स्कूल के मामूली टीचर थे, के लिए वह दाम मतलब उनकी साल भर की पगार थी। पगार नहीं, बल्कि उनकी आत्मा का मूल्य। लेकिन नीचे लिखा था, “आसान फ़ाइनेंस उपलब्ध, प्रोसेसिंग फ़ीस ज़ीरो, ब्याज ज़ीरो परसेंट!” बस! यहीं से श्रीधर बाबू के मन में शैतान जाग उठा। ज़ीरो परसेंट ब्याज! अगर वे एक शानदार टीवी फ़ाइनेंस पर ले लें तो! किश्तें भरते रहेंगे, कम से कम घर आने वाले पड़ोसियों को तो लगेगा कि आदमी का रुतबा है। वे मन ही मन हिसाब लगाने लगे—कितनी किश्तें होंगी, कितनी चाय बचानी पड़ेगी, बच्चों की कॉपी-किताब में कितनी कटौती करनी पड़ेगी। तभी उन्हें याद आया—बच्चों की पढ़ाई के नाम पर तो केबल कनेक्शन कब का कटवा दिया था! जब केबल ही नहीं है तो दीवार साइज़ के टीवी का क्या करेंगे? बस, वहीं खुली आँखों का सपना धड़ाम से टूट गया। उन्हें लगा, यह ज़ीरो परसेंट ब्याज नहीं है, यह तो उनकी बची-खुची ज़मीर को गिरवी रखने का ऑफर था। मन भारी हो गया, हाथ भी अखबार के अस्सी पन्नों के वज़न से दब गए।
उन्होंने दो-तीन पन्ने जल्दी-जल्दी पलटे। स्थानीय समाचार! पढ़कर क्या करेंगे? वही रोज़ की ख़बरें—लूट हुई, मर्डर हुआ, किसी नेता ने जनता को ‘महान’ बताया और किसी ने ख़ुद को ‘जनता का सेवक’। ये ख़बरें तो अब केवल विज्ञापनों के बीच का ‘फ़िलर’ बनकर रह गई हैं। फिर आया वह पन्ना, जहाँ शहर भर के बड़े और छुटभैये नेता अपनी फोटो चिपकाकर, हाथ जोड़कर खड़े थे। “धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ!” भले ही उनमें से कई तो खुलेआम गुंडे हों, जिन पर कई मुकदमे चल रहे हों। श्रीधर बाबू को हँसी आई, जो तुरंत ही कड़वाहट में बदल गई। उन्होंने सोचा, कोई इन नेताओं को समझाए कि ये जो शुभकामनाएँ छपवाते हैं, इनका पैसा भी देते हैं क्या? और कौन प्रभावित होता है इन शुभकामनाओं से? वे जो हीरे ख़रीद रहे हैं, या वे जो सीलन भरे मकान में सड़ रहे हैं? इन नेताओं के चेहरों पर जो नकली मुस्कान थी, वह भी एक विज्ञापन थी—ईमानदारी का विज्ञापन, जिसका स्टॉक बाज़ार में ख़त्म हो चुका है। कुल पचास से ऊपर पन्नों के इस अखबार में आधे से ज़्यादा में विज्ञापन थे। ख़बरें तो कहीं गायब थीं, और गायब थी अखबार की वह पुरानी स्याही की खुशबू, जो ज्ञान की गंध हुआ करती थी। अब इसमें से आती है सिर्फ़ विज्ञापन की भीनी महक, जिसका सरोकार ख़बरों से नहीं, सिर्फ़ पैसे से है, श्रीधर बाबू की जेब से है।
श्रीधर बाबू का मन बुरी तरह उचट गया। त्यौहार की सुबह-सुबह मन इतना भारी हो गया कि लगा जैसे उन्होंने धनतेरस पर सोना नहीं, अपनी सारी ख़ुशियाँ बेच डाली हैं। उन्हें लगा, हम सब इन विज्ञापनों के गुलाम हो गए हैं। हमारा वजूद बचा कितना है? इंसान की पहचान अब इंसानियत से नहीं, ब्रांड से होती है। बिना ब्रांडेड कपड़े के आदमी की औकात कौड़ी की है, भले ही उसमें इंसानियत कूट-कूट कर भरी हो। अखबार बंद करके श्रीधर बाबू ने उसे अलग रखा। पहले पन्ने के किनारे पर ऊपर में कीमत लिखी थी: कुल पृष्ठ ५२ + ८, मूल्य ५ रु। पाँच रुपए का यह कागज़, यह अखबार, आज आपको कितना ‘चूना’ लगा सकता है, सोचिए? यह सिर्फ पाँच रुपए का कागज़ नहीं था, यह उनकी पूरी आर्थिक और मानसिक हैसियत का आईना था। एक विज्ञापन! सिर्फ़ एक विज्ञापन आपके भीतर घुस कर बैठ गया तो? वह धीरे-धीरे आपके छोटे से सुखी संसार को चाटकर ख़त्म कर देगा। श्रीधर बाबू की आँखों में नमी थी। वे उस बिल्डर को, जौहरी को, और उस ज़ीरो परसेंट ब्याज को कोस रहे थे। लेकिन सबसे ज़्यादा वे उस पांच रुपए के अखबार को कोस रहे थे, जिसने एक ही सुबह में उन्हें उनकी गरीबी का इतना मार्मिक और पीड़ादायक अहसास करा दिया था।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – आत्मकथा
सुनो…
-हूँऽऽ…
-तुम आत्मकथा क्यों नहीं लिखते?
-क्यों लिखूँ? कोई नहीं पढ़ेगा मेरी आत्मकथा।
-बेवकूफ हो तुम। हॉट सेलर हैं आजकल आत्मकथाएँ। हॉं कंटेंट थोड़ा कंट्रोवर्सी वाला होना चाहिए। जो लोग विवाद लिख रहे हैं, खूब बिक रहे हैं।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ समवेदना – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆
सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
सई और सचिन, दोनों की ही पिछले चार-पाँच महीनों से भागदौड़ जारी थी। पूरा एक महीना तो बस योजना बनाने में ही निकल गया। दूल्हा-दुल्हन को लाभान्वित करने वाले विवाह का शुभ मुहूर्त तय होने के पश्चात् जब उन्हें ज्ञात हुआ कि, उस दिन उनका पसंदीदा सभागृह उपलब्ध है, तो उन्होंने उसका तत्काल आरक्षण कर लिया। अब उनकी असली भागमभाग की शुरुआत हुई।
बहुत पहले से ही उन दोनों ने अपनी लाड़ली इकलौती बिटिया का विवाह बड़ी धूमधाम से मनाने का फैसला कर लिया था – लेन -देन, बारातियों का आदर सम्मान जैसे अहम प्रश्नों के उत्तर समधी जी ने बड़े सलीक़े से दे दिए थे, सो उन दोनों के तनावग्रस्त मन को काफी राहत मिली थी। परन्तु अन्य साज सामान की खरीदारी, गहने, घरेलू सामान, पूजा की तैयारी, घर की सजावट एवं कई अन्य चीजें बाकी थी। उस पर निमंत्रण सूची पर काफी विचार-विमर्श चल रहा था, तब कहीं जाकर अंतिम फेहरिस्त तैयार होने वाली थी। ऐसे में निमंत्रण पत्रिका का चयन भी एक समय लेने वाली प्रक्रिया होती है। आने वाले समय में तो बस काम का अटल पहाड़ सामने उनके इंतजार में था। उन दोनों की अक्सर कई मुद्दों पर गहन चर्चा होती, कभी कभी थोड़ी गर्मजोशी से बहस होती, परन्तु इस जुगाली के अंत में जैसे उनमें मतैक्य हो जाता, वैसे इस बार भी वे कई मुद्दों पर सहमति बना चुके थे। विचारों के धागे उलट पलट कर उलझे तो थे लेकिन धीरे धीरे उनको सुलझाने के निरंतर प्रयास के कारण यह उलझन अंततः समाप्त हो गई, और प्रत्येक कार्य योजना के अनुसार मुकाम हासिल करता रहा।
जल्द ही निमंत्रण देने का सिलसिला भी ख़त्म हो गया। चाय- नाश्ते का पूरा ऑर्डर ही दिया गया था। अपने सगे सम्बन्धियों को भेंट करने के लिए उपहार पैक करके तैयार कर लिए गए। खाना बनाने एवं ऐन वक्त पर उभरने वाले तमाम आकस्मिक काम काज करने के लिए दो अतिरिक्त कामकाजी महिलाऐं भी गत आठ दिन से जुट गईं थीं। घर की सजावट शुरू हो चुकी थी। जहाँ विवाह संपन्न होने वाला था उस हॉल में ले जाने वाले सामान से भरे बैग पैक होकर तैयार थे—यानी सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं—दोनों में उत्साह की लहरें उमड़ रहीं थीं। उनकी उमंगों का ज्वार मानों उफान पर था। देखते देखते कल आने वाला गणेश और मातृका पूजन का दिन देहलीज पर खड़ा दस्तक दे रहा था।
तेजी से भागने वाले इतने दिनों तक अपनी बेटी के बिछोह के विचार से विचलित होने तक का समय भी नहीं मिल पाया था – परन्तु आज – आज इस घड़ी में, सिर्फ एक ही अनुभूति उसके मन को कचोट रही थी। – एक नन्हीसी कली जैसी उसकी मासूम बिटिया की हर बात, बढती उम्र के साथ बदलती हुई उसकी खिलखिलाती बाललीलाएँ, उम्र की एक एक दहलीज को पार करता उसका कली से फूल में रूपांतरण! फूल में परिवर्तित होते होते उसके बदलते हठ और मांगें! दूसरी तरफ जाने-अनजाने में वृद्धिंगत होती समझदारी, सब कुछ उसकी स्मृति में शीशे की तरह साफ़ दिखाई देने लगा सई को। नन्ही मासूम सलोनी याद आयी, पर याद करना हो तो भूलना पड़ता है। हालत यह थी कि, सलोनी के नन्हे-नन्हे प्यारे बचपन का एक भी पल वह बिसरी ही कहाँ थी, जो उसे याद करना पड़ता? उन यादगार लम्हों को भूलना वैसे भी असंभव ही था। नन्ही सलोनी की वजह से दोनों की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी—जो ज़िंदगी अब तक निरर्थक और उदास लगती थी, उसे एक नया अर्थ प्राप्त हुआ था। उनके जीवन को मानों एक नई दिशा मिल गई थी।
‘सलोनी’… कितना प्यारा और सुन्दर नाम सोचा था उन्होंने उसके लिए। वह नन्हीसी बच्ची थी ही वैसी! मनमोहक गुड़िया जैसी लुभावनी, मुस्कुराती- गेहुँआ रंग, बाएं गुलाबी गाल पर खिली एक छोटीसी डिंपल। बेहद खूबसूरत, पानीदार, भावभीनी मतवाली आँखें – पहली ही नज़र में उसने इन दोनों का मन मोह लिया था। उसे देखते बराबर ही दोनों ने तुरंत फैसला किया, कि वे अब अन्य बालकों का मुआयना नहीं करेंगे। उन्होंने आश्रम प्रबंधक को अपने फैसले की सूचना दी। कानूनी औपचारिकताएँ पूरी की गईं और वे दोनों उसे लाने के लिए कोजागिरी पूर्णिमा के दिन चले गए। मन पर सम्मिश्र भावनाओं का घना कोहरा छा गया था। भय – दबाव- उत्सुकता- बेचैनी – विषाद और मन ही मन उस मासूम बच्ची की असली माँ के लिए एक गहरी सहानुभूति- वह अभागी माँ कभी भी यह नहीं जान पाएगी कि उसके ही पेट से जन्मी उसकी लाड़ली बिटिया हमेशा के लिए कौनसे पराये लोगों के हाथों में पहुँच जाएगी। सई को इस वास्तविकता पर बहुत रंज हो रहा था- परन्तु इसका कोई इलाज नहीं था। आश्रम की यहीं शर्त थी।
—– आश्रम में पहुँचते बराबर सई ने उस नन्ही कली को गोद में उठा लिया और अनायास ही अपनी ह्रदय से लगा लिया, और बस उसी अंतरंग पल में, मानों उसे विचलित करने वाले विचारों का मन पर हावी हुआ बोझ सदा के लिए उतर गया। वह बच्ची भी सई से लिपट गई। सई का हृदय भर आया। वह बच्ची को बारम्बार चूमती रही। जैसे ही उसने उसके लिए लाए नए झबला-टोपी अपने हाथों से उसे पहनाए, उसका मन एक अनामिक आनंद और अनकही संतुष्टि से प्रफुल्लित हो उठा। यहाँ आते समय वे दोनों आये थे, अब विधि के विधान के अनुसार वे हमेशा हमेशा के लिए ‘तीन’ हो गए थे। वे एक अलग ही उल्लास और उमंग के साथ बाहर आए। मुख्य द्वार पर पहुँचते ही सई सलोनी को लेकर वहीं रुक गई, जबकि सचिन कार लेने चला गया।
उस अबोध बालिका के साथ सई लगातार बातें करती जा रही थी। —– “देखो ये पमपम– पसंद आई? और वहां देखो- उसे पेड़ कहते हैं– कितना बड़ा है न? और पूरा हरा हरा –‘ — जिसे दुनिया की कोई जानकारी तक नहीं थी, उस नवजात बालिका को पेड़ दिखाते दिखते उसकी नजर अनायास ही उस पेड़ के पीछे से झांकती दो व्याकुल आँखों की और आकर्षित हुई–.. ..
वे आँखें उस नन्ही बच्ची को हसरत भरी निगाहों से ताक रही थीं। उन सजल नेत्रों से निरन्तर बहती आंसुओं की धार सई दूर से ही महसूस कर पा रही थी। जैसे ही वह पेड़ की ओर बढ़ीं, एक औरत पेड़ की ओट से धीरे से झाँकी…मटमैली फटी साड़ी पर लगे कई पैबंद के बावजूद वह मुश्किल से ही अपने शरीर को ढक पा रही थी। उसके रूखे बाल बिखरे हुए थे और उसका कमजोर शरीर एकदम निस्तेज लग रहा था। उसने अपने हाथ से सई को इशारा किया — “आगे मत आओ।” —- वहीं से उसने अपनी उंगलियों को अपने कानों पर मोड़ बड़े प्रेमभाव से उस नन्ही बालिका की बलैया ली, अपना हाथ उठाकर उठाकर, ‘अच्छा है-अच्छा है’ का संकेत कर बच्ची को खूब आशीर्वाद दिए। सई की ओर अप्रत्याशित कृतज्ञता भरी नज़र से देखते हुए, उसने अपने हाथ जोड़ लिए – और पीछे मुड़कर देखते हुए बड़ी ही तेज़ी इस कदर भाग गई कि देखते देखते सई की आँखों से ओझल हो गई…
.. .. .. .. सई का मन भावनाओं की उथलपुथल से मचलने तो लगा था, परन्तु इसी बीच कई और अपरिचित भावनाओं का कोहरा उसके मन पर छाने लगा —— “क्या वह इस नन्ही की माँ हो सकती है? इतनी दूर से भी, मैं निश्चित रूप से उन कई एक भावनाओं के अम्बार को महसूस कर सकती थी, जो एक के बाद तेजी से उसके पारदर्शी चेहरे पर महीन बदलियों की भांति छाते और छंट जाते। उसे अपने पेट से जने गोले को ऐसे को इस तरह दुनिया जहाँ के थपेड़े झेलने के लिए छोड़ देने के अपराधबोध से वह शर्म के मारे मानों धरती में धंसे जा रही थी। परन्तु उसकी आँखों ने कई अनकही बातें व्यक्त कर दीं थीं —- भले ही काफी दूर से ही क्यों न हो, अपनी बेटी को देखने की खुशी— अब फिर से उसे कभी न देख पाने का अपार अकथनीय दुःख – और एक अनामिक संतुष्टि। और – और अपने ही हाथों से अपने “मातृत्व” की छाप हमेशा के लिए मिटा देने की असीम मानसिक वेदना –जो किसीको भी लब्जों में बयान नहीं की जा सकती। हृदय को अंदर से बाहर तक तोड़ मरोड़ कर रख देने वाली भयानक पीड़ा के ज्वलंत सत्य का एहसास अनायास सई के चेहरे पर भी उभरकर व्यक्त हो गया था। — “उस पल सई को लगा कि परकोटि की विवशता का मूर्तिमंत रूप उसके सामने खड़ा है। परन्तु सचमुच ही वह अबला स्त्री एवं सई, दोनों ही उस क्षण बेबस थे। आश्रम का एक सख्त नियम था कि एक बार आप अपने बच्चे को आश्रम के दरवाज़े पर छोड़ आए, तो ज़िंदगी में फिर कभी भी उसके समक्ष नहीं आ सकते। और यह जानते हुए भी, जैसे ही उसे भनक लगी कि कोई उसकी बेटी को गोद ले रहा है, तो आज उस असहाय माता ने इतना साहसी निर्णय इसलिए लिया था ताकि, वह अपनी बिटिया को अंतिम बार देख सके, भले ही दूर से ही क्यों न हो!
—–सई का दिल और आँखें दोनों ही आँसुओं से भर आईं। उससे दूर भागती हुई उस स्त्री को उसने मन ही मन सच्चे दिल से वादा किया कि वह उसकी बेटी की माँ बनेगी, और उसी क्षण वह उस नन्ही बिटिया की असली माँ बन गई——-
—— हॉर्न बजते ही सई की चेतना जागी। धीरे से आँखें पोंछते हुए वह सलोनी को धीरे से अपनी बाँहों में भरकर कार में बैठ गई। शांति से सो रही उनकी नन्हीसी परी को वे दोनों कुछ समय तक अपलक देखते रहे, और फिर वे सलोनी के नए घर की ओर निकल पड़े—- यह जानकर कि वे खुद कभी किसी के भी असली माता-पिता नहीं बन पाएंगे, इस सदमे से थोड़ा उबरने के बाद, उन्होंने बहुत सोच-विचार के बाद यह निर्णय लिया। ससुराल और मायके के सभी सदस्यों ने उसे तहे दिल से स्वीकार कर लिया था। इसलिए, सलोनी का घर पर बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया गया —-
—- और फिर, जैसे कोई कोमल कली हौले हौले खिलती है, वैसे ही वक्त के साथ सलोनी भी धीरे-धीरे सजीला स्त्रीत्व प्राप्त करती गई — और वे दोनों तुष्टि से उसे देखते रहते। बढ़ती उम्र के साथ, उसकी पसंद, विचार, रहन-सहन-बातचीत, व्यवहार, राय, अभिव्यक्ति—सब कुछ बदल रहा था,— सलोनी में हो रहे इतने सारे बदलावों को वे दोनों अभिभावक के रूप में सचेतन रूप से महसूस कर रहे थे। वह बुद्धिमान तो थी ही, और उसके व्यक्तित्व में वृद्धिंगत होती प्रगल्भता अक्सर उन दोनों को कृतार्थ होने का एहसास दिलाती थी। उन्हें बार बार अनुभूति होते रहती कि, सलोनी के उनके घर-आंगन में प्रवेश करने मात्र से ही उनका जीवन परिपूर्ण और सार्थक हो गया है। “गोद लेने की अवधारणा” तो उनके भाव विश्व से कब की लुप्त हो चुकी थी। घर में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। वह पूरी तरह से लाड़प्यार से पल रही थी। उसे अपनी पसंद की शिक्षा लेने की स्वतंत्रता थी। और अब उसने अपनी इंजीनियरिंग की शिक्षा भी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर ली थी — देखते देखते वह ब्याह करने योग्य हो गई थी। सब कुछ सुचारु रूप से मन के माफिक चल रहा था — सलोनी के और उन दोनों के भी। परन्तु फिर भी, उससे पहले कई सालों से, उनके मन पर लगातार एक दबाव बना हुआ था— सलोनी को एक दिन खुद के बारे में सत्य पता चल ही जाएगा —- तब क्या होगा? उसका और हम दोनों का भी ——-
जब वह अठारह वर्ष की हुई, तब मनोचिकित्सकों की सलाह और सहायता से सलोनी को सई और सचिन ने बतलाया था कि, वे उसके असली माता-पिता नहीं हैं। अधिकांश बच्चे मनोवैज्ञानिक रूप से टूट जाते हैं जब उन्हें अप्रत्याशित रूप से यह कड़वी सच्चाई पता चलती है कि जिन्हें वे अपने माता-पिता कहते हैं, वे उनके वास्तविक जैविक माता-पिता नहीं हैं, तथा कोई भी नहीं जानता कि उनके वास्तविक माता-पिता कौन हैं। यह सत्य निगलना उनके लिए बहुत कष्टप्रद होता है, इसलिए अधिकतर बच्चे मानसिक रूप से अत्यंत विचलित होकर विचित्र और असंगत व्यवहार करने लगते हैं। डॉक्टर ने उन्हें अच्छी तरह आगाह किया था —- “यह अनुमान लगाने का कोई तरीका नहीं है कि, ऐसे बच्चे इस आकस्मिक आघात को ठीक से झेल पाएंगे या नहीं” —- और दोनों ही इस बात को लेकर बेहद तनाव में थे। दोनों के मन में डर था कि सलोनी उनसे दूर हो जाएगी। लेकिन उसे किसी न किसी मोड़ पर यह बात मालूम होना जरुरी था। इस पर सुकून इस बात का था कि, आजतक किसी और ने बेबाकी से उसे यह बात नहीं बताई थी।
सलोनी को सच्चाई पता चलते ही उसने भी अपेक्षा के अनुसार व्यवहार करना शुरू कर दिया। उसने सात-आठ दिनों से उन दोनों से बात तक नहीं की थी – न ही ढंग से खाना खाया था – वह घंटों खुद को कमरे में बंद किए रहती थी… इधर-उधर धक्का मुक्की करते हुए छटपटाती रहती थी — बिना किसी वजह के उसका चीखना चिल्लाना जारी था, मानों हवा से लड़ाई झगड़ा कर रही हो — दोनों ही बहुत हतप्रभ और भयाकुल थे। परन्तु मनोचिकित्सक के उपबोधन (काउंसेलिंग) का प्रभाव धीरे धीरे असरदार हो रहा था।
…… और एक दिन, जैसे ही वह उठी, सई के गले में अपनी बाँहें डाल जोर जोर से निरंतर रोती रही। उसकी सिसकियाँ धीरे धीरे शांत हुईं। उसे लगा जैसे उसके मन पर छाए चिंता के घने बादल छंट गए हो। —- “माँ, मैं समझ गई —चाहे मुझे किसी ने भी जन्म दिया हो, आप ही मेरे सच्चे माता-पिता हैं और हमेशा रहेंगे। मैं जानती हूँ कि आप मन की गहराई से मुझे बहुत प्यार करते हैं। और मैं भी आप दोनों से उतना ही प्यार करती हूँ। आपको छोड़ कोई और मेरे माता-पिता नहीं हो सकते।” — और सलोनी के इन प्रेमभरे बोलों के साथ ही सभी के मन का बाँध टूट गया। उसी अनमोल क्षण को साक्षी मान उन तीनों के बीच एक नया, समृद्ध और दृढ़ रिश्ता अंकुरित हुआ। दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था। आश्रम से उस गुड़िया को घर लाते वक्त उन्हें जो प्रसन्नता हुई थी, वह अधिक थी, या इस क्षण में अनुभव की हुई प्रसन्नता की भावना, यह प्रश्न निरर्थक ही साबित होता था। —–
और देखते ही देखते सलोनी विवाह के उम्र तक बड़ी हो गई। उसने अपना जीवनसाथी खुद ही चुना था — बड़ी समझ बूझ के साथ. रिश्ता बहुत ही अच्छा था। लड़का अमेरिका में नौकरी कर रहा था। उसका संपूर्ण परिवार सर्वार्थ रूप से समृद्ध था। रिश्ते को नकारने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। सबसे अहम बात यह थी कि उस लड़के और उसके परिवार वालों ने यह सत्य भी सहजता से स्वीकार लिया था कि सलोनी उनकी गोद ली हुई लड़की है। उन्होंने दिल की गहराई से इस विवाह के लिए हामी भरी थी — और विवाह की घडी बस चार दिन दूर थी। यह तो मानी हुई बात थी कि शादी के बाद सलोनी अमेरिका जाने वाली थी — यह सोचकर कि अब सलोनी इसके बाद किसी और की होगी, उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे ——-
— और आज, इतने सालों बाद, उसे अचानक उस स्त्री की याद आ गई — जो पेड़ की ओट से ही सही, अपनी बेटी को अंतिम बार देखने की आस लिए हुए थी—उसे उतनी दूर से आशीर्वाद दे रही थी वह — अपने दिल पर हमेशा के लिए पत्थर रख कर अपनी बेटी से जीवन भर के दूर जा चुकी थी वह —–
.. .. .. सई को गहरा एहसास हुआ —- “उस औरत को समाज ने निष्कासित कर दिया था, और मैं यहाँ बहुत ही सम्मानजनक रूप से जी रही हूँ, सलोनी को नौ महीने अपनी कोख में पाले बिना ही उसकी माँ होने का सुख अनुभव कर रही हूँ — अपने आँचल में कन्यादान का पुण्य बटोर रही हूँ, हम इतिकर्तव्यता का श्रेय लेते हुए आनंदोत्सव मना रहे हैं। लेकिन वह असली जनिता? हम कैसे कह सकते हैं कि सामाजिक रूप से दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है? भले ही किसी को यह ज्ञात न हो कि वह इस लड़की, सलोनी, की जननी है, पर मैं तो यह सत्य कैसे नकार सकती हूँ? बेचारी वह अनामिका माता! उसे तो अपनी बेटी का नाम तक मालूम नहीं है! परन्तु उसकी बेटी कैसी दिखती है – क्या करती है – कहाँ रहती है, सुरक्षित और खुश है या नहीं – ऐसे सब विचार उसके मन में ज़रूर मंडराते होंगे, है ना? — यानि हम दोनों के अंतर्मन की ‘माँ’ बिल्कुल एक जैसी ही तो है —- दोनों की भावनाएं एक जैसी – प्यार की कसक वैसी ही – और बेटी से बिछड़ने की व्यथा का एहसास भी एक जैसा है। क्या इसी को ‘समवेदना’ कहते हैं?
परन्तु … परन्तु शायद — शायद नहीं– बिल्कुल निश्चित ही — तब की उसकी ये सारी भावनाएँ – जब वह हतोत्साहित होकर मज़बूरी में अपनी बेटी को अपने ही हाथों से खुद से दूर धकेल रही थी – मेरी अब की भावनाओं से कहीं अधिक तीव्र और दर्दनाक थीं, भले ही उसने उन्हें न दर्शाया न ही बतलाया! बावजूद इसके मैंने तब भी उन्हें महसूस किया था – और अब तो मैं उसे लगातार और भी अधिक प्रकर्ष के साथ अनुभव कर रही हूँ – क्योंकि न केवल उसे इस स्पष्ट सत्य की जानकारी थी कि, वह अपनी बेटी को भविष्य में जीवन में फिर कभी भी, यहाँ तक कि, दूर से भी देख तक नहीं पाएगी, बल्कि उसके पास इस हलाहल को पचाने के अलावा कोई विकल्प तक नहीं था। यह सब झेलते हुए उसने कितनी प्रचंड मात्रा में क्लेश सहे होंगे—
— परन्तु मेरे साथ ऐसा नहीं है। — ऐसा तो तो होगा नहीं कि, सलोनी का विवाह होने के बाद मैं कभी उसे
देख नहीं पाऊँगी। आज मैं ‘बिछोह’ इस शब्द का दर्दनाक अर्थ सही मायने में समझ पा रही हूँ।”
— सई ने अत्यंत दृढ़ता से यह महसूस किया, और मन ही मन उस माँ के सामने हाथ जोड़े – एक बार फिर उस अनजान जनिता माता को उसकी अपनी बच्ची के बारे में आश्वस्त किया, जो उसके लिए हमेशा के लिए अजनबी हो गई थी। उस स्त्री ने सई के आँचल में न केवल अपनी बेटी सौंपी थी, बल्कि एक सम्पूर्ण “मातृत्व” भी प्रदान किया था – आज पहली बार, सई के हृदय में उसके प्रति इतनी गहराई से समाई हुई वास्तविक और असीम कृतज्ञता उसकी आँखों से ऑंसुओं की बरसात का रूप लेकर बह रही थी। और इतने सालों से मन की गहराई में छाया घना कोहरा अप्रत्याशित तेजी से छंट चुका था।
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मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
सांगली, महाराष्ट्र मो ९८२२८४६७६२
हिंदी भावानुवाद – डॉ. मीनाश्रीवास्तव
संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन का रंग।)
☆ लघुकथा # ९१ – जीवन का रंग☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
“अरे अरे पगली जब अक्ल बंट रही थी तो कहाँ थी तू, बेवकूफी की हद है, तुम्हें अलमारी में ना ठीक से कपड़े रखने आता है और ना ऑफिस जाते समय मेरे खाने का ठीक से टिफिन रखना आता है। कोई नई डिश बना भी नहीं सकती, रोज-रोज वही रोटी सब्जी ही बस बना कर दे देती हो? मेरे ऑफिस का चपरासी तक अच्छे से टिफिन लेकर आता है। जाने क्या तुम एम ए (इकोनॉमिक्स) से हो और घर का हिसाब किताब तक ठीक से संभाल नहीं सकती।”
सुबह-सुबह जयंती को मनोज बड़बड़ा रहा था।
जयंती ने गंभीर स्वर में कहा – “मनोज तुम्हें मुझसे इतनी ही दिक्कत है तो मुझे छोड़ कर चले क्यों नहीं जाते। अपने परिवार वालों और दोस्तों के सामने हमेशा मेरी बेइज्जती करते रहते हो और यह क्यों भूल जाते हो कि मेरे पिताजी के दिए हुए फ्लैट में ही रह रहे हो तब शादी क्यों कर ली थी?”
मनोज ने गुस्से में कहा- “अच्छा सुबह- सुबह लड़ाई झगड़ा बंद करो? बस अब आंसू बहाने लगोगी, बस रो रोकर जीती हो। चलो अब जल्दी से नाश्ता लगा दो? ”
तभी फोन की घंटी बजती है।
अब देखो किसका फोन है जयंती?
“मनोज मैं तुम्हारे लिए नाश्ता लग रही हूं?”
मोबाइल की घंटी बजती रही थोड़ी देर बाद जयंती ने फोन उठाया।
फोन मनोज की बहन का था “क्या बात है भाभी तुम्हें फोन उठाने तक की फुर्सत नहीं है घर तो बुलाती नहीं हो और ध्यान भी नहीं रखती हो?”
जयंती ने फोन मनोज को थमा दिया।
“भैया क्या है सुबह-सुबह आप भी फोन नहीं उठा रहे हो अपनी बहन को भूल गए हो क्या?”
“नहीं नहीं मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूं? कड़वे झूठ का जहर पी रहा हूं जीवन का सारा रंग ही बेरंग हो गया है।”
“कोई बात नहीं भैया तुम्हारे जीवन में मैं रंग भर देती हूं आज शाम को मैं कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास रहने को आ रही हूं?”
“ठीक है बहन तुम आ जाओ, कम से कम तुम्हारे आने से खाना तो ढंग से मिलेगा।”
मनोज तेज गति से ऑफिस की ओर चला जाता है। जयंती मन ही मन विचार करती रहती है कि सारा दिन मैं सेवा करती हूं जीवन का रंग तो मेरा फीका हो गया है और इन दोनों बहन भाई के नाटक खत्म ही नहीं हो रहे हैं। अब ये दोनों मिलकर बातों के तीर चलाएंगे।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “पहचान”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४६ ☆
🌻लघुकथा🌻 पहचान 🌻
कमल पुष्प जैसी पवित्रता, सुंदरता, आध्यात्मिक ज्ञान, और सृजन का प्रतीक अरविंद यथा नाम तथा गुण को व्यक्तित्व में उतारते डॉक्टर अरविंद सरल सहज भाव से भरे हुए।
क्लीनिक पर लगातार भीड़ को नियंत्रित करते उनके सहयोगी। अचानक अफरा-तफरी, भागा दौड़ी। समझ में आता तब तक क्लीनिक में लगभग बीस व्यक्तियों का समागम।
डॉक्टर साहब – – जल्दी कीजिए इनको बचा लीजिए, हमारी दुनियाँ है हम लुट जाएंगे, हम तो परदेसी हैं।
आज एक समारोह में आए हैं तबीयत थोड़ी खराब थी पर इतनी खराब हो जाएगी यह पता नहीं था, प्लीज हेल्प मी!!!!!!
सहायकों ने दूर हटने का ईशारा किया। आपके पास कोई कागज दवाई पर्चा है? ऐसे कोई डा नहीं देखता। सच ही तो है – – आज की दुनिया में डॉक्टरों की क्लीनिक को तोड़फोड़ करते देर नहीं लगती सारा दोष डा पर डाल दिया जाता है।
चश्मे से झाँकते डॉ साहब अपनी कुर्सी से उठते हुए बोले – “कुछ नहीं होगा हम है न शांति बनाएं!!! पेशेंट का नब्ज जाने किस भाव से उन्होंने देखा और दवाइयां इंजेक्शन का इशारा।“
तत्काल इलाज मिलते ही सब कुछ उठते हुए तूफान की जगह शांत होती लहरें चेहरे पर मुस्कुराहट।
तब तक गर्म चाय लिए एक साहसी आदमी सभी को चाय दे रहा था।
इससे पहले कुछ बात होती मरीज के सिर पर हाथ फेरते कहा– हम डॉक्टर लोगों का जीवन सदैव कर्तव्यों का पालन करते हुए निकलता है। हम वचनबद्ध रहते हैं। बाकी प्रभु की इच्छा। हाथ जोड़ रिश्तेदार डॉक्टर साहब आपकी फीस???
पूरे कमल की तरह खिलखिलाते उन्होंने जवाब दिया सिर्फ मेडिसिन का बिल दे देना है और हाँ जब कभी मैं आपके शहर आया मुझे याद रखिएगा। यह रहा मेरा कार्ड।
पीछे से किसी ने कहा– आज भी भगवान किसी न किसी रूप में आते हैं। डॉक्टर अरविंद की पहचान, सदैव के लिए बन गई मुस्कान 😊
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– फिलहाल इतना ही…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ८३ — फिलहाल इतना ही —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
मेरी मातृभूमि की एक अद्भुत सी कथा है। कभी एक नामी धर्मनेता और एक राजनेता सूखे कुएँ में एक साथ गिर गए थे। दोनों अपने – अपने भविष्य के प्रति चिंतित थे। धर्मनेता धर्म के मामले में गोबर हो जाने से राजनीति में जाना चाहता था। राजनेता चुनाव हार जाने पर धर्म का रास्ता लेने के लिए विकल था। उन दिनों धोती का जमाना होने से उन्होंने आपस में धोती बदल ली। “फिलहाल इतना ही” बदलने से उनका काम चल जाता।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “आज का रांझा”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
उन दोनों ने एक दूसरे को देख लिया था और मुस्कुरा दिए थे। करीब आते ही लड़की ने इशारा किया था और क्वार्टरों की ओर बढ़ चली। लड़का पीछे पीछे चलने लगा।
लड़के ने कहा -तुम्हारी आंखें झील सी गहरी हैं।
– हूं।
लड़की ने तेज तेज कदम रखते इतना ही कहा।
– तुम्हारे बाल काले बादल हैं।
– हूं।
लड़की तेज चलती गयी।
बाद में लड़का उसकी गर्दन , उंगलियों, गोलाइयों और कसाव की उपमाएं देता रहा। लड़की ने हूं भी नहीं की।
क्वार्टर खोलते ही लड़की ने पूछा -तुम्हारे लिए चाय बनाऊं?
चाय कह देना ही उसकी कमजोर नस पर हाथ रख देने के समान है , दूसरा वह बनाये। लड़के ने हां कह दी। लड़की चाय चली गयी औ, लड़का सपने बुनने लगा। दोनों नौकरी करते हैं। एक दूसरे को चाहते हैं। बस। ज़िंदगी कटेगी।
पर्दा हटा और ,,,,
लड़का सोफे में धंस गया। उसे लगा जैसे लड़की के हाथ में चाय का प्याला न होकर कोई रायफल हो , जिसकी नली उसकी तरफ हो। जो अभी गोली उगल देगी।
– चाय नहीं लोगे?
लड़का चुप बैठा रहा।
लड़की से, बोली -मेरा चेहरा देखते हो? स्टोव के ऊपर अचानक आने से झुलस गया। तुम्हें चाय तो पिलानी ही थी। सो दर्द पिये चुपचाप बना लाई।
लड़के ने कुछ नहीं कहा। उठा और दरवाजे तक पहुंच गया।
– चाय नहीं लोगे?
लड़की ने पूछा।
– फिर कब आओगे?
– अब नहीं आऊंगा।
– क्यों? मैं सुंदर नहीं रही?
और वह खिलखिला कर हंस दी।
लड़के ने पलट कर देखा,,,
लड़की के हाथ में एक सड़ा हुआ चेहरा था और वह पहले की तरह सुंदर थी।
लड़का मुस्कुरा कर करीब आने लगा तो उसने सड़ा हुआ चेहरा उसके मुंह पर फेंकते कहा -मुझे मुंह मत दिखाओ।