(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “भोले का अभिषेक”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५५ ☆
🌻 लघुकथा 🌻 भोले का अभिषेक 🌻
महाशिवरात्रि की धूम, भक्तों की टोली यत्र- तत्र, शिवालय, देवालय घर मंदिर, सजा सुंदर, चमकता जहाँ तक दृष्टि जाए हर- हर महादेव की गूंज।
दूध दही, गंगाजल निर्मल जल की धार, अभिषेक करने की होड़ सी मची है। शिव शंकर भक्तों की परीक्षा ले रहे हैं। सब उनका मायाजाल।
अरे जल्दी चलो नहीं जाना है क्या? मालती।
जल्दी चलो– शिव अभिषेक करने का समय हो चला है। पास के मंदिर में बहुत भीड़ होने लगी है।
सखी ने जोर से आवाज लगाई।
नहीं अभी नहीं जा रही हूँ। घर मंदिर में अभिषेक कर लूँ तत्पश्चाप जाऊंगी।
तू तो पगली है घर में बाद में करते रहना। पहले चल वहाँ हो आते हैं। बहुत अच्छा पुण्य मिलता है। नहीं तो मंदिर में बहुत भीड़ हो जाएगी।
नहीं मेरे मंदिर में सभी देवगण बैठे इंतजार करते हैं। सभी को मेरे अभिषेक की आवश्यकता है।
सखी आँखें तरेर कर बोली– ऐसे कह रही है– जैसे भगवान इसके घर पर हैं।
मालती ने कहा सही कहा तुमने। चाय, दूध, नाश्ता, टिफिन, कपड़े की तैयारी, स्कूल की तैयारी, भोजन व्यवस्था, झाड़ू बुहार, साफ सफाई समय पर नहीं हुआ तो मेरे अभिषेक का क्या महत्व।
मेरे पतिदेव ने सारा कुछ मुझे सौप दिया है। अपनी जिम्मेदारी उठा परिवार को खुश रखने के लिए दिन-रात परिश्रम करते हैं।
कहते-कहते वह भाव विभोर होने लगी। आज पतिदेव उठकर भोर एक लोटा जल सूर्य देव अर्पण करते कह रहे थे – – – प्रभु मेरी मालती को सदैव कुशल रखना। हे अर्धनारीश्वर बस यही मेरा अभिषेक है।
और वह सखी की ओर देखने लगी। सखी बोल पड़ी – – हो गया भोले का अभिषेक। 🙏😊
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– रुके हुए आँसू …” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९४ — रुके हुए आँसू —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
विधवा माँ एक विधुर से पुनर्विवाह करती। आदमी का संतान न होना एक संयोग ही था। पर बेटी ने माना नहीं। बाद में बेटी की शादी हो गयी। बीस साल बीते। बीमार माँ अस्पताल में थी। बेटी ने अस्पताल पहुँचने पर माँ के पास एक अनजान आदमी को देखा। माँ ने उसे बताया इसी के साथ उसका पुनर्विवाह होना था। केंसर पीड़ित माँ इतना बोलते रो दी। बेटी के भीतर आज बहुत कुछ टूट गया, बिखर गया।
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – लघुकथा – क्या रखा है नाम में?)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६७ ☆
☆ लघुकथा – क्या रखा है नाम में?☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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नाम व्यक्ति की पहचान होता है। शिशु को नाम माता-पिता या अन्य पारिवारिक बड़े जन देते हैं। हम सब समाज में अपने नाम से ही जाने जाते हैं। एक ही नाम एक से अधिक व्यक्तियों के हो सकते हैं। पहचान सुनिश्चित करने के लिए पिता, पति या गाँव के नाम तथा कुलनाम भी जोड़ लिया जाता है। नेकनाम होना तथा नाम कमाना सबकी चाह होती है जबकि गुमनाम, बदनाम होना कोई नहीं चाहता।
मेरे कार्यालय में एक अधिकारी आए जिनका नाम था राम लाल शर्मा। संयोगवश दफ्तर में एक भृत्य का भी यही नाम था। अधिकारी के कक्ष के बाहर उनकी नाम पट्टिका लगाई गई तो उन्होंने उसे हटाने का आदेश देते हुए कहा कि आर. एल. शर्मा आई.ए.एस. लिखवाओ।
एक बच्चे का नाम गरीब दास था। वह पढ़-लिखकर नौकरी में लगा तो यह नाम चुभने लगा उसने शपथ पत्र देकर नाम बदल लिया। उसके रिश्तेदार आते तो उसे बचपन के नाम से पुकारते, यह उसे बहुत खराब लगता। माता-पिता से अक्सर बहस कर लेता और डाँट खाता।
कुछ लोग अपने पेशे को अपने व्यक्तित्व से अहमियत देते हैं, वे नाम के पहले डॉक्टर या प्रोफेसर लिखने लगते हैं। यह लत इतनी बढ़ जाती है कि केवल नाम लिखा या लिया जाने पर वे खुद को अपमानित या शर्मिंदा अनुभव करते हैं।
जब समाज में शिक्षा का प्रसार कम था तब नाम के साथ उपाधि बी.ए., एम.ए., विशारद, शास्त्री आदि लिखने का चलन था। मेरे एक पड़ोसी सेवा निवृत्त उच्च अधिकारी हैं, वे नाम पट्टिका पर अपना पदनाम लिखने का मोह नहीं छोड़ पाए। एक सामाजिक कार्यकर्ता खुद का परिचय पत्नी के पद से से पार्षद पति कहकर देते हैं।
एक दिन मेरी बेटी ने मेरे पिता श्री पूछ लिया कि व्यक्ति की सही पहचान नाम, कुलनाम या पदनाम क्या होती है? पिता जी बोले- पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात, क्या धरा है नाम में? मनुष्य की सही पहचान उसके काम से होती है। दुनिया को काम ही प्यारा होता है, नाम या चाम नहीं।”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल कहानी — जादूई पेन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३९ ☆
‘‘क्या हुआ बेटी?’’ दादीजी ने पूछा, ‘‘आज तुम्हारी परीक्षा है, तुम सो रही हो?’’ कहते हुए दादीजी ने उसे छुआ। उसका शरीर गरम हो रहा था।
‘‘दादीजी! बुखार आ गया है,’’ श्रेया ने कहा। तभी उसकी मम्मी आ गईं, ‘‘मांजी! जब भी परीक्षा आती है, इसे बुखार आ जाता है।’’
‘‘अच्छा!’’ दादीजी ने कहा।
मम्मी ने फोन लगाकर डॉक्टर को बुला लिया। डॉक्टर ने श्रेया को देखा और बुखार उतरने की गोली दे दी।
कुछ ही देर में श्रेया का बुखार उतर गया। तभी दादीजी पास आकर बोलीं, ‘‘श्रेया! अब कैसी हो?’’
‘‘ठीक हूं दादीजी,’’ श्रेया ने बैठते हुए कहा।
तब दादीजी ने उससे पूछा, ‘‘अच्छा! यह बताओ कि तुम्हें सबसे ज़्यादा डर किससे लगता है?’’
‘‘परीक्षा से,’’ श्रेया ने तुरंत कह दिया, ‘‘पेपर में क्या आता है, पता नहीं चलता। उसमें याद किया हुआ लिख पाऊंगी या नहीं — इससे ज़्यादा डर लगता है,’’ श्रेया ने जवाब दिया।
‘‘परीक्षा से डर कैसा?’’ दादीजी ने कहा, ‘‘मेरे पास ऐसा पेन है जो परीक्षा में डर को दूर करता है। वह पेन जादू का काम करता है।’’
‘‘जादूई पेन!’’
‘‘हां, जादूई पेन,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘इससे परीक्षा में डर भाग जाता है। बस आप एक अक्षर इस पेन से लिख दीजिए, फिर किसी भी पेन से लिखिए — आप अपना याद किया हुआ भूलते नहीं हैं। जो याद किया है, वह तुरंत लिखते चले जाते हैं।’’
‘‘तब तो यह जादूई पेन मुझे दे दीजिए,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मुझे परीक्षा में लिखते हुए डर लगता है। यह पेन मेरी सहायता करेगा?’’
‘‘बिलकुल करेगा,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘मगर यह पेन तभी काम करता है, जब वह परीक्षा में छात्र के पास हो, और छात्र परीक्षा देने से पहले लिख-लिखकर याद करता हो, उसे दो बार दोहराता हो — तभी यह पेन काम करता है।’’
‘‘तब तो यह पेन मुझे दे दीजिए,’’ कहते हुए श्रेया ने दादीजी से जादूई पेन लिया। अपनी कॉपी-किताब खोलकर बैठ गई। फिर अपना अभ्यास दोहराने लगी। जब यह कार्य कर लिया, तब तैयार होकर परीक्षा देने गई।
आज उसमें आत्मविश्वास था। वह बेफिक्र होकर परीक्षा देने गई। उसका पेपर अच्छा हुआ था। परीक्षा का डर चला गया था। आखिर उसे जादूई पेन मिल गया था।
श्रेया ने हर दिन अच्छी मेहनत की। अपना पेन संभालकर रखा। इससे सभी पेपर अच्छे से हल हुए। मगर, आखिरी पेपर के दिन उसका पेन गुम हो गया। वह चिंतित हो गई — अब क्या होगा? मगर उसके सभी पेपर हो गए थे, इसलिए उसे ज़्यादा चिंता नहीं थी।
वह घर आते ही दादीजी से बोली, ‘‘दादीजी! मेरा जादूई पेन गुम गया।’’
‘‘कोई बात नहीं, जब स्कूल खुलेंगे तो हम दूसरा ला देंगे,’’ दादीजी ने कहा और वे श्रेया से बातें करने लगीं।
श्रेया की दादीजी गांव में रहती थीं। वे कुछ समय के लिए शहर आई थीं। श्रेया दादीजी के साथ गांव चली गई। वहां उसने खूब मस्ती की। गांव में घूमी, खेत पर गई, वहां की ताज़ी सब्ज़ियां खाईं। इस तरह खेलते-कूदते उसकी गर्मी की छुट्टियां बहुत जल्दी बीत गईं।
जब उसका परीक्षाफल आया तो वह इस बार ज़्यादा अंकों से पास हुई थी। वह खुश होकर चिल्लाई, ‘‘वाकई! जादूई पेन ने अपना कमाल कर दिया।’’
उस वक्त दादीजी मुस्कराकर रह गईं। मगर जब श्रेया वापस शहर आने लगी तो उसने दादीजी से कहा, ‘‘दादीजी! मुझे वह जादूई पेन दिलवा दीजिए, वह मेरे काम आएगा।’’
‘‘चलो! अभी दिलवा देती हूं,’’ कहते हुए दादीजी उसे एक दुकानदार के पास ले गईं, ‘‘लाला! वह पेन देना,’’ दादीजी ने कहा।
लाला ने एक पेन निकालकर दादीजी को दे दिया। दादीजी ने उस पेन के ऊपर लगा नाम का स्टीकर हटा दिया। फिर बोलीं, ‘‘लो श्रेया! यह जादूई पेन।’’
यह देखकर श्रेया चकित रह गई, ‘‘मगर दादीजी! यह तो साधारण पेन है।’’
इस पर दादीजी ने कहा, ‘‘किसने कहा कि यह साधारण पेन है? इसने हमारी श्रेया में आत्मविश्वास का जादू भरा था। वह अपने अभ्यास को पूरे विश्वास के साथ और मन लगाकर दोहराने लगी थी। फिर यह सोचकर परीक्षा देने गई कि उसे सब याद है — तब यह पेन साधारण कैसे हो सकता है?’’
‘‘मगर दादीजी! यह पेन तो आपने इस साधारण दुकान से खरीदा है।’’
‘‘हां, मगर इसके सहारे परीक्षा का डर निकल गया था। इसलिए यह जादूई पेन हुआ कि नहीं?’’
‘‘हां दादीजी,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मैं बेकार ही परीक्षा से डरती थी। अब नहीं डरूंगी। मुझे सब याद है, तो परीक्षा में आराम से लिख सकती हूं। यही मेरा विश्वास है। यह सोचकर परीक्षा दूंगी।’’
‘‘शाबाश श्रेया,’’ दादीजी ने कहा और श्रेया पूरे आत्मविश्वास के साथ शहर आ गई। तब से उसका परीक्षा का डर सदा के लिए खत्म हो गया।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मौन।)
“माँ जल्दी करो अभी तक चाय नहीं बनाई है और न टिफिन दिया है कॉलेज जाने में देर हो रही है।”
रवि ने अपनी माँ कमला से कहा।
“बेटा आज बहुत ठंड है 8:00 बज गया अभी तक मेरा हाथ पैर सीधा नहीं हो रहा है?”
“कोई बात नहीं माँ मैं चाय बना ले रहा हूं और ब्रेड सेंक के तुम्हें देता हूं” मुस्कुराते हुए रवि ने कहा “माँ ब्रश कर लो।”
“माँ पता नहीं क्यों बाहर बहुत हल्ला हो रहा है?”
कमला जी ने कहा – “बेटा सड़क के किनारे घर हैं। आते जाते बहुत सारी आवाज़ सुनाई देती रहती है। “
रवि ने कहा – “मैं देखता हूँ क्यों बाहर भीड़ लगी है।”
“मां आप चिंता मत करो ऑनलाइन मैंने खाना ऑर्डर कर दिया है थोड़ी देर बाद आ जाएगा और मैं कॉलेज कैंटीन में खाना खा लूंगा।”
वह बाइक लेकर कॉलेज के लिए चला गया।
जब वह पहुंचा तो देखा कि एक वृद्ध ठंड के मारे कांप रहा था और एक फटा कंबल ओढ़ कर बैठा था,
लोग उसे भगाने की कोशिश कर रहे थे।
रवि ने एक चाय की दुकान से चाय और एक बिस्कुट का पैकेट लिया और उस बुजुर्ग आदमी को दिया।
तभी वहां पास खड़े एक व्यक्ति ने उसे डांटा- “क्या हम इसे भगा रहे हैं जानते हो कौन है और तुम इसे चाय पिला रहे हो?”
रवि ने मुस्कुराते हुए कहा -“अंकल जी कहिए तो आपको भी मैं चाय पिला दूं बेचारे ठंड से कांप रहे हैं पहले उनमे थोड़ा हिम्मत आये फिर हम पूछते हैं उन्हें कहाँ जाना है। “
वह वृद्ध आदमी बहुत खुश हुआ मुस्कुरा के उसे ढेर सारा आशीर्वाद दिया और बोला कि “मेरा सब कुछ कुछ महीने पहले ही बेटे-बहु सबने छीन लिया था बस यूं ही भटकता रहता हूं गली-गली, आज यहां आग तापते हुए सो गया और मेरी नींद लग गई थी तभी सुबह यह सब लोग मुझे परेशान करने लग गए और मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ ?”
“कोई बात नहीं अंकल जी आप यह बताइए मैं आपको कहां छोड़ दूं? “
“बेटा मुझे तो कुछ पता नहीं है” उसे वृद्ध ने कहा।
“मेरे कॉलेज के प्रिंसिपल सर भी बुजुर्गों की सेवा करते हैं।”
रवि ने कहा- “बाबा आप बाइक में बैठो।”
वृद्ध की आंखों में एक चमक आ गई और उसके शरीर में अचानक एक ऊर्जा भर गई।
वह उसकी बाइक में तन कर बैठ गया।
प्रिंसिपल सर बोले “अरे यह किसको ले आए कॉलेज!”
“सर बाबा के रहने का इंतजाम करना है इनके बच्चों ने इन्हें घर से निकाल दिया है”
“ठीक है अपने कॉलेज के थोड़ा सा दूरी पर जो वृद्ध आश्रम है उसका नाम है ‘अपना घर’ इन्हें वहां छोड़ आओ।”
वृद्ध की ऑंखों से ऑंसू निकल रहे थे मौन होकर भी ऑंखे आभार व्यक्त कर रही थी।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “आम के बीच राम”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५४ ☆
🌻लघुकथा🌻आम के बीच राम🌻
वार्षिकोत्सव कार्यक्रम चल रहा था। सभी अपनी-अपनी कार्य कुशलता मंच के मध्य रखना चाह रहे थे। चमचमाता मंच, सजावट, तिलक रोली चंदन वंदन अभिनंदन, मन आनंदित और उमंगों से भरा ।
सभी की निगाहें तो बस वहाँ क्या हो रहा? क्या होने वाला है? इसकी जानकारी लेते नजर आए।
किसी ने मन की बात, कोई व्यंग, कोई परियंत, कोई प्रियवर, कोई हँसी ठिठोली, कोई ज्ञान की बात, संत ध्यान की बात, न चाहते भी तालियाँ बजाते रहिए। कुल मिलाकर गीत संगीत भरपूर मनोरंजन।
अंग्रेजी परवरिश में पलते आज के बच्चों को ये सब नही भाता।अथर्व अपनी दादी के साथ आया था। बीच-बीच में तंग करने लगा – – घर चलो यहाँ तो आम लोग बैठे है।
दादी प्यार से सिर पर हाथ फेरते बच्चे से बोली — जहाँ आम लोग होते है। वहीं राम होते है। तुम्हें भी श्री राम बनना है न??
बच्चे ने धीरे से कहा — तो फिर ठीक है। थोड़ी देर बैठ जाता हूँ।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघु कथा “– मेला …” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९३ — मेला —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
आठों पहर वहाँ एक स्थायी मेला बना रहता था। लोग अपनी व्यस्तता से थक जाएँ तो एक वही मेला होता था जहाँ जाने पर उनका मन बहलता था। धारणा इस तरह से बनी होती थी कि अपना कोई घर में खो जाए तो वहाँ मेले में ढूँढने पर उसे पा लेंगे। पर एक प्रेमी के साथ कुछ और हुआ। उसने खोने को तो अपनी प्रेमिका को इस मेले में ही खोया, लेकिन उसे पाया नहीं। बात होती थी सब का कहीं खोया मेले में मिल जाता है तो उसका क्यों नहीं मिलता? रही प्रेमी की बात, वर्षों प्रेमिका को ढूँढते थका – हारा हो जाने से वह खत्म हो गया। अब वह कब्रस्तान में होता। प्रेमिका वहीं थी।
यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। लोक साहित्य पर पुस्तक, चार उपन्यास एवं आठ कहानी संग्रह प्रकाशित। गुजराती, मराठी, बांग्ला, अंग्रेजी, उर्दू, तमिल एवं पंजाबी में पुस्तकों व रचनाओं का अनुवाद। हंस, वनमाली, वागर्थ, भाषा, कथादेश, नया ज्ञानोदय, पाखी आदि कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार 2020 तथा राष्ट्रीय निर्मल वर्मा सम्मान।
☆ कथा कहानी ☆ झुरमुटी गलियारे☆ डॉ. हंसा दीप ☆
एक के बाद एक, परिवारजनों के संदेशों की भरमार थी- “एक बार आ जाओ, दीदी से मिल लो। अब वे किसी को पहचानती नहीं। सब कुछ भूल गई हैं।”
उनके बच्चों के संदेश भी थे- “मम्मी शायद आपको पहचान लें, आप आ जाइए।”
मैं मान ही नहीं सकती, दीदी सब कुछ कैसे भूल सकती हैं! जो किसी की कही, छोटी से छोटी बात भी बरसों याद रखती थीं। न जाने कितने धार्मिक सूत्र और छंद उन्हें कंठस्थ थे। राजनीति के कितने ही पहलुओं को बिना किसी किताब के, एक के बाद एक, पूरे क्रम से सुना देती थीं। वे किसी को पहचानती नहीं, ये सब कुछ मेरे गले से नीचे नहीं उतर रहा था।
शायद इसलिए भी कि मैं उनके बेहद करीब थी। उनके जीवन के हर पहलू से परिचित। अपने जीवन भर की कठिनाइयों को उन्होंने न जाने कितनी बार उसी तरह दोहराया था। इतनी बार कि मुझे भी वे किस्से रट से गए थे। उनकी आपबीती जैसे मेरी अपनी यादों का हिस्सा बन चुकी थी। कितने बरस उनकी छत्रछाया में बिताए थे मैंने। क्या उन्हें वो एक पल भी याद नहीं आएगा! अतीत के सारे पन्ने खोलकर रख दूँगी, वे जरूर पढ़ लेंगी। एक नहीं, कई तरकीबें होंगी मेरे पास उन्हें याद दिलाने के लिए।
इन्हीं खयालों के साथ जब मैं उनसे मिलने जा रही थी, मन में बहुत उमंग थी। चेहरे पर छलकती खुशी, भीतर की भावनाओं-संभावनाओं को आकार दे रही थी। मन आश्वस्त था। इस गहन विश्वास के साथ कि वे मुझे पहचान ही लेंगी। भले ही किसी और को पहचानें, न पहचानें, मगर मुझे तो पहचान ही लेंगी। कैसे नहीं पहचानेंगी भला, आखिर मैं उनकी हंसु थी। वे सारी दुनिया को भुला सकती हैं, मगर मुझे नहीं। मेरे हाथों का स्पर्श ही पर्याप्त होगा, उन्हें उस झुरमुट से बाहर ले आने के लिए।
उनके कमरे में कदम रखते ही सारे मुगालते दूर हो गए। उन पर नजर पड़ते ही मन की सारी मुरादें मन में ही ठहर गयीं। मुझे देखकर भी अनदेखा करता उनका चेहरा, मुझे तोड़ गया। वे सामने की दीवार को घूरती रहीं, जैसे मैं वहाँ मौजूद न थी। मेरे बार-बार याद दिलाने पर भी उन पर कोई असर न पड़ा। चेहरा शांत रहा। निर्विकार।
मैं उनके सामने बैठी रही। वे मुस्कुराईं। वैसी मुस्कान जैसी किसी अजनबी के लिए होती है। ऐसी मुस्कान जिसमें अपनापन नहीं था, बस एक शिष्ट दूरी थी। वह मुस्कान किसी और के लिए थी, किसी अपने के लिए नहीं।
मैं स्तब्ध थी, मेरा कल, कल ही था, आज नहीं। कल बीत चुका था और आज दीदी की आँखें खाली थीं। सारे नाम, सारे चेहरे, यहाँ तक कि उनकी अपनी कहानियाँ भी कहीं पीछे छूट गई थीं। कभी जो बातें हँसी में गूँजती थीं, आज वे केवल हवा में खोए स्वर बनकर रह गई थीं।
मैंने बहुत कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द उन तक नहीं पहुँच रहे थे। मैंने बार-बार उनका हाथ छूने की कोशिश की, लेकिन मेरे स्पर्श की कोई गरमाहट भीतर की बर्फ को नहीं पिघला सकी। एक पल के लिए उनकी आँखें मुझसे मिलीं और फिर खो गईं। ठीक वैसे, जैसे कोई दरवाजा बंद हो गया हो और मैं बाहर ही खड़ी रह गई। उनके और मेरे बीच अनदेखी दीवार थी। कभी जो आँखें मेरी आँखों से बतियाती थीं, आज उनमें केवल प्रतिध्वनि ही थी। उनकी उपस्थिति यहाँ थी पर ध्यान कहीं और बहकता-उछलता चला जाता था।
और मैं बैठी रह गई, देखती रह गई। पिछला समय उनके और मेरे बीच की खाई में बह चुका था। उनके भीतर की दुनिया अब उनकी-मेरी नहीं रही, सिर्फ उनकी ही रह गई थी। हर याद एक धुँधली तस्वीर की तरह किनारे पर आकर फिसलती चली जा रही थी। हारकर मैं चुप हो गई। बैठ गई उनका हाथ थामकर। उनके भावशून्य चेहरे को ताकती रही। वे सामने बैठी तो थीं, लेकिन किसी अनजान की तरह। किसी अजनबी की तरह।
पचहत्तर साल की एक शिशु। खुली आँखें, उजला चेहरा और ऐसी मुस्कान जिसमें किसी स्मृति की परछाई तक नहीं थी। वही तो थीं, मेरी ही दीदी। सब आते, जाते। किसी के आने से उनके चेहरे पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। मैं सुनती रही सबका कहा- “वे अब न किसी को जानतीं, न किसी को पहचानतीं। न अपने बच्चों को, न अपने भाई-बहनों को। और न ही स्वयं को।” उनसे बात करते हुए मुझे अब मानना पड़ रहा था कि उन्हें अपना नाम तक याद नहीं। शायद अब नाम की कोई जरूरत ही नहीं रह गई थी। उन्होंने अपनी एक नई दुनिया रच ली थी। ऐसी दुनिया जहाँ नाम नहीं होते, पहचान नहीं होती, सिर्फ वहाँ होना होता है।
कुछ पल चुप रहकर वे बोलने लग जातीं। न जाने कहाँ-कहाँ की बातें। कभी किसी अदृश्य सभा को संबोधित करतीं, तो कभी किसी अनजाने अपराध पर डाँट लगा देतीं। अतीत से भटकते हुए कुछ शब्द जबान पर आ तो जाते, मगर बगैर किसी संदर्भ के। ऐसा लगता जैसे अभी कोई उनके गलियारे से झाँक कर वापस चला गया हो। बगैर चेहरे के। बगैर रिश्ते के। किसी बात को लेकर खिलखिलातीं तो हँसती ही जातीं। हम उनके अपने, उन्हें देखते ही रह जाते। समझने की कोशिश करते हुए कि ऐसा क्या याद आया कि उनकी हँसी थम ही नहीं रही। वे हँस रही होतीं, हम उस हँसी में साथ देने के बजाय उदास हो जाते। आँखों की कोरों को गीली होने तक उन्हें एकटक निहारते रहते, जब तक उनकी हँसी थम नहीं जाती।
न जाने क्यों, वे हमेशा प्रसन्न दिखाई देतीं। उनकी अपनी दुनिया में। खुश और निश्चिंत। उन्हें न तो खाने का ध्यान था, न कपड़ों का। किसी ने जबरन रोटी का टुकड़ा उनके मुँह में दे दिया तो नाराज हो जातीं। किसी ने प्यार से खिलाया तो खा लेतीं वरना भूखी ही बैठी रहतीं। जैसे भूख-प्यास जैसी तमाम सारी बातें अब उनकी दुनिया का हिस्सा ही न हों।
आज जब मैं उन्हें खिलाने बैठी तो शायद वे सारे निवाले याद आए जो उन्होंने बचपन में मेरे मुँह में दिए थे। मैं नहीं खाती तो वे डाँटती थीं। आज मैं भी ठीक उसी लहजे में उन्हें डाँट रही थी। वे खाते-खाते बोलने लगीं। मेरे मुँह से अनायास वही शब्द निकल पड़े, उन्हीं के शब्द- “खाते-खाते कैसे बोल सकते हैं। मुँह एक ही है, या तो बोलेगा या फिर खाएगा। पहले खा लो, फिर जो कहना है कह देना।”
वे रुक गईं। गहरी नजरों से मुझे देखा। एक हल्की-सी आशा मेरे चेहरे पर आई। शायद, उन्हें कुछ याद आया, लेकिन अगले ही पल निराशा ने घेर लिया। उन्होंने अच्छे बच्चे की तरह सिर हिलाया और मुँह का खाना चबाने लगीं। उनके शब्द मुझे याद थे, जिन्हें दोहराकर मैं उस पुराने ऋण को चुपचाप चुका रही थी। कर्ज की भरपाई का सुकून भीतर तक महसूस कर रही थी मैं। खाना खाने के बाद उनकी ऊर्जा दुगुने वेग से लौट आयी। आसपास से गुजरते हर इंसान को अपने पास बुलाने लगीं और अनवरत बातें करने लगीं। बातें बगैर किसी तारतम्य के। ऐसी बातें जिनका कोई क्रम नहीं था, कोई अर्थ नहीं था। मानो कह रही हों- “मैं बोल रही हूँ। समझ सको तो समझ लो।”
यह न अतीत था, न वर्तमान। शायद कोई तीसरी ही दुनिया थी। उनकी अपनी दुनिया, जहाँ वे पूरी तरह सुरक्षित और बेखौफ थीं। जैसे चाहें बैठें, जो चाहें बोलें। न लोकलाज का भय, न घर वालों की चिंता-फिक्र।
मुझे खुशी इस बात की थी कि उनकी सेहत अच्छी थी। चेहरे पर रौनक थी। ऐसा नहीं लगता था कि उन्हें किसी से भी, या खुद से भी कोई शिकायत हो। हम समझने में लगे थे कि उन्हें एक अलग अपनी दुनिया बनाने की जरूरत क्यों और कैसे पड़ी। हम सभी, उनके परिवार के पंद्रह सदस्य जिनमें डॉक्टर भी हैं, इसका उत्तर खोजने की भरपूर कोशिश करते-करते बेबस-से हो गए हैं। ऐसा क्यों हुआ, कैसे हुआ का उत्तर खोजते-खोजते एक बिंदु पर आकर रुक गए कि जो भी हुआ, वे यहाँ तो हैं। इलाज की कोई उम्मीद ही नहीं। बीमारियों को नाम भी देना नहीं चाहते, अलज़ाइमर या डिमेंशिया या कुछ और। उत्तर नहीं चाहिए, बस उनका होना चाहिए। थक-हार कर सबको एक ही बात का सुकून है- “वो किसी को नहीं पहचानतीं, लेकिन हम सब तो उन्हें पहचानते हैं।”
हम सब, उनके अपने, उनके और भी करीब आ गए हैं। मैं भी। आखिर वही तो हैं मेरी प्यारी दीदी, जिनके मुँह से हंसु सुनते ही कभी मेरी बाँछें खिल उठती थीं। अब फर्क बस इतना-सा था कि हर बार मैं ही उन्हें अपना परिचय उसी नाम से देती हूँ। धीरे से उनके पास जाकर कहती हूँ- “दी, मैं आपकी हंसु हूँ।”
ये शब्द उनके कानों तक पहुँचाकर मन को एक अजीब-सी राहत मिलती, जैसे यकीन हो गया हो कि मेरी दीदी अब भी मुझे सुन रही हैं।
उनसे मिलकर पहले दिन बहुत रोई थी मैं। अगले दिन पीड़ा कुछ कम हुई। और कुछ दिन उनके साथ बिताने के बाद मन ने चुपचाप स्वीकार कर लिया- “अब दीदी का ध्यान हमें ही रखना है।” झुरमुटी गलियारों में उनके साथ, उनकी उँगली पकड़कर चलना है। और इसी स्वीकार्य के साथ मेरी, हम सभी की पीड़ा धीरे-धीरे सेवा में बदल गई। हाथों की उँगलियाँ निवाला तैयार करती हैं, किसी बीते कल को जगाने के लिए नहीं, बल्कि आज को बचाने के लिए। बस खिलाने के लिए। मानों स्मृतियाँ थककर मौन हो गई हों, और प्रेम अकेला साथ निभा रहा हो।
☆ लघुकथा – मुंह पर थप्पड़☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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यह जानते ही मानसी ने जयंत को फोन किया।पहले तो जयंत ने मानसी का फोन अटैंड नहीं किया, और जब फोन उठाया तो सीधे जवाब देने की बजाय टालमटोली करता रहा, औरजब मानसी ने सीधे सीधे सवाल किया कि, “जयंत तुम यह बताओ कि वह तुम्हारे जो चाचाजी दहेज की सूची दे गए हैं, तो वह क्या तुम्हारी जानकारी में है?”
“हां! है तो ।”
“क्या, तुम उससे सहमत नहीं ?”
“नहीं।”
“मतलब असहमत हो?’
“नहीं, मैंने ऐसा तो नहीं कहा।”
“मतलब यह , कि वह सूची मेरे पापा व चाचा ने बनाई है, तो सहमत न होते हुए भी मुझे मानना पड़ेगा।—-और फिर इसमें बुराई भी क्या है, आख़िर तुम्हारी शादी आय.ए.एस. से जो हो रही है।इसमें तुम्हारे जीवन के शान व सुख-सुविधा से गुज़रने की गारंटी भी तो है।”
“मतलब, यह तुम लोगों का अंतिम फैसला है ?”
“हां!ऐसा ही समझो।’
“और हमारे प्यार का क्या ?”
“वह तो हमने तब किया था, जब मैं आय.ए.एस. नहीं था। ”
“ओके!तो मैं इस रिश्ते को अभी ख़त्म करती हूं।मुझे नहीं करना दहेज के लालचियों के घर अपना रिश्ता।”
और फुंफकारती हुई मानसी चली गई, और जुट गई जी-जान से यू.पी.एस.सी. की तैयारी करने में।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “दुखवा मैं कासे कहूँ?”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
घर के निरीह बूढ़े प्राणी की अंतिम सांसें चल रही थीं पर उसके प्राण कुछ कहने के लिए तड़प रहे थे। आंखों की पुतलियां बेचैनी में बार बार धरती को, आसमान को ताके जा रही थीं। होंठ थे कि कुछ कहने के लिए खुलते पर फिर कसमसा कर बंद हो जाते थे।
परिवार के सभी छोटे बड़े सदस्य उनकी चारपाई के इर्द गिर्द घेरा डाले हुए खड़े थे। आखिर उनके प्यारे पोते से उनकी हालत देखी न गयी, आंसुओं से बाबा के पांव को नम करने के बाद, माथा टिकाते कहा- कहिए न बाबा। आप जो कहना चाहते हैं ताकि आपकी आत्मा को मुक्ति मिले।
बाबा ने कोशिश करके मुंदी आंखें खोलीं, फिर परिवारजनों को निहारा और धीमे सुर में कहना शुरू किया -मेरे बच्चो। मेरा जन्म उस पंजाब में हुआ, जिसमें अमृतसर और लाहौर एक दूसरे की ओर पीठ करके नहीं बैठते थे बल्कि एक दूसरे के गले मिलते थे.. हाय.. फिर इनका बिछुड़ना भी इन आंखों ने देखा। कैसे कहूं?
– कहिए न बाबा..
– मेरे बच्चो। मेरी जवानी उस पंजाब के खेतों को हरा भरा करने में निकल गयी जिसे इंसानी लहू से सींचा क्या था? आह.. कैसे कहूं.. ? कैसा भयानक दौर आया। बंटवारे की धुंधली तस्वीर फिर सामने आ खड़ी हुई। और तुम मुझे पंजाब की अनजान धरती पर ले आए। अब..
– दुख कहो न बाबा..
– अब उस धरती पर अपने प्राण त्याग रहा हूं जहां मैंने न जन्म लिया, बचपन बिताया, न जवानी भोगी.. तुम लोगों ने मेरा बुढ़ापा खराब कर दिया। हे भगवान्…. । कुछ और मंज़र दिखाने से पहले इस धरती से मुझे उठा ले.. उठा ले..
इतना कहते कहते बाबा की गर्दन एक तरफ लुढ़क गयी.. एक प्रश्नचिन्ह बनाती हुई..