हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 19 ☆ लघुकथा – सलमा बनाम सोन चिरैया ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी . उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं. अब आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक लघुकथा  “सलमा बनाम सोन चिरैया”।  यह लघुकथा  मात्र लघुकथा ही नहीं अपितु मानवीय संवेदनाओं की पराकाष्ठा है, जिसे डॉ ऋचा जी की कलम ने  सांकेतिक विराम देने की चेष्टा की है और इसमें वे पूर्णतः सफल हुई हैं। डॉ ऋचा जी की रचनाएँ अक्सर यह अहम्  भूमिकाएं निभाती हैं । डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को ऐसी रचना रचने के लिए सादर नमन। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद – # 19 ☆

☆ लघुकथा –सलमा बनाम सोन चिरैया 

 

सलमा बहुत हँसती थी, इतना कि चेहरे पर हमेशा ऐसी खिलखिलाहट जो उसकी सूनी आँखों पर नजर ही ना पड़ने दे। गद्देदार सोफों, कीमती कालीन और महंगे पर्दों से सजा हुआ आलीशान घर? तीन मंजिला विशाल कोठी, फाइव स्टार होटल जैसे कमरे। हँसती हुई वह हर कमरा दिखा रही थी  — ये बड़े बेटे साहिल का कमरा है, न्यूयार्क में है, गए हुए ८ साल हो गए, अब आना नहीं चाहता यहाँ।

फिर खिल-खिल हँसी — इसे तो पहचान गई होगी तुम — सादिक का गिटार, बचपन में कितने गाने सुनाता था इस पर, उसी का कमरा है यह,  वह बेंगलुरु में है- 6 महीने हो गए उसे यहाँ आए हुए, मैं गई थी उसके पास। वह आगे बढी — ये गेस्ट रूम है, ये हमारा बेडरूम —- पति ? – —  अरे तुम्हें तो पता ही है सुबह ९ बजे निकलकर रात में १० बजे ही वो घर लौटते हैं – वही हँसी, खिलखिलाहट, आँखें छिप गई।

और ये कमरा मेरी प्यारी सोन चिरैया का — सोने -सा चमकदार पिंजरा कमरे में बीचोंबीच लटक रहा था, जगह – जगह छोटे झूले लगे थे। सोन चिरैया इधर – उधर उड़ती, झूलती, दानें चुगती और पिंजरे में जा बैठती।  कमरे का दरवाजा खुला हो तब भी वह बाहर नहीं उड़ती।

सलमा बोली – दो थीं एक मर गई, ये अकेली कब तक जिएगी पता नहीं? इस बार उसकी आँखें बोलीं थी।

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 34 – वापसी ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी  एक व्यंग्यात्मक  किन्तु शिक्षाप्रद लघुकथा  “वापसी । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #34☆

 

☆ लघुकथा – वापसी ☆

 

” यमदूत ! तुम किस ओमप्रकाश को ले आए ? यह तो हमारी सूची में नहीं है. इसे तो अभी माता-पिता की सेवा करना है , भाई को पढाना है. भूखे को खाना खिलाना है और तो और इसे अभी अपना मानव धर्म निभाना है .”

” जो आज्ञा , यमराज.”

” जाओ ! इसे धरती पर छोड़ आओ और उस दुष्ट ओमप्रकाश को ले आओ. जो पृथ्वी के साथ-साथ माता-पिता के लिए बोझ बना हुआ है .”

यमदूत नरक का बोझ बढ़ाने के लिए ओमप्रकाश को खोजने धरती पर चल दिया.

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य- लघुकथा ☆ संगमरमर  ☆ डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक 

 

(डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा रचित एक सार्थक लघुकथा   “संगमरमर ”.)

☆ लघुकथा – संगमरमर 

प्रशांत ने अपनी जमापूंजी एवं लोन लेकर अपने सपनों का घर बनवाया था । उसमें अपनी पसंद के संगमरमर के पत्थर  हॉल , बेडरूम एवं बाथरूम के फर्श पर लगवाये थे। आज प्रशांत तथा रश्मि बहुत खुश थे , ग्रह प्रवेश पर उन्होंने अपने सभी रिश्तेदारों एवं मित्रों को आमंत्रित किया था । सभी उसके घर की बहुत तारीफ कर रहे थे । देर रात तक पार्टी समाप्त हुई , दोनों मेहमानों की आवभगत करते करते बहुत थक चुके थे ।

रश्मि बाथरूम गई , संगमरमरी फर्श पर पानी पड़ा होने से उसका पैर अचानक फिसला और वह सिर के बल गिरी , उसका सिर फट गया । रश्मि की चीख सुनकर वह भी हड़बड़ाहट में बाथरूम की ओर भागा , तभी उसका भी पैर फिसला तथा उसका माथा नल की टोंटी से टकराकर फट गया ।

संगमरमरी मकान में रहने का सुख भोगने के पूर्व ही दोनों संग मर गये ।

 

© डॉ . प्रदीप शशांक 

37/9 श्रीकृष्णपुरम इको सिटी, श्री राम इंजीनियरिंग कॉलेज के पास, कटंगी रोड, माढ़ोताल, जबलपुर ,मध्य प्रदेश – 482002

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हिन्दी साहित्य ☆ धारावाहिक उपन्यासिका ☆ पगली माई – दमयंती – भाग 9 ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

(आज से प्रत्येक रविवार हम प्रस्तुत कर रहे हैं  श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी द्वारा रचित ग्राम्य परिवेश पर आधारित  एक धारावाहिक उपन्यासिका  “पगली  माई – दमयंती ”।   

इस सन्दर्भ में  प्रस्तुत है लेखकीय निवेदन श्री सूबेदार पाण्डेय जी  के ही शब्दों में  -“पगली माई कहानी है, भारत वर्ष के ग्रामीण अंचल में पैदा हुई एक ऐसी कन्या की, जिसने अपने जीवन में पग-पग पर परिस्थितिजन्य दुख और पीड़ा झेली है।  किन्तु, उसने कभी भी हार नहीं मानी।  हर बार परिस्थितियों से संघर्ष करती रही और अपने अंत समय में उसने क्या किया यह तो आप पढ़ कर ही जान पाएंगे। पगली माई नामक रचना के  माध्यम से लेखक ने समाज के उन बहू बेटियों की पीड़ा का चित्रांकन करने का प्रयास किया है, जिन्होंने अपने जीवन में नशाखोरी का अभिशाप भोगा है। आतंकी हिंसा की पीड़ा सही है, जो आज भी  हमारे इसी समाज का हिस्सा है, जिनकी संख्या असंख्य है। वे दुख और पीड़ा झेलते हुए जीवनयापन तो करती हैं, किन्तु, समाज के  सामने अपनी व्यथा नहीं प्रकट कर पाती। यह कहानी निश्चित ही आपके संवेदनशील हृदय में करूणा जगायेगी और एक बार फिर मुंशी प्रेम चंद के कथा काल का दर्शन करायेगी।”)

☆ धारावाहिक उपन्यासिका – पगली माई – दमयंती –  भाग 9 – संघर्ष ☆

(अब  तक आपने पढ़ा  —- पगली के जीवन की संघर्ष की कहानी , किस प्रकार पगली का विवाह हुआ, ससुराल में नशे की पीड़ा झेलनी पड़ी। अब आगे पढ़े——)

उस जहरीली शराब ने पगली से उसके पति का जीवन छीन लिया था। वह विधवा हो गई थी। अब घर गृहस्थी की गाड़ी खीचने का सारा भार पगली के सिर आन पड़ा था।
समय के साथ उसके ह्रदय का घाव भर गया था। पति के बिछोह का दर्द एवम् पीड़ा, गौतम के प्यार में कम होती चली गई थी। उसने परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए गौतम को उच्च शिक्षा दिलाने का निर्णय ले लिया था।  गौतम के भविष्य को लेकर अपनी आंखों में भविष्य के सुन्दर ख्वाब सजाये थे। अपने सपने पूरे करने के लिए उसने लोगो के घर चूल्हा चौका करना भी स्वीकार कर लिया था। वह रात दिन खेतों में मेहनत करती।  उसका एक मात्र उद्देश्य गौतम को पढा़ लिखा अच्छा हुनर मंद इंसान बनाना था, ताकि वह एक दिन देश व समाज के काम आये।

गौतम बड़ा ही प्रतिभाशाली कुशाग्र बुद्धि का था। व्यवहार कुशलता, आज्ञा पालन, दया, करूणा, प्रेम, जैसे श्रेष्ठ मानवीय गुणों उसे अपनी माँ से विरासत में मिले थे, जिन्हें उसने पौराणिक कथाओं को मां से सुन कर प्राप्त किया था। वह अपनी माँ के नक्शे कदम पर चलता।  लोगों की मदद करना उसका स्वभाव बन गया था।  बच्चों के साथ वह नायक की भूमिका में होता। सबके साथ खेलना, मिल बांट कर खाना उसका शौक था। उस वर्ष उसने अपने गांव के माध्यमिक विद्यालय की आखिरी कक्षा की अंतिम परीक्षा पूरे जिले में सर्वोच्च अंको से विशिष्ट श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। उसकी इस सफलता पर सारा गांव गौरवान्वित हुआ था। सबको ही अपने गांव के होनहार पर गर्व था, जो विपरीत परिस्तिथियों में संघर्ष करते हुए इस स्तर तक पहुँच सका था।

अब पगली के सामने गौतम को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए शहर मे रहने खाने की व्यवस्था करने की समस्या उत्पन्न हो गई थी, उसे कोई रास्ता सूझ नही रहा था।  वह ऊहापोह में पड़ी सोच ही रही थी, अब आगे की पढ़ाई की उसकी औकात नही थी। वह इसी उधेड़ बुन में परेशान थी, कि सहसा उसकी इस समस्या का समाधान निकल आया।

एक दिन उस गाँव के संपन्न परिवारों गिने जाने वाले एक नि:संतान दंपत्ति पं दीनदयाल पगली के घर किसी कार्यवश आये थे। बातों बातों में जब गौतम के पढ़ाई की चर्चा चली तो उन्होंने गौतम के आगे की पढ़ाई का खर्चा देने की हामी भर दी थी, तथा खर्च का साराभार अपने उपर ले कर पगली को चिंता मुक्त कर दिया था।  उसके बदले में पगली ने पं दीनदयाल के घर चौका बर्तन करने का जिम्मा सम्हाल लिया था। पगली की मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई थी। उसने मन ही मन में भगवान को कोटिश :धन्यवाद दिया था।

अब पं दीनदयाल ने खुद ही शहर जा कर मेडिकल की पढ़ाई हेतु अच्छे संस्थान में दाखिला करा दिया था।  गौतम के रहने खाने का उत्तम प्रबंध भी कर दिया था। गौतम जब भी छुट्टियों में घर आता, तो दोस्तों के साथ खेलता ठहाके लगा हंसता, तो पगली की ममता निहाल हो जाती।

कभी कभी जब गौतम पढ़ते पढ़ते थक कर निढाल हो पगली की गोद में लेट कर माँ के सीने से लग सो जाता। अलसुबह माँ जब चाय की प्याली बना बालों में उंगलियाँ फिराती गौतम को जगाती तो गौतम कुनमुना कर आंखें खोल मां के कठोर छालों से युक्त हाथों को हौले से चूम लेता और झुककर माँ के पैरों को छू लेता तो, उसे उन कदमो में ही जन्नत नजर आती और पगली का मन  पुलकित हो जाता साथ ही उसकी आंखें छलछला जाती।

– अगले अंक में7पढ़ें  – पगली माई – दमयंती  – भाग – 10 – आतंकवाद का कहर

© सूबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 18 ☆ लघुकथा – साजिश ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी . उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं. अब आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक लघुकथा  “साजिश”।  समाज में व्याप्त इस कटु सत्य को पीना इतना आसान नहीं है किन्तु,  सत्य आखिर सत्य तो है और नकारा नहीं जा सकता।  डॉ ऋचा जी की रचनाएँ अक्सर यह अहम्  भूमिकाएं निभाती हैं । डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को ऐसी रचना रचने के लिए सादर नमन। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद – # 18 ☆

☆ लघुकथा –साजिश 

बुढ़ापा … उम्र के इस दौर में वे दोनों किसी तरह जी रहे थे। एक बेटी और दो बेटों का भरा-पूरा परिवार था। वह घर जिसमें हमेशा चहल-पहल, हो-हल्ला मचा रहता था अब सन्नाटे में डूबा रहता। वृद्ध  दंपति के पास करने को कुछ नहीं था, करते क्या, शरीर भी तो साथ नहीं देता। सोचने को था बहुत कुछ बच्चों की बेशुमार यादें। पहले बेटी फिर ढ़ेरों मन्नतों के बाद दो बेटे  — कुलदीपक ?

जीवन पर्यंत जिम्मदारियों का निर्वाह, यथासंभव ……जी तोड़ कोशिश कर और अब …. अमावस की घोर कालिमा-सी वृद्धावस्था।

शुक्ल जी बड़े ही स्वाभिमानी व्यक्ति थे। बेटी को तो पराया धन मानते ही थे। बेटों के आगे भी कभी हाथ नहीं फैलाया। यह बात दूसरी है कि बेटी की शादी और बेटों को पढाने-लिखाने में तन और धन दोनों से खाली हो चुके थे। संतान के लिए जितना करो उतना कम।

अब बारी बेटों की। गेंद उनके पाले में – देखें कैसी खेलते हैं जीवन की यह पारी। दिनेश तो पढाई पूरी होते ही विदेश चला गया था। राहुल शहर में होकर भी पास नहीं था। कई बार शुक्ल जी ने फोन करके कहा – एक बार देख जा माँ को, दिन-पर-दिन तबियत बिगड़ती जा रही है। तुझे देखने को तरसती है। व्यस्त हूँ, जरूर आऊँगा – जैसे टालू उत्तर फोन पर शुक्ल जी सुनते रहे। मोबाईल युग है – सुख-दुःख फोन पर बँटते हैं। आवाजें पास, दिल दूर-दूर।

शुक्ल जी की बेटी रंजना को आज भी याद हैं पापा के वे शब्द – ‘बेटी ! हम पति-पत्नी मर जाएंगे लेकिन बेटों के सामने दया की भीख नहीं मांगेगे।’ माँ की भीगी आँखों की निरीहता भूली नहीं जाती। कैसी अकथनीय वेदना छिपी थी उन बूढी आँखों में।

माँ के अंतिम संस्कार की तैयारी चल ही रही थी कि ‘पापा नहीं रहे’ – वाक्य उसके कानों में पड़ा, दो उल्टियां हुई और सब खत्म। वह सन्न रह गयी।

पड़ोस की स्त्रियां बोली – ‘कितनी सौभाग्यशाली है सुहागिन मरी’ पुरुष बोले – ‘अच्छा हुआ शुक्ल जी पत्नी के जाते ही चल दिए, बहुओं का राज नहीं देखना पड़ा’, रंजना सच जानती थी। स्वाभिमान से जीने की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को उनके बेटों ने बेमौत मार डाला।

रंजना अपना दुःख कहे भी तो किससे ???

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 33 – व्यवहार  ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी  मानवीय आचरण के एक पहलू को दर्शाती लघुकथा  “व्यवहार  । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #33☆

☆ लघुकथा – व्यवहार ☆

माँ बेटी से परेशान थी और बेटी माँ. दोनों को एक दूसरे की आदतें नहीं सुहाती थी. इस से दोनों को नींद में चलने व बोलने की बीमारी हो गई थी.

“यह बूढ़िया भी न जाने कब तक जीएगी. यह मर क्यों नहीं जाती. ताकि इस की टोका टोकी से मुक्ति मिलें. यह जब तब मेरे मोबाइल में तांक झांक करती रहती है. मैं किस से बात करती हूँ,  क्या करती हूँ. कहां जाती हूँ. इसे मुझसे से क्या लेना देना है. ………..’’ यह बड़बड़ाते हुए बेटी बरामदें में टहल रही थी.

इधर माँ कह रही थी, “इस लड़की को न जाने क्या रोग लग गया. न जाने किस किस से बातें करती रहती है. कहीं किसी लड़के के साथ भाग गई या उस से मुंह काला करवा लिया तो मेरी नाक कट जाएगी. भगवान ! मैं क्या करूं ताकि इस नासपीटी को इस बीमारी से छुटकारा मिल जाए”,  कहते हुए माँ भी बरामदे में टहलते टहलते आ गई.

दोनों नींद में टहल रही थी. तभी दोनों एक दूसरे से टकरा गई.

अचानक हड़बड़ा कर माँ बेटी की नींद खुल गई.

“मां ! तू यहाँ क्या कर रही है? ”

“अरे ! तू यहां क्या कर रही है ?”’’ दोनों हड़बड़ा कर एक दूसरे से बोली.

“माँ! मैं तो जल्दी उठ कर पानी भरना चाहती थी ताकि तू परेशान न हो. तुझे आराम मिले. हर माँ की सेवा करना बेटी का फर्ज होता है.”

“अच्छा नासपीटी”, माँ ने मन ही मन बड़बड़ाते हुए कहा,  “बेटी ! तू सो जा चिंता मत कर. मैं पानी भर लूंगी. तू दिन भर पढ़ लिख कर थक जाती है. इसलिए तू आराम कर.” मां ने बुरा सा मुंह बना कर कहा. मगर, यह ध्यान रखा कि उस का मुंह बेटी न देख ले.

“अच्छा  माँ,  मेरी प्यारी माँ,  “बुरासा मुंह बनाते हुए बेटी अपनी मां से लिपट गई. मगर,  दोनों नींद में कही गई अपनी अपनी भावनाएं दबा गई. आखिर व्यवहारिकता का यही सलीका है.

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 34 – जूही का श्रृंगार ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

 

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  – एक भावप्रवण लघुकथा  “जूही का श्रृंगार”।  बचपन की स्मृतियाँ आजीवन हमारे साथ चलती रहती हैं और कुछ स्मृतियाँ भविष्य में  यदा कदा भावुकतावश नेत्र सजल कर देती हैं। श्रीमती सिद्धेश्वरी जी  का कथा शिल्प कथानक को सजीव कर देता है। इस अतिसुन्दर लघुकथा के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई। 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 34 ☆

☆ लघुकथा – जूही का श्रृंगार

जूही अपने घर परिवार में बहुत प्यारी बिटिया। सभी उसका ध्यान रखते और जूही भी सबका दिल जीत लेती।

घर के पास में ही फूल मंडी थी। इसलिए मम्मी पापा ने बिटिया के जन्म होते समय बहुत प्यार से बिटिया का नाम ‘जूही’ रख दिया। धीरे-धीरे जूही बड़ी होने लगी।

स्कूल पढ़ने जाने लगी। समय बीतता गया फूल मंडी में एक दादू बैठ, अपनी दुकान लगाते थे। जहां पर बचपन से वह पापा के साथ जाकर, फूल खरीद कर लाया करती थी। दादू भी जूही की बाल लीला को देखते देखते जाने कब उसे अपने स्नेह से अपना बना लिए कि बिना दुकान जाए जूही का मन नहीं लगता था।

दादू कहते… देखना जूही तेरी शादी के समय मैं इतना सुंदर फूलों का श्रृंगार बनाऊंगा कि सब देखते रह जाएंगे। दादू के मजाक करने की आदत और उनका अपनापन जूही को बहुत भाता था।

कालेज पढ़ने जूही दूसरे शहर गई हुई थी। जब भी आती दादू से जरूर मिल कर जाती थी। अब दादू सयाने हो चले थे।

एक दिन बातों ही बातों में उन्होंने कहा…. जूही मैं देखना किसी दिन चला जाऊंगा दुनिया से और तू मुझे बहुत याद करेगी।

जूही का मन बहुत व्याकुल हो उठता था, उनकी बातों से। अब दादू के दुकान पर उनका बेटा बैठने लगा था।

अचानक जूही की शादी तय कर दी गई। कुछ दिनों से जूही बाहर थी। घर आई शादी का कार्यक्रम शुरु हो चुका था। बहुत खुश जूही आज जल्दी से अपने दादू के पास जाने को बेकरार हो रही थी। क्योंकि दादू ने कहा था… शादी में फूलों का श्रृंगार बनाऊंगा। घर से निकलकर जूही दुकान पर पहुंची बेटे से पूछा…. कि दादू कहां है… उन्होंने एक पत्र निकाल कर दिया। पत्र पढ़ते ही धम्म से जूही पास की बेंच पर बैठ गई। क्योंकि उसके दादू तस्वीर में कैद हो चुके थे, और उनकी अंतिम इच्छा थी कि जब भी जूही आए, मुझे गुलाब के फूलों की माला पहनाकर मेरा श्रृंगार करें।

जूही को लगा आज सारे फूलों की खुशबू दादू के साथ चली गई है और जूही बिना सुगंध के रह गई। जूही ने भरे मन से तस्वीर पर माला पहनाया और घर वापस लौट आई।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य ☆ धारावाहिक उपन्यासिका ☆ पगली माई – दमयंती – भाग 8 ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

(आज से प्रत्येक रविवार हम प्रस्तुत कर रहे हैं  श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी द्वारा रचित ग्राम्य परिवेश पर आधारित  एक धारावाहिक उपन्यासिका  “पगली  माई – दमयंती ”।   

इस सन्दर्भ में  प्रस्तुत है लेखकीय निवेदन श्री सूबेदार पाण्डेय जी  के ही शब्दों में  -“पगली माई कहानी है, भारत वर्ष के ग्रामीण अंचल में पैदा हुई एक ऐसी कन्या की, जिसने अपने जीवन में पग-पग पर परिस्थितिजन्य दुख और पीड़ा झेली है।  किन्तु, उसने कभी भी हार नहीं मानी।  हर बार परिस्थितियों से संघर्ष करती रही और अपने अंत समय में उसने क्या किया यह तो आप पढ़ कर ही जान पाएंगे। पगली माई नामक रचना के  माध्यम से लेखक ने समाज के उन बहू बेटियों की पीड़ा का चित्रांकन करने का प्रयास किया है, जिन्होंने अपने जीवन में नशाखोरी का अभिशाप भोगा है। आतंकी हिंसा की पीड़ा सही है, जो आज भी  हमारे इसी समाज का हिस्सा है, जिनकी संख्या असंख्य है। वे दुख और पीड़ा झेलते हुए जीवनयापन तो करती हैं, किन्तु, समाज के  सामने अपनी व्यथा नहीं प्रकट कर पाती। यह कहानी निश्चित ही आपके संवेदनशील हृदय में करूणा जगायेगी और एक बार फिर मुंशी प्रेम चंद के कथा काल का दर्शन करायेगी।”)

☆ धारावाहिक उपन्यासिका – पगली माई – दमयंती –  भाग 8 – अंत्येष्टि ☆

(अब  तक आपने पढ़ा  —- किस प्रकार जहरीली शराब के सेवन से हाथ पांव  पीटते लोग मर रहे थे।  उसमें से एक अभागा पगली का पति भी था। अब आगे पढ़े—–)

उस दिन कुछ लोग उसके पति को सहारा दे पगली के दरवाजे पर लाये और घर से बाहर पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर लिटा कर चलते बने, घर के एक कोने में पड़ा उदास गौतम मौत की पीड़ा झेलते हाथ पांव पीटते अपने जन्मदाता को विवश हो सूनी सूनी आंखों से ताक रहा था।  कुछ भी करना उसके बस में नही था। वहीं पर पैरों के पास बैठी पगली अपने दुर्भाग्य पर अरण्य रुदन को विवश थी।  कोई भी तो नही था उसे ढाढ़स बंधाने वाला।  उसकी नशे की मस्ती अब मौत की पीड़ा में बदलती जा रही थी।

उस सर्द जाड़े की रात में जब सारा गाँव रजाइयों में दुबका नींद के आगोश में लिपटा पड़ा था। तब कोहरे की काली चादर में लिपटी रात के उस नीरव वातावरण में माँ बेटे रोये जा रहे थे कि- सहसा पास पड़े उस बेजान जिस्म में थोड़ी सी हलचल हुई, नशे में बंद आंखे थोड़ी सी खुली, जिसमें पश्चाताप के आंसू झिलमिलाते नजर आये,  हाथ क्षमा मांगने की मुद्रा में जुड़े, एक हिचकी आई फिर सब कुछ खामोश।

अब माँ बेटों के करूण क्रंदन से रात्रि की नीरवता भंग हो गई।  साथ ही गाँव के बाहर सिवान में सृगाल समूहों का झुण्ड हुंआ  हुंआ का शोर तथा कुत्तों का रूदन वातावरण को और डरावना बना रहे थे।

अब पगली के समक्ष पति के अन्त्येष्टि की समस्या एक यक्ष प्रश्न बन मुंह बाये खडी़ थी। जब कि उसके घर में खाने के लिए अन्न के दाने नही तो वह कफन के पैसे कहाँ से लाती।  यह तो भला हो उन गांव वालों का जो उसके बुरे वक्त में काम आए और अंतिम संस्कार में खुलकर मदद की तथा अपना पड़ोसी धर्म निभाया।

उस दिन उस गाँव के लोगों ने नशे से तबाह होते परिवार की पीड़ा को निकट से महसूस किया था तथा गाँव में किसी का चूल्हा उस दिन नहीं जला था। विधवा महिलाओं ने अपने वैधव्य का हवाला देकर उसे चुप कराया था। श्मशान में चिता पर लेटे पिता को मुखाग्नि का अग्नि दान दे गौतम ने अपने पुत्र होने का फर्ज निभाया था। वही श्मशान में कुछ दूर खड़ी पगली लहलह करती जलती चिता पर अपने जीवन के देवता के धू धू कर जलते शरीर को एकटक भाव शून्य चेहरे एवम् अश्रुपूरित नेत्रों से देखती जा रही थी।

ऐसा लगा जैसे उसे काठ मार गया हो, तभी सहसा गौतम माँ  के सीने से लग फूट फूट कर रो पड़ा था। उन माँ बेटों को रोता देख गाँव वासियों को लगा जैसे उनकी दुख पीड़ा देख महाश्मशान देवता भी रो पड़े हों।

– अगले अंक में7पढ़ें  – पगली माई – दमयंती  – भाग -9 –  संघर्ष 

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ सच्ची सुहागन ☆ श्रीमती सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

श्रीमती सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

( आदरणीय श्रीमती सविता मिश्रा ‘ अक्षजा’ जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आप हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं  (लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हायकु-चोका आदि)  की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आप एक अच्छी ब्लॉगर हैं। कई सम्मानों / पुरस्कारों  से सम्मानित / पुरस्कृत / अलंकृत हैं। आपकी कई रचनाएँ राष्ट्रिय स्टार की पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं एवं आकाशवाणी के कार्यक्रमों में प्रसारित हो चुकी हैं।  ‘रोशनी के अंकुर’ लघुकथा एकल-संग्रह प्रकाशित| आज प्रस्तुत है उनकी एक लघुकथा ‘ सच्ची सुहागन ‘.   हम भविष्य में आपकी चुनिंदा रचनाएँ अपने पाठकों से साझा करने की अपेक्षा करते हैं । )

 ☆ लघुकथा – सच्ची सुहागन ☆

पूरे दिन घर में आवागमन लगा था। दरवाज़ा खोलते, बंद करते, श्यामू परेशान हो गया था। घर की गहमागहमी से वह इतना तो समझ चुका था कि बहूरानी का उपवास है। सारे घर के लोग उनकी तीमारदारी में लगे थे। माँजी के द्वारा लाई गई साड़ी बहूरानी को पसंद न आई थी, वो नाराज़ थीं। अतः माँजी सरगी की तैयारी के लिए श्यामू को ही बार-बार आवाज दे रही थीं। सारी सामग्री उन्हें देने के बाद, वह घर के सभी सदस्यों को खाना खिलाने लगा। सभी काम से फुर्सत हो, माँजी से कह अपने घर की ओर चल पड़ा।

बाज़ार की रौनक देख अपनी जेब टटोली, महज दो सौ रूपये । सरगी के लिए ही ५० रूपये तो खर्च करने पड़ेंगे। आखिर त्योहार पर, फल इतने महँगे जो हो जाते हैं। मन को समझा, उसने सरगी के लिए आधा दर्जन केले खरीद ही लिए। वह भी अपनी दुल्हन को सुहागन रूप में सजी-धजी देखना चाहता था, अतः सौ रूपये की साड़ी और

शृंगार सामग्री भी ले ली।

सौ रूपये की लाल साड़ी को देख सोचने लगा, मेरी पत्नी तो इसमें ही खुश हो जायेगी। उसकी धोती में बहत्तर तो छेद हो गए हैं। अब कोठी वालों की तरह न सही, पर दो-चार साल में तन ढ़कने का एक कपड़ा तो दिला ही सकता हूँ। बहूरानी की तरह मुँह थोड़े फुलाएगी। कैसे माँजी की दी हुई साड़ी पर बहूरानी नाक-भौंह सिकोड़ रही थीं। छोटे मालिक के साथ बाजार जाकर, दूसरी साड़ी ले ही आईं।

मन में गुनते हुए ख़ुशी-ख़ुशी सब कुछ लेकर घर पहुँचा। अपने छोटे साहब की तरह ही, वह भी अपनी पत्नी की आँख बंद करते हुए बोला- “सोच-सोच क्या लाया हूँ मैं?”

“बड़े खुश लग रहे हो। लगता है कल के लिए, बच्चों को भरपेट खाने को कुछ लाए हो! आज तो भूखे पेट ही सो गए दोनों।”

 

© श्रीमती सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

फ़्लैट नंबर -३०२, हिल हॉउस, खंदारी अपार्टमेंट, खंदारी, आगरा, पिन- 282002

ई-मेल : 2012.savita.mishra@gmail.com

मो. :  09411418621

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 17 ☆ लघुकथा – बदलाव ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी . उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं. अब आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी  एक  लघुकथा  “ बदलाव ”।  समाज में व्याप्त नकारात्मक संस्कारों को भी सकारात्मक स्वरुप दिया जा सकता है। डॉ ऋचा जी की रचनाएँ अक्सर यह अहम्  भूमिकाएं निभाती हैं ।  डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को ऐसी रचना रचने के लिए सादर नमन। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद – # 17 ☆

☆ लघुकथा – बदलाव

माँ सुबह ६ बजे उठती है। झाड़ू लगाती है, नाश्ता बनाती है, स्नान कर तुलसी में जल चढ़ाती है। हाथ जोड़कर सूर्य भगवान की  परिक्रमा करती है।  मन ही मन कुछ कहती है। निश्चित ही पूरे परिवार के  लिए मंगलकामना करती है। पति-पुत्र को अपने व्रत और पूजा-पाठ के बल पर दीर्घायु करती है। बेटा देसी घी का लड्डू भले ही हो, बेटी भी उसके दिल का टुकड़ा है। दोपहर का खाना बनाती है। बर्तन माँजकर रसोई साफ करती है। कपड़े धोती है। शाम की चाय, रात का खाना, पति की प्रतीक्षा और फिर थकी बेसुध माँ लेटी है। बेटा तो सुनता नहीं, बेटी से पैर दबवाना चाहती है वह। दिन भर काम करते-करते पैर टूटने लगते है। माँ कहती है- बेटी ! मेरे पैरों पर खड़ी हो जा, टूट रहे हैं।

बेटी अनमने भाव से एक पैर दबाकर टी.वी. देखने भाग जाना चाहती है कि माँ उनींदे स्वर में बोलती है – बेटी ! अब दूसरे पैर पर भी खड़ी हो जा, नहीं तो वह रूठ जाएगा। बेटी पैरों को हाथ लगाने ही वाली थी कि ‘अरे ना- ना’, माँ बोल पड़ती है – ‘पैरों को हाथ मत लगाना, बस पैरों पर खड़ी हो जा।  बेटियाँ माँ के पैर नहीं छूतीं।’ नर्म –नर्म पैरों के दबाव से माँ के पैरों का दर्द उतरने लगता है या दिन भर की थकान उसे सुला देती है, पता नहीं…….. ?

अनायास बेटी का ध्यान माँ के पैर की उँगलियों में निश्चेष्ट पड़े बिछुवों की ओर जाता है। काले पड़े चाँदी के बिछुवों की कसावट से उंगलियां काली और कुछ पतली पड़ गयी हैं। बेटी एक बार माँ के शांत चेहरे की ओर देखती है और बरबस उसका हाथ बिछुवेवाली उँगलियों को सहलाने लगता है। बड़े भोलेपन से वह माँ से पूछ बैठती है – माँ तुम बिछुवे क्यों पहनती हो ?

नींद में भी माँ खीज उठती है – अरे ! तूने मेरे पैरों को हाथ क्यों लगाया ? कितनी बार मना किया है ना ! और कुछ भी पूछती है तू ? पहना दिए इसलिए पहनती हूँ बिछुवे, और क्या बताऊँ……

बेटी सकपका जाती है, माँ पैरों को सिकोडकर सो जाती है।

दृश्य कुछ वही है आज मैं माँ हूँ। याद ही नहीं आता कि कब, कैसे अपनी माँ के रूप में ढ़लती चली गयी। कभी लगता है – ये  मैं नहीं हूँ, माँ का ही प्रतिरूप हूँ। आज मेरी बेटी ने भी मेरे दुखते पैरों को दबाया, बिछुवे वाली उँगलियों को सहलाया, बिछुवों की कसावट थोडी कम कर दी, उंगलियों ने मानों राहत की साँस ली।

मैंने पैर नहीं सिकोडे। बेटी मुस्कुरा दी।

अरे ! यह क्या, बेटी के साथ-साथ मैं भी तो मुस्कुराने लगी थी।

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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