हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५६ – बाल रचनाएँ: १. श्रेया रानी २. अर्णव दादा  ३. आरोही – ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – बाल रचनाएँ: १. श्रेया रानी २. अर्णव दादा  ३. आरोही।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५६ ☆

☆ बाल रचनाएँ: १. श्रेया रानी २. अर्णव दादा  ३. आरोही ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

१. श्रेया रानी

श्रेया रानी खूब सयानी

प्यारी लगती कर नादानी

पल में हँसे, रूठती पल में

कभी लगे नानी की नानी

चाहे मम्मी कभी न टोंकें

करने दें जी भर मनमानी

लाड लड़ाती है दादी से

बब्बाजी से सुने कहानी

***

२. अर्णव दादा

अर्णव दादा गुपचुप आता

रहे शांत, सबके मन भाता

आँखों में सपने अनंत ले-

मन ही मन हँसता-मुस्काता

मम्मी झींके:’नहीं सुधरता,

कभी न खाना जी भर खाता

खेले कैरम हाथी-घोड़े,

ऊँट-वज़ीरों को लड़वाता

***

३. आरोही

धरती से निकली कोंपल सी

आरोही नन्हीं कोमल सी

अनजाने कल जैसी मोहक

हँसी मधुर, कूकी कोयल सी

उलट-पलटकर पैर पटकती

ज्यों मछली जल में चंचल सी

चाह: गोद में उठा-घुमाओ

करती निर्झर ध्वनि कलकल सी

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मंथन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मंथन ? ?

इस ओर असुर,

उस ओर भी असुर ही,

न मंदराचल,

न वासुकि,

तब भी-

रोज़ मथता हूँ

मन का सागर…,

जाने कितने

हलाहल निकले,

एक बूँद

अमृत की चाह में..!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८३ ☆ मुक्तक – ।। कांटों से डरो नहीं तो जीवन में गुलाब मिलता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८३ ☆

☆ मुक्तक ।। कांटों से डरो नहीं तो जीवन में गुलाब मिलता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

जिंदगी पल – पल यों ही ढलती जा रही है।

ऐसे ही कल – कल में चलती जा रही है।।

न कोई उत्साह उमंग जीने की आदमी को।

जैसे रेत बस मुठ्ठी से फिसलती जा रही है।।

=2=

बीज बनो ऐसे मिट्टी में दबकर फिर उग आओ।

फल से लद कर पेड़ की  तरह झुक जाओ।।

कोशिश हो हर क्षण  बिखर  कर संवरने की।

मीठा ही बोल सको जीवन में ऐसा रुख लाओ।।

=3=

कांटों से डरो नहीं तो जीवन में गुलाब मिलता है।

होली रंगों में भीग कर ही रंग गुलाल मिलता है।।

मन नियंत्रित हो आपकाऔर न कोई षडयंत्र हो।

तप कर ही हमें फिर सोने सा जलाल मिलता है।।

=4=

किरदार बनाओ खुशबू खुद सफर तय करती है।

प्रेम समा जाए खुद ही नफरत की शय मरती है।।

बस चार दिनों को ही मिलें हैं ये श्वास और प्राण।

जिंदादिली  ही तो जिंदगी से भय को हरती है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२४७ ☆ कविता – जो जैसा है सोचता वैसे करता काम… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – जो जैसा है सोचता वैसे करता काम..” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २४७ ☆

☆ जो जैसा है सोचता वैसे करता काम…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

चेहरा है शरीर का ऐसा अंग प्रधान

जिससे होती आई है हर जन ही पहचान।

* 

द्वेष भाव संसार में है एक सहज स्वभाव

जाता है बड़ी मुश्किल से कर ढेरों उपाय ।

 *

स्वार्थ, द्वेष हैं शत्रु दो सबके प्रबल महान

जो उपजाते हृदय में लोभ और अभियान | ।

 *

होती प्रीति की भावना गुण-दोषों अनुसार

पक्षपात होता जहाँ दुखी वही परिवार

 *

जिनका मन वश में सदा औ खुद पर अधिकार

उन्हें डरा सकता नहीं कभी भी यह संसार ।

 *

इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार

वैसा करता काम जन जैसा सोच विचार

 *

बहुतों को होता नहीं खुद का पूरा ज्ञान

 क्योंकि उनकी बुद्धि को हर लेता अभिमान।

 *

 हर एक जैसा सोचता वैसे करता काम

सहना पड़ता भी किये करमो का परिणाम ।

 ☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # १० – कविता – कई हैं… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “कई हैं…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # १०   ?

? कविता – कई हैं… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

रह घूँघट में, जेठ कई हैं,

ठाठ हैं किंचित, ठेठ कई हैं

*

अव्यवस्था की चपेट में

चिपकर मटियामेट कई हैं

*

बच भागे, बेदाग़ वे देखो

मालूम जिनको गेट कई हैं

*

राशन मुफ़्त, योजना अनगिन

तब भी भूखे पेट कई हैं

*

खाट खड़ी, चकराया सर भी

चीज़ एक ही, रेट कई हैं

*

राजनीति के मकड़जाल में

फँसकर भी, अपडेट कई हैं

*

ऑफिस फाइल बाबू अफ़सर

कानूनी अलसेट कई हैं

*

कांक्रीट सिटी में बिजनेस

ग्राहक ज्यों आखेट कई हैं

*

ईमान बिक जाता सस्ता

ऐसे भी मार्केट कई हैं

*

सत्ता हुक़ूमत पॉवर उनकी

जिनके चमचे-प्लेट कई हैं

*

शोर, चुनावी – वादों हेतु

बैनर फ्लैक्स पैम्फलेट कई हैं

*

दुर्घटना में वो ही फटते

सर जो बिन हेलमेट कई हैं

*

फास्ट हुए न, रह गए पिछड़े

ऐसे लेज़ी – लेट कई हैं

*

न्यू जनरेशन उलझे जिसमें

ऐसे इण्टरनेट कई हैं

*

परहेज प्याज – लहसुन से

और खाते आमलेट कई हैं

*

पेट्रोल – डीजल के दाम पर

बिक जाते, घासलेट कई हैं

*

समझें वे ख़ुद को अमरीका

जिनके बम – रॉकेट कई हैं

*

श्री -श्री के कुर्ता – पाजामा

शूट – बूट जाकेट कई हैं

*

ढूंँढ़ न पाओगे, काला धन

गोपनीय पॉकेट कई हैं

*

गई मरोड़ी, वही गर्दनें

गले जिनके लॉकेट कई हैं

*

लाइफ भी तो इक क्रिकेट है

अब तक गिरे विकेट कई हैं

*

मिली जगह ना, केबिनेट में

बेचारे अपसेट कई हैं

*

टिकट जुगाडू वे ही पाते

जिनके लाग-लपेट कई हैं

*

बॉस की टेबल, के क्या कहने

बिल कम, पेपर – वेट कई हैं

*

मीडिया सोशल, रील-वीडियो

डेटाखोर, झकलेट कई हैं

*

ब्लैक आँकड़े, व्हाइट साइन

बिल हो रये, जनरेट कई हैं

*

बैलेट उनके ही फेवर में

जिनके पास, बुलेट कई हैं

*

“चुनावी आपदा” कम्बल-बॉटल

बँट जाते, पैकेट कई हैं

*

सी.बी.आई. भी, है अचरज़ में

दफ़्तर के सीक्रेट कई हैं

*

सियासती बैटिंग – फील्डिंग में

बॉलर कई, रन – रेट कई हैं

*

राजनीति के गलियारे में

बिछते कालीन – मेट कई हैं

*

हीरा पक्ष, विपक्षी सोना

इन सबके, कैरेट कई हैं

*

हंगामा बरपा है, चूँकि

स्कैण्डल – रैकेट कई हैं

*

चेतावनी लिखी है, फ़िर भी

पीते, बीड़ी-सिगरेट कई हैं

*

निजीकरण की स्पर्धा में

उलझे, कारपोरेट कई हैं

*

स्वच्छता अभियान है ज़ारी

ग़ुम – शुदा, टॉयलेट कई हैं

*

पॉवरफुल विज्ञापन जहँ-तहँ

बाज़ारू टैबलेट कई हैं

*

प्लेन खटारा, क्रैश हो रहे

मरने को पॉयलेट कई हैं

*

स्कूल सरकारी लेकिन

खर्चे भी प्रायवेट कई हैं

*

सी.डी., डी.वी.डी. के युग में

फँसी हुई कैसेट कई हैं

*

वाई-फाई ई-डिजिटल मैट्रो

लिंक – लैस गैजेट कई हैं

*

ई.डी. छापा, बाल न बाँका

सैफ्टी – सेफ – सैप्रेट कई हैं

*

पॉलिटिकल स्कोर बोर्ड में

ज़ीरो सिम्पल, ग्रेट कई हैं

*

ज़हाँपनाह! जहँ पनाह मांगे

अ – हिन्दी स्टेट कई हैं

*

गुरु अगर साइलेण्ट मोड पर

चेले भी वाइब्रेट कई हैं

*

सोर्स फुल एप्रोच करप्शन

एक्टिव ब्यूरोक्रेट कई हैं

*

वर्ल्ड वार का असली रीजन

बम ग्रेनेड औ जेट कई हैं

*

नये क़रतब क्यों न क्रिएट हों

अब भी एसोसिएट कई हैं

*

हैं डकैत और लठैत ऐसे

जिनके पास फिएट कई हैं

*

दिन अच्छे ‘राजेश‘ आ गए

नौकर विरले, सेठ कई हैं ll

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विधान ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विधान ? ?

चाँदनी के आँचल से

चाँद को निरखते हैं,

इतने विधानों के साथ

कैसे लिखते हैं..?

सीधी-सादी कहन है मेरी

बिम्ब, प्रतीक,

उपमेय, उपमान

तुमको दिखते हैं..!

?

© संजय भारद्वाज  

21.10.20, रात्रि 10:09

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १ – कविता – पूजनीय वृक्ष… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘पूजनीय वृक्ष…‘।)

? कविता – पूजनीय वृक्ष…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

ईश् पर ही खिला था पुष्प,

मंदिर जा, शीश पर चढ़ा दिया,

नगण्य  हुआ सौंदर्य भी,

जीवन भी कमतर हुआ,

एक बूंद अश्रु की,

पाषाण से, नीचे को ढलक गई,

भावना तो दिखी नहीं,

सुंदर रचना भी मिट गई,

… स्वत: ही बीज बनकर,

नव अंकुर को पोषता,,

उफ़!! यह सारी संभावना,,

सिरे से खत्म हो गई…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७२ ☆ बाल कविता – तोड़ गगन से तारे… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७२ ☆ 

☆ बाल कविता – तोड़ गगन से तारे… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

चमचम तेरी चोंच चिरइया

तोड़ गगन से तारे।

अँधियारा धरती पर फैला

कर घर-घर उजियारे।

* 

गीत सुना तारों को बढ़िया

खुश हो जाएँ सारे।

खुशियाँ-खुशियाँ घर-घर बरसें

निश्छल मन हों प्यारे।

 *

फूल खिलें धरती भी महके

बचपन हमें पुकारे।

खेल-खेल में पढ़ना सीखें

खेल करें हम न्यारे।

 *

चंदा जी को जाकर कहना

रोज चाँदनी लाएँ।

लुकना-छिपना बन्द करें वे

सदा – सदा मुसकाएँ।

  ☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०१ – कविता – ☆ मन तो सब का होता है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “मन तो सब का होता है…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०१ ☆

☆ मन तो सब का होता है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

मन तो सब का होता है

बस, एक पहल की जरूरत है।

*

निष्प्रही, भाव – भंगिमा

चित्त में,मायावी संसार बसे

कैसे फेंके यह जाल, मछलियां

खुश हो कर, स्वयमेव  फंसे,

ताने-बाने यूं चले, निरन्तर

शंकित  मन  प्रयास  रत है

बस एक पहल की जरूरत है।

*

ये, सोचे, पहले  वे  बोले

दूजा सोचे, मुंह ये, खोले

जिह्वा से दोनों मौन, मुखर

-भीतर एक-दूजे को तोले

रसना कब निष्क्रिय होती है

उपवास, साधना या व्रत है

बस एक पहल की जरूरत है।

*

रूकती साँसे किसको भाये

स्वादिष्ट लालसा, रोगी को

रस, रूप, गंध-सौंदर्य, करे 

-मोहित,विरक्त-जन, जोगी को

ये अलग बात,नहीं करे प्रकट

वे अपने मन के, अभिमत हैं

बस एक पहल की जरूरत है।

*

आशाएं,  तृष्णाएं  अनन्त

मन में जो बसी, कामनायें

रख इन्हें, लिफाफा बन्द किया

किसको भेजें, न समझ आये

नही टिकिट, लिखा नहीं पता

कहाँ पहुंचे यह ,बेनामी खत है

बस एक पहल की जरूरत है।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२२ ☆ धूप स्वेटर पहन कर आई ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “धूप स्वेटर पहन कर आई”।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२२ ☆ धूप स्वेटर पहन कर आई ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

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हवाओं में

घुल रही ठिठुरन

धूप स्वेटर पहनकर आई।

 

ओस ने गीला किया

फूलों का लो तन

कँपकँपी के पाँव ने

जकड़ा है तन-मन

 

शिराओं में

दौड़ती सिहरन

धुँध कुहरे को पकड़ लाई।

 

खेत में फैली ख़ुशी

अँकुराए हैं दिन

मेंड़ कहती कान में

धरती बनी दुल्हन

 

मचानों पर

बैठ अपनापन

फूँकता है सगुन शहनाई।

 

नदी बैठी घाट पर

सुड़कती है चाय

रात लेकर चाँद को

कहे टाटा बाय

 

कुनकुनी सी

सूरज की किरन

चुभ रही काँटे सी पुरवाई।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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