image_print

हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ #82 – शिक्षक दिवस एवं “स्मार्ट क्लास ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक (श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है।आज प्रस्तुत है श्री अरुण डनायक जी के  शिक्षक दिवस से सम्बंधित संस्मरण  “शिक्षक दिवस एवं "स्मार्ट क्लास”) ☆ जीवन यात्रा #82 – शिक्षक दिवस एवं "स्मार्ट क्लास" ☆  विगत 5 सितम्बर को ही में हम सब ने शिक्षक दिवस मनाया। भारत के यशस्वी राष्ट्रपति डा.सर्वपल्ली राधा कृषणन...
Read More

हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ सूरज पुनः उठेगा …. युवा कवि स्व. महीप प्रशांत ☆ श्री अजीत सिंह, पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन

श्री अजीत सिंह (हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज  श्री अजीत सिंह जी द्वारा प्रस्तुत है ई-अभिव्यक्ति के जीवन-यात्रा स्तम्भ के अंतर्गत  ‘’सूरज पुनः उठेगा …. युवा कवि स्व. महीप प्रशांत ’। हम आपकी अनुभवी कलम से ऐसे ही आलेख समय-समय पर साझा करते  रहेंगे।) (कुरुक्षेत्र के युवा कवि स्व महीप प्रशांत) ☆ जीवन यात्रा ☆ सूरज पुनः उठेगा …. युवा कवि स्व. महीप प्रशांत ☆ (वानप्रस्थ में हिंदी पखवाड़ा - युवा कवि स्व महीप प्रशांत का स्मरण को याद किया) कुरुक्षेत्र में पले बढ़े महीप प्रशांत मात्र 21 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कह गए पर अपने पीछे उच्च स्तर की साहित्यिक रचनाओं का जो अच्छा खासा खज़ाना छोड़ गए हैं, वह उन्हें अमर बनाए रखेगा। हिंदी पखवाड़े के उपलक्ष्य में आयोजित एक वेबिनार में हिसार की वानप्रस्थ संस्था ने जहां एक ओर हिंदी भाषा के इतिहास, विकास, चुनौतियों और संभावनाओं पर विचार किया वहीं...
Read More

हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ #81 – 3 – पन्ना के जुगल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक (श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है।आज प्रस्तुत है श्री अरुण डनायक जी के जीवन के श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से जुड़े अविस्मरणीय एवं प्रेरक संस्मरण/प्रसंग “पन्ना के जुगल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े ”) ☆ जीवन यात्रा #81 – 3 – पन्ना के जुगल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े ☆  (मेरी आगामी पुस्तक घुमक्कड़ के अध्याय...
Read More

हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ #80 – 2 – पूज्य बाबूजी को उनके 93 वें जन्म दिन पर परिवार के श्रद्धा सुमन ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक (श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. आज प्रस्तुत है श्री अरुण डनायक जी के जीवन के श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से जुड़े अविस्मरणीय एवं प्रेरक संस्मरण/ प्रसंग     “ जीवन यात्रा  -पूज्य बाबूजी को उनके 93 वें जन्म दिन पर परिवार के श्रद्धा सुमन”) ☆ जीवन यात्रा #80 – 2 –पूज्य बाबूजी को उनके 93 वें जन्म दिन पर...
Read More

मराठी साहित्य – जीवन-यात्रा ☆ आत्मसंवाद – फिरुनी नवी जन्मेन मी – भाग तिसरा ☆ सुश्री सुमती जोशी

सुश्री सुमती जोशी  ☆ आत्मसंवाद – फिरुनी नवी जन्मेन मी – भाग तिसरा ☆ सुश्री सुमती जोशी ☆ आई म्हणून घडत असताना आपली मुलं आपल्याला अनेक धडे देत असतात. आपण शिकत जातो, साच्यात बंदिस्त न होता स्वत:ला नव्यानं घडवू लागतो. वयानं लहान असली तरी कधीकधी ती आपल्याला नवीन काहीतरी सुचवत असतात. माझ्याही  बाबतीत तसंच काहीसं घडलं. माझा धाकटा मुलगा आँकॉलॉजी या विषयात सुपर स्पेशलायझेशन करायला तीन वर्षांसाठी अहमदाबादला जायला निघाला, सूनही तिच्या पी.एच.डी.च्या कामात व्यस्त होती. निघतांना तो मला म्हणाला, “आई, मी आता तीन वर्षे इथे येणार नाही. तुला काही करायचं असलं तर कर.” हे वाक्य माझ्या जीवनाला कलाटणी देणारं ठरलं. उत्क्रांती लिहून झाल्यावर आलेलं रिकामपण खायला उठत होतं. एखादी नवीन भाषा का शिकू नये? असं वाटल्यावर शोधाशोध सुरू झाली. गोरेगावला प्रतिमा गोस्वामी एका म्युनिसिपल शाळेत बंगालीचे वर्ग घेत असत. त्यांना फोन लावला, पण सप्टेंबर महिना उलटून गेला असल्यामुळे त्यांनी प्रवेश नाकारला. चिवटपमाणे परत फोन केला. जूनमध्ये वर्ग सुरू झालेले असल्यामुळे चार महिने बरंच काही शिकवून झालं होतं. ते मी पुन्हा शिकवणार नाही,...
Read More

मराठी साहित्य – जीवन-यात्रा ☆ आत्मसंवाद – फिरुनी नवी जन्मेन मी – भाग दुसरा ☆ सुश्री सुमती जोशी

सुश्री सुमती जोशी  ☆ आत्मसंवाद – फिरुनी नवी जन्मेन मी – भाग दुसरा ☆ सुश्री सुमती जोशी ☆ जीवनात बरेचदा योगायोगानं घटना घडत असतात. आपण मात्र सगळ्याचं श्रेय घ्यायला टपलेले असतो. यात गैर काही नाही. तो मनुष्य स्वभाव आहे. नाना जोशी यांनी मला ‘उत्क्रांती’ या विषयावर लिहायला सांगितलं. उत्क्रांती हा विषय आकाशाला गवसणी घालण्यासारखा. ‘उत्क्रांतीचा डार्विनने मांडलेला सिद्धांत’ हा नानांना अभिप्रेत असलेला विषय होता. मी त्याला आधुनिक विज्ञानाची जोड द्यायचे  ठरवले. म्हणजेच जनुकीय शास्त्रानुसार डी.एन.ए. आर.एन.ए. या रेणूंची रचना कशी असते, जनुक म्हणजे काय, याचा सगळ्यांना समजेल असा अर्थ सांगायचा. संशोधनाचा उपयोग मानवजातीच्या कल्याणासाठी व्हावा असाच उद्देश असतो. या संशोधनाचा उपयोग माणसांचं जीवनमान उंचावायला, जीवन सुसह्य व्हायला झालाय का? हे मुद्दे विचारात घेऊन त्यांचा उहापोह करावा अशी माझ्यापुरती सीमारेषा मी आखून घेतली. या विषयाकडे वळण्यापूर्वी एक महत्त्वाचा मुद्दा इथे सांगायला हवा. माझ्या घराजवळ असलेल्या एका शाळेत राष्ट्रीय शिष्यवृत्तीच्या परीक्षेची तयारी करून घेण्यासाठी वर्ग चालवले जात. इयत्ता आठवी आणि नववीचे विद्यार्थी त्यात सहभागी होत. सी.बी.एस.सी.च्या बारावीपर्यंतचा अभ्यासक्रम यात समाविष्ट केलेला असे. इतका विस्तृत अभ्यासक्रम आठवी...
Read More

मराठी साहित्य – जीवन-यात्रा ☆ आत्मसंवाद – फिरुनी नवी जन्मेन मी – भाग पहिला ☆ सुश्री सुमती जोशी

सुश्री सुमती जोशी  ☆ आत्मसंवाद - फिरुनी नवी जन्मेन मी – भाग पहिला ☆ सुश्री सुमती जोशी ☆ सूर्य, चंद्र, ग्रह, तारे, आकाशगंगा सारे आपापल्या मार्गाने वाटचाल करत असतात. तोच सूर्य आणि तोच चंद्र. तरीही सकाळ झाली की आपण म्हणतो सूर्योदय झाला. चंद्राच्या वाढत्या आणि कमी होणाऱ्या कला पाहून आपण रोज रात्री नव्यान चंद्र बघितल्याची  अनुभूती घेत असतो. मलाही स्वत:च्या बाबतीत तसंच काहीसं वाटलं. रोज उगवणारा दिवस वेगळा. त्या दिवसाची आव्हानं, कर्तव्य, कामगिऱ्या यात वेगळेपणा असतो. त्यानुसार आपण दिनचर्येत बारीक बारीक बदल करत असतो. एका तत्त्ववेत्त्याने म्हटलंय, आजचा मी कालच्या मीपेक्षा वेगळा आहे. वाटलं, बरोबर आहे. जीवनाच्या धकाधकीत येणाऱ्या नित्यनव्या अनुभवांमुळे आपली मतं बदलत राहतात. विशेषत: अडचणीच्या काळात आप्तेष्टांची खरी कसोटी होते. आपल्या भवतालाविषयी, मित्र, सखेसोयरे यांच्याविषयी आपले काही आडाखे असतात. अनुभवानुसार आपण त्यातही बदल करतच असतो. तेव्हा जीवनात ‘बदल’ हाच ‘नित्य’ असतो. कालची मी आज नाही. रोज माझा नव्यानं जन्म होत असतो, असा मला विश्वास वाटतो.    संसारिक जबाबदाऱ्या काही प्रमाणात कमी झाल्या. मुलं आपापल्या शिक्षणात गुंतली होती. तेव्हा माझी मैत्रीण डॉक्टर मीना...
Read More

हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ #79 – 1 हल षष्ठी की यादें: मातृशक्ति को नमन ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक (श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है श्री अरुण डनायक जी के जीवन के श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से जुड़े अविस्मरणीय एवं प्रेरक संस्मरण/ प्रसंग     “ जीवन यात्रा #79-1 हल षष्ठी की...
Read More

हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ मेरी यात्रा…. मैं अब भी लड़ रही हूँ – भाग -18 – सुश्री शिल्पा मैंदर्गी ☆ प्रस्तुति – सौ. विद्या श्रीनिवास बेल्लारी

सुश्री शिल्पा मैंदर्गी (आदरणीया सुश्री शिल्पा मैंदर्गी जी हम सबके लिए प्रेरणास्रोत हैं। आपने यह सिद्ध कर दिया है कि जीवन में किसी भी उम्र में कोई भी कठिनाई हमें हमारी सफलता के मार्ग से विचलित नहीं कर सकती। नेत्रहीन होने के पश्चात भी आपमें अद्भुत प्रतिभा है। आपने बी ए (मराठी) एवं एम ए (भरतनाट्यम) की उपाधि प्राप्त की है।) ☆ जीवन यात्रा ☆ मेरी यात्रा…. मैं अब भी लड़ रही हूँ – भाग – 18 – सुश्री शिल्पा मैंदर्गी  ☆ प्रस्तुति – सौ. विद्या श्रीनिवास बेल्लारी☆  (सौ विद्या श्रीनिवास बेल्लारी) (सुश्री शिल्पा मैंदर्गी के जीवन पर आधारित साप्ताहिक स्तम्भ “माझी वाटचाल…. मी अजून लढते आहे” (“मेरी यात्रा…. मैं अब भी लड़ रही हूँ”) का ई-अभिव्यक्ति (मराठी) में सतत प्रकाशन हो रहा है। इस अविस्मरणीय एवं प्रेरणास्पद कार्य हेतु आदरणीया सौ. अंजली दिलीप गोखले जी का साधुवाद । वे सुश्री शिल्पा जी की वाणी को मराठी में लिपिबद्ध कर रहीं हैं और उसका  हिंदी भावानुवाद “मेरी यात्रा…. मैं अब भी लड़ रही हूँ”, सौ विद्या श्रीनिवास बेल्लारी जी  ने किया है। इस श्रंखला की यह अंतिम कड़ी है। )   'नवरत्न' परिवार में मेरा प्रवेश...
Read More

हिन्दी साहित्य – मासिक स्तम्भ ☆ खुद से खुद का साक्षात्कार #4-2 – डॉ. हंसा दीप ☆ आयोजन – श्री जय प्रकाश पाण्डेय, संपादक ई-अभिव्यक्ति (हिन्दी)

श्री जय प्रकाश पाण्डेय वर्तमान में साहित्यकारों के संवेदन में बिखराव और अन्तर्विरोध क्यों बढ़ता जा रहा है, इसको जानने के लिए साहित्यकार के जीवन दृष्टिकोण को बनाने वाले इतिहास और समाज की विकासमान परिस्थितियों को देखना पड़ता है, और ऐसा सब जानने समझने के लिए खुद से खुद का साक्षात्कार ही इन सब सवालों के जवाब दे सकता है, जिससे जीवन में रचनात्मक उत्साह बना रहता है। साक्षात्कार के कटघरे में बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं, जो अपना सीना फाड़कर सबको दिखा देते हैं कि उनके अंदर एक समर्थ, संवेदनशील साहित्यकार विराजमान है। कुछ लोगों के आत्मसाक्षात्कार से सबको बहुत कुछ सीखने मिलता है, क्योंकि वे विद्वान बेबाकी से अपने बारे में सब कुछ उड़ेल देते है। खुद से खुद की बात करना एक अनुपम कला है। ई-अभिव्यकि परिवार हमेशा अपने सुधी एवं प्रबुद्ध पाठकों के बीच नवाचार लाने पर विश्वास रखता है, और इसी क्रम में हमने माह के हर दूसरे बुधवार को “खुद से खुद का साक्षात्कार” मासिक स्तम्भ प्रारम्भ  किया हैं। जिसमें...
Read More
image_print