हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०८ ☆ “व्यंग्य पच्चीसी…” – लेखक : श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित  व्यंग्य पच्चीसीपर चर्चा।

(१४ जून को लोकार्पित)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०८ ☆

☆ “व्यंग्य पच्चीसी…” लेखक : श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक : व्यंग्य पच्चीसी

लेखक:सुरेश पटवा

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

 मुखौटे उतारती एक बेबाक कृति – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य केवल हास्य उत्पन्न करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यवस्था और समाज के भीतर झाँकने की एक पैनी दृष्टि है।

मैं प्रायः कहता रहा हूं कि व्यंग्यकार को गन्ने का शुगर फ्री रस निकाल कर प्रस्तुत करना आना चाहिए । वह खुद समाज से भिन्न नहीं होता । उसे समाज में रहते हुए उसकी मरम्मत का जिम्मा उठाना पड़ता है। मां की भांति दुलारते पुचकारते हुए समाज सुधार करना व्यंग्य का नैतिक कार्य है।

“व्यंग्य  स्वतंत्र विधा से पहले, एक ‘स्पिरिट’ है जो कहीं भी समाहित हो सकती है।

इन तथ्यों के साथ ” सुरेश पटवा की कृति ‘व्यंग्य पच्चीसी’ का मूल्यांकन करना  प्रासंगिक हो जाता है। पटवा एक बहुविध रचनाकार हैं, जिनकी भाषा में सहजता, शैली में चुटीलापन और दृष्टि में जन-सरोकारों की स्पष्टता है।

 एक सजग लेखक का सामाजिक आईना

‘व्यंग्य पच्चीसी’ अपने शीर्षक के अनुरूप पच्चीस विविध व्यंग्य रचनाओं का संग्रह है। यह पुस्तक न केवल पाठक का मनोरंजन करती है, बल्कि उसे आत्ममंथन के लिए बाध्य भी करती है। लेखक का व्यंग्य उपहास नहीं, बल्कि यथार्थ का ‘अनावरण’ है। वे व्यक्ति पर प्रहार करने के बजाय समाज में व्याप्त कुत्सित प्रवृत्तियों, सत्ता के छल-प्रपंच, बौद्धिक पाखंड, और बाजारवाद की विडंबनाओं को बेनकाब करते हैं।

पटवा जी की लेखन प्रक्रिया स्वयं में एक प्रयोग है। वे जिस कृति पर काम करते हैं, उसके प्रतिदिन के लेखन को सार्वजनिक कर बौद्धिक पाठकों के साथ  सतत संवाद स्थापित करते हैं। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और चुटीली है। इस संग्रह की प्रमुख शिल्पगत विशेषता , बुंदेली के स्थानीय प्रयोग, सटीक मुहावरे और ‘आइटम संत’ जैसे स्वनिर्मित शब्दों का  जीवंत प्रयोग है।

 व्यंग्य लेखों में शिल्पगत विविधता है ।।व्यंजना और लक्षणा शब्द शक्ति का प्रभावपूर्ण उपयोग, रूपकों एवं फैंटेसी के माध्यम से व्यंग्य को धारदार बनाया गया है।

 अभिव्यक्ति में कटाक्ष और शिष्टता का संतुलन है। तीखे प्रहारों के बावजूद भाषा मर्यादित है। व्यक्तिगत आक्षेप या किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध फूहड़ता नहीं है, जो लेखक की परिपक्वता को दर्शाता है। वैचारिक धरातल पर

यह संग्रह समकालीन जीवन के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करता है। ‘मोबाइल व्यथा कथा’ और ‘फ़ेस्बुकिया करनी-भरनी’ आज के डिजिटल दौर की विसंगतियों पर  कटाक्ष हैं।

‘प्रखर साहित्यजीवी’ और ‘व्यंग्य लेखन की परेशानी’ जैसे व्यंग्य लेखों में पुरस्कार-लोलुपता और साहित्यिक परिवेश की विडंबनाओं का यथार्थ चित्रण है।

प्रशासनिक विडंबनाएं उजागर करते व्यंग्य  ‘छिद्दी का बकरी लोन’, ‘भ्रष्टाचार का बुल्डोजर’ और ‘ओम बजटाय नमः’ आदि रचनाएँ सत्ता और दफ्तरों की नौकरशाही मानसिकता पर चोट करती हैं। ‘सभ्य जंगल की सैर’ आधुनिकता और प्रकृति-विमुखता के अंतर्विरोधों को बखूबी रेखांकित करती है।

 

‘व्यंग्य पच्चीसी’ पारंपरिक व्यंग्य-परंपरा का विस्तार है, जिसमें व्यंग्य के ट्रायपॉड परसाई , जोशी और त्यागी जैसे पुरोधाओं की वैचारिक परंपरा की गूँज तो है, किंतु शैली पूर्णतः मौलिक और समकालीन है।

यद्यपि कहीं-कहीं लेखक की विद्वत्ता व्यंग्य की संक्षिप्तता को  प्रभावित करती है, तथापि यह पुस्तक समकालीन व्यंग्य का एक  दस्तावेज़ है।

यह संग्रह सामान्य पाठक के लिए रोचक, चिंतनशील पाठक के लिए गंभीर और नए लेखकों के लिए व्यंग्य की समझ को लेकर एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में  सक्षम है। सुरेश जी की यह कृति सिद्ध करती है कि आज व्यंग्य विधा समाज की चेतना को झकझोरने का  सशक्त माध्यम है।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

(मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी से पुरस्कार प्राप्त)

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४८ – पुस्तक समीक्षा – लघु की विराटता – संपादक – सुमति कुमार जैन  ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्री सुमति कुमार जैन जी द्वारा संपादित पुस्तक – “लघु की विराटताकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४८

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ लघु की विराटता – संपादक – सुमति कुमार जैन ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

पुस्तक- लघु की विराटता

संपादक-  सुमति कुमार जैन

प्रकाशक- दीपज्योति ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन, महावीर मार्ग, अलवर- 301001 (राज) मोबाइल नंबर 94148 93120

पृष्ठ संख्या- 444

मूल्य- 500

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

☆ लघु की विराटता को दर्शाती पुस्तक ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

लघु में कथा समेटे हो वह लघुकथा होती है। इसमें निदान होता है। समस्या के समाधान से दूर रहती है। बस ! अपने में एक तीक्ष्णता और व्यंग्यता को समाए रखती है। प्रारंभ में इसे लघु कथा कहा जाता था। इस मायने में भारतेंदु हरिश्चंद्र को लघुकथा का जनक माना जाता है। इन्होंने इसी पैमाने पर खरी उतरने वाली लघुकथाएं लिखी थी।

इसके पश्चात कई रचनाकारों ने इसे पुष्पित व पल्लवित किया है। इसमें मुख्य रूप से प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, वजाहत, जगदीश कश्यप, विष्णु नागर, यशपाल, चंद्रभान शर्मा गुलेरी, राजेंद्र यादव, काशीनाथ सिंह, हरिशंकर परसाई, सतीशराज पुष्करणा सहित अनेक रचनाकार हुए हैं जिन्होंने इसे विकसित व स्थापित किया है।

वहीं वर्तमान में अनेक रचनाकार इसे गति प्रदान कर रहे हैं। ये नवोदित रचनाकारों को प्रशिक्षित करते हुए अपने रचनाकर्म में भी लिप्त हैं। इनमें मधुदीप गुप्ता, योगराज प्रभाकर, रूप देवगुण, राजकुमार निजात, अनिल शूर आजाद, रामकुमार घोटड़, मधुकांत, अशोक भाटिया, अशोक जैन, बलराम, सतीश दुबे  सुभाष नीरव, रामेश्वर कांबोज हिमांशु, सुकेश साहनी, कमल चोपड़ा, माधव नागदा, संतोष सुपेकर, कांताराय, चंद्रेश कुमार छतलानी आदि अनेक नामों को प्रमुखता से लिया जा सकता है।

लघुकथा के विकास में पत्र-पत्रिकाओं के साथ विभिन्न प्रतियोगिताओं और संकलनों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होंने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रस्तुत समीक्ष्य लघुकथा संकलन- लघुकथा की विराटता, उसी परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा। इसका संपादन- जगमग दीप ज्योति, मासिक पत्रिका के संपादक सुमति कुमार जैन ने किया है। जो अनेक वर्षों से संपादनकर्म में संलग्न है।

प्रस्तुत संकलन में लघुकथा की विराटता को रचनाओं की गुणवत्ता में समेटने का प्रयास किया गया हैं। इसमें अनेक लघुकथाएं प्रतिष्ठित रचनाकारों की सम्मिलित की गई है। लघुकथा के चमकते नामों में से प्रमुख- कमल चोपड़ा, माधव नागदा, मधुकांत, पूरणसिंह,  प्रबोधकुमार गोविल, राजकुमार निजात, रामकुमार घोटड़, रामचरण यादव, रमेश मनोहरा, रामेश्वर कांबोज, रामरतन यादव, रूप देवगुण, शराफत अली खान, मुकेश साहनी, त्रिलोकसिंह ठकुरेला सहित अनेक लघुकथाकारों को इसमें सम्मिलित किया गया है।

इसके अलावा इस पुस्तक में कई नवोदितों को स्थान देकर प्रोत्साहित किया गया है। मगर, इसी के साथ ही संपादक ने रचनाधर्मिता को प्राथमिकता देने का प्रयास किया है। इस प्राथमिकता के आधार पर जनजीवन के संघर्ष, उसके यथार्थ स्वरूप और उत्थान-पतन पर प्रश्नचिन्ह लगाती कथाओं को प्राथमिकता के साथ सम्मिलित किया है।

चार सौ छिय्यासी पृष्ठों के इस विराट संकलन में कुल मिलाकर एक सौ दस रचनाकारों की लघुकथाएं संकलित की गई है। मुख्य पृष्ठ इसकी सांकेतिकता को प्रदर्शित करता है। साज-सज्जा व छपाई उत्तम है । पृष्ठ संख्या के हिसाब से मूल्य वाजिब है। साथ ही सभी लघुकथाएं पठनीय बन पड़ी है। इस संकलन का लघुकथा के क्षेत्र में हार्दिक स्वागत किया जाएगा। ऐसा समीक्षक का विश्वास है।

——–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

24-09-2021

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०७ ☆ “खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)…” – लेखिका : किरण लता वैद्य ‘कठिन’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है किरण लता वैद्य ‘कठिन’ जी द्वारा लिखित  खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०७ ☆

☆ “खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)…” – लेखिका : किरण लता वैद्य ‘कठिन’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक .. खिड़की से झाँकता चेहरा (कहानी संग्रह)

लेखिका : किरण लता वैद्य ‘कठिन’

प्रकाशक: माय बुक्स 

मूल्य : २५० रु

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ समकालीन हिंदी कथा साहित्य की एक सार्थक और पठनीय कृति – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

खिड़की से झाँकता चेहरा समकालीन हिंदी कहानी की उस परंपरा का  संग्रह है , जिसमें कथा का उद्देश्य मनोरंजन मात्र नहीं, मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक विडंबनाओं और जीवन मूल्यों को पाठक तक पहुँचाना  है। इस संग्रह की कहानियाँ किसी वैचारिक घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि जीवन के साधारण से दिखने वाले प्रसंगों के भीतर छिपे असाधारण मानवीय अनुभवों को उजागर करती हैं।

लेखिका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जटिल सामाजिक प्रश्नों को सहज और संप्रेषणीय भाषा में प्रस्तुत करती हैं।

संग्रह की चौदह कहानियाँ रिश्तों, संघर्षों, स्त्री जीवन, सामाजिक असमानताओं और मानवीय करुणा के विविध रंगों को समेटती हैं।

संग्रह की पहली कहानी वीरा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह कहानी अपराध, दंड और पुनर्वास जैसे गंभीर विषय को नवाचारी मानवीय दृष्टि से देखती है। एक किशोर की भूल उसके पूरे जीवन को अंधकार में धकेल सकती थी, किंतु कहानी स्थापित करती है कि मनुष्य को उसके एक अपराध से नहीं, बल्कि उसके परिवर्तन की स्वीकार्यता क्षमता से भी पहचाना जाना चाहिए। वीरा का तबला वादक के रूप में स्थापित होना केवल व्यक्तिगत सफलता की कथा नहीं, बल्कि समाज द्वारा दिए गए दूसरे अवसर की सार्थकता का प्रमाण है। कहानी में करुणा, आत्मग्लानि, संघर्ष और पुनर्जन्म की भावनाएँ प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में लेखिका सफल हैं। 

शीर्षक कहानी , खिड़की से झाँकता चेहरा संग्रह की प्रभावी मार्मिक रचनाओं में है। खिड़की यहाँ केवल वास्तु का हिस्सा नहीं, बल्कि स्त्री जीवन की सीमाओं और उसकी आकांक्षाओं का प्रतीक बन जाती है। कंचन का चरित्र उस भारतीय स्त्री का प्रतिनिधित्व करता है जो घर की चारदीवारी में कैद होकर भी बाहर की दुनिया को लालसा के साथ देखती है।

लेखिका बिना आक्रोश की भाषा के इस्तेमाल किए , स्त्री की मौन यातना को पाठक के मन तक पहुँचा देती हैं।  

कृतज्ञ , कहानी मानवीय संबंधों में स्मृति और ऋण स्वीकार की दुर्लभ भावना को रेखांकित करती है। आज के स्वार्थ प्रधान समय में जब सफलता अक्सर व्यक्ति को उसकी जड़ों से दूर कर देती है, यह कहानी बताती है कि जीवन में आगे बढ़ने के बाद भी उन हाथों को याद रखना कितना आवश्यक है जिन्होंने कठिन समय में सहारा दिया था। कहानी का भावपक्ष अत्यंत सशक्त है और पाठक के भीतर मानवीय विश्वास को पुनर्जीवित करता है।

कथनी और करनी ,  वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कहानी है। थर्ड जेंडर के प्रश्न को केंद्र में रखकर लेखिका समाज की उस दोहरी मानसिकता को उजागर करती हैं जहाँ समानता की बातें तो बहुत की जाती हैं, किंतु व्यवहार में स्वीकार्यता का अभाव दिखाई देता है। कहानी अपने शीर्षक को पूर्णतः सार्थक करती है और पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करती है।

संग्रह की शक्ति इसकी संवेदनात्मक प्रामाणिकता है। लेखिका ने जीवन को दूर खड़े होकर नहीं देखा, बल्कि उसके बीच उतरकर अनुभव किया है। इसलिए पात्र कृत्रिम नहीं लगते और घटनाएँ बनावटी प्रतीत नहीं होतीं।

भाषा सरल है, किंतु उसमें भावों की ऊष्मा बनी है। कहीं-कहीं कथानक आदर्शवादी मोड़ लेते हैं, फिर भी वे पाठक को अस्वाभाविक नहीं लगते क्योंकि उनके पीछे लेखिका का मानवीय विश्वास सक्रिय रहता है।

खिड़की से झाँकता चेहरा उन कहानी संग्रहों में है जिन्हें पढ़कर केवल कथाएँ याद नहीं रहतीं, बल्कि उनके पात्र मन में बस जाते हैं। यह संग्रह पाठक को निराशा के अंधेरे में भी आशा की  किरण दिखाता है और यही इसकी साहित्यिक उपलब्धि है।

मानवीय मूल्यों, रिश्तों की गरिमा और सामाजिक संवेदना को केंद्र में रखने वाला यह संग्रह समकालीन हिंदी कथा साहित्य की एक सार्थक और पठनीय कृति है। मेरी शुभेच्छा लेखिका के साथ हैं।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

(साहित्य अकादमी से सम्मानित लेखक,  समालोचक)

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ कथाकार सुश्री मृदुल कोस्टा की लघु कथा कृति – मृदुल दृष्टि’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ कथाकार सुश्री मृदुल कोस्टा की लघु कथा कृति – मृदुल दृष्टि ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

यह सर्व मान्य है कि जबलपुर के पाथेय प्रकाशन ने पिछले वर्षों में अधिकाधिक साहित्यिक कृतियों को प्रकाशित करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक कीर्तिमान स्थापित किया है। इसी तारतम्य में पिछले दिनों पाथेय प्रकाशन ने चर्चित लेखिका सुश्री मृदुल कोस्टा की एक ऐसी पठनीय कृति की प्रभावी प्रस्तुति की है जिसमें पाठकों को अपनी अपनी रुचि के अनुसार गद्य और पद्य की विभिन्न रचनायें पढ़ने को मिल सकती है।

 मृदुल दृष्टि संकलन की अनेक रचनाएं ऐसी हैं जो लेखिका के हृदय में सहज मानवीय संवेदना से उत्पन्न हुई प्रतीत होती हैं। कृति का गहनता से अध्ययन मनन करने के बाद यह बात तो सामने आती है कि लेखिका की दृष्टि अत्यंत व्यापक है और उन्होंने पाठकों के प्रत्येक वर्ग की रुचि और पसंद के अनुरूप अपनी सृजित रचनाओं को पुस्तक में शामिल किया है। इस संग्रह में विभिन्न सारगर्भित और सामयिक विषयों पर आलेख, कहानियां, संस्मरण, कविताओं इत्यादि ऐसी रचनाओं सम्मिलित हैं जो कि पाठकों के लिए पठनीय तो हैं ही साथ में उनके जीवन के लिए दिशा दर्शक और प्रेरणा का विषय भी बन सकती हैं। इस कृति की एक अन्य खूबी यह भी है कि वह पाठकों को भटकाव या पलायन से रोकती है और परिस्थितियों से संघर्ष करने की अपील करती है। कुरीतियों में जकड़ी नारी हो या संघर्ष से घबराया – थका पुरुष, सभी के लिए अधिकांश रचनाओं में अविराम संघर्षजयी बनने का प्रोत्साहन देने की लालसा भी लेखिका में विद्यमान है और इस कारण वे प्रायः सकारात्मक दृष्टिकोण कायम रखती हैं। यद्यपि कहीं कहीं विषमताओं और विद्रूपताओं के प्रति खीझ भी स्पष्ट दिखती है लेकिन उसके बाद भी अनौचित्य से संघर्ष की उनकी मानसिक दृढ़ता कहीं कमजोर दिखाई नहीं देती है। मुझे विश्वास है कि यह कृति समाज के सभी वर्गों के लिए उपयोगिता और पठनीयता की दृष्टि से एक श्रेष्ठ कृति साबित होगी।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०६ ☆ “आकांक्षा” (काव्य संग्रह) – कवि : श्री परमानन्द सिन्हा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री परमानन्द सिन्हा जी द्वारा लिखित  काव्य संग्रह आकांक्षापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०६ ☆

☆ “आकांक्षा” (काव्य संग्रह) – कवि : श्री परमानन्द सिन्हा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

काव्य संग्रह : आकांक्षा

कवि : श्री परमानन्द सिन्हा

प्रकाशक : बुक्स क्लिनिक, बिलासपुर

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ ‘आकांक्षा’ काव्य संग्रह कवि की आंतरिक यात्रा और उनके जीवन की  अनुभूतियों का निचोड़ है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

साहित्य में काव्य की सार्थकता केवल शब्दों के चयन या तुकबंदी में नहीं, बल्कि उन जीवन मूल्यों में निहित होती है जो समाज को संबल प्रदान करते हैं। कविता , अभिव्यक्ति की सर्वाधिक प्राचीन विधा है।  कंठस्थ रहने में सुगमता एवं साहित्य के कलात्मक सौंदर्य के चलते बरसों से काव्य,  साहित्य के शिखर पर है। एक रचनाकार जब अपनी अनुभूतियों को कागज़ पर उतारता है, तो वह स्वयं को व्यक्त ही नहीं करता, बल्कि अपने युग की धड़कनों को स्वर देता है।

‘आकांक्षा’ काव्य संग्रह इसी उदात्त परंपरा का निर्वहन करता है, जहाँ कविता मनोरंजन की परिधि से बाहर निकलकर आत्म-चिंतन और नैतिक बोध का माध्यम बनती है। काव्य मूल्यों की कसौटी पर यह संग्रह इसलिए खरा उतरता है क्योंकि इसमें सत्य की कटुता और संवेदना की कोमलता का अद्भुत संतुलन है। जब मैं इन कविताओं से गुजरा  तो मैंने पाया कि रचनाकार मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज रायपुर के सहपाठी , वहां मेरे प्रारंभिक साहित्यिक सफर के सहयात्री भाई परमानंद सिन्हा जी ने जीवन के प्रति एक सकारात्मक और मूल्यपरक दृष्टिकोण अपनाया है, जो आज के अस्थिर परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक तथा महत्वपूर्ण है।

इस संग्रह की समालोचना करते हुए यह स्पष्ट होता है कि कवि ने अपनी रचनाओं में भाव और यथार्थ का जो शाश्वत तथ्यों का ताना-बना बुना है, वह अत्यंत सुदृढ़ है। उदाहरण के लिए,

सुगंधित फूलों के संग,

काटें भी तो बेशुमार है।

खुशियों की नदी बहती है,

पर दुख भी तो अपार है।

 इसी प्रकार,  कवि की लेखनी मर्म स्पर्शी हो जाती है,  वे लिखते हैं

अंधियारे को देखा पिघलते हुये,

रवि की किरणों को मचलते हुये।

शीतल सुखद थी, सुबह की बयार,

पंछी उड़ चले, चह चहाते हुये।

इन पंक्तियों में छायावादी गीत चेतना परिलक्षित होती है। जो प्रकृति परिवेश का शाब्दिक चित्र बनाती है।

एक मिजाज के गीत एक खंड में संजोकर उन्होंने पाठकों के लिए अलग अलग गुलदस्ते एक साथ प्रस्तुत किए हैं।

लंबे अंतराल में मनोभावों को शब्दों में प्रस्तुत कविताओं को संग्रह के अंतिम स्वरूप में प्रकाशित कर एक विशद साहित्यिक , संपादन का उनका प्रयास स्तुत्य है।

संग्रह के काव्य विधान, शैली और भाषा की बात करें तो इसमें एक सहज प्रवाह और माधुर्य है जो पाठक को अंत तक बांधे रखता है। कवि ने क्लिष्ट और बोझिल शब्दावली के स्थान पर ऐसी सुगम भाषा का प्रयोग किया है जो जनमानस से सीधे संवाद करती है। उनकी शैली वर्णनात्मक होते हुए भी प्रतीकों और बिंबों से इस प्रकार सजी हुई है कि कविता पढ़ते समय दृश्य जीवंत हो उठते हैं।

यहाँ उपमा और रूपक अलंकारों का प्रयोग किसी कृत्रिम साज-सज्जा की तरह सायास नहीं, बल्कि भावों की तीव्रता बढ़ाने के लिए स्वाभाविक रूप से हुआ है।

छंदों की गति और लय  में एक आंतरिक संगीत है, जो इन रचनाओं को केवल पढ़ने योग्य ही नहीं, बल्कि गुनगुनाने योग्य भी बनाता है। शिल्प और कथ्य का यह सामंजस्य श्री परमानंद सिन्हा जी के काव्य संग्रह ‘आकांक्षा’ को एक विशिष्ट साहित्यिक पहचान दिलाता है।

अंततः, ‘आकांक्षा’ काव्य संग्रह कवि की आंतरिक यात्रा और उनके जीवन की  अनुभूतियों का वह निचोड़ है जो समाज के लिए उनकी अप्रतिम भेंट सिद्ध होगा । इस काव्य कृति के माध्यम से कवि ने अपनी रचनात्मकता का जो परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। मैं रचनाकार से यह मंगलमयी आशा करता हूँ कि भविष्य में भी उनकी लेखनी इसी प्रकार सा+हित के  रचनात्मक लोक कल्याणी मार्ग पर प्रशस्त रहेगी। पाठकों को उनसे यह अपेक्षा रहेगी कि वे मानवीय संवेदनाओं के और भी सूक्ष्म धरातलों को अपनी लेखनी से स्पर्श करेंगे और समाज में व्याप्त जड़ता को तोड़ने के लिए निरंतर सृजनरत रहेंगे।  यह साहित्यिक यात्रा निरंतर पल्लवित हो और ‘आकांक्षा’ पाठकों के हृदय में अपना स्थायी स्थान बनाए, यही मेरी हार्दिक मनोकामना है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ सुवीर श्रीवास्तव वीर की काव्य धारा में है सामाजिक संचेतना – चर्चित काव्य कृति ‘रंग मेरे जीवन के’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ सुवीर श्रीवास्तव वीर की काव्य धारा में है सामाजिक संचेतना – चर्चित काव्य कृति ‘रंग मेरे जीवन के’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

अभी पिछले कुछ दिनों पहले साहित्यिक क्षेत्र में पाथेय प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रसिद्ध कवि श्री सुवीर श्रीवास्तव वीर की काव्य कृति रंग मेरे जीवन के पाठकों के मध्य काफी चर्चा में रहा। इस संग्रह की कविताएं वास्तव में एक सामाजिक व्यक्ति के जीवन में सुख दुख के विभिन्न रंगों का विशविश्लेषण करती नज़र आती हैं और इसीलिए कृति की कविताओं ने पाठकों को ज्यादा प्रभावित किया है।कवि ने अपने आसपास जो भी देखा और महसूस किया वह उनकी कलम से कागज पर उतर आया और जो भी उन्होने रचा वह पाठकों के लिए पठनीय बन गया । सुवीर जी की रचनाएं किसी व्यक्ति के मानस पटल पर एक अनूठी छाप छोड़ती हैं।कवि की अधिकांश कविताएं पाठकों को अत्यंत सार्थकता और गंभीरता के साथ कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं जैसे उनकी इस कविता की ये पंक्तियां देखिए –

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अब जबकि मेरे बाजू/ बड़े हो गये हों/ साथ साथ अब बूढ़ा पेड़/मेरे बाजुओं में/ समाता नहीं है— /मैं आंखों ही आंखों में नापता हूं / मोटाई इसकी /और/सोचता हूं/मन ही मन/ बढ़ते कुनबे के लिए/कमरा एक और बनाना है/ सोफ़ा भी घर का / हो गया पुराना है/ मेरे आंगन का पेड़/ बूढ़ा हो गया है।
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कवि न तो निराशा की बात सोचता है और नहीं निराशा की बात करता है बल्कि कवि आज की व्यवस्था और परिस्थितियों में भी पूर्ण रूप से आशावादी नजर आता है । कवि की रचना में गंभीर सोच का ये उदाहरण भी देखें –
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बहुत अंधेरा है,
सूरज का
कोई टुकड़ा लाओ
‌ चिपका दो
किसी दीवार पर
फेविकोल से
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इस काव्य कृति की शुरुआत में प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री प्रतुल श्रीवास्तव जी की प्रतिक्रिया अत्यंत प्रभावी और महत्वपूर्ण है। वे लिखते हैं कि- इन कविताओं में रसभाव और प्रभाव है। मुक्त छंद का यही पक्ष मुक्त छंदीय कविताओं के सौंदर्य को बनाए रखता है। परिवेश की विकृति के प्रति आक्रोशित इन रचनाओं में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि है ।

इस संग्रह में सुप्रसिद्ध साहित्यकार,पाथेय प्रकाशन के संयोजक श्री राजेश पाठक प्रवीण ने रचनाओं का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि सामाजिक पाखंड, दोगलापन और मूल्य हीनता से व्यथित कविवर सुवीर श्रीवास्तव वीर की काव्य धारा में द्वन्द और वेदना के साथ दृष्टिबोधक तत्व मुखरित हुआ है।उनकी आस्था मन की श्रेष्ठता के संधान में है।भाई श्री सुवीर श्रीवास्तव वीर जी की 98 काव्य रचनाओं के इस संग्रह की सोचनीय और सार्थक कविताओं से साहित्यिक क्षेत्र को काफी आशाएं हैं और पाठकों के मध्य वर्ष 2025 की ये एक श्रेष्ठ कृति सिद्ध होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०५ ☆ “’बिट्टू…” – लेखक : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित  “बिट्टूपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०५ ☆

☆ “’बिट्टू…” – लेखक : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक – ‘बिट्टू’ 

लेखक डॉ. संजीव कुमार

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ मातृत्व की  पावन तपस्या पर अभिनव उपन्यास – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

डॉ. संजीव कुमार का  ‘बिट्टू’ कालजयी और शाश्वत साहित्यिक मूल्यों को रेखांकित करता नया रोचक उपन्यास है। वे विविध नवाचारी विषयों, और विधाओं में इतना सारा मौलिक रच चुके हैं कि रिकॉर्ड बुक्स में लगातार दर्ज होकर साहित्यिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे हैं।

हिंदी उपन्यास साहित्य का मूल उद्देश्य मानव मन की अतल गहराइयों को छूना और समाज को एक संवेदनशील आईना दिखाना है। यह कृति इस साहित्यिक मानक पर शत प्रतिशत खरी  है।

उपन्यास  एक बंधी-बंधाई कहानी नहीं है, बल्कि स्त्री के अस्तित्व, उसकी अदम्य जिजीविषा और मर्मस्पर्शी त्याग का एक जीवंत दस्तावेज़ है। यह समाज को करुणा और संवेदना के शाश्वत मूल्यों से जोड़ता है। उपन्यास की नायिका ‘बिट्टू’ एक शांत, विनम्र और बेहद हँसमुख स्त्री है, जिसका जीवन विवाह के शुरुआती दिनों में किसी मधुर गीत की तरह खुशियों से भरा हुआ था। किंतु, कहानी का मुख्य साहित्यिक द्वंद्व ‘माँ बनने की अभिलाषा’ से शुरू होता है। दस वर्षों का लंबा और मरुस्थल जैसा इंतज़ार, समाज के तीखे ताने और पारिवारिक दबाव के बीच बिट्टू का संघर्ष पाठक को भावनात्मक रूप से अपने साथ बहा ले जाता है।

लेखक ने यहाँ बड़ी कुशलता से दिखाया है कि कैसे एक स्त्री का मातृत्व केवल उसकी व्यक्तिगत इच्छा नहीं रह जाता, बल्कि उसे सामाजिक प्रतिष्ठा का एक क्रूर प्रश्न बना दिया जाता है।

इस कथा-प्रवाह में बिट्टू का चरित्र अटूट विश्वास और संकल्प के एक ऊंचे शिखर की तरह प्रस्तुत किया गया है। जहाँ एक ओर बिट्टू का पति उसके मातृत्व को लेकर मौन धारण कर लेता है और रूढ़िवादी समाज उसे ‘दोषी’ ठहराने लगता है, वहीं बिट्टू अपनी आस्था की लौ को बुझने नहीं देती।

 वह मंदिर, मन्नत, व्रत और डॉक्टरों के चक्कर काटकर भी हार नहीं मानती। यहाँ तक कि अपनी जान दांव पर लगाकर सर्जरी का बड़ा जोखिम उठाना, उसके इसी संकल्प को दर्शाता है कि वह अपने मातृत्व को पूर्ण करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

लेखक की भाषा सरल होते हुए भी गहरी संवेदनाओं को व्यक्त करने में पूरी तरह सक्षम है। पूरी रचना में प्रतीकों और उपमाओं का बहुत ही सुंदर और ललित प्रयोग किया गया है। उदाहरण के लिए, जब बीमारी की रिपोर्ट आती है, तो लेखक उसे “वज्रपात” के समान बताते हैं। यह ललित शैली पाठक के हृदय में आदि से अंत तक करुणा का संचार करती चलती है।

उपन्यास में संतान हीनता पर सामाजिक प्रताड़ना के यथार्थ को चित्रित करते हुए लेखक लिखते हैं कि, “शुरू-शुरू में घरवाले उसे समझाते, लेकिन धीरे-धीरे ताने और फुसफुसाहटें बढ़ने लगीं। कोई कहता- ‘शायद इसी में कोई दोष है।’ कोई कहता- ‘इतने साल हो गये, अब क्या उम्मीद!'”, यह अंश हमारे समाज की उस कड़वी और नग्न सच्चाई को उजागर करता है, जहाँ बाँझपन का सारा दोष केवल और केवल स्त्री के माथे मढ़ दिया जाता है। लेखक ने यहाँ सीधे प्रहार के बजाय “फुसफुसाहटों” शब्द का जो प्रयोग किया है, वह उस मानसिक पीड़ा को दर्शाता है जो किसी सीधे वार से भी अधिक गहरी और जानलेवा होती है। परंतु, इस घने अंधकार के बाद मातृत्व की उपलब्धि और परम तृप्ति का वह उजला क्षण भी आता है, जब वह पहली बार अपने बच्चे को गोद में लेती है। उसकी आँखों से अविरल अश्रु धारा बह निकलती हैं और वह मन ही मन कहती है,  “हे भगवान, अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए… तूने मुझे माँ बना दिया।”, यहाँ बिट्टू के दस वर्षों के तप और संघर्ष का एक सुखद अंत होता है। “अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए” का यह भाव यह सिद्ध करता है कि एक भारतीय स्त्री के लिए जीवन का चरम लक्ष्य और उसकी संपूर्णता मातृत्व की प्राप्ति ही है।

परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। कहानी का सबसे कारुणिक मोड़ तब आता है जब वह ब्रेन ट्यूमर जैसी घातक बीमारी की चपेट में आ जाती है। लेकिन इस काल के सामने भी बिट्टू टूटती नहीं है, बल्कि वह नियति और मृत्यु पर अपनी ममता से विजय प्राप्त करती है। अपने अंतिम दिनों में, वह काँपते हाथों से अपने मासूम बच्चे के सिर पर हाथ रखती है और कहती है,  “बेटा, मज़बूत बनना। माँ ने तेरे लिए बहुत इंतज़ार किया था… अब तू ही मेरा संसार है।” मृत्यु के द्वार पर खड़ी होकर भी अपने बेटे के भविष्य की यह चिंता और उसके चेहरे की शांति यह संकेत देती है कि उसने अपनी जीवन-साधना पूरी कर ली है। अब उसे मृत्यु का कोई भय नहीं है।

साहित्यिक मानकों की कसौटी पर यदि हम इस कृति को परखें, तो ‘बिट्टू’ बांझपन की सामाजिक विसंगति पर एक अत्यंत सफल, प्रौढ़ और श्रेष्ठ उपन्यास सिद्ध होता है। अरस्तू के प्रसिद्ध ‘विरेचन सिद्धांत’ के अनुसार, जो साहित्य पाठक के मन के विकारों को धोकर उसे करुणा से पवित्र कर दे, वही उत्तम साहित्य है। यह उपन्यास पाठक के भीतर इसी पवित्र करुणा का संचार करता है। भारतीय काव्यशास्त्र के सिद्धांतों वस्तु,  अर्थात् पात्र-चित्रण, रस और उद्देश्य के कड़े मानकों पर यह रचना पूरी तरह सुदृढ़ और संतुलित है। इसका शिल्प और इसका कथ्य दोनों ही उच्च कोटि के हैं। डॉ. संजीव कुमार ने एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक कृति हिंदी साहित्य को सौंपी है, जो पाठकों को पुस्तक बंद करने के बाद भी देर तक सोचने पर विवश करती है। यह उपन्यास दुःख की राख से अपनी खुशियों का संसार बुनने वाली एक साधारण स्त्री के असाधारण और कालजयी महागाथा बनने की अमर कहानी है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०४ ☆ “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’” – लेखक : डॉ. इन्द्रजीत सिंह ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ इंद्रजीत सिंहजी द्वारा लिखित  “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०४ ☆

☆ “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’” – लेखक : डॉ इंद्रजीत सिंह ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कृति: ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’

लेखक : इंद्रजीत सिंह

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग

मूल्य : 330 रु

आलेख: विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल

☆ यह पुस्तक संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

“अलेक्सा, प्ले हिट्स ऑफ लता…” ड्राइंग रूम के किसी कोने से महज़ इतना कहने भर की देर होती है और आधुनिक तकनीक का वह उपकरण लता दीदी के ‘अनफॉरगेटेबल’ एल्बम का कालजयी गीत बजाने लगता है, “तू जहाँ-जहाँ भी होगा, मेरा साया साथ होगा…”। तकनीक बदल गई, माध्यम बदल गए, पीढ़ियाँ बदल गईं, लेकिन जो नहीं बदला, वह है लता मंगेशकर की आवाज़ का जादुई सम्मोहन। अपनी इसी अलौकिक आवाज़ के ज़रिये लता जी आज भी हम सबके बीच चिर-जीवित हैं। सच ही तो है, कुछ शख़्सियतें मर कर भी अमर हो जाती हैं। सुख हो या दुख, राष्ट्रीय पर्व हो या कोई पावन त्योहार, हमारी हर भावना को स्वर देने के लिए लता दीदी का कोई न कोई गीत हमारी चेतना में सहज ही तैर जाता है। अक्सर लोग गीतकार या संगीतकार को बाद में याद करते हैं, वे पहले लता जी की आवाज़ से फिल्म, नायिका और उस दौर को पहचानते हैं। वे सही मायनों में भारतीय संगीत की वैश्विक ‘ब्रांड एम्बेसडर’ हैं।

ऐसी युगप्रवर्तक हस्ती पर देश-विदेश में प्रचुर काम हुआ है। नसरीन मुन्नी कबीर की ‘लता मंगेशकर-इन हर ऑन वॉइस’, हरीश भिमानी की बहुचर्चित कृति ‘इन सर्च ऑफ लता मंगेशकर’ , राजू भारतन द्वारा लिखित ‘लता मंगेशकर: ए बायॉग्रफी’, नसरीन मुन्नी कबीर व रचना शाह की ‘ऑन स्टेज विद लता’, मंदर वी. बिचू की ‘लता: वॉइस ऑफ द गोल्डन एरा’ तथा तारिकुल इस्लाम की पुस्तक जैसी कई महत्वपूर्ण कृतियाँ अंग्रेजी में आ चुकी हैं। मूलतः हिंदी में इस स्तर पर अपेक्षाकृत कम काम दिखाई देता था, जिसे यतींद्र मिश्र की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘लता: सुर गाथा’ और सुरेश पटवा की ‘सुरमयी लता’ ने एक ठोस धरातल दिया।

इसी श्रेणी में एक बेहद प्रामाणिक, संवेदनशील और शोधपरक दस्तावेज़ के रूप में हाल ही में सामने आई है, शिक्षाविद एवं साहित्यकार डॉ. इन्द्रजीत सिंह (पूर्व प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय संगठन) द्वारा लिखित पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित ₹330 मूल्य की यह सुंदर कृति सुर कोकिला की जीवन यात्रा को बेहद प्रवाही और मुकम्मल अंदाज़ में पाठकों के सामने रखती है। सुप्रसिद्ध कवि और गीतकार इरशाद कामिल की प्रस्तावना इस पुस्तक के महत्व को और बढ़ा देती है।

लेखक डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने लता जी के विराट जीवन को केवल एक पार्श्वगायिका के दायरे में न समेटकर, उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को बेहद सलीके से गूंथा है।

लता जी की जीवन यात्रा, संघर्ष की कहानी है, जो आज की पीढ़ी के लिए प्रेरक है। संघर्ष और दुश्वारियों भरी राह, को इंद्रजीत जी ने एक अलग अध्याय में संजोया है।

लता जी के कालजयी गीत, लता जी का क्रिकेट प्रेम, विदेशों में भारत का परचम,

गायिकी की गंगा: लता मंगेशकर, लता मंगेशकर वाया हरीश भिमानी एवं यतीन्द्र मिश्र,सम्मान और पुरस्कार अध्याय लता दीदी के जीवन को पाठक तक स्पष्ट एवं सुव्यवस्थित स्वरूप में पहुंचाने में इंद्रजीत जी की कलम सफल रही है।

डॉ. इन्द्रजीत सिंह के अनुसार लता मंगेशकर की आवाज़ शब्दों को एक नई आत्मा प्रदान करती थी। उनके गायन में भाव, अर्थ और शुद्धता का जो अद्भुत समन्वय था, वही इस पुस्तक का मुख्य कथ्य है।

1942 में पिता दीनानाथ मंगेशकर के असामयिक निधन के बाद, मात्र 13 वर्ष की नन्हीं उम्र में पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर अभिनय और गायन की दुनिया में उतरना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। शुरुआती दौर में कुछ निर्माताओं द्वारा उनकी आवाज़ को “बेहद पतली” कहकर नकार दिया जाना और फिर उसी आवाज़ का पूरे विश्व पर राज करना, यह संघर्ष गाथा पाठकों के भीतर नई ऊर्जा भरती है।

लता जी की आवाज़ में एक अनूठा जादू था। वे बच्चों सी मीठी बोली और अठखेली करती किशोरी से लेकर एक प्रौढ़ संजीदगी भरी आवाज़ तक, सुर-ताल-राग के अनुरूप गले को त्वरित प्रभाव से ढाल लेती थीं।

पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी इसका प्रामाणिक और तटस्थ होना है। लेखक ने दूरदर्शन, आकाशवाणी के आर्काइव्स तथा लता जी के तमाम साक्षात्कारों के गहन संदर्भों को सहेजा है।

पुस्तक में संगीत जगत के उन रोचक इतिहासों और विवादों को भी पूरी तटस्थता के साथ जगह दी गई है, जो अक्सर ऐसी बड़ी हस्तियों के साथ जुड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए, सन् 1974 में लता जी का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे अधिक गाने (लगभग 25,000 गाने) गाने वाली गायिका के रूप में दर्ज होना, फिर मोहम्मद रफी साहब द्वारा उस रिकॉर्ड की संख्या को चुनौती देना, और अंततः शोधकर्ता हरमिंदर सिंह हमराज द्वारा प्रत्येक गाने को सूचीबद्ध कर वास्तविक आंकड़ों को सामने रखने जैसे प्रसंगों का ज़िक्र पुस्तक को बेहद प्रामाणिक और पठनीय बनाता है। उनकी बहन आशा भोंसले जी से मिलने वाली स्वस्थ संगीतमय चुनौतियों का विश्लेषण भी इस पुस्तक के फलक को विस्तार देता है।

कवियों की पसंद का अद्भुत सर्वेक्षण: डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने इस पुस्तक में एक अनूठा और अभिनव प्रयोग किया है। उन्होंने देश के 100 से अधिक प्रतिष्ठित कवियों और साहित्यकारों से संपर्क कर यह जानने का प्रयास किया कि उन्हें लता जी का कौन-सा गीत सर्वाधिक प्रिय है। इस सर्वेक्षण का निचोड़ यह निकला कि अधिकांश रचनाकारों के दिलों पर ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ राज करता है। साथ ही, यह तथ्य भी उभरकर आया कि साहित्यिक अभिरुचि के लोगों द्वारा पसंद किए गए अधिकांश कालजयी गीत अद्भुत गीतकार शैलेन्द्र के लिखे हुए थे। उल्लेखनीय है कि लेखक इन्द्रजीत सिंह पूर्व में गीतकार शैलेन्द्र पर भी लिख चुके हैं।

संगीत से इतर, लता जी का क्रिकेट के प्रति अगाध प्रेम और लॉर्ड्स के मैदान से लेकर भारतीय क्रिकेट इतिहास के कप्तानों के साथ उनकी आत्मीयता का जो अध्याय इसमें बुना गया है, वह पाठकों के लिए एक संदर्भ है।

इरशाद कामिल की काव्यात्मक भूमिका रोचक है । उन्होंने लता जी की तुलना एक अत्यंत पावन और निर्मल नदी से करते हुए लिखा है:”लता मंगेशकर एक नदिया का नाम है, जिसका पानी बेहद साफ़ है। निर्मल है। पावन है। जो बहती है तो लहरें नाचती हैं। जिसकी लहरों में कोई देवी संतूर लिए बैठी है। इस नदी की आवाज़ अगर ज़ख़्मों पे लगा लो तो ज़ख़्म भर जाते हैं।” यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति पठनीय है।

‘न भूतो न भविष्यति’

संगीत की लंबी और यशस्वी पारी को जीते हुए लता जी जब सराहना के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान थीं, तब उनका इस नश्वर संसार से जाना पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों के लिए एक मर्मांतक और स्तब्ध कर देने वाली घटना थी। उस भावुक क्षण में हर संवेदनशील हृदय रो उठा था।

इसी मर्म को अभिव्यक्त करती मेरी तब प्रकाशित हुई , काव्य पंक्तियाँ इस विमर्श को पूर्णता देती हैं:

स्वर साम्राज्ञी कोकिल कंठी, हम सब का है प्यार लता,

भारत रत्न, रत्न भारत का, गीतों का सुर, सार लता ।

रागों का जादू, जादू गज़ल का, सरगम की लय, तार लता,

तबले की धिन् पर, सितारों की धड़कन, नगमों की रस धार लता ।

बनारस घराना, जयपुर तराना, गीतों का इकरार लता,

बैजू सुना था सुर बावरा वो, तानसेन दीदार लता।

सरहद की रेखा से सुर ही बड़ा है, नूपुर की झंकार लता,

भारत-पाक लाख दुश्मन हों, जनता की सरकार लता ।

तुम्हारा ये जाना न माने ज़माना, रहेंगी सदा गुलज़ार लता

… विवेक रंजन श्रीवास्तव

आज का दौर बदल चुका है। तकनीक के इस युग में ‘स्टार मेकर्स’ जैसे ऐप्स और ‘इंडियन आइडल’ जैसे कई रियलिटी शोज़ के मंच मौजूद हैं, जहाँ से नई प्रतिभाएँ बहुत आसानी से अपनी सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इन मंचों पर लता जी के कई प्रतिरूप और अनुगामी शनैः-शनैः संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना रहे हैं। परंतु, यह एक निर्विवाद शाश्वत सत्य है कि लता दीदी तो बस लता दीदी ही थीं— न भूतो, न भविष्यति। यद्यपि, सुर-साधना तो वास्तव में माँ सरस्वती की वह चिरंतन तपस्या और पूजा है, जिसमें यदि कल को कोई नई लता स्थापित होती है, तो स्वर्ग के किसी कोने में बैठी लता दीदी की आत्मा ही सर्वाधिक प्रसन्न होगी।

मशहूर शायर जावेद अख्तर ने कभी कहा था “हमारे पास एक चाँद है, एक सूरज है और एक लता मंगेशकर है।”

डॉ. इन्द्रजीत सिंह की पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’ इसी अद्वितीय और ऐतिहासिक सत्य को बेहद आदर, सलीके और शोधपूर्ण दृष्टि से सहेजने का एक अत्यंत सराहनीय और सफल प्रयास है। यह पुस्तक न केवल हर संगीत प्रेमी के संग्रह में होनी चाहिए, बल्कि संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

सेवा निवृत मुख्य अभियंता विद्युत मंडल

स्वतंत्र लेखक , कहानीकार , नाट्य लेखक ,समालोचक

ई अभिव्यक्ति पोर्टल के हिंदी संपादक

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ कवियत्री सिद्धेश्वरी सराफ शीलू की काव्य कृति – आर्यावर्त की अनुपमायें (काव्य संग्रह) ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ कवियत्री सिद्धेश्वरी सराफ शीलू की काव्य कृति – आर्यावर्त की अनुपमायें (काव्य संग्रह) ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

नारी तुम केवल श्रद्धा हो

 विश्वास रजत नग पग तल में

 पीयूष स्त्रोत सी बहा करो

 जीवन के सुन्दर समतल में

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 सुप्रसिद्ध कवि स्व श्री जयशंकर प्रसाद की ये काव्य पंक्तियां इस बात की प्रतीक हैं कि नारी शक्ति ने वीरता, कर्मठता और ममता के क्षेत्र में हमेशा से एक कीर्तिमान स्थापित किया है और राष्ट्र को विश्व के रंग मंच पर गौरवान्वित किया है। राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साहित्य साधना से संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाली सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रिय बहन सिद्धेश्वरी सराफ शीलू ने भी मातृ शक्ति पर आधारित ऐसी ही प्रभावी कविताओं की रचना की है जिनका काव्य संग्रह आर्यावर्त की अनुपमायें का विमोचन पाथेय के तत्वावधान में गरिमामय कार्यक्रम के साथ आज आयोजित है।

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

वैसे तो सिद्धेश्वरी जी लम्बे समय से कविताएं लिख रही हैं और काफी अच्छा लिख रही हैं और पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित इनकी कविताओं का ऐसा पाठक वर्ग है जिनके बीच इनकी कविताओं की पठनीयता सिद्ध भी हुई है। सिद्धेश्वरी जी की अधिकांश कविताएं राष्ट्रीयता, सामाजिकता और आध्यात्मिकता से ओत-प्रोत हैं, इसीलिए उनकी कविताओं में भी राष्ट्र और समाज के लिए एक सार्थक और प्रेरक संदेश भी निहित है। शीलू जी के काव्य सृजन में देश की महान नारी की गौरव गाथा इस प्रकार से शामिल की गई है कि वह समाज के लिए अत्यंत प्रेरक प्रतीत होती है। क्रिकेट टीम की महिला कप्तान सुश्री हरमनप्रीत कौर की यशोगाथा का कुछ इस प्रकार वर्णन किया है –

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चयन हुआ है खेल में, जीत बनी पहचान

श्रेष्ठ नारी है बनी भारत की है शान

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सिद्धेश्वरी जी ने नारी शक्ति को अपनी कविताओं में इस प्रकार महिमा मंडित किया है कि इन कविताओं में ज्ञानवर्धक जानकारी भी उपलब्ध होती हैं। उन्होंने प्रथम महिला चिकित्सक श्री आनंदी बाई जोशी को भी अपनी कृति में शामिल किया है –

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बनी प्रेरणा हिन्द की, लिखा गया इतिहास।

स्वास्थ्य चिकित्सा भाग में, आनंदी है खास। ।

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इस देश की महिलाओं ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सक्रियता और दक्षता का परिचय देते हुए कीर्तिमान स्थापित किया है और यही बात कवियत्री की काव्य पंक्तियों में दृष्टिगोचर होती है –

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शुभ कर्णम मल्लेश्वरी

 ओलंपिक का खेल।

सिडनी ओलंपिक चली

 दक्षिण भारत रेल। ।

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भारत की महान नारियों की महान गाथा का गौरव गान करते हुए शीलू जी की ये प्रथम महिला नौ सेना पायलट शिवांगी सिंह के विषय में भी कविता की एक झलक देखिए –

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सोने की गुड़िया सजी

 नौ सेना के संग।

वीरों से हम कम नहीं

 फौलादी हैं अंग।

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 इस काव्य कृति में चर्चित साहित्यकारों ने भी अपनी प्रतिक्रियाओं के रूप में मंगल भाव व्यक्त किए हैं। प्रतिष्ठित साहित्यकारों के क्रम में श्री विजय नेमा अनुज जी, श्री संतोष कुमार सिंह जी, मथुरा, श्री अशोक पटसारिया नादान जी, टीकमगढ़, डा. संध्या जैन श्रुति जी, श्री राजेश पाठक प्रवीण जी, श्री संतोष नेमा संतोष जी की प्रभावी प्रतिक्रियाओं ने कृति की पठनीयता सिद्ध की है। श्री नर्मदा प्रकाशन से प्रकाशित इस काव्य संग्रह में मातृ शक्ति के रुप में 101 महान नारियों पर आधारित 5-5 दोहें शामिल हैं।

 इन सशक्त और सार्थक काव्य रचनाओं का अध्ययन और मनन करने के पश्चात मेरा तो यह विश्वास है कि मातृ शक्ति के प्रति असीम श्रद्धा और नमन भाव से सृजित कवियत्री सिद्धेश्वरी सराफ शीलू जी की ये काव्य कृति साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक और शिक्षाप्रद सिद्ध होंगी, इसलिए शासन के शिक्षा विभाग से मेरी अपेक्षा है कि इस काव्य कृति की महत्वपूर्ण कविताएं अगर पाठ्यक्रम में शामिल की जायें तो इन कविताओं की उपयोगिता और सार्थकता दोनों ही का महत्व प्रतिपादित होगा।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “मोती उजास के” – लेखिका – डॉ  मुक्ता ☆ चर्चा – डॉ दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ ☆

डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘

अल्प – परिचय

शिक्षा – एम.एम., एम.एड.(स्वर्ण पदक), पी.एच.डी.( मनोविज्ञान )

संप्रति –

  • पूर्व व्याख्याता, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
  • मनोवैज्ञानिक सलाहकार,
  • साहित्य एवं समाज सेवी, देहदानी
  • अनुवादक, समीक्षक, सम्पादक
  • अनेक मंचों की संरक्षक, निदेशक, मार्गदर्शक

प्रकाशन / प्रसारण –  

  • 12 पुस्तकें प्रकाशित, जिनमें चार ई-ऑडियो बुक अमेज़न पर उपलब्ध(मेरी अपनी ही आवाज़ में )
  • अनेकों साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित, देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में (सविशेष हरिगंधा, राष्ट्र वीणा-गुजरात, सदीनामा, गर्भनाल, सेतु, ऑस्ट्रियांचल, नारी अस्मिता, व्यंग्यलोक में लेख-आलेख, समीक्षा आदि अनवरत प्रकाशित।
  • दैनिक पत्र हरियाणा  प्रदीप के स्थायी स्तम्भ में देश भक्ति भाव जागरण संदेश मुक्तक रूप में, सतत कई वर्षों से प्रकाशित। *अनेकों प्रतिष्ठित संस्थाओं से पुरस्कृत एवं सम्मानित।
  • साझा संकलनों में रचनाएँ, प्रकाशित।
  • चार साझा संकलन जिन्हें गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में स्थान प्राप्त, लघु योगदान अपना भी।
  • नाटक गुजरात राज्य, प्रथम पुरस्कार प्राप्त, दूर दर्शन पर गुजराती अनुवाद के साथ प्रसारित।

सम्मान और पद – 

  • राय व्योम फ़ाउण्डेशन दिल्ली द्वारा “ लाइफ़ टाइम एचीवमेंट अवार्ड, 2024”
  • ”संस्थापक अवार्ड “अंतर्राष्ट्रीय महिला काव्य मंच द्वारा।
  • विदेश में  मकाम की प्रथम इकाई का शुभारम्भ, सैन डिएगो, कैलीफॉर्निया, अमेरिका में, मेरे द्वारा किया गया। आज विश्व के 42 देशों में 83 इकाइयाँ सक्रियता से कार्यरत हैं। प्रतिदिन विस्तार हो रहा है। हिन्दी भाषा के प्रचार -प्रसार एवं विस्तार हेतु कृत संकल्प।
  • साहित्य सेवा के लिए मकाम की विदेश संरक्षक पद पर पदासीन।
  • संत साहित्य अकादमी और दधीचि देहदान समिति की कार्यकारिणी सदस्य।

साहित्य सेवा द्वारा देश की सेवा हेतु कृत संकल्प।

आज प्रस्तुत है आपके द्वारा डॉ मुक्ता जी द्वारा लिखित पुस्तक “मोती उजास के पर चर्चा।

☆ “मोती उजास के” – लेखिका – डॉ  मुक्ता ☆ चर्चा – डॉ दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – मोती उजास के “

लेखिका – डॉ० मुक्ता

प्रकाशन वर्ष -2025

प्रकाशक – वर्ड्सविगल पब्लिकेशन

पृष्ठ संख्या -128

मूल्य – 199

☆ सूक्ष्मावलोकन की दृष्टि वातावरण में बिखरे गहरे सिद्धान्तों को उजागर करती है ☆ चर्चा – डॉ दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ ☆

 

“स्व पहचान से आत्मज्ञान की दिशा में अग्रसर मन

आत्मोदय से अंधकार में प्रकाश के मोती पा सकता है।”

माँ शारदा की स्तुति से प्रारम्भ होती 100 नज़्मों से सजा यह काव्य-संग्रह “मोती उजास के” आशावाद से भरपूर है। “ज़िन्दगी ख़ुशनुमाँ हो जाएगी,” “ख़ुद पर विश्वास कर” प्रारम्भिक दो रचनाएँ मन में सकारात्मकता का संचार करती हैं तथा उत्साह से भर रही हैं। प्रोत्साहन से परिपूर्ण एक-एक शब्द सराहनीय है; पठनीय और संग्रहणीय है। “सबका मंगल होय” की कामना करने वाला हृदय कितना कोमल होगा– इसका अंदाज़ा लग जाता है। “ग़िले शिक़वे” भले ही हज़ार हों लेकिन “अपनत्व का अहसास” बना रहे और “संवादों का सिलसिला” सिमटना नहीं चाहिए। “स्वयं बनिए अपने सारथी” कितनी अच्छी बात कही है, क्योंकि “अपना सहारा ख़ुद बनना होगा“ ‘कशमकश’ जब दूर हो जाएगी, तब “ख़ुदा को पा जाएगा इंसान” शीर्षक के नाम की कविता “मोती उजास के” यही सार्थक संदेश देती है कि सपने साकार होंगे। “मत व्यर्थ कयास कर” हमारे सोचने से कुछ नहीं होगा, जो कुछ है और हो रहा है, वह पूर्व निर्धारित है। कर्मों के फलों का लेखा-जोखा है। विधि के विधान को न कोई समझ पाया है, न ही बदल पाया है। उतना तो हर किसी को झेलना ही पड़ता है। “वक्त के करिश्मे हैं” समय बहुत बलवान है। जिस समय जो घटित होना है, वह घटित हो कर ही रहता है। कभी हमें लगता है कि हमारे साथ बुरा क्यों हुआ? किन्तु वस्तुतः ईश्वर हमारे भले के लिए ही करता है। अध्यात्मवाद का उल्लेख भी है तो पुरुषार्थ का समर्थन भी है। प्रयास कर “ख़ुद को पा जाएगा” ख़ुद को पा गया तो ख़ुदा को भी पा जाएगा।

“ मैं और तुम के भँवर में फँसी ज़िन्दगी/ लाख चाहने पर भी व्यूह से बाहर नहीं आ पाती है।

‘अयं निजः परोवेत्ति’ का भाव हर्गिज़ न रखें। इस संसार में कोई अपना और दूसरा पराया नहीं है। सब अपने ही हैं। सभी के प्रति समभाव होना चाहिए।” चाहिए “कह कर आदर्शवाद की दिशा का निर्देश किया है। होना तो सचमुच यही चाहिए कि सब अपने हैं, कोई पराया है ही नहीं। लेकिन यह कहाँ सम्भव हो पाता है। सभी अपने-पराए के दायरे में बँधे हैं। इन सीमित दायरों से कोई भी मुक्त नहीं हो पाता। मेरा धर्म- मेरी जाति, मेरे लोग । “दर्द भी दवा भी” ज़िन्दगी दर्द भी है, ज़िन्दगी दवा भी है ।सच ही तो है एक व्यक्ति हमें बुरा-भला कह कर चला जाता है तो दूसरा हमारी तकलीफ़ों को, पीड़ाओं को महसूस करता है, मरहम लगाता है, सान्त्वना देता है और हमारे साथ खड़ा होता है। परस्पर का साथ सहयोग ही तो दुःख-दर्द की दवा बनता है। यूँ आज कल जग के “मिथ्या बंधन” में ही दिल उदास रहता है। आपस का भरोसा ख़त्म हो गया है। विश्वास नहीं रहता। बदल गया है दुनिया का चलन। काश! मिट जाता दिलों से वैमनस्य भाव। मानव राग-द्वेष व वैर से ऊपर उठ कर क्यों नहीं जी पाता है । उस एक ईश्वर के अंश सभी हैं  फिर परस्पर परायापन कैसा और क्यों ? स्व से ऊपर उठ कर क्यों विचार नहीं कर पाता?

डॉ. मुक्ता

मुक्ता जी की सभी नज़्में सीधे-सादे शब्दों  में गहन चिंतन-मनन की बातें करती हैं। कभी ऐसा भी लगता है मानो सीधा ईश्वर से संवाद करती हैं। प्रश्न पूछती हैं, समाधान मांगती हैं। ’जाने क्यों मन’ खोया रहता है। जग के मोह-माया में भटका मन खोया ही तो रहता है। उलझनें सुलझाते-सुलझाते और भी उलझ ही जाता है। “नव वर्ष की आमद” नव वर्ष ,नव उत्कर्ष, भोर की स्वर्णिम रश्मियाँ जीवन में उमंग भर देती हैं। हर दिन एक नया दिन है। हर दिन का स्वागत करें पूरे जोश पूरे उत्साह से करें व वैराग्य भाव भी रखें । मोह में इतना भी न उलझें कि बिछुड़ना घातक हो जाए। कारण कुछ भी अपने साथ नहीं जाना है। हर कोई चाहे कितना भी बलशाली-शक्तिशाली क्यों न हो, कुछ भी अपने साथ ले कर नहीं जा पाता है। यही जीवन का अंतिम सत्य है। जब धरा का धरा पर ही धरा रह जाना है तब मोह कैसा और मौत से भी क्यों घबराना है।

“सब यहीं रह जाना है” सब कुछ जानते-समझते हुए भी यह इंसान न जाने क्यूँ ख़ुद को धोखा ही देता रहता है। “परेशान हर इंसान है,” “हुनर सीख ले” हर हाल में ख़ुश रहने का। हुनर यही कि सबको “अपना बनाता चल” बस फिर बेफिक्र कटेगी ज़िन्दगी। ऊपर वाले पर भरोसा कर। जिसने जन्म दिया है, वही पालन भी करेगा । आज दुःख है तो कल सुख भी देगा। यह विश्वास यह भरोसा विकसित कर। आस्था और विश्वास पर टिकी ज़िन्दगी ही सुखी ज़िन्दगी हो सकती है।

लेखिका की सूक्ष्मावलोकन की दृष्टि वातावरण में बिखरे गहरे सिद्धान्तों को उजागर करती है। सरल-सहज भावाभिव्यक्ति विचार और भाव सम्प्रेषण में सफल है। कहीं-कहीं आवश्यकतानुरूप क्षेत्रीय भाषा का पुट भी मिलता है। कुछेक रचनाएँ हैं जैसे “मनवा मानत नाहीं” कह कर उस समाज, उस वर्ग के साथ निकटता व आत्मीयता का भाव रखते हुए अपनी बात बखूबी उस वर्ग तक पहुँचाने का प्रयास किया है।

साहित्य जगत् में मुक्ता जी का नाम वर्षों पुराना है। सतत साहित्य साधना में रत मुक्ता जी ने हर विधा में लिखने की कोशिश की है और सफल लेखिका के रूप में साहित्य जगत में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। डॉ० मुक्ता जी राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित हैं।साहित्य अकादमी और ग्रंथ अकादमी की निदेशक रह चुकी हैं। वर्तमान में स्वतंत्र लेखिका के रूप में कार्यरत हैं। मेरे लिए तो मेरे मन में मुक्ता जी के प्रति एक अलग ही विशिष्ट स्थान है। मुक्ता जी की सशक्त लेखनी को नमन। भाव सम्प्रेषण और अपने विचारों को सभी तक पहुँचाने में सफल साहित्यकार के रूप में आप प्रसिद्धि प्राप्त चुकी हैं। अनेकों प्रमुख संस्थाओं से पुरस्कृत हो चुकी हैं। आप इसी तरह अपने विचारों और भावों से जग को समृद्ध करती रहें, आपकी पुस्तकें  लोगों के मन में अपना एक विशिष्ट  स्थान बनाती रहें–यही ईश्वर से प्रार्थना है।

हर रचना एक महत्वपूर्ण संकेत करती है। संदेश देती है। सीख देती है। पठनीय एवं संग्रहणीय पुस्तक !

अशेष शुभकामनाएँ !

समीक्षक – डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘

पूर्व व्याख्याता-मनोविज्ञान, बी.एच.यू., वाराणसी

मूलतः बनारस से, स्थायी निवास – फरीदाबाद, हरियाणा, भारत।

सम्प्रति —कैलीफ़ॉर्निया,अमेरिका सम्पर्कमो० -9910408884, ईमेल – durga.a.sinha@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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