(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री अखंड गहमरी जी द्वारा लिखित “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २१२ ☆
☆ “मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)” – लेखक : श्री अखंड गहमरी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)
लेखक – अखंड गहमरी
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ मुख्य विषय : यात्रा, प्रकृति, संस्कृति, लोकजीवन एवं मानवीय संवेदनाएँ– श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
यह किताब यात्रा के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना का विस्तार, प्राकृतिक सौन्दर्य का सजीव चित्रण, स्थानीय समाज और जीवन-मूल्यों का सजीव परिचय, अनुभव प्रधान एवं संवेदनशील रोचक पठनीय अभिव्यक्ति, यात्रा, संवेदना और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज़ है।
प्रारंभिक पृष्ठों से ही यह किताब स्पष्ट संकेत देती है कि यह केवल पर्यटन-वृत्तांत नहीं, बल्कि अनुभवों, संस्कृतियों और मानवीय संवेदनाओं का संग्रह योग्य दस्तावेज़ है। लेखक ने यात्रा को मनोरंजन या स्थल-दर्शन तक सीमित न मानकर जीवन को समझने का माध्यम माना है। अनुक्रम पर दृष्टि डालने से ही स्पष्ट होता है कि पुस्तक में विभिन्न स्थलों, प्रसंगों और अनुभवों को क्रमबद्ध रूप से स्वतंत्र अध्यायों में अभिव्यक्त किया गया है। यह संरचना पाठक को यात्रा के विविध आयामों से हिस तरह परिचित कराती है, मानो वह स्वयं सहयात्री है।
लेखक की दृष्टि केवल प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रत्येक स्थान के सांस्कृतिक परिवेश, वहाँ के लोगों के जीवन, उनकी परम्पराओं तथा मानवीय संबंधों को भी समान महत्त्व देती है। इसी कारण पुस्तक का स्वर केवल विवरणात्मक न होकर अनुभवात्मक और चिंतनपरक है। लेखक पाठक को यह अनुभव कराता है कि यात्रा का वास्तविक अर्थ बाहरी संसार को देखने के साथ-साथ उन संदर्भों में स्वयं के भीतर झाँकना भी है।
भाषा की दृष्टि से पुस्तक अत्यंत सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय शैली में लिखी हुई है। लेखक अनावश्यक शब्दाडम्बर से बचते हुए सरल शैली में अपने अनुभवों को व्यक्त करता है। वर्णन में दृश्यात्मकता इतनी प्रभावी है कि पाठक स्वयं को यात्रा का सहभागी अनुभव करने लगता है। प्रकृति, पर्वत, मार्ग, स्थानीय वातावरण और जनजीवन के चित्रण में गहमरी जी की संवेदनशीलता स्पष्ट दिखाई देती है।
पुस्तक के स्पष्ट रूप से पठनीय अंशों में लेखक का यह कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है— “यात्राएँ मनुष्य को केवल नए स्थानों से नहीं, नए अनुभवों से भी परिचित कराती हैं।” यह वाक्य सम्पूर्ण पुस्तक की मूल चेतना को अभिव्यक्त करता है। लेखक के अनुसार यात्रा का वास्तविक लाभ केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि अनुभवों का विस्तार है। यही अनुभव व्यक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाते हैं और उसे जीवन के विविध रूपों को समझने की क्षमता प्रदान करते हैं।
इसी तरह उनका उल्लेखनीय कथन है— “प्रकृति के निकट पहुँचकर मनुष्य अपने भीतर की शांति को पहचानने लगता है।” इस विचार में लेखक की प्रकृति-दृष्टि निहित है। प्रकृति यहाँ केवल सौन्दर्य का विषय नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन, आत्मचिंतन और आंतरिक शांति का आधार बनकर उभरती है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।
पुस्तक की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि लेखक स्थानीय संस्कृति को बाहरी दृष्टि से नहीं, बल्कि आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करता है। यात्रा के दौरान मिलने वाले लोग, उनकी जीवनशैली, व्यवहार, परम्पराएँ और सामाजिक मूल्य लेखक के वर्णन में स्वाभाविक रूप से समाहित होते हैं। इससे पुस्तक केवल स्थानों का परिचय देने वाली रचना नहीं रह जाती, बल्कि सांस्कृतिक दस्तावेज़ का रूप ग्रहण कर लेती है।
शिल्प की दृष्टि से पुस्तक वर्णनात्मक और संस्मरणात्मक शैली का सफल समन्वय प्रस्तुत करती है। घटनाओं का क्रम स्वाभाविक है तथा प्रत्येक प्रसंग अपने आप में पूर्ण प्रतीत होता है। भाषा में आत्मीय संवाद का गुण है, जिससे पाठक लेखक के अनुभवों से सहज रूप से जुड़ जाता है।
यह कृति यात्रा-साहित्य की उस राहुल सांस्कृतायायन परम्परा का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें यात्रा केवल स्थानों का भ्रमण नहीं, बल्कि संस्कृति, समाज और जीवन-दृष्टि की खोज है। लेखक अपने अनुभवों के माध्यम से पाठक को यह विश्वास दिलाता है कि प्रत्येक यात्रा मनुष्य को कुछ नया सिखाती है और उसके व्यक्तित्व को समृद्ध बनाती है।
समग्रतः यह पुस्तक यात्रा, प्रकृति, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का संतुलित एवं प्रभावशाली समन्वय प्रस्तुत करती है। इसकी सरल भाषा, आत्मीय अभिव्यक्ति, अनुभवों की प्रामाणिकता तथा जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण इसे एक पठनीय और संग्रहणीय कृति बनाते हैं। यात्रा-साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक केवल जानकारी का स्रोत नहीं, बल्कि संवेदनात्मक अनुभवों की ऐसी यात्रा है जो पाठक को बाहरी संसार के साथ-साथ अपने भीतर के संसार से भी परिचित कराती है।
☆ काव्य कृति – सपनों के गांव में – कविवर – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(कविवर श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ के जन्म दिवस पर मंगल भाव सहित 🌹)
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भाई श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ का काव्य संग्रह “सपनों के गांव में” इस समय मेरे सामने है इस संग्रह में संकलित सभी कविताओं की यह विशेषता है कि इन में कृत्रिमता नहीं है और ये सभी कविताएं बिना किसी लाग-लपेट के सीधी सरल भाषा में हैं। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ये कविताएं मेरे मन के आंगन में उतर गई हैं।
श्री संतोष नेमा ‘संतोष’
श्री संतोष नेमा की यह खासियत है कि वे जितनी खूबी से ईश्वर के विभिन्न रूपों में आस्था अभिव्यक्त करते हैं उतने ही अधिकार से प्रकृति का वर्णन करते हैं। इसी प्रकार उनकी सिद्ध हस्तता उनके लिखे उन गीतों में मिलती है जब वे मानवता और सद्भाव की बात करते हैं। उदाहरण के लिए उनकी लिखी कविताएं “सपनों के गांव में” तथा “मेरा गांव” ली जा सकती हैं। “सपनों के गांव” शीर्षक कविता में वे कहते हैं –
नारी जहां पुजती हो, सच्चाई न बिकती हो,
बने रहें सद्भाव में, चलो चलें सपनों के गांव में।
इसी कविता में वे आगे कहते हैं –
दिव्य स्वप्न आंखों में, झरते फूल बातों में,
जीवन के रसमय सद्भाव में, चलो चलें सपनों के गांव में।
ऐसा लगता है कि कवि का विश्वास सद्भावना की स्थापना में है। यह उचित भी है। जब भी कोई साहित्यकार स्वस्थ समाज की चर्चा करता है, वह ऐसे समाज की कल्पना करता है जहां सद्भावना हो।
यह वास्तविकता भी है। कोई भी समाज बिना सद्भाव के नहीं रह सकता। उनकी लिखी कविता “मेरा गांव” में भी यही जरूरत सामने आती है, जब वे कहते हैं –
सादा जीवन रीत निराली, सच्चाई की पीते प्याली
रहता सदा यहां सद्भाव, सबसे सुन्दर मेरा गांव।
भारत के गांवों की यह खासियत है। शहरों में व्याप्त कृत्रिमता और आडम्बरपूर्ण दर्शन से दूर ग्रामीण परिवेश का परिचय श्री संतोष नेमा कराते हैं जब वे यह कहते हैं –
छल प्रपंच पाखंड ने घेरा,
लोभ मोह का सघन अंधेरा
मन से तृष्णा दूर भगाएं
अन्तर्मन में ज्योति जलायें।
इस संग्रह में ऐसे विचारों की बहुलता है। कवि का जोर सदैव इस बात पर रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति में सद्भाव जगाने की आवश्यकता है। वह मानवता का अग्रदूत बनता है। बिना सद्भाव और मानवता के समाज की कल्पना श्री संतोष नेमा नहीं करते हैं। यह इस संकलन की विशेषता है कि ग्राम्य परिवेश का सुन्दर वर्णन ईश्वर के विभिन्न रूपों और अवतारों के श्रद्धापूर्ण स्मरण के साथ मिलता है। हिन्दू आस्था इस संग्रह में जगह जगह मिलती है। भगवान राम, कृष्ण, दुर्गा की भक्ति की कविताएं हैं लेकिन कवि को अन्य संप्रदायों का ख्याल है। वह दूसरे मतों की चर्चा करते हुए इसके लिए राजनीति को दोषी ठहराता है।
यह सही भी है। हम राजनीति में इस तरह डूब गए हैं कि हमें अपने पास पड़ोस का ख्याल नहीं रहता।
कवि को हमारी इस कमजोरी का ध्यान है। वह कहते हैं-
सियासत ने हमें बांटा कुछ कदर,
हिन्दू हिन्द के,
मुसलमान पाकिस्तानी हो गए।
यह इस संकलन की विशेषता है। कवि का यद्यपि अडिग हिन्दू देवी देवताओं पंर विश्वास है और
इसे अभिव्यक्त करने में पीछे नहीं रहता लेकिन उसे अन्य संप्रदायों का भी ध्यान है। यह सर्व धर्म सद्भाव और हमारी प्राचीन परंपरा के अनुरूप है। जिन मुसलमानों ने भारत में रहना स्वीकार किया और पाकिस्तान नहीं गए उन्हेंं पाकिस्तानी कहना ग़लत होगा।
इस काव्य संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी भाषा और शैली। इसकी भाषा जहां सुबोध है, इसकी शैली बोधगम्य और अकृत्रिम है। कवि बिना किसी बहाने बाजी या लाग लपेट के अपनी भावना रखता है। शब्दाडंबर और अलंकारों का उपयोग कर कविता को बोझिल नहीं बनाया गया है। अमिधा गुणों की खूबसूरती इन कविताओं में है। “एक कहानी हो गये” कविता में जातिवाद पर प्रहार है। पर्यावरणीय वर्णन भी है। ग्रामीण परिवेश का परिचय भी मिलता है जैसा संकलन के नाम से प्रकट होता है।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ. अनुराग वाजपेयी जी द्वारा लिखित “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २११ ☆
☆ “ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)” – लेखक : डॉ. अनुराग वाजपेयी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ईमान का बोझा (व्यंग्य संग्रह)
(समकालीन विसंगतियों का आईना)
लेखक – डॉ. अनुराग वाजपेयी
प्रकाशक – प्रकाशन, जयपुर
(संस्करण – 2026)
मूल्य- रु 250/-
☆ समकालीन विसंगतियों का आईना – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
आजादी के बाद से देश ने प्रत्येक क्षेत्र में खूब प्रगति की है।
यदि कुछ ह्रास हुआ है तो वह है नैतिकता , आचरण और जीवन मूल्यों में लगातार गिरावट स्पष्ट दिखती है।
साहित्य की विभिन्न विधाओं में व्यंग्य वह औजार है जो इन विसंगतियों पर सफलता से प्रहार कर रहा है।
डॉ. अनुराग वाजपेयी उनके पिछले आधा दर्जन व्यंग्य संग्रहों के माध्यम से अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कर चुके हैं। उनके द्वारा रचित यह नव प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘ईमान का बोझा’ इसी कसौटी पर खरा उतरने वाला एक प्रभावशाली संग्रह है। यह किताब समकालीन भारतीय समाज, राजनीति, प्रशासन और आधुनिक जीवनशैली की उन परत-दर-परत विसंगतियों को खोलती है, जिनसे आज का सामान्य नागरिक नित्य जूझ भी रहा है, तथा विडंबना और हास्यास्पद है कि जहां भी जिसे जो अवसर मिल रहा है वह बेइमानी से बाज नहीं आ रहा। बेईमानी नया सामाजिक लोकाचार बनता जा रहा है।
पुस्तक का शीर्षक ‘ईमान का बोझा’ मार्मिक और व्यंग्यात्मक है। लेखक ने बड़े ही तीखेपन से यह स्थापित किया है कि आज के दौर में ईमानदारी एक भारी पत्थर की तरह है, जिसे ढोना कठिन हो गया है। जो व्यक्ति जितना अधिक ‘हल्का’ (यानी सिद्धांतहीन) है, वह उतनी ही तेजी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है। यह आधुनिक भौतिकवादी समाज में कड़वा यथार्थ है।
लेखक ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली, बाबुओं की मानसिकता और भ्रष्टाचार के जो चित्र खींचे हैं, वे यथार्थ के दर्शन करवाते हैं। रिश्वतखोरी के नए तौर-तरीकों पर कटाक्ष करते हुए लेखक दिखाते हैं कि कैसे समाज में अनैतिकता को अब ‘सभ्यता’ का लबादा ओढ़ा दिया गया है।
कोरोना काल, एवं लॉकडाउन के कुछ व्यंग्य किताब में शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि ये सारे व्यंग्य समय समय पर लिखे हुए हैं, तथा इस पुस्तक में संकलित हैं।डिजिटल युग के प्रभावों को जिस तरह से पुस्तक में पिरोया गया है, वह पाठकों को वैचारिक मंथन के लिए विवश करता है। ‘छुट्टियों’ के प्रति देश के उत्साह और ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ के नाम पर किए जा रहे छलावे पर लेखक की टिप्पणियां व्यंग्य की शास्त्रीय परंपरा को पुष्ट करती हैं।
व्यंग्य के मूल्यों की कसौटी पर परखें, तो ‘ईमान का बोझा’ समाज को आईना दिखा रहा है। लेखक केवल हास्य रंजन करने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं। वे समाज के प्रति अपनी ‘अकुलाहट’ और चिंता उनकी कलम से व्यक्त करते हैं।
अनुराग वाजपेयी की भाषा सहज है, वाक्य रीडर्स फ्रेंडली हैं। लेकिन उसमें कटाक्ष की धार पैनी है। वे कठिन विषयों को भी रोचक किस्सागोई के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं, जो व्यंग्य अभिव्यक्ति की बड़ी ताकत है।
पुस्तक केवल समस्याओं को नहीं गिनाती, बल्कि उन कारणों पर भी प्रहार करती है जो व्यक्ति को ‘बेईमान’ बनने के लिए प्रेरित करते हैं।
‘ईमान का बोझा’ आज के दौर का यथार्थ पाठ है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जो व्यवस्था की चक्की में पिस रहे हैं और जो ईमानदारी का बोझ ढोकर भी मुस्कान बनाए रखना चाहते हैं।
डॉ. अनुराग वाजपेयी ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि व्यंग्यकार का काम केवल व्यवस्था को कोसना नहीं, बल्कि पाठकों के भीतर छिपे उस जागरूक नागरिक को जगाना है, जो शोर-शराबे में कहीं खो रहा है।
यह संग्रह व्यंग्य साहित्य के प्रेमियों और अध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
किताब खरीद कर पढ़ने की सलाह है। ये 100 पृष्ट एक दस्तावेज हैं। 34 आलेख हैं, सभी एक दूसरे से बेहतर सुगठित ललित साहित्यिक मूल्यों पर खरे हैं।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
साहित्य अकादमी भोपाल से सम्मानित लेखक, समालोचक, समीक्षक, व्यंगयकार
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है सुश्री जनक कुमारी सिंह बघेल जी द्वारा लिखित “संपरिपाटी (कहानियां)” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २१० ☆
☆ “परिपाटी (कहानियां)” – लेखिका : जनक कुमारी सिंह बघेल ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक : परिपाटी (कहानियां)
लेखिका : जनक कुमारी सिंह बघेल
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
समाहित कहानियाँ : 21
☆ समय की संवेदनाओं का दस्तावेज़ : परिपाटी – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
(पारिवारिक संबंध, सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाएँ और जीवन-मूल्य की कहानियों का संग्रह)
हिन्दी कहानी का वर्तमान परिदृश्य अनेक दिशाओं में विकसित हो रहा है। एक ओर प्रयोगधर्मी लेखन है तो दूसरी ओर जीवन के साधारण अनुभवों से असाधारण अर्थ खोजने वाली पारंपरिक कहानियाँ भी लिखी जा रही हैं। जनक कुमारी सिंह बघेल का कहानी-संग्रह परिपाटी इसी दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करता है। संग्रह की इक्कीस कहानियाँ किसी बड़े वैचारिक विमर्श का शोर नहीं मचातीं, बल्कि परिवार और समाज के भीतर घटित होने वाले उन सूक्ष्म परिवर्तनों को दर्ज करती हैं, जिनसे आज का मनुष्य प्रतिदिन गुजर रहा है। यही कारण है कि इन कहानियों का संसार पाठक को अपरिचित नहीं लगता। वह स्वयं को इन कहानियों के पात्रों और परिस्थितियों के बीच खड़ा पाता है।
संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विषय विविधता है। यहाँ बुज़ुर्गों की उपेक्षा है, रिश्तों में आती औपचारिकता है, स्त्री की मौन पीड़ा है, बच्चों का मनोविज्ञान है, सामाजिक रूढ़ियों से टकराती मानवीय संवेदना है और बदलती जीवन-शैली से उत्पन्न अकेलापन भी नजर आता है। लेखिका इन विषयों को किसी आंदोलनकारी मुद्रा में नहीं, बल्कि जीवन के स्वाभाविक प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं। उनकी दृष्टि आरोपित नहीं करती वह अनुभवजन्य लेखन है। इसलिए कथाएँ सहज विश्वसनीय बन पड़ी हैं।
संग्रह की शीर्षक कहानी ‘परिपाटी’ की वैचारिक धुरी कही जा सकती है। कहानी उस त्रासद सामाजिक सत्य को उद्घाटित करती है कि परिवारों में बुज़ुर्गों के प्रति अपनाई गई उपेक्षा धीरे धीरे एक परंपरा बनती जा रही है। आज जो व्यवहार हम अपनी पूर्व पीढ़ी के साथ करते हैं, वही कल अगली पीढ़ी हमारे साथ दोहराती है। कहानी का शीर्षक इसी विरासत में मिलती अमानवीयता की ओर संकेत करता है। बिना किसी भाषण या नाटकीयता के यह कहानी पाठक के भीतर यह गहरा नैतिक प्रश्न उठाती है।
‘अनकहे जज़्बात’ संग्रह की भिन्न और स्मरणीय कहानियों में है। इसमें पुस्तकों को मानवीय संवेदनाओं का रूप देकर लेखिका ने अत्यंत मौलिक शिल्प अपनाया है। अलमारी में सजी पुस्तकें अपने पाठकों की प्रतीक्षा करती, चेतन पात्र बन जाती हैं। यह कहानी केवल पुस्तकों के उपेक्षित होने की नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक स्मृति के क्षीण होते जाने की कथा है जो किसी भी समाज की आत्मा होती है। पुस्तक-प्रेमियों के लिए यह कहानी विशेष आत्मीयता और कसक उत्पन्न करती है। प्रयोग नवाचारी है।
अन्य कहानियाँ भी अपने-अपने स्तर पर सामाजिक यथार्थ को विविध आयाम देती हैं। कहीं पुनर्विवाह के प्रश्न के माध्यम से जीवन को दूसरा अवसर देने की बात है, कहीं आत्मग्लानि से उपजे प्रायश्चित का भाव है। कुछ कहानियाँ यह विश्वास जगाती हैं कि मनुष्य के भीतर करुणा समाप्त नहीं हुई है, तो कुछ कथानक आधुनिक जीवन की विडंबनाओं को उजागर करते हैं ,जहाँ सुविधाएँ बढ़ी हैं, पर आत्मीयता सिकुड़ती चली गई है।
रिश्तों की ऊष्मा, विश्वास, संवाद और नैतिक उत्तरदायित्व इन कहानियों में बार-बार लौटने वाले मूल्य हैं।
भाषा की दृष्टि से लेखिका का लेखन सरल, संप्रेषणीय और प्रवाहपूर्ण है। वे अनावश्यक अलंकरण या भाषिक चमत्कार से बचती हैं। उनकी कलम में सहज भाव संप्रेषण की कला है, वे सामर्थ्यवान लेखिका हैं।संवाद पात्रों के स्वभाव के अनुरूप हैं और कथानक बिना कृत्रिमता के आगे बढ़ते हैं। यह सादगी ही उनकी शक्ति है, क्योंकि पाठक का ध्यान भाषा की सजावट पर नहीं, कथा के भाव पर केंद्रित रहता है। कहीं-कहीं भावुकता का पुट अवश्य मिलता है, किंतु वह कथ्य की संवेदनात्मक प्रकृति से स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है।
आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो संग्रह की कुछ कहानियाँ अपने अंत को और अधिक खुला तथा बहुअर्थी बन सकती थीं। कई स्थानों पर आदर्शवादी समाधान यथार्थ की जटिलताओं को अपेक्षाकृत सरल बना देते हैं। फिर भी यह कमी संग्रह की मूल संवेदनात्मक शक्ति को कम नहीं करती। इन कहानियों का उद्देश्य पाठक को चमत्कृत करना नहीं, बल्कि उसके भीतर सोई हुई मानवीय संवेदना को स्पर्श करना है, और इस उद्देश्य में वे पर्याप्त सफल हैं।
आज जब साहित्य का बड़ा हिस्सा बाज़ार, उपभोक्तावाद और तात्कालिक सनसनी के दबावों से जूझ रहा है, किसी न किसी “वाद” का लबादा ओढ़कर प्रस्तुत हो रहा है।परिपाटी जैसे कहानी संग्रह यह विश्वास दिलाते हैं कि मनुष्य और उसके संबंध अभी भी हिन्दी कहानी के केंद्र में हैं। यह संग्रह पाठक को अपने परिवार, अपने व्यवहार और अपने सामाजिक दायित्वों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है। इसकी यही विशेषता इसे केवल कहानी-संग्रह नहीं, बल्कि समकालीन सामाजिक जीवन की संवेदनात्मक दस्तावेज़ के रूप में प्रतिष्ठित करती है।
परिपाटी ऐसी पुस्तक है जिसे केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि पढ़ने के बाद देर तक महसूस किया जाता है। रिश्तों की ऊष्मा, मानवीय करुणा और नैतिक चेतना में विश्वास रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए संग्रह की लगभग हर कहानी एक सार्थक और पठनीय कृति है।
☆ पुस्तक चर्चा ☆ मुंबई, बंबई, बॉम्बे (काव्य संग्रह) – कविकवि : बालासाहेब लबडे – अनुवादक : भारत वेडे ☆ समीक्षक – सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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काव्य संग्रह — मुंबई, बंबई, बॉम्बे
कवि — बालासाहेब लबडे
अनुवादक –भारत वेडे
समीक्षक –इन्दिरा किसलय
प्रकाशक –लिटिल बर्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली
मूल्य — रु 399/-
☆ “मुंबई, बंबई, बॉंम्बे” – स्याह रंग की अनसुनी आवाजें – इन्दिरा किसलय ☆
हजार चेहरे मुंबई के, फिर भी बेचेहरा। इसके वजूद की पहचान इतनी आसान भी नहीं। “बालासाहेब लबडे “द्वारा प्रणीत यह कृति, मुंबई की धड़कनों का कोलाज है। इसमें समुद्र का खारापन, जल की नमी है, तो लहरों का संगीत कम, उत्पात ज्यादा सुनाई देता है। एक मोहाविष्ट दर्शक की दृष्टि से परे, कवि ने मुंबई में दिन के बहुरंगी ऐश्वर्य को नहीं, रात की कालिमा में ढँकी कितनी ही अस्फुट, कातर और अनसुनी आवाजों को समेटा है।
अनेक भाषा, धर्म, जाति वर्ग, और विश्वास एवं सियासी ताने बाने से बुना यह महानगर, कवि के शब्दों में “महा मिथक””एक स्वप्न नगरी”, “महामाया” ही है, जो तिलिस्मी है और भयावह भी। कृति में इलिट क्लास का भद्रलोक तो है, लेकिन उस जीवनशैली के पीछे जो अप्रिय सत्य छिपा है, उसका अनावरण किया गया है।
मुंबई से कवि का 40 वर्षों का नाता है। यही कारण है कि उनकी सूक्ष्म ग्राही द्रृष्टि की पकड़ में हर वो दृश्य, व्यक्ति और घटना है, जो अक्सर साहित्यकारों की नज़र से छूट जाता है, इसलिए कि “लोग क्या कहेंगे.”
यह कृति मुंबई पर बनाई गई किसी फिल्म का हिस्सा लगती है. भाषा ने कैमरे का काम किया है।
उपभोक्तावाद, रफ्तार, महत्वाकांक्षा और द्रव्य के पीछे दौड़ने को विवश करती मुंबई समूचे देश को लुभाती है। कवि ने इसे एहसास के तल पर जिया है। जानकारी विस्फोट के दौर में शहर का हर रंग तलाशना बहुत आसान है पर कवि ने उसे आत्मीय और निर्विकल्प सच्चाई के तल पर अनुभव किया है।
एक संतृप्त अभिमान अपने शहर को लेकर कुछ इस तरह व्यक्त हुआ है–
” मुंबई हमारे हक की,
नहीं किसी के बाप की,
जय महाराष्ट्र”
मुंबई के दावेदार इस कविता में वे कहते हैं–
” एकता का बांध कभी बांधती है मुंबई माझी। “
वहां की यांत्रिक जीवन शैली का एक सचल चित्र पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है–
एशिया खंड की सबसे बड़ी फन लैंड–
“संवेदना, गुम हुआ शहर, अधिकाधिक होता जाता है नटखट गो हाई के अंतरंग में।। “
धारावी, एशिया की सबसे बड़ी झोपड़ पट्टी पर पाठकों ने कई बयान सुने होंगे, पर कवि मन के उद्गार कुछ ऐसे हैं–
“मरूस्थल में धारावी की झोंपड़ियां क्यों भूखी,
छलती यह पेटेश्वरी,
जीवन्तता की एकादशी।। “
नैतिकता की सभी कल्पनाएं, सभी मानदंड यहां रोटी हेतु शरण जाते हैं और कहीं खो जाते हैं। यह विश्व का सबसे अंतिम छोर है, आश्चर्य का स्थान है।
शिवाजी पार्क, लोकल, सी-एस-टी, डांस बार, हफ्ता वसूली, कचरा बीनते बच्चे, चौपाटी, धारापुरी, ऐसे कितने ही शीर्षक हैं, जो मुंबई के विषय में जिग्यासा जगाते हैं।
एक कविता जिसे कहीं और पढ़ा जाना असंभव है,
” नियर सहारा एयरपोर्ट” घृणा और जुगुप्सा उपजाती है। कभी-कभी उनकी कविता के अंत में सुभाषित भी हासिल होते हैं।
“समय का चेहरा कभी किसी को पकड़ में आया है क्या?”
**
“इंसानियत का कोई धर्म नहीं होता। “
दृश्य समाज की अदृश्य परतों को शब्दशः उधेड़ते हुए, कवि इस बात की गवाही देते हैं कि आत्मीयता सिर्फ रंग, रूप और सौंदर्य की मुखापेक्षी नहीं होती। उनके अनुभव पाठकों के लिए एक सवाल बनकर उपस्थित होते हैं, जिसकी गूँज क्षितिज तक पहुँचती है।
“मीठी नदी” की दुर्दशा भी उन्हें चिंतित करती है।
इन सर्वथा गद्यात्मक कविताओं के बिंब इतने सघन और गरिष्ठ हैं कि मूल कथ्य तक पहुँचने में कवायद करनी पड़ती है। रूपक, प्रतीक, प्रतिमान, बिंब कहीं भी पारंपरिक नहीं हैं। कविता को मुक्त कर दिया है उन्होंने किसी भी शास्त्रीय बंधन से, जो भावावेग को संभाल न सके।
कृति अनुवादित है.। अनुवादक हैं “भारत वेडे”। मूल मराठी में इसका आस्वाद जरा भिन्न ही होगा। कविता का मौलिक अंदाज़ सुरक्षित होगा। हर भाषा का अपना स्वभाव, सरोकार, लय और बरतने का तरीका होता है।
शहर के गत्यात्मक, चाक्षुष बिंबों को स्थिर शब्दों के हवाले करना आसान नहीं है। मुंबई के सांस्कृतिक स्पंदन से उपजी स्थानीय बोलियां, शब्द, गालियां, पारिभाषिक शब्द सिर्फ मुंबई में ही पाये जा सकते हैं, जिसे कवि ने अचूक दर्ज किया है।
शहर जब नायक की भूमिका में है, तो उसके आचरण का रेशा-रेशा खुलता ही चला जाता है, हर्फ दर हर्फ। मूल बंबईया शब्दों ने अभिव्यक्ति को प्रामाणिकता दी है। सब कुछ ऑर्गेनिक, कहीं मिलावट नहीं.। कुछ शब्द जैसे सुमड़ी, खोका, राड़ा, मुलुख, टाली, टपोरी, बेवड़ा, तथा कुछ अंग्रेजी के मिश्रित शब्द भी धड़ल्ले से चलते हैं।
अनैतिकता या महानगरों के यौनिक स्याह चेहरे– जैसे मालिश सेंटर, मेगा ब्लॉक में डान्स बार—इनके पीछे छिपी विवशताएं झाँक रही हैं।
“इस विश्व में बिकता नहीं ऐसा कुछ भी नहीं
शाश्वत ऐसा कुछ भी नहीं होता।।”
“प्रॉपर्टी डीलर” शीर्षकवाही कविता में उनकी व्यंजना दृष्टव्य है–
“तो खरीदा जा सकता है जनतंत्र,
केवल ये जनतंत्र के बिल्डर हैं।। “
जिन्होंने मुंबई की जीवन रेखा की वक्र सरलता नहीं देखी, उसे जिया नहीं, वे पढ़ते ही चौंक जाएंगे। अधिकांशतः अभिव्यक्ति अगम ही रही आएगी।
कथ्य, भाषा, शिल्प, हर दृष्टि से बेहद अनोखी है यह कृति, इसे अपूर्व ही कहेंगे।
हिंदी अनुवाद में वर्तनी यदा कदा प्रश्न बन सकती है। अंततः कवि एक द्वन्द्व उपस्थित करते हैं–
कवि अर्थात् हम,
ले सकते हैं क्या बंदूक हाथ में,
क्या बैठ सकते हैं अनशन को
यह कृति हिंदी और मराठी के बीच ऐसा पुल बनाती है, जो हर मौसम, हर आघात के बीच भी अटूट रहेगा। अरब सागर, वैश्विक एवं पहचान, तकनीकी औद्योगिक विकास का लोहा मनवाती हुई मुंबई, अपनी ही सतह के नीचे एक अनाम लोक से अनजान प्रतीत होती है, और वही कवि का उपजीव्य है।
यह साहित्य के इतिहास में साहस का प्रतिमान है। अनुभूति की तीक्ष्णता और अनूठी अनगढ़ शैली इसे साहित्य विश्व में क्रान्तिकारी सिद्ध करती है। लिटिल बर्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली का यह अनुवादित शाहकार पाठकों के मन को निश्चय ही आंदोलित करेगा और एक स्थायी स्मृति बनकर हृदय में सुरक्षित रहेगा। ।
☆ आत्मकथ्य ☆ ~ श्रेयस कृत काव्य कथा वीथिका की कविताएं : कविता में लघुकथा ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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कोविड अपने चरम पर था, उन दिनों मैं फेसबुक पर लगभग प्रतिदिन एक कविता लिखा करता था। इस पोस्ट का नाम मैंने काव्य कथा वीथिका ही रखा था। धीरे धीरे मेरी ऐसी कई रचनाएं बनकर तैयार हो गयीं। फिर मैंने इन रचनाओं को संकलित कर संकलित कर पुस्तक का स्वरूप दिया। यह पुस्तक काव्य कथा वीथिका थी। इस पुस्तक की कविताएं, सामान्य, सरल एवं आम जन के लिए आसानी से समझ में आने वाली थी। इन कविताओं की विशेषता यह थी कि मेरे जीवन में (पूर्व में और वर्तमान में) जो कुछ भी घटनाएं घटती या जो कुछ भी मैंने अपने आंखों से घटते हुए देखता, उनका आश्रय लेते हुए कुछ काल्पनिक पुट से उसे साहित्यिक ढंग में सजाते हुए कविता के रूप दे देता। इसके अतिरिक्त भी सामाजिक समताओ एवं विषमताओं पर आधारित मनोभावों को कविता का स्वरूप दे देता था। यह सब उपक्रम करते एवं कविता लिखते वक्त मुझे यह पता ही नहीं चला कि कब इन कविताओं में छोटी सी लघुकथाएँ समा गयीं। मैं तो इन्हें बस एक सरल, तुकबंदी वाली, अगेय कविता ही समझ रहा था।
खैर पुस्तक के प्रकाशन की अवधि नजदीक आयी तो मैंने इसकी पांडुलिपि को मॉरीशस में जन्मे, भारतीय मूल के हिंदी गद्य साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के पास पुस्तक भूमिका लिखने हेतु भेज दी।
अब प्रश्न उठता है कि काव्य की भूमिका एक गद्य लेखक कैसे लिख सकता है। इस विषय में क्या सोच सकता है, तो इस पर मेरा मानना यह है कि एक गद्य लेखक अवश्य ही गद्य लिखता है लेकिन वह एक पाठक भी होता है। उसके भीतर भी हृदय होता है तथा शब्दों के भाव और रस को समझने की क्षमता होती है। कविताएं जो मन को प्रमुदित करती है, उनको सुनने का चाव सबके अंदर होता है.
जब इस सुप्रसिद्ध कथाकार ने मेरी कविताओं के अंदर एक लघुकथा को समाते हुए देखा तो उन्होंने अपनी भूमिका में निम्न पंक्ति डाल दीं –
“काव्य कथा वीथिका – यह आपका निजी शीर्षक था, जिसे आपने धारा प्रवाह बनाकर अब तक अनेक रचनाओं का पाठकों को रसास्वादन करवा दिया है। विशेष कर आपबीती को आप आधार बना कर लिखते हैं जो किसी भी कोण से साहित्य होता है। मैंने शुरू में लिखा था आप अपनी ओर से एक विधा की नींव रख रहे हैं आज भी मैं अपनी इस बात पर कायम हूँ. “
प्रसिद्ध गीतकार स्व.श्री नीरज अवस्थी (लखीमपुर) के देख रेख में प्रकाशित इस पुस्तक की एक रचना आपके समक्ष रखता हूँ, जो कि निम्नवत है
☆ दादी की होली ☆
*
होली का त्योहार आज था, दादी घर पर न थी।
अम्मा चाचा को दादी की, चिंता आज लगी थी। ।
बुधिया काकी के घर में, चूल्हा नहीं जला क्यों।
चिंता न हो दादी को, इसकी आज भला क्यों। ।
ऐसे कैसे हो सकता था, हम सब पूआ खाएं।
बुधिया काकी के घर के, बच्चे भूखे भूखे सोए। ।
घर से आँटा घी लेकर के, दादी वही गई थी।
मेरी दादी की होली, ऐसे आज मनी थी।।
☆
मुझे बेशक अपनी कविताओं में लघुकथा नहीं समझ में आयी लेकिन श्री रामदेव तुरंत ने इन कविताओं में एक लघुकथा देखा था।
युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच उत्तर प्रदेश इकाई के तत्वावधान में दिनांक 28 -10 2023 को, कविता में लघुकथा विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन गूगल मीट के आभासी पटल पर किया गया l कार्यक्रम में श्री राम किशोर उपाध्याय जी, राष्ट्रीय अध्यक्ष युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच, श्री रामदेव धुरंधर मॉरीशस, डॉ0 नूतन पाण्डेय जी, सहायक निदेशक केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली रहीं l डॉ 0 अभय नाथ सिंह, प्राचार्य किसान स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय रकसा, रतसर बलिया, श्री चंद्रेश्वर प्रताप सिंह छ. ग., प्रवासी साहित्यकर डा. अनिता कपूर जी (अमेरिका) एवं डा. दीपक पाण्डेय जी सहायक निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली श्रीमती प्रमिला कानपुर डॉ मोहम्मद जावेद, श्री रामसनेही विश्वकर्मा ‘सजल’, डॉ श्री प्रकाश मिश्रा, श्री मृदुल कुमार सिंह ‘मृदुल’, श्री नरेंद्र सिंह सिसोदिया, श्री अमित कुमार गुप्ता नेश्री शकील अहमद (बिलासपुर छ. ग.), श्री रामराज भारती, श्री बृजेश यादव, श्री अतुल राय, श्री नंदकिशोर वर्मा जी आदि ने अपने वक्तव्य एवं विचार रखें।
इस विषय में एक प्रस्ताव युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच केंद्रीय इकाई के समक्ष भी रखा गया कि क्या इसे एक विधा का रूप में देख सकते हैं या नहीं।
“श्रेयस की काव्य कथा विथिका का कविताओं के माध्यम से छोटी-छोटी लघुकथाओं और घटनाओं का अवलोकन कराती है।
इनकी कविताओं में किसी लघु कथा के विभिन्न तत्व – पात्र, परिवेश, संघर्ष, समस्या घटनाक्रम और संदेश सभी समाहित है।
☆ पुस्तक चर्चा ☆ मिठलबरा की आत्मकथा – लेखक – गिरीश पंकज ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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मिठलबरा की आत्मकथा
यशस्वी साहित्यकार पत्रकार गिरीश पंकज कृत वह उपन्यास जो पत्रकारिता की भीतरी दुनिया की पड़ताल करता है। वैचारिकी को उष्मा प्रदान करने वाली जबर्दस्त प्रस्तुति जो सहज हास्य में छिपे तीक्ष्ण व्यंग्य के साथ मन पर अमिट छाप छोड़ जाएगी।
☆ विहंगम दृष्टिपात “मिठलबरा” पर – इन्दिरा किसलय ☆
“समकालीन हिन्दी पत्रकारिता का रेशा रेशा उधेड़ता हुआ सच का बेखौफ दस्तावेज है—मिठलबरा की आत्मकथा। जहाँ कटघरे में व्यक्ति नहीं प्रवृत्ति है।
मिशन को कमीशन में तब्दील करते संपादक, पिन/पीत पत्रकारिता से लिपटे हुए पत्रकार, विज्ञप्तिजीवी नेता, चमचे, दिलजले, छपासपीड़ित, यूनियनबाज, शोषित-मातहत और छद्म बुद्धिजीवियों को बेनकाब करते हुए पंकज, पाठकों की धड़कन में समा जाते हैं।
धनबल और मिठलबरों की फौज के बीच मासूम सच बलि के बकरे सा लगता है।
उपभोक्तावादी पंक में आपादमस्तक डूबी महानगरीय पत्रकारिता का आतंक नैतिक चेतना को छटपटाने तक की इज़ाजत नहीं देता। चेहरा पाने की तलाश में बेचेहरा होते लोग पंकज के निशाने पर हैं। क्रान्तदर्शी उपन्यासकार की भूमिका में उन्होंने मुद्दतों से बेचैन वक्त को राहत प्रदान की है।
मिठलबरा-छत्तीसगढ़ी भाषा का शब्द है। यानी वो शख्स जो आदतन झूठ बोले और झूठ को चाशनी में डुबाकर बोले। सामने तो मुस्कुराए और आदमी के घूमते ही पीठ में छुरा घोंप दे।
प्रसंगवश सामिष गालियांऔर व्यावहारिक हिन्दी का आंचलिक रूप कथ्य को जीभ पर हरी मिर्च सा रख जाता है। पाठक पानी भी नहीं मांगता। आनुषंगिक प्रस्तुतियों की एक धारा कभी “जूली” तो कभी चाटुकार चुगलखोरों की रसीली बोली के माध्यम से बेसाख्ता गुदगुदाती हुई नग्न सत्य के कालकूट विष को पचाने की सामर्थ्य देती है। झोंक, खांटी, गरियाना, चुम्मू, भदभदाकर हँसना जैसे शब्द अँचल का रंग उड़ेलते हैं पाठकों पर।
काश “पंकज” उपन्यास को महज फंतासी न कहते। यह उपन्यास नहीं चलचित्र है। अखबारों की दुनिया में व्याप्त भ्रष्टाचार पर उनकी तड़प सतत अग्निवर्षा में तब्दील हो गई है। स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने उन काँच की दीवारों को कलम के हीरे से काटा है जो चीखों को उस पार जाने नहीं देतीं।
उपन्यास की परंपरा में बहुत संभव है श्रीलाल शुक्ल की “राग दरबारी”और हरिशंकर परसाई की “रानी नागफनी की कहानी स्मरण हो आए। पर मिठलबरा की आत्मकथा अनोखी तथा अपूर्व है। क्योंकि इसमें उपन्यासकार ने सच्चाई से द्रविड़ प्राणायाम नहीं करवाया है। ऐसे में उनका साहस ऐतिहासिक हो गया है। तथा स्तुत्य है इस मायने में कि उनके व्यक्तित्व और ईमानदारी के बीच किसी किस्म की पर्दादारी नहीं है।।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है उनकी हाल ही में आये व्यंग्य संग्रह – ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ‘ पर उनका आत्मकथ्य। )
(ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से डॉ कुंदन सिंह परिहार जी को उनकी १४वीं पुस्तक के लिए हार्दिक बधाई।)
☆ आत्मकथ्य – ये इश्क़ नहीं आसाँ ☆ डॉ कुन्दन सिंह परिहार ☆
यह मेरा सातवां व्यंग्य-संकलन है। अब मेरे कथा-संग्रहों और व्यंग्य-संग्रहों की संख्या बराबर हो गयी, यानी दोनों ही 7-7 हो गये। कुल पुस्तकों की संख्या 14 हो गयी। 13 पुस्तकों के प्रकाशन के बाद सोचा था कि अब शायद अगली पुस्तक जन्म नहीं लेगी, लेकिन सिद्ध हुआ कि लिखने और न लिखने पर लेखक का वश नहीं होता।
अब रचनाएं पत्रिकाओं, समाचार-पत्रों को नहीं भेजता क्योंकि अब सारा सिस्टम पूर्व के सिस्टम से भिन्न हो गया है। अब साहित्यिक रचनाओं को पहले जैसा महत्व नहीं दिया जाता। अब अक्सर लेखक को रचना के प्रकाशन की जानकारी भी नहीं मिल पाती। इसलिए मेरे जैसे लेखकों के लिए फेसबुक अच्छा साधन है। रचना तुरन्त पाठकों के सामने आ जाती है और पाठकों की प्रतिक्रिया भी मिल जाती है, जो समाचार-पत्रों में नहीं होता। अधिकांश पत्रिकाएं अब अनियमित हैं। रचना के प्रकाशन की कोई समय-सीमा नहीं होती।
व्यंग्य-लेखन एक सामाजिक उपक्रम है। यदि व्यंग्य समाज के लिए नहीं है तो उसका कोई अर्थ नहीं है। व्यंग्य व्यक्तिगत शिकवा- शिकायत नहीं है, न ही वह मनोरंजन का साधन है। व्यंग्यकार अन्याय, अनीति के विरुद्ध समाज की पीड़ा को प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। इसीलिए परसाई जी ने लिखा कि व्यंग्य हंसने हंसाने की चीज़ नहीं है। मैं लिखता हूं क्योंकि मेरी संवेदना अभी जागृत है, क्योंकि मेरी दृष्टि में समाज में बहुत कुछ ऐसा है जो मुझे परेशान करता है और मुझे लिखने के लिए बाध्य करता है।
मेरे प्रकाशक, वर्जिन साहित्यपीठ के संचालक भाई ललित मिश्र को पुनः धन्यवाद देता हूं क्योंकि उनके सहयोग से ही मेरी लगभग सभी रचनाएं पुस्तक के रूप में आ सकी हैं। 1982 से 2018 तक के लगभग 36 वर्षों में अन्य प्रकाशकों के द्वारा मेरी 7 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जबकि मिश्र जी ने 2019 से 2024 के 5 वर्षों में मेरी 6 पुस्तकें प्रकाशित कीं। मेरे लिए यह बड़ी राहत की बात रही। मिश्र जी के साफ-सुथरे व्यवहार के कारण मुझे इस दौर में कभी परेशानी नहीं हुई। पूर्व में पुस्तकों के प्रकाशन में विलंब का मूल कारण यह रहा कि मैं संपर्क बनाने और दौड़-भाग करने में हमेशा कमज़ोर रहा। संयोग से ही मिश्र जी से परिचय हुआ, जो मेरे लिए संकटमोचक बना।
पुणे से ‘ई-अभिव्यक्ति’ ब्लॉग संचालित करने वाले भाई हेमंत बावनकर का भी मैं ऋणी हूं। वे प्रति रविवार को मेरा एक लेख प्रकाशित करते हैं। अभी तक वे मेरे 300 से अधिक लेखों को पाठकों के सम्मुख ला चुके हैं। वे भी बहुत भले व्यक्ति हैं। उन्हीं ने मेरा परिचय ललित मिश्र जी से कराया।
रायपुर से प्रकाशित अखबार ‘चैनल इंडिया’ के साहित्य संपादक श्री स्वराज करुण ने मेरी 70 से अधिक रचनाएं प्रकाशित कीं, जिसके लिए मैं उनका आभारी हूं। वे भी बहुत सज्जन व्यक्ति हैं।
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है संपादक – डॉ कृष्णा रावत, सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ द्वारा सम्पादित “प्रबोध-बोध ” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०९ ☆
☆ “प्रबोध-बोध ” – संपादक – डॉ कृष्णा रावत, सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक – प्रबोध-बोध (प्रबोध कुमार गोविल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित)
संपादक – डॉ कृष्णा रावत, सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर ‘
प्रकाशक – साहित्यागार
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ प्रबोध जी पर विभिन्न एंगल से साहित्यिक सामाजिक शोध बोध – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
( इन दिनों लंदन से)
किसी लेखक पर लिखी गई पुस्तक तभी सार्थक बनती है जब वह केवल व्यक्ति का परिचय न दे, बल्कि उसके रचना संसार के भीतर छिपे उस जीवंत मनुष्य को भी सामने लाए जो अपने समय, समाज और संवेदनाओं से निरंतर संवाद करता है।
लेखक को समझने के लिए उसके परिवेश , का ज्ञान महत्वपूर्ण होता है, इसीलिए रचना के साथ फुटनोट में सूक्ष्म लेखक परिचय प्रकाशित किया जाता है। पाठक और लेखक के बीच दूरी मिटाती यह पुस्तक स्वागतेय साहित्यबोध है।
प्रबोध कुमार गोविल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित पुस्तक प्रबोध बोध इसी अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज के रूप में अब पाठकों के साथ है।
यह पुस्तक प्रबोध जी के बहाने से उस रचनात्मक चेतना की पड़ताल है जिसने दशकों तक हिंदी साहित्य को अपनी विशिष्ट दृष्टि, वैचारिक निर्भीकता और मानवीय सरोकारों से समृद्ध किया है।समय के साथ लेखक के चश्मे के नम्बर , उनके फ्रेम परिस्थितियों की पृष्ठ भूमि बदलती रहती है, किंतु उसके लेखकीय लक्ष्य , उसका दृष्टिकोण उम्र की परिपक्वता के साथ विकसित होता चलता है।
इस पुस्तक का आकर्षक पक्ष यह है कि इसमें प्रबोध कुमार गोविल को केवल एक साहित्यकार के रूप में नहीं देखा गया है। उनके भीतर के मनुष्य, चिंतक, समाज दृष्टा और संवेदनशील रचनाकार को समान महत्त्व दिया गया है।
पुस्तक पढ़ते हुए यह अनुभव बार बार होता है कि साहित्य अंततः जीवन से ही जन्म लेता है और जीवन के विविध रंग ही किसी लेखक की रचनाओं में रूपांतरित होकर पाठक तक किताबों और स्फुट रचनाओं के माध्यम से पहुंचते हैं , यही लेखकीय यात्रा का जीवन संदेश बन जाता है।
प्रबोध कुमार गोविल का साहित्य अपने समय की धड़कनों को दर्ज करता है। उनके पात्र केवल कथा को आगे बढ़ाने वाले माध्यम नहीं हैं। वे समाज के भीतर छिपे प्रश्नों, अंतर्विरोधों, इच्छाओं और संघर्षों के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं। पुस्तक इस तथ्य को अनेक दृष्टियों से प्रमाणित करती है। उनके लेखन में महानगरीय अकेलापन भी है। बदलते सामाजिक मूल्य भी हैं। संबंधों की जटिलताएँ भी हैं। मनुष्य की आंतरिक बेचैनियाँ भी हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य, पाठक को केवल मनोरंजन नहीं देता बल्कि उसे वैचारिक मंथन के लिए भी बाध्य करता है।
इस पुस्तक की एक विशेष उपलब्धि यह है कि यह लेखक की रचनात्मक यात्रा को उसके सामाजिक संदर्भों से जोड़कर देखती है। आज जब साहित्य को अक्सर केवल पाठ या विचार के रूप में पढ़ा जाता है, तब यह पुस्तक स्मरण कराती है कि हर रचना के पीछे एक जीवित अनुभव संसार होता है। प्रबोध कुमार गोविल ने जीवन को बहुत निकट से देखा है। समाज के विविध वर्गों, परिस्थितियों और मानवीय मनोदशाओं को समझा है। यही अनुभव उनकी रचनाओं को विश्वसनीय बनाते हैं।
पुस्तक में उनके व्यक्तित्व के जिन आयामों का उल्लेख किया गया है, वे भी कम रोचक नहीं हैं। सहजता, विनम्रता, संवेदनशीलता और मानवीय आत्मीयता उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं के रूप में उभरती हैं। यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान खींचता है कि उनकी रचनात्मकता केवल बौद्धिक उपक्रम नहीं है। उसके पीछे मनुष्य और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है। शायद यही कारण है कि उनके साहित्य में विचार और संवेदना साथ साथ चलते हैं।
प्रबोध कुमार गोविल के साहित्य की चर्चा करते हुए पुस्तक के आलेख उनके कथा साहित्य, उपन्यासों, कविताओं तथा बाल साहित्य की ओर संकेत करती है। इससे उनके बहुआयामी रचनाकार होने का परिचय मिलता है। वे किसी एक विधा तक सीमित लेखक नहीं हैं। उनकी रचनात्मक ऊर्जा अनेक साहित्यिक रूपों में व्यक्त हुई है। यह विस्तार उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की शक्ति को रेखांकित करता है।
पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी भाषा और शिल्प पर किया गया विमर्श भी है। उनकी भाषा सरल है, पर साधारण नहीं। उसमें जीवन की सहजता है। संवाद की ऊष्मा है। विचार की स्पष्टता है। यही कारण है कि उनका साहित्य विद्वानों के साथ साथ सामान्य पाठकों तक भी पहुँचता है। साहित्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह पाठक के मन में उतर सके और उसके अनुभव का हिस्सा बन जाए।
इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह भी महसूस होता है कि लेखक के मूल्यांकन का कार्य केवल प्रशंसा करना नहीं होता। उसका वास्तविक उद्देश्य उसके साहित्यिक अवदान को समझना और समझाना होता है। प्रबोध बोध इस कसौटी पर खरी उतरती दिखाई देती है। यह पुस्तक प्रबोध कुमार गोविल के साहित्य को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का अवसर प्रदान करती है। साथ ही यह बताती है कि किसी लेखक की वास्तविक पहचान उसके पुरस्कारों से नहीं, उसकी रचनाओं की जीवंतता और समय से संवाद करने की क्षमता से निर्मित होती है।
समग्र रूप से देखा जाए तो प्रबोध बोध एक ऐसी पुस्तक है जो व्यक्ति और कृतित्व के बीच सेतु का काम करती है। यह पाठक को लेखक के निकट ले जाती है। उसके साहित्य को नए सिरे से पढ़ने की प्रेरणा देती है। साथ ही यह विश्वास भी जगाती है कि सच्चा साहित्य समय के साथ पुराना नहीं होता। वह हर युग में नए अर्थों के साथ पाठकों के सामने उपस्थित होता रहता है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उसकी स्थायी प्रासंगिकता भी है।
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है पुस्तक समीक्षा – “तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६८ ☆
पुस्तक समीक्षा – तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)… कवि – महेन्द्र वर्मा ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
पुस्तक का नाम – तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)
कवि – महेन्द्र वर्मा
प्रकाशक – आस्था प्रकाशन गृह, जालंधर-नई दिल्ली-कनाडा
संस्करण – 2026
मूल्य – 325 रु.
सार्त्र ने कहा था – “सब कुछ गुजर जाता है। आंधी, तूफान, सुनामी, सब आते हैं, रुकते नहीं, थमते नहीं, पतझड़ में रंग-बिरंगे पत्ते, अपनी शाख से, आज़ादी पा, मंडराते हैं, खिलखिलाते हैं और फिर बिखर जाते हैं ज़मीं पर”… किसी काव्य-संग्रह में सार्त्र का नाम होना ही कवि की उच्चता दर्शाता है, क्योकि ज्याँ पॉल सार्त्र बीसवीं सदी के सुविख्यात फ्रांसीसी अस्तित्ववादी दार्शनिक थे, जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता को बनाए रखते हुए नोबेल पुरस्कार भी लेने से इंकार कर दिया था।
विदेश में विदेशी भाषा के माध्यम से हिंदी पढ़ाने वाले महेन्द्र वर्मा जी जैसा व्यक्तित्व जब कविता रचेगा तो उसमें अपने उत्स और विदेश की धरती पर अपनों परायों के बीच जीवन जीना कितना अनुभूत, कितना परानुभूत होगा, यह उनकी कविताओं से थोड़ा सा परिलक्षित होता है, थोड़ा सा इसलिए कि अपनी भाषा की सुगंध को विदेशी भाषा की सुगंध में अवगुंठित करना और अपनी मांटी की सौंध से सात समुंदर पार की धरती तक के वितान पर अनुभवों की रेखा खींच पाना एक काव्य-संग्रह में संभव नहीं है, परंतु सात समुंदर पार भी अपनी मांटी की सौंध को अपने में बसाये रखने वाले महेन्द्र वर्मा जैसे व्यक्तित्व की एक ही कविता ऐसी हो सकती है कि पाठक उसे पढ़कर बरसों प्रभावित रह सकता है।
महेन्द्र वर्मा की अपनी पहली कविता, “क्या खोया, क्या पाया”, में ही बयान कर देते हैं-
अक्तूबर का दिन था
खुशनुमा दिन
जब आया था न्योता
सात समंदर पार
यू.के. से
एक नहीं
दो-दो
यॉर्क और मेनचेस्टर से।
करना है
मजबूत-प्रवास में
हिंदी की नींव को
यॉर्क ने,
दूर से दी थी आवाज।“
इस कविता में ही उन्होंने अपनी यात्रा का ऐसा वर्णन कर दिया है कि पाठक पढ़कर सोचता रह जाता है। आगे पढने के लिए उसे हिम्मत जुटानी पड़ती है। आगे वर्मा जी सोचें लेकिन उनकी यात्रा हिंदी से ही पूरी होती है, जो उनका बहुत बड़ा संबल भी बनती है। इसी कव्ता में आगेलिखते हैं-
“प्रवासी को
हाथ बढ़ा कर
दे दिया
हिंदी ने
इतना कुछ,
विधि में
मिलता नहीं
सदा
सब कुछ।
कुछ खोया, कुछ पाया।“
लेकिन विरासत उन्हें कुछ भूलने नहीं देती। दूसरी कविता “विरासत” में वे कह उठते हैं-
“है संबंध अनूठा
मानवता औ विरासत का,
है एक विशाल कोश
वेदों औ पुराणों में
विरासत का
करता है प्रदान जो
मानवता को अंतर्दृष्टि।
……
मिला दर्शन
वसुधैव कुटुंबकम्
सर्वे भवंतु सुखिना
औ’
ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत
का भी।”
विदेश में रहते वे रामायण, गीता, मानस, तमिल कंब रामायण, मलयालम अध्यातम रामायणम्, नानक, गौतम और महावीर के साथ-साथ शंकर और चार्वाक किसी को नहीं भूलते।
महेन्द्र वर्मा जी का काव्य कौशल उस समय ऊंचाइयों की पराकाष्ठा पर होता है जब वे “पतझड़” को एक नया सकारात्मक स्वरूप प्रदान करते हैं, जो किसी कवि ने नहीं दिया। वे लिखते हैं-
“पतझड़ है यह तो
ज़मीं पर बिखरी पत्तियाँ
सूरज की
सुनहली रोशनी में
चमकती-दमकती
इठला रही हैं,
मुक्ति मिली है
आज”
अंग्रेजी कवि कीट्स की कविता को उन्होंने आगे बढ़ाया है। इसी कविता में आगे लिखते हैं—
“और मिला है
वह अंतिम सुख
जब बटोर- बटोर कर
माली ने
किया
उनका अंतिम संस्कार।”
प्रकृति का अवलोकन ही नहीं अवीक्षण भी उनका अभूतपूर्व है। “कली बोली” कविता उऩकी दृष्टि देखिए—
“कली बोली-
मैं अधखिली रह गयी,
था मेरे
यौवन का क्षण, वह
तुषारापात कर दिया
अचानक
जब तुमने।”
और वे “गुलमोहर” से पूछ बैठते हैं—
“गुलमोहर से पूछो
खुल कर, खिलखिला कर बोलेगा,
पतझड़ आया तो क्या
चला गया
हर वर्ष
जाड़ा भी आकर।”
ऐसा कोई कवि नहीं हुआ, जिसने येन-केन-प्रकारेण सृष्टि पर कुछ न लिखा हो। प्रकृति और सृष्टि कवियों के चहेते विषय हैं, तो वर्मा जी पीछे कैसे रहते, “सृष्टि” कविता में लिखते हैं—
“सृष्टि का भी तो
अजीबो-ग़रीब
रंगो-रिवाज़ है।
सुनामी आती तो है
पर
दस्तक देकर ,
चली भी जाती।”
उनकी कल्पना शक्ति “सुगंध” नामक कविता में तो देखते ही बनती है। अमूर्त को मूर्त कैसे बनाया जाता है उसकी बानगी इस कविता में है—
“निःशब्द हो
तुम सुगंध,
पर निष्प्राण नहीं।
धार्मिक अनुष्ठानों में
मंदिर हो या मस्जिद
कहाँ नहीं मिलती हो तुम
….
सुगंध, तेरी है विचित्र कहानी
पवन का दामन छोड़
पहुँच जाती हो
जब अंतरिक्ष में
फैलादेती हो ऐसा
अपना सुवास, अपना सौरभ
बतला नहीं पाती,
रह जाती है
नाकाम
अंतरिक्ष निर्वात में
नाक हमारी।”
सड़कों के किनारे वृक्ष लगाए जाते हैं और वे ऊंचे होकर सड़क को ढंकते हुए मिल जाते हैं। ऐसा मैंने देखा है। आपने भी देखा होगा। और महेन्द्र वर्मा ने भी देखा, लेकिन कैसे, उनकी कविता “आमने-सामने” में देखिए—
“रख दिया तुमने मुझे
अपनों से दूर
जमा दिया सड़क के
इस पार- उस पार
आमने-सामने
,………
प्यार का नशा हो जाए
तो लगती हैं खिसकने
दूरियाँ।
उम्र बढ़ती गयी
और हम पास आते गए
आलिंगन होने लगा
फुनगियाँ, फुनगियों से मिलती रहीं
हमारी दूरियाँ फिसलती गयीं।”
सृष्टि, प्रकृति पर ही उनकी निगाह नहीं गई, अपितु विज्ञान पर गहरी नजर गई और वैज्ञानिकों को सुनाया भी। उनकी “विज्ञान और वैज्ञानिक” कविता में है—
“विज्ञान नहीं, वैज्ञानिकों,
कर डाला तुमने
क्या
विज्ञान का।
……
पैदा कर दी है
वैमनस्यता कैसी
भेद डाल
मित्रता में
विज्ञान औ प्रकृति की।
….
रख दिया ताक पर
सृष्टि के मूल्यों को
मत दो विध्वंस का नुस्खा,
दे दो संजीवनी की औषधि।”
इंतज़ार पर उन्होंने तीन कविताएँ लिखी हैं। तीनों हृदयस्पर्शी हैं। लेकिन एक “इंतजार-2” मेरे दिल को भेद गई, आंसू ढल आए। आप भी देखिए—
“व्यग्रता से था
माँ को इंतज़ार
बेटा आएगा
लौट कर युद्ध से।
आया तो अवश्य
पर, अंतिम संस्कार के लिए।”
इंतज़ार 1 और 3 भी बहुत गंभीर रचनाएँ हैं। वर्मा जी लिखते हैं तो कविता लेकिन दर्शन उनकी हर बात में रहता है। वास्तव में वे एक भाषावैज्ञानिक कवि ही नहीं अपितु दार्शनिक कवि हैं। उनकी प्रतीक्षा नामक कविता में ऐसे दिखता है—
“करूँ प्रतीक्षा किस की
कब तक
..
उस मौसम की
जो कभी न आया।
प्रतीक्षा में नींद आने की
रात को थाम लेता हूँ,
रात आती तो है
पर फटकने देती नहीं,
नींद को पास
और हो जाती है सुबह।”
ऐसे ही प्रतीक्षा की घड़ी कविता में लिखते हैं—
“खिसकती जा रही है
प्रतीक्षा की घड़ी
सूइयाँ फिर भी
थकती नहीं
अनवरत चलती जा रही हैं,
घूम-घूम कर
मोक्ष का दामन पकड़े
मुक्ति की आशा
रख रही है-
ज़िंदा उन्हें।”
उन्होंने खूब लिखा है। पर माँ को नहीं भूलते—
“माँ बैठी है, चुपचाप
आँखें हो गयी हैं
पथरायी-सी
बाट जोहते-जोहते
उसकी
जो कभी न लौटा,
लौटा भी तो तब
जब बंद हो चुकीं थीं
माँ की आँखें।”
मुक्ति कविता में वर्मा जी लिखते हैं—
“ईश्वर ने
मानव से पूछा-
मुक्ति मेरी
कब आएगी
उत्तर आया-
जब मेरी होगी।”
आगे पाठक स्वयं पढ कर देखेंगे कि और क्या उत्तर आता है। “ऐसे ही लोगे कब तक परीक्षा,” “कब तक रहोगा उदास”, “जी करता है” उऩकी बहुत मर्मस्पर्शी कविताएँ हैं। उनका प्रवासी मन मसोस उठता है।
“जी करता है
कुछ बोलूँ,
क्या बोलूँ
किस से बोलूँ
कैसे बोलूँ
बतियाऊँ भी तो
किस भाषा में”
अकेलापन तो वे बड़े नज़दीक से महसूस करते हैं। लिखते हैं—
“खड़ा हूँ
अब अकेला अंतिम पड़ाव पर।
दिखते बहुत हैं लोग
मुड़कर देखता कोई नहीं।
कैसा है अकेलापन यह।”
वर्मा जी विदेश में रहते हैं, पर संस्कारों का पूरा ध्यान रखते हैं और संस्कार पर कविता लिखना नहीं भूलते, लिखते हैं-
“तुम्हारे संस्कार, औ’ मेरे संस्कार
क्या दोनों का सामंजस्य
नहीं हो सकता .
जीवन का अर्थ क्या है.
जीने का मतलब क्या है.
जीवन एक जैसा नहीं रहता हमेशा,
नहीं रहते संदर्भ और मूल्य एक जैसे।”
मानव मन के अध्येता के रूप में वर्मा जी तब उभर कर आते हैं जब घृणा पर कविता लिखते हैं। घृणा पर शायद ही किसी ने ऐसी कविता लिखी हो, विदेश में नस्ल भेद और घृणा को उन्होंने स्वयं भोगा है शायद। दृष्टव्य है—
“घृणा करना कितना
घिनौना होता है
इंसान जब इंसानियत
भूल बैठता है
नस्ल के नशे में
……
नस्ल, धर्म, जाति, पंथ, रंग
के नाम पर
घिनौनी हरकतें
जब कभी भी
दूसरों का रंग
उसे लगता है बदरंग। ”
वे व्यक्ति को सचेत भी करते हैं कि—
“दीप
दीप तो
कभी न कभी
सारे बुझेंगे ।
सोच कर यह
हो जाना
अकर्मण्य
विपरीत है
धर्म के।”
वे शब्दों के चितेरे हैं, तभी तो शब्द पर तीन कविताएं लिखी हैं। शब्दों की शक्ति में लिखते हैं—
“शब्दों में समाहित है
संगीत की शक्ति,
होती है शब्दों में
कोलाहल को भेदने की शक्ति,
शब्दों में शक्ति होती है
ममता औ’ मनुहार करने की,
लड़ने औ लड़ मरने की भी।”
महेन्द्र वर्मा जी एक दार्शनिक कवि हैं। उनकी हर कविता में दर्शन झलकता है। जैसे “नाम” शीर्षक वाली कविता में लिखते हैं—
“सोचता हूँ कभी-कभी
क्या धरा है मात्र नाम में.
सोचता हूँ फिर,
हुआ होगा
सृष्टि में
कभी क्या
बिना नाम के संबोधित
कोई कभी.”
ऐसे ही उत्सव की परिभाषा में –
“होता है, मुक्ति का उत्सव
त्यागने पर अपना शरीर।
उत्सव, उत्सव हो सकता है
सारा जीवन ही उत्सव।”
“बेसलन, रूस” कविता में वे आतंकवादियों को ललकारते हैं—
“कितने बच्चे थे
मासूम
नन्हें-नन्हें
नए जीवन की
करने शुरुआत,
……
जब किया प्रहार
निर्दयी आतंकवादी
तुमने।“
फिर “मौत” कविता में जज़्बाती भी हो जाते हैं—
“जब भी आती है
मौत
कभी दस्तक
देती नहीं।“
अपने देश से दूसरे देश में बसने वाले या प्रवास करने वाले प्रवासियों की पीड़ा को वर्मा जी से अच्छा कौन
बता सकता है, “प्रवासी की पीड़ा” में देखिए—
“समझ गया मैं।
देसी कभी
नहीं समझोगे मुझको.
रंग भेद है
जाति भेद है
नस्ल भेद है
…..
करा दिया
स्वीकार तुम्हीं ने,
अंश नहीं
बन सकता
तेरी धरती का मैं।
वर्मा जी भाषाविज्ञानी तो हीं ही, विदेश में पढाया भी है। लेकिन भाषा और मातृभाषा को काव्य में भी नहीं भूलते, जैसे, “आप्रवासी की मातृभाषा” में देखिए—
“पहचानो, समझो मुझको।
अंग्रेजी नहीं जानतीं
पर, नहीं हूँ बिन भाषा के मैं ।
मेरी माँ की भाषा
भी सशक्त थी जब,
शिक्षा द्वार पहुँचते ही
दुत्कारा मेरी भाषा को
तुमने।”
भाषा के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वालों और स्वार्थलिप्सा में बंधे विद्वानों को भी नहीं छोड़ते, “भाषा हितैषी” कविता में लिखते हैं—
“और तुम
बहुत व्यस्त रहे तुम,
भाषाकर्मी बन
शोध जगत में।
….
बहुत कर लिए
शोध तुम ने।
शोधक भी हो गए
और संशोधक भी।
…..
दिखता नहीं तुम्हें क्या
होती जा रही है लुप्त
मेरी अपनी भाषा।
बनी रहेगा पीड़ा उसकी
पीढ़ी-दर-पीढ़ी तक।
…..
मेरी पीड़ा है साक्षी
उस भाषाई भेदभाव की।
डिगा दिया है जिसने
संस्कृति की वह नींव हमारी।”
“मम्मी-डैडी” कविता में हिंदी-अंग्रेजी ध्वनियों की बात करते हैं तो “पनप न पाएगी” कविता में कहते हैं—
“कर लो कितनी भी कोशिश
पनप न पाएगी
इस धरती पर,
तेरी, उनकी भाषाएँ।”
इसके भी आगे “मेरी भाषा-तेरी भाषा” कविता में लिखते हैं—
“तेरी भाषा
मेरी भाषा
भाषा तो भाषा ही है
जैसी तेरी
वैसी मेरी।”
महेन्द्र वर्मा प्रवासी तो रहे पर जहाँ रहे वहाँ प्रकृति के बनके रहे, जैसे “ट्यूलिप के फूल” कविता में—
“आता है वसंत
औ’ निकल पड़ते तुम
गर्भ से ज़मीं के,
सुर्ख लाल,पीले
रंग-बिरंगे।
…
चंद दिनों का तुम्हारा जीवन
मुर्झाने लगता है,
मानकर
नियति के नियम को
हो जाते हो
धीरे-धीरे लुप्त
स्वीकार कर
आने-जाने के दर्शन को।”
“यूस्टन स्टेशन” का दर्शन वे कुछ इस तरह कराते हैं—
“भाग रहे हैं
भाग रहे हैं
सब के सब
बस दौड़ रहे हैं,
यह जाना पहचाना
यूस्टन का स्टेशन।”
“तुम, न आए लौट कर” कविता में उनका गहन सोच, दर्शन बहुत सुंदर ढंगे से प्रस्फुटित होता है—
“तुम न आए लैट कर
सृष्टिकर्ता,
रच तो दिया
इस अद्भुत सृष्टि को,
पर न आए लौट कर।”
“तुम, न आए लौटकर” काव्य संग्रह में कुल अस्सी कविताएँ हैं। हर कविता एक से बढकर एक, चयन करना मुश्किल, क्योंकि महेन्द्र वर्मा जी का शब्दों और अर्थों पर पूरा अधिकार है। काव्य संग्रह पढ़कर ही सुधी पाठक उसका आनंद उठा पाएंगे।