हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५२ – पुस्तक समीक्षा – गुल्लक और उसकी रजाई – कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग जी द्वारा लिखित पुस्तक – “गुल्लक और उसकी रजाई” की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५२ ☆

☆ पुस्तक समीक्षा – गुल्लक और उसकी रजाई – कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

कहानी-संग्रह : गुल्लक और उसकी रजाई

कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग

प्रकाशन सहयोग : राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर

प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

प्रथम संस्करण : 2026

ISBN : 978-93-7251-012-6

मूल्य : ₹199/-

समीक्षक : ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

☆ गुल्लक और उसकी रजाई : बालमन की जिज्ञासा से सामाजिक चेतना तक ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

बाल साहित्य को लेकर एक सामान्य धारणा यह रही है कि वह बच्चों के मनोरंजन और नैतिक शिक्षण का माध्यम है। किंतु आधुनिक बाल साहित्य ने इस सीमित धारणा से आगे बढ़कर बालक को उसके समय, समाज, पर्यावरण और बदलती जीवन-स्थितियों के बीच देखने का प्रयास किया है। आज का बच्चा केवल परी-कथाओं का पाठक नहीं है; वह तकनीक से परिचित है, प्रश्न करता है, अपने आसपास घट रही घटनाओं को देखता है और अनेक बार बड़ों की स्थापित धारणाओं पर भी सवाल उठाता है। इसलिए आज की बाल कहानी से अपेक्षा है कि वह बालमन की जिज्ञासा को स्वीकार करे और उसे संवेदना, विवेक तथा सामाजिक चेतना से जोड़े।

अंजना मनोज गर्ग का कहानी-संग्रह ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ इसी बदलती हुई बाल साहित्यिक चेतना का प्रतिनिधि संग्रह कहा जा सकता है। इसमें बीस कहानियाँ हैं और लगभग प्रत्येक कहानी किसी न किसी समकालीन सरोकार को बालमन के निकट ले आती है। जल-संरक्षण, पर्यावरण, पशु-पक्षी, स्वच्छता, पुस्तकों के प्रति प्रेम, बुजुर्गों की उपेक्षा, पारिवारिक संबंध, त्योहार, प्रकृति और आधुनिक तकनीकी जीवन—ये सभी विषय संग्रह में अपनी अलग-अलग कथात्मक शक्ल में उपस्थित हैं।

इस संग्रह की विशेषता यह है कि लेखिका गंभीर विषयों को बच्चों के सामने सीधे भाषण के रूप में नहीं रखतीं, बल्कि उन्हें कहानी की स्थितियों में बदलने का प्रयास करती हैं। कहीं रजाई कथा का माध्यम बनती है, कहीं पुस्तक स्वयं अपना दर्द व्यक्त करती है, कहीं जंगल एसी की माँग करता दिखाई देता है और कहीं पक्षियों के माध्यम से प्रकृति का मौन संकट सामने आता है। यही रचनात्मक प्रयोग इस संग्रह को सामान्य उपदेशात्मक बालकथाओं से अलग करने का प्रयास करते हैं।

अंजना मनोज गर्ग के आमुख को पढ़ते हुए उनके बाल लेखन की मूल प्रेरणा स्पष्ट होती है। वे बचपन की निर्मलता, अबोधता और जिज्ञासा को अपनी रचनात्मकता का आधार मानती हैं। उनके लिए बालमन प्रश्नों का एक ऐसा संसार है, जहाँ जीवन की साधारण घटनाएँ भी कौतूहल का विषय बन सकती हैं।

उनकी रचनात्मक दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे बच्चे को केवल परिवार और विद्यालय के दायरे में नहीं देखतीं। उनके बच्चे जंगल, पक्षियों, पेड़ों, मौसम, जल और घरेलू संसार से भी जुड़े हुए हैं। इसीलिए संग्रह में प्रकृति और मनुष्य का संबंध बार-बार उभरता है।

लेखिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि उन्होंने जीवन में काम आने वाले सामान्य किंतु महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को बालमन की जिज्ञासा में ढालकर कहानी रचने का प्रयास किया है। यही बात उनके कथा-संसार की आधारभूमि बनती है। वे बड़े प्रश्नों को छोटे प्रसंगों में बदलती हैं और बच्चों को उन प्रसंगों के बीच रख देती हैं।

आज तकनीकी विकास ने बच्चे की दुनिया को अभूतपूर्व रूप से बदल दिया है। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल माध्यम उसके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। इस स्थिति में बाल साहित्य का दायित्व कम नहीं, बल्कि बढ़ गया है। सूचना के विस्तार के साथ संवेदना का विकास भी आवश्यक है।

तकनीक बच्चे को बहुत कुछ जानने का अवसर देती है, लेकिन साहित्य उसे यह समझने में सहायता करता है कि उस ज्ञान का मानवीय उपयोग क्या है। बाल साहित्य उसे प्रकृति से जोड़ सकता है, दूसरों के दुख को समझने की दृष्टि दे सकता है और उसके भीतर सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव पैदा कर सकता है।

जितेन्द्र निर्मोही ने संग्रह की भूमिका में इसी संदर्भ को रेखांकित करते हुए कहा है कि आज बच्चों में तकनीकी समझ तेजी से बढ़ रही है, इसलिए उन्हें संवेदना, सामाजिक सरोकार और संस्कृति से जोड़ना भी आवश्यक है। ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ इसी आवश्यकता को अपने कथ्य में ग्रहण करता है।

इस संग्रह की बीस कहानियाँ विषयगत रूप से एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक व्यापक सूत्र से जुड़ी हैं—बालमन के माध्यम से जीवन और समाज को देखना।

‘घमण्डी गुलाब’ से संग्रह की शुरुआत होती है। गुलाब जैसे फूल को केंद्र में रखकर निर्मित यह कथा बाल साहित्य में मानवीकरण की परंपरा का उपयोग करती है। फूल को व्यक्तित्व देना बच्चे के लिए प्रकृति को एक जीवंत सत्ता के रूप में देखने की संभावना खोलता है।

शीर्षक कहानी ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ में सर्दी और विद्यालय जाने की स्थिति के माध्यम से कर्तव्य-बोध को कथा का आधार बनाया गया है। यहाँ रजाई केवल सर्दी से बचाने वाली वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि बालक के आराम और उसके दायित्व के बीच एक रोचक प्रतीकात्मक स्थिति निर्मित करती है। बालक का अपने कर्तव्य की ओर लौटना कथा का केंद्रीय भाव बनता है।

‘मकर संक्रान्ति और बरगद काका की सीख’ में प्रकृति और पक्षियों के प्रति संवेदना का स्वर है। त्योहार को केवल परंपरा के रूप में न लेकर उसके भीतर छिपी प्रकृति-संवेदना को रेखांकित करने का प्रयास कहानी को सामाजिक अर्थ देता है।

‘शुभम की नयी होली’ और ‘पानी की चोरी’ जल-संरक्षण के प्रश्न को बच्चों के सामने रखती हैं। पानी के संकट को यदि केवल तथ्य या आँकड़े के रूप में बताया जाए तो बालक उससे भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ता। कहानी इस समस्या को अनुभव में बदल देती है। यही बाल साहित्य की शक्ति है।

‘भोलू का अपना घर’ स्वच्छता के प्रश्न को सामने लाती है। स्वच्छता यहाँ केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि रहने के परिवेश और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा विषय बनती है।

‘जंगल लौटी चिनचिन गौरैया’ और ‘चिंकी और गौरैया’ में पक्षी बाल साहित्य के माध्यम से प्रकृति के संकट के प्रतिनिधि बनते हैं। गौरैया का उल्लेख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह पक्षी भारतीय घर-आँगन और मानवीय जीवन से गहरे जुड़ा रहा है। उसके अस्तित्व को लेकर चिंता स्वयं मनुष्य और प्रकृति के बदलते संबंधों की ओर संकेत करती है।

‘सोनू की तासीर’ संग्रह की विषय-विविधता का उदाहरण है। यह गर्म तासीर वाले फलों को किस प्रकार खाया जाए, जैसे सामान्य जीवनोपयोगी प्रश्न को बाल कथा का रूप देती है। इससे स्पष्ट होता है कि लेखिका के लिए बाल कहानी का विषय केवल बड़े सामाजिक प्रश्न नहीं, बल्कि बच्चे के दैनिक जीवन की छोटी-छोटी आवश्यकताएँ भी हैं।

‘किताबों का दर्द’ संग्रह की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। पुस्तक को मानवीय संवेदना देकर उसके ‘दर्द’ को सामने रखना एक प्रभावी कल्पनात्मक युक्ति है। बच्चों द्वारा पुस्तकों को फाड़ने या खराब करने की आदत को सीधे डाँटने के बजाय यदि पुस्तक स्वयं अपनी पीड़ा व्यक्त करे तो बच्चा उसके साथ भावनात्मक संबंध स्थापित कर सकता है।

‘मेहुल और दादी का वैलेंटाइन’ और ‘दादाजी और धूप’ आधुनिक जीवन और पारिवारिक संबंधों के बीच संवाद स्थापित करती हैं। यहाँ बुजुर्ग केवल ज्ञान देने वाले पात्र नहीं हैं; वे भावनात्मक संबंधों की उस कड़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो आधुनिक व्यस्तता में कमजोर पड़ रही है।

‘गीतु-मीतु की समीरा’ और ‘रसोई बीमार है’ घरेलू और पर्यावरणीय जीवन के अलग-अलग पक्ष सामने लाती हैं। विशेषकर ‘रसोई बीमार है’ का शीर्षक ही अपने भीतर एक मानवीकरण छिपाए हुए है। रसोई का ‘बीमार’ होना वास्तव में उस घरेलू व्यवस्था की उपेक्षा का रूपक बन जाता है, जिसका प्रभाव बच्चों के जीवन पर पड़ता है।

‘जंगल में जब लगा एसी’ संग्रह की सबसे अधिक कल्पनाशील और समकालीन कहानियों में रखी जा सकती है। जंगल में एसी की आवश्यकता क्यों पड़ी—यह असंभव-सी लगने वाली स्थिति बच्चे के भीतर तुरंत प्रश्न पैदा करती है। यही प्रश्न आगे पर्यावरणीय संकट की ओर ले जाता है। एसी और रेफ्रिजरेटर से ओजोन परत को होने वाले नुकसान की ओर संकेत कहानी को वैज्ञानिक चेतना से जोड़ता है।

‘दीपावली और सफाई’ त्योहार और सामाजिक सरोकार के संबंध को रेखांकित करती है। दीपावली केवल सजावट और उत्सव नहीं, बल्कि स्वच्छता तथा सामुदायिक जीवन से जुड़ा अवसर भी है—कहानी इसी दिशा में विचार करती है।

अंतिम कहानियों में ‘नन्हें प्राशु की समझदारी’ और ‘नन्हा जलदू और बेमौसम की बारिश’ जैसी रचनाएँ बाल-बुद्धि और पर्यावरणीय संकट को केंद्र में लाती हैं। ‘नन्हा जलदू और बेमौसम की बारिश’ में कटते जंगल, उत्खनन और नदियों से रेत के दोहन जैसे प्रश्नों को कथा के दायरे में लाया गया है। इस प्रकार संग्रह का पर्यावरणीय पक्ष केवल पेड़-पौधे बचाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विकास की उन प्रक्रियाओं पर भी संकेत करता है जो प्रकृति के संतुलन को प्रभावित करती हैं।

बालमनोविज्ञान : संग्रह का केंद्रीय आधार

इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति इसका बालमनोविज्ञान है। लेखिका ने बच्चों को उपदेश ग्रहण करने वाली निष्क्रिय इकाई नहीं माना है। उनकी कहानियों में बच्चा प्रश्न करता है, देखता है, अनुभव करता है और कई बार समाधान की दिशा भी खोजता है।

यह दृष्टिकोण आधुनिक बाल साहित्य के लिए आवश्यक है। बच्चे को यदि केवल ‘यह करो’ और ‘यह मत करो’ बताया जाए तो कहानी उपदेश बन जाती है। किंतु जब वही बात किसी पात्र की समस्या और उसके अनुभव से निकलती है, तो वह कथा का स्वाभाविक निष्कर्ष बन जाती है।

मानवीकरण : कथा को रोचक बनाने का साधन

लेखिका ने कई कहानियों में मानवीकरण का प्रयोग किया है। गुलाब, किताब, रसोई, गौरैया और जंगल जैसे तत्वों को मानवीय संदर्भ देकर उन्होंने बच्चों की कल्पनाशीलता को सक्रिय किया है।

मानवीकरण बाल साहित्य का पुराना किंतु अत्यंत प्रभावी उपकरण है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि लेखक उसके माध्यम से केवल मनोरंजन करता है या कोई नया अर्थ भी निर्मित करता है। इस संग्रह में मानवीकरण का उपयोग अधिकांशतः किसी सामाजिक या पर्यावरणीय प्रश्न को बालमन के निकट लाने के लिए किया गया है।

प्रकृति एक पात्र के रूप में

संग्रह में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं है। कई कहानियों में वह स्वयं कथा की सक्रिय शक्ति बन जाती है। गौरैया, बरगद, जंगल, बारिश, पानी और पेड़ कथानक के भीतर अपना अर्थ निर्मित करते हैं।

यहीं संग्रह की पर्यावरणीय चेतना सबसे प्रभावी रूप में सामने आती है। लेखिका प्रकृति को ‘बचाने योग्य वस्तु’ मात्र नहीं मानतीं, बल्कि उसे मनुष्य के जीवन का सहभागी बनाती हैं।

पारिवारिक संबंध

दा-दादी और बच्चों के संबंध संग्रह में विशेष स्थान रखते हैं। ‘मेहुल और दादी का वैलेंटाइन’ तथा ‘दादाजी और धूप’ जैसी कहानियाँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि आधुनिकता के बीच बुजुर्गों की भूमिका और उनके प्रति भावनात्मक जिम्मेदारी को पुनः समझने की आवश्यकता है।

इन कहानियों का महत्त्व इसलिए भी है कि ये बच्चों को परिवार की बहु-पीढ़ीय संरचना से जोड़ती हैं। बाल साहित्य के माध्यम से पीढ़ियों के बीच संवाद स्थापित करना आज के समय में अत्यंत आवश्यक है।

भाषा और शैली

लेखिका की भाषा सहज और संप्रेषणीय है। बाल पाठक के लिए कठिन शब्दावली या अत्यधिक जटिल वाक्य-विन्यास से बचने का प्रयास किया गया है। कहानियों में कथ्य के अनुसार कल्पनात्मक और संवादात्मक शैली का उपयोग मिलता है।

जहाँ पर्यावरणीय समस्या है वहाँ विचार प्रमुख होता है, जबकि पशु-पक्षियों और वस्तुओं के मानवीकरण वाली कहानियों में कल्पना का पक्ष मजबूत हो जाता है। इस शैलीगत विविधता के कारण संग्रह एकरस नहीं बनता।

शीर्षक और कथात्मक कौतूहल

संग्रह के कई शीर्षक अपने आप में जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं—’किताबों का दर्द’, ‘रसोई बीमार है’, ‘जंगल में जब लगा एसी’, ‘पानी की चोरी’ और ‘गुल्लक और उसकी रजाई’।

इन शीर्षकों में एक प्रश्न छिपा हुआ है। किताब को दर्द कैसे हो सकता है? रसोई बीमार कैसे हो सकती है? जंगल में एसी क्यों लगा? पानी की चोरी किसने की? यही प्रश्न बाल पाठक को कथा की ओर खींचते हैं।

नवाचार : संग्रह की केंद्रीय उपलब्धि

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ की सबसे बड़ी साहित्यिक विशेषता उसका नवाचार है। नवाचार का अर्थ केवल नए विषय चुनना नहीं, बल्कि परिचित विषय को नई दृष्टि से प्रस्तुत करना भी है।

पर्यावरण पर हजारों रचनाएँ लिखी गई हैं, लेकिन जंगल के पशुओं को एसी की आवश्यकता पड़ने की कल्पना समस्या को एक नए कोण से देखने का अवसर देती है। पुस्तक संरक्षण पर उपदेश देने की जगह ‘किताबों का दर्द’ उनकी भावनात्मक आवाज बन जाता है। घरेलू उपेक्षा को ‘रसोई बीमार है’ के रूपक में बदल देना भी इसी रचनात्मकता का उदाहरण है।

इस प्रकार लेखिका ने कई गंभीर विषयों को बालमन के लिए प्रतीक, कल्पना और मानवीकरण के माध्यम से सुगम बनाने का प्रयास किया है।

आलोचनात्मक सीमाएँ

किसी भी कृति का मूल्यांकन केवल उसकी उपलब्धियों के आधार पर नहीं किया जा सकता। आलोचना का उद्देश्य रचना की संभावनाओं और सीमाओं दोनों को देखना है।

इस संग्रह की प्रमुख सीमा यह कही जा सकती है कि कुछ कहानियों में सामाजिक और नैतिक संदेश इतना स्पष्ट है कि पाठक के लिए निष्कर्ष तक पहुँचने की गुंजाइश कुछ कम रह जाती है। बाल कहानी की शक्ति तब और बढ़ती है जब बच्चा स्वयं कहानी के अनुभव से अर्थ ग्रहण करे।

कुछ कहानियों में पात्रों के मनोवैज्ञानिक विकास की अपेक्षा कथ्य और संदेश अधिक प्रमुख दिखाई पड़ते हैं। यदि पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, असमंजस और संघर्ष को थोड़ा अधिक स्थान मिले तो कहानियों का साहित्यिक विस्तार बढ़ सकता है।

इसी प्रकार पर्यावरणीय कहानियों में समस्या और समाधान के बीच का तनाव कुछ और गहरा किया जा सकता था। उदाहरण के लिए जंगल, जल या वर्षा से जुड़े संकट केवल नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जटिलताओं से भी जुड़े हैं। बाल साहित्य में इन जटिलताओं को सरल बनाना आवश्यक है, किंतु उन्हें पूरी तरह सपाट कर देना कथा की संभावनाओं को सीमित कर सकता है। प्रूफ की कमी मखमल में टाट के पैबंद की तरह अखरती है।

फिर भी यह आलोचना संग्रह की मूल रचनात्मक उपलब्धियों को कम नहीं करती। यह लेखिका की आगामी रचनाओं के लिए संभावनाओं की ओर संकेत करती है।

निष्कर्ष

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ समकालीन बाल साहित्य की उन रचनाओं में अपना स्थान बनाने की क्षमता रखता है, जो बालमन और सामाजिक सरोकारों के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास करती हैं। यह संग्रह केवल नैतिक शिक्षा देने वाली कहानियों का संकलन नहीं है। इसमें लेखिका ने बालक की जिज्ञासा को प्रकृति, पर्यावरण, परिवार और समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास किया है।

इसकी कहानियों में पानी है तो उसके साथ जल-संकट का प्रश्न भी है; गौरैया है तो उसके साथ प्रकृति-संरक्षण की चिंता भी है; पुस्तक है तो उसके साथ ज्ञान और पुस्तक-संस्कृति का प्रश्न भी है; दादा-दादी हैं तो उनके साथ पारिवारिक संवेदना का प्रश्न भी है; जंगल है तो उसके साथ पर्यावरणीय संकट भी है।

यही इस संग्रह की सार्थकता है।

अंजना मनोज गर्ग ने बालमन की छोटी-छोटी जिज्ञासाओं को सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों से जोड़ने का जो प्रयास किया है, वह उल्लेखनीय है। उनकी कहानियाँ यह विश्वास जगाती हैं कि बाल साहित्य केवल बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य नहीं, बल्कि भविष्य के नागरिक के मन और संवेदना को आकार देने वाला साहित्य भी है।

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ का महत्त्व इस बात में है कि यह बच्चे को केवल कहानी सुनाकर छोड़ नहीं देता; वह उसके आसपास की दुनिया को देखने की उसकी दृष्टि में हल्का-सा परिवर्तन करने का प्रयास करता है।

अंततः कहा जा सकता है कि यह संग्रह बालमन की निर्मलता, प्रकृति की पुकार और सामाजिक संवेदना को एक साथ समेटे हुए बीस कहानियों का ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें मनोरंजन के साथ विचार और विचार के साथ संवेदना भी खिलती है। अंजना मनोज गर्ग की यह कृति बाल साहित्य की वर्तमान धारा में अपने विषय-नवाचार और समकालीन सरोकारों के कारण ध्यान आकर्षित करती है और लेखिका के आगामी रचनात्मक विकास के लिए एक आशाजनक आधारभूमि तैयार करती है।

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

08/10/2026

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१८ ☆ “अस्मि” – उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय जी द्वारा लिखित  “अस्मि” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१८ ☆

☆ “अस्मि” – उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/

पुस्तक : अस्मि 

उपन्यासकार : शिखा वार्ष्णेय

प्रकाशक : शिवना प्रकाशन

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ अस्मि’: अपने होने की पहचान की तलाश – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

किसी पुस्तक पर चर्चा करना केवल उसकी कथा सुनाना नहीं होता।  उसके भीतर छिपे विचारों, संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि को समझने का प्रयास  है। मेरे लिए अस्मि ऐसी ही एक कृति है, जो एक स्त्री की कहानी कहते हुए हम सबके सामने एक बुनियादी प्रश्न रखती है,दूसरों के लिए जीते हुए क्या स्त्रियाँ अपने लिए जीना भूल जाती हैं?

‘अस्मि’ का अर्थ होता है—‘मैं हूँ’। यह छोटा-सा शब्द अपने भीतर एक बड़ा जीवन-दर्शन समेटे है। हम अपने जीवन में अनेक भूमिकाएँ निभाते हैं। किसी के माता-पिता, जीवनसाथी, बेटे-बेटी और मित्र होते हैं। इन रिश्तों के साथ जिम्मेदारियाँ जुड़ी होती हैं। लेकिन इन सबसे अलग हमारा अपना व्यक्तित्व भी है। हमारी इच्छाएँ, रुचियाँ और सपने भी हैं। क्या हम उन्हें पहचान पाते हैं? क्या हमारे जीवन में उनके लिए जगह बचती है? शिखा वार्ष्णेय का उपन्यास इन्हीं सवालों को कथा का आधार बनाता है।

शिखा वार्ष्णेय पत्रकारिता और साहित्य, दोनों से जुड़ी रही हैं। उन्होंने मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई की। लंदन में रहते हुए भी उनका लेखन भारतीय पाठकों से निरंतर संवाद करता है। ‘लंदन नामा’ जैसी स्तंभ-लेखन यात्राएँ उनके अनुभवों को पाठकों तक पहुँचाती रही हैं। यात्रा-वृत्तांत और अन्य लेखन के माध्यम से उन्होंने अपने अलग अनुभव-संसार का परिचय दिया है। अस्मि में भी बाहरी परिवेश के साथ मनुष्य के भीतर चलने वाले द्वंद्व को समझने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है।

उपन्यास की केंद्रीय पात्र एला एक शिक्षित महिला है। उसका परिवार है, पति राजीव है और बेटा अंकुर है। बाहर से उसका जीवन सामान्य और व्यवस्थित दिखाई देता है। लेकिन भीतर वह अकेली है। परिवार की अपेक्षाएँ पूरी करते-करते उसकी अपनी रुचियाँ और कलात्मक अभिरुचियाँ पीछे छूट गई हैं। वह धीरे-धीरे स्वयं से दूर होती जाती है। उसके जीवन में सुविधाएँ हैं, लेकिन संतोष नहीं। अपने लोगों के बीच रहते हुए भी उसे अपने होने का एहसास नहीं मिलता।

एला की यह स्थिति उपन्यास को हमारे समय से जोड़ती है। हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग हैं, जो दूसरों की जरूरतों का ध्यान रखते हैं, लेकिन उनकी अपनी जरूरतें अनदेखी रह जाती हैं। विशेष रूप से महिलाओं से परिवार के लिए त्याग और समर्पण की अपेक्षा की जाती है। इसमें कोई बुराई नहीं, यदि यह समर्पण उनकी अपनी पहचान को मिटाने की कीमत पर न हो। परिवार महत्वपूर्ण है, लेकिन परिवार के भीतर प्रत्येक व्यक्ति का स्वतंत्र व्यक्तित्व भी महत्वपूर्ण है।

एला मानसिक तनाव और अवसाद से गुजरती है। इसी बीच एक पैराडाइव स्पोर्ट्स दुर्घटना उसके जीवन की दिशा बदल देती है। वह एक दूरस्थ पहाड़ी गाँव में पहुँच जाती है। वहाँ के लोग उसके परिचित नहीं हैं। वे उसके परिवार, सामाजिक स्थिति या अतीत के बारे में कुछ नहीं जानते। फिर भी वे उसकी देखभाल करते हैं और उसे अपनापन देते हैं।

कथा का यह मोड़ ध्यान देने योग्य है। जिस एला को अपने परिचित परिवेश में अकेलापन महसूस होता था, उसे अनजान लोगों के बीच आत्मीयता मिलती है। यह अनुभव एक सहज प्रश्न उठाता है, क्या संबंध केवल रक्त, विवाह और परिचय से बनते हैं? या मनुष्य की संवेदना भी ऐसा रिश्ता बना सकती है, जो कभी-कभी स्थापित रिश्तों से अधिक गहरा हो?

गाँव में एला धीरे-धीरे अपने भीतर लौटने लगती है। वह चित्र बनाती है। घरों और दीवारों को रंगों से सजाती है। बच्चों के साथ समय बिताती है। अपने वनस्पति-विज्ञान के ज्ञान से गाँव के लोगों की मदद करती है। उसकी प्रतिभा अब केवल उसकी निजी रुचि नहीं रहती। वह समुदाय के जीवन का हिस्सा बन जाती है। लोग उसके काम को महत्व देते हैं। उसे लगता है कि वह उपयोगी है और उसके होने का कोई अर्थ है।

मनुष्य को केवल भौतिक सुविधाएँ नहीं चाहिए। उसे यह अनुभव भी चाहिए कि उसके जीवन का कोई उद्देश्य है। उसकी प्रतिभा का उपयोग हो रहा है। उसकी उपस्थिति किसी के लिए मायने रखती है। एला को गाँव में यही अनुभव मिलता है। वह दूसरों के जीवन में रंग भरते हुए अपने जीवन में भी रंग वापस ले आती है।

गाँव का अरलू उसे जापानी अवधारणा ‘इकिगाई’ से परिचित कराता है। इसका आशय उस उद्देश्य से है, जो हमें हर सुबह उठने का कारण देता है। जीवन में कोई ऐसा काम, संबंध या लक्ष्य होना, जिससे हम भीतर से जुड़े रहें। एला के लिए चित्रकला, बच्चों के साथ जुड़ाव और गाँव के लोगों की सहायता ऐसे ही उद्देश्य बन जाते हैं। उसे किसी बड़ी उपलब्धि की तलाश नहीं है। उसे अपने काम में अर्थ दिखाई देने लगता है।

उपन्यास का संदेश उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि एला के अनुभवों के माध्यम से सामने आता है। अपने जीवन को अर्थ देने के लिए हमेशा किसी बड़ी सफलता या सामाजिक मान्यता की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी किसी बच्चे को सिखाना, किसी घर की दीवार पर रंग भरना या किसी जरूरतमंद की सहायता करना भी जीवन को नई दिशा दे सकता है।

लेकिन इस कथा का वास्तविक संघर्ष तब सामने आता है, जब एला का बेटा अंकुर उसे खोजते हुए गाँव पहुँचता है। वह चाहता है कि उसकी माँ उसके साथ लौट चले। उसकी चिंता स्वाभाविक है। वह माँ से प्रेम करता है और उसे सुरक्षित देखना चाहता है। दूसरी ओर, एला अब उस जीवन में लौटने के लिए तैयार नहीं है, जिसमें वह अपनी पहचान खो बैठी थी। वह अंकुर को समझाती है कि गाँव ने उसे वह आत्मीयता और उद्देश्य दिया है, जिसकी उसे तलाश थी।

अंकुर के लिए माँ के निर्णय को स्वीकार करना आसान नहीं है। लेकिन वह कुछ समय गाँव में बिताता है। धीरे-धीरे उसे समझ आता है कि उसकी माँ यहाँ सचमुच खुश है। अंततः वह उसके निर्णय का सम्मान करता है।

मेरी दृष्टि में यह उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। यहाँ प्रेम और अधिकार के बीच का अंतर सामने आता है। हम अपने प्रियजनों के लिए निर्णय लेना चाहते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि हम उनके लिए बेहतर जानते हैं। लेकिन क्या प्रेम का अर्थ उनकी ओर से जीवन चुनना है? या उनके निर्णय को समझने और स्वीकार करने का प्रयास करना भी प्रेम है?

एला का निर्णय हमें रिश्तों की एक नई व्याख्या की ओर ले जाता है। परिवार से जुड़ाव का अर्थ अपने व्यक्तित्व का विसर्जन नहीं होना चाहिए। किसी स्त्री का माँ या पत्नी होना उसकी पहचान का एक हिस्सा है, संपूर्ण पहचान नहीं। उसे अपनी रुचियों, अपने निर्णयों और अपनी खुशी के लिए भी जगह चाहिए। यह बात केवल स्त्रियों के लिए नहीं, हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है, जो सामाजिक अपेक्षाओं के बीच अपने भीतर की आवाज खो देता है।

हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता और आत्मनिर्णय पर गंभीर लेखन हुआ है। मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती जैसी लेखिकाओं ने स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व और उसकी आंतरिक दुनिया को अपनी रचनाओं में स्थान दिया।

 शिखा वार्ष्णेय की अस्मि इस व्यापक साहित्यिक विमर्श को आज के जीवन, प्रकृति और सामुदायिक संवेदना के संदर्भ में प्रस्तुत करती है। इसकी विशेषता यह है कि एला की पहचान केवल विचार या विद्रोह से नहीं बनती। वह अपने काम, अपनी कला और दूसरों से जुड़ाव के माध्यम से स्वयं को खोजती है।

उपन्यास में पहाड़ी गाँव भी केवल कथा की पृष्ठभूमि नहीं है। वह ऐसे जीवन का प्रतीक है, जहाँ एला अपने व्यक्तित्व को व्यक्त कर पाती है। वहाँ सुविधाएँ कम हैं, लेकिन आत्मीयता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि गाँव का जीवन हर समस्या का समाधान है या शहर का जीवन संवेदनहीन है। उपन्यास का संकेत अधिक सूक्ष्म है। मनुष्य को ऐसा परिवेश चाहिए, जहाँ उसे सुना जाए, उसके काम का सम्मान हो और उसे अपनी राह चुनने की स्वतंत्रता मिले।

यहाँ प्रकृति की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रकृति के निकट रहते हुए एला अपने भीतर की आवाज सुन पाती है। वह जीवन को केवल जिम्मेदारियों की सूची के रूप में नहीं देखती। उसे अपने आसपास के छोटे-छोटे कामों में आनंद मिलने लगता है। इस तरह उपन्यास आत्म-खोज को प्रकृति, कला और सामुदायिक जीवन से जोड़ता है।

अब प्रकाशक शिवना प्रकाशन की चर्चा भी जरूरी है। किसी पुस्तक को पाठकों तक पहुँचाना साहित्यिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शिवना प्रकाशन ने हिंदी की विभिन्न विधाओं में पुस्तकों के प्रकाशन के साथ प्रवासी लेखकों की रचनाओं को भी मंच दिया है। प्रवासी साहित्य हिंदी को नए अनुभवों और नए परिवेश से जोड़ता है। भाषा किसी एक देश की सीमा में बंद नहीं रहती। वह जहाँ भी रची जाती है, वहाँ के जीवन और संवेदना से समृद्ध होती है। इस दृष्टि से ऐसे प्रकाशन और साहित्यिक आयोजन हिंदी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 मैं कहूँगा कि अस्मि का महत्व केवल एला की कहानी में नहीं, बल्कि उस प्रश्न में है जो यह पाठक के सामने छोड़ती है। क्या हम अपने प्रियजनों को उनकी स्वतंत्र पहचान के साथ स्वीकार कर पाते हैं? क्या हम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए अपने लिए भी कुछ बचा पाते हैं? और क्या हम यह समझते हैं कि जीवन का अर्थ केवल दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी करना नहीं है?

एला की यात्रा हमें याद दिलाती है कि स्वयं को पहचानना स्वार्थ नहीं है। यह अपने जीवन के प्रति सजग होना है। जब व्यक्ति अपने भीतर के संसार से जुड़ता है, तभी वह दूसरों से भी अधिक सच्चाई और संवेदना के साथ जुड़ पाता है।

‘अस्मि’ का सार शायद इसी एक वाक्य में है—मैं दूसरों के लिए हूँ, लेकिन मेरा अपना होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

शिखा वार्ष्णेय जी को इस संवेदनशील उपन्यास के लिए हार्दिक बधाई।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ संजय दृष्टि – ‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’ — मूल शोधकर्ता – स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे — संपादक – डॉ. मृणालिनी शहा, डॉ. लतिका जाधव ☆ समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

? संजय दृष्टि –  समीक्षा का शुक्रवार # 26 ?

?‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’ — मूल शोधकर्ता – स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे — संपादक – डॉ. मृणालिनी शहा, डॉ. लतिका जाधव  ?  समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ?

पुस्तक का नाम – ‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’

विधा – शोध कार्य

मूल शोधकर्ता – स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे

संपादक – डॉ. मृणालिनी शहा, डॉ. लतिका जाधव

प्रकाशक – क्षितिज प्रकाशन, पुणे

पृष्ठ संख्या – 308

मूल्य – रु. 500/-

? अपने-अपने पर सबके राम ☆ श्री संजय भारद्वाज ?

श्रीराम, भारतीय संस्कृति के शलाका पुरुष हैं। रामकथा कल-कल प्रवाहित होती धारा है। प्रवाह, धारा का प्राण है। श्रीराम का जीवनचरित अपने आप में कविता है। जिसने भी इस चरित को लिखा, उसकी लेखनी से कविता स्वयं प्रवाहित होने लगी। इस प्रवाह का राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपने शब्दों में कुछ यूँ वर्णन किया है,

राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है,

कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।

इस सहज संभाव्यता ने महर्षि वाल्मीकि से लेकर गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य स्वयंभू और विभिन्न भाषाओं में अनेकानेक मूर्धन्य कवियों से रामकथा लिखवाई। यह सिलसिला अब तक चल रहा है।

प्रस्तुत पुस्तक ‘स्वयंभू एवं तुलसीदास रचित रामकथा’ स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे का महत्वपूर्ण शोध-प्रबंध है। जैसाकि नाम से ही स्पष्ट है, यह ग्रंथ जैन आचार्य स्वयंभू रचित ‘पउमचरिउ’और गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ का तुलनात्मक अध्ययन है।

वस्तुत: महर्षि वाल्मीकि कृत ‘रामायण’, रामकथा का आदिग्रंथ है। भारत में विभिन्न भाषाओं में रामकथा पर आधारित लगभग 300 ग्रंथ हैैं। स्थूल रूप से ये सभी रामायण से अनुप्राणित हैं। बांग्ला में कृतिवास की ‘रामायण’, तमिल में ‘कंबन रामायण’, मराठी में संत एकनाथ की ‘भावार्थ रामायण’, गुरु गोविंद सिंह जी की ‘गोविंद रामायण’, माधव कंदली की ‘असमिया रामायण’, सारलादास की ‘उड़िया रामायण’, रंगनाथ की ‘तेलगु रामायण’, भानुभक्त की ‘नेपाली रामायण’, एषुतुच्छन की ‘मलयालम रामायण’,  कन्नड़ की ‘तोखे रामायण’, आदि कुछ नाम हैं। यही नहीं बल्कि विभिन्न अंचलों के साथ-साथ विभिन्न जनजातियों में भी लिखित या श्रुत रामायण मिलती हैं।

इनमें संबंधित भाषा-भाषियों की स्थानीय संस्कृति, परिवेश, भौगोलिक स्थितियों के अनुसार छोटे-बड़े परिवर्तन भी देखने को मिलते हैं।

दो ग्रंथों के तुलनात्मक अध्ययन की अपनी चुनौतियाँ होती हैं। इनमें देश, काल, स्थिति का अंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गोस्वामी जी के ‘रामचरितमानस’ की गणना विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्यों में होती है। यह महाकाव्य भारतीय लोक के लिए आदर्श आचार-संहिता है। आचार्य स्वयंभू का ‘पउमचरिउ’ जैन दर्शन को केंद्र में रखकर रचा गया है। इसके चलते इस ग्रंथ में वाल्मीकि कृत मूल रामकथा में कई बड़े बदलाव दृष्टिगोचर होते हैं।

संभवत: ‘पउमचरिउ’ एकमात्र अपवाद है जिसमें रावण का वध श्रीराम के हाथों ना होकर लक्ष्मण के हाथों कराया गया है। प्रचलित रामकथा के कुछ पात्रों के नाम में परिवर्तन भी इसमें देखने को मिलते हैं। हनुमान जी के ब्रह्मचारी रूप की मान्यता के विपरीत उन्हें आठ सहस्त्र पत्नियों के पति के रूप में प्रस्तुत करना, शूर्पणखा को खर-दूषण की पत्नी बताना एवं अन्य अनेक परिवर्तन हैं। इसमें श्रीराम एवं रावण का धार्मिक, सांस्कृतिक परिवेश समान बताया गया है। रावण का चरित्र चित्रण श्रीराम की अपेक्षा विस्तृत है। ‘पउमचरिउ’ के रावण का खलनायकत्व भी उसके प्रति सहानुभूति जगाने में सहायक है।

राम, भारतीय आस्था का चैतन्य स्वरूप हैं। हमारे लोकजीवन के कण-कण और क्षण-क्षण में राम हैं। यही कारण है कि बच्चे के जन्म पर रामलला की बधाइयाँ गाई जाती हैं। संबोधन के लिए हम जीवन भर ‘राम-राम’ कहते हैं। अंतिम सत्य के रूप में काया से चेतन तत्व जब प्रस्थान कर जाता है तो ‘राम नाम सत्य है’ को स्मरण किया जाता है।  रामकथा, भारतीय लोकमानस में पैठी हुई है। पारंपरिक रामकथा में परिवर्तन की स्वीकार्यता भी श्रीराम के व्यक्तित्व में अंतर्निहित उदारता का ही प्रतीक है।

गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम के देवत्व को रेखांकित किया। जबकि आचार्य स्वयंभू ने उनके मनुष्यत्व को लेखनीबद्ध किया। महत्वपूर्ण यह है कि मनुष्यत्व हो या देवत्व, अंतर्निहित तो रामत्व ही है।

वाल्मीकि रामायण में महर्षि वाल्मीकि, देवर्षि नारद से पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ पुरुष के बारे में अनेक प्रश्न करते हैं। देवर्षि हर एक का उत्तर देते हुए श्रीराम का नाम गिनाते हैं। इसी क्रम में देवर्षि का यह कथन महत्वपूर्ण है-

सर्वदाभिगत: सद्भि: समुद्र इव सिन्धुभि:।

आर्य: सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शन:॥

जैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार सदा राम से साधु पुरुष मिलते रहते हैं। वे आर्य एवं सब में समान भाव रखने वाले हैं, उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है।

प्रियदर्शन श्रीराम की कथा को भाषा की दृष्टि से देखें तो रामचरितमानस अवधी में रचा गया है जबकि पउमचरिउ की भाषा अपभ्रंश है। ऐसे में शोधकर्ता के लिए तुलनात्मक अध्ययन जटिल और अनेक प्रश्नों को हल कर आगे बढ़ने की प्रक्रिया हो जाता है। शोधकर्ता डॉ. साठे ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक सूक्ष्म से सूक्ष्म बिंदु का विस्तृत अध्ययन कर तटस्थ भाव से शोध करने का प्रयास किया है। यह श्लाघनीय है।

यह शोध साठ वर्ष पूर्व किया गया था। शोधकर्ता अब दिवंगत हो चुके हैं। देह की नश्वरता के संबंध में गोस्वामी जी रामचरितमानस में लिखते है,

बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा॥

साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाइ न जेहि परलोक सँवारा॥

अर्थात मनुष्य की देह सौभाग्य से प्राप्त होती है। विभिन्न ग्रंथ कहते हैं कि देवताओं के लिए भी इसकी प्राप्ति सहज नहीं होती। मनुष्य योनि, साधन योनि है। यह मोक्ष प्राप्ति का द्वार है। अतः देह नष्ट होने से पहले इसका सदुपयोग कर अपना परलोक सुधार लेना चाहिए।

आचार्य स्वयंभू ने इस विषय को पउमचरिउ में यूँ व्यक्त किया है,

जं देहु तं णासधम्मु।

णिच्चु ण होइ कइ वि कम्मु॥

जिसे देह कहते हैं, उसका मूल स्वभाव नश्वरता है। स्वाभाविक है कि कोई भी देह जगत में सदा बनी नहीं रह सकती।

छह दशक बाद इस शोध का प्रकाशित होना इस बात की पुष्टि करता है कि देह अनिवार्य रूप से नश्वर है पर विचार और चिंतन ईश्वर हैं। ईश्वर अर्थात समय की सीमा के परे शाश्वत अस्तित्व। अक्षर-अक्षर जोड़कर रचा जाता है साहित्य। यूँ ही ‘अक्षर’ नामकरण नहीं हुआ। जिसका क्षरण नहीं होता वही अक्षर है।

यही कारण है कि संपादक द्वय डॉ. मृणालिनी शहा और डॉ. लतिका जाधव को साठ वर्ष का अंतर प्रभावित नहीं कर पाया और उन्होंने शोध प्रबंध को प्रकाशित करने का बीड़ा उठाया। ज्ञान के नित्य भाव का यह प्रमाण है।

इस प्रबंध के प्रकाशन की व्यावहारिक कठिनाइयाँ रही होंगी। तत्कालीन भाषा, तब की टाइपिंग, अक्षर विन्यास, वर्तनी और व्याकरण में समय-समय पर हुए परिवर्तन इन सब पर संपादक द्वय ने परिश्रम किया है। जिन बातों को ज्यों का त्यों रखने की अपरिहार्यता रही होगी, उन्हें वैसे ही रहने दिया गया है।

स्व. डॉ. गजानन नरसिंह साठे द्वारा किया यह महत्वपूर्ण काम है। वस्तुत: किसी भी शोध प्रबंध को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करते हुए अनेक बिंदु विधागत परिवर्तन की मांग करते हैं। शोधप्रबंध के प्रारूप में हर बिंदु के साथ आवश्यक लगने वाले संदर्भ, पुस्तक रूप में उतने प्रयोजनीय प्रतीत नहीं होते। इन सब पर काम करके शोधप्रबंध को शोधकर्ताओं और सामान्य पाठक के हाथ में एक सुपाठ्य पुस्तक के रूप में लाने का बीड़ा दोनों संपादकों ने पूरे सामर्थ्य से उठाया है।

दोनों संपादकों को हार्दिक बधाई। आशा है कि यह पुस्तक हर जिज्ञासु के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। शुभं भवतु।

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५१ – पुस्तक चर्चा – टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना –  लेखक : श्री राजकुमार जैन ‘राजन’ ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्री राजकुमार जैन ‘राजन’ जी द्वारा लिखित बाल कहानी संग्रह – “टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना” की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५१ ☆

☆ पुस्तक चर्चा – टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना –  लेखक : श्री राजकुमार जैन ‘राजन’ ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

 

पुस्तक : टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना

विधा : बाल कहानी-संग्रह

कहानीकार : राजकुमार जैन ‘राजन’

प्रकाशक : ज्ञानमुद्रा पब्लिकेशन, भोपाल

संस्करण : 2026

मूल्य : 200 रुपए

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

☆ ‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’ : बालमन में जिज्ञासा, संवेदना और सामाजिक चेतना जगाता कहानी-संग्रह – ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

राजकुमार जैन ‘राजन’ ऐसे कहानीकार हैं जिनकी रचनात्मक चिंतन का केंद्र बालक होता है। उनकी दृष्टि में बाल कहानी केवल बच्चे का मनोरंजन करने वाली रचना नहीं होती है, बल्कि उसके भीतर जिज्ञासा, संवेदना, साहस, विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करने वाला माध्यम होती है। टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना की ‘अपनी बात’ में स्वयं लेखक कहानी को अंधेरे में राह दिखाने वाला दीपक और छोटे-छोटे हाथों में बड़े सपने भरने वाला माध्यम मानते हैं। वे विशेष रूप से इस बात पर बल देते हैं कि आज के बच्चे के पास सूचना बहुत है, लेकिन समय कम है; इसलिए ऐसी कहानियों की जरूरत है जो छोटी हों, रोचक हों और पढ़ने के बाद बच्चे को सोचने के लिए विवश करें।

रचनाकार अपने आसपास के वातावरण, अपने अनुभवों, गाँव की गलियों, विद्यालय की कक्षाओं और बच्चों की सहज बातचीत से कहानियों के कथानक ग्रहण करता है। यह बात उनकी रचना-दृष्टि को कृत्रिम होने से बचाती है। उनके पात्र प्रायः हमारे आसपास के बच्चे, माता-पिता, शिक्षक, दादा-दादी और ग्रामीण समाज से आते हैं। पुस्तक के समर्पण में वे वरिष्ठ साहित्यकार स्व. गोविंद शर्मा को अपना प्रेरणास्रोत और संरक्षणदाता बताते हुए उन्हें अपनी कृति समर्पित करके अपनी रचनाधर्मिता को प्रदर्शित करके उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

राजन की रचना-दृष्टि की विशेषता यह है कि वे बच्चों को केवल ‘सिखाने’ की मुद्रा में नहीं आते; वे उन्हें परिस्थितियों से गुजरते हुए सीखने का अवसर देते हैं। यही कारण है कि उनकी अनेक कहानियों में बाल पात्र स्वयं प्रश्न करते, पहल करते, समस्या पहचानते हैं और उसके समाधान में भाग लेते हैं।

बाल साहित्य की उपयोगिता : मनोरंजन से आगे की यात्रा

बाल साहित्य बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास का महत्त्वपूर्ण साधन होता है। कहानी बालक को संसार से परिचित कराने के साथ-साथ उसे दूसरों की परिस्थितियों को समझना, प्रश्न करना, कल्पना करना और निर्णय लेना सिखाती है। अच्छी बाल कहानी में मनोरंजन और संस्कार के बीच संतुलन होना चाहिए। केवल उपदेश बालक को आकर्षित नहीं करता और केवल मनोरंजन उसके व्यक्तित्व को आवश्यक दिशा नहीं देता है।

राजकुमार जैन ‘राजन’ की दृष्टि भी इसी संतुलन की ओर दिखाई देती है। पुस्तक की ‘अपनी बात’ में वे स्पष्ट करते हैं कि बच्चे उपदेश से नहीं, उदाहरण से सीखते हैं। इसलिए संग्रह की कहानियों में पर्यावरण-संरक्षण, शिक्षा, समान अवसर, स्वतंत्रता, ईमानदारी, सहयोग, पढ़ने की आदत और मानवीय संवेदना जैसे विषय कथा-स्थितियों के माध्यम से सामने आते हैं।

आज जब बच्चों के सामने इंटरनेट, मोबाइल और त्वरित सूचना का संसार भरा पड़ा है, तब भी पुस्तक की भूमिका समाप्त नहीं हुई है; बल्कि उसका स्वरूप और महत्त्व और अधिक बढ़ गया है। पुस्तक में लेखक स्वयं यह प्रश्न उठाते हैं कि बच्चों के पास जानकारी बहुत है, पर समय कम है। इसलिए ऐसी कहानियाँ आवश्यक हैं जो कम समय में प्रभावी अनुभव दें और पढ़ने के बाद भी मन में बनी रहें।

इस दृष्टि से टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना उपयोगी बाल साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है, क्योंकि इसकी कहानियाँ ज्ञान को कथा के भीतर पिरोने का प्रयास करती हैं।

इस समीक्ष्य संग्रह में कुल ग्यारह कहानियाँ हैं—‘पारूल का सपना’, ‘पौधा रोपण का महत्त्व’, ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’, ‘शिक्षा का उजाला’, ‘खिलौना रोबोट’, ‘सच्ची दिवाली’, ‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’, ‘स्वतंत्रता का उत्सव’, ‘दीपू ने ठग पकड़वाए’, ‘खुशी दो, खुशी लो’ और ‘बच्चों का वाचनालय’।

‘पारूल का सपना’ बालिका के स्वप्न, आत्मविश्वास और अवसर की समानता को केंद्र में रखकर लिखी गई है। पारूल विमान देखकर पायलट बनने का सपना देखती है। परिवार की ओर से आरंभिक संकोच के बावजूद वह अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहती है, अध्ययन करती है, विज्ञान मेले में विमान का मॉडल बनाती है और अंततः अपने सपने की दिशा में आगे बढ़ती है। यह कहानी बालिकाओं की आकांक्षाओं को सामाजिक रूढ़ियों से ऊपर देखने की प्रेरणा देती है।

‘पौधा रोपण का महत्त्व’ में दादाजी और बच्चों के माध्यम से पर्यावरण-संरक्षण की चेतना विकसित होती है। कहानी की विशेषता यह है कि वृक्षारोपण किसी भाषण का विषय न रहकर बच्चों की सक्रिय भागीदारी बन जाता है। दादाजी बच्चों को पौधे लगाने, उनकी देखभाल करने और प्रकृति के महत्त्व को समझने का अवसर देते हैं।

‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’ में बच्चों का सामूहिक प्रयास सामाजिक परिवर्तन का रूप लेता है। बच्चे प्लास्टिक से पशुओं और मनुष्यों को होने वाले नुकसान को समझते हैं, अभियान चलाते हैं, कपड़े की थैलियों का प्रयोग बढ़ाते हैं और पशुओं के लिए भोजन-पेटियाँ रखते हैं। कहानी की उपयोगिता इस से समझा जा सकता है कि इसमें बालक समस्या के दर्शक नहीं, समाधान के सहभागी बनते हैं।

‘शिक्षा का उजाला’ शिक्षा के अभाव, गलत संगति और आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों से जूझते रोहित की कथा प्रस्तुत करती है। उसके भीतर की प्रतिभा को परिस्थितियाँ दबाती हैं, लेकिन आगे चलकर जीवन के अनुभव उसे अपनी भूल का अहसास कराते हैं। कथा शिक्षा को केवल रोजगार पाने का साधन न मानकर जीवन को दिशा देने वाली शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

‘खिलौना रोबोट’ आधुनिक तकनीक, बालमन और पारिवारिक संबंधों से जोड़ती है। रोबोट बच्चे के लिए आकर्षण का केंद्र है, लेकिन कथा का वास्तविक केंद्र मानवीय संबंध और समझ है। इस कहानी में आधुनिक वस्तु धीरे-धीरे आगे चलकर मानवीय संवेदना का माध्यम बन जाती है।

‘सच्ची दिवाली’ त्यौहार के अर्थ को सामाजिक संवेदना से जोड़कर प्रस्तुत करती है। घर को रोशन करने के साथ दूसरों के घरों का अँधेरा दूर करना ही सच्चे उत्सव का अर्थ है—कहानी इसी मानवीय विचार को कथा में रूप में हमारे सम्मुख लाती है।

‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’ संग्रह की शीर्षक-कहानी है और विज्ञान, कल्पना तथा ज्ञान को एक साथ उभारती है। प्रोफेसर, बच्चे और रोबोट मिलकर समय की यात्रा की कल्पना करते हैं। कहानी का महत्त्व इस बात से उजागर होता है कि समय-यात्रा के रोमांच को केवल चमत्कार न बनाकर अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने के विचार से जोड़ा गया है। अंततः ज्ञान बाँटने को ही वास्तविक उपलब्धि माना गया है।

‘स्वतंत्रता का उत्सव’ कहानी स्वतंत्रता के अर्थ को पक्षी के माध्यम से प्रतीकात्मक ढंग से सामने लाती है। सोने का पिंजरा भी पिंजरा ही है—यह बिंब स्वतंत्रता के वास्तविक मूल्य को बालमन तक सरलता से पहुँचाया जाता है।

‘दीपू ने ठग पकड़वाए’ साहस, निरीक्षण-शक्ति और तर्कबुद्धि की कहानी है। जहाँ बड़े लोग अंधविश्वास और भय के प्रभाव में आ जाते हैं, वहाँ दीपू परिस्थितियों को समझने की कोशिश करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से रहस्य का समाधान करना कहानी को विशेष रूप से उपयोगी बनाता है।

‘खुशी दो, खुशी लो’ इस संग्रह की सबसे अधिक मानवीय और संवेदनात्मक कहानियों में एक है। जादुई रूमाल का बाहरी आकर्षण अंततः इस बोध में बदल जाता है कि खुशी किसी वस्तु में नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति किए गए छोटे-छोटे सद्भावपूर्ण व्यवहार में निहित है। कहानी का अंतिम बोध—खुशी देने वाले के हृदय में होती है—बालक के लिए सहज और प्रभावशाली है।

‘बच्चों का वाचनालय’ संग्रह की सबसे उपयोगी सामाजिक कल्पनाओं में से एक है। पारूल और उसके भाई गाँव के एक पुराने खंडहर को बच्चों के वाचनालय में बदलने की योजना बनाते हैं। बच्चे स्वयं सफाई करते हैं, पुस्तकें जुटाते हैं, पढ़ने का कार्यक्रम बनाते हैं और धीरे-धीरे पूरा समुदाय उससे जुड़ जाता है। अंततः प्रशासन भी इस पहल को देखकर भवन को पुस्तकालय में बदल देता है।

कथा-तत्त्वों की दृष्टि से मूल्यांकन:

कहानी के प्रमुख तत्त्वों में कथानक, पात्र, संवाद, वातावरण, भाषा-शैली, उद्देश्य और प्रभाव को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इस कसौटी पर यह संग्रह अनेक उल्लेखनीय विशेषताएँ प्रस्तुत करता है।

  1. कथानक

संग्रह के अधिकांश कथानक सरल, रैखिक और बालकेंद्रित हैं। इनमें समस्या आती है, पात्र उसके सामने खड़े होते हैं और प्रयास के माध्यम से समाधान तक पहुँचते हैं। ‘पारूल का सपना’ में सपना लक्ष्य बनता है, ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’ में समस्या सामाजिक अभियान में बदलती है और ‘बच्चों का वाचनालय’ में एक छोटी-सी कल्पना सामुदायिक आंदोलन का रूप लेती है।

कथानकों की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी क्रियाशीलता है। बच्चे केवल घटना के साक्षी नहीं रहते; वे घटनाओं को आगे बढ़ाते हैं। यह बाल साहित्य के लिए महत्त्वपूर्ण गुण है।

  1. पात्र-योजना

राजन की कहानियों में बाल पात्र अपेक्षाकृत सक्रिय और आत्मविश्वासी रूप में सामने आते हैं। पारूल, रोहित, दीपू और वाचनालय के बच्चे अपनी परिस्थितियों से संवाद करते हैं। दादाजी, शिक्षक और परिवार के बड़े पात्र मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं।

विशेष रूप से पारूल का चरित्र उल्लेखनीय है। उसका सपना केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं रह जाता है; वह बालिका के आत्मविश्वास और समान अवसर की आकांक्षा का प्रतीक बन जाता है। इसी प्रकार वाचनालय की कहानी में बच्चों का सामूहिक चरित्र एक व्यक्ति से आगे बढ़कर ‘बच्चों की सामूहिक शक्ति’ का प्रतिनिधित्व करता है।

  1. संवाद

संवादों की भाषा सामान्यतः सहज और बोलचाल की भाषा है। यह बाल पाठक को पात्रों के अधिक निकट लाती है। कई जगह संवाद ही कहानी का विचार स्पष्ट करते हैं। उदाहरण के लिए ‘पारूल का सपना’ में पायलट बनने के प्रश्न पर पारूल का आत्मविश्वास कहानी के विचार को सीधे सामने लाता है।

हालाँकि कुछ स्थानों पर संवाद अपेक्षाकृत अधिक व्याख्यात्मक हो जाते हैं। पात्र कभी-कभी उतना ही कहते हैं जितना लेखक पाठक को समझाना चाहता है। यदि ऐसे संवादों को थोड़ा संक्षिप्त और स्वाभाविक किया जाए तो कथा की कलात्मकता और बढ़ सकती है।

  1. वातावरण

ग्रामीण जीवन की प्रस्तुति इस संग्रह की बड़ी ताकत है। गाँव की गलियाँ, विद्यालय, बगीचे, खेत, खंडहर, पंचायत और परिवार—ये सब कहानियों को स्थानीय धरातल प्रदान करते हैं। इससे बच्चे कथाओं से सहज जुड़ते हैं। स्वयं लेखक ने भी स्पष्ट किया है कि उनकी कहानियों का स्रोत गाँव की गलियाँ, स्कूल की कक्षाएँ और बच्चों की मासूम बातें हैं।

वातावरण केवल सजावटी नहीं है। ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’ में गाँव अभियान का क्षेत्र बनता है, ‘पौधा रोपण का महत्त्व’ में बगीचा सीखने का स्थल और ‘बच्चों का वाचनालय’ में खंडहर ज्ञान के केंद्र में बदल जाता है।

  1. भाषा-शैली

लेखक ने जान-बूझकर सरल भाषा अपनाई है। कठिन शब्दों और भारी-भरकम उपदेशात्मक भाषा से बचने का प्रयास पुस्तक की ‘अपनी बात’ में भी स्पष्ट दिखाई देता है।

यह सरलता बाल पाठक के लिए उपयोगी है। वाक्य सामान्यतः सीधे, सरल और सहज हैं और घटनाएँ क्रम से आगे बढ़ती हैं। कई जगह हास्य, कौतूहल और भावुकता का संतुलित प्रयोग भी दिखाई देता है।

लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यही सरलता कुछ जगहों पर अतिसरलीकरण में बदल जाती है। कुछ कहानियों के अंत में संदेश अपेक्षाकृत स्पष्ट रूप से बता दिया जाता है, जबकि साहित्यिक कहानी में कई बार संकेत पाठक पर छोड़ देना अधिक प्रभावी होता है। बालक को निष्कर्ष तक स्वयं पहुँचने का अवसर मिले तो कहानी का प्रभाव अधिक स्थायी हो सकता है।

  1. कल्पना और फैंटेसी

संग्रह की शीर्षक-कहानी में टाइम मशीन और रोबोट का प्रयोग तथा ‘खुशी दो, खुशी लो’ में जादुई रूमाल जैसे तत्व कल्पना को विस्तार देते हैं। इनका उद्देश्य केवल चमत्कार पैदा करना नहीं, बल्कि ज्ञान और मानवीय मूल्यों को रोचक बनाना है।

यहाँ लेखक की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सामने आती है—वे विज्ञान और कल्पना को नैतिक बोध से जोड़ते हैं। टाइम मशीन अतीत की यात्रा का उपकरण होने के साथ सीखने का माध्यम बनती है और जादुई रूमाल अंततः वस्तु से अधिक मनुष्य के व्यवहार का प्रतीक बन जाता है।

  1. उद्देश्य और संदेश

लगभग सभी कहानियों के पीछे स्पष्ट सामाजिक या नैतिक उद्देश्य है—शिक्षा, पर्यावरण, स्वतंत्रता, सहयोग, वैज्ञानिक दृष्टि, समान अवसर, पढ़ने की आदत और मानवीय संवेदना। यह उद्देश्यपरकता पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति भी है और आलोचना की दृष्टि से इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी।

शक्ति इसलिए कि बालक कहानी समाप्त होने के बाद किसी विचार के साथ लौटता है; चुनौती इसलिए कि कहीं-कहीं कथा से संदेश स्वाभाविक रूप से निकलने के बजाय लेखक द्वारा स्पष्ट कर दिया जाता है।

समीक्षात्मक समालोचना:

टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना मूलतः उद्देश्यपरक और मूल्यपरक बाल कहानी-संग्रह है। इसका केंद्रीय आग्रह यह है कि बालक जिज्ञासु बने, पढ़े, प्रश्न करे, अपने आसपास की समस्याओं को पहचाने और उन्हें बदलने के लिए स्वयं पहल करे। यह दृष्टि संग्रह को महज मनोरंजनात्मक बाल साहित्य से अलग करती है।

संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि है बालक को समस्या-समाधानकर्ता के रूप में प्रस्तुत करना। पारूल अपने सपने के लिए प्रयास करती है, बच्चे गाँव को प्लास्टिक से मुक्त करने का अभियान चलाते हैं, दीपू ठगों की चाल समझता है और बच्चे खंडहर को वाचनालय में बदल देते हैं। इस तरह लेखक बच्चों के भीतर निहित परिवर्तनकारी शक्ति पर विश्वास व्यक्त करते हैं।

दूसरी बड़ी उपलब्धि है विषय-विविधता। पर्यावरण से लेकर शिक्षा तक, तकनीक से लेकर स्वतंत्रता तक और व्यक्तिगत सपने से लेकर सामुदायिक पुस्तकालय तक—कहानीकार ने बच्चों के जीवन से जुड़े अनेक विषयों को कथा में समेटा है। विषय-सूची भी इस विविधता को स्पष्ट करती है।

तीसरी विशेषता है स्थानीयता और जीवन-संबंध। कहानियाँ किसी अमूर्त आदर्शलोक में नहीं घटतीं। गाँव, घर, स्कूल, बाजार, बगीचा और परिवार उनके संसार का हिस्सा हैं। इसलिए बच्चों को इनमें अपना परिवेश दिखाई देता है।

फिर भी एक गंभीर समीक्षक के रूप में कुछ सीमाओं की ओर संकेत करना आवश्यक है। पहली सीमा यह है कि अनेक कहानियों में उपदेश का अनुपात कथा की तुलना में कुछ अधिक हो जाता है। लेखक जिस बात को कहानी के माध्यम से पाठक तक पहुँचाना चाहते हैं, उसे कई बार पात्रों के संवाद में सीधे कह देते हैं। इससे कहानी का कलात्मकता प्रभावित होती है।

दूसरी सीमा आदर्श समाधान की तीव्रता है। कुछ कथाओं में समस्या अपेक्षाकृत शीघ्र और सुंदर ढंग से हल हो जाती है। वास्तविक जीवन की जटिलताओं की तुलना में ये समाधान कभी-कभी बहुत सरल प्रतीत होते हैं। यदि कहीं-कहीं संघर्ष, असफलता, संशय और पुनः प्रयास के लिए अधिक स्थान दिया जाता, तो पात्र अधिक त्रिआयामी और कथाएँ अधिक विश्वसनीय बन सकती थीं।

तीसरी बात चरित्र-विकास से जुड़ी है। कुछ पात्र कथा के उद्देश्य को पूरा करने के लिए निर्मित प्रतीत होते हैं। यदि उनके भीतर अधिक मनोवैज्ञानिक द्वंद्व, व्यक्तिगत कमजोरियाँ और परिवर्तन की क्रमिक प्रक्रिया दिखाई जाती, तो संग्रह का साहित्यिक स्तर और ऊँचा हो सकता था।

इन सीमाओं के बावजूद हमें बाल साहित्य को लक्षित पाठकीयता के संदर्भ में देखना चाहिए। लेखक का प्राथमिक उद्देश्य जटिल मनोवैज्ञानिक कथा रचना नहीं, बल्कि बच्चों में पढ़ने, सोचने, प्रश्न करने और सकारात्मक कार्य करने की प्रवृत्ति पैदा करना है। इस दृष्टि से उनकी कथात्मक रणनीति समझ में आती है। जिसकी वजह से वे सरल, सहज और आकर्षक कहानियां प्रस्तुत कर पाए हैं।

निष्कर्ष:

संक्षेप में कहे तो टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना ऐसा बाल कहानी-संग्रह है जिसमें ज्ञान और कल्पना, मनोरंजन और संस्कार, व्यक्ति और समाज तथा वर्तमान और भविष्य के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास किया गया है।

इस संग्रह की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि लेखक बच्चों को केवल ‘अच्छा बच्चा’ बनने का उपदेश नहीं देते; वे उन्हें कुछ करने, प्रश्न उठाने और अपने आसपास परिवर्तन लाने वाले पात्रों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक की ‘अपनी बात’ में भी लेखक का आग्रह है कि बच्चों से कहानियों पर चर्चा की जाए और उनसे पूछा जाए कि वे पारूल की जगह होते तो क्या करते या अपने गाँव-मोहल्ले के लिए क्या कर सकते हैं।  यही आग्रह इस संग्रह की वास्तविक शैक्षिक शक्ति है।

विशेष रूप से ‘पारूल का सपना’, ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’, ‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’, ‘दीपू ने ठग पकड़वाए’ और ‘बच्चों का वाचनालय’ जैसी कहानियाँ बालक को निष्क्रिय पाठक न बनाकर सहभागी बनाने की कोशिश करती हैं। ‘बच्चों का वाचनालय’ तो पुस्तक-पठन को सीधे सामुदायिक जीवन से जोड़ते हुए यह विश्वास पैदा करती है कि संसाधनों की कमी हमेशा ज्ञान की कमी नहीं होती; इच्छा, सहयोग और पहल हो तो एक खंडहर भी ज्ञान के केंद्र में बदला जा सकता है।

अंततः कहा जा सकता है कि राजकुमार जैन ‘राजन’ का यह संग्रह बालमन में जिज्ञासा जगाने, संवेदना विकसित करने और सकारात्मक कर्म की प्रेरणा देने वाला उपयोगी प्रयास है। साहित्यिक कसौटी पर इसमें उपदेशात्मकता और आदर्शवादी समाधान जैसी सीमाएँ अवश्य हैं, लेकिन इसकी विषयगत विविधता, सरल भाषा, बाल-केंद्रित दृष्टि, सामाजिक सरोकार और बच्चों को सक्रिय भूमिका देने की प्रवृत्ति इसे समकालीन बाल साहित्य में महत्त्वपूर्ण बनाती है।

यह पुस्तक बच्चे को केवल यह नहीं बताती कि क्या अच्छा है, बल्कि बार-बार यह प्रश्न उसके सामने रखती है कि अच्छा करने के लिए वह स्वयं क्या कर सकता है। यही इस कहानी-संग्रह का सबसे मूल्यवान पक्ष है। इस बेहतरीन कहानी संग्रह के लिए राजकुमार जैन राजन को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

——-

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१७ ☆ “आठवाँ सुर” – लेखक – नौशाद ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है  नौशाद जी द्वारा लिखित  “आठवाँ सुर” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१७ ☆

☆ “आठवाँ सुर” – लेखक – नौशाद ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(किताब उपलब्ध करवाने हेतु, आभार Kavita Kafe UK – कविता कैफ़े यूके)

कृति – आठवाँ सुर

लेखक – नौशाद 

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ संगीत के उस्ताद का शब्द-संसार : ‘आठवाँ सुर’ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

नौशाद अली को हम हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार के रूप में याद करते हैं। बैजू बावरा, मुगल-ए-आज़म, मदर इंडिया, अनमोल घड़ी जैसी फिल्मों का संगीत उनकी पहचान है।

लेकिन जब संगीत का यह जादूगर शब्दों के संसार में प्रवेश करता है तो पता चलता है कि उसके भीतर एक संवेदनशील शायर भी था। ‘आठवाँ सुर’ इसी शायर नौशाद अली से हमारा परिचय कराती है। पुस्तक उनकी शायरी का संग्रह है, जिसमें ग़ज़ल, शेर और आत्मानुभूति के स्वर एक साथ दिखाई देते हैं।

‘आठवाँ सुर’ शीर्षक अपने आप में बड़ा अर्थपूर्ण है। भारतीय संगीत में सामान्यतः सात स्वरों की चर्चा होती है, लेकिन नौशाद के लिए जीवन के अनुभवों, प्रेम, विरह, स्मृति, पीड़ा और मृत्यु से निकली अनुभूति जैसे किसी अनसुने आठवें स्वर की तरह है। यही स्वर उनकी शायरी में सुनाई देता है। संगीतकार नौशाद ने फिल्मों में सुरों से भावों को व्यक्त किया था, शायर नौशाद शब्दों से वही काम करते हैं। शायद यही कारण है कि उनकी ग़ज़लों में भी एक लयात्मकता सहज रूप से नज़र आती है।

 नौशाद की शायरी केवल प्रेम की रूमानियत तक सीमित नहीं है। उसमें जीवन की नश्वरता, बिछोह, स्मृति, आत्मसंवाद और मृत्यु का बोध भी है। एक जगह वे लिखते हैं   —

“क्यों मिली थी हयात याद करो

याद रखने की बात याद करो।”

दो छोटे-से मिसरे हैं, लेकिन इनके भीतर पूरी जिंदगी का प्रश्न खड़ा हो जाता है। जीवन क्यों मिला था? हमने उसका क्या किया? और जाते-जाते क्या याद रह जाएगा? यह प्रश्न शायर स्वयं से भी करता है और पाठक से भी।

इसी तरह उनका एक और शेर है—

“इक बे-क़रार दिल से मुलाक़ात कीजिए

जब मिल गए हैं आप तो कुछ बात कीजिए।”

यहाँ भाषा सहज है, लेकिन भाव में गहराई है। ‘बेकरार दिल’ और ‘मुलाकात’ जैसे पारंपरिक ग़ज़ल के रूमानी शब्दों के माध्यम से नौशाद उस आत्मीय क्षण को पकड़ लेते हैं जिसमें मिलने के बाद भी मन की बात कहने की बेचैनी बनी रहती है।

 संग्रह की विशेषता इसकी सादगी है। नौशाद कठिन शब्दावली या चमत्कारपूर्ण बिंबों के पीछे नहीं भागते। वे उर्दू ग़ज़ल की परंपरा में रहते हुए भी अपनी बात को अपेक्षाकृत सीधे ढंग से कहते हैं। प्रेम है तो उसमें आत्मीयता है, विरह है तो उसमें पीड़ा है, स्मृति है तो उसके साथ एक कसक है। इसीलिए उनके शेर पढ़ते हुए ऐसा नहीं लगता कि कोई केवल शायरी कर रहा है। लगता है जैसे कोई अपने जीवन का हिसाब-किताब पाठकों के सामने रख रहा हो।

उनकी शायरी की जड़ें परंपरा में हैं और वे स्वयं इस परंपरा से अनजान नहीं थे। पुस्तक के एक पृष्ठ पर उनका आत्मव्यंग्य पूर्ण शेर है—

“करना है शायरी अगर ‘नौशाद’

‘मीर’ का कुल्लियात याद करो।”

यह केवल मीर के प्रति श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि अपनी शायरी की सीमाओं की विनम्र स्वीकृति भी है। रचनाकार की पहचान इसी विनम्रता से होती है कि वह अपने पीछे खड़ी महान परंपरा को पहचानता है। नौशाद यहाँ अपने लिए भी एक कसौटी निर्धारित करते दिखाई देते हैं।

पुस्तक के आरंभिक पृष्ठों में आया उनका आत्मीय संस्मरण भी संग्रह को केवल शायरी की किताब नहीं रहने देता। उसमें परिवार, मृत्यु, स्मृति और अपने प्रियजनों से जुड़ा ऐसा मार्मिक प्रसंग आता है, जहाँ चार पंक्तियों में उनकी निजी पीड़ा कविता बन जाती है

“फिर उसी तरह कलेजे से लगा लो मुझको

गिरती दीवार हूँ लिल्लाह सँभालो मुझको।”

और आगे—

“जिसने फल-फूल दिये, प्यार दिया, साया दिया

मैं वही पेड़ हूँ मरने से बचा लो मुझको।”

यहाँ ‘पेड़’ केवल पेड़ नहीं रह जाता। वह जीवन, परिवार, आश्रय और बीतती उम्र का प्रतीक बन जाता है। यह प्रसंग पढ़ते हुए लगता है कि संगीतकार नौशाद के भीतर का शायर अपने जीवन के अंतिम सत्य से संवाद कर रहा है।

‘आठवाँ सुर’ की शायरी में याद एक महत्वपूर्ण भाव है। वे बीते हुये समय की बार-बार याद करते है। कभी प्रेम की याद के रूप में, कभी किसी बिछुड़े व्यक्ति की स्मृति बनकर और कभी अपने ही अतीत के आईने की तरह। एक शेर में वे कहते हैं—

“मैं लाख ढूँढूँ उसे ढूँढने से क्या होगा

मेरी तलाश में वो भी तो खो गया होगा।”

यहाँ तलाश का द्वंद्व बहुत सुंदर है। जिसे हम खोज रहे हैं, संभव है वह भी हमें खोजते-खोजते कहीं खो गया हो। प्रेम की यह पारस्परिक विडंबना शेर को साधारण विरह से उठाकर जीवन की व्यापक अनुभूति बना देती है।

नौशाद की शायरी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष समय और मृत्यु का बोध है। जीवन को वे स्थायी उपलब्धि की तरह नहीं देखते। उनके यहाँ संसार आता-जाता है, रिश्ते बनते-बिगड़ते हैं और अंततः मनुष्य स्मृतियों में बदल जाता है। यही दृष्टि उनकी शायरी को केवल प्रेम-कविता का संग्रह बनने से बचाती है।

इस दृष्टि से ‘आठवाँ सुर’ को नौशाद के संगीत से अलग करके देखना भी उचित नहीं होगा। संगीत में उन्होंने भारतीय शास्त्रीय परंपरा को लोकप्रिय सिनेमा की भाषा में प्रतिष्ठित किया, शायरी में उन्होंने उसी सांस्कृतिक संस्कार को शब्दों का रूप दिया। उनके संगीत की तरह उनकी शायरी में भी माधुर्य, अनुशासन और भाव प्रधानता दिखाई देती है। किताब से गुजरते हुए नौशाद की रचनात्मक दुनिया में संगीत और कविता दो अलग-अलग धाराएँ नहीं, बल्कि एक ही संवेदनशील मन से निकले दो स्वर समझ आतें हैं। उनके जीवन और कला की यही बहुआयामी पहचान उन्हें विशिष्ट बनाती है।

‘आठवाँ सुर’ पढ़ते हुए सबसे सुखद बात यह लगती है कि यहाँ एक प्रसिद्ध संगीतकार अपने स्थापित व्यक्तित्व का सहारा लेकर शायर बनने की कोशिश नहीं करता। वह अपने शब्दों के बल पर सामने आता है। कहीं वह प्रेमी है, कहीं विरही, कहीं आत्मालोचक, कहीं जीवन से सवाल करता हुआ मनुष्य और कहीं अपनी स्मृतियों में लौटता हुआ वृद्ध। यही मानवीयता इस संग्रह को मूल्यवान बनाती है।

अनुमान लगा सकता हूं कि ये संग्रह उनके जीवन के लंबे सफर में मन का चैन ढूंढने का, समय समय पर कागज पर अभिव्यक्त प्रयासो का संकलन है।

नौशाद के संगीत को सुनते हुए हम उनके सुरों के जादू में खो जाते हैं,  ‘आठवाँ सुर’ पढ़ते हुए उन्हीं सुरों के पीछे छिपे मनुष्य से हमारा परिचय होता है। सात सुरों के महान साधक ने शब्दों में जो अतिरिक्त स्वर खोजा, शायद वही इस पुस्तक का ‘आठवाँ सुर’ है, एक ऐसा स्वर, जिसे कानों से कम और मन से अधिक सुना जा सकता है।

उन्हें श्रद्धांजलि

#लंदन_डायरी, #पुस्तक, #bhawan

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ प्रतिष्ठित कवियत्री और शिक्षाविद डा. संध्या जैन श्रुति की कृति – नर्मदा महाकाव्य ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ प्रतिष्ठित कवियत्री और शिक्षाविद डा. संध्या जैन श्रुति की कृति – नर्मदा महाकाव्य ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(जन्म दिवस पर मंगल भाव सहित)

☆

वैसे तो अनेक साहित्यकारों ने अपनी कलम के माध्यम से मां नर्मदा की साधना, आराधना की है और उनकी कृति साहित्यिक क्षेत्र में पाठकों के बीच काफी चर्चित भी हुई हैं। इसी तारतम्य में अगर देखा जाए तो डॉ. संध्या जैन ‘श्रुति’ कृत ‘नर्मदा महाकाव्य’ भी माँ नर्मदा के इसी आध्यात्मिक, प्राकृतिक, सांस्कृतिक एवं दार्शनिक वैभव का एक अप्रतिम और भावपूर्ण काव्यात्मक आलेखन है।

डा . संध्या जैन ‘श्रुति’

कवयित्री स्वयं ‘आत्मकथ्य’ में अपने जीवन की एक अद्भुत घटना का स्मरण करते हुए व्यक्त करती हैं कि बाल्यकाल में भेड़ाघाट के जलप्रपात में जलधार के बीच गिर जाने पर किस प्रकार माँ नर्मदा कीज्ञ कृपा से उनका जीवन सुरक्षित रहा। यह महाकाव्य उसी जीवनदान के प्रति कृतज्ञता, समर्पण और अनन्य निष्ठा का भक्तिपुष्प है।

 शारदा प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित डा. संध्या जैन श्रुति जी का यह महाकाव्य मंगलाचरण से प्रारंभ होकर १३ सर्गों में सुनियोजित ढंग से विभक्त है। कवयित्री ने माँ नर्मदा की उत्पत्ति, उनके पौराणिक एवं प्राकृतिक स्वरूप, सामाजिक-सांस्कृतिक महत्त्व तथा आध्यात्मिक चेतना को प्रत्येक सर्ग में विस्तार से प्रस्तुत किया है। उदाहरण स्वरुप अगर हम कृति के कुछ भागों की चर्चा करें तो इस महाकाव्य की पठनीयता से हम परिचित हो सकते हैं।

मंगलाचरण एवं नर्मदा स्तुति:

महाकाव्य का प्रारंभ देवाधिदेव महादेव और उमा-पति शिव की अराधना से होता है। कवयित्री ने शिव-शंकर के पसीने की बिंदु से प्रवाहित होती रेवा के अवतरण को अद्भुत काव्यात्मक छटा में पिरोया है:

 ०

“शिवशंकर की दिव्य-देह से, सतत पसीना बह निकला।

सरल-तरल, अविरल उस जल ने, किया रूप धारण अबला ॥”

 ०

मातृत्व और अनुग्रह का भाव:

कवयित्री का समर्पण भाव महाकाव्य के प्रत्येक छंद में मुखरित होता है। वे अपने अल्पज्ञ स्वरूप को स्वीकारते हुए माँ के सम्मुख आत्म-समर्पण करती हैं:

 ०

“ममता मयी हो मात तुम्हारी समता कहीं नहीं

तेरे सजुल सबल इस जल से सिंचित सारी मही ॥”

 ०

घाटों का आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक सौंदर्य:

‘नर्मदा के घाट’ शीर्षक के अंतर्गत कवयित्री ने नर्मदा तटों पर व्याप्त अनहद नाद, मंदिरों की घंटियों और आत्मिक शांति का जीवंत सजीव चित्रण किया है:

 ०

“अटके-भटके रागी प्राणी ऋद्धि-सिद्धि पा जाते

मन की शांति प्राप्त कर लेते शक्ति रूप पतियाते ॥

 ०

ओम् अनहद नाद घंटा-घाट तट की बात

रम्य दृश्यों से सुसज्जित नर्मदा के घाट ॥”

 ०

नर्मदा महाकाव्य’ केवल एक काव्य ग्रंथ नहीं, बल्कि अमरकंटक से लेकर सागर संगम तक बहने वाली रेवा की चेतना का काव्यात्मक संस्मरण है। जैसा कि श्री कल्याण सेवा आश्रम के पूज्य बाबा कल्याण दास जी ने अपने मंगलाशीष में लिखा है— यह कृति माँ नर्मदा की सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक महिमा को सर्वांगपूर्ण रूप में प्रस्तुत करने का एक स्तुत्य एवं सफल प्रयास है।

 🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१६ ☆ “काश! मैं बादल होता” – कवि – श्री आशुतोष झुड़ेले ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है कवि – श्री आशुतोष झुड़ेलेजी द्वारा लिखित  “काश! मैं बादल होता” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१६ ☆

☆ “काश! मैं बादल होता” – कवि – श्री आशुतोष झुड़ेले ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/

कृति -काश! मैं बादल होता

कवि – आशुतोष झुड़ेले

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ जीवन को देखने की सहज दृष्टि – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कविता के लिए हमेशा किसी असाधारण घटना की जरूरत नहीं होती। एक खाली मेज़, उड़ती पतंग, पहली बारिश की खुशबू, किसी मित्र की स्मृति या मन में उठती कोई छोटी-सी शिकायत भी कविता का कारण बन सकती है। आशुतोष झुड़ेले ‘ओ रे कबीरा’ का संग्रह ‘काश! मैं बादल होता’ इसी सहज अनुभूति से निकली 51 कविताओं का संसार है। कवि स्वयं स्वीकार करता है कि ये कविताएँ जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुख, त्योहारों, घटनाओं और रोजमर्रा के अनुभवों से बनी हैं।

इस संग्रह को पढ़ते हुए लगता है कि कवि कविता लिखने से अधिक जीवन को पकड़ने की कोशिश करता है। ‘बग़ीचे की मेज़’ इसका सुंदर उदाहरण है। सामान्य-सी दिखाई देने वाली एक मेज़ कवि की दृष्टि में अनेक जीवन-कथाओं की साक्षी बन जाती है। वहाँ बुजुर्ग हैं, बच्चे हैं, प्रेमी युगल हैं, अकेलेपन की तलाश में आए लोग हैं और अपने हिस्से के लिए संघर्ष करते चेहरे भी। अंततः वही मेज़ खाली होती है और कवि को लगता है,“यहीं तो मेरी मुलाक़ात आज उम्मीद से होने वाली है।”  वस्तु को जीवन के रूपक में बदल देना इस कविता की उपलब्धि है।

संग्रह में स्मृति एक महत्वपूर्ण संवेदनात्मक आधार है। ‘चुरा ले गए’ में कवि उन चीजों की तलाश करता है जो आधुनिक जीवन में धीरे-धीरे हमसे छूटती जा रही हैं, सुबह की ताजगी, शाम की सादगी, पहली बारिश की खुशबू, बगीचे के फूल और आँगन की मिट्टी। “कुछ लोग पहली बारिश की ख़ुशबू चुरा ले गए” केवल एक सुंदर बिंब नहीं, संवेदनाओं के क्षरण की ओर बड़ा संकेत है।

इसी क्रम में ‘पतझड़ के भी रंग होते हैं’ जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी सौंदर्य खोजती है। पतझड़ यहाँ अंत नहीं, देखने की नई दृष्टि है। सूखे पत्तों, गिरे फूलों और पुराने गीतों में भी रंग और स्मृति बची हुई है। यह कविता संग्रह के आशावादी स्वर को पहचान देती है।

‘पतंग सी जिंदगी’ में जीवन की उड़ान और उसकी डोर का सुंदर साम्य है। पतंग दूर जाती है, लौटती है, हवा से संघर्ष करती है, फिर भी डोर से जुड़ी रहती है।  स्वतंत्रता और संबंधों के बीच मनुष्य की स्थिति को कवि ने एक परिचित लोक-प्रतीक में सहजता से बाँधा है।

आशुतोष की कविता केवल निजी अनुभवों तक सीमित नहीं रहती। ‘भीड़ की आड़ में’ सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा प्रश्न करती है। धर्म, जाति और सामूहिक पहचान के पीछे छिपकर मनुष्य अपने दोषों से बचने की कोशिश करता है। कविता का निष्कर्ष आत्ममंथन की ओर ले जाता है,दोष किसी भीड़ का नहीं, अंततः मनुष्य का अपना है।

‘हम सोचते हैं’ इसी तेवर को व्यंग्य में बदलती है और हमारी सामाजिक स्मृति तथा आत्ममुग्धता पर चोट करती है।

‘दर दर गंगे’ में सांस्कृतिक आस्था और पर्यावरणीय चिंता साथ दिखाई देती हैं। गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा में कवि उस नदी की पीड़ा दर्ज करता है जिसे हम माँ कहते हैं, जिसकी आरती करते हैं, पर जिसकी रक्षा का दायित्व भूल जाते हैं। “बहाती जा रही बस आँसू” जैसे बिंब श्रद्धा को जिम्मेदारी से जोड़ देते हैं। इस तरह के कई नवाचारी रूपक कवि की अनुभव जन्य भाषा ,भाव , शब्द सामर्थ्य के परिचायक हैं। यद्यपि यह कवि की पहली ही कृति है, उनके व्यक्तित्व की तरह व्यापक सुगठित सरल तथा परिपक्व है।

‘भोपाल’ संग्रह की अत्यंत छोटी, किंतु गहरी कविता है। “हवा क्या होती है, पूछो भोपाल से…” जैसे लगातार प्रश्न एक त्रासदी को केवल घटना न रहने देकर सामूहिक स्मृति में बदल देते हैं।  शब्द कम हैं, लेकिन उनके पीछे भय, अन्याय और जीवन-मृत्यु का पूरा अनुभव उपस्थित है। भोपाल गैस त्रासदी पर केंद्रित यह कविता महत्वपूर्ण संवेदी, दस्तावेजी रचना बन पड़ी है।

रिश्तों की नाजुकता भी कवि की प्रमुख चिंता है। ‘डोर’ में समय और संबंध दोनों को ऐसे धागे की तरह देखा गया है जो लंबा होने पर अपना सिरा खो देता है और तनिक से झटके में टूट भी सकता है।  ‘रिश्ते’ कविता अपेक्षा और उपेक्षा के बजाय देने और कर्म को महत्व देती है।  ‘शिकायत थी मुझको’ में शिकायतों की पूरी सूची अंततः आत्मबोध  सामने लाती है। कबीरा का मुस्कुराकर ‘मूरख’ कहना कविता को उपदेश नहीं, आत्मव्यंग्य बना देता है।

खुद पर व्यंग्य कर पाना एक सामर्थ्यवान कवि की पहचान है।

‘पहचानो तुम कौन हो?’ संग्रह की उल्लेखनीय रचनाओं में है। भेड़ों के बीच पला शेर का बच्चा स्वयं को भेड़ समझता रहता है। अपनी वास्तविक पहचान से अपरिचित यह शेर हमारे भीतर छिपी संभावनाओं का रूपक बन जाता है।  कविता का प्रश्न इसलिए केवल शेर से नहीं, पाठक से भी है, हम अपने बारे में जो मानते हैं, क्या वास्तव में वही हैं?

संग्रह की भाषा उसकी अपनी पहचान है। हिंदी के साथ उर्दू और लोकभाषा के शब्द सहजता से आते हैं। पुनरावृत्ति, संवाद और लोकलय कई कविताओं को मंचीय प्रभाव देते हैं। ‘तू है गज’ में लगातार दोहराया गया संबोधन हाथी को भारतीय सांस्कृतिक स्मृति, शक्ति, करुणा और अस्तित्व के व्यापक प्रतीक में बदल देता है।

‘काश! मैं बादल होता’ की कविताएँ बड़े दार्शनिक निष्कर्षों का दावा नहीं करतीं। वे छोटे अनुभवों से छोटी-छोटी रोशनियाँ चुनती हैं। यही इनकी विशेषता है। कहीं स्मृति है, कहीं व्यंग्य, कहीं सामाजिक सरोकार, कहीं पर्यावरण की चिंता और कहीं आत्मसंवाद। कवि बादल बनकर उड़ना चाहता है, पतंग बनकर लौटता है, खाली मेज़ पर उम्मीद खोजता है और अंततः स्वयं से ही पूछता है, “पहचानो तुम कौन हो?”

कविताएं पढ़कर समझ आता है कि आशुतोष जी साहित्य के एक अच्छे पाठक हैं, तथा कला संस्कृति उनकी अभिरुचि है, जो रचनाओं में मुखर हुई दिखती है।

कविता यहाँ जीवन से अलग कोई सजाया हुआ संसार नहीं, बल्कि जीवन को थोड़ी देर ठहरकर देखने की कला है। ‘काश! मैं बादल होता’ इसी ठहरने, देखने और फिर भीतर कुछ बदल लेने का सहज आमंत्रण है।

कवि की आगामी रचना यात्रा के पड़ाव की प्रतीक्षा रहेगी।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆  समीक्षक – श्री अनिल कुमार अस्थाना ☆

श्री अनिल कुमार अस्थाना

☆ पुस्तक समीक्षा ☆

☆ ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆  समीक्षक – श्री अनिल कुमार अस्थाना ☆

☆

पुस्तक समीक्षा: ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी)

 लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव

☆ प्रेम का मनोविज्ञान -बदलाव की बयार-“कोई नाम न दो” – सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी द्वारा रचित पुस्तक ‘ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी)’ का अध्ययन करने का सुखद अवसर प्राप्त हुआ। भले ही इन कहानियों का परिवेश मूलतः ब्रिटिश है, परंतु ये सभी कहानियां किसी न किसी रूप में हमारी दादियों द्वारा भारत में सुनाई जाने वाली कथाओं की ही आत्मीय अनुभूति कराती हैं।

लेखक ने विदेशी लोक कथाओं में छिपे उन तत्वों को उकेरा है जो भारतीय जनमानस से गहराई से जुड़ते हैं:

रॉबिन हुड और शेरवुड का जंगल : यह कहानी पूरी तरह से भारतीय ऐतिहासिक परिवेश से मेल खाती प्रतीत होती है। यह उस कालखंड का स्मरण कराती है जब पहले मुगल और फिर ब्रिटिश शासक जनता से जबरन लगान वसूलते थे। इसके साथ ही, यह प्रसंग बरबस ही इस बात की याद दिलाता है कि कैसे भारत शासन ने जमींदारी प्रथा को समाप्त कर ग्रामीण जनता को इस शोषण से बड़ी राहत दिलवाई थी।

राजा आर्थर और जादुई तलवार: यह कथा भारतीय महाकाव्य महाभारत के उस गौरवशाली प्रसंग की याद दिलाती है, जहां अर्जुन मछली की आंख पर अचूक निशाना लगाते हैं।

वर्तमान परिदृश्य में, यह पुस्तक आज की युवा पीढ़ी और बच्चों को अंतर्राष्ट्रीय कहानियों से परिचित कराने का एक अत्यंत सार्थक माध्यम है।

इस पुस्तक की विषयवस्तु से प्रेरित होकर, मैंने यह निर्णय लिया है कि मैं कल्याण में रह रही अपनी 4 वर्षीय भांजी ‘अन्वी’ को ये बाल-कहानियां अवश्य सुनाऊंगा।

विदेशी लोक कथाओं को इतने सहज और ग्राह्य रूप में प्रस्तुत करने के लिए लेखक श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी को हार्दिक बधाई।

☆

©  श्री अनिल कुमार अस्थाना

जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ पितृ भक्ति पर मंथन श्री की संग्रहणीय और पठनीय कृति – पितृ नमन – संपादक – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षक – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ पितृ भक्ति पर मंथन श्री की संग्रहणीय और पठनीय कृति – पितृ नमन – संपादक – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षक – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

☆

मेरे पूज्य पिता स्व. पं.भगवती प्रसाद जी पाठक की 25 सितंबर को 127 वीं जयंती है और यह मेरे लिए सौभाग्य और सुखद संयोग की बात है कि संस्था मंथन श्री के द्वारा भी अभी 20 सितंबर को पिता को समर्पित काव्य रचनाओं का एक संग्रह पितृ नमन भी प्रकाशित किया गया। इस कृति में अपने पूज्य पिता पर आधारित एक कविता मेरी भी शामिल की गई जिसके लिए मैं मंथन श्री परिवार के प्रति आत्मीय रुप से आभार व्यक्त करता हूं।

अगर देखा जाए तो पिता कीअपेक्षा मातृ भक्ति को लेकर कवियों द्वारा अधिक काव्य रचनाओं का सृजन किया गया।काफी दिनों से वास्तव में पितृ भक्ति को लेकर भी एक ऐसे ही काव्य संग्रह की आवश्यकता महसूस भी की जा रही थी जिसमें पिता को समर्पित ऐसी कविताएं शामिल हों जो कि पाठकों के लिए पठनीय साबित हो सके।

श्री संतोष नेमा ‘संतोष’

मंथन श्री द्वारा इसी पावन उद्देश्य को लेकर जबलपुर के कला वीथिका में प्रतिष्ठित कवियों की पिता को समर्पित श्रेष्ठ कविताओं के संग्रह पितृ नमन का लोकार्पण कार्यक्रम पिछले दिनों आयोजित किया गया।पितृ नमन को साहित्यिक क्षेत्र का एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज कहा जा सकता है जो कि पिता को समर्पित काव्य रचनाओं के सशक्त सृजन हेतु सहायक सिद्ध होगा। मंथन श्री के संस्थापक और प्रसिद्ध साहित्य साधक श्री संतोष नेमा संतोष जी की परिकल्पना, संयोजना एवं सफल संपादन में प्रकाशित इस कृति के प्रकाशन में श्री राजेश पाठक प्रवीण, श्री विजय नेमा अनुज‌ एवं सिद्धेश्वरी सराफ शीलू का संपादन सहयोग भी काफी सराहनीय रहा

प्रज्ञा पीठाधीश्वर श्री मां साध्वी विभानंद गिरी, महाकवि आचार्य भगवत दुबे जी, महामहोपाध्याय आचार्य डा. हरिशंकर जी दुबे, श्री शरद अग्रवाल जी, कविवर श्री हरिशंकर भटनागर जी, सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री प्रतुल श्रीवास्तव जी, श्री विजय नेमा अनुज जी, श्री राजेश पाठक प्रवीण जी, की मंगल भाव सहित प्रभावी प्रतिक्रियाओं ने पुस्तक कृति को सार्थकता प्रदान की है।पितृ नमन में श्री संतोष नेमा संतोष जी की कृतज्ञता भाव के रुप में अभिव्यक्ति उल्लेखनीय है। वे लिखते हैं कि यह संग्रह एक ही भाव के अनेक रंग हैं। किसी ने पिता को बरगद कहा, किसी ने हिमालय, , किसी ने पुरानी साईकिल की घंटी, किसी ने फटी हुई कमीज़ के पीछे छिपा गौरव। छंद, ग़ज़ल, गीत, मुक्तक और नयी कविता के माध्यम से रचनाकारों ने अपने अपने पिता को जिया है। यह विविधता ही इस संग्रह की की सबसे बड़ी शक्ति है।मंथन श्री द्वारा संयोजित इस पितृ नमन कृति को भाई श्री संतोष नेमा संतोष ने अपने पूज्य पिता स्व. श्री देवीचरण जी नेमा को समर्पित की है। पाथेय प्रकाशन की इस कृति में 208 कवियों की अपने पिता को समर्पित काव्य रचनाएं शामिल हैं।

इस पुस्तक के प्रारंभ में पिता पर आधारित ये‌ काव्य पंक्तियां पाठकों को प्रभावित और आकर्षित करने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं:

०

पिता तप की ज्योति हैं,

त्यागों का विस्तार हैं।

मौन रहकर भी सदा,

जीवन के आधार हैं।

मंथन श्री ने शब्दों में,

पितृ महिमा को स्वर दिया।

संकलन में पितृ ऋण के,

श्रद्धा और संस्कार हैं।

०

पितृ भक्ति पर आधारित मंथन श्री की यह काव्य कृति साहित्यिक क्षेत्र के पाठकों के लिए इस वर्ष की एक संग्रहणीय, पठनीय और प्रशंसनीय कृति सिद्ध होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१५ ☆ ☆ “नाभिनाल का अटूट रिश्ता” –  संपादक : ख़ुदेजा ख़ान और डाॅ. मयंक मुरारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है ख़ुदेजा ख़ान और डाॅ. मयंक मुरारी जी द्वारा संपादित   “नाभिनाल का अटूट रिश्ता” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१५ ☆

☆ “नाभिनाल का अटूट रिश्ता” –  संपादक : ख़ुदेजा ख़ान और डाॅ. मयंक मुरारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/

 

मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)

लेखक – अखंड गहमरी

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ नाभिनाल का अटूट रिश्ता : स्मृति, ममत्व और मनुष्य होने की कविता – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

माँ को पढ़ना दरअसल उस मौन को पढ़ना है, जिसे जन्म से पहले से ही माँ पल पल स्वयं कष्ट सहकर भी आनंदित होती है और जीवन की कहानी लिखती चलती है।

माँ जीवन का अमर तत्व है। उस पर प्रायः प्रत्येक कवि ने लिखा  है। मुझे स्मरण है कि जागरण समूह ने इंदौर से मां शीर्षक से एक भव्य लघुकथा संग्रह निकाला था।

मुझे अपनी मां के अवसान पर स्वयं मुखरित हुई रचना की पंक्तियां याद आती हैं

“घर के हर दर पर चंदन की खुश्बू सी ,लगती हो माँ

तुलसी बिरवे के चौरे पर

रौशन बाती सी उजरी  हो माँ “

माँ और संतान का रिश्ता एक अदृश्य धागा है, जो जन्म के क्षण में भले ही शारीरिक रूप से अलग हो जाता है, लेकिन स्मृति, संवेदना और आत्मा के धरातल पर वह कभी विच्छिन्न नहीं होता।

ख़ुदेजा ख़ान और डाॅ. मयंक मुरारी द्वारा बहुत ही गम्भीर चिंतन से संपादित काव्य संकलन ‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ इसी शाश्वत संबंध को कविता के अनेक स्वरों में अनुभव करने का अवसर देता है।

यह पुस्तक केवल माँ पर लिखी गई कविताओं का ऐसा संग्रह है जो उस  मानवीय अनुभव की साहित्यिक यात्रा है, जहाँ माँ एक व्यक्ति से आगे बढ़कर स्मृति, माटी, घर, त्याग, समय और अस्तित्व का रूपक बन जाती है।

विभिन्न कवियों की रचनाएँ इसी केंद्रीय भाव को अपने-अपने जीवनानुभवों , परिवेश और  भाषिक संस्कारों के साथ अभिव्यक्त करती हैं

‘नाभिनाल’ जैविक संबंध का प्रतीक है, जबकि ‘अटूट रिश्ता’ उसके भावात्मक विस्तार का व्याख्यान। जन्म के बाद नाभिनाल कटती है, लेकिन क्या माँ से हमारा संबंध कभी कट सकता है? यही प्रश्न इस संकलन के शीर्षक को साधारण नाम से उठाकर एक दार्शनिक प्रस्तावना में बदल देता है।

माँ हमारे जीवन का पहला स्पर्श है, पहली भाषा है और संभवतः पहली ऐसी उपस्थिति भी, जिसके अर्थ को हम उम्र भर समझने का प्रयास करते रहते हैं। हम बड़े होते हैं, घर बनाते हैं, अपनी सफलताओं का संसार रचते हैं, लेकिन हमारे भीतर कहीं एक बच्चा अपनी माँ की आवाज, उसकी हथेली और उसकी प्रतीक्षा में सदैव ठहरा रहता है।

इस संकलन की कविताएँ इसी ठहरे हुए बच्चे तक पहुँचने का रास्ता बनाती हैं।

ब्रज श्रीवास्तव की कविता ‘सबसे पहले माँ’ माँ की पारंपरिक छवि को एक आत्मीय और धरती से जुड़ी हुई व्याख्या देती है—

“माँ केवल माँ नहीं है सुखद उपस्थिति है किसी जज़्बात की”

और आगे कवि लिखते हैं—“माँ कोई जन्नत नहीं है वह तो खालिस धरती है ,धरती पर मौजूद घर का ओसारा है।”

इन पंक्तियों में माँ को किसी अमूर्त आदर्श या दूरस्थ स्वर्ग के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की ठोस, रोजमर्रा की सुरक्षा के रूप में देखा गया है। ओसारा यहाँ  घर का वास्तु-तत्व ,  विश्राम, आश्रय और अपनत्व का स्थान है। जीवन की तपिश भरी धूप से लौटकर मनुष्य जहाँ स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है, वही माँ का भावलोक है।

कविता का दार्शनिक सौंदर्य इस बात में है कि वह माँ को पूजनीय बनाने के बजाय पहले मनुष्य के जीवन में उसकी वास्तविक उपस्थिति को पहचानती है।

 माँ की आवाज, उसकी चिंता और उसकी परवाह करना, ये सभी हमें स्वयं से प्रेम करना सिखाते हैं।

 माँ को समझना , एक ऐसी भाषा,होती है जिसे पढ़ा नहीं जा सकता, वह अनुभव होती है।

भरत प्रसाद की कविता ‘कोई और धातु की होती है-माँ’ मातृत्व को असाधारण शक्ति और रहस्य के रूप में देखती है। कवि लिखते हैं— “गलती से भी मां को परखने की गलती मत करना उसके भीतर छिपी रहती हैं अज्ञात लिपियाँ”

यहाँ माँ एक ऐसी किताब बन जाती है, जिसके अक्षर सामान्य बौद्धिक उपकरणों से नहीं पढ़े जा सकते। मातृत्व को कवि प्रकृति द्वारा लिखी गई एक विशिष्ट भाषा कहते हैं—“मिट्टी की भाषा की तरह।”

इस कविता का भावात्मक केंद्र उस स्वीकार में है कि माँ को जानना केवल उसके कार्यों की सूची बना लेना नहीं है। उसके त्याग, धैर्य और मौन की गहराई का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन उसकी संपूर्णता को नाप पाना कठिन है।

कविता की अंतिम पंक्तियाँ इस अनुभूति को और गहरा करती हैं

 “जीते जी हद से ज्यादा मिट जाने की कला है- मां होना।।”

माँ होने को मिट जाने की कला कहना एक मार्मिक दार्शनिक बिंब है। यह मातृत्व के समर्पण की ओर संकेत करता है, यद्यपि माँ को केवल आत्म-विलोपन तक सीमित कर देना उचित नहीं होगा। माँ की पहचान उसके अपने सपनों, संघर्षों और व्यक्तित्व से भी बनती है। इस दृष्टि से कविता पाठक को मातृत्व के त्याग के साथ उसके मानवीय विस्तार पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

शायद मां अपने सपने अपनी संतान में साकार करती है।

संग्रह की एक और कविता नरेंद्र गौड़ की ‘माँ का संदूक’ स्मृति को किसी बड़े दार्शनिक वक्तव्य में नहीं, बल्कि एक घरेलू वस्तु में खोजती है। पिता द्वारा संदूक पर लिखे गए माँ के नाम से कविता आरंभ होती है— “आइलपेंट से टेढ़ मेढ़े अक्षरों में संदूक पर छोड़ गए माँ का नाम”

माँ का संदूक परिवार की संपत्ति से कहीं अधिक उसकी सामूहिक स्मृति का पात्र बन जाता है। माँ के जाने के बाद उसके कपड़े, आभूषण और उपयोग की वस्तुएँ अचानक भावनात्मक और आर्थिक मूल्य के बीच खड़ी दिखाई देती हैं।

कविता का व्यंग्यात्मक और करुण पक्ष तब सामने आता है, जब भाई संदूक को लेकर अपनी आजमाइश करते हैं। जिस माँ ने परिवार के लिए अपने आभूषणों तक को बचाकर नहीं रखा, उसकी बची हुई वस्तुओं में संतानें अपने हिस्से का अर्थ खोजती हैं।

यहाँ संदूक एक वस्तु नहीं रह जाता, वह परिवार के बदलते मूल्यों का आईना बन जाता है। माँ की स्मृति के भीतर छिपे त्याग को समझने की जगह मनुष्य जब वस्तुओं के मूल्य में उलझ जाता है, तब कविता एक मौन प्रश्न छोड़ जाती है, क्या भावना और स्मृतियों का भी बँटवारा किया जा सकता है?

मिथिलेश रॉय की कविता ‘अपनी कथा में’ माँ को उसकी संतान की माँ होने से पहले एक स्वतंत्र बचपन वाली लड़की के रूप में देखने का प्रयास करती है। वह अपने पोते-पोतियों को खेलों, नदी और स्कूल की स्मृतियाँ सुनाती है।

कविता में माँ का बचपन धीरे-धीरे सामने आता है, वह लंबी दौड़ जीतती थी, नदी पार करती थी, तितली की तरह उड़ती थी। फिर विवाह और सामाजिक बंधनों की स्मृति उस कथा में प्रवेश करती है। “तब इतना बड़ा घूँघट लेना पड़ता था हमें ससुराल में”

बच्चों का उस घूँघट को देखकर हँसना और माँ का अपनी कथा के बीच रुक जाना कविता को एक गहरी संवेदनात्मक ऊँचाई देता है। उसके बाद— “रुंध जाता है उसका गला , भरने लग जाती है मां की आवाज।”

यहाँ कविता केवल अतीत का वर्णन नहीं करती,  वह पीढ़ियों के बीच अनुभवों की दूरी को सामने लाती है। जिस माँ को बच्चे केवल माँ के रूप में जानते हैं, उसके भीतर एक लड़की, एक विद्यार्थी, एक स्वप्नदर्शी और एक संघर्षशील स्त्री भी समाई हुई थी।

कविता हमें याद दिलाती है कि किसी व्यक्ति को उसके संबंधों की एकमात्र भूमिका में देखना उसके पूरे अस्तित्व को देखना नहीं है।

अमरजीत  की कविता ‘चिराग़ जैसी मां’ माँ की अनुपस्थिति को शहर के सामान्य जीवन के बीच रखती है। माँ के जाने के बाद शहर में सब कुछ पहले जैसा चलता रहता है, लोग काम पर जाते हैं, कारखाने चलते हैं, सड़कों पर भीड़ रहती है। लेकिन परिवार के भीतर एक ऐसी रिक्तता उत्पन्न हो जाती है, जिसे बाहरी दुनिया नहीं देख पाती।

कविता के अंत में आता है— “सिर्फ एक माँ के नाम का चिराग है बुझा हुआ।”

यह बिंब अत्यंत प्रभावी है। शहर की रोशनियों के बीच माँ के नाम का बुझा चिराग निजी शोक और सार्वजनिक सामान्यता के अंतर को प्रकट करता है। दुनिया चलती रहती है, लेकिन किसी एक व्यक्ति के लिए समय का अर्थ बदल जाता है।

माँ की मृत्यु के बाद स्मृति ही वह दीपक बनती है, जिसके सहारे मनुष्य अतीत से संवाद करता रहता है।

इस संकलन का एक महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न भाषायी और भौगोलिक पृष्ठभूमियों के कवियों का सम्मिलन है। असमिया और उड़िया सहित अलग-अलग क्षेत्रों के कवि मातृत्व के अनुभव को अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों और भाषिक संवेदनाओं के साथ भिन्न  भिन्न रचनाओं में व्यक्त करते हैं।

मानस रंजन महापात्र की कविता ‘माँ के लिए आकाश के सपने’ में माँ धरती और आकाश के बीच फैली हुई एक विराट उपस्थिति बन जाती है— “आकाश के चप्पे चप्पे पर तेरा नाम लिखा है मेरी माँ!”

माँ और माटी का यह संबंध भारतीय संवेदना में गहरी जड़ें रखता है। मिट्टी हमें जन्म देती है, पोषित करती है और अंततः अपने भीतर समाहित कर लेती है। कविता इस चक्र को मातृत्व की स्मृति से जोड़ती है।

कवि आगे कहते हैं— “धरती के शब्द सारे असमर्थ हैं तेरा नाम लिखने को।”

इन पंक्तियों में अतिशयोक्ति के माध्यम से उस भाव को व्यक्त किया गया है, जहाँ माँ के प्रति प्रेम सामान्य शब्दावली की सीमा से बाहर चला जाता है। अनुवाद के माध्यम से यह अनुभव एक भाषिक सीमा से दूसरी भाषा तक पहुँचता है और संकलन को व्यापक भारतीय काव्य-संवेदना से जोड़ता है।

मधु सक्सेना की कविता ‘बंजारन माँ’ , माँ की गृहस्थी को एक छोटे टीन के बक्से में समेटती है। कुछ कपड़े, एक शाल, पति की तस्वीर और बच्चों के लिए तावीज, ये वस्तुएँ माँ के जीवन के भौतिक विस्तार को दर्शाती हैं।

कविता की खूबी यह है कि वह माँ की स्मृतियों को भव्यता से नहीं, सामान्य घरेलू विवरणों से रचती है। उसके हाथों से बने पकवान, व्रत, बच्चों की चिंता और नाती-पोतों को देखकर झुकी कमर का गर्व, ये सब मिलकर एक ऐसी स्त्री की छवि बनाते हैं, जिसके जीवन में संघर्ष और स्नेह साथ-साथ चलते हैं।

माँ के लिए परिवार केवल वर्तमान नहीं है; वह उसकी स्मृतियों, आदतों और प्रार्थनाओं में भी उपस्थित रहता है।

‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ का महत्त्व उसके विषय की भावुकता भर में नहीं, बल्कि इस बात में है कि माँ को देखने के लिए इसमें अनेक दृष्टियाँ उपलब्ध हैं। कहीं माँ धरती है, कहीं संदूक में सुरक्षित स्मृति, कहीं बचपन खो चुकी लड़की, कहीं चिराग और कहीं ऐसी भाषा, जिसका पूर्ण अनुवाद संभव नहीं।

यह विविधता पुस्तक को एकरेखीय भावुक संकलन बनने से बचाती है। हालाँकि मातृत्व पर लिखी कविताओं में पुनरावृत्त भाव-बिंबों की संभावना स्वाभाविक है, फिर भी अलग-अलग कवियों की निजी स्मृतियाँ इस विषय को नए कोण प्रदान करती हैं। इस प्रकार पुस्तक का साहित्यिक मूल्य केवल उसके भावनात्मक प्रभाव में नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद सामाजिक, पारिवारिक और दार्शनिक प्रश्नों में भी है।

माँ को याद करना यहाँ अतीत में लौटना भर नहीं है। यह स्वयं से पूछना भी है कि हमारी वर्तमान जीवन-व्यवस्था में उस व्यक्ति के लिए कितना स्थान बचा है, जिसने हमारे अस्तित्व के निर्माण में सबसे पहली भूमिका निभाई।

 नाभिनाल से स्मृति तक , पढ़ते हुए लगा कि कविता का काम हमेशा उत्तर देना नहीं होता। कई बार वह हमारे भीतर ऐसे प्रश्न जगा देती है, जिनके साथ हम चुपचाप घर लौटते हैं।

माँ को लेकर लिखी गई कविताएँ हमें भावुक करती हैं, लेकिन उससे आगे जाकर वे हमें अपने व्यवहार, अपनी स्मृतियों और अपने संबंधों पर विचार करने का अवसर देती हैं। माँ के प्रति प्रेम केवल स्मरण का विषय नहीं, जीवन में निभाए जाने वाले दायित्व का प्रश्न भी है।

नाभिनाल जन्म के समय कटती है, पर उसकी स्मृति मनुष्य की चेतना में जीवन भर बनी रहती है। शायद इसीलिए माँ को याद करते हुए हम केवल अपनी माँ को नहीं पुकारते, हम अपने भीतर के उस आरंभ को पुकारते हैं, जहाँ से हमारी मनुष्यता ने पहली साँस ली थी।

‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ इसी आरंभ की कविता है। एक ऐसा काव्य-संसार, जहाँ माँ स्मृति भी है, माटी भी, मौन भी और मनुष्य होने का पहला अर्थ भी है।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, स्वतंत्र लेखक, व्यंगयकार, समालोचक 

इन दिनों लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

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≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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