श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है प्रो. अरुण कुमार भगत जी द्वारा लिखित “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०२ ☆
☆ “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” – लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक ..’संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक’
लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत (सदस्य , बिहार लोक सेवा आयोग, पटना)
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन , नयी
दिल्ली
मूल्य : 325 रु, पृष्ठ 160
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रो. अरुण कुमार भगत की यह पुस्तक पत्रकारिता के उस ‘नेपथ्य’ को सामने लाती है, जिसके बिना सूचना महज एक कच्चा माल है। आठ प्रमुख अध्यायों में विस्तृत विषय वस्तु को बिंदुवार व्याख्या कर लेखक ने संपादन को एक यांत्रिक कार्य के बजाय एक बौद्धिक और सृजनात्मक शिल्प के रूप में स्थापित किया है।
\संपादन की परिकल्पना और कला (पृष्ठ 11-40), के पहले अध्याय में लेखक ने पुस्तक की शुरुआत ‘संपादन की अवधारणा’ से की है। यहाँ संपादन को केवल त्रुटि-शोधन नहीं, बल्कि एक ‘दृष्टि’ के रूप में परिभाषित किया गया है। ‘संपादन के सोपान’ और ‘तकनीक’ वाले अध्याय यह स्पष्ट करते हैं कि एक संपादक को किन मानसिक चरणों से गुजरना पड़ता है। संपादन के महत्व को रेखांकित करते हुए पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए एक स्तरीय संदर्भ है ।
संपादन के सिद्धांत (पृष्ठ 41-54) अध्याय पुस्तक का दार्शनिक आधार है। यहाँ ‘पाठ्य-सामग्री के चयन’, ‘गठन’ और ‘प्रस्तुति’ के सिद्धांतों पर लेखक ने अनुभूत विस्तृत चर्चा की है। लेखक ने कतिपय अनुभवी संपादकों के सिद्धांतों को जोड़कर इस खंड को ऐतिहासिक संदर्भ भी प्रदान किया है, जो शोधार्थियों के लिए मूल्यवान सामग्री है। संपादकीय विभाग का ढाँचागत स्वरूप (पृष्ठ 55-74) गहन अध्ययन योग्य है। एक उत्कृष्ट समाचार पत्र या पत्रिका के पीछे की संगठनात्मक शक्ति इस आलेख में स्पष्ट होती है ।संपादकीय कक्ष (Newsroom) की कार्य-प्रणाली और संरचना को बारीकी से समझाया गया है। यह व्यवहारिक ज्ञान उन नवागत पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण है जो मीडिया संस्थानों की आंतरिक कार्य-संस्कृति को समझ कर कुछ नवाचार करना चाहते हैं।
मेरा मानना है कि शीर्षक किसी भी किताब या लेख का वह प्रवेश द्वार होता है जो अपने लालित्य से पाठक को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। लेखन का शिल्प और सौंदर्य (पृष्ठ 75-97)
शीर्षक (Headline) में यही तथ्य बौद्धिक विवेचना के आधार पर बताया गया है। प्रो. भगत ने शीर्षक के प्रकार, उसकी विशेषताओं और ‘प्रभावी शीर्षक लेखन की तकनीक’ पर जो प्रकाश डाला है, वह लेखक के स्वयं के व्यापक अनुभव का प्रमाण है। यहाँ शिल्प और सौंदर्य का सामंजस्य संपादन को एक ललित कला की श्रेणी में खड़ा कर देता है।
संपादन का शिल्प-विधान और शैली-पुस्तिका (पृष्ठ 98-108) संपादन में ‘शैली’ (Style Book) का क्या महत्व है, इस पर लेखक ने विशेष बल दिया है। भाषा-शैली की एकरूपता और शुद्धता ही किसी प्रकाशन की पहचान बनाती है। यह खंड भाषाई अनुशासन के प्रति लेखक की आदर्श प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
संपादन-प्रक्रिया, विलोम पिरामिड से चित्र-संपादन तक (पृष्ठ 109-140) अध्याय सबसे अधिक तथ्यात्मक और क्रियात्मक है। इसमें ‘आमुख (Lead) की बनावट’, ‘विलोम पिरामिड शैली’ (Inverted Pyramid) और ‘समाचार का पुनर्गठन’ जैसे गंभीर विषयों पर नवाचारी चर्चा की गई है। साथ ही, ‘चित्र-संपादन’ का समावेश यह बताता है कि विजुअल मीडिया के दौर में एक संपादक की आँखें कितनी पैनी होनी चाहिए।
मुझे स्मरण है कि मेरा एक व्यंग्य ‘कबीर से एक आत्म साक्षात्कार ‘ एक राष्ट्रीय पत्र में छपा था, लेख में, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, कुछ भी ऐसा नहीं है जो किसी की कोई भावना आहत करे , पर लेख के साथ प्रकाशित व्यंग्य चित्र के चलते एक वर्ग को लगा कि उनकी भावना आहत हुई, और उन्होंने प्रतिवाद दर्ज किया था। अतः संपादन में व्यापक समझ और दूरंदेशी वांछित होती है।
आज सोशल मीडिया के स्वसम्पादन वाला इंस्टा युग है। इधर लिखा उधर दुनिया भर में गया । जब तक एक खबर पर भरोसा करो , उसका खंडन आ जाता है। खबरों का ट्रंप कार्ड संपादक के पास ही होता है, अतः उसे सब कुछ ठीक तरीके से फैक्ट चेक के बाद ही जारी करने का साहस रखना चाहिए। इस दृष्टि कोण से यह किताब अध्ययन मनन और सीखने , पढ़ते , गुनते रहने वाली सामग्री का विशद कलेवर समेटे हुए है।
मेरी समझ में असंपादित न्यूज की हड़बड़ी के चलते ही आगरा समिट विफल हो गई थी। अतः संपादन का महत्व निर्विवाद है।
पुस्तक में पृष्ठ-सज्जा और अभिकल्प (पृष्ठ 141-160) पर पूरा अध्याय है।
पुस्तक का समापन ‘पृष्ठ-सज्जा’ (Page Layout) के संतुलन और सौंदर्यबोध के साथ होता है।
एक संपादक को केवल शब्दों का ही नहीं, बल्कि रिक्त स्थान और विजुअल बैलेंस का भी ज्ञान होना चाहिए, यह इस खंड का मुख्य संदेश है। प्रकाशन रीडर्स फ्रेंडली होना चाहिए। छोटे अक्षरों में बेतहाशा पठनीय सामग्री उड़ेल देना उचित नहीं होता।
यह पुस्तक संपादन का संपूर्ण कोश है।
प्रो. अरुण कुमार भगत ने संपादन-कला के हर सूक्ष्म तंतु को स्पर्श कर उसे सरल शब्दों में विस्तार पूर्वक समझाया है। अध्यायों का प्रवाह ‘सिद्धांत’ से शुरू होकर ‘प्रस्तुति’ के अंतिम पड़ाव तक जाता है। ‘सूचना विस्फोट’ के इस दौर में, जहाँ विश्वसनीयता का संकट है, यह पुस्तक संपादकीय शुचिता और बौद्धिक प्रखरता का मार्ग प्रशस्त करती है।
पत्रकारिता जगत से जुड़े हर छोटे बड़े के लिए यह पुस्तक एक मार्गदर्शिका है । किताब संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला में पारंगत बनाती है।
पुस्तक अमेजन पर सुलभ है। संदर्भ हेतु अपने स्टडी सेल्फ में रखने की अनुशंसा अपने पाठकों को करता हूं।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
























